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कविता

बदहाली
नरेंद्र जैन


एक खुली हुई धारदार
बडी सी कैंची
आसमान से गिर रही है

कैंची के हमले से
अपने को बचाता हुआ
यह दर्जी एक पैर पर उछल रहा है
उसके रोजगार की सारी चीजें
यहाँ उसके खिलाफ युद्धरत हैं
बहुत सी सुइयाँ, तरह तरह के
धागों के जाल
बटन और नापने के फ़ीते
उस पर वार करने के लिए आमादा हैं

दर्जी के चेहरे से टपक रहा है पसीना
और उससे ज्यादा भय
उसके वस्‍त्र मैले कुचैले हैं
और उसके चारों तरफ दूर-दूर तक
बस जमीन खाली है

व्‍यवसाय की बदहाली
शायद यहीं बयान हो रही है।


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