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लेख

गिरमिटिया अनुभव एवं सांस्कृतिक लोक मानस
राजीव रंजन राय


सारांश

सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने में भाषा एवं साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारतीय संस्कृति की शक्ति भारत देश के बाहर बसे आप्रवासी भारतवंशियों की जीवन शैली से अनुभव की जा सकती है। विश्व के अन्य देशों में भारतीय संस्कृति को जीवित रखने के लिए भारतवंशियों के बीच हिंदी मातृभाषा होने के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक भाषा भी है। भाषा विविध रूपों में सदैव अपने संदर्भों एवं अभिप्रायों से आगे बढ़ने में समर्थ होती है। किसी भाषा विशेष के विभिन्न अभिप्राय विशिष्ट सामाजिक समूह के लिए अर्थवान होते हैं। संस्कृति एवं भाषा दो समरूप मानसिक सत्ताएँ हैं। भौतिक एवं अभौतिक सांस्कृतिक उत्पाद वास्तविक जगत की प्रतिनिधि एवं मानवीय व्याख्याएँ मात्र नहीं होती हैं , बल्कि अस्मिता एवं अस्तित्व बनाए रखने के लिए उनका पीढ़ी दर पीढ़ी संप्रेषित होना एक अपरिहार्यता भी है।
लोक मानस स्मृतियों का एक साझा कोश है। पीड़ा एवं प्रताड़ना का अनुभव चाहे वह संवेदना के स्तर पर हो या संस्कृति के स्तर पर हो , साहित्य में ही सृजित होकर भावी पीढ़ियों तक संप्रेषित होने के साथ ही लोक मानस का हिस्सा बन जाता है। औपनिवेशिक प्रणाली के अंतर्गत विश्व भर फैले भारतवंशियों के संदर्भ में यह संप्रेषण लोक एवं साहित्य दोनों स्तरों पर हुआ है। गिरमिटिया अनुभव भारतीय डायस्पोरा का एक साझा अनुभव रहा है। भारत के पुराने डायस्पोरा के संदर्भ में प्लांटेशन जीवन अनुभव में गिरमिट शब्द का एक विशिष्ट स्थान है। एग्रीमेंट का देशज रूप गिरमिट इंडेंचर युग की यादों , साझी विरासत , काल्पनिक विश्वास एवं पारस्परिक चेतना को अभिव्यक्त करने का वैचारिक धरातल बनता जा रहा है। इस शोध आलेख में भारत के पुराने डायस्पोरा के संदर्भ में गिरमिट युग की यादों को सांस्कृतिक विरासत के रूप में विविध प्रचलित भाषिक एवं साहित्यिक स्वरूपों के आधार पर स्वभूमि एवं गंतव्यभूमि दोनों स्तरों पर विवेचित करने का प्रयास किया गया है।

इक्कीसवीं सदी का भारतीय डायस्पोरा पुराने एवं नए डायस्पोरा के उभार का परिणाम है। डायस्पोरा में भारतवंशियों ने अपने मेजबान समुदायों एवं स्थानीय परिस्थितियों से समायोजन करते हुए कौशल एवं सृजनात्मकता के साथ अपनी पहचान को संरक्षित रखने के लिए कठिन संघर्ष किया है। भारतीय डायस्पोरा के उद्भव में भारतीय भाषाओं, धार्मिक मूल्यों एवं सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखने में विविध आयामी साक्ष्य प्राप्त होते हैं। संरक्षण एवं अनुकूलन के इन्हीं प्रयासों के कारण वर्तमान वैश्विक सांस्कृतिक विविधता में भारतीय डायस्पोरा भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर रही है।

मानव समुदायों में प्रवासन निरंतर जारी रहने वाली प्रक्रिया है। समुदायों में प्रवासन से जुड़े निहितार्थ समुदाय की परिधि, प्रवासन के कारणों, मेजबान समुदायों और प्रवासन के पैमाने इत्यादि पर निर्भर होते हैं। मानव समुदायों के प्रवासन से जुड़े दो कारक महत्वपूर्ण हैं - प्रथमतः प्रवासन लोगों का मात्र भौतिक आवागमन नहीं होता है और द्वितीयतः प्रवासी समूह सामाजिक-सांस्कृतिक गठरी को अपने साथ ले जाते हैं, जो मुख्यतः पूर्व-पारिभाषित सामाजिक पहचान, धार्मिक रीति-रिवाजों और विश्‍वास की प्रणाली, परिवार और नातेदारी व्यवस्था को संचालित करने वाले मूल्य और मानदंड, भोजन संबंधी आदतें, बोली और भाषा आदि से निर्मित होती है।

इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि प्रवासी कभी भी अपनी जन्मभूमि से पूर्णतया अलग नहीं हो पाते हैं। वे स्वभूमि से सीधे तौर पर या भावनात्मक जुड़ाव को बनाए रखते हैं, इसे ही 'पुनर्वापसी के मिथक' के रूप में भी माना जा सकता है। उनके 'महत्वपूर्ण अन्य' में स्वभूमि के बिछुड़े लोग और उनके नए बसेरे की स्थानीय जनसंख्या के लोग होते हैं। ये दोनों ही प्रवासी समुदायों की मूल भूमि/जन्मभूमि से जुड़ाव या अपनेपन के प्रति जागरूक होते हैं। मानव प्रवासन से जुड़ा यह महत्वपूर्ण तथ्य प्रवासी समुदायों में नृजातीय-निर्माण (एथनिक फॉर्मेशन) और अन्य नृजातीय समूहों से उनके संबंधों को निर्धारित करता है।

विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास और विभिन्‍न आर्थिक-राजनीतिक दशाओं के कारण विदेशों में प्रवासी भारतीय समुदायों का विकास एक अलग प्रकार के डायस्पोरा समुदायों के रूप में हुआ। इन समुदायों द्वारा विशिष्ट प्रकार की भारतीयता का प्रदर्शन किया जाता है, जिनमें इन समुदायों को अपने पुरखों द्वारा प्रदत्त विविध सामाजिक प्रतिमान और सांस्कृतिक तत्व सम्मिलित हैं। इन तत्वों को प्रवासी भारतीय समुदायों द्वारा अनुरक्षित, संरक्षित और पुनर्जीवित किया गया है और इनके मूल को सार रूप में भारत में खोजा जा सकता है। इन समुदायों द्वारा जागरूक तौर पर अपनी अलग अस्मिता बनाए रखने के लिए भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित और पुनर्गठित भी किया गया है।

बहुसांस्कृतिक समाजों में रहने और विशिष्ट नृजातीय पहचान निर्मित होने के कारण विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदायों को अलग-अलग प्रकार की नृजातीयता (एथनिसिटी) से जुड़ी समस्याओं से समझौता करना पड़ा। साथ ही इन समुदायों को सक्रिय आर्थिक और सांस्कृतिक प्रतियोगिता में हिस्सा लेना पड़ा। कुछ परिस्थितियों में इन समुदायों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नृजातीय अलगाव से भी सामना हुआ। यहाँ तक कि इन्हें हिंसात्मक नृजातीय संघर्ष और प्रबल राजनीतिक आंदोलनों की विपरीत स्थितियों को भी झेलना पड़ा। नृजातीय और सांस्कृतिक मुद्दों का सत्ता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक उपयोग इन गतिशील समाजों में निरंतर होता रहा है। कुछ देशों में शक्‍ति और सत्ता से जुड़े प्रश्‍न अपनी राजनीतिक सीमा को लाँघकर हिंसा और दमन का रूप ग्रहण कर लेते हैं। इन्हीं गंभीर स्थितियों के कारण इंडो-गयानीज समुदाय के लोगों को उत्तरी अमेरिका, हिंदुस्तानी सूरीनामी लोगों को नीदरलैंड, पूर्वी अफ्रीकी सिख समुदायों को यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) और इंडो-फिजी लोगों को न्यूजीलैंड और कनाडा के लिए पुनर्प्रवास करना पड़ा।

डायस्पोरा समुदाय के रूप में प्रवासी भारतीयों की स्थिति अधिकांशतया गंतव्य अथवा मेजबान देशों की नृजातीय-धार्मिक और सामाजिक-आर्थिक बनावट द्वारा निर्धारित हुई है। अधिकांश स्थितियों में ये देश बहुलवादी समाज के रूप में जाने जाते हैं। बहुलवादी समाज से तात्पर्य है विविध धार्मिक-सांस्कृतिक-जातीय मान्यता वाले समुदायों का एक साथ रहना, यद्यपि 'बहुलवादी समाज' की अवधारणा को लेकर विद्वान एकमत नहीं हैं।

इन बहुसांस्कृतिक राज्‍य व्यवस्थाओं में भारतीय समुदायों का 'अन्य' (समाजशास्‍त्रीय संदर्भ में महत्वपूर्ण अन्य) लोगों से संबंधों की विवेचना करने के लिए मेजबान समाज के बारे में धारणा बनाया जाना आवश्यक है। चूँकि भारतीय प्रवासी समुदाय मेहमान के रूप में हैं, इस कारण इन देशों में पहले से विद्यमान समुदायों की भूमिका मेजबान के रूप में मानी जाती है। अधिकांश स्थितियों में इन देशों में रहने वाले अधिकांश समुदाय प्रवासी समुदाय ही हैं। इन बहुसांस्कृतिक देशों में जहाँ भारतीय मूल के लोगों की संख्या महत्वपूर्ण है, वहाँ इन समुदायों के बारे में धारणा और अस्मिता, दोनों ही अत्यंत संवेदनशील हैं। औपनिवेशिक काल में प्रवासी भारतीयों को ब्रिटिश सत्ता द्वारा 'कुली' शब्‍द से संबोधित किया गया था। इन समुदायों में पढ़-लिखकर आगे बढ़े पेशेवर लोगों को भी इसी योजक शब्द से जोड़कर संबोधित किया जाता रहा। दक्षिण अफ्रीका में मोहनदास करमचंद गांधी को अनेक प्रकरणों में 'कुली बैरिस्टर' का संबोधन प्राप्त हुआ। प्रवासी भारतीयों के बारे में उपलब्ध साहित्य में इन्हें अनेक नामों से संबोधित किया जाता रहा है, जैसे 'गिरमिटिया', 'ईस्ट-इंडियन', 'एशियन' और गंतव्य देशों के नाम के साथ योजक पद 'इंडो' लगाकर 'इंडो-अमेरिकन', 'इंडो-कनाडियन', 'इंडो-गयानीज', 'इंडो-त्रिनिदादियन' आदि।

इन बहुसांस्कृतिक देशों में प्रवासी भारतीय समुदायों और उनके 'महत्वपूर्ण अन्यों' के बीच के संबंधों को निर्धारित करने में इन समुदायों द्वारा अस्मिता निर्मित करने की प्रक्रिया का भी महत्व है। इस प्रक्रिया को भाषा, नातेदारी-संबंध, खान-पान, रीति-रिवाज और धार्मिक आस्था आदि से जुड़े व्यवहार और प्रतिमानों में देखा जा सकता है। ये विशिष्ट सांस्कृतिक व्यवहार-प्रतिमान ही प्रवासी भारतीयों की 'नृजातीयता' को आकार देते हैं और इन समाजों में रहने वाले अन्य समुदायों से उनके संबंधों को निर्धारित करते हैं।

नृजातीय पहचानों की अभिव्यक्‍ति और जातीय हितों के जुड़ाव को भारतीय डायस्पोरा समुदायों द्वारा गठित किए गए फोरम और संघों में देखा जा सकता है। इस प्रकार के संगठन क्षेत्रीय, भाषिक और जातीय श्रेणी पर निर्मित किए गए हैं और पिछले दशकों में इलेक्ट्रॉनिक संचार साधनों के विस्तार के पश्‍चात इनमें उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। विशेष तौर पर कंप्यूटर जनित संचार माध्यमों ने अप्पादोरई (1996) के विशिष्ट प्रकार के 'डायस्पोरा लोक मानस' (डायस्पोरा पब्लिक स्फीयर्स) का सृजन किया है। प्रवासी भारतीय लोगों के आपसी संबंधों को निर्धारित करने में इन (आभासी/वर्चुअल) माध्यमों का योगदान क्रमशः बढ़ता जा रहा है। इनकी मध्यस्थता द्वारा इन समुदायों में जुड़ाव और नृजातीय तत्वों को पुनर्सृजित किया जा रहा है।

भारतीय उपमहाद्वीप से लोगों का विभिन्‍न देशों के लिए प्रवासन इतिहास के विभिन्‍न काल-खंडों में अलग-अलग कारणों से हुआ। आप्रवासी समूहों में समुद्रपारीय भारतीयों की संख्या अधिक है। एक अनुमान के अनुसार पूरे विश्‍व में साठ लाख भारतीय नागरिकों के अतिरिक्‍त दो करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं (भारत सरकार, 2001)। यदि पाँच हजार की न्यूनतम संख्या को आधार माना जाए, तो समुद्रपारीय भारतीय विश्‍व के 55 देशों में बसे हुए हैं। भारतीय मूल के लोग फिजी (49%), गयाना (53%), मॉरीशस (74%), त्रिनिदाद तथा टोबैगो (40%), और सूरीनाम (37%) में जनसंख्या के आधार पर सर्वाधिक बड़े नृजातीय समूह का निर्माण करते हैं। एशिया के हाँगकांग, मलेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका, पूर्वी अफ्रीका आदि में भारतीयों द्वारा प्रभावी अल्पसंख्यक समुदाय का निर्माण किया जाता है। इसके अतिरिक्‍त ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीयों की प्रभावी उपस्थिति है। भारतीय डायस्‍पोरा एक जटिल और विविधतापूर्ण पहचान को बनाए हुए है। यह विविधता उसके प्रवासन के इतिहास, क्षेत्रीयता, धर्म, आर्थिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के कारण आज भी विद्यमान है। भारतीय डायस्‍पोरा का विकास अलग-अलग राजनीतिक तथा आर्थिक संदर्भों में हुआ है और इसी कारण इनका सामाजिक-सांस्‍कृतिक अनुभव भी विविधतायुक्‍त है। अलग-अलग स्थानों की परिस्थितियों में सामाजिक अनुकूलन के कारण भारतीय डायस्‍पोरा समुदायों में भाषा एवं संस्कृति की स्थिति भी विविधतापूर्ण बनी हुई है।

विजय मिश्र (2007) के अनुसार सभी डायस्पोरा खिन्न हैं, लेकिन उनकी यह खिन्नता अपने अलग तरीके से है। डायस्पोरा अवधारणा उन लोगों की ओर इंगित करता है, जो पासपोर्ट में अंकित योजक-चिह्न विहीन अपनी पहचान के प्रति असहजता महसूस करते हैं। ये वे लोग हैं, जो इस योजक चिह्न अथवा जुड़ाव (कनेक्शन) का अन्वेषण तो करना चाहते हैं, लेकिन अन्य समुदायों के व्यापक प्रतिरोध के भय से इसको अधिक प्रभावी ढंग से प्रदर्शित नहीं करना चाहते हैं। वे जोखिमपूर्ण ढंग से अपने वास्तविक अथवा काल्पनिक स्थांतरण की यादों को बनाए रखते हैं, इसी कारण डायस्पोरा समूहों को आरंभिक आधुनिकता द्वारा अनावश्यक एवं हानिकारक तथा उत्तर-आधुनिकता द्वारा प्रतिष्ठित एवं उपयोगी माना गया है। उत्तर-आधुनिकता के अंतर्गत डायस्पोरा लोकतांत्रिक तौर-तरीके का एक उदाहरण प्रस्तुत करने वाली स्थिति है, जिसके लिए वर्चस्व/प्रभुत्व एवं स्थानीयता/क्षेत्रीयता राष्ट्रवाद के लिए एक अनिवार्य दशा नहीं है। इस प्रकार डायस्पोरा दशा एक स्वस्थ उदाहरण होने के साथ-साथ एक प्रतिक्रियावादी स्थिति भी है।

भारत का एक करोड़ बीस लाख की संख्या वाला प्रभावी डायस्पोरा का अपना निरंतर जारी रहने वाला प्रवासन इतिहास रहा है। इस प्रवासन इतिहास का अवलोकन यह स्पष्ट करता है कि मात्र स्वभूमि की गरीबी ही इन प्रवासियों को समुद्र पार जाने के लिए मजबूर करने वाला कारण नहीं रहा है। भारतभूमि से धार्मिक-सांस्कृतिक प्रचार-प्रसार, वाणिज्यिक उद्यमिता एवं अवसर की तलाश में विभिन्न समूहों का वैश्विक प्रवासन निरंतर जारी रहा है। भारतीय डायस्पोरा के वृत्तांत को समझने के लिए प्रायः दो मनः स्थितियों का सहारा लिया जाता है - पुराना एवं नया। पुराना से अभिप्राय आरंभिक आधुनिकता से जुड़े शास्त्रीय पूँजीवादी या और स्पष्ट तौर पर उन्नीसवीं सदी की इंडेंचर प्रणाली के अंतर्गत हुए बड़े पैमाने पर प्रवासित श्रमिकों एवं उनके वंशजों से है। इन लोगों द्वारा विश्व के विभिन्न औनिवेशिक स्थलों फीजी, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, मॉरीशस, त्रिनिदाद, गयाना एवं सूरीनाम आदि में अन्य प्रवासित समुदायों के साथ शक्ति एवं प्राधिकार के एक जटिल संबंधों का गठन किया गया है।

भारत के पुराने डायस्पोरा के संदर्भ में प्लांटेशन जीवन अनुभव में गिरमिट शब्द का एक विशिष्ट स्थान है। एग्रीमेंट के देशज रूप गिरमिट इंडेंचर युग की यादों, साझी विरासत, काल्पनिक विश्वास एवं पारस्परिक चेतना को अभिव्यक्त करने का वैचारिक धरातल बनता जा रहा है। उपनिवेशों में गन्ने की खेती सफलतापूर्वक करने तथा इसे लाभप्रद बनाए रखने के लिए सस्ते, बहुतायत तथा मेहनतकश श्रमिकों की आवश्यकता थी। कैरिबियाई क्षेत्रों में बागान उपनिवेशों में गुलाम श्रमिक उत्पादन प्रणाली की रीढ़ थे। यूरोपीय मानवाधिकारवादियों और राजनैतिक दलों की सक्रियता से ब्रिटिश साम्राज्य में 23।08।1833 को स्लेवरी एबालिशन एक्ट' पारित कर दिया गया। गुलामी प्रथा की समाप्ति फ्रांसिसी साम्राज्य में 1 जुलाई तथा डच साम्राज्य में 1 जुलाई 1863 को की गई। अंग्रेजी साम्राज्य से 1833 में दास-प्रथा की समाप्ति होने के कारण शस, फीजी, गुयाना, वेस्टइंडीज इत्यादि उपनिवेशों में गन्ने के खेतों में काम करने वाने मजदूरों की कमी हो गई। टिंकर (1974) के शब्दों में, अनुबंधित श्रमिक प्रणाली गुलामी का दूसरा रूप कुली-प्रथा की शुरुआत हुई थी। इस प्रथा के अंतर्गत काम करने वाले लोगों को गिरमिटिया कहा गया। गिरमिट 'एग्रीमेंट' का ही भोजपुरीकरण है।

अनुबंध (इंडेंचर) एक विश्वस्तरीय परिघटना थी, जिसका प्रारंभ 19वीं शताब्दी में हुआ। इसका प्रारंभ मारिशस में ब्रिटिश लोगों द्वारा किया गया। इसे महान प्रयोग (ग्रेट एक्सपेरिमेंट) माना गया, क्योंकि इस व्यवस्था के द्वारा गुलामी प्रथा की समाप्ति के बाद औपनिवेशिक सत्ता के हित में मजदूरों, श्रमिकों, कामगारों की पूर्ति को बनाए रखने के लिए सफलतापूर्वक वर्षों तक चलाया गया। अनुबंध व्यवस्था के कारण भारत, चीन, अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया से विभिन्न श्रम-आयातकर्ता कालोनियों के लिए बड़े पैमाने पर श्रमिक प्रवासित हुए। मारिशस इस प्रणाली में अग्रणी देश था, अन्य ब्रिटिश, फ्रांसीसी तथा डच कालोनियों द्वारा बाद में इस प्रणाली को अपनाया गया । औपबंधिक श्रम प्रणाली (इंडेंचर लेबर सिस्‍टम) का स्वरूप संविदात्मक होने के साथ ही वैधानिक भी था। कार्टर के अनुसार अनुबंधित प्रवासी वह व्‍यक्‍ति है, जिसने बागानों तक आवागमन पर हुए व्‍यय को स्वयं वहन नहीं किया है। एक बार अनुबंधित कर लिए जाने पर व्‍यक्‍ति के अनुबंध की अवधि में उसकी मजदूरी दर, कार्य के घंटे, कार्य की प्रकृति, भोजन, आवास और चिकित्‍सा आदि के संबंध में निर्धारित नियमों के अनुसार व्‍यवस्‍था की जाती थी। इस व्‍यवस्‍था के अनुसार मालिकों और कामगारों के बीच का संबंध अधिनियमों के तहत संचालित होता था। इस प्रकार के अधिनियम कमोबेश सभी उपनिवेशों में लागू थे। अनपढ़ भारतीय अनुबंधित श्रमिकों के लिए यह एक अबूझ पहेली की तरह था, जिसमें वे अरकाटियों के बहलावे-फुसलावे में आकर फँस जाते थे। यूरोपीय बागान मालिकों (प्‍लांटर) के मनःस्थिति गुलामी प्रथा से जुड़ी होने के कारण अनुबंधित भारतीय श्रमिकों को गुलाम मजदूरों के विकल्‍प के रूप में ही माना जाता रहा और इसी कारण इनके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया जाता रहा। इसी आधार पर लार्ड रसेल ने अपने संसदीय भाषण में इस प्रणाली को 'गुलामी की एक नवीन व्‍यवस्‍था' के रूप में चिह्नित किया था।

वर्ष 1838 से लेकर वर्ष 1917 तक लाखों भारतीय पुरुषों, महिलाओं को शर्तबंदी मजदूर बनाकर मॉरीशस, फिजी, त्रिनिदाद, जमैका, ब्रिटिश गयाना, डच गयाना, फ़्रेंच गयाना इत्यादि उपनिवेशों में भेजा गया। इन उपनिवेशों में गन्‍ना, कॉफी, कपास, कोको, चावल के कुछ सम्मिलित कृषि केंद्र (प्लांटेशन) बचे थे, जिन्हें बचाने के लिए कुशल कृषि श्रमिकों की आवश्यकता थी। अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवादी गरीब भारतीय कृषि श्रमिकों को अच्छी जीविका और बेहतर रोजगार के अवसर का लोभ देकर अपने उपनिवेशों में 'गिरमिटिया (अनुबंधित श्रमिक) बनाकर भेजने लगे। इस काल में मानव-श्रमिकों का कच्‍चे माल की तरह व्यवसाय किया गया। भारतीय श्रमिकों के निर्यात के लिए डच एजेंटों ने कलकत्ता में अपना मुख्य केंद्र खोला। श्रमिकों की भरती के लिए अंग्रेजों ने गोरखपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, बस्ती और मथुरा में उपकेंद्र खोले। विश्‍व की अलग-अलग कालोनियों के लिए अलग-अलग भरती केंद्र थे। दूर-दूर से मजदूरों को खोजकर लाने के लिए 'सब एजेंट' बनाए गए। इन सब एजेंट के अंर्तगत अरकाटी (दलाल) काम करते थे। अरकाटी सीधे-सादे ग्रामीण लोगों को समझा-बुझाकर, छल-बल, धोखाधड़ी, डरा-धमका और फुसलाकर भरती करने लगे। इन दलालों को एक आदमी के लिए पाँच रुपये और एक महिला के लिए इससे भी अधिक कमीशन मिलता था।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने गिरमिटिया श्रमिकों की पीड़ा एवं भारतभूमि द्वारा अपनों के बिछुड़ने की व्यथा को "किसान" शीर्षक कविता के माध्यम से निम्नवत व्यक्त किया है :

एक जन ने त्रिवेणी-तीर पर मुझसे कहा -
तरस मुझको आ रहा है देखकर
तुमको अहा!
तुम दुखी-से दीखते हो, क्या तुम्हें
कुछ कष्ट है?
कठिन है निर्वाह भी, यह देश ऐसा
नष्ट है!
किंतु अब चिंता नहीं, तुम पर हुई प्रभु की दया
आज लो बस, आज ही दिन फिरे, दुःख मिट गया।
वस्त्र-भोजन और पंद्रह का महीना,
धाम भी;
काम भी ऐसा कि जिसमें नाम भी, आराम भी।
सैर सागर की करोगे दृश्य देख
नए नए,
जानते हो पुरी को? द्वारिका भी हो गए?
यह बहू है? ठीक है बस, भाग्य ने अवसर दिया,
याद भी मुझको करोगे, था किसी ने हित किया?
मैं चकित सा रह गया, यह मनुज है या देवता;
पर लगा पीछे मुझे उस अरकाटी का पता!
सावधान! स्वदेशवासी, हाँ! तुम्हारे
देश में
घूमते हैं दुष्ट दानव मानव के
भेष में!
इसके अगले भाग फिजी में वह लिखते हैं :
अधम अरकाटी कहता था - फीजी स्वर्ग है भू पर,
नभ के नीचे रहकर भी वह पहुँच गया है ऊपर!
मैं कहता हूँ फीजी स्वर्ग है तो फिर नरक कहाँ है?
नरक कहीं हो किंतु नरक से बढ़कर दशा यहाँ है।

इस अधम अरकाटी को औपनिवेशिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण माना जाता था, जिसका चित्रण एक हिंदी उपन्यास में निम्नवत किया गया है :

"...क्या ऐसा भी कोई आदमी इलाके में है जो दरोगा जी से न डरता हो? ऐसे आदमी अगर कोई हैं तो तो कुली डिपो के नौकर हैं। भर्ती वाले साहब के जोर पर वे पुलिस से बिलकुल नहीं डरते हैं। रहमान कई दफे थाने के सामने से गाता चला गया। यह बतला देना ठीक होगा कि भर्ती का नौकर अकेला रहमान है। लेकिन नाटा और जगरोपन यों छिप-छिपकर काम करते हैं, औरतों को फँसा-फँसाकर लाते हैं... बढ़हलगंज में जब गाँव भर की औरतों को देखते देखते कुली डिपो के आदमी ने धनरजिया को जबरदस्ती स्टीमर पर चढ़ा लिया था।"

ठीक इसी प्रकार का अनुभव 1898 ई। में सूरीनाम गए मुंशी रहमान खान को भी हुआ :

"बाजार की घड़ी में अभी तो सात ही बजे थे। देखकर जरा उसी पुल पर खड़ा होकर नहर का तमाशा देखने लगा कि इतने में दो इस्‍लामी सूरत, शैतान की मूरत, पैसे की जरूरत वाले मेरे पास आए। मैंने उनको शरीफ और दाता-इन्‍साफ जानकर सलावालेकुम किया। क्‍योंकि ये दोनों हजरत खूब साफ और उमदा पोशाक पहने और अपना ढाँचा बढ़ाया हुए थे। उन्‍होंने भी मेरे सलाम का जबाब देकर मुझसे पूछा कि क्‍यों जी आप कहाँ से आते हैं। मैने कहा कि परेट की सराय से आता हूँ। फिर पूछा कहा जावोगे। मैंने पूछा आठ बजे की रेलगाड़ी पर चाँदपुर जाऊँगा। तब उन्‍होंने अपने दिल में सोचा कि अब इस चिड़िया को अपने जाल में फँसाना चाहिए। जबाब दिया कि अजी साहब अब तो रेलगाड़ी 12 बजे खुलती है, क्‍योंकि रेलगाड़ी की टेम (वक्‍त) बदल गई। ऐसा कलाम मैंने उन पाजियों से सुनकर मैंने अपने दिल में कहा कि ये लोग शहर के रहने वाले हैं इन्‍हें और जियादह मालूम है। मैं वही ठहर गया और दिल में कहा कि चलूँ बाजार की सैर कर लूँ। कुछ थोड़ा सा नास्‍ता भी कर लूँ। अभी वक्‍त बाकी है। इसी सोच-विचार में था कि उन्‍होंने फिर पूछा कि क्‍यों साहब आप नौकरी करेंगे। मैने कहा किसकी नौकरी है। उन्‍होंने कहा सरकारी नौकरी है। फिर मुझसे पूछा कि आप पढ़-लिखे हैं। मैंने कहा, जी हाँ मिडिल पास हूँ। तब वे खुश होकर बोले कि तब तो तुम सर्दार होगे। और तनख्‍वाह भी तुमको बारह आने रोज मिलेगी। शक्‍कर का काम है। वहाँ मजदूरी से काम करना और सरकारी जहाज पर सरकारी खर्चे से आना और जाना पड़ेगा। जहाज यहाँ से तीन महीने में पहुँचता है। अगर तुमको तनख्‍वाह के बारे में कुछ शक है तो चलो हम सरकार में रजिस्‍टर करा दें और चलो मजदूरों को भी दिखा दें कि जिन पर तुम सरदार रहोगे और आज से ही तुमको सरकार की तरफ से खाने का खर्चा मिलेगा... ऐसी चिकनी-चुपड़ी बातों को सुनकर मेरा दिल बाग हो गया... फंदे में फँस गया... चलो मन कुछ रोज इस नौकरी को कर के देख लिया जावे... चलिए मैं पहले देख लूँ। ये सब बातें मैने मंजूर की और डीपू में रहने लगा।'' (गौतम :1999)

उन्नीसवीं शताब्दी में बड़ी संख्या में स्त्री एवं पुरुषों ने उन देशों में कुली के रूप में कार्य करने के लिए भारत को छोड़ कर प्रस्थान किया। इन लोगों के इस प्रकार के निष्क्रमण के कारण जीवन का एक नया प्रतिमान एवं उससे जुड़े साहित्यिक संवेदना का उभार हुआ, जिसे कुलीवृत्ति (तोराबुली, 2002) के नाम से जाना जाने लगा है। भारतीय डायस्पोरा से संबंधित विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेजों, कविताओं एवं अन्य कथा साहित्य के अनुशीलन से कुलीवृत्ति उन जीवित अनुभवों का एक समग्र विवरण प्रस्तुत करने का आधार प्रस्तुत करती है, जिससे त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम, गेदेल्यूप, मार्टीनीक्यू, मॉरीशस, रीयूनियन, फीजी, एवं दक्षिण अफ्रीका के प्रवासी भारतीय समूह कुली के रूप में रूपांतरित हुए। इससे भी महत्वपूर्ण इस में एक प्रयास हुआ है कि इसमें इन समुदायों के उत्तर औपनिवेशिक पहचान में कुली लोगों के सांस्कृतिक एकीकरण एवं अंतर-मिश्रण के लिए एक फ्रेमवर्क प्रस्तुत किया है।

इन डायस्पोरा प्रवासियों के वंशजों ने आज अपना एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान निर्मित करने में सफलता प्राप्त की है, जो इन लोगों की मूल सांस्कृतिक तत्वों के संरक्षण के साथ ही अधिकांश स्थितियों में इनके विस्तार एवं विकास का प्रयास भी प्रदर्शित करता है। इनकी सांस्कृतिक आदतों एवं व्यवहारों का क्रिओलीकृत संस्करण इन लोगों के संपर्क में आए अन्य प्रवासी एवं स्थानीय नृजातीय समूहों के सापेक्ष उद्विकसित एवं परिवर्धित हुआ है। डायस्पोरा संस्कृति का विकास निश्चित तौर संस्कृति के एकीकृत और समांगीकृत मान्यताओं एवं वैचारिकी पर प्रश्न उठाता है, और डायस्पोरा पहचान से जुड़ी संकर विशिष्टताओं के प्रति सकारात्मक सोच अपनाने का अवसर प्रदान करता है। कुलीवृत्ति की अवधारणा प्रथम पीढ़ी के गिरमिटिया मजदूरों के अनुभवों को समेकित रूप से कैरेबियाई, प्रशांत एवं हिंद महासागर क्षेत्र में फैले उनकी वर्तमान पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए किया जा रहा है। इस शब्द का प्रतीकात्मक महत्व कुली जीवन अनुभव से जुड़ी विशिष्टताओं की व्याख्या एवं साथ ही पारस्परिक तुलना के एक औजार के तौर पर किया जा रहा है। सभी कुली चाहे वे फीजी, दक्षिण अफ्रीका, वेस्ट इंडीज, अथवा हिंद महासागर के द्वीपों में गए हों, वे सभी भारतभूमि को छोड़कर एक प्रकार के वनवास पर ही निकले थे, कुलीवृत्ति उनके इसी साझी ऐतिहासिक विरासत को महत्व प्रदान करता है।

कुलीवृत्ति की मूल संवेदना को समझने के लिए कुली लोगों के समुद्री यात्रा के वृत्तांत से गुजरना आवश्यक है। कुली ओडिसी से जुड़े निर्णायक अनुभव ने कुलीवृत्ति के काल्पनिक भू-परिदृश्य पर एक अमिट छाप अंकित किया है इन डायस्पोरा प्रवासियों के वंशजों ने आज अपना एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान निर्मित करने में सफलता प्राप्त की है, जो इन लोगों की मूल सांस्कृतिक तत्वों के संरक्षण के साथ ही अधिकांश स्थितियों में इनके विस्तार एवं विकास का प्रयास भी प्रदर्शित करता है। इनकी सांस्कृतिक आदतों एवं व्यवहारों का क्रिओलीकृत संस्करण इन लोगों के संपर्क में आए अन्य प्रवासी एवं स्थानीय नृजातीय समूहों के सापेक्ष उद्विकसित एवं परिवर्धित हुआ है। डायस्पोरा संस्कृति का विकास निश्चित तौर संस्कृति के एकीकृत और समांगीकृत मान्यताओं एवं वैचारिकी पर प्रश्न उठाता है, और डायस्पोरा पहचान से जड़ी संकर विशिष्टताओं के प्रति सकारात्मक सोच उभारने का अवसर प्रदान करता है।

जैसे ही प्रस्थान का समय नजदीक आने लगता है, समुद्र यात्रा से जुड़ी पहली वर्जना का तोड़ा जाना आवश्यक हो जाता है। जो हिंदू समुद्र पार कर लेते थे, हुगली के लोगों में शामिल हो जाते थे, और इस प्रकार गंगा के पवित्र जल से अलग हो जाते थे। वे अभिशप्त होकर पुनर्जन्म की किसी संभावना के न होने की स्थिति का सामना करते हुए भटकते रहते हैं। इसी स्थिति को भाँपकर इन प्रवासियों के अनुष्ठानिक प्रयोग के लिए अंग्रेजों द्वारा गंगाजल के बड़े हंडे जहाज पर लदवाए जाते थे। इस प्रकार धोखा देने वाले इन लोगों ने अनिच्छुक यात्रियों को समुद्र पार करने के बाद भी अपनी आत्मा पर विश्वास बनाए रखने के लिए एक छलावा तैयार कर लिया था। अधिकांश स्थितियों में यह पहला अवसर होता था था, जब इन कुली लोगों में से अधिकांश ने पहली बार समुद्र के दर्शन किए थे और अपने पारंपरिक जीवन से दूर किसी अज्ञात दुनिया की ओर धकेले जा रहे थे। जैसे ही कुली जहाज से उतरते थे, उनकी पीड़ादायक यात्रा का अंत होता था, जहाज का कप्तान जल्दी में इन नवागंतुक लोगों के नाम वाले रजिस्टर के पन्नों को फाड़कर अलग करता था, ये पन्ने धातु की एक क्लिप indented metal clips से बांधे जाते थे, इसी कारण इन प्रवासी श्रमिकों को इंडेंचर लेबर नाम से जाना गया। ये फटे पन्ने इन प्रवासी कुली लोगों की भारतीय पैतृकता से जुड़े गहरे जख्म की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति होने के साथ ही उनकी पहचान एवं भाषा को भी रेखांकित करते हैं।

प्रवासी भारतीयों की पीड़ा, उनका क्रंदन, उनका आक्रोश, उनकी त्रासदी आदि को व्‍यक्‍त करने के लिए उस समय में लोकगीतों का सहारा लिया जाता था। फीजी में प्रचलित एक लोक गीत में यह अनुभव को निम्नलिखित रूप में अभिव्यक्त हुआ है :

फिरंगिया के रजुवा में छूटा मोरा देसुआ हो,
गोरी सरकार चली चाल रे बिदेसिया...
भोली हमें देख अरकाटी भरमाए हो,
कलकत्ता पार जाओ पाँच साल रे बिदेसिया।
डिपुआ मा लाय पकरायो कगदुआ हो,
अँगूठवा लगाए देल हार रे बिदेसिया।
पाल के जहजुआ मा रोई-धोई बैठी हो,
कैसे होई कालापानी पार रे बिदेसिया...
काली कोठरिया मा बीते नहिं रतिया हो,
कैसे बताए हम पीर रे बिदेसिया।

साहित्य सृजन एवं लेखन में भारतीय श्रमिकों के तथ्यात्मक विवरणों की प्रभावी भूमिका रही है। इन डायस्पोरा प्रवासियों के वंशजों ने आज अपना एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान निर्मित करने में सफलता प्राप्त की है, जो इन लोगों की मूल सांस्कृतिक तत्वों के संरक्षण के साथ ही अधिकांश स्थितियों में इनके विस्तार एवं विकास का प्रयास भी प्रदर्शित करता है। इनकी सांस्कृतिक आदतों एवं व्यवहारों का क्रिओलीकृत संस्करण इन लोगों के संपर्क में आए अन्य प्रवासी एवं स्थानीय नृजातीय समूहों के सापेक्ष उद्विकसित एवं परिवर्धित हुआ है। डायस्पोरा संस्कृति का विकास निश्चित तौर संस्कृति के एकीकृत और समांगीकृत मान्यताओं एवं वैचारिकी पर प्रश्न उठाता है, और डायस्पोरा पहचान से जड़ी संकर विशिष्टताओं के प्रति सकारात्मक सोच उभारने का अवसर भी प्रदान करता है। भारतीय गिरमिटिया डायस्पोरा का जीवन अनुभव अब विभिन्न भाषाओं में भी साहित्यिक अभिव्यक्ति प्राप्त कर रहा है, जो उसकी भारतीय विशेषता के साथ ही उसके पूर्ण जीवन यात्रा वृत्त का भी प्रस्तुतिकरण है :

The Many-faced Recruit
I am a chamar from the plains of the Ganges Pallan Palli
Already a slave from Canara
At Andhra I struggled under the yoke of Misirdar Tiourel
Ready to leave the brunt earth of Meerut
I declared myself an adventurer, thirsty for gold of the colonies
To be consumed among the canes of Saint Alary
I am the mutineer from the Sepoy Revolt
The vanquished Brahmin from the kingdom of Oudh.
(के. तोराबुली, Chair Corail, Fregments Coolies, पृष्ठ 53)

फीजी के औपनिवेशिक बागानों में कुंती पर हुए अत्याचार को हिंदी जगत के कवियों ने व्यक्त किया है:

सतियों का धर्म डिगाने को जब,
अन्यायियों ने कमर कसी।
जल अगम में कुंती कूद पड़ी,
पार बही मझधार नहीं।
अत्याचार की चक्की में,
पिस कर धरम नहीं छोड़ा।
हिंदूपन अपना खो बैठें,
भारत के वीर गँवार नहीं।
इस पतन का तो यत्न करो,
हर कुंती का जीवन सफल रहे।
बिना धरम धारण किए,
सच शांति का संचार नहीं।

इसी प्रकार, भारतीय-फीजीयन समुदाय के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक इतिहास के लिए 'डउका पुरान' का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण घटना है। पाँच सौ से अधिक पृष्ठों में प्रकाशित यह पुस्तक प्रशांत द्वीपों में देशज भाषा में लिखित साहित्य में सबसे लंबे गद्य खंड के तौर पर माना जा सकता है। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अंग्रेजी साहित्य के विद्वान सुब्रमनी (2001) ने फीजी-हिंदी में फीजी भारतवंशियों के जीवन अनुभव को सर्जनात्मक आकार प्रदान किया।

'हम बोला बाबू से ई तो बड़ा अच्छा बात है की डउकन कै इतिहास मा सामिल करा जाय। सबन कै जगहा होयक चाही देस के इतिहास मा, चाहे डउकन होय या लाकुडू लफाड़ी। अउर ना भूलियो ओझन अउर तउकिन। कै मन्नेमन हंसा हम, 'अब तो तोहार इतिहास होइ जाई डामा डोल। ऊबड़-खाबड़' ...डउका पुरान मा खाली गोबरे थोरे है। तो का है? नदी, परबत, चान्दनी रात, सादी बिआह, महा तीरथ, अउर एक अउरत जेकर नाम है पिंगला।' (पृष्ठ संख्या 6)

एक टेम रहा जब कोई बाहेर से आवे, सीधे जाय मुरगन सरदार कै हिंया। सरदार मुखिया रहे गाँव कै। घर दुवार सब अच्छा रहा। बड़ा टिन कै घर। लड़कन साथ रहत रहिन। तीन लड़कन - केसवा, माधवा, कमलेस - अउर एक लड़की रागिनी। ...ऊ टेम घिसिआवन कै बाप एक छोटा फूसेक घरवाम रहत रहा। खेती करै अरहर अउर मकईक। अउरतिया चक्की पीसे, बेचे भूजा अउर सतुआ। ...धान कै बोआई एक रकम कै तेउहार रहै। ...रागिनी इंडियास लउट कै उधरे सूबाम काम करे लगी, अउर कमलेस असटेलिया मां गेंद खेलत खेलत वहीं रहे लगा।

पुरखों की बोली-बानी को सँजोए रखने की जद्दोजहद का उदाहरण डउका पुरान के एक संवाद से और स्पष्ट होता है :

'तो तू सबन कै सामने हिंदी काहें झोंकत रहेव, कोई ना देखे तो हाँको'

'अरे हिंदी मा बात करिब तो साला इंगलिस कइसे इमपुररूब होई'।

इस प्रणाली का विरोध इसके आरंभ के साथ ही शुरू हो गया, लेकिन भारतीय लोक मानस में इस अमानवीय प्रथा के प्रति जागरूक करने में औपनिवेशिक भारत के हिंदी प्रिंट मीडिया की एक प्रमुख भूमिका रही। तोताराम सनाढ्य के शब्दों में "...प्रत्येक भारतवासी का यह कर्तव्य है कि इस प्रथा के विरुद्ध आंदोलन में सहायता करे... कई जगह ऐसा हुआ कि कुली-प्रथा के विरुद्ध व्याख्यान देने का प्रबंध किया गया, पर अरकाटियों के बहकाने से लोगों ने इस कार्य को राजद्रोहपूर्ण समझकर व्याख्यान करने के लिए अपना स्थान ही नहीं दिया... हिंदी समाचार-पत्रों में भारत-मित्र और अंग्रेजी पत्रों में मॉडर्न रिव्यू को छोड़कर ऐसे बहुत कम समाचार-पत्र हमारे देखने में आए हैं, जिन्होंने इस ओर विशेष ध्यान दिया हो...।" गांधीजी के अनुसार सन् 1917 की इकतीसवीं जुलाई के पहले गिरमिट प्रथा बंद होने की सरकारी घोषणा हुई। सन् 1894 में इस प्रथा का विरोध करने वाला पहला प्रार्थना पत्र उन्होंने तैयार किया था और यह आशा रखी थी कि किसी दिन यह 'अर्ध-गुलामी' अवश्य रद्द होगी। 1894 से शुरू किए गए इस प्रयत्न में बहुतों की सहायता थी। अंततः 1917 में इस अमानवीय प्रथा का अंत हुआ। गिरमिटिया व्यवस्था की समाप्ति पर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त धन्यवाद देते हुए लिखते हैं :

समझी भारत सरकार अंत में बातें।
निज कुली प्रथा के साथ यहाँ की घातें।
बड़े लाट हर्डिंग-भला हो उनका,
सह सके ना लगना न्याय दंड में
घुन का!
थी तीन नरों में जहाँ एक नारी,
टूटी आखिर वह कुली-प्रथा व्यभिचारी।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारतीय डायस्पोरा की भौगोलिक रूप से विस्तीर्ण जनसंख्या के मध्य गिरमिटिया अनुभव से जुड़े आख्यान लोक मानस एवं चेतना में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत के रूप में संचित है और यही साझी विरासत भारतीयता एवं भारतीय जीवन शैली के एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में फल-फूल रहा है।

संदर्भ :

• गौतम मोहनकांत (2015) "कैरेबियन देशों में हिंदी भाषा और समाज", बहुवचन, अंक 46, जुलाई-सितंबर, 2015

• अवस्थी, पुष्पिता (2014) "सूरीनाम का सृजनात्मक साहित्य", साहित्य अकादमी, नई दिल्ली

• मिश्र विजय (2007) "द लिटरेचर ऑफ द इंडियन डायस्पोरा : थ्योराइजिंग द डायस्पोरिक इमेजनरी", रुटलेज पब्लिशिंग

• सुब्रमनी (2001) "डउका पुरान", स्टार पब्लिकेशंस, नई दिल्ली

• ह्यू टिंकर (1974) "ए न्यू सिस्टम ऑफ स्लेवरी : द एक्सपोर्ट ऑफ इंडियन लेबर ओवरसीज, 1830-1920", ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, लंदन।

• तोराबुली, खल एवं मरीना कार्टर (2002) "कुलीट्यूड : एन एंथालोजी ऑफ द इंडियन लेबर डायस्पोरा" एंथम प्रेस

• अर्जुन अप्पादोराई (1996)। "मोडर्निटी एट लार्ज : कल्चरल डाइमेंशन ऑफ ग्लोबलाइजेशन"। यूनिवर्सिटी ऑफ मिनासोटा प्रेस।


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हिंदी समय में राजीव रंजन राय की रचनाएँ