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कविता

पारो
कुमार मंगलम


जाँघ में लगी थी गोली
खून बहुत बह गया
पारो मर गई
छर्रा धँसा था घुटने के ठीक ऊपर

उल्टी करते
अचानक पेट दर्द से
पारो मर गई
हस्पताल भी नहीं जा पाई

तीतर खाई
चावल और अंडे खाए
गरई भून के खाई
उसके साथ-साथ गंधक भी खाती रही
पारो मर गई

वह मर गई
उसे जीने की उम्मीद नहीं थी

वह मर गई
उसके पास दवाई नहीं थी

वह मर गई
क्योंकि वह भूखी थी

वह मर गई
क्योंकि उसके ठोकर लगे पैर
का घाव नहीं सूख रहा था

पारो जंगल में
जंगल का गीत गाती थी
जिससे चिड़ियों ने चहकना सीखा था।


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