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कविता

एकाएक
नरेंद्र जैन


कल तक सब कुछ यथावत था
आज एकाएक मैंने गौर किया और
स्तब्ध होकर दीवार पर टँगे चित्र को
देखता ही रहा
चित्र में वर्णित दृश्य का एक हिस्सा
चित्र से बाहर निकल कर
दीवार से लटक रहा था
वहाँ दरख्त की सूखी जड़ें
फ्रेम से बाहर निकल आई थीं
जैसे भूकंप की हल्की-सी तरंग
उस चित्र के आर-पार हो गई थी
अगली सुबह मैंने देखा
दृश्य गायब था और
मैं खाली कैनवास के सामने हताश खड़ा था।


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हिंदी समय में नरेंद्र जैन की रचनाएँ



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