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कविता

कविताएँ
सुनील गंगोपाध्याय


सिर्फ कविता के लिए

ओ इक्कीसवीं सदी के मनुष्य!

देखता हूं मृत्यु

नारी अथवा घासफूल

नाम नहीं

पर्दा हट जाता है

इसी तरह

नीरा के लिए

लंबी कविता की पांडुलिपि

 

 

सिर्फ कविता के लिए

सिर्फ कविता के लिए यह जन्म, सिर्फ कविता के लिए
कुछ खेल, सिर्फ कविता के लिए बर्फीली सांझ बेला में
अकेले आकाश-पाताल पार कर आना, सिर्फ कविता के लिए
अपलक लावण्य की शान्ति एक झलक,
सिर्फ कविता के लिए नारी, सिर्फ
कविता के लिए इतना रक्तपात, मेघ में गंगा का निर्झर
सिर्फ कविता के लिए और बहुत दिन जीने की लालसा होती है
मनुष्य का इतना क्षोभमय जीवन, सिर्फ
कविता के लिए मैंने अमरत्व को तुच्छ माना है ।

(अनुवाद : प्रियंकर पालीवाल)

 

ओ इक्कीसवीं सदी के मनुष्य!

ओ इक्कीसवीं सदी के मनुष्य!
तुम्हारे लिए प्रार्थना करता हूं
चंचल सुख और समृद्धि की,
तुम अपने जीवन और जीवनयापन में मजाकिया बने रहना
तुम लाना आसमान से मुक्ति-फल --
जिसका रंग सुनहरा हो,
लाना -- खून से धुली हुई फसलें
पैरों-तले की जमीन से,
तुम लोग नदियों को रखना स्रोतस्विनी
कुल-प्लाविनी रखना नारियों को
तुम्हारी संगिनियां हमारी नारियों की तरह
प्यार को पहचानने में भूल न करें,
उपद्रवों से मुक्त, खुले रहें तुम्हारे छापेखाने
तुम्हारे समय के लोग मात्र बेहतर स्वास्थ्य के लिए
उपवास किया करें माह में एक दिन,
तुम लोग पोंछ देना संख्याओं को
ताकि तुम्हें नहीं रखना पड़े बिजली का हिसाब
कोयले-जैसी काले रंग की चीज
तुम सोने के कमरे में चर्चा में मत लाना
तुम्हारे घर में आए गुलाब-गंधमय शान्ति,
तुम लोग सारी रात घर के बाहर घूमो-फिरो।
ओ इक्कीसवीं सदी के मनुष्य!
आत्म-प्रताड़नाहीन भाषा में पवित्र हों
तुम्हारे हृदय,
तुम लोग निष्पाप हवा में आचमन कर रमे रहो
कुंठाहीन सहवास में।
तुम लोग पाताल-ट्रेन में बैठकर
नियमित रूप से
स्वर्ग आया-जाया करो।

(अनुवाद : उत्पल बैनर्जी)

 

देखता हूं मृत्यु

मृत्यु के पास मैं नहीं गया था, एक बार भी
फिर भी वह क्यों छद्मवेश में
बार-बार दिखाई देती है!
क्या यह निमन्त्रण है.... क्या यह सामाजिक लघु-आवागमन
अकस्मात उसकी चिट्ठी मिलती है
अहंकार विनम्र हो जाता है
जैसे देखता हूं नदी किनारे एक स्त्री
बाल बिखरा कर खड़ी है
पहचान लिए जाते हैं शरीरी संकेत
वैसे ही हवा में उड़ती है नश्वरता
डर लगता है, छाती कंपती है
कि सब कुछ छोड़कर जाना पड़ेगा
जब भी कुछ सुन्दर देखता हूं
जैसे कि भोर की बारिश
अथवा बरामदे के लघु पाप
अथवा स्नेह की तरह शब्दहीन फूल खिले रहते हैं
देखता हूं मृत्यु, देखता हूं वही चिट्ठी का लेखक है
अहंकार विनम्र हो जाता है
डर लगता है, छाती कंपती है
कि सब कुछ छोड़कर जाना पड़ेगा!!


(अनुवाद : उत्पल बैनर्जी)

 

नारी अथवा घासफूल

मनोवेदना का रंग नीला है या कि बादामी
नदी किनारे आज खिले हैं घासफूल
पीले और सफेद
क्या उनके पास भी है हृदय या स्वप्नों की वर्णच्छटा
एक दिन इस नदी के तट पर आकर खुशी से उजला हो जाता हूं
और फिर कभी यहीं हो जाता हूं दुखी
मनहर मुख नीचा कर पूछता हूं
घासफूल, तुम क्या नारी की तरह
दु:ख देते हो
तुम्हीं प्रतीक हो आनन्द के भी

(अनुवाद : उत्पल बैनर्जी)

 

पर्दा हट जाता है

 

देखता हूँ दूर अंधेरी स्मृति के उस पार हैं
सैकड़ों कारागार, कालिख जाते और धुएँ से भरे
या फिर पूजा के घण्टे अथवा मदिर लास्य गीतों से,
ये ऐसे कारागार कि जहाँ प्रहरीवृन्द बड़े मजाकिया हैं
शब्दों के आह्लाद में वे लाते हैं लोहे के बदले सोने की बेड़ियाँ।
पर्दा हट जाता है
देखता हूँ, एक झूठे समाज में
झूठे कुनाट्य-रंग में विह्वल है पूर्व और पश्चिम बंगाल
जूठन खाने वाले जुटे हैं लालच की प्रतियोगिताओं में
विज्ञ और भाण्ड व्याकुल हो भूमिकाएँ बदल लेते हैं।
पर्दा हट जाता है
देखता हूँ, समस्त दृश्यों को पार कर एक अलग-सी रोशनी...
डर और रोना छोड़कर गरीब लोग निकल पड़े हैं राजपथ पर
खून के प्यासों के ही वंश से उठ आया है कोई असली महान रक्तदाता...
सप्तरथियों से घिरा किन्तु घोर युद्ध में फिर भी शामिल
बौना अकेला ब्राह्मण,
एक-एक कर दीवारें गिर रही हैं
हू-हू कर घुस रही है स्वच्छ हवा
कुछ ग्लानि पोंछकर...
उन्नीसवीं सदी करवट बदलकर सो जाती है।


(अनुवाद : उत्पल बैनर्जी)

 

इसी तरह

हमारे बड़े विस्मयकारी दुःख हैं
हमारे जीवन में हैं कई कड़वी खुशियाँ
माह में दो-एक बार है हमारी मौत
हम लोग थोड़ा-सा मरकर फिर जी उठते हैं
हम लोग अगोचर प्रेम के लिए कंगाल होकर
प्रत्यक्ष प्रेम को अस्वीकार कर देते हैं
हम सार्थकता के नाम पर एक व्यर्थता के पीछे-पीछे
खरीद लेते हैं दुःख भरे सुख
हम लोग धरती को छोड़कर उठ जाते हैं दसवीं मंजिल पर
फिर धरती के लिए हाहाकार करते हैं
हम लोग प्रतिवाद में दाँत पीसकर अगले ही क्षण
दिखाते हैं मुस्कराते चेहरों के मुखौटे
प्रताड़ित मनुष्यों के लिए हम लोग गहरी साँस छोड़कर
दिन-प्रतिदिन प्रताड़ितों की संख्या और बढ़ा लेते हैं
हम जागरण के भीतर सोते हैं और
जागे रहते हैं स्वप्न में
हम हारते-हारते बचे रहते हैं और जयी को धिक्कारते हैं
हर पल लगता है कि इस तरह नहीं, इस तरह नहीं
कुछ और, जीवित रहना किसी और तरह से
फिर भी इसी तरह असमाप्त नदी की भाँति
डोलते-डोलते आगे सरकता रहता है जीवन...!!

( अनुवाद : उत्पल बैनर्जी)

 

नीरा के लिए

नीरा! तुम लो दोपहर की स्वच्छता
लो रात की दूरियाँ
तुम लो चन्दन-समीर
लो नदी किनारे की कुँआरी मिट्टी की स्निग्ध सरलता
हथेलियों पर नींबू के पत्तों की गंध
नीरा, तुम घुमाओ अपना चेहरा
तुम्हारे लिए मैंने रख रखा है
वर्ष का श्रेष्ठवर्णी सूर्यास्त
तुम लो राह के भिखारी-बच्चे की मुस्कराहट
लो देवदारु के पत्तों की पहली हरीतिमा
कांच-कीड़े की आंखों का विस्मय
लो एकाकी शाम का बवण्डर
जंगल के बीच भैंसों के गले की टुन-टुन
लो नीरव आंसू
लो आधी रात में टूटी नींद का एकाकीपन
नीरा, तुम्हारे माथे पर झर जाए
कुहासा-लिपटी शेफालिका
तुम्हारे लिए सीटी बजाए रात का एक पक्षी
धरती से अगर बिला जाए सारी सुन्दरता
तब भी, ओ मेरी बच्ची
तेरे लिए
मैं यह सब रख जाना चाहता हूं।

(अनुवाद : उत्पल बैनर्जी)

 

लंबी कविता की पांडुलिपि

इस पृथ्वी के साथ मिली हुई है एक दूसरी पृथ्वी
अरण्य के साथ एक समान्तराल अरण्य
दोपहर की निर्जनता में दूसरी एक निर्जनता
मुझे विस्मित कर देता है
कभी-कभी बहुत विस्मित कर देता है,
प्यार के मुखमण्डल को घेरे हुए है एक दूसरा प्यार
गहरी सांस के पड़ोस में एक और गहरी सांस
किसी शाम नदी किनारे अकेला बैठता हूं
लहर-लहर टुकड़े-टुकड़े हो जाता है रक्तवर्ण आकाश
तब एक और नदी के पड़ोस में
असंख्य लहरों का सम्राट बनकर
अकेले एक इन्सान का बैठे रहना --
एक अकेला इन्सान
पानी के इन्द्रजाल में देखता है कि वह अकेला नहीं
समस्त दुखों के हिमशीतल बिस्तर में है
एक और दूसरा दु:ख
सारे चिकने रास्तों के सिरहाने डोलता है
बिसरा दिया गया और एक निरुद्देश्य रास्ता
मुझे विस्मित कर देता है
कभी-कभी बहुत विस्मित कर देता है ....

(अनुवाद : उत्पल बैनर्जी)

 

 

नाम नहीं

 

अरुणोदय-जैसा शब्द मैंने बहुत दिनों से नहीं लिखा
शायद फिर कभी नहीं लिखूंगा
और तभी बादल गड़गड़ाते हैं --
यह क्या सुदूर गर्जन है या कि मेघमन्द्र
शब्दों के अमेय नशे ने जितनी अस्थिरता दी थी
उतना नारी भी नहीं जानती
सिहरन शब्द से जिस तरह बार-बार सिहरन होती है
बिसरा दी गई बाल-स्मृति में से
फिर उठ आती है प्रहेलिका
शाम को चौरास्ते पर अकस्मात
सारे रास्ते गड्ड-मड्ड हो जाते हैं,
कविता लिखने अथवा न लिखने का दु:ख आकर
सीने को दबोच लेता है
दु:ख, या कि दु:ख के जैसा कुछ और
जिसका नाम नहीं है!

(अनुवाद : उत्पल बैनर्जी)


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