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उपन्यास

चंद्रकांता संतति
खंड 3

देवकीनंदन खत्री

अनुक्रम बारहवां भाग पीछे    

 

बयान - 1

हम ग्यारहवें भाग के अन्त में लिख आये हैं कि जब देवीसिंह ने उस विचित्र मनुष्य का चेहरा धोकर साफ किया तो शायद तारा ने उसे पहचान लिया और इस घटना का उस पर ऐसा असर हुआ कि वह चिल्ला उठी, उसका सिर घूमने लगा और वह जमीन पर गिरने के साथ ही बेहोश हो गई। उसी समय सामने से वह नकाबपोश भी आता हुआ दिखाई दिया जिसने उस विचित्र मनुष्य को हैरान-परेशान कर दिया था और उस गठरी को भी अपने कब्जे में कर लिया था जिसमें विचित्र मनुष्य के कहे मुताबिक तारा की किस्मत बन्द थी। इस बयान में भी हम उसी सिलसिले को जारी रखना उचित समझते हैं।

बात की बात में नकाबपोश उस जगह आ पहुंचा जहां वह विचित्र मनुष्य और उसके सामने एक पत्थर की चट्टान पर तारा बेहोश पड़ी हुई थी तथा कमलिनी बड़ी मुहब्बत से तारा का सिर थामे ताज्जुब-भरी निगाहों से हर एक को देख रही थी।

देवीसिंह - (नकाबपोश से) आप यहां कैसे क्या यहां का रास्ता आपको मालूम था?

नकाबपोश - नहीं-नहीं, मैं तुम्हारे पीछे-पीछे यहां तक आया हूं।

इतना कहकर नकाबपोश ने अपने चेहरे से नकाब उठाकर पीछे की तरफ उलट दी और सभी ने तेजसिंह को पहचानकर बड़ा ही आश्चर्य किया। भैरोसिंह ने दौड़कर अपने पिता के चरण छूए, देवीसिंह भी तेजसिंह के गले मिले और किशोरी, कामिनी, लाडिली तथा कमलिनी ने भी उन्हें प्रणाम किया।

देवीसिंह - (तेजसिंह से) क्या आप ही वह नकाबपोश हैं जिसका विचित्र हाल भूतनाथ की जुबानी मैंने सुना है?

तेजसिंह - हां, मैं ही था, मगर भूतनाथ को इस बात का शक भी न हुआ होगा कि नकाबपोश वास्तव में तेजसिंह है। (विचित्र मनुष्य की तरफ इशारा करके) इसके और भूतनाथ के बीच में जो-जो बातें या घटनाएं हुईं वह भूतनाथ की जुबानी तुमने सुनी ही होंगी?

देवीसिंह - हां, सुनी तो हैं मगर मुझे विश्वास नहीं है कि भूतनाथ ने जो कहा, सब सच कहा होगा।

तेजसिंह - ठीक है, रात से मेरा खयाल भी भूतनाथ की तरफ से ऐसा ही हो रहा है, खैर मैं स्वयं सब हाल तुम लोगों से कहता हूं। मैं तारासिंह को साथ लिये हुए रोहतासगढ़ गया था। उस समय मैं रोहतासगढ़ ही में था जब यह खबर पहुंची कि कमलिनी के तिलिस्मी मकान को दुश्मनों ने घेर लिया है और उस पर अपना दखल जमाना ही चाहते हैं। मैंने तुरन्त थोड़े से फौजी सिपाहियों को दुश्मन से मुकाबला करने के लिए रवाना किया और दो घंटे बाद तारासिंह को साथ लेकर सूरत बदले हुए खुद भी उसी तरफ रवाना हुआ। रात की पहली अंधेरी थी जब हम दोनों एक जंगल में पहुंचे और उसी समय घोड़े के टापों की आवाज आने लगी। यह आवाज पीछे की तरफ से आ रही थी और क्रमशः पास होती जाती थी। हम दोनों यह सोचकर पेड़ की आड़ में खड़े हो गये कि जब यह सवार आगे निकल जाय तब हम लोग चलेंगे। मगर जब यह घोड़ा उस पेड़ के पास पहुंचा जिसकी आड़ में हम दोनों छिपे खड़े थे तो हमने देखा कि उस घोड़े पर एक नहीं बल्कि दो आदमी सवार हैं जिनमें से एक औरत है जो पीछे की तरफ बैठी हुई है। उसका औरत होना मुझे इस तरह मालूम हुआ कि जब घोड़ा उस पेड़ के पास पहुंचा जिसकी आड़ में हम लोग छिपे हुए थे तो उस औरत ने कहा, ''जरा ठहर जाइये, मैं इस जगह उतरूंगी और दस-बारह पल के लिए आपसे जुदा होऊंगी।'' बस इस आवाज ही से मुझे निश्चय हो गया कि वह औरत है। घोड़ा रोककर सवार उतर पड़ा और हाथ का सहारा देकर उस औरत को भी उसने उतारा।

इतना कहकर तेजसिंह रुक गये और कमलिनी की तरफ देखकर बोले, ''मगर मुझे इस समय अपना किस्सा कहते अच्छा नहीं मालूम होता।''

कमलिनी - सो क्यों

तेजसिंह - इसलिए कि मैं एक तरफ बेचारी तारा को बेहोश देखता हूं, दूसरी तरफ किशोरी और कामिनी को ऐसी अवस्था में पाता हूं जैसे वर्षों की बीमार हों और तुमको भी सुस्त और उदास देखता हूं, इन कारणों से मेरी यह इच्छा होती है कि पहले इस तरफ का हाल सुन लूं।

कमलिनी - आपका कहना बहुत ठीक है, फिर भी मैं यही चाहती हूं कि पहले आपका हाल सुन लूं।

तेजसिंह - खैर, मैं भी अपना किस्सा मुख्तसर ही में पूरा करता हूं।

इतना कहकर तेजसिंह ने फिर कहना शुरू किया -

''जब वह औरत उस काम से छुट्टी पा चुकी जिसके लिए उतरी थी, तो घोड़े के पास आई और अपने साथी से बोली, ''भूतनाथ ने जिस समय आपको देखा उसके चेहरे पर मुर्दनी छा गई।'' इसका जवाब उस आदमी ने जो वास्तव में (विचित्र मनुष्य की तरफ इशारा करके) यही हजरत थे, यों दिया, ''बेशक ऐसा ही है क्योंकि भूतनाथ मुझे मुर्दा समझे हुए था। देखो तो सही आज मेरे और उसके बीच कैसी निपटती है। मैं उसे अवश्य अपने साथ ले जाऊंगा और नहीं तो आज ही उसका भण्डा फोड़ दूंगा जो बड़ा अच्छा, नेक और बहादुर बना फिरता है!'' इतना कह दोनों पुनः घोड़े पर सवार हुए और आगे की तरफ चले। मेरे दिल में तरह-तरह के खुटके पैदा हो रहे थे और मैं अपने को उनके पीछे-पीछे जाने से किसी तरह रोक नहीं सकता था। लाचार हम दोनों भी उनके पीछे तेजी के साथ रवाना हुए। इस बात की फिक्र मेरे दिल से बिल्कुल जाती रही कि हमारे फौजी सिपाही दुश्मनों के मुकाबले में कब पहुंचेंगे और क्या करेंगे। अब तो यह फिक्र पैदा कि यह आदमी कौन है और इससे तथा भूतनाथ से क्या सम्बन्ध है इस बात का पता लगाना चाहिए, और इसीलिए हम लोग अपना रास्ता छोड़कर घोड़े के पीछे-पीछे ही रवाना हुए मगर हम लोगों को बहुत देर तक सफर न करना पड़ा और शीघ्र ही हम लोग उस जंगल में जा पहुंचे जिसमें भगवानी और श्यामसुन्दर की कहा-सुनी हो रही थी और थोड़ी देर के बाद आप लोग भी पहुंच गये थे। मैं जान-बूझकर आप लोगों से नहीं मिला और इस विचित्र मनुष्य के पीछे पड़ा रहा, यहां तक कि आप लोग चले गये और मुझे वह विचित्र घटना देखनी पड़ी।''

इसके बाद तेजसिंह ने वह सब हाल कहा जिसे हम ऊपर लिख आये हैं और पुनः इस जगह दोहराकर लिखना वृथा समझते हैं। हां, उस दूसरे नकाबपोश के विषय में कदाचित् पाठकों को भ्रम होगा इसलिए साफ लिख देना आवश्यक है कि वह दूसरा नकाबपोश जिसने भगवानी को भागने से रोक रखा था और जिसके पास पहुंचने के लिए तेजसिंह ने श्यामसुन्दरसिंह को नसीहत की थी, वास्तव में तारासिंह था जिसका हाल इस समय तेजसिंह के बयान करने से मालूम हुआ।

जो कुछ हम ऊपर लिख आये हैं, उतना बयान करने के बाद तेजसिंह ने कहा, ''जब यह विचित्र मनुष्य भूतनाथ को लेकर रवाना हुआ तो मैं भी इसके पीछे-पीछे चला पर बीच ही में उससे और देवीसिंह से मुलाकात हो गई, देवीसिंह उसे पकड़ के यहां ले आये और मैं भी देवीसिंह के पीछे-पीछे चुपचाप यहां तक चला आया।''

इतना कहकर तेजसिंह चुप हो गये और तारा की तरफ देखने लगे।

कमलिनी - यह घटना तो बड़ी ही विचित्र है, निःसन्देह इसके अन्दर कोई गुप्त रहस्य छिपा हुआ है।

तेजसिंह - जहां तक मैं समझता हूं मालूम होता है कि आज बड़ी-बड़ी गुप्त बातों का पता लगेगा। अब कोई ऐसी तरकीब करनी चाहिए जिसमें यह (विचित्र मनुष्य की तरफ इशारा करके) अपना सच्चा हाल कह दे।

देवीसिंह - तो इसे होश में लाना चाहिए।

तेजसिंह - नहीं, इसे अभी इसी तरह पड़ा रहने दो। कोई हर्ज नहीं और पहले तारा को होश में लाने का उद्योग करो।

देवीसिंह - बहुत अच्छा।

अब देवीसिंह तारा को होश में लाने का उद्योग करने लगे और तेजसिंह ने कमलिनी से कहा, ''जब तक तारा होश में आवे, तब तक तुम अपना हाल और इस तरफ जो कुछ बीता है, सो सब हाल कह जाओ।'' कमलिनी ने ऐसा ही किया अर्थात् अपना और किशोरी, कामिनी तथा तारा का सब हाल संक्षेप में कह सुनाया, और इसी बीच में तारा भी होश में आकर बातचीत करने योग्य हो गई।

कमलिनी - (तारा से) क्यों बहिन, अब तबीयत कैसी है?

तारा - अच्छी है।

कमलिनी - तुम इस विचित्र मनुष्य को देखकर इतना डरी क्यों? क्या इसे पहचानती हो?

तारा - हां, मैं इसे पहचानती हूं मगर अफसोस कि इसका असल भेद अपनी जुबान से नहीं कह सकती। (विचित्र मनुष्य की तरफ देख के) हाय, इस बेचारे ने तो किसी का कुछ भी नुकसान नहीं किया, फिर आप लोग क्यों इसके पीछे पड़े हैं?

कमलिनी - बहिन, मेरी समझ में नहीं आता कि तुम इसका भेद जान के भी इतना क्यों छिपाती हो क्या तुमने अभी नहीं सुना कि इसके और भूतनाथ के बीच में क्या बातें हुई हैं मगर फिर भी ताज्जुब है कि इसे तुम अपनायत के ढंग से देख रही हो!

तारा - (लम्बी सांस लेकर) हाय, अब मैं अपने दिल को नहीं रोक सकती। उसमें अब इतनी ताकत नहीं है कि उन भेदों को छिपा सके जिन्हें इतने दिनों तक अपने अन्दर इसलिए छिपा रखा था कि मुसीबत के दिन निकल जाने पर प्रकट किये जायेंगे। नहीं-नहीं, अब मैं नहीं छिपा सकती! बहिन कमलिनी, तू वास्तव में मेरी बहिन है और सगी बहिन है, मैं तुझसे बड़ी हूं, मेरा ही नाम लक्ष्मीदेवी है।

कमलिनी - (चौंककर और तारा को गले से लगाकर) ओह! मेरी प्यारी बहिन! क्या वास्तव में तुम लक्ष्मीदेवी हो?

तारा - हां, और यह विचित्र मनुष्य हमारा बाप है!

कमलिनी - हमारा बाप बलभद्रसिंह!

तारा - हां, यही हमारे-तुम्हारे और लाडिली के बाप बलभद्रसिंह हैं। कम्बख्त मायारानी की बदौलत मेरे साथ मेरे बाप भी कैदखाने की अंधेरी कोठरी में सड़ते रहे। हरामजादा दारोगा इस पर भी सन्तुष्ट न हुआ और उसने इनको जहर दे दिया मगर ईश्वर ने एक सहायक भेज दिया जिसकी बदौलत इनकी जान बच गई। पर फिर भी उस जहर के तेज असर ने इनका बदन फोड़ दिया और रंग बिगाड़ दिया बल्कि इस योग्य तक नहीं रखा कि तुम इन्हें ठीक से पहचान सको। इतना ही नहीं, और भी बड़े-बड़े कष्ट भोगने पड़े। (रोकर) हाय! अब मेरे कलेजे में दर्द हो रहा है। मैं उन मुसीबतों को बयान नहीं कर सकती! तुम स्वयं अपने पिता ही से सब हाल पूछ लो, जिन्हें मैं कई वर्षों के बाद इस अवस्था में देख रही हूं!

पाठक, आप समझ सकते हैं कि तारा की इन बातों ने कमलिनी के दिल पर क्या असर किया होगा, तेजसिंह और भैरोसिंह की क्या अवस्था हुई होगी और देवीसिंह कितने शर्मिन्दा हुए होंगे जिन्होंने पत्थर मारकर उस विचित्र मनुष्य का सिर तोड़ डाला था। कमलिनी दौड़ी हुई अपने बाप के पास गई और उसके गले से चिपटकर रोने लगी। तेजसिंह भी लपककर उनके पास गये और लखलखे की डिबिया उनकी नाक से लगाई। बलभद्रसिंह होश में आकर उठ बैठे और ताज्जुब-भरी निगाहों से चारों तरफ देखने लगे। तारा, कमलिनी और लाडिली पर निगाह पड़ते ही उद्योग करने पर भी न रुकने वाले आंसू उनकी आंखों में डबडबा आये और उन्होंने कमलिनी की तरफ देखकर कांपती हुई आवाज में कहा, ''क्या तारा ने मेरे या अपने विषय में कोई बात कही है तुम लोग जिस निगाह से मुझे देख रही हो उससे साफ मालूम होता है कि तारा ने मुझे पहचान लिया और मेरे तथा अपने विषय में कुछ कहा है!''

कमलिनी - (गद्गद होकर) जी हां, तारा ने अपना और आपका परिचय देकर मुझे बड़ा ही प्रसन्न किया है।

बलभद्रसिंह - तो बस, अब मैं अपने को क्योंकर छिपा सकता हूं और इस बात से क्योंकर इनकार कर सकता हूं कि मैं तुम तीनों बहिनों का बाप हूं। आह! मैं अपने दुश्मनों से अपना बदला स्वयं लेने की नीयत से थोड़े दिन तक और अपने को छिपाना चाहता था मगर समय ने ऐसा न करने दिया! खैर मर्जी परमात्मा की! अच्छा कमलिनी, सच कहना, क्या तुझे इस बात का गुमान भी था कि तेरा बाप जीता है?

कमलिनी - मैं अफसोस के साथ कहती हूं कि कई पितृपक्ष ऐसे बीत गए जिनमें मैं आपके नाम तिलांजलि दे चुकी हूं क्योंकि मुझे विश्वास दिलाया गया था कि हम लोगों के सिर पर से हमारे प्यारे बाप का साया जाता रहा और इस बात को भी एक जमाना गुजर गया। जो हो, मगर आज हमारी खुशी का अन्दाजा कोई भी नहीं कर सकता।

बलभद्रसिंह उठकर तारा के पास गये जिसमें चलने-फिरने की ताकत अभी तक नहीं आई थी, तारा उनके गले से लिपट गई और फूट-फूटकर रोने लगी। उसके बाद लाडिली की नौबत आई और उसने रो-रोकर अपने कपड़े भिगोये और मायारानी को गालियां देती रही। आधे घंटे तक यही हालत रही, अन्त में तेजसिंह ने सभी को समझा-बुझाकर शान्त किया और फिर बातचीत होने लगी।

देवीसिंह - (बलभद्रसिंह से) मैं आपसे माफी मांगता हूं, मुझसे जो कुछ भूल हुई वह अनजाने में हुई है!

बलभद्रसिंह - (हंसकर) नहीं-नहीं, मुझे इस बात का रंज कुछ भी नहीं है, बल्कि सच तो यह है कि अब मुझे केवल आप ही लोगों का भरोसा रह गया है, मगर अफसोस इतना ही है कि भूतनाथ आप लोगों का दोस्त है और मैं उसे किसी तरह भी माफ नहीं कर सकता।

तेजसिंह - हम लोगों को बड़ा ही आश्चर्य हो रहा है और बिल्कुल समझ में नहीं आता कि आपके और भूतनाथ के बीच में किस बात की ऐंठन पड़ी हुई है।

बलभद्रसिंह - (तेजसिंह से) मालूम होता है कि अभी तक आपने वह गठरी नहीं खोली जो आपने एक औरत के हाथ से छीनी थी और जो इस समय भी मैं आपके पास देख रहा हूं।

तेजसिंह - (गठरी दिखाकर) नहीं, मैंने अभी तक नहीं खोला।

बलभद्रसिंह - तभी आप ऐसा पूछते हैं, अच्छा अब इसे खोलिये।

कमलिनी - वह औरत कौन थी?

बलभद्रसिंह - उसका भी हाल मालूम हो जायगा, जरा सब्र करो! (तेजसिंह से) हां साहब, अब वह गठरी खोलिये।

''बहुत अच्छा'' कहकर तेजसिंह उठे और गठरी लिये हुए उस तरफ बढ़ गए जहां किशोरी, कामिनी और तारा पड़ी थीं। इसके बाद सभी की तरफ देख के बोले, ''इस गठरी में क्या है सो देखने के लिए सभी का जी बेचैन हो रहा होगा बल्कि मैं कह सकता हूं कि तारा सबसे ज्यादा बेचैन होगी इसलिए मैं किशोरी, कामिनी और तारा ही के पास बैठकर यह गठरी खोलता हूं जिससे इन्हें उठने और चलने की तकलीफ न होगी, आइये, आप लोग भी इसी जगह आ बैठिये।''

इतना कहकर तेजसिंह वहां बैठ गए, बलभद्रसिंह उनके बगल में जा बैठे, और बाकी सभी ने तेजसिंह को इस तरह घेर लिया जैसे किसी मदारी को खेल करते समय मनचले लड़के घेर लेते हैं। तेजसिंह ने गठरी खोली और सभी की निगाह उसके अन्दर की चीजों पर पड़ी।

इस गठरी में पीतल की एक छोटी-सी सन्दूकड़ी थी जिसे कलमदान भी कह सकते हैं और एक मुट्ठा कागजों का था। बलभद्रसिंह ने कहा, ''पहले इस कागज के मुट्ठे को खोलो।'' तेजसिंह ने ऐसा ही किया और जब कागज का मुट्ठा खोला गया तो मालूम हुआ कि कई चीठियों को आपस में एक-दूसरे के साथ जोड़ के वह मुट्ठा तैयार किया गया है।

तेजसिंह - (मुट्ठा खोलते हुए) इसे शैतान की आंत कहूं या विधाता की जन्मपत्री!

बलभद्रसिंह - (हंसकर) आप जो चाहें कह सकते हैं। इन चिठियों और पुर्जों को मैंने क्रम के साथ जोड़ा है, आप शुरू से एक-एक करके पढ़ना आरम्भ कीजिये।

तेजसिंह - बहुत अच्छा।

तेजसिंह ने पहला पुर्जा पढ़ा, उसमें ऊपर की तरफ यह लिखा हुआ था -

''श्रीयुत् रघुबरसिंह योग्य लिखी हेलासिंह की राम-राम।'' और बाद में यह मजमून था -

''मेरे प्यारे दोस्त -

आपको मालूम है कि राजा गोपालसिंह की शादी बलभद्रसिंह की लड़की लक्ष्मीदेवी के साथ होने वाली है, मगर मैं चाहता हूं कि आप कृपा करके कोई ऐसा बन्दोबस्त करें जिसमें वह शादी टूट जाय और उसके बदले में मेरी लड़की मुन्दर की शादी राजा गोपालसिंह के साथ हो जाय। अगर ऐसा हुआ तो मैं जन्म-भर आपका अहसान मानूंगा और जो कुछ आप कहेंगे करूंगा। मुझे आपकी दोस्ती पर बहुत भरोसा है। शुभम्।''

बलभद्र - लीजिये, पहले नम्बर की चीठी समाप्त!

तारा - रघुबरसिंह किसका नाम है?

तेजसिंह - इस भूतनाथ का नाम रघुबरसिंह है और नानक इसी का लड़का है, (बलभद्रसिंह से) क्या हेलासिंह मायारानी के बाप का नाम है?

बलभद्रसिंह - जी हां, और मायारानी का असल नाम मुन्दर है।

कमलिनी - अच्छा आगे पढ़िये।

तेजसिंह ने दूसरी चीठी पढ़ी। उसमें यह लिखा था -

''मेरे प्यारे दोस्त हेलासिंह,

आपका पत्र पहुंचा। मैं इस बात का उद्योग कर सकता हूं मगर इस काम में हद से ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। खुल्लमखुल्ला तो आपकी लड़की की शादी राजा गोपालसिंह से नहीं हो सकती क्योंकि राजा गोपालसिंह को आपकी लड़की का विधवा होना मालूम है, हां उनका दारोगा अगर साथ मिल जाय तो कोई तरकीब निकल सकती है, लेकिन उसमें भी यह कठिनाई है कि दारोगा लालची है और आप गरीब हैं।

- रघुबरसिंह।''

देवीसिंह - वाह-वाह, भूतनाथ तो बड़ा शैतान मालूम होता है! यह सब कांटे क्या उसी के बोए हुए हैं!

कमलिनी - मगर अफसोस है कि आप उसे अपना दोस्त बनाने के लिए कसम खा चुके हैं!

बलभद्रसिंह - मैं ठीक कहता हूं कि थोड़ी देर बाद देवीसिंहजी को अपने किये पर पछताना पड़ेगा।

लाडिली - खैर, जो होगा देखा जायगा, आप तीसरी चीठी पढ़िये।

बलभद्रसिंह - मालूम नहीं है कि भूतनाथ की चीठी का जवाब हेलासिंह ने क्या दिया था क्योंकि वह चीठी मेरे हाथ नहीं लगी। यह तीसरी चीठी जो आप पढ़ेंगे वह भी भूतनाथ ही की लिखी हुई है।

तेजसिंह तीसरी चीठी पढ़ने लगे। उसमें लिखा हुआ था -

''प्रियवर हेलासिंह -

आपने लिखा कि 'यद्यपि मुन्दर विधवा है और उसकी उम्र भी ज्यादा है परंतु नाटी होने के सबब वह ज्यादा उम्र की मालूम नहीं पड़ती' ठीक है, मगर बहुत-सी बातें ऐसी हैं जो औरों को चाहे मालूम न हों, मगर उससे किसी तरह छिपी नहीं रह सकतीं जिसके साथ उसकी शादी होगी और इसी बात से राजा गोपालसिंह का दारोगा भी डरता है, मगर मैंने भविष्य के लिए उसके खयाल में ऐसे-ऐसे सरसब्जबाग पैदा कर दिए हैं कि जिसकी बेसुध और मदहोश कर देने वाली खुशबू को वह अभी से सूंघने लग गया है, तिस पर भी मैं इस बात का तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि यह शादी प्रकट रूप से नहीं हो सकती। इसके लिए उस ब्याह वाले दिल ही कोई अनोखी चाल चलनी पड़ेगी। अस्तु, दारोगा साहब ने यह कहा है कि आज के आठवें दिन गुरुवार को संध्या समय दारोगा साहब के बंगले में आप उनसे मिलें, मैं भी वहां मौजूद रहूंगा। फिर जो कुछ तै हो जाय वही ठीक है।

- वही रघुबर।''

कमलिनी - मुझे यह नहीं मालूम था कि भूतनाथ के हाथ से ऐसे-ऐसे अनुचित कार्य हुए हैं। उसने यही कहा था कि मैं राजा वीरेन्द्रसिंह का दोषी हूं और इस बात का सबूत मायारानी और उसकी सखी मनोरमा के कब्जे में है। जहां तक मुझसे बना मैंने भूतनाथ का पक्ष करके उन सबूतों को गारत कर दिया मगर मैं हैरान थी कि भूतनाथ को धमकाने, कब्जे में रखने या तबाह करने के लिए मायारानी ने इतने सबूत क्यों बटोर रक्खे हैं या उसे भूतनाथ की परवाह इतनी क्यों हुई! मगर आज उस बात का असल भेद खुल गया। इस समय मालूम हो गया कि लक्ष्मीदेवी और गोपालसिंह के साथ दगा करने में भूतनाथ शरीक था और इस बात का डर केवल भूतनाथ और दारोगा ही को नहीं था बल्कि मायारानी को भी था और वह भी अपने को भूतनाथ और दारोगा के कब्जे में समझती थी। राजा गोपालसिंह को कैद करने के बाद यह डर और भी बढ़ गया होगा और भूतनाथ ने भी उसे कुछ डराया-धमकाया या रुपये वसूल करने के लिए तंग किया होगा और उस समय भूतनाथ को अपने आधीन करने के लिए मायारानी ने यह कार्रवाई की होगी अर्थात् भूतनाथ को राजा वीरेन्द्रसिंह का दोषी ठहराने के लिए बहुत से सबूत इकट्ठे किये होंगे।

भैरोसिंह - मैं भी यही सोचता हूं।

तेजसिंह - निःसन्देह ऐसा ही है।

कमलिनी - ओफ ओह! अगर मैं पहले ही ऐसा जान गई होती तो भूतनाथ का इतना पक्ष न करती और न उसे अपना साथी ही बनाती।

देवीसिंह - मगर इधर तो उसने आपके कामों में बड़ी मेहनत की है इसलिए मुरौवत तो करनी पड़ेगी!

कमलिनी - नहीं-नहीं, मैं उसका कसूर कभी माफ नहीं कर सकती चाहे जो हो!

देवीसिंह - मगर फिर वह भी आप ही लोगों का दुश्मन हो जायेगा। जहां तक मैं समझता हूं इस समय वह अपने किए पर आप पछता रहा है।

कमलिनी - जो हो मगर यह कसूर ऐसा नहीं है जिसे मैं माफ कर सकूं। ओह, क्रोध के मारे मेरा अजब हाल हो रहा है!

तेजसिंह - उसने कसूर भी भारी किया है।

बलभद्रसिंह - अभी क्या है, अभी तो कुछ देखा ही नहीं! उसने जो किया है उसका हजारवां भाग भी अभी तक आपको मालूम नहीं हुआ है! जरा आगे की चीठियां तो पढ़िए, और इसके बाद जब वह पीतल वाला कलमदान खुलेगा तब देवीसिंहजी से पूछेंगे कि 'कहिए, भूतनाथ के साथ कैसा सलूक करना चाहिए?

इस समय बेचारी तारा (जिसको आगे से हम लक्ष्मीदेवी के नाम से लिखा करेंगे) चुपचाप बैठी लम्बी-लम्बी सांसें ले रही थी। बाप की शर्म से वह इस विषय में कुछ बोल नहीं सकती थी मगर भूतनाथ से बदला लेने का खयाल उसके दिल में मजबूती के साथ जड़ पकड़ता जा रहा था और क्रोध की आंच उसके अन्दर इतनी ज्यादा तेज होकर सुलग रही थी कि उसका तमाम बदन गर्म हो रहा था इस तरह जैसे बुखार चढ़ आया हो। आज के पहले तक वह भूतनाथ को लायक और नेक समझती थी, मगर इस समय यकायक जो बातें मालूम हुईं उन्होंने उसे अपने आपे से बाहर कर दिया था।

तेजसिंह ने चौथी चीठी पढ़ी। उसमें यह लिखा हुआ था -

''प्रिय बन्धु हेलासिंह,

बहुत दिनों से पत्र न भेजने के कारण आपको उदास न होना चाहिए। मैं इस फिक्र में लगा हूं कि किसी तरह बलभद्रसिंह और लक्ष्मीदेवी को खपा डालूं मगर अभी तक मैं कुछ न कर सका क्योंकि एक तो बलभद्रसिंह स्वयं ऐयार है दूसरे आजकल राजा गोपालसिंह की आज्ञानुसार बिहारीसिंह और हरनामसिंह भी उसके घर की हिफाजत कर रहे हैं। खैर कोई चिन्ता नहीं, देखिए तो सही क्या होता है! मैंने बलभद्रसिंह के पड़ोस में हलवाई की एक दुकान खोली है और अच्छे-अच्छे कारीगर हलवाई नौकर रक्खे हैं। बहुत-सी मिठाइयां मैंने ऐसी तैयार की हैं जिनमें दारोगा साहब का दिया हुआ अनूठा जहर बड़ी खूबी के साथ मिलाया गया है। यह जहर ऐसा है कि जिसे खाने के साथ ही आदमी नहीं मर जाता बल्कि महीनों तक बीमार रहके जान देता है। जहर खाने वाले का बदन बिल्कुल फूट जायगा और वैद्य लोग उसे देख के सिवाय इसके और कुछ भी नहीं कह सकेंगे कि यह गर्मी की बीमारी से मरा है, जहर का तो किसी को गुमान भी न होगा। मैंने उस घर की लौंडियों और नौकरों से भी मेल-जोल पैदा कर लिया है, अस्तु चाहे वे लोग कैसे भी होशियार और धूर्त क्यों न हों, मगर एक-न-एक दिन हमारी जहरीली मिठाई बलभद्रसिंह के पेट में उतर ही जायगी। आपकी लड़की बड़ी ही होशियार और चांगली है। वह सुजान के घर में बहुत अच्छे ढंग से रहती है। सुजान ने उसे अपनी भतीजी कहके मशहूर किया है और उसकी भी बातचीत चल रही है, मगर गोपालसिंह का बूढ़ा बाप बड़ा ही शैतान है। दारोगा साहब उसका नाम-निशान भी मिटाने के उद्योग में लगे हुए हैं। सब्र करो, घबराओ मत, काम अवश्य बन जायगा। आज से मैं अपना नाम बदल देता हूं, मुझे अब भूतनाथ कह के पुकारा करना।

वही - भूत.।''

इस चीठी ने सभी के दिल पर बड़ा ही भयानक असर किया, यहां तक कि देवीसिंह की आंखें भी मारे क्रोध के लाल हो गईं और तमाम बदन कांपने लगा।

तेजसिंह - बेईमान! दुष्ट! इतनी बड़ी-चढ़ी बदमाशी!

भैरोसिंह - इस हरामजदगी का कुछ ठिकाना है!

लाडिली - इस समय मेरा कलेजा फुंका जाता है। यदि भूतनाथ यहां मौजूद होता तो इसी समय अपने हृदय की आंच में उसे आहुति दे देती। परमेश्वर, ऐसे-ऐसे पापियों के साथ तू...?

कमलिनी - हाय! कम्बख्त भूतनाथ ने तो ऐसा काम किया है कि यदि वह कुत्ते से भी नुचवाया जाय तो इसका बदला नहीं हो सकता।

बलभद्रसिंह - ठीक है, मगर मैं उसकी जान कदापि न मारूंगा। मैं वही काम करूंगा जिससे मेरे कलेजे की आग ठंडी हो। ओफ...।

देवीसिंह - इधर हम लोगों के साथ मिलके भूतनाथ ने जो-जो काम किए हैं उनसे विश्वास हो गया था कि वह हम लोगों का खैरख्वाह है, हम लोग उससे बहुत ही प्रसन्न थे और...।

बलभद्रसिंह - नहीं वह ऐसे काले सांप का जहरीला बच्चा है जिसके काटे का मन्त्र ही नहीं। उसका कोई ठिकाना नहीं! बेशक वह कुछ दिन में आप लोगों को अपने आधीन करके मायारानी से मिल जाता। यह काम भी वह कभी का कर चुका होता, मगर जब से उसने मेरी सूरत देख ली है और उसे निश्चय हो गया कि मैं मरा नहीं बल्कि जीता हूं तब से उसकी अक्ल ठिकाने नहीं है, वह घबड़ा गया है और अपने बचाव की तरकीब सोच रहा है। (तेजसिह से) खैर, आगे पढ़िए, देखिए और क्या बात मालूम होती है!

तेजसिंह ने अगली चीठी पढ़ी, उसमें यह लिखा हुआ था -

''मेरे लंगोटिया यार हेलासिंह -

मालूम होता है तुम्हारा नसीबा बड़ा जबर्दस्त है। राजा गोपालसिंह का बुड्ढा बाप बड़ा ही चांगला और काइयां था। वह कम्बख्त अपने ही मन की करता था। अगर वह जीता रहता तो लक्ष्मीदेवी की शादी गोपालसिंह से अवश्य हो जाती, क्योंकि वह बलभद्रसिंह की बहुत इज्जत करता था। बलभद्रसिंह की जाति उत्तम है और जाति - पांति का खयाल वह बुड्ढा बहुत करता था। खैर आज मैं तुम्हें बधाई देता हूं कि मेरी और दारोगा की मेहनत ठिकाने लगी और वह इस दुनिया से कूच कर गया। सच तो यह है कि बड़ा भारी कांटा निकल गया। अब साल-भर के लिए शादी रुक गई और इस बीच में हम लोग बहुत कुछ कर गुजरेंगे।

वही - भूत.।''

चीठी पूरी करने के साथ ही तेजसिंह की आंखों से आंसू की बूंदें टपकने लगीं और उन्होंने एक लम्बी सांस लेकर कहा, ''अफसोस! यह बात किसी को भी मालूम न हुई कि राजा गोपालसिंह का बाप इन दुष्टों की चालबाजियों का शिकार हुआ। बेचारा बड़ा ही लायक और बात का धनी था।''

तारा यद्यपि बड़ी मुश्किल से अपने दिल को रोके हुए यह सब तमाशा देख और सुन रही थी मगर इस चीठी ने उसके साहस में विघ्न डाल दिया और उसे सभी की आंखें बचाकर आंचल के कोने से अपने आंसू पोंछने पड़े। किशोरी, कामिनी, लाडिली, कमलिनी और ऐयारों का दिल भी हिल गया और भूतनाथ की सूरत घृणा के साथ उनकी आंखों के सामने घूमने लगी। तेजसिंह ने कागज का मुट्ठा जमीन पर रख दिया और अपने दिल को सम्हालने की नीयत से सिर उठाकर सरसब्ज पहाड़ियों की तरफ देखने लगे। थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा इसके बाद तेजसिंह ने कागज का मुट्ठा उठा लिया और फिर पढ़ने लगे।

''मेरे भाग्यशाली मित्र हेलासिंह,

मुबारक हो! आज हमारी जहरीली मिठाई बलभद्रसिंह के घर में जा पहुंची। इसका जो कुछ नतीजा होगा, उसको मैं अगली चीठी में लिखूंगा। वास्तव में तुम किस्मतबर हो।

वही - भूत.।''

कमलिनी - हाय कम्बख्त, तेरा सत्यानाश हो!

लाडिली - चाण्डाल कहीं का, ऐसा सत्यानाशी और हम लोगों के साथ रहे! छीः छीः!

तारा - (तेजसिंह से) हाय, मेरा जी डूबा जाता है, मैं हाथ जोड़ती हूं। इसके बाद वाली चीठी शीघ्र पढ़िये जिससे मालूम हो कि उस विश्वासघाती की मिठाई का क्या नतीजा निकला।

सब - हां - हां, यहां पर हम लोग नहीं रुक सकते, शीघ्र पढ़िये।

तेजसिंह - मैं पढ़ता हूं -

''श्रीमान प्यारे बन्धु हेलासिंह,

खुशी मनाइये कि मेरी मिठाई ने लक्ष्मीदेवी की मां, लक्ष्मीदेवी के छोटे भाई और दो लौंडियों का काम तमाम कर दिया। बलभद्रसिंह और उसकी तीनों लड़कियों ने मिठाई नहीं खाई थी, इसलिए बच गयीं। खैर, फिर सही, जाते कहां हैं।

वही - भूत।''

इस चीठी ने तो अंधेर कर दिया। कोई भी ऐसा नहीं था जिसकी आंख से आंसू न निकल रहे हों। कमलिनी और लाडिली रोने लगीं, और लक्ष्मीदेवी तो चिल्लाकर बोली, ''हाय, इस समय मुझे लड़कपन की सब बातें याद आ रही हैं। वह समां मेरी आंखों के सामने घूम रहा है। मेरे घर में वैद्यों की धूम मची हुई थी, मेरी प्यारी मां अपने लड़के की लाश पर पछाड़ें खा रही थी, अन्त में वह भी मर गई। हम लोग रो-रोकर लाश के साथ चिपटते थे और हमारा बाप हम लोगों को खींच-खींचकर अलग करता था। हाय! क्या दुनिया में कोई ऐसी सजा है जो इस बात का पूरा बदला कहला सके!''

किशोरी - (रोकर) कोई नहीं, कोई नहीं!

कमलिनी - हाय! मेरे कलेजे में दर्द होने लगा! किस दुष्ट का जीवनचरित्र मैं सुन रही हूं! बस अब मुझमें सुनने की सामर्थ्य नहीं रही, (रोकर) ओफ, इतना जुल्म! इतना अन्धेर!

भैरोसिंह - बस रहने दीजिए, अब इस समय आगे न पढ़िये।

तेजसिंह - इस समय मैं आगे पढ़ ही नहीं सकता।

तेजसिंह ने कागज का मुट्ठा लपेटकर रख दिया और सभी को दिलासा और तसल्ली देने लगे। तेजसिंह का इशारा पाकर भैरोसिंह और देवीसिंह कई तीतर और बटेर का शिकार कर लाये और उसका कबाब तथा शोरबा बनाने लगे जिसमें सभी को खिला-पिलाकर शान्त करें।

आज खाने-पीने की इच्छा किसी की भी न थी, मगर तेजसिंह के समझाने-बुझाने से सभी ने कुछ खाया और जब शान्त हुए तो तेजसिंह ने कहा, ''अब हमको तालाब वाले मकान में चलना चाहिए।''

बलभद्रसिंह - हां, अब इस जगह रहना ठीक न होगा, मकान में चलकर जो कुछ पढ़ना या देखना हो, करिएगा।

कमलिनी - मेरी भी यही राय है। मैं देवीसिंहजी से कह चुकी हूं कि यदि मैं उस मकान में रहती तो दुश्मन हमारा कुछ भी न बिगाड़ सकते और तालाब को पाट देना तो असम्भव ही था। खैर, अब भी मैं बिना परिश्रम के उस तालाब की सफाई कर सकती हूं।

इतना कहकर कमलिनी ने तालाब वाले मकान का बहुत-सा भेद तेजसिंह को बताया और जिस तरह से तालाब की सफाई हो सकती थी वह भी कहा, जो कि हम ऊपर भी लिख आये हैं। अन्त में सभी ने निश्चय कर लिया कि घण्टे भर के अन्दर इस जगह को छोड़ देना और तालाब वाले मकान में चले जाना चाहिए।

बयान - 2

सुबह का सुहावना समय है। पहले घण्टे की धूप ने ऊंचे-ऊंचे पेड़ों की टहनियों, मकानों के कंगूरों और पहाड़ों की चोटियों पर सुनहली चादर बिछा दी है। मुसाफिर लोग दो-तीन कोस की मंजिल मार चुके हैं। तारासिंह और श्यामसुन्दरसिंह अपने साथ भगवनिया और भूतनाथ को लिए हुए तालाब वाले तिलिस्मी मकान की तरफ जा रहे हैं। उनके दोनों साथी अर्थात् भगवनिया और भूतनाथ अपने-अपने गम में सिर नीचा किए चुपचाप पीछे-पीछे जा रहे हैं। भूतनाथ के चेहरे पर उदासी और भगवनिया के चेहरे पर मुर्दनी छाई हुई है। कदाचित भूतनाथ के चेहरे पर भी मुर्दनी छाई हुई होती या वह इन लोगों में न दिखाई देता यदि उसे इस बात की खबर होती कि तारा की किस्मत वाली गठरी तेजसिंह के हाथ लग गई और तारा तथा बलभद्रसिंह का भेद खुल गया है। वह तो यही सोचे हुए था कि तारा अपने बाप को नहीं पहचानेगी, बलभद्रसिंह अपने को छिपावेगा और देवीसिंह मेरे भेदों को गुप्त रखने का उद्योग करेगा। बस इतनी ही बात थी जिससे वह एकदम हताश नहीं हुआ था और इन लोगों के साथ कमलिनी से मिलने के लिए चुपचाप सिर झुकाये हुए कुछ सोचता-विचारता जा रहा था। वह अपनी धुन में ऐसा डूबा हुआ था कि उसे अपने चारों तरफ की कुछ भी खबर न थी और उसकी वह धुन उस समय टूटी जब तारासिंह ने कहा, ''वह देखो, तालाब वाला तिलिस्मी मकान दिखाई देने लगा। कई आदमी भी नजर पड़ते हैं। मालूम पड़ता है कि कमलिनी का डेरा आ गया। अगर मेरी निगाह धोखा नहीं देती तो मैं कह सकता हूं कि यह चबूतरे के दक्षिणी कोने पर खड़े होकर जो इसी तरफ देख रहे हैं, हमारे चाचा तेजसिंह हैं!''

तेजसिंह के नाम ने भूतनाथ को चौंका दिया और उसके दिल में एक नया शक पैदा हुआ। इसके साथ ही उसके चेहरे की रंगत ने पुनः पल्टा खाया अर्थात् जर्दी के बाद सफेदी ने अपना कुदरती रंग दिखाया और भूतनाथ का कांपता हुआ पैर धीरे-धीरे आगे की तरफ बढ़ने लगा। जब ये लोग मकान के पास पहुंच गये तो भूतनाथ ने देखा कि भैरोसिंह और देवीसिंह भी अन्दर से निकल आये हैं और नफरत की निगाह से उसे देख रहे हैं। जब ये लोग तालाब के किनारे पहुंचे तो भगवनिया ने देखा कि तालाब की मिट्टी न मालूम कहां गायब हो गयी है, तालाब पूरा स्वच्छ है, और उसमें मोती की तरह साफ जल भरा हुआ दिखाई देता है। वह बड़े आश्चर्य से तालाब के जल और उसके बीच वाले मकान को देखने लगी।

भैरोसिंह उन लोगों को ठहरने का इशारा करके मकान के अन्दर गया और थोड़ी देर बाद बाहर निकला, इसके बाद डोंगी खोलकर किनारे पर ले गया और चारों आदमियों को सवार करके मकान के अन्दर ले आया।

श्यामसुन्दरसिंह और भगवानी को विश्वास था कि यह मकान हर तरह के सामान से खाली होगा, यहां तक कि चारपाई, बिछावन और पानी पीने के लिए लोटा-गिलास तक न होगा, मगर नहीं, इस समय यहां जो कुछ सामान उन्होंने देखा, वह बनिस्बत पहले के बेशकीमत और ज्यादा था। इसका कारण यह था कि दुश्मन लोग इस मकान में से वही चीजें ले गये थे जिन्हें वे लोग देख और पा सकते थे, मगर इस मकान के तहखानों और गुप्त कोठरियों का हाल उन्हें मालूम न था जिनमें एक से एक बढ़ के उम्दा चीजें तथा बेशकीमत असबाब मकान सजाने के लिए भरा हुआ था और जिन्हें इस कमलिनी ने निकालकर मकान को पहले से ज्यादा खूबसूरती के साथ सजा डाला था और भागे हुए आदमियों में से दो सिपाही और दो नौकर भी आ गये थे जो भाग जाने के बाद भी छिपे-छिपे इस मकान की खोज-खबर लिया करते थे।

तारासिंह, श्यामसुन्दरसिंह, भगवनिया और भूतनाथ उस कमरे में पहुंचाए गए जिसमें किशोरी, कामिनी, लक्ष्मीदेवी, कमलिनी, लाडिली और बलभद्रसिंह वगैरह बैठे हुए थे और किशोरी, कामिनी और लक्ष्मीदेवी सुन्दर मसहरियों पर लेटी हुई थीं।

बलभद्रसिंह को असली सूरत में देखते ही भूतनाथ चौंका और घबड़ाकर दो कदम पीछे हटा, मगर भैरोसिंह ने जो उसके पीछे था, उसे रोक लिया। बलभद्रसिंह की असली सूरत देखकर भूतनाथ को विश्वास हो गया कि उसका सारा भेद खुल गया और इस बारे में उस समय तो कुछ भी शक न रहा जब उस कागज के मुट्ठे और पीतल की सन्दूकची को भी कमलिनी के सामने देखा जो भूतनाथ की विचित्र जीवनी का पता दे रहे थे, जिस समय भूतनाथ की निगाह उनके चेहरे पर गौर के साथ पड़ी जिनसे रंज और नफरत साफ जाहिर होती थी उस समय उसके दिल में एक हौल-सा पैदा हो गया और उसकी सूरत देखने वालों को ऐसा मालूम हुआ कि वह थोड़ी ही देर में पागल हो जायगा क्योंकि उसके हवास में फर्क पड़ गया था और वह बड़ी ही बेचैनी के साथ चारों तरफ देखने लगा था।

बलभद्रसिंह - भूतनाथ, मैं अफसोस करता हूं कि तुम्हारे भेदों को कुछ दिन तक और छिपा रखने का मौका मुझे न मिला!

देवीसिंह - जिस गठरी में तारा की किस्मत बंद थी और जिसे तुम अपने सामने देख रहे हो, वह वास्तव में तेजसिंह के कब्जे में आ गई थी।

बलभद्रसिंह - जिस नकाबपोश ने तुम्हारे सामने मुझे पराजित किया था, वह तेजसिंह थे और इस समय तुम्हारी बगल में खड़े हैं। हैं - हैं! देखो, सम्हालो! पागल मत बनो।

भूतनाथ - (लड़खड़ाई हुई आवाज से) ओह! उस औरत को धोखा हुआ! उसने नकाबपोश को वास्तव में नहीं पहचाना!

भूतनाथ पागलों की तरह हाथ-मुंह फैला और आंखें फाड़-फाड़कर चारों तरफ देखने लगा और फिर चक्कर खाकर जमीन पर गिरने के साथ ही बेहोश हो गया।

तेजसिंह - बुरे कामों का यही नतीजा निकलता है।

देवीसिंह - इससे कोई पूछे कि ऐसे-ऐसे खोटे कर्म करके दुनिया में तूने क्या मजा पाया मैं समझता हूं, अब या तो यह अपनी जान दे देगा या यहां से भाग जाना पसन्द करेगा।

बलभद्रसिंह - हां, यदि इसकी एक बहुत ही प्यारी चीज मेरे कब्जे में न होती तो बेशक यह अपनी जान दे देता या भाग ही जाता। मगर अब यह ऐसा नहीं कर सकता है।

कमलिनी - वह कौन-सी चीज है?

बलभद्रसिंह - जल्दी न करो, उसका हाल भी मालूम हो जायगा।

तेजसिंह - खैर, आप यह तो बताइए कि इसके साथ क्या सलूक करना चाहिए?

बलभद्रसिंह - कुछ नहीं, इसे इसी तरह उठाकर तालाब के बाहर रख आओ और छोड़ दो, जहां जी चाहे चला जाय।

कमलिनी - (तेजसिंह से) क्या आपको मालूम है कि इसका लड़का नानक आजकल कहां है?

तेजसिंह - मुझे नहीं मालूम।

किशोरी - इसका केवल एक ही लड़का है?

तेजसिंह - क्या तुम्हें अभी तक किसी ने नहीं कहा कि भूतनाथ की पहली स्त्री से एक लड़की भी है जिसका नाम कमला है और जो तुम्हारी प्यारी सखी है हाय, मैं अफसोस करता हूं कि इस दुष्ट का हाल सुनकर उस बेचारी को बड़ा दुख होगा। मैं सच कहता हूं कि कमला ऐसी लायक लड़की बहुत कम देखने-सुनने में आवेगी।

इतना सुनते ही भैरोसिंह के चेहरे पर खुशी की निशानी दिखाई देने लगी जिसे उसने बड़ी होशियारी से तुरन्त दबा दिया और किशोरी सिर नीचा करके न मालूम क्या सोचने लगी।

तेजसिंह - (बलभद्रसिंह से) अच्छा, तो यह निश्चय हो गया कि इसे तालाब के बाहर छोड़ आया जाय?

बलभद्रसिंह - हां, मेरी राय में तो ऐसा ही होना चाहिए।

कमलिनी - क्या इसे कुछ भी सजा न दी जायगी इसका तो इसी समय सिर उतार लेना चाहिए।

बलभद्रसिंह - (ताज्जुब से कमलिनी की तरफ देख के) तुम ऐसा कहती हो मुझे आश्चर्य होता है। शायद गम ने तुम्हारी अक्ल में फर्क डाल दिया है। इसे मार डालने से क्या हमारा बदला पूरा हो जायगा?

कमलिनी ने शरमाकर सिर नीचा कर लिया और तेजसिंह का इशारा पाकर भैरोसिंह और देवीसिंह ने भूतनाथ को तालाब के बाहर पहुंचा दिया। तारासिंह और श्यामसुन्दरसिंह आश्चर्य से सभी का मुंह देख रहे थे कि यह क्या मामला है, क्योंकि इधर जो कुछ गुजरा था उसका हाल उन्हें भी मालूम न था।

ऊपर लिखे कामों से छुट्टी पाकर तेजसिंह ने तारासिंह को एक किनारे ले जाकर वह हाल सुनाया जो इधर गुजर चुका था और फिर अपने ठिकाने आ बैठे। इसके बाद कमलिनी ने बलभद्रसिंह से कहा - ''मेरा जी इस बात को जानने के लिए बेचैन हो रहा है कि इतने दिनों तक आप कहां रहे, किस स्थान में रहे और क्या करते रहे आप पर क्या-क्या मुसीबतें आयीं और हम लोगों का हाल जानकर भी आपने इतने दिनों तक हम लोगों से मुलाकात क्यों नहीं की क्या आप नहीं जानते थे कि हमारी लड़कियां कहां और किस मुसीबत में पड़ी हुई हैं'

बलभद्रसिंह - इन सब बातों का जवाब मिल जायगा, जरा सब्र करो और घबड़ाओ मत। पहले उन चीठियों को सुन जाओ, फिर इसके बाद जो कुछ तुम्हें पूछना हो पूछना और मुझे भी जो कुछ तुम्हारे विषय में मालूम नहीं है, पूछूंगा। (तेजसिंह से) यदि इस समय कोई आवश्यक काम न हो तो आप उन चीठियों को पढ़िए या पढ़ने के लिए किसी को दीजिए!

तेजसिंह - नहीं-नहीं, (कागज के मुट्ठे की तरफ देख के) इन चीठियों को मैं स्वयं पढ़ूंगा और इस समय हम लोग सब कामों से निश्चिन्त भी हैं। हां, तारासिंह को यदि कुछ...।

तारा - नहीं, मुझे कोई काम नहीं है। केवल भगवनिया के विषय में पूछना है कि इसके साथ क्या सलूक किया जाय?

तेजसिंह - इसका जवाब कमलिनी के सिवाय और कोई नहीं दे सकता।

यह कह उन्होंने कमलिनी की तरफ देखा।

कमलिनी - (भैरोसिंह से) आपको यहां का सब हाल मालूम हो चुका है। इसलिए आप ही तहखाने तक जाने की तकलीफ उठाइये।

''बहुत अच्छा'' कहकर भैरोसिंह उठ खड़ा हुआ और भगवानी की कलाई पकड़े हुए बाहर चला गया। कमलिनी ने श्यामसुन्दरसिंह से कहा, ''अब तुम्हें भी यहां न ठहरना चाहिए, बस तुरन्त चले जाओ और हमारे आदमियों को जो दुश्मन के सताने से इधर-उधर भाग गये हैं, जहां तक हो सके ढूंढो तथा हमारे यहां आ जाने की खुशखबरी सुनाओ। बस, चले ही जाओ, यहां अटकने की कोई जरूरत नहीं।''

श्यामसुन्दरसिंह चाहता था कि वह यहां रहे और उस घटनाओं का हाल पूरा-पूरा जाने जो बलभद्रसिंह और भूतनाथ से सम्बन्ध रखती हैं, क्योंकि बलभद्रसिंह को देख के भूतनाथ की जो हालत हुई थी उसे वह अपनी आंखों से देख चुका था और उसका सबब जानने के लिए बहुत ही बेचैन भी था - मगर कमलिनी की आज्ञा सुनकर उसका अथाह उत्साह टूट गया और वहां से चले जाने के लिए मजबूर हुआ। वह अपने दिल में समझे हुए था कि उसने भगवानी को पकड़ के बड़ा काम किया है, इसके बदले में कमलिनी उससे खुश होगी और उसकी तारीफ करके उसका दर्जा बढ़ावेगी, मगर वे बातें तो दूर ही रहीं कमलिनी ने उसे वहां से चले जाने के लिए कहा। इस बात का श्यामसुन्दरसिंह को बहुत रंज हुआ, मगर क्या कर सकता था। लाचार मुंह बनाकर पीछे की तरफ मुड़ा, इसके साथ ही देवीसिंह भी कमलिनी का इशारा पाकर उठे और श्यामसुन्दरसिंह को तालाब के बाहर पहुंचाने को चले।

जब श्यामसुन्दरसिंह को पहुंचाने के लिए देवीसिंह तालाब के बाहर गए तो उन्होंने देखा कि भूतनाथ जिसे बेहोशी की अवस्था में तालाब के बाहर पहुंचाया गया था, अब होश में आकर तालाब के ऊपर वाली सीढ़ी पर चुपचाप बैठा हुआ है।

देवीसिंह को इस पार आते हुए देखकर वह उठा और पास आकर देवीसिंह की कलाई पकड़कर बोला, ''मैं जो कुछ कहना चाहता हूं उसे सुन लो तब यहां से जाना।''

देवीसिंह ने कहा, ''बहुत अच्छा, कहो मैं सुनने के लिए तैयार हूं। (श्यामसुन्दरसिंह से) तुम क्यों खड़े हो गये जाओ, जो काम तुम्हारे सुपुर्द हुआ है उसे करो।'' देवीसिंह की बात सुनकर श्यामसुन्दरसिंह को और भी रंज हुआ और वह मुंह बनाकर चला गया।

देवीसिंह - (भूतनाथ से) अब जो कुछ तुम्हें कहना हो कहो।

भूतनाथ - पहले आप यह बताइये कि मुझे इस बेइज्जती के साथ बंगले के बाहर क्यों निकाल दिया?

देवीसिंह - क्या तुम स्वयम् इस बात को नहीं सोच सके?

भूतनाथ - मैं क्योंकर समझ सकता था हां इतना मैंने अवश्य देखा कि सभी की जो निगाह मुझ पर पड़ रही थी वह रंज और घृणा से खाली न थी, मगर कुछ सबब मालूम न हुआ।

देवीसिंह - क्या तुमने बलभद्रसिंह को नहीं देखा क्या उस गठरी पर तुम्हारी निगाह नहीं गई जो तेजसिंह के सामने रक्खी हुई थी और क्या तुम नहीं जानते कि उस कागज के मुट्ठे में क्या लिखा हुआ है?

भूतनाथ - तब नहीं तो अब मैं इतना समझ गया कि उस आदमी ने, जो अपने को बलभद्रसिंह बताता है मेरी चुगली की होगी और मेरे झूठे दोष दिखलाकर मुझ पर बदनामी का धब्बा लगाया होगा - मगर मैं आपको होशियार कर देता हूं कि वह वास्तव में बलभद्रसिंह नहीं है बल्कि पूरा जालिया और धूर्त है, निःसन्देह वह आप लोगों को धोखा देगा। यदि मेरी बातों का विश्वास न हो तो मैं इस बात के लिए तैयार हूं कि आप लोगों में से कोई एक आदमी मेरे साथ चले, मैं असली बलभद्रसिंह को जो वास्तव में लक्ष्मीदेवी का बाप है और अभी तक कैदखाने में पड़ा हुआ है दिखला दूंगा। मैं सच कहता हूं कि उस कागज के मुट्ठे में जो कुछ लिखा हुआ है यदि उसमें किसी तरह की मेरी बुराई है तो बिल्कुल झूठ है।

देवीसिंह - मैं केवल तुम्हारे इतना कहने पर क्योंकर विश्वास कर सकता हूं मैं तुम्हारे अक्षर अच्छी तरह पहचानता हूं जो उस कागज के मुट्ठे की लिखावट से बखूबी मिलते हैं। खैर इसे भी जाने दो, मैं यह पूछता हूं कि बलभद्रसिंह को वहां देखकर तुम इतना डरे क्यों यहां तक कि डर ने तुम्हें बेहोश कर दिया!

भूतनाथ - यह तो तुम जानते ही हो कि मैं उससे डरता हूं, मगर इस सबब से नहीं डरता कि वह कमलिनी का बाप बलभद्रसिंह है, बल्कि उससे डरने का कोई दूसरा ही सबब है जिसके विषय में मैं कह चुका हूं कि आप मुझसे न पूछेंगे और यदि किसी तरह मालूम हो जाय तो बिना मुझसे पूछे किसी पर प्रकट न करेंगे।

देवीसिंह - अच्छा इस बात का जवाब तो दो कि अगर तुम्हें यह मालूम था कि कमलिनी का बाप किसी जगह कैद है और तारा वास्तव में लक्ष्मीदेवी है जैसा कि तुम इस समय कह रहे हो तो आज तक तुमने कमलिनी को इस बात की खबर क्यों न दी या यह बात क्यों न कही कि 'मायारानी वास्तव में तुम्हारी बहिन नहीं है।'

भूतनाथ - इसका सबब यही था कि असली बलभद्रसिंह ने जो अभी तक कैद है और जिसके छुड़ाने की मैं फिक्र कर रहा हूं मुझसे कसम ले ली है कि जब तक वे कैद से न छूटें, मैं उनके और लक्ष्मीदेवी के विषय में किसी से कुछ न कहूं और वास्तव में अगर मुझ पर इतनी विपत्ति न आन पड़ती तो मैं किसी से कहता भी नहीं। मुझे इस बात का बड़ा ही दुःख है कि मैं तो अपनी जान हथेली पर रखकर आप लोगों का काम करूं और आप लोग बिना समझे-बूझे और असल बात को बिना जांचे दूध की मक्खी की तरह मुझे निकाल फेंकें। क्या मुरौवत, नेकी और धर्म इसी को कहते हैं क्या यही जवांमर्दों का काम है आखिर मुझ पर इलजाम तो लग ही चुका था, मगर मेरी और उस दुष्ट की, जो कमलिनी का बाप बन के मकान के अन्दर बैठा हुआ है, दो-दो बातें तो हो लेने देते।

भूतनाथ की बात सुनकर देवीसिंह को बड़ा ही आश्चर्य हुआ और वह कुछ देर तक सिर नीचा किए हुए सोचते रहे, इसके बाद कुछ याद करके बोले, ''अच्छा मेरी एक बात का जवाब दो।''

भूतनाथ - पूछिए!

देवीसिंह - यदि तुम्हें उस कागज के मुट्ठे से कुछ डर न था और वास्तव में जो कुछ उस मुट्ठे में तुम्हारे खिलाफ लिखा हुआ है वह झूठ है जैसा कि तुम अभी कह चुके हो तो तुम उस गठरी को देख के उस समय क्यों डरे थे जब बलभद्रसिंह ने रात के समय उस जंगल में तुम्हें वह गठरी दिखाई थी और पूछा था कि यदि कहो तो भगवानी के सामने इसे खोलूं मैं सुन चुका हूं कि उस समय इस गठरी को देखकर तुम कांप गये थे और नहीं चाहते थे कि भगवानी के सामने वह खोली जाय!

भूतनाथ - ठीक है, मगर मैं उस कागज के मुट्ठे को याद करके नहीं डरा था बल्कि मुझे इस बात का गुमान भी न था कि गठरी में कोई कागज का मुट्ठा भी है, सच तो यह है कि मैं उस पीतल की सन्दूकड़ी को याद करके डरा था जो उस समय तेजसिंह के सामने पड़ी हुई थी। मैं यही समझे हुए था कि उस गठरी के अन्दर केवल एक पीतल की सन्दूकड़ी है और वास्तव में उसकी याद से ही मैं कांप जाता हूं। उसकी सूरत देखने से जो हालत मेरी होती है सो मैं ही जानता हूं, मगर साथ ही इसके मैं यह भी कहे देता हूं कि उस पीतल की सन्दूकड़ी के अन्दर जो चीज है उससे कमलिनी, तारा और लाडिली या असली बलभद्रसिंह का कोई सम्बन्ध नहीं है। इसका विश्वास आपको उसी समय हो जायगा जब वह सन्दूकड़ी खोली जायगी।

भूतनाथ की बातों ने देवीसिंह को चक्कर में डाल दिया। वह कुछ भी नहीं समझ सकते थे कि वास्तव में क्या बात है। देवीसिंह ने जो बातें भूतनाथ से पूछीं उनका जवाब भूतनाथ ने बड़ी खूबी के साथ दिया, न तो कहीं अटका और न किसी तरह का शक रहने दिया और ये ही बातें थीं जिन्होंने देवीसिंह को तदद्दुद, परेशानी और आश्चर्य में डाल दिया था। बहुत देर गौर करने के बाद देवीसिंह ने पुनः भूतनाथ से पूछा।

देवीसिंह - अच्छा अब तुम क्या चाहते हो सो कहो!

भूतनाथ - मैं केवल इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे इस मकान में ले चलिए और तेजसिंह तथा तीनों बहिनों से कहिए कि मेरे मुकदमे की पूरी-पूरी जांच करें, आप लोगों के आगे निर्दोष होने के विषय में जो कुछ मैं सबूत दूं उसे अच्छी तरह सुनें, समझें और देखें तथा इसके बाद जो दगाबाज ठहरे उसे सजा दें, बस।

देवीसिंह - अच्छा, मैं जाकर तेजसिंह और कमलिनी से ये बातें कहता हूं, फिर जैसा वे कहेंगे किया जायगा।

भूतनाथ - तो आप एक काम और कीजिए।

देवीसिंह - वह क्या?

इसके जवाब में भूतनाथ ने अपने ऐयारी के बटुए में से एक तस्वीर निकालकर देवीसिंह के हाथ में दी और कहा, ''आप यह तस्वीर लक्ष्मीदेवी (तारा) को दिखाएं और पूछें कि तुम्हारा बाप यह है या वह दगाबाज जो सामने बैठा हुआ अपने को बलभद्रसिंह बताता है?'

देवीसिंह ने बड़े गौर से उस तस्वीर को देखा। यह तस्वीर पूरी तो नहीं मगर फिर भी बलभद्रसिंह की मूरत से बहुत-कुछ मिलती थी। भूतनाथ की बातों ने और उसके सवाल-जवाब के ढंग ने देवीसिंह के दिल पर मामूली असर पैदा नहीं किया था, बल्कि सच तो यह है कि उसने थोड़ी देर के लिए देवीसिंह की राय बदल दी थी। देवीसिंह ने सोचा कि ताज्जुब नहीं भूतनाथ बहुत-कुछ सच ही कहता हो और बलभद्रसिंह वास्तव में असली बलभद्रसिंह न हो क्योंकि जहां तक मैंने देखा है बलभद्रसिंह के मिलने से जितना जोश कमलिनी, लाडिली और तारा के दिल में पैदा हुआ था उतना बलभद्रसिंह के दिल में अपनी तीनों लड़कियों को देखकर पैदा नहीं हुआ, यह एक ऐसी बात है जो मेरे दिल में शक पैदा कर सकती है, मगर उस कागज के मुट्ठे में जितनी चीठियां भूतनाथ के हाथ की लिखी कही जाती हैं वे अवश्य भूतनाथ के हाथ की लिखी हुई हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं क्योंकि जब मैंने भूतनाथ से कहा था कि तुम्हारे अक्षर इन चीठियों के अक्षरों से मिलते हैं तो इस बात का कोई जवाब उसने नहीं दिया अस्तु इन दुष्ट कर्मों का करने वाला तो अवश्य भूतनाथ है मगर क्या यह बलभद्रसिंह भी वास्तव में असली बलभद्रसिंह नहीं है अजब तमाशा है, कुछ समझ में नहीं आता कि क्या निश्चय किया जाय।

इन सब बातों को सोचते हुए देवीसिंह वहां से रवाना हुए और डोंगी पर सवार हो मकान के अन्दर गए जहां तेजसिंह उस कागज के मुट्ठे को हाथ में लिए हुए देवीसिंह के वापस आने की राह देख रहे थे।

तेजसिंह - देवीसिंह, तुमने इतनी देर क्यों लगाई मैं कब से राह देख रहा हूं कि तुम आ जाओ तो इस मुट्ठे को खोलूं।

देवीसिंह - हां-हां, आप पढ़िये, मैं भी आ गया।

तेजसिंह - मगर यह तो कहो कि तुम्हें इतनी देर क्यों लगी?

देवीसिंह - भूतनाथ ने मुझे रोक लिया और कहा कि पहले मेरी बातें सुन लो तब यहां से जाओ।

बलभद्रसिंह - क्या भूतनाथ तालाब के बाहर अभी तक बैठा है?

देवीसिंह - हां, अभी तक बैठा है और बैठा रहेगा।

बलभद्रसिंह - सो क्यों, क्या कहता है?

देवीसिंह - वह कहता है कि मुझे कमलिनी ने बिना समझे व्यर्थ निकाल दिया, उन्हें चाहिए था कि नकली बलभद्रसिंह के सामने मेरा इन्साफ करतीं।

बलभद्रसिंह - नकली बलभद्रसिंह कैसा?

देवीसिंह - वह आपको नकली बलभद्रसिंह बताता है और कहता है कि असली बलभद्रसिंह अभी तक एक जगह कैद है, अगर किसी को शक हो तो मुझसे सवाल-जवाब कर ले।

बलभद्रसिंह - नकली और असली होने के सबूत की जरूरत है या सवाल-जवाब करने की?

देवीसिंह - ठीक है मगर उसने आपको बुलाया है और कहा है कि बलभद्रसिंह मेरी एक बात आकर सुन जाय फिर जो कुछ भी उसके जी में आवे करे।

बलभद्रसिंह - मारो कम्बख्त को, मैं अब उसकी बातें सुनने के लिए क्यों जाने लगा?

देवीसिंह - क्या हर्ज है अगर आप उसकी दो बातें सुन लें, कदाचित् कोई नया रहस्य ही मालूम हो जाय!

बलभद्रसिंह - नहीं, मैं उसके पास न जाऊंगा।

तेजसिंह - तो भूतनाथ को इसी जगह क्यों न बुला लिया जाय?

कमलिनी - हां, मैं भी यही उचित समझती हूं।

देवीसिंह - नहीं-नहीं, इससे यह उत्तम होगा कि बलभद्रसिंह खुद उससे मिलने के लिए तालाब पर जायें।

इतना कहकर देवीसिंह ने तेजसिंह की तरफ देखा और कोई गुप्त इशारा किया।

बलभद्रसिंह - उसका इस मकान में आना मुझे भी पसन्द नहीं! अच्छा मैं स्वयं जाता हूं, देखूं वह नालायक क्या कहता है।

तेजसिंह - अच्छी बात है, आप भैरोसिंह को अपने साथ लेते जाइये।

बलभद्रसिंह - सो क्यों?

देवीसिंह - कौन ठीक कम्बख्त चोट कर बैठे, आखिर गम और डर ने उसे पागल तो बना ही दिया है।

इतना कहकर देवीसिंह ने फिर तेजसिंह की तरफ देखा और इशारा किया जिसे सिवाय तेजसिंह के और कोई नहीं समझ सकता था।

बलभद्रसिंह - अजी, उस कम्बख्त गीदड़ में इतनी हिम्मत कहां जो मेरा मुकाबला करे!

तेजसिंह - ठीक है, मगर भैरोसिंह को साथ लेकर जाने में हर्ज भी क्या है! (भैरोसिंह से) जाओ जी भैरो, तुम इनके साथ जाओ।

लाचार भैरोसिंह को साथ लेकर बलभद्रसिंह बाहर चला गया। इसके बाद कमलिनी ने देवीसिंह से कहा, ''मुझे मालूम होता है कि आपने मेरे पिता को जबर्दस्ती भूतनाथ के पास भेजा है।''

देवीसिंह - हां, इसलिए कि ये थोड़ी देर के लिए अलग हो जायं तो मैं एक अनूठी बात आप लोगों से कहूं।

कमलिनी - (चौंककर) क्या भूतनाथ ने कोई नई बात बताई है?

देवीसिंह - हां भूतनाथ ने यह बात बहुत जोर देकर कही कि असली बलभद्रसिंह अभी तक कैद में है और यदि किसी को शक हो तो मेरे साथ चले मैं दिखला सकता हूं। उसने बलभद्रसिंह की तस्वीर भी मुझे दी है और कहा है कि यह तस्वीर तीनों बहिनों को दिखाओ, वे पहिचानें कि असली बलभद्रसिंह यह है या वह।

लक्ष्मीदेवी ने हाथ बढ़ाया और देवीसिंह ने वह तस्वीर उसके हाथ पर रख दी।

तारा - (तस्वीर देखकर) आह! यह तो मेरे बाप की असली तस्वीर है! इस चेहरे में तो कोई ऐसा फर्क ही नहीं है जिससे पहचानने में कठिनाई हो। (कमलिनी की तरफ तस्वीर बढ़ाकर) लो बहिन, तुम भी देख लो, मैं समझती हूं यह सूरत तुम्हें भी न भूली होगी।

कमलिनी - (तस्वीर देखकर) वाह! क्या इस सूरत को अपनी जिन्दगी में कभी भूल सकती हूं! (देवीसिंह से) क्या भूतनाथ ने इसी सूरत को दिखाने का वादा किया है?

देवीसिंह - हां, इसी को।

कमलिनी - तो क्या आपने पूछा नहीं कि तुम यह हाल पहले ही जानते थे, तो अब तक हम लोगों से क्यों न कहा?

देवीसिंह - केवल यही नहीं बल्कि मैंने कई और बातें भी उससे पूछीं।

तेजसिंह - तुममें और भूतनाथ में जो-जो बातें हुईं सब कह जाओ।

वह तस्वीर एक-एक करके सभी ने देखी और तब देवीसिंह उन बातों को दोहरा गये जो उनके और भूतनाथ के बीच में हुई थीं। उनके सुनने से सभी को ताज्जुब हुआ और सभी कोई सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए।

कमलिनी - (तारा से) बहिन, बेशक तुम इस विषय में हम लोगों से बहुत ज्यादा गौर कर सकती हो, फिर भी इतना मैं कह सकती हूं कि मेरे पिता में, जो भूतनाथ से मिलने गए हैं, और इस तस्वीर में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है।

तारा - क्या कहूं अक्ल कुछ काम नहीं करती! मैं उन्हें अच्छी तरह पहचानती हूं और इस तस्वीर को भी अच्छी तरह पहिचानती हूं। इस तस्वीर को तो हम तीन में से जो देखेगा वही कहेगा कि हमारे पिता की है, मगर इनको केवल मैं ही पहचानती हूं। जिस जमाने में मैं और ये एक ही कैदखाने में थे, उसी जमाने में इनकी सूरत-शक्ल में बहुत फर्क पड़ गया था। (चौंककर) आह, मुझे एक पुरानी बात याद आई है जो इस भेद को तुरन्त साफ कर देगी!

कमलिनी - वह क्या?

तारा - तुम्हें याद होगा कि जब हम छोटे-छोटे बच्चे थे और लाडिली बहुत ही छोटी थी तो इसे एक दफे बुखार आया था और वह बुखार बहुत ही कड़ा था यहां तक कि सरसाम हो गया था और उसी पागलपन में इसने पिताजी के मोढ़े पर दांत से काट लिया था।

कमलिनी - ठीक है, अब मुझे भी यह बात याद पड़ी। इतने जोर से दांत काटा था कि सेरों खून निकल गया था। जब तक वे हम लोगों के साथ रहे तब तक मैं बराबर उस निशान को देखती थी। मुझे विश्वास है कि सौ वर्ष बीत जाने पर भी वह दाग मिट नहीं सकता।

तारा - बेशक ऐसा ही था और हमने-तुमने मिलकर यह सलाह गांठी थी कि दांत काटने के बदले में लाडिली को खूब मारेंगे। आखिर वह लड़कपन का जमाना ही तो था!

कमलिनी - हां और यह बात हमारी मां को मालूम हो गई थी और उसने हम दोनों को समझाया था।

तारा की यह बात ऐसी थी कि इसने लड़कपन के जमाने की याद दिला दी और कमलिनी तथा लाडिली को तो इस बात में कुछ भी शक न रहा कि तारा बेशक लक्ष्मीदेवी है मगर बलभद्रसिंह के विषय में जरूर कुछ शक हो गया और उनके विषय में दोनों ने यह निश्चय कर लिया कि बलभद्रसिंह भूतनाथ से मिलकर लौटें तो किसी बहाने से उनका मोढ़ा देखा जाय, साथ ही यह भी निश्चय कर लिया कि इसके बाद ही कोई आदमी भूतनाथ के साथ जाय और उस कैदी को भी देखे, बल्कि जिस तरह बने, उसे छुड़ाकर ले आवे।

इतने ही में तालाब के बाहर से कुछ शोरगुल की आवाज आई। तेजसिंह ने पता लगाने के लिए तारासिंह को बाहर भेजा और तारासिंह ने लौटकर खबर दी कि भूतनाथ और बलभद्रसिंह में लड़ाई बल्कि यों कहना चाहिए कि जबरदस्त कुश्ती हो रही है।

यह सुनते ही कमलिनी, लाडिली, देवीसिंह और तेजसिंह बाहर चले गए और देखा कि वास्तव में वे दोनों लड़ रहे हैं और भैरोसिंह अलग खड़ा तमाशा देख रहा है। भूतनाथ और बलभद्रसिंह की लड़ाई तेजसिंह पहले ही देख चुके थे और उन्हें मालूम हो चुका था कि बलभद्रसिंह भूतनाथ से बहुत जबरदस्त है मगर इस समय जिस खूबी और बहादुरी के साथ भूतनाथ लड़ रहा था उसे देखकर तेजसिंह को ताज्जुब मालूम हुआ और उन्होंने तारासिंह की तरफ देख के कहा, ''इस समय भूतनाथ बड़ी बहादुरी से लड़ रहा है। मैं समझता हूं कि पहली दफे जब हमने भूतनाथ की लड़ाई देखी थी तो उस समय डर और घबड़ाहट ने भूतनाथ की हिम्मत तोड़ दी थी मगर इस समय क्रोध ने उसकी ताकत दूनी कर दी है, लेकिन भैरो चुपचाप खड़ा तमाशा क्यों देख रहा है?'

देवीसिंह - जो हो, पर इस समय उचित है कि पार चलके इन लोगों को अलग कर देना चाहिए, डोंगी एक ही है जो इस समय उस पार गई हुई है।

कमलिनी - सब्र कीजिए, मैं दूसरी डोंगी ले आती हूं, यहां डोंगियों की कमी नहीं है।

इतना कहकर कमलिनी चली गई और थोड़ी देर में मोटे और रोगनी कपड़े की एक तोशक उठा लाई जिसमें हवा भरने के लिए एक कोने पर सोने का पेंचदार मुंह बना हुआ था और उसी के साथ एक छोटी भाथी भी थी। तेजसिंह ने उसी भाथी से बात-की-बात में हवा भरके उसे तैयार किया और उस पर तेजसिंह और देवीसिंह बैठकर पार जा पहुंचे।

तेजसिंह और देवीसिंह को यह देखकर बड़ा ही ताज्जुब हुआ कि दोनों आदमियों का खंजर और ऐयारी का बटुआ भैरोसिंह के हाथ में है और वे दोनों बिना हर्बे के लड़ रहे हैं। तेजसिंह ने बलभद्रसिंह को और देवीसिंह ने भूतनाथ को पकड़कर अलग किया।

बलभद्रसिंह - इस नालायक कमीने को इतना करने पर भी शर्म नहीं आती, चुल्लू-भर पानी में डूब नहीं मरता और मुकाबला करने के लिए तैयार होता है!

भूतनाथ - मैं कसम खाकर कहता हूं कि यह असली बलभद्रसिंह नहीं है। वह बेचारा अभी तक कैद में है और इसी की बदौलत कैद में है। जिसका जी चाहे मेरे साथ चले, मैं दिखाने के लिए तैयार हूं।

बलभद्रसिंह - साथ ही इसके यह भी क्यों नहीं कह देता कि चीठियां भी तेरे हाथ की लिखी हुई नहीं हैं!

भूतनाथ - हां-हां, तेरे हाथ की लिखी वे चीठियां भी मेरे पास मौजूद हैं, जिनकी बदौलत बेचारा बलभद्रसिंह अभी तक मुसीबत झेल रहा है।

यह कहकर भूतनाथ ने अपना ऐयारी का बटुआ लेने के लिए भैरोसिंह की तरफ हाथ बढ़ाया।

 

बयान - 3

जिस समय भूतनाथ ने बलभद्रसिंह से यह कहकर कि 'तेरे हाथ की लिखी हुई वे चीठियां भी पास मौजूद हैं, जिनकी बदौलत बेचारा बलभद्रसिंह अभी तक मुसीबत झेल रहा है' भैरोसिंह की तरफ ऐयारी का बटुआ लेने को हाथ बढ़ाया। उस समय तेजसिंह को विश्वास हो गया कि बेशक भूतनाथ बलभद्रसिंह को दोषी ठहरावेगा मगर भैरोसिंह के हाथ से ऐयारी का बटुआ लेने के बाद भूतनाथ ने कुछ सोचा और फिर तेजसिंह की तरफ देखकर कहा -

भूतनाथ - नहीं, इस समय मैं उन चीठियों को नहीं निकालूंगा, क्योंकि यह झट इनकार कर जायगा और कह देगा कि ये चीठियां मेरे हाथ की लिखी नहीं। आप लोगों को इसके हाथ की लिखावट देखने का मौका अभी तक नहीं मिला है।

बलभद्रसिंह - नहीं-नहीं, मैं इनकार न करूंगा, तू कोई चीठी निकाल के दिखा तो सही।

भूतनाथ - हां-हां, मैं चीठियां निकालूंगा, मगर इस थोड़ी देर में मैं इस बात को सोच चुका हूं कि तेरे हाथ की लिखी हुई चीठियों को निकालना इस समय की अपेक्षा उस समय विशेष लाभदायक होगा जब मैं तेजसिंह या किसी को ले जाकर असली बलभद्रसिंह का सामना करा दूंगा। (तेजसिंह से) कहिए आप मेरे साथ चलने के लिए तैयार हैं या किसी को साथ भेजेंगे?

तेजसिंह - इस बात का फैसला कमलिनी या लक्ष्मीदेवी करेंगी। मैं तुमको पुनः इस मकान में चलने की आज्ञा देता हूं, मगर साथ-ही-साथ यह भी कह देता हूं कि देखो भूतनाथ, तुम बड़े-बड़े जुर्म कर चुके हो और इस समय भी अपने हाथ की लिखी हुई चीठियों से इनकार नहीं करते, मगर अब मैं देखता हूं कि तुम पुनः कोई नया पातक किया चाहते हो!

इतना कहकर तेजसिंह ने बलभद्रसिंह का हाथ पकड़ लिया और देवीसिंह तथा भैरोसिंह को यह कहकर मकान की तरफ रवाना हुए कि ''हम दोनों के जाने के बाद थोड़ी देर में जब हम कहला भेजें तो भूतनाथ को लेकर मकान को आना।''

बलभद्रसिंह को साथ लिए हुए तेजसिंह मकान के अन्दर आए और कमलिनी, किशोरी तथा तारा इत्यादि से सब हाल कहा।

तारा - इसमें कोई शक नहीं कि भूतनाथ झूठा, दगाबाज और परले सिरे का बेईमान हो चुका है।

कमलिनी - ठीक है (बलभद्रसिंह की तरफ देखके) आप बहुत सुस्त और पसीने-पसीने हो रहे हैं अतएव कपड़े उतारकर आराम कीजिए और ठण्डे होइए।

बलभद्रसिंह - हां, मैं भी यही चाहता हूं।

इतना कहकर बलभद्रसिंह ने कपड़े उतार डाले। उस समय लोगों का ध्यान बलभद्रसिंह के मोढ़े की तरफ गया और सभी ने उस निशान को बहुत अच्छी तरह देखा जिसे लक्ष्मीदेवी ने याद दिलाया था।

कमलिनी - (खुशी से बलभद्रसिंह का हाथ पकड़ के और लक्ष्मीदेवी की तरफ करके) देखो बहिन, यह पुराना निशान अभी तक मौजूद है। ऐसी अवस्था में मुझे कोई धोखा दे सकता है कभी नहीं।

बलभद्रसिंह - (हंसकर) इस निशान को लाडिली अच्छी तरह पहचानती होगी क्योंकि इसी ने बीमारी की अवस्था में दांत काटा था। (लम्बी सांस लेकर) अफसोस, आज और उस जमाने के बीच में जमीन-आसमान का फर्क पड़ गया है। ईश्वर, तेरी महिमा कुछ कही नहीं जाती।

बलभद्रसिंह के मोढ़े का निशान देखकर कमलिनी, लाडिली और लक्ष्मीदेवी का शक जाता रहा और इसके साथ-ही-साथ तेजसिंह इत्यादि ऐयारों को भी निश्चय हो गया कि यह बेशक कमलिनी, लक्ष्मीदेवी और लाडिली का बाप है और भूतनाथ अपनी बदमाशी और हरामजदगी से हम लोगों को धोखे में डालकर दुःख दिया चाहता है।

थोड़ी देर तक बाप-बेटियों के बीच में वैसी ही मुहब्बत-भरी बातें होती रहीं जैसी कि बाप-बेटियों में होनी चाहिए और बीच-ही-बीच में ऐयार लोग भी हां, नहीं, ठीक है, बेशक इत्यादि करते रहे। इसके बाद इस विषय पर विचार होने लगा कि भूतनाथ के साथ इस समय क्या सलूक करना चाहिए। बहुत देर तक वाद-विवाद होने पर यह निश्चय ठहरा कि भूतनाथ को कैद कर रोहतासगढ़ भेज देना चाहिए, जहां उसके किए हुए दोषों की पूरी-पूरी तहकीकात समय मिलने पर हो जायगी, हां लगे हाथ उस कागज के मुट्ठे को अवश्य पढ़कर समाप्त कर देना चाहिए जिससे भूतनाथ की बदमाशियों तथा पुरानी घटनाओं का पता लगता है - तथा इन सब बातों से छुट्टी पाकर किशोरी, कामिनी, लक्ष्मीदेवी, कमलिनी और लाडिली को रोहतासगढ़ में चलकर आराम के साथ रहना चाहिए।

ऊपर लिखी बातों में जो तै हो चुकी थीं, कई बातें कमलिनी की इच्छानुसार न थीं मगर तेजसिंह की जिद से, जिन्हें सब लोग बड़ा बुजुर्ग और बुद्धिमान मानते थे, लाचार होकर उसे भी मानना ही पड़ा।

तेजसिंह उसी समय कमरे के बारह चले गए और जफील बजाकर देवीसिंह तथा भैरोसिंह का अपनी तरफ ध्यान दिलाया। जब दोनों ऐयारों ने इधर देखा तो तेजसिंह ने कुछ इशारा किया जिससे वे दोनों समझ गए कि भूतनाथ को कैदियों की तरह बेबस करके मकान के अन्दर ले जाने की आज्ञा हुई है। देवीसिंह ने यह बात भूतनाथ से कही, भूतनाथ ने कुछ सोचकर सिर झुका लिया और तब हथकड़ी पहनने के लिए अपने दोनों हाथ देवीसिंह की तरफ बढ़ाए। देवीसिंह ने हथकड़ी और बेड़ी से भूतनाथ को दुरुस्त किया और इसके बाद दोनों ऐयार उसे डोंगी पर चढ़ाकर मकान के अन्दर ले आए। इस समय भूतनाथ की निगाह फिर उस कागज के मुट्ठे और पीतल की सन्दूकड़ी पर पड़ी और पुनः उसके चेहरे पर मुर्दनी छा गई।

तेजसिंह - भूतनाथ, तुम्हारा कसूर अब हम सब लोगों को मालूम हो चुका है। यद्यपि यह कागज का मुट्ठा अभी पूरा-पूरा पढ़ा नहीं गया, केवल चार-पांच चीठियां ही इसमें की पढ़ी गईं परन्तु इतने ही में सभी का कलेजा कांप गया है। निःसन्देह तुम बहुत कड़ी सजा पाने के अधिकारी हो, अतएव तुम्हें इस समय कैद करने का हुक्म दिया जाता है, फिर जो होगा देखा जायगा।

भूतनाथ - (कुछ सोचकर) मालूम होता है कि मेरी अर्जी पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और इस बलभद्रसिंह को सभी ने सच्चा समझ लिया है।

तेजसिंह - बेशक बलभद्रसिंह सच्चे हैं और इस विषय में अब तुम हम लोगों को धोखा देने का उद्योग मत करो, हां यदि कुछ कहना है तो इन चीठियों के बारे में कहो जो बेशक तुम्हारे हाथ की लिखी हुई हैं और तुम्हारे दोषों को आईने की तरफ साफ खोल रही हैं।

भूतनाथ - हां इन चीठियों के विषय में भी मुझे बहुत-कुछ कहना है, परन्तु आप लोगों के सामने कुछ कहना उचित नहीं समझता क्योंकि आप लोग मेरा फैसला नहीं कर सकते।

तेजसिंह - सो क्यों, क्या हम लोग तुम्हें सजा नहीं दे सकते?

भूतनाथ - यदि आप धर्म की लकीर को बेपरवाही के साथ लांघने से कुछ भी संकोच कर सकते हैं तो मेरा कहना सही है, क्योंकि आप लोगों के मालिक राजा वीरेन्द्रसिंह मेरे पिछले कसूरों को माफ कर चुके हैं और इधर राजा वीरेन्द्रसिंह का जो-जो काम मैं कर चुका हूं उस पर ध्यान देने योग्य भी वे ही हैं। इसी से मैं कहता हूं कि बिना मालिक के कोई दूसरा मेरे मुकद्दमे को नहीं देख सकता।

तेजसिंह - (कुछ देर तक सोचने के बाद) तुम्हारा यह कहना सही है। खैर जैसा तुम चाहते हो वैसा ही होगा और राजा साहब ही तुम्हारे मामले का फैसला करेंगे मगर मुजरिम को गिरफ्तार और कैद करना तो हम लोगों का काम है।

भूतनाथ - बेशक, कैद करके जहां तक जल्द हो सके, मालिक के पास ले जाना जरूर आप लोगों का काम है, मगर कैद में बहुत दिनों तक रखकर किसी को कष्ट देना आपका काम नहीं क्योंकि कदाचित वह निर्दोष ठहरे जिसे आपने दोषी समझ लिया हो।

तेजसिंह - क्या तुम फिर भी अपने को बेकसूर साबित करने का उद्योग करोगे?

भूतनाथ - बेशक मैं बेकसूर बल्कि इनाम पाने के योग्य हूं परन्तु आप लोगों के सामने जिन पर अक्ल की परछाईं तक नहीं पड़ी है मैं अब कुछ भी न कहूंगा। आप यह न समझिए मैं केवल इसी बुनियाद पर अपने को छुड़ा लूंगा कि महाराज ने मेरा कसूर माफ कर दिया है। नहीं, बल्कि मेरा मुकद्दमा कोई अनूठा रंग पैदा करके मेरे बदले में किसी दूसरे ही को कैदखाने की कोठरी का मेहमान बनावेगा।

तेजसिंह - खैर, मैं भी तुम्हें बहुत जल्द राजा वीरेन्द्रसिंह के सामने हाजिर करने का उद्योग करूंगा।

इतना कहकर तेजसिंह ने देवीसिंह की तरफ देखा और देवीसिंह ने भूतनाथ को तहखाने की कोठरी में ले जाकर बन्द कर दिया।

इस काम से छुट्टी पाकर तेजसिंह ने चाहा कि किसी ऐयार के साथ भूतनाथ और भगवनिया को आज ही रोहतासगढ़ रवाना करें और इसके बाद कागज के मुट्ठे को पुनः पढ़ना आरम्भ करें मगर उन्हें शीघ्र ही मालूम हो गया कि कोई ऐयार तब तक भूतनाथ को लेकर रोहतासगढ़ जाना खुशी से पसन्द न करेगा जब तक भूतनाथ की जन्मपत्री पढ़ या सुन न लेगा। अस्तु तेजसिंह की यही इच्छा हुई कि लगे हाथ सब कोई रोहतासगढ़ चले चलें और जो कुछ हो वहां ही हो। अन्त में ऐसा ही हुआ अर्थात् तेजसिंह की आज्ञा सभी को माननी पड़ी।

 

बयान - 4

नानक को तो हमने इस तरह भुला दिया जैसे अमीर लोग किसी से कुछ वादा करके उसे भुला देते हैं। आज अकस्मात् नानक की याद आयी है, अकस्मात् काहे, बल्कि यों कहना चाहिए कि यकायक आ पड़ने वाली आवश्यकता ने नानक की याद दिला दी है।

जमानिया प्रान्त से भागे हुए स्वार्थी नानक ने वहां से बहुत दूर जाकर अपना डेरा बसाया और यही सबब है कि आज मिथिलेश की अमलदारी में एक छोटे से शहर के मामूली मुहल्ले में मंगनी का मकान लेकर लापरवाही के साथ दिन बिताते हुए नानक को हम देखते हैं। यह शहर यद्यपि छोटा है मगर दो-तीन पढ़े-लिखे विद्यानुरागी रईसों और अमीरों के कारण जिन पर यहां की रिआया का बहुत बड़ा प्रेम है, अंगूठी का सुडौल नगीना हो रहा है।

नानक यद्यपि कंगाल नहीं था मगर बहुत ही खुदगर्ज और साथ-साथ कंजूस भी होने के कारण अपने को छिपाये हुए बहुत ही साधारण ढंग से रहा करता था, अर्थात् उसके घर में (कुत्ते-बिल्ली को छोड़) एक नौकर, एक मजदूरनी और एक उसकी जोरू के सिवाय जिसे वह न मालूम कहां से उठा लाया या ब्याह लाया था, और कोई भी नहीं रहता था। लोगों का कथन तो यही था कि नानक ने ब्याह कर अपनी गृहस्थी बसाई है मगर कई आदमियों को जो नानक के साथ ही साथ रामभोली के किस्से से भी अच्छी तरह जानकार थे, इस बात का विश्वास नहीं होता था।

नानक के लिए यह शहर नया नहीं है। जब से उसका नाम इस किस्से में आया है उसके पहले भी समय-समय पर कई दफे वह इस शहर में आकर रह चुका है। अबकी दफे यद्यपि उसे इस शहर में आए बहुत दिन नहीं हुए मगर वह इस ढंग से रह रहा है जैसे पुराना वाशिन्दा हो। वह यह भी सोचे हुए है कि उसका गुमनाम बाप, अर्थात् भूतनाथ जिसका असल हाल थोड़े ही दिन हुए, उसे मालूम हुआ है, बहुत जल्द वीरेन्द्रसिंह की बदौलत मालामाल होकर शहर में आवेगा और उस समय हम लोग बड़ी खुशी से जिन्दगी बितावेंगे मगर उसकी इस आशा को बड़ा भारी धक्का लगा जैसा कि आगे चलकर मालूम होगा।

रात पहर भर के लगभग जा चुकी है। नानक अपने मकान के अन्दर वाले दालान को बिछावन आसन और रोशनी के सामान से इस तरह सजा रहा है जैसे किसी नए या बहुत ही प्यारे मेहमान की अवाई सुनकर जाहिरदारी के शौकीन लोग सजाया करते हैं। उसकी स्त्री भी खाने-पीने के सामान की तैयारी में चारों तरफ मटकती फिरती है और थालियों को तरह-तरह के खाने तथा कई प्रकार के मांस से सजा रही है। उसकी सूरत-शक्ल और चाल-ढाल से यह भी पता लगता है कि उसे अपने मेहमान के आने की खुशी नानक से भी ज्यादा है। खैर, इस टीमटाम के बयान को तो जाने दीजिये, मुख्तसर यह है कि बात की बात में सब सामान दुरुस्त हो गया और नानक की स्त्री ने अपनी लौंडी से कहा - ''अरे, जरा आगे बढ़के देख तो सही, गज्जू बाबू आते हैं या नहीं!''

लौंडी - (धीरे से, जिसमें दूसरा कोई सुनने न पावे) बीबी जल्दी क्यों करती हो, वे तो यहां आने के लिए तुमसे भी ज्यादा बेचैन हो रहे होंगे।

बीबी - (मुस्कुराकर धीरे से) कम्बख्त - यह तू कैसे जानती है?

लौंडी - तुम्हारी और उनकी चाल से क्या मैं नहीं जानती क्या उस एकादशी की रात वाली बात भूल जाऊंगी (अपना बाजू दिखाकर) देखो यह तुम्हारी...।

लौंडी अपनी बात पूरी भी न करने पाई थी कि मटकते हुए नानक भी उसी तरफ आ पहुंचे और लाचार होकर लौंडी को चुप रह जाना पड़ा।

नानक - (सजी हुई थालियों की तरफ देख के) अरे, इसमें मुरब्बा तो रक्खा ही नहीं!

बीबी - मुरब्बा क्या खाक रखती! न मालूम कहां से सड़ा हुआ मुरब्बा उठा लाये! वह उनके खाने लायक भी है लखपती आदमी की थाली में रखते शर्म तो नहीं मालूम पड़ती!

नानक - मेरा तो दो आना पैसा उसमें लग गया और तुम्हें पसन्द ही नहीं। क्या मैं अंधा था जो सड़ा हुआ मुरब्बा उठा लाता!

बीबी - तुम्हारे अंधे होने में शक ही क्या है ऐसे ही आंख वाले होते तो रामभोली, अपनी मां और अपने बाप को पहचानने में वर्षों तक काहे झख मारते रहते?

नानक - (चिढ़कर) तुम्हारी बातें तो तीर की तरह लगती हैं! तुम्हारे तानों ने तो कलेजा पका दिया! रोज-रोज की किचकिच ने तो नाकों दम कर दिया! न मालूम कहां की कम्बख्ती आयी थी जो तुम्हें मैं अपने घर में ले आया।

बीबी - (अपने मन में) कम्बख्ती नहीं आई थी बल्कि तुम्हारा नसीब चमका था जो मुझे अपने घर में लाए! अगर मैं न आती तो ऐसे-ऐसे अमीर तुम्हारे दरवाजे पर थूकने भी नहीं आते! (प्रकट) तुम्हारी कम्बख्ती तो नहीं मेरी कम्बख्ती आई थी जो इस घर में आई! जने-जने के सामने मुंह दिखाना पड़ता है। तुम्हें तो ऐसा मकान भी न जुड़ा जिसमें मरदानी बैठक तो होती और तुम्हारे दोस्तों की खिदमत से मेरी जान छूटती। अच्छा तो तभी होता जब वही गूंगी तुम्हारे घर आती और दिन में तीन दफे झाडू दिलवाती। चलो, दूर हो जाओ मेरे सामने से, नहीं तो अभी भण्डा फोड़ के रख दूंगी।

लौंडी - बीबी, रहने भी दो, तुम तो बड़ी भोली हो, जरा-सी बात में रंज हो जाती हो!

बड़ी मुश्किल से लौंडी ने लड़ाई बन्द करवाई और इतने ही में दरवाजे पर से किसी के पुकारने की आवाज आयी। नानक दौड़ा हुआ बाहर गया। दरवाजा खोलने पर मालूम हुआ कि पांच-सात नौकरों के साथ गज्जू बाबू आ पहुंचे हैं। इनका असल नाम 'गजमेन्दुपाल' था मगर अमीर होने के कारण लोग इन्हें गज्जू बाबू के नाम से पुकारा करते थे।

नौकरों को तो बाहर छोड़ा और अकेले गज्जू बाबू आंगन में पहुंचे। नानक ने बड़ी खातिरदारी से इन्हें बैठाया और थोड़ी देर तक गपशप के बाद खाने की सामग्री उनके आगे रक्खी गई।

गज्जू बाबू - अरे, तो क्या मैं अकेला ही खाऊंगा?

नानक - और क्या!

गज्जू बाबू - नहीं, सो नहीं होगा, तुम भी अपनी थाली ले आओ और मेरे सामने बैठो।

नानक - भला खाइए तो सही, मैं आपके सामने ही तो हूं, (बैठकर) लीजिए बैठ जाता हूं।

गज्जू बाबू - कभी नहीं, हरगिज नहीं, मुमकिन नहीं! ज्यादा जिद करोगे तो मैं उठकर चला जाऊंगा!

नानक - अच्छा आप खफा न होइए, लीजिए मैं भी अपनी थाली लाता हूं।

लाचार नानक को भी अपनी थाली लानी पड़ी। लौंडी ने गज्जू बाबू के सामने नानक के लिए आसन बिछा दिया और दोनों आदमियों ने खाना शुरू किया।

गज्जू बाबू - वाह गोश्त तो बहुत ही मजेदार बना है - जरा और मंगाना।

नानक - (लौंडी से) अरे जा, जल्दी से गोश्त का बरतन उठा ला।

गज्जू बाबू - वाह-वाह, क्या दाई परोसेगी?

नानक - क्या हर्ज है?

गज्जू बाबू - वाह, अरे हमारी भाभी साहिबा कहां हैं बुलाओ साहब। जब हमारी-आपकी दोस्ती है तो पर्दा काहे का?

नानक - पर्दा तो कुछ नहीं है मगर उसे आपके सामने आते शर्म मालूम होगी।

गज्जू बाबू - व्यर्थ! भला इसमें शर्म काहे की हां अगर आप कुछ शर्माते हों तो बात दूसरी है!

नानक - नहीं, भला आपसे शर्म काहे की आप-हम तो एक-दिल एक-जान ठहरे! आपकी दोस्ती के लिए मैंने बिरादरी के लोगों तक की परवाह नहीं की।

गज्जू बाबू - ठीक है और मैंने भी अपने भाई साहब के नाक-भौं चढ़ाने का कुछ खयाल न किया और तुम्हें साथ लेकर अजमेर और मक्के चलने के लिए तैयार हो गया।

नानक - ठीक है, (अपनी स्त्री से) अजी सुनो तो सही-जरा गोश्त का बर्तन लेकर यहां आओ।

गज्जू बाबू - हां - हां, चली आओ, हर्ज क्या है। तुम तो हमारी भाभी ठहरी - अगर जिद हो तो हमसे मुंह-दिखाई ले लेना!

इतना सुनते ही छमछम करती हुई बीबी साहिबा पर्दे से बाहर निकलीं और गोश्त का बर्तन बड़ी नजाकत से लिए दोनों महापुरुषों के पास आ खड़ी हुईं।

हम यहां पर बीबी साहिबा का हुलिया लिखना उचित नहीं समझते और सच तो यह है कि लिख भी नहीं सकते क्योंकि उनके चेहरे का खास-खास हिस्सा नाममात्र के घूंघट में छिपा हुआ था। खैर जाने दीजिये, ऐसे तम्बाकू पीने के लिए छप्पर फूंकने वाले लोगों का जिक्र जहां तक कम आये अच्छा है। हम तो आज नानक को ऐसी अवस्था में देखकर हैरान हैं और कमलिनी तथा तेजसिंह की भूल पर अफसोस करते हैं। यह वही नानक है जिसे हमारे ऐयार लोग नेक और होनहार समझते थे और अभी तक समझते होंगे मगर अफसोस, इस समय यदि किसी तरह कमलिनी को इस बात की खबर हो जाती कि नानक के धर्म तथा नेक चालचलन के लम्बे-चौड़े दस्तावेज को दीमक चाट गए, अब उसका विश्वास करना या उसे सच्चा ऐयार समझना, अपनी जान के साथ दुश्मनी करना है तो बहुत अच्छा होता। यद्यपि किशोरी, कामिनी, लाडिली, लक्ष्मीदेवी और वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का दिल भूतनाथ से फिर गया है मगर नानक पर कदाचित् अभी तक उनकी दया-दृष्टि बनी हुई है।

नानक की स्त्री ने बर्तन में से दो टुकड़ा गोश्त निकालकर गज्जू बाबू की थाली में रक्खा और पुनः निकालकर थाली में रखने के लिए झुकी ही थी कि बाहर से किसी आदमी ने बड़े जोर से पुकारा, ''अजी नानकजी हैं!'' इस आवाज को सुनते ही नानक चौंक गया और उसने दाई की तरफ देख के कहा, ''जल्दी जा, देख तो सही कौन पुकार रहा है!''

दाई दौड़ी हुई दरवाजे पर गई। दरवाजा खोलकर जब उसने बाहर की तरफ देखा तो एक नकाबपोश पर उसकी निगाह पड़ी जिसने चेहरे की तरह अपने तमाम बदन को भी काले कपड़े से ढंक रक्खा था। उसके तमाम कपड़े इतने ढीले थे कि उसके अंग-प्रत्यंग का पता लगाना या इतना भी जान लेना कि यह बुड्ढा है या जवान बड़ा ही कठिन था।

दाई उसे देखकर डरी। यदि गज्जू बाबू के कई सिपाही उसी जगह दरवाजे पर मौजूद न होते तो वह निःसन्देह चिल्लाकर मकान के अन्दर भाग जाती मगर गज्जू बाबू के नौकरों के रहने से उसे कुछ साहस हुआ और उसने नकाबपोश से पूछा -

दाई - तुम कौन हो और क्या चाहते हो?

नकाबपोश - मैं आदमी हूं और नानक परसाद से मिलना चाहता हूं।

दाई - अच्छ तुम बाहर बैठो वह भोजन कर रहे हैं, जब हाथ-मुंह धो लेंगे तब आवेंगे।

नकाबपोश - ऐसा नहीं हो सकता! तू जाकर कह दे कि भोजन छोड़कर जल्दी से मेरे पास आवें। जा देर मत कर। यदि थाली की चीजें बहुत स्वादिष्ट लगती हों और जूठा छोड़ने की इच्छा न होती हो तो कह दीजियो कि 'रोहतासगढ़ का पुजारी' आया है।

यह बात नकाबपोश ने इस ढंग से कही कि दाई ठहरने या पुनः कुछ पूछने का साहस न कर सकी। किवाड़ बन्द करके दौड़ती हुई नानक के पास गई और सब हाल कहा। 'रोहतासगढ का पुजारी' आया है इस शब्द ने नानक को बेचैन कर दिया। उसके हाथ में इतनी भी ताकत न रही कि गोश्त के टुकड़े को उठाकर अपने मुंह तक पहुंचा देता। लाचार उसने घबड़ाई हुई आवाज में गज्जू बाबू से कहा - ''आधे घण्टे के लिए मुझे माफ कीजिये। उस आदमी से बातचीत करना कितना आवश्यक है सो आप इसी से समझ सकते हैं कि घर में आप ऐसा दोस्त और सामने की भरी थाली छोड़कर जाता हूं, आपकी भाभी साहिबा आपको खुले दिल से खिलावेंगी। (अपनी स्त्री से) दो-चार गिलास आसव का भी इन्हें देना।''

इतना कहकर अपनी बात का बिना कुछ जवाब सुने ही नानक उठ खड़ा हुआ। अपने हाथ से गगरी उंडेल हाथ-मुंह धो दरवाजे पर पहुंचा और किवाड़ खोलकर बाहर चला गया। यद्यपि इस समय नानक ने तकल्लुफ की टांग तोड़ डाली थी तथापि उसके चले जाने से गज्जू बाबू को किसी तरह का रंज न हुआ, बल्कि एक तरह की खुशी हुई और उन्होंने अपने दिल में कहा, 'चलो इनसे भी छुट्टी मिली।'

दरवाजे के बाहर पहुंचकर नानक ने उस नकाबपोश को देखा और बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़के मकान से कुछ दूर ले गया। जब ऐसी जगह पहुंचा जहां उन दोनों की बातें सुनने वाला कोई दिखाई नहीं दिया तब नानक ने बातचीत आरंभ की।

नानक - मैं तो आवाज ही से पहचान गया था कि मेरे दोस्त आ पहुंचे, मगर लौंडी को इसलिए दरवाजे पर भेजा था कि मालूम हो जाय कि आप किस ढंग से आए हैं और किस प्रकार की खबर लाए हैं। जब लौंडी ने आपकी तरफ से 'रोहतासगढ़ के पुजारी' का परिचय दिया, बस कलेजा दहल उठा, मालूम हो गया कि खबर जरूर भयानक होगी।

नकाबपोश - बेशक ऐसी ही बात है। कदाचित् तुम्हें यह सुनकर आश्चर्य होगा कि तुम्हारा बहुत दिनों का खोया हुआ बाप अर्थात् भूतनाथ अब मैदान की ताजी हवा खाने योग्य नहीं रहा।

नानक - हैं, सो क्यों?

नकाबपोश - उसका दुर्दैव जो बहुत दिनों तक पारे में चांदी की तरह छिपा हुआ था, एकदम प्रकट हो गया। उसने तुम्हारी मां को भी अष्टम चन्द्रमा की तरह कृपा-दृष्टि से देख लिया और साढ़ेसाती के कठिन शनि को भी तुमसे जैगोपाल करने के लिए कहला भेजा है, पर इससे यह न समझना कि ज्योतिषियों के बताये हुए दान का फल बनकर मैं तुम्हारी रक्षा के लिए आया हूं। अब तुम्हें भी यह उचित है कि आजकल के ज्योतिषियों के कर्म-भण्डार से फलित विद्या की तरह जहां तक हो सके, जल्द अन्तर्धान हो जाओ।

नानक - (डरकर) अफसोस, तुम्हारी आदत किसी तरह कम नहीं होती। दो शब्दों में पूरी हो जाने वाली बात को भी बिना हजार शब्दों का लपेट दिए तुम नहीं रहते। साफ क्यों नहीं कहते कि क्या हुआ?

नकाबपोश - अफसोस, अभी तक तुम्हारी बुद्धि की कतरनी को चाटने के लिए शान का पत्थर नहीं मिला। अच्छा, तब मैं साफ-साफ ही कहता हूं सुनो। तुम्हारे बाप का छिपा हुआ दोष बरसात की बदली में छिपे हुए चन्द्रमा की तरह यकायक प्रकट हो गया। इसी से तुम्हारी मां भी दुश्मन के काबू में, शेर के पंजे में बेचारी हिरनी की तरह पड़ गई और उसी कारण से तुम पर भी उल्लू के पीछे शिकारी बाज की तरह धावा हुआ ही चाहता है। सम्भव है कि चारपाई के खटमल की तरह जब तक कोई ढूंढ़ने के लिए तैयार हो, तुम गायब हो जाओ। मगर मेरी समझ में फिर भी गरम पानी का डर बना ही रहेगा।

नानक - (चिढ़कर) आखिर तुम न मानोगे! खैर, मैं समझ गया कि मेरे बाप का कसूर वीरेन्द्रसिंह को मालूम हो गया। परन्तु उनके, तेजसिंह के और कामिनी के मुंह से निकले हुए 'क्षमा' शब्द पर मुझे बहुत भरोसा था। यद्यपि दोष जान लेने के पहले ही उन्होंने ऐसा किया था।

नकाबपोश - नहीं-नहीं, तुम्हारे बाप ने वीरेन्द्रसिंह का जो कुछ कसूर किया था वह तो उनके ऐयारों को पहले ही मालूम हो गया था। मगर इन नये-नये प्रकट भये हुए दोषों के सामने वे दोष ऐसे थे, जैसे सूर्य के सामने दीपक, चन्द्रमा के सामने जुगनू, दिन के आगे रात या मेरे मुकाबले में तुम।

नानक - अगर तुममें यह ऐब न होता तो तुम बड़े काम के आदमी थे। देख रहे हो कि हम लोग सड़क पर बेमौके खड़े हैं, मगर फिर भी संक्षेप में बात पूरी नहीं करते!

नकाबपोश - इसका सबब यही है कि मेरा नाम संक्षेप में या अकेले में नहीं है। गोपी और कृष्ण इन दोनों शब्दों से मेरा नाम बड़े लोगों ने ठोंक मारा है। अस्तु बड़े लोगों की इज्जत का ध्यान करके मैं अपने नाम को स्वार्थ की पदवी देने के लिए सदैव उद्योग करता रहता हूं। इसी से गोपियों के प्रेम की तरह मेरी बातों का तौल नहीं होता और जिस तरह कृष्णजी त्रिभंगी थे, उसी तरह मेरे मुख से निकला प्रत्येक शब्द त्रिभंगी होता है। हां, यह तुमने ठीक कहा कि सड़क पर खड़े रहना भले मनुष्यों का काम नहीं है। अस्तु, थोड़ी दूर आगे बढ़ चलो और नदी के किनारे बैठकर मेरी बात इस तरह ध्यान देकर सुनो जैसे बीमार लोग वैद्य के मुंह से अपनी दवा का अनुपान सुनते हैं। बस, जल्द बढ़ो देर न करो, क्योंकि समय बहुत कम है, कहीं ऐसा न हो कि विलम्ब हो जाने के कारण वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग आ पहुंचें और उस चरणानुरागी पात्र की मजबूती का इल्जाम तुम्हारे माथे ठोंकें, जिसके कारण जंगली कांटों और कंकड़ियों से बचकर यहां तक वे लोग पहुंचेंगे।

नानक - (झुंझलाकर) बस माफ कीजिए, बाज आए आपकी बातें सुनने से। जिस सबब से हम पर आफत आने वाली है, उसका पता हम आप लगा लेंगे। मगर द्रौपदी के चीर की तरह समाप्त न होने वाली बातें तुमसे न सुनेंगे।

नकाबपोश - (हंसकर) शाबाश-शाबाश, जीते रहो! अब मैं तुमसे खुश हो गया, क्योंकि अब तुम भी अपनी बातों में उपमालंकार की टांग तोड़ने लगे। सच तो यों है कि तुम्हारा झुंझलाना मुझे उतना ही अच्छा लगता है, जितना इस समय भूख की अवस्था में फजली आम और अधावट दूध से भरा हुआ चौसेरा कटोरा मुझे अच्छा लगता।

नानक - तो साफ - साफ क्यों नहीं कहते कि हम भूखे हैं जब तक पेट भरकर खा न लेंगे, तब तक असल मतलब न कहेंगे।

नकाबपोश - शाबाश, खूब समझे। बेशक मैंने यही सोचा था कि तुम्हारे यहां दक्षिणा के सहित भोजन करूंगा और उन बातों का रत्ती-रत्ती भेद बता दूंगा जिनकी बदौलत तुम कुम्भीपाक में पड़ने से भी ज्यादा दुःख भोगना चाहते हो, मगर नहीं, दरवाजे पर पहुंचते ही देखता हूं कि फोड़ा फूट गया और सड़ा मवाद बह निकला है। अब तुम इस लायक न रहे कि तुम्हारा छूआ पानी भी पीया जाय। खैर, हम तुम्हारे दोस्त हैं, जिस काम के लिए आये हैं, उसे अवश्य ही पूरा करेंगे। (कुछ सोचकर) कभी नहीं, छिः-छिः, तुम नालायक से अब हम दोस्ती रखना नहीं चाहते। जो कुछ ऊपर कह चुके हैं, उसी से जहां तक अपना मतलब निकाल सको, निकाल लो और जो कुछ करते बने करो, हम जाते हैं!

इतना कहकर नकाबपोश वहां से रवाना हो गया। नानक ने उसे बहुत समझाया और रोकना चाहा। मगर उसने एक न सुनी और सीधे नदी के किनारे का रास्ता लिया तथा नानक भी अपनी बदकिस्मती पर रोता हुआ घर पहुंचा। उस समय मालूम हुआ कि उसके नौजवान अमीर दोस्त को अच्छी तरह अपनी नायाब ज्याफत का आनन्द लेकर गये हुए आधी घड़ी बीत चुकी है।

बयान - 5

सन्तति के छठवें भाग के पांचवें बयान में हम लिख आए हैं कि कमलिनी ने जब कमला को मायारानी की कैद से छुड़ाया तो उसे ताकीद कर दी कि तू सीधे रोहतासगढ़ चली जा और किशोरी की खोज में इधर-उधर घूमना छोड़कर बराबर उसी किले में बैठी रह। कमला ने यह बात स्वीकार कर ली और वीरेन्द्रसिंह के चुनारगढ़ चले जाने के बाद भी कमला ने रोहतासगढ़ को नहीं छोड़ा, ईश्वर पर भरोसा करके उसी किले में बैठी रही।

यद्यपि उस किले का जनाना हिस्सा बिल्कुल सूना हो गया था, मगर जब से कमला ने उसमें अपना डेरा जमाया, तब से बीस-पच्चीस औरतें, जो कमला की खातिर के लिए राजा वीरेन्द्रसिंह की आज्ञानुसार लौंडियों के तौर पर रख दी गई थीं, वहां दिखाई देने लगी थीं। जब राजा वीरेन्द्रसिंह यहां से चुनारगढ़ की तरफ रवाना होने लगे, तब उन्होंने भी कमला को ताकीद कर दी कि तू अपनी ऐयारी को काम में लाने के लिए इधर-उधर दौड़ना छोड़ के बराबर इसी किले में बैठी रहियो और यदि चारों तरफ की खबर लिए बिना तेरा जी न माने तो हमारे जासूसों को, जो ज्योतिषिजी की मातहती में हैं, जहां जी चाहे भेजा कीजियो। इसी तरह ज्योतिषीजी को भी ताकीद कर दी थी कि कमला की खातिरदारी में किसी तरह की कमी न होने पावे तथा यह जिस समय जो कुछ चाहे उसका इन्तजाम कर दिया करना और इसमें भी कोई शक नहीं कि पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी ने कमला की बड़ी खातिर की। कमला बड़े आराम से यहां रहने लगी और जासूसों के जरिये से जहां तक हो सकता था, चारों तरफ की खबर भी लेती रही।

आज बहुत दिनों के बाद कमला के चेहरे पर हंसी दिखाई दे रही है। आज वह बहुत खुश है, बल्कि यों कहना चाहिए कि आज उसकी खुशी का अन्दाजा करना बहुत ही कठिन है, क्योंकि पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी ने तेजसिंह के हाथ की लिखी चीठी कमला के हाथ में दी और जब कमला ने उसे खोलकर पढ़ा तो यह लिखा हुआ पाया -

''मेरे प्यारे दोस्त ज्योतिषीजी,

आज हम लोगों के लिए बड़ी खुशी का दिन है, इसलिए कि हम ऐयार लोग किशोरी, कामिनी, कमलिनी, लाडिली और तारा को एक साथ लिए हुए रोहतासगढ़ की तरफ आ रहे हैं, अस्तु जहां तक हो सके पालकियों और सवारियों के अतिरिक्त कुछ फौजी सवारों को भी साथ लेकर तुम स्वयं 'डहना' पहाड़ी के नीचे हम लोगों से मिलो।

तुम्हारा दोस्त -

तेजसिंह।''

इस चीठी के पढ़ते ही कमला हद से ज्यादा खुश हो गई और उसकी आंखों से गर्म-गर्म आंसुओं की बूंदें गिरने लगीं, गला भर आया और कुछ देर तक बोलने या कुछ पूछने की सामर्थ्य न रही। इसके बाद अपने को सम्हालकर उसने कहा -

कमला - यह चीठी आपको कब मिली आप अभी तक गए क्यों नहीं?

ज्योतिषी - यह चीठी मुझे अभी मिली है। मैं तेजसिंहजी के लिखे बमूजिब इन्तजाम करने का हुक्म देकर तुम्हारे पास खबर करने के लिए आया हूं और अभी चला आऊंगा।

कमला - आपने बहुत अच्छा किया, मैं भी उनसे मिलने के लिए ऐसे समय अवश्य चलूंगी, मगर मेरे लिए भी पालकी का बन्दोबस्त कर दीजिए, क्योंकि ऐसे समय में दूसरे ढंग पर वहां जाने से मालिक की इज्जत में बट्टा लगेगा।

ज्योतिषीजी - बेशक ऐसा ही है, मैं पहले ही से सोच चुका था कि तुम हमारे साथ चले बिना न रहोगी, इसलिए तुम्हारे वास्ते भी इन्तजाम कर चुका हूं। पालकी ड्यौढी पर आ चुकी होगी, बस तैयार हो जाओ, देर मत करो।

कमला झटपट तैयार हो गई और ज्योतिषीजी ने भी तेजसिंह के लिखे बमूजिब सब तैयारी बात की बात में कर ली। घण्टे भर ही के बाद रोहतासगढ़ पहाड़ के नीचे पांच सौ सवार चांदी-सोने के काम की पालकियों को बीच में लिए हुए 'डहना' पहाड़ी की तरफ जाते हुए दिखाई दिए और पहर भर के बाद वहां जा पहुंचे, जहां तेजसिंह, किशोरी इत्यादि को एक गुफा के अन्दर बैठाकर ऐयारों तथा बलभद्रसिंह को साथ लिए ज्योतिषीजी का इन्तजार कर रहे थे। तेजसिंह तथा ऐयार लोग खुशी-खुशी ज्योतिषीजी से मिले। कमला की पालकी उस गुफा के पास पहुंचाई गई जिसमें किशोरी और कमलिनी इत्यादि थीं और कहार सब वहां से अलग कर दिए गए।

वह गुफा जिसमें कमलिनी और किशोरी इत्यादि थीं, ऐसी तंग न थी कि उनको किसी तरह की तकलीफ होती, बल्कि वह एक आड़ की जगह में और बहुत ही लम्बी-चौड़ी थी और उसमें चांदना बखूबी पहुंच रहा था। तारासिंह की जुबानी जब किशोरी ने यह सुना कि कमला भी आई है तो उससे मिलने के लिए बेचैन हो गई और जब तक वह पालकी के अन्दर से निकले तब तक किशोरी स्वयं खोह के बाहर निकल आई। कमला ने किशोरी को देखा तो बड़े जोर और मुहब्बत से लपककर किशोरी के गले से लिपट गई और किशोरी ने भी बड़े प्रेम से उसे दबा लिया तथा दोनों की आंखों से आंसुओं की बूंदें टपाटप गिरने लगीं। कमलिनी ने दोनों को अलग किया और कमला को अपने गले से लगा लिया। इसके बाद कामिनी, लाडिली और तारा भी बारी-बारी कमला से मिलीं। उस समय सभी के चेहरे खुशी से दमक रहे थे और सभी के दिल की कली खिली जाती थी। किशोरी, कामिनी, तारा और लाडिली को मालूम हो चुका था कमला, भूतनाथ की लड़की है और वे सब भूतनाथ से बहुत रंज थीं। मगर कमला की तरफ से किसी का दिल मैला न था, बल्कि कमला को देखने के साथ ही उन पांचों के दिल में ऐसी मुहब्बत पैदा हो गई, जैसी सच्चे प्रेमियों के दिल में हुआ करती है। मगर अफसोस कि अभी तक कमला को इस बात की खबर नहीं हुई कि भूतनाथ उसका बाप है और उसने बड़े-बड़े कसूर किए हैं।

किशोरी, कमलिनी और कमला इत्यादि की मुहब्बत भरी बातचीत कदापि पूरी न होती, यदि तेजसिंह वहां पहुंचकर यह न कहते कि ''अब तुम लोगों को यहां से बहुत जल्दी चल देना चाहिए जिससे सूर्यास्त के पहले ही रोहतासगढ़ पहुंच जाएं।'' पालकियां गुफा के आगे रखी गईं। कमलिनी, किशोरी, कामिनी, कमला, लाडिली और तारा उन पर सवार हुईं। कहारों को आकर पालकी उठाने का हुक्म दिया गया और खुशी-खुशी सब कोई रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए।

सूर्य अस्त होने के पहले ही सवारी रोहतासगढ़ किले के अन्दर दाखिल हो गई। किले का जनाना भाग आज फिर रौनक हो गया। मगर महल में पैर रखते ही एक दफे किशोरी का कलेजा दहल उठा, क्योंकि इस समय उसने पुनः अपने को उसी मकान में पाया जिसमें कुछ दिन पहले बेबसी की अवस्था में रहकर तरह-तरह की तकलीफें उठा चुकी थी और इसके साथ-ही-साथ उसको लाली और कुन्दन की बातें याद आ गईं। केवल किशोरी ही को नहीं, बल्कि लाडिली को भी वह जमाना याद आ गया क्योंकि यही लाडिली लाली बनकर उन दिनों इस महल में रहती थी जिन दिनों किशोरी यहां मुसीबत के दिन काट रही थी। लाडिली तो किशोरी को पहचानती थी, मगर किशोरी को इस बात का गुमान न था कि वह लाली वास्तव में यही लाडिली थी, जो आज हमारे महल में दाखिल है।

महल में पैर रखने के साथ ही किशोरी को वे पुरानी बातें याद आ गईं और इस सबब से उसके खूबसूरत चेहरे पर थोड़ी देर के लिए उदासी छा गई, साथ ही पुरानी बातें याद आ जाने के कारण लाडिली की निगाह भी किशोरी के चेहरे पर जा पड़ी। वह उसकी अवस्था को देखकर समझ गई कि इस समय इसे पुरानी बातें भी याद आ गई हैं। उन्हीं बातों को खुद भी याद करके इस समय अपने को और किशोरी को मालिक की तरह या दूसरे ढंग से इस मकान में आए देख के और किशोरी के चेहरे पर ध्यान पड़ने से लाडिली को हंसी आ गई। उसने चाहा कि हंसी रोके परन्तु रोक न सकी और खिलखिलाकर हंस पड़ी जिससे किशोरी को कुछ ताज्जुब हुआ और उसने लाडिली से पूछा -

किशोरी - क्यों, तुम्हें हंसी किस बात पर आई?

लाडिली - यों ही हंसी आ गई।

किशोरी - ऐसा नहीं है, इसमें जरूर कोई भेद है, क्योंकि कई दिनों से हमारा तुम्हारा साथ है पर इस बीच में व्यर्थ हंसते हुए हमने तुम्हें कभी नहीं देखा। बताओ, सही बात क्या है?

लाडिली - तुम्हें विचित्र ढंग से घबड़ाकर चारों तरफ देखते हुए देखकर मुझे हंसी आ गई।

किशोरी - केवल यही बात नहीं है, जरूर कोई दूसरा सबब भी इसके साथ है।

कमलिनी - मैं समझ गई! बहिन, मुझसे पूछो, मैं बताऊंगी! बेशक लाडिली के हंसने का दूसरा सबब है जिसे वह शर्म के मारे नहीं कहना चाहती।

किशोरी - (कमलिनी की कलाई पकड़कर) अच्छा बहिन, तुम ही बताओ कि इसका क्या सबब है?

कमलिनी - इसके हंसने का सबब यही है कि जिन दिनों तुम इस मकान में बेबसी और मुसीबत के दिन काट रही थीं, उन दिनों यह लाडिली भी यहां रहती थी और इससे-तुमसे बहुत मेल-मिलाप था।

किशोरी - (ताज्जुब से) तुम भी हंसी करती हो! क्या मैं ऐसी बेवकूफ हूं जो महीनों तक इस महल में लाडिली के ही साथ रही और फिर भी उसे पहचान न सकूं!

कमलिनी - (हंसकर) यह तो मैं नहीं कहती हूं कि उन दिनों इस महल में लाडिली अपनी असली सूरत में थी! मेरा मतलब लाली से है, वास्तव में यह लाडिली उन दिनों लाली बनकर यहां रहती थी।

किशोरी - (ताज्जुब से घबड़ाकर और लाडिली को पकड़कर) हैं! क्या वास्तव में लाली तुम ही थीं?

लाडिली - इसके जवाब में 'हां' कहते मुझे शर्म मालूम होती है। अफसोस उन दिनों मेरी नीयत आज की तरह साफ न थी क्योंकि मैं दुष्टा मायारानी के आधीन थी। उसे मैं अपनी बड़ी बहिन समझती थी और उसी की आज्ञानुसार एक काम के लिए यहां आई थी।

किशोरी - ओफ ओह! तब तो आज बड़े-बड़े भेदों का पता लगेगा जिन्हें याद करके मेरा जी बेचैन हो जाता था और इस सबब से मैं और भी परेशान थी कि उन भेदों का असल मतलब कुछ मालूम न होता था, अब तो मैं बहुत कुछ तुमसे पूछूंगी और तुम्हें बताना पड़ेगा।

कमलिनी - हां-हां, तुम्हें सब-कुछ मालूम हो जायगा, मगर घबड़ाती क्यों हो, इस समय हम लोगों को केवल यही काम है कि ईश्वर को धन्यवाद दें जिसकी कृपा से हम लोग हजारों दुःख उठाकर ऐसी जगह आ पहुंचे हैं जहां हमारे दुश्मन रहते थे और जिसे अब हम अपना घर समझते हैं।

लाडिली - (किशोरी से) बेशक ऐसा ही है, केवल एक यही बात नहीं और भी कई अद्भुत बातें तुम्हें मालूम होंगी। जरा सब्र करो, सफर की हरारत मिटाओ और आराम करो, जल्दी क्यों करती हो!

बयान - 6

रात का समय है और चांदनी छिटकी हुई। आसमान पर कहीं-कहीं छोटे बादलों के टुकड़े दौड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं जिनमें कभी-कभी चन्द्रमा छिपता और फिर तेजी के साथ निकल आता है। इस समय रोहतासगढ़ किले के चारों तरफ की मनभावन छटा बहुत भली मालूम पड़ती है। महल की छत पर किशोरी, कामिनी, कमलिनी, लाडिली, लक्ष्मीदेवी और कमला टहलती हुई चारों तरफ की कैफियत देख रही हैं। इस समय की शोभा, छटा या प्राकृतिक अवस्था जो कुछ भी कहें उन सबके दिल पर जुदे ढंग का असर कर रही है। कमलिनी अपने ध्यान में डूबी हुई, लक्ष्मीदेवी कुछ और ही सोच रही है, लाडिली किसी दूसरे ही सम्भव-असम्भव के विचार में पड़ी है, किशोरी और कामिनी अलग ही मन के लड्डू बना रही हैं। मगर कमला के दिल का कोई ठिकाना नहीं। उसने जब से यह सुन लिया है कि भूतनाथ गिरफ्तार करके रोहतासगढ़ के कैदखाने में डाल दिया गया है तब से वह तरह-तरह की बातें सोच रही है। भूतनाथ वास्तव में कौन है उसने क्या कसूर किया वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग उससे खुश थे - फिर यकायक रंज क्यों हो गए और यह तारा कभी-कभी लक्ष्मीदेवी के नाम से क्यों पुकारी जाती है। कमलिनी तारा का अदब क्यों करने लग गई इत्यादि बातों को जानने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा है मगर अभी तक किसी ने इन बातों का जिक्र उससे न किया है। हां, इस समय इन्हीं विषयों पर बात करने का वादा है परन्तु कमला इसी बात का मौका ढूंढ़ रही है कि ये सब एक ठिकाने बैठ जायं तो बातों का सिलसिला छेड़ा जाय।

घण्टे - भर तक टहल-टहलकर चारों ओर देखने के बाद सबकी सब एक ठिकाने फर्श पर बैठ गईं और कमला ने बातचीत करना आरम्भ कर दिया।

कमला - (किशोरी से) क्यों बहिन! भूतनाथ तो राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों के साथ मिल-जुलकर काम करता था और सब कोई उससे खुश थे, फिर यकायक यह क्या हो गया कि उसे कैदखाने की गर्म हवा खानी पड़ी?

किशोरी - इसका हाल कमलिनी बहिन से पूछो।

कामिनी - क्योंकि वह इन्हीं का ऐयार था और इन्हीं की आज्ञानुसार काम करता था।

कमलिनी - (हंसकर) किसी का ऐयार था या किसी का बाप था, इससे क्या मतलब जो था सो था - अब न कोई उसे अपना ऐयार बनाना पसन्द करेगा और न कोई अपना बाप कहना स्वीकार करेगा।

किशोरी - (मुस्कुराकर) जिस तरह अब तुम मायारानी को अपनी बहिन कहना उचित नहीं समझतीं।

कमलिनी - नहीं-नहीं, इस तरह और उस तरह में तो बड़ा फर्क है। कम्बख्त मायारानी तो वास्तव में हमारी बहिन है ही नहीं!

कमला - (ताज्जुब से) मायारानी तुम्हारी बहिन नहीं है फिर तुमने मुझसे क्यों कहा था कि 'मायारानी हमारी बड़ी बहिन है!'

कमलिनी - तब तक मैं उसका असल हाल नहीं जानती थी, उसी तरह जिस तरह तुम भूतनाथ का असल हाल नहीं जानतीं और जब जान जाओगी तो न मालूम तुम्हारे दिल का क्या हाल होगा। खैर, वह सब जो कुछ हो लेकिन भूतनाथ का सच्चा-सच्चा हाल कभी-न-कभी तुम्हें मालूम हो ही जायगा। मगर देखो बहिन, दुनिया में कोई किसी के दोष का भागी नहीं हो सकता। जिस तरह ईमानदार बाप बदनीयत लड़के के दोष से दोषी नहीं हो सकता उसी तरह धर्मात्मा लड़का अपने कपटी कुटिल तथा कुचाली बाप के कामों का उत्तरदायी नहीं हो सकता। हर एक आदमी अपने किए का फल आप ही भोगेगा, उसके बदले में उसका कोई नातेदार या मित्र दण्ड नहीं पा सकता, पर हां बचाव में मदद जरूर कर सकता है, इसी के साथ-ही-साथ यह भी बंधी हुई बात है कि अच्छे और बुरे का साथ बहुत दिनों तक निभ नहीं सकता चाहे वह आपस में दोस्त हों या भाई हों या बाप-बेटे हों, क्योंकि दोनों की प्रकृति में भेद रहता है और जब तक दोनों की प्रकृति एक या कुछ-कुछ मिलती-जुलती न हो, प्रेम नहीं हो सकता।

कमला - क्षमा करना, क्योंकि मैं बीच ही मैं टोकती हूं - तब लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि 'बुरे की सोहबत करने से अच्छा आदमी भी बुरा हो जाता है

कमलिनी - ठीक है, जहां तक मैं समझती हूं किसी एक बुरे आदमी की सोहबत में कोई एक भला आदमी बुरा नहीं हो सकता, बल्कि एक बुरा आदमी किसी एक भले आदमी के साथ से कुछ सुधर सकता है - क्योंकि मन एक शुद्ध पदार्थ होता है। यदि वह किसी तरह के दबाव में न पड़ जाय या किसी तरह की जरूरियात उसे मजबूर न करें तो वह बराबर सचाई ही की तरफ ढुलकता रहता है - हां, यदि कोई एक अच्छे चालचलन का आदमी चार-पांच या दस-बीस बदमाशों की सोहबत में बैठे, तो निःसन्देह वह कुचाली हो ही जायगा क्योंकि बहुत से नापाक दिल मिल-जुलकर उस पाक-दिल पर जबर्दस्त हो जायेंगे - और सच तो ये है कि सोहबत एक आदमी के संग को नहीं कहते बल्कि कई आदमियों के झुण्ड में मिलकर बैठने का नाम सोहबत है। हां, तो मैं क्या कह रही थी, जब तुमने टोका था - बिल्कुल ही भूल गई! इसी से कहते हैं कि बातों के सिलसिले में टोकना अच्छा नहीं होता।

कमला - ठीक है, तभी तो मैंने पहले ही क्षमा मांग ली थी। खैर, जाने भी दो। मैं तुम्हारी बातों का मतलब पा गई कि तुम भूतनाथ को मेरा नातेदार बनाना चाहती हो।

कमलिनी - मैं क्यों बनाना चाहती हूं! ईश्वर ही ने उसे तुम्हारा नातेदार बनाया है, खैर, मैं सबसे पहले तुमसे नानक का हाल कहती हूं। नानक ने अपना हाल स्वयं ही तेजसिंह से कहा था और मैं उस समय छिपकर उसे सुन रही थी। इसके बाद और लोगों को भी वह हाल मालूम हुआ।

तब कमलिनी ने पिछला बहुत-सा हाल जो गुजर चुका था वह कह सुनाया और तब तेजसिंह का पागल बन के मायारानी के बाग में जाना और वहां की कैफियत जनाना, नानक का हाल, चंडूल की दिल्लगी, भूतनाथ और शेरसिंह का रंग-ढंग तथा बाकी का सब हाल भी कहा जिसे बड़े गौर और आश्चर्य से सब सुनती रहीं। इस समय कमला के दिल की अजब हालत थी, उसकी आंखों के सामने उसके लड़कपन का जमाना घूम रहा था। वह उस समय की बातों को अच्छी तरह याद कर-करके सोच रही थी जब उसकी मां जीती थी और उसका बाप बहुत दिनों तक गैरहाजिर रहा करता था। अन्त में उसका बाप यकायक गायब हो गया था और किसी अनजान आदमी ने उसके मरने की खबर कमला के नाना को पहुंचाई थी। उन दिनों कमला के बाप के बारे में तरह-तरह की खबरें उड़ रही थीं। आखिर जब कमला का चाचा शेरसिंह कमला के घर गया और उसने स्वयं कहा कि 'बेशक कमला का बाप मेरे सामने मरा और मैंने ही उसकी दाह-क्रिया की है', तब सभी को उसके मरने का विश्वास हुआ था।

कमला - हां, तो इस किस्से से साबित होता है बल्कि मेरा दिल गवाही देता है कि भूतनाथ मेरा रिश्तेदार है।

कमलिनी - बेशक ऐसा ही है।

कमला - तो साफ-साफ जल्दी क्यों नहीं कह देतीं कि वह मेरा कौन है यद्यपि मैं समझ गई हूं तथापि अपने मुंह से कुछ कह नहीं सकती।

कमलिनी - अच्छा, तो मैं कहे देती हूं कि वह तुम्हारा बाप है और नानक तुम्हारा भाई।

कमला - तो उसने अपने मरने की झूठी खबर क्यों मशहूर की थी नानक के किस्से से तो केवल इतना ही जाना जाता है कि राजा वीरेन्द्रसिंह के यहां चोरी करने के कारण उसे ऐसा करना पड़ा था।

कमलिनी - पहले तो मैं भी ऐसा ही समझती थी और भूतनाथ ने भी इसके सिवा और कोई सबब अपने गायब होने का नहीं कहा था, मगर अब जो बातें मालूम हुई हैं वे बहुत ही भयानक हैं और इस योग्य हैं कि उनका फल भोगने के डर से उसका जहां तक हो अपने को छिपाना उचित ही था। ओफ! भूतनाथ ने मुझे बड़ा धोखा दिया। अगर भूतनाथ के कागजात जो मनोरमा के कब्जे में थे और जो मेरे उद्योग से भूतनाथ को मिल गये थे, इस समय मौजूद होते तो बेशक बहुत-सी बातों का पता लगता, मगर अफसोस! अपनी भूल का दण्ड सिवाय अपने और किसको दूं?

कमला - बहिन, चाहे जो हो मैं अपनी मां की नसीहत कदापि भूल नहीं सकती और न उसके विपरीत ही कुछ कर सकती हूं। ईश्वर उसकी आत्मा को सुखी करे, वह बड़ी ही नेक थी। जिस समय चाचा ने मेरे बाप के मरने की खबर पहुंचाई थी, उस समय वह बहुत ही बीमार थी। सब लोग तो रोने-पीटने लगे, मगर उसकी आंखों में आंसू की बूंद भी दिखाई नहीं दी। इसका कारण लोगों ने यही बताया कि रंज बहुत ज्यादा है जिससे यह बेसुध हो रही है, मगर मेरी मां ने मुझे चुपके से बुला के समझाया और यह भी कहा कि ''बेटी! मैं खूब समझती हूं कि तेरा बाप मरा नहीं है, बल्कि कहीं छिपा बैठा है, और वास्तव में उसका चाल-चलन ऐसा नहीं कि वह हम लोगों को अपना मुंह दिखाए मगर क्या किया जाय वह मेरा पति है, किसी के आगे उसकी निन्दा करना मेरा धर्म नहीं है। मैं खूब समझती हूं कि अबकी दफे की बीमारी से मैं किसी तरह बच नहीं सकती, इसीलिए तुझे समझाती हूं कि यदि कदाचित् तेरा बाप तुझे मिल जाय तो तू उससे किसी तरह की भलाई की आशा न रखना। हां, तेरा चाचा बहुत ही लायक है, वह सिवाय भलाई के तेरे साथ बुराई कभी न करेगा, मगर मेरी समझ में नहीं आता कि उसने स्वयं अपने भाई के मरने की झूठी खबर क्यों उड़ाई खैर, जो हो मैं अपने सिर की कसम देकर कहती हूं कि तू अपने चाल-चलन को बहुत सम्हाले रहना और वही काम करना जिसमें किशोरी का भला हो, क्योंकि उसका नमक मेरे और तेरे रोम-रोम में भिदा हुआ है - और साथ ही मुझे इस बात का भी पूरा विश्वास है कि किशोरी तुझे जी से चाहती है और वह जो कुछ करेगी तेरे लिए सब अच्छा ही करेगी। बाकी रही किशोरी की मां और किशोरी का नाना, सो किशोरी की मां एक ऐसे आदमी के पाले पड़ी है कि जिसके मिजाज का कोई ठिकाना नहीं, ताज्जुब नहीं कि किसी दिन उसे खुद अपनी जान दे देनी पड़ जाय, और किशोरी का नाना परले सिरे का क्रोधी है, अतएव सिवाय किशोरी के तुझे सहारा देने वाला मुझे कोई दिखाई नहीं देता।''

इतना सुनते-सुनते किशोरी को अपनी मां याद आ गयी और उसकी आंखों से टप-टप आंसू की बूंदें गिरने लगीं। कमला का भी यही हाल था। कमलिनी ने दोनों के आंसू पोंछे और समझा-बुझाकर दोनों को शान्त किया। थोड़ी देर तक बातचीत बन्द रही, इसके बाद फिर शुरू हुई।

कमला - (कमलिनी से) तो क्या मैं सुन सकती हूं कि मेरे बाप ने क्या काम किये हैं जिनके लिए आज उसको यह दिन देखना पड़ा?

कमलिनी - हां-हां, मैं वह सब हाल तुमसे कहूंगी, मगर कमला, तुम यह न समझना कि उसके सबब से हम लोगों के दिल में तुम्हारी मुहब्बत कम हो जायगी।

किशोरी - नहीं-नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता! मैं तुम्हारी नेकियों को कदापि नहीं भूल सकती। तुमने मेरी जान बचाई, तुमने दुःख के समय मेरा साथ दिया, और तुम्हारे ही भरोसे पर मैंने जो जी में आया किया।

लक्ष्मीदेवी - (कमला से) यद्यपि मेरा-तुम्हारा साथ नहीं हुआ है, परन्तु मैं तुम्हारे दिल को इन्हीं दो-चार दिनों में अच्छी तरह समझ गई हूं। निःसन्देह तुम्हारी दोस्ती कदर करने लायक है और यह बात तो हम लोग अच्छी तरह जानते हैं कि तुमने किशोरी के लिए बहुत तकलीफ उठाई, इससे ज्यादा कोई किसी के लिए नहीं कर सकता।

कमला - मैंने किशोरी के लिए कुछ भी नहीं किया, जो कुछ किया किशोरी की मुहब्बत ने किया है। मैं तो केवल इतना जानती हूं कि मेरी जिंदगी किशोरी की जिंदगी के साथ है। यदि वह खुश है तो मैं भी खुश हूं, इसे दुःख है तो मुझे भी रंज है। और फिर मैं किस लायक हूं! मगर उस समय बेशक मुझे बड़ा दुःख होगा जब किसी को यह कहते सुनूंगी कि 'कमला का बाप दुष्ट था।' हाय, जिसके साथ मैं जान देने के लिए तैयार हूं, उसी के साथ मेरा बाप बुराई करे!

कमलिनी - नहीं-नहीं, कमला तुम्हारे बाप ने किशोरी के साथ कोई बुराई नहीं की बल्कि उसने हम तीनों बहिनों के साथ बुराई की है जिन्हें तुम थोड़े दिन पहले जानती भी नहीं थीं। अतएव तुम्हें रंज न करना चाहिए, फिर मैं यह भी उम्मीद करती हूं कि राजा वीरेन्द्रसिंह भूतनाथ का कसूर माफ कर देंगे।

लक्ष्मीदेवी - बहिन, इन बातों को जाने भी दो! चाहे भूतनाथ ने हम लोगों के साथ कैसी ही बुराई क्यों न की हो, मगर हम लोग उसे अवश्य माफ करेंगे क्योंकि कमला को किसी तरह उदास नहीं देख सकते। कमला, तू मेरी सगी बहिन से बढ़कर है! जब कि किशोरी तुझे अपना मानती है तो निःसन्देह हम लोग उससे बढ़कर मानेंगी। सच तो यह है कि आज हम लोग जिन सुखों की आशा कर रहे हैं, वे सब किशोरी के चरणों की बदौलत हैं।

इतना कहकर लक्ष्मीदेवी ने कमला को गले लगा लिया और उसके आंसू पोंछे, क्योंकि इस समय उसकी आंखों से बेअन्दाज आंसू बह रहे थे। किशोरी भी रो रही थी, लक्ष्मीदेवी, लाडिली और कमलिनी की आंखें भी सूखी न थीं। कमलिनी ने सभी को समझाया और बातों का रंग-ढंग बदल देने की कोशिश की। थोड़ी देर तक सन्नाटा रहने के बाद सभी ने एक-एक करके अपना हाल कहना शुरू किया यहां तक कि आज की तीन पहर रात बातों में ही बीत गई और इसके बाद एक नई घटना ने सभी को चौंका दिया।

बयान - 7

रात पहर भर से कम रह गई थी जब किशोरी, कामिनी, कमला, लक्ष्मीदेवी, लाडिली और कमलिनी की बातें पूरी हुईं और उन्होंने चाहा कि अब उठकर नीचे चलें और दो घण्टे आराम करें। इस समय महल में बिल्कुल सन्नाटा था। लौंडियां बेफिक्री के साथ खुर्राटे ले रही थीं, क्योंकि कमलिनी ने सभी को अपने सामने बिदा कर दिया था और कह दिया था कि बिना बुलाये कोई हम लोगों के पास न आवे।

इस समय ये सब जिस महल में हैं वह राजमहल के नाम से पुकारा जाता था। महाराज दिग्विजयसिंह की रानी इसी में रहा करती थीं। इसके बगल में पीछे की तरफ महल का वह दूसरा भाग था जिसमें किशोरी उन दिनों में रहती थी जब दिग्विजयसिंह की जिन्दगी में जबर्दस्ती इस मकान के अन्दर लाई गई थी और लाली तथा कुन्दन भी किशोरी की हिफाजत के लिए उसी मकान में रहा करती थीं जिनका हाल सन्तति के तीसरे भाग के आठबें बयान में लिख आये हैं।

पाठक भूले न होंगे कि उसी महल या बाग में (जिसमें पहले किशोरी रहा करती थी) एक कोने पर वह इमारत थी जिसका दरवाजा हमेशा बन्द रहता था और जिसकी छत फोड़कर किशोरी को साथ लिए लाली उसके अन्दर चली गई थी। यद्यपि महल का वह भाग अलग था, मगर राजमहल की छत पर से वह मकान बखूबी दिखाई देता था। किशोरी, कमला, लाडिली, कामिनी, लक्ष्मीदेवी और कमलिनी की बात जब समाप्त हुई और वे सब नीचे जाने के इरादे से उठकर खड़ी हुईं तो यकायक लाडिली की निगाह उस इमारत पर पड़ी जिसके अन्दर किशोरी को लेकर वह (लाली) चली गयी थी। आज भी उस मकान का दरवाजा उसी तरह बन्द था जैसे दिग्विजयसिंह के समय में बन्द रहा करता था, हां, पहले की तरह आज उसके दरवाजे पर पहरा नहीं पड़ता था, उस मकान की छत जिसमें लाली ने सेंध लगाई थी, दुरुस्त कर दी गयी थी। बाग में चारों तरफ सन्नाटा था, क्योंकि आजकल उसमें कोई रहता न था और यह बात कमलिनी और लाडिली इत्यादि को मालूम थी।

जिस समय लाडिली की निगाह उस मकान की छत पर पड़ी, उसे एक आदमी दिखाई दिया जो बड़ी मुस्तैदी के साथ चारों तरफ घूम-घूम और देख-देखकर शायद इस बात की टोह ले रहा था कि कोई आदमी दिखाई तो नहीं देता, मगर किशोरी और कामिनी इत्यादि ऐसे ठिकाने थीं कि ये सब चारों तरफ सबको देखतीं, मगर इन्हें कोई नहीं देख सकता था क्योंकि जिस मकान की छत पर ये सब थीं, उसके चारों तरफ पुर्से भर ऊंची कनाती दीवार थी ओर उसमें बहुत से सूराख देखने और तीर मारने के लायक बने हुए थे और इस समय लाडिली ने भी उस आदमी को ऐसे ही एक सूराख की राह से ही देखा था।

लाडिली ने कमलिनी का हाथ पकड़ लिया और उस इमारत की तरफ देखने का इशारा किया। कमलिनी ने और इसके बाद एक-एक करके सभी ने उस आदमी को देखा और अब क्या करेगा यह जानने के लिए सभी की निगाह उसी तरफ अटक गई।

थोड़ी देर बाद उस छत पर नीचे की तरफ से आती हुई रोशनी दिखाई दी जिससे मालूम हुआ कि उसकी छत इस समय पुनः तोड़ी गयी है और नीचे की कोठरी में और भी कई आदमी हैं। रोशनी दिखाई देने के बाद दो आदमी और निकल आये और तीन आदमी उस छत पर दिखाई देने लगे। अब पूरी तरह निश्चय हो गया कि उस मकान की छत तोड़ी गई है। उन तीनों आदमियों ने बड़े गौर से उस तरफ देखा जहां किशोरी, कामिनी इत्यादि खड़ी थीं, मगर कुछ दिखाई न दिया, इसके बाद उन तीनों ने झुककर छत के नीचे से एक भारी गठरी निकाली। उसके बाद नीचे से दो आदमी और निकलकर छत पर आ गये तथा अब वहां पांच आदमी दिखाई देने लगे।

कमलिनी ने कमला का हाथ पकड़के कहा, ''बहिन, इन शैतानों की कार्रवाई बेशक देखने और जांचने योग्य है, ताज्जुब नहीं कि कोई अनूठी बात मालूम हो, अस्तु तू जाकर जल्दी से तेजसिंह को इस मामले की खबर कर दे, फिर जो कुछ उनके जी में आयेगा, वह करेंगे।'' इतना सुनते ही कमला तेजसिंह की तरफ चली गई और सब फिर उसी तरह देखने लगीं।

थोड़ी देर तक वे पांचों आदमी बैठकर उस गठरी के साथ न मालूम क्या करते रहे, इसके बाद कमन्द के जरिये वह गठरी बाहर की तरफ बाग में उतार दी गई। उसके पीछे वे पांचों आदमी भी बाग में उतर आये और गठरी लिए हुए बाग के बीचोंबीच वाले उस कमरे की तरफ चले गये जिसमें पहले किशोरी रहा करती थी। उसी समय कमला भी लौटकर आ पहुंची और बोली, ''तेजसिंहजी को खबर कर दी गयी और वे देवीसिंहजी वगैरह ऐयारों को साथ लेकर किसी गुप्त बाग में गये हैं।''

कमलिनी - मुझे भी वहां जाना उचित है!

किशोरी - क्यों?

कमलिनी - उस मकान के गुप्त भेद की खबर तेजसिंह को नहीं है, कदाचित् कोई आवश्यकता पड़े।

किशोरी - कोई आवश्यकता न पड़ेगी, बस, चुपचाप खड़ी तमाशा देखो।

लक्ष्मीदेवी - इनमें से अगर एक आदमी को भी तेजसिंह पकड़ लेंगे तो सब भेद खुल जायगा।

कमलिनी - हां, सो तो है।

कमला - मैं समझती हूं कि उस मकान के अन्दर और भी कई आदमी होंगे। अगर वे सब गिरफ्तार हो जाते तो बहुत ही अच्छा होता।

कमलिनी - इसी से तो मैं कहती हूं कि मुझे वहां जाने दो। मेरे पास तिलिस्मी खंजर मौजूद है, मैं बहुत कुछ कर गुजरूंगी।

किशोरी - नहीं बहिन, मैं तुम्हें कदापि न जाने दूंगी, मुझे डर लगता है, तुम्हारे बिना मैं यहां नहीं रह सकती।

कमलिनी - खैर, मैं न जाऊंगी। तुम्हारे ही पास रहूंगी।

अब हम बाग के उस हिस्से का हाल लिखते हैं जिसमें वे पांचों आदमी गठरी लिए दिखाई दे चुके हैं।

वे पांचों आदमी गठरी लिए हुए बाग के बीचोंबीच वाले उस मकान में पहुंचे जिसमें पहले किशोरी थी। जब उस मकान के अन्दर पहुंच गये तो उन लोगों ने चकमक से आग झाड़ मशाल जलाई और गठरी को बंधी-बंधाई जमीन पर छोड़कर आपस में यों बातचीत करने लगे -

एक - अच्छा, अब क्या करना चाहिए?

दूसरा - गठरी को इसी जगह छोड़कर राजमहल में पहुंचना और अपना काम करना चाहिए।

तीसरा - नहीं-नहीं, पहले इस गठरी को ऐसी जगह रखना या पहुंचाना चाहिए जिससे सबेरा होते ही किसी-न-किसी की निगाह इस पर अवश्य पड़े।

चौथा - बाग के इस हिस्से में जब कोई रहता ही नहीं, फिर किसी की निगाह इस पर क्यों पड़ने लगी?

पांचवां - अगर ऐसा है तो इसे भी अपने साथ ही राजमहल में ले चलना।

पहला - अजब आदमी हो, राजमहल में अपना जाना तो कठिन हो रहा है तुम कहते हो, गठरी भी लेते चलो।

दूसरा - फिर इस बाग में इस गठरी का रखना बेकार ही है जहां कोई आदमी रहता ही नहीं!

चौथा - बस, अब इसी हुज्जत में रात बिता दो! अभी पहले अपना असल काम तो कर लो जिसके लिए आये हो, चलो, पहले तहखाना खोलो।

दूसरा - ठीक है, मैं भी यही उचित समझता हूं।

इतना कहकर वह खड़ा हो गया और अपने साथियों को भी उठने का इशारा किया।

 

बयान - 8

उन लोगों ने वह बंधी-बंधाई गठरी तो उसी जगह छोड़ दी और बीच वाले कमरे के दरवाजे पर पहुंचे जिसमें ताला बन्द था। एक आदमी ने लोहे की सलाई के सहारे ताला खोला और इसके बाद सब-के-सब उस कमरे के अन्दर जा पहुंचे। यह कमरा इस समय भी हर तरह से सजा और अमीरों के रहने लायक बना हुआ था। पहले तो उन आदमियों ने मशाल की रोशनी में वहां की हर एक चीज को अच्छी तरह गौर से देखा और इसके बाद सभी ने मिलकर वहां का फर्श जो जमीन पर बिछा हुआ था उठा डाला। यहां की जमीन संगमरमर के चौखूटे पत्थर के टुकड़ों से बनी हुई थी जिसे देख एक ने कहा -

एक - अगर हम लोगों का अन्दाज ठीक है और वास्तव में इसी कमरे का पता हम लोगों को दिया गया है तो यहां की जमीन में सूराख करना कोई बड़ी बात नहीं है, दो-चार पत्थर उखाड़ने से सहज ही में काम चल जायेगा।

दूसरा - बेशक ऐसा ही है, मगर मैं समझता हूं कि थोड़ी देर रुककर बाबाजी की राह देखना उचित होगा।

तीसरा - अजी, अपना काम करो, इस तरह रुका-रुकी में रात बीत जायेगी तो मुफ्त में मारे जायंगे।

पहला - मारे क्यों जायंगे यहां है ही कौन, जो हम लोगों को गिरफ्तार करेगा!

तीसरा - (कुछ रुककर और बाहर की तरफ कान लगाकर) किसी के आने की आहट मालूम होती है।

चौथा - (ध्यान देकर) ठीक तो है, मगर सिवाय बाबाजी के और होगा ही कौन?

तीसरा - लीजिए, आ ही तो गए।

चौथा - हमने कहा था कि बाबाजी होंगे।

इतने ही में दो आदमियों को साथ लिए बाबाजी भी वहां आ पहुंचे, वही बाबाजी जो मायारानी के तिलिस्मी दारोगा थे। उनके साथ में एक तो मायारानी थी और दूसरा आदमी पटने का सूबेदार वही शेरअलीखां था जिसकी लड़की गौहर का हाल ऊपर के किसी बयान में लिखा जा चुका है। मायारानी इस समय अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए थी, मगर उसकी पोशाक जनाने ढंग की और उसी शान-शौकत की थी जैसी कि उन दिनों पहरा करती थी जब तिलिस्म की रानी कहलाने का उसे हक था और अपने ऊपर किसी तरह की आफत आने का शानो-गुमान भी न था।

हम इस जगह थोड़ा-सा हाल तेजसिंह का लिख देना भी उचित समझते हैं। कमला की जुबानी समाचार पाकर तेजसिंह तुरन्त तैयार हो गये और तारासिंह वगैरह ऐयारों को साथ लिए हुए महल के उस हिस्से में पहुंचे जिसमें ऊपर लिखी कार्रवाई हो रही थी। उन पांचों बदमाशों को कमरे के अन्दर जाते हुए तेजसिंह ने देख लिया था इसलिए वे छिपते हुए पिछली राह से कमरे की छत पर चढ़ गये। छत के बीचोंबीच में जमीन से दो हाथ ऊंचा एक रोशनदान बना हुआ था जिसके जरिये कमरे के अंदर रोशनी और कुछ धुप भी पहुंचा करती थी। उस रोशनदान में चारों तरफ बिल्लौरी शीशे इस ढंग के लगे हुए थे जिन्हें जब चाहे खोल और बन्द कर सकते थे। तारासिंह तो हिफाजत के लिए हाथ में नंगी तलवार लिए सीढ़ी पर खड़े हो गए और तेजसिंह, देवीसिंह तथा भैरोसिंह उसी रोशनदान की राह से कमरे के अन्दर का हाल देखने और उन शैतानों की बातचीत सुनने लगे।

अब हम फिर कमरे के अन्दर का हाल लिखते हैं। बाबाजी ने आने के साथ ही उन पांचों आदमियों की तरफ देखके कहा -

बाबाजी - अभी तक तुम लोग सोच-विचार में ही पड़े हो?

एक - अनजान जगह में हम लोग कौन काम जल्दी के साथ कर सकते हैं खैर अब यह बताइये कि यही जमीन खोदी जायगी या कोई और...।

बाबाजी - हां, यही जमीन खोदी जायगी, बस, जल्दी करो, रात बहुत कम है। सिर्फ आठ-दस पत्थर उखाड़ डालो, दो हाथ से ज्यादा मोटी छत नहीं है।

दूसरा - बात-की-बात में सब काम ठीक किये देता हूं, कोई हर्ज नहीं!

इतना कहकर उन लोगों ने जमीन खोदने में हाथ लगा दिया और बाबाजी, मायारानी तथा शेरअलीखां में यों बातचीत होने लगी -

मायारानी - जिस राह से हम लोग आये हैं, उसी राह से अपने फौजी सिपाहियों को भी ले आते तो क्या हर्ज था?

बाबाजी - तुम बाज दफे बच्चों की-सी बात करती हो। एक तो वह तिलिस्मी रास्ता इस लायक नहीं कि उस राह से हम सैकड़ों फौजी आदमियों को ला सकें। क्या जाने किससे क्या गलती हो जाये या कैसी आफत आ पड़े, सिवाय इसके सैकड़ों बल्कि हजारों आदमियों पर तिलिस्मी गुप्त भेदों का प्रकट कर देना क्या मामूली बात है अगर ऐसा होता तो बुजुर्ग लोग जिन्होंने इस किले और तिलिस्म को तैयार किया है यह रास्ता क्यों बनाते जिसे इस समय हम लोग खोद रहे हैं इसे भी जाने दो, सबसे भारी बात सोचने की यह है कि इस तिलिस्मी रास्ते से जिधर से हम लोग आये हैं, हमारी फौज इस किले में तब पहुंच सकती है जब वह इस पहाड़ के ऊपर चढ़ आये मगर यह कब हो सकता कि हजारों आदमी इस पहाड़ पर चढ़ आवें और किले वालों को खबर तक न हो। ऐसा होना बिल्कुल असम्भव है, मगर जब हम इस रास्ते को खोल देंगे तो हमारे फौजी सिपाहियों को पहाड़ पर चढ़ने की जरूरत न रहेगी, क्योंकि इसका दूसरा मुहाना 'जस' नदी के किनारे पड़ता है जो इस पहाड़ के नीचे कुछ हटकर बहती है।

मायारानी - तो क्या यहां से उस नदी तक जाने के लिए पहाड़ के अन्दर ही अन्दर सीढ़ियां बनी हुई हैं?

बाबाजी - बेशक ऐसा ही है। रास्ते के बारे में इस किले की अवस्था ठीक 'देवगढ़'1 की तरह समझनी चाहिए। मैं जहां तक खयाल करता हूं यह रोहतासगढ़ का किला और वह देवगढ़ का किला एक ही आदमी का बनवाया हुआ है।

मायारानी - तो क्या फौज के सिपाही भीतर-ही-भीतर इस छत को नहीं तोड़ सकते थे जो दूसरी राह से आकर हम लोगों को यह काम करना पड़ा।

बाबाजी - नहीं, इसका एक खास सबब और भी है जो इस समय छत के नीचे जाने ही से तुम्हें मालूम हो जायेगा। (शेरअलीखां की तरफ देखके) मैं समझता हूं आपकी फौज उस नदी के किनारे नियत स्थान पर पहुंच गई होगी!

शेरअलीखां - जरूर पहुंच गई होगी, केवल हम लोगों के जाने की देर है, मगर अफसोस यही है कि अब रात बहुत कम रह गई है।

बाबाजी - कोई हर्ज नहीं, आजकल इस बाग में बिल्कुल सन्नाटा रहता है, कोई झांकने के लिए भी नहीं आता, मगर पहर दिन चढ़े तक भी हमारी फौज यहां तक आ पहुंचे तो किसी को पता न लगेगा और बात-की-बात में यह किला अपने कब्जे में आ जायेगा। बड़ी खुशी की बात तो यह है कि आजकल किशोरी, कामिनी, लाडिली और तारा भी इस किले में मौजूद हैं।

इतने ही में बाहर की तरफ से आवाज आई, ''तारा मत कहो, लक्ष्मीदेवी कहो, क्योंकि अब तारा और लक्ष्मीदेवी में कोई भेद नहीं रहा।''

आश्चर्य से बाबाजी, मायारानी, शेरअलीखां और उन पांचों आदमियों की निगाह जो जमीन खोदने में लगे हुए थे, दरवाजे की तरफ घूम गई और उन्होंने एक विचित्र आदमी को कमरे के अन्दर आते देखा। हमारे ऐयार लोग भी जो छत के ऊपर रोशनदान की राह से झांककर देख रहे थे, ताज्जुब के साथ उस आदमी की तरफ देखने लगे।

इस विचित्र आदमी का तमाम बदन बेशकीमत स्याह पोशाक और फौलादी जर्रःमोजे

1. देवगढ़ का किला हैदराबाद (दक्षिण) लगभग तीन सौ मील के उत्तर और पश्चिम के कोने में है। यह किला बहुत ऊंची पहाड़ी के ऊपर विचित्र ढंग का बना हुआ है जिसके देखने से आश्चर्य होता है। पहाड़ का बहुत बड़ा भाग छील-छालकर दीवार की जगह पर कायम किया गया है। पहाड़ के चारों तरफ एक खाई है, उसके बाद तिहरी दीवार है। अन्दर जाने का रास्ता किसी तरफ से मालूम नहीं होता। शहर उन तीनों दीवारों के बाहर बसा हुआ है और शहर के शहरपनाह की बड़ी मजबूत दीवार है। पहाड़ काटकर अन्दर किले में जाने के लिए उसी तरह की सीढ़ियां बनी हुई हैं जैसे किसी बुर्ज या धरहरे के ऊपर चढ़ने के लिए होती हैं। उस राह से जानकार आदमी का भी बिना मशाल की रोशनी के सीढ़ियां चढ़कर किले के अन्दर जाना बहुत मुश्किल है। किले के अन्दर जहां वह रास्ता समाप्त हुआ है उसके मुंह पर भारी लोहे का तवा इसलिए रखा हुआ है कि यदि कदाचित् दुश्मन इस रास्ते से घुस भी आवें तो तवे के ऊपर सैकड़ों मन लकड़ियां रखकर आग जला दी जाय जिसमें उसकी गर्मी से दुश्मन अन्दर-ही-अन्दर जल मरें। इस किले में पानी के कई हौज हैं और एक सौ साठ फुट ऊंचा एक बुर्ज भी है जिस पर से दूर-दूर तक की छटा दिखाई देती है। यह किला अभी तक देखने लायक है, देखने से अक्ल दंग होती है, मुमकिन नहीं कि कोई इसे लड़कर फतह कर सके। चौदहवीं सदी में दिल्ली का बादशाह 'मुहम्मद तुगलक' दिल्ली उजाड़ के वहां की रिआया को इसी देवगढ़ में बसाने के लिए ले गया था और देवगढ़ का नाम दौलताबाद रखकर इसे अपनी राजधानी कायम किया था, परन्तु अन्त में उसे पुनः लौटकर दिल्ली आना पड़ा। देवगढ़ के इर्दगिर्द कई स्थान अब भी देखने योग्य हैं, जैसे कि एलोरा की गुफा इत्यादि, जिसका आनन्द देशाटन करने वालों को ही मिल सकता है।

और जाली इत्यादि से ढका हुआ था, केवल चेहरे का हिस्सा फौलादी जालीदार बारीक नकाब के अन्दर से झलक रहा था मगर वह इतना ज्यादा काला था और लाल तथा बड़ी-बड़ी आंखें ऐसी चमक रही थीं कि देखने से डर मालूम होता था। यह आदमी बहुत ही ताकतवर है इसका अन्दाज तो केवल इतने ही से मिल सकता था कि उसके बदन पर कम-से-कम दो मन लोहे का सामान था और उसकी चाल बहुत गम्भीर तथा निडर बहादुरों की-सी थी। ढाल, तलवार और खंजर के सिवाय और कोई हरबा उसके पास दिखाई न देता था।

इस विचित्र आदमी के आते ही ताज्जुब के साथ-ही-साथ डर भी सभी के दिल पर छा गया और बाबाजी ने घबड़ाई आवाज में इस आदमी से पूछा, ''आप कौन हैं?'

आदमी - हम जिन्न हैं।

बाबाजी - मैं समझता हूं कि जिन्न किसे कहते हैं।

आदमी - जिन्न उसको कहते हैं जो सब जगह पहुंच सके, भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालों का हाल जाने, कोई हरबा उस पर असर न करे और जो किसी के मारने से न मरे।

बाबाजी - (ताज्जुब से) तो क्या ये सब गुण आपमें हैं?

जिन्न - बेशक!

बाबाजी - मैं कैसे समझूं?

जिन्न - आजमा के देख लो!

बाबाजी तो उस जिन्न से बातें कर रहे थे, मगर मायारानी और शेरअलीखां का डर के मारे कलेजा सूख रहा था। मायारानी तो औरत ही थी मगर शेरअलीखां बहादुर होकर डर के मारे कांप रहा था। इसका सबब शायद यह हो कि मुसलमान लोग जिन्न का होना वास्तविक और सच मानते हैं। जो हो मगर बाबाजी अर्थात् दारोगा को जिन्न की बात का विश्वास नहीं हो रहा था, फिर भी जिस समय उसने कहा कि 'आजमा के देख लो' तो उस समय दारोगा भी बेचैन हो गया और सोचने लगा कि इसे किस तरह आजमावें?

जिन्न - शायद तुम सोच रहे हो कि इस जिन्न को किस तरह आजमावें क्योंकि तुम्हारे पास कोई जरिया आजमाने का नहीं है। अच्छा, हम खुद अपनी बात का सबूत देते हैं, लो, सम्हल जाओ!

इतना कहकर उस जिन्न ने अपना बदन झाड़ा और अंगड़ाई ली, इसके बाद ही उसके तमाम बदन में से आग की चिनगारियां निकलने लगीं और इतनी ज्यादा चमक पैदा हुई कि सभी की आंखें चौंधियाने लगीं। यह चिनगारियां और चमक उस फौलादी जर्रः और जाल में से निकल रही थी जो वह अपने बदन में पहने हुए था। यह हाल देखकर मायारानी, शेरअलीखां और पांचों आदमी घबरा गये, मगर दारोगा को फिर भी विश्वास न हुआ, तिलिस्मी खंजर की तरह उसके जर्रः और जाल में भी किसी प्रकार का तिलिस्मी असर खयाल करके उसने अपने दिल को समझा लिया और कहा।

दारोगा - खैर, इससे हमें कोई मतलब नहीं, आप यह कहिये कि यहां किस काम से आये हैं

जिन्न - (चिनगारियों और चमक को बन्द करके) तुम लोगों की हरामजदगी का तमाशा देखने और तुम लोगों के कामों में विघ्न डालने के लिए।

दारोगा - यह तो मैं खूब जानता हूं कि तुम न तो जिन्न हो और न शैतान ही बल्कि कोई धूर्त ऐयार हो। यह सामान जो तुम्हारे बदन पर है, तिलिस्मी है और सहज में तुम्हें कोई गिरफ्तार नहीं कर सकता। मगर साथ ही इसके यह भी समझ रखो कि मैं तिलिस्म का दारोगा हूं और चालीस वर्ष तक तिलिस्म का इन्ताजाम करता रहा हूं।

जिन्न - (जोर से हंसकर) बेईमान, हरामखोर, उल्लू का पट्ठा कहीं का!

दारोगा - (गुस्से से) बस, जुबान सम्हालकर बातें करो।

जिन्न - अबे जा दूर हो सामने से। चालीस वर्ष तक तिलिस्म का इन्तजाम करता रहा! तेरे ऐसे बेईमान और मालिक की जान लेने वाले भी अगर तिलिस्मी कारखाने को जानने की डींग हांकें तो बस हो चुका। बस, अब बेहतरी इसी में है कि तुम यहां से चले जाओ और जो किया चाहते हो उसका ध्यान छोड़ो नहीं तो अच्छा न होगा।

इतना कहकर उसने शेरअलीखां, मायारानी और उन पांचों आदमियों की तरफ भी देखा जो इस मकान में पहले आये थे।

दारोगा ने क्षण - भर तो कुछ सोचा और फिर शेरअलीखां की तरफ देख के बोला, ''क्या एक अदना ऐयार मक्कारी करके हम लोगों का बना-बनाया खेल चौपट कर देगा देख क्या रहे हो! मारो इस कम्बख्त को, बचकर जाने न पावे।''

शेरअलीखां पहले तो कुछ सहमा हुआ था, मगर दारोगा की बातचीत ने उसे निडर कर दिया और जिन्न का खयाल छोड़ उसने भी कुछ-कुछ यकीन कर लिया कि यह कोई ऐयार है। आखिर उसने म्यान से तलवार निकाल ली और उन पांचों आदमियों की तरफ जो जमीन खोदने के लिए आये थे कुछ इशारा करके जिन्न के ऊपर हमला किया। जिन्न ने इसकी कुछ भी परवाह न की और बड़े गम्भीर भाव से चुपचाप खड़ा रहा तथा शेरअलीखां के हमले को बरदाश्त कर गया, मगर शेरअलीखां के हमले का नतीजा कुछ भी न निकला क्योंकि उसकी तलवार आवाज देती हुई जमीन पर गिर पड़ी। इसके साथ ही उन पांचों आदमियों ने भी जिन्न पर हमला किया, मगर जिन्न ने इसकी भी कुछ परवाह न की, बल्कि शेरअलीखां के गले में हाथ डाल तथा पैर की आड़ लगाकर ऐसा झटका दिया कि वह किसी तरह सम्हल न सका और जमीन पर गिर पड़ा। जिन्न उसकी छाती पर सवार हो गया और जोर से बोला, ''खबरदार, मुझ पर कोई हमला न करे। कोई मेरी तरफ बढ़ा और मैंने शेरअलीखां का सिर काटकर अलग किया।''

मालूम होता है कि वे पांचों आदमी शेरअलीखां के ही नौकर थे क्योंकि उसी के इशारे से जिन्न पर हमला करने के लिए तैयार हो गये थे और जब उसी को जिन्न के नीचे मजबूर देखा तो यह सोचकर कि कदाचित् हम लोगों के हमला करने से नाराज होकर जिन्न उसका सिर काटा ही न ले हमला करने से रुक गये और पीछे हटकर ताज्जुब की निगाहों से उस विचित्र व्यक्ति को देखने लगे जिसने अपना नाम जिन्न रखा था, साथ ही इसके डर और आश्चर्य ने मायारानी और दारोगा के पैर भी वहीं चिपका दिये।

जब हमला करने वाले अलग हो गये तो जिन्न ने नर्मी के साथ शेरअलीखां से कहा जो उसके नीचे दबा हुआ मजबूर पड़ा था और जीवन की आशा छोड़ चुका था -

जिन्न - मुझे आपसे किसी तरह की दुश्मनी नहीं और न मैं आपकी जान ही लिया चाहता हूं, सिर्फ दो बात आपसे पूछा चाहता हूं, लेकिन अगर इसमें किसी तरह के हीले और हुज्जत को जगह मिलेगी तो लाचार रहम भी न कर सकूंगा।

शेरअलीखां - वे कौन-सी दो बातें हैं

जिन्न - एक तो जो कुछ मैं इस समय आपसे पूछूं, उसका जवाब एकदम सच-सच दीजिये।

शेरअलीखां ने सिर हिला दिया, मानो स्वीकार किया।

जिन्न - दूसरी बात मैं अपने सवालों के अन्त में कहूंगा।

शेरअलीखां - बहुत अच्छा, इन्हें भी पूछ डालिये।

जिन्न - आपने इस कम्बख्त 'मुन्दर' का साथ क्यों दिया, जिसने अपने को मायारानी के नाम से मशहूर कर रखा है?

'मुन्दर' के शब्द में जादू का असर था जिसने मायारानी और दारोगा के कलेजे को दहला दिया। यह एक ऐसी गुप्त और भेद की बात थी जिसके सुनने के लिए दोनों तैयार न थे और न यहां सुनने की उन दोनों को आशा ही थी।

शेरअलीखां - (ताज्जुब से) मुन्दर!

जिन्न - हां मुन्दर, आप यह न समझिये कि यह आपके दोस्त बलभद्रसिंह की लड़की है।

शेरअलीखां - तो क्या यह हमारे दोस्त के दुश्मन हेलासिंह की लड़की मुन्दर है?

जिन्न - जी हां।

शेरअलीखां - (जोश के साथ) बस आप मेहरबानी करके मुझे छोड़ दीजिए। अगर आप बहादुर हैं और आपको बहादुरी का दावा है तो मुझे छोड़िये, मैं कसम खाकर कहता हूं कि अगर आपकी यह बात सच निकली तो आपकी गुलामी अपनी इज्जत का सबब समझूंगा।

जिन्न तुरन्त उसकी छाती पर से उठकर अलग खड़ा हो गया और मायारानी तथा दारोगा की सूरत गौर से देखने लगा, जिनके चेहरे का रंग गिरगिट की तरह बदल रहा था।

मायारानी - झूठ, बिल्कुल झूठ!

जिन्न - शायद मुन्दर को इस बात की खबर नहीं कि असली मायारानी अर्थात् लक्ष्मीदेवी का बाप प्रकट हो गया है और वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों के सामने ही वह अपनी लड़की लक्ष्मीदेवी से मिला जो तारा के नाम से कमलिनी के मकान में इस तरह रहती थी कि कमलिनी को भी अब तक उसका हाल मालूम न होने पाया था और इस समय बलभद्रसिंह और लक्ष्मीदेवी इस रोहतासगढ़ किले के अन्दर मौजूद भी हैं। (शेरअलीखां से) मैं समझता हूं कि तुम उनसे मिलना खुशी से पसन्द करोगे और मुलाकात होने पर सच-झूठ का शक भी न रहेगा, अच्छा, अब मैं जाता हूं। तुम जो मुनासिब समझो, करो।

शेरअलीखां - सुनिये, वह दूसरी बात तो आपने कही ही नहीं।

जिन्न - अब इस समय उसके कहने की कोई जरूरत नहीं मालूम पड़ती है, फिर देखा जायेगा!

इतना कह जिन्न तो वहां से रवाना हो गया और इन सभी को परेशानी की हालत में छोड़ गया। मायारानी और दारोगा की इस समय अजब हालत थी। मौत की भयानक सूरत उनकी आंखों के सामने दिखाई दे रही थी, तमाम बदन सनसना रहा था, सिर में चक्कर आ रहे थे, पैरों में इतनी कमजोरी आ गई कि खड़ा रहना मुश्किल हो गया था, यहां तक कि दोनों जमीन पर बैठ गये और अपनी बदकिस्मती का इन्तजार करने लगे।

जिन्न के चले जाने के बाद शेरअलीखां ने मायारानी की तरफ देखके कहा -

शेरअलीखां - तूने तो केवल एक ही कलंक का टीका अपने माथे पर दिखाया था जिस पर मैंने इसलिये विशेष ध्यान नहीं दिया कि तू मेरे दोस्त की लड़की है, मगर अब तो एक ऐसी बात मालूम हुई है जिसने मुझे तड़पा दिया, मेरे कलेजे में दर्द पैदा कर दिया, रंजोगम का पहाड़ मेरे ऊपर डाल दिया। अफसोस, बलभद्रसिंह मेरा लंगोटिया दोस्त और लक्ष्मीदेवी मेरी मुंहबोली लड़की! हां राजा गोपालसिंह से मुझे कोई ऐसा सरोकार न था सिवाय इसके कि वह मेरे दोस्त का दामाद था। निःसन्देह यह सब काम इसी कम्बख्त दारोगा की मदद से किया गया होगा!

मुन्दर - (खड़ी होकर) बड़े अफसोस की बात है कि तुमने एक मामूली आदमी की झूठी बातों पर विश्वास करके मेरी तरफ कुछ भी ध्यान न दिया और न अपनी तथा उसकी बर्बादी का ही कुछ खयाल किया जिसके साथ तुमने कई काम करने के लिए कसमें खाई थीं।

शेरअली - खैर, मैं थोड़ी देर के लिए तेरी बात माने लेता हूं कि वह एक झूठा और मामूली आदमी था, मगर इस बात का पता लगाना कौन कठिन है कि इस वक्त इस किले के अन्दर बलभद्रसिंह है या नहीं।

मुन्दर - उस बनावटी जिन्न ने तुम्हें धोखा दिया, जब उसने देखा कि वह अकेले हम लोगों को गिरफ्तार नहीं कर सकता तो यह चालबाजी खेली जिसमें तुम मेरे बाप बलभद्रसिंह का पता लगाने के लिए, जिसे मरे हुए एक जमाना बीत गया है, इस किले वालों से मिलकर गिरफ्तार हो जाओ और अपने साथ हम लोगों को भी बरबाद करो। अगर तुमको उसकी सचाई पर ऐसा ही दृढ़ विश्वास है तो हम लोगों को इस किले के बाहर पहुंचा दो और तब जो जी में आवे सो करो।

शेरअली - जब मुझे उसकी बातों पर विश्वास ही है तो तुझे यहां से राजी-खुशी के साथ क्यों जाने दूंगा जिसने हजारों आदमियों को धोखे में डालकर बर्बाद किया और मुझे प्रतापी राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ दुश्मनी करने के लिए तैयार किया?

मुन्दर - तुमने मुफ्त में मेरा साथ देना स्वीकार नहीं किया, तुमने मेरे बाप बलभद्रसिंह की दोस्ती का खयाल नहीं किया बल्कि तुमने उस दौलत की लालच में पड़कर मेरा साथ दिया जिसने तुम्हें अमीर ही नहीं बल्कि जिन्दगी भर के लिए लापरवाह कर दिया - मेरे बाप बलभद्रसिंह के साथ तुमको मुहब्बत थी यह बात तो मैं तब समझूं जब सब मेरी दौलत मुझे वापस कर दो। यह भला कौन भलमनसी की बात है कि मेरी कुल जमा-पूंजी लेकर मुझे कंगाल बना दो और अन्त में यों धोखा देकर बर्बाद करो!

शेरअली - (हंसकर) यह किसी बड़े भारी बेवकूफ का काम है कि अपने घर में आई दौलत को फिर निकाल बाहर करे तिस पर भी ऐसे नालायक की दौलत जिसने एक नहीं बल्कि सैकड़ों खून किये हों!

मुन्दर - (क्रोध में आकर) तो क्या तुम अपने मन की ही करोगे?

शेरअली - बेशक!

मुन्दर - अच्छा तो मैं जाती हूं, जो तुम्हारे जी में आवे, करो।

शेरअली - ऐसा नहीं हो सकता।

इतना सुनते ही मायारानी ने तिलिस्मी खंजर कमर से निकाल लिया और शेरअलीखां की तरफ बढ़ा ही चाहती थी कि सामने के दरवाजे से आता हुआ फिर वही जिन्न दिखाई पड़ा।

जिन्न - (मायारानी की तरफ इशारा करके) इसके कब्जे से तिलिस्मी खंजर ले लेना मैं भूल गया था क्योंकि जब तक खंजर इसके पास रहेगा, यह किसी के काबू में न आएगी।

यह कहकर उसने मायारानी की तरफ हाथ बढ़ाया और मायारानी ने वह खंजर उसके बदन के साथ लगा दिया, मगर उस पर इसका असर कुछ भी न हुआ। जिन्न ने मायारानी के हाथ से खंजर छीन लिया तथा अंगूठी भी निकाल ली और इसके बाद फिर बाहर का रास्ता लिया।

दारोगा और जितने आदमी वहां मौजूद थे, सब आश्चर्य और डर के साथ मुंह देखते ही रह गये, कोई एक शब्द भी मुंह से न निकाल सका।

अब इस जगह हम पुनः थोड़ा-सा हाल उन ऐयारों का लिखना चाहते हैं जो इस कमरे की छत पर बैठे सब तमाशा देख और सभी की बातें सुन रहे थे।

शेरअलीखां को छोड़कर जब वह जिन्न कमरे के बाहर निकला तो उसी समय तेजसिंह छत के नीचे उतरे और इस फिक्र में आगे की तरफ बढ़े कि जिन्न का पीछा करें मगर जब ये छिपते हुए सदर दरवाजे के पास पहुंचे, जिधर से वह जिन्न आया और फिर लौट गया था तो उन्होंने और भी कई बातें ताज्जुब की देखीं। एक तो यह कि वह जिन्न लौटकर चला नहीं गया, बल्कि अभी तक दरवाजे की बगल में छिपा हुआ खड़ा है और कान लगाकर सब बातें सुन रहा है। दूसरे यह कि जिन्न अकेला नहीं है, बल्कि उसके साथ एक आदमी और भी है जो स्याह नकाब से अपने को छिपाये हुए और हाथ में एक नंगी तलवार लिए है। जब यह जिन्न दोहराकर कमरे के अन्दर गया और मायारानी से तिलिस्मी खंजर छीनकर फिर बाहर चला आया तो अपने साथी को लिए हुए बाग की तरफ चला और कुछ दूर जाने के बाद अपने साथी से बोला, ''आओ भूतनाथ, अब तुमको फिर उसी कैदखाने में छोड़ आवें जिसमें राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने तुम्हें कैद किया था और उसी तरह हथकड़ी-बेड़ी तुम्हें पहना दें जिसमें उन लोगों को इस बात का गुमान भी न हो कि भूतनाथ को कोई छुड़ा ले गया था!''

भूतनाथ - बहुत अच्छा, मगर यह तो कहिये कि अब मेरी क्या दशा होगी?

जिन्न - दशा क्या होगी मैं तो कह ही चुका कि तुम हर तरह से बेफिक्र रहो, ठीक समय पर मैं तुम्हारे पास पहुंच जाऊंगा।

भूतनाथ - जैसे आपकी मर्जी, मगर मैं समझता हूं कि राजा वीरेन्द्रसिंह के आने में अब विलम्ब नहीं और उनके आने के साथ ही मेरा मुकद्दमा पेश हो जायगा।

जिन्न - क्या हर्ज है, मुझे तुम हर वक्त अपने पास समझो और बेफिक्र रहो।

भूतनाथ - जो मर्जी।

तेजसिंह ने जो छिपे हुए उन दोनों के पीछे जा रहे थे, ये बातें भी सुन लीं और उन्हें हद से ज्यादा आश्चर्य हुआ। जिन्न और भूत दोनों उस मकान के पास पहुंचे जिसकी छत फोड़ी गई थी और जो तिलिस्मी तहखाने के अन्दर जाने का दरवाजा था। भूतनाथ ने कमन्द लगाई और उसी के सहारे जिन्न तथा भूतनाथ उसके ऊपर चढ़ गए और टूटी हुई छत की राह से अन्दर उतर गए। तेजसिंह ने भी उसके अन्दर जाने का इरादा किया मगर फिर कुछ सोचकर लौट आए और उसी कमरे की छत पर चले गए जहां अपने साथियों को छोड़ा था।

अब हम पुनः कमरे के अन्दर का हाल लिखते हैं। जब मायारानी से तिलिस्मी खंजर छीनकर वह जिन्न कमरे के बाहर चला गया तो मायारानी बहुत ही डरी और जिन्दगी से नाउम्मीद होकर सोचने लगी कि अब जान बचना मुश्किल है, बड़ी नादानी की जो यहां आई, भाग निकलने पर भी धनपत वाली करोड़ों रुपये की जमा मेरे हाथ में थी। अगर चाहती या आज के दिन की खबर होती तो किसी और मुल्क में चली जाती और जिन्दगी भर अमीरी के साथ आनन्द करती। मगर दुश्मनी की डाह में वह भी न होने पाया, असंभव बातों के लालच में पड़कर शेरअलीखां के घर में वह सब माल रख दिया और उस स्वार्थी और मतलबी ने ऐसे समय में मेरे साथ दगा की। अब क्या किया जाय मैं कहीं की भी न रही। एक तो अब मुझे बचने की आशा ही नहीं रही, फिर अगर मान भी लिया जाय कि पहले की तरह यदि अब भी राजा गोपालसिंह मुझे छोड़ देंगे तो मैं कहां जाकर रहूंगी और किस तरह अपनी जिन्दगी बिताऊंगी हाय, इस समय मेरा मददगार कोई भी नहीं दिखाई देता!

मायारानी इन सब बातों को सोच रही थी और शेरअलीखां क्रोध में भरा हुआ लाल आंखों से उसे देख रहा था कि यकायक कई आदमियों के आने की आहट पाकर वे दोनों चौंके और दरवाजे की तरफ घूम गये। हमारे बहादुर ऐयारों पर नजर पड़ी और सब के सब आश्चर्य से उनकी तरफ देखने लगे।

सुबह की सफेदी ने रात की स्याही को धोकर अपना रंग इतना जमा लिया था कि बाग का हर एक गुलबूटा साफ-साफ दिखाई देने लग गया था जब तेजसिंह, देवीसिंह, भैरोसिंह और तारासिंह कमरे की छत पर से नीचे उतरे और शेरअलीखां, मायारानी और उसके आदमियों के सामने जा खड़े हुए।

तेजसिंह ने मुस्कराते हुए मायारानी की तरफ देखा और आगे बढ़कर कहा -

तेजसिंह - केवल राजा गोपालसिंह ही ने नहीं, बल्कि हम लोगों ने भी उनकी आज्ञा पाकर इसलिए कई दफे तुझे छोड़ दिया था कि देखें न्यायी ईश्वर तुझे तेरे पापों का फल क्या देता है मगर ईश्वर की मर्जी का पता लग गया। वह नहीं चाहता कि तू एक दिन भी आराम के साथ कहीं रह सके और हम लोगों के सिवाय किसी दूसरे या गैर पर अपनी जिन्दगी की आखिरी नजर डाले। केवल तू ही नहीं (दारोगा की तरफ देखकर) इस नकटे की बदकिस्मती भी इसे किसी दूसरी जगह जाने नहीं देती और घुमा-फिराकर घर बैठे हम लोगों के सामने ले आती है। हां, यह (शेरअलीखां) एक नये बहादुर हैं जो हम लोगों के साथ दुश्मनी करने के लिए तैयार हुए हैं।

शेरअलीखां - (हाथ जोड़कर) नहीं-नहीं, मैं खुदा की कसम खाकर कहता हूं कि मैं आप लोगों के साथ दुश्मनी का बर्ताव नहीं रक्खा चाहता और न मुझमें इतनी सामर्थ्य है। मुझे इस बदकार ने धोखा दिया। मुझे इसका असल हाल मालूम न था। मैं सुन चुका हूं कि आप लोग बड़े बहादुर और दिल खोल के खैरात देने वाले हैं इसलिए भीख के ढंग पर अपने उन कसूरों की माफी मांगता हूं जो इस वक्त तक कर चुका हूं।

तेजसिंह - अगर तुम्हारा दिल साफ है और आगे कसूर करने का इरादा नहीं है तो हमने माफ किया। अच्छा आओ और इन दोनों बदकारों को लेकर हमारे साथ चलो। हां, यह तो बताओ कि ये पांचों आदमी तुम्हारे हैं या इस दारोगा के हैं?

शेरअलीखां - जी हां, ये पांचों आदमी मेरे ही हैं।

तेजसिंह - और भी तुम्हारा कोई आदमी इस बाग में आया या आने वाला है?

शेरअलीखां - जी नहीं, मगर थोड़ी-सी फौज इस पहाड़ी के नीचे नदी-किनारे मौजूद है जिसका...।

तेजसिंह - (बात काटकर) उसका हाल हमें मालूम है, खैर देखा जायगा, तुम हमारे साथ आओ।

तेजसिंह की आज्ञानुसार सब के सब कमरे के बाहर निकले। मायारानी और दारोगा के लिए इस वक्त मौत का सामान था, मगर लाचार कोई बस नहीं चल सकता था और न वे दोनों यहां से भाग ही सकते थे। तेजसिंह ने भैरोसिंह को कुछ समझाकर उसी बाग में छोड़ दिया। और बाकी सभी को साथ लिए हुए अपने स्थान का रास्ता लिया। रास्ते में शेरअलीखां से यों बातचीत होने लगी -

तेजसिंह - आज की रात केवल हम लोगों के लिए नहीं बल्कि तुम्हारे लिए भी अनूठी ही रही।

शेरअलीखां - बेशक ऐसा ही है, जिस राह से मैं इस बाग में आया हूं और यहां आकर जो कुछ देखा जन्म भर याद रहेगा। मैं निश्चिन्त होने पर सब हाल आपसे कहूंगा तो आप भी सुनकर आश्चर्य करेंगे।

तेजसिंह - हमें सब हाल मालूम है। रास्ते के बारे में हम लोगों के लिए कोई नई बात नहीं है क्योंकि जिस तहखाने की राह तुम लोग आये हो, उसी राह से हम लोग कई दफे आ चुके हैं। रही जिन्न वाली बात, सो वह भी हम लोगों से छिपी नहीं है।

शेरअलीखां - (ताज्जुब से) क्या आप लोग बहुत देर से यहां आये हुए थे?

तेजसिंह - देरी से! बल्कि हमारे सामने तुम इस बाग में आये हो। हां, तुम्हारे पांचों नौकर पहले आ चुके थे, बल्कि यों कहना चाहिए कि उन्हीं के आने की खबर पाकर हम लोग आए थे।

शेरअलीखां - आप लोग हम लोगों को कहां से देख रहे थे?

तेजसिंह - सो नहीं कह सकते, मगर कोई मामला ऐसा नहीं हुआ जिसे हम लोगों ने न देखा हो या जिसे हम लोग न जानते हों। (मायारानी और दारोगा की तरफ इशारा करके) हम लोगों का सामना होने के पहले तक ये दोनों कम्बख्त सोचते होंगे कि जिन्न ने पहुंचकर काम में बाधा डाल दी, नहीं तो कमरे की जमीन खुद जाती और सुरंग की राह से तुम्हारी फौज यहां पहुंच कर किले को दखल कर लेती।

शेरअलीखां - बेशक ऐसा ही है और मैं भी इसका पक्ष लिए ही जाता अगर उन जिन्न ने, चाहे वह कोई भी हो, मुझे कह न दिया होता कि ''यह मायारानी असल में तुम्हारे दोस्त की लड़की लक्ष्मीदेवी नहीं है बल्कि तुम्हारे दोस्त के दुश्मन हेलासिंह की लड़की मुन्दर है।''

तेजसिंह - मगर यह खयाल झूठा था क्योंकि तुम्हारी फौज के आने की खबर हम लोगों को मिल चुकी थी और हम लोग उसके रोकने का बन्दोबस्त कर चुके थे केवल इतना ही नहीं बल्कि तुम्हारी फौज के सेनापति महबूबखां को हमारे एक ऐयार ने गिरफ्तार करके पहर रात जाने के पहले ही इस किले में पहुंचा भी दिया था।

शेरअलीखां - (आश्चर्य से) तो क्या महबूबखां यहां कैद है?

तेजसिंह - बेशक!

शेरअलीखां - ओफ, आप लोगों के साथ दुश्मनी करना आप ही अपनी मौत को बुलाना है!

तेजसिंह - (मायारानी की तरफ देख के) बड़ी खुशी की बात है कि आज तुम अपनी दोनों नालायक बहिनों को भी इसी महल के अन्दर देखोगी।

मायारानी ने इसका जवाब कुछ भी न दिया और सिर झुका लिया मगर भीतर से उसका रंज और भी बढ़ गया क्योंकि कमलिनी तथा लाडिली के यहां होने की खबर उसे बहुत बुरी मालूम हुई।

तेजसिंह सभी को लिए अपने कमरे में पहुंचे। शेरअलीखां के लिए एक मकान दिया गया, दारोगा को कैदखाने की अंधेरी कोठरी नसीब हुई, और कमलिनी की इच्छानुसार मायारानी कैदियों की सूरत में महल के अन्दर पहुंचाई गई!

 

बयान - 9

दिन पहर भर से ज्यादा चढ़ चुका है। रोहतासगढ़ के महल में एक कोठरी के अन्दर जिसके दरवाजे में लोहे के सींखचे लगे हुए हैं मायारानी सिर नीचा किये हुए गर्म-गर्म आंसुओं की बूंदों से अपने चेहरे की कालिख धोने का उद्योग कर रही है, मगर उसे इस काम में सफलता नहीं होती। दरवाजे के बाहर सोने की पीढ़ियों पर, जिन्हें बहुत-सी लौंडियां घेरे हुई हैं कमलिनी, किशोरी, कामिनी, लाडिली, लक्ष्मीदेवी और कमला बैठी हुई मायारानी पर बातों के अमोघ बाण चला रही हैं।

किशोरी - (कमलिनी से) तुम्हारी बहिन मायारानी है बड़ी खूबसूरत!

कमला - केवल खूबसूरत ही नहीं, भोली और शर्मीली भी हद से ज्यादा है। देखिये, सिर ही नहीं उठाती, बात करना तो दूसरी बात है।

कामिनी - इन्हीं गुणों ने तो राजा गोपालसिंह को लुभा लिया था।

कमलिनी - मगर मुझे इस बात का बहुत रंज है कि ऐसी नेक बहिन की सोहबत में ज्यादा दिन तक रह न सकी।

किशोरी - जो हो मगर एक छोटी-सी भूल तो मायारानी से भी हो गई।

कामिनी - वह क्या?

कमलिनी - यही कि राजा गोपालसिंह को इन्होंने कोठरी में बन्द करके कैदियों की तरह रख छोड़ा था।

किशोरी - इसका कोई न कोई सबब तो जरूर ही होगा। मैंने सुना है कि राजा गोपालसिंह इधर-उधर आंखें बहुत लड़ाया करते थे, यहां तक कि धनपत नामी एक वेश्या को अपने घर में डाल रक्खा था। (मायारानी से) क्यों बीबी, यह बात सच है?

लक्ष्मीदेवी - ये तो बोलती ही नहीं, मालूम होता है हम लोगों से कुछ खफा हैं।

कमला - हम लोगों ने इनका क्या बिगाड़ा है जो हम लोगों से खफा होंगी, हां अगर तुमसे रंज हों तो कोई ताज्जुब की बात नहीं, क्योंकि तुम मुद्दत तक तो तारा के भेष में रहीं और आज लक्ष्मीदेवी बनकर इनका राज्य छीनना चाहती हो। बीबी, चाहे जो हो, मैं तो महाराज से इन्हीं की सिफारिश करूंगी तुम चाहे भला मानो चाहे बुरा।

कामिनी - तुम भले ही सिफारिश कर लो मगर राजा गोपालसिंह के दिल को कौन समझावेगा

कमला - उन्हें भी मैं समझा लूंगी कि आदमी से भूल-चूक हुआ ही करती हैं, ऐसे छोटे-छोटे कसूरों पर ध्यान देना भले आदमियों का काम नहीं है, देखो बेचारी ने कैसी नेकनामी के साथ उनका राज्य इतने दिनों तक चलाया।

किशोरी - गोपालसिंह तो बेचारे भोले-भाले आदमी ठहरे, उन्हें जो कुछ समझा दोगी, समझ जायेंगे, मगर ये तारारानी मानें तब तो! ये जो हकनाहक लक्ष्मीदेवी बनकर बीच में कूदी पड़ती हैं और इस बेचारी भोली औरत पर जरा रहम नहीं खातीं!

लक्ष्मीदेवी - अच्छा रानी, लो मैं वादा करती हूं कि कुछ न बोलूंगी बल्कि धनपत को छुड़वाने का भी उद्योग करूंगी, क्योंकि मुझे इस बेचारी पर दया आती है।

कमला - हां देखो तो सही, राजा गोपालसिंह की जुदाई में कैसा बिलख-बिलखकर रो रही है, कम्बख्त मक्खियां भी ऐसे समय में इसके साथ दुश्मनी कर रही हैं। किसी से कहो नारियल का चंवर लाकर इसकी मक्खियां तो झले।

किशोरी - इस काम के लिए तो भूतनाथ को बुलाना चाहिए।

कमला - इस बारे में तो मैं खुद शर्माती हूं।

इतना सुनते ही सब की सब मुस्कुरा पड़ीं और कमलिनी तथा लक्ष्मीदेवी ने मुहब्बत की निगाह से कमला को देखा।

लक्ष्मीदेवी - मेरा दिल यह गवाही देता है कि भूतनाथ का मुकद्दमा एकदम से पलट जायगा।

कमलिनी - ईश्वर करे ऐसा ही हो, मैं तो चाहती हूं कि मायारानी का मुकद्दमा भी एकदम से औंधा हो जाय और तारा बहिन तारा की तारा ही बनी रह जायं।

ये सब बड़ी देर तक बैठी हुई मायारानी के जख्मों पर नमक छिड़कती रहीं और न मालूम कितनी देर तक बैठी रहतीं अगर इनके कानों में यह खुशखबरी न पहुंचती कि राजा वीरेन्द्रसिंह की सवारी इस किले में दाखिल हुआ ही चाहती है।

 

बयान - 10

अब रोहतासगढ़ किले के अन्दर राजा वीरेन्द्रसिंह की सवारी आई है जिससे यहां की रिआया बहुत ही प्रसन्न है। छोटे-छोटे बच्चे भी उनके आने की खुशी में मग्न हो रहे हैं। इसका सबब यही है कि राजा वीरेन्द्रसिंह जब जहां रहते हैं खैरात का दरवाजा वहां खुला रहता है। यों तो जहां इनकी अमलदारी है, बराबर खैरात हुआ ही करती है मगर जहां ये स्वयं मौजूद रहते हैं खैरात ज्यादा हुआ करती है। खैरात का मकान और बन्दोबस्त अलग है। कोई आदमी वापस नहीं जाने पाता और जिसको जिस चीज की जरूरत होती है दी जाती है। तीन वर्ष के ऊपर और बारह वर्ष से कम उम्र वाले लड़कों को मिठाई बांटने का हुक्म है और तीन वर्ष से कम उम्र वाले बच्चों को चीनी के खिलौने बांटे जाते हैं। चीनी के खिलौने, मिठाइयां और साथ ही इसके कपड़ों का बांटना तभी तक जारी रहता है जब तक राजा वीरेन्द्रसिंह स्वयं मौजूद रहते हैं, और अन्न तो हमेशा बंटा करता है। यही सबब है कि आज रोहतासगढ़ के छोटे-छोटे बच्चों को भी हद से ज्यादा खुशी है और वे झुण्ड-के-झुण्ड इधर-उधर घूमते दिखाई दे रहे हैं।

आज यह खबर बहुत अच्छी तरह मशहूर हो रही है कि मायारानी नामी एक औरत और 'दारोगा बाबा' नामी एक मर्द इस किले में गिरफ्तार हुए हैं, जो वीरेन्द्रसिंह के दुश्मन हैं और भूतनाथ नामी कोई ऐयार गिरफ्तार किया गया है, जिसके मुकद्दमे का फैसला करने के लिए राजा साहब स्वयं आये हैं। ये खबरें किसी एक ढंग पर मशहूर नहीं हैं बल्कि तरह-तरह का पलेथन लगाकर लोग इनकी चर्चा कर रहे हैं और राजा वीरेन्द्रसिंह के दुश्मनों को जी-जान से गालियां दे रहे हैं।

राजा वीरेन्द्रसिंह के आने के साथ ही उनके ऐयारों ने एक-एक करके वे कुल बातें बयान कर दीं, जो आज के पहले हो चुकी थीं और जिन्हें राजा वीरेन्द्रसिंह नहीं जानते थे। भूतनाथ का हाल सुनकर उन्हें बड़ा ही रंज हुआ क्योंकि कमला को वे अपनी लड़की की तरह प्यार करते थे। खैर, सब बातों को सुन-सुनाकर राजा वीरेन्द्रसिंह महल में गए और कमलिनी, लाडिली और कमला इत्यादि से इस तरह मिले जैसे बड़े लोग अपनी लड़कियों और भतीजियों से मिला करते हैं और उन सभी ने भी वैसी ही मुहब्बत और इज्जत का बरताव किया जैसा नेकचलन लड़कियां अपने माता-पिता के साथ करती हैं।

सभी को प्यार और दिलासा देकर राजा वीरेन्द्रसिंह बाहर आये और आज का दिन तेजसिंह से सलाह-विचार करने में बिताया। दूसरे दिन दोपहर के बाद शेरअलीखां से मुलाकात की और घण्टे भर रात जाने के बाद भूतनाथ का मुकद्दमा सुनने का विचार प्रकट करके कहा कि मायारानी तथा दारोगा का मुकद्दमा भूतनाथ के बाद सुना जायेगा।

राजा वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह से यह भी कह दिया कि भूतनाथ का मुकद्दमा महल के अन्दर सुना जायेगा और उस समय हमारे ऐयारों के सिवाय यहां किसी गैर के रहने की जरूरत नहीं है। औरतों में भी सिवाय लड़कियों के जो चिक के अन्दर बैठाई जायेंगी, कोई लौंडी इतना नजदीक न रहने पावे कि हम लोगों की बातें सुने, और बलभद्रसिंह की गद्दी हमारे पास ही बिछाई जाये।

हमारे पाठक सवाल कर सकते हैं कि जब मुकद्दमा सुनने के समय ऐयारों के सिवाय किसी गैर आदमी के मौजूद रहने की मनाही कर दी गई तो किशोरी, कमलिनी और लक्ष्मीदेवी इत्यादि को पर्दे के अन्दर बैठाने की क्या जरूरत थी इसका जवाब यह हो सकता है कि ताज्जुब नहीं, राजा वीरेन्द्रसिंह ने सोचा हो कि जिस समय भूतनाथ का मुकद्दमा सुना जायेगा और उसके ऐबों को पोटलियां खोलने के साथ-साथ सबूत की चीठियां अर्थात् वह जन्मपत्री पढ़ी जायेगी, जो बलभद्रसिंह ने दी है तो बेशक लड़कियों के दिल पर चोट बैठेगी और उनके चेहरे तथा अंगों से उनकी अवस्था अवश्य प्रकट होगी, कौन ठिकाना कोई चीख उठे, कोई बदहवास होकर गिर पड़े, या किसी से किसी तरह की बेअदबी हो जाये, तो यह अच्छी बात न होगी। बड़ों के सामने अनुचित काम बेबसी की अवस्था में हो जाने से दिल को रंज पहुंचेगा और यदि ऐसा न भी हुआ तो भी दिल की अवस्था छिपाने के लिए उन्हें बहुत उद्योग करना पड़ेगा तथा उनके नाजुक कलेजे को तकलीफ पहुंचेगी, जिससे वह लज्जित होंगी। इससे इन लोगों का परदे के अन्दर ही बैठना उचित होगा। बेशक यही बात है और बड़ों को ऐसा खयाल होना ही चाहिए!

रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है। महल के एक छोटे से मगर दोहरे दालान में रोशनी अच्छी तरह हो रही है। दालान के पहले हिस्से में बारीक चिक का परदा गिरा हुआ है और भीतर पूरा अंधकार है। किशोरी, कामिनी, लक्ष्मीदेवी, कमलिनी, लाडिली और कमला उसी के अन्दर बैठी हुई हैं। बाहरी हिस्से में जिसमें रोशनी बखूबी हो रही है, राजा वीरेन्द्रसिंह की गद्दी लगी हुई है, उनके बगल में बलभद्रसिंह बैठे हुए हैं, दूसरी बगल में कागजों की गठरी लिए हुए तेजसिंह विराजमान हैं तथा सभी की निगाहें सामने के मैदान पर पड़ रही हैं जिधर से हथकड़ी-बेड़ी से मजबूर भूतनाथ को लिए हुए देवीसिंह चले आ रहे हैं। भूतनाथ ने आने के साथ ही झुककर राजा वीरेन्द्रसिंह को सलाम किया और कहा।

भूतनाथ - व्यर्थ ही बात का बतंगड़ बनाकर मुझे सांसत में डाल रखा गया है, मगर भूतनाथ ने भी जिसने आप लोगों को खुश रखने के लिए कोई बात उठा नहीं रखी इस बात का प्रण कर लिया था कि जब तक राजा वीरेन्द्रसिंह का सामना न होगा, अपने मुकद्दमे की उलझन को खुलने न देगा।

वीरेन्द्रसिंह - बेशक इस बात का मुझे भी बहुत रंज है कि उस भूतनाथ के ऊपर एक भारी जुर्म ठहर गया है, जिसकी कार्रवाइयों को सुन-सुनकर हम खुश होते थे और जिसे मुहब्बत की निगाह से देखने की अभिलाषा रखते थे।

भूतनाथ - अगर महाराज को इस बात का रंज है तो महाराज निश्चय रखें कि भूतनाथ महाराज की नजरों से दूर किए जाने लायक साबित नहीं होगा। (इधर-उधर और पीछे की तरफ देख के) मगर अफसोस, हमारा मददगार अभी तक नहीं पहुंचा, न मालूम कहां अटक रहा!

इतने में सामने की तरफ से वही जिन्न आता हुआ दिखाई पड़ा, जिसे तेजसिंह पहले देख चुके थे और जिसका हाल राजा वीरेन्द्रसिंह से भी कह चुके थे। इस जिन्न की चाल आजाद, बेफिक्र और निडर लोगों की-सी थी जो धीरे-धीरे चलकर उसी दालान में आ पहुंचा और चुपचाप एक किनारे खड़ा हो गया।

उसके रंग-ढंग और उसकी पोशाक का हाल हम एक जगह बयान कर आए हैं, इसलिए पुनः लिखने की कोई आवश्यकता नहीं। यद्यपि जिन्न आश्चर्यजनक रीति से यकायक वहां आ पहुंचा था और उसको इस बात का गुमान था कि हमारा आना लोगों को बड़ा ही आश्चर्यजनक मालूम होगा, मगर ऐसा न था क्योंकि तेजसिंह को इस बात की खबर पहले ही दिन हो चुकी थी जब वे जिन्न और भूतनाथ के पीछे-पीछे जाकर उनकी बातें सुन आये थे और तेजसिंह ने यह हाल राजा वीरेन्द्रसिंह, अपने साथियों और कमलिनी, लक्ष्मीदेवी वगैरह से भी कह दिया था, अतएव जिन्न के आने का सब कोई इन्तजार ही कर रहे थे और जब वह आ गया, तो सब उसकी सूरत गौर से देखने लगे। वीरेन्द्रसिंह का इशारा पाकर देवीसिंह ने उस जिन्न से पूछा -

देवीसिंह - महाराज की इच्छा है कि तुम अपना नाम और यहां आने का सबब बताओ।

जिन्न - मेरा नाम कृष्णजिन्न है और मैं भूतनाथ का विचित्र मुकद्दमा सुनने तथा अपने एक पुराने मित्र से मिलने आया हूं।

देवीसिंह - (आश्चर्य से) क्या भूतनाथ के अतिरिक्त कोई दूसरा आदमी भी तुम्हारा मित्र है।

जिन्न - हां।

देवीसिंह - और वह है कहां?

जिन्न - इसी जगह, आप लोगों के बीच ही में।

देवीसिंह - अगर ऐसा है तो तुम उसे अपने पास बुलाओ और बातचीत करो।

जिन्न - इससे आपको कोई मतलब नहीं, जब मौका आवेगा ऐसा किया जाएगा।

देवीसिंह - ताज्जुब है कि तुम किसी का कुछ खयाल न करके बेअदबी के साथ बातचीत करते हो! क्या हम लोगों के साथ तुम्हें किसी तरह की दुश्मनी या रंज है या दुश्मनी पैदा करना चाहते हो?

जिन्न - दुश्मनी बिना डाह, डर और रंज के पैदा नहीं होती और हमारे को ये तीनों बातें छू नहीं गई हैं। न तो हमें किसी का डर है न किसी को डराने की इच्छा है, न किसी को कुछ देते हैं और न किसी से कुछ चाहते हैं, न कोई हमारा कुछ बिगाड़ सकता है न हम किसी का कुछ बिगाड़ते हैं, न हमें किसी बात की कमी है न लालसा है, फिर ऐसी अवस्था में किसी से दुश्मनी या रंज की नौबत हो भी क्योंकर सकती है अतः आप लोगों को यही चाहिए कि हमारा खयाल छोड़कर अपना काम करें और हमारा होना न होना एक बराबर समझें।

जिन्न की बातों से सभी को बड़ा ही आश्चर्य और रंज हुआ, बल्कि हमारे कई ऐयारों को क्रोध भी चढ़ आया, मगर राजा वीरेन्द्रसिंह का इशारा पाकर सभी को चुप और शान्त होना ही पड़ा। वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह की तरफ देखकर भूतनाथ का मुकद्दमा शुरू करने के लिए कहा और तेजसिंह ने ऐसा ही किया।

तेजसिंह ने भूमिका के तौर पर थोड़ा-सा पिछला हाल कहकर वह गठरी खोली जिसमें पीतल की एक सन्दूकड़ी और कागज का वह मुट्ठा भी था जिसमें की कई चीठियां कमलिनी वगैरह के सामने पढ़ी जा चुकी थीं। तेजसिंह उन चीठियों को पढ़ गये, जिनका हाल हमारे पाठकों को मालूम हो चुका है और इसके बाद अगली चीठी पढ़ने का इरादा किया, मगर जिन्न ने उसी समय टोक दिया और कहा, ''यदि महाराज साहब उचित समझें, तो दारोगा और मुन्दर को भी जिसने अपने को मायारानी के नाम से मशहूर कर रखा है और जो इस समय सरकार के कब्जे में है इसी जगह बुलवा लें और चीठियों को उनके सामने पुनः पढ़ने की आज्ञा दें। यद्यपि यहां पर शेरअलीखां के आने की भी आवश्यकता है परन्तु मौके-मौके पर कई बातें ऐसी प्रकट होंगी, जिनका हाल शेरअलीखां को मालूम होने देना हम उचित नहीं समझते।''

यद्यपि जिन्न ने बेमौके टोक दिया था और राजा वीरेन्द्रसिंह तथा हमारे ऐयारों को इस बात का रंज होना चाहिए था, मगर ऐसा नहीं हुआ, बल्कि सभी ने जिन्न की बात पसन्द की और महाराज ने मायारानी को हाजिर करने का हुक्म दिया। तारासिंह गए और थोड़ी ही देर में मायारानी और दारोगा को इस तरह लिए हुए आ पहुंचे, जिस तरह अपनी जान से हाथ धोए और जिद्दी कैदियों को घसीटते हुए लाना पड़ता है। जिस समय मुन्दर वहां आई, उसने घबड़ाहट के साथ चारों तरफ देखा। सबसे ज्यादा देर तक उसकी निगाह जिस पर अड़ी रही, वह बलभद्रसिंह था, और बलभद्रसिंह ने भी मायारानी को बड़े गौर से देर तक देखा। जिन्न ने इस समय पुनः टोका और राजा वीरेन्द्रसिंह से कहा, ''आशा है कि हमारे होशियार और नीति-कुशल महाराज मुन्दर और बलभद्रसिंह की आंखों को बड़े ध्यान और गूढ़ विचार से देख रहे होंगे!''

जिन की इस बात ने होशियारों ओैर बुद्धिमानों के दिल में एक नया ही रंग पैदा कर दिया और तेजसिंह तथा वीरेन्द्रसिंह ने मुस्कुराते हुए जिन्न की तरफ देखा। इसी समय भैरोसिंह भी आ पहुंचे जिन्हें तेजसिंह कुछ समझा-बुझाकर आज दो दिन हुए बाग के उस हिस्से में छोड़कर आये थे जिसमें मायारानी गिरफ्तार की गई थी। भैरोसिंह के हाथ में एक छोटा-सा पुर्जा था जिसे उन्होंने तेजसिंह के हाथ में रख दिया और तब मुस्कुराते हुए जिन्न की तरफ देखा। भैरोसिंह को देख जिन्न के दांत भी हंसी से दिखाई दे गए, मगर उसने अपने को रोका और भैरोसिंह की तरफ से मुंह फेर लिया। तेजसिंह ने इस पुर्जे को पढ़ा और हंसकर राजा वीरेन्द्रसिंह के हाथ में दे दिया। राजा वीरेन्द्रसिंह भी पढ़कर हंस पड़े और जिन्न तथा भैरोसिंह की तरफ देखने लगे।

इस समय सभी की इच्छा यह जानने की हो रही थी कि भैरोसिंह ने जो पुर्जा तेजसिंह को दिया उसमें क्या लिखा हुआ था और राजा वीरेन्द्रसिंह उसे पढ़कर और जिन्न की तरफ देखकर क्यों हंस पड़े और इसी तरह जिन्न भैरोसिंह को और भैरोसिंह जिन्न को देखकर क्यों हंसे असल भेद न किसी को मालूम हुआ न कोई पूछ ही सका।

जब जिन्न ने मायारानी और बलभद्रसिंह की देखादेखी के बारे में आवाज कसी, उस समय मायारानी ने बलभद्रसिंह की तरफ से आंखें फेर लीं, मगर बलभद्रसिंह केवल आंख बचाकर चुप न रह गया बल्कि उसने क्रोध में आकर जिन्न से कहा -

बलभद्रसिंह - एक तो तुम बिना बुलाए यहां पर चले आए जहां आपस की गुप्त बातों का मामला पेश है, दूसरे तुमसे जो कुछ पूछा गया, उसका जवाब तुमने बेअदबी और ढिठाई के साथ दिया, तीसरे अब तुम बात-बात पर टोका-टोकी करने और आवाजें भी कसने लगे! आखिर कोई कहां तक ये हरकतें बरदाश्त करेगा तुम हम लोगों की बातों में बोलने वाले कौन?

जिन्न - (क्रोध और जोश में आकर) हमें भूतनाथ ने अपना मुख्तार बनाया है, इसलिए हम इस मामले में बोलने का अधिकार रखते हैं, हां, यदि राजा साहब हमें चुपचाप रहने की आज्ञा दें तो हम अपनी जबान बन्द कर सकते हैं। (कुछ रुककर) मगर मैं अफसोस के साथ कहता हूं कि क्रोध और खुदगर्जी ने तुम्हारी बुद्धि के आईने को गंदला कर दिया है और निर्लज्जता की सहायता से तुम बोलने में तेज हो गये हो। इतना भी नहीं सोचते कि इतने बड़े रोहतासगढ़ किले के अन्दर बल्कि महल के बीच में जो बेखौफ घुस आया है वह किसी तरह की ताकत भी रखता होगा या नहीं! (राजा वीरेन्द्रसिंह और ऐयारों की तरफ इशारा करके) जो ऐसे-ऐसे बहादुरों और बुद्धिमानों के सामने बिना बुलाए आने पर भी ढिठाई के साथ वाद-विवाद कर रहा है, वह किसी तरह की कुदरत भी रखता होगा या नहीं! मैं खूब जानता हूं कि नेक, ईमानदार, निर्लोभ और लापरवाह आदमी को राजा वीरेन्द्रसिंह ऐसे बहादुर और तेजसिंह ऐसे चालाक आदमी भी कुछ नहीं कह सकते, तुम्हारे ऐसों की तो हकीकत ही क्या जिसने बेईमानी, लालच, दगाबाजी और बेशर्मी के साथ-ही-साथ पापों की भारी गठरी अपने सिर पर उठा रखी है और उसके बोझ से घुटने तक जमीन के अन्दर गड़ा हुआ है। मैं इस बात को भी खूब समझता हूं कि मेरी इस समय की बातचीत लक्ष्मीदेवी, कमलिनी और लाडिली को जो इस पर्दे के अन्दर बैठी हुई सब-कुछ देख-सुन रही हैं बहुत बुरी मालूम होती होगी, मगर उन्हें धीरज के साथ देखना चाहिए कि हम क्या करते हैं। हां मुझे अभी बहुत-कुछ कहना है और मैं चुप नहीं रह सकता क्योंकि तुमने लज्जा से सिर झुका लेने के बदले में बेशर्मी अख्तियार कर ली है और जिस तरह अबकी दफे टोका है उसी तरह आगे भी बात-बात पर मुझे टोकने का इरादा कर लिया है, मगर खूब समझ रखो कि राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयारों की बातें मैं इसलिए सह लूंगा कि ये लोग किसी के साथ सिवाय भलाई के बुराई करने वाले नहीं हैं जब तक कोई कम्बख्त इन लोगों को व्यर्थ न सतावे, और ये नेक तथा बद को पहचानने की भी बुद्धि रखते हैं, मगर तुम्हारे ऐसे बेईमान और पापी की बातें मैं सह नहीं सकता। भूतनाथ पर एक भारी इल्जाम लगाया गया है और भूतनाथ का मैं मुख्तार हूं, इससे मेरी इज्जत में कमी नहीं आ सकती। तुम लक्ष्मीदेवी, कमलिनी और लाडिली के बाप बनकर अपने को बराबरी का दर्जा दिया चाहते हो, मगर ऐसा नहीं हो सकता। अगर भूतनाथ दोषी है तो तुम भी मुंह दिखाने के लायक नहीं हो। समझ रखो और खूब समझ रखो कि चाहे आज ही या दो दिन के बाद हो, भूतनाथ की इज्जत तुमसे बढ़ी ही रहेगी! (भूतनाथ की तरफ देखकर) क्यों जी भूतनाथ, तुम क्यों इससे दबे जाते हो तुम्हें किस बात का डर है?

भूतनाथ - (पीतल की सन्दूकड़ी की तरफ इशारा करके) बस केवल इसी का डर है, और इस कागज के मुट्ठे को तो मैं कुछ भी नहीं समझता, इसकी इज्जत तो मेरे सामने इतनी ही हो सकती है जितनी आज के दिन मायारानी की उस चीठी की होती जो वह अपने हाथ से लिखकर राजा गोपालसिंह के सामने इस नीयत से रखती कि उसका कसूर माफ किया जाये और लक्ष्मीदेवी का कुछ खयाल न करके मुझे पुनः रानी बनाया जाये।

जिन्न - निःसन्देह ऐसा ही है और इसी सन्दूकड़ी के सबब से बलभद्रसिंह तुम्हारे सामने ढिठाई कर रहा है। अच्छा इस सन्दूकड़ी का जादू दूर करने के लिए इसी के पास मैं एक तिलिस्मी कलमदान रखे देता हूं, जिसमें बलभद्रसिंह पुनः तुम्हारे सामने बोलने का साहस न कर सके और तुम्हारा मुकद्दमा बिना किसी रोक-टोक के समाप्त हो जाये।

इतना कहकर जिन्न ने अपने कपड़ों के अन्दर से एक सोने का कलमदान निकालकर उस सन्दूकड़ी के बगल में रख दिया जो राजा वीरेन्द्रसिंह के सामने रक्खी हुई थी और भूतनाथ के कागजात की गठरी में से निकाली गई थी।

यह कलमदान, जिसका ताला बन्द था, बहुत ही अनूठा और सुन्दर बना हुआ था। इसके ऊपर की तरफ मीनाकारी के काम की तीन तस्वीरें बनी हुई थीं और उनकी चमक इतनी तेज और साफ थी कि कोई देखने वाला इन्हें पुरानी नहीं कह सकता था।

इस कलमदान को देखते ही भूतनाथ खुशी से उछल पड़ा और जिन्न की तरफ देख के तथा हाथ जोड़ के बोला, ''माफ करना, मैंने आपकी कुदरत के बारे में शक किया था। मैं नहीं जानता था कि आपके पास एक ऐसी अनूठी चीज है। यद्यपि मैंने अभी तक आपको नहीं पहचाना, तथापि कह सकता हूं कि आप साधारण मनुष्य नहीं हैं। आप यह न समझें कि यह कलमदान मुझसे दूर है और मैं इसे अच्छी तरह से देख नहीं सकता। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, इसकी एक झलक ने ही मेरे दिल के अन्दर इसकी पूरी-पूरी तस्वीर खींच दी है! (आसमान की तरफ हाथ उठा के) हे ईश्वर, तू धन्य है!''

भूतनाथ के विपरीत बलभद्रसिंह पर उस कलमदान का उल्टा ही असर पड़ा। वह उसे देखते ही चिल्ला उठा और उठकर मैदान की तरफ भागा मगर जिन्न ने फुर्ती के साथ लपककर उसे पकड़ लिया और वीरेन्द्रसिंह के सामने लाकर कहा, ''भलमनसी के साथ यहां चुपचाप बैठो, तुम भागकर अपनी जान किसी तरह नहीं बचा सकते!''

केवल भूतनाथ और बलभद्रसिंह पर ही नहीं बल्कि तिलिस्म के दारोगा पर भी उस कलमदान का बहुत ही बुरा असर पड़ा और डर के मारे वह इस तरह कांपने लगा जैसे बुखार चढ़ आया हो। वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और बाकी के ऐयारों को भी बड़ा आश्चर्य हुआ और वे लोग ताज्जुब-भरी निगाहों से उस कलमदान की तरफ देखने लगे। तभी चिक के अन्दर से आवाज आई, ''इस कलमदान को मैं भी जरा देखना चाहती हूं!'' यह आवाज कमलिनी की थी जिसे सुनकर राजा वीरेन्द्रसिंह ने जिन्न की तरफ देखा और जिन्न ने जोश के साथ कहा, ''हां-हां, आप बेशक इस कलमदान को पर्दे के अन्दर भिजवा दें क्योंकि लक्ष्मीदेवी और कमलिनी को भी इस कलमदान का देखना आवश्यक है।'' (तेजसिंह से) ''आप स्वयं इसे लेकर चिक के अन्दर जाइये।''

तेजसिंह कलमदान को लेकर उठ खड़े हुए और चिक के अन्दर जाकर कलमदान कमलिनी के हाथ में रख दिया। वहां किसी तरह की रोशनी नहीं थी और पूरा अंधकार था इसलिए उन सभी को कलमदान अच्छी तरह देखने के लिए दूसरे कमरे में जाना पड़ा जहां दीवारगीरों की रोशनी से दिन की तरह उजाला हो रहा था।

सिवाय लक्ष्मीदेवी के और किसी औरत ने कलमदान को नहीं पहचाना और न किसी पर उसका असर ही पड़ा, मगर लक्ष्मीदेवी ने जिस समय उसे उजाले में देखा, तो उसकी अजब हालत हो गई। वह सिर पकड़कर जमीन पर बैठने के साथ ही बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी।

लक्ष्मीदेवी के बेहोश होने से एक हलचल-सी मच गई और कमलिनी तथा कमला इत्यादि उसे होश में लाने का उद्योग करने लगीं। तेजसिंह कलमदान उठाकर और यह कहकर कि ''लक्ष्मीदेवी की तबीयत ठीक होने के साथ ही बाहर खबर कर देना'' वीरेन्द्रसिंह के पास चले आये और कलमदान सामने रखकर लक्ष्मीदेवी का हाल कहा।

इस मामले से सभी का ताज्जुब बढ़ गया और वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह से कहा -

वीरेन्द्रसिंह - इन भेदों को खोलकर आज अवश्य फैसला कर ही देना चाहिए।

तेजसिंह - मैं भी यही चाहता हूं। (जिन्न की तरफ देख के) मगर यह बात बिना आपकी मदद के किसी तरह नहीं हो सकती!

जिन्न - जब तक राजा वीरेन्द्रसिंह आज्ञा नहीं देंगे मैं यहां से न जाऊंगा क्योंकि मैं भी इस मामले को आज खतम कर देना आवश्यक समझता हूं मगर तब तक सब्र कीजिए जब तक लक्ष्मीदेवी की तबीयत ठिकाने न हो जाय और वे सब पर्दे के पास आकर बैठ न जायं। हां, बलभद्रसिंह को कहिये कि वह उठकर अपने ठिकाने जाय और भाग जाने का ध्यान भूलकर चुपचाप बैठे।

बलभद्रसिंह की ताकत बिल्कुल निकल गई थी और वह जहां का तहां सुस्त बैठा रह गया था। तेजसिह ने उसे उठाकर अपनी बगल में बैठा लिया और थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा।

आधी घड़ी के बाद खबर आई कि लक्ष्मीदेवी की तबीयत ठीक हो गई और वे सब पर्दे के पास आकर बैठ गई हैं।

(बारहवां भाग समाप्त)


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