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कविता

झाँकती है देह आँखों के पार
सुजाता


...और इस दूसरे जाम के बाद मुझे कहना है
कि दुनिया एकदम हसीन नहीं है तुम्हारे बिना
हम तितलियों वाले बाग में खाए हुए फलों का हिसाब
तीसरे जाम के बाद कर जरूर कर लेंगे...

हलकी हो गई हूँ सँभालना ...
मौत का कुआँ है दिमाग, बातें सरकस
बच्चे झाँक रहे हैं खिलखिलाते
एक आदमी लगाता है चक्कर लगातार
धम्म से गिरती है फर्श पे मीना कुमारी
'न जाओ सैंया... कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी...'
और सुनो -
जाना, तो बंद मत करना दरवाजा।
आना, तो खटखटा लेना।

मौत के कुएँ पे लटके, हँसते हुए
बच्चे ने उछाल दिया है कंकड़
आँखें मधुमक्खियाँ हो गई हैं
आँखें कंकड़ हो गई हैं
आँखें हो गई हैं बच्चा
आँखें हँसने लगी हैं
झाँक रही हैं आँखें
अपने भीतर !

बच्चे काट रहे हैं कागज कैसे आकारों में
कि औरतों की लड़ी बन जाती है मानो
दुख के हाथों से बँधी एक-से चेहरों वाली
एक-सी देह से बनी
झाँकती है देह आँखों के पार !

अरे ...देखो ! उड़ गई मधुक्खियाँ शहद छोड़
जीने की लड़ाई में मौत का हथियार लेकर

आँसू कुआँ हैं, भर जाता है तो
डूब जाती है आवाज तुम्हारी
सूखता है तो पाताल तक गहरा अँधेरा...
बहुत हुआ !
- तुम फेंकते हो झटके-से बालटी डोरी से बँधी
भर लेते हो लबलबाता हुआ, उलीचते हो
रह जाती हूँ भीतर फिर भी उससे ज्यादा

उफ ! दिमाग है कि रात की सड़क सुनसान
जिन्हें कुफ्र है दिन में निकलना
वे दौड़ रहे हैं खयाल बेखटके...

इंतजार रात का
इंतजार सुबह का

बहती है नींद अंतरिक्ष में आवारा होकर
भटकती है शहरजाद प्यार के लिए
अनंत अँधेरों में करोड़ों सूर्यों के बीच
ठंडे निर्वात में होगी एक धरती
सोने से पहले
हजारों कहानियों के पार !

एक अबाबील उड़ी
दो अबाबील उड़ीं
तीन अबाबील उड़ीं
चार...
पाँच...
सारी
फुर्र !


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