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कविता

डरती हूँ, डरता है मुझसे डर भी
सुजाता


सामने खाईं है और मैं
खड़ी हूँ पहाड़ के सिरे पर
किसी ने कहा था
- 'शापित है रास्ता
पीछे मुड़ कर न देखना
अनसुनी करना पीपल की सरसराहट
किस दिशा को हैं
देखना पाँव उसके जो रोती है अकेली इतना महीन
कि पिछली सदियों तक जाती है आवाज
दर्द यह माइग्रेन नहीं है
उठा लाई हूँ इसे अँधेरे की पोटली में बाँध
वहीं से
बच्चों के चुभलाए टुकड़े टूटे हुए वाक्य गीले बिछौने
सारे टोटके बाँध लाई हूँ

संबोधन तलाशती हूँ
मुँह खोलते अँट जाती है खुरचन पात्र में
मेरे स्वामी
प्रभु मेरे !
मुट्ठी में फँसे मोर पंखों की झपाझप सर पर...

नहीं, खाईं में कूदना ही होगा
तो मुड़ ही लूँ एक बार ?
नहीं दिखते दूर-दूर भी
पिता
माँ
बहन
साथी

देखती हूँ अपने ही पाँव उलटे !


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