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आलोचना

वापसी मुमकिन नहीं : जलडमरूमध्यस
मनोज कुमार पांडेय


अखिलेश ऐसे कथाकार हैं जो अपनी कहानियों के लिए लंबा वक्‍त लेते रहे हैं। और इधर तो उन्‍होंने जितनी भी कहानियाँ लिखी हैं सब की सब लंबी कहानियाँ हैं। एक औपन्‍यासिकता लिए हुए। 'जलडमरूमध्‍य' उनकी लंबी कहानियों का प्रस्‍थान-बिंदु है। इसके पहले की उनकी कहानियाँ लंबाई में भले ही लंबी कहानियों जैसी रही हों पर उनमें वह तत्‍व अपेक्षाकृत कम थे जो कि उनकी बाद की कहानियों को उपन्‍यास के करीब ले जाकर खड़ा कर देते हैं। मतलब यह कि यह सिर्फ लंबाई का मामला नहीं हैं न सिर्फ यह बहुस्‍तरीयता का मसला है जो अखिलेश की कहानियों में पहले भी समाई रही है। यह एक संश्लिष्‍ट जीवन-दृष्टि का मसला तो है ही, साथ में यथार्थ को एक बड़े कालखंड में उठाने का भी मसला है जो कि 'जलडमरूमध्‍य' में आकर एक मुकम्‍मल आकार पाता है। अखिलेश के यहाँ पहले भी किसी किस्‍म के सपाट इकहरेपन का अभाव था पर 'जलडमरूमध्‍य' में और इसके बाद की कहानियों में यह संश्लिष्टता और भी घनीभूत होकर प्रकट होती है। किस्‍से कई-कई तरफ खुलते हुए। यथार्थ की कई-कई परतें जो जितना बाहर की तरफ खुलती हैं उतना ही भीतर - किसी एक केंद्रीय कथा सत्‍ता की तरफ भी। इस लिहाज से भी अखिलेश की कहानियों में 'जलडमरूमध्‍य' बेहद महत्‍वपूर्ण कहानी है पर इससे भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण यह इसलिए है क्‍योंकि यह उदारीकरण के बाद हमारे समाज में घटित हुए परिवर्तनों को उनकी छोटी-छोटी छायाओं तक के साथ पकड़ती है। इस कहानी में पिछले पचीस साल का यथार्थ सीधे-सीधे उपस्थित है और अपनी विशिष्‍ट संरचना की वजह से यह अपने पहले और बाद के समयों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करती है।

यह सहाय बाबू की अगली-पिछली पीढ़ियों की कहानी है। पर केंद्रीय रूप में यह सहाय बाबू की ही कहानी है। जो अपने समय में उनकी सामाजिक उपस्थिति, अपने समय में हस्‍तक्षेप की शक्ति के बावजूद उनकी तटस्‍थता और एक खास तरह की मोहक मूल्‍य संरचना से शुरू होती है तथा उनके नपुसंक शाप पर समाप्‍त होती है जिसमें वे यह कहते हैं कि ''मगर देखना जो कोई यह संपत्ति खरीदेगा नाश हो जाएगा उसका। तुम लोग - हाँ तुम लोग भी सुखी नहीं रह पाओगे। चिरैयाकोट से जो भी नाता तोड़ेगा, हमेशा दुख भोगेगा। दे देवताओं और देवी माताओं। तुम सब चिरैयाकोट के इन दुश्‍मनों को दंड देना...।'' सहाय बाबू से पूछने का मन होता है कि चिरैयाकोट इतना ही प्‍यारा था तो उसे छोड़कर गाँव जाने का क्‍या मतलब था। यह एक महत्‍वपूर्ण सवाल है जिसके बहाने सहाय जी के जीवन और उनकी रहस्‍यमय बीमारियों की पड़ताल की जा सकती है। यह सहाय बाबू के माध्‍यम से ऐसे लोगों की कहानी है जिन्‍हें लग रहा था कि समय उनकी मुट्ठी में है और उन्‍हें पता ही नहीं चल पाया कि समय कब उनकी मुट्ठी से फिसलता चला गया। और जब पता चला तो वे अचानक से एक अवसाद या जड़ता की स्थिति में पहुँच गए। वे अपने आत्‍ममुग्‍ध वैभव में इतने खोए रहे कि बदलते हुए समय पर उनकी निगाह नहीं गई और जब गई तो समय इतना बदल चुका था कि उससे पार पाने का कोई रास्‍ता उनके पास बचा ही नहीं था। और अगर कोई रास्‍ता था भी तो उस पर चलने का उन्‍हें को अभ्‍यास ही नहीं था।

सहाय बाबू के दिमाग में एक शहर है 'चिरैयाकोट' जिसमें वे रहते हैं और जहाँ वे बेहद सम्‍मानित व्‍यक्ति हैं। खूब पैसा बनाया है पर वे सिर्फ पैसे के पीछे ही नहीं भागते बल्कि कलात्‍मक अभिरुचियों से संपन्‍न व्‍यक्ति हैं। यहाँ तक कि ''उनके पास बेगम अख्‍तर नूरजहाँ और बड़े गुलाम अली खाँ के सारे रिकार्ड थे। इतना ही नहीं उन्‍होंने एक शायर एक सारंगीवादक और तीन रक्‍काशाओं जैसे कई हुनरमंदों की गाढ़े वक्‍त में खासी इमदाद भी की थी।'' और ''सभी संप्रदाय के लोगों के बीच उनका आत्‍मीयतापूर्ण आमदरफ्त था। जाने कितने मुसलमान भी उनके दोस्‍त थे।'' चिरैयाकोट के मध्‍यमर्गीय संसार में सहाय बाबू की उपस्थिति एक केंदीय हैसियत रखती थी। और वे इस शहर से प्‍यार भी करते हैं। देखें - ''जैसे उनको चिरैयाकोट का नशा था। दरअसल यह शहर उन की लीलाभूमि था। इसके जर्रे-जर्रे का स्‍पर्श उनके पैरों में था। उनके रंध्रों में यहाँ के वृक्षों की हवाएँ थी और आँखों में ढेर सारे अक्‍स। कितने सारे दोस्‍त और दुश्‍मन थे। कैसे इससे मुँह मोड़कर चले जाते वह?" पर अब वे इस शहर को छोड़कर जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्‍यों? कहानी में इसके कई संभावित जवाब हैं। और लगभग सभी जवाब 'चिरैयाकोट' की आबोहवा से जुड़ते हैं। सवाल यह है कि शहर के माहौल में घुलते जहर को वे भाँप कैसे नहीं पाए? इसीलिए वह उनके लिए इतना अचानक है कि यह सांप्रदायिक तनाव उनके संवेदनातत्‍व पर गहरा असर करता है। इसी के साथ-साथ उदारीकरण के पश्‍चात तेजी से घटित हो रहे अन्‍य बदलाव जैसे शहर में अचानक से दुकानों का बहुत बढ़ जाना भी उनकी चेतना पर नकरात्‍मक असर डालने हैं। ऐसा संभवतः इसीलिए होता है कि उनकी सारी दिख रही सक्रियता के बावजूद उनका अपने समकालीन यथार्थ से कोई नाता बचा ही नहीं है। वे एक गनोलोक में रह रहे हैं जो कि स्‍मृतियों और कुछ मासूम भ्रमों से बना हुआ है। उनके इस मनोलोक में जब यथार्थ अपने कटु रूप में प्रवेश करता है तो उनका सपनों जैसा सम्‍मोहन छिन्‍न-छिन्‍न हो जाता है और तब वे अपने पुश्‍तैनी गाँव लौटने का फैसला करने हैं।

पर फिर वही बात कि यह गाँव भी उनके मनोलोक में ही है। असली गाँव में वह पिछले कई सालों से नहीं गए। अपनी अकेली रह रही चाची की कोई खोज-खबर भी उन्‍होंने नहीं ली। बावजूद जब वह गाँव गए तो बेहद बूढ़ी और अपने जुझारूपन वाले व्‍यक्तित्‍व के बावजूद आखिरकार छिन्‍न-भिन्‍न चाची में कोई गर्मजोशी न पाकर अचंभित हैं। आखिर क्‍यों अचंभित होता चाहिए उन्‍हें? या बाद में चिन्‍मय के विचारों पर क्‍यों दुखी होता चाहिए उन्‍हें? क्‍या चिन्‍मय को दिल्‍ली में घर और कार के लिए वही चेक काटकर नहीं आए थे? जब सहाय बाबू खुद अपने तमाम महान मूल्‍यों के बावजूद चिरैयाकोट में रहकर भी कभी गाँव नहीं लौट पाए या कि गाँव से कोई जीवित संबंध नहीं रख पाए तो वे अपने बेटे चिन्‍मय से ऐसी उम्‍मीद भी कैसे कर सकते हैं कि वह गाँव या चिरैयाकोट लौटेगा कभी। तो अगर चिन्‍मय लौटेगा नहीं तो सहाय बाबू का इकलौता वारिस होने के नाते वह क्‍या करेगा? ठीक है कि चिन्‍मय की जल्‍दबाजी गलत है पर उसे समय का दबाव क्‍यों न माना जाय? आखिर पैसा बनाने का जो दबाव सहाय बाबू और उनके पिता पर रहा है वह चिन्‍मय पर क्‍यों न काम करे? और यह भी देखने की बात है कि उसके मन में सहाय जी की तरह गाँव की कोई स्‍मृति नहीं है तो जब संपन्‍न स्‍मृति के बावजूद खुद सहाय जी कभी गाँव वापस नहीं लौट पाए तो चिन्‍मय भला कैसे लौटेगा? क्‍या इस स्थिति के लिए चिन्‍मय ही पूरी तरह से दोषी है? क्‍या सहाय जी जो अपने को लगातार पीड़ित महसूस कर रहे हैं इसमें उनकी कोई गलती नहीं है?

जाहिर है कि सहाय जी उस वर्ग के प्रतिनिधि हैं जो यथार्थ से पूरी तरह से कटा हुआ है। अपने यथार्थ से कटे हुए विश्‍वासों पर वह खुद तो अमल करते हैं पर दूसरे भी उन पर अमल करें इस बात की कोई कोशिश वह पूरी कहानी या उससे भी परे अपने जीवन मे कहीं भी करते नहीं दिखाई पड़ते। किसी को भी अपने से सहमत करने के लिए वे किसी बहस में नहीं उतरते। वे चुप रहते हैं या फिर फैसला करते हैं। यहाँ तक कि अपनी पत्‍नी कौशल्‍या या बेटे चिन्‍मय तक को अपने से सहमत कर पाने की कोई कोशिश करते वे कभी नहीं दिखाई पड़ते। सवाल तो यह भी है कि चिन्‍मय के तौर-तरीकों या उसके लालची सपनों के लिए सहाय जी को भी क्‍यों न जिम्‍मेदार माना जाय। अगर उन्‍होंने उसकी परवरिश उसी रुपये-पैसे वाली भाषा में की है तो इसमें उसका क्‍या कसूर? आखिर अब वह कौन सी भाषा सीखे या बोले? कहानी यहाँ पर मध्‍य वर्ग की सब कुछ पैसे वाली नई पीढ़ी के इस हस्र के बारे में साफ संकेत करती है कि इसमें पुरानी पीढ़ी - जो कि अब छाती पीट रही है - भी कम उत्‍तरदायी नहीं है। कुछ ज्‍यादा ही रंगीन सपनों का यह पौधा उसी ने रोपा था जो कि अब एक छतनार वृक्ष में बदल गया है जिसके नीचे रोशनी की एक किरण भी नहीं आ रही है। चमक-दमक भरा एक भयानक अँधेरा है। इसके बावजूद यह भी ध्‍यान रखने की बात है कि चिन्‍मय और मनजीत के संबंध आपस मे कितने भी बुरे क्‍यों न हो पर वह सहाय जी और कौशल्‍या के संबंधों की तुलना में बहुत बेहतर हैं जहाँ पर कौशल्‍या सहाय जी की अनुगामिनी भर हैं।

कहानी में सहाय जी के पिता के बारे में सूचना है कि वे ''रजिस्‍ट्रार ऑफिस में बड़े बाबू थे और बेइंतिहा पैसा कमाते थे। कहा जाता है कि वह चिरैयाकोट के मोतीलाल नेहरू थे और सहाय जी जवाहरलाल नेहरू। जब सहाय जी लखनऊ में वकालत पढ़ने गए तो उनके पिता ने उन्‍हें मोटर खरीद कर दी थी। वहाँ वह शाम को दोस्‍तों को मोटर में बिठाकर हजरतगंज की सैर कराते थे। चिरैयाकोट के जवाहरलाल नेहरू स्‍वयं अच्‍छे वकील बने। वकालत के पेशे से उन्‍होंने काफी दौलत जुटाई थी।'' तो जब सहाय जी के पिता जी ने 'बेइंतिहा पैसा' बनाया था तो वह ईमानदारी से तो नहीं बनाया होगा। और खुद चिरैयाकोट के जवाहरलाल नेहरू सहायजी ने उत्‍पीड़ितों का मुकदमा लड़कर तो पैसा नहीं ही जुटाया होगा। और फिर जब उनका अपने गाँव से नाता तोड़कर चिरैयाकोट में रहना गलत नहीं था तो चिन्मय का दिल्‍ली में रहना और उसके आसपास प्रापर्टी आदि बनाने की बात करना गलत कैसे हो गया जिससे कि सहाय जी इतने दुखी हैं? यहाँ सहाय जी को नेहरूवियन मूल्‍यों के फेल्‍योर से भी जोड़कर देखा जा सकता है। अपनी जिन नीतियों को नेहरू ने आगे बढ़ाया बाद में उन्‍हीं के सामने वह असहाय कैसे हो गए? लोकविश्‍वास के अनुसार सहाय जी अपनी गरीब भाभी की मदद पतंग उड़ाते समय पतंग में पैसा बाँधकर करते थे। यह नेहरू के कबूतर उड़ाने जैसा ही प्रदर्शनप्रिय तरीका है। सहाय जी की शौकीनियों के जो किस्‍से कहानी में आए है वे भी उनकी समाजनिरपेक्ष उच्‍चमध्‍यवर्गीय छवि ही रचते हैं। और जब यही छवि उनके बेटे में ट्रांसफर हो जाती है तो वे कभी आँसुओं के सूखने की बीमारी से ग्रामित होते हैं तो कभी बात-बात पर रोने की।

दरअसल इस शानदार कहानी में एक छोटी सी दिक्‍कत है। वह यह कि इसमें सहाय जी का चरित्र जिस लेखकीय लगाव व तन्‍मयता से रचा गया है वैसा ही लगाव या वैसी ही तन्‍मयता चिन्मय और मनजीत के हिस्‍से नहीं आई। और यहीं से तमाम तरह की प्रचलित आलोचकीय आसानियाँ शुरू हो जाती हैं। जिनके शिकार इस कहानी पर लिखते हुए अनेक आलोचक हुए। जहाँ उन्‍होंने कहानी में शुरू से आखिर तक निहित रचनात्‍मक गवाहियों की अनदेखी की और इस तरह से उन्‍हें सहाय जी आदर्श लगने लगे और चिन्‍मय और मनजीत बुरे और उपभोक्‍तावादी विकृतियों के शिकार जो कि वे हैं भी पर सहाय बाबू और आदर्श...! जमीनी तौर पर देखें और खासकर सहाय जी और चिन्‍मय दोनों को उनके समय के संदर्भ में देखें तो दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं है। फर्क है तो बस समय का है या कि उसकी गति का है। जो चीजें या प्रवृत्तियाँ सहाय जी को विरासत में मिली थीं और जिन्हें सहाय जी ने आगे बढ़ाया, अब चिन्‍मय और मनजीत के समय में उन्‍होंने निर्णायक गति पकड़ ली है। चिन्‍मय और मनजीत शिकार ही हैं इस समय के पर मुश्किल यह रही कि कहानी में व्‍याप्‍त अन्‍य स्थितियों की अनदेखी करते हुए एक सपाट राह पर चलने के आदी अनेक आलोचकों ने उन्‍हें शिकारी समझ लिया और उनके साथ इसी तरह का बर्ताव किया। इस तरह इस तरह इस कहानी का यह पाठ निकला कि मध्‍यवर्ग की मूल्‍यों पर आधारित सुरुचिपूर्ण जिंदगी देखते ही देखते चिन्‍मय और मनजीत की भयानक उपभोक्‍तावादी दुनिया में बदल गई। आखिर क्‍या यह अचानक से हुआ कि नई आर्थिक नीतियों के लागू होते ही लोग रातोंरात बदल गए या कि इसकी पूर्वपीठिका बहुत-बहुत पहले से लिखी जा रही थी?

कहानी में स्‍मृतियाँ एक निर्णायक भूमिका में हैं। सहाय जी एक जमींदार घराने से आते हैं, उसकी स्‍मृतियाँ हैं। आसपास के लोगों के प्रजा होने की स्‍मृतियाँ हैं। चिरैयाकोट में ही नहीं गाँव में भी वैभव का एक साम्राज्‍य फैला हुआ है। पर क्‍या पूरे गाँव के लोग सहाय जी के परिवार की तरह ही वैभवशाली थे? अगर नहीं तो उदारीकृत भारत में और और बदहाल होते चले जाने के बाद अगर वे सिक्‍कों या किसी काल्‍पनिक खजाने की तलाश में सहाय जी का पूरा घर खोद डालते हैं तो यह सहज-स्‍वाभाविक भले ही न हो पर इस स्थिति को सहानुभूतिपूर्ण ढंग से समझना कोई कठिन काम भी नहीं है। पर सहाय जी की दिक्‍कत यह है कि वे अपने वैभव के जिस काल में जी रहे हैं उसमें उन्‍हें अपने आसपास के तेजी से बदल रहे यथार्थ की खबर ही नहीं होती। उन्होंने कभी खबर लेने की कोशिश भी नहीं की... अपनी चाची तक की नहीं जो नितांत अकेली एक विशाल और पुराली हवेली में प्रेत की तरह भटक रही थीं। तब फिर वह गाँव वालों की सुधि भला कहाँ से लेते या कि उनकी वास्‍तविक स्थिति की खबर उन्‍हें कैसे लगती? ऐसे ही चिरैयाकोट में बन रही दुकानें या बढ़ रही सांप्रदायिकता, सबसे वे अनजान ही बने रहते हैं। जबकि कहानी यह भी बताती है कि वे रमजान में मुसलमानों को रोजा अफ्तार की दावत भी दिया करते थे। और बेहद गर्मजोशी से ईद वगैरह मिलने भी जाया करते थे। पर कहानी यह भी बताती है कि यह गर्मजोशी कितनी ठंडी थी, कितनी सतही और औपचारिक थी, तभी वह शहर में पक रहे सांप्रदायिक तनाव को नहीं पकड़ पाए और जब यह तनाव अपनी पूरी क्रूरता और वीभत्‍सता के साथ घटित हुआ तो वे बुखार में बस दुःस्‍वप्‍न ही देखते रहे जबकी चिरैयाकोट में उनकी निर्णायक स्थिति को देखते हुए उस तनाव को दूर करने में उनकी एक सक्रिय भूमिका हो सकती थी। पर यह हस्‍तक्षेप तो तब बने जब उन्‍हें कुछ पता हो या कि वे पता करने की कोशिश करें। पर यह सब करने की बजाय वे गाँव जाने यानी पलायन करने का फैसला करते हैं। पर जब यथार्थ आपका चारों तरफ से पीछा कर रहा हो तो पलायन असंभव है और तब फिर आँसुओं के सूखने या बात-बात पर रोने की अजीबोगरीब बीमारियाँ प्रकट होती हैं। सवाल यह है कि ऐसे सहाय जी का इसके अतिरिक्‍त कुछ और भी हो सकता था क्‍या?

और आखिर में चिन्‍मय और मनजीत। वे सहाय जी के बेहद स्‍वाभाविक उत्‍तराधिकारी है पर यह समय है जिसने सहाय जी पर बहुत सारे मोहक आवरण डाल रखे थे और यह भी समय ही है जिसने चिन्‍मय और मनजीत के उपर के सारे आवरणों को खींच लिया है। जिसकी वजह से वे एकदम नंगे दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि चिन्‍मय और मनजीत को जहाँ फेंक दिया गया है और ऊपर से वे जिस वर्ग से आते हैं वहाँ उनके पास दूसरे कौन से विकल्‍प हो सकते थे? सहाय जी के पास भले ही तमाम विकल्‍प हो सकते थे पर उनकी तुलना में चिन्‍मय और मनजीत के पास विकल्‍प न के बराबर हैं। 'जलडमरूमध्‍य' भूगोल का एक शब्‍द है जो एक ऐसी भौगोलिक स्थिति के लिए प्रयोग किया जाता है जहाँ दो तरफ स्‍थल हो और उनके बीच पानी का एक सँकरा इलाका जो जमीन के दोनों तरफ डमरू की आकृति में फैला हुआ दिखता हो। यह शीर्षक कहानी को बेहद स्‍वाभाविक कोण देता है। समय की एक बेहद सँकरी पट्टी है जो सहाय जी और चिन्‍मय को अलग करती है और जोड़ती भी है बावजूद इसके कि दोनों मिलकर एक जैसी स्थिति ही बनाते हैं। यह स्थिति जलडमरूमध्‍य की है। भौगोलिक जलडमरूमध्‍य बजता नहीं पर यह कहानी में आकर कुछ इस तरह से बज रहा है कि उसके नाद में हम भारतीय मध्‍यवर्ग का पूरा पतन राग सुन सकते हैं।


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