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कहानी

गोलोबोलो...लाइजेसन
स्कंद शुक्ल


मुनेस के मन में अब भी सालों से ठस पड़ा आनंद पिघल-पिघलकर जैसे दिमाग की परतों से बाहर आ रहा है।

धान की शेविंग के बाद के जले हुए खेत का एक स्याह रोयेंदार कोना है, जहाँ आज वे पाँचों चाँदनी रात में जमा हैं। ऐसा मौका अब तो कभी-कभी ही मिल पाता है। शहर जाने के बाद कुछ ऐसा हो गया है कि स्याह जमीन, चाँदनी रात और पाँचों का साथ, तीनों एक जगह पर संग बिरले ही घट पाते हैं।

"चीजबर्स्ट कहते हैं इसे उल्लू! पनीर न समझियो!" नवल उसे हमेशा की तरह एडवांस में मूरख समझते हुए कहता है। वैसे मुनेस ही क्या, मूरख तो वहाँ सभी हैं। कोई थोड़ा कम तो कोई थोड़ा ज्यादा। देबू, ओमबीर, तीरथ सभी। और खुद नवल ने ही कौन सी सरस्वती सिद्ध कर ली है! बड़ी रंगीन टच-स्क्रीनवाला चायनीज सेलफोन रख लेने से कोई होशियार थोड़े ही न हो जाता है!

लेकिन न जाने फिर भी क्यों, नवल के बोल बाण बन कर सबसे पहले अपना शिकार मुनेस को ही बनाते हैं। शायद उन्हें भी पता है कि इस चौकड़ी में सबसे कमजोर कड़ी वही है। यों तो गाँव से उन सभी का वास्ता अब तक बना हुआ था, लेकिन गाँव में रहने के बाद भी ग्रामीण सर्वाधिक मुनेस ही है।

शहर से लगा गाँव परिभाषाओं का अवैध घुसपैठिया होता है, जो जब-तब सीमाओं के आरपार मन-माफिक आया-जाया करता है। नगरीय जनजीवन में रम जाने के बाद गाँव के छुट्टे लड़के को अपना पुराना घर एक खस्ताहाल फार्महाउस लगने लगता है, जिसका इस्तेमाल वह छुट्टियों-वगैरह में आलस्य-भोग के लिए किया करता है। शहर बड़ा मक्कार है। वह गाँव के लड़के को लगातार अपनी ओर खींचता है, फिर उसका रूपांतरण करके उसे वापस गाँव भेज देता है। और इस तरह से शहरी हो चुका यह लड़का जब अपने हिस्से का नगर-प्रेम लेकर वापस गाँव पहुँचता है, तो वह ग्रामीण नहीं रह जाता। गाँव के लोगों को अपने रंग में रँगकर उन्हें वापस गाँव भेज कर चिढ़ाना शहर की सबसे बड़ी सामाजिक सफलता है और गाँव की सबसे बड़ी व्यथा-कथा।

"सहरी होने में और समझदार होने में अंतर है, बेटा!" मुनेस प्रतिकार के दिग्भ्रमित स्वर में जवाब देता है। "माना तुम हम लोगों से ज्यादा दुनिया देखे हो, भैया तुम्हारे वहाँ काम करते हैं और हम यहाँ, लेकिन आजकल कोई भी... उल्लू न कहना!"

"अबे बात बंद करो, इस चौकोर गत्ते को खोलो तो! तुम लोग भी!" ओमबीर ह्विस्की की बोतल को टाँगों के बीच दबाते हुए कहता है।

वैसा ही किया जाता है। अभी-अभी शहर से आया पीत्सा का वह डिब्बा खोल दिया जाता है और चारों उसे ध्यान से देखने लगते हैं।

"मैदे का मोटा पराठा है यह तो!" देबू खीस निपोरता है।

"हलवाई की दुम! कभी पराठे-पूड़ी से ऊपर भी उठ लिया कर! पिज्जा कहते हैं इसे! यहाँ का नहीं है, इटली से आया है इटली से! ग्लोबलाइजेशन की वजह से! नाम सुना है कभी?" नवल ज्ञान के साथ बहुत कुछ बघारते हुए कहता है।

"पता है भाई। हम भी अखबार पढ़ लेते हैं। गोलोबोलोलाइजेशन के कारण सब कुछ सब कहीं मिलने लगता है, यहीं न!" देबू जवाब देता है।

"सब कुछ गोल-बोल हो गया है आज-कल! खाना-पीना-सोना - सब कुछ!" ओमबीर जोड़ता है।

"इसीलिए पिज्जा भी गोल-गोल नजर आता है!" मुनेस के मुँह से मूरखपना निकल ही जाता है।

"गोलोबोलोलाइजेशन! पैग तो बना लो अब यारो!" तीरथ माहौल को गति देने की कोशिश करता है।

खुले आसमान के नीचे खेत में प्लास्टिक के गिलास सज जाते हैं। धीमे-धीमे चलती हवा का झोंका भी उन्हें ढनकाने के लिए काफी है; इसलिए पहले ह्विस्की और फिर पानी के साथ उसे वजनदार बनाया जाता है। "एक मिनट भाई लोगो!" कहते हुए नवल सबसे पहले अपना फोन निकालता है और चायनीज-चेकर्स से जाने पड़ते उस भोज्य-खंड की तीन-चार फोटोग्राफ खचाखच खींच डालता है।

"अबे भाई, इनका क्या करोगे?" मुनेस कौतूहल के साथ सवाल करता है।

"खाने ने पइले खींचते बहुत हो तुम, बे! सबै कुछ करने से पइले खींचते जरूर हो!" ओमबीर खिंचाई करता है।

"अबे उ... अबे फेसबुक पर डालूँगा - पिज्जा-पार्टी इन विलेज विद फ्रेंड्स!" हाथ से दिलासा देते हुए नवल जवाब देता है।" और साले ओम, आज-कल जो करो, जताओ जरूर। फ्यूचर में यही फोटो देखिहौ और कइहौ कि पिज्जा खाए रहे।"

पिछले कई दिनों से चली आ रही पीत्सा-जिज्ञासा आज अपने पूर्ति के चरम पर है। नवल शहर की जिस कॉलोनी में गार्ड की नौकरी करता है, उसके पास ही में एक पीत्सा की दुकान है, जहाँ उसके बड़े भाई काम करते हैं।

अन्य फास्टफूड-आयटमों के विपरीत पीत्सा की पहुँच अभी बर्गर-चाउमीन की तरह सर्वजन-सुलभ नहीं हो पाई है। वह अमूमन बड़ी दुकानों पर ही मिलता है, जहाँ निम्न वर्ग दाखिल होने से पहले सौ दफा सोचता है। लेकिन इस बार सबको धुन ही सवार हो गई थी। नवल ने इतनी तारीफ कर दी थी दुकान और पकवान की, कि पीत्सा-मुहूर्त निकल ही आया और मिल-बैठ पर प्लान बनने लगा।

"शहर में तो इसे आधे घंटे में लड़का पहुँचा देता है घर। नहीं तो पैसे नहीं मिलते। फ्री डिलीवरी। लेकिन यहाँ तक तो गरम नहीं आ सकता। मैं जब शहर से निकलूँगा, तो लेता आऊँगा। दो घंटे लगेंगे, ठंडा ही खाना पड़ेगा।" नवल ने स्पष्ट किया था।

"पैसे तुम न लेना। फ्री डिलीवरी।" ओमबीर के चेहरे पर तीखी मुस्कान थी।

"हाँ!"

"और क्या बे!"

"एकदम!"

"ठीक है सालो, ठंडी जेब वालो! मुफ्तखोरी कर लो एक बार! तुम भी क्या याद रखोगे!" नवल की अनिच्छा पर अहंभाव का मुखौटा चढ़ा था। "लेकिन सूखा खाओगे क्या?"

"तब फिर?" देबू ने पूछा था। "गुप्ताजी से एक केतली चाय मैं लेता आऊँ?"

"अबे गधे गुप्ता की पूँछ, पिज्जा चाय के साथ नहीं खाया जाता!" ओमबीर ने मजाकिया स्वर में जवाब दिया था। "बच्चे कोल्डड्रिंक के संग खाते हैं और... बड़ों में वह कड़क के साथ चलता है।"

"दारू? कहाँ से आएगी?" मुनेस ने पूछा था।

"हम पिला देंगे। बप्पा एक अद्धा धरे हैं अलमारी में। खिलाई इनकी, तो पिलाई हमारी। तुम लोग भी क्या याद रखोगे।" उसने फिर कहा था।

... ...

"बिरजू भैया पिज्जा वाली दुकान पर कित्ते साल से हैं?" मुनेस जैसे कुछ टटोलना चाह रहा है।

"अब इस दिसंबर में चार साल हो जाएँगे। याद है भाई, याद है - तुम्हारे लिए अबकी बार बात करूँगा। वहाँ, जहाँ, कहीं भी।" नवल को अपनी कही पुरानी बात याद आ जाती है। कुछ ही दिन पहले मुनेस ने उससे शहर में कहीं लगवाने की बात कही थी। नवल में भरोसा दिलाया था कि वह इस मामले में बिरजू भैया से बात करेगा।

"तुम्हारे या भैया के साथ ही लग जाते...। पिज्जा की दुकान पर पर ही सही। जान-पहचान के बीच..." मुनेस थोड़ा और दिल खोलकर मंशा व्यक्त करता है।

"शहर वाले उसे पीत्सा की दुकान नहीं कहते गधे, आउटलेट या टेक-अवे कहते हैं।" नवल हँस देता है।

"तुझे बड़ा पता है!" मुनेस बिना सोचे-समझे खीझ उठता है।

"बेटा, भैया मेरे वहीं नौकरी करते हैं। मैं दिन भर पास में रहता हूँ। साल भर मुझे हो गया। इत्ता भी न जानूँगा?"

"अच्छा एक बात बता भाई। भैया का वहाँ काम क्या है? वे पिज्जा बेचते हैं?"

"अबे पिज्जा बेचा नहीं जाता, सर्व या सोल्ड होता है। समझा!"

"सर्व या सोल्ड! अरे कहा करें! आउटलेट-कटलेट-आमलेट-घासलेट, जो चाहे कहा करें! है तो वह पिज्जा की दुकान ही न!" मुनेस किलस कर कहता है।

"दुकान न बोल भैया उसे, दुकान और भंडार गाँव में होते हैं! जैसे देबू के गुप्ताजी का गुप्ता-मिष्टान्न-भंडार!" अबकी बार टोकने की बारी ओमबीर की है।

"तुझे बड़ा पता है रे सराबी! जिंदगी में कभी देखा है पिज्जा आमने-सामने!" मुनेस को ताव आ जाता है।

"आमने-सामने न देखा तो क्या, टीवी में तो देखा है बे! गोल मैदे के ऊपर सजी तरह-तरह की सब्जियाँ होती हैं! टमाटर, सिमला, मकई, मिर्च और न जाने क्या-क्या!"

उसे निर्मित हुए शायद कुछ समय अधिक हो गया है, इसलिए उसमें आँच का सर्वथा अभाव है। लेकिन फिर भी गाँववाले शहरियों के लिए है तो वह सुस्वादु खाद्य ही, जिसकी कल्पनाभरी चर्चा में उन्होंने पिछले कई महीने बिताए हैं। सूखी सतह पर बिखरे रंगबिरंगी सब्जियों के टुकड़े जिन्हें बाजार ने लाकर एक साथ खड़ा कर दिया है। कौन कहता है धरती चपटी नहीं है? वह तो इस मैदे के टुकड़े-सी चपटी भी है और ठंडी भी। वह उतनी ही आदिम भी है जितनी टेक-अवे से निकलने के समय थी; अलबत्ता किस्म-किस्म की सब्जियाँ कट-छँट कर उस पर एक साथ जबरन जरूर लगा दी गई हैं।

"अबे ये काले छल्ले?" तीरथ पहली चुस्की मारते हुए पूछता है।

"ऑलिव कहते हैं इन्हें। काले ऑलिव।" जवाब फिर नवल से आता है।

"ऑलिव यानी जैतून न? साला जैतून भी काला होता है?" ओमबीर विस्मित है।

"और नहीं तो तुम क्या अंगूर समझे थे?" मुनेस को जैसे बदला लेने का अवसर मिल जाता है।

"रुको बे! नैपकिन में धरकर खाओ! दोनों हाथ चीज से साने ले रहे हो!" नवल देबू से कहता है।

"क्या कहे थे - चीजबर्स्ट? फटे पड़ा है माल इसमें से!" ओमबीर को हल्की-हल्की चढ़ने लगती है।

"वो माल क्या जो दूध से फट न पड़े!" नवल चुटकी लेता है।

और फिर रात के अँधेरे में ठहाके गूँज उठते हैं। रात चढ़ चुकी है और खेत में ग्लोबल मजा अपने उरूज पर है। मुनेस के मन के अवन में कच्चे सपने पक रहे हैं। कुछ दिन, नहीं कुछ महीने वह भी बिरजू भैया की तरह पिज्जा की दुकान... धत्! टेक वे पर काम करेगा। पूरे मन से सिस्टम समझेगा। कैसे बनाते हैं, कैसे परोसते... वही सर्व, सर्व करते हैं। कैसे मोटरसाइकल पर लेकर आधे घंटे में आननफानन में पहुँचाते हैं, गोया पिज्जा न हो, मरते लखनलाल की संजीवनी बूटी हो जो देर से पहुँचेगी तो प्राण-पखेरू उड़ जाएँगे।

मुनेस मगन है। उसे नवल ने बताया था कि पिज्जा का ऑर्डर फोन पर कैसे अँगरेजी में शिष्टता के साथ लिया जाता है। यानी ऊपर टॉपिंग सी गिटिर-पिटिर होनी चाहिए, नीचे चाहे मैदा कच्चा-पक्का रह जाए। टॉपिंग का ही तो जमाना चल रहा है। ऊपर क्या है इसपर सबकी नजर है, नींव कैसी है, इसकी किसे परवाह है भला? वह भी, जब तक बिरजू भैया संग नौकरी नहीं लग जाती, थोड़ी अँगरेजी सीखेगा। एकदम टॉपिंग-टाइप ताकि उसका गँवारू कच्चे मैदे का बेस रंगबिरंगे छल्लों के तले खो जाए। बस फिर क्या है! फिर तो यहीं गाँव में पिज्जा बेचा जाएगा। शहर से सामान लाकर यहीं माहौल बनाया जाएगा। साथ के लिए बौड़म देबू है ही, साला कब तक गुप्ता हलवाई के यहाँ कचौड़ियाँ-समोसे तलता रहेगा? मैदे का भविष्य अब इसी में है कि वह पिज्जा-तले आ जाए, शहर में चटोरे अब कड़ाहियों के किनारे कम और काउंटरों के बाहर अधिक जमा होते हैं। फिर तो उसकी निकल पड़ेगी! थोड़े महँगे दाम पर ही सही, पर गाँव में बिक्री तो खूब होगी। ठंडा हो जाएगा तो उसके लिए भी कुछ तवे-ववे का जुगाड़ कर लेंगे शुरुआत में। फिर बाद में देखा जाएगा, जब थोड़ा मुनाफा हो जाएगा तो एक भट्ठी... वही अवन... अवन ले लेंगे।

"अबे ये क्या है? कौन सी सब्जी है?" एक काले तिकोने टुकड़े को देखकर उसका हसीन सपना टूट जाता है।

"क्यों? साले, जान जाएगा तो क्या ज्यादा स्वाद ले लेगा?" देबू खींचते हुए कहता है। "खा ले चुपचाप!"

"अबे होगी स्पेशल टॉपिंग! इतनी वैरायटी की सब्जियाँ पड़ती है ऊपर! ग्लोबलाइजेशन है बेटा!"

"ग्लोबलाइजेशन के नाम पर खा ले!"

और फिर एक हिचक के बावजूद मुनेस ने चीज पर चिपके उस काली तिकोनी चीज के साथ वह टुकड़ा खा लेता है। जबान पर एक तीखा-सा स्वाद क्षण भर को आता है और फिर चीज के अतिरेक में समाकर खो जाता है।

***

अब तक चाँद आसमान में काफी ऊपर तक चढ़ आया है और घर-वापसी में पड़ने वाला बंजर मैदान रुपहला हो चला है। तभी मंथर गति से आगे बढ़ते मुनेस के टायर के नीचे शायद कोई पत्थर आ जाता है। हलके नशे में होने के कारण उसका हाथ डगमगा जाता है और सायकिल समेत वह गिरते-गिरते बचता है। उसका सारा वजन क्षण भर को जैसे दाहिने पैर पर आ जाता है। अधमुँदी आँखों को सायास फाड़-फाड़कर वह चारों ओर के माहौल पर नजर डालता है। उसे ऐसा मालूम होता है कि वह किसी चीज की सतह पर खड़ा है जो नीचे तरल रूप में मौजूद है जो कभी भी फट कर बह पड़ेगी। "वह माल क्या जो दूध से फट न पड़े!" नवल से छिछोरे शब्द उसके कानों में फिर गूँज उठते हैं। संतुलन जाँचने की क्रिया में उसने सायकिल के हैंडल को जरा सा हिलाता है, तो उसकी नजर उसके अगले टायर पर जाती है। उसे लगता है कि वह काले ऑलिव के दो छल्लों पर सवार है, जिन्हें वह आज तक पहचान ही नहीं पाया। इतने साल इस सवारी ने उसके जिस्म को ढोया लेकिन उसपर जैसे उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया। और इन काले छल्लों पर सवार होकर न जाने वह कहाँ तक जाएगा? क्या किसी अनजाने के मुँह में?

एक झटके से वह बोझ पैडल पर डालता है और आगे बढ़ चलता है। ऊबड़-खाबड़ पगडंडी के सामने आ जाने से पेट में मरोड़-सी उठने लगी है। बिन मौसम की तेज अक्टूबरी हवा चल रही है। इकहरे बदन के मुनेस को ऐसा लगता है कि कि उसके भीतर अगर दारू न होती तो वह प्लास्टिक के कमजोर गिलास सा ढनक जाता। वह दृढ़ता के साथ आगे बढ़ता है। दिमाग में मानो उसके हलापेनो का बुरादा चढ़ गया है। नवल ने उसके बारे में उसे पहले दो-एक बार बताया था। वह जो मिर्च तो है लेकिन मिर्च-सी तीखी नहीं है। वह जो मेक्सिको में पैदा हुई थी लेकिन अब हर जगह उगने लगी है। और-तो-और शहर वाले भी इतने जाहिल हैं, कि उसे जलापेनो-जलापेनो बोला करते हैं। सीख रहे हैं ये लोग भी, हमसे थोड़े ज्यादा ग्लोबल हैं बस, और क्या। हम भी हो जाएँगे।

मुनेस को लगता है कि आगे बढ़ने के लिए आधुनिक ट्रेंड यही हैं। जैसे दिखो, वैसे होओ नहीं। जहाँ जन्मों, वहाँ से निकल कर कहीं और पनपने की कोशिश करो। जटिल हो जाओ इतने कि वर्गीकृत करने वाले सिर पीट लें। जीवन अपवाद हुए बिना जिया तो क्या जिया।

पहले अपवाद एकाध होते थे। अब हर आदमी अपवाद सिद्ध करता है। वो क्या कहता था नवलवा - कस्टमाइज्ड! कस्टामाइज्ड चीजों का जमाना है आज-कल! जो पिछड़े हैं, वे नकल करते चल रहे हैं। वे कॉपी बन रहे हैं। जो कुछ कर पा रहे हैं, वे कस्टमाइज्ड हो कर बढ़ रहे हैं। विकास ओरिजिनैलिटी का ही नाम है। मौलिक बनना होगा। एकदम ओरिजिनल। वैसा जैसा कोई नहीं बना। चाहे उसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़े।

अब तक घर सामने आ गया था। अभी-अभी दीवाली में पुताई होने के कारण चाँदनी में और दूधिया मालूम देता। मानो पीत्सा का ताजा डिब्बा नहीं... पैकेट हो जो अभी-अभी घर पहुँचाया गया हो। घर के बाहर पड़े खाद के सूखे फटे बोरे उसे ऑरीगैनो सीजनिंग और चिली फ्लेक्स के फटहे पाउचों से जान पड़े; वे जिन्हें घर-खेत की मिट्टी पर स्वादिष्ट उपज के लिए छिड़क लिया गया है।

अब तक पेट की मरोड़ें बहुत बढ़ने लगी हैं। ऐसा जान पड़ता है कि कोई आँतों को गीले पतलून-सा मरोड़ कर पानी निचोड़ रहा है। मुनेस का जी मालिश कर रहा है और मल का दबाव भी बन रहा है। पीत्सा के खिलाफ पेट एकदम से ऐसे विद्रोह करेगा, इसकी उसके जरा उम्मीद नहीं थी।

वह तेजी से लगभग दौड़ता हुआ टॉयलेट में दाखिल हो जाता है। अँधेरे में पतलून सरकाता है और शंका-मुद्रा में बैठ जाता है। एक विद्रूप प्रतिकार भरी आवाज गूँजती है और बिना प्रयास ही के पेट खाली हो जाता है। वह कुछ देर और बैठा रहता है; शायद उसे अब भी थोड़ी असहजता-भरी चुभन बरकरार है।

पानी से अँधेरे में सफाई होती है। ज्यों वह खड़ा होता है और दो कदम बढ़ता है, विद्रोह का दूसरा स्वर गूँजता है। अबकी बार जोर ऊपर को है। वह बमुश्किल दरवाजे तक पहुँच भर पाता है कि वहीं उलटी हो जाती है।

मुनेस की साँस में राहत भरी रफ्तार है। उसका दिल किसी सायकिल सा चल रहा है जो अभी-अभी खड़ंजे वाली पगडंडी छोड़कर घर को आ लगी है। पास पड़े तख्त पर वह बैठ जाता है। उसके दोनों पतले-पतले हाथ पीत्सा-कटर की तरह खाट के गद्देदार जिस्म पर टिके हैं।

बगल में लेटे पिताजी खटपट सुनकर मच्छरदानी के भीतर से गर्दन उठाकर पूछते हैं - "ठीक तो हो? क्या हुआ?"

"हाँ, वो आज पार्टी थी। नवल ने दी थी। उसी में थोड़ा ज्यादा हो गया।"

"क्या खा लिया?"

"पिज्जा..." कहकर वह वाक्य को अधूरा छोड़ देता है।

पिताजी आगे कुछ नहीं कहते। मुँह घुमा कर वापस बदन को बिस्तर पर ढीला छोड़ देते हैं। मुनेस भी लेट जाता है। उसके सामने काले आसमान की ऊँचाई पर जगमग चीजबर्स्ट-सा चंद्रमा है, जिससे फटफट कर दूधिया प्रकाश बह रहा है। उसके इर्द-गिर्द फैले सहस्रों तारे मानो उसकी रुपहली कांति से खिंचे चले आ रहे हैं और एक दिन सबके सब उसमें जा गिरेंगे। आज से पहले मुनेस को प्रकाश इतना अँधेरे-सा भयानक कभी न लगा था। लेकिन गोलोबोलाइजेशन का जमाना है, हर चीज अपनी जड़ और गुण-धर्म छोड़कर ही अपनी पहचान बनाती है आज-कल! आजकल उजाला ही अब नया अँधेरा है! यही नया ट्रेंड है - सर्व! टेक-अवे! गोलोबोलो... मुनेस को लगता है कि चंद्रमा धीमे-धीमे आगे बढ़ता उसके पास आ रहा है। उसकी ठंडक अब गर्म हो रही है। पास, पास और पास। इतने पास कि उससे आँखें चुँधिया रही हैं और चेहरे पर पसीना छलक रहा है। बढ़ते-बढ़ते, बढ़ते-बढ़ते, बढ़ते-बढ़ते... न जाने कब उसकी आँख लग जाती है और मद्धिम पेटदर्द की उसे सुध नहीं रहती।

सुबह आठ चाय के लिए हिलाकर जब माँ उठाती हैं तो उसकी नींद टूटती है। "बड़ी देर तक आज सोते रहे। उठ जाओ।"

वह अँगड़ाई लेते हुए शरीर को सँभालकर सीधा करता है और धीरे-धीरे उठ कर बैठ जाता है। चाय के लिए बिना बोले हाथ से मना करता है। अब भी उदर-व्यवस्था पूरी तरह पटरी पर नहीं लौटी है। वह धीमे से उठकर बाथरूम की तरफ बढ़ता है। रास्ते में, नाली के समीप रात के वमन-चिह्नों पर उसकी दृष्टि पड़ती है। टमाटर की चमड़ी, चीज की कतरनें, शिमलामिर्च के अवशेष, मकई के लगभग पिस चुके दाँत... और सबसे बढ़कर ऑलिव के स्याह छल्ले। वह सबको अचंभे से एक-एक करके पहचानने की कोशिश करता है।

"मुनेस! फोन बज रहा है तेरा!" पीछे से माँ की आवाज कानों में पड़ती है। वह पलटता है। खाट पर रखा फोन उठाता है - सामने चटकी स्क्रीन पर नवल का नाम 'बेबी को बेस पसंद है' के साथ जगमगा रहा है।

"हाँ... हाँ बोल... हाँ बोल भाई... अभी उठा... तबियत बिगड़ गई थी रात में थोड़ी ...हाँ।" फोन कान पर लगाए सिर झुकाये वह आहिस्ता-आहिस्ता बरामदे में चहलकदमी करता है। "न भाई। रहने दे। न, न, न। न भाई। फिर देखेंगे। बाद में... सोचेंगे। गोलोबोलो... गोलोबोलाइज होने में दिक्कत आ रही है। मुश्किल हो रही है।" कहते हुए वह काट देता है और पैजामा पकड़ कर तेजी से शौचालय की तरफ भागता है।


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