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वैचारिकी

फेंस के उस पार
विभूति नारायण राय

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भारत-पाकिस्तान संबंध अनेक अर्थों में विशिष्ट है। एक साझा इतिहास, भूगोल और संस्कृति के वारिस दोनों कई युद्ध लड़ चुके हैं और किसी पल फिर लड़ाई में कूद सकते हैं। दोनों अब तक तीन युद्ध लड़ चुके हैं और किसी भी समय उनमें पुन: युद्ध हो सकता है। यह निश्चित है कि इस बार का युद्ध अंतिम होगा क्योंकि परमाणु संपन्न दोनों ही राष्ट्रों के भीतर ऐसी शक्तियाँ सक्रिय हैं जिनके मन में परमाणु बम के इस्तेमाल को लेकर बहुत नैतिक संकट नहीं है।

पाकिस्तानी समाज के एक जिज्ञासु छात्र की हैसियत से मैं वहाँ पर घट रही घटनाओं को ध्यान से पढ़ता सुनता रहा हूँ। भारतीय उपमहाद्वीप में पसरी सांप्रदायिक चेतना को समझने के प्रयास के फलस्वरूप मेरी अविभाजित भारत में विभिन्न धर्मावलंबियों खासतौर से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच रिश्तों की बारीकियों को पकड़ सकने में दिलचस्पी रही है। इन दोनों समुदायों के बीच 700 वर्षों के घृणा और प्रेम पर आधारित संबंधों ने लेन देन की एक अद्भुत दुनिया निर्मित की है। शताब्दियों तक दोनों एक-दूसरे से लड़ते झगड़ते भी रहे और दोनों ने मिल जुल कर संगीत, दृश्य तथा श्रव्य कलाओं, स्थापत्य और पाक शास्त्र जैसे क्षेत्रों में बेमिसाल रचा भी।

साथ रहते और लड़ते झगड़ते दोनों ने वह मशहूर सैद्धांतिकी भी गढ़ी जिसके अनुसार हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र थे और साथ नहीं रह सकते हैं। दुनिया भर में सिर्फ धर्म के आधार पर राष्ट्र बनने का यह पहला मौका था। यहाँ विस्तार से जाने का अवसर नहीं है पर कुछ थोड़े उदाहरणों से ही साबित किया जा सकता है कि हिंदुओं और मुसलमानों को अलग राष्ट्र मानने का पहला आग्रह मुख्य रूप से हिंदू विचारकों की तरफ से आया था। हिंदू राष्ट्रवाद के एक प्रमुख आधार नबगोपाल मित्र ने 19वी शताब्दी के उत्तरार्ध में एक लेख में हिंदुओं को एक राष्ट्र के रूप में घोषित किया था और उन्हें मुसलमानों तथा ईसाइयों से श्रेष्ठ बताया था। उनके अनुसार हिंदू धर्म ही राष्ट्रीय एकता का आधार हो सकता था और हिंदुओं को एक आर्य राष्ट्र के निर्माण का प्रयास करना चाहिए। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में आर्य समाज के बड़े नेता भाई परमानंद ने हिंदुओं और मुसलमानों को दो अलग राष्ट्रों के रूप में रेखांकित करते हुए यह भी घोषित किया कि ये साथ नहीं रह सकते। भाई परमानंद ने अपनी आत्मकथा में भी लिखा है कि उन्होंने 1908 में ही हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी को अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बसाने की सलाह दी थी। हिंदू राष्ट्रवादी और कांग्रेस के नेता लाला लाजपत राय ने 14 दिसंबर 1924 में बंबई के दैनिक द ट्रिब्यून में एक लेख लिखा था जिसके अनुसार हिंदू भारत और गैर हिंदू भारत के बीच विभाजन जरूरी था। 1923 में सावरकर ने हिंदुत्व शब्द गढ़ा और लिखा कि मुसलमान और ईसाई हिंदू राष्ट्र का अंग नहीं हो सकते। इसी क्रम में हिंदू महासभा के 19वीं अधिवेशन (1937) में बोलते हुए सावरकर ने कहा कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं। ये सारे उदाहरण 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग द्वारा पारित अलग मुस्लिम राष्ट्रों (राष्ट्र नहीं) के प्रस्ताव के पहले के हैं। दरअसल मुस्लिम लीग ने पहले भारत के पश्चिम और पूरब में अलग मुस्लिम राष्ट्रों की कल्पना की थी जो कुछ हद तक एक ढीले-ढाले भारतीय संघ का ही भाग होते। इसी लिए 24 अप्रैल 1943 को मुसलमानों की एक सभा में जब जिन्ना ने यह पूछा कि पाकिस्तान शब्द उन्हें किसने दिया तो एक स्वर से आवाज आई हिंदुओं ने।

मैंने ऊपर जान बूझकर वे ही उदाहरण दिए हैं जिनसे यह साबित होता है कि हिंदुओं और मुसलमानों को अलग राष्ट्र मानने की प्रवृत्ति सिर्फ मुसलमानों में ही नहीं थी। हर समुदाय में खुद को सही मानने तथा दूसरों से मनवाने की एक ज़िद होती है और इसके लिए वह तर्क और तथ्य गढ़ता है। हिंदुओं ने भी इसी तरह स्वयं को आश्वस्त कर रखा है कि भारत विभाजन की पूरी जिम्मेदारी मुसलमानों की है। यह सही है कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब छोटे पैमाने पर ही सही चुनावी लोकतंत्र की शुरुआत हुई मुस्लिम अभिजात्य के समक्ष यह स्पष्ट होने लगा कि जब कभी अँग्रेज भारत छोड़कर जाएँगे सत्ता हिंदुओं के हाथ में आएगी क्योंकि वे बहुसंख्यक थे। इस समझ को वे आसानी से इसलिए नहीं पचा पा रहे थे कि कहीं न कहीं उनके मन में यह आशा दबी-छिपी थी कि अँग्रेज जाते समय दिल्ली का राजपाट उन्‍हें सौंप कर जाएँगे क्योंकि 1857 में नाममात्र के ही सही पर एक मुसलमान बादशाह से ही उन्होंने ताज़ छीना था। जमीदारों, ताल्लुकेदारों और नवाबों से बने उच्च वर्ग तथा उर्दू - फारसी के जानकार दरबारी मुलाज़िमों के मध्य वर्ग को यह समझ में आया कि लोकतंत्र में उनके विशेषाधिकार बरकरार नहीं रह पाएँगे और उन्हें हिंदुओं से कमतर होकर रहना होगा। सर सैय्यद अहमद खां ने उन्‍हें अँग्रेजी शिक्षा और आधुनिकता से जोड़ा और उन्‍हें यह अहसास हुआ कि उनसे पहले अँग्रेजी अपनाने वाले हिंदू सरकारी नौकरियों के मामले में उनसे बहुत आगे निकल गए थे। सब का मिला जुला असर यह हुआ कि 1905 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और चार दशकों में ही लीग एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की ध्वजवाहक बन गई।

छात्र जीवन से ही मै भारतीय समाज के इस पक्ष को समझने का प्रयास करता रहा हूँ। इसी क्रम में सांप्रदायिकता के भौतिक प्रस्फुटन सांप्रदायिक दंगों में भी मेरी दिलचस्पी बढ़ी और अपने पेशे के कारण करीब से भारतीय राज्य और अल्पसंख्यकों के आपसी रिश्तों को समझने का मौक़ा भी मिला। मैंने विस्तार से इस पर अलग से लिखा है इसलिए यहाँ कुछ भी लिखना उसे दोहराना ही होगा।

स्वाभाविक ही था कि हिंदू-मुस्लिम रिश्तों का अध्ययन मुझे पाकिस्तान तक ले गया। शुरू से ही मै पत्र पत्रिकाओं में पाकिस्तान के संबंध में जो कुछ छपता उसे ढूढ़-ढूढ़ कर पढ़ता। ज्यादातर सांप्रदायिक दुर्भावना से ग्रस्त पाकिस्तान विरोधी सामग्री होती। इसे रेखांकित करने की जरूरत नहीं है कि विभाजन के वर्षों बाद तक मुसलमान पाकिस्तान बनाने से जुड़ी अपराधबोध की सलीब अपने कंधों पर उठाए चलता था। यह भारतीय समाज का एक सामान्य दृश्य होता कि एक मिश्रित समूह में मुसलमान कोई न कोई बहाना ढूढ़ कर पाकिस्तान को कोसने लगता। हिंदू घरों में आम विश्वास था कि भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच में कोई पाकिस्तानी खिलाड़ी छक्का लगाता है तो मुसलमान पटाखे छोड़ते हैं। एक-दूसरे के बारे में कई तरह के पूर्वाग्रह थे जिनसे आमतौर से कोई हिंदू या मुसलमान परिवार ग्रस्त रहता था।

पाकिस्तान में मेरी रुचि तब और बढ़ी जब मेरी नियुक्ति सीमा सुरक्षा बल में हुई। दस साल की अपनी नियुक्ति के दौरान तीन वर्षों तक मैं एक ऐसी सीट पर रहा जिसकी दिलचस्पी के केंद्र में पाकिस्तान था। सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तान रेंजर्स रोज वागा चेक पोस्ट पर एक-दूसरे को अपनी पचास से अधिक पत्र पत्रिकाएँ देते थे। ये दूसरे दिन शाम तक दिल्ली मेरे दिल्ली कार्यालय पहुँचते थे। तीसरे दिन बासी ख़बरों के साथ ही सही मुझे ये पत्र पत्रिकाएँ आकर्षित करती। खासतौर से अँग्रेजी दैनिक डान और मासिक हेराल्ड औरन्यूज लाइन। इनके अलावा नज़म सेठी का फ्राईडे टाइम्स साप्ताहिक भी था। जनरल परवेज मुशर्रफ ने कुछ ही दिनों पहले हुकूमत पर कब्ज़ा किया था और यह मजेदार विरोधाभास था कि लोकतंत्र में प्रेस जिस आज़ादी से वंचित रह गया था, वह उसे एक तानाशाही दौर में मिल रही थी। मुझे देखकर बड़ा आश्चर्य होता कि हमारी रूढ़ समझ के उलट पाकिस्तानी प्रेस जम कर धार्मिक कठमुल्लों के खिलाफ लिखता। अपने हाकिमों पर हमला करने में भी यह भारतीय मीडिया से किसी मायने में कम निर्भीक या वस्तुपरक नहीं था। पाकिस्तानी अखबारों की यह लत ऐसी लगी कि आज तक जारी है। आज तो इंटरनेट ने उन्हें और सुलभ बना दिया है। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि भारतीय अखबारों के आने के पहले मै नेट पर उन्‍हें पढ़ चुका होता हूँ। इन अखबारों के जरिए न सिर्फ पाकिस्तानी राजनीति बल्कि वहाँ की सामाजिक संरचना को करीब से समझने में मदद मिलती है।

मुझे पाँच बार पाकिस्तान जाने का मौका मिला है। हर यात्रा में वह पारंपरिक समझ गड़बड़ा जाती है जो भारत में बैठ कर हम वहाँ के बारे में गढ़ते रहते हैं। कम से कम मुझे तो हर बार मोहब्बत से लबरेज इंसान दिखाई दिए जो यह सुनते ही कि मै भारत से आया हूँ स्वागत में बिछ जाते थे। इतने आत्मीय अनुभव हैं कि एक पूरी किताब उन्‍हें समेटने में ही कम पड़ेगी। कुछ का जिक्र प्रसंगवश इस पुस्तक में आया है। दोनों तरफ युद्ध की वकालत करने वाले उन्मादियों की उपस्थिति के बावजूद मेरा अनुभव यह कहता है कि आम पाकिस्तानी शांति चाहता है। लगभग वैसे ही जैसे आम भारतीय।

अंत में सिर्फ यह कि भारत की ही तरह एक साथ कई पाकिस्तान अस्तित्व में हैं। हम गलती से सिर्फ उस पाकिस्तान के बारे में सोचते हैं जो कट्टरपंथियों और फौज से मिलकर बनता है। किसी ने सही कहा है कि राज्य को एक सेना की जरूरत होती है किंतु पाकिस्तानी सेना को एक राज्य चाहिए और उसने एक नैरेटिव गढ़ लिया है कि पाकिस्तान राष्ट्र राज्य की हिफाजत के लिए उसका मजबूत होना जरूरी है। इस नैरेटिव के अनुसार जनता के चुने सारे प्रतिनिधि भ्रष्ट और अक्षम है और सिर्फ सेना ही देश को बचा सकती है। इसी नैरेटिव के अनुसार सेना ने जिहादी संगठन खड़े किए और उन्हें पाकिस्तानी विदेश और रक्षा नीति का अविभाज्य अंग बनाया। तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, जैशे मोहम्मद या लश्कर-ए-तायबा जैसे संगठन अफगानिस्तान और कश्मीर में उसकी लड़ाई लड़ते हैं। तालिबान ने तो इस सेना की मदद से कई वर्षों तक अफगानिस्तान पर शासन भी किया और अगर 9/11 जैसी मूर्खतापूर्ण हरकत न करते तो आज भी वहाँ के शासक होते। जैशे मोहम्मद और लश्कर कश्मीर में पाक सेना की दूसरी पंक्ति की भूमिका में है। चार बार और लगभग आधा समय पाकिस्तान में हुकूमत करने वाली फौज आज सत्ता पर क़ाबिज़ जरूर नहीं है पर अभी भी देश की विदेश और रक्षा नीति के मसलो पे चलती उसी की है। तब और अगर उनका ताल्लुक भारत, अफगानिस्तान और अमेरिका से हो।

दूसरा पाकिस्तान वहाँ की मुख्य धारा की राजनैतिक पार्टियों का है। जनता की नब्ज पहचानने वाले इनके कार्यकर्ता तथा नेता केवल फर्ज अदायगी के लिए बीच-बीच में भारत विरोध और युद्ध की बातें करते हैं। वहाँ की दोनों बड़े दल - पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नून) तो एक एक चुनाव इस नारे पर भी जीत चुके हैं कि वे भारत से दोस्ती कायम करेंगे। बेनजीर भुट्टो, आसिफ अली जरदारी और नवाज शरीफ के राजनैतिक करियर में कई बार ऐसे मौके आए है जब उन्हें फौज के दबाव में भारत की तरफ बढ़ाया हुआ दोस्ती का हाथ पीछे खींच लेना पड़ा। एक तीसरा पाकिस्तान भी है जो लेखकों, कलाकारों और खिलाडि़यों से मिलकर बनता है। ये पूरी तरह से दोस्ती के हामी हैं और कुछ के लिए तो भारत आर्थिक संभावनाओं की खान है। दुर्भाग्य से हमारे कट्टरपंथी दूसरे और तीसरे पाकिस्तान से संवाद के बहुत इच्छुक नहीं लगते।

इस पुस्तक में छपे लेख भिन्न पत्र पत्रिकाओं में छपे हैं। मैं दैनिक हिंदुस्तान और साप्ताहिक शुक्रवार में पाकिस्तान पर नियमित कालम लिखता रहा हूँ। मै कोई प्रशिक्षित समाजशास्त्री नहीं हूँ और न ही आप मुझे पाकिस्तान विशेषज्ञ कह सकते हैं। मै तो सिर्फ एक जिज्ञासु छात्र हूँ जो इस उपमहाद्वीप, जो अब तीन देशों में बट चुका है, में रहने वाले हिंदुओं और मुसलमानों के आपसी रिश्तों को पकड़ने की कोशिश करता रहा हूँ। विभाजन के पहले का समाजशास्त्र पढ़ते-समझते यह प्रक्रिया मुझे पाकिस्तानी समाज तक ले आई है और उसी की अभिव्यक्ति का प्रयास है यह छोटी सी पुस्तक।

- विभूति नारायण राय


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