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कहानी

दारियु के प्रति
दाल्तोन ट्रेविसों

अनुवाद - गरिमा श्रीवास्तव


दारियु जल्दी-जल्दी चलकर आ रहा था, बाएँ हाथ में छाता लिए, रास्ते के कोने में थोड़ा मुड़कर धीरे-धीरे एक घर की दीवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया। उसके बाद बारिश से भीगे फुटपाथ पर पीठ दीवार से टिकाए-टिकाए ही, हाथ का पाइप वहीं जमीन पर रख वह धप से बैठ गया। दो-तीन राहगीरों ने उसे घेर लिया, वे जानना चाहते थे कि क्या उसकी तबियत खराब है? दारियु ने मुँह खोला, एक जोड़ा होंठ हिले भी लेकिन उन्हें कोई उत्तर सुनाई नहीं पड़ा। सफेद कपड़े वाले एक सज्जन ने कहा, "जरूर दिल का दौरा पड़ा है"। दारियु अलसा कर एक ओर लुढ़क गया था, अब वह दीवार के पास से सरककर फुटपाथ पर आ चुका था, पाइप बुझ चुका था। एक ग्वालेनुमा व्यक्ति ने लोगों से कहा कि वे जरा हटकर खड़े हों, जिससे दारियु साँस ले सके। दारियु की जैकेट, बेल्ट, टाई, जूते सब खोलकर अलग कर दिए गए थे; अभी वे जूते खोल ही रहे थे कि दारियु के गले से एक विचित्र किस्म की घरघराहट की आवाज के साथ उसके मुँह के किनारे से बजबजाता हुआ सफेद झाग बाहर निकल आया। वहाँ पर मौजूद प्रत्येक व्यक्ति भीड़ से उचक-उचक कर देखने की कोशिश कर रहा था पर दारियु को कोई देख नहीं पा रहा था। उस मुहल्ले के सभी रहनेवाले अब इसी विषय पर बातचीत कर रहे थे, बच्चों को कच्ची नींद से जगाया जा चुका था, लोग जैसे-तैसे, मुड़े-तुड़े कपड़ों में अपनी खिड़कियों के पास आकर खड़े हो गए थे। एक मोटा आदमी दारियु अब भी दीवार से टेक लेकर बैठा था और उसके पाइप से अब भी धुआँ निकल रहा था।

लेकिन अब उसका पाइप या छाता कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

पके सफेद बालों वाली एक बूढ़ी एकाएक चिल्लाई कि देखो वह मर रहा है। कई लोग उसे उठाकर सड़क के किनारे खड़ी टैक्सी के पास लेकर गए। उसकी देह के आधे से अधिक भाग को जब टैक्सी के भीतर डाला जा चुका था तभी चालक ने प्रतिवाद किया कि यदि यह बीच रास्ते में ही मर गया तो! अब तय किया गया कि एंबुलेंस बुलाई जाय। दारियु को किसी तरह से उठा-पठाकर फिर से दीवार से टिका कर बैठा दिया गया था।

उसके जूतों का जोड़ा और मोती-जड़ा टाईपिन अब नहीं था।

एक आदमी ने सूचना दी कि बगल वाले रास्ते पर दवा की दुकान है। दारियु को सड़क के किनारे से इतनी दूर लेकर नहीं जाया जा सकता था क्योंकि दवा-दुकान ब्लॉक के अंतिम सिरे पर थी और इसके अलावा दारियु का शरीर वजनी भी तो बहुत था। उसे बीच की दुकान के दरवाजे के सामने सुला दिया गया जहाँ एक घंटे के भीतर ही मक्खियों के झुंड के झुंड ने उसके चेहरे को लगभग ढक लिया था। मक्खियों को भगाने का कोई उपक्रम उसमें नहीं देखा गया। इस घटना के दर्शकों से आसपास के कैफे की, अब तक खाली पड़ी मेजें भर गई थीं। अब वहाँ रात के विशेष खान-पान का आनंद लिया जा रहा था। जिस तरह से दारियु को रख दिया गया था, वह वैसे ही दुकान की सीढ़ी के नीचे गुड़ी-मुड़ी होकर पड़ा रहा।

हाथ की घड़ी अब नहीं थी।

एक तीसरा आदमी दारियु के सभी कागज-पत्तर देखने की बात करने लगा। उसके जेब से सारे कागज-पत्तर निकाल कर उसकी सफेद कमीज पर सजा कर रख दिए गए। सभी उसके नाम, उम्र, आँखों के रंग, पहचान-चिह्न आदि से परिचित होने लगे। लेकिन उसके पहचान-पत्र पर पता किसी दूसरे शहर का था। लगभग दस लोगों के कौतूहल भरे समूह ने उसे रास्ते पर घेर रखा था, अब रास्ता और फुटपाथ मिलकर एक हो गए थे। तभी उनके बीच हलचल दीखी। पुलिस आ गई थी - भीड़ को चीरती काली वैन मानो तैरती हुई-सी आ गई थी। बहुत से लोग आपस में टकराते, दारियु के शरीर के ऊपर गिरते-पड़ते पीछे हटने लगे। कितनी ही बार कितने पाँवों से दारियु का शरीर कुचला जाने लगा। पुलिस वालों ने आगे बढ़कर मृत देह को देखा लेकिन उसकी शिनाख्त नहीं हो सकी। उसकी जेब खाली थी, बची रह गई थी उँगली में पहनी हुई शादी की अँगूठी जिसे साबुन के बिना निकाल पाना संभव नहीं था। तत्क्षण निष्कर्ष निकाला गया कि यह हिंसा की वारदात है। बचे हुए लोगों में से किसी ने कहा कि वह मर गया है! मर गया है! अब धीरे-धीरे भीड़ छँटने लगी। मरने में दारियु को लगभग दो घंटे का वक्त लगा था। किसी को विश्वास नहीं हुआ कि वह उसका अंतिम समय था।

अब सभी को उसमें मृतक के लक्षण ही दिखाई पड़ने लगे।

एक सहृदय आदमी ने दारियु की जैकेट खोल उसके सिरहाने डाल दी और दोनों बाँहें उसकी छाती पर रख दी, पर कोशिश करके भी दारियु की आँखें या मुँह बंद नहीं कर पाया। मुँह से निकला झाग अब सूख चुका था, दारियु अब एक मृतक मात्र था। भीड़ जल्द ही छँटने लगी, कैफे की मेजें पहले की मानिंद खाली हो चुकी थी। कई लोग जो अपनी खिड़कियों में हाथ को सहारा देने के लिए तकिए लेकर खड़े थे, अब भी खड़े-खड़े तमाशा देख रहे थे।

एक काला बच्चा नंगे पैर मृत शरीर के पास एक मोमबत्ती जला कर रख गया। ऐसा लग रहा था मानो दारियु वर्षों पहले मर चुका है - अनगिनत बारिशों में भीगे हुए लुटे-पिटे मृत मनुष्य की एक छवि।

एक-एक करके सारी खिड़कियाँ बंद हो चुकी थीं।

तीन घंटे बाद भी दारियु किस हिंसा की प्रतीक्षा में है - सिर पर पत्थर, जैकेट गायब, उँगली अँगूठीविहीन और मोमबत्ती, जो फिर से शुरू हुई बारिश की पहली बूँद से अधजली ही बुझ चुकी थी।


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