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कविता

मैं पागलपन में शामिल हूँ
सुजाता


पार्ट-1

इस बार तय है पेड़ पर चढ़ूँगी मैं
'जा मेरी अम्मा यहीं रहूँगा जब तक न लौटोगी'
किलकारियों से गूँजी अमराई में आखिरकार माली दोनों को दौड़ा ले गया

हाँफ रहे हैं हम अब तक !

कलेजे में जा लगा है पानी का घूँट

चाहिए कंधा दोनों को और पीठ से पीठ दिए बैठे हैं
एक गड्ढे में है दूसरा सीढ़ी नहीं लगाता
कूद जाता है, रो रोकर कुआँ बनाते हैं लबलबाता हुआ
अभी तैर कर आएँगे बाहर

- पड़ेगा एक थप्पड़ सारी हँसी निकल जाएगी

- बड़ी लड़ाकिन है बाई गॉड !
चिढ़ाता बिखरा देता है चने 'ले खा तू ही'
वह चुग लेती है चिड़िया सी - 'सँभालती हूँ, आना रोते हुए भूखे मेरे पास
मोतियों सा पिरो लूँगी माला सा पहनूँगी जलना तू'

सपने में आती है चनों की माला पहने वह...
छूती है तो पीठ पर उगने लगते हैं पंख...
और लड़ाकिन ने कहा था न
सच्ची ! नाक कितनी लंबी होने लगी है...
आधी रात में सपने के बीच भूख लगना प्यार होने की निशानी है क्या ?

वह पूछती है किसी और रास्ते चलें ?
चाय के बागान पार करते चर्च के पीछे बने कब्रिस्तान से होकर
साँवली ओस में भीगी बेंच पर बैठेंगे
मैं नायिका हो जाऊँगी निर्मल की...

वह कहता है मैं पागलपन में शामिल हूँ
शामिल हूँ मेरी जूनी!
तुम्हारी रोशनी में आसमान की तरह
तुम्हारी गति में आवेग सा
तुम्हारे अलाप में हथेलियों की थाप सा
निचले कागज पर तुम्हारी कलम से उभरे बेस्याही शब्द की तरह

पार्ट-टू

पहाड़ी के पीछे चार तालाबों के पार घाटी के बीचोंबीच
कहानी का जिन्न करता है प्रतीक्षा
जंगल में खिले हैं अग्निफूल और प्रेत बुलाते हैं - देनी होगी परीक्षा

पाताल से निकलते हैं चूहे
आकाश से समूह गिद्धों का

चार दिशाओं से टिड्डी दल बढता ही चला आता है
सायरनों के शोर में बिला जाते हैं नन्हें गुबरैले
भोंपुओं से निकलती बास में मुरझाते हैं फूल कब्र के

काले बादलों की राख से पुत गया है चाँद
कहर सी बारिश है... ... ...
खंडहर-सा चर्च भीगता है खड़ा निश्चेष्ट
अपने ही नाखून खुभ जाते हैं हथेलियों में
ढहती हैं सारी मूर्तियाँ सर पर

बचने के लिए तबाही से जीवन में
उसे आने ही देना होता है एक बार...

कहानियों की किताब में एक
अलग कहानियों में फँसे हैं हम
वाक्यों के सिरे तोप के मुहाने हैं
पूर्ण विराम माचिस की तीलियाँ

अँधेरे के मौन में चिस्स्स... !

उँगली के जलने से पहले पूरा होना होगा चुंबन

आखिरी साँस लेता है ज्यों बीच का पन्ना
सीने पर घूँसे जमाते हैं एक दो तीन
खुलते ही खिड़की भागता है पंखे की पत्ती पर सहमा बैठा पंछी
गिरा जाता है बीट कंधे पर तो
आँसुओं की धुली आँखों में हँसती है लड़की
अपने सबसे ताजे पल में प्रेम हवा है
हम धूल कणों से उसमें घुल गए

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