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कविता

बाजरे की रोटियाँ
नरेंद्र जैन


बहुत सारे व्यंजनों के बाद
मेज के अंतिम भव्य सिरे पर रखी थीं
बाजरे की रोटियाँ
मैंने नजरें बचाते-बचाते
कुछ रोटियाँ उठाईं
एक कुल्हड़ में भरा छाछ का रायता
और समारोह से बाहर एक पुलिया पर आ बैठा

अब मेरे पास
भूख थी
और
एक दुर्लभ कलेवा

मैंने पुलिया पर बैठे-बैठे वर वधू को आशीष दिया
और उस अंधकार की तरफ बढ़ा
जहाँ मेरा घर था।


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