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कहानी

भगोड़े
पल्लवी प्रसाद


बात उस समय की है जब देश में सूचना और संचार, दोनों माध्यम का प्रसार सीमित था। आम आदमी के जीवन में यह पोस्ट-कार्ड और अंतर्देशीय पत्र के रूप में अमूमन मौजूद था तथा ट्रंक-कॉल और टेलीग्राम का खर्च वह मौत के सुरतेहाल में ही उठाता था। चूँकि यह कहानी आम-जन की है इसलिए यह ऐतिहासिक नहीं और इसके घटित होने का वर्ष-दिनांक कहीं दर्ज नहीं। यह उस समय की भी बात है जब हमारे रेलवे स्टेशनों पर कूड़ादान खोजने पर भी नहीं मिलता था। दरअसल उसे खोजने की सोच ही हम में तब नहीं आई थी। पटरियों के बीच लगे बंबे से बेपनाह गिरता पानी खूबसूरत लगता और उसके नीचे 'पब्लिक' नहा लिया करती। अपना वक्त बचाने के लिए दो प्लेटफॉर्म के बीच की पटरियों को यात्री आसानी से आते-जाते पार कर लेते। उन पटरियों पर आवारा कुत्ते, चूहे, छछुंदर, अनगिनत मक्खियाँ और भिखारी भी आजाद घूमते - जूठन, कूड़ा, सकोरे और पखाने के ढेर पर अपने स्वाद और रुचि अनुसार ठिठकते हुए। यह तब की बात है जब रेलगाड़ी या वेटिंग रूम के गुसलखानों में नहाने में घिन आती और लोग तीन दिन का रेल सफर बिना नहाए काट देते। मानो रेल की नाभी थी और उससे उठती दुर्गन्ध चंद घंटों के रेल यात्री की देह से भी इस तरह चिपकती कि मेजबान की गली का भूँकता, कटाहा कुत्ता उसके पीछे पड़ जाता। आखिर सिर धो कर नहाने के बाद ही यात्री अपने मौलिक चोले में लौट पाता। ...खैर!

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ट्रेन में यात्री कम हैं। आने वाले बड़े स्टेशनों पर गाड़ी भर जाएगी। स्लीपर डिब्बे के एक कंपार्टमेंट में दो ही यात्री बैठे हैं - एक लड़का और एक लड़की। वे आमने-सामने की खिड़कियों पर बैठे हैं और बाहर देख रहे हैं। लड़की की गोद में सिंकी हुई लाल मूँगफलियों का ठोंगा रखा है। जिसमें से वह दाने टूँग-टूँग कर खा रही है। उसने अपना सिर खिड़की के रॉड पर टिका रखा है। उसकी धूसरित लटें तेज हवा में फरफरा रही हैं और उसकी पलकें मिची जाती हैं। लड़की दुबली है। उसकी गर्दन की तराई में कंधों की हड्डियाँ उभरी हुई हैं। उसका रंग तीसरे पहर की धूप जैसा है जिसमें शाम का वादा है। कभी लड़का हाथ बढ़ा कर उसकी गोद से मूँगफलियाँ उठा लेता है तो कभी लड़की स्वयं ठोंगा उसकी तरफ बढ़ा देती है। नमक की पुड़िया वे अदल-बदल लेते हैं। लड़की अपनी उँगली पर लगा नमक ज्यादा देर तक चाटती है। लड़के का रंग साँवला है। छोटा मुँह, घने बाल, दुबला इतना कि उसके पैंट की मोहरी उसकी छाती को ललकारती है। दोनों ही कमसिन हैं। बात क्या है, यह समझ नहीं आती लेकिन कुछ तो बात है जरूर कि जो उन्हें पहली बार देखता है वह तुरंत पलट कर दूसरी बार भी देखता है। इस तरह उन्हें टी.टी.ई., मूँगफली वाला, झाड़ू मार कर पैसा माँगने वाला लड़का, गलियारे से गुजरते हुए यात्रियों, इत्यादि ने देखा है... माने, पलट कर। - उस कंपार्टमेंट में अब दो आदमी चढ़ आए हैं। वे किसी कारोबार के एजेंट हैं, वे आपस में परिचित हैं। एक पंजाबी है और दूसरा तेलुगु। इस गरमी में ऊपर लगे दो में से एक पंखे का न चलना वे हैरानी से देखते हैं। पंजाबी अपनी जेब से नीले रंग का बॉल पेन निकालता है और पंजों पर खड़े हो कर 'खुड़पेंच' में लग जाता है। वह स्विच ऑन-ऑफ करता है। लेकिन पंखा, पंखा है - वह ऋषि विश्वामित्र नहीं कि दो-चार कामुक अदाओं पर अपनी समाधि तोड़ ले। वह बंद पड़ा रहता है। इस दरम्यान तेलुगु एक बड़ा सा रूमाल निकाल कर अपने चेहरे और गर्दन पर बहता पसीना पोंछता है। वह कुछ स्वस्थ हुआ तो उसने दाएँ-बाएँ-ऊपर-नीचे अपनी आँखें घुमा कर कंपार्टमेंट का मुआयना किया। पंजाबी और तेलुगु दोनों रह-रह कर लड़का-लड़की को देखते हैं किंतु किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते। लड़का-लड़की ने उन्हें उड़ती नजरों से एकाध बार देखा फिर बाहर चलायमान नजारे और अपने खयालों में पुनः मग्न हो गए। - दो छोटे स्टेशन पार हो गए। तीसरे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर गाड़ी के इंतजार में पहले से खड़े लोग दिखाई दिए। गाड़ी के रुकने पर इस कंपार्टमेंट में एक बुजुर्ग महिला दो बच्चों के साथ चढ़ी। वह बच्चों की नानी है। फिर अगले बड़े स्टेशन पर रोज 'अप-डाउन' करने वालों का मजमा डिब्बे में दाखिल हुआ। सो अब कंपार्टमेंट में खूब भीड़ हो गई है। नीचे वाले बर्थों पर बैठे लोग तथा खड़े हुए लोग जगह की तंगी को ले कर सजग हैं। लड़की-लड़का की तरफ अब किसी का ध्यान नहीं रहा।

लड़की ने लड़के से पूछा, "खाना खाओगे?" लड़के ने हामी भरी। लड़की सीट के नीचे रखे झोले में से खाने के पैकेट निकालने लगी। नीचे झुकने से उसके कंधे की हड्डियाँ और उभर आईं, उसके ढीले कुर्ते का गला झूल गया। ऊपर वाले बर्थ से कई जोड़ी आँखें भीतर टपक गईं। एजेंटों ने भी कनखियों से उधर देखा। खड़े यात्रियों में किसी ने देख लिया, कुछ महरूम रह गए। लड़की ने कागज की पुड़िया में बड़े सलीके से लपेटे हुए पूरी-सब्जी-अचार को लड़के के हाथ में थमाया। एक पुड़िया उसने अपने लिए खोल ली। वे दोनों खाते जाते, एक-दूसरे को देखते या खिड़की से बाहर देखते। कभी मुँह का कौर चबाते हुए वे सहयात्रियों को भी देख लेते। लोग बार-बार लड़की को देखते। उन्होंने अब उसमें अपने लिए संभावना भाँप ली है। गर्मी के दिन के, भीड़ भरे सफर में कोई और कर भी क्या सकता था? हालाँकि लड़की से कहीं ज्यादा दिलचस्प वह थी जो कुछ देर पहले यहाँ से चने की चाट बेच कर गई है। उसने भीतर अँगिया भी नहीं पहनी थी और उसका हरा झालरदार फ़्रॉक दो-तीन जगह से मस्का हुआ था। उसकी उम्र चाहे जो रही हो, शरीर फ़्रॉक पहनने वाला नहीं था। वह वहीं खड़े-खड़े हाथोंहाथ चने बेच गई थी। एक-दो मनचलों ने भीड़ के बहाने, अनजान बन, उसके पीछे हाथ भी फेर लिया था। यह देख, कुछ यात्री मुस्कुरा दिए थे। न जाने वह चाट वाली ऐसों से खुद को कैसे बचाती थी? बचाती भी थी या खुद को भँजा लेती थी? कपड़ों में चाहे अंग न समाएँ, उसकी आँखों में दुनिया समाई थी। वह जो शोले भड़का गई थी उनकी तपिश लड़की को महसूस होने लगी। उसने चौकन्ने हो कर अपना दुपट्टा और कुर्ता ठीक किया। उसका मुँह उतर आया। उसने शायद लड़के को इशारा किया होगा इसलिए लड़के ने लड़की के बगल में बैठे आदमी को उठा कर अपनी खिड़की वाली सीट पर भेज दिया और खुद लड़की से सट कर बैठ गया। लड़की ने लड़के की आड़ ले कर राहत महसूस की। वह खिलने लगी। दोनों आपस में खुसुर-पुसुर करते और लड़की अपनी हँसी दबाती, लड़का मुस्कुराता। लड़का, लड़की की आँखों में उलझे-उलझे ही उसे खिड़की के बाहर कुछ दिखाने के बहाने उस पर ज्यादा झुक जाता। यह देख, लोग दंग हुए! यह मुआमला क्या है? यह भाई-बहन या ऐसे कोई 'शाकाहारी' संबंधी नहीं लगते। वे पति-पत्नी भी नहीं क्योंकि लड़की किसी भी नजरिये से ब्याहता नहीं दिखती। उसकी माँग में सिंदूर नहीं है। उसके कान, हाथ और गला, सब सूने हैं। न उसने पैर में पायल या बिछुवे ही पहने हैं। उसके अंगों पर आभूषण या श्रृंगार का नामोनिशान नहीं। उसने सूट भी पुराना सा पहना हुआ है। सादे नेवी ब्लू सलवार-कमीज पर प्याजी रंग का मामूली दुपट्टा। फिर वे कौन हैं? कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं? कहीं ये अपने घरों से भागे हुए प्रेमी युगल तो नहीं? दो बच्चों की नानी जो अब तक के सफर में अपने नाती-नातिन को छोड़ बाकी हर बात से उदासीन रही थी, वह भी अब इस जोड़े को कौतुहल से देखने लगी। लड़की के खिलाफ बूढ़ी की आँखों में निंदा साफ झलकती थी। - बहुत देर बाद वहाँ टी.टी.ई. आया। उस वक्त वह जोड़ा एक-दूसरे पर जरा सा ढला हुआ ऊँघ रहा था। वहाँ पहुँचते ही, टिकट चेकर की अनुभवी आँखों ने भीड़ को चीरते हुए सबसे पहले उन्हें ताड़ लिया था। टिकट चेकर ने रेलवे की सेवा में बाईस साल काटे हैं। वह, 'बागीचा-ए-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे, होता है शबो रोज तमाशा मेरे आगे' टाइप का खुदा का फिलॉसोफर बंदा है। उसने अन्य यात्रियों के टिकट चेक करते हुए कई बार उधर नजर डाली। वह मन ही मन चकराया भी। लेकिन सरकारी आदमी यदि हर ऊँच-नीच पर 'रिएक्ट' करने लगे तो वह ऊपरी आमदनी कब कमाएगा? अभी गाड़ी फुल है, वह अपना 'टाईम खोटी' नहीं करेगा। उसने लड़के को जगाया, लड़के ने उसे दो टिकट दिखाए। टिकट चेकर भीड़ को धक्का देते हुए अगले कंपार्टमेंट में बढ़ गया।

सूर्यास्त के बाद चलती हुई गाड़ी में एक के बाद एक बत्तियाँ जल उठीं। जल्द ही खिड़कियों के बाहर सब ब्लैक-आउट हो गया। अब खिड़कियों के काँच पर कंपार्टमेंट के भीतर का अक्स उभर आया। कोई लाख कोशिश कर ले उनसे पार देखने की, उसे अपना ही काला मुँह चिढ़ाएगा। सिर्फ गुजरती हुई पीली बत्तियाँ बस्तियों का अंदेशा देतीं। एक साहब इधर एक स्टेशन पहले ही चढ़े हैं। उन्होंने बढ़िया लेकिन सौम्य कपड़े पहने हैं। उनके सफेद बाल किसी तेल या क्रीम की मदद से सटा कर एक तरफ काढ़े गए हैं। बालों की सफेदी के बनिस्बत चेहरे की त्वचा स्निग्ध और कसी हुई है, उनका ताँबई रंग दीप्त तथा गाल फूले हुए हैं जिन पर खिचड़ी मूँछें ढली हुई हैं। अभी-अभी एक मूँगफली वाला, साहब के बगल में एक बड़ी पुड़िया में मूँगफली रखते हुए तेजी से निकल गया। साहब की बगल में ऐसे कई पैकेट मूँगफली, रेवड़ी और गजक के पहले से ही मौजूद हैं। उनके बीच एक पुड़िया 'झाल-मूढ़ी' की, अपना सा मुँह बाए पड़ी है। हर गुजरता हुआ फेरीवाला अपना एक नग माल साहब के पास धरता हुआ, आँखें चुराते हुए, तेजी से निकल जाता है। पैसे का कोई लेन-देन नहीं। साथी यात्री चकित देख रहे हैं कि साहब की सौम्यता तिनका भी न हिलती है, गोया डिब्बे में एक वही हैं जो इन पैकेट-पुड़ियों से बेखबर हैं। - ऊपर की बर्थ पर लेटे एजेंट रह-रह कर नीचे झाँकते हैं, लड़का-लड़की की नजरें बारंबार साहब की ओर घूम जाती हैं... बच्चों का मत पूछिए! वे नानीजी की गोद से ऊपर नीचे फिसल कर उनकी साड़ी खींच-बिगाड़ रहे हैं, एकदम से चंचल हो कर अपनी देह को आड़े-टेढ़े उमेठ रहे हैं। बच्चे की नजरें पैकेट पर से हटती नहीं। उसकी छोटी बहन की नजरें जब हटती हैं तो याचना से अपनी नानी को देखती हैं। नानीजी कि खिन्नता बढ़ रही है। बहुत देर से कोई चाय वाला इधर क्यों नहीं आया? शाम कट गई, अँधेरा चढ़ आया और चाय का ठिकाना नहीं। यात्रियों को चाय के लिए उचकता हुआ भाँप कर साहब ने एक गुजरते हुए बूट-पॉलिश वाले से अपने सौम्य अंदाज में कहा "चाय भेजो।" पॉलिश वाला बिदक कर भागा। साहब ने पहली बार अपने सहयात्रियों को हौले आवाज और एक मुस्कान के साथ संबोधित किया, "वे जानते हैं मैं इस डिब्बे में हूँ इसलिए चाय वाले इधर नहीं आ रहे।" यह सुन, रहस्य से लोगों के मुँह खुल गए। लड़के ने पूछा, "क्यों अंकल?" साहब बोले - "मैं फूड इंस्पेक्टर हूँ।" कंपार्टमेंट में बढ़ा तनाव अचानक झूल गया। अब साहब 'फ्रेंडली' हो गए जिसका सीधा मुनाफा बच्चों को हुआ, उनके नन्हें मुँह और मुट्ठियाँ मूँगफलियों और रेवड़ियों से कस गए। लड़के ने सोच कर पूछा, "फेरीवाले आ-जा रहे हैं तब सिर्फ चाय वाले ही क्यों न आते हैं?" साहब ने बताया, "मूँगफली, रेवड़ी वगैरह में क्या मिलावट हो सकती है? लेकिन चाय में पूरा-पूरा 'लोचा' है। इन लोगों में आग की तरह खबर फैलती है कि फलाँ डिब्बे में फूड इंस्पेक्टर बैठा है... बस, चाय वाले चंपत!" बात पर जोर देते हुए उन्होंने अपनी चुटकी बजाई। मानो उनकी चुटकी सुन, जिन्नात की तरह तीन चाय वाले वहाँ हाजिर हो गए। चाय वालों ने बड़े विनम्रतापूर्वक यात्रियों को चाय परोसी। साहब ने चाय नहीं पी - उन्हें प्रमेह की शिकायत है। चाय वाले चले गए। लोग चाय सुड़कने लगे। साहब ने सबको बारी-बारी ध्यान से देखा और बात में हुल देते हुए पूछा, "क्या ट्रेन में आपलोगों ने कभी बदरंग चाय देखी है?" लोगों ने अपनी याददाश्त पर जोर डाला, एक-दो निर्णय न ले पाए, बाकी ने 'ना' में सिर हिलाया। साहब खुश हो कर बोले, "पूछिए क्यों?" सबने पूछा, "क्यों?" - "देखिए, वह ऐसा है... कि ये लोग चाय में जलेबी में पड़ने वाला रंग मिलाते हैं। तभी वे सुबह की बनी चाय को दिन भर गरम कर-कर के बेचते हैं लेकिन उसका रंग खिला का खिला रहता है, मानो वह तुरंत बनी हो। हम फूड इंस्पेक्टर यह बात जानते हैं, चाहें तो सबको पकड़ लें।..." लोगों ने अचकचा कर अपने कप में बची हुई चाय को देखा। साहब हँस कर बोले, " अरे, चायवाले मुझे जानते हुए यहाँ आए थे। चाय शुद्ध और बढ़िया होगी... कैसी लगी?" चाय वाकई अप्रत्याशित रूप से स्वादिष्ट थी। लोगों ने साहब का लोहा माना। आखिरकार, साहब का स्टेशन आया और वे अपना खाद्य-खजाना समेट कर वहाँ उतर गए। पल भर को ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे कोई प्रिय मेहमान घर से चला गया हो। ...लोगों का ध्यान और संदेह एक बार फिर से जवान लड़का-लड़की पर सिमटने लगा।

ऊपरी बर्थ पर सो रहे तेलुगु एजेंट की अनायास आँख खुल गई - नींद के भीतरी अंधकार से बाहरी अंधकार में उनके खुलने का यह असर था कि एजेंट समझ नहीं पाया वह कहाँ है? उसके दाएँ, दीवार, ऊपर छत और बाएँ गहरी खाईं... जो इतनी भी अँधेरी नहीं थी, वहाँ उसे लड़के का घुँघराला सिर दिखाई दिया... रफ्तार का भास हुआ... वह ट्रेन में है!!! - यह एहसास क्षणांश में ही घटित हो गया। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, फिर खोलीं। उसने अपने हवा-तकिया के नीचे दबी हाथ-घड़ी को देखा, रात के सवा दो बज रहे हैं। ...क्या कर रहा है यह लड़का? मँझले बर्थ पर लड़की चादर में लिपटी सोई थी... लड़का उस पर झुका हुआ था। चादर के भीतर कसमसाहट हो रही थी... यहाँ लड़के की झुकी पीठ के चलते दृश्य अवरुद्ध हो रहा था। वह शायद मदहोश सा कुछ फुसफुसा रहा था जिसमें से सिर्फ "ह-नी मून...हन्नी मून" के शब्द हवा में साफ तिर रहे थे। - एजेंट को एकदम से गुस्सा आया। ' यह आजकल के लौंडे! आधी बालिश्त की छाती नहीं और मजाल इतनी कि किसी बदकिस्मत बाप की बेटी भगाए लिए जा रहा है? इसे दिन में ही जी.आर.पी.एफ. के हवाले करना चाहिए था। अपने लोगों की भी गलती है कि ऐसे अपराधियों की करतूतों को नजरअंदाज करते हैं...।' यूँ सोचते हुए कि सुबह में देखा जाएगा, एजेंट ने दीवार की तरफ करवट फेर ली। लेकिन वह इनसान ही था। प्रत्यक्ष दृश्य पर पटाक्षेप होने के बाद जल्द ही उसकी आँखों के सामने कई-कई दृश्यों की रील चलने लगी - किसी जमाने में देखीं दक्षिण भारतीय 'ए' सर्टिफिकेट फिल्मों की। अवश्य ही वह अब तक की सारी बातें और आगे भी, अपनी भाषा में ही सोच-महसूस रहा होगा और रहेगा। हरारतवश एजेंट के शरीर पर लंबाई-चौड़ाई से एक महीन परत पसीने की बिछ गई। वह क्या करे? उसकी जगह कोई दूसरा होता तो लड़के को दो झाँपड़ में पापड़ कर देता और लड़की को... भागी हुई लड़की का क्या है, बहती गंगा है...। लेकिन एक शरीफ आदमी ज्यादा से ज्यादा जो कर सकता है, उसने वही किया - शौचालय की राह पकड़ी।

एजेंट बहुत देर तक दौड़ रही ट्रेन के खुले दरवाजे पर खड़ा सिगरेट पीता रहा। हवा के शीतल थपेड़ों ने उसे ताजादम कर दिया। उसके भीतर का नागरिक बहुत पहले ही पुनः अचेत हो चुका था - भाड़ में जाए। वह ही बचा है थाना पुलिस करने को? ऐसी लड़कियों के साथ ठीक होता है। यह सुबह बचीं तो शाम लुटेंगी। ख्वामखाह ही किस चक्कर में उसने अपनी नींद बिगाड़ ली! वह थका सा अपने बर्थ पर लौटा तो उसे यह देख कर अचरज हुआ कि अन्य यात्रियों की तरह, लड़का और लड़की अपनी-अपनी बर्थ पर शांत सो रहे थे। एजेंट भी अपनी बर्थ पर चढ़ कर सो गया।

***

बड़ा शहर! बड़े शहर की बात निराली। जब लड़का और लड़की खूब-खूब गहमा गहमी भरे रेलवे स्टेशन से बाहर निकले तब उनकी आँखें चौंधिया गईं, कुछ तेज धूप और कुछ शहर की छटा ऐसी थी। अभी उनकी यात्रा पूरी नहीं हुई है, उन्हें यहाँ से दूर जाना है। लेकिन लड़का अब एक कदम आगे न बढ़ना चाहता है। लड़की को पूरी तरह से अपने अख्तियार में पाकर लड़के का मगज फिर गया। वह उसके संग पहले हनीमून मनाना चाहता है... उसके बाद ही वह कुछ सोच या कर पाएगा। लड़की जरूर पहले अनमनी हुई परंतु जब उसने लड़के की तरफ देखा तो उसकी तपती निगाहों के प्रणय-दलदल में फँस कर उसके आँखों के डोरे गुलाबी हो उठे और पलकें झुक गईं। चिलचिलाती धूप में भी उसकी देह लरजने लगी। प्रेम क्या माने... न मौसम, न वर्जना! उन्हें किसी होटल में रूम लेना अनिवार्य मालूम पड़ा हालाँकि इसका दोनों को ही तजुर्बा नहीं था। यह शहर लड़के के लिए अजनबी है। - उन्हें असमंजस में खड़ा देख, कुछ ऑटो वालों ने उन्हें फौरन आन घेरा। बड़े शहर के ऑटो चालक, बड़े खुर्रांट और अनुभवी! एक ने ऑटो स्टार्ट करते हुए लड़के से सीधा सवाल पूछा, "होटल ले चलूँ साहब?" लड़के ने सामान ऑटो में रखा, सामान क्या था - लड़की का एक पुराना-धुराना सूटकेस और लड़के का एक बड़ा सा झोला! वह ऑटो वाले से बोला, "हाँ, लेकिन ऐसी जगह ले चलना जहाँ रेट कम हो..." - "फिक्र नॉट साहब, अपन रोज सवारियों को उनके मनमाफिक ठिकाने पहुँचाता है।" - ऑटो वाले ने रियर व्यू मिरर में लड़की को निर्लज्जता से घूरते हुए कहा। ...लड़ा... लड़ा... लड़ा... रे बचा!!! - तकरीबन दस मिनट तक वह ऑटो ट्रैफिक की गाँठों से उलझता हुआ, साँय-फाँय होता हुआ 'ए-वन होटल' के सामने जा रूका। यदि होटल के नाम का बोर्ड नहीं लगा होता तो यकायक पहचानना मुश्किल होता कि वहाँ कोई होटल है। दुकानों के बीच एक सँकरा, अँधियाला सा रास्ता है जो रंगरोगन को तरसती हुई उस इमारत की दूसरी मंजिल पर ले जाता है। वहीं, ऊपर होटल ए-वन है। यहाँ दिन में भी रोशनी की जरूरत है... मैनेजर की मेज के पीछे एक मद्धिम वोल्टेज का बल्ब जल रहा है। जिसकी मैली रोशनी में वहाँ मौजूद लोगों के हाव-भाव पढ़ना भी मुश्किल सा है। ऑटो वाला बड़े याराना अंदाज से लपकता हुआ ऊपर आया था लेकिन न जाने क्या देख उलटे पैर सीढ़ियों से नीचे उतर गया? - गुलाबी बुश्शर्ट पहने एक तोंदियल आदमी, यहाँ का मैनेजर मालूम पड़ता है। वह अपने मेज के सामने खड़े एक ऊँचे डील के आदमी के साथ बहस कर रहा है, न जाने किस बाबत? उस आदमी ने खाकी पैंट पर सफेद कमीज पहन रखी है जो लापरवाहीवश पैंट के बाहर निकली हुई है। सामने कत्थई रंग के रैग्जीन के सोफे पर दो कॉन्सटेबल बैठे हैं, मानो यूँ ही। मैनेजर द्वारा तवज्जो नहीं दिए जाने पर लड़का असमंजस में पड़ा। वह कुछ अनिश्चितता से उनकी बहस के खत्म होने की राह देखने लगा। लो जी, मैनेजर मेज के पीछे से निकल कर ऊँचे डील के आदमी को लिए परले अँधेरे कोने में कुछ 'फरियाने' लगा। तभी एक खामोश सा बूढ़ा नौकर प्रकट हुआ और उसने लड़के के सामने होटल का मेहमान-रजिस्टर बढ़ाया। बही के बीच एक मैली सी डोर से बँधा, सस्ता नीला पेन रखा था - लड़के ने दस्तखत किए और राहत की साँस ली।

लड़का-लड़की होटल के कमरे में सीलन की बदबू, पान के पीक की छींट, मैले फर्श, गंदे और टूटे टॉयलेट-बाल्टी-मग, तैलीय बिस्तर-पोश, चर्र चूँ करते पलंग और उसके नीचे पड़े इस्तेमाल हुए कंडोम के कागज तथा संभवतः मौजूद खटमल व बीमारी के कीटाणुओं से बेखबर हैं। संग विवश बँधी उनकी रूहों को यह कमरा स्विट्ज़रलैंड की वादी से कम हसीन नहीं लग रहा। मानो यहाँ बेपनाह मुहब्बत की कलियों के गलीचे बिछे हैं - वे कलियाँ एक साथ "चटक्" से बज कर, खिल उठना चाहती हैं। उनकी खुशबू... खुदा खैर करे!

"धड़-धड़...धड़-धड़-धड़-धड़..." - कोई बदतमीजी से कमरे का दरवाजा भड़भड़ा रहा है। इस व्यवधान से खिन्न हो, लड़के ने जरा रोष में दरवाजा खोला। सामने, बाहर सोफे पर जो कॉन्सटेबल बैठा था वह खड़ा है, बोला, "बाहर निकलो।" लड़का - "क्या बात हुई?" कॉन्सटेबल - "रेड पड़ी है।" लड़का बुद्धू की तरह बोला, "हैं???" उसके पैरों तले धरती खिसक गई, सिर पर आसमान नाच उठा। वह बोला, "अरे, हम तो अभी-अभी आए हैं, आपके सामने ही तो!" कॉन्सटेबल ने भद्दा इशारा किया, "करने तो वही आए हो।" लड़का बौखला उठा, बोला, "हमने कुछ नहीं किया। हम बेकुसूर हैं..." कॉन्सटेबल ने लड़के के पीछे खड़ी भय-चकित लड़की पर एक उड़ती निगाह डाली और लड़के से बोला, "तूने रजिस्टर पर सही की, येइच तेरा कुसूर। ...चल फटाफट!" होटल के गलियारे में उन्हें अन्य जोड़े भी मिले। छुट्टी का दिन नहीं था तथा अभी दोपहर भी न होने पाई थी इसलिए जोड़े अधिक नहीं थे। जो थे लगता था पुराने अनुभवी थे। उन लड़कियों या महिलाओं ने चटपट अपने मुँह पर कपड़ा लपेट लिया था ताकि देखने वाले को उनकी शिनाख्त न हो पाए। उनमें से कुछ तो पुलिस की गाड़ी में हँसती-बोलती बैठ रही थीं मानो पुलिस उनकी पुरानी यार हो। हाँ, कई पुरुष जरूर परेशान दिखाई देते थे। कॉन्सटेबल उन्हें तसल्ली दे रहे थे कि पत्रकार वगैरह कोई नहीं आएगा इधर। पुलिस की गाड़ी भी होटल के पिछवाड़े की सड़क से निकली मानो 'गुनाहगारों' को समाज की नजरों से बचाते हुए। लड़का बहुत ही चिंतित ढंग से इस मुसीबत से निकलने के उपाय ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा है। बेचारी लड़की के कलेजे को भय का भूचाल रौंद रहा है। हक्के-बक्केपन में उसने अपना मुँह भी नहीं ढाँपा है, वह चलती गाड़ी में हिचकोले खाती विस्फारित नेत्रों से बारी-बारी सबको देख रही है। उसे अपने दुर्भाग्य पर यकीन न आता है।

यह अवश्य अचरज की बात थी कि पकड़े गए जोड़ों के प्रति पुलिस का व्यवहार बुरा नहीं कहा जा सकता था। जल्द ही इस भेद से पर्दा उठ गया - होटल मालिक कई दिनों से थाने का हक पहुँचाने में बेईमानी कर रहा था। यह रेड नकली है। यदि होटल मालिक ने जल्दी वाजिब रुपये न उगले तो लिखा-पढ़ी दर्ज कर रेड असली बना दी जाएगी। फिर बच्चू को बचाने वाला कोई न होगा - इस बार ऊँट पहाड़ के नीचे आ गया है। होटल मालिक की पहुँच चाहे नेताआों और आला अफसरों तक रहे, 'लोकल थाना' आखिर लोकल थाना रहेगा। थाने में लाए गए लोगों को कहीं भी या किसी को भी फोन लगाने की मनाही है। मुआमले के निबटने के इंतजार में कुछ लोग चाय पी रहे हैं...। लेकिन लड़का-लड़की के ऐसे भाग्य कहाँ? वे यहाँ आकर बुरी तरह फँस गए हैं। लड़के ने पुलिस को बता दिया है कि वे शादी-शुदा हैं। यह बात पुलिस के लिए फीके मजे की निकली, एक पुलिस वाला उदासीनता से बोला, "कुछ नया बोल, यह तो सब बताते हैं।" लड़का बेवकूफ ठहरा। उसने बात को तूल दे दी, वह बार-बार दुहराने लगा कि वे शादी-शुदा हैं। लड़की ने भी उसका साथ दिया। अचानक से थानेदार मेज पीटते हुए बोला, "अर्रे स्साला! यह तो लड़की भगा लाया है...!" अब फौजदारी रजिस्टर फड़फड़ा कर खुला... लड़की बालिग-नाबालिग का घालमेल दिखती थी। नाबालिग हुई तो किडनैपिंग, बलात्कार की धारा से कम क्या लगेगा? लड़का हाथ जोड़ के बड़ी जोर से घिघियाया, "हम शादी-शुदा हैं हुजूर।" प्रतीत होता था आखिरकार होटल मालिक ने पिछला हिसाब चुकता कर सेटिंग पूरी कर दी है। लोगों को छोड़ दिया गया है। थानेदार ने बाहर जाते हुए लोगों की तरफ इशारा कर के लड़के से कहा, "भाई मेरे, मौज करता। शादी करने की के जरूरत पड़ी थी?" और वह भोंडी हँसी हँसा। फिर उसने कड़क कर पूछा, "नाम?" - लड़के ने सूखते कंठ से उत्तर दिया, "राजेश।" - "पूरा नाम?" - "राजेश...कुमार।" ... "...तेरा नाम?" लड़की ने लड़के को देखते हुए कहा, "नूरी।" थानेदार चौंका, "ऐं ...मुसलमानी भगा लाया? दंगा करवाएगा...।" लड़की ने घबरा कर टोका, "नहीं जी, मैं हिंदू हूँ। मेरा पुराना नाम रीना है। शादी के समय नाम बदलने के रिवाज पर इन्होंने मेरा नाम बदल दिया, नूरी।" पास खड़ा एक कॉन्स्टेबल गुनगुना उठा, "आ जा रे... आ जा रे ओ मेरे दिलबर आ जा, दिल की प्यास बुझा जा रे...नू...रीई...।" वह अपने गिरेबाँ पर हाथ फेरते हुए मुस्कुराया, "लव स्टोरी वाली फिल्म थी, सर।" थानेदार हँसा।

लड़की के मुँह में एक चीख घुट कर रह गई। परदे के पीछे एक उम्रदराज महिला कॉन्स्टेबल उसके शरीर की तलाशी ले रही है। अभी-अभी उसका हाथ लड़की के कमर और जाँघ के बीच आ कर रुक गया है - वहाँ एक सख्त उभार है जो टटोलने पर छुन् -छुन् बोलता है। महिला कॉन्स्टेबल ने लड़की की एक न सुनी, उसे अपनी सलवार ढीली करनी ही पड़ी। देखा तो वहाँ लड़की के अंतर्वस्त्र में सेफ्टी पिन की मदद से एक नीले रंग का मखमली बटुआ टँका था। लड़की ने काँपते मन और थरथराते हाथों से बटुआ खोल कर दिखाया तो कॉन्स्टेबल के मुँह से निकला, "घर से चोरी कर के भागी!" ...बटुए के भीतर से सोने का एक मंगलसूत्र, एक नेकलेस-झुमके का सेट, एक चेन, दो जोड़ी टॉप्स, चार अँगूठियाँ, दो चूड़ियाँ, चाँदी के छ बिछुवे, एक जोड़ी पायल और सौ रुपये के चार मुड़े हुए नोट बरामद हुए। महिला कॉन्सटेबल ने इन्हें फौरन झपट कर अपने कब्जे में ले लिया। रोती हुई लड़की कॉन्सटेबल के घुटने पकड़ कर धरती पर लोट गई। हिचकियों के बीच वह बोली, "चोरी कैसी, चाची? ये गहने मेरे हैं, मेरी अपनी शादी के चढ़ावे हैं...।" कॉन्स्टेबल, व्यंग्य से - "कब हुई तेरी शादी?" - "तीन महीने हो गए, चाची। पहली बार मायके जा रही हूँ।" कॉन्स्टेबल - "बहुत होशियार बनती है? तूने खुद को हिंदू बताया ...न सिंदूर, न कोई सुहाग चिन्ह... अभी बच्ची है। माँ-भाभी के गहने चुरा कर अपने यार के साथ भागी है, मुझे बेवकूफ बनाती है?" इतना सुनना था कि लड़की लपक कर उठी और उसने आनन फानन अपने बालों से पिन नोच फेंकी, फिर चोटी ढीली कर के सामने के बाल उलटे किए तो उसके सिर पर एक नई माँग निकल आई, दपदप सिंदूर से भरी हुई। वह दौड़ी और उसने अपना पुराना-धुराना सा सूटकेस महिला कॉन्स्टेबल के सामने खुला पटक दिया। कॉन्स्टेबल देख कर हैरान थी, सूटकेस के अंदर कई-कई रंग की चकमक करती साड़ियाँ थी, रेशमी गोटेदार कपड़े में लिपटा सिंदोरा (शादी के वक्त चढ़ाये जाने वाला लकड़ी का बना लंबा-ऊँचा सिंदूरदान) लिटा पड़ा था। लड़की ने किरन लगी पीले रंग की बिहौती साड़ी के नीचे से शादी की एक बड़ी सी फोटो निकाली और महिला कॉन्सटेबल को दिखाई, कॉन्स्टेबल मुँह बाए देखते ही रह गई...।

दो-तीन बार एक न एक पुलिसवाला भीतर झाँक कर लौट गया। थाने के सारे रंगरूट महिला कॉन्सटेबल के उम्र, अनुभव और कर्कश स्वभाव के आगे दबते हैं इसलिए टोका किसी ने नहीं। कॉन्सटेबल पालतू बूढ़ी शेरनी की तरह मुँह लटकाए बैठी, लड़की की राम कहानी सुन रही है - कैसे तीन महीने होने पर भी जब मायके से उसे कोई न लेने आ सका तो लड़के को उसके बाप ने दुकान से मोहलत दी कि वह बहु को मायके छोड़ आए। लड़की की सास बड़े कड़े स्वभाव की है, सदा कड़वे-मीठे बोल सुनाती रहती हैं। वे चाहती हैं सबके सामने उनकी बहु पहन-ओढ़ कर लक्-दक् रहे, इस से चार लोगों के बीच उनका नाम हो। धन्य है उनकी व्यावहारिकता कि कहीं नव-विवाहित दंपत्ति जान, बेटे बहु को उनकी प्रथम यात्रा में चोर-ठग लूट न लें इसलिए उन्होंने बहु के तन से एक एक गहना उतरवा लिया। माथे पर जरा सी बिंदी लगवाई और केश का माँग यूँ कढ़वाया कि सिंदूर छुप जाए। उसे साड़ी की जगह पुराना सूट पहनवाया कि कोई जानने न पाए कि वह नई दुल्हन है। इतना ही नहीं, सास ने विशेष रूप से अपना पुराना सूटकेस भी बहु को ले जाने के लिए दे दिया। नई दुल्हन के पास से चोर उच्चकों को जेवर माल मिलने का पक्का यकीन जो होता है। इतनी लंबी यात्रा पर नए दूल्हा-दुल्हन का अकेले जाना सुरक्षित नहीं। जमाना बड़ा खराब है। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से वह बटुआ सिया और उसमें गहने ठूँस कर बहु को अंतर्वस्त्र में छुपाने के लिए दिए और सख्त ताकीद की कि मायके पहुँचने पर वह दिन-रात उन्हें वहाँ धारण किए रहेगी। फिर, उनके किस रिश्तेदार ने कौन सा गहना मुँह दिखाई में उसे दिया था यह उन्होंने बहु को पुनः रटवाया। हालाँकि इन गहनों में एक सेट लड़की के मायके का है। वे उसके माँ-बाप को जतलाना चाहती हैं कि उन्होंने तो अपनी बेटी को यूँ ही विदा कर दिया, उसके भाग्य ससुराल में आ कर खुले हैं। वे उनकी बेटी को उन्हीं की लुक्खई का आईना बना कर भेजना चाहती हैं। परंतु उस ग्रामीण अक्ला-बुआ की बगटूट कल्पना में भी यह बात न आ सकती थी कि उसके बेटे-बहु को दुनिया भगोड़ा प्रेमी युगल समझ बैठेगी। ...खैर अब जब यह साबित हो चुका है कि लड़का-लड़की सच में विवाहित हैं, पुलिस वालों की उनमें दिलचस्पी न रही। ऐसे भी, मेज और कुर्सी के हिसाब से अभी-अभी उनमें हिस्सा बँटा है (होटल वाला)। वे सब अपने आप में मस्त हैं। महिला कॉन्स्टेबल ने बड़ी चालाकी से गहनों के बटुवे वाली बात अपने साथियों से छिपा ली है। अब वह बटुआ एक बार फिर से लड़की के अंतर्वस्त्र में सुरक्षित टँका है। लेकिन इस बार वह थोड़ा हल्का हो गया है क्योंकि कॉन्स्टेबल के निर्देश पर लड़की ने पाँवों में बिछुवे और पायल व कानों में टॉप्स पहन लिए हैं। उसकी माँग में सिंदूर दिख रहा है और उसने अपने माथे पर सिंदूर से गोल बिंदिया बना ली है। वह विवाहिता है, अब इसमें कोई शक नहीं। - जो बात वह लड़की नहीं जानती और कभी न जान पाएगी वह यह कि उसकी कॉन्स्टेबल 'चाची' नि:संतान हैं और इसी वश पति द्वारा परित्यक्त भी। - कि वे आज सुबह ही ड्यूटी पर लौटी हैं। वे अपनी बहन की बेटी की शादी में शरीक होने अपने घर गई हुई थीं। वहाँ बेटी की विदाई के वक्त रो-रो कर उन्होंने ऐसा समाँ बाँधा था कि उनकी बहन भी एकबारगी चुप लगा गई थी। न जाने वे क्या को रोती थीं... बहन-बेटी के विछोह को, बाँझपन को या अपने एकाकी जीवन को? आज उनके पैरों पर रोती हुई नूरी ने उन्हें अपनी तुरंत शादीशुदा, विदा हुई बहन-बेटी की याद दिला दी। ...चलते वक्त कॉन्स्टेबल ने नूरी को एक कागज पर थाने के दो फोन नंबर लिख कर दिए और कहा, "कहीं कोई दिक्कत हो, कोई रोके तो बेझिझक फोन करना, कहना खेडुन मैडम से बात कराओ, उनके घर से बोल रही।" लड़की - "खेडुन?" कॉन्स्टेबल - "हाऊ! खैरुनिस्सा कुरैशी।"

बस स्टैंड पर राजेश और नूरी बैठे हैं। वे नूरी के घर-कस्बे जाने वाली बस की राह देख रहे हैं। दोनों पर बीती हुई दुर्घटनाओं की जलालत पूरी कुरूपता के साथ बरस रही है। राजेश एकदम खामोश बैठा है। नूरी रोई जा रही है। वह खफा है, बहुत-बहुत ज्यादा खफा! न उसने राजेश का दिया हुआ पानी पिया, न ही कुछ खाया है। आस-पास बहुत लोग हैं लेकिन किसी की उनके प्रति दिलचस्पी नहीं जाग रही। वे विवाहित जोड़ा हैं। तो क्या हुआ जो पत्नी लगातार रोए जा रही है, होगा कोई आपसी मसला या मायके से लौटती होगी...। देखने वाले अपनी उचाट नजरें फेर लेते हैं, कोई उन पर ध्यान नहीं दे रहा। राजेश क्या जानता था कि उसकी बनाई हनीमून की योजना का ऐसा भयंकर परिणाम निकलेगा? सिनेमा में तो कुछ और ही दिखाते हैं...? इसी तरह रोते-धोते बस आ गई और वे राम-राम करते हुए अपने गंतव्य पर पहुँचे।

आज रात राजेश की आँखों में नींद नहीं। वह पहली बार अपने ससुराल आया है। सास-ससुर अपने नए, बड़े दामाद की आवभगत में जरा सी भी कसर नहीं छोड़ रहे। छोटे साले-सालियों ने 'जीजा जी' को घेर रखा है। वे उन्हें संग लिए उछलते-कूदते बाजार घूमने निकल पड़ते हैं। लेकिन उसका दिल जिसके पास है, वह तो उसके पास आती ही नहीं। कल पहली रात थी और वह छोटे भाई-बहनों को कहानियाँ सुनाती, उन्हीं के साथ गदबद् हो कर सो गई थी... वह रात भर जागता रहा उसके इंतजार में। आज की दोपहर वह सिर-दर्द का बहाना कर के पड़ा रहा... छोटे साले बारी-बारी से उसका सिर अपने नन्हें हाथों से दबाते रहे लेकिन वह न आई। कितनी कठोर-हृदया है? ...एक बहन, तीन भाई - उसके बाप ने फौज लगा दी है और अपने राम का ये हाल! लगता है आज की रात भी आँखों में कटेगी। सास को जरूर खटका हुआ है और वे बेटी को किसी न किसी बहाने दामाद के कमरे में भेजती रहीं लेकिन वह उज्जड़ हमेशा अपने साथ फौज को लिए आती। वह अपमान का घूँट पिए जाता है, डरता है कि कहीं वह अपने माँ-बाप से होटल और थाने वाली बात न कह दे। वह अपने घर में होता तो इस हूर-परी को बताता, इसके नखरे धरे रह जाते...। कल सुबह की गाड़ी पकड़ कर वह अपने घर लौट जाएगा। वह इस तरह अपनी नूरी को छोड़ कर जाना नहीं चाहता। किंतु वह परवश है। उसकी यात्रा उसके माता-पिता ने तय की है। पिता उसे दुकान पर वापिस चाहते हैं और अम्माँ ने तो उसे कसम खिला कर भेजा है जो वह एक दिन भी ससुराल में ज्यादा रुका, उनकी शान घट जाएगी। यदि वह रुका तो अम्माँ आहत हो जाएँगी... इधर नूरी उधर अम्माँ, वह धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का। ...मुर्गे ने बाँग दे दी।

घर के द्वार पर रिक्शा आ खड़ा हुआ है। सास ने आशंकित मन से राह सफर का खाना-नाश्ता साथ दे दिया है - ऐसा सीधा दामाद मिला है! उन्हें अपनी बेटी के ही लक्षण ठीक नहीं लग रहे? राजेश ने सास-ससुर के पैर छूये तो ससुर ने उसकी जेब में 'आशीष' रख दिया। उसने रिक्शा पर चढ़ने से पहले आखिरी बार मुड़ कर नूरी को देखा - दो रातों के रतजगे और ठुकराए प्रेम से लाल, चढ़ आई उसकी आँखों ने उस मूर्खा के दिल पर खूब प्रहार किया। उसे पश्चात्ताप हुआ - हाय! वह अपने प्रेमी (पति) को बैरंग लौटा रही है? रिक्शा एक झटके के साथ आगे बढ़ गया। "...उजला उजला... नरम सवेरा..."* दोनों की रूह को चुभ रहा है।

(*फिल्म नूरी के लोकप्रिय गीत की पंक्ति)


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हिंदी समय में पल्लवी प्रसाद की रचनाएँ