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कहानी

इन्सुलिन : शी लव्स मी, शी लव्स मी नॉट!
स्कंद शुक्ल


"क्या बाबा आप भी! संजीवनी बूटी खराब हो जाएगी! एक्सपायर!"

"खराब क्यों बिटिया?"

"बाबा, पौधा ही तो है बेचारा। हिमालय से लंका लाया गया, इमरजेंसी का मामला था। वह भी पूरे-के-पूरे पहाड़ के साथ। फिर वहीं जमा दिया गया। लेकिन आब-ओ-हवा तो उसे पहाड़ी पसंद होगी न? समुंदर की नमी से घिरा कैसे जिएगा बेचारा?"

"कुदरत अब जो करे। जलवायु बदले तो जिए। और न जिए तो भी कोई बात नहीं।"

"दवाएँ रख-रखाव माँगती हैं बाबा! समझे कुछ आप!"

"बीमारियाँ भी रख-रखाव माँगती है! समझीं कुछ आप!"

संदेह से बात शुरू होकर संदेह पर ही हुई थी। जहाज से उड़ा पंछी पुनि जहाज पर आ गया था। बाबा थे ही ऐसे। वे हमेशा निष्कर्ष निकाले बिना बात खत्म किया करते थे। एकदम अनिर्णीत। फैसला स्वयं करो, चाहे जो लगे। हम क्या बताएँ। कहानियाँ उँगली पकड़ कर कक्षा से जीवन में थोड़े ही ले जाती हैं! सो उठो और खुद जाओ।

न! न! न! आप बाबा को कोई बहुत प्रगतिशील आधुनिक सोच वाला बुजुर्ग कतई न समझें। वे एकदम पुरानी सोच वाले आदमी हैं। लेकिन कहानियाँ अनिर्णीत सुनाते हैं। या यों कहें कि उनके चाहने-न चाहने के बाद भी उनका कहा बहुत कुछ अनिर्णीत ही जान पड़ने लगता है।

जीवन भी उनका अनिर्णीत रहा बड़े दिन। एक छोटी शहरी नौकरी में भर्ती मिली, तो मुकदमे के चक्कर में बड़े दिन रोजगार-बेरोजगारी के बीच झूले। असफलता एकदम त्रिशंकु-सी। स्वर्ग को चले थे और धरती पर भी नहीं गिरे। उलटे अटक गए। लेकिन मुँह से कर्मनाशा न बहीं। बाबा कुछ भी करते, कर्म का नाश कभी न कर सकते थे। सो गाँव में एक नर्सरी खोल ली। बागवानी का शौक पुराना था। पौधों से दुलार ने बिना पैसों के हरे रहने का मौका दिया। एक-दो यार-दोस्त संग लग लिए। कहा कि मदद करो रुपये और बीज रोपने में। काम चल निकलेगा तो फिर हरियाली होगी, दोनों ओर। सब चुकता हो जाएगा सूद-समेत।

फिर वही नौकरी किसी अजनबी की तरह अचानक आकर बगल में बैठ गई 'हाउ डू यू डू' करती। एकबारगी बाबा पहचान ही न पाए। यह हुआ क्या? मुकदमे का फैसला हो गया? इतनी जल्दी? अभी बीसेक साल ही तो बीते हैं। इस तरह। बिना बताए। हम तो यहाँ मन लगा चुके हैं। अब क्या करें!

बाबा न्यायालय की इस निर्णयबाजी से खुश नहीं हुए। निर्णय न होने से आदमी झूलता जीवन जीता है। आदमी से उसके झूलने का अधिकार किसी को नहीं छीनना चाहिए। उससे आस-निरास दोनों बारी-बारी से आ-जाकर खोज-खबर लिया करते हैं। अब एक नहीं आएगा। अब हम एक पाले में चले गए। अब हम एक के हो गए। फैसले ने हमें बाँध दिया।

सो बाबा ने मन मसोस कर कुछ साल नौकरी की। लेकिन पौधे उनसे छूट न सके। बेटे-बहुएँ तो संग रहे नहीं थे, एक लड़का रख लिया था साथ में। वह उनका और नर्सरी के सदस्यों, दोनों का सतत ध्यान रखता था। छुट्टियों में बच्चे और बच्चों के बच्चे आते-जाते रहते थे, उनका मन लग जाता था। फिर धीरे-धीरे मन दफ्तरी फाइलों से उचटने लगा, सो छोड़ दिया उन्हें। पेड़ों की कागजी छालों को छोड़कर वापस जिंदा पेड़-पौधों के बीच आ गए।

रौनक अपने बाबा की लाड़ली पोती है। उनके बड़े बेटे की इकलौती बेटी। अब वह शहर के एक मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई करती है। चार साल हो गए हैं, उसे दाखिला लिए। डेढ़ साल में वह पूरी डॉक्टर बन जाएगी। उसे पूरा होने की बड़ी जल्दी है। यह शुभ दिन जल्दी आए। जल्दी से डिग्री मिले। जल्दी से नाम के पहले वह सम्मान लगे। सब-कुछ जल्दी से बस घट जाए। जल्दी-जल्दी-जल्दी।

बाबा उससे रुकने-थमने की बातें करते हैं। उनकी बात बड़ी, पर ढर्रा पुराना है। वे बीच-बीच में ज्ञान देते हुए पौराणिक हो जाते हैं। किस्सों-कहानियों से तटस्थता समझाने लगते हैं। सुखेदुखे समेकृत्वा... यह गीता है। उन्हें इस बात की तसल्ली है कि उनका जीवन इसी बात को याद करते, याद रखते बीता है। वे नई पीढ़ियों से भी तटस्थता चाहते हैं। कि वह झटपट हानि-लाभ के लिए जीवन न जिए। कि वह आनन-फानन में इस पार - उस पार रहने-निकल जाने की बात न करे। साहिल-साहिल करते-करते हर नया आदमी माजी हुआ जा रहा है। बेटा, इतने ही किनारे पसंद है, तो सड़क पर चल लो। नदी में बहने काहे आए!

रौनक को बाबा से लाड़ और बात लड़ाना, दोनों भाता है। यह ठीक है कि उसके भी बॉयफ्रेंड का नाम साहिल ही है। लेकिन वह उनसे उसके बचाव में हमेशा कहा करती है कि बाबा, हम कहाँ आए नदी चुनने। हमें तो छोड़ दिया गया बता कर कि यह है एम.बी.बी.एस. नाम की नदी। अब जो चाहो, करो। सो क्या करते। पार न लगें, तो सालों गोते लगाते रहेंगे और एक दिन मर जाएँगे।

'ही लव्स मी, ही लव्स मी नॉट' - कहते हुए हर प्रेम-कहानी शुरू होती है। इसमें कोई नई बात तो है नहीं। लेकिन धीरे-धीरे निर्णय तक बात लगने लगती है। हाँ तो रूमानी, न तो बेईमानी। लड़के-लड़की टिकते हैं या फिर आगे बढ़ जाते हैं। प्रेम में पाया या खोया जाता है। बीच में रहकर, रह-रह कर रोया थोड़े ही जाता है।

बाबा मगर इन सब मैचनुमा मुहब्बतों को नकारते हैं। ये भी कोई बात है बिटिया कि मुहब्बत करते समय मन में सिक्का उछालो और फिर साइड चुनो। फिर खेलो और जीतो या हारो। फिर हँसो या रोओ। फिर वैलेंटाइन या फिर डाइन कहते हुए मन को सबके सामने खोलते रहो।

मौत और मुहब्बत जितनी भी बड़ी हुई हैं, अनिर्णीत हुई हैं। हिरण्यकशिपु-सी मौत और मौत-वाली मुहब्बत। "क्या बाबा, आप भी कहाँ से कहाँ जोड़ लेते हो कनेक्शन! राक्षस की कहानी को कहाँ खींच लाए!" बाबा हँस पड़ते हैं। "पागल लड़की। कहानी में दम न भक्त से है, न राक्षस से। न नृसिंह से ही उसमें जादू पैदा होता है। उसका असली इंद्रजाल है न इधर, न उधर। जब राक्षस की मौत होती है। न दिन, न रात। न ऊपर, न नीचे। न अस्त्र, न शस्त्र। न मनुष्य, नपशु। न अंदर, न बाहर। ऐसी मृत्यु कितनों को मिली - बताओ जरा!"

"अरे पर इस कहानी से मुहब्बत वाली बात का भला क्या मेल? अलौकिक पुराण और लौकिक प्रेम को आप साथ एक पंगत में बिठा रहे हो। यह कैसे हो सकेगा? यह तो बेमेल जोड़ा है। हम हँसते भी है और हैरत भी होती है।"

"बेमेल नहीं है दुविधा। उसमें सबसे ज्यादा बात है। ये मौत जो है न, उसका लेबल लगाकर हर प्रेम-कहानी बड़ी बनी है। प्यार हुआ, इकरार हुआ, फिर इस पार-उस पार हुआ। फिर अत्याचार हुआ और अंत में मर गए दोनों, समाहार हुआ। प्रेमियों को हिरण्यकशिपु से कुछ सीखना चाहिए।"

रौनक हँसती है। "क्या बाबा, आप भी। प्रह्लाद को ही पकड़ लेते। बैड डैडी को बीच में ले आए। कैसी हिमाकत करते हो। अब तो हँसी भी हैरत के पीछे छिपने लगी है।"

बाबा गंभीर हैं एकदम। कहते हैं कि प्रेम में मरने से ज्यादा अनिर्णीत रहकर जीना है। टॉस में सिक्का खड़ा आ गया। अब न बैटिंग कर सकते हैं, न बॉलिंग। लेकिन मैचवा खेलना पड़ेगा, क्योंकि वाकआउट समय देगा नहीं। इसलिए जो चाहे, दे दो पहले। सोइ कर लेंगे।

"सबसे बड़े प्रेम में 'ही लव्स मी, ही लव्स मी नॉट' के बाद डंठली लिए बैठे रहना है। पत्तियाँ तोड़ने के बाद भी कुछ नहीं टूट सका है। फैसला हो ही नहीं पाया। अब इस बारीक लंबी टहनी को किस तरफ भेजें। सो लिए रहेंगे, और बैठे रहेंगे।"

"अच्छा बाबा, अरे वाह!" रौनक खिलखिलाती है। "आप बैठे टहनी लिए ऐसे? आज भी बैठे हैं क्या? कौन थी या है? बड़े छिपे रुस्तम निकले आप तो। बताइए, तो हम भी जानें। पापा-मम्मी से नहीं बताएँगे कुछ भी। पक्का, पक्का, पक्का।"

"नहीं छिपाने की कोई बात नहीं बिटिया। एक थीं। अब भी हैं। आधी सदी गुजर गई। अब वे लखनऊ के राजा बाजार की चौबाइन हैं। हम यहाँ रहे, वे पूरी जिंदगी वहाँ रहीं। नाम-वाम में कुछ धरा नहीं। सो बस इतना जानो, बहुत है। और क्या करोगी?"

"अरे, आप जीवन-भर डंठली लिए जिए और हम जान न पाए। न पापा, न मम्मी। बताइए। नाक के नीचे मुहब्बत बसती रही। इतना बड़ा अनिर्णय निवास करता रहा।" रौनक खिलखिलाती है।

"ड्रा मैच में दिलचस्पी नहीं होती दर्शकों की। लोग फैसलों के लिए जीवन जीना जानते हैं।" बाबा चश्मा उतारकर दूर कुछ देखने की कोशिश करते हैं।

"मिले कभी कि नहीं? अरे मिल आइए दादी से। अब दादी ही कहेंगे हम तो। न तो चलिए, अबकी कॉलेज चलेंगे तो मिला देंगे। पता-वता कुछ है धरा?"

"न अता है, न पता है और न वता। पिछले साल डायबिटीज हुई थी, तब कॉलेज में दिखाया था। तब वहीं से इलाज चालू किया था। सामने के मेडिकल स्टोर पर पर्चा लेकर पहुँचे थे, तो क्या जानते थे कि मिसरी की डली से मिलना हो जाएगा इतने सालों बाद।"

"कैसी थीं? वैसी ही? कैसा महसूस हुआ एकदम से? अचानक से मिलना हुआ! आप तो झटका खा गए होंगे न!"

"भरी कॉपी हो गई थी एकदम। इबारतें ही इबारतें। सत्तर से ऊपर की हो भी तो गई होगी। अरे, तभी उन्नीस की थी, जब आखिरी बार देखा था। इतना समय गुजर गया। एकदम से शूगर आसमान छू गई!"

"फिर? फिर? फिर?" रौनक की आँखों में किसी फैसले की चाह है ज्यों बहते पानी में काँटा डालने वाला जल्दी मछली पाने तो बेताब हो जाए।

"फिर कुछ नहीं। दुआ-सलाम। कैसी हैं रेनुका जी? बड़े दिन बाद। नमस्ते। हाँ, आप कैसे हैं। कैसे आए। अच्छा, बीमार हैं। ओह। आप कहाँ रहती हैं? यहीं, पास में। फिर औपचारिक स्पीड ब्रेकर। गाड़ी निचले गियर में। तभी दुकानदार ने इन्सुलिन की शीशी दी। साथ में लाल सिरिंज। इसे पर्चे के हिसाब से लगाना है। इधर वह मुड़ गई और चल पड़ी।"

"वह सामने से जा रही थी। उस समय मुझे लगा कि निर्णय हुआ जा रहा है जीवन का। वैसा, जैसा तब न हुआ था जब उसका ब्याह हुआ था। वैसा आज हो रहा है। डॉक्टर कहते हैं मीठा अब न खाना, मधुमेह हो गया है तुम्हें। हम सोचने लगे कि मधु मिला ही नहीं जीवन-भर, तो मेह से इतनी चीनी कैसे बढ़ गई खून में हमारे... और आज देखो तो, गिर रही है एकदम से!" कहते हुए बाबा एक साथ हँसने-रोने लगते हैं।

रौनक रग पर से हाथ हटा लेती है। बाबा से मित्र का व्यवहार असहज स्थितियों से निपटना नहीं जानता। पोती होकर जीना बहुत आसान है। डॉक्टर होकर जीना और भी आसान। सो वह अपने नए-नए पात चीकने फड़फड़ाने लगती है, ताकि माहौल का ताप दूर हो।

"इन्सुलिन लगाना जानते हैं न आप? ठीक से? ग्लूकोमीटर कहाँ है? शुगर नाप लेते हैं?"

"हाँ। सीखा है। सीख कर आगे बढ़ रहे हैं। ग्लूकोमीटर तो नहीं है। पर पास में जाकर नपवा लेते हैं, बीच-बीच में। काम चल जाता है। न बढ़ने देते हैं, न घटने। जीवनधार बह रही है।"

"चलिए अच्छा है।" कहकर रौनक उठ जाती है। साहिल का फोन आ रहा है। पिछले तीन दिनों से वह वहाँ है। कल ही वापस लखनऊ निकलना होगा। कॉलेज की छुट्टियाँ तो खत्म नहीं हो रही, लेकिन वह तो वहीं है। इसलिए ऐसे में छुट्टियों को कॉलेजी बनाना दूसरे नजरिये से जरूरी, बहुत जरूरी है।

बाबा यहीं रहेंगे। मिठास के झूले में ऊपर-नीचे होते अपनी मिसरी की डली के संग। जान बचाएगी इन्सुलिन। न ऊपर चढ़ने देगी, न नीचे गिरने। पहाड़ और घाटियाँ प्यार करने वालों के लिए होते हैं। अब तुम न लो रिस्क इस उम्र में। एकदम सपाट सड़क वाला जीवन जियो। 'जाही बिधि राखे दवा, ताही बिधि रहिए' स्टाइल में।

"मीठा तुम्हारे लिए जहर है, जानते हो न। डायबिटीज में बदपरहेजी बर्दाश्त नहीं। शुगर बढ़ गई, तो समस्या हो जाएगी। घट गई और और बड़ी मुसीबत। इसलिए नियमित मध्यम मार्ग। एक ही रास्ते आना, एक ही रास्ते जाना। एंड नो चीटिंग! समझे!"

बाबा मगर चीटिंग करना चाहते हैं। जवानी भर मिठास को मुँह न लगाया, एक बार जब रेनुका से दूर हुए। अब लेकिन इस उम्र में फिर आ मिली? यह भी क्या संजोग है? या फिर दुरजोग है? जब बीमार हुए, तो मिठाई से भी कुदरत ने मिला दिया। अब करो परहेज। कर के दिखाओ। देखें तो कितने मध्यम मार्गवाले हो। हम भी तो जानें कि प्रेम में ड्रॉ मैच अब कैसे खेलते हो?

बाबा सोचते हैं, रौनक से बात करें, फिर रुक जाते हैं। बच्चों के सामने मनचला दिखना अच्छा नहीं। क्या संदेश जाएगा! अब इस पड़ाव पर आकर नादानी कर रहे हैं। यकायक बालमन से बेचैन हो उठे हैं। पुराने करियाए दिए में जज्बातों की जबरन नई बाती। यह भी भला कोई बात हुई!

गाँव में जब-तब बत्ती गुल हो जाती है। रौनक ने इसी के लिए एक बार चेताया था। इन्सुलिन को गर्मी से बचाए रखना बाबा। शीशी की दवा खराब हो जाएगी वरना। फ्रिज तो है न, उसी में नीचे के कोने में धरो इसे। लगाओ सुबह-शाम और फिर वहीं वापस। नपवाते रहो खून में शक्कर। एकदम दुरुस्त रहनी चाहिए। बढ़ने मत देना। बहुत नुकसान उठाओगे नहीं तो।

बत्ती गुल होते ही बाबा के अधपोपले मुँह में गुलगुले घुलने लगते हैं। रेनुका से मिल ही लें। अब कौन सा लोकाचार बिगड़ जाएगा। अब तो सब कुछ हो बीता। अब तो केवल मिल-बैठने की बात है। औपचारिक मेल मिलाप तो हम लोग रख ही सकते हैं।

"नई पीढ़ी में तो एक्स से भी संबंध बनाकर रखे जाते हैं, बाबा।" रौनक ने उनसे एक बार बताया था। "हम लोग किसी से एकदम से मामला नहीं तोड़ लेते। न जाने कहाँ, किस मोड़ पर लौटना, यू-टर्न लेना पड़ जाए।"

"हम तो भाई टर्न-वर्न वाला जीवन जीते नहीं। कभी जिया ही नहीं। सीधे बढ़ते चले आए सड़क पर। मोड़ में एक्सीडेंट का खतरा भी तो है।"

"एक्सीडेंट एक होता है, मोड़ हजारों हैं। उस एक के भय से आप कभी मुड़े ही नहीं?"

बाबा चुप हैं। उनके सामने पूरा जीवन ऐसे ऊन के गोले की तरह सुलझता चला जाता है, जिसमें न कोई फंदा है, न उलझाव। एक डोर है, जो दूर खुलती चली गई है। बस दूर एक सिरे पर अतीत में एक सलाई है, जो पल-भर को खिंचती है और एक तरंग-सी उनके आज में छोड़ती चली जाती है।

सलाई जो कभी पत्तियों वाली पतली डंठली थी। जिसके सारे पत्ते एक-एक कर झड़ गए। मगर वह जस-की-तस रही। जीवन का ऊन उसके इर्द-गिर्द लिपटता गया, और वह वजनदार होती गई।आज न जाने रौनक ने बात छेड़ी, तो वह खुल गई। उसे इस तरह इस समय खुलना नहीं चाहिए था।

खाने की प्लेट उनके सामने लगी है। अचानक लाइट फिर चली गई है। वे उठते हैं और इन्सुलिन के शीशी को फ्रिज से निकालकर सिरिंज-समेत ले आते हैं। तीस यूनिट भरते हैं। तरल अनुशासन पारदर्शी पात्र में खिंचता चला जाता है। पेट की त्वचा को दो उँगलियों के बीच फँसाते हैं और उसमें एक चुभन मार देते हैं - मिठास का जोर नीचे लाने के लिए।

रह-रहकर कुछ नया प्रयोग करने की चाह उठा करती है। रह-रहकर उनका पथ छोड़ने का मन करता है। रह-रहकर जी करता है कि अनुशासन में थोड़ी ढील दी जाए।

"बदपरहेजी जानकारों के लिए होती है, बाबा।" रौनक कहा करती है।

"तो मैं जानकार हूँ कि नहीं?"

"यह मुझसे मत पूछिए, खुद से पूछिए। आपकी जानकारी आप से बेहतर किसे होगी?"

इतने सालों से बाबा जानकार बनकर ही तो जीते आए। जवानी की दहलीज पर एक बार डगमगाकर जो सँभले, फिर पूरी जिंदगी सँभली हुई ही बीती। न कहीं इधर देखा, न उधर। एकदम नाक की सीध में चलते चलते आए। अब जाकर जब जाल समेटने का समय आया है, तो फिर मीठे की चाह जोर मार रही है। वह भी तब जब पिछले ही साल यह रोग उन्हें पता चला।

न जाने उनकी डायबिटीज उनसे क्या चाहती है? जिंदा रखना चाहती है या मार देना? बदपरहेजी उन्होंने कभी की नहीं, पान तक न खाया। सीधे रास्ते चले तो यह रोग मिला। आड़े-तिरछे चलते, तो क्या मिलता न जाने!

लोग-बाग उनका कभी-कभी मजाक भी उड़ाते हैं। बाबाजी संत रहे, तो तो मधु से मेह मान लिया गया। इससे बढ़िया तो मेह ही कर लेते। इलजाम सच्चा तो लगता कम-से-कम। बदनामी के लिए, बद तो हो ही लेना चाहिए।

मगर रौनक उन्हें समझाती है। ये सब बेकार की मनगढ़ंत बातें हैं। आपको छेड़ते हैं, क्योंकि सीधी रेखा में आप-सा चल न सके। इसीलिए आपसे मजे लेते हैं।

"तो फिर यह बीमारी क्यों आन लगी? अनुशासन का यही सिला मिला?"

"अनुशासन से आप चाइनीज चेकर्स खेलते हो, बाबा। जीवन नहीं जीते। जीवन तो सुपरगेम है, जिसमें कुदरत रोज फाउल करती है। जो होता है, वह अनुशासन के कहे से हमेशा नहीं होता। कुदरत कहती है कि आप फाउल मत करना, नहीं तो डिसक्वालिफाई कर दिए जाओगे। लोग उसके कहे में आ जाते हैं।"

बाबा को लगता है, रौनक बहुत शातिर है। लोगों की बात को लच्छेदार बनाकर सामने रख रही है। सीधे न चिढ़ाओ, झाड़ पर चढ़ाकर कर चिढ़ाओ। दर्शन का मुलम्मा पहना दो और फिर व्यंग्य कसो।

सीधे चलो, चाहे तिरछे। बहुत उम्मीद लिए मत चलो। हो कुछ भी सकता है। बल्कि कुछ भी, कभी भी हो भी जाता है।

बाबा एकबारगी रौनक की बातें सुनकर चौंक जाते हैं। इक्कीस साल में ऐसे परिपक्वता! उन्हें तो छह साल लग गए थे सँभलने में रेनुका की शादी के बाद।आज-कल के बच्चे सँभले-सँभलाए चला करते हैं। और वे इन्हें अनिर्णय और मध्यस्थ रहने का ज्ञान दे रहे हैं। रॉन्ग नंबर! एकदम रॉन्ग नंबर!

दिन-दिन समय बीतता जा रहा है। गर्मियाँ अपने पूरे उरूज पर हैं। आसमान से आग बरसती देख कर पारा मानो चढ़कर उससे मिल जाएगा। इधर बिजली की आँख-मिचौली और बढ़ गई है। घंटों-घंटों पसीने में पंखा झलते बीत जाते हैं। ऊपर तारों-भरा आसमान। नीचे आँगन में खाट। पास में उनका वही लड़का। सूरज को गए घंटों बीत गए हैं, लेकिन लगता है कि वह अभी भी यहीं कहीं है। वह आउट नहीं हुआ है, उसकी पारी चल रही है। केवल ड्रेसिंग रूम में ड्रेस बदलने भर गया है।

बाबा को लगता है कि उनके हाथ में पंखा नहीं, जिंदगी का ऊनी गोला है जिसे वे लेटे-लेटे खोल रहे हैं। धागा-धागा सुलझ रहा है, लकीरों के जमावड़े कम होते-होते जवानी में फ्लैशबैक-सा ले जा रहे हैं। हवा हौले-हौले झुर्रियों को सपाट-स्निग्ध करती जा रही है। वे दिन जब वे सलाई-से थे। तभी रेनुका उनके जीवन में धागे-सी लिपट गई थी। माँ-बाप को बचपन में खो देने के बाद पहली बार उन्हें किसी से आत्मिक जुड़ाव हुआ था। बल्कि जुड़ाव क्या होता है, यह उन्होंने ने पहली बार जाना था।

उन्होंने रेनुका से कभी अपने दिल को कहा नहीं। कह ही न पाए। उन्हें लगा उन्हें मौका मिलेगा। अभी उन्नीस साल ही की तो है वह। वे अभी पढ़ रहे हैं, दो-तीन साल में कहीं-न-कहीं पढ़-लिख नौकरी ढूँढ़ेंगे और फिर प्रस्ताव भेज देंगे। बिरादरी एक है, आड़े नहीं आएगी। परिवार परिचित हैं, सहमति मुश्किल नहीं।सब कुछ सुखद ही घटेगा, इसमें कहाँ कोई दोराय है!

मगर सुख और सूख में सूख दीर्घ है। वह उनके सुख को दरकिनार कर गया। रेनुका के लिए योग्य लड़का लखनऊ में मिला। एकदम बढ़िया सरकारी नौकरी। अच्छा रूप-रंग। उससे अच्छा स्वभाव। और सबसे अच्छी तनख्वाह। बाबाजी के हाथ कुछ न था। उन्नीस की उम्र ने उन्हें एकदम उन्नीस साबित कर दिया। चुपचाप बिना कुछ कहे कहानी का पाँच रील में ही दि एंड हो गया।

इधर कई दिनों से उन्होंने शुगर नहीं नपवाई है। ठीक ही होगी। पास के गुप्ताजी का ग्लूकोमीटर खराब हो गया है। बाबाजी वहीं जाकर नपवा लेते थे कि अपनी मिठास। ठीक ही आती थी अमूमन। गुप्ताजी पैसे न लेते थे। अरे, हफ्ते में एक-दो पट्टियों के पैसे कैसे बाबा! जाओ आप! अच्छा रुको, एक कप फीकी चाय पीते जाओ।

बाबा स्नेह से सराबोर रुक जाते हैं। चाय फीकी है, लोग थोड़े ही हैं। उनमें भरपूर मिठास है। इतना प्यार, इतना ध्यान कि क्या कहने। एक-एक कप हो ही जाए।

काश कि उस दिन रेनुका भी रुक जाती। मन में तो सब कुछ था, बस शब्दों में ही तो नहीं उतरा था।

पर वे जानते हैं कि मन बेचारा बोली के बिना खाट का अपाहिज है। उसके इशारे इतने हलके होते हैं, कि ज्यादातर तो समझ नहीं पाते। और फिर थोड़े बहुत जो आधा-तीहा बूझते हैं, वे जानबूझ कर उसे अनसुना-अनदेखा करते चलते हैं। उन्हें अपनी समझ पर भरोसा नहीं है, वे डरे हुए हैं। इसी डर से वे पढ़-लिखकर भी अनपढ़-सा बर्ताव करते चले जाते हैं।

रेनुका भी यही करती थी क्या? वह सचमुच की अनपढ़ थी या फिर जानबूझ कर ऐसा करती थी? शायद उसे संकोच रहा हो और आज तक हो। या फिर वह समझ ही न पाई हो इतने गहरे मौन में छिपे उनके भाव को। कदाचित्-किंतु-लेकिन-परंतु।

बाबा के शरीर में रह-रहकर आज एक घबराहट सी उठती है। उन्हें लगता है कुछ छूटा जा रहा है। कुछ है जो उन्हें वैसे नहीं करना चाहिए था, जैसे किया। अँधेरे में अकेले अब वे पंखा भी नहीं झल पा रहे। पसीना पूरी बनियान को लथपथ किए दे रहा है। जून के इस मौसम में कुछ उनमें न्यून हुआ जाता है। आज शाम तक तो सब कुछ ठीक था। खाना ढंग से हुआ और उसके पहले इन्सुलिन भी। फिर अभी अचानक ऐसा अटपटा क्यों हो रहा है।

पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा। बाबा आहिस्ता से उठते हैं और टहलने के लिए बाहर को चल देते हैं। शायद चलने-फिरने से कुछ राहत मिले। उनका सीना जोरों से धड़क रहा है। रफ्तार तेज है, फिर भी वे रुकते जा रहे हैं। धीरे, धीरे और धीरे... और फिर बस!

न जाने कितना वक्त गुजरा, न जाने कितने घंटों बाद आँखों के कपाट खुले। सामने उनके रौनक थी। आसपास धुँधली मानव-आकृतियाँ।

"आपको अब अकेले नहीं रहना। साथ रहेंगे लखनऊ हमारे।" रौनक कहती जा रही थी। "इन्सुलिन लेते थे न? पक्का?"

बाबा तकिए पर निश्चेष्ट हैं। वे हिल नहीं पा रहे।

"इनकी शुगर सात सौ के पार है। पूरी रात बाहर बेहोश रहे। सुबह साथ वाले लड़के राजू ने देखा, तो आनन-फानन में यहाँ लाया। इन्सुलिन छोड़ तो नहीं दी थी?"

राजू सिर हिलाता है। उसे पक्का यकीन है कि बाबा नियम जीते जी नहीं तोड़ेंगे कोई। रौनक भी यह बात भली-भाँति जानती है।

"यह शीशी बेकार हो चुकी है। लाइट कितने घंटे नहीं आ रही गाँव में तुम्हारे? कब से चल रहा था यह सब? इतनी गरमी में इस खराब हो चुकी दवाई से क्या खाक शुगर कंट्रोल होती!" साहिल उससे कहता जा रहा है।

कोमा से अधमरे-अर्धमूर्छित मरीजों के बीच न जाने बाबा अब कब तक रहेंगे। उन्हें घर ले जाने या यहाँ रखने का फैसला तो रौनक के पापा-मम्मी को डॉक्टर से मिलकर करना है।

सामने अभी-अभी एक और महिला इसी वॉर्ड में दाखिल हुई है फालिज की मार से आधा जिस्म मरा लिए। लखनऊ की ही रहने वाली रेनुका चौबे, उम्र छिहत्तर साल।

झूलती इन्सुलिन-ड्रिप से आहिस्ता-आहिस्ता टपकता द्रव खून की बेलगाम बड़ी मिठास को कम कर रहा है। इस समय न दिन है न रात। न जीवन है न मृत्यु। क्या पता वे रहें संग, क्या पता न रहें। इस समय उनका जीवन अधर में झूल रहा है। न जाने उनके लिए लोग क्या चुनेंगे। वे होश में होते तो शायद इस बार रेनुका से कह देते सब कुछ। लेकिन भाग्य ने उन्हें आज फिर पूरी तरह अनिर्णीत रहने का मौका नहीं दिया।

शी लव्स मी, शी लव्स मी नॉट!


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