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कविता

चाँद की तरह

रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति


तुम कमरे में रात का अँधेरा हो
मुस्कान खिड़की के काँच पर
स्ट्रीट लाइट सी चमक रही है
तुम प्यार नहीं करती पर उसमें भीगी हो

तुम्हारे ओंठों में कमल झलक रहे हैं और
पहाड़ों जैसे स्तनों में प्यार का रस भरा है
तुम्हारी आँखें चाँदनी में भीगी झील हैं
काले बालों में कान रातरानी की तरह महक रहे हैं
तुम अपने कमरे के अँधेरे में
दुनिया की सबसे खूबसूरत रात हो

तुम्हारे सुगंधित स्तनों के बीच की जगह
चाँदनी रात में बहती दूध की गंगा बन गई है
तुम्हरी मादक पिंडलियों में
पार्वती की सुंदरता आकर बस गई

नाभि में समुद्र मंथन से निकली मदिरा बह रही है
जो तुम्हारी एड़ियों में आकर छलक उठी है
तुम रात के अँधेरे में लेटी धरती हो
मैं चाँद की तरह तुम पर शीतलता को बुन रहा हूँ


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