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कविता

सूरज और सपना
किरण अग्रवाल


सूर्योदय

मध्याह्न

सूर्यास्त

लापता सूरज

प्रतिक्रिया

खोज

इति

कविता के इलाके में

रोबोट

वह कुछ नहीं कहता

पूछती हैं बेटियाँ

औरतें कविताएँ नहीं पढ़तीं

प्रकाश की दुनिया

सूर्योदय

सूरज पूरब से नहीं निकला आज
न पश्चिम से
सूरज निकला आज
एक साहित्यकार की कामान्ध कलम से
कुछ अलसाया-सा
कुछ भरमाया-सा
अपने स्खलित वीर्य को
उषा की अधखुली जंघाओं पर बिखेरता
देखते ही देखते
केबल टी.वी. के नेटवर्क में उलझ गया

 

मध्याह्न

दोपहर में फिर दिखा सूरज मुझे
संसद भवन के चक्कर लगाता
घोटालों की दुनिया में
छुपता-छुपाता
एक मंत्री की भारी-भरकम कुर्सी पर बैठा हुआ।

 

सूर्यास्त

महानगर के पीछे
सूरज डूब गया
गटर में
काला पड़ गया आसमान
ज्यों इन्सान के चेहरे के पीछे
इन्सानियत।

 

लापता सूरज

दूसरे दिन
अखबार के मुखपृष्ठ पर
था सनसनीखेज समाचार
सूरज लापता हो गया
कद : असंख्य किरणों फुट
रंग : सोने-सा तपता हुआ
उम्र : कोई नहीं जानता
अन्तिम बार उसे
बापू की समाधि पर देखा गया था
उस दिन हो रही थी लगातार बरसात
आकाश था बादलों से आच्छन्न
कहीं नहीं था सूरज का नामोनिशान

 

प्रतिक्रिया

लोग थे हैरान/परेशान
धरती होती जा रही थी जल-निमग्न
जमुना कसमसा रही थी अपनी परिधि में
इच्छाएँ थीं भ्रष्टाचार के पुल-सी भग्न
प्रेयसी की मांसल देह
खो चुकी थी आज अपनी आँच
बन्द कमरों में भी
लोग काँप रहे थे

 

खोज

और तब
शुरू हुई खोज सूरज की
आसमान से लेकर धरती तक
प्रधानमंत्री के बँगले से झुग्गी-झोंपड़ी तक
सारे कब्रिस्तानों और समाधियों को
छान डाला गया
अन्त में सूरज एक अँधेरे गोदाम में मिला
आरडीएक्स के ढेर पर सोया हुआ

 

इति

एक भयभीत खुशी
चूम गयी
लोगों के कुम्हलाये चेहरों को
वे समवेत चिल्लाये-
'सूरज भाई उठो
अपने घर चलो
देखो तुम्हारे बिना हमारी क्या दशा हो गयी'
'हू डेयर्ड टु वेक मी अप फ्रॉम माई ड्रीम?'
सूरज ने खोल दीं अपनी रक्तिम आँखें
'लेट मी हैव वन एके42 राइफल ऐट लीस्ट'
वह मुस्कराया
और आसमान पर चढ़ आया

 

कविता के इलाके में

कविता के इलाके में
पुलिस से भाग कर नहीं घुसी थी मैं
वहाँ मेरा मुख्य कार्यालय था
जहाँ बैठकर
जिन्दगी के कुछ महत्त्वपूर्ण फैसले करने थे मुझे
यह सच है तब मैं हाँफ रही थी
मेरी आँखों में दहशत थी
पर कोई खून नहीं किया था मैंने
लेकिन मैं चश्मदीद गवाह थी अपने समय की हत्या की
जिसे जिन्दा जला दिया गया था धर्म के नाम पर
मैं पहचानती थी हत्यारों को
और हत्यारे भी पहचान गये थे मुझे
वे जो ढलान पर दौड़ते हुए मेरे पीछे आये थे
वह पुलिस नहीं थी
पुलिस की वर्दी में वही लोग थे वे
जो मुझे पागलों की तरह ढूँढ़ रहे थे
जो मिटा देना चाहते थे हत्याओं के निशान
किसी तरह उन्हें डॉज दे
घुस ली थी मैं कविता के इलाके में
और अब एक जलती हुई शहतीर के नीचे खड़ी हाँफ रही थी
जो कभी भी मेरे सिर पर गिर सकती थी
दंगाई मुझे ढूँढ़ते हुए यहाँ तक आ पहुँचे थे
मुझे उनसे पहले ही अपने मुख्य कार्यालय पहुँचना था
और निर्णय लेना था कि किसके पक्ष में थी मैं
मुझे एक वसीयत लिखनी थी आने वाली पीढ़ी के नाम
और छुपा देना था उसे कविता की सतरों के भीतर
मुझे बनानी थी हत्यारों की तस्वीर
और लिख देने थे उनके नाम और पते

 

रोबोट

और एक दिन नींद खुलेगी हमारी
और हम पायेंगे
कि आसमान नहीं है हमारे सिर के ऊपर
कि प्रयोगशालाओं के भीतर से निकलता है तन्दूरी सूरज
कि पक्षी अब उड़ते नहीं महज फड़फड़ाते हैं
और पेड़ पेड़ नहीं ठूँठ नाम से जाने जाते हैं
कि कोख कोख नहीं जलता हुआ रेगिस्तान है
और हृदय संवेदनशून्य, बर्फ उगलता एक श्मशान
और एक दिन डिक्शनरी खोलेंगे हम
और देखेंगे
कि 'आजादी' शब्द हमारे शब्दकोश में नहीं है
कि माता-पिता, प्रेम, दया जैसे उद्गार
औब्सोलीट हो गये हैं अब
और तब बदहवास से डिस्क में बंद अतीत को स्क्रीन पर टटोलते
हम जानेंगे
कि हम इन्सान नहीं रोबोट हैं!

 

वह कुछ नहीं कहता

कहाँ गयी वो गरमाहट अँगुलियों की
संवेदनाओं के रंगों में डूबे
आकार ग्रहण करते
एक-एक अक्षर
गुस्सा, प्यार, सुगबुगाहट, बैचेनी
कहाँ गयी एक-एक शब्द में लिपटी
तुम्हारी आँखों की नमी
तुम्हारे थरथराते लबों से लेकर
तुम्हारी काँपती अँगुलियों तक
फैलती जाती भाव तरंग
जो कर देती थी तुम्हारे अक्षरों को
टेढ़ा-मेढ़ा
थोड़ा इधर या उधर
मेरे हाथ में तुम्हारा मशीनी पत्र है
कम्प्यूटर पर लिखा गया
जहाँ सिर्फ तुम्हारा हस्ता़क्षर है
तुम्हारी हस्तलिपि का चश्मदीद गवाह
लेकिन वह भी कुछ नहीं कहता
नहीं हिलाता अपने हाथ-पैर-मुँह-गर्दन
बस अपनी सर्द आँखों से
ताकता है एकटक शून्य में
मानो उसी स्थिति में फ्रीज हो गया हो

 

पूछती हैं बेटियाँ

''माँ! यह व्रत किसके लिए कर रही हो तुम?''
पूछती हैं बेटियाँ
''तेरे बाबूजी के लिए कर रही हूँ''
बोलती हूँ मैं
और देने लगती हूँ चन्द्रमा को अर्ध्य
''माँ! यह व्रत किसके लिए कर रही हो तुम?''
पूछती हैं बेटियाँ
''तेरे भैया के लिए कर रही हूँ''
बोलती हूँ मैं
और देने लगती हूँ तारों को अर्ध्य
''माँ! यह व्रत किसके लिए कर रही हो तुम?''
पूछती हैं बेटियाँ
''तेरे बाबूजी और तेरे भैया के लिए कर रही हूँ''
अपने परिवार की खुशहाली के लिए कर रही हूँ''
बोलती हूँ मैं
और काढ़ने लगती हूँ सकट देवता चकले पर गंगोटी से
''माँ! बेटियों के लिए व्रत किस दिन करोगी तुम?''
पूछती हैं बेटियाँ
''हमारे शास्त्रों में ऐसे किसी व्रत का विधान नहीं है''
बोलती हूँ मैं
रोली और तिल के छींटे सकट देवता पर लगाते हुए
''माँ! तो क्या हम तुम्हारे परिवार के बाहर हैं?''
पूछती हैं बेटियाँ
''यह कैसी बातें करती हो तुम सब!''
मैं सिर उठाकर देखती हूँ बेटियों को भरपूर नजर
''माँ! हम धर्म-शास्त्रों को बदल डालेंगे
हम क्यों मानें धर्म को या शास्त्र को
जो हमें नहीं मानता...''
''बहुत जबान चलने लगी है तुम लोगों की
खाली खा-खाकर मोटी हो रही हो''
थप्पड़ मारने के लिए उठा मेरा हाथ
बीच में ही रुक गया है
लगता है बेटियों की जगह मैं खड़ी हूँ
और पूछ रही हूँ अपनी माँ से
''माँ! मेरे लिए व्रत किस दिन रखोगी तुम?''

 

औरतें कविताएँ नहीं पढ़तीं

औरतें साहित्यिक पत्रिकाएँ नहीं पढ़तीं
वे मनोरमा पढ़ती हैं
पढ़ती हैं वे गृहशोभा, मेरी सहेली और वनिता
पुरुष को वश में करने के नुस्खे तलाशती हैं वे
और बुनाई की नयी-नयी डिजाइनें
रेसिपी नये-नये व्यंजनों की
कुछ आधुनिक औरतें फेमिना पढ़ती हैं
और डिबोनेयर
देखती हैं स्त्री देह को परोसा हुआ बाजार में
और अपनी देह को स्थानान्तरित कर लेती हैं वहाँ
औरतें कविताएँ नहीं पढ़तीं
लेकिन लिखती हैं
और गाड़ देती हैं अँधेरे तहखानों में
भूल जाने के लिए
जहाँ से युगों के बाद
कोई पुरातत्त्ववेत्ता
खोद कर निकालता है एक पूरी सभ्यता
औरतें इतिहास रचती हैं
और खाली छोड़ देती हैं अपने नाम की जगह

 

प्रकाश की दुनिया

मेरे सामने है प्रकाश की दुनिया
वहाँ अन्धकार नहीं है
वहाँ दुःख नहीं है
वहाँ आनन्द है और बस आनन्द है
मेरे सामने खुला है द्वार प्रकाश की दुनिया का
मैं जाती हूँ वहाँ
लेकिन लौट-लौट कर वापस आती हूँ
अपनी इसी दुनिया में
मैं अकेले नहीं रहना चाहती वहाँ
मैं अपने परिवार के साथ वहाँ जाना चाहती हूँ
और सारी दुनिया है मेरा परिवार
मैं अपनी दुनिया के साथ
प्रविष्ट होना चाहती हूँ प्रकाश की दुनिया में

 


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हिंदी समय में किरण अग्रवाल की रचनाएँ



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