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कविता

सूझ का साथी
माखनलाल चतुर्वेदी


सूझ, का साथी -
मोम-दीप मेरा!

कितना बेबस है यह
जीवन का रस है यह
छनछन, पलपल, बलबल
छू रहा सवेरा,
अपना अस्तित्व भूल
सूरज को टेरा -
मोम-दीप मेरा!

कितना बेबस दीखा
इसने मिटना सीखा
रक्त-रक्त, बिंदु-बिंदु
झर रहा प्रकाश सिंधु
कोटि-कोटि बना व्याप्त
छोटा सा घेरा!
मोम-दीप मेरा!

जी से लग, जेब बैठ
तम-बल पर जमा पैठ
जब चाहूँ जाग उठे
जब चाहूँ सो जावे,
पीड़ा में साथ रहे
लीला में खो जावे!
मोम-दीप मेरा!

नभ की तम गोद भरें -
नखत कोटि; पर न झरें
पढ़ न सका, उनके बल
जीवन के अक्षर ये,
आ न सके उतर-उतर
भूल न मेरे घर ये!
इन पर गर्वित न हुआ
प्रणय गर्व मेरा
मेरे बस साथ मधुर -
मोम-दीप मेरा!

जब चाहूँ मिल जावे
जब चाहूँ मिट जावे
तम से जब तुमुल युद्ध -
ठने, दौड़ जुट जावे
सूझों के रथ-पथ का
ज्वलित लघु चितेरा!
मोम-दीप मेरा!

यह गरीब, यह लघु-लघु
प्राणों पर यह उदार
बिंदु-बिंदु
आग-आग
प्राण-प्राण
यज्ञ ज्वार
पीढ़ियाँ प्रकाश-पथिक
जग-रथ-गति चेरा!
मोम-दीप मेरा!


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