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विमर्श

राजनीति में गुम होती साहित्यिकता
सोनम सिंह


'दूसरी परंपरा की खोज' पुस्तक प्रकाशित होने के साथ ही विवादों से घिर गई। पुस्तक के पक्ष तथा विपक्ष में दो गुट बन गए। इन सबके बीच इस किताब में जो मूल प्रश्न उठाए गए थे वह कहीं दब कर रह गए। कुछ विद्वानों ने दूसरी परंपरा का संवाहक कह कर इसकी प्रशंसा तो की, पर इसे साहित्य में वह स्थान न मिल सका जो इसे मिलना चाहिए था। लोकोन्मुखी परंपरा, प्रगतिशील परंपरा, अतीत को जाँचने-परखने की नवीन मौलिक दृष्टि की खोज करने का सार्थक प्रयास तो इस पुस्तक में किया ही गया है, निःसंदेह यह सभी बिंदु 'दूसरी परंपरा की खोज' पुस्तक की उपलब्धि हैं या यों कहें कि इसकी ताकत हैं, किंतु इन सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं के इतर एक और महत्वपूर्ण सवाल भी इस पुस्तक में उठाया गया है। डॉ. नामवर सिंह पुस्तक की भूमिका में कहते हैं -

"शायद यह स्पष्ट करना जरूरी हो कि यह प्रयास परंपरा की खोज का ही है, सम्प्रदाय-निर्माण का नहीं।"1

डॉ. नामवर सिंह पुस्तक की भूमिका में ही जोर देकर इस बात को स्पष्ट करते हैं। इसका यह अर्थ है कि कहीं न कहीं वह सशंकित थे कि कहीँ यह पुस्तक साहित्यिक राजनीति मात्र बनकर न रह जाए और कहीं न कहीं द्विवेदी जी के व्यक्तिगत जीवन से जुड़े कुछ विशेष प्रसंगों को अपनी पुस्तक में स्थान देकर वह इन प्रसंगों के माध्यम से साहित्य की किसी विशेष विचारधारा की ओर संकेत करना चाहते हैं न कि द्विवेदी जी को हिंदी साहित्य में स्थापित करना या उन्हें श्रेष्ठ घोषित करना। यदि नामवर सिंह का उद्देश्य आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को साहित्य में स्थापित करना, उनकी विद्वता का बखान करना या उन्हें श्रेष्ठ घोषित करना होता तो, वह द्विवेदी जी के द्वारा रचित ग्रंथों का महिमामंडन करते हुए पुस्तक की रचना कर सकते थे, किंतु उन्होंने द्विवेदी जी के उन्हीं विचारों का उल्लेख पुस्तक में किया है जो भारतीय परंपरा तथा साहित्य को समझने में सहायक हैं। नामवर सिंह कहते हैं -

"इसमें न पंडित जी की कृतियों की आलोचना है, न मूल्यांकन का प्रयास।" 2

'ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत' नामक अध्याय में नामवर सिंह ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' को लिखे पत्र का उल्लेख किया है -

"काशी से कुछ ऐसे पत्र आए हैं और अब भी आ रहे हैं जो बहुत घृणास्पद है। 'घृणास्पद' शब्द मैं बड़ी व्यथा के कारण व्यवहार कर रहा हूँ। इनके लिखने वालों में कहीं कोई मनुष्योचित भाव है ही नहीं। केवल निरुत्साहित करना, धमकी देना, अखबारी कतरनें भेजना, गाली गलौज करना यह क्या साहित्यिक है?"3

उपर्युक्त पंक्तियाँ संकीर्ण मानसिकता वाले साहित्यिक जनों की विशिष्टता को व्यक्त कर रही हैं। साहित्य का उद्देश्य सुंदर को और सुंदर बनाना है, रागात्मक वृत्ति का विस्तार करना है, न कि ईर्ष्या, द्वेष तथा साहित्य के नाम पर अपना स्वार्थ सिद्ध करना। जब आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आचार्य पद पर कार्यरत हुए तब भी उन्हें कुछ विशिष्ट प्रकार के साहित्यिक जनों के विरोध का सामना करना पड़ा। उन पर यह आरोप लगाया गया कि आचार्य शुक्ल विरोधी हैं और हिंदी विभाग से शुक्ल जी की परंपरा को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। निश्चय ही आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आचार्य शुक्ल की कुछ मान्यताओं का खंडन किया था, किंतु यदि कोई साहित्यकार किसी दूसरे साहित्यकार की मान्यता का खंडन करता है तो इसका यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि उनमें व्यक्तिगत मतभेद है या ईर्ष्यावश कोई किसी की मान्यताओं या विचारों का खंडन कर रहा है। साहित्य भावनात्मक, वैचारिक, संवेदनात्मक क्षेत्र है। विचारों से सहमति-असहमति, संघर्ष, टकराहट के माध्यम से ही जो श्रेष्ठ है, जो सृजनात्मक है वह निकलकर बाहर आएगा, किंतु यदि विचारों में मतभेद आदि को व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि से जोड़ कर देखा जाने लगेगा तो साहित्य भावनाओं का व्यापार बनकर रह जाएगा, जो मात्र नफा-नुकसान के पैमाने तक सिमट कर रह जाएगा। आचार्य द्विवेदी जी के मन में आचार्य शुक्ल जी के प्रति घृणा का भाव या अश्रद्धा नहीं थी। उनकी श्रद्धा का प्रमाण स्वयं 'हिंदी साहित्य की भूमिका' का यह वाक्य है -

"भारतीय काव्यालोचन शास्त्र का इतना गंभीर और स्वतंत्र विचारक हिंदी में तो दूसरा हुआ ही नहीं, अन्यान्य भारतीय भाषाओं में भी हुआ है या नहीं, ठीक नहीं कह सकते। शायद नहीं हुआ।"4

द्विवेदी जी पर शुक्ल जी को लेकर जो भी आरोप लगाए जा रहे थे वह अपनी स्वार्थ सिद्धि तथा साहित्यिक राजनीति के तहत लगाए जा रहे थे। इसे स्पष्ट करते हुए नामवर सिंह ने टिप्पणी की है -

" फिर भी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में द्विवेदी जी को यदि शुक्ल-विरोधी के रूप में प्रचारित किया जा रहा था, तो मानना पड़ेगा कि विरोधियों का शुक्ल-पक्ष, अपनी घोषणा के बावजूद कुछ और था। काशी का यह शुक्ल पक्ष वस्तुतः आचार्य शुक्ल का कृष्ण पक्ष था, घोर दकियानूसी हथियारों को छिपाने के लिए आचार्य शुक्ल के उज्ज्वल नाम की नकाब।"5

नामवर सिंह की उपर्युक्त टिप्पणी इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि किस प्रकार साहित्य अपने उद्देश्य से भटक कर स्वार्थ सिद्धि, आरोप-प्रत्यारोप तक सिमट कर रह जाता है। इस साहित्यिक खेमेबंदी, गुटबंदी के चलते साहित्यिक उद्देश्य धरा रह जाता है। साहित्य की इसी संकीर्णता पर व्यंग्य करते हुए नामवर सिंह अपनी पुस्तक 'वाद विवाद संवाद' में लिखते हैं -

"मार्क्सवादी लोग पाठ्यक्रम बदलने की माँग बहुत करते हैं, कर लिया शामिल पाठ्यक्रम में मार्क्सवादी आलोचना को भी। आएँ बदले हिंदी साहित्य को! बाहरी विरोध व्यवस्था में समाहित! अंदर आने के बाद मार्क्सवादी हिंदी साहित्य को भी बदलना भूल गया है और उस समाज को भी जिसे बदलने के लिए इतना प्रतिश्रुत रहता है। यह है हिंदी विभाग के बहुलतावाद का चमत्कार। यहाँ हर वाद के लिए जगह है, लेकिन हर वाद अपनी जगह पर।"6

'दूसरी परंपरा की खोज' में भी नामवर सिंह द्विवेदी जी के माध्यम से इसी विचारधारा की ओर संकेत करना चाहते हैं कि किस तरह यथास्थितिवादी, रूढ़िवादी विचारधारा के लोग किसी नवीन विचारधारा का विरोध करते हैं तथा किस तरह कोई नवीन विचार जो वैचारिक दृष्टि से कुछ नया, क्रांतिकारी, सकारात्मक परिवर्तन की अलख लिए रहता है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए तथा जो विमर्श के योग्य होता है, राजनितिक पचड़ेबाजी में फँसकर विरोध-प्रतिरोध तक ही सिमट कर रह जाता है।

'दूसरी परंपरा की खोज' पुस्तक प्रकाशित होने के बाद ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल बनाम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, तुलसीदास बनाम कबीर, रामविलास शर्मा बनाम नामवर सिंह तक सीमित होकर रह गई। 'बनाम' की राजनीति इस पर हावी हो गई। इस 'बनाम' की राजनीति पर विचार करते हुए डॉ. निर्मला जैन कहती हैं -

" इसे हिंदी के दो आलोचकों की टकराहट का रूप देना मूल प्रश्न से मुँह चुराना है। अपने समय में जयशंकर प्रसाद ने भी कुछ ऐसे ही सवालों से जूझने की कोशिश की थी। पक्ष-विपक्ष से सहमति अलग बात है परंतु इस पूरे सवाल को जिस परिप्रेक्ष्य में उठाया गया है, उसे दो आचार्यों के बीच टकराहट का सवाल बनाकर उलझाने के बजाय उस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।"7

डॉ. नामवर सिंह द्विवेदी जी के माध्यम से यह दिखाना हैं कि किस तरह साहित्य में गुटबंदी होती है तथा साहित्य अपने मूल उद्देश्य से दूर चला जाता है। साहित्य में विचारों से सहमत न होना, मतों का खंडन आदि वैचारिक स्तर पर होता है, इसे व्यक्तिगत राजनीति का रूप देना साहित्य के महत्व को कम करता है। आलोचना जब तक वैचारिक स्तर पर होती है तभी तक वह साहित्य है, किंतु जब आलोचना निजी स्तर पर, व्यक्तिगत स्तर पर होने लगती है तब वह साहित्य न रहकर संकीर्ण मानसिकता भर रह जाती है। नामवर सिंह ने द्विवेदी जी की दृष्टि को संतुलित दृष्टि कहा है। एक ऐसी दृष्टि जो न समन्वयवादी हो, न समझौतावादी हो, न अतिवादी हो, अपितु जो तमाम कटु आलोचनाओं की परवाह किए बगैर, पक्ष-विपक्ष का विचार किए बिना, व्यक्तिगत हित की चिंता से रहित होकर, जो कुछ भी सृजनात्मक है, श्रेष्ठ है, सत्य है, जिसमें सभी का हित समाहित हो उसकी खोज कर सके। नामवर सिंह पुस्तक में मात्र प्रगतिशील परंपरा, लोकोन्मुखी परंपरा की खोज ही नहीं करते, अपितु वह एक अन्य परंपरा की ओर संकेत भी करते हैं। एक ऐसी परंपरा जो साहित्य में सर्वजन हिताय की जगह स्वजन हिताय को महत्व दे रही थी। एक ऐसी परंपरा जो साहित्य की महत्ता पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर रही थी। एक ऐसी परंपरा जो साहित्य को राजनितिक रूप दे रही थी। तब यह महत्वपूर्ण है कि 'दूसरी परंपरा की खोज' पुस्तक में हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के व्यक्तिगत जीवन से जुड़े प्रसंगों को उठाकर नामवर सिंह ने जिस साहित्यिक गुटबाजी, खेमेबंदी, संकीर्ण मानसिकता की ओर संकेत किया है उससे सीख ली जाए तथा एक ऐसे साहित्यिक वातावरण का निर्माण किया जाए जो वाद-विवाद से व्यक्तिगत आलोचना तथा खेमेबंदी तक न पहुँचे, वह पहुँचे वाद-विवाद से संवाद तक।

संदर्भ

1- दूसरी परंपरा की खोज, नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2008,पृ. 8

2- वही, पृ. 7

3- वही, पृ. 30

4- वही, पृ. 37

5- वही, पृ. 37

6- वाद विवाद संवाद, नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चतुर्थ आवृत्ति 2011, पृ. 138

7- हिंदी आलोचना की बीसवीं सदी, निर्मला जैन, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 82


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