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कविता

इसी कोलाहल में
पंकज चतुर्वेदी


इसी भीड़ में संभव है प्रेम
इसी तुमुल कोलाहल में
जब सूरज तप रहा है आसमान में
जींस और टी-शर्ट पहने वह युवती
बाइक पर कसकर थामे है
युवक चालक की देह

इसी भीड़ में
संभव है प्रेम


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हिंदी समय में पंकज चतुर्वेदी की रचनाएँ