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बात-चीत

मैंने हमेशा मनुष्य की अच्छाई को खोजा है : स्वयं प्रकाश
पल्लव


(वरिष्ठ कथाकार स्वयं प्रकाश से युवा आलोचक पल्लव की बातचीत)

पिछले दिनों आपकी एक किताब नेशनल बुक ट्रस्ट से आई थी ' प्यारे भाई रामसहाय' उसमें आपने अपने बचपन के किस्सों को लिखा है। तो पहला प्रश्न यही है कि आपका बचपन कहाँ बीता कैसा बीता?

मेरा जन्म इंदौर में हुआ और आरंभिक शिक्षा भी वहीं हुई। यहाँ तक कि ग्रेजुएशन भी वहीं से की। आपने अच्छा जिक्र किया रामसहाय का वो मेरे काल्पनिक मित्र हैं जिन्हें मैं हर महीने पत्र लिखता हूँ और अपने बचपन के मित्रों की शरारतों को बताता हूँ। बात बहुत पुरानी है पर बताना जरूरी है। पहले मित्रता और पुस्तकें हर परिवार में थे। बच्चों का काम था खेलना और और पढ़ना। मोहल्लों में वाचनालय हुआ करते थे। चलित पुस्तकालय होते थे। परिवार - मित्रता और पुस्तकें - साथ-साथ चलते थे। इसकी प्रतिछाया आपको साहित्य में भी दिखाई पड़ती है। बच्चों के किस्से, पशु-पक्षी, प्रकृति-मौसम सब मिलेंगे। पर धीरे-धीरे ये सब गायब हो गए। शिकायत नहीं कर रहा। पुरानी चीजें गईं तो नई चीजें आईं भी, पर वो एक मोहक समाज था। काफी समय हो गया मैंने गाय, भैंस या गेंदे के फूल पर कोई कविता या रचना नहीं पढ़ी। तो वो सब बचपन की बातें हैं जो काफी रोमांचित करती हैं।

बीता हुआ बड़ा मोहक होता है। आपने ये बातें बताईं वे इंदौर से जुड़ी हैं। आपके पिता अजमेर के रहने वाले थे। तो इंदौर में रहना कैसे हुआ? क्या अजमेर की भी ऐसी कुछ यादें हैं?

ये बड़ी मजेदार बात है। हमारा पैतृक घर अजमेर में है, वहाँ स्कूल की उचित व्यवस्था नहीं थी तो पिताजी ने मुझे इंदौर भेज दिया। यहाँ नाना-नानी थे, बहुत-से मामा थे, बहुत-सी मौसियाँ थीं। एक बहुत बड़ा घर था जिसमें लगभग चालीस परिवार रहते थे। उसे यामू का बाड़ा कहा जाता था। जो किसी समय शिवाजी का था। मेरे नाना बहुत प्रसिद्ध वैद्य थे पर उनकी आँखें चली गई थीं तो कई बार वो हमसे वैद्यकी से संबंधित काम कहते थे - लिख दो, वो पीस दो। अच्छा दूसरी बात यह थी कि इंदौर उस समय मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक राजशानी था, जहाँ बाईस हायर सेकंड्री स्कूल और कई कॉलेज थे। बड़े से बड़ा नेता वहाँ भाषण देने आता था। वहाँ लोगों में राजनैतिक जागरूकता बहुत थी। कॉटन मील्स थीं और उनकी यूनियनें थीं। आपने होमी दाजी का नाम सुना होगा, उस समय उनका काफी जलवा था। उस माहौल में जीवंतता थी, जिसका असर उस समय सब पर पड़ा। दूसरी तरफ अजमेर का भी अलग जलवा था। अजमेर में मेट्रिक बोर्ड था। तो ये संयोग ही कहिए कि मुझे थोड़े संस्कार राजपूताना के मिले और थोड़े संस्कार मालवा के मिले।

आपने स्कूल की पढ़ाई इंदौर से की और फिर इंजीनियरिंग की। वो पढ़ाई कहाँ से हुई?

रतलाम के पास एक जगह है जावरा, जो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कैलाशनाथ काटजू का गृहनगर था। वो जवाहरलाल नेहरू के साथ रहे थे। जावरा में उन्होंने एक पॉलीटेक्नीक खुलवाया था जहाँ से मैंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया था और वहाँ से मैं भारतीय नौसेना में गया।

जिसके अंश हमें ' जलते जहाज पर' उपन्यास में मिलते हैं। थोड़ा उसके बारे में बताएँ। वह कैसा अनुभव था?

वो हुआ यूँ कि हम दो लोग मध्य प्रदेश से मुंबई गए। वहाँ जब पहुँचे तो देखा लोग बड़ी सुंदर ड्रेस में सुबह-सुबह अभ्यास कर रहे थे। वह सब हमें बहुत आकर्षक लगा। उस हेड क्वार्टर को आईएनएस रँगरेज कहते हैं। नेवी के जितने हेड क्वार्टर होते हैं उसे एक जहाज ही माना जाता है और आईएनएस कहा जाता है। फिर जब वहाँ चला गया तो लगा जो सोचकर आए थे वो तो हुआ नहीं। घूमना-फिरना तो हो नहीं पाया और उस समय मैं थोड़ा प्रेमी-कवि किस्म का भी हो गया था, जिसकी वहाँ कोई जगह नहीं थी। फिर मैंने उसे अलविदा कह दिया।

फिर आप डाक तार विभाग में चले गए। वहाँ कैसा अनुभव रहा? वहाँ आप किस पद पर थे? कुछ बताएँ।

पहले संचार व्यवस्था इतनी अच्छी नहीं थी। एक ही तार पर दस-बारह या पंद्रह संवादों को भेजने के लिए लाइन के दोनों तरफ कई यंत्रों का प्रयोग किया जाता था और उन यंत्रों को ऑपरेट करने वालों को रिपीटर स्टेशन अस्सिस्टेंट कहा जाता था। मेरे लिए इसमें सबसे आकर्षक चीज यह थी कि इसकी छह महीने की ट्रेनिंग मद्रास में होने वाली थी। तो मुझे लगा कि वहाँ जाने का इससे बेहतर मौका नहीं हो सकता। दक्षिण भारत के जीवन को निकटता से देखने का अवसर वहाँ रहते हुए जैसे-जैसे मिलता रहा मै घूमा। मेरी कहानियों में भी उसके दस-बीस फीसदी अंश होंगे वो बहुत मीठे अनुभव रहे।

आप अपनी ट्रेनिंग के बाद नौकरी पर राजस्थान आए। मतलब फिर से अपने पैतृक घर आ गए। तो इस दौरान आपका कहाँ-कहाँ रहना हुआ?

सबसे पहले तो मैं जोधपुर में रहा। फिर वहाँ से एक जगह है, बहुत छोटा-सा कस्बा, भीनमाल चला गया। वहाँ मैं कोई पाँच-छह साल रहा। भीनमाल में मेरी मुलाकात अभिन्न मित्र मोहन श्रोत्रिय से हुई जो वहाँ कॉलेज में अँग्रेजी पढ़ाते थे। वहाँ से हमने 'क्यों' नाम की एक साहित्यिक पत्रिका निकाली। उसके बाद मैं जैसलमेर चला गया जहाँ पाँच-छह साल रहा। लेखन में ये संयोग बड़ी भूमिका निभाते हैं और ये लेखन के लिए सबसे बड़ा प्रशिक्षण होता है। कई मित्र तो इसलिए मुझसे ईर्ष्या करते हैं कि तुम्हें दूरस्थ स्थानों में रहने का मौका मिला। जब मैं जैसलमेर में था तो मैंने पाकिस्तान की सीमा तक सब छान मारा। वो रेत की दुनिया इतनी अद्भुत थी कि मैं कहूँ हिंदुस्तान के हर बच्चे को तीन चीजें जरूर देखनी चाहिए बर्फ, समुद्र और रेत।

फिर आप जैसलमेर रहते हुए ही हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में चले गए थे?

नहीं-नहीं, उसके बाद मेरा स्थानांतरण सुमेरपुर हो गया था। सुमेरपुर एक व्यापारिक मंडी है। वहाँ मेरी अधूरी शिक्षा पूरी हुई। वहीं रहते हुए मैंने हिंदी से एम.ए. किया और बाद में पीएच.डी. भी किया। वहाँ मेरे कई मित्र बने, जिनसे मित्रता अब भी कायम है। वहाँ हम मित्र बहुत सक्रिय थे। तरह-तरह के साहित्यिक कार्यक्रम करते थे।

आप टेलीफोन व तार डाक सेवा में इंजीनियर थे। फिर राजभाषा अधिकारी जैसे पद पर कैसे गए?

देखिए, यह मेरे साथ बड़ा रोचक संयोग रहा कि जब मैंने पीएच.डी. की उसी समय हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में हिंदी अधिकारी का पद निकला। मित्रों ने कहा आवेदन कर दो। मैंने कर दिया। चयन भी हो गया पर मेरा जाने का मन नहीं था। लेकिन उन्होंने मेरी पहली पोस्टिंग उड़ीसा के एक आदिवासी इलाके में दी तो मैं बहुत रोमांचित हो गया और सारे मोह-माया के बंधन को छोड़कर इस अवसर को लपक लिया।

उसके बाद आपकी पोस्टिंग कहाँ-कहाँ हुई?

हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड जिंक और सीसा बनाता था। इनके माइंस शहरों में नहीं जंगलों में होते थे तो उसके बाद मैं राजस्थान आया, जहाँ मैं जावर माइंस में रहा, राजपुरा माइंस में रहा। राजपुरा और जावर में तो मैं अधिकांशतः श्रमिकों के साथ रहा। उनके जीवन से परिचित हुआ। हाँ, चित्तौड़ जिंक स्मेल्टर में थोड़ा पढ़े-लिखे लोगों से मित्रों से मिलना हुआ जिनमें आप भी एक हैं।

हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में आप राजभाषा अधिकारी थे पर जब आप चित्तौड़ गए तो सतर्कता अधिकारी हो गए थे तो नौकरी में ये बदलाव कब और कैसे हुआ?

मैं उड़ीसा में था तब वहाँ मजदूरों को हिंदी पढ़ाता था। उन्होंने एक शर्त रखी कि हम हिंदी तभी सीखेंगे जब आप उड़िया सीखेंगे और फिर मैंने वहाँ सारे हिंदी अधिकारियों और कर्मचारियों से कहा कि यहाँ दो क्लासें लगेंगी - एक उड़िया की और एक हिंदी की। इसी चक्कर में मैं, अनुवाद के माध्यम से ही सही, उड़िया के कई प्रसिद्ध लेखकों से परिचित हुआ। उन्हें आमंत्रित किया अनेक संगोष्ठियाँ करवाईं। फिर जब मैं राजस्थान आ गया तो यहाँ हर तरफ हिंदीभाषी ही थे तो कोई अधिक सार्थक काम रह नहीं गया था। मुझे लगा कुछ नया करना चाहिए। देखो पल्लव! मैंने अपने चिंतन में, लेखन में, अपने जीवन में भी हमेशा मनुष्य की अच्छाई को खोजा है। मेरा मानना है कि मनुष्य देवताओं का सबसे बड़ा स्वप्न है और ये सब लोग अपनी अच्छाई से अच्छे लोगों का अच्छा समाज बना सकते हैं। अब यहाँ लोगों ने कहा आप दुष्टों से तो मिले ही नहीं तो हमने चोरों को पकड़ने का काम ले लिया।

ये यात्रा काफी रोचक रही। आप कह रहे हैं कि आप अच्छे लोगों के संधान में लगे रहे। आपकी कहानियों में खल पात्रों की कमी दिखती है। सब अच्छे ही पात्र मिलते हैं चाहे वो अविनाश मोटू हो या ' नैनसी का धूड़ा' का धूड़ा ही क्यों न हो। अब आप अपने परिवार के बारे में कुछ बताएँ।

मुझे अपने बारे में बताने में बहुत संकोच होता है। पाठक यह जानकर क्या करेंगे? फिर भी आप पूछ रहे हैं तो बता देता हूँ। मेरे परिवार में मैं सबसे बड़ा था। घर में छह छोटी बहनें और एक छोटा भाई था। मैं सबसे बड़ा था तो मुझ पर खासा उत्तरदायित्व भी था और इस कारण मैंने अपनी कई इच्छाओं को स्थगित भी कर दिया था। एक समय में मैं अभिनेता बनना चाहता था। मुझे लगता था दुनिया का सबसे काबिल आदमी तो अभिनेता ही होता है फिर मुझे बाद में लगने लगा अभिनेता नहीं निर्देशक सबसे काबिल होता है और फिर मुझे लगा निर्देशक भी क्या करेगा जब उसे लेखक ठीक से लिखकर नहीं देगा। और फिर मुझे लगा जीवन सबसे बड़ा होता है तो ऐसे में आपका परिवार ही आपका व्यक्तित्व हो जाता है।

साहित्य के संदर्भ यहाँ से बात शुरू करूँगा। कब आपको लगा कि कहानी लेखन की शुरुआत करनी चाहिए। पाठक और हिंदी समाज आपको कहानीकार के रूप में जानता है लेकिन आपकी कहानियों का शोशार्थी होने के नाते मैं ये जानता हूँ कि आपका एक कविता-संग्रह भी प्रकाशित हुआ था। तो कविता से ही बात शुरू करते हैं कब आपको लगा कि लिखना चाहिए?

इसका श्रेय भी मैं इंदौर को देना चाहूँगा। आप जिससे भी पूछेंगे वो आपको कहेगा कि उसके अध्यापक साहित्य में बहुत रुचि लेते थे... तो वो एक संस्कार तो है ही पर मेरे नाना जी का जो परिवार था वहाँ पुस्तकालय से पुस्तक लाकर पढ़ने का ही चलन नहीं था अपितु शाम को बैठक में सब बच्चे बैठ जाते थे उसके बाद किसी कविता पुस्तक का पाठ किया जाता था। यह पाठ बच्चे करें या बड़े करें। एक-दो व्यक्ति पाठ करते बाकी सब सुनते थे। ये कार्यक्रम एक-दो घंटे चलता था। जैसे उस समय में मैथिली शरण गुप्त बहुत प्रसिद्ध कवि थे तो उनकी कृतियाँ 'भारत भारती', 'जयद्रथ वध' इत्यादि हमने सस्वर उन बैठकों में पढ़ी हैं। दूसरा उस समय कई दैनिक समाचार पत्र निकलते थे जिनमें एक तो बहुत यशस्वी था - 'नई दुनिया', उन सबको पढ़ते थे। इंदौर उन दिनों कई कवि सम्मेलनों का केंद्र भी रहा। उस समय जब कवि सम्मेलन होते थे तो लोग डायरी और पेन-पेंसिल लेकर जाते थे और आपको आश्चर्य होगा उस समय कोई बैठने की व्यवस्था नहीं होती थी फिर भी लोग रात तीन बजे तक बैठकर कवियों को सुनते थे। हमारे परिवार से कभी किसी ने किसी बच्चे को इतनी रात तक रुकने से मना नहीं किया। आज तो कोई माँ-बाप ऐसा नहीं कर पाएँगे। ...तो साहित्यिक संस्कार उसी समय से पड़ गए थे। बाद में लोगों ने कहा कि कविता छोड़ो, कहानी लिखो और जब लिखी तो कहा कि लिख सकते हो तो मेरी दूसरी कहानी ही 'सारिका' में उस समय छपी जब कमलेश्वर उसके संपादक थे। मैं तो दंग रह गया कि कृष्णा सोबती, दूधनाथ सिंह के साथ मेरी कहानी भी छपी है तो यह मेरे लिए व्यक्तित्व का पुनराविष्कार था। लेखन के शुरुआती चार-पाँच सालों में ही संपादक मुझसे कहानी की माँग करने लगे जिससे मुझे कुछ पैसे भी मिलने लगे और लगा की यह काम हो सकता है।

' मात्रा और भार' आपका पहला कहानी-संग्रह है जो जयपुर से छपा था। पहली पुस्तक छपवाना आज भी जटिल काम माना जाता है और यह तो 1975 के आसपास की बात है। तो यह प्रकाशन कैसे हुआ इस पर कुछ बताएँ?

मुझे तो कुछ भी पता नहीं था कि प्रकाशक कहाँ रहता है पांडुलिपि कैसे तैयार होती है और अनुबंध क्या होता है? ऐसी इच्छा भी नहीं थी कि मेरी पुस्तक आए। उस समय जयपुर से एक दुबली-पतली लघु पत्रिका छपती थी जिसका नाम 'लोक संपर्क' था। उसके संपादक महोदय ने मुझसे कहा आपकी आठ-दस कहानियाँ जो इधर-उधर छपी हैं वे सब आप मुझे दे दीजिए, मैं उनकी एक पुस्तक छाप देता हूँ। मैंने सोचा जब ये इतना उत्सुक हो रहे हैं तो मैंने उन्हें वे कहानियाँ दे दीं। अब न वो प्रकाशक रहे, न वो किताब ही रही। सब एक सुनहरी दास्तान हो गए।

आपका दूसरा कहानी-संग्रह ' सूरज कब निकलेगा' दिल्ली से प्रकाशित हुआ जिसमें आपकी प्रसिद्ध कहानी ' नीलकांत का सफर' और शीर्षक कहानी ' सूरज कब निकलेगा' भी थी जिनकी वजह से हिंदी समाज ने आपको कहानीकार के रूप में पहचाना।

जैसा आपने कहा उस समय लघु पत्रिका आंदोलन अपने ओज पर था। सब जगह से लघु पत्रिकाएँ निकल रही थीं। मेरी तमाम कहानियाँ भी लघु पत्रिकाओं में छप रही थीं। दिल्ली में मेरे मित्र रमेश उपाध्याय एक पत्रिका निकालते थे उसी में मैंने अपनी कहानी 'सूरज कब निकलेगा' छपने के लिए भेजी थी। संयोग से उसी समय मेरे एक अन्य मित्र मोहन श्रोत्रिय जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शोध के लिए गए। वहाँ उनकी मुलाकात एक प्रकाशक से हुई जिन्होंने कहा कि हम स्वयं प्रकाश की कहानियों का संग्रह छापना चाहते हैं जिसमें ये कहानी होनी चाहिए। इस तरह 'सूरज कब निकलेगा' नाम से ही कहानी-संग्रह छप गया।

इस बीच आपका एक नाटक ' फीनिक्स' आया था, जो बीकानेर के धरती प्रकाशन से छपा था और एक-दो छोटी किताबें भी। इनकी कहानी बताइए?

यह सब मित्रतावश हो गया बस। अब आज तो पूरा संसार आपके पास है। आप न्यूयॉर्क के प्रकाशक से भी बात कर सकते हैं। उस समय, 75-80 के दौर में, राजस्थान के छोटे शहरों में प्रकाशकों को ढूँढ़ना बहुत मुश्किल था। उस समय साहित्य के केंद्र थे इलाहाबाद और बनारस। बाद में दिल्ली साहित्य का केंद्र बना। बनारस या इलाहाबाद से ही सारी किताबें छपती थीं और लेखकों को यश भी वहीं से मिलता था। आप देखेंगे एक समय तक हिंदी में प्रदेशों की झनक नहीं मिलती। इस मामले में मध्य प्रदेश को थोड़ा अपवाद माना जा सकता है। वहाँ के लोग यशस्वी साहित्यकार हुए। उस समय कोई भी साहित्य में प्राप्ति के दृष्टिकोण से नहीं आता था। प्राप्ति की आशा से आना तो कुएँ में छलाँग लगाने जैसा था। उस समय कला के प्रति समर्पण के भाव से लोग आते थे।

' क्यों' के बारे में बताएँ। आप मोहन श्रोत्रिय जी से मिले। आपकी मित्रता हुई और आप दोनों ने मिलकर ' क्यों' का संपादन किया। तो लघु पत्रिका निकलने का विचार कैसे आया? यह जोखिम नहीं था आप लोगों के लिए?

वहाँ एक मजेदार बात ये हुई। मैं वहाँ बहुत सारे काम करता था। बच्चों के नाटक कराता था, वहाँ के गरीब बच्चों के लिए शाम को कक्षा का प्रबंध करता था और वहाँ से मैंने एक अखबार भी निकाला था - 'मुक्तवाणी', वो चल नहीं पाया तो उसी समय मित्रों ने कहा, क्यों न आपके विचारों को लघु पत्रिका से पूरे क्षेत्र में पहुँचाया जाए। उस समय यह एक वैचारिक पत्रिका थी और इसमें मैं अपने से ज्यादा मोहन श्रोत्रिय को इसका श्रेय दूँगा। एक और शख्स जिनके बिना ये नहीं हो सकता था वो थे हमारे कुर्बान भाई, उनसे हमें बहुत सहयोग मिला। तो उस छोटी-सी जगह से 'क्यों' पत्रिका निकल पाई।

आप जब हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड से सेवानिवृत्त हुए तो आप भोपाल आ गए और वहाँ आप ' वसुधा' और ' चकमक' से जुड़े।

 

मध्यप्रदेश में प्रगतिशील लेखक संघ बहुत मजबूत था और उस समय उसके अध्यक्ष थे हरिशंकर परसाई। उसी समय ज्ञानरंजन और कमला प्रसाद ने एक पत्रिका निकाली थी - 'पहल', जिसने हिंदी साहित्य में बहुत डंका बजाया। कमला प्रसाद जी मित्र थे उन्होंने 'वसुधा' शुरू की और कहा - आ जाओ। तो चले गए। ...और 'चकमक' से तो ऐसे जुड़ना हुआ कि मैंने सोचा चालीस साल तक लिखा पर बच्चों के लिए कुछ नहीं लिखा और फिर 'चकमक' से जुड़ गया।

आपने कहानी, नाटक, उपन्यास और बच्चों के लिए भी लिखा। तो क्या यह नहीं पूछना चाहिए कि आपको किस काम में सबसे ज्यादा आनंद आया और किसका रचना-संसार आपको सबसे अच्छा लगा?

आपके प्रश्न के दो भाग हैं तो पहला तो यह कि मुझे किसके लिए लिखने में आनंद आया तो इसका उत्तर बड़ा मार्मिक है, करुण है। ...मुझे मित्रों को पत्र लिखने में बड़ा आनंद आता है। आता था और ये तो वो जमाना था जब पंद्रह से बीस पृष्ठों का पत्र लिखते थे और दूसरा भाग यह कि आपको किसके लिए लिखने में आनंद आता है तो मुझे बच्चों के लिए लिखने में बहुत आनंद आता है।

आपका एक उपन्यास आया था ' ईंधन', उसे भूमंडलीकरण की बड़ी परिघटना का उपन्यास कहा गया। उसकी तारीफ भी हुई। उस समय आप चित्तौड़ में रहते थे, जहाँ छोयर मार्केट की चिंता भी कितने लोग करते होंगे, मैं नहीं जानता। तो ऐसे में आपको भूमंडलीकरण पर लिखने की प्रेरणा कैसे मिली?

दरअसल जो भी हमारे देश के बदलाव को ध्यान से देख रहा होगा तो जानता होगा कि अस्सी के दशक में तीन चीजें महत्वपूर्ण हुईं। एक तो सोवियत सत्ता का पतन हुआ, दूसरा संचार क्रांति हुई, आज जो संचार साधन आप देख रहे हैं वो उस समय कहाँ थी। हमारे यहाँ तो कंप्यूटर का छोटे से छोटा काम सीखने भी लंदन जाना होता था, और तीसरा यह कि उसके साथ ही नवसाम्राज्यवाद आने लगा जिसे लाड़ में सब वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण कहते हैं। अब वस्तुएँ हमारा मूल्य निर्धारण करने लगीं। इस प्रकार की बातें धीरे-धीरे बढ़ने लगीं। इसकी चिंता ने मुझे एक भय दिया कि भारत की सामूहिकता-पारिवारिकता और सब खत्म हो जाएगा। दूसरी बात विज्ञापन की है। विज्ञापन ने दस पैसे की चीज को सौ पैसे का कर दिया जिसने भारत की पूरी तसवीर बदल दी तो इसका विरोध करना था जो मैंने लिखकर 'ईंधन' के रूप में किया।

अब इससे ये पता चला कि आपके चिंतन में भारतीयता और उसका मूल्य है। अब यह बताएँ कि इन दिनों आप क्या नया कर रहे हैं?

पल्लव! मुझे लगता है एक स्थिति के बाद कलाकार को विश्राम ले लेना चाहिए जैसे खिलाड़ी करते हैं जब वह अवस्था पार कर लेते हैं तो कमेंटेटर हो जाते हैं। तो बात यह है कि यदि आप स्वयं को अड़ा लेंगे तो लोग परेशान हो जाते हैं तो एक तरह से मैंने साहित्य से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली है। हाँ, सोचता हूँ तो लिखता भी हूँ पर अभी कोई बड़ी परियोजना नहीं है। अगर बच्चों के लिए अमर पात्रों की कल्पना कर पाया तो ये मेरा सौभाग्य होगा।

इस सूचना क्रांति के दौर में पुस्तकों का और परिवार का महत्व और मूल्य कैसे बचाएँ?

मैं तो यही कहूँगा कि जितने लोग इस साक्षात्कार को पढ़ रहे हैं महीने में एक किताब खरीदकर अपने बच्चों को जरूर दें। साल में बारह किताबें अगर बच्चों ने पढ़ लीं तो उन्हें किताबें अच्छी लगेंगी। हिंदी जो अभी हिंदी पढ़ने वाले बच्चों, शिक्षकों और साहित्यकारों के बीच सिमटी हुई है उसमें जब सब लोग, समाज के हर वर्ग के लोग, उसमें हिस्सा लेंगे तो यह जीवंत होगी। पुस्तकें जीवित रहेंगी। इसका कोई विकल्प नहीं है।


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