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कविता

नींद के बाहर
सुजाता


(1.)

अनमनी आँखों में मुँद जाती तस्वीर तुम्हारी
दूर तक कानों में गूँजती हवा की गुदगुदी
तुमने पुकारा हो जैसे मेरा नाम...
आज नहीं सुनती कोई बात
तुम्हें सुनती हूँ
ऐसी ही होगी सृष्टि के पहले पुरुष की आवाज ...
आखेटक !

सधी हुई
माहिर
लयबद्ध
कलकल
सृष्टि का पहला झरना...
पहले प्रेम में खिली लता सी
झूल गई हूँ इसे थाम...

(2.)

दिन सन्नाटा है
भटकती रही हूँ तुम्हारी आवाज में देर तक
अपने ही भीतर अपनी ही बात कहता उलझ जाए कोई जैसे
कुआँ है अतल... वह स्वर
भागती रस्सी दिगंत तक... उठती-गिरती
गहराती आवाज
मनस्विनी पृथ्वी के भीतर से
फूटता अनहद नाद...
डूबती हूँ, थामती हूँ रस्सी
पिघलती है इंद्रधनुषी आवाज
भीगती हूँ
भीगी होगी जैसे
सृष्टि की पहली स्त्री !

(3.)

हवा के पर्दे में छिपी उदासी
आवाज जैसे गुफा अँधेरी ठंडी और गहरी
चट्टानी और गीली
अतीत से बोझिल पुरानी अकेली
कोई शब्द रहस्यलोक
पाताल का वासी
नतसिर भीतर जाती मैं सँकरे मुहाने आवाज-गुफा के
अलाप है विरही सा कंपन प्रलाप है
थरथर और मरमर
मंत्रों से बाधित प्रवेश
दुराती है करती निषेध

नतसिर जाती मैं भीतर धारण कर मौन की देह...

(4.)

और अभी
जैसे अभी खिला सहस्र दल कमल
बरसता कंबल और भीगता पानी
भीगती तरंगायित
कंठ में तुम्हारे कमलिनी
कुँलाचें भरता प्यारा मृगछौना
गरमी उसाँस की ...महमह
प्रेम के अक्षर उछलते लुढकते पहाड़ी से घाटी
पुकार
अथक
बकबक
सशब्द
निःशब्द !


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