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कविता

बोल राजा, स्वर अटूटे
माखनलाल चतुर्वेदी


बोल राजा, स्वर अटूटे
मौन का अब बाँध टूटे

जी से दूर मान बैठी थी
जी से कैसे दूर? बता दो?
ऐ मेरे बनवासी राजा!
दूरी बनी कुसूर? बता दो?
उठ कि भू पर चाँद टूटे
बोल राजा, स्वर अटूटे
मौन का अब बाँध टूटे!

उस दिन जिस दिन तुम हँस -
उट्ठे, मैंने पुनर्जन्म को पाया,
फिर मेरे जी में तुम जनमें
मैं फिर नीला-सा हो आया,
अब वियोगिन साँझ टूटे,
बोल राजा, स्वर अटूटे,
मौन का अब बाँध टूटे!

जीवन के इस बगीचे में
सुमन खिले, फल भी तो झूले,
पर मैंने सब फेंक दिए
वे फले-फूले, वे फले-फूले!
प्राण तू मुझसे न छूटे,
बोल राजा, स्वर अटूटे,
मौन का अब बाँध टूटे!

मेरे मानस में संकट के -
कुंज शीश ऊँचा कर आए,
तुतलाने का वचन दिए
मेरी गोदी में तुम भर आए,
बोल अपने कर न झूठे,
बोल राजा, स्वर अटूटे
मौन का अब बाँध टूटे!

जी की माला पर लिख दूँ मैं
कैसे तेरा देश निकाला?
मेरी हर धक-धक खिल उट्ठी
फिर क्यूँ चुनूँ फूल की माला?
सुमन के छाले न फूटे,
बोल राजा, स्वर अटूटे
मौन का अब बाँध टूटे!

जब कि मौन से भी ध्वनि झरती
तब ध्वनि की ध्वनि रोक न राजा
चल कि प्रलय भाँवरिया खेलें!
प्राणों के आँगन में आजा;
आज मैं बन लूँ बधूटी
'बाँध-गाँठ' कि गाँठ छूटी!
काढ़ जी पर बेल-बूटे
बोल राजा, स्वर अटूटे
मौन का अब बाँध टूटे!


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