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संस्मरण

कृष्णा सोबती : एक मुलाकात
गरिमा श्रीवास्तव


लगभग ९४ वर्ष का एक लंबा सफर तय कर हिंदी साहित्य को अद्भुत ढंग से समृद्ध कर के कृष्णा जी इस वर्ष के शुरू में ही जा चुकी हैं। बच गई हैं उनके पीछे से ढेरों किताबें और उन किताबों में बिखरे विपुल पात्र जो बहते हुए जीवन की गति में हँसाते-रुलाते रहेंगे और याद दिलाएँगे कि हाड़-मांस, अस्थि-मज्जा की बनी एक औरत ने अपने एकांत में, जीवन का गीत गाते हुए न जाने कितनी कहानियाँ रचीं, उपन्यास लिखे और जीवन का भरपूर प्याला पीकर अपनी चरम यात्रा को रुखसत हुई। इन्हीं कृष्णा जी से दो वर्ष पहले की एक मुलाकात का जिक्र अपने पाठकों से कर रही हूँ।

'ऐ लड़की' में कृष्णा जी की पात्र अम्मू कहती है - "अपने आप में आप होना परम है। खुद पाए हुए अनुभव श्रेष्ठ हैं जिसका विकल्प और कोई अनुभव हो ही नहीं सकता।" कृष्णा जी लिखती हैं - 'मैं किसी को नहीं पुकारती। जो मुझे आवाज देगा, मैं उसे जवाब दूँगी" - मेरी पुकार का ऐसा ही जवाब दिया था एक सुदीर्घ रचनात्मक जीवन जीने वाली और आज भी खूब सकारात्मक ऊर्जा से भरी हुई कृष्णा जी ने। शरीर से भले वृद्ध हों लेकिन विचार के स्तर पर युवा हैं, खूब जमकर लगातार लिख रही हैं, भावुकता, उदारता और बौद्धिकता का अद्भुत संगम - बात बात में जोर का कहकहा, जुबान से धाराप्रवाह फिसलती फ़ारसी, पंजाबी और अंग्रेजी, जिंदगी और जिंदादिली, अद्भुत जिजीविषा... हँसकर कह पड़ीं मुझसे 'मैंने तो इसे (सहायिका) को फोन न. लिखकर दे रखे हैं, कि किसी सुबह आवाज देने पर मैं उस पुकार से परे जा निकलूँ तब ...हाँ और सुनिए गरिमा! जी चाहता है वहाँ ऊपर अल्ला मियाँ से कहकर वनरूम फ्लैट आरक्षित करवा लूँ...' मैं हतप्रभ हूँ और वे हैं कि हँस रही हैं।

नौ दशकों का सफर विश्रांत हो रहा है, इसे समझकर भी मन चाहता है कि यदि कोई ऊपर हो और मेरी बात सुने तो उससे अर्ज करूँ कि इस सोहबत को भरपूर स्वास्थ्य दे कि और कुछ वर्ष वे लिख सकें, ऐसा कुछ जिससे हम ऐसे पाठकों में शुमार हों जिन्होंने जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने की तमीज सीखी है, उन्हें पढ़कर। वे इन दिनों गुजरात पर लिख रही हैं... बिना रुके, अपनी तकलीफों के पुलिंदों को छिपाए हँसकर मिलजुल रही हैं। कहती हैं - दिल्ली में लोग आपस में मिलने-जुलने का रिवाज कम ही रखते हैं। कैसे कहूँ उन्हें कि अपरिचय और कृत्रिमता ही आज किसी भी शहर की रवायत बन चुके हैं। गाँवों में भी धीरे-धीरे ये बीमारी पहुँच गई है। कर्ण-गुहा में मोबाईल का प्लग फँसाए हम दूसरी दुनिया के निवासी हैं, जहाँ दूसरे के दुख-सुख, हँसी-कराह की ध्वनियाँ वर्जित हैं, अजनबियत भी आत्मरक्षा का एक हथियार है। लेकिन फिर हम विरासत पाएँगे किससे, जीवन को समझने की अनुभव संपन्न दृष्टि दे सकने वाले लोग अपनी-अपनी यात्राओं पर चले जाएँगे, और हम सभाएँ कर उन्हें स्मरण कर कर्तव्य कर लिया करेंगे।

आज दिन के चार-पाँच घंटे एक अरसे के बाद उनके साथ गुजारे... या यों कहूँ जीए। सन १९९४ में एम.फिल. की उपाधि के लिए उनकी किताब "ऐ लड़की' के चुनाव का सुझाव प्रो. नित्यानंद तिवारी ने दिया था। संकोच और कमउम्र के तकाजे ने कृष्णा जी से एक निश्चित दूरी बनाए रखी। इस बार दिल्ली आने पर जब उनका फोन आया कि ज्वाइन कर लिया हो तो मिलने आ जाओ... हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय ने उन्हें जब डी.लिट्. की मानद उपाधि (Honoris Causa) दी तो विश्वविद्यालय स्वयं सम्मानित हुआ, और शायद हिंदी पट्टी के विश्वविद्यालयों में भी हिंदी की इतनी बड़ी रचनाकार को Honoris Causa दिलवा देना इतना सहज भी नहीं होता। हमारे विभाग में तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रो. रवि रंजन और सहयोगियों ने इस प्रस्ताव का जोरदार समर्थन किया और अंततः कई स्तरों से गुजरने और शैक्षिक परिषद की हंगामेदार बहस के बाद स्वीकृति मिल ही गई, विभाग में सब एकमत थे कि दूसरे के सम्मान से हम खुद सम्मानित होते हैं। २०१२ के दीक्षांत समारोह में कृष्णा जी का स्वयं आकर सम्मान लेना स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के कारण हो नहीं पाया, उनकी जगह अशोक वाजपेयी (जिन्हें है.के.वि.वि. ने सम्मानित किया था) ने सम्मान उन तक पहुँचाया, लेकिन हम हमेशा फोन पर लंबी चर्चाएँ करते रहे।

जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र के सहयोगियों से मैंने कृष्णा सोबती से अपनी भावी मुलाकात का जिक्र किया था दिन में, और रात को अरावली के कमरे में, जहाँ हर घंटे यूँ गिना करती कि लो अब बोईंग विमान उड़ान के पहले रनवे पर बीस मिनट घिसटा, अब दो-चालीस हुए और विशाल भारी पंखों, जगमगाती बत्तियों वाले विमान को जेएनयू पर मंडराने के अलावा कुछ सूझ ही नहीं रहा, लाईन क्लियर नहीं है, जाग पड़ी रहती है - अनिद्रा और निद्रा के बीच सपने में यों भासा ज्यों वे व्हील चेयर पर बैठी हों, बड़े फ्रेम का चश्मा पहने, काले दुपट्टे से सिर और गले को लपेटे, बीच में गौरवर्ण तेजस्वी मुख दीप्त हो और मैं उन्हें दिखा रही होऊँ जेएनयू के पेड़-पौधे, मानुस, नया इंडिया काफी हॉउस, गंगा ढाबा, पार्थसारथी रॉक, खूब पढ़ाकू छात्रों से भरी लाइब्रेरी, हवाई चप्पल पहने तेजोद्दीप्त आवेगमय विद्यार्थियों का झुंड, अपने में ही गुम सर झुकाए जाता कोई अध्यापक, नीलगायों के झुंड, मोरों के रंगीन पंख और देर रात नाच गान करते कई छात्र। वे देखती हों हर चीज को कौतुक से, मेरे उत्साह से उत्साहित सी, ज्यों पहली बार स्वच्छ आकाश में पेड़ों के बीच से झाँकते तारों की बोली-बानी सुनती हों...

कृष्णा जी उन लोगों में शुमार हैं जो मनुष्य को जाति, वर्ग और जेंडर के कठघरे में बाँटने से पहले उसके आत्यंतिक सत्य को महत्व देती हैं - शबारी उपरे मानुष सत्य ...जेएनयू में ज्वाइन करने के बाद मैंने उनसे कहा कि सर्दियों की छुट्टियों के बाद आपको मिलती हूँ, लेकिन उनका आग्रह था अभी मिलो न... इस अभी मिल लेने में कुछ था जो कहा नहीं गया पर महसूसा गया - वह था, कल किसने देखा है? मुझसे हाथ मिलाकर बोलती हैं... आप तो तीसरी पीढ़ी की हैं। पैदाइशी महानगरीय होना और छोटी जगह से आकर यहाँ बस जाने के फर्क को देर तक समझाती हैं। मैंने हौले से उनके झुर्रियों भरे गोरे हाथ को छू लिया है, दो उँगलियों में हीरे की अँगूठियाँ हैं, कलाई में सोने का एक सादा सा कड़ा, त्वचा झूल गई है, नीली ...हरी नसें हड्डियों को मजबूती से थामे हुए हैं। उँगलियाँ कलात्मक हैं ...मेरी उँगलियाँ देख रही हैं वे भी गौर से ...चश्मे के भीतर एक जोड़ी चुस्त और चौकन्नी आँखें हैं, सुनने बोलने में कहीं कोई दिक्कत नहीं, बस कहती हैं कि अब थक जाया करती हूँ, देर रात तक जाग कर काम करना उन्हें पहले से ही सुहाता है, इसलिए सुबह देर से सोकर उठती हैं "...आपको ग्यारह बजे आना था इसलिए आज जल्दी उठ गई" - और बच्चों की तरह खिलखिला उठती हैं। सर को उन्होंने काले ऊनी टोपे से ढँक रखा है, मैंने थोड़ा इठलाकर कहा है कि उनके सन से केश देखना चाहती हूँ, वे बिलकुल आत्मीय पुरनिया की तरह टोपी उतार देती हैं, रबींद्रनाथ ठाकुर की श्वेत केश राशि याद आ रही है। अब वे कुछ ज्यादा ही कमजोर हो गई हैं ...सालों पहले की कृष्णा सोबती जिनकी विस्तृत आडंबरपूर्ण 'हाई-टी' का लुत्फ बहुत से साहित्यकार, अतिथि, परिचित उठाया करते थे, उसकी रौनक मंद भले हो गई हो, बुझी नहीं है। सहायिका ने इशारा समझकर चाय का एक लंबा सरंजाम रख दिया है। मैंने नोटिस किया है कि वे बहुत कम खा रही हैं... न के बराबर, लेकिन निरंतर इस बात का ख्याल रख रही हैं कि मेहमाननवाजी में कुछ कमी न रह जाए। ये वो पीढ़ी है जिसकी जड़ें भारतीय सभ्यता और संस्कार में गहरे तक जमी हैं और पाश्चात्य संस्कृति से पुष्पित-पल्लवित हुई हैं।

कृष्णा जी अपने बचपन के दिनों को याद कर रही हैं। शरीर यहीं सोफे पर मेरे साथ बैठा रह गया है और आँखों की पुतलियाँ थोड़ी सिकुड़ गई हैं और दृष्टि स्थिर, जा पहुँची है अतीत के सुदूर कोने-अंतरों को देखने 'हमारे पिता रात को रोशनी बुझ जाने पर घर के बीचोंबीच बैठकर लालटेन की मंद रोशनी में कोई साहित्यिक टुकड़ा पढ़ा करते, हम सब अपने अपने बिस्तरों पर लेटे, घर में गूँजती उस गुरु गंभीर मंद्र आवाज को सुना करते, भाषा की ध्वनियाँ और उसका शब्द भंडार अजीब रहस्यमय ढंग से हमारे कानों के जरिये सीधे दिल में उतर जाया करता... भाषा के संस्कार हमने अपने माता-पिता से पाए, और अनुशासन भी।'

मैंने उन्हें कुरेदने की कोशिश की है - आपकी पहली रचना? वे बोल उठीं - 'चन्ना' शीर्षक मैंने पहला उपन्यास लिखा था, जिसे छपाया नहीं क्योंकि इलाहाबाद के किन्हीं लल्लूलाल जी ने कंपोजिंग में ही पंजाबी के लोक शब्दों को अपनी तरफ से सुधारकर शुद्ध हिंदी के शब्द भंडार में शामिल करने योग्य बना लिया था, मसलन शाहनी को उन्होंने सुधारकर शाह-पत्नी कर दिया, अपने बचपन की बोली-बानी, रवानेदार पंजाबी मुहावरों को खड़ी बोली का चुस्त पहनावा पहनाना मुझे असह्य हो गया, और उसे प्रकाशित करवाने का विचार त्याग दिया। मैंने उनसे कहा है कि मुझे 'जिंदगीनामा' के अगले खंड की प्रतीक्षा है, वे मुस्कुराती हैं और मेरी आँखों के सामने बड़े शाहजी के सिरहाने शबद उचारती राब्याँ की चुनरी की कोर झिलमिला गई है। क्या आप ही हैं राब्याँ? आप कब कहाँ मिलीं राब्याँ से... जिसकी आवाज का दर्द, दीनो-जहान में मुहब्बत का दर्द हर उस पाठक के दिल में टीस-सा जिंदा है जो पैडे मारती राब्याँ को शाहजी के पीछे-पीछे दरया में उतरता देख चुका है, जाति-बिरादरी, उम्र, शरीर के परे शाहजी की राब्याँ के लिए दीवानगी देख चुका है, ताक पर रखे दीये की लौ-सी झिलमिला रही हैं कृष्णा जी की आँखें ...न न राब्याँ की आँखें। जिस दिन वह लाली शाह की पुकार को अनसुना करके दरिया में उतर गई थी बेआवाज ...हौले ...चुपचाप ...सारी हवेली की दौलत को पीछे छोड़कर चली गई थी उसी दरया में ...जहाँ शाहजी गए थे ...तब से ढूँढ़ रही हूँ मैं उस राब्याँ को ...मिली नहीं कभी मिलेगी भी नहीं...

'सिक्का बदल गया' की शाहनी ट्रक पर चढ़ा दी गई है, खेत, दौलत, संबंध, नाते, शाहजी की स्मृतियाँ सब कुछ पीछे छूट रहा है, ट्रक की गति उस शाहनी को दूर ले जा रही है मुझसे ...क्या आप ही हैं शाहनी ...राब्याँ ...कृष्णा जी की आँखें झिलमिला रही हैं या मेरी आँखों का पानी ही धुँधला कर रहा है मेरी नजर को ...जी कह रहा है कहूँ - 'मत जाओ राब्याँ, कहीं मत जाओ, यहीं सबद उचारो, तुम्हारे शाहजी नहीं लेकिन अब वक्त बदला है तुम्हारी जरूरत है बहुतों को ...मत जाओ शाहनी अपने खेत-खलिहानों को छोड़कर ...ये नन्हें-मुन्ने सरसों के पौधे सर्द हवा में बाँहें फैलाकर तुम्हें बुलाते हैं ...रुक तो जाओ ...यूँ भी जाता है कोई... रुको न अम्मू! तुमने कहा था - लड़की ! परलोक होता है दूसरों का लोक ...परायों का ...वहाँ का रास्ता क्यों देखना ...मुझ जैसी कई लड़कियाँ होंगी जिन्हें जरूरत होगी तुम्हारे अनुभवों से बहुत कुछ सीखने की, अभी अपनी तैयारी स्थगित रखो शाहनी...

जिन्होंने कभी किसी को आवाज नहीं दी, बस पुकार का उत्तर भर दिया, वे जीवन भर स्वाभिमान से कभी समझौते न करने वाली रचनाकार के रूप में जानी जाती रहीं। जिस शहर की आबोहवा में हर दूसरा रचनाकार पुरस्कृत हो, या होने के लिए लालायित हो, उसी शहर में आपने बड़े बड़े पुरस्कारों को दरवाजे से लौटा दिया - "इसका कोई अफसोस नहीं है मुझे' स्वाभिमान और अपनी शर्तों पर जीने के लिए कहीं हाथ नहीं फैलाया, 26 साल की कानूनी लडाई लड़ी और उसी में घर बिक गया - ये बताते हुए चेहरे की मुस्कान धूमिल! नहीं... नहीं कहाँ। दुख या अफसोस के बादल का कोई नन्हा टुकड़ा भी नहीं, निरभ्र अपरिमित विस्तार... छोटे शिमला की यादें, विभाजन की यादें... जो मन में आए कर डालना चाहिए, न कोई दोस्त न कोई दुश्मन... मैं अपना दिल खुद ही लगाती हूँ। लोग कहते हैं आप अपने निज के बारे में कुछ नहीं बतातीं। कभी किसी ने मुझसे पूछा कि सुना था कभी आपका एक प्रेम प्रसंग था तो मैंने जवाब दिया - सुनिए मेरी इतनी बुरी हालत कभी नहीं थी, जहाँ सिर्फ एक ही प्रेम-प्रसंग होता' इसके साथ ही हमारी समवेत हँसी उम्र की दीवारों को ढहाते हुए कलकल नदी सी बह उठती है जिसकी छलछलाहट बहुत दिनों तक स्मृति का मंद स्मित बिखेरती रहेगी।

इन दिनों 'दिलोदानिश' का पाठ हो रहा है जामिया मिल्लिया में, शाम को कृष्णा जी को वहीं जाना है। मेरे पास समय नहीं कि अपनी प्रिय रचनाकार के इस उपन्यास -पाठ में शामिल हो सकूँ। लौटने का वक्त हो चला है - 'सिक्का बदल गया' की शाहनी ने अपने गहने जेवर कुछ नहीं साथ रखे थे, चल दी थी शरणार्थी कैंप में दूसरों के साथ कभी न लौटने के लिए, संग कुछ ले गई ही नहीं ...कौन ले जा पाता है इस दुनिया से चीज-बस्त, अपनी साँस जब तक साथ दे तब तक ही है मैं, मेरा, अपना, हमारा ज्यों ही औचक बुलावा आया उसी समय राब्याँ चुपचाप दरया की लहरों में गुम... बादलों के घेरों ने घेर लिया है ...चुपचाप अपने रस्ते चल देना है ...किसी से गिला-शिकवा क्यों ...जीवन जितना मिला, जैसा मिला, भरपूर जिया, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया... हाँ जब तक रहे सुकून से रहे, अच्छा खाया, अच्छा पहना गरारे से लेकर शरारे तक, अपनी धज सबसे अलग रखी, किसी को रुचे तो ठीक, न रुचे तो राम-राम... मुझे विदाई जैसा कुछ दे रही हैं वो ...एक सुंदर काला कुरता, जिस पर चाँदनी के मोर बने हुए हैं, मानों कहती हों पहनना तो याद करना मुझे। झिलमिली आँखों में बालबंगरा के दालान में सिर पर हाथ रखे छोटे गोल मुख वाली नानी की तसवीर है, जो दिल्ली लौटने के दिन कहती थी 'फेर लौट के अइह, गर्मी के छुट्टी में' - विदा लेते कलेजा मुँह को आता था, सोचा था नौकरी करूँगी तो नानी की देखभाल करूँगी। नानी उससे पहले चली गईं, और फिर ननिहाल के नाम पर सब कुछ बच रहा नानी के सिवाय।

कृष्णा जी मुझे विदा दे रही हैं। उन्हीं की लिखी पंक्तियाँ याद आ रही हैं, जिन्हें दोहराने की इजाजत बड़े संकोच से मैंने माँग ली है - "लड़की, प्याला बना ही इसलिए कि उठाओ और पी जाओ। जब तक पी सकते हो पीते रहो" ...जीवन हिरण है हिरण। कस्तूरी मृग। इस क्षणभंगुर जगत में अपनी महक फैला यह जा और वह जा।" सुनते ही वे आनंद से ताली बजा कर हँसने लगी हैं - तुमको याद है इतना सब ? मेरा जवाब है - मुझे तो आपका पूरा उपन्यास याद है। कृष्णा जी ने बाएँ पासंग पर रखी एक छोटी किताब से एक टुकड़ा निकाला है और कहती हैं - इसे बोल कर पढ़िए ...मुझे मालूम है कि ये टुकड़ा कौन सा है, वे मेरा उच्चारण सुनना चाहती हैं। नफीस उर्दू की नज़्म मन को ताजा कर गई है...।

ठंड बढ़ने से पहले जेएनयू पहुँचना है ...दीवार पर शिवनाथ जी की मंदमुस्कान टँगी है, कोई माला नहीं... जो साथी यहीं हैं पुराने काँच के गिलासों में, बुद्ध की धूल भरी प्रतिमा में, विवर्ण हो चुके गाढ़े रंग के सोफे कवरों में, सीले-सीले से रेशमी पर्दों में, रंग और पुताई की फरियाद करती दीवारों और छतों में, कभी रोशन करते काँच के झाड़-फानूसों में, उस की तसवीर पर माला क्यों। उसकी उपस्थिति तो उत्कीर्ण है पाँचवीं मंजिल के फ्लैट के दरवाजे पर स्टील की प्लेट पर -

जेहलम और चनाब
बहते रहेंगे इसी धरती पर।
लहराते रहेंगे
खुली-डुली हवाओं के झोंके
इसी धरती पर
इसी तरह।
हर रुत-मौसम में
इसी तरह
बिलकुल इसी तरह
सिर्फ
हम यहाँ नहीं होंगे।
नहीं होंगे,
फिर कभी नहीं होंगे,
नहीं।
(जिंदगीनामा)


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