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कविता

न मेरे पास
पंकज चतुर्वेदी


न मेरे पास मोरपंख का मुकुट था
न धनुष तोड़ने का पराक्रम
कंठ भी निरा कंठ ही था
किसी के ज़हर से
नीला न हो सका

क्षीरसागर में बिछी हुई
सुखद शय्या नहीं थी
नहीं थी संपत्ति से मैत्री

देवताओं में ईर्ष्या जगानेवाली
ऐसी तपस्या न थी
जिसे भंग करने के लिए
तुम्हारे प्रेम का
अभिनय ज़रूरी होता

ययाति की तरह यौवन न था
लौटकर आता हुआ उत्साह से
और वह कौशल भी नहीं
जो काँपते प्रतिबिंब के बल पर
किसी की आँख को घायल करे

तुम्हें मंत्रमुग्ध कर देने को
मेरे पास बाँसुरी न थी
और न वह छल
जो सिर्फ़ जल का आवरण है
तुम्हारी देह पर
तुम्हारे स्वप्न में
भीगा हुआ कमल है


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