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कहानी

नया अतीत
स्कंद शुक्ल


रागिनी आज फिर आरामकुर्सी पर 'फॉस्ट' खोले, ढीली पड़ी है। अँगरेजी में अनूदित जर्मन महाकवि गेटे की वह सर्वोत्तम काव्यकृति, जिसने उन्नीसवीं सदी के तर्कवान यूरोप में खलबली मचा दी थी : बुद्धि और भावना के संघर्ष की गाथा, जो जितनी तब प्रासंगिक थी, उतनी ही आज भी है।

किताब के पहले ही पृष्ठ पर महाकवि गेटे का रंगीन चित्र है। सफेद-धूसर बालों से घिरा लंबा रक्ताभ चेहरा, वृद्धावस्था के कारण चौड़ा, आड़ी रेखाओं से पटा माथा, कमानदार भौहों से घिरी और ऊँची-लंबी पुलनुमा नाक से बँटी तिरछी तालनुमा आँखें और हलकी मुस्कान दर्शाते सिले पतले लाल होठ। नीचे शरीर पर उन्नीसवीं सदी की सफेद-स्लेटी वेशभूषा और हाथ में एक पत्र, जिसमें शायद जर्मन भाषा में कुछ लिखा हुआ है। इतना स्पष्ट, सुंदर और आभामय होने के बाद भी चित्र में रागिनी को बहुत-कुछ धुँधला, अस्पष्ट और रहस्यमय-सा नजर आता है और दाईं आँख से एक आँसू उसके गाल पर ढलक जाता है।

फिर अगले ही क्षण वह हाथ से उसे पोछ देती है और अब उसके चेहरे पर मौजूद करुणा एक तीव्र घृणा द्वारा विस्थापित हो जाती है।

"शार्दूल! तुम इतने घिनौने हो सकते हो! मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि... यू विल डू दिस टु मी! ...माय फैमिली! ऋद्धिमा मेरी बेटी है! तुम्हारे दिमाग में एक बार भी यह ख्याल क्यों नहीं आया! हाउ कुड यू डू डिस! हाउ! हाउ! हाउ!"

और फिर तेज चलते उच्छ्वासों के साथ वह 'फॉस्ट' को बंद करती है और आँखें मींच लेती है। मगर अभी-अभी देखा हुआ गेटे का चित्र अब भी उसके सामने है, मानो वह पुस्तक से निकलकर उसकी पलकों के भीतर जा चिपका है। रागिनी बंद आँखों से उसे देख रही है, उसे लगता है कि वह गेटे नहीं स्वयं शार्दूल है। वही चेहरा-मोहरा, वही कद-काठी, वही कांतिमान रूप-रंग!

"और वही आचार-विचार भी तो!" मानो पलकों पर चिपकी वह छवि एक ठहाके के साथ बोल पड़ती है।

रागिनी झट से आँखें खोल देती है। उठती है और फ्रिज की ओर चल देती है। दरवाजा खोलकर हाथ एक ठंडी बोतल को टटोलकर निकालते हैं और बगल की मेज पर रखे गिलास में उड़ेल देते हैं। पानी के गिरने की आवाज में भी उसे शार्दूल की हँसी सुनाई पड़ती है, उसका हाथ रुक जाता है। वह आधे भरे गिलास को बमुश्किल अपने हलक के नीचे धकेल भर पाती है।

फिर पास की एक कुर्सी पर वह अपना ढीला बदन छोड़ देती है। सामने काँच की एक लंबी-चौड़ी आलमारी है, जिसमें पुरानी यादें फोटो फ्रेमों में कैद हैं। निशीथ और अपनी एक पुरानी फोटो पर जाकर उसकी नजरें जम जाती हैं और वह खो जाती है। मानो कल ही की बात हो। मनाली की वह कॉलेज-ट्रिप। संगी-साथियों के साथ मौज मस्ती। वहीं तो इस कहानी की शुरुआत हुई थी।

"अच्छा! क्या बात है! प्यार करते हो मुझसे! कौन-सा?" उसने उस शाम बॉनफायर के बाद शार्दूल से पूछा था।

"कौन ...सा! आ...आई डिड नॉट गेट यू।" उसका काँपता स्वर गूँजा था।

"देखो डियर! लिटरेचर के स्टूडेंट हैं हम। लिटरेचर वाले केवल प्यार नहीं करते, वे प्यार को पढ़ते हैं, पढ़कर प्यार करते हैं। तो बताओ - क्लासिकल प्यार करते हो मुझसे या कंटेंपॅरेरी!" और फिर उत्तर सुनने का इंतजार किए बिना ही उसने जोर का ठहाका मारा था।

"तुम लिटरेचर पढ़ती हो रागी, मैं लिटरेचर जीता हूँ। यही फर्क है तुम्हारी-मेरी साहित्यानुभूति में। गेटे का चेला हूँ मैं।" शार्दूल में न जाने कहाँ से एक दृढ़ता आ गई थी।

"ओय-होय रागी! एक्सक्यूज मी, दैट इज माइ पेटनेम! इतनी नजदीकी, इतनी जल्दी! और गेटे को हमने भी पढ़ा है यार! ऐसा क्या खास लगाव है तुम्हें भला?" उसके स्वर में अब भी पीछे हटते सागर की लहरों-सा हास्य था।

"यॅस। आइ मीन इट। मेरी मुहब्बत उस वर्थर की तरह है, जो वह अपनी लॉटे से करता है उस नॉवेल में।"

रागिनी के चेहरे पर वर्थर का नाम सुनते ही गंभीरता पसर गई थी। शार्दूल ने जिक्र ही कुछ ऐसा रूमानी छेड़ दिया था। जर्मन महाकवि गेटे द्वारा सृजित चौबीस साल का वह लड़का वर्थर, गाँव की उस लड़की लॉटे से एकतरफा लेकिन अगाध प्रेम करता है, यह जानते हुए भी कि उसकी प्रेयसी किसी अन्य के प्रति अनुराग रखती है और उसी की मंगेतर है। वर्थर की जीवन-कथा प्रेम की उसी असफलता का पत्र रूप में चित्रण है, जो वह अपने एक दोस्त विल्हेम को समय-समय पर लिखता है। उपन्यास आगे बढ़ता है, वर्थर लॉटे को भुला नहीं पाता, लॉटे अपने मंगेतर एल्बर्ट से शादी कर लेती है, और जब वह वर्थर के प्रेम की तड़प को अबंध रूप से बढ़ते देखती है, तो उससे मिलने से मना कर देती है।

वर्थर उसके गाँव से जाने का बहाना बनाकर उससे सुरक्षा के नाम पर एक पिस्टल की माँग करता है और उसी से स्वयं को गोली मार कर अपनी अतृप्त संतप्त प्रेमकथा का अंत कर लेता है। यह दास्तान 'द सॉरोज ऑफ यंग वर्थर' जब गेटे ने लिखी थी, तब बुद्धि और तर्कवादी शुष्क यूरोप भूमि के आसमान पर रोमांसवाद के बादल घुमड़ रहे थे। वह जमाना रूसो के उद्दाम प्रकृति-पेशल जीवन यापन के दर्शन का था; वह जमाना निरंकुश सामंतवादी शोषक व्यवस्था के प्रतिरोध का था।

साहित्य के इतिहास में वह काल 'तूफान और तनाव' के काल के रूप में याद किया जाता है। 'तूफान और तनाव' - यही वे शब्द थे, जो रागिनी के मुखमंडल पर चिंता के भाव ले आए थे। शार्दूल गेटे का नाम लेकर क्या अपने प्रेम की उदात्तता-उद्दामता सिद्ध करना चाहता था? या उसका इस तरह वर्थर का उद्धरण देना एक किस्म की धमकी थी, जो अक्सर नए-नए आशिक अपनी महबूबाओं के इंप्रेस करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। या इन दोनों में से कुछ भी नहीं, वह मात्र एक प्रेमी का अपनी प्रेयसी के लिए फैशन-स्टेटमेंट भर था।

मगर इस वार्तालाप को उन्हें असमय वहीं समाप्त कर देना पड़ा था। वहाँ निशीथ आ गया था और रागिनी उठकर उसके साथ चल दी थी। फिर ट्रिप के दौरान इस विषय पर बात ही न छिड़ सकी। मनाली बीत गई और अपने साथ असफल प्रेमोद्यम-गाथा छोड़ गई।

शार्दूल ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी थी। निशीथ से इसीलिए प्यार करती हो न रागिनी, क्योंकि उसके साथ तुम्हें अपना भविष्य दिखता है! वह अच्छे घर से है, पढ़ने में होशियार है और कहीं-न-कहीं नौकरी-व्यवसाय में लग ही जाएगा, इसीलिए न! और नहीं तो क्या कारण है, मेरी इन भावनाओं के साथ ऐसे बर्ताव का! सकारात्मक प्रतिक्रिया तो दूर, तुम मुझे ढंग से सुनना भी नहीं चाहती! ऐसी निष्ठुरता रागिनी! भौतिकता के प्रति इतना अनुराग!

और फिर घटनाचक्र कुछ ऐसा घूमता गया कि सब कुछ निशीथ के पक्ष में और शार्दूल के प्रतिकूल घटता गया। सिविल सर्विसेज की परीक्षा में निशीथ का अच्छी रैंक के साथ उत्तीर्ण होना और तत्पश्चात राजस्थान कैडर जॉइन करना। और इधर शार्दूल का वह बाइक-एक्सीडेंट और उसके तुरंत बाद पिताजी का देहावसान। ऐसे में किसी भी परीक्षा में स्थिर मन के साथ कैसे बैठा जा सकता था?

"मैं तुमसे एक गहरा जुड़ाव महसूस करता हूँ, रागी। मैं..." कॉलेज के आखिरी दिन शार्दूल ने छटपटाहट-भरी हिम्मत दिखाई थी।

"हर जुड़ाव जरूरी नहीं कि प्रेम ही बने, शार्दूल। अब इतने दिनों में जुड़ाव तो हो ही गया है। लखनऊ शहर से, यूनिवर्सिटी से, तुम-सबसे। शादी के बाद इस जिंदगी को बड़ा मिस करूँगी मैं। बैचलर लाइफ आफ्टर ऑल बैचलर लाइफ ही होती है!"

"शादी?" शार्दूल के चेहरे को जैसे साँप सूँघ गया था। "किसकी?"

"मेरी, ऑबवियस्ली और किसकी!"

शार्दूल की आँखें फटी रह गईं। वह रागिनी को हतप्रभ एकटक देखता रहा : मानो उसकी दुनिया ही लुट गई हो। उसने यह पूछने की भी जरूरत नहीं समझी कि दूल्हा आखिर कौन है। और वह बिना यह बात सुने वहाँ से चल भी देता, अगर रागिनी स्वयं ही न बता देती।

"निशीथ परसों यहाँ पहुँचेगा। शादी उंतीस को यहाँ कानपुर में है और रिसेप्शन बारह मई को वहाँ जयपुर में।"

शार्दूल पर वज्रपात हो गया। "तुम निशीथ से शादी कर रही हो? निशीथ से?" उसने एक अजीब-सी खिन्नता के साथ सवाल किया था।

रागिनी ने उस पर दृढ़ एकटक जमी नजरों के साथ मौन रहते हुए सिर हिलाया। बस।

कुछ ही देर में शार्दूल वहाँ से चल पड़ा। उसकी चाल में एक त्वरण था, वह रफ्तार-भरे डग भरते हुए ऑटो में बैठा और कहा, "निशातगंज? चलो।"

पच्चीस अप्रैल की शाम को शार्दूल के चाचा और माँ रागिनी के घर तशरीफ लाए थे। शादी की तैयारियों के माहौल के बीच ऐसी बातचीत सर्वथा अनपेक्षित थी, लेकिन सामाजिक सभ्यता नाम की भी तो चीज होती है न!

"भाई साहब, आइ वुड हैव ए ग्रीड टु दिस प्रपोजल, अगर रागिनी तैयार होती। निशीथ को उसने खुद पसंद किया है, अगर वह किसी और को पसंद करती तो हम उसके लिए 'हाँ' कर देते।" रागिनी के पिता ने कहा था।

"मैं जानती हूँ, सिंह साहब। लेकिन बेटा बड़ा उदास है। तीन दिनों से टूटा-बिखरा-सा पड़ा है, न खाता है, न पीता है। बहुत समझाया हम-लोगों ने, लेकिन नहीं मानता। थक-हारकर मैं आपके सामने हूँ। कोई तरीका हो सकता हो तो..." इतना कहकर शार्दूल की माँ ने एक बेबस मौन थाम लिया।

अगले हफ्ते रागिनी और निशीथ की धूमधाम से शादी हो गई। कानपुर के उस उत्सव में कॉलेज के बहुत-से दोस्त आए, खूब मस्ती हुई, नई-नई यादें गढ़ी गईं।

उंतीस अप्रैल की वह रात शार्दूल की जिंदगी की जैसे कालरात्रि थी। क्या करे वह? जान दे दे? कैसे यकीन दिलाए रागिनी को अपने प्रेम की तीव्रता का? या यह तीव्रता ही कहीं अभिशाप तो नहीं? और अब तीव्रता का विश्वास दिलाकर भी क्या होगा? सच है, लड़कियाँ भावना के निश्छल संवेग को नहीं चाहतीं। अरे, वे दरअसल भावनाओं को चाहती ही नहीं। वे केवल भौतिकता की चकाचौंध में जीती हैं, मैटीरियलिस्टिक सुख हर भावना से बड़ा है उनके लिए, वे तर्क का शृंगार करके अनुभूति का उपहास उड़ाती फिरती हैं। तितलियाँ हैं वे - उनका सरोकार सुवासित-सुदर्शी सुमनों से ही है, रस-गंध-रूपहीन फूलों पर क्यों फटकने लगीं वे भला?

रागिनी, तुमसे मैंने प्रेम किया, यह मेरा भावनात्मक उत्थान है; तुमने कोई रागात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी, यह तुम्हारा तर्कशील पतन है। मैं भावना के उत्तुंग शृंग से गिरा हूँ, इसलिए इतनी बुरी तरह घायल हुआ हूँ; मगर तुम न समझना कि तुम पूर्णरूपेण स्वस्थ हो और यों ही रहोगी सदा-सर्वदा। तुम तर्क के पंक में हो रागिनी और तुम्हें इस पंकजन्य संक्रमण का बोध बाद में होगा। और तब तुम्हें यह शार्दूल याद आएगा। बहुत याद आएगा। समझीं तुम!

तभी घर में चहचहाती डोरबेल की आवाज गूँजती है और रागिनी का स्वप्न टूट जाता है। दरवाजे पर इस समय कौन होगा? निशीथ के दो साल पहले अचानक डेंगी बुखार में हुए रक्तस्राव से निधन के बाद दिन में घर में कहाँ कोई आता है। मेड का आना-जाना सुबह जल्दी और देर रात को होता है; ऋद्धिमा कॉलेज के लिए निकलती है, तो शाम तक वापस आती है।

रागिनी आहिस्ता-आहिस्ता कदमों से दरवाजे की तरफ बढ़ती है। "कौन है!" भीतर से ही वह पूछती है।

कोई उत्तर नहीं आता तो वह दरवाजे के नन्हें गोल काँच से झाँकती है। सामने एक साँवला लड़का है, काले कपड़ों में। तेल चुपड़े-चिपके बाल, माथे पर लंबा काला टीका। वह फिर अपना प्रश्न दोहराती है।

"आज शनिवार है, मैडम! शनिदान कीजिए।" उत्तर मिलता है।

"जाओ अभी। आज नहीं।" वह रुखाई से जवाब देती है।

"हर तरह की बाधा कट जाए! तबियत-नौकरी-प्रेम : जो परेशान कर रहा हो, सब रस्ते पर आ जाए!" फिर जवाब मिलता है।

"कोई परेशानी नहीं है, कहा न! जाइए अभी!" रागिनी अबकी बार जोर देकर कहती है।

"प्रेम में जो भटके हैं, उनका मन उचट जाए!" फिर स्वर सुनाई पड़ता है।

रागिनी को एक खटका-सा लगता है। क्या शनिदान लेने आया यह पड़वा, ऋद्धिमा के बारे में कुछ जानता है? ऐसा कैसे हो सकता है? यह बात तो उसके - ऋद्धिमा-शार्दूल के सिवा किसी चौथे व्यक्ति को पता नहीं। यहाँ तक कि ऋद्धिमा ने कॉलेज की सहेलियों को भी इस राज से लगभग अनभिज्ञ ही रखा है। फिर?

रागिनी तेजी से भीतर की ओर चल देती है। लगभग दौड़ती, वह बेडरूम में पहुँचती है और अपना शरीर खाली बिस्तर पर जैसे फेंक देती है। उसे लगता है घर के इस विकृत रहस्य को अब सब जान चुके हैं, पूरा संसार उस पर क्षारीय हँसी हँस रहा है, समूचे समाज के सामने उसका निर्दय तिरस्कार हो रहा है।

रागिनी उद्विग्न नजरों से छत पर लगे सीलिंग फैन को एकटक देख रही है। तभी अचानक वह चल पड़ता है और उसके ब्लेड घूमने लगते हैं और वह अतीत में फिर खो जाती है।

अभी दो महीने पहले ही की तो वह बात है। वज्रपात उस पर यों अचानक होगा, उसने सोचा भी न था। बिग बाजार से शॉपिंग करते वक्त उसे कुछ थकान महसूस होने लगी और वह मॉल में स्थित कैफे कॉफी डे की ओर बढ़ चली। सामने काँच की दीवारों के पार नजरें गईं तो देखा कि ऋद्धिमा किसी के साथ एक सोफे पर बैठी है। कंधे पर तिरछा सिर, हाथ में गुँथा हाथ। मगर बगल में बैठा व्यक्ति उससे उम्र में थोड़ा बड़ा जान पड़ रहा था और जाना-पहचाना भी। रागिनी ने निगाहों को पैना कर के देखा तो मूँछों के बावजूद उसे शार्दूल को पहचानने में दिक्कत नहीं हुई। यह क्या! कैसे! क्यों!

एकबारगी उसके जी में आया कि सीधे धड़धड़ाते हुए कैफे में दाखिल हो जाए और ऋद्धिमा को खड़ी करके उसे दो चपत लगाए। प्रेम का अंधा होना सुना था मगर उसके अन्य अंगों की विकलता कहीं नहीं बताई गई थी। और दृष्टिहीन होने के बाद भी, वह अपनी इस विकलता की भरपाई अन्य इंद्रियों के परिवर्धन से कर लेता है। जमाना बदल गया है, जातिगत-धर्मगत और यहाँ तक कि राष्ट्रगत विषमताएँ भी आज बेमानी साबित हो रही हैं, लेकिन अभी भी भारत में कम-से-कम अवस्था की मर्यादा तो बरकरार है ही। कम-से-कम उसने तो ऐसा महज किस्सों-कहानियों में सुना था, सामने घटते नहीं देखा था। और घटना भी ऐसा कि खुद ही की बेटी के साथ!

मगर रागिनी का परम निपीड़क मर्म-बिंदु ऋद्धिमा का अपने से इतने बड़े व्यक्ति के साथ प्रणयबद्ध होना नहीं था। वह इतना न कसमसाती अगर वह शार्दूल को न जानती होती, अगर उसका और शार्दूल का एक साझा अतीत न होता, अगर उसने शार्दूल के प्रणय-प्रस्ताव को इक्कीस साल पहले लखनऊ में यों अस्वीकार नहीं किया होता। उसे ऋद्धिमा ने चोटिल नहीं किया था, वह शार्दूल के आघात से घायल हुई थी।

रागिनी वहाँ से अतीत के उत्तरों और वर्तमान के प्रश्नों की पीड़ा लिए चल दी। जिस अतीत को अब तक वह साधारण समझती थी, वह असाधारण वर्तमान में परिणत होकर इस तरह सामने आएगा, ऐसा उसने सपने में भी नहीं सोचा था। मगर उसके सामने अब भी कई अनुत्तरित सवाल थे? क्या शार्दूल ऋद्धिमा के परिवार के बारे में जानता है? क्या वह जानता है कि वह रागिनी और निशीथ की बेटी है? अगर हाँ, तो उसने ऐसी घिनौनी हरकत क्यों की? अथवा वह इस छद्म प्रेमलीला की सर्जना करके रागिनी से प्रतिशोध ले रहा है?

बिच्छुओं के दंश-से सैकड़ों सवाल और उनके सहस्रों संभावित जवाब। रागिनी स्वयं को उनसे डसवाती रही और वे उसे विषाक्त करते रहे। घर पहुँचते-पहुँचते उसमें इतना विष व्याप्त हो चुका था कि वह किसी सर्पिणी की तरह फुफकार रही थी।

घर खोलते ही वह सीधे बेडरूम की ओर बढ़ी, अपना पर्स बिस्तर पर फेंका और सेलफोन से ऋद्धिमा का नंबर डायल किया।

"व्हेयर आर यू? कम होम अभी। तुरंत। इट्स अर्जेंट। कहा न इट्स अर्जेंट! ऋद्धि! जितना कहा है, उतना करो। आइ सेड राइट नाउ!" कहकर उसने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।

एक घंटे बाद घर में मातम का माहौल था। दोनों माँ-बेटी लॉबी में बैठी हुई थीं, आँखें परस्पर मिलाए हुए और मौन प्रश्नों के बदले प्रतिप्रश्न। समस्या यह थी कि रागिनी बिना पृष्ठभूमि बताए नश्तर-से तीखे सवालों के जवाब चाह रही थी, जो ऋद्धिमा को अजीब और बुरे दोनों लग रहे थे। उसने कभी अपनी मम्मी को इस तरह बिहेव करते नहीं देखा था।

"मॉम! वुड यू प्लीज टेल मी व्हॉट्स रॉन्ग विद यू!" लड़की ने दोनों हथेलियों को असहाय अंदाज में फैलाकर कहा।

रागिनी ने किलसन के साथ शून्य में ताकते हुए गर्दन हिलाई।

"मॉम! प्लीज! स्टॉप बिहेविंग इन सच अवे!"

"हाउ कुड यू बी विद अ मैन लाइक हिम?" अंततः रागिनी का अंतर्विक्षोभ फूट पड़ा।

"मैन लाइक हिम? आइ लव हिम!" ऋद्धिमा के उत्तर में एक निर्णयात्मक दृढ़ता थी।

"लव? डज ही लव यू बैक?" रागिनी जैसे प्रश्न न पूछ रही हो बल्कि प्रत्युत्तर दे रही हो।

"ही डज! वी बोथ लव ईच अदर! इट्स म्यूचुअल मॉम!" ऋद्धिमा ने समझाते हुए अपनी बात रखी।

"शादी करेगा तुमसे? या खाली मजे कर रहा है?"

"शादी! शादी! शादी! मॉम! प्यार सच्चा है, इसकी कसौटी क्या सिर्फ शादी है? अगर शादी का वादा करके प्यार किया तो गुड! अदरवाइज नहीं?" ऋद्धिमा ने खीझकर पूछा।

रागिनी चुप हो गई। ऐसा लग रहा था कि वह वार्तालाप केवल औपचारिकता के लिए कर रही है; इस खेल के दोनों पात्रों को वह भलीभाँति जानती है। और उसे यह भी पता है कि इस संबंध की परिणति अंततः क्या होगी।

उसने अपने आँसू पोछे और वह वहाँ से उठकर चल ही दी थी कि ऋद्धिमा ने ही कुछ अप्रत्याशित कहा।

"आपसे ज्यादा मैच्योर हैं वे। जिंदगी को ठहरकर जीते हैं। लिटरेचर के प्रोफेसर जो ठहरे। कहते हैं कि लोग साहित्य पढ़ते हैं, मैं साहित्य जीता हूँ। मिलेंगी उनसे? मिलाऊँ आपको? बोलिए?"

रागिनी को जैसे साँप सूँघ गया था।

"बोलिए? ही इज रियली-रियली अ गुड कंपनी! एक बार मिल लीजिए, फिर कहिएगा।"

रागिनी से कुछ बोलते न बन रहा था।

"मॉम! बताइए कब मिलाऊँ? घर पर लंच? या बाहर डिनर करने चलें? टेल मी!"

"ठीक है। जब और जहाँ तुम ठीक समझो।" अंततः रागिनी ने निष्क्रियता के साथ उत्तर दिया।

"ऑल राइट देन! लेट्स हैव डिनर टुगेदर सम टाइम सून!" ऋद्धिमा ऐसी चहकी, जैसे उसने कोई बहुत बड़ी विजय पा ली हो।

अगले ही दिन शाम को जयपुर के उस पाँच-सितारा होटल 'द ललित' में रात्रिभोज आयोजित किया गया था। रागिनी और ऋद्धिमा तय समय से आधे घंटे पहले पहुँची थीं और शार्दूल ने ऋद्धिमा से कहा था कि वह ठीक आठ बजे वहाँ पहुँच जाएगा।

दोनों माता-पुत्री के चेहरों पर अलग-अलग भावनाओं का प्रतिबिंबन था। रागिनी असहज भी थी और कुंठित भी, वह समझ नहीं पा रही थी कि घड़ी से तेज चलने को कहे या धीमे। उसके भीतर कई क्रोध भरे प्रश्न उबल रहे थे जो उसे शार्दूल से पूछने थे।

ऋद्धिमा प्रसन्न थी और उत्साहित भी। उसे इसी बात से संतोष था कि उसकी प्यारी मम्मी शार्दूल से मिलने को तैयार हो गई हैं। प्रेम अब उनके संज्ञान में आ गया है तो उसके लिए उसे अनुमोदन मिल जाए, बाकी आगे देखा जाएगा।

जैसे ही घड़ी ने आठ बजाए, शार्दूल सामने से डाइनिंग-हॉल में दाखिल हुआ। मानो घड़ी के बड़े काँटे ने बारह पर पहुँचकर आगंतुक को 'हेलो देयर' कहा हो। बिलकुल भी तो नहीं बदला था वह। वही मँझोला कद, वही चाल, वही भाव-भंगिमाएँ; बस होठ के ऊपर घनी मूँछें ही उसे उसके अतीत से विलग करती थीं। सहज अंदाज में चलता हुआ वह डाइनिंग-टेबल की ओर बढ़ता चला आया, जहाँ रागिनी और ऋद्धिमा प्रतीक्षारत थे।

"हाय! हेलो!" उसके दोनों को किए अलग-अलग अनाम अभिवादनों के पहले ही दोनों महिलाएँ एक साथ खड़ी हो गई थीं। "प्लीज, आप लोग बैठिए!"

और फिर वहाँ कुछ क्षणों के लिए एक अजीब-सी शांति पसर गई। तीनों शायद इस सोच में थे कि बातचीत कैसे शुरू की जाए और कौन शुरू करे।

सबसे पहले शार्दूल को देखते हुए ऋद्धिमा का चहकता स्वर फूटा। "पंक्चुअल ऐज एवर! ठीक आठ बजे!"

"मैं सात बजे निकला था। बुक शॉप से कुछ किताबें लेनी थीं। फिर वहाँ से सीधा यहाँ।" शार्दूल ने जवाब दिया।

"बाय-द-वे! ये मेरी मम्मी हैं। और मम्मी ही इज शार्दूल!" ऋद्धिमा ने उनके तार परस्पर जोड़ते हुए कहा।

शार्दूल ने शांत मुस्कान के साथ मौन अभिवादन किया, रागिनी ने अपने चेहरे के प्रश्नचिह्नों को पूर्ववत बनाए रखा।

एक असहजता का बुलबुला अब भी उन तीनों को कैद किए हुए था जिसकी परिधि और भित्ति-शक्ति को तीनों अपने-अपने तरीके से अनुमानित कर रहे थे।

इतनी देर में वेटर ने आकर शांति भंग की। "हैलो सर! हैलो मैडम! व्हॉट वुड यू लाइक टु हैव?"

तीन जोड़ी आँखें आपस में बारी-बारी से चार हुईं। "वी विल लेट यू नो इन अ व्हाइल!" न जाने रागिनी में अचानक एक निर्णयात्मकता कैसे आ गई थी।

वेटर सहमति में सिर हिलाता चला गया। ऋद्धिमा ने एक बार फिर से मौनभंग करते हुए ऊपर सीलिंग पर लगे झूमरों को देखते हुए कहा, "आइ लाइक द एंबिएंस ऑफ दिस प्लेस! नाइस!"

रागिनी की नजरें मेन्यू कार्ड पर जमी थीं। जब मौन भी मुखरता-सा ही असहज करता हो, तो ऐसे मौके पर सारा दारोमदार नजरों पर ही तो आ टिकता है। व्यक्ति जब मुँह से कुछ सुन नहीं पाते, तब वे आँखों में झाँकते हैं। ऐसे में नजरों को चुराने से बेहतर उन्हें कहीं और लगा देना ही होता है।

"आप क्या लेंगी?" शार्दूल के बोल फूटे।

"कुछ भी।" रागिनी ने धीमे से जवाब दिया। "आप सजेस्ट कीजिए।"

"यू वुड टेक चिकेन, इजंट इट?" ऋद्धिमा ने शार्दूल की तरफ देखा और फिर एक ठहाका मारा। "मम्मी! ही जस्ट लव्ज चिकेन! सच अ 'मुर्गी-किलर' ही इज! ओ! एक्सक्यूज मी प्लीज!"

उसका फोन आ गया था और वह उठकर वहाँ से चल दी। डाइनिंग-टेबल पर पल भर को जैसे संतुलन बिगड़-सा गया। रागिनी के पैर जैसे उसे किसी स्प्रिंगनुमा हरकत के साथ बेटी के पीछे-पीछे ले जाने को उद्यत हुए ही थे कि किसी भीतरी शक्ति ने उसको वहीं बैठे रहने का निर्देश दिया।

"लड़की की माँ हो तुम! कैसी बेवकूफी करने चली हो! जिसके साथ उसने संबंध बनाया है, उससे बात न करना और उठकर चल देना कहाँ की समझदारी है! बचपना दिखाना बंद करो रागिनी!"

"कैसी हो रागिनी!" एक ठंडा किंतु दृढ़ उच्छ्वास छोड़ते हुए शार्दूल ने पूछा।

"कब से जानते हो ऋद्धि को?" रागिनी के भीतर की माँ जो अब तक झिझकी बैठी थी, बाहर आ गई।

"पहले तुम बताओ कि तुम कैसी हो?"

"यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है, शार्दूल!"

"एक साल से। पर तुम कैसी..."

"यू आर सच अ स्काउंड्रल! यू रास्कल! एक साल से तुम मेरी बेटी को डेट कर रहे हो! तुम्हें पता था न कि ऋद्धिमा इज माइ डॉटर! बोलो शार्दूल! यू न्यू इट न!" रागिनी ने फूत्कारित स्वर में कहा।

"रागिनी! रिलैक्स! मुझे पता है कि तुम क्या सोच रही हो। लेकिन मुझे भी कुछ कहने का मौका तो दो। जितने सवाल तुम्हारे हैं, उन सब के जवाब साथ ले कर ही मैं यहाँ आया हूँ।"

"क्या जवाब हैं तुम्हारे पास? क्या जवाब दोगे तुम? यू डिड दिस ऐज अ रिवेंज, राइट? बदला ले रहे हो न मुझसे तुम, शार्दूल! है न! बोलो!"

"मुझे कुछ कहने दोगी, तब न कुछ कहूँगा। तुम बिलकुल नहीं बदली पहले से। न तब मुझे सुनती थी, न आज सुनती हो। मैं बोलूँ कुछ? इजाजत है?" शार्दूल ने अपने स्वर को हल्का-सा चढ़ाते हुए कहा।

"ओके फाइन। बोलो।" रागिनी ने अपने दोनों हाथों से माथे पर चले आ रहे बालों को पीछे धकेलते हुए भी नजरें शार्दूल पर गड़ाये रखीं।

"एक साल से ऋद्धिमा और मैं साथ हैं। लेकिन ये रिलेशनशिप कोई प्लानिंग या बदला नहीं है। मैं तो एक महीने पहले तक जानता भी नहीं था कि वह तुम्हारी बेटी है। वन डे शी शोड मी सम ऑफ हर फैमिली पिक्स।"

- और तब मुझे मालूम चला।"

"मालूम चला और फिर भी तुमने सोचा कि ठीक है, चलने दो। लेट द रिलेशनशिप गो ऑन। नई कमसिन लड़की है, व्हाइ शुड आइ मिस द फन! और इसी बहाने रागिनी से पुराना हिसाब-किताब भी पूरा हो जाएगा!" रागिनी उत्तेजित स्वर में कहे जा रही थी।

"रागिनी, बस करो। प्लीज।"

"टेल मी समथिंग, डिड यू गाइज मेक आउट? हाउ वाज इट? फन? मजा आया होगा न नई उम्र की लड़की की..."

"रागिनी! बस! बहुत हो गया! स्टॉप इट नाउ!"

रागिनी चुप हो गई, शार्दूल की तीव्र प्रतिक्रिया देखकर नहीं, बल्कि आसपास सर्व कर रहे वेटरों और खाना खा रहे लोगों का असहज अंदाज देखकर। तब तक ऋद्धिमा भी उस तरफ तेज कदमों से लौटती दिखाई दी।

"सो! हाउ वाज इट गाइज!" शरारत के साथ दोनों को देखते हुए वह अपनी जगह पर बैठने लगी।" मुझे तो ऐसा लग रहा है कि आप-दोनों डेट पर आए हों।"

"किसका फोन था?" रागिनी ने विषयांतरण करते हुए पूछा।

"स्निग्धा का। उसे मेरे नोट्स चाहिए, आज ही।"

"इतनी-सी बात में इतनी देर लग गई?"

"हाँ, वह मुझे अपने एक कजिन के रिश्तों-विश्तों के बारे में बताने लगी। उसके घरवालों की पसंद वगैरह। मॉम! व्हॉट्स रॉन्ग विद यू?" उसने फटी आँखों को हलके से झपकते हुए कहा।

"खाना ऑर्डर करें?" शार्दूल ने स्थिति सँभालते हुए कहा।

मेन्यू कार्ड फिर से देखे जाने लगे। भूख लगने का तो सवाल ही कहाँ था! जब दिमाग में इतनी सारी मरोड़ें उठ रही हों, तब कौन भला पेट की मरोडों पर ध्यान देगा? फिर भी डिनर की मर्यादा तो रखनी ही थी, इसलिए ऑर्डर दे दिया गया।

कुछ ही देर में तीनों बेमन से खाना खाने लगे। ऋद्धिमा को यह मुलाकात दोनों के उतरे चेहरे देखकर अपने लक्ष्य से भटकी हुई जान पड़ रही थी। रागिनी का मन अब भी विक्षुब्ध था और शार्दूल अभी अपने संबंध के विषय में और बहुत-कुछ कहना चाहता था।

खाना आधे-अधूरे अंदाज में निपट गया। जिस ध्येय से डिनर आयोजित किया गया था, वह अब भी अपूर्ण था। लेकिन किया भी क्या जा सकता था! वेटर बिल लेकर आया और उसने शार्दूल के समीप उसे रख दिया।

"प्लीज शार्दूल, बिल मैं दूँगी।" रागिनी ने कहा।

"अब आप अगली बार दे दीजिएगा। इस बार मुझे ही देने दीजिए।" शार्दूल ने जवाब दिया।

"प्लीज, बात मानो। अलाउ मी।"

"अच्छा-अच्छा! आप दोनों नहीं करेंगे। गेट-टुगेदर मैंने ऑर्गेनाइज किया था, इसलिए मैं करूँगी।" ऋद्धिमा ने अपने बैग में हाथ डालकर वॉलेट निकालते हुए कहा।

बिल चुक गया। मीटिंग खत्म तो हुई, लेकिन पूरी नहीं हुई। तीनों साथ-साथ होटल की लिफ्ट से नीचे जाने लगे।

"जानती हो ऋद्धिमा! तुम्हारी मम्मी और मैं एक ही कॉलेज में थे।" शार्दूल ने दोनों महिलाओं को सन्न करने वाली घोषणा की।

"व्हॉट! डोंट टेल मी! आप लोग सीनियर-जूनियर थे?" ऋद्धिमा ने उत्फुल्ल फटी आँखों से पूछा।

"नहीं। हम साथ-साथ थे। एक ही बैच में, एक ही क्लास में।" शार्दूल ने कहा।

"मम्मी! व्हॉट इज दिस! आपने बताया नहीं!" ऋद्धिमा से आश्चर्य अब भी सँभल नहीं रहा था।

रागिनी ने चेहरे पर शांति बनाए रखी और कोई जवाब नहीं दिया।

तुम्हारी मम्मी और मुझे भी यह बात यहीं आकर मालूम पड़ी। इट वॉज सो स्ट्रेंज टु सी हर हियर आफ्टर ट्वेंटी वन ईयर्स! और वह भी यहाँ! तुम्हारे साथ!" शार्दूल ने बात का जवाब दिया।

"टेल यू व्हॉट शार्दूल! आप अपने कॉलेज के दिनों में एकदम मग्घे रहे होंगे। एकदम किताबी कीड़े-टाइप! तभी मम्मी जैसी लड़की आपसे मिस हो गईं और पापा इनको ले उड़े!" ऋद्धिमा ने ठहाका मारा।

"चुप करो ऋद्धि! कुछ भी बकवास करती हो! कहीं भी!" रागिनी का मौन टूट ही गया।

"अरे! लेकिन! आपके-जैसी लड़की को छोड़कर कैसे..." कहते हुए ऋद्धिमा ने हँसना जारी रखा।

"ऑल राइट देन। चला जाए। अरे हाँ! मम्मी आपने बताया नहीं कि आपको शार्दूल कैसे लगे?" गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए ऋद्धिमा ने एक आखिरी कोशिश की।

"ऋद्धि, देर हो रही है। उन्हें भी घर जाना होगा। इट्स इलेवन।" रागिनी ने सपाट चेहरा लिए जवाब दिया।

"रागिनी, कैन आइ हैव योर नंबर प्लीज!" शार्दूल ने पूछा।

रागिनी ने बिना कुछ कहे, पर्स खोला और एक कार्ड निकालकर उसे थमा दिया।

"बाय!" कहकर ऋद्धिमा ने पैर से एक्सेलेरेटर दबाया और कार आगे बढ़ गई।

दरवाजे पर फिर अचानक हुई हरकत से रागिनी वापस अतीत से वर्तमान में लौट आती है। दरवाजे पर क्या फिर कोई है? क्या वह शनिदान माँगने वाला पड़वा अभी तक गया नहीं? या कोई और है? कोई होता तो फिर डोरबेल बजाता। शायद मेरे कान ही बज रहे हों।

लेकिन फिर भी इतनी सारी शंकाओं के साथ आराम से बैठे रहना भी आसान नहीं होता। निर्जनता तब ज्यादा परेशान करती है, जब वह सचमुच निर्जन नहीं जान पड़ती, कोई उसे प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप में भंग कर रहा होता है। यही वजह है कि रागिनी अपनी समूची हिम्मत बटोरती है और वह वापस दरवाजे की ओर बढ़ती है। ऐसी खटपट के साथ मन में तरह-तरह के आते ख्यालों को विराम देने का यही एक विकल्प है।

दरवाजा खुलते ही सारी शुभाशुभ अटकलों पर विराम लग जाता है। वहाँ महज एक कुत्ता है काले रंग का, जो बड़े ध्यान से रागिनी की ओर एकटक देख रहा है। जानवर होने के बाद भी उसकी आँखों में एक अजीब-से मानवीय भावों की झलक है। रागिनी उसकी चेष्टा को समझती कुछ मिनटों को वहीं दरवाजे से सहारा लिए खड़ी रहती है और फिर अचानक हँस पड़ती है। कहीं वही शनिदान वाला पड़वा - इस कुत्ते में तो... नहीं बदल... गया!

फिर एक अजीब बदलाव होता है। रागिनी उस काले कृशकाय जानवर की आँखों में झाँकती रहती है तो उसे वही मेफिस्टोफ्लीज नजर आता है, जिसका खाका गेटे ने अपनी 'फॉस्ट' में खींचा था। नजरों में झलकता वही वहशियाना अंदाज, नुकीले दाँतों के बीच से लपलपाती गुलाबी जीभ में वही दृश्यमान क्रूरता, धीरे-धीरे दाएँ-बाएँ डोलते लंबे जिस्म में वही चिढ़ाने वाली अदा। देखा रागिनी! वर्थर को सताने की सजा क्या होती है! हर वर्थर आत्महत्या नहीं करता, कुछ उम्र बढ़ने पर फॉस्ट बन जाते हैं। और फिर! फिर, उन्हें मैं मिल जाता हूँ, मैं! शैतान! लॉटे उसकी न हुई, क्योंकि तब मैं उसके साथ नहीं था! लेकिन अब! अब ग्रेचेन को उससे मिलने से कोई नहीं रोक सकता! कोई नहीं!

रागिनी सिहर उठती है और पूरी ताकत से अपने शरीर को पीछे धकेलते हुए, तेजी से दरवाजा बंद करती है। उसका शरीर बम विस्फोट की शिकार किसी जर्जर दीवार-सा काँप रहा है, साँस किसी प्रयोगशाला की खौलते रसायनयुक्त परखनली-सी चल रही है और दिल धौंकनी-सा धड़क रहा है। उसकी दोनों हथेलियाँ पूरी ताकत से दरवाजे से चिपकी उसे पीछे धकेल रही हैं, उस काले शैतान से अपना-अपन घर का बचाव करते हुए जो मानो धीरे से हाँफते स्वर में फुसफुसा रहा है - "ऋद्धिमा को शार्दूल से मिलने से कोई नहीं रोक सकता! समझी रागिनी! कोई नहीं! कोई नहीं!"

रागिनी भीतर की तरफ दौड़ पड़ती है और बेडरूम में पहुँचकर दरवाजे को लैच कर लेती है। बिस्तर पर अपने आप को गिराकर आँखें भींच लेती है। काश! कानों में भी पलकें होतीं, वह विद्रूप-बीभत्स फुसफुसाहट अब भी उसके कानों में गूँज रही है! उसे ऐसा लगता है कि वह कुत्ता घर के बंद दरवाजे से भीतर दाखिल होकर उसके कमरे तक आ गया है, और उसे अपनी वहशी आँखों से जीभ लपलपाते पूँछ हिलाते देख रहा है। वह चौंककर उठ बैठती है। कोई भी तो नहीं है वहाँ! अकेली ही तो है वह! फिर क्यों ऊलजलूल ख्याल यों मन में पनप रहे हैं!

वह बगल में पड़े रिमोट से टीवी ऑन कर देती है और जान बूझकर अँगरेजी-समाचार वाला चैनल लगाती है। ऐसे मनोविज्ञान से निपटने का सबसे बेहतर तरीका यथार्थ के सामने खड़े हो जाना है। दुनिया में जो घट रहा है, वह सबसे बड़ा यथार्थ है और अँगरेजी चैनल उसे हिंदी वालों से बेहतर और बिना मिर्च-मसाला लगाए दिखाते हैं।

मगर उस दिन अँगरेजी-समाचार-चैनल भी जैसे उसके संग सैडिस्ट व्यवहार करने पर आमादा था। "अ टीन एज गर्ल इन इंडिया इलोप्ड एंड मैरीड अ सिक्स्टी ईयर ओल्ड टीचर!" रागिनी का चेहरा फक पड़ जाता है और वह बदहवास-सी उसे बदल कर कार्टून-चैनल लगा देती है। सामने टॉम एंड जेरी का शो चल रहा है, बिल्ला टॉम नन्हें चूहे को दौड़ा रहा है, कूदाफाँदी के बीच अचानक टॉम कोई पेय पदार्थ पी लेता है और उसका आकार बड़ा और शक्तिशाली हो जाता है। जेरी का वह पीछा करता है जो भागकर एक थियेटर में जा छिपता है। और फिर वह एक चुहिया के वेश में बाहर निकलता है - लंबी-लंबी बरौनियाँ, सुर्ख होठ, मटकती आँखें। लेकिन टॉम को वह छका नहीं पाता, पकड़ा जाता है। उस नन्हीं चुहिया को विशाल राक्षसकाय बिल्ले की मजबूत मुट्ठी में छटपटाते देखकर जैसे रागिनी के मुँह से एक चीख निकलने को होती है। कार्टून ही तो है पागल! ऐसा क्या ओवर-रिएक्शन! लेकिन नहीं! वह खुद को नहीं सँभाल पाती! रिमोट का एक बटन दबाती है और टीवी की स्क्रीन स्याह हो जाती है।

रागिनी ने कभी न सोचा था कि शार्दूल इस तरह इक्कीस साल पुरानी बात का बदला उससे निकालेगा। प्रेम के बदले प्रेम किया ही जाए, क्या यह आवश्यक है? और फिर जब वह निशीथ से जुड़ी थी, तब उसे कहाँ पता था कि शार्दूल उसके प्रति ऐसी रागात्मकता रखता है? और फिर पता हो, चाहे न हो - किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपना निर्णय स्वतंत्र होकर ले, किसी के वशीभूत होकर नहीं। सामने वाले की भावनाओं से प्रभावित होकर उसके प्रति प्रीति जागृत होना, क्या सचमुच मुक्त प्रेम है अथवा प्रतिक्रया? छिः! धिक्कार है तुम्हें शार्दूल, तुमने प्रेम को प्रतिशोध बनाकर पाला और फिर उस विकृति को ऋद्धिमा पर छोड़ दिया! कितने नीच, कितने पतित हो तुम!

न जाने कब अतीत-वर्तमान के बीच रिवाइंड-फास्ट फॉरवर्ड होते ख्यालों के बीच रागिनी की आँखें मुँद जाती हैं। चेतना स्वयं चोट का कारण बन जाए तो निश्चेत होना ही एकमात्र विकल्प बचता है। शायद गहरी नींद ही इस मनमंथन की पीड़ा से उसे निजात दिला सके।

निद्रा-प्लवन में बीते चार घंटे पता ही नहीं चलते। उतरते समुद्र से बाहर निकलते टापू-सी जब उसकी चेतना आँखें खोलती है, तो कुछ बेहतर महसूस होता है। शार्दूलरूपी सूरज अब भी ऊपर तप रहा है, लेकिन मिट्टी कुछ गीली तो है न! रागिनी उठकर मुँह धोती है और अपने लैपटॉप के सामने बैठ जाती है। सब कुछ आजमा लिया, कहीं सुकून हाथ नहीं लगा, क्यों न इंटरनेट की ही शरण गही जाए। शायद यहीं कुछ मन भटके।

रागिनी अपना मेल बॉक्स खोलती है और मेल्स चेक करने लगती है। 'मच इज यट टु बी सेड! - शार्दूल का भी एक पत्र उनमें सम्मिलित है। रागिनी के मुँह से एक चीख निकलने को होती है। यहाँ भी! वह उसे बिना पढ़े डिलीट मारना चाहती है, लेकिन एक सोच उसे ऐसा करने से रोक देती है। शार्दूल से बचने का सबसे कारगर उपाय उसकी ओर जाना ही है। उससे भागकर उससे मुक्ति नहीं पाई जा सकती। एक वह्निमुखी उच्छ्वास छोड़कर न चाहकर भी उसे खोलकर पढ़ने बैठ जाती है।

डियर रागिनी,

मुझे तुम्हें आखिरकार यह ईमेल लिखना पड़ा क्योंकि मेरा-तुम्हारा वार्तालाप तो शायद कभी हो ही नहीं सकेगा। पहले भी कॉलेज के दिनों में ठीक से वह कभी नहीं हुआ, अभी जब हम बड़े दिनों मिले तो तुम और मैं सहज नहीं थे और आगे - पता नहीं! कब-किन हालातों में मिलना हो! हम दोनों के बीच में मोनोलॉगों से ही काम चलता रहा है, आगे भी यों ही चलता रहेगा।

एकपक्षी संवादों की अपनी सार्थकता होती है रागिनी! द्विपक्षीय बातों की तरह वे क्रिया-प्रतिक्रया के नियमों तले नहीं किए जाते, वे अपना पक्ष खुलकर बस रखते चले जाते हैं। जब मन भरा बैठा हो और प्राथमिकता सामने वाले का रिएक्शन सुनने से ज्यादा अपना एक्शन कह देने की हो, तो निरवरोध बोलने-बोलते रहने को दिल करता है।

मुझे तुम ऐसा अवसर नहीं दोगी, मुझे मालूम है। इसीलिए इस ईमेल का सहारा ले रहा हूँ। जब सब बहुत कुछ लगातार खुलकर कहना हो, तब वाणी कई बार अक्षम साबित होती है और आदमी लेखन के शरणागत होता है। मैं भी आज वही कर रहा हूँ।

रागिनी, ऋद्धिमा से मेरा परिचय एक साल से है। उसके पहले इसी कॉलेज में प्रोफेसर होने के बावजूद मैंने कभी उसे नोटिस नहीं किया। उसका अस्तित्व मेरे सामने एक साल पहले अचानक कॉलेज-फेस्टिवल के दौरान उभरा, और बावजूद इसके कि वह साइंस स्ट्रीम की विद्यार्थी थी और मैं लिटरेचर का, हमारे बीच की नजदीकियाँ बढ़ती गईं।

हाँ! जानता हूँ मैं कि उसके विषय में कहा-लिखा अंतरंग कुछ भी तुम्हें बर्दाश्त नहीं होता, जानता हूँ कि ऋद्धिमा का मुझसे जुड़ना तुम्हें कैसी क्षारीय अनुभूतियाँ दे रहा है, क्या-क्या कुत्सित सोच रही हो तुम हम-दोनों के संबंध के विषय में, कितनी गहराई तक आहत हो तुम इस प्रणय-पीड़ा से।

मेरा-उसका संबंध कब शिष्ट परिचय से रागात्मक जुड़ाव और फिर भावनात्मक संयोग में परिणत हो गया, मैं जान ही नहीं पाया। इस तरह के प्रणय-संबंधों को जिन्हें पाश्चात्य जगत 'मे-दिसंबर रोमैंस' की संज्ञा देता है, ऊष्ण-शीत का बेमेल संयोग भर नहीं होते। दो व्यक्तियों के मेल को विषम ऋतुओं का मेल बताना यह बताता है कि हम वय को महज जलवायु-सा साधारण समझते हैं, इससे अधिक कुछ भी नहीं।

पाँच साल पहले मेरी पत्नी शुचि की मृत्यु के बाद से न मैंने कभी दोबारा विवाह के विषय में सोचा और न कहीं किसी से रागात्मक तौर पर जुड़ सका। आज भी जब मैं ऋद्धिमा से जुड़ा हूँ, तो इसके पीछे कोई पूर्व-नियोजित साजिश तो दूर, कोई सोच तक नहीं है। हाँ रागिनी! मैं नहीं जानता था अभी एक महीने पहले तक कि वह तुम्हारी और निशीथ की बेटी है। मेरा-उसका संबंध योजनात्मक तरीके से निर्मित ईंटे-गारे के सेतु-सा नहीं रहा है, वह तो बस एक प्रवहमान भाव सरिता सा है।

मैं आज उसके संग बह रहा हूँ, यह सत्य है। कब तक बह सकूँगा, नहीं जानता। मैंने सब कुछ कालाधीन छोड़ रखा है। हमारा परस्पर-प्रेम सत्य-सहज-अनियोजित रहा है, आगे के विषय में अभी से क्या बताऊँ? प्रेम की परिणति विवाह हो भी सकती है और नहीं भी, और ऐसा मैं किसी कलुषित सोच के कारण नहीं कह रहा। यही दरअसल यथार्थ है, रागात्मक संबंधों का। मैंने तुमसे परिणति निर्धारित करके प्रेम किया था और शुचि से प्रेम निर्धारित करके परिणय, लेकिन दोनों ही संबंध आज मेरे साथ नहीं हैं। इसलिए ऋद्धिमा के विषय में मैं उससे पूरे समर्पण के साथ प्रेम करना चाहता हूँ, विना कोई पूर्व-नियोजन-निर्धारण किए।

मैं गेटे को अपना साहित्य गुरु जरूर माना है, मैंने वर्थर की तरह तुमसे उद्दाम प्रेम भी कभी किया था, लेकिन यकीन मानो : मैं आज किसी मेफिस्टोफ़्लीज के भरमाने से फॉस्ट के चरित्र में नहीं ढला हूँ। गेटे का वह महानायक एक बुद्धिजीवी था; मैं अब उस युवा वर्थर-सा भावोद्दाम नहीं रहा, लेकिन मुझमें प्रौढ़ फॉस्ट-सी बौद्धिक कठोरता और महत्वाकांक्षा आज भेी नहीं जन्मी है।

तुमसे जब मैं जुड़ा था तब मुझमें 'तूफान और तनाव' था; ऋद्धिमा जब से मेरे जीवन में है, मैं किसी प्रशांत समुद्र-सा गंभीर हूँ। वर्थर-सा प्रेम अब मेरे किए भी होगा नहीं और फॉस्ट-सा प्रेम मैं ऋद्धिमा से करता नहीं।

यही मेरे वर्तमान का सच है जो मैं तुमको कहकर न बता पाया, इसलिए यहाँ उद्भासित कर रहा हूँ। आशा करता हूँ कि तुम इसके साथ अतीत-सा बर्ताव नहीं करोगी।

तुम्हारा शुभेच्छु,

शार्दूल।

चेहरे पर उधेड़बुन लिए रागिनी ने इनबॉक्स से साइन-आउट किया। शार्दूल के इस अप्रत्याशित जवाब के बाद अब कंप्यूटर पर बैठा नहीं जा सकता था। वह उठती है और कमरे की बंद खिड़की के पास जाकर खड़ी हो जाती है। पर्दा हटाती है तो अँधेरे अवसादग्रस्त कमरे में डूबते सूरज का प्रकाश भर जाता है। अरे! शाम हो गई! पलट कर वह घड़ी देखती है। "पाँच बज गए! पता ही नहीं चला!"

बाहर कॉलोनी के बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। सर्विस-लेन को खेल का मैदान बनाया हुआ है। गेंद चाहे बल्ले पर लगे या चाहे स्टंप बिखेर दे, एक-सा शोरगुल गूँजता है। यातायात धीमे-धीमे असुविधा झेलता बगल से निकल रहा है। बच्चों को वाहनों के गमनागमन की कोई परवाह नहीं। ये बावले नहीं जानते कि सर्विस लेन, चाहे मुख्य मार्ग न हो, लेकिन होती वह ट्रैफिक के लिए ही है। आमोद-प्रमोद के लिए उसके प्रवाह को बाँधना बचपन की मासूम बेवकूफी भर है और कुछ नहीं।

रागिनी उन्हें देखकर गीली आँखों के साथ खिन्नता की हँसी हँसी ही थी कि तभी डोरबेल बजती है। वह तुरंत अश्रुल हास्य को पोंछकर दरवाजा खोलती है। सामने ऋद्धिमा है।

"हाउ वॉज योर डे?" रागिनी अपना हाथ उसके धूल-धूप से मुरझाए चेहरे की ओर बढ़ाती हुई पूछती है, जो वहाँ तक पहुँचता नहीं। ऋद्धिमा आगे बढ़कर बुझा-सा 'ठीक था' कहती, घर के भीतर दाखिल हो जाती है।

इतना कुछ घटनाक्रम होने के बाद जैसे रागिनी के भीतर अब भी कुछ सुलग रहा है। वह ऋद्धिमा से पूछे बिना रह नहीं पाती है।

"शार्दूल से मुलाकात हुई थी।"

ऋद्धिमा अनुत्तरित प्रश्न सुनती वॉशबेसिन में अपना मुँह धो रही है।

"ऋद्धि! बोलो?"

"हाँ मम्मी! हुई थी! रोज होती है!" वह अधधुले चेहरे को ऊपर उठाकर जवाब देती है। "इसमें नया क्या है!"

"तुम्हारे डैडी-मम्मी की एज का है वह।"

"डैडी-मम्मी तो नहीं है न! मुझे उन्होंने आपका-अपना अतीत बताया था तीन दिन पहले। वह लव स्टोरी तो शुरू भी नहीं हो पाई थी ठीक से, मम्मी।"

"यह लव स्टोरी ठीक शुरू हुई है? और क्या यह लव स्टोरी ही है?"

"यह लव स्टोरी ही है और ठीक शुरू भी हुई है। और आपको शार्दूल से मेरे जुड़ने पर इतना हर्ट फील न होता, अगर आपका-उनका कोई अतीत न होता। वही अतीत आपके वर्तमान की तकलीफ की वजह है।"

"माँ हूँ तुम्हारी। डरती हूँ, वर्तमान का अतीत जैसा हश्र न हो।" रागिनी गहरी साँस छोड़ते हुए कहती है।

कंटेंप्लेशन से जिंदगी नहीं कटती है, मम्मी। प्यार का हश्र न अतीत में आपके हाथ में था और न वर्तमान में मेरे हाथ में है। इसे ऐसे ही ऐक्सेप्ट कर लेना रीजनेबल है और इसी में सबकी भलाई है। प्लीज अतीत को वर्तमान से जोड़कर मत देखिए; साझे इनसान के साथ बिताया गया वक्त हमेशा पहले-सा साझा नहीं रहता, वह बदल जाता है।" ऋद्धिमा रागिनी के कंधे पर हाथ रखते हुए जवाब देती है।


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हिंदी समय में स्कंद शुक्ल की रचनाएँ