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कविता

कमीज
नरेंद्र जैन


विशालकाय मशीनें चलती ही रहती हैं
कपड़ा लगातार बुनता चला जाता है
कपड़ा मिल से निकले कपड़े तक
एक लंबा सफर है
कपास के सफेद फूल का
रातपाली के
अवसादपूर्ण घंटे
तार तार जिंदगी
धागा धागा भूख
श्रमिक नंगा ही रहता है
जिंदगी के सारे रंग
बगीचों के सारे फूल
यहाँ छपते हैं
कपड़ों पर
ये कमीज मेरी
किस कदर तरबतर है
खून और पसीने से?


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हिंदी समय में नरेंद्र जैन की रचनाएँ



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