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कविता

विचार
प्रत्यूष गुलेरी


विचार मात्र एक शब्द नहीं
अंबार है
इसे बांधना
सहज-असहज भी नहीं
तट बंधन तोड़ता
कोई समंदर है
नए क्षितिज तलाशता
सुर्ख लाल
सूरज भी है
पावन प्रेम का प्रतीक।
विचार वह कबूतर है
जो लाँघता नापता
अथाह आकाश को
थकता नहीं
नन्हें नन्हें पंखों की
निर्बाध उड़ान से
चीरता लक्ष्य
दर लक्ष्य को।
विचार एक विद्रोह है
विस्फोट का लवादा भी
इसके सम्मुख
क्या वजूद है
बम, एटम बम का
या अन्य रासायनिक, जैविक
हथियारों, पदार्थों का
सब बौने हैं ।
बात बिगड़ेगी
बात बनेगी
बस विचार से ही
विचार स्वयं में
स्वयं से फूटती कविता है
होम के यज्ञ की
समिधा है
ब्रह्मांड में फैलती-बिखरती
सुगंध है
विचार ही।


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