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कविता

औसत औरत
सुजाता


तुम्हें चाहिए एक औसत औरत
न कम न ज्यादा
बिल्कुल नमक की तरह
उसके जबान हो
उसके दिल भी हो
उसके सपने भी हो

उसके मत भी हों मतभेद भी
उसके दिमाग हो
ताकि वह पढ़े तुम्हें और सराहे
वह बहस कर सके तुमसे
तुम शह-मात कर दो
ताकि समझा सको उसे
कि उसके विचार कच्चे हैं अभी
अभी और जरूरत है उसे
तुम-से विद्वान की।

औसत औरत को तुम
सिखा सकोगे बोलना
सिखा सकोगे कि कैसे पाले जाते हैं
आजादी के सपने

पगली होती हैं औरतें
बस खिंचीं चली जाती हैं दुलार से

इसलिए उसके भावनाएँ भी होंगी
आँसू भी
वह रो सकेगी
तुम्हारी उपेक्षा पर
तुम हँस सकोगे उसकी नादानी पर
कि कितना भी कोशिश करे औरत
औसत से ऊपर उठने की
औरतपन नहीं छूटेगा उससे

तुम्हारा सुख एक मुकम्मल सुख होगा
ठीक उस समय तुम्हारी जीत सच्ची जीत होगी
जब एक औसत औरत में
तुम गढ़ लोगे अपनी औरत।


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