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कविता

सजल गान, सजल तान
माखनलाल चतुर्वेदी


सजल गान, सजल तान
स-चमक चपला उठान,
गरज-घुमड़, ठान-ठान
बिंदु-विकल शीत प्राण;
थोथे ये मोह-गीत
एक गीत, एक गीत!

छू मत आचार्य 'ग्रंथ'
जिसके पद-पद अनंत,
वाद-वाद, पंथ-पंथ,
व्यापक पूरक दिगंत;
लघु मैं, कर मत सभीत।
एक गीत, एक गीत!

छू मत तू प्रणय गान
जिसके उलझे वितान,
मादक, मोहक, मलीन
चूम चाम की लुभान
कर न मुझे चाह-क्रीत,
एक गीत, एक गीत!

संस्कृति का बोझ न छू
छू मत इतिहास-लोक,
छू मत माया न ब्रह्म,
छू मत तू हर्ष-शोक,
सिर पर मत रख अतीत;
एक गीत, एक गीत!

छू मत तू युद्ध-गान
हुंकृति, वह प्रलय-तान,
बज न उठें जंजीरें,
हथकड़ियाँ छू न प्राण!
मौत नहीं बने मीत
एक गीत, एक गीत!

गीत हो कि जी का हो,
जी से मत फीका हो,
आँसू के अक्षर हों,
स्वर अपने 'ही' का हो,
प्रलय-हार प्रलय-जीत
एक गीत, एक गीत!


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