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लेख

मध्यकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श
कुमारी किरण


हिंदी साहित्य के पूर्वमध्यकाल में निर्गुण संतों की वाणी सुनाई पड़ती है। ठीक उसी समय विजेता मुसलमान और विजित हिंदुओं की संस्कृति का संगम हो रहा था। इस्लाम के प्रचार-प्रसार में तलवार की चमक का आधिक्य था और हिंदुओं के सामने मृत्यु की विभीषिका और बलात्कार का वीभत्स दृश्य। हिंदू प्रजा मुसलमान शासकों की दमन नीति से कराह रही थी, उनके व्यथित जीवन का उपयोग केवल कर चुकाने वाली इकाइयों के रूप में ही शेष रह गया था। हिंदुओं की दशा इतनी दयनीय हो गई थी कि उनकी स्त्रियों को मुसलमानों के घर पर दासियों का काम करना पड़ता था। यवन धर्म-युद्ध में आस्था नहीं रखते थे। सैनिकों की बहादुर नारी अपहरण में ही दृष्टिगत होती थी। परिणामस्वरूप नारी की सुरक्षा के लिए उसे घर की चहारदीवारी में बंदी बना दिया गया। सती-प्रथा ने यह सिद्ध कर दिया कि नारी समाज राष्ट्र पर भार है, हारते हुए हिंदू अपने को ही बचाने में असमर्थ थे फिर स्त्रियों की रक्षा कैसे करते? इसीलिए उसे पति की चिता पर भस्म कर देना ही उचित समझा गया। डॉ. सावित्री सिन्हा का कथन है कि हिंदू-धर्म के रक्षकों ने दूसरे देशों के सामने भारतीय स्त्रियों के त्याग और बलिदान का ढिंढोरा पीटते हुए इस प्रथा को न्यायोचित ठहराया, पर हँसते-हँसते पति के शव के साथ जल जाने वाली स्त्रियों की मानसिकता के भेद, दाह के पहले पिलाए गए धतूरे और भंग खोल देते है। मदावस्था में कभी हँसती, कभी रोती, अर्द्धविक्षिप्त नारी श्रृंगार से सजी चिता में प्रवेश करती थी। इस प्रकार संसार में साथ देने वाली सहधर्मिणी को पुरुष बलात स्वर्ग में ले जाकर उससे सेवा करवाता है। जब तक वह जीवित रही पुरुष के आनंद का स्रोत बनी और मरकर भी उसे वही काम करना पड़ा। नारी संबंधी अनुरागात्मक अथवा घृणात्मक भावना तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। जिस युग में पुरुष आध्यात्मिकता की तरफ झुक जाता है, उसकी विचारधारा प्रवृत्ति होने के बदले निवृत्तिमुखी हो जाती है, उस युग की नारी अपवाद बनकर नरक का द्वार बन जाती है। नारी का यह रूप भक्तिकालीन युग में विशेष रूप से उजागर हुआ है। भारतीय इतिहास में चित्रित नारी के मादक और शौर्य का आलोक धीरे-धीरे क्षीण होते हुए मध्यकाल तक पूर्णतया तिरोहित हो गया। हिंदी के जिस युग में निर्गुण संतों कबीर आदि की वाणी गूँज रही थी, उस युग में नारी परम अपावन की स्थिति में पहुँच गई थी। हिंदू जनता मुसलमानों के आतंक से संन्यास की ओर आकर्षित हुई। वे चार पुरुषार्थो में अंतिम पुरुषार्थ मोक्ष की ओर उन्मुख हुए। ऐसी स्थिति में संसार का त्याग करना एक आदर्श बन गया। इस रास्ते पर चलने में नारी बाधक समझी गई और इन संतों ने एक साथ मिलकर उन पर प्रहार करना प्रारंभ किया। निर्गुण संत नारी को सहज अपावन समझ कर दूर भागने लगे और विलासी उसका मूल्य उसके शारीरिक संगठन में आँकने लगे। इस लोक से परे किसी अनिर्वचनीय सुख की तलाश में लीन पुरुष काम-प्रवृत्ति का दमन करने लगा। काम-दमन से नारी के प्रति विरक्ति और घृणा पैदा हो गई। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा का कथन है कि - 'हमारी संस्कृति ने हृास के क्षणों में पुरुष को स्त्री से बहुत दूर रहने का आदेश दिया था। यह इसी से प्रकट हो जाता है कि ब्रह्मचारी के लिए चित्र में भी स्त्री-दर्शन वर्ज्य तथा एकांत में माता की सन्निकटता भी अनुचित मानी गई। भारत वैराग्यमय संयम प्रधान देश है, अतः दुर्बल पुरुष को इस आदर्श तक पहुँचने के लिए उसकी ओर प्रमुख प्रलोभन स्त्री और स्वर्ण के बीच ऐसी अग्निमय रेखा खींच दी, जिससे उस पर झाँकना कठिन हो गया।'1

मध्यकाल में सबसे दयनीय स्थिति नारियों की थी। जैसा कि डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव का कहना है कि सल्तनत काल में स्त्रियों की दशा बहुत खराब हो गई थी, परंतु इस काल में भारत से बाहर दूसरे देशों में स्त्रियों की दशा अपेक्षाकृत बहुत अच्छी थी। इब्नबतूता ने लिखा है कि तुर्की स्त्रियों को हिंदू स्त्रियों की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता थी।

वैराग्यमूलक धर्मो के साथ ही बेचारी स्त्रियों को विभिन्न निंदासूचक विशेषणों से भूषित किया गया। पंचतंत्र में उनके दोषों की चर्चा करते हुए अनृत, साहस, माया, मूर्खता, लोभ, अशौच और अनर्दयता को उनके लिए स्वभावज कहा गया। मध्ययुगीन हिंदी भक्त कवियों ने उपर्युक्त विचार परंपरा से पाया था। कृष्णभक्त कवियों में, राधा की प्रतिष्ठा होने के कारण स्त्रियों के प्रति थोड़ी सम्मान की भावना जाग उठी थी। इसीलिए सूर की गोपियाँ कृष्ण की निष्ठुरता पर उपालंभ दे सकी हैं।

भारतीय साहित्य का अवलोकन करने पर यह जान पड़ता है कि विभिन्न परिस्थितियों में और स्त्री के विभिन्न रूपों के प्रति विविध प्रकार के दृष्टिकोण दिखाई पड़ते हैं। कन्या, पत्नी, माता तथा शुद्ध स्त्री ये स्त्री के विविध रूप थे। सिद्धांततः स्त्री, पुरुष की अर्द्धागिनी थी, उसके बिना पुरुष अपूर्ण था, दोनों परस्पर मिलन से ही जीवन में पूर्णता और सफलता संभव थी। ब्राह्मणकाल में यह तथ्य स्वीकार किया गया था।

स्मृतियों ने इस बात को माना है कि धर्म, संपत्ति, संतानोत्पत्ति और रति तीनों में स्त्री और पुरुष समान, अभिन्न तथा अविच्छेद हैं। स्त्री के बिना गृह और गृहस्थ जीवन की कल्पना असंभव थी। गृहणी ही गृह थी। उसके बिना गृह अरण्य था। 2

कालिदास, बाण और भवभूति आदि ने समान रूप से गृहिणी की प्रशंसा की है। इसके विपरीत कहीं-कहीं तो स्त्रियों के स्वभावतः नैतिक पतन का उल्लेख पाया जाता है। 'महाभारत' के अनुशासन पर्व में स्त्रियों के संबंध में कहा गया है कि - स्त्रियाँ स्वतंत्रता के योग्य नहीं है, इसी विचार से प्रभावित तुलसी ने कहा कि -

'जिमि सुतन्त्र भये बिगरहिं नारी'

सूत्रकार की यह व्यवस्था है कि स्त्रियाँ अमृतरूपा हैं। स्त्रियों के अमृतत्व के बारे में वेद में भी पाठ मिलता है... स्त्रियों से बढ़कर कोई पापनिष्ठ नहीं होता। स्त्री एकत्र छुरे की धारा, विष, सर्प तथा अग्नि जैसी होती है। 3

भागवत की स्त्रियाँ और सूर की स्त्रियाँ कृष्ण के जीवन का परिष्कार करती हैं। सामाजिक असंतुलन को मिटाती है। प्रेमपरक भक्ति का श्रेष्ठ पथ प्रदर्शित करती हैं और एक आध्यात्मिक दृष्टि को मानस में स्थापित करती है। इससे भिन्न स्वरूप सूफियों के यहाँ देखने को मिलता है। स्त्री मात्र सौंदर्य की प्रतीक हैं। बाद में वासना व विलास का उपकरण बन गई। सूफी कथाओं जैसे लैला-मजनू, शीरी-फरहाद से लोक में विकृति आती है। वामपंथी और संत कवि स्त्रियों की निंदा करते हैं। उसे माया बताते हैं। सिद्धों और व्रजयानियों आदि के कारण प्रचलित वाममार्गी उपासना पद्धति ने स्त्री विषयक मान्यता को विकृत किया। तांत्रिक और शैवमत के सम्मिश्रण से शाक्त-मत का प्रादुर्भाव हुआ कालांतर में इस मत के आचार-विचार दो भागों में विभक्त हो गए - दक्षिणाचार और वामाचार।4

दक्षिणाचार के अनुसार प्रभात के समय संध्या, मध्याह्न में जप, दुग्ध तथा शर्करा का पान, रुद्राक्ष की माला धारण करना साधक के लिए अनिवार्य माना गया। यह एक प्रकार से गौरवर्ण शक्ति की अराधना थी। इसके प्रतिकूल वामाचार में तापसी उपासना का विधान है। इसमें पशु-बलि तथा गुरू का विशेष महत्व था। गुरु के बिना सिद्धियों की प्राप्ति असंभव मानी गई। इसके अतिरिक्त वामाचार में पाँच मकारों का भी विधान था। इन मकारों को कार्यरूप में परिणत करने के लिए भैरवी-चक्र की योजना की जाती थी। चक्रों में वर्ण-जाति के भेद का विचार नहीं होता था। ये चक्र तीन प्रकार के होते थे वीर, राज और देव। वीर चक्र में किसी भी रजस्वला कन्या की गणना हो सकती थी। राजचक्र में यामिनी, योगिनी, रजकी, आदि नारी का शक्ति रूप में व्यवहार किया जाता था। देवचक्र में राजवेश्या, नागरी, गुप्तवेश्या, देव वेश्या, ब्रह्म वेश्या सम्मिलित होती थी। इस प्रकार जब सिद्ध लोग हठयोग तथा संयम से कुंडलिनी को जाग्रत करते थे, तब शाक्त संप्रदाय वाले इसी कार्य को भोग द्वारा संपन्न करते थे। चक्रों और कुंडलिनी का स्थान दोनों संप्रदायों में समान था, परंतु साधना के रूप में भिन्नता थी दार्शनिक दृष्टि से शाक्तमत का पथ तलवार की खरप्रवाह धार के समान था तथा भोग का अर्थ इंद्रियों की तृप्ति नहीं, बल्कि वासना का संहार था। लेकिन उसके गूढ़ तत्व को समझना दुष्कर था और उस धर्म के अनुयायी इसके रहस्य को समझे बिना भोग में आकर डूब जाते थे। यह पूरा युग नारी के पतन और गिरावट का युग है। नारी-जाति के उत्थान के लिए पहला प्रयत्न वैष्णव भक्त कवियों ने धार्मिक पुनर्जागरण का आंदोलन किया। आगे चलकर इस दिशा में दो धाराएँ सामने आईं - एक वैष्णव धर्म सुधारकों के पुनर्जागरण के रामानंद वगैरह का, दूसरा सूर एवं अष्टछाप के अन्य कवियों का, जिसने स्त्रियों को महिमामंडित किया। नारी को महिमामंडित करने के लिए ब्रह्मंडल में कृष्ण-उपासना की दृष्टि से एक पृथक सखी संप्रदाय का उदय हुआ, जिसमें महाभारत का वह संदर्भ जीवित किया गया जब कृष्ण ने द्रौपदी को सखी कहकर सम्बोधित किया था। मध्यकालीन युग आक्रामक मुस्लिम शासन के अत्याचार, नारी अपहरण तथा बलात्कार का युग था। हिंदू समाज अपने अंधविश्वास में डूबा हुआ था। उसके समक्ष नए मूल्य नहीं थे। अतः तुलसी ने सद्भावना और दुर्भावना को कसौटी बनाकर स्त्रियों की सामाजिक स्वीकृति का मार्ग प्रशस्त किया। नारी मान्यता की दृष्टि से तुलसी बड़े उदार दिखाई देते हैं। जिस सीता को वे जगत जननी मानते हैं।, वही रावण के हाथों हरी जाती है किंतु क्षणभर के लिए भी वह लोकनायक राम से मनसा, वाचा, कर्मणा विमुख नहीं होती और निष्ठा राम में बनी रहती है। उनकी आस्था रावण द्वारा अपहरण किए जाने और लंका में बहुत समय तक बंदिनी के रूप में निवास करने के पश्चात भी अग्नि परीक्षामात्र से तुलसी ने सीता को सामाजिक स्वीकृति प्रदान की और पुनः उन्हें जगत जननी का सम्मान प्रदान किया। 5

संदर्भ-सूची

1. रामचरितमानस, विविध संदर्भ पृ. 93, मुकुंदी लाल मुंशी

2. विनय पत्रिका

3. हिंदी साहित्य का इतिहास - आचार्य रामचंद्र शुक्ल

4. मनु 5 अध्याय, 155 श्लोक

5. याज्ञवल्क्य स्मृति 77 श्लोक


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