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आलोचना

कविता के केंद्र में स्त्री
साधना अग्रवाल


इस भयावह समय में हम अपने भीतर जड़ होती संवेदना से लगातार लड़ाई लड़ रहे हैं। संवेदना हमारी प्रार्थना नहीं, हमारे जीवित होने का एहसास है - कविता जीवन की अभिलाषा है, कहीं आकांक्षा भी। कवि कुँवर नारायण के शब्दों में - 'जीवन में ऐसा कुछ नहीं जहाँ कविता न हो : जहाँ वह नहीं होती वहाँ भी अगर उसके न होने की तकलीफ को महसूस कराया जा सके तो शायद जब तक हममें इस तकलीफ का एहसास जिंदा है, कविता भी जिंदा है - हमारी भाषा में, हमारे रहने-सहने में, हमारी चेतना में।' चूँकि कविता साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में हमारे समय और समाज को सूक्ष्मता में अभिव्यक्त करती है। सचमुच यदि कविता बची रहेगी तो यह दुनिया भी क्योंकि संवेदना का असली घर कविता ही है।

कविता के पाठक चाहे गिने-चुने हों या फिर प्रकाशक इस बात का रोना रोते हों कि कहानी-उपन्यास तो बिक जाते हैं लेकिन कविता की पुस्तकें नहीं बिकतीं मगर पिछले वर्ष कविता पुस्तकों की आमद सुखद रही। जहाँ मरणोपरांत केदारनाथ सिंह का 'मतदान केंद्र में झपकी' और कुँवर नारायण का 'सब कुछ इतना आसान' आए वहीं लीलाधर मंडलोई का 'जलावतन' भी चर्चा में रहा। वहीं कुछ युवा कवियों के पहले संग्रहों ने हमें कविता के भविष्य के प्रति आश्वस्त कराया बल्कि एक उम्मीद भी दिलाई कि कविता का नया रंग और नया आस्वाद बरकरार है। यहाँ मैंने अपने इस लेख के लिए कुछ ऐसे संग्रहों को चुना है जिनके केंद्र में स्त्री है।

नारी पर अधिकार स्थापित करना ही पुरुष के पौरुष की कसौटी रहा है। वह उसके रूप-सौंदर्य की प्रशंसा ही नहीं करता बल्कि उसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने की कोशिश करता है। दरअसल स्त्री उसके लिए सिर्फ भोग्या है। वह उसके एक-एक अंग को भोगना चाहता है। मर्यादा और नैतिकता की तमाम सीमाओं को लाँघते अपनी मर्दानगी को दिखाने की जिद में वह स्त्री को केवल अपनी संपत्ति समझता है। स्त्री उसके लिए बस एक साधन है और कुछ नहीं। सैद्धांतिक रूप से उसे देवी का दर्जा जरूर दिया गया है लेकिन व्यवहार में ऐसा है नहीं। जबकि स्त्री खुद को केवल मनुष्य समझने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ती रही है। स्त्री का शोषण आज से नहीं अपितु सृष्टि के आरंभ से होता रहा है, युग कोई भी रहा हो। युगों के हिसाब से केवल स्त्री पात्र बदल गए लेकिन उनकी नियति नहीं। उस पर तो धर्म, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता के नाम पर अनेक नियम और बंधन लाद दिए गए हैं। पुरुष सत्ता की थोथी मर्यादा के बीच स्त्री असंख्य अदृश्य बेड़ियों और जंजीरों में जकड़ी हुई है। स्त्री का जीवन हमेशा से ही संघर्षों की गाथा रहा है। उसका न तो अपनी देह पर कोई अधिकार है और न मन पर। इसीलिए तो आज की स्त्री अपनी अस्मिता की पहचान के लिए पितृसत्ता के विरोध उठ खड़ी हुई है।

हिंदी के प्रतिष्ठित कवि पवन करण का नया काव्य संग्रह 'स्त्रीशतक' अभी आया है जिसमें उन्होंने बहुत मेहनत और शोध करके हमारे धर्मग्रंथों, पुराणों और इतिहास से शोषित, पीड़ित, दुखी, अपमानित 100 विभिन्न स्त्री पात्रों के जरिए उनकी दारुण कथा को कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया है। जिसे सुनकर आप न केवल शर्मसार होते हैं बल्कि ग्लानि भी अनुभव करने लगते हैं। पवन करण पुरुषों के झूठे अहम और दंभ को चकनाचूर कर उनकी असलियत को भी सामने रखते हैं। इसकी एक बड़ी विशेषता यह है कि वह ऐसे अनचीन्हें स्त्री पात्रों से हमारा परिचय कराते हैं जिनसे हम अनभिज्ञ हैं।

यद्यपि भारतीय संस्कृति, पुराणों और मिथकों को आधार बनाकर संस्कृत साहित्य में विशाल मात्रा में साहित्य रचा गया है लेकिन वह एकांगी इस अर्थ में दिखाई देता है क्योंकि वह पुरुष समाज के वर्चस्व और उसकी ताकत का परिचय ही देता है। यद्यपि आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता' लेख लिखकर इस ओर कवियों का ध्यान आकृष्ट किया था जिसका परिणाम था मैथिलीशरण गुप्त का साकेत। उसके बाद रामधारी सिंह दिनकर ने भी इस ओर कदम बढ़ाया था। लेकिन इस संग्रह में हमारी पूर्वज स्त्रियों की व्यथा-कथा ही नहीं है बल्कि मुक्ति की आकांक्षा भी है। उनके प्रश्न हमें विचलित ही नहीं करते बल्कि बेचैन भी करते हैं। लगता है पवन करण ने सैकड़ों पन्ने पलटकर इतिहास की भीतरी तह तक जाकर एक से बढ़कर एक स्त्री पात्रों की वेदना को स्वर दिया है। हो सकता है भविष्य में जिसकी भरपाई कवि को करनी पड़े, जिसके लिए उसको अपनी कमर कसनी होगी लेकिन इतना तो मानना पड़ेगा कि जो सवाल उनके भीतर नासूर की तरह दुख रहे थे मानो उस पर संवेदना का मरहम लगा दिया हो।

पवन करण ने तमाम देवताओं, ऋषियों, मुनियों, राजाओं, साधु-संतों को अपराधी बनाकर जनता के समक्ष खड़ा कर दिया है। इसका एक धवल पक्ष यह भी है कि इसमें साधारण से साधारण स्त्री भी अपनी बात कहने में कोई संकोच करती नहीं दिखती और देवताओं तक को कठघरे में खड़ा करने से नहीं घबराती। ये कविताएँ हमें निरुत्तर कर देती हैं। हमारे सामने सती, सावित्री, सीता आदि के उदाहरण तो दिए जाते हैं लेकिन उनकी वेदनाओं को कभी सामने नहीं लाया जाता।

पवन करण ने इस संग्रह की प्रत्येक कविता के फुटनोट में संबंधित स्त्री पात्र का संक्षिप्त परिचय भी दिया है जिससे उसे जानने-समझने में पाठक को आसानी होती है। इस संग्रह की पहली ही कविता है 'तारा'। तारा यूँ तो वृहस्पति की पत्नी थी लेकिन चंद्र उसे अपने साथ भगा ले गया था जिसके परिणामस्वरूप बुध का जन्म हुआ। इस कविता में कवि ने तारा की व्यथा को आज के पुरुष की ग्लानि से जोड़कर प्रस्तुत किया है।

कीर्तिमालिनी कविता में व्याकुल करने वाला प्रश्न है जिसका जवाब शायद ही किसी के पास हो - 'माया रचता कोई देव ही क्यों न हो / कामभोग के लिए किसी की / भार्या माँगने का / अधिकार नहीं किसी को।' इसी कविता में कीर्तिमालिनी देवी उमा से सवाल करती हैं कि - 'उमा अब आप ही मुझे बताएँ / परीक्षा लेने के लिए देव / स्त्री-देह ही क्यों चुनते हैं / यह तो सरासर देह-लोलुपता है / जिसमें उनका साथ देने / आप भी चली आती हैं।' कवि उमा पर दोषारोपण करता यही नहीं रुकता बल्कि एक औरत होने के नाते उन पर गंभीर आरोप भी लगाता है - ये आपने क्या किया गौरी / आपने तो करोड़ों स्त्रियों के मन में / कुंठा घोलकर रख दी / आश्चर्य कि शंभु के सामने शक्तिहीना होकर रह गई शक्ति / गौरवर्ण प्राप्त करने को उद्यत / आपने एक बार भी / उन स्त्रियों के बारे में नहीं सोचा / जिनकी त्वचा का रंग / काले सर्प सा डसता रहा है उन्हें।' इस कविता में स्त्री की वेदना, दुख, पीड़ा, संत्रास, अपमान, उपेक्षा, ग्लानि, हताशा ही सामने नहीं आती बल्कि उसका मन चीत्कार कर उठता है जब उसे एहसास होता है कि इसके लिए पुरुष ही नहीं स्त्री भी किसी हद तक उतनी ही दोषी है।

इस संग्रह में अर्जुन की बालविधवा पत्नी उलूपी का दुख-दर्द है तो सवाल करती घटोत्कच की पत्नी मोर्वी है। विदुर की माँ इंदु की पीड़ा है, पृथ्वी का दोहन करने वाले राजा पृथु की पत्नी अर्ची है जो दबे स्वर से सती होने से मना करना चाहती है लेकिन साहस नहीं जुटा पाती।

कल्पाषपाद की भार्या मदयंती ऋषि-मुनियों से सवाल करती है कि क्या वे स्त्रियों को भोगने के लिए ही तो राजाओं को शाप नहीं दिया करते थे या फिर पुत्र की चाहत में राजा अपनी पत्नी को गर्भवती होने के लिए ऋषियों के पास भेजा करते थे। मदयंती पूछती है - 'मुझे छूने से पहले मेरी बात का / जवाब दो मुनि प्रवर / क्या आप हमारे पतियों को / उनके और उनके राज्य पर / अपना ज्ञान और श्रेष्ठता / कायम करने के लिए शाप देते हो / राजपाट के साथ-साथ / भोगने के लिए हमें भी / अपने कमंडल में भरे घूमते हो / तरह-तरह के शाप / वन में मेरे पति को रतिदोष का / शाप देने को तत्पर / कामक्रीड़ारत मुनि ही था एक / ये कैसी साधना है तुम्हारी / इंद्रियाँ ही नहीं सधती"

शर्याति की पुत्री सुकन्या भी ऋषि-मुनियों के शाप देने पर ही सवाल खड़ा नही करती बल्कि उनकी काम-लोलुपता पर उँगली उठाती है। वह एक पिता की बेबसी का वर्णन करती कहती है - 'पिता को जो सूझा वो किया उन्होंने / मगर मुझे पाकर च्यवन ने / छोड़कर अपनी तपस्या / मेरे लिए खुद को किया युवा।' वहीं पवन करण राजा दशरथ की आँख में अंगुली डालकर दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने बेटे और बेटी में भेदभाव ही नहीं किया बल्कि अपनी बेटी को एक ऋषि को सौंप दिया बिना उसकी इच्छा जाने कि वह क्या चाहती है - 'जब दशरथ उसे ऋष्यश्रृंग को / सौंप रहे थे तब क्या उसने / तुमसे कहा कि मैं किसी ऋषि से नहीं राम भैया जैसे किसी / राजकुमार से ब्याह करना चाहती हूँ।'

पवन करण की ये कविताएँ निश्चित ही आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होंगी क्योंकि इसका फलक इतना व्यापक है कि हम सोच भी नहीं पाते, याद करने की कोशिश भी करते हैं तो बामुश्किल हमें 10-12 चरित्र ही याद आते हैं। यही कारण है कि ये कविताएँ कोई मामूली कविताएँ न होकर स्त्रियों की महागाथा के रूप में हमारे सामने आती हैं। हालाँकि भारतीय समाज जैसा आज है, वैसा सदियों से रहा था, यह कहने में अब कोई संकोच नहीं। मेरा मानना है कि ये कविताएँ पढ़कर हम अपने भीतर उस विद्रोह की आँच को महसूस कर सकते हैं, यही इसकी ताकत है और सफलता भी।

वरिष्ठ कवयित्री सुमन केशरी के कविता-संग्रह 'पिरामिडों की तहों में' में प्रकृति है, स्त्री है, मनुष्यता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संकट है, मिथक हैं, स्वप्न हैं, दुख हैं, पीड़ा है, संघर्ष है, जटिल होता समय है तो उम्मीद का सघन रूप भी है। उन्होंने हमारे समय और समाज की हलचलों को और उनकी विडंबनाओं को तो उकेरा ही है साथ ही उन अँधेरों में उम्मीद की रोशनी की तलाश को भी नहीं छोड़ा है। वे मनुष्यता के आखिरी बचे चिह्नों को बचा लेने का यत्न करती दिखती हैं।

कवयित्री मृगतृष्णा के जागरण में सुकून की नींद की तलाश में हैं और तमाम आकांक्षाओं की पोटलियों को उतार फेंकना चाहती हैं लेकिन उन्हें ऐसी अँधेरी कब्र दिखाई देती है जहाँ नहीं है एक बूँद जल भी तर्पण को। वह बताना चाहती हैं कि समय किसी का इंतजार नहीं करता और मनुष्य इस धोखे में रहकर लगातार यात्रा करता रहता है कि वह अपनी मनचाही मंजिल तक पहुँच जाएगा लेकिन 'समय का पहिया चलता रहा बेखटके / पखेरू का पता न था।'

सुमन केशरी इस धोखे, अविश्वास भरे समाज से यह अपेक्षा करती हैं कि वह उनकी भावनाओं को समझे ही नहीं बल्कि विश्वास भी करे। मनुष्य कितना लाचार और विवश हो जाता है जब कोई उस पर विश्वास नहीं करता। उसका दम घुटने लगता है अपनी बात बताने के लिए - 'कैसे बताए तब से अब तक / कितनी बार धँसा है वो समंदर में / आग बुझाने / कोई नहीं मानता उसकी बात / कोई नहीं जानता समंदर की थाह।'

स्त्री उनकी कविता में एक बेहद अहम हिस्सा है जो कई रूपों में हमारे सामने आती है क्योंकि जीवन के मरुस्थल में माँ का आँचल ही सुखद छाँह की तरह होता है 'जिसे थाम कर वह कर जाए पार / यह मरुस्थल अछोर / यही नहीं माँ / तू मेरे लिए / विस्मृति में स्मृति है। क्योंकि 'विपुल पृथ्वी / और / निरवधि काल की तरह / होता है माँ का मन।'

यूँ तो घर की तलाश हिंदी के कवियों ने की है लेकिन यहाँ कवयित्री एक बड़ा सवाल उठाती है कि आखिर एक औरत का असली घर कहाँ है? क्योंकि 'कहते तो यही हैं / कि औरत ही घर बनाती है / पर जब भी बात होती है घर की / तो वह हमेशा मर्द का ही होता है / और / वहाँ से निष्कासित / औरत ही होती है।' और अंततः वह इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि औरत का कोई घर नहीं होता क्योंकि - 'पौध मैं यहाँ की नहीं / रुपी एक घर में / ले जाई गई दूसरी ठौर / इन दोनों के बीच की दूरी / नहीं पटी किसी देश, काल, धर्म / किसी भी ठौर।'

सुमन केशरी औरत की नियति पर अफसोस करती हैं कि वह पूरी जिंदगी उम्मीद की एक किरण का एक सिरा पकड़ने की कोशिश तो बहुत करती है लेकिन लाख चाहने पर भी वह उसे प्राप्त नहीं कर पाती। वह समाज को चेतावनी देती हैं कि औरत को सिर्फ देह समझना उसकी सबसे बड़ी भूल है क्योंकि औरत सिर्फ देह भर नहीं बल्कि उससे कहीं ज्यादा है लेकिन पुरुष प्रधान समाज उसे एक वस्तु में तब्दील करना चाहता है। उनकी इन पंक्तियों को देखिए - 'मेरा रंग-रूप निहारती / मुझे देह भर मानती / तुम्हारी नजरें / मुझे कदम बढ़ाने की चुनौती देती हैं / गहरे साहस से / ऊर्जा से भर देती हैं/ उसी से पुनर्नवा / मैं / धो देती हूँ / तुम्हारी दृष्टि के दंश को / अपने धीरज के निर्मल जल से।' इस संग्रह में जहाँ एक ओर बदलते परिवेश और संस्कारों की बात की गई है वहीं हिंदी के प्रति आश्वस्ति भी दिखाई गई है।

सुपरिचित कवयित्री गगन गिल लगभग 3 दशकों से भी अधिक की अपनी रचना यात्रा में पहले ही कविता-संकलन 'एक दिन लौटेगी लड़की' से हिंदी पाठकों का ध्यान आकर्षित कर चुकी हैं। 'मैं जब तक आयी बाहर' उनका सद्य प्रकाशित पाँचवा कविता- संग्रह है। यह संग्रह 4 उपशीर्षकों में विभाजित है। इस संग्रह की पहली कविता 'तुम सूई में से निकलती हो' माँ और बेटी के तादात्म की कविता तो है ही साथ ही व्यवस्था को सँवारने की भी कोशिश है - कौन सी बखिया, माँ / हम सिले जा रहीं / सदियों से / कौन सा यह टाँका / पूरा होने में नहीं आता।' यह स्त्री जाति की नियति ही तो है कि वह घर, समाज, राष्ट्र की दरारों को अपने भरसक सीने का प्रयास करती है लेकिन उसका उत्साह और कोशिश निराशा में बदल जाती है कि जो खुशहाली का सपना उसने देखा, वह पूरा नहीं हो सका।

तार-तार होती स्त्री कुछ पल के लिए ही सही दरकती हुई धरती को थाम लेना चाहती है। उसके भीतर जो हलचल और कोलाहल है, वह बिना छलके, बिना किसी शोर के चुपचाप मनुष्यता को बचा लेना चाहती है। माँ की लाचारी, बेबसी, पीड़ा, दुख, परेशानियाँ, चिंताएँ सभी कुछ कवयित्री को परेशान करते हैं और वह सोचती है कि उसके हिस्से का सुख आखिर क्यों नहीं मिल पाया जिसके आँचल के साये में वह सुरक्षित जीवन बिता पाती।

संग्रह के दूसरे खंड 'ये जो जल मैं पीती हूँ' की कविताएँ सांसारिक बंधनों को तोड़ आध्यात्म का रुख करती हैं लेकिन यहाँ भी चाहत है, कामना है, प्रार्थना है, विवेदन है उस अनदेखे सर्वशक्तिमान ईश्वर से कि उसकी प्रार्थना को सुन लिया जाए। मनुष्य की चाहत न तो जीते-जी कभी खत्म होती है बल्कि मरने के बाद भी बनी रहती है। उसकी कामना है - देखने दो पुरखों को / धुँधली आँख / अपने वंशज / क्षण भर / बस क्षण भर / स्थिर करो / सृष्टि सब / अँधेरे में / ईश्वर।'

उनके मन में उस अज्ञात के प्रति तमाम सवाल हैं जिनका उत्तर देने वाला कोई नहीं। वह पूछती हैं - 'क्यों जाना है तुम्हें उतनी दूर / अकेले-अकेले / बदलना है अपना रूप / अपना चोला?' किसी को जाते हुए देखना बहुत बड़ा दुख है जो कवयित्री नहीं चाहती। हालाँकि यह सच हम सभी को पता है कि जीवन क्षणभंगुर है और मृत्यु अवश्यंभावी है लेकिन फिर भी यह बात हम भूल जाते हैं और तमाम कड़वाहटें, बुराइयाँ, दुश्मनी, गलतियाँ लगातार करते चले जाते हैं। लेकिन यदि हम मृत्यु के सच को जान लें तो संभवतः अपने छोटे से छोटे जीवन को भी सुंदर और साकार बना सकते हैं ठीक उस तितली की तरह जिसकी उम्र बहुत छोटी होती है। फिर भी - 'तितली ने कहा / कुल नौ दिन / मैं तुम्हारे पास हूँ / बगीचा यूँ ही रखना।'

इस पुस्तक के चौथे और अंतिम खंड में वह स्वप्न से बाहर यथार्थ की भावभूमि पर खड़ी दिखाई देती हैं। वह सोचती हैं - 'चाहे कितना भी विषाक्त हो / कभी-कभी / कह देना चाहिए अपना सच। और जब वह अपनी स्वप्निल दुनिया और एकांत से बाहर आती हैं, उन्हें एहसास होता है - 'मैं जब तक आयी बाहर / एकांत से अपने / बदल चुका था/ रंग दुनिया का / अर्थ भाषा का / मंत्र और जप का / ध्यान और प्रार्थना का।'

कह सकते हैं कि गगन गिल की ये कविताएँ सच को स्वीकारती लेकिन समाज से अपना प्रतिरोध दर्ज कराती हैं भले ही इनका मर्म बदल चुका हो। ये कविताएँ आध्यात्मिक और रहस्य के आवरण में लिपटी दुख, करुणा और एकांत से उपजी हैं।

ज्योति चावला एक साथ कवि और कहानीकार हैं। अपने पहले ही कविता-संग्रह 'माँ का जवान चेहरा' से वह अपनी मजबूत उपस्थिति हिंदी पाठकों के बीच दर्ज करा चुकी हैं। उनका 'जैसे कोई उदास लौट जाए दरवाजे से' पिछले वर्ष प्रकाशित दूसरा कविता-संग्रह है जिसमें स्त्री की अलग-अलग पार्श्वछवियाँ हैं। कह सकते हैं कि ये कविताएँ स्त्री विमर्श को एक नई दिशा देती हैं। यहाँ नाउम्मीदी में भी उम्मीद की एक नई किरण है। बल्कि कहा जा सकता है कि ये कविताएँ स्त्री निर्मिति की कविताएँ हैं।

ज्योति चावला को ऐसी लड़कियाँ पसंद हैं जो परंपरा की मजबूत दीवारों को ध्वस्त करके अपने लिए एक नई इबारत तैयार करती हैं। यही कारण है कि उन्हें न जाने क्यों झूठ बोलती लड़कियाँ अच्छी लगती हैं क्योंकि वे झूठ बोलकर अक्सर कहती हैं कि दुनिया खूबसूरत है, इसे ऐसा ही होना चाहिए।

ज्योति का मानना है कि लड़किया कभी भी 'न' नहीं बोल पातीं, उनसे जो-जो कहा गया, चुपचाप वे उसे मानती गईं, इसलिए नकारने की भाषा वे भूल गईं और इसी कारण तमाम दुखों, तकलीफों, प्रताड़ना और शोषण को सहती रहीं।

इन कविताओं में रिश्तों की गहन पड़ताल ही नहीं की गई है बल्कि उनकी अहम् भूमिका भी बताई गई है। आज जब वैश्वीकरण के प्रभाव में रिश्ते संकुचित होते जा रहे हैं। बड़े-बुजुर्गों के लिए समय और संवेदना सिकुड़ती जा रही है, ज्योति को अपनी नानी की पीड़ा और संघर्ष बड़ी शिद्दत से याद आते हैं। इस कविता में वे स्त्री के भीतर छिपे तमाम दुख-दर्द को समाज के सामने ला देती हैं कि एक स्त्री कैसे चुपचाप अपनी नियति समझकर सब कुछ बर्दाश्त करती रहती है बिना किसी शिकायत और सवालों के।

ज्योति चावला अपनी अजन्मा बेटी के लिए उसके होने वाले पिता से यह वायदा चाहती हैं कि बेटी के प्रति प्यार के सारे प्रतिमान बदलकर उसे केवल बेटी के रूप में ही स्वीकार किया जाए। क्योंकि अक्सर होता यह है कि अनजाने में ही सही माता-पिता से अपनी बेटियों के बारे में यह सुना जाता है कि यह हमारी बेटी नहीं बेटा है, जिसे ज्योति उचित नहीं समझती।

उन्हें जहाँ एक ओर झूठ बोलती लड़की अच्छी लगती है वहीं उन्हें बारिश में भीगती लड़कियाँ पसंद हैं। यही नहीं उन्हें हँसती-मुस्कुराती लड़कियाँ अच्छी लगती हैं जिन्होंने तय की गई परिभाषाओं से अपनी एक अलग दुनिया रची हो। यही नहीं वह निडर हो, थोड़ी बेफिक्र, थोड़ी लापरवाह हो और बिना किसी संकोच के 'जो लिख देती है शहर की दीवारों पर / कि उसने कई प्रेम किए हैं और यह भी / कि इनमें से अधिकांश में उसे मिला है धोखा ही / और फिर भी जिसके प्रोफाइल पिक्चर में मिलती है / बेलौस खिलखिलाती उसकी बेजोड़ तस्वीरें।'

कह सकते हैं कि ज्योति चावला एक सजग नागरिक की तरह एक ऐसी दुनिया रचना चाहती हैं जहाँ कहीं कोई उदासी न हो। उनका यह संग्रह आज की कविता की दुनिया में उनकी पहचान को और अधिक पुख्ता करेगा, ऐसा मेरा भरोसा है।

युवा लेखिका तिथि दानी ढोबले का 'प्रार्थनारत बत्तखें' पहला ही काव्य संग्रह है। इन कविताओं को पढ़कर यह उम्मीद जगती है कि आज कविता की दुनिया वीरान नहीं हुई है बल्कि भरपूर समृद्ध हो रही है। आज की समकालीन कविता पर जहाँ यह आरोप लगता है कि कविता से मनुष्यता और प्रकृति प्रायः लुप्त हो रही है उसका सटीक जवाब ये कविताएँ देती हैं। यही नहीं तिथि दानी अपने समय और समाज को भी नहीं भूलती बल्कि उसके साथ कदमताल चलती दिखाई देती हैं। उनकी एक अतिरिक्त विशेषता यह है कि वह आज के भयावह समय में भी खुशहाली की उम्मीद करना नहीं छोड़ती और अपनी जमीन पर पाँव जमाकर रखती आगे बढ़ती हैं।

वे इस संग्रह की शीर्ष कविता प्रार्थनारत बत्तखें में बत्तखों के नजरिए से दुनिया को देखने-समझने की कोशिश करती हैं। इन बत्तखों को देखने-सुनने से न केवल मनुष्य अपनी हर तकलीफ को भूल जाना चाहता है बल्कि कुछ पल के लिए एक नई उम्मीद और आशा का संचार उसके थके, बीमार और बोझिल मन में होने लगता है। भूमंडलीकरण का दुष्प्रभाव या कोई भी खतरा इन स्वच्छंद बत्तखों को नहीं सालता। इसीलिए वे निर्भय और निर्द्वंद्व होकर इधर-उधर घूमती जिंदगी को पूरी उमंग और उल्लास के साथ जीती हैं।

'दो सहेलियाँ झूले पर' कविता में कवयित्री मासूम और कोमल बचपन की ओर संकेत करती है कि बिना किसी तनाव और फिक्र के बच्चे अपना जीवन जीते हैं क्योंकि उन्हें दुनियादारी की न तो चिंता है और न ही कोई डर। काश हम अपनी पूरी जिंदगी इसी वातावरण में गुजार पाते लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है - खतरा और चिंताएँ भी बढ़ने लगती हैं। बचपन को उनकी खुशियाँ देने के लिए मानो पृथ्वी ने भी पूरी तैयारी कर ली है और उनको आश्वस्त करना चाहती है कि 'पृथ्वी ने भाँप ली है उन सहेलियों की योजना / और, / डेफोडिल्स के कालीन बिछाकर / उन्हें कर दिया है इशारा / कि,/ पृथ्वी अब भी उर्वर है, संभावनाओं से भरी है, / और नहीं चाहती है अपने प्राण गँवाना।'

वह सपनो को परिभाषित करने की जद्दोजहद में है लेकिन सपने तो आखिर सपने होते हैं। वह पीछे मुड़कर माँ को याद करती है और स्मृतियों के पन्ने पलटते उसे माँ की कई बातें बहुत शिद्दत से याद आने लगती हैं, जिसने उसे न केवल चलना सिखाया बल्कि दुनिया से लड़ने का हौंसला भी दिया और विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी खुद को सँभालना सिखाया।

तिथि जिंदगी का पाठ भी पढ़ना चाहती हैं तो प्रकृति को समझने का भरपूर यत्न भी करती हैं। उन्हें अपने वक्त के बदलने का इंतजार है। वह अफसोस करती हैं कि एक निम्नश्रेणी के कर्मचारी को कभी वह सम्मान और इज्जत क्यों नहीं मिलती जबकि हर वक्त वह अपना काम बड़ी मेहनत और ईमानदारी से करता है। अगर वह किसी दुर्घटना का शिकार भी हो जाए तो कोई उसे तवज्जो नहीं देता, जैसे उसकी जान की कोई कीमत न हो।

कवयित्री हर व्यक्ति, हर गली, हर चौराहे पर मुस्कराहट देखना चाहती हैं। वह सोचती हैं - कैसा होगा वह दिन जब / अचानक किसी को बिना बात मुस्कुराते देख / कोई बच्चा अपने पिता से पूछेगा - / पापा ऐसे ही लोग होते हैं क्या, जिनको पागल कहते हैं ? / फिर थाह सकेंगे क्या हम / बेवजह मुस्कुराते अलहदा लोगों के / चेहरों के पीछे छिपी कोई अदद वजह / और डाल सकेंगे बीज इनके / अपने जज्बातों की जमीं पर ?'

इस संग्रह में प्रकृति है, पेड़-पौधे हैं, चिड़िया है, सूरज है, मासूमियत है, बच्चे हैं और सबसे बढ़कर है उम्मीद। क्योंकि उम्मीद ही वह शक्ति है जो हमें जीवित रखे हुए है और इसी उम्मीद में वह चाहती हैं कि स्त्रियाँ जुगनू बन जाएँ क्योंकि उनका मानना है कि - 'स्त्रियाँ प्रार्थना करती हैं / पलक झपकते ही जोड़ लेती हैं / वे ईश्वर से अपने तार / स्त्रियों की प्रार्थनाएँ / वाकई होती हैं काफी अलग / वे खुद के लिए नहीं माँगती सब कुछ / सब कुछ माँगती हैं वे / सबके लिए।'

इस संग्रह की कविताएँ आज के तनावपूर्ण वातावरण में उम्मीद और आशा के एक सुखद झोंके की तरह हमें आश्वस्त करती हैं कि दुनिया इतनी भी बुरी नहीं, बस उसको जानने, परखने, बरतने के लिए हमें न केवल उम्मीद बनाए रखना चाहिए बल्कि एक खूबसूरत दुनिया का सपना भी देखना चाहिए। ये कविताएँ हमारे भीतर के डर से संघर्ष करके उसे जीतने का हौंसला भी देती हैं।

'आश्चर्यवत्' युवा कवयित्री मोनिका कुमार का पहला ही संग्रह है लेकिन इन कविताओं को पढ़कर आश्वस्त हुआ जा सकता है कि ये कविताएँ हमारे समय के सवालों से टकराती समकालीन काव्य जगत में सार्थक हस्तक्षेप ही नहीं करतीं बल्कि अपने लिए एक नया पथ भी बनाती हैं। इन कविताओं में प्रश्नाकुलता के साथ जिज्ञासा भी दिखाई देती है। लेकिन जिज्ञासाएँ लिजलिजी भी हो सकती हैं, सोचकर वे बिना समाधान ढूँढ़े आगे बढ़ जाती हैं। चूँकि जिज्ञासा हमें परमुखापेक्षी ही बनाती हैं और परमुखापेक्षी होना किसी भी तरह से अच्छा नहीं होता इसलिए वे खुद ही अनुमान लगाना बेहतर समझती हैं भले ही अनुमान सही हो या गलत।

मोनिका के यहाँ प्रेम के अलग-अलग चित्र हैं। एक तरफ वह कहती हैं - 'प्रणय प्रस्ताव के प्रत्युत्तर में / तुम्हें देने के लिए / मेरे पास राई के दाने जितना दिल है, / यह तुम देखो / इतना छोटा दिल अगर ठीक होगा / प्रेम के लिए।' तो दूसरी तरफ उन्हें लगता है कि चुंबन और आलिंगन असफल प्रेम को सहने की युक्ति होता है और इस असफलता को प्रेमिका महसूस करती है - 'प्रेमिका को लगता है / उसने किया बहुत प्रेम / पता नहीं क्या है जो पूरा नहीं पड़ता।

मोनिका के मन में प्रेम के प्रति विरक्त भाव आ जाता है और उन्हें लगता है कि 'घर प्रेम के बगैर भी चलने लगता है जैसे / जीवन की खुशी में इसका कोई स्थान नहीं।' लेकिन अपनी आसक्ति को जानकर उन्हें लगता है कि वे केवल प्रेम करने के लिए दुनिया में आई थीं। वहीं उन्हें प्रेम की तलाश है और प्रतीक्षा है - विनम्र साँसों की आग में जो जल सके / उजले पानी में जो डूब सके, / विनम्र जीवन के हर क्षण / वह ऐसे प्रेमी की प्रतीक्षा करती है।'

इस संग्रह में स्त्री के सच का भी जहाँ-तहाँ देखा जा सकता है। यद्यपि सब्जी जलना एक मामूली बात हो सकती है लेकिन एक स्त्री के लिए यह बहुत दुख और उदास करने वाली बात है क्योंकि वह बहुत मेहनत और यत्न से सब्जी को बनाती है लेकिन अचानक ध्यान भग्न हो जाने के कारण सब्जी के जल जाने से वह न केवल झुँझला उठती है कि उसकी मेहनत बेकार हो गई बल्कि उसे उदास भी कर देती है - वह हल्के हाथों से / सब्जी हिलाकर / कड़ाही के छोर पर / करछुल से ठक-ठक करती / अग्नि को विदा देती है / किसी दिन वह इस अंतिम स्पर्श से चूक जाती है / सम्मेहक गंध से उसे झपकी आती है / झुँझलाकर जगती वह / जली हुई सब्जी को देखती है / रसोई की खिड़कियाँ खोल देती है / और दिन भर उदास रहती है।'

मोनिका के यहाँ निराशा और हताशा से उपजी कविताएँ भी हैं। सहज स्वाभाविक है कि आज हम समाज में ऐसा वातावरण देखते हैं कि हर कोई तनावग्रस्त नजर आता है। मशीनीकरण के इस युग में खुशियाँ धीरे-धीरे मानो कहीं गायब होती जा रही हैं। यही कारण है कि मनुष्यता से हमारा विश्वास लगभग उठ चुका है क्योंकि ऐसी बहुत सी घटनाएँ हम आए दिन घटते हुए देखते हैं। अवसाद और एकांत अब हमारे लिए अनिवार्य जगह बना चुका है। हमारे चाहने न चाहने से कुछ नहीं होता। समय का पहिया लगातार चलता रहता है - 'अवसाद के दिनों / बेल चली / फूल खिले / पत्तियाँ आईं और झड़ गईं / पर फूल के चारों ओर / वे जैसे-तैसे खिली थीं / जैसे मैं खड़ी थी लोगों के बीच / अपनी आँखों से इस्तीफे बाँटते हुए।' फिर भी 'एकांत के अरण्य में / आत्मीय एक फूल खिल गया है। और इसी अवसाद के सदमे से उबरने की वे कोशिश करती हैं लेकिन उनको लगता है - 'सदमे से उभरा वैराग्य / छोटी दुश्मनियों और नफरतों से आजाद कर देता है / यह वैराग्य ऐसे विषाद से परिचय कराता है / जो अपने नयेपन की वजह से इतना अजनबी होता है / कि भरे हुए पेट में तुरंत खालीपन कर देता है / और मुँह से स्वाद छीन लेता है।'

इस संग्रह में कुछ निजी और वैयक्तिक कविताएँ भी हैं जैसे 'मैं और मेरे विद्यार्थी' तथा 'मैं कहाँ मेरा नाम कहाँ', जो गैरजरूरी लगती हैं।

अनुराधा सिंह ने अपने पहले ही संग्रह 'ईश्वर नहीं नींद चाहिए' से पाठकों का ध्यान न केवल आकर्षित किया है बल्कि अपनी एक सुरक्षित जगह और अलग पहचान बनाई है। इस संग्रह में प्रेम के बहाने वे स्त्री की घनीभूत पीड़ा को समाज के सामने लाई हैं। वे समकालीन काव्य परिदृश्य में एक सार्थक हस्तक्षेप करती दिखाई देती हैं। उनकी सहज, सरल अभिव्यक्ति इन कविताओं को खास बनाती है। कहीं कोई बनावट या कृत्रिमता नहीं दिखती इसलिए भी अधिक विश्वसनीय लगती हैं।

इन कविताओं में एक ओर प्रेम चाहती स्त्री है तो दूसरी ओर वह समाज से शिकायत भी करती है और प्रश्न भी पूछती है और अपने घाव दिखाने में भी संकोच नहीं करती। इनमें केवल स्त्री अस्मिता या पितृसत्तात्मक समाज से बावस्ता स्त्री ही नहीं बल्कि एक सजग और चेतनाशील स्त्री भी है।

इस संग्रह की स्त्री केवल हमारे आस-पड़ोस की ही नहीं है बल्कि तमाम देशों की स्त्रियों के दुख-दर्द भी शामिल हैं। कह सकते हैं कि संपूर्ण मनुष्यता को अपने भरसक सामने लाने की एक कोशिश है जहाँ सर्वस्व न्यौछावर कर देने पर भी उसे कुछ हासिल नहीं होता। वह सोचती है - धरती से सब छीनकर मैंने तुम्हें दे दिया / कबूतर के वात्सल्य से अधिक दुलराया / बाघ के अस्तित्व से अधिक संरक्षित किया / प्रेम के इस बेतरतीब जंगल को सींचने के लिए / चुराई हुई नदी बांध रखी अपनी आँखों में / फिर भी नहीं बचा पाई कुछ कभी हमारे बीच / क्या सोचती होगी पृथ्वी / औरत के व्यर्थ गए अपराधों के बारे में।'

कवयित्री कहना चाहती है कि सैद्धांतिक बातों से बात नहीं बनने वाली बल्कि उसे व्यवहार में उतारना बेहद आवश्यक है क्योंकि उसे लगता है कि - जिन्होंने प्रेम और स्त्री पर बहुत लिखा / दरअसल उन्होंने ही किसी स्त्री से प्रेम नहीं किया।' वह यही नहीं रुकती बल्कि मनुष्यता को बचा लेना सबसे जरूरी मानती हैं - 'शब्द लिखे जाने से अहम था / मनुष्य बने रहना।' अनुराधा सिंह पितृसत्तात्मक समाज से सवाल करती हैं कि आखिर स्त्रियों से उसकी अपेक्षाएँ क्या हैं। क्योंकि त्याग और समर्पण तो स्त्रियाँ करती हैं जबकि उसका फल पुरुषों को मिलता है लेकिन फिर भी वे संतुष्ट नहीं होते और वे उसके कृतज्ञ होना तो दूर, उसका शोषण करने से भी नहीं चूकते - 'तुम लिखना चाहते थे कविता / वह स्याही बन फैल गई शिराओं में / सबने कहा, वाह! खून से लिखते हो / तुमने प्रेम कविता सुनाई / वह बन गई कान / और फिर आँच बन कर रो दी / कि उसमें कहीं नहीं था उसका नाम।' आगे वह पूछती हैं - 'वह हर भूमिका में तुम्हारे भीतर छिपा / प्रेमी ढूँढ़ती है / तुम जाने क्या-क्या चाहते हो स्त्री से।'

इस संग्रह की शीर्ष कविता में अनुराधा सिंह ईश्वर से भी ज्यादा जरूरी नींद को मानती हैं क्योंकि स्त्रियों को न जाने कितनी बार अपनी कीमती नींद की कीमत चुकानी पड़ती है इसीलिए तो औरतों को ईश्वर नहीं बल्कि नींद की जरूरत है - 'नींद ही वह कीमत है / जो उन्होंने प्रेम परिणय संतति / कुछ भी पाने के एवज में चुकाई / सोने दो उन्हें पीठ फेर आज की रात / आज साथ भर दुलार से पहले / आँख भर नींद चाहिए उन्हें।'

कवयित्री जब दुनिया की उन तमाम औरतों के दुख-दर्द के बारे में सोचती है तो उसे अपने बदतर हालात भी बहुत बेहतर लगने लगते हैं - मैं बहुत बेहतर थी / लीबिया, सीरिया की बेटियों और अफगान औरतों से / बहुत बेहतर थी मैं उन औरतों से / जिनके दुख दिखते हैं / जो छाती पीट कर रो सकती हैं / पछाड़ खा सकती हैं विलाप कर सकती हैं / नहीं दिखा सकती मैं अपने जख्म / किसी पेचीदा मरहम को / नहीं माँग सकती बेनींद रातों का हिसाब / एहतियाती सिरहाने से / नहीं रोई कभी / क्योंकि मैं सबसे बेहतर थी।'

मुझे पूरी उम्मीद ही नहीं विश्वास भी है कि अनुराधा सिंह समकालीन कविता की दुनिया में अपनी एक मुकम्मल पहचान ही नहीं बनाएँगी बल्कि एक अलग और नई लकीर भी खींचेगीं।


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