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कविता

लाल चिरैया
सुरेन्द्र स्निग्ध


एक असंकलित कविता

लिए चोंच में
घास किरन की
पूरब में हर सुबह-सुबह क्यों
लाल चिरैया आती है?

बैठी मेरे घर की छत पर
देहरी पर
फिर धीरे-धीरे आँगन में भी
घास किरन की छितराती है

उछल-कूदकर शोर मचाती
दाना चुगती, पानी पीती
फिर किरनों की घास समेटे
लिए चोंच में
पच्छिम को उड़ जाती है।


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