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उपन्यास

चंद्रकांता संतति
खंड 3

देवकीनंदन खत्री

अनुक्रम दसवां भाग पीछे     आगे

बयान - 1

अब हम थोड़ा-सा हाल तिलिस्म का लिखना उचित समझते हैं। पाठकों को याद होगा कि कुंअर इन्द्रजीतसिंह कमलिनी के हाथ से तिलिस्मी खंजर लेकर उस गड़हे या कुएं में कूद पड़े जिसमें अपने छोटे भाई आनन्दसिंह को देखना चाहते थे। जिस समय कुमार ने तिलिस्मी खंजर कुएं के अन्दर किया और उसका कब्जा दबाया तो उसकी रोशनी से कुएं के अन्दर की पूरी-पूरी कैफियत दिखाई देने लगी। उन्होंने देखा कि कुएं की गहराई बहुत ज्यादा नहीं है, बनिबस्त ऊपर के नीचे की जमीन बहुत चौड़ी मालूम पड़ी, और किनारे की तरफ एक आदमी किसी को अपने नीचे दबाये हुए बैठा उसके गले पर खंजर फेरना ही चाहता है।

कुंअर इन्द्रजीतसिंह को यकायक खयाल गुजरा कि यह जुल्म कहीं कुंअर आनन्दसिंह पर ही न हो रहा हो! छोटे भाई की सच्ची मुहब्बत ने ऐसा जोश मारा कि वह अपने को एक पल के लिए भी रोक न सके क्योंकि साथ ही इस बात का भी गुमान था कि देर होने से कहीं उसका काम तमाम न हो जाय, इसलिए बिना कुछ सोचे और बिना किसी से कहे-सुने इन्द्रजीतसिंह उस गड़हे में कूद पड़े। मालूम हुआ कि वह किसी धातु की चादर पर जो जमीन की तरह से मालूम होती थी, गिरे हैं क्योंकि उनके गिरने के साथ ही वह जमीन दो-तीन दफे लचकी और एक प्रकार की आवाज भी हुई। चमकता हुआ एक तिलिस्मी खंजर उनके हाथ में था जिसकी रोशनी में और टटोलने से मालूम हुआ कि वे दोनों आदमी वास्तव में पत्थर के बने हुए हैं जिन्हें देखकर वे गड़हे के अन्दर कूदे थे। इसके बाद कुमार ने इस विचार से ऊपर की तरफ देखा कि कमलिनी या राजा गोपालसिंह को पुकारकर यहां का कुछ हाल कहें मगर गड़हे का मुंह बन्द पाकर लाचार हो रहे। ऊंचाई पर ध्यान देने से मालूम हुआ कि इस गड़हे का ऊपर वाला मुंह बन्द नहीं हुआ, बल्कि बीच में कोई चीज ऐसी आ गई, जिससे रास्ता बन्द हो गया है।

कुमार ने तिलिस्मी खंजर का कब्जा इसलिए ढीला किया कि वह रोशनी बन्द हो जाय जो उसमें से निकल रही है और मालूम हो कि इस जगह बिलकुल अंधेरा ही है या कहीं से कुछ चमक या रोशनी भी आती है, पर वहां पूरा अन्धकार था, हाथ को हाथ दिखाई नहीं देता था, अस्तु लाचार होकर कुमार ने फिर तिलिस्मी खंजर का कब्जा दबाया और उसमें से बिजली की तरह चमक पैदा हुई। उसी रोशनी में कुमार ने चारों तरफ इस आशा से देखना शुरू किया कि किसी तरफ आनन्दसिंह की सूरत दिखाई पड़े मगर सिवाय एक चांदी के सन्दूक के जो उसी जगह पड़ा हुआ था और कुछ दिखाई न दिया। यहां तीन तरफ पक्की दीवार थी जिसमें छोटे-छोटे दरवाजे और एक तरफ जाने का रास्ता इस ढंग का था जिसे हर तौर पर सुरंग कह सकते हैं। कुमार उसी सुरंग की राह आगे की तरफ बढ़े मगर ज्यों-ज्यों आगे जाते थे सुरंग पतली होती जाती थी और मालूम होता था कि हम ऊंची जमीन पर चढ़े चले जा रहे हैं। लगभग सौ कदम जाने के बाद सुरंग खतम हुई और अन्त में एक दरवाजा मिला जो जंजीर से बन्द था और कुंडे में एक ताला लगा हुआ था। कुमार ने खंजर मार के जंजीर काट डाली और धक्का देकर दरवाजा खोला तो सामने उजाला नजर आया। अब तिलिस्मी खंजर की कोई आवश्यकता न थी इसलिए उसका कब्जा ढीला किया और दरवाजा लांघकर दूसरी तरफ चले गये। कुमार ने अपने को एक हरे-भरे बाग में पाया औैर देखा कि वह बाग मामूली तौर का नहीं है बल्कि उसकी बनावट विचित्र ढंग की है, फूलों के पेड़ बिल्कुल न थे पर तरह-तरह के मेवों के पेड़ लगे हुए थे। हर एक पेड़ के चारों ओर दो-दो हाथ ऊंची दीवार घिरी हुई थी और बीच में मिट्टी भरने के कारण खासा चबूतरा मालूम पड़ता था। इसके अतिरिक्त अर्थात् पेड़ों के चबूतरों को छोड़कर बाकी जितनी जमीन उस बाग में थी सब संगमरमर का फर्श था। पूरब तरफ से एक नहर बाग के अन्दर आई हुई थी और पन्द्रह-बीस हाथ के बाद छोटी-छोटी शाखों में फैल गई थी। जो नहर बाग के अन्दर आई थी उसकी चौड़ाई ढाई हाथ से कम न थी, मगर बाग के अन्दर संगमरमर की छोटी-छोटी सैकड़ों नालियों में उसका जल फैल गया था। उन नालियों के दोनों तरफ की दीवार तो संगमरमर की थी मगर बीच की जमीन पक्की न थी और इसी सबब से यहां की जमीन बहुत तर थी और पेड़ सूखने नहीं पाते थे। बाग के चारों तरफ ऊंची दीवार पर पूरब तरफ एक दालान और कोठरियां थीं, पश्चिम तरफ की दीवार के पास एक संगीन कुआं था और बाग के बीचोंबीच में एक मन्दिर था।

कुमार ने पेड़ों से कई फल तोड़ के खाए और चश्मे का पानी पीकर भूख-प्यास की शान्ति की ओर इसके बाद घूम-घूमकर देखने लगे। उन्हें कुंअर आनन्दसिंह के विषय में चिन्ता थी और चाहते थे कि किसी तरह शीघ्र उनसे मुलाकात हो।

चारों तरफ घूम-फिरकर देखने के बाद कुमार उस मन्दिर में पहुंचे जो बाग के बीचोंबीच में था। वह मन्दिर बहुत छोटा था और उसके आगे का सभामंडप भी चार-पांच आदमियों से ज्यादा के बैठने लायक न था। मन्दिर में प्रतिमा या शिवलिंग की जगह एक छोटा-सा चबूतरा था और इसके ऊपर एक भेड़िए की मूरत बैठाई हुई थी। कुमार उसे अच्छी तरह देखभालकर बाहर निकल आए और सभामंडप में बैठकर खून से लिखी हुई किताब पढ़ने लगे। अब उन्हें उस किताब का मतलब साफ-साफ समझ में आता था। जब तक बखूबी अंधेरा नहीं हुआ और निगाह ने काम दिया तब तक वे उस किताब को पढ़ते रहे, इसके बाद किताब संभालकर उसी जगह लेट गए और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए।

उस बाग में कुंअर इन्द्रजीतसिंह को दो दिन बीत गए। इस बीच में वे कोई ऐसा काम न कर सके जिससे अपने भाई कुंअर आनन्दसिंह को खोज निकालते या बाग से बाहर निकल जाते या तिलिस्म तोड़ने में ही हाथ लगाते, हां, इन दो दिन के अन्दर वे खून से लिखी हुई तिलिस्मी किताब को अच्छी तरह पढ़ और समझ गये बल्कि उसके मतलब को इस तरह दिल में बैठा लिया कि अब उस किताब की उन्हें कोई जरूरत न रही। ऐसा होने से तिलिस्म का पूरा-पूरा हाल उन्हें मालूम हो गया और वे अपने को तिलिस्म तोड़ने लायक समझने लगे। खाने-पीने के लिए उस बाग में मेवों और पानी की कुछ कमी न थी।

तीसरे दिन दो पहर दिन चढ़े बाद कुछ कार्रवाई करने के लिए कुमार फिर उस भेड़िये की मूरत के पास गए जो मन्दिर में चबूतरे के ऊपर बैठाई हुई थी। वहां कुमार को अपनी कुल ताकत खर्च करनी पड़ी। उन्होंने दोनों हाथ लगाकर भेड़िये को बाईं तरफ इस तरह घुमाया जैसे कोई पेंच घुमाया जाता है। तीन चक्कर घूमने के बाद वह भेड़िया चबूतरे से अलग हो गया और जमीन के अन्दर से घरघराहट की आवाज आने लगी। कुमार उस भेड़िये को एक किनारे रखकर बाहर निकल आए और राह देखने लगे कि अब क्या होता है। घण्टे भर तक बराबर वह आवाज आती रही और फिर धीरे-धीरे कम होकर बन्द हो गई। कुमार फिर उस मन्दिर के अन्दर गए और देखा कि वह चबूतरा जिस पर भेड़िया बैठा हुआ था, जमीन के अन्दर धंस गया और नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां दिखाई दे रही हैं। कुमार बेधड़क नीचे उतर गए। वहां पूरा अन्धकार था इसलिए तिलिस्मी खंजर से चांदनी करके चारों तरफ देखने लगे। यह एक कोठरी थी जिसकी चौड़ाई बीस हाथ और लम्बाई पच्चीस हाथ से ज्यादा न होगी। चारों तरफ की दीवारों में छोटे- छोटे कई दरवाजे थे जो इस समय बन्द थे। कोठरी के चारों कोनों में पत्थर की चार मूरतें एक ही रंग-ढंग की और एक ही ठाठ से खड़ी थीं, सूरत-शक्ल में कुछ भी फर्क न था, या था भी तो केवल इतना ही कि एक मूरत के हाथ में खंजर और बाकी तीन मूरतों के हाथ में कुछ भी न था।

कुमार पहले उसी मूरत के पास गए जिसके हाथ में खंजर था। पहले उसकी उंगलियों की तरफ ध्यान दिया। बाएं हाथ की उंगली में अंगूठी थी जिसे निकालकर पहिन लेने के बाद खंजर ले लिया और कमर में लगाकर धीरे से बोले, ‘‘इस तिलिस्म में ऐसे तिलिस्मी खंजर के बिना वास्तव में काम नहीं चल सकता, अब आनन्दसिंह मिल जाय तो यह खंजर उसे दे दिया जाय।’’

पाठक समझ ही गये होंगे कि मूरत के हाथ से जो खंजर कुमार ने लिया, वह उसी प्रकार का तिलिस्मी खंजर था जैसा कि पहले से एक कमलिनी की बदौलत कुमार के पास था। इस समय कुंअर इन्द्रजीतसिंह जो कुछ कार्रवाई कर रहे हैं बल्कि खून से लिखी हुई तिलिस्मी किताब के मतलब को समझ अपनी विमल बुद्धि से जांच और ठीक करके करते हैं, तथा आगे के लिए भी पाठकों को ऐसा ही समझना चाहिए।

अब कुमार उन दरवाजों की तरफ गौर से देखने लगे जो चारों तरफ की दीवारों में दिखाई दे रहे थे। उन दरवाजों में केवल चार दरवाजे चार तरफ असली थे और बाकी के दरवाजे नकली थे अर्थात् चार दरवाजों को छोड़कर बाकी दरवाजों के केवल निशान दीवारों में थे मगर ये निशान भी ऐसे थे कि जिन्हें देखने से आदमी पूरा-पूरा धोखा खा जाय।

कुमार पूरब तरफ की दीवार की ओर गये और उस तरफ जो दरवाजा था उसे जोर से लात मारकर खोल डाला, इसके बाद बाएं तरफ के कोने में जो मूरत थी उसे बगल में दाब उठाना चाहा मगर वह उठ न सकी क्योंकि उनके दाहिने हाथ में वह चमकता हुआ तिलिस्मी खंजर था, आखिर कुमार ने खंजर कमर में रख लिया। यद्यपि ऐसा करने से वहां पूर्ण रूप से अन्धकार हो गया मगर कुमार ने इसका कुछ विचार न करके अंधेरे ही में दोनों हाथ उस मूरत की कमर में फंसाकर जोर किया और उसे जमीन से उखाड़कर धीरे-धीरे उस दरवाजे के पास लाए जिसे लात मारकर खोला था। जब चौखट के पास पहुंचे तो उस मूरत को जहां तक जोर से बन पड़ा दरवाजे के अन्दर फेंक दिया और फुर्ती से तिलिस्मी खंजर हाथ में ले रोशनी करके सीढ़ी की राह कोठरी के बाहर निकल आये अर्थात् फिर उसी बाग में चले आये और मन्दिर से कुछ दूर हटकर खड़े हो गये।

थोड़ी देर तो कुमार को ऐसा मालूम हुआ कि जमीन कांप रही है और उसके अन्दर बहुत-सी गाड़ियां दौड़ रही हैं। आखिर धीरे-धीरे कम होकर ये दोनों बातें जाती रहीं। इसके बाद कुमार फिर मन्दिर के अन्दर हो गए और सीढ़ियों की राह उस तहखाने में उतर गए जहां पहले गए थे। इस समय वहां तिलिस्मी खंजर की रोशनी की कोई आवश्यकता न थी क्योंकि इस समय कई छोटे- छोटे सुराखों में से रोशनी बखूबी आ रही थी जिसका पहले नाम-निशान भी न था। कुमार चारों तरफ देखने लगे मगर पहले की बनिस्बत कोई नई बात दिखाई न दी। आखिर पूरब तरफ की दीवार के पास गए और उस दरवाजे के अन्दर झांक के देखा जिसे लात मारकर खोला गया था या जिसके अन्दर मूरत को जोर से फेंका था। इस समय इस कोठरी के अन्दर भी चांदना था और वहां की हर एक चीज दिखाई दे रही थी। यह कोठरी बहुत लम्बी-चौड़ी न थी मगर दीवारों में छोटे-छोटे कई खुले दरवाजे दिखाई दे रहे थे, जिससे मालूम होता था कि यहां से कई तरफ जाने के लिए सुरंग या रास्ता है। कुमार ने उस मूरत को गौर से देखा जिसे उस कोठरी के अन्दर फेंका था। उस मूरत की अवस्था ठीक वैसी हो रही थी जैसे कि चूने की कली की उस समय होती है जब थोड़ा-सा पानी उस पर छोड़ा जाता है, अर्थात् टूट-फूट के वह बिल्कुल ही बर्बाद हो चुकी थी। उसके पेट में एक चमकती हुई चीज दिखाई दे रही थी जो पहले तो उसके पेट के अन्दर रही होगी मगर अब पेट फट जाने के कारण बाहर हो रही थी। कुमार ने वह चमकती हुई चीज उठा ली और तहखाने के बाहर निकल मन्दिर के मण्डप में बैठकर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए।

थोड़ी ही देर बाद धमधमाहट की आवाज से मालूम हुआ कि मन्दिर के अन्दर तहखाने वाली सीढ़ियों पर कोई चढ़ रहा है। कुमार उसी तरफ देखने लगे। यकायक कुंअर आनन्दसिंह आते हुए दिखाई पड़े। बड़े कुमार खुशी के मारे उठ खड़े हुए और आंखों में प्रेमाश्रु की दो-तीन बूंदें दिखाई देने लगीं। आनन्दसिंह दौड़कर अपने बड़े भाई के पैरों पर गिर पड़े। इन्द्रजीतसिंह ने झट से उठाकर गले लगा लिया। जब दोनों भाई खुशी-खुशी उस जगह पर बैठ गए तब इन्द्रजीतसिंह ने पूछा, ‘‘कहो, तुम किस आफत में फंस गए थे और क्योंकर छूटे’ कुंअर आनन्दसिंह ने अपने फंस जाने और तकलीफ उठाने का हाल अपने बड़े भाई के सामने कहना शुरू किया।

तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में कुंअर आनन्दसिंह जिस तरह अपने बड़े भाई से बिदा होकर खूंटियों वाले तिलिस्मी मकान के अन्दर गए थे और चांदी वाले सन्दूक में हाथ डालने के कारण फंस गये थे, उसका इस जगह दोहराना पाठकों का समय नष्ट करना है, हां वह हाल कहने के बाद फिर जो कुछ हुआ और कुमार ने अपने बड़े भाई से बयान किया उसका लिखना आवश्यक है।

छोटे कुमार ने कहा - ‘‘जब मेरा हाथ सन्दूक में फंस गया तो मैंने छुड़ाने के लिए बहुत कुछ उद्योग किया मगर कुछ न हुआ और घण्टों तक फंसा रहा। इसके बाद एक आदमी चेहरे पर नकाब डाले हुए मेरे पास आया और बोला, ‘‘घबराइए मत, थोड़ी देर और सब्र कीजिए, मैं आपको छुड़ाने का बन्दोबस्त करता हूं।’’ इस बीच में वह जमीन हिलने लगी जहां मैं था, बल्कि तमाम मकान तरह-तरह के शब्दों से गूंज उठा। ऐसा मालूम होता था मानो जमीन के नीचे सैकड़ों गाड़ियां दौड़ रही हैं। वह आदमी जो मेरे पास आया था, यह कहता हुआ ऊपर की तरफ चला गया कि ‘‘मालूम होता है कुमार और कमलिनी ने इस मकान के दरवाजे पर बखेड़ा मचाया है, मगर यह काम अच्छा नहीं किया।’’ थोड़ी ही देर बाद वह नकाबपोश नीचे उतरा और बराबर नीचे चला गया, मैं समझता हूं कि दरवाजा खोलकर आपसे मिलने गया होगा अगर वास्तव में आप ही दरवाजे पर होंगे।’’

इन्द्रजीतसिंह - हां दरवाजे पर उस समय मैं ही था और मेरे साथ कमलिनी और लाडिली भी थीं, अच्छा, तब क्या हुआ

आनन्दसिंह - तो क्या आपने कोई कार्रवाई की थी

इन्द्रजीतसिंह - की थी, उसका हाल पीछे कहूंगा, पहले तुम अपना हाल कहो।

आनन्दसिंह ने फिर कहना शुरू किया -

‘‘उस आदमी को नीचे गये हुए चौथाई घड़ी भी न हुई होगी कि जमीन यकायक जोर से हिली और मुझे लिए हुए सन्दूक जमीन के अन्दर घुस गया, उसी समय मेरा हाथ छूट गया और सन्दूक से अलग होकर इधर-उधर मैं टटोलने लगा क्योंकि वहां बिल्कुल ही अंधकार था, यह भी न मालूम होता था कि किधर दीवार है और किधर जाने का रास्ता है। ऊपर की तरफ, जहां सन्दूक धंस जाने से गड्ढा हो गया था देखने से भी कुछ मालूम न होता था, लाचार मैंने एक तरफ का रास्ता लिया और बराबर ही चलते जाने का विचार किया परन्तु सीधा रास्ता न मिला, कभी ठोकर खाता, कभी दीवार में अड़ता, कभी दीवार थामे घूमकर चलना पड़ता। जब दुःखी हो जाता तो पीछे की तरफ लौटना चाहता था, मगर लौट न सकता था क्योंकि लौटते समय तबीयत और भी घबड़ाती और गर्मी मालूम होती थी, लाचार आगे की तरफ बढ़ना पड़ता। इस बात को खूब समझता था कि मैं आगे ही की तरफ बढ़ता हुआ बहुत दूर नहीं जा रहा हूं बल्कि चक्कर खा रहा हूं, मगर क्या करूं लाचार था, अक्ल कुछ काम न करती थी। इस बात का पता लगाना बिल्कुल ही असम्भव था कि दिन है कि रात, सुबह है या शाम, बल्कि वही दिन है या कि दूसरा दिन, मगर जहां तक मैं सोच सकता हूं कि इस खराबी में आठ-दस पहर बीत गये होंगे। कभी तो मैं जीवन से निराश हो जाता, कभी यह सोचकर कुछ ढाढ़स होती कि आप मेरे छुड़ाने का जरूर कुछ उद्योग करेंगे। इसी बीच में मुझे कई खुले हुए दरवाजों के अन्दर पैर रखने और फिर उसी या दूसरे दरवाजे की राह से बाहर निकलने की नौबत आई, मगर छुटकारे की कोई सूरत नजर न आई। अन्त में एक कोठरी के अन्दर पहुंचकर बदहवास हो जमीन पर गिर पड़ा क्योंकि भूख-प्यास के मारे दम निकल जाता था। इस अवस्था में भी कई पहर बीत गये, आखिर इस समय से घण्टे भर पहले मेरे काम में आवाज आई जिससे मालूम हुआ कि इस कोठरी के बगल वाली कोठरी का दरवाजा किसी ने खोला है। मुझे यकायक आपका खयाल हुआ। थोड़ी ही देर बाद जमीन हिलने लगी और तरह-तरह के शब्द होने लगे। आखिर यकायक उजाला हो गया, तब मेरी जान में जान आई, बड़ी मुश्किल से मैं उठा, सामने का दरवाजा खुला हुआ पाया, निकल के दूसरी कोठरी में पहुंचा जहां दरवाजे के पास ही देखा कि पत्थर का एक आदमी पड़ा है जिसका शरीर पानी में पड़े हुए चूने की कली की तरह फूला-फटा हुआ है। इसके बाद मैं तीसरी कोठरी में गया और फिर सीढ़ियां चढ़कर आपके पास पहुंचा।’’

कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपने छोटे भाई के हाल पर बहुत अफसोस किया और कहा - ‘‘यहां मेवों की और पानी की कोई कमी नहीं है, पहले तुम कुछ खा-पी लो, फिर मैं अपना हाल तुमसे कहूंगा।’’

दोनों भाई वहां से उठे और खुशी-खुशी मेवेदार पेड़ों के पास जाकर पके हुए और स्वादिष्ट मेवे खाने लगे। छोटे कुमार बहुत भूखे और सुस्त हो रहे थे, मेवे खाने और पानी पीने से उनका जी ठिकाने हुआ और फिर दोनों भाई उसी मंदिर के सभा-मण्डप में आ बैठे तथा बातचीत करने लगे। कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपना पूरा-पूरा हाल अर्थात् जिस तरह यहां आये थे और जो कुछ किया था आनन्दसिंह से कह सुनाया और इसके बाद कहा, ‘‘खून से लिखी इस किताब को अच्छी तरह पढ़ जाने से मुझे बहुत फायदा हुआ। यदि तुम भी इसे इसी तरह पढ़ जाओ और याद कर जाओ तो फिर इसकी आवश्यकता न रहे और दोनों भाई शीघ्र ही इस तिलिस्म को तोड़ के नाम और दौलत पैदा करें। साथ ही इसके यह बात भी समझ लो कि बाग में आकर तुम्हारा पता लगाने की नीयत से जो कुछ मैंने किया, उससे इतना नुकसान अवश्य हुआ कि अब बिना तिलिस्म तोड़े हम लोग यहां से निकल नहीं सकते।’’

आनन्दसिंह - (कुछ सोचकर) यदि ऐसा ही है और आपको निश्चय है कि इस रिक्तग्रंथ के पढ़ जाने से हम लोग अवश्य तिलिस्म तोड़ सकेंगे तो मैं इसी समय इसका पढ़ना आरम्भ करता हूं, परन्तु इसमें बहुत से शब्द ऐसे हैं जिनका मतलब समझ में नहीं आता...।

इन्द्रजीतसिंह - ठीक है, मगर मैं अभी कह चुका हूं कि तुम्हें खोजता हुआ जब मैं खूंटियों वाले मकान के पास पहुंचा तो राजा गोपालसिंह ने...।

आनन्दसिंह - (बात काटकर) जी हां, मुझे बखूबी याद है, आपने कहा था कि राजा गोपालसिंह ने कोई ऐसी तरकीब आपको बताई है कि जिससे केवल रिक्तग्रंथ ही नहीं बल्कि हर एक तिलिस्मी किताब को पढ़कर उसका मतलब आप बखूबी समझ सकेंगे, अस्तु, मेरे कहने का मतलब यह था कि जब तक आप वह मुझे न बताएंगे तब तक...।

इन्द्रजीतसिंह - (हंसकर) इतनी उलझन डालने की क्या जरूरत थी! मैं तो स्वयं ही वह भेद तुमसे कहने को तैयार हूं, अच्छा सुनो।

कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी किताबों को पढ़कर समझने का भेद जो राजा गोपालसिंह से सुना था, आनन्दसिंह को बताया। इतने ही में मन्दिर के पीछे की तरफ चिल्लाने की आवाज आई, तो दोनों भाइयों का ध्यान एकदम उस तरफ चला गया और तब यह आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘अच्छा-अच्छा, तू मेरा सिर काट ले। मैं भी यही चाहती हूं कि अपनी जिन्दगी में इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को दुःखी न देखूं। हाय इन्द्रजीतसिंह, अफसोस, इस समय तुम्हें मेरी कुछ भी खबर न होगी!’’

इस आवाज को सुनकर इन्द्रजीतसिंह बेचैन हो गये और जल्दी से आनन्दसिंह से यह कहते हुए कि ‘कमलिनी की आवाज मालूम पड़ती है!’ मन्दिर के पीछे की तरफ झपटे और आनन्दसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले।

 

 

 

बयान - 2

अब हम फिर मायारानी की तरफ लौटते हैं और उसका हाल लिख कई गुप्त भेदों को लिखते हैं। मायारानी भी उस चीठी को पूरा-पूरा पढ़ न सकी और बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ी। नागर तुरन्त उठी और भंडरिये में से एक सुराही निकाल लाई जिसमें बेदमुश्क का अर्क था। वह अर्क मायारानी के मुंह पर छिड़का जिससे थोड़ी देर बाद वह होश में आई और नागर की तरफ देखकर बोली, ‘‘हाय अफसोस, क्या सोचा था और क्या हो गया।’’

नागर - खैर, जो होना था सो हो गया, अब इस तरह बदहवास होने से काम नहीं चलेगा। उठो और अपने को सम्हालो, सोचो-विचारो और निश्चय करो कि अब क्या करना चाहिए।

मायारानी - अफसोस, उस कम्बख्त ऐयार ने तो बड़ा भारी धोखा दिया, और मुझसे भी बड़ी भारी भूल हुई कि लक्ष्मीदेवी वाला भेद उसके सामने जुबान से निकाल बैठी! यद्यपि उस इशारे से वह कुछ समझ न सकेगा परन्तु जिस समय गोपालसिंह के सामने लक्ष्मीदेवी का नाम लेगा और वे बातें कहेगा जो मैंने उस दारोगा रूपधारी ऐयार से कही थीं तो वह बखूबी समझ जायगा और मेरे विषय में उसका क्रोध सौगुना हो जायगा। यदि मेरे बारे में वह किसी तरह की बदनामी समझता भी था, तो अब न समझेगा। हाय, अब जिन्दगी की कोई आशा न रही।

नागर - लक्ष्मीदेवी का नाम ले के जो कुछ तुमने कहा, उससे मुझे भी शक हो गया है। क्या असल में...।

मायारानी - ओफ, यह भेद सिवाय असली दारोगा के किसी को भी मालूम नहीं। आज - (कुछ रुककर) नहीं, अब भी मैं उस भेद को छिपाने का उद्योग करूंगी और तुझसे कुछ भी न कहूंगी, बस अब लक्ष्मीदेवी का नाम तुम मेरे सामने मत लो। (चीठी की तरफ इशारा करके) अच्छा इस चीठी को तुम एक दफा फिर से पढ़ जाओ।

नागर ने वह चीठी उठा ली जिसके पढ़ने से मायारानी की वह हालत हुई थी और पुनः उसे पढ़ने लगी।

चीठी -

‘‘बुरे कामों का करने वाला कदापि सुख नहीं भोग सकता। तू समझती होगी कि मैं राजा गोपालसिंह, देवीसिंह, भूतनाथ, कमलिनी और लाडिली को मारके निश्चिन्त हो गई, अब मुझे सताने वाला कोई भी न रहा। इस बात का तो तुझे गुमान भी न होगा कि मैं सुरंग में असली दारोगा से नहीं मिली, बल्कि ऐयारों के गुरु-घंटाल तेजसिंह से मिली जो दारोगा के भेष में था, और यह बात भी तुझे सूझी न होगी कि दारोगा वाले मकान के उड़ जाने से कैदियों को कुछ भी हानि नहीं हुई बल्कि वे लोग अजायबघर की चाबी की बदौलत जो सुरंग में मैंने तुझसे ले ली थी और भोजन तथा जल पहुंचाने के समय कैदियों को होश में लाकर दे दी थी, निकल गये। अहा, परमात्मा, तू धन्य है! तेरी अदालत बहुत सच्ची है। ऐ कम्बख्त मायारानी, अब तू सब कुछ इसी से समझ जा कि मैं वास्तव में तेजसिंह हूं।

तेरा

जो कुछ तू समझे - तेजसिंह’’

इस चीठी को सुनते ही मायारानी का सिर घूमने लगा और वह डर के मारे थर-थर कांपने लगी। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह उठ बैठी और नागर की तरफ देखकर बोली -

मायारानी - यह तेजसिंह भी बड़ा ही शैतान है। इसने दो दफा भारी धोखा दिया। अफसोस, अजायबघर की ताली हाथ में आकर फिर निकल गई, केवल ये दोनों तिलिस्मी खंजर मेरे हाथ में रह गये, मगर इनसे मेरी जान नहीं बच सकती। सबसे ज्यादा अफसोस तो इस बात का है कि लक्ष्मीदेवी वाला भेद अब खुल गया और यह बात मेरे लिए बहुत ही बुरी हुई। (कुछ सोचकर) हाय, अब मैं समझी कि इस तिलिस्मी खंजर का असर तेजसिंह पर इसलिए नहीं हुआ कि उसके पास भी जरूर इसी तरह का खंजर और ऐसी ही अंगूठी होगी।

नागर - बेशक यही बात है। खैर, अब यह बहुत जल्द सोचना चाहिए कि हम लोगों की जान कैसे बच सकती है।

मायारानी इसका कुछ जवाब दिया ही चाहती थी कि सामने का दरवाजा खुला और मायारानी के दारोगा साहब अन्दर आते हुए दिखाई पड़े। उन्हें देखते ही मायारानी क्रोध के मारे लाल हो गई और कड़ककर बोली, ‘‘तुझ कम्बख्त को यहां किसने आने दिया! खैर, अच्छा ही हुआ जो तू आ गया। मुझे मालूम हो गया कि तेरी मौत तुझे यहां पर लाई है, हां अगर तेरी चीठी मुझे न मिली रहती तो मैं फिर धोखे में आ जाती। कम्बख्त, नालायक, तूने मुझे बड़ा भारी धोखा दिया! अब तू मेरे हाथ से बचकर नहीं जा सकता!’’

दारोगा - तू अपने होश में भी है या नहीं क्या अपने को बिल्कुल भूल गई! क्या तू नहीं जानती कि किससे क्या कह रही है मेरी मौत नहीं बल्कि तेरी मौत आई है जो तू जुबान सम्हालकर नहीं बोलती।

मायारानी - (खड़ी होकर और तिलिस्मी खंजर को हाथ में लेकर) हां, ठीक है, यदि मैं अपने होश में रहती तो तुझ कम्बख्त के फेर में पड़ती ही क्यों बेईमान कहीं का, तूने मुझे बड़ा भारी धोखा दिया, देख अब मैं तेरी क्या दुर्गति करती हूं।

नागर - ताज्जुब है कि इतनी बड़ी बदमाशी करने पर भी तू निडर होकर यहां कैसे चला आया! मालूम होता है अपनी जान से हाथ धो बैठा। कोई हर्ज नहीं, अगर तिलिस्मी खंजर का असर तुझ पर नहीं होता, तो मैं दूसरी तरह से तेरी खबर लूंगी।

इस समय मायारानी की फुर्ती देखने ही योग्य थी। वह बाघिन की तरह झपटकर दारोगा के पास पहुंची। इस समय उसकी उंगली में एक जहरीली अंगूठी उसी तरह की थी जैसी नागर के हाथ में उस समय थी जब उसने सुनसान जंगल में भूतनाथ को अंगूठी गाल में रगड़कर बेहोश किया था। इस समय मायारानी ने भी वही काम किया, अर्थात् वह अंगूठी जिस पर जहरीला नोकदार नगीना जड़ा हुआ था, दारोगा के गाल में इस फुर्ती और चालाकी से रगड़ दी कि वह बेचारा कुछ भी न कर सका। उस नगीने की रगड़ से गाल जरा-सा ही छिला था मगर जहर का असर पल भर में अपना काम कर गया। दारोगा चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। मायारानी ने नागर की तरफ देखा और कहा, ‘‘अब इसके हाथ-पैर जकड़ के बांध दो और तब होश में लाकर पूछो कि कहिए तेजसिंह, अब आपका मिजाज कैसा है’ इसके जवाब में नागर ने कहा - ‘‘केवल हाथ-पैर ही बांध करके नहीं छोड़ दो, बल्कि थोड़ी नाक काट लो और नकली दाढ़ी उखाड़कर फेंक दो और तब होश में लाकर पूछो कि कहिए ऐयारों के गुरु-घंटाल तेजसिंह, आपका मिजाज कैसा है’

इस समय मायारानी यही समझ रही थी कि यह दारोगा वास्तव में वही तेजसिंह है जिसने उसे अनूठी रीति से धोखा दिया था, बल्कि वह उसके शक पर बगीचे में घूमने के समय हर एक पत्ते से डरती फिरे तो ताज्जुब नहीं। परन्तु हमारे पाठक जरूर समझते होंगे कि तेजसिंह ऐसे बेवकूफ नहीं हैं जो मायारानी को धोखा देकर बल्कि अपने धोखे का परिचय देकर फिर उसके सामने उसी सूरत में आवें जिस सूरत में उन्होंने धोखा दिया था, और वास्तव में बात भी ऐसी ही है। यह तेजसिंह नहीं थे, बल्कि मायारानी के असली दारोगा साहब थे। मगर अफसोस, इस समय उनकी दाढ़ी नोंचने तथा नाक काटने के लिए वही तैयार हैं जिनके वे पक्षपाती हैं।

नागर ने जो कुछ कहा मायारानी ने स्वीकार किया। नागर ने पहले तिलिस्मी खंजर से दारोगा साहब की नाक काट ली और फिर दाढ़ी नोंचने के लिए तैयार हुई। मगर यह दाढ़ी नकली नहीं थी जो एक ही झटके में अलग हो जाती, इसलिए इसके नोंचने में बेचारी नागर को विशेष तकलीफ उठानी पड़ी। नागर दाढ़ी नोंचती जाती थी और यह कहती जाती थी - ‘‘तेजसिंह बड़े मजबूत मसाले से बाल जमाता है!’’

आधी दाढ़ी नुचते-नुचते दारोगा का चेहरा खून से लालोलाल हो गया। उस समय मायारानी ने चौंककर नागर से कहा, ‘‘ठहर-ठहर, बेशक धोखा हुआ, यह तेजसिंह नहीं, वास्तव में बेचारा दारोगा है।’’

नागर - (रुककर) हां, ठीक तो जान पड़ता है। हाय, बहुत बुरी भूल हो गई।

मायारानी - भूल क्या, गजब हो गया! इस बेचारे ने तो सिवाय नेकी के मेरे साथ बुराई कभी नहीं की, अब यह जहर के मारे मरा जा रहा है, पहले जहर दूर करने की फिक्र करनी चाहिए।

नागर - जहर तो बात-की-बात में दूर हो जायगा मगर अब हम लोग इसे अपना मुंह कैसे दिखाएंगे!

मायारानी - मैंने तो केवल दाढ़ी नोंचने की राय दी थी, तूने ही नाक काटने के लिए कहा और अपने हाथ से बेचारे की नाक काट भी ली।

नागर - क्या खूब इसे गालियां भी मैंने ही दी थीं। क्या तुम्हारी आज्ञा के बिना मैंने इनकी नाक काट ली अब कसूर मेरे सिर पर थोप आप अलग होना चाहती हो तुम्हें लोग सच ही बदनाम करते हैं। तुम्हारी दोस्ती पर भरोसा करना बेशक मूर्खता है, जब मेरे सामने तुम्हारा यह हाल है तो पीछे न मालूम तुम क्या करतीं! खैर, क्या हर्ज है, जैसी खुदगर्ज हो मैं जान गई।

इतना कहकर नागर वहां से गई और जहर दूर करने वाली दवा की शीशी ले आई। थोड़ी-सी दवा उस जगह लगाई जहां अंगूठी के सबब से छिल गया था। दवा लगाने के थोड़ी देर बाद उस जगह छाला पड़ गया और उस छाले को नागर ने फोड़ दिया। पानी निकल जाने के साथ ही दारोगा होश में आकर उठ बैठा और अपनी हालत देखकर अफसोस करने लगा। यद्यपि वह कुछ भी नहीं जानता था कि मायारानी ने उसके साथ ऐसा सलूक क्यों किया तथापि उसे इतना क्रोध चढ़ा हुआ था कि मायारानी से कुछ भी न पूछकर वह चुपचाप उसका मुंह देखता रहा।

मायारानी - (दारोगा से) माफ कीजियेगा, मैंने केवल यह जानने के लिए आपको बेहोश किया था कि यह वीरेन्द्रसिंह का कोई ऐयार तो नहीं है, इसके सिवाय और जो कुछ किया नागर ने किया।

नागर - ठीक है, बाबाजी इस बात को बखूबी समझते हैं। मैंने ही तो जहरीली अंगूठी से इनकी जान लेने का इरादा किया था! (बाबाजी की तरफ देखकर) मायारानी की दोस्ती पर भरोसा करना बड़ी भारी भूल है। जब इसने अपने पति ही को कैद करके वर्षों तक दुःख दिया तो हमारी- आपकी क्या बात है। इसने लक्ष्मीदेवी वाला भेद भी तेजसिंह से कह दिया और साथ ही इसके यह भी कह दिया कि सब काम दारोगा साहब ने किया है।

मायारानी - (क्रोध से नागर की तरफ देखकर) क्यों री, तू मुझे नाहक बदनाम करती है!

नागर - जब तुम झूठमूठ मुझे बदनाम करती हो और बाबाजी की नाक काटने का कसूर मुझ पर थोपती हो तो क्या मैं सच्ची बात कहने से भी गई! आंखें क्या दिखाती हो मैं तुमसे डरने वाली नहीं हूं और तुम मेरा कुछ कर भी नहीं सकती हो। पहले तुम अपनी जान तो बचा लो!

मायारानी, जिसने इसके पहले कभी आधी बात भी किसी की नहीं सुनी थी, आज नागर की इतनी बड़ी बात कब बर्दाश्त कर सकती थी उसने दांत पीसकर नागर की तरफ देखा। इस बीच में बाबाजी भी बोल उठे, ‘‘बेशक सब कसूर मायारानी का है, नागर की जुबान से लक्ष्मीदेवी का शब्द निकलना ही इसका पूरा-पूरा सबूत है।’’

बाबाजी की बात सुनकर मायारानी का गुस्सा और भी भड़क उठा। वह तिलिस्मी खंजर हाथ में लेकर नागर पर झपटी। नागर ने बगल में होकर अपने को बचा लिया और आप भी तिलिस्मी खंजर हाथ में लेकर मायारानी पर वार किया। दोनों में लड़ाई होने लगी। वे दोनों कोई फेकैत या उस्ताद तो थीं ही नहीं कि गुंथ जातीं या हिकमत के साथ लड़तीं। हां, दांव-घात बेशक होने लगे। कायदे की बात है कि तलवार या खंजर जो भी हाथ में हो, लड़ते समय उसका कब्जा जोर से दबाना ही पड़ता है। दबाने के सबब दोनों खंजरों में से बिजली की-सी चमक पैदा हुई और इस सबब से बेचारे बाबाजी ने घबराकर अपनी आंखें बन्द कर लीं, बल्कि भागने का बन्दोबस्त करने लगे। वह लौंडी, जो तेजसिंह की चीठी लाई थी, चिल्लाती हुई बाहर चली गई और उसने सब लौंडियों को इस लड़ाई की खबर कर दी। बात की बात में सब लौंडियां वहां पहुंचीं और लड़ाई बन्द कराने का उद्योग करने लगीं।

जब आदमी के पास दौलत होती है या जब आदमी अपने दर्जे या ओहदे पर कायम रहता है, तब तो सभी कोई उसकी इज्जत करते हैं, मगर रुपया निकल जाने या दर्जा टूट जाने पर फिर कोई भी नहीं पूछता, संगी-साथी सब दुम दबाकर भाग जाते हैं, भले आदमी उससे बात करना अपनी बेइज्जती समझते हैं, चाचा कहने वाले भतीजा कहकर भी पुकारना पसन्द नहीं करते, दोस्त साहब-सलामत तक छोड़ देते हैं, बल्कि दुश्मनी करने पर उतारू हो जाते हैं, और नौकर-चाकर केवल सामना ही नहीं करते बल्कि खुद मालिक की तरफ आंखें दिखाते हैं।

ठीक यही हालत इस समय मायारानी की है। जब वह रानी थी, सौ ऐब होने पर भी लोग उसकी कदर करते थे, उससे डरते थे, और उसका हुक्म मानना, चाहे कैसे ही बुरे काम के लिए वह क्यों न कहे, अपना फर्ज समझते थे। आज वह रानी की पदवी पर नहीं है, स्वयं उसे अपना राज्य छोड़ना बल्कि मुंह छिपाकर भागना पड़ा, धन-दौलत रहते भी कंगाल होना पड़ा, वह कल रानी थी, आज उसके पास एक पैसा नहीं है, कल तक उससे लाखों आदमी डरते थे, आज उससे एक लौंडी भी नहीं डरती, कल सैकड़ों आदमियों की जान उसके हुक्म से ले ली जा सकती थी, मगर आज वह खुद एक लौंडी का कुछ नहीं कर सकती। यह उसके बुरे कर्मों का फल था। इसके सिवाय और क्या कहा जाय।

मनोरमा मायारानी की सखी थी, और यह नागर मनोरमा की मुंह-लगी और मायारानी की लौंडी समझी जाती थी। मायारानी के हाथ से मनोरमा और नागर ने लाखों रुपये पाये। यह मकान, रुआब और दबदबा मनोरमा और नागर का मायारानी ही की बदौलत था। यही नागर मायारानी की सैकड़ों गालियां बर्दाश्त करती थी, भला या बुरा जो कुछ मायारानी उसे कहती थी, मानना पड़ता था, मगर आज जब मायारानी किसी योग्य न रही, जब मायारानी धन-दौलत से खाली हो गई, जब मायारानी की ताकत न रही, तो वही नागर बकरी से बाघिन हो गयी, बल्कि नागर की लौंडियों की नजरों में भी मायारानी की इज्जत न रही। अब नागर को मायारानी से कुछ पाने की आशा तो रही ही नहीं, बल्कि यह मौका आ गया कि नागर खुद रुपये से मायारानी की मदद करे, इसलिए झट नागर की आंख बदल गई और वह बात का बतंगड़ बनाकर जान लेने के लिए तैयार हो गई। नागर की लौंडियां जो इस लड़ाई का हाल सुनकर आ पहुंची थीं, नागर का दिया हुआ खाती थीं, और इस समय मायारानी को भी अच्छी निगाह से नहीं देखती थीं। इसलिए ये सब सिवाय नागर और किसी की मदद करना नहीं चाहती थीं, मगर तिलिस्मी खंजरों के सबब से इस लड़ाई के बीच में पड़ने से लाचार थीं। हां, जब दोनों लड़ाकियां ठहर जातीं और खंजर का कब्ता ढीला पड़ने के कारण चमक बन्द हो जाती तो वे लौंडियां नागर की मदद करने को जरूर तैयार हो जातीं।

आखिर नागर ने मायारानी से ललकार के कहा, ‘‘देख मायारानी, तू इस समय मुझसे लड़कर नहीं जीत सकती। यदि मैं तेरे सामने से भाग भी जाऊं और काशीराज के पास जाकर तेरा सब हाल कह दूं तो तुझे इसी समय गिरफ्तार करके राजा वीरेन्द्रसिंह के पास भेज देंगे और तुझसे कुछ भी करते-धरते न बन पड़ेगा। तू इस समय यहां छिपकर बैठी हुई है, किसी को भी तेरे हाल की खबर होगी तो तेरे लिए अच्छा न होगा। मगर मैं पुरानी दोस्ती पर ध्यान देकर तुझे माफ करती हूं और साथ ही इसके आज्ञा देती हूं कि इसी समय यहां से भाग जा और जिस तरह अपनी जान बचा सके बचा।’’

नागर की बातें सुनकर मायारानी रुक गई और थोड़ी देर तक कुछ सोचती रही, अंत में तिलिस्मी खंजर कमर में रख शीघ्रता से कमरे के बाहर होते से निकल गई। और न मालूम कहां चली गई। नागर ने इधर-उधर देखा तो दारोगा को भी न पाया। आखिर मालूम हुआ कि वह भी मौका देखकर भाग निकला, और न जाने कहां चला गया।

 

बयान - 3

अब जरा उन कैदियों की सुध लेनी चाहिए, जिन्हें नकली दारोगा ने दारोगा वाले बंगले में मैगजीन की बगल वाली कोठरी में बन्द किया था। वास्तव में वह तेजसिंह ही थे, जो दारोगा की सूरत बनाकर मायारानी से मिलने और उसके दिल का भेद लेने जा रहे थे, मगर जब दारोगा वाले बंगले पर पहुंचे तो मायारानी की लौंडियों तथा लाली की जबानी मालूम हुआ कि दो आदमियों के पीछे-पीछे मायारानी और नागर टीले पर गई हैं। तेजसिंह उस टीले का हाल बखूबी जानते थे और सुरंग की राह बाग के चौथे दर्जे में आने-जाने का भेद भी उन्हें बता दिया गया था, इसलिए उन्हें शक हुआ और वे सोचने लगे कि मायारानी जिन दो आदमियों के पीछे-पीछे टीले पर गई है, कहीं वे दोनों हमारी तरफ के ऐयार ही न हों जो बाग के चौथे दर्जे में जाने का इरादा रखते हों, यदि वास्तव में ऐसा हो तो निःसन्देह मायारानी के हाथ से उन्हें कष्ट पहुंचेगा। यह सोचते ही तेजसिंह भी उसी टीले की तरफ रवाना हुए और यही सबब था कि सुरंग में दारोगा की शक्ल बने हुए तेजसिंह की मायारानी से मुलाकात हुई थी और उसके बाद जो कुछ हुआ ऊपर लिखा ही जा चुका है।

मैगजीन की बगल वाली कोठरी में कैदियों को कैद करने के बाद जब खाने-पीने का सामान लेकर तेजसिंह उस तहखाने में गये तो कैदियों को होश में लाकर संक्षेप में सब हाल कह दिया था और अजायबघर की ताली जो मायारानी से वापस ली थी, राजा गोपालसिंह को देकर कहा कि इस ताली की मदद से जहां तक हो सके आप लोग यहां से जल्द निकल जाइये। गोपालसिंह ने जवाब दिया था कि ‘‘यदि यह ताली न मिलती तो भी हम लोग यहां से निकल जाते क्योंकि मुझे यहां का पूरा-पूरा हाल मालूम है और अब आप हम लोगों की तरफ से निश्चिन्त रहिये, मगर चौबीस घण्टे के अन्दर मायारानी का साथ न छोड़िये और न उसे कोई काम इस बीच में करने दीजिये, इसके बाद हम लोग स्वयं आपको ढूंढ़ लेंगे।’’

इस दारोगा वाले बंगले का हाल केवल तेजसिंह को ही नहीं, बल्कि हमारे और भी कई ऐयारों को मालूम था। क्योंकि कमलिनी ने, जो कुछ भी वह जानती थी, सभी को बता दिया था।

अब जब तेजसिंह दारोगा वाले बंगले से चले तो राजा गोपालसिंह और कमलिनी इत्यादि को ढूंढ़ने के लिए उत्तर की तरफ रवाना हुए। वे जानते थे कि मैगजीन की बगल वाली कोठरी से निकलकर वे लोग उत्तर की तरफ ही किसी ठिकाने बाहर होंगे।

तेजसिंह कोस भर से ज्यादा नहीं गये होंगे कि रात की पहली अंधेरी ने चारों तरफ अपना दखल जमा लिया। जिसके सबब से वे उन लोगों को बखूबी ढूंढ़ न सकते थे और न उन लोगों का ठीक पता ही था, तथापि उन्हें विशेष कष्ट न उठाना पड़ा क्योंकि थोड़ी ही दूर जाने के बाद देवीसिंह से मुलाकात हो गई, जो इन्हीं को ढूंढ़ने के लिए जा रहे थे। देवीसिंह के साथ चलकर तेजसिंह थोड़ी ही देर में वहां जा पहुंचे, जहां गोपालसिंह इत्यादि घने जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठे इनके आने की राह देख रहे थे। तेजसिंह को देखते ही सब लोग उठ खड़े हुए और खातिर की तौर पर दो-चार कदम आगे बढ़ आये।

देवीसिंह - देखिए, इन्हें कितना जल्दी ढूंढ़ लाया हूं।

गोपालसिंह - (तेजसिंह से) आइये-आइये।

तेजसिंह - इतनी दूर आये तो क्या दो-चार कदम के लिए रुके रहेंगे

गोपालसिंह - (हंस के और तेजसिंह का हाथ पकड़ के) आज आप ही की बदौलत हम लोग जीते-जागते यहां दिखाई दे रहे हैं।

तेजसिंह - यह सब तो भगवती की कृपा से हुआ और उन्हीं की कृपा से इस समय मैं इसके लिए अच्छी तरह तैयार भी हो रहा हूं कि मेरी जितनी तारीफ आपके किये हो सके कीजिये और मैं फूला नहीं समाता हुआ चुपचाप बैठा सुनता रहूं और घण्टों बीत जायें, मगर तिस पर भी आपकी की हुई तारीफ को उस काम के बदले में न समझूं, जिसकी वजह से आप लोग छूट गये, बल्कि एक दूसरे ही काम के बदले में समझूं, जिसका पता खुद आप ही की जुबान से लगेगा और यह भी जाना जायगा कि मैं कौन-सा अनूठा काम करके आया हूं, जिसे खुद नहीं जानता, मगर जिसके बदले में तारीफों की बौछार सहने को चुप्पी का छाता लगाये पहले ही से तैयार था। साथ ही इसके यह भी कह देना अनुचित न होगा कि मैं केवल आप ही को तारीफ करने के लिए मजबूर न करूंगा, बल्कि आपसे ज्यादा कमलिनी और लाडिली को मेरी तारीफ करनी पड़ेगी।

गोपालसिंह - (कुछ सोचकर और हंसी के ढंग से) अगर गुस्ताखी और बेअदबी में न गिनिये तो मैं पूछ लूं कि आज आपने भंग के बदले में ताड़ी तो नहीं छानी है

यद्यपि यह जंगल बहुत ही घना और अंधकारमय हो रहा था, मगर तेजसिंह को साथ लिए देवीसिंह के आने की आहट पाते ही भूतनाथ ने बटुए में से एक छोटी-सी अबरख की लालटेन जो मोड़माड़ के बहुत छोटी और चिपटी कर ली जाती थी, निकाल ली थी और रोशनी के लिए तैयार बैठा था। देवीसिंह की आवाज पाते ही उसने बत्ती बालकर उजाला कर दिया था, जिससे सभी की सूरत साफ-साफ दिखाई दे रही थी। तेजसिंह की इज्जत के लिए सब कोई उठकर दो-चार कदम आगे बढ़ गये थे, और इसके बाद मायारानी का समाचार जानने की नीयत से सभी ने उन्हें घेर लिया था। तेजसिंह के चेहरे पर खुशी की निशानियां मामूली से ज्यादा दिखाई दे रही थीं, इसलिए गोपालसिंह इत्यादि किसी भारी खुशखबरी के सुनने की लालसा मिटाने का उद्योग करना चाहते थे। मगर तेजसिंह की रेशम की गुत्थी की तरह उलझी हुई बातों को सुनकर गोपालसिंह भौंचक से हो गये और सोचने लगे कि वह कैसी खुशखबरी है कि जिसे तेजसिंह स्वयं नहीं जानते, बल्कि मुझसे ही सुनकर मुझी को सुनाने और खुश करके तारीफों की बौछार सहने के लिए तैयार हैं, और यही सबब था कि राजा गोपालसिंह ने दिल्लगी के साथ तेजसिंह पर भंग के बदले में ताड़ी पीने की आवाज कसी।

तेजसिंह - (हंसकर) ताड़ी और शराब पीना तो आप लोगों का काम है जिन्हें अपने-बेगानों की कुछ खबर ही नहीं रहती! मैं यह बात दिल्लगी से नहीं कहता, बल्कि साबित कर दूंगा कि आप भी उन्हीं में अपनी गिनती करा चुके हैं। सच तो यों है कि इस समय आपके पेट में चूहे कूदते होंगे, और यह जानने के लिए आप बहुत ही बेताब होंगे कि मैं आपसे क्या पूछूंगा और क्या कहूंगा। अच्छा आप बताइये कि ‘लक्ष्मीदेवी’ किसका नाम है?

गोपालसिंह - क्या आप नहीं जानते यह तो उसी कम्बख्त मायारानी का नाम है।

तेजसिंह - बस-बस-बस! अब आपकी जुबानी मुझे उस बात का पता लग गया जिसे मैं एक भारी खुशखबरी समझता हूं। अब आप सुनिये, (कुछ रुककर) मगर नहीं, पहले आपसे इनाम पाने का इकरार तो करा ही लेना चाहिए, क्योंकि खाली तारीफों की बौछार से काम नहीं चलेगा।

गोपालसिंह - मैं आपको कुछ इनाम देने योग्य तो हूं नहीं, पर यदि आप मुझे इस योग्य समझते ही हैं तो इनाम का निश्चय भी आप ही कर लीजिए, मुझे जी-जान से उसे पूरा करने के लिए तैयार पाइएगा।

तेजसिंह - (हाथ फैलाकर) अच्छा, तो आप हाथ पर हाथ मारिये, मैं अपना इनाम जब चाहूंगा, मांग लूंगा और आप उस समय उसे देने योग्य होंगे।

गोपालसिंह - (तेजसिंह के हाथ पर हाथ मार के) लीजिए अब तो कहिए, आप तो हम लोगों की बेचैनी बढ़ाते ही जा रहे हैं।

तेजसिंह – हां-हां सुनिये। (कमलिनी और लाडिली से) तुम दोनों भी जरा पास आ जाओ और ध्यान देकर सुनो कि मैं क्या कहता हूं। (हंसकर) आप लोग बड़े खुश होंगे। हां, अब आप सब बैठ जाइये।

गोपालसिंह - (बैठकर) तो आप कहते क्यों नहीं, इतना नखरा-तिल्ला क्यों कर रहे हैं?

तेजसिंह - इसलिए कि खुशी के बाद आप लोगों को रंज भी होगा और आप लोग एक तरद्दुद में फंस जायेंगे।

गोपालसिंह - आप तो उलझन पर उलझन डाले जाते हैं और कुछ कहते भी नहीं।

तेजसिंह - कहता तो हूं, सुनिए - यह जो मायारानी है वह असल में आपकी स्त्री लक्ष्मीदेवी नहीं है।

इतना सुनते ही राजा गोपालसिंह, कमलिनी और लाडिली को हद से ज्यादा खुशी हुई, यहां तक कि दम रुकने लगा और थोड़ी देर तक कुछ कहने की सामर्थ्य न रह गयी। इसके बाद अपनी अवस्था ठीक करके कमलिनी ने कहा।

कमलिनी - ओफ, आज मेरे सिर से बड़े भारी कलंक का टीका मिटा। मैं इस ताने के सोच में मरी जाती थी कि तुम्हारी बहिन जब इतनी दुष्ट है तो तुम न जाने कैसी होगी!

गोपालसिंह - मैं जिस खयाल से लोगों को अपना मुंह दिखाने से हिचकिचाता था आज वह जाता रहा। अब मैं खुशी से जमानिया के राजकर्मचारियों के सामने मायारानी का इजहार लूंगा, मगर यह तो कहिए इस बात का निश्चय आपको क्योंकर हुआ?

तेजसिंह - मैं संक्षेप में आपसे यह कह चुका हूं कि जब मैं दारोगा की सूरत में सुरंग के अन्दर पहुंचा और मायारानी से मुलाकात हुई, तो आपको होश में लाने के लिए मायारानी से खूब हुज्जत हुई।

गोपालसिंह - हां, यह आप कह चुके हैं।

तेजसिंह - उस समय जो-जो बातें मायारानी से हुईं वह तो पीछे कहूंगा, मगर मायारानी की थोड़ी-सी बात, जिसे मैंने इस तरह अक्षर-अक्षर खूब याद कर रखा है जैसे पाठशाला के लड़के अपना पाठ याद कर रखते हैं, आप लोगों से कहता हूं, उसी से आप लोग उस भेद का मतलब निकाल लेंगे। मायारानी ने मुझे समझाने की रीति से कहा था कि -

‘‘यद्यपि आपको इस बात का रंज है कि मैंने गोपालसिंह के साथ दगा की और यह भेद आपसे छिपा रखा, मगर आप भी तो जरा पुरानी बातों को याद कीजिए! खास करके उस अंधेरी रात की बात, जिसमें मेरी शादी और पुतले की बदलौअल हुई थी! आप ही ने तो मुझे यहां तक पहुंचाया! अब अगर मेरी दुर्दशा होगी तो क्या आप बच जायेंगे मान लिया जाय कि अगर गोपालसिंह को बचा लें तो लक्ष्मीदेवी का बच के निकल जाना आपके लिए दुःखदायी न होगा और जब इस बात की खबर गोपालसिंह को लगेगी, तो क्या वह आपको छोड़ देगा बेशक जो कुछ आज तक मैंने किया है, सब आप ही का कसूर समझा जायेगा! मैंने इसे इसलिए कैद किया था कि लक्ष्मीदेवी वाला भेद इसे मालूम न होने पावे या इसे इस बात का पता न लग जाय कि दारोगा की करतूत ने लक्ष्मीदेवी की जगह...’’

बस इतना कहकर वह चुप हो गई और मैंने भी इस भेद को सोचते हुए यह समझकर, कि कहीं बात-ही-बात में मेरा अनजानपन न झलक जावे और मायारानी को यह न मालूम हो जाय कि मैं वास्तव में दारोगा नहीं हूं, इन बातों का कुछ जवाब देना उचित न जाना और चुप हो रहा।

गोपालसिंह - बस-बस! मायारानी के मुंह से निकली हुई इतनी ही बातें सबूत के लिए काफी हैं और बेशक वह कम्बख्त मेरी स्त्री नहीं है। अब मुझे ब्याह के दिन की कुछ बातें धीरे-धीरे याद आ रही हैं जो इस बात को और भी मजबूत कर रही हैं और इसमें भी कोई शक नहीं कि हरामखोर दारोगा ही सारे फसादों की जड़ है।

कमलिनी - मगर उस हरामजादी की बातों से, जैसा कि आपने अभी कहा, यह भी साबित होता है कि दारोगा की मदद से अपना काम पूरा करने के बाद वह मेरी बहिन लक्ष्मीदेवी की जान लेना चाहती थी, मगर वह किसी तरह बच के निकल गई।

तेजसिंह - बेशक ऐसा ही है और मेरा दिल गवाही देता है कि लक्ष्मीदेवी अभी तक जीती है। यदि उसकी खोज की जाय तो अवश्य मिलेगी।

गोपालसिंह - मेरा भी दिल यही गवाही देता है, मगर अफसोस की बात है कि उसने मुझ तक पहुंचने या इस भेद को खोलने के लिए कुछ उद्योग न किया।

कमलिनी - यह आप कैसे कह सकते हैं कि उसने कोई उद्योग न किया होगा कदाचित उसका उद्योग सफल न हुआ हो इसके अतिरिक्त मायारानी की और दारोगा की चालाकी कुछ इतनी कच्ची न थी कि किसी की कलई चल सकती, फिर उस बेचारी का क्या कसूर जब मैं उसकी सगी बहिन होकर धोखे में फंस गई और इतने दिनों तक उसके साथ रही तो दूसरे की क्या बात है उसके ब्याह के चार वर्ष बाद जब मैं माता-पिता के मर जाने के कारण लाडिली को साथ लेकर आपके घर आई तो मायारानी की सूरत देखते ही मुझे कुछ शक पड़ा, परन्तु इस खयाल ने उस शक को जमने न दिया कि कदाचित् चार वर्ष के अन्तर ने उसकी सूरत-शक्ल में इतना फर्क डाल दिया और यह आश्चर्य की बात है भी नहीं, बहुतेरी कुंआरी लड़कियों की सूरत-शक्ल ब्याह होने के तीन या चार वर्ष बाद ही ऐसी बदल जाती है कि पहचानना कठिन होता है।

तेजसिंह - प्रायः ऐसा होता है, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

कमलिनी - और कम्बख्त ने हम दोनों बहिनों की उतनी ही खातिर की जितनी कोई बहिन किसी बहिन की कर सकती है। मगर यह बात भी तभी तक रही जब तक उसने (गोपालसिंह की तरफ इशारा करके) इनको कैद नहीं कर लिया।

गोपालसिंह - मेरे साथ तो रस्म और रिवाज ने दगा की! ब्याह के पहले मैंने उसे देखा ही न था, फिर पहचानता क्योंकर?

कमलिनी - बेशक बड़ी चालाकी खेली गई। हाय, अब मैं बहिन लक्ष्मीदेवी को कहां ढूंढूं, और कैसे पाऊं?

तेजसिंह - जिस ढंग से मायारानी ने मुझे समझाया था, उससे तो मालूम होता है कि यह चालाकी करने के सथ ही दारोगा ने लक्ष्मीदेवी को कैद करके किसी गुप्त स्थान में रख दिया था, मगर कुछ दिनों के बाद वह किसी ढंग से छूट के निकल गई। शायद इसी सबब से वह कमलिनी या लाडिली से न मिल सकी हो।

गोपालसिंह - बिना दारोगा को सताये इसका पूरा हाल मालूम नहीं होगा।

तेजसिंह - दारोगा तो रोहतासगढ़ में ही कैद है।

इतने ही में एक तरफ से आवाज आई, ‘‘दारोगा अब रोहतासगढ़ में कैद नहीं है, निकल भागा।’’ तेजसिंह ने घूमकर देखा तो भैरोसिंह पर निगाह पड़ी। भैरोसिंह ने पिता के चरण छुए और राजा गोपालसिंह को भी प्रणाम किया, इसके बाद आज्ञा पाकर बैठ गया।

तेजसिंह - (भैरोसिंह से) क्या तुम बड़ी देर से खड़े-खड़े हम लोगों की बातें सुन रहे थे हम लोग बातों में इतना डूबे हुए थे कि तुम्हारा आना जरा भी मालूम न हुआ।

भैरोसिंह - जी नहीं, मैं अभी-अभी चला आ रहा हूं और सिवाय इस आखिरी बात के, जिसका जवाब दिया है, आप लोगों की और कोई बात मैंने नहीं सुनी।

तेजसिंह - तुम्हें यह कैसे मालूम हुआ कि हम लोग यहां हैं?

भैरोसिंह - मैं तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा रहा था, मगर जब दारोगा वाले बंगले के पास पहुंचा तो उसकी बिगड़ी हुई अवस्था देखकर जी व्याकुल हो गया, क्योंकि इस बात का विश्वास करने में किसी तरह का शक नहीं हो सकता था कि उस बंगले की बरबादी का सबब बारूद और सुरंग है और यह कार्रवाई बेशक हमारे दुश्मनों की है। अस्तु, तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जाने के पहले इस मामले का असल हाल जानने की इच्छा हुई और किसी से मिलने की आशा में मैं इस जंगल में घूमने लगा। मगर इस लालटेन की रोशनी ने, जो यहां बल रही है, मुझे ज्यादा देर तक नहीं भटकने दिया। अब सबसे पहले मैं उस बंगले की बरबादी का सबब जानना चाहता हूं। यदि आपको मालूम हो तो कहिये।

तेजसिंह - मैं भी यही चाहता हूं कि राजा वीरेन्द्रसिंह का कुशल-क्षेम पूछने के बाद जो कुछ कहना है, सो तुमसे कहूं और उस बंगले की कायापलट का सबब तुमसे बयान करूं, क्योंकि इस समय एक बड़ा ही कठिन काम तुम्हारे सुपुर्द किया जायेगा जो कितना जरूरी है सो उस बंगले का हाल सुनते ही तुम्हें मालूम हो जायेगा।

भैरोसिंह - राजा वीरेन्द्रसिंह बहुत अच्छी तरह हैं। इधर का हाल सुनकर उन्हें बहुत क्रोध आता है और चुपचाप बैठने की इच्छा नहीं होती, परन्तु आपकी वह बात उन्हें बराबर याद आती रहती है जो उनसे बिदा होने के समय अपनी कसम का बोझ देकर आप कह आये थे। निःसन्देह वे आपको सच्चे दिल से चाहते हैं और यही सबब है कि बहुत कुछ कर सकने की शक्ति रखकर भी कुछ नहीं कर रहे हैं।

तेजसिंह - हां, मैं उनसे यह ताकीद कर आया था कि चुपचाप चुनार जाकर बैठिए और देखिए कि हम लोग क्या करते हैं। तो क्या राजा वीरेन्द्रसिंह चुनार गये

भैरोसिंह - जी हां, वे चुनार गये और मैं अबकी दफे चुनार ही से चला आ रहा हूं। रोहतासगढ़ में केवल ज्योतिषीजी हैं और उन्हें राज्य-सम्बन्धी कार्यों से बहुत कम फुरसत मिलती है। इसी सबब से दारोगा धोखा देकर न मालूम किस तरह कैद से निकल भागा। जब यह खबर चुनार पहुंची तो यह सोचकर कि भविष्य में कोई गड़बड़ न होने पाये, चुन्नीलाल ऐयार रोहतासगढ़ भेजे गये और जब तक कोई दूसरा हुक्म न पहुंचे, उन्हें बराबर रोहतासगढ़ ही में रहने की आज्ञा हुई और मैं इधर का हालचाल लेने के लिए भेजा गया।

तेजसिंह - अच्छा, तो मैं दारोगा वाले बंगले की बरबादी का सबब बयान करता हूं।

इसके बाद तेजसिंह ने सब हाल अर्थात् अपना सुरंग में जाना, मायारानी से मुलाकात और बातचीत, राजा गोपालसिंह और कमलिनी इत्यादि का गिरफ्तार होना और फिर उन्हें छुड़ाना, तथा दारोगा वाले बंगले के उड़ने का सबब और इसके बाद का पूरा-पूरा हाल कह सुनाया जिसे भैरोसिंह बड़े गौर से सुनता रहा और जब बातें पूरी हो गयीं तो बोला -

भैरोसिंह - यह एक विचित्र बात मालूम हुई कि मायारानी वास्तव में कमलिनी की बहिन नहीं है। (कुछ सोचकर) मगर मैं समझता हूं कि असल बातों का पूरा-पूरा पता लगाने के लिए उसे बहुत जल्द गिरफ्तार करना चाहिए, केवल उसी को नहीं बल्कि कम्बख्त दारोगा को भी ढूंढ़ निकालना चाहिए।

गोपालसिंह - बेशक ऐसा ही होना चाहिए, और अब मैं भी अपने को गुप्त रखना नहीं चाहता जैसे कि आज के पहले सोचे हुए था।

तेजसिंह - सबसे पहले यह तय कर लेना चाहिए कि अब हम लोगों को करना क्या है! (गोपालसिंह से) आप अपनी राय दीजिए।

गोपालसिंह - राय और बहस में तो घण्टों बीत जायेंगे, इसलिए यह काम भी आप ही की मर्जी पर छोड़ा, जो कहिए वही किया जाय।

तेजसिंह - (कुछ सोचकर) अच्छा तो फिर आप कमलिनी और लाडिली को लेकर जमानिया जाइए और तिलिस्मी बाग में पहुंचकर अपने को प्रकट कर दीजिए, मैं समझता हूं कि वहां आपका विपक्षी (खिलाफ) कोई भी न होगा।

गोपालसिंह - आप खिलाफ कह रहे हैं! मेरे नौकरों को मुझसे मिलने की खुशी है, अपने नौकरों में मैं अपने को प्रकट भी कर चुका हूं!

तेजसिंह - (ताज्जुब से) यह कब मैं तो इसका हाल कुछ भी नहीं जानता!

गोपालसिंह - इधर आपसे मुलाकात ही कब हुई जो आप जानते कमलिनी, लाडिली, भूतनाथ और देवीसिंह को यह मालूम है।

तेजसिंह - खैर, कह तो जाइए कि क्या हुआ?

गोपालसिंह - बड़ा ही मजा हुआ। मैं आपसे खुलासा कह दूं सुनिये। एक दिन रात के समय मैं भूतनाथ को साथ लिए गुप्त राह से तिलिस्मी बाग के उस दर्जे में पहुंचा जिसमें मायारानी सो रही थी। हम दोनों नकाब डाले हुए थे। उस समय इसके सिवाय और कोई काम न कर सके कि कुछ रुपये देकर एक मालिन को इस बात पर राजी करें कि कल रात के समय तू चुपके से चोरदरवाजा खोल दीजो क्योंकि कमलिनी इस बाग में आना चाहती है। यह काम इस मतलब से नहीं किया गया कि वास्तव में कमलिनी वहां जाने वाली थी बल्कि इस मतलब से था कि किसी तरह से कमलिनी के जाने की झूठी खबर मायारानी को मालूम हो जाय और वह कमलिनी को गिरफ्तर करने के लिए पहले से तैयार रहे जिसके बदले में हम और भूतनाथ जाने वाले थे, क्योंकि आगे जो कुछ मैं कहूंगा उससे मालूम होगा कि वह मालिन तो इस भेद को छिपाया चाहती थी और हम लोग हर तरह से प्रकट करके अपने को गिरफ्तार कराया चाहते थे। इसी सबब से दूसरे दिन आधी रात के समय हम दोनों फिर उस बाग में उसी राह से पहुंचे जिसका हाल मेरे सिवाय और कोई भी नहीं जानता - बाग ही में नहीं, बल्कि उस कमरे में पहुंचे जिसमें मायारानी अकेली सो रही थी। उस समय वहां केवल एक हांडी जल रही थी जिसे जाते ही मैंने बुझा दिया और इसके बाद दरवाजे में ताला लगा दिया जो अपने साथ ले गया था। यद्यपि दरवाजे पर पहरा पड़ रहा था मगर मैं दरवाजे की राह से नहीं गया था बल्कि एक सुरंग की राह से गया था जिसका सिरा उसी कोठरी में निकलता था। उस कोठरी की दीवार लकड़ी की थी और इस बात का गुमान भी नहीं हो सकता था कि दीवार में कोई दरवाजा है। यह दरवाजा केवल एक तख्ते के हट जाने से खुलता है और तख्ता एक कमानी के सहारे पर है। खैर ताला बन्द कर देने के बाद मैंने जानबूझकर एक शीशा जमीन पर गिरा दिया जिसकी आवाज से मायारानी चौंक उठी। अंधेरे के कारण सूरत तो दिखाई नहीं देती थी इसलिए मैं नहीं कह सकता कि उसने क्या - क्या किया मगर इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह बहुत ही घबड़ाई होगी और वह घबड़ाहट उसकी उस समय और भी बढ़ गई होगी, जब दरवाजे के पास पहुंचकर उसने देखा होगा कि वहां ताला बन्द है। मैं पैर पटक-पटककर कमरे में घूमने लगा। थोड़ी देर में टटोलता हुआ मायारानी के पास पहुंचकर मैंने उसकी कलाई पकड़ ली और जब वह चिल्लाई तो एक तमाचा जड़ के अलग हो गया। तब मैंने एक चोर लालटेन जलाई जो मेरे पास थी। उस समय तक मायारानी डर और मार खाने के कारण बेहोश हो चुकी थी। मैंने दरवाजे का ताला खोल दिया और उसे उठाकर चारपाई पर लिटा देने के बाद वहां से चलता बना। यह कार्रवाई इसलिए की गई थी कि मायारानी घबड़ाकर बाहर निकले और उसकी लौंडियां इस घटना का पता लगाने के लिए चारों तरफ घूमें जिससे आगे हम लोग जो कुछ करेंगे उसकी खबर मायारानी को लग जाय। इसके बाद मैं और भूतनाथ एक नियत स्थान पर उस मालिन से जाकर मिले और उससे बोले कि आज तो कमलिनी नहीं आ सकी मगर कल आधी रात को जरूर आवेगी, चोरदरवाजा खुला रखियो! बेशक इस बात की खबर मायारानी को लग गई जैसा कि हम लोग चाहते थे, क्योंकि दूसरे दिन जब हम लोग चोरदरवाजे की राह बाग में पहुंचे तो हम लोगों को गिरफ्तार करने के लिए कई आदमी मुस्तैद थे।

ऊपर लिखे हुए बयान से पाठक इतना तो जरूर समझ गये होंगे कि मायारानी के बाग में पहुंचने वाले दोनों नकाबपोश जिनका हाल सन्तति के नौवें भाग के चौथे और सातवें बयान में लिखा गया है ये ही राजा गोपालसिंह और भूतनाथ थे, इसलिए उन दोनों ने और जो कुछ काम किया उसे इस जगह दोहराकर लिखना हम इसलिए उचित नहीं समझते कि वह हाल पाठकगण पढ़ ही चुके हैं और उन्हें याद होगा। अस्तु यहां केवल इतना ही कह देना काफी है कि ये दोनों गोपालसिंह और भूतनाथ थे और राजा गोपालसिंह ने ही कोठरी के अन्दर बारी-बारी से पांच-पांच आदमियों को बुलाकर अपनी सूरत दिखाई और कुछ थोड़ा-सा हाल भी कहा था।

राजा गोपालसिंह ने यह सब पूरा - पूरा हाल तेजसिंह और भैरोसिंह से कहा और देर तक वे सुन-सुनकर हंसते रहे। इसके बाद देवीसिंह और भूतनाथ ने भी अपनी कार्रवाई का हाल कहा और फिर इस विषय में बातचीत होने लगी कि अब क्या करना चाहिए।

तेजसिंह - (गोपालसिंह से) अब आप खुले दिल से अपने महल में जाकर राज्य का काम कर सकते हैं इसलिए अब जो कुछ आपको करना है, हुकूमत के साथ कीजिए। ईश्वर की कृपा से अब आपको किसी तरह की चिन्ता न रही इसलिए इधर-उधर...

गोपालसिंह - यह आप नहीं कह सकते कि अब मुझे किसी तरह की चिन्ता नहीं, मगर हां बहुत-सी बातें जिनके सबब से मैं अपने महल में जाने से हिचकता था जाती रहीं इसलिए मेरी भी राय है कि कमलिनी और लाडिली को साथ लेकर मैं अपने घर जाऊं और वहां से दोनों कुमारों को मदद पहुंचाने का उद्योग करूं जो इस समय तिलिस्म के अन्दर जा पहुंचे हैं, क्योंकि यद्यपि तिलिस्म का फैसला उन दोनों के हाथों होना ब्रह्मा की लकीर-सा अटल हो रहा है तथापि मेरी मदद पहुंचने से उन्हें विशेष कष्ट न उठाना पड़ेगा। इसके साथ मैं यह भी चाहता हूं कि किशोरी और कामिनी को भी अपने तिलिस्मी बाग ही में बुलाकर रक्खूं...।

कमलिनी - जी नहीं, मैं तिलिस्मी बाग में तब तक नहीं जाऊंगी जब तक कम्बख्त मायारानी से अपना बदला न ले लूंगी और अपनी बहिन को, यदि वह अभी तक इस दुनिया में है, न ढूंढ़ निकालूंगी। किशोरी और कामिनी का भी आपके यहां रहना उचित नहीं है इसे आप अच्छी तरह गौर करके सोच लें। उनकी तरफ से आप निश्चिन्त रहें, तालाब वाले मकान में जो आजकल मेरे दखल में है, उन्हें किसी तरह की तकलीफ न होगी। मैं हाथ जोड़ के प्रार्थना करती हूं कि आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें और मुझे अपनी राय पर छोड़ दें।

गोपालसिंह - (कुछ सोचकर) तुम्हारी बातों का बहुत - सा हिस्सा सही और वाजिब है मगर बेइज्जती के साथ तुम्हारा इधर-उधर मारे-मारे फिरना मुझे पसन्द नहीं। यद्यपि तुम्हें ऐयारी का शौक है और तुम इस फन को अच्छी तरह जानती हो मगर मेरी और इसी के साथ किसी और की इज्जत पर भी ध्यान देना उचित है। यह बात मैं तुम्हारी गुप्त इच्छा को अच्छी तरह समझकर कहता हूं। मैं तुम्हारी अभिलाषा में बाधक नहीं होता बल्कि उसे उत्तम और योग्य समझता हूं।

कमलिनी - (कुछ शर्माकर) उस दिन आप जो चाहें मुझे सजा दें जिस दिन किसी की जुबानी, जो ऐयार या उन लोगों में से न हो जिनके सामने मैं हो सकती हूं, आप यह सुन पावें कि कमलिनी या लाडिली की सूरत किसी ने देख ली या दोनों ने कोई ऐसा काम किया जो बेइज्जती या बदनामी से सम्बन्ध रखता है।

गोपालसिंह - (तेजसिंह से) आपकी क्या राय है?

तेजसिंह - मैं इस विषय में कुछ भी न बोलूंगा, हां, इतना अवश्य कहूंगा कि यदि आप कमलिनी की प्रार्थना स्वीकार कर लेंगे तो मैं अपने दो ऐयारों को इनकी हिफाजत के लिए छोड़ दूंगा।

गोपालसिंह - जब आप ऐसा कहते हैं तो मुझे कमलिनी की बात माननी पड़ी। खैर, थोड़े से सिपाही इनकी मदद के लिए मैं भी मुकर्रर कर दूंगा।

कमलिनी - मुझे उससे ज्यादा आदमियों की जरूरत नहीं है जितने मेरे पास थे, हां आप उन लोगों को एक चीठी मेरे जाने के बाद अवश्य लिख दें कि ‘हम इस बात से खुश हैं कि तुम इतने दिनों से कमलिनी के साथ रहे और रहोगे।’ हां इसके साथ एक काम और भी चाहती हूं।

गोपालसिंह - वह क्या?

कमलिनी - जब मैंने अपना किस्सा आपसे बयान किया था तो यह भी कहा था कि मायारानी ने तिलिस्मी मकान के जरिए से कुमार और उनके ऐयारों के साथ-ही-साथ कई बहादुर सिपाहियों को गिरफ्तार कर लिया था।

गोपालसिंह - हां, मुझे याद है, जिस मकान में बारी-बारी हंसकर वे लोग कूद गये थे।

कमलिनी - जी हां, कुमार और उनके ऐयार तो छूट गये, मगर मेरे सिपाहियों का अभी तक पता नहीं है, बेशक वे भी तिलिस्मी बाग में किसी ठिकाने कैद होंगे, जिसका पता आप लगा सकते हैं। मुझे आज तक यह न मालूम हुआ कि उनके हंसने और कूद पड़ने का क्या कारण था। इस विषय में कुमार से भी कुछ पूछने का मौका न मिला।

गोपालसिंह - मैं वादा करता हूं कि उन आदमियों को यदि वे मारे नहीं गए हैं तो अवश्य ढूंढ़ निकालूंगा, और इसका कारण कि वे लोग हंसते-हंसते उस मकान के अन्दर क्यों कूद पड़े सो तुम इसी समय देवीसिंह से भी पूछ सकती हो जो यहां मौजूद हैं और उन हंसते-हंसते कूद पड़ने वालों में शरीक थे।

देवीसिंह - माफ कीजिए, मैं उस विषय में तब तक कुछ भी न कहूंगा जब तक इन्द्रजीतसिंह मेरे सामने मौजूद न होंगे, क्योंकि उन्होंने इस बात को छिपाने के लिए मुझे सख्त ताकीद की है बल्कि कसम दे रखी है।

कमलिनी - यह और भी आश्चर्य की बात है, खैर, जाने दीजिए, फिर देखा जायेगा। हां, आपने मेरी प्रार्थना स्वीकार की लाडिली मेरे साथ रहेगी।

गोपालसिंह - हां, स्वीकार की। मगर देखना, जो कुछ करना होशियारी ही से करना और मुझे बराबर खबर देती रहना।

तेजसिंह - मैं प्रतिज्ञानुसार अपने दो ऐयार तुम्हारे सुपुर्द करता हूं। जिन्हें तुम चाहो अपनी मदद के लिए ले लो।

कमलिनी - अच्छा, तो आप कृपाकर भूतनाथ और देवीसिंह को दे दीजिए।

तेजसिंह - भूतनाथ तो तुम्हारा ही ऐयार है उस पर अभी मेरा कोई अख्तियार नहीं है, वह अवश्य तुम्हारे साथ रहेगा, उसके अतिरिक्त दो ऐयार तुम और ले लो।

कमलिनी - निःसन्देह आपका मुझ पर बड़ा अनुग्रह है, मगर मुझे ज्यादा ऐयारों की आवश्यकता नहीं है।

तेजसिंह - खैर, यही सही फिर देखा जायेगा। (देवीसिंह से) अच्छा, तो तुम कमलिनी का काम करो और इनके साथ रहो।

देवीसिंह - बहुत अच्छा।

तेजसिंह - खैर, तो अब सभा विसर्जित होनी चाहिए, देखिये आसमान का रंग बदल गया। कमलिनी और लाडिली के लिए सवारी का क्या इन्तजाम होगा

कमलिनी - थोड़ी दूर जाकर मैं रास्ते में इसका इन्तजाम कर लूंगी आप बेफिक्र रहिये।

थोड़ी - सी और बातचीत के बाद सब कोई उठ खड़े हुए। कमलिनी, लाडिली, भूतनाथ तथा देवीसिंह ने दक्खिन का रास्ता पकड़ा और कुछ दूर जाने के बाद सूर्य भगवान की लालिमा दिखाई देने के पहले ही एक जंगल में गायब हो गये।

 

बयान - 4

रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है। आज की रात मामूली से ज्यादा अंधेरी मालूम होती है क्योंकि आबोताब से चमक लेकर पांचों सवारों में गिनती करने वाले तारों की थोड़ी रोशनी को दिन भर तेजी के साथ चले हुए हवा के झपेटों की सहायता से ऊपर की तरफ उठे हुए गर्द-गुबार ने अपना गंदला शामियाना खींचकर जमीन तक आने से रोक रखा है। दिन भर के कामकाज से थके और आंधी के झोंकों तथा गर्द-गुबार से दुःखी आदमी इस समय सड़कों पर घूमना पसन्द न करके अपने-अपने झोंपड़ों, मकानों और महलों में आराम कर रहे हैं इसलिए काशीपुरी के बाहरी प्रान्त की सड़कों पर कुछ विचित्र-सा सन्नाटा छाया हुआ है। केवल एक आदमी शहर की हद पर बहने वाली बरना नदी पार करके त्रिलोचन महादेव की तरफ तेजी के साथ बढ़ा चला जाता है और उसे टोकने या देखने वाला कोई भी नहीं। यह आदमी आधी रात के पहले ही मनोरमा के मकान के पास जा पहुंचा, जिसमें इस समय केवल नागर रहती थी। यहां पहुंच वह सीधे फाटक की तरफ चला गया। देखा कि फाटक बन्द है मगर उसकी छोटी खिड़की अभी खुली हुई है और उस राह से झांककर देखने से मालूम होता है कि भीतर की तरफ दो आदमी टहल-टहलकर पहरा दे रहे हैं।

वह आदमी बेधड़क छोटी खिड़की की राह से भीतर घुस गया और दोनों पहरा देने वालों से बिना साहब-सलामत किये या बिना कुछ कहे अपनी जेब टटोलने लगा। एक पहरे वाले ने ताज्जुब में आकर उससे पूछा, ‘‘तुम कौन हो और क्या चाहते हो’ इसके जवाब में आगन्तुक ने एक चीठी उसके हाथ पर रखकर कहा, ‘‘यह चीठी बहुत जल्द उसके हाथ में दो, जो इस मकान में सबका सरदार मौजूद हो।’’

सिपाही - पहले तुम अपना नाम बताओ और यह कहो कि तुम किसके भेजे हुए आये हो और इस चीठी का मतलब क्या है?

आगन्तुक - तुम अपनी बातों का जवाब मुझसे नहीं पा सकते और न इस चीठी के पहुंचाने में विलम्ब कर सकते हो, ताज्जुब नहीं कि तुम सफाई के साथ यह कहो कि मकान मालिक इस समय आराम के साथ खर्राटे ले रहा है और हम उसे जगा नहीं सकते मगर याद रखो कि यह समय बड़ा ही नाजुक बीत रहा है और एक पल भी व्यर्थ जाने देने लायक नहीं है, अगर तुम मुझसे कुछ पूछताछ करोगे तो मैं बिना कुछ जवाब दिये यहां से चला जाऊंगा और इसका नतीजा बहुत बुरा होगा, क्योंकि सबेरा होने से पहले इस मकान में रहने वाले जितने हैं सब-के-सब यमलोक को सिधार जायेंगे और सब कसूर तुम्हारा ही समझा जायेगा। खैर मुझे इन बातों से क्या मतलब, लो मैं जाता हूं।

सिपाही - सुनो-सुनो, लौटे क्यों जाते हो, मैं यह चीठी अभी अपने मालिक के पास पहुंचाए देता हूं, मगर यह तो बताओ कि ऐसी कौन-सी आफत आने वाली है और उसका क्या सबब है

आगन्तुक - मैं पहले ही कह चुका हूं कि तुम्हारी बातों का कुछ जवाब नहीं दिया जायेगा, तुमने पुनः पूछने में जितना समय नष्ट किया, समझ रखो कि उतने समय में दो आदमियों का बेड़ा पार हो गया। बस मैं फिर कहता हूं कि अभी चले जाओ, मैं जो कुछ कहता हूं तुम लोगों के भले ही के लिए कहता हूं।

इस आये हुए आदमी की धमकी लिए हुए जल्दबाजी ने उस पहरे वाले को बल्कि और सिपाहियों को भी जो उस समय वहां मौजूद थे और उसकी बातें सुन रहे थे बदहवास कर दिया - फिर उससे कुछ पूछने की हिम्मत किसी की न पड़ी। वह सिपाही जिसके हाथ में चीठी दी गई थी कुछ सोचता-विचारता बाग के अन्दर वाले मकान की तरफ रवाना हुआ और नजरों से गायब होकर आधे घण्टे तक न आया। तब तक वह आदमी जो चीठी देने आया था फाटक ही में एक किनारे चुपचाप खड़ा रहा। सिपाहियों ने कुछ पूछना चाहा, मगर उसने किसी की बात का जवाब न दिया और सिर नीचा किये इस ढंग से जमीन को देखता रहा जैसे बड़े गौर और फिक्र में कुछ विचार कर रहा हो।

आधे घण्टे के बाद जब वह सिपाही लौटकर आया तो उसने आगन्तुक से कहा, ‘‘चलिए आपको नागरजी बुला रही हैं।’’

आगन्तुक - (ताज्जुब से) नागरजी! क्या इस समय इस मकान में वही मालिक की तौर पर हैं मैं तो मायारानी से मिलने की आशा रखता था!

सिपाही - इस समय नागरजी के सिवाय यहां और मालिक लोग नहीं हैं। क्या तुम्हारी चीठी इस लायक न थी कि नागरजी के हाथ में दी जाती क्योंकि मैंने देखा कि चीठी पढ़ने के साथ ही फिक्र और तरद्दुद ने उनकी सूरत बदल दी।

आगन्तुक - नहीं कोई विशेष हानि नहीं है, खैर चलो मैं चलता हूं।

वह आगन्तुक सिपाही के पीछे-पीछे उस मकान की तरफ रवाना हुआ, जो इस बाग के बीचोंबीच में था और क्यारियों के बीच बनी हुई बारीक सड़कों पर घूमता हुआ मकान के पिछली तरफ जा पहुंचा। इस जगह मकान के दोनों तरफ दो कोठरियां थीं, दाहिनी तरफ वाली कोठरी तो बन्द थी मगर बायीं तरफ वाली कोठरी का दरवाजा खुला हुआ था और भीतर चिराग जल रहा था। दोनों आदमी उस कोठरी के भीतर गये। वहां ऊपर की छत पर जाने के लिए सीढ़ियां बनी थीं, उसी राह से दोनों ऊपर की छत पर चले गये और एक कमरे में पहुंचे जहां सिवाय सफेद फर्श के और कोई सामान जमीन पर न था। सामने की दीवार में दो जोड़ी दीवारगीरों की थीं जिनमें मोटी-मोटी मोमबत्तियां जल रही थीं और उनकी रोशनी से इस कमरे में अच्छी तरह उजाला हो रहा था। इस कमरे में बायीं तरफ एक कोठरी थी जिसके दरवाजे पर लाल साटन का पर्दा पड़ा हुआ था। वह आदमी उसी पर्दे की तरफ मुंह करके खड़ा हो गया, क्योंकि इस कमरे में सिवाय इन दो आदमियों के और कोई भी न था।

इन दोनों आदमियों को बहुत बड़ी देर तक वहां खड़े रहना पड़ा और इसी बीच में उस आदमी को जो चीठी लाया था मालूम हो गया कि पर्दे के अन्दर से किसी ने उसे अच्छी तरह देखा है। थोड़ी देर में पर्दे के अन्दर से दो लौंडियां चुस्त और साफ पोशाक पहने हाथ में नंगी तलवार लिए बाहर निकलीं और इसके बाद उसी तरह की बेशकीमत पोशाक पहने नागर भी पर्दे के बाहर आई। उसकी कमर में वही तिलिस्मी खंजर था और उंगली में उसके जोड़ की अंगूठी मौजूद थी। नागर ने उस आये हुए आदमी की तरफ देखकर कहा - ‘‘तुम किसके भेजे हुए आये हो और तुम्हारा क्या नाम है मुझे खयाल आता है कि मैंने तुम्हें कहीं देखा है मगर याद नहीं पड़ता कि कब और कहां!’’

इस आदमी की उम्र लगभग चालीस या पैंतालीस वर्ष के होगी। इसका कद लम्बा और शरीर दुबला मगर गठीला, रंग गोरा, चेहरा खूबसूरत और रोबीला था। बड़ी-बड़ी मूंछें दोनों किनारों से ऐंठी और घूमी हुई थीं। आंखें बड़ी और इस समय कुछ लाल थीं। पोशाक यद्यपि बेशकीमत न थी मगर साफ और अच्छे ढंग की थी। चुस्त पायजामा घुटने के चार अंगुल नीचे तक का, चपकन और उस पर से एक ढीला चोगा पहने और सिर पर भारी मुंड़ासा बांधे हुए था। सरसरी निगाह से देखने पर वह कोई छोटा या बदरोब आदमी नहीं कहा जा सकता था।

नागर की बात सुनकर वह आदमी कुछ मुस्कराया और बोला, ‘‘केवल इतना ही नहीं, आप अभी बहुत कुछ मुझसे पूछेंगी मगर मैं किसी के सामने आपकी बातों का जवाब नहीं दिया चाहता, क्योंकि मैं एक नाजुक काम के लिए आया हूं। यदि किसी तरह का खौफ न हो तो (सिपाही और लौंडियों की तरफ इशारा करके) इनको हट जाने के लिए कहिए और फिर जो कुछ चाहे पूछिए, मैं साफ जवाब दूंगा।’’

उस आदमी की बात सुनकर नागर ने अपने तिलिस्मी खंजर की तरफ देखा जो कमर से लटक रहा था, मानो उस खंजर पर उसे बहुत भरोसा है और इसके बाद सिपाही तथा लौंडियों को वहां से हट जाने का इशारा करके बोली, ‘‘नहीं-नहीं, मुझे तुमसे खौफ खाने का कोई सबब मालूम नहीं होता।’’

आदमी - (सिपाही और लौडियों के हट जाने के बाद) हां, अब जो कुछ आपको पूछना हो पूछिए, मैं जवाब दूंगा।

नागर - मैं फिर पूछती हूं कि तुम किसके भेजे हुए आये हो और तुम्हारा नाम क्या है मैंने तुम्हें कहीं-न-कहीं अवश्य देखा है।

आदमी - मेरा नाम श्यामलाल है और तुमने मुझे उस समय देखा होगा जब तुम्हारा नाम ‘मोतीजान’ था और तुम बाजार में कोठे के ऊपर बैठकर अपने कटाक्षों से सैकड़ों को घायल किया करती थीं। रंडियों के लिए यह मामूली बात है कि जब विशेष दौलत हो जाती है, तब वे उन दोस्तों को भूल जाती हैं, जिनसे किसी जमाने में थोड़ी रकम पाई हो, चाहे वह उस समय कितना ही गाढ़ा मुलाकाती क्यों न रह चुका हो। मैं यह ताने के ढंग पर नहीं कहता, बल्कि इस उम्मीद पर कहता हूं कि पुरानी मुलाकात की याद कर मुझे साफ करोगी क्योंकि इस समय तुम एक ऊंचे दर्जे पर हो।

नागर - (नाक-भौं सिकोड़कर, जिससे मालूम होता था कि श्यामलाल की बातों से वह कुछ चिढ़ गई है) हां खैर, मैंने तुम्हें पहचाना। अच्छा अब बताओ कि तुम क्या चाहते हो?

श्यामलाल - (मुस्कराकर) बस यही चाहता हूं कि तुम मुझे बिदा करो और चुपचाप यहां से चले जाने दो।

नागर - नहीं-नहीं, मेरा यह मतलब नहीं है। मैं उस चीठी का भेद जानना चाहती हूं, जो मेरे सिपाही के हाथ तुमने भेजी है और जिसमें केवल इतना ही लिखा है कि ‘लक्ष्मीदेवी के प्रकट हो जाने से अनर्थ हो गया, अब मायारानी और उसके पक्षपातियों को एकदम भागकर अपनी जान बचाना उचित है।’ (चीठी दिखाकर) देखो, यही है न!

श्यामलाल - हां, यही है, मगर इसमें यह भी लिखा है कि ‘नहीं तो बारह घंटे के बाद फिर कुछ करते-धरते न बन पड़ेगा।’

नागर - हां ठीक है, यह भी लिखा है। मगर यह बताओ कि लक्ष्मीदेवी कौन है और उसके प्रकट हो जाने से हमारा क्या नुकसान है?

श्यामलाल - (ताज्जुब से नागर का मुंह देखकर) क्या तुम लक्ष्मीदेवी वाला भेद नहीं जानती हो क्या यह भेद मायारानी ने तुमसे छिपा रखा है खैर, अगर यह बात है, तो मैं भी इस भेद को खोलना उचित नहीं समझता। अच्छा, यह तो बताओ मायारानी कहां है, मैं उससे कुछ कहना चाहता हूं।

नागर - क्या मायारानी तुम्हारे सामने हो सकती हैं क्या तुम नहीं जानते कि उनका दर्जा कितना बड़ा है, और उन्हें कोई गैर मर्द नहीं देख सकता!

श्यामलाल - मैं सब-कुछ जानता हूं और यह भी जानता हूं कि वह मुझसे पर्दा न करेगी।

नागर - शायद ऐसा ही हो, लेकिन इस समय वह किसी काम से गई हैं, और यहां नहीं हैं।

श्यामलाल - अगर ऐसा ही है, तो मैं भी जाता हूं और तुमसे कह जाता हूं कि जहां तक हो सके जल्द भागकर अपनी जान बचाओ।

यह कहकर श्यामलाल पीछे की तरफ लौटा मगर नागर ने उसे रोककर कहा, ‘‘सुनो तुम अभी कह चुके हो कि हमारे पुराने दोस्त हो, तो क्या तुम मुझ पर कृपा करके पुरानी दोस्ती को याद करके लक्ष्मीदेवी वाला भेद मुझे नहीं बता सकते क्या तुम साफ-साफ नहीं कह सकते कि हम लोगों पर क्या आफत आने वाली है’

श्यामलाल - बेशक मैं तुम्हारी दोस्ती का इकरार कर चुका हूं और अब भी यह कहता हूं कि अभी तक तुम्हारी मुहब्बत ने मेरा साथ नहीं छोड़ा है मगर (कुछ सोचकर) अच्छा लो, मैं एक चीठी देता हूं, इसके पढ़ने से तुम्हें सब हाल मालूम हो जायगा मगर (कोठरी के दरवाजे पर पड़े हुए पर्दे की तरफ देखकर) मुझे शक है कि इस परदे के अन्दर से कोई लौंडी छिपकर न देखती हो।

नागर - नहीं-नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता। लो, मैं तुम्हारा शक दूर किये देती हूं।

यह कहकर नागर ने आगे बढ़कर वह पर्दा किनारे कर दिया और कोठरी का दरवाजा बन्द कर लिया। श्यामलाल ने नागर की तरफ चीठी बढ़ाकर कहा, ‘‘देखो, मैं निश्चय करके आया था कि यह चीठी सिवाय मायारानी के और किसी के हाथ में न दूंगा, क्योंकि उसे मैं दिल से चाहता हूं और उसी की खातिर इतना कष्ट उठाकर आया भी हूं, सच तो यह है कि वह भी मुझे जी-जान से मानती और प्यार करती है।’’

नागर - अफसोस और ताज्जुब की बात यह है कि तुम मायारानी की शान में ऐसी बात कह रहे हो। निःसन्देह तुम झूठे और दगाबाज हो। मायारानी को क्या पड़ी है कि वह तुमसे मुहब्बत करें क्या वह भी मेरी तरह से गन्धर्व कुल को रौनक देने वाली हैं

श्यामलाल - (हंसकर और चीठी वाला हाथ अपनी तरफ खींचकर) हः-हः-हः, जब तुम असल बातों को जानती ही नहीं हो तो मेरी बातें क्योंकर समझ सकती हो तुम मायारानी की सखी कहलाने का दावा रखती हो, मगर मैं देखता हूं कि मायारानी तुम्हें एक लौंडी के बराबर भी नहीं समझती। यही सबब है कि उसने अपना असली हाल तुमसे कुछ भी नहीं कहा। अफसोस, तुम्हें इतनी खबर भी नहीं है कि मायारानी मेरी सगी साली है।

नागर - (चौंककर) मायारानी तुम्हारी साली हैं! और लक्ष्मीदेवी?

श्यामलाल - लक्ष्मीदेवी वह है जिसकी जगह मायारानी मेरी और दारोगा की मदद... मगर नहीं, ओफ, मैं भूलता हूं, जब मायारानी ने ही खुद अपना हाल तुमसे छिपाया, तो मैं क्यों कहूं अच्छा, मायारानी आवे तो कह देना कि श्यामलाल आया था और कह गया है कि मैंने लक्ष्मीदेवी और गोपालसिंह का बन्दोबस्त कर लिया है। अब तू बेफिक्र होकर बैठ और जहां तक हो सके, मुझसे जल्द मिल। लेकिन अफसोस तो यह है कि इस मकान में रहने वाले आज गिरफ्तार कर लिए जायेंगे और मायारानी को यहां आने का मौका ही न मिलेगा। तब मैं यह सब बातें तुमसे क्यों कह रहा हूं। अच्छा खैर, जाने दो, जहां तक हो जल्द भागकर तुम अपनी जान बचाओ और जो कुछ दौलत यहां से निकालकर ले जा सको, लेती जाओ। लो, अब मैं जाता हूं।

नागर - सुनो-सुनो, वह चीठी जो तुम मुझे दिखाना चाहते थे, सो तो दिखा दो, और इसके बाद मेरी एक बात का जवाब देकर तब जाओ।

श्यामलाल - (कुछ सोचकर और नागर की तरफ चीठी बढ़ाकर) खैर, लो, तुम भी पढ़ लो, देखो तो सही अपनी साली की खातिर से कैसे खुशबूदार अंतरों से बसी हुई चीठी तैयार करके मैं लाया था। अच्छा कोई हर्ज नहीं, किसी जमाने में तुम भी मुझे खुश कर चुकी हो। इसके पढ़ने से आने वाली आफत का पूरा-पूरा हाल मिल जायगा। मैं यह चीठी इसलिए लिख लाया था कि शायद किसी सबब से मैं स्वयं मायारानी से न मिल सकूंगा, तो यह चीठी भेजकर उसे आने वाली आफत से होशियार कर दूंगा और फिर वह स्वयं मुझसे मिल सकेगी, मगर अफसोस! उससे तो मुलाकात ही न हुई। खैर, इस चीठी को पढ़ो, मगर बैठ जाओ और मुझे भी बैठने के लिए कहो, क्योंकि मैं खड़ा-खड़ा थक गया हूं।

नागर ने अपने हाथ में चीठी लेकर श्यामलाल को बैठने के लिए कहा और खुद भी उसी जगह बैठकर लिफाफा खोला। लिफाफे और चीठी का कागज खुशबूदार चीजों से ऐसा बसा हुआ था कि लिफाफा हाथ में लेने और खोलने के साथ ही नागर का जी खुश हो गया। ऐसी मीठी और भली खुशबू उसके दिमाग में शायद आज तक न पहुंची होगी। चीठी पढ़ने के पहले ही उसने कई दफे उसे सूंघा और आंखें बन्द करके ‘वाह-वाह’ कहने लगी। मगर उस खुशबू का काम केवल इतना ही न था कि दिल और दिमाग को खुश करे बल्कि उसमें मजेदार और आनन्द देने वाली बेहोशी पैदा करने का भी गुण था, इसलिए चीठी पढ़ने के पहले ही नागर के दिमाग की ताकत जिससे चेतना और विचार-शक्ति का सम्बन्ध है बिल्कुल जाती रही और वह बेहोश होकर दीवार के साथ उठंग गई। उसकी हालत देखकर श्यामलाल आगे बढ़ा और पास जाकर बिना कुछ सोचे-विचारे उसकी उंगली से वह अंगूठी निकाल ली जो तिलिस्मी खंजर के जोड़ की और मामूली तौर की बिल्कुल सादी थी। अंगूठी लेकर श्यामलाल ने मुंह में रख ली और उसी रंग की दूसरी अंगूठी अपनी जेब से निकालकर नागर की उंगली में पहना दी। इसके बाद अपनी कमर से एक खंजर निकाला जो चपकन और अबा के अन्दर छिपा हुआ था। यह खंजर नागर की कमर में खोंसा और उसकी कमर से तिलिस्मी खंजर लेकर अपनी कमर में चपकन के अन्दर छिपा लिया। श्यामलाल ये दोनों चीजें निःसन्देह इसी काम के लिए तैयार करके ले आया था, क्योंकि वह खंजर और अंगूठी ठीक तिलिस्मी खंजर और अंगूठी के रंग-ढंग के ही थे, बहुत गौर करने पर भी किसी तरह का शक नहीं हो सकता था।

खंजर और अंगूठी बदल लेने के बाद श्यामलाल ने वह खुशबूदार चीठी भी नागर के हाथ से ले ली और उसके बदले में उसी तरह की दूसरी चीठी उसके हाथ में रख दी। इस चीठी में से भी उसी तरह की खुशबू आ रही थी। फर्क सिर्फ इतना ही था कि उसकी खुशबू बेहोशी पैदा करने वाली थी और इसकी खुशबू बेहोशी दूर करने की ताकत रखती थी अर्थात् लखलखे का काम देती थी।

इस काम से छुट्टी पाकर श्यामलाल पीछे हटा और अपने ठिकाने बैठकर नागर के चैतन्य होने की राह देखने लगा। थोड़ी ही देर में नागर चैतन्य हो गई और आंखें खोलकर श्यामलाल की तरफ देख और उस चीठी को पुनः सूंघकर बोली, ‘‘बेशक खुशबू बहुत ही अच्छी और प्रिय मालूम होती है, मगर मुझे क्या हो गया था! क्या मैं बेहोश हो गई थी’

श्यामलाल - (हंसकर) वाह क्या खूब! केवल एक दफे आंख बन्द करके खोल देने का ही अर्थ अगर बेहोशी है, तो बस हो चुका, क्योंकि मेरी समझ में तुमने चार पल से ज्यादा देर तक आंख बन्द नहीं की, सो भी इस खुशबू से पैदा हुई मस्ती के सबब था।

नागर - (मुस्कराकर) अगर तुम मायारानी के बहनोई न होते तो मैं कुछ कह बैठती, क्योंकि ऐसे समय में जबकि जान बचाने की फिक्र पड़ रही है जैसा कि तुम स्वयं कह रहे हो तो इस तरह की दिल्लगी अच्छी नहीं मालूम पड़ती। अच्छा, अब मैं इस चीठी को पढ़कर देखती हूं कि तुमने क्या लिखा है। (चीठी को पढ़कर) वाह-वाह, इसका मतलब तो मेरी समझ में कुछ भी नहीं आता, मालूम होता है कि बहुत-सी पहेलियां लिखकर रखी हुई हैं!

श्यामलाल - बस-बस, अब मुझे और भी निश्चय हो गया कि मायारानी तुम लोगों से मुंह-देखी मुहब्बत रखती है क्योंकि अगर वह तुम लोगों की कदर करती तो अपना भेद जरूर कहती और अपना भेद कहती तो इस चीठी का मतलब भी तुम जरूर समझ जातीं - मगर उसने अदना से अदना भेद भी छिपा रखा जिसके बताने में कोई हानि न थी।

नागर - ठीक है, मुझे भी यही विश्वास होता है। मगर जब मुझ पर दया करके यह कह रहे हो कि जल्दी यहां से भागकर अपनी जान बचाओ, तो कृपा कर इसका सबब भी बता दो, क्योंकि मुझे कुछ भी नहीं सूझता कि मैं भागकर कहां जाऊं और इस जायदाद के बचाने का क्या उद्योग करूं?

श्यामलाल - इसका जवाब मैं कुछ भी नहीं दे सकता, क्योंकि मैं अगर तुम्हें कोई तरकीब बताऊं या अपने साथ चलने के लिए कहूंगा तो तुम्हें मुझ पर अविश्वास होगा क्योंकि तुम बहुत दिनों के बाद मुझे आज देख रही हो सो भी ऐसे समय में जब तुम्हारा दिल राजकीय विषयों की उलझन में हद से ज्यादा उलझा हुआ है, परन्तु इतना कह देने में मेरी कोई हानि भी नहीं है कि राजा गोपालसिंह के लिखे बमूजिब काशीराज इस मकान को अपने कब्जे में कर लेने के बाद यहां के रहने वालों को कैद कर लेंगे। गोपालसिंह ने सुना था कि मायारानी इस मकान में टिकी हुई है। इसलिए यह कार्रवाई और भी जोर के साथ की गई, मगर इतनी खैरियत है कि अभी तक वह आदमी इस शहर में नहीं पहुंचा जिसे राजा गोपालसिंह ने चीठी देकर काशीराज के पास भेजा है। हां आशा है कि सबेरा होते-होते वह शहर में आ पहुंचेगा। (कुछ सोचकर) क्या करें, आज तुम्हें देखकर तुम्हारी मुहब्बत फिर से नई हो गई। खैर, अगर तुम चाहोगी तो मैं तुम्हारी कुछ मदद इस समय भी कर सकूंगा।

नागर - अगर इस समय तुम मेरी सहायता करोगे तो मैं जन्म भर तुम्हारा अहसान न भूलूंगी। मैं कसम खाकर कहती हूं कि मैं तुम्हारी हो जाऊंगी और जो कुछ तुम कहोगे वही करूंगी।

श्यामलाल - अच्छा तो अब मैं बयान करता हूं, कि इस समय तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं। सुनो और अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो। मैं उस आदमी को अच्छी तरह पहचानता हूं, जो गोपालसिंह की चीठी लेकर काशीराज के पास आ रहा है, मुझसे उसकी बहुत दिनों की जान-पहचान है। मैं उम्मीद करता हूं कि सबेरा होते ही वह आदमी बरना के किनारे आ पहुंचेगा। यदि वह किसी तरह गिरफ्तार कर लिया जाय तो बेशक कई दिनों तक तुम्हें सोचने-विचारने का मौका मिलेगा क्योंकि राजा गोपालसिंह कई दिनों तक बैठे राह देखेंगे कि हमारा आदमी पत्र का जवाब लेकर अब आता होगा।

नागर - बात तो बहुत अच्छी है। क्या तुम उसे गिरफ्तार नहीं कर सकते?

श्यामलाल - (हंसकर) वाह, वाह, वाह, कहते शर्म तो नहीं आती! हां, इतना कर सकता हूं कि तुम थोड़े-से सिपाही अपने साथ लेकर इस समय मेरे साथ चलो, और शहर के बाहर होकर रास्ता रोक बैठो, जब वह आदमी आवेगा तो मैं इशारे से बता दूंगा कि यही है, फिर जो तुम्हारे जी में आवे करना। मगर, मैं उसका सामना न करूंगा, क्योंकि अभी कह चुका हूं कि मेरी-उसकी जान-पहचान बहुत पुरानी है।

नागर - जब तुम मुझ पर कृपा करके इतना काम कर सकते हो तो मेरे जाने की क्या जरूरत है मैं थोड़े से सिपाही तुम्हारे साथ कर देती हूं, समय पड़ने पर तुम...।

श्यामलाल - बस-बस-बस, अब मत बोलो, मैं समझ गया कि तुम्हारी नीयत साफ नहीं है। मैं खुदगर्जों का साथ देना उचित नहीं समझता, केवल तुम्हारे ही बारे में नहीं बल्कि मायारानी के बारे में भी जो मेरी साली होती है मेरा यही खयाल है कि वह परले सिरे की खुदगर्ज है, दूसरे को फंसाकर अपना काम निकालना और आप अलग रहना खूब जानती है, मगर मैं क्या करूं अपनी स्त्री से लाचार हूं जो मुझसे भी ज्यादा मायारानी के साथ मुहब्बत रखती है और मैं उसे जान से ज्यादा चाहता हूं।

श्यामलाल की बातचीत कुछ अजब ढंग की थी जिसमें हर जगह से सचाई की बू पाई जाती थी। बात करने के समय वह अपने चेहरे के उतार-चढ़ाव को ऐसा दुरुस्त रखता था कि होशियार से होशियार आदमी को भी उस पर किसी तरह का शक नहीं हो सकता था। नागर को उसकी बातों पर पूरा विश्वास हो गया और वह इस उम्मीद पर कि राजा गोपालसिंह के भेजे हुए आदमी को अवश्य गिरफ्तार कर लेगी, अपने साथ केवल थोड़े सिपाहियों को लेकर जाने के लिए तैयार हो गई। इसके बाद उसने अपनी कमर से लटकते हुए तिलिस्मी खंजर पर पुनः गम्भीर निगाह डाली, मानो अपने सिपाहियों से ज्यादे उस खंजर पर भरोसा रखती है मगर उसे इस बात का गुमान भी न था कि वह खंजर बड़ी खूबी के साथ बदल दिया गया है।

नागर ने अपनी समझ में श्यामलाल को बहुत कुछ कह-सुनकर मदद के लिए राजी किया और आप उसके साथ जाने के लिए तैयार हो गई। उसने श्यामलाल से आधी घड़ी की छुट्टी ली और उस कोठरी के अन्दर चली गई जिसके दरवाजे पर पर्दा पड़ा हुआ था। आधी घड़ी के बाद वह बाहर आई और श्यामलाल से बोली, ‘‘अब मैं हर तरह से तैयार हो गई, आप चलिए।’’ इस समय भी नागर उसी पोशाक में थी जिसमें घड़ी भर पहले देखी गयी थी, फर्क इतना ही था कि एक चादर उसके हाथ में थी जिसे फाटक के बाहर होते ही अपने को सिर से पैर तक ढांक लेने की नीयत से वह अपने साथ लाई थी।

श्यामलाल को साथ लिए हुए नागर नीचे उतरी और चक्कर खाती हुई सदर फाटक के पास पहुंची। यहां उसने स्याह चादर में अपने को छिपा लिया और फाटक के बाहर रवाना हुई! श्यामलाल ने इस समय मामूली पहरा देने वाले सिपाहियों के अतिरिक्त आठ सिपाही हर्बों से दुरुस्त वहां मौजूद पाये जो फाटक के बाहर होते ही नागर और श्यामलाल के पीछे-पीछे रवाना हुए, नागर को इसके लिए कुछ कहने की जरूरत न पड़ी जिससे श्यामलाल समझ गया कि आधी घड़ी की छुट्टी में नागर ने यह इन्तजाम किया है।

ये दसों आदमी गंगा के किनारे उतरे और वहां से तेजी के साथ काशी के छोर पर बहने वाली बरना नदी की तरफ रवाना होकर आधे घण्टे से कुछ ज्यादा देर में वहां जा पहुंचे। इस समय रात आधी से ज्यादा जा चुकी थी और चन्द्रदेव उदय हो रहे थे। बरना नदी पार करने के लिए नदी से बीस गज ऊंचा एक मजबूत पुल बना हुआ था। इस पुल के दोनों बगल मुसाफिरों के आराम के लिए बारह दालान बने हुए थे और उसी जगह से पुल के नीचे उतरने के लिए छोटी-छोटी सीढ़ियां भी बनी हुई थीं। ये दसों आदमी जब उस पर पहुंचे तो नागर ने श्यामलाल से पूछा, ‘‘कहिये इसी पार ठहरने का इरादा है या उस पार चलकर’ जिसके जवाब में श्यामलाल ने कहा, ‘‘बिना उस पार गये ठीक न होगा।’’

अब ये लोग पुल के उस पार रवाना हुए, मगर आधी दूर से ज्यादे न गये होंगे कि सामने से आते हुए दो घोड़ों की आहट मिलने लगी जिसे सुनते ही श्यामलाल ने कहा, ‘‘लीजिए, हम लोगों को ज्यादे ठहरना न पड़ा। निःसन्देह ये वे ही सवार हैं जिन्हें हम लोग गिरफ्तार किया चाहते हैं। बस अब जल्दी करनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि ये लोग तेजी के साथ निकल जायं क्योंकि ये घोड़ों पर सवार हैं और हम लोग पैदल।’’

नागर ने अपनी कमर से खंजर निकाल लिया जिसे वह तिलिस्मी समझे हुए थी और इसके बाद अपने आदमियों की तरफ देख के बोली, ‘‘देखो ये सवार जाने न पावें, इन्हीं को गिरफ्तार करने के लिए हम लोग आये हैं।’’

बात की बात में वे दोनों सवार पास आ गये। नागर के सिपाही म्यान से तलवार निकालकर खड़े हो गए और ललकारकर बोले, ‘‘खबरदार, आगे मत बढ़ना!’’ मगर इतने में ही मालूम हुआ कि पीछे की तरफ से भी कई आदमी दौड़े आ रहे हैं। उस समय नागर घबड़ा गई ओैर उसे निश्चय हो गया कि अब यहां से बचकर निकल जाना मुश्किल है क्योंकि हम लोग दोनों तरफ से घिर गये, हां तिलिस्मी खंजर की बदौलत अलबत्ते बच सकते हैं। नागर ने तिलिस्मी खंजर का (जो वास्तव में असली न था) कब्जा दबाया मगर किसी तरह की चमक पैदा न हुई। तब उसने फिरकर श्यामलाल की तरफ देखा मगर उसे कहीं न पाया। अब उसके ताज्जुब की हद न रही और घबड़ाहट के मारे वह ऐसी बौखला गई कि थोड़ी देर तक तन-बदन की भी सुध जाती रही। इस बीच में वे आदमी भी जो पीछे से आ रहे थे आ पहुंचे और नागर के सिपाहियों पर टूट पड़े। वे लोग भी गिनती में उतने ही थे जितने नागर के सिपाही थे, मगर नागर के सिपाही इतने दिलावर और मजबूत न थे कि उन आठों के मुकाबले में ठहर सकते। नागर डर के मारे चिल्लाकर एक किनारे हट गई और भागना चाहती थी मगर मौका न मिला। वे दोनों सवार नागर की आवाज सुनकर पहचान गये कि वह औरत है। एक ने घोड़े से उतरकर उसे गोद में उठा लिया और उसके हाथ से खंजर छीनकर उसे दूसरे सवार के आगे बैठा दिया। इसके बाद खुद भी अपने घोड़े पर सवार होकर उसने ऊंची आवाज में न मालूम किससे पूछा - ‘‘यहां केवल एक नागर ही औरत है या और भी कोई औरत है’ इसके जवाब में किसी ने कुछ दूर से पुकारकर कहा, ‘‘अगर कोई औरत हाथ आ गई तो ले भागो और समझो कि यही नागर है।’’ इस जवाब को नागर ने भी सुना और पहचान गई कि यह श्यामलाल की आवाज है। अपने सवाल का जवाब पाते ही सवार उत्तर की तरफ रवाना हो गये।

इस समय चन्द्रदेव पूरी तरह से निकलकर अपनी सुफेद चांदनी चारों तरफ फैला रहे थे। नागर के सिपाहियों को जब मालूम हुआ कि नागर गिरफ्तार कर ली गई तो उनकी ताकत और भी जाती रही। दो सिपाही तो जख्मी होकर जमीन पर गिर पड़े और बाकी छह अपनी जान लेकर भागे। उस समय श्यामलाल भी आकर उन आठों बहादुरों के पास खड़ा हो गया और उन लोगों की तरफ देख के बोला, ‘‘शाबाश, तुम लोगों ने अपना काम बड़ी खूबी के साथ पूरा किया, मैं बहुत खुश हूं, अब बताओ, मेरे लिए घोड़ा कहां है?’

श्यामलाल को देखते ही उन लोगों ने हाथ जोड़कर सिर झुकाया और एक यह कहकर उत्तर की तरफ बढ़ा कि ‘ठहरिये, मैं घोड़ा लेकर अभी आता हूं।’ थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा और जब वह आदमी घोड़ा लेकर आ गया तो श्यामलाल घोड़े पर सवार हो गया तथा उन आठों से बोला, ‘‘अच्छा अब तुम लोग रमापुर जाओ, मैं अपना काम करके तुमसे मिलूंगा।

श्यामलाल भी उत्तर की तरफ रवाना हुआ और पुल के पार होकर उसने अपने घोड़े को तेज किया। जब लगभग एक कोस के गया तो देखा कि वे दोनों सवार, जो नागर को उठा लाये थे, सड़क पर खड़े हैं। उन लोगों को देखकर श्यामलाल ने कहा, ‘‘शाबाश मेरे दोस्तो, तुम लोगों की जितनी तारीफ की जाय थोड़ी है। अच्छा, अब यहां ठहरने का मौका नहीं है, चले चलो।’’

 

बयान - 5

अब हम अपने पाठकों को उस तिलिस्मी मकान की तरफ ले चलते हैं जो कमलिनी के अधिकार में है अर्थात् वह तालाब के बीचोंबीच वाला मकान जिसमें कुछ दिन तक कुंअर इन्द्रजीतसिंह को कमलिनी के बस में रहना पड़ा था।

आजकल इस मकान में कमलिनी की प्यारी सखी तारा रहती है। नौकर, मजदूर, प्यादे, सिपाही सब उसी के आधीन हैं। क्योंकि वे लोग इस बात को बखूबी जानते हैं कि कमलिनी तारा को अपनी सगी बहिन से बढ़कर मानती है और तारा के कहे को टालना कदापि पसन्द नहीं करती। कमलिनी के कहे अनुसार तारा कुछ दिनों तक कमलिनी ही की सूरत बनाकर उस मकान में रही और इस बीच में वहां के नौकर-चाकरों को इसका गुमान भी न हुआ कि कमलिनी कहीं बाहर गई और यह तारा है, बल्कि उन लोगों को यही विश्वास था कि तारा को कमलिनी ने किसी काम के लिए भेजा है, मगर उस दिन से जब से कमलिनी ने मनोरमा को गिफ्तार किया था और अपने तिलिस्मी मकान में भिजवा दिया था, तारा अपनी असली सूरत में ही रहती है और समय - समय पर कमलिनी के हाल-चाल की खबर भी उसे मिला करती है।

देवीसिंह और भूतनाथ को साथ लिए हुए राजा गोपालसिंह ने जब किशोरी और कामिनी को कैद से छुड़ाया था तो उन दोनों को भी कमलिनी की इच्छानुसार इसी तिलिस्मी मकान में पहुंचा दिया था। पहुंचाते समय देवीसिंह और भूतनाथ को साथ लिए हुए स्वयं राजा गोपालसिंह किशोरी तथा कामिनी के संग आये थे। उस समय का थोड़ा-सा हाल यहां लिखना उचित जान पड़ता है।

किशोरी और कामिनी को लिए हुए जब राजा गोपालसिंह उस मकान के पास पहुंचे तो खबर करने के लिए भूतनाथ को तारा के पास भेजा। उस समय तारा किसी काम के लिए तालाब के बाहर आई हुई थी जब उसकी भूतनाथ से मुलाकात हुई। भूतनाथ को देखकर तारा खुश हुई और उससे कमलिनी का समाचार पूछा जिसके जवाब में भूतनाथ ने उस दिन से जिस दिन कमलिनी तारा से आखिरी मर्तबे जुदा हुई थी आज तक का हाल कह सुनाया जिसमें राजा गोपालसिंह का भी हाल था और अन्त में यह भी कहा कि ‘‘किशोरी और कामिनी को कैद से छुड़ाकर कमलिनी की इच्छानुसार उन दोनों को यहां पहुंचा देने के लिए स्वयं राजा गोपालसिंह आये हैं, थोड़ी ही दूर पर हैं और तुमसे मिलना चाहते हैं।’’

तारा को इसका गुमान भी न था कि राजा गोपालसिंह अभी तक जीते हैं या मायारानी के कैदखाने में हैं। आज भूतनाथ की जुबानी यह हाल सुनकर खुशी के मारे तारा की अजब हालत हो गई। भूतनाथ ने उसके चेहरे की तरफ देखकर गौर किया तो मालूम हुआ कि राजा गोपालसिंह के छूटने की खुशी बनिस्बत कमलिनी के तारा को बहुत ज्यादा हुई, बल्कि वह सोचने लगा कि ताज्जुब नहीं कि खुशी के मारे तारा की जान निकल जाय, और वास्तव में यही बात थी भी। तारा के खूबसूरत भोले चेहरे पर हंसी तो साफ दिखाई दे रही थी, मगर साथ ही हंसी के गला फंस जाने के कारण उसकी आवाज रुक-सी गई थी, वह भूतनाथ से कुछ कहना चाहती थी, मगर कह नहीं सकती थी। आंखों से आंसुओं की बूंदें गिर रही थीं और बदन में पल-पल भर में हलकी कंपकंपी हो रही थी।

जब भूतनाथ ने तारा की यह हालत देखी तो उसे बड़ा ही ताज्जुब हुआ, मगर यह सोचकर उसने अपने ताज्जुब को दूर किया कि अक्सर ऐसा भी हुआ करता है कि अगर घर के स्वामी पर आई हुई कोई बला टल जाती है तो बनिस्बत सगे रिश्तेदारों के ताबेदारों को विशेष खुशी होती है। मगर इतना सोचने पर भी भूतनाथ की यह इच्छा हुई कि तारा की इस बढ़ी हुई खुशी को किसी तरह कम कर देना चाहिए, नहीं तो ताज्जुब नहीं कि इसे किसी तरह का शारीरिक कष्ट उठाना पड़े। इसी विचार से भूतनाथ ने तारा की तरफ देख के कहा -

भूतनाथ - राजा गोपालसिंह छूट गये सही, मगर अभी उनकी जिन्दगी का भरोसा न करना चाहिए।

तारा - (चौंककर) सो क्यों सो क्यों?

भूतनाथ - यह बात मैं इस विचार से कहता हूं कि मायारानी कुछ न कुछ बखेड़ा जरूर मचावेगी और इसके अतिरिक्त तमाम रिआया को राजा गोपालसिंह के मरने का विश्वास हो चुका है, जिसे कई वर्ष बीत चुके हैं, अब देखना चाहिए उन लोगों के दिल में क्या बात पैदा होती है। खैर, जो होगा देखा जाएगा, अब तुम विलम्ब न करो, वे राह देख रहे होंगे।

भूतनाथ की बातों का जवाब देने का तारा को मौका न मिला और वह बिना कुछ कहे भूतनाथ के साथ रवाना हुई। राजा गोपालसिंह बहुत दूर न थे। इसलिए आधी घड़ी से कम ही देर में तारा वहां पहुंच गई और उसने अपनी आंखों से गोपालसिंह, किशोरी, कामिनी और देवीसिंह को देखा। तारा के दिल में खुशी का दरिया जोश के साथ लहरें ले रहा था। निःसन्देह उसके दिल में इतनी ज्यादा खुशी थी कि उसके समाने की जगह अन्दर न थी और बहुतायत के कारण रोमांच द्वारा तारा के एक-एक रोंगटे से खुशी बाहर हो रही थी। तारा के दिल में तरह-तरह के खयाल पैदा हो रहे थे और वह अपने को बहुत सम्हाल रही थी। तिस पर भी राजा गोपालसिंह के पास पहुंचते ही वह उनके कदमों पर गिर पड़ी।

गोपालसिंह - (तारा को जल्दी से उठाकर) तारा, मैं जानता हूं, तुम्हें मेरे छूटने की हद से ज्यादा खुशी हुई है, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं खासकर इस सबब से कि तुमने कमलिनी का साथ बड़ी नेकनीयती और मुहब्बत के साथ दिया और कमलिनी के ही सबब से मेरी जान बची, नहीं तो मैं मर ही चुका था, बल्कि यों कहना चाहिए कि मुझे मरे हुए पांच वर्ष बीत चुके थे। (लम्बी सांस लेकर) ईश्वर की भी विचित्र माया है। अच्छा, अब जो मैं कहता हूं, उसे सुनो। क्योंकि मैं यहां ज्यादा देर तक नहीं ठहर सकता।

तारा - (ताज्जुब के साथ) तो क्या आप अभी यहां से चले जायेंगे मकान में न चलेंगे?

गोपालसिंह - नहीं, मुझे इतना समय नहीं। मैं बहुत जल्द कुंअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और कमलिनी के पास पहुंचना चाहता हूं।

तारा - क्या वे लोग अभी निश्चिन्त नहीं हुए?

गोपालसिंह - हुए, मगर वैसे नहीं, जैसे होने चाहिए।

गोपालसिंह की बात सुनकर तारा गौर में पड़ गई और देर तक कुछ सोचती रही। इसके बाद उसने सिर उठाया और कहा, ‘‘अच्छा कहिये, क्या आज्ञा होती है (किशोरी और कामिनी की तरफ इशारा करके) इनके छूटने की मुझे बहुत खुशी हुई, इनके लिए मुद्दत तक मुझे रोहतासगढ़ में छिपकर रहना पड़ा था, अब तो कुछ दिन तक यहां रहेंगी न’

गोपालसिंह - हां, बेशक रहेंगी। इन्हीं दोनों को पहुंचाने के लिए मैं आया हूं। इन दोनों को मैं तुम्हारे हवाले करता हूं और ताकीद के साथ कहता हूं कि कमलिनी के लौट आने तक इन्हें बड़ी खातिर के साथ रखना, देखो, किसी तरह की तकलीफ न होने पावे। आशा है कि कुंअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और कमलिनी को साथ लिए हुए मैं बहुत जल्द यहां आऊंगा।

तारा - मैं इन दोनों को अपनी जान से ज्यादा मानूंगी। क्या मजाल कि मेरी जान रहते इन्हें किसी तरह की तकलीफ हो।

गोपालसिंह - बस यही चाहिए। हां, एक बात और भी कहनी है!

तारा - वह क्या?

गोपालसिंह - मेरा हाल अभी तुम किसी से न कहना, क्योंकि अभी मैं गुप्त रहकर कई काम करना चाहता हूं, इसी सबब से मैं तुम्हारे मकान में न आया, तुम्हें यहां बुलाकर जो कुछ कहना था कहा।

तारा - बहुत अच्छा, जैसा आपने कहा है वैसा ही होगा।

गोपालसिंह - अच्छा तो अब हम लोग जाते हैं।

किशोरी और कामिनी को तारा उस तिलिस्मी मकान में लिवा लाई। भूतनाथ और देवीसिंह पहुंचाने के लिए साथ आये और फिर चले गये।

तारा ने किशोरी और कामिनी को बड़ी इज्जत और खातिरदारी के साथ रखा। इन बेचारियों को अपनी जिन्दगी में तरह-तरह की तकलीफें उठानी पड़ीं, इसलिए बहुत दुबली, दुःखी और कमजोर हो रही थीं। तरह-तरह की चिन्ताओं ने उन्हें अधमरा कर डाला था। अब मुद्दत के बाद यह दिन नसीब हुआ कि वे दोनों बेफिक्री के साथ अपनी हालत पर गौर करें और तारा को उसके मोहब्बताने बर्ताव पर धन्यवाद दें।

किशोरी पर कामिनी का और कामिनी पर किशोरी का बड़ा ही स्नेह था, इस समय दोनों एक साथ हैं और यह भी सुन चुकी हैं कि कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह मायारानी की कैद से छूट गये और अब कुशलपूर्वक हैं, इसलिए एक प्रकार की प्रसन्नता ने उनकी जिन्दगी की मुर्झाई हुई लता पर आशा रूपी पानी के दो-चार छींटे डाल दिये थे और अब उन्हें ईश्वर की कृपा पर बहुत-कुछ भरोसा हो चला था, परन्तु यह जानने के लिए दोनों ही का जी बेचैन हो रहा था कि मायारानी को हम लोगों से इतनी दुश्मनी क्यों है और वह स्वयं कौन है, क्योंकि कैद के बाद देवीसिंह से यह बात न पूछ सकी थीं, और न इसका मौका ही मिला था।

उस तिलिस्मी मकान में दो दिन और रात आराम से रहने के बाद तीसरे दिन संध्या के समय जब किशोरी और कामिनी को मकान की छत पर ले जाकर तारा दिलासा और तसल्ली देने के साथ ही साथ चारों तरफ की छटा दिखा रही थी, किशोरी को मायारानी का हाल पूछने का मौका मिला और इस बात की भी उम्मीद हुई कि तारा सब बात अवश्य सच-सच कह देगी। अस्तु, किशोरी ने तारा की तरफ देखा और कहा -

किशोरी - बहिन तारा, निःसन्देह तुमने हमारी बड़ी खातिर और इज्जत की, तुम्हारी बदौलत हम लोग यहां बड़े चैन और आराम से हैं जिसकी अपनी भौंडी किस्मत से कदापि आशा न थी। और ईश्वर की कृपा से कुछ-कुछ यह भी आशा हो गई है कि हम लोगों के दिन अब शीघ्र ही फिरेंगे। इस समय मेरे दिल में बहुत-सी बातें ऐसी हैं, जिनका असल भेद मालूम न होने के कारण जी बेचैन हो रहा है, अगर तुम कुछ बताओ तो...।

तारा - वे कौन-सी बातें हैं, कहिये, जो कुछ मैं जानती हूं अवश्य बताऊंगी।

किशोरी - पहले यह बताओ कि मायारानी कौन है और हम लोगों के साथ दुश्मनी क्यों करती है

तारा - मायारानी जमानिया की रानी है, जमानिया में एक भारी तिलिस्म है। जिसके विषय में जाना गया है कि वह कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के हाथों से टूटेगा; मगर मायारानी चाहती है कि वह तिलिस्म न टूटने पावे, इसी सबब से वह इतना बखेड़ा मचा रही है।

किशोरी - और कमलिनी कौन हैं मैं उनका नाम कई दफे सुन चुकी हूं और यह भी मानती हूं कि वह हम लोगों की मदद कर रही हैं।

तारा - मायारानी की दो बहिनें और हैं! (ऊंची सांस लेकर) एक तो ये कमलिनी हैं, जिनके मकान में आप इस समय बैठी हैं, अब मायारानी की चाल-चलन से रंज होकर उससे अलग हो गयीं और दोनों कुमारों की मदद कर रही हैं। और दूसरी सबसे छोटी बहन लाडिली है जो मायारानी के साथ रहती है। मगर अब सुनने में आया है कि वह भी मायारानी से अलग होकर कमलिनी का साथ दे रही है।

किशोरी - और ये राजा गोपालसिंह और भूतनाथ कौन हैं?

तारा - भूतनाथ कमलिनी का ऐयार है और राजा गोपालसिंह जमानिया के राजा हैं, मायारानी इन्हीं की स्त्री है। पांच वर्ष हुए जब यह बात मशहूर हुई थी कि राजा गोपालसिंह का देहान्त हो गया, यहां तक कि कमलिनी को भी इस बात में शक न रहा, क्योंकि उनके देखते राजा गोपालसिंह की दाह-क्रिया की गई थी। हां लोगों को अगर किसी तरह का कुछ शक था तो केवल इतना कि राजा गोपालसिंह को मायारानी ने जहर दे दिया। खैर, जमाने से राजा गोपालसिंह की जगह मायारानी जमानिया का राज्य कर रही है। इधर जब मायारानी ने दोनों कुमारों को कैद कर लिया तो कमलिनी उन्हें छुड़ाने के लिए जमानिया गई। उस समय कमालिनी को किसी तरह मालूम हुआ कि राजा गोपालसिंह के विषय में मायारानी ने धोखा दिया था और वे मरे नहीं, बल्कि मायारानी ने उन्हें कैद कर रखा है। तब कमलिनी ने बड़े उद्योग से गोपालसिंहजी को कैद से छुड़ाया, मगर राजा साहब की यह राय हुई कि हमारे छुटने का हाल अभी किसी को मालूम न होना चाहिए, किसी मौके पर हम अपने को जाहिर करेंगे। मैंने यह जो कुछ आपसे कहा, बहुत ही मुख्तसर में कहा है नहीं तो इस बीच में ऐसे - ऐसे काम हुए हैं कि सुनने से आश्चर्य होता है। मैंने जब भूतनाथ की जुबानी सब हाल सुना तो आश्चर्य और हंसी से मेरी अजब हालत थी।

किशोरी - तो तुम खुलासा क्यों नहीं कहतीं क्या कहीं जाना है या कोई जरूरी काम है?

तारा - (हंसकर) जाना कहां है और काम ही क्या है अच्छा, मैं कहती हूं सुनिये।

तारा ने भूतनाथ का खुलासा हाल कह सुनाया। वह जिस तरह नागर और मायारानी को धोखा देकर उनसे मिल गया और जिस खूबसूरती से किशोरी और कामिनी को नागर की कैद से छुड़ा लाया, उसके कहने के बाद यह भी कहा कि भूतनाथ मायारानी को और भी धोखा देगा। वह मायारानी से वादा कर आया है कि राजा गोपालसिंह को जो तुम्हारी कैद से छूट गये हैं बहुत जल्द गिरफ्तार करके तुम्हारे पास ले आऊंगा, तुम उन्हें अपने हाथ से मारकर निश्चिन्त हो जाना। निःसन्देह बड़ी ही दिल्लगी होगी जब मायारानी को विश्वास हो जायगा कि कैद से छूट जाने पर भी राजा गोपालसिंह जीते न बचे।

तारा की जुबानी भूतनाथ का हाल सुनकर किशोरी और कामिनी को बड़ा ताज्जुब हुआ और उसके विषय में देर तक तीनों में बातचीत होती रही। अन्त में किशोरी ने तारा से पूछा, ‘‘जब तुम राजा गोपालसिंह के पास गई थीं और उन्होंने मुझे तुम्हारे सुपुर्द किया था उस समय तुमने मेरी तरफ देखकर यह कहा था कि ‘इनके लिए मुझे मुद्दत तक छिपकर रोहतासगढ़ के किले में रहना पड़ा था’ तो क्या वास्तव में तुम रोहतासगढ़ के किले में उस समय थीं जब मैं वहां बदकिस्मती के दिन काट रही थी अगर तुम वहां थीं तो लाली और कुन्दन का हाल भी तुम्हें जरूर मालूम होगा।’’

किशोरी की बात का तारा कुछ जवाब देना ही चाहती थी कि एक प्रकार की आवाज सुनकर चौंक पड़ी और घबराकर उस पुतली की तरफ देखने लगी जो वहां छत पर एक छोटे से चबूतरे के ऊपर सिर नीचे और पैर ऊपर किये खड़ी थी।

पाठक इस मकान की अवस्था को भूल न गये होंगे, क्योंकि इस मकान और पुतलियों का हाल हम सन्तति के तीसरे भाग में लिख चुके हैं। इस समय जब तारा ने इस पुतली को तेजी के साथ नाचते हुए पाया तो घबरा गई, बदहवास होकर उठ खड़ी हुई और कहने लगी - ‘‘हाय बड़ा अनर्थ हुआ, अब हम लोगों की जान बचती नजर नहीं आती! हाय-हाय, बहिन कमलिनी, न जाने इस समय तू कहां है। हाय, अब मैं क्या करूं!’’

 

बयान - 6

हम ऊपर के किसी बयान में लिख आए हैं कि तिलिस्मी दारोगा की बदौलत जब नागर और मायारानी में लड़ाई हो गई तो उसी समय मौका पाकर कम्बख्त दारोगा वहां से निकल भागा और उसके थोड़ी ही देर बाद मायारानी भी नागर के धमकाने से डरकर वहां से चली गई।

यद्यपि दारोगा और मायारानी में लड़ाई हो गई थी मगर मेल होने में भी कुछ देर न लगी। कायदे की बात है कि चोर-बदमाश, बेईमान आदि जितने बुरे कर्म करने वाले हैं, प्रकृत्यानुसार कभी-कभी आपस में लड़ भी जाते हैं और लड़ाई यहां तक बढ़ जाती है कि एक के खून का दूसरा प्यासा हो जाता है बल्कि जान का नुकसान भी हो जाता है, मगर थोड़े ही अरसे के बाद फिर आपस में मेल-मिलाप हो जाता है। इसका असल सबब यही है कि बुरे मनुष्यों के हृदय में लज्जा, शान, मान और आन की जगह नहीं होती। उन्हें इस बात का ध्यान नहीं होता है कि फलां ने मुझे ताना मारा था या फलां ने मेरी किसी प्रकार बेइज्जती की थी, अतएव कदापि उसके सामने न जाना चाहिए या किसी तरह उसे अवश्य नीचा दिखाना चाहिए, क्योंकि बुरे मनुष्य तो नीच होते ही हैं, उन्हें अपने नीच कर्मों या अपने साथियों के ताने या लड़ाई से शर्म ही क्यों आने लगी और यही सबब है कि उनकी लड़ाई बहुत दिनों के लिए मजबूत नहीं होती। अगर ऐसा होता तो फूट और तकरार के कारण स्वयं बदमाशों का नाश हो जाता और भले आदमियों को बुरे मनुष्यों से दुःख पाने का दिन नसीब न होता। परमेश्वर की इस विचित्र माया ही ने मायारानी और दारोगा में फिर से मेल करा दिया और राजा वीरेन्द्रसिंह तथा उनके खानदान की बदनसीबी के वृक्ष में पुनः फल लगने लगे जिसका हाल आगे चलकर मायारानी और दारोगा की बातचीत से मालूम होगा।

जिस समय नागर की धमकी से डरकर कुछ सोचती-विचारती मायारानी सदर फाटक के बाहर निकली और गंगा के किनारे की तरफ चली तो थोड़ी ही दूर जाने के बाद तिलिस्मी दारोगा से, जो नाक कटाकर अपनी बदकिस्मती पर रोता-कलपता धीरे-धीरे गंगाजी की तरफ जा रहा था उसकी मुलाकात हुई। जब अपने पीछे किसी के आने की आहट पा दारोगा ने फिरकर देखा तो मायारानी पर निगाह पड़ी। यद्यपि उस समय वहां पर अंधेरा था परन्तु बहुत दिनों तक साथ रहने के कारण एक ने दूसरे को बखूबी पहचान लिया। मायारानी तुरन्त दारोगा के पैरों पर गिर पड़ी और आंसुओं से उसके नापाक पैरों को भिगोती हुई बोली -

‘‘दारोगा साहब, निःसन्देह इस समय आपकी बड़ी बेइज्जती हुई और आप मुझसे रंज हो गये, परन्तु मैं कसम खाकर कहती हूं कि इसमें मेरा कसूर नहीं है। थोड़ी-सी बात जो मैं आपसे कहना चाहती हूं आप कृपा करके सुन लीजिए। इसके बाद यदि आपका दिल गवाही दे कि बेशक मायारानी का दोष है तो आप बेखटके अपने हाथ से मेरा सिर काटा डालिए, मुझे कोई उज्र न होगा, बल्कि मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहती हूं कि मैं उस समय अपने हाथ से कलेजे में खंजर मारकर मर जाऊंगी जब मेरी बात सुनने के बाद आप अपने मुंह से कह देंगे कि बेशक कसूर तेरा है, क्योंकि आपको रंज करके मैं इस दुनिया में रहना नहीं चाहती। आप खूब जानते हैं कि इस दुनिया में मेरा सहायक सिवाय आपके दूसरा नहीं, अतएव जब आप ही मुझसे अलग हो जायेंगे तो दुश्मनों के हाथों सिसक-सिसककर मरने की अपेक्षा अपने हाथ से आप ही जान दे देना मैं उत्तम समझती हूं।’’

दारोगा - यद्यपि अभी तक मेरा दिल यही गवाही देता है कि आज तू ही ने मेरी बेइज्जती की और तू ही ने मेरी नाक काटी, परन्तु जब तू मेरे पैरों पर गिरकर साबित किया चाहती है कि इसमें तेरा कोई कसूर नहीं है, तो मुझे भी उचित है कि तेरी बातें सुन लूं और इसके बाद जिसका कसूर हो उसे दण्ड दूं।

माया - (खड़ी होकर और हाथ जोड़कर) बस-बस-बस, मैं इतना ही चाहती हूं।

दारोगा - अच्छा, तो इस जगह खड़े होकर बातें करना उचित नहीं। किसी तरह शहर के बाहर निकल चलना चाहिए बल्कि उत्तम तो यह होगा कि गंगा के पार हो जाना चाहिए फिर एकान्त में जो कुछ कहोगी मैं सुनूंगा।

दोनों वहां से रवाना होकर बात-की-बात में गंगा के किनारे जा पहुंचे। वहां दारोगा ने खूब अच्छी तरह अपनी नाक धोकर मरहम की पट्टी बांधी जो उसके बटुए में मौजूद थी और इसके बाद मल्लाह को कुछ देकर मायारानी को साथ लिए दारोगा साहब गंगा पार हो गये। दारोगा ने वहां भी दम न लिया और लगभग आध कोस के सीधे जाकर एक गांव में पहुंचे जहां घोड़ों के सौदागर लोग रहा करते थे और उनके पास हर प्रकार के कमकीमत और बेशकीमत घोड़े मौजूद रहा करते थे। यहां पहुंचकर दारोगा ने मायारानी से कहा कि ‘‘तेरे पास कुछ रुपया-अशर्फी है या नहीं’ इसके जवाब में मायारानी ने कहा कि ‘‘रुपये तो नहीं हैं मगर अशर्फियां हैं और जवाहरात का एक डिब्बा भी जो तिलिस्मी बाग से भागते समय साथ लाई थी, मौजूद है।’’

आसमान पर सुबह की सफेदी अच्छी तरह फैली न थी। गांव में बहुत कम आदमी जागे थे। मायारानी से पचास अशर्फी लेकर और उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर दारोगा साहब सराय में गये और थोड़ी ही देर में दो घोड़े मय साज के खरीद लाए। मायारानी और दारोगा दोनों घोड़ों पर सवार होकर दक्खिन की तरफ इस तेजी के साथ रवाना हुए कि जिससे जाना जाता था कि इन दोनों को अपने घोड़ों के मरने की कोई परवाह नहीं है, इसके बाद जब एक जंगल में पहुंचे तो दोनों ने अपने-अपने घोड़ों की चाल कम की और बातचीत करते हुए जाने लगे।

दारोगा - अब हम ऐसी जगह आ पहुंचे हैं जहां किसी तरह का डर नहीं है, अब तुम्हें जो कुछ कहना हो कहो।

मायारानी - इसके पहले कि आपके छूटने का हाल आपसे पूछूं, जिस दिन से आप मुझसे अलग हुए हैं उस दिन से लेकर आज तक का अपना किस्सा मैं आपसे कहना चाहती हूं जिसके सुनने से आपको पूरा-पूरा हाल मालूम हो जायगा और आप स्वयं कहेंगे कि मैं हर तरह से बेकसूर हूं।

दारोगा - ठीक है, जितने विस्तार के साथ तुम कहना चाहो, मैं सुनने के लिए तैयार हूं।

मायारानी ने ब्यौरेवार अपना हाल दारोगा से कहना शुरू किया जिसमें तेजसिंह का पागल बन के तिलिस्मी बाग में आना, चंडूल का पहुंचना, राजा गोपालसिंह का कैद से छूटना, लाडिली का मायारानी से अलग होना, धनपत की गिरफ्तारी, अपना भागना, तिलिस्म का हाल, सुरंग में राजा गोपालसिंह, कमलिनी, लाडिली, भूतनाथ और देवीसिंह का आना, नकली दारोगा का पहुंचना और उससे बातचीत करके धोखा खाना इत्यादि जो कुछ हुआ था सच-सच दारोगा से कह सुनाया, इसके बाद दारोगा की चीठी पढ़ना और फिर असली दारोगा के विषय में धोखा खाना भी कुछ बनावट के साथ बयान किया जिसे बड़े गौर से दारोगा साहब सुनते रहे और जब मायारानी अपनी बात खतम कर चुकी तो बोले -

दारोगा - अब मुझे मालूम हुआ कि जो कुछ किया हरामजादी नागर ने किया और तू बेकसूर है, या अगर तुझसे किसी तरह का कसूर हुआ भी तो धोखे में हुआ, मगर तेरी जुबानी सब हाल सुनकर मुझे इस बात का बहुत रंज हुआ कि तूने राजा गोपालसिंह के बारे में मुझे पूरा धोखा दिया।

मायारानी - बेशक यह मेरा कसूर है। मगर वह कसूर पुराना हो गया और धोखे में लक्ष्मीदेवी का भेद खुल जाने पर तो अब वह क्षमा के योग्य भी हो गया। अगर आप उस कसूर को भूलकर बचने का उद्योग न करेंगे तो बेशक मेरी और आपकी दोनों की जान दुर्गति के साथ जायगी, क्योंकि मैं फिर भी ढिठाई के साथ कहती हूं कि उस विषय में मेरा और आपका कसूर बराबर है।

दारोगा - बेशक ऐसा ही है, खैर, मैं तेरा कसूर माफ करता हूं क्योंकि तूने इस समय उसे साफ-साफ कह दिया और यह भी निश्चय हो गया कि आज केवल नागर हरामजादी ने...।

मायारानी - (अपने घोड़े को पास ले जाकर और दारोगा का पैर छूकर) केवल माफ ही नहीं बल्कि उद्योग करना चाहिए जिससे राजा गोपालसिंह, वीरेन्द्रसिंह, उनके दोनों लड़के और ऐयार गिरफ्तार हो जायं या दुनिया से उठा दिए जायं।

दारोगा - ऐसा ही होगा और शीघ्र ही इसके लिए मैं उत्तम उद्योग करूंगा। (कुछ सोचकर) मगर मैं देखता हूं कि इस काम के लिए रुपये की बहुत जरूरत है।

मायारानी - रुपये-पैसे की किसी तरह कमी नहीं हो सकती, मेरे पास लाखों रुपये के जवाहरात हैं बल्कि देवगढ़ी का खजाना ऐसा गुप्त है कि सिवाय मेरे कोई दूसरा पा ही नहीं सकता क्योंकि गोपालसिंह को उसकी कुछ भी खबर नहीं है।

दारोगा - (ताज्जुब से) देवगढ़ी का खजाना कैसा मैं भी उस विषय में कुछ नहीं जानता।

मायारानी - वाह, आप क्यों नहीं जानते! वह मकान आप ही ने तो धनपत को दिया था।

दारोगा - ओह देवगढ़ी क्यों कहती हो, शिवगढ़ी कहो!

मायारानी - हां, हां, शिवगढ़ी, शिवगढ़ी, मैं भूल गई थी, नाम में गलती हुई। उसमें बड़ी दौलत है। जो कुछ मैंने धनपत को दिया सब उसी में मौजूद है, धनपत बेचारा कैद ही हो गया, फिर निकालता कौन?

दारोगा - बेशक वहां दौलत होगी। इसके सिवाय मुझे भी तुम दौलत से खाली न समझना, अस्तु कोई चिन्ता नहीं, देखा जायगा।

मायारानी - मगर अभी तक यह न मालूम हुआ कि आप कहां जा रहे हैं घोड़े बहुत थक गये हैं, अब यह ज्यादा नहीं चल सकते।

दारोगा - हमें भी अब बहुत दूर नहीं जाना है, (उंगली के इशारे से बताकर) वह देखो जो पहाड़ी है उसी पर मेरा गुरुभाई इन्द्रदेव रहता है, इस समय हम लोग उसी के मेहमान होंगे।

मायारानी - ओहो, अब याद आया, इन्हीं का जिक्र आप अक्सर किया करते थे और कहते थे कि बड़े चालाक और प्रतापी हैं। आपने एक दफे यह भी कहा था कि इन्द्रदेव भी किसी तिलिस्म के दारोगा हैं।

दारोगा - बेशक ऐसा ही है और मैं उसका बहुत भरोसा रखता हूं। उसकी बदौलत मैं अपने को राजा से भी बढ़ के अमीर समझता हूं और वीरेन्द्रसिंह की कैद से छूटकर आजादी के साथ घूमने का दिन भी मुझे उसी के उद्योग से मिला है जिसका हाल मैं तुमसे फिर कहूंगा। वह बड़ा ही धूर्त एवं बुद्धिमान और साथ ही इसके ऐयाश भी है।

मायारानी - उम्र में आपसे बड़े हैं या छोटे?

दारोगा - ओह, मुझसे बहुत छोटा है बल्कि यों कहना चाहिए कि अभी नौजवान है, बदन में ताकत भी खूब है, रहने का स्थान भी बहुत ही उत्तम और रमणीक है, मेरी तरह फकीरी भेष में नहीं रहता बल्कि अमीराना ठाठ के साथ रहता है।

दारोगा की बात सुनकर मायारानी के दिल में एक प्रकार की उम्मीद और खुशी पैदा हुई, आंखों में विचित्र चमक और गालों पर सुर्खी दिखाई देने लगी जो क्षणभर के लिए थी, इसके बाद फिर मायारानी ने कहा -

मायारानी - यह आपकी कृपा है कि ऐसी बुरी अवस्था तक पहुंचने पर भी मैं किसी तरह निराश नहीं हो सकती।

दारोगा - जब तक मैं जीता और तुझसे खुश हूं तब तक तो तू किसी तरह निराश कभी भी नहीं हो सकती मगर अफसोस अभी तीन-चार दिन ही हुए हैं कि इसके पास से तेरी खोज में गया था, आज मेरी नाक कटी देखेगा तो क्या कहेगा?

मायारानी - बेशक उन्हें बड़ा क्रोध आवेगा जब आपकी जबानी यह सुनेंगे कि नागर ने आपकी यह दशा की।

दारोगा - क्रोध! अरे तू देखेगी कि नागर को पकड़वा मंगायेगा और बड़ी दुर्दशा से उसकी जान लेगा। उसके आगे यह कोई बड़ी बात नहीं है! लो, अब हम लोग ठिकाने आ पहुंचे, अब घोड़े से उतरना चाहिए।

इस जगह पर एक छोटी-सी पहाड़ी थी जिसके पीछे की तरफ और दाहिने-बाएं कुछ चक्कर खाता हुआ पहाड़ियों का सिलसिला दूर तक दिखाई दे रहा था। जब ये दोनों आदमी उस पहाड़ी के नीचे पहुंचे तो घोड़े से उतर पड़े क्योंकि पहाड़ी के ऊपर घोड़ा ले जाने का मौका न था और इन दोनों को पहाड़ी के ऊपर जाना था। दोनों घोड़े लम्बी-लम्बी बागडोरों के सहारे एक पेड़ के साथ बांध दिए गए और इसके बाद मायारानी को साथ लिए हुए दारोगा ने उस पहाड़ी के ऊपर चढ़ना शुरू किया। उस पहाड़ी पर चढ़ने के लिए केवल एक पगडण्डी का रास्ता था और वह भी बहुत पथरीला और ऐसा ऊबड़-खाबड़ था कि जाने वाले को बहुत सम्हलकर चढ़ना पड़ता था। यद्यपि पहाड़ी बहुत ऊंची न थी, मगर रास्ते की कठिनाई के कारण इन दोनों को ऊपर पहुंचने में पूरा एक घण्टा लग गया।

जब दोनों पहाड़ी के ऊपर पहुंचे तो मायारानी ने एक पेड़ के नीचे खड़े होकर देखा कि सामने की तरफ जहां तक निगाह काम करती है, पहाड़-ही-पहाड़ दिखाई दे रहे हैं, जिनकी अवस्था आषाढ़ के उठते हुए बादलों-सी जान पड़ती है। टीले पर टीला, पहाड़ पर पहाड़, क्रमशः बराबर ऊंचा ही होता गया है। यह वही विंध्य की पहाड़ी है जिसका फैलाव सैकड़ों कोस तक चला गया है। इस जगह से जहां इस समय मायारानी खड़ी होकर पहाड़ी के दिलचस्प सिलसिले को बड़े गौर से देख रही है राजा वीरेन्द्रसिंह की राजधानी नौगढ़ बहुत दूर नहीं है परन्तु यह जगह नौगढ़ की हद से बिल्कुल बाहर है।

धूप बहुत तेज थी और भूख-प्यास ने भी सता रक्खा था, इसलिए दारोगा ने मायारानी से कहा, ‘‘मैं समझता हूं कि इस पहाड़ पर चढ़ने की थकावट अब मिट गई होगी, यहां देर तक खड़े रहने से काम न चलेगा क्योंकि अभी हम लोगों को कुछ दूर और चलना है और भूख-प्यास से जी बेचैन हो रहा है।’’

मायारानी - क्या अभी हम लोगों को और आगे जाना पड़ेगा आपने तो इसी पहाड़ी पर इन्द्रदेव का घर बताया था?

दारोगा - ठीक है मगर उसका मतलब यह न था कि पहाड़ पर चढ़ने के साथ ही कोई मकान मिल जायगा।

मायारानी - खैर, चलिए। अब कितनी देर में ठिकाने पर पहुंचने की आशा कर सकती हूं

दारोगा - अगर तेजी के साथ चलें तो घण्टे-भर में।

मायारानी - ओफ!

आगे - आगे दारोगा और पीछे-पीछे मायारानी दोनों आगे की तरफ बढ़े। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते थे, जमीन ऊंची मिलती जाती थी और चढ़ाव चढ़ने के कारण मायारानी का दम फूल रहा था। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर खड़ी होकर दम लेती थी और फिर दारोगा के पीछे-पीछे चल पड़ती थी, यहां तक कि दोनों एक गुफा के मुंह पर जा पहुंचे जिसके अन्दर खड़े होकर बराबर दो आदमी बखूबी जा सकते थे। बाबाजी ने मायारानी से कहा कि ‘‘क्या हर्ज है, मैं चलने को तैयार हूं मगर जरा दम ले लूं।’’

गुफा के दोनों तरफ चौड़े-चौड़े दो पत्थर थे जिनमें से एक पर दारोगा और दूसरे पर मायारानी बैठ गई। इन दोनों को बैठे अभी ज्यादा देर नहीं हुई थी कि गुफा के अन्दर से एक आदमी निकला जिसने पहली निगाह में मायारानी को और दूसरी निगाह में दारोगा को देखा। मायारानी को देखकर उसे ताज्जुब हुआ मगर जब दारोगा को देखा तो झपटकर उसके पैरों पर गिर पड़ा और बोला, ‘‘आश्चर्य है कि आज मायारानी को लेकर आप यहां आये हैं!’’

दारोगा - हां, एक भारी आवश्यकता पड़ जाने के कारण ऐसा करना पड़ा। कहो, तुम अच्छे तो हो बहुत दिन पर दिखाई दिए।

आदमी - जी, आपकी कृपा से बहुत अच्छा हूं, हाल ही में जब आप यहां आये थे तो मैं एक जरूरी काम के लिए भेजा गया था इसी से आपके दर्शन न कर सका, कल जब मैं लौटकर आया तो मालूम हुआ कि बाबाजी आये थे, पर एक ही दिन रहकर चले गये (आश्चर्य के ढंस से) मगर यह नाक पर पट्टी कैसे बंधी है?

दारोगा - कल लड़ाई में एक आदमी ने बेकसूर मुझे जख्मी किया, इसी से पट्टी बांधने की आवश्यकता हुई!

आदमी - (क्रोध में आकर) किसकी मौत आई है जिसने हम लोगों के होते आपके साथ ऐसा किया! जरा नाम तो बताइये!

दारोगा - अब आया हूं तो अवश्य सब-कुछ कहूंगा, पहले यह बताओ कि इस समय तुम जाते कहां हो?

आदमी - एक काम के लिए महाराज ने भेजा है, संध्या होने के पहले ही लौट आऊंगा, यदि आज्ञा हो तो महाराज के पास जाकर आपके आने का संवाद दूं!

दारोगा - नहीं-नहीं, इस आवश्यकता नहीं है, मैं चला जाऊंगा, तुम जाओ, जब लौटो तो रात को बातचीत होगी।

आदमी - जो आज्ञा।

दारोगा का पैर छूकर वह आदमी वहां से तेजी के साथ चला गया और इसके बाद मायारानी ने दारोगा से कहा, ‘‘अफसोस, यहां तक नौबत आ पहुंची, कि अब हर एक आदमी बारह पर्दे के अन्दर रहने वाली मायारानी को खुल्लमखुल्ला देख सकता है जैसा कि अभी इस गैर आदमी ने देखा।’’

दारोगा - तुझे इस बात का अफसोस न करना चाहिए। समय ने जब तुझे अपने घर से बाहर कर दिया, रिआया से बदतर बना दिया, हुकूमत छीनकर बेकार कर दिया बल्कि यों कहना चाहिए कि वास्तव में छिपकर जान बचाने लायक कर दिया, तो पर्दे और इज्जत का खयाल कैसा! किस जात-बिरादरी के वास्ते क्या तुझे आशा है कि राजा गोपालसिंह अब तुझे अपनी बनाकर रखेगा कभी नहीं। फिर लज्जा का ढकोसला क्यों हां समय ने अगर तेरा नसीब चमकाया और तू हम लोगों की मदद से गोपालसिंह, वीरेन्द्रसिंह तथा उसके लड़कों पर फतह पाकर पुनः तिलिस्म की रानी हो गई तो तुझे उस समय आज की निर्लज्जता की परवाह न रहेगी क्योंकि रुपये वालों का ऐब जमाना नहीं देखता, रुपये वाले की खातिर में कमी नहीं होती, रुपये वाले को कोई दोष नहीं लगता, और रुपये वालों की पहली अवस्था पर कोई ध्यान नहीं देता। फिर इसके लिए सोचने-विचारने से क्या फायदा तू आज से अपने को मर्द समझ ले और मर्दों की ही तरह जो कुछ मैं सलाह दूं वह कर।

मायारानी - बात तो आपने ठीक कही, वास्तव में ऐसा ही है! अब आज से मैं ऐसी तुच्छ बातों पर ध्यान न दूंगी। अच्छा, जहां चलना हो चलिए, मैं बखूबी आराम कर चुकी, हां यह तो बताइये कि वह आदमी कौन था और उसने मुझे पहचाना कैसे?

दारोगा - वह इन्द्रदेव का ऐयार है, मुझसे मिलने के लिए बराबर आया करता था, यही सबब है कि तुझे पहचानता है, और फिर ऐयारों से यह बात कुछ दूर नहीं है कि तुझ-सी मशहूर को पहचान लिया।

इसके बाद दारोगा उठ खड़ा हुआ और मायारानी को अपने पीछे-पीछे आने के लिए कहकर गुफा के अन्दर रवाना हुआ।

 

बयान - 7

मायारानी इस गुफा को साधारण और मामूली समझे हुए थी, मगर ऐसा न था। थोड़ी दूर जाने के बाद पूरा अंधकार मिला, जिससे वह घबड़ा गई, मगर दारोगा के ढाढ़स देने से उसका कपड़ा पकड़े हुए धीरे-धीरे रवाना हुई। लगभग सौ कदम जाने के बाद दारोगा रुका और बाईं तरफ घूमकर चलने लगा। अब मायारानी पहले की बनिस्बत ज्यादा डरी और उनसे घबड़ाकर दारोगा से पूछा, ‘‘क्या हम लोग चांदनी में न पहुंचेंगे कहीं ऐसा न हो कि कोई दरिन्दा जानवर मिल जाये और हम लोगों को फाड़ खाये।’’

दारोगा - (जोर से हंसकर) क्या इतने ही में तेरी हिम्मत ने जवाब दे दिया तिलिस्म की रानी होकर इतना छोटा दिल, आश्चर्य है!

मायारानी - (अपने डरे हुए दिल को सम्हालकर) नहीं-नहीं, मैं डरी और घबराई नहीं हूं, हां भूख-प्यास और थकावट के कारण बेहाल हो रही हूं इसी से मैंने पूछा कि यह गुफा जिसे सुरंग कहना चाहिए, किसी तरह समाप्त भी होगी या नहीं?

दारोगा - घबरा मत, अब हम लोग बहुत जल्द इस अंधेरे से निकलकर ऐसे दिलचस्प मैदान में पहुंचेंगे जिसे देखकर तू बहुत ही खुश होगी।

मायारानी - इन्द्रदेव के मकान में जाने के लिए यही एक राह है या और भी कोई?

दारोगा - बस इस रास्ते के सिवाय और रास्ता नहीं है।

मायारानी - अगर ऐसा है तो मालूम होता है कि आपके इन्द्रदेव बहुत से दुश्मन रखते हैं जिनके डर से उन्हें इस तरह छिपकर रहना पड़ता है।

दारोगा - (हंसकर) नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, इन्द्रदेव इस योग्य है कि अपने दुश्मनों को बात-की-बात में बर्बाद कर दे। वह इस स्थान में जानकर नहीं रहता बल्कि मजबूर होकर उसे यहां रहना पड़ता है क्योंकि जिस तिलिस्म का वह दारोगा है, वह तिलिस्म भी इसी स्थान में है।

मायारानी - ठीक है, तो क्या इस तिलिस्म का कोई राजा नहीं है?

दारोगा - नहीं, जिस समय यह तिलिस्म तैयार हुआ था, उसी समय इसके मालिक ने इस बात का प्रबन्ध किया था कि उसके खानदान में जो कोई हो वह तिलिस्म का राजा नहीं बने बल्कि दारोगा की तरह रहे। उसी के खानदान में यह इन्द्रदेव है। इसे तिलिस्म की हिफाजत करने के सिवाय और किसी तरह का अधिकार तिलिस्म पर नहीं, मगर दौलत की इसे किसी तरह की कमी नहीं है।

मायारानी - अगर पुराने प्रबन्ध को तोड़कर वह तिलिस्मी चीजों पर अपना दखल जमावे तो उसे कौन रोक सकता है?

दारोगा - रोकने वाला तो कोई नहीं है, मगर वह तिलिस्म का भेद कुछ भी नहीं जानता, न मालूम यह तिलिस्म इतना गुप्त किसलिए रखा गया है।

मायारानी - मैं तो अपने तिलिस्म से बहुत फायदा उठाती थी।

दारोगा - बेशक ऐसा ही है, मगर उस तिलिस्म में भी जो खास-खास अलभ्य वस्तुएं हैं, उनका मालिक तिलिस्म तोड़ने वाले के सिवाय और कोई नहीं हो सकता। अच्छा, अब ठहर जा, हम लोग ठिकाने पहुंच गये हैं, यहां एक दरवाजा है जिसे खोलकर आगे चलना होगा।

दारोगा की बात सुनकर मायारानी रुक गई, मगर अंधेरे में उसे यह न मालूम हुआ कि बाबाजी क्या कर रहे हैं। दस-बारह पल से ज्यादा देर न लगी होगी कि एक आवाज ठीक उसी प्रकार की आई जैसी लोहे का हल्का दरवाजा खुलने के समय आती है। बाबाजी ने मायारानी का हाथ पकड़ के उसे दो-तीन कदम आगे कर दिया तथा स्वयं पीछे रह गये और फिर उस दरवाजे के बन्द होने की आवाज आई, इसके बाद बाबाजी ने मोमबत्ती जलाई, जिसका सामान दरवाजे के पास ही किसी ठिकाने पर था।

बहुत देर तक अंधेरे में रहने के कारण मायारानी बहुत घबड़ा गई थी। अब रोशनी हो जाने से वह चैतन्य हो गई और आंखें फाड़कर चारों तरफ देखने लगी। केवल उधर की तरफ जिधर से वह आई थी, लोहे का एक तख्ता दिखलाई दिया, जिसमें दरवाजे का कोई आकार न था, इसके अतिरिक्त सब तरफ पत्थर ही दिखाई पड़ता था और साफ मालूम होता था कि मानवीय उद्योग से पहाड़ काटकर यह रास्ता या सुरंग तैयार की गई है, मगर यह सुरंग इसी जगह पर नहीं समाप्त हुई थी बल्कि बाईं तरफ तीन-चार सीढ़ियां नीचे उतर के और भी कुछ दूर तक गई हुई थी। मायारानी ने आश्चर्य से चारों तरफ देखने के बाद बाबाजी से कहा, ‘‘यह लोहे की दीवार जो सामने दिखाई पड़ती है निःसन्देह दरवाजा है परन्तु इसमें दरवाजे का कोई आकार मालूम नहीं पड़ता, आपने इसे किस तरकीब से खोला या बन्द किया था’ इसके जवाब में दारोगा ने कहा, ‘‘इस दरवाजे को खोलने और बंद करने की तरकीब नियमानुसार इन्द्रदेव की आज्ञा बिना मैं नहीं बता सकता और यह मोमबत्ती भी मैंने इसलिए जलाई है कि (सीढ़ियों की तरफ इशारा करके) इन सीढ़ियों को तू अच्छी तरह देख ले जिसमें उतरने के समय ठोकर न लगे।’’ इतना कहते ही दारोगा ने मोमबत्ती बुझाकर उसे उसी ठिकाने रख दिया और मायारानी का हाथ पकड़ के सीढ़ियों के नीचे उतरा। मायारानी को अपनी बातों का जवाब न पाने से रंज हुआ, मगर वह कर ही क्या सकती थी, क्योंकि इस समय वह हर तरह से दारोगा के आधीन थी।

सीढ़ियां उतरने के साथ ही सामने की तरफ थोड़ी दूर पर उजाला दिखाई दिया और मालूम हुआ कि उस ठिकाने सुरंग समाप्त हुई। आश्चर्य, डर, चिन्ता और आशा के साथ मायारानी ने यह रास्ता भी तै किया और सुरंग के आखिरी दरवाजे के बाहर कदम रखने के साथ ही एक रमणीक स्थान की छटा देखने लगी।

इस समय मायारानी की आंखों के सामने पहाड़ी गुलबूटों से हरा-भरा एक चौखूटा मैदान था, जिसकी लम्बाई चार सौ गज और चौड़ाई साढ़े तीन सौ गज से ज्यादा न होगी। यह मैदान चारों तरफ से ढलवां और सरसब्ज पहाड़ी से घिरा हुआ था जिस पर के पेड़ों और सुन्दर-सुन्दर लताओं के बीच से निकल-कर नीरोग हवा के नर्म-नर्म झपेटे आ रहे थे। सामने की तरफ पहाड़ी की आधी ऊंचाई से झरना गिर रहा था, जिसका बिल्लौर की तरह साफ जल नीचे आकर बारीक और पेचीली नालियों का-सा आनन्द दिखलाता हुआ रमने के खुशनुमा कोमल और सुन्दर फूल-पत्तों वाले पौधों को तरी पहुंचा रहा था। खुशनुमा और मीठी बोलियों से दिल लुभा लेने वाली छोटी-छोटी चिड़ियों की सुरीली आवाजों में दबी हुई रसीले फूलों पर घूम-घूमकर बलाएं लेते हुए मस्त भौंरों के परों की आवाज कमजोर उदास और मुरझाए दिल को ताकत और खुशी देने के साथ चैतन्य कर रही थी। इस स्थान के आधे हिस्से पर इस समय अपना दखल जमाए हुए सूर्य भगवान की कृपा ने धूप-छांह की हुबाबी चादर इस ढंग से बिछा रखी थी कि तरह-तरह की चिन्ताओं और खुटकों से विकल मायारानी को लाचार होकर मस्ती और मदहोशी के कारण थोड़ी देर के लिए अपने को भुला देना पड़ा और जब वह कुछ होश में आई तो सोचने लगी कि ऐसे अनूठे स्थान का अपूर्व आनन्द लेने वाला भी कोई यहां है या नहीं। इस विचार के साथ ही दाहिनी तरफ पहाड़ी पर बने हुए एक खुशनुमा बंगले पर उसकी निगाह जा पड़ी मगर उसे अच्छी तरह देखने भी न पाई थी कि दारोगा साहब हंसकर बोल उठे, ‘‘अब यहां कब तक खड़ी रहोगी, चलो आगे बढ़ो!’’

जिस जगह मायारानी खड़ी थी उसकी ऊंचाई जमीन से लगभग बीस-पचीस गज के होगी। नीचे उतरने के लिए छोटी-छोटी सीढ़ियां बनी हुई थीं जिन पर पहले दारोगा ने अपना मनहूस (अमंगल) कदम रखा और उसके पीछे-पीछे मायारानी रवाना हुई।

ये दोनों उस खुशनुमा जमीन की कुदरती क्यारियों पर घूमते हुए उस पहाड़ी के नीचे पहुंचे, जिस पर वह खूबसूरत बंगला बना हुआ था और उसी समय दो आदमियों को पहाड़ी से नीचे उतरते हुए देखा। बात-की-बात में ये दोनों आदमी दारोगा के पास आ पहुंचे और दण्ड-प्रणाम के बाद बोले, ‘‘इन्द्रदेवजी ने आपको दूर ही से देखकर पहचान लिया, मगर मायारानी को न पहचान सके जो इस समय आपके साथ हैं।’’

यह जानकर मायारानी को आश्चर्य हुआ कि यहां का हर एक आदमी उसे अच्छी तरह जानता और पहचानता है मगर इस विषय में कुछ पूछने का मौका न समझकर वह चुप हो रही। बाबाजी ने दोनों ऐयारों से पूछा, ‘‘कहो कुशल तो है इन्द्रदेव अच्छे हैं?’

एक - जी हां, बहुत अच्छे हैं। मगर यह तो कहिये आपने नाक पर यह पट्टी क्यों बांधी हुई है?

दारोगा - इसका हाल इन्द्रदेव के सामने कहूंगा, उसी समय तुम भी सुन लेना। चलो जल्द चलें, भूख-प्यास और थकावट से जी बेचैन हो रहा है।

ये चारों आदमी पहाड़ी के ऊपर चढ़ने लगे। यद्यपि इन सभी को बहुत ऊंचे नहीं चढ़ना था परन्तु मायारानी बहुत थकी और सुम्त हो रही थी। इसलिए बड़ी कठिनाई के साथ चढ़ी और ऊपर पहुंचने तक मामूली से बहुत ज्यादा देर लगी। ऊपर पहुंचकर मायारानी ने देखा कि वह बंगला छोटा और साधारण नहीं है बल्कि बहुत बड़ा और अच्छे ढंग का बना हुआ है मगर यहां पर इस मकान की बनावट तथा उसके सुन्दर-सुन्दर कमरों की सजावट का हाल न लिखकर मतलब की बातें लिखना उचित जान पड़ता है।

उस समय इन्द्रदेव अगवानी के लिए स्वयं बाहर निकल आया जब ये दोनों आदमी उस कमरे के पास पहुंचे, जिसमें वह रहता था। वह इन दोनों से बड़े तपाक से मिला और खातिर के साथ अन्दर ले जाकर बैठाया।

इन्द्रदेव - (दारोगा से) आपके और मायारानी के कष्ट करने का सबब पूछने के पहले मैं जानना चाहता हूं कि आपने नाक पर पट्टी क्यों बांध रखी है?

दारोगा - तुमसे विदा होकर मैंने जो कुछ तकलीफें उठाई हैं यह उसी का नमूना है। जब मैं जरा दम लेने के बाद अपना किस्सा तुमसे कहूंगा, तब सब हाल मालूम हो जायगा, इस समय भूख-प्यास और थकावट से जी बेचैन हो रहा है।

दारोगा का जवाब सुनकर इन्द्रदेव चुप हो रहा और फिर कुछ बातचीत न हुई। दारोगा और मायारानी के खाने-पीने का उत्तम प्रबन्ध कर दिया गया और उन दोनों ने कई घण्टे तक आराम करके अपनी थकावट दूर की। जब संध्या होने में थोड़ी देर बाकी थी तब इन्द्रदेव स्वयं उस कमरे में आया जिसमें दारोगा का डेरा पड़ा हुआ। वह कमरा इन्द्रदेव के कमरे के बगल ही में था और उसमें जाने के लिए केवल एक मामूली दरवाजा था। उस समय मायारानी दारोगा के पास बैठी अपना दुखड़ा रो रही थी। इन्द्रदेव के आते ही वह चुप हो गई और बाबाजी ने खातिर के साथ इन्द्रदेव को अपनी बगल में बैठाया।

इन्द्रदेव - मैं समझता हूं कि इस समय आप अपना हाल बखूबी कह सकेंगे, जिसके सुनने के लिए मेरा जी बेचैन हो रहा है।

दारोगा - वह कहने के लिए इस समय मैं स्वयं ही तुम्हारे पास आने वाला था, अच्छा हुआ कि तुम आ गये।

दारोगा ने अपना और मायारानी का हाल जो कुछ हम ऊपर लिख आये हैं, इन्द्रदेव से पूरा-पूरा बयान किया। इन्द्रदेव चुपचाप सुनता रहा, पर अन्त में जब नागर द्वारा बाबाजी की नाक काटने का हाल सुना तो उसे यकायक क्रोध चढ़ आया। उसका चेहरा लाल हो गया, होंठ हिलने लगे, और वह बिना कुछ कहे बाबाजी के पास से उठकर चला गया। यह हाल देखकर मायारानी को ताज्जुब मालूम हुआ और उसने दारोगा से पूछा, ‘‘क्या आप कह सकते हैं कि इन्द्रदेव आपकी बातों का कोई जवाब दिये बिना ही क्यों चला गया?’

दारोगा - मालूम होता है कि मेरा हाल सुनकर उसे हद से ज्यादा क्रोध चढ़ आया और वह कोई कार्रवाई करने के लिए चला गया है।

मायारानी - इन्द्रदेव नागर को जानता है?

दारोगा - बहुत अच्छी तरह, बल्कि नागर का जितना भेद इन्द्रदेव को मालूम है उतना तुमको भी मालूम न होगा।

मायारानी - सो कैसे?

दारोगा - जिस जमाने में नागर रण्डियों की तरह बाजार में बैठती थी और मोतीजान के नाम से मशहूर थी उस जमाने में इन्द्रदेव भी कभी-कभी उसके पास भेष बदलकर गाना सुनने की नीयत से जाया करता था और उसकी हर एक बात की इसे खबर थी, मगर इन्द्रदेव का ठीक-ठीक हाल बहुत दिनों तक सोहबत करने पर भी नागर को मालूम न हुआ, वह इन्द्रदेव को केवल एक सरदार और रुपये वाला ही जानती थी।

आधे घण्टे तक इसी किस्म की बातें होती रहीं और इसके बाद इन्द्रदेव के ऐयार सूर्यसिंह ने कमरे के अन्दर आकर कहा, ‘‘इन्द्रदेवजी आपको बुलाते हैं, आप अकेले जाइये और नजरबाग में मिलिये जहां वह भी अकेले टहल रहे हैं।’’

इस सन्देश को सुनकर दारोगा उठ खड़ा हुआ और मायारानी को अपने कमरे में जाने के लिए कह इन्द्रदेव के पास चला गया।

इस मकान के पीछे की तरफ एक छोटा-सा नजरबाग था जो अपनी खुशनुमा क्यारियों और गुलबूटों की बदौलत बहुत ही भला मालूम पड़ता था। जब दारोगा वहां पहुंचा तो उसने इन्द्रदेव को उसी जगह टहलते हुए पाया।

इन्द्रदेव - भाई साहब, आज आपकी जुबान से मैंने वह बात सुनी है जिसके सुनने की कदापि आशा न थी।

दारोगा - बेशक नागर की बदमाशी का हाल सुनकर आपको बहुत ही रंज हुआ होगा।

इन्द्रदेव - नहीं, मेरा इशारा नागर की तरफ नहीं है। इसमें तो कोई सन्देह नहीं नागर ने आपके साथ जो किया बहुत बुरा किया और मैं उसे गिरफ्तार कर लेने के लिए एक ऐयार और कई सिपाही रवाना भी कर चुका हूं मगर मैं उन बातों की तरफ इशारा कर रहा हूं जो राजा गोपालसिंह से सम्बन्ध रखती हैं। मुझे इस बात का गुमान भी न था कि राजा गोपालसिंह अभी तक जीते हैं! मुझे स्वप्न में भी इस बात का ध्यान नहीं आ सकता था कि मायारानी वास्तव में गोपालसिंह की स्त्री नहीं है और आपकी कृपा से लक्ष्मीदेवी की गद्दी पर जा बैठी है! ओफ ओह, दुनिया भी अजब चीज है, और उसमें विहार करने वाले दुनियादार भी कैसे-कैसे मनसूबे गांठते हैं

इन्द्रदेव की बातें सुनकर दारोगा चौंक पड़ा और उसे विश्वास हो गया कि हमारी आशालता में अब कोई नये ढंग का फूल खिलना चाहता है। उसने घबराकर इन्द्रदेव की तरफ देखा जिसका जमीन की तरफ झुका हुआ चेहरा इस समय बहुत ही उदास हो रहा था।

दारोगा - बेशक मायारानी को लक्ष्मीदेवी बनाने में मेरा कसूर था मगर राजा गोपालसिंह के बारे मैं निर्दोष हूं। मुझे इस बात का गुमान भी न था कि राजा साहब को मायारानी ने कैद कर रक्खा है, मैं वास्तव में उन्हें मरा हुआ समझता था।

इन्द्रदेव - (इस ढंग से जैसे दारोगा की बात उसने सुनी ही नहीं) क्या आप कह सकते हैं कि राजा गोपालसिंह ने आपके साथ कोई बुराई की थी।

दारोगा - नहीं-नहीं, उस बेचारे ने मेरे साथ कोई बुराई नहीं की।

इन्द्रदेव - क्या आप कह सकते हैं कि गोपालसिंह के बाद आप विशेष धनी हो गए हैं?

दारोगा - नहीं।

इन्द्रदेव - क्या आप इतना भी कह सकते हैं कि राजा साहब के समय की बनिस्बत आज ज्यादा प्रसन्न हैं?

दारोगा - (ऊंची सांस लेकर) हाय, प्रसन्नता तो मानो मेरे लिए सिरजी ही नहीं गई!

इन्द्रदेव - नहीं-नहीं, आप ऐसा कदापि नहीं कह सकते, बल्कि ऐसा कहिये कि ईश्वर की दी हुई प्रसन्नता को आपने लात मारकर घर से निकाल दिया।

दारोगा - बेशक ऐसा ही है।

इन्द्रदेव - (जोर देकर) और आज नाक कटाकर भी दुनिया में मुंह दिखाने के लिए आप तैयार हैं और पिछली बातों पर जरा भी अफसोस नहीं करते! जिस कम्बख्त मायारानी ने अपना धर्म नष्ट कर दिया, जो मायारानी लोक-लाज को एकदम तिलांजलि दे बैठी, जिस दुष्टा ने अपने सिरताज राजा गोपालसिंह के साथ ऐसा घात किया, जिस पिशाचिनी ने अपने माता-पिता की जान ली, जिसकी बदौलत आपको कारागार (कैदखाने) का मजा चखना पड़ा और जिसके सतसंग से आप अपनी नाक कटा बैठे, आज पुनः उसी की सहायता करने के लिए आप तैयार हुए हैं और इस पाप में मुझसे सहायता लेकर मुझे भी नष्ट करना चाहते हैं! वाह भाई साहब वाह, आपने गुरु का अच्छा नाम रोशन किया और मुझे भी अच्छा उपदेश कर रहे हैं! बड़े अफसोस की बात है कि आप-सा एक अदना आदमी, जो एक रण्डी के हाथ से अपनी नाक नहीं बचा सका, राजा वीरेन्द्रसिंह ऐसे प्रतापी राजा का नामो-निशान मिटाने के लिए तैयार हो जाय! मैंने तो राजा वीरेन्द्रसिंह का केवल इतना ही कसूर किया कि आपको उनके कैदखाने से निकाल लाया और अब इसी अपराध को क्षमा कराने के उद्योग में लगा हूं, मगर आप, जिनकी बदौलत मैं अपराधी हुआ हूं, अब फिर...|

इतना कहते-कहते इन्द्रदेव रुक गया क्योंकि पल-पल भर में बढ़ते जाने वाले क्रोध ने उसका कंठ बन्द कर दिया। उसका चेहरा लाल हो रहा था और होंठ कांप रहे थे।

दारोगा का चेहरा जर्द पड़ गया, पिछले पापों ने उसके सामने आकर अपनी भयानक मूर्ति दिखाके डराना शुरू किया और वह दोनों हाथों से अपना मुंह ढांककर रोने लगा।

थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा इसके बाद इन्द्रदेव ने फिर कहना शुरू किया -

इन्द्रदेव - हाय, मुझे रह-रहकर वह जमाना याद आता है जिस जमाने में दयावान और धर्मात्मा राजा गोपालसिंह की बदौलत आपकी कदर और इज्जत होती थी। जब कोई सौगात उनके पास आती थी तब वह ‘लीजिए बड़े भाई’ कहकर आपके सामने रखते थे। जब कोई नया काम करना होता था तो ‘कहिए बड़े भाई, आप क्या आज्ञा देते हैं कहकर आपसे राय लेते थे, और जब उन्हें क्रोध चढ़ता था और उनके सामने जाने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी तब आपकी सूरत देखते ही सिर झुका लेते थे और बड़े उद्योग से अपने क्रोध को दबाकर हंस देते थे। क्या कोई कह सकता है कि आपसे डरकर या दबकर वे ऐसा करते थे नहीं, कदापि नहीं, इसका सबब केवल प्रेम था। वे आपको चाहते थे और आप पर विश्वास रखते थे कि स्वामीजी ने (जिनके आप शिष्य हैं) आपको अच्छी दीक्षा और शिक्षा दी होगी। उन्हें यह मालूम न था कि आप इतने बड़े विश्वासघाती हैं! हाय, उनके साथ आपका ऐसा बर्ताव! छिः-छिः, धिक्कार है ऐसी जिन्दगी पर! किसके लिए किस दुनिया में मुंह दिखाने के लिए क्या आप नहीं जानते कि ईश्वर भी कोई वस्तु है! खैर जाइये, इस समय मैं विशेष बात नहीं कर सकता। आप यह न समझिये कि मैं अपने घर में से चले जाने के लिए आपसे कहता हूं बल्कि यह कहता हूं कि अपने कमरे में जाकर आराम कीजिये। आपको चार दिन की मोहलत दी जाती है इस बीच में अच्छी तरह सोच लीजिये कि किस तरह से आपकी भलाई हो सकती है और आपको किस रास्ते पर चलना उचित है, मगर खबरदार, इस समय जो कुछ बातें हुई हैं, उनका जिक्र मायारानी से न कीजिएगा और इन चार दिन के अन्दर मुझसे मिलने की भी आशा न रखिएगा।

बयान - 8

दारोगा जिस समय इन्द्रदेव के सामने से उठा तो बिना इधर-उधर देखे सीधा अपने कमरे में चला गया और चादर से मुंह ढांपकर पलंग पर सो रहा। घण्टे भर रात गई होगी जब मायारानी यह पूछने के लिए कि इन्द्रदेव ने आपको क्यों बुलाया था बाबाजी के कमरे में आई, मगर जब बाबाजी को चादर से मुंह छिपाए पड़े देखा तो उसे आश्चर्य हुआ। वह उनके पास गई और चादर हटाकर देखा तो बाबाजी को जागते पाया। इस समय बाबाजी का चेहरा जर्द हो रहा था और ऐसा मालूम पड़ता था कि उनके शरीर में खून का नाम भी नहीं है या महीनों से बीमार हैं।

बाबाजी की ऐसी अवस्था देखकर मायारानी सन्न हो गई और बाबाजी का मुंह देखने लगी।

दारोगा - इस समय जाओ सो रहो, मेरी तबीयत ठीक नहीं है।

मायारानी - मैं केवल इतना ही पूछने के लिए आई थी कि इन्द्रदेव ने आपको क्यों बुलाया था और क्या कहा?

दारोगा - कुछ नहीं, उसने केवल धीरज दिया और कहा कि चार-पांच दिन ठहरो मैं तुम लोगों का बन्दोबस्त कर देता हूं। तब तक नागर भी गिरफ्तार होकर आ जाती है, लोग उसे पकड़ने के लिए गये हैं।

मायारानी - मगर आपकी अवस्था तो कुछ और कह रही है।

दारोगा - बस, इस समय और कुछ न पूछो। मैं अभी कह चुका हूं कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, मैं इस समय बात भी मुश्किल से कर सकता हूं।

मायारानी और कुछ भी न पूछ सकी, उलटे पैर कर अपने कमरे में चली गई और पलंग पर लेट के सोचने-विचारने लगी, मगर थकावट, मांदगी और चिन्ता ने उसे अधिक देर तक चैतन्य न रहने दिया और शीघ्र ही वह नींद की गोद में जाकर खर्राटे लेने लगी।

रात बीत गई। सबेरा होने पर दारोगा ने दरियाफ्त किया तो मालूम हुआ कि इन्द्रदेव यहां नहीं हैं। एक आदमी ने कहा कि तीन-चार दिन के बाद आने का वादा करके कहीं चले गये और यह कह गए हैं कि आप और मायारानी तब तक यहां से जाने का इरादा न करें। अब बाबाजी को मालूम हुआ कि दुनिया में उनका साथी कोई भी नहीं है और उनके बुरे कर्मों पर ध्यान देकर कोई भी उनकी मदद नहीं कर सकता। उन्हें अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना ही होगा।

बयान - 9

दारोगा साहब को मकान में बैठकर झक मारते हुए चार दिन बड़ी मुश्किल से बीते और आज पांचवां दिन है। जैसे ही बाबाजी अपनी चारपाई पर से उठाकर बाहर निकले वैसे ही एक आदमी ने आकर संदेश दिया कि ‘‘इन्द्रदेवजी आपको बुलाते हैं, मायारानी को साथ लेकर नजरबाग में जाइये।’’ यह सुनते ही बाबाजी लौटकर मायारानी के कमरे में गए और मायारानी को साथ लिये हुए उसी नजरबाग में पहुंचे, जहां पहले दिन उनको नसीहत की गई थी। बाबाजी और मायारानी ने देखा कि इन्द्रदेव एक कुर्सी पर बैठा हुआ है और उसके बगल में दो कुर्सियां खाली पड़ी हैं, उसके सामने दो आदमी नागर के दोनों बाजू पकड़े खड़े हैं। नागर का हाथ पीठ के पीछे मजबूती के साथ बंधा हुआ है। इन्द्रदेव ने दारोगा और मायारानी को बैठने का इशारा किया और वे उन कुर्सियों पर बैठ गए जो इन्द्रदेव के बगल में खाली पड़ी हुई थीं।

बाबाजी की अवस्था देखकर मायारानी को निश्चय हो गया था कि इन्द्रदेव ने मदद से साफ-साफ इनकार कर दिया है और इसी से बाबाजी उदास और बेचैन हैं, मगर इस समय नागर को अपने सामने बेबस खड़ी देखकर मायारानी को कुछ ढाढ़स हुई और उसने सोचा कि बाबाजी की उदासी का कोई दूसरा ही कारण होगा, इन्द्रदेव हम लोगों की मदद अवश्य करेगा।

पाठक महाशय समझ ही गए होंगे कि नागर को गिरफ्तार कराने वाला इन्द्रदेव ही है जिसका हाल ऊपर एक बयान में लिख चुके हैं, और जिस श्यामलाल ने नागर को गिरफ्तार किया था वह इन्द्रदेव का कोई ऐयार होगा या स्वयं इन्द्रदेव ही होगा।

इन्द्रदेव के बगल में जब मायारानी और दारोगा बैठ गए तो इन्द्रदेव ने नागर से पूछा, ‘‘क्या बाबाजी की नाक तूने ही काटी?’

नागर - जी हां, मैंने मायारानी की आज्ञा पाकर इनकी नाक काटी है।

इन्द्रदेव - (अपने आदमी से) अच्छा, अब तुम इस कम्बख्त नागर की नाक और उसके साथ कान भी काट लो और यदि कुछ बोले तो जुबान भी काट लो!

हुक्म की देर थी, नौकर मानो पहले ही से नाक काटने के लिए तैयार था, अस्तु इस समय जो कुछ होना था हो गया और इसके बाद नागर कैदखाने में भेज दी गई। मायारानी भी इन्द्रदेव की आज्ञानुसार अपने कमरे में चली गई और इन्द्रदेव तथा दारोगा अकेले ही रह गए।

इन्द्रदेव - आप देखते हैं कि जिसने आपके साथ बिना कारण के बुराई की थी उसे उस बुराई का बदला ईश्वर ने कुछ विशेषता के साथ दे दिया। आपको भी इसी तरह विचारना चाहिए कि क्या राजा वीरेन्द्रसिंह और राजा गोपालसिंह के साथ, जो बड़े नेक और बिल्कुल बेकसूर हैं, बुराई करने वाला अपनी सजा को न पहुंचेगा?

दारोगा - निःसन्देह आपका कहना ठीक है, परन्तु...!

दारोगा ‘परन्तु’ से आगे कहने भी न पाया था कि इन्द्रदेव फिर जोश में आ गया और कड़ी निगाह से बाबाजी की तरफ देख के बोला -

इन्द्रदेव - मैं इतना बक गया मगर अभी तक ‘परन्तु’ का डेरा आपके दिल से न निकला। वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों से उलझने की इच्छा आपकी अभी तक बनी ही है। खैर जो आपके जी में आवे कीजिए मगर मुझसे इस बारे में किसी तरह की आशा न रखिए। आप चाहे मुझे कोई भारी वस्तु समझे बैठे हों परन्तु मैं अपने को उन लोगों के मुकाबले में एक भुनगे के बराबर भी नहीं समझता। मुझे अच्छी तरह विश्वास है कि जहां हवा भी नहीं घुस सकती वहां वीरेन्द्रसिंह के ऐयार पहुंचते हैं। (बगल से एक चीठी निकालकर और दारोगा की तरफ बढ़ाकर) लीजिये पढ़िए और सुनकर चौंक जाइए कि प्रातःकाल जब मैं सोकर उठा तो इस पत्र को अपने गले के साथ ताबीज की तरह बंधा हुआ देखा। ओफ, जिसके ऐसे-ऐसे ऐयार ताबेदार हैं उसके साथ उलझने की नीयत रखने वाला पागल या यमराज का मेहमान नहीं तो और क्या समझा जायगा!

बाबाजी ने डरते-डरते वह पत्र इन्द्रदेव के हाथ से ले लिया और पढ़ा, यह लिखा हुआ था -

‘‘इन्द्रदेव -

तुम यह मत समझो कि ऐसे गुप्त स्थान में रहकर हम लोगों की नजरों से भी छिपे हुए हो। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं। हम लोग तुम्हें अच्छी तरह जानते हैं और हमें यह भी मालूम है कि तुम अच्छे ऐयार, बुद्धिमान और वीर पुरुष हो, परन्तु बुराई करना तो दूर रहा, हम लोग बिना कारण या बिना बुलाए किसी के सामने भी कभी नहीं जाते। इसी से हमारा और तुम्हारा सामना अभी तक नहीं हुआ। तुम यह मत समझो कि तुम बिल्कुल बेकसूर हो, कम्बख्त दारोगा को रोहतासगढ़ के कैदखाने से निकाल लाने का कसूर तुम्हारी गर्दन पर है, मगर तुमने यह बड़ी बुद्धिमानी की कि हमारे किसी आदमी को दुःख नहीं दिया और इसी से तुम अभी तक बचे हुए हो। हम तुम्हें मुबारकबाद देते हैं कि श्री तेजसिंह ने तुम्हारा कसूर जो हरामखोर और विश्वासघाती दारोगा को कैद से छुड़ाने के विषय में था माफ किया। इसका कारण यही था कि वह तुम्हारा गुरुभाई है, अतएव उसकी कुछ न कुछ मदद करना तुम्हें उचित ही था, चाहे वह नमकहराम तुम्हारा गुरुभाई कहलाने योग्य नहीं है। खैर, तुमने जो कुछ किया अच्छा किया, मगर इस समय तुम्हें चेताया जाता है कि आज से मायारानी, दारोगा या और किसी भी हमारे दुश्मन का यदि तुम साथ दोगे, पक्ष करोगे, हमारी कैद से निकाल ले जाने का उद्योग करोगे या केवल राय देकर भी सहायता करोगे, तो तुम्हारे लिए अच्छ न होगा। तुम चुनारगढ़ के तहखाने में अपने को हथकड़ी-बेड़ी से जकड़े हुए पाओगे, बल्कि आश्चर्य नहीं कि इससे भी बढ़कर तुम्हारी दुर्दशा की जाय। हां, यदि तुम दुनिया में नेकी, ईमानदारी और योग्यता के साथ रहोगे तो ईश्वर भी तुम्हारा भला करेगा। हम लोग ईमानदार, नेक और योग्य पुरुष का साथ देने के लिए हरदम कमर कसे तैयार रहते हैं। इसके सिवाय एक बात और कहनी है सो भी सुन लो। दो अदद तिलिस्मी खंजर, जो हम लोगों की मिलकियत हैं, मायारानी और नागर के कब्जे में चले गये हैं। इस समय दारोगा को साथ लेकर मायारानी तुम्हारे यहां मदद मांगने के लिए आई है। सो खैर, उससे तो कुछ मत कहो, उसके पास जो हमारे खंजर हैं, हम ले लेंगे, कोई चिन्ता नहीं, मगर नागर के पास जो तिलिस्मी खंजर था, वह तुम्हारे एक ऐयार के पास है। जो श्यामलाल बनकर नागर को गिरफ्तार करने गया था और उसे गिरफ्तार कर लाया है। बेशक वह खंजर तुम्हारे पास दाखिल किया जायगा, मगर तुम्हें मुनासिब है कि उसे तुरत हमारे हवाले करो। कल ठीक दोपहर के समय हम खोह के मुहाने पर मिलने के लिए तैयार रहेंगे जो तुम्हारे इस मकान में आने के पहले दरवाजे के समान है। यदि उस समय तिलिस्मी खंजर लिए तुम हमसे न मिलोगे तो हम समझेंगे कि तुम मायारानी और दारोगा का साथ देने के लिए तैयार हो गये, फिर जो कुछ होगा देखा जायगा।

मिती 13 प्रथम ऋतु। तुमको होशियार करने वाला

संवत् 412 कु.। एक बालक - भैरोसिंह ऐयार।’’

पत्र पढ़कर दारोगा ने फिर इन्द्रदेव के हाथ में दे दिया। उस समय दारोगा का चेहरा डर, चिन्ता और निराशा के कारण पीला पड़ गया था और भविष्य पर ध्यान देने ही से वह अधमरा हो गया था। भैरोसिंह के पत्र में तिलिस्मी खंजर का जिक्र था इसलिए दारोगा ने इन्द्रदेव की उंगलियों पर निगाह दौड़ा कर उसी समय देख लिया था कि तिलिस्मी खंजर के जोड़ की अंगूठी उसकी उंगली में मौजूद है, अतएव उसे निश्चय हो गया कि भैरोसिंह से कोई बात छिपी नहीं है, इन्द्रदेव सहायता करते दिखाई नहीं देते और अपना भविष्य बुरा नजर आता है, दारोगा इसी विचार में सिर झुकाये हुए कुछ देर तक खड़ा रहा और इन्द्रदेव उसके चेहरे के उतार-चढ़ाव को गौर से देखता रहा। आखिर इन्द्रदेव ने कहा - ‘‘मैं समझता हूं कि इस चीठी के प्रत्येक शब्द पर आपने गौर किया होगा और मतलब पूरा-पूरा समझ गये होंगे?’

दारोगा - जी हां।

इन्द्रदेव - खैर, तो अब मुझे इतना ही कहना है कि यदि इस समय आपके बदले में कोई दूसरा आदमी मेरे सामने होता तो उसे तुरन्त ही निकलवा देता, परन्तु आप मेरे गुरुभाई हैं। इसलिए तीन दिन की मोहलत देता हूं, इस बीच में आप यहां रहकर अपने भले-बुरे को अच्छी तरह सोच लें और फिर जो कुछ करने का इरादा हो मुझसे कहें, साथ ही इसके इस बात पर भी ध्यान रहे कि यदि आपकी नीयत अच्छी रही तो आपका कसूर क्षमा कराने के लिए मैं उद्योग करूंगा, नहीं जो राजा वीरेन्द्रसिंह के विषय में मुझसे मदद पाने की आशा आप कदापि न रखें!

दारोगा - क्या आप भैरोसिंह से मिलकर तिलिस्मी खंजर उसके हवाले करेंगे?

इन्द्रदेव - क्या आपको इसमें शक है अफसोस!

दारोगा ने फिर कुछ न पूछा और चुपचाप वहां से उठकर अपने कमरे में चला गया। मायारानी यह जानने के लिए कि इन्द्रदेव में और दारोगा में क्या बातें हुईं, पहले ही से दारोगा के कमरे में बैठी हुई थी। जब दारोगा लम्बी सांस लेकर बैठ गया तो उसने पूछा -

मायारानी - कहिए, क्या हुआ कम्बख्त नागर से खूब बदला लिया गया।

दारोगा - ठीक है, मगर इससे यह न समझना चाहिए कि इन्द्रदेव हमारी मदद करेगा।

मायारानी - (चौंककर) तो क्या उसने इशारे में कुछ इनकार किया?

दारोगा - इशारे में नहीं बल्कि साफ-साफ जवाब दे दिया।

मायारानी - तब तो वह बड़ा ही डरपोक निकला! अच्छा कहिये तो क्या-क्या बातें हुईं?

इन्द्रदेव और दारोगा में जो कुछ बातें हुई थीं, इस समय उसने मायारानी से साफ-साफ कह दीं और भैरोसिंह की चीठी का हाल भी सुना दिया।

मायारानी - (ऊंची सांस लेकर और यह सोचकर कि इन्द्रदेव की बातों में पड़कर दारोगा कहीं मेरा भी साथ न छोड़ दे) अफसोस, इन्द्रदेव कुछ भी न निकला! वह निरा डरपोक और कम-हिम्मत है, घर बैठे-बैठे खाना-पीना और सो रहना जानता है, उद्योग की कदर कुछ भी नहीं जानता। ऐसा मनुष्य दुनिया में क्या खाक नाम और इज्जत पैदा कर सकता है मगर हम लोग ऐसे सुस्त और भौंडी किस्मत पर भरोसा करके चुप बैठे रहने वाले नहीं हैं। हम लोग उनमें से हैं जो गरीब और लाचार होकर भी और चक्रवर्ती होने के लिए कृतकार्य न होने पर भी उद्योग किये ही जाते हैं और अन्त में सफल-मनोरथ होकर ही पीछा छोड़ते हैं। जरा गौर तो कीजिये और सोचिये तो सही कि मैं कौन थी और उद्योग ने मुझे कहां पहुंचा दिया तो क्या ऐसे समय में जब किसी कारण से दुश्मन हम पर बलवान हो गया, उद्योग को तिलांजलि दे बैठना उचित होगा नहीं, कदापि नहीं! क्या हुआ यदि इन्द्रदेव डरपोक और कम-हिम्मत निकला, मैं तो हिम्मत हारने वाली नहीं हूं और न आप ऐसे हैं। देखिए तो सही, मैं क्या हिम्मत करती हूं और दुश्मनों को कैसा नाच नचाती हूं। आप मेरी और अपनी हिम्मत पर भरोसा करें और इन्द्रदेव की आशा छोड़ मौका देखकर चुपचाप यहां से निकल चलें।

अफसोस! दुनिया में अच्छी नसीहत का असर बहुत कम होता है और बुरी सोहबत की बुरी शिक्षा शीघ्र अपना असर करके मनुष्य को बुराई के शिकंजे में फंसाकर उनका सत्यानाश कर डालती है। मगर यह बात उन लोगों के लिए नहीं है जिनके दिमाग में सोचने-समझने और गौर करने की ताकत है। सन्तति के इस बयान में दोनों रंग के पात्र मौजूद हैं, अतएव पाठकों को आश्चर्य न करना चाहिए।

दूसरे दिन इन्द्रदेव ने अपने दोनों मेहमानों दारोगा और मायारानी को अपने घर में न पाया और पता लगाने से मालूम हुआ कि वे दोनों रात ही को किसी समय मौका पाकर वहां से निकल भागे।

 

बयान - 10

दोपहर की कड़ाके की धूप से व्याकुल होकर कुछ आराम पाने की इच्छा से दो आदमी एक नहर के किनारे, जिसके दोनों तरफ घने और गुंजान जंगली पेड़ों ने छाया कर रखी है, बैठकर आपस में धीरे-धीरे कुछ बातें कर रहे हैं। इनमें से एक तो बुड्ढा नकटा दारोगा है और दूसरी किस्मत से मुकाबला करने वाली कम्बख्त मायारानी जो इस अवस्था को पहुंचकर भी हिम्मत हारने की इच्छा नहीं करती। ये दोनों इन्द्रदेव के मकान से चुपचाप भाग निकले हैं और बड़े-बड़े मनसूबे गांठ रहे हैं। इनके साथ ही वे इन्द्रदेव को भी बिगाड़ने की तरकीब सोच रहे हैं, यह भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। बुरे मनुष्य जब किसी भले आदमी से मदद मांगने जाते हैं और बेचारा बुरे कामों का नतीजा सोचकर बुराई में उनका साथ देने से इन्कार करता है तो वे दुष्ट उसके भी दुश्मन हो जाते हैं।

मायारानी - क्या हर्ज है जरा मुझे बन्दोबस्त कर लेने दीजिए, फिर मैं इन्द्रदेव से समझे बिना न रहूंगी।

दारोगा - बेशक, मुझे भी इन्द्रदेव पर बड़ा ही क्रोध है। नालायक ने ऐसे नाजुक समय में साथ देने से इन्कार कर दिया। खैर, देखा जायगा, इस समय तो इस बात पर विचार करना चाहिए कि वीरेन्द्रसिंह के दुश्मन कौन-कौन हैं और उन लोगों को किस तरह अपना साथी बनाना चाहिए, क्योंकि हम लोगों का पहला काम यही है कि अपनी मण्डली को बढ़ावें।

मायारानी - बेशक, ऐसा ही है। अच्छा, आप उन लोगों का नाम तो जरा ले जायें जो हम लोगों का साथ दे सकते हैं और यह भी कह जायें कि इस समय वे लोग कहां हैं।

दारोगा - (सोचता हुआ) महाराज शिवदत्त, भीमसेन और उनके साथी एक, माधवी दो, दिग्विजयसिंह का लड़का कल्याणसिंह तीन, शेरअलीखां जिसकी लड़की को वीरेन्द्रसिंह ने कैद रखा है चार, और उसके पक्षपाती लोग जिनका कुछ हिसाब नहीं।

मायारानी - बेशक, इन लोगों का साथ हो जाने से हम लोग वीरेन्द्रसिंह और उनके पक्षपातियों को तहस-नहस कर सकते हैं और ये लोग खुशी से हमारा साथ देंगे भी, मगर अफसोस यह है कि शेरअलीखां को छोड़कर बाकी के सभी लोग कैद में हैं। हां, यह तो कहिए कि महाराज शिवदत्त को किसने गिरफ्तार किया था और अब वह कहां हैं?

दारोगा - मुझे ठीक-ठीक पता लग चुका है कि भूतनाथ ने ‘रूहा’ बनकर शिवदत्त को धोखा दिया और अब शिवदत्त कमलिनी के तालाब वाले मकान में कैद है, माधवी और मनोरमा भी उसी मकान में कैद हैं।

मायारानी - उस मकान में से उन लोगों को छुड़ाना जरा मुश्किल है, वह भी ऐसे समय में जब कि हमारे पास कोई ऐयार नहीं।

दारोगा - (यकायक कोई बात याद आने से चौंककर) हां, मैं यह पूछना तो भूल ही गया कि तुम्हारे ऐयार बिहारीसिंह और हरनामसिंह कहां हैं मालूम होता है कि तुम्हारी इस अवस्था का हाल उन लोगों को मालूम नहीं है। मगर नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। जमानिया में इतना फसाद मच जाना और तुम्हारा निकल भागना कोई साधारण बात नहीं है, जिसकी खबर तुम्हारे ऐयारों को न होती। शायद इसका कोई और सबब हो!

अब मायारानी इस सोच में पड़ गई कि दारोगा की बातों का क्या जवाब दिया जाय। उसने और सब हाल तो दारोगा से कह दिया था, मगर उन दोनों ऐयारों की जान लेने का हाल अब तक नहीं कहा था। उसने सोचा कि यदि दारोगा को यह मालूम हो जायगा कि मैंने दोनों ऐयारों को मार डाला तो उसे बड़ा ही रंज होगा, क्योंकि ऐयारों को मारना बहुत बुरा होता है। तिस पर अपने खास ऐयारों की जान लेना और सो भी बिना कसूर! लेकिन फिर क्या कहा जाय क्या उनके मारने का हाल ठीक-ठीक न कहकर कुछ बहाना कर देना उचित होगा नहीं, बहाना करने और छिपा जाने से काम नहीं चलेगा, अन्त में यह बात प्रकट हो ही जायगी, क्योंकि लीला को यह बात मालूम हो चुकी है और कम्बख्त लीला भी इस समय मेरा साथ छोड़कर अलग हो गई है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि वह मेरा भंडा फोड़ दे और सभी के साथ बाबाजी को भी उन बातों का पता लग जाय। मगर नहीं, उस समय जो होगा देखा जायगा, अभी तो छिपाना ही उचित है।

मायारानी सिर झुकाये हुए इन बातों को सोच रही थी और दारोगा इस आश्चर्य में था कि मायारानी ने मेरी बात का जवाब क्यों नहीं दिया या यह क्या सोच रही है। आखिर दारोगा चुपचाप रह न सका और उसने पुनः मायारानी से कहा -

दारोगा - तुम क्या सोच रही हो, मेरी बात का जवाब क्यों नहीं देतीं?

मायारानी - मैं यही सोच रही हूं कि आपकी बात का क्या जवाब दूं जब कि मैं स्वयं नहीं जानती कि मेरे ऐयारों ने ऐसे समय में मेरा साथ क्यों छोड़ दिया और कहां चले गये!

दारोगा - अस्तु, मालूम हुआ कि उन दोनों ने स्वयं तुम्हारा साथ छोड़ दिया।

मायारानी - बेशक, ऐसा ही कहना चाहिए। अच्छा अब विशेष समय नष्ट न करना चाहिए। अब आप जल्दी यह सोचिए कि हम कहां जाकर ठहरें और क्या करें!

दारोगा - अब जहां तक मैं समझता हूं, यही उचित जान पड़ता है कि शेरअलीखां के पास चलें और उससे मदद लें। यह तो सब कोई जानते हैं कि शेरअलीखां बड़ा जबर्दस्त लड़ाका है, मगर उसके पास दौलत नहीं है।

मायारानी - ठीक है, मगर जब मैं दौलत से उसका घर भर दूंगी तो वह बहुत ही खुश होगा और एक जबर्दस्त फौज तैयार करके हमारा साथ देगा। मैं आपसे कह चुकी हूं कि इस अवस्था में भी दौलत की मुझे कमी नहीं है।

दारोगा - हां, मुझे याद है, तुमने शिवगढ़ी के बारे में कहा था, अच्छा तो अब विलम्ब करने की आवश्यकता ही क्या है (चौंककर) हैं, यह क्या! (हाथ का इशारा करके) वह कौन है जो सामने की झाड़ी में से निकलकर इसी तरफ आ रहा है! शिवदत्त की तरह मालूम पड़ता है! (कुछ रुककर) बेशक, शिवदत्त ही तो है! हां देखो तो, वह अकेला नहीं है, उसके पीछे उसी झाड़ी में से और भी कई आदमी निकल रहे हैं।

मायारानी ने भी चौंककर उस तरफ देखा और हंसती हुई उठ खड़ी हुई।

(दसवां भाग समाप्त)


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