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कविता

तुम : छह कविताएँ
सुजाता


तुम : खुरदुरे

मुस्कुराते हो
तो लजाती हैं उदास आँखें तुम्हारी

मैं छूती हूँ तुम्हें
कैसी बुनावट है
एकदम सूती
खुरदुरा
शुद्ध
कपास !
जलेगा एक एक तंतु आखिरी दम
मुझ तक पहुँचने देने से पहले आँच

मैं ठंडी पड़ी राख हूँ पहले ही
मेरे पगले !

चाँद, जुगनू और तुम

मैंने बेसब्री से रात की प्रतीक्षा की
अँधेरा होने पर लेट गई
चादर बिछाकर आसमान तले
साँस खींचकर बंद कर लीं आँखें
एक स्कूबाडाइव के लिए
जैसे समंदर के नीचे की दुनिया हो
ऐसे कितना साफ दिखाई देता था
मोतियों भरा थाल
चाँद
जुगनू
और
तुम !

भोर तुम

तुम हार रहे थे
मुस्कुराई थी मैं
खेलने दिया था शिद्दत से
मेरा प्रिय खेल तुम्हें
एक रात बदल रही थी
भोर में धीरे धीरे
सौंप दिए मैंने
टिमटिमाते तारे
और पा लिया
एक समूचा आकाश !

अकथ तुम

पसीने में भीगते
निपट प्यासा होना -
- ऐसे चाहना तुम्हें !

पहली बार तुम

जहाँ दीखती है खूब रोशनी
मुड़ जाना वहाँ से -
तुमने कहा रास्ता बताते
और मुझे सुनाई दिया
- रुकना मेरे लिए वहाँ
जहाँ गहन हो अंधकार !

यह सुनकर कोई आँखों में देखे बिना
कैसे रह सकता होगा
मैं भी नहीं रही
और देखा पहली बार
तुम्हारी आँखों में सर्द अँधेरा
मुझे रुकना था वहीं?
और करना था इंतजार !

अनुपस्थित तुम

मिटा कर सारी स्मृतियों को
भर दिया गया है अज्ञात !

अब तुम ही लौटाना किसी दिन
वे अल्हड़ पल, सौंपना मुझे
वह समय जब मैं प्रेम में थी
दिलाना याद मुझे एक-एक बात

और वह क्षण भी
जब कहा व्याकुल होकर
हाँ मैं प्रेम में हूँ
और तुम नहीं थे
कुछ भी सुनने को वहाँ

उस पार तुम

अब इस सर्द रात मेरे पास
बहुत गरम कपड़े हैं
दिन भर की तायी हुई धूप आँखों में
सूखे मेवे और मोजे और नया स्कार्फ जो अभी उपहार में मिला है

ठंड है कि धँसती जाती है नसों में
कई सालों से दिसंबर बीतता नहीं है
देखो मेरे नीले नाखून और बर्फ होती नाक
तुमने जाते हुए कहा - ध्यान रखना अपना
मैं गर्म चाय से जला लेती हूँ तालू और अब स्वाद ही नहीं बचा है कोई
अकेलापन अंटार्कटिक सा सफेद है और ठंडा - तुम्हें लिखते हुए
मैं सब खिड़कियाँ बंद करके सिमट जाती हूँ।


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हिंदी समय में सुजाता की रचनाएँ