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कविता

पुर ते निकसीं रघुवीर वधू
सुजाता


बेमतलब-सी बात की तरह होती है सुबह
नीम के पेड़ पर कमबख्त कोयल बोलती ही जाती है
उसे कोई उम्मीद बची होगी

सारी दोपहरें आसमान पर जा चिपकी हैं आज, उनकी अकड़ !
एक शाम उतरती है पहाड़ से और बैठ जाती है पाँव लटका कर, जिद्दी बच्ची !
ढलने से पहले झाँकना चाहता है नदी में कहीं कोई सूरज
सिंदूरी रेखा खिंचती है
जैसे छठ पूजती स्त्रियों की भरी हुई माँग
पूरा डूबा है मन आज
आधी डूबी हैं मछलियाँ
मल्लाह पुकारता है - हे हो !
आज और गहरे जाएँगे पानी में...

यह लौटने का समय है
समय... प्रतीक्षाओं की लय...

झूठ बोलकर खेलने चले गए बच्चे पहाड़ी के पीछे
तितलियाँ साक्षी हैं उनके झूठ की
अभी साथ में करेंगे धप्पा और चाँद को आना पड़ेगा बाहर मुँह लटकाए
ये देखो आज शिकारी छिपा है आसमान में, एक योगी भी है
छिप-छिप के रह-रह टिमकते तारे ...चोर हैं चालीस
कहानियों की सिम-सिम ...नींद का खजाना... लो... सो गए...

अब सब काम निबट गए
पाँव नंगे हैं मेरे
बच्चों ने छिपा दी होगी...
या रख दी होगी मैंने ही कहीं
मेरे नाप की कोई चप्पल नहीं है भैया ?
- आपको कुछ पसंद ही नहीं आता
ह्म्म...

सपनों के लिए बुलाया गया है आज मुझे कोर्ट
अचानक लगता है खो गई हूँ
यहाँ वह पेड़ भी नहीं है बरगद का चबूतरे वाला
किसी हत्या के भी निशान नहीं हैं मिट्टी पर
चौकीदार कहता है -
पूजा करनी होगी आपको, गलत गेट से आ गई हैं आप, दूसरी तरफ है बरगद, सही-सलामत।

एक प्रेम को भर देना चाहती थी आश्वासनों से, मीलॉर्ड !
फुसफुसाता है कोई - झूठ !

शब्दकोश से मेरे गायब हो रहे हैं शब्द जजसाहब -
गड्ढे बन गए हैं जहाँ से उखड़े हैं वे... मैं गिरती हूँ रोज किसी गड्ढे में
फुसफुसाता है कोई - झूठ !

मैं धरती से बहिष्कृत थी...
कोई बोला - झूठ !

मैं कविता लिखती थी ...मैंने लिखा था सब ...ये देखिए
मेरी ही हस्तलिपि है... मेरी..
वह छीनते कागज उठ खड़ा हुआ है - झूठ !

मैं तब भी थी ...अनाम ...मैं भटक रही थी अँधेरी गुफाओं में
चलती रही हूँ रात-रात भर ...दिन भर स्थिर...
बड़बड़ाती रही हूँ नींदों में ...दिन भर मौन ...

मीलॉर्ड ! मुझे सुना नहीं गया मेरे कातिलों को सुनने से पहले वह चिल्ला पड़ा है - चुप्प् प !!

आप पर अनुशासनहींनता का आरोप है
अदालत की तौहीन है...

होती हूँ नजरबंद आज से ...अपने शब्दों में ...कानों में गूँजता है - झूठ है !
होती हूँ मिट्टी ...हवा... आँसू...

मुझे उनके जागने से पहले पहुँचना है
चीखता है ऑटो वाला - हे हो !
मरने का इरादा है क्या !


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