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कविता

मैं नहीं बोला, कि वे बोला किए
माखनलाल चतुर्वेदी


मैं नहीं बोली, कि वे बोला किए।
हृदय में बेचैन
मुख खोला किए,
दो हृदय ले, तौल पर तौला किए।

यह न था बाजार, पर
उनके तराजू हाथ में थी,
क्रोध के थे, किंतु उनके
बोल थे कि सनाथ मैं थी,
सुघढ़, मन पर
गर्व को तौला किए,
झूलती, प्रभु-बोल का डोला किए,
मैं नहीं बोली, कि वे बोला किए।

आज चुंबन का प्रलोभन
स्नेह की जाली न डाली,
नहीं मुझ पर छोड़ने को
प्रेम की नागिन निकाली,
सजनि मेरे
प्राणों का झोला किए;
डालते थे प्यार को, वे क्रोध का गोला किए,
मैं नहीं बोली, कि वे बोला किए।

समय सूली-सा टँगा था,
बोल खूँटी से लगे थे,
मरण का त्यौहार था सखि,
भाग जीवन-धन जगे थे,
रूप के अभिमान में जी का जहर घोला किए,
मैं नहीं बोली, कि वे बोला किए।


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