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हिंदी पत्रकारिता के काल-विभाजन एवं नामकरण की समस्या
पुष्पेंद्र कुमार


इतिहास-लेखन एक दुष्कर एवं श्रमसाध्य कार्य है। यह वैज्ञानिक निरीक्षण, सचेत इतिहास-दृष्टि एवं तटस्थ व्याख्या की माँग करता है। परंतु विशाल अतीत के सभी पहलुओं की संपूर्ण अभिव्यक्ति एक ही स्थल पर संभव नहीं। अतः इतिहासकार काल-विशेष संबंधी किसी खास प्रवृत्ति अथवा विषयों का ही चयन कर पाता है। अतीत-अध्ययन के इस चयनित दृष्टिकोण से भ्रामक अथवा एकांगी इतिहास प्रस्तुति के खतरे भी उत्पन्न होते हैं। ऐसे में इतिहासकार 'अतीत' के सटीक संशोधन हेतु किसी युग-विशेष का अध्ययन; उसकी विभिन्न स्थितियों, महत्वपूर्ण घटनाओं एवं संक्रमणशील परिस्थितियों में अंतर्निहित समान प्रकृति के आधार पर करता है। 'अतीत' निरीक्षणोपरांत जिस तटस्थ व्याख्या को इतिहास-लेखन का आधार माना गया है, उसकी ग्राह्यता बिना उसके सरल, संक्षिप्त और क्रमवार प्रस्तुति के संभव नहीं। इतिहासकार इतिहास-अध्ययन और लेखन संबंधी इस दुरूहता का समाधान; संदर्भित अतीत की पृष्ठभूमि एवं प्रकृति के अनुरूप काल-विभाजन एवं उसके नामकरण द्वारा करता है। काल-विभाजन एवं उसका नामकरण, इतिहास-लेखन अथवा अध्ययन को न मात्र एक प्रवृत्तिपरक ऊर्ध्व दिशा प्रदान करता है अपितु तथ्यों, संदर्भों और आँकड़ों के भँवरजाल से निकलकर एक उद्देश्यपरक, संक्षिप्त और स्पष्ट अतीत की यथार्थ प्रस्तुति में भी सहायक सिद्ध होता है, जहाँ प्रस्तुत इतिहास अतीत, वर्तमान और भविष्य के मध्य संवाद का माध्यम बन सके। यद्यपि किसी अनुशासन अथवा विधा में एक ही कालखंड, कालखंडों अथवा संपूर्ण विकासयात्रा पर लिखे गए इतिहास में 'प्रवृत्तियों' एवं 'उद्देश्यों' की भिन्नता इतिहास-प्रस्तुतियों/व्याख्याओं को एक-दूसरे से अलग भी करती हैं।

यदि हम किसी अनुशासन अथवा विधा के अंतर्गत लिखे गए विभिन्न इतिहासों का सम्यक् अध्ययन करें तो पाएँगे कि इतिहासकारों द्वारा परस्पर एक ही धरातल पर कुछेक उद्घाटनों, प्रवृत्तियों, घटनाओं, संदर्भों और स्थापनाओं को छोड़कर कमोबेश समान कालखंड(कालावधि) अथवा नामकरण द्वारा ही इन्हें प्रस्तुत किया गया है। परंतु क्या भारतीय पत्रकारिता के इतिहास-लेखन के संबंध में यही स्थिति विद्यमान है? संभवतः नहीं। पत्रकारिता अन्य अनुशासनों से कई विषयों, स्तरों और माध्यमों में नितांत भिन्न है। तत्कालीन घटनाओं, प्रतिक्रियाओं एवं कार्यवाहियों की प्रत्यक्षदर्शी पत्र-पत्रिकाएँ समाज की वंशीय, वर्गीय, जातीय, लैंगिक एवं अन्य सामाजिक विभेदों के अनुसार ही विविधरूपी होती हैं। ये मात्र समाज से प्रभावित नहीं होतीं अपितु उसे प्रभावित भी करती हैं। ऐसे में पत्रकारिता के सम्यक् अनुशीलन के लिए इन सभी विभेदों एवं उनके विभिन्न स्तरों की अभिज्ञता आवश्यक है। यद्यपि एक ही स्थल पर इन सभी विभेदों/स्तरों का कमोबेश उल्लेख तो संभव है परंतु एकरेखीय प्रवृत्तिमूलक इतिहास-लेखन संभव नहीं। संभवतः यही कारण है कि भारतीय पत्रकारिता अथवा विभिन्न भाषाई पत्रकारिता के इतिहास संबंधी काल-विभाजन एवं नामकरण एक-दूसरे से नितांत भिन्न हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में इतिहास-लेखन संबंधी इस दुविधा अथवा चुनौती को 'हिंदी पत्रकारिता के इतिहास-लेखन' में विभिन्न इतिहासकारों/विद्वानों द्वारा किए गए काल-विभाजन एवं नामकरण के माध्यम से समझा जा सकता है।

हिंदी पत्र-पत्रिकाओं संबंधी इतिहास-लेखन का प्रथम प्रयास बाबू राधाकृष्णदास द्वारा किया गया। उनकी पुस्तक 'हिंदी भाषा के सामयिक पत्रों का इतिहास' एक संक्षिप्त विवरणात्मक इतिहास है, जिसे 1894 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित किया गया। उस समय तक उन्हें जितनी सामग्री उपलब्ध हुई, उसे उन्होंने अपनी पुस्तक में संकलित कर दिया। प्रथम प्रयास होने के कारण इसमें अनुसंधानात्मक प्रवृत्ति की कमी और तथ्यात्मक त्रुटियाँ भी दिखाई पड़ती हैं। 1 इतिहास-लेखन संबंधी दूसरा प्रयास संभवतः बाबू बालमुकुंद गुप्त द्वारा किया गया। बीसवीं सदी के प्रथम दशक में 'भारत मित्र' के माध्यम से उन्होंने 'हिंदी समाचारपत्रों का इतिहास' लिखना आरंभ किया। परंतु मृत्यु से पूर्व वह इसे पूरा न कर सके। यह एक व्यवस्थित परंतु सूचनापरक इतिहास मात्र है। बाबू राधाकृष्णदास की भाँति इन्होंने भी 'बनारस अखबार' को हिंदी का पहला पत्र माना था। इस क्षेत्र में एक अन्य प्रयास पं. विष्णुदत्त शुक्ल ने 'विशाल भारत' के माध्यम से 'हिंदी पत्रकार कला का इतिहास' लिख कर किया, परंतु वह हिंदी पत्रकारिता का कोई स्पष्ट स्वरूप निर्धारित न कर सके। हिंदी साहित्य के मूर्द्धन्य इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी अपनी चर्चित पुस्तक 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में हिंदी पत्रकारिता के उद्भव और विकास का संक्षिप्त विश्लेषण किया है। शुक्ल जी द्वारा हिंदी पत्रकारिता पर किए गए विचार के संबंध में कृष्णबिहारी मिश्र लिखते हैं - "शुक्लजी ने अपने इस इतिहास में साहित्य की विविध धाराओं का गंभीर अनुशीलन प्रस्तुत किया है। पत्रकारिता के माध्यम से भाषा और साहित्य को विकास-बल मिला है, इसलिए साहित्यिक इतिहास-निर्माण के समय पत्रकारिता के विकास-क्रम तथा साहित्य के इतिहास की अन्य विकास-भूमियों पर दृष्टिपात करना आवश्यक था। शुक्लजी ने उधर दृष्टि तो डाली किंतु प्रामाणिक यथार्थ की उपलब्धि इसलिए नहीं हो सकी क्योंकि उस दिशा में शुक्लजी की शोधवृत्ति दब-सी गई थी। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि शुक्ल जी के अनुशीलन की दिशा दूसरी थी, उद्देश्य दूसरा था। कदाचित् इसीलिए उनसे तथ्य-संबंधी कई भूलें हो गईं। ऐसा प्रतीत होता है कि राधाकृष्णदास के इतिहास को उन्होंने आधार बनाया और अधिकांश तथ्यों को यथावत अपने इतिहास में रख दिया।" 2

अनंतर रामरतन भटनागर ने हिंदी पत्रकारिता पर अंग्रेजी में 'राइज एंड ग्रोथ ऑफ हिंदी जर्नलिज्म' (हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में पीएचडी हेतु किया गया प्रथम शोध) नामक 768 पृष्ठों की एक पुस्तक प्रकाशित की, जो 1846 से 1945 ई. तक प्रकाशित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का एक विवरणात्मक संग्रह है। यद्यपि हिंदी पत्रकारिता के इतिहास-लेखन के क्षेत्र में यह प्रथम व्यवस्थित कृति कही जा सकती है, तथापि प्रकाशन-काल की अशुद्धि, अप्रामाणिक तथ्य, विवेचनात्मक अध्ययन एवं अनुसंधान प्रवृत्ति का अभाव यहाँ भी बना रहा। अंबिकाप्रसाद वाजपेयी इस शोध-ग्रंथ के संदर्भ में लिखते हैं - "भटनागरजी अपनी कृति से डॉक्टर तो बन गए, पर उनसे जिस शोध और परिश्रम की अपेक्षा की जाती थी, उसका परिचय उनके ग्रंथ से नहीं मिलता। जान पड़ता है कि उन्होंने संग्रह को ही अधिक महत्व दिया, फलतः 'यद्दृष्टं तल्लिखितं' को ही कर्तव्य मान लिया।"3 एक अन्य महत्वपूर्ण प्रयास दक्षिण में श्री वेंकटलाल ओझा द्वारा किया गया। उन्होंने बहुत ही परिश्रम से 1826 से 1925 ई. तक सौ वर्षों में प्रकाशित हिंदी समाचारपत्रों की एक सूची तैयार की। इसे समाचारपत्र संग्रहालय, हैदराबाद द्वारा 'हिंदी समाचारपत्र सूची'(भाग-1 तथा भाग-2) नाम से प्रकाशित किया गया है। यह संग्रह प्रारंभिक शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, परंतु संवत् को ई. सन् में बदलने के क्रम में (पुस्तक में अंग्रेजी सन् के अनुसार सभी पत्रों का वर्णन है) कई स्थलों पर एक साल तक का अंतर आ गया है। कई उर्दू, बांग्ला और संस्कृत के पत्रों को भी हिंदी का पत्र मानकर उल्लेख किया गया है। ओझाजी ने भूलवश कुछ पुस्तकों को भी समाचारपत्र मान लिया है। 4

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास-लेखन का प्रथम प्रामाणिक प्रयास 1953 ई. में संपादकाचार्य पं. अंबिकाप्रसाद वाजपेयी द्वारा लिखित 'समाचारपत्रों का इतिहास' (सं. 2010) है। हिंदी पत्रकारिता के आधार-स्तंभों में एक वाजपेयी जी को हिंदी पत्रकारिता के विकास और विभिन्न चरणों का एक लंबा अनुभव प्राप्त था। साथ ही हिंदी पत्रकारिता के इतिहास-लेखन संबंधी किए गए प्रयासों और खामियों से वह स्वयं परिचित थे। अपनी इतिहास-पुस्तक की भूमिका में वह लिखते हैं - "यह काम जितना श्रम, शक्ति और अर्थसाध्य है, उसका इस लेखक में अत्यंत अभाव था और इस अभाव में जो कसर थी, वह रुग्णता ने पूरी कर दी। ...अनाधिकार चेष्टा इसलिए की गई कि लेखक को गत 48-49 वर्षों की पत्रकारिता का जो अनुभव था और पुराने संपादकों के सत्संग से जो जानकारी प्राप्त हुई थी, उसका अंत उसके साथ ही हो जाना न लेखक को अभीष्ट था और न उनके मित्रों को।" 5 यद्यपि कतिपय विद्वानों ने इस पुस्तक की कलेवर-लघुता, कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों की वैशिष्ट्य चर्चा का अभाव तथा कुछ स्थलों पर प्रकाशन-काल संबंधी भूलों के आरोप लगाये हैं (कई स्थलों पर स्वयं वाजपेयीजी भी उक्त पत्र-पत्रिका संबंधी भ्रम की स्थिति स्वीकारते हैं) तथापि उपलब्ध सामग्रियों के आधार पर क्रमवार विषय-वैशिष्ट्य सहित यह इतिहास-पुस्तक आज भी प्रथम प्रामाणिक संदर्भ स्रोत के रूप में विद्वानों में स्वीकार्य है।

अद्यतन हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास संबंधी कई प्रवृत्तिपरक, विषयपरक एवं अनुसंधानपरक महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं। इनमें क्षेत्र-विशेष की हिंदी पत्रकारिता संबंधी कार्य भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास-लेखन संबंधी कुछ महत्वपूर्ण कार्यों में डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र का प्रामाणिक शोध प्रबंध कलकत्ता की 'हिंदी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण-भूमि', डॉ. रमेश कुमार जैन की 'हिंदी पत्रकारिता का आलोचनात्मक इतिहास', डॉ. वेदप्रताप वैदिक द्वारा संपादित 'हिंदी पत्रकारिता : विविध आयाम', डॉ. कैलाश नारद की 'मध्यप्रदेश में हिंदी पत्रकारिता : राष्ट्रीय नवउद्बोधन', विजयदत्त श्रीधर संपादित 'मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास', डॉ. मधुकर भट्ट द्वारा लिखित 'वाराणसी और प्रयाग की पत्रकारिता (सन् 1850 से 1950)', डॉ. ब्रह्मानंद की 'भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और उत्तर प्रदेश की हिंदी पत्रकारिता', डॉ. रामचंद्र तिवारी की 'पत्रकारिता के विविध रूप' तथा डॉ. अर्जुन तिवारी द्वारा लिखित 'हिंदी पत्रकारिता का बृहद् इतिहास' प्रमुख हैं। अंबिकाप्रसाद वाजपेयी से शुरू हुई अनुसंधानपरक तथा प्रवृत्तिमूलक गंभीर परंपरा में अद्यतन दो दर्जन से अधिक इतिहास-पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं, परंतु इन पुस्तकों में हिंदी पत्रकारिता के उद्भव और विकास संबंधी काल-विभाजन एवं नामकरण का कोई सर्वमान्य स्वरूप प्रस्तुत नहीं हो पाया है। कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण द्रष्टव्य हैं -

सर्वप्रथम बाबू बालमुकुंद गुप्त ने हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा (1826 ई. से बीसवीं सदी के प्रथम दशक तक) को तीन चरणों में विभाजित किया था -

1. प्रथम चरण - 1845 से 1877 ई.

2. द्वितीय चरण - 1877 से 1890 ई.

3. तृतीय चरण - 1890 ई. से के बाद...6

डॉ. रामरतन भटनागर ने अपने शोध-ग्रंथ 'राइज एंड ग्रोथ ऑफ हिंदी जर्नलिज्म (1826-1945)' में हिंदी पत्रकारिता के विकास को चार कालखंडों में विभाजित किया है -

1. आरंभिक युग - 1826-1867 ई.

2. उत्थान तथा अभिवृद्धि युग : (क) प्रथम चरण - 1867-1883 ई.

(ख) द्वितीय चरण - 1883-1900 ई.

3. विकास युग : (क) प्रथम चरण - 1900-1921 ई.

(ख) द्वितीय चरण - 1921-1935 ई.

4. आधुनिक युग- 1935-1945 ई.7

हिंदी पत्रकारिता पर प्रथम प्रामाणिक, वैशिष्ट्यपरक और श्रमसाध्य इतिहास लिखने वाले संपादकाचार्य पं. अंबिकाप्रसाद वाजपेयी ने अपनी पुस्तक 'समाचार पत्रों का इतिहास' (प्रथम संस्करण, सं.2010) के दूसरे भाग 'हिंदी-समाचारपत्रों का इतिहास' के विभिन्न पड़ावों को इस प्रकार प्रस्तुत किया है -

1. प्रारंभकाल के हिंदी के पत्र

2. दूसरे दौर के पत्र

3. तीसरे दौर के पत्र

4. नए युग की झलक

5. दैनिक पत्रों का युग 8

हिंदी साहित्य के आद्यंत विकास को लिपिबद्ध करने के उद्देश्य से नागरी प्रचारिणी सभा, काशी की महत्वकांक्षी परियोजना के रूप में 16 भागों में प्रकाशित 'हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास' के भाग-13 (संपादक-डॉ. लक्ष्मीनारायण 'सुधांशु') में डॉ. माहेश्वरी सिंह 'महेश' ने हिंदी पत्रकारिता का काल-विभाजन इस प्रकार किया है -

1. प्रथम उत्थान- 1826-1867 ई.

2. द्वितीय उत्थान- 1867-1920 ई.

3. आधुनिक काल- 1920 ई. के बाद 9

कलकत्ता की हिंदी पत्रकारिता पर केंद्रित चर्चित पुस्तक 'हिंदी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि' के लेखक कृष्णबिहारी मिश्र ने भारतीय पत्रकारिता के विकास को राष्ट्रीयता के विकास से जोड़कर देखा है। उन्होंने इस शोध-ग्रंथ में हिंदी पत्रकारिता को निम्नलिखित कालखंडों में विभाजित किया है -

1. भारतीय नवजागरण और हिंदी पत्रकारिता का उदय - 1826-1867 ई.

2. राष्ट्रीयता का विकास और हिंदी पत्रकारिता का दूसरा दौर - 1867-1900 ई.

3. बीसवीं शताब्दी का आरंभ और हिंदी पत्रकारिता का तीसरा दौर - 1900-1947 ई.

(क) हिंदी पत्रकारिता का तिलक युग - 1900-1920 ई.

(ख) हिंदी पत्रकारिता का गांधी युग - 1920-1947 ई.

4. सांप्रतिक पत्रकारिता - आदर्शों में विघटन और मनोबल का ह्रास (1947 के बाद) 10

डॉ. रामचंद्र तिवारी ने अपनी पुस्तक 'पत्रकारिता के विविध रूप' में हिंदी पत्रकारिता का काल-विभाजन एवं नामकरण इस प्रकार किया है -

1. उदयकाल - 1826-1867 ई.

2. भारतेंदु युग - 1867-1900 ई.

3. तिलक या द्विवेदी युग - 1900-1920 ई.

4. गांधी युग - 1920-1947 ई.

5. स्वातंत्र्योत्तर युग - 1947 ई. के बाद... 11

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को प्रसिद्ध पत्रकार एवं संपादक डॉ. बाँकेबिहारी भटनागर ने निम्नलिखित चरणों में विभाजित किया है -

1. प्रथम चरण - 1826-1857 ई.

2. द्वितीय चरण - भारतेंदु युग : 1857-1890 ई.

3. तीसरा चरण - 1890-1918 ई.

4. चौथा चरण - गांधी युग : 1918 से स्वतंत्रतापूर्व तक 12

डॉ. रमेश कुमार जैन ने अपनी पुस्तक 'हिंदी पत्रकारिता का आलोचनात्मक इतिहास' में हिंदी पत्रकारिता की विकासयात्रा को निम्नलिखित युगों में विभाजित किया है-

1. प्रारंभिक युग - 1826-1867 ई.

2. भारतेंदु युग - 1867-1900 ई.

3. द्विवेदी युग - 1900-1920 ई.

4. गांधी युग - 1920-1947 ई.

5. स्वातंत्र्योत्तर युग - 1947 से अब तक 13

हिंदी पत्रकारिता के काल-विभाजन संबंधी विभिन्न प्रयासों के अवलोकन के इस क्रम में डॉ. नगेंद्र द्वारा संपादित एवं डॉ. अर्जुन तिवारी द्वारा लिखित दो पुस्तकों को देखना समीचीन होगा। डॉ. नगेंद्र द्वारा संपादित पुस्तक 'हिंदी वाङ्मय : बीसवीं शती' में श्री अशोक तथा प्रेमनाथ चतुर्वेदी ने बीसवीं सदी की राजनीतिक घटनाओं, विभिन्न क्रांतियों और उसके व्यापक सामाजिक प्रभावों के आधार पर हिंदी पत्रकारिता का काल-विभाजन एवं नामकरण किया है-

1. सन् 1905-1914 ई.- बंग-भंग और गरम दल का उदय

2. सन् 1914 से 1921 ई.- प्रथम विश्वयुद्ध, पंजाब में दमन और सत्याग्रह आंदोलन

3. सन् 1921 से 1939 ई.- राजनीतिक सुधार और संगठन, विधानसभाओं का उदय, समाजवादी क्रांति (रूस) का प्रभाव, नाजीवाद और द्वितीय विश्वयुद्ध

4. सन् 1939 से 1947 ई. - भारत छोड़ो आंदोलन, द्वितीय विश्वयुद्ध, परमाणु युग का आरंभ, भारत का विभाजन और स्वतंत्रता

5. सन् 1947 ई. - स्वतंत्रता के बाद 14

डॉ. नगेंद्र द्वारा संपादित एक अन्य चर्चित पुस्तक 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में डॉ. ओम प्रकाश सिंह ने उन्नीसवीं सदी की हिंदी पत्रकारिता की विकास-यात्रा को तीन उत्थानों में अभिव्यक्त किया है -

1. प्रथम उत्थान - 1826 से 1867 ई.

2. द्वितीय उत्थान - 1868 से 1885 ई.

3. तृतीय उत्थान - 1886 से 1900 ई. 15

इस क्रम में डॉ. अर्जुन तिवारी की पुस्तक 'स्वतंत्रता आंदोलन और हिंदी पत्रकारिता' का उदाहरण द्रष्टव्य है। वह हिंदी पत्रकारिता के व्यक्तित्व निर्माण को राष्ट्रीय चेतना और क्रांति के मणिकांचन संयोग की निर्मिति मानते हुए इसका विभाजन एवं नामकरण इस प्रकार करते हैं -

1. बीज-वपन काल : 1826-1867 ई.

2. अंकुरण काल : 1867-1905 ई.

3. पल्लवन काल : 1905-1929 ई.

4. फलन काल : 1929-1947 ई. 16

वहीं, दूसरी ओर अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'हिंदी पत्रकारिता का बृहद इतिहास' में वह हिंदी पत्रकारिता के उद्भव, विकास और वर्तमान काल में प्रकाशित हिंदी पत्रों के उद्बोधन, जागरण, क्रांति तथा नव-निर्माण द्वारा भारत में राष्ट्रीय एवं सामाजिक परिवर्तनों की स्वस्थ दिशा को परिलक्षित करते हुए हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को निम्नलिखित कालों में बाँटते हैं -

1. उद्भव काल (उद्बोधन काल) - 1826 से 1884 ई.

2. विकास काल - (क) स्वातंत्र्यपूर्व काल : I. जागरणकाल - 1885-1919 ई.

II. क्रांतिकाल - 1920-1947 ई.

(ख) स्वातंत्र्योत्तर काल : नव निर्माण काल (1948-1974 ई.)

3. वर्तमान काल (बहुउद्देशीय काल) - 1975 से... 17

यदि हिंदी पत्रकारिता के इतिहास-लेखन संबंधी विभिन्न प्रयासों (पुस्तकों) की एक सूची तैयार करें, तो यह संख्या 50 से भी अधिक हो जाएगी, परंतु यह सभी ग्रंथ मौलिक अवधारणाओं/इतिहास-दृष्टि से कोसों दूर हैं और उनके द्वारा किए गए काल-विभाजन एवं नामकरण उपरोक्त पुस्तकों की नकल अथवा अनुसरण मात्र हैं। हिंदी अथवा अन्य भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं के काल-विभाजन में भी कोई खास-अंतर नहीं दिखाई पड़ता। कई स्थलों पर शासकों के नाम पर भी काल-विभाजन एवं नामकरण के प्रयास हुए हैं। यथा - अंग्रेजी पत्रकारिता के क्षेत्र में एलिजाबेथ युग, विक्टोरिया युग आदि। लगभग सभी भाषाओं की पत्रकारिता में कालजयी साहित्यकारों, समाज-सुधारकों, युगद्रष्टा पत्रकारों अथवा राजनीतिक आंदोलनकारियों/पुरोधाओं के नाम पर काल-विभाजन एवं नामकरण हुए हैं। परंतु इसी क्रम में वे उत्थानकाल और स्वातंत्र्योत्तर युग के साथ न्याय नहीं कर पाते। युग-पुरुषों के नाम पर काल-विभाजन यथोचित होते हुए भी एकरूपता की दृष्टि से उचित नहीं जान पड़ता। दूसरी तरफ पत्रकारिता संबंधी ये काल-विभाजन किसी एक प्रकृति, प्रवृत्ति अथवा आंदोलन का दमन कर दूसरे को प्रमुखता देते हैं। पत्रकारिता के रूप-परिवर्तन और दशा-दिशा का अध्ययन तभी समीचीन होगा, जब समान प्रकृति या प्रवृत्ति के आधार पर काल-विभाजन एवं नामकरण हो, परंतु जब प्रकृति और प्रवृत्ति बहुधर्मी हो, तब चयनित अवधि के समस्त पत्रों में मुख्य अंतर्वृत्ति या स्थिति की परख कई स्वरों के विरोध में खड़ी हो जाती है। यह सही है कि विभिन्न विद्वानों द्वारा हिंदी पत्रकारिता के एक ही कालखंड में समान प्रकृति अथवा प्रवृत्ति की एक दृढ़ रेखा खींची गई है, परंतु दूसरी ओर उसी कालखंड में मानवीय चेतना का परस्पर विरोधी विकास, भिन्न प्रेरक स्थितियाँ एवं सरोकार, संक्रमणशील परिस्थितियों के प्रति परस्पर विरोधी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न विरोधी प्रवृत्तियाँ एवं उद्देश्य; पत्र-पत्रिकाओं की प्रवृत्ति निरूपण और एकरेखीय काल-विभाजन को न मात्र दुरूह बनाती हैं, अपितु काल-विभाजन की नई स्थापनाओं को भी जन्म देती हैं।

क्या हिंदी पत्रकारिता का एक सर्वमान्य काल-विभाजन एवं नामकरण असंभव है? वास्तव में प्रश्न असंभाव्यता का नहीं है वरन हिंदी पत्रकारिता के वैविध्यवर्णी, बहुउद्देश्यीय और नवीन अनुसंधान संभाव्यता का है। विभिन्न सरोकारों की दृष्टि से पत्रकारिता अन्य अनुशासनों से नितांत अलग है। पत्र-पत्रिकाएँ अपनी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, भौगोलिकतथा साहित्यिक सरोकारों, उनसे उत्पन्न परिस्थितिजन्य दायित्वों, उद्देश्यों और प्रतिक्रियाओं तथा अपने संरचनात्मक विशेषताओं के कारण काल एवं उसकी प्रतीति का सर्वाधिक मुख्य स्रोत होती हैं। फलस्वरूप किसी भी भाषा की पत्रकारिता के इतिहास-लेखन के कई आधार हो सकते हैं और यही आधार उनके काल-विभाजन एवं नामकरण के प्रमुख कारक बनते हैं। उदाहरणस्वरूप हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का मूल्यांकन हम प्रकाशन अवधि (यथा - दैनिक, साप्ताहिक, अर्द्धसाप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, द्विमासिक, त्रैमासिक, वार्षिक आदि) के आधार पर; विभिन्न स्थितियों, विषयों अथवा आंदोलनों (राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, साइक्लोस्टाइल भूमिगत पत्रों आदि) के आधार पर, वर्गीय अथवा जातीय (दलित, आदिवासी, स्त्री, बाल-पत्रकारिता, आर्य समाज, मजदूर एवं किसान आदि) आधार पर, पेशेगत पत्रकारिता (शिक्षा, खेल, स्वास्थ्य, फिल्म, उद्योग और व्यवसाय आदि) के आधार पर, विभिन्न संस्थाओं के आधार पर (भाषा, शैक्षणिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि संस्थाओं द्वारा चलाए जाने वाले पत्र), क्षेत्रीयता (बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत, पंजाब, दक्षिण भारत आदि क्षेत्रों में हिंदी पत्रकारिता) के आधार पर तथा भाषा अथवा साहित्य के आधार पर हिंदी पत्रकारिता के इतिहास-लेखन के प्रयास किए जा सकते हैं/किए गए हैं। ऐसे में इनके काल (विषय अथवा स्थान केंद्रित प्रथम पत्रिका से लेकर), प्रवृत्तियाँ तथा उपादेयता एक-दूसरे से नितांत भिन्न हो सकती हैं, जिन्हें एकही विभाजन एवं नामकरण में समेटना न तो श्रेयस्कर होगा और न ही उचित। यही कारण है कि हिंदी पत्रकारिता के काल-विभाजन एवं नामकरण संबंधी उपरोक्त प्रयास अपने अन्वेषण, प्रवृत्ति तथा उद्देश्यपूर्ति के आधार पर वैज्ञानिक, सुसंगत और सफल प्रतीत होते हुए भी एक सर्वमान्य आधार उपलब्ध नहीं करा पाते।

संदर्भ :

1. वाजपेयी, अंबिकाप्रसाद(पं.), समाचारपत्रों का इतिहास, पृ.ख; मिश्र, कृष्णबिहारी, हिंदी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण-भूमि, पृ. 2-33

2. मिश्र, कृष्णबिहारी, हिंदी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण-भूमि, पृ.33

3. वाजपेयी, अंबिकाप्रसाद(पं.), समाचार पत्रों का इतिहास, पृ.ख

4. वही, पृ.ग

5. वही, पृ.क

6. उद्धृत, जैन, रमेश कुमार(डॉ.), हिंदी पत्रकारिता का आलोचनात्मक इतिहास, पृ.41; शर्मा, झाबरमल्ल(सं.), गुप्त निबंधावली

7. उद्धृत, वही, पृ.42

8. वाजपेयी, अंबिकाप्रसाद(पं.), समाचार पत्रों का इतिहास, विषय-सूची, पृ.1

9. सुधांशु, लक्ष्मीनारायण(डॉ.)(सं.), हिंदी साहित्य का बृहत् इतिहास, त्रयोदश भाग, महेश, माहेश्वरी सिंह(डॉ.), पत्रकारिता, खंड-3, पृ.132

10. मिश्र, कृष्णबिहारी, हिंदी पत्रकारिता: जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण-भूमि, विषयानुक्रमणिका, पृ.19-25

11. तिवारी, रामचंद्र(डॉ.),पत्रकारिता के विविध रूप, पृ.16

12. उद्धृत, तिवारी, अर्जुन(डॉ.), हिंदी पत्रकारिता का बृहद् इतिहास, पृ.49

13. जैन, रमेश कुमार(डॉ.), हिंदी पत्रकारिता का आलोचनात्मक इतिहास, पृ.43

14. डॉ. नगेंद्र(सं.), हिंदी वांङ्मय : बीसवीं शती, पृ.388

15. डॉ. नगेंद्र(सं.), हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ.491

16. तिवारी, अर्जुन(डॉ.), स्वतंत्रता आंदोलन और हिंदी पत्रकारिता, पृ.3

17. तिवारी, अर्जुन(डॉ.), हिंदी पत्रकारिता का बृहद् इतिहास, पृ.60


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