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लेख

हिंदी साहित्य : काव्य-भाषा और श्रीधर पाठक
कृष्ण कुमार मिश्र


साहित्य के विकास में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। चाहे वह साहित्य किसी भी भाषा का हो। हिंदी काव्य-भाषा का स्वरूप भी इसी आधार पर विकसित होता है। यह आधार अपनी भाषा के माध्यम से साहित्य के पल्लवन में सहायता प्रदान करता है। आचार्य शुक्ल के शब्दों में 'साहित्य जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।' यही जनता की चित्तवृत्ति अपनी भाषा और साहित्य को मजबूत करने में सहायता करती है। वैसे तो किसी भी साहित्य का विकास वहाँ पर प्रयुक्त होने वाली बोलियों से प्रारंभ होता है। वही बोली आगे चलकर मुख्य साहित्य का अंग बन जाती है। हिंदी साहित्य के विकास में विभिन्न बोलियों का योगदान रहा है, जैसे कि अवधी, ब्रज, बुंदेली, राजस्थानी आदि। हिंदी साहित्य का प्रारंभ 'प्राकृताभास हिंदी' अर्थात अपभ्रंश से माना जाता है। अपभ्रंश भाषा प्राकृत की उस अवस्था को कहा गया है जब वह बोलचाल की भाषा न रहकर लोक में प्रचलित भाषा का प्राकृत के छायाभास के रूप में प्रयुक्त होने लगे। नाथों-सिद्धों ने ज्यादातर इसी भाषा का प्रयोग अपने काव्य में किया है। वीरगाथा काल में हिंदी काव्य-भाषा ने थोड़ा सा अपने स्वरूप में परिवर्तन किया और डिंगल-पिंगल भाषा का रूप अपनाया। आदिकाल के अंतिम चरण में अमीर खुसरो का अवतरण होता है जिन्होंने अपनी गजलों, मुकरियों और दो सुखनों से आधुनिक काल में प्रयोग होने वाली खड़ीबोली हिंदी की झलक दिखला दी। मध्यकाल में थोड़ा और परिवर्तन के साथ ब्रजभाषा और अवधी भाषाओं का बहाव ही देखने को मिलता है। इन दोनों भाषाओं ने समूचे मध्यकाल पर अपना परचम लहराया।

हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में प्रवेशित होते ही काव्य-भाषा के परंपरागत ढाँचे से बाहर निकलने की कुलबुलाहट देखी गई। भारतेंदु युग में लगभग सभी कवियों ने ब्रजभाषा का ही अनुसरण किया है परंतु भारतेंदु युग के अंतिम चरण में श्रीधर पाठक ने काव्य सृजन की शुरुआत की तथा खड़ीबोली हिंदी में काव्य सृजन की तरफ अन्य कवियों का ध्यान आकृष्ट किया। ऐसा नहीं है कि पाठक ने केवल हिंदी खड़ीबोली में ही रचनाएँ की, उन्होंने ब्रजभाषा में भी बहुत सारी कविताओं की रचना की है। इसके पीछे बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि उनकी मातृभाषा ब्रजभाषा रही है, क्योंकि श्रीधर पाठक का जन्म खाँटी ब्रजक्षेत्र जौंधरी, आगरा में हुआ था। इसीलिए उनके काव्य सृजन में ब्रज का प्रभाव स्वाभाविक दिखलाई पड़ता है। फिर भी ब्रजक्षेत्र के होकर भी और ब्रजभाषा के वर्चस्व के बावजूद भी खड़ीबोली की हिमायत करना या खड़ीबोली में काव्य रचना करना अपने आप में एक साहस का कार्य है।

हिंदी खड़ीबोली काव्य की विकास यात्रा में श्रीधर पाठक की ऐतिहासिक भूमिका निर्धारित होती है। खड़ीबोली आंदोलन के उन्नायक अयोध्या प्रसाद खत्री के आंदोलन की सबसे बड़ी और उल्लेखनीय उपलब्धि श्रीधर थे। खत्री के आंदोलन को सशक्त और स्थायी समर्थन पाठक जी से प्राप्त हुआ था। भारतेंदु युग में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने दो-चार कविताएँ खड़ीबोली में अवश्य लिखी परंतु ज्यादातर उनकी कविताएँ ब्रजभाषा में ही देखने को मिलती हैं। द्विवेदी युग के प्रतिष्ठापक, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जिस प्रतिबद्धता के साथ खड़ी बोली काव्य को प्रतिष्ठित करने का संकल्प लिया था उसकी शुरुआत श्रीधर पाठक के काव्य में पहले ही देखी जा सकती है। पाठक ने न सिर्फ भारतेंदु मंडल के राधाचरण गोस्वामी, प्रतापनारायण मिश्र आदि महाकवियों से सीधी टक्कर ही नहीं ली वरन उनकी शंकाओं, प्रश्नों और आपत्तियों का उचित निवारण भी किया। अयोध्या प्रसाद खत्री एक समर्थ विद्वान और आंदोलनकारी तो थे परंतु स्वयं अच्छे कवि न थे, उनकी इस कमी को पाठक जी ने पूरा किया। क्योंकि पाठक जी कई भाषाओं के ज्ञाता और विद्वान कवि थे। परंपरा, आधुनिकता, राष्ट्रीय चेतना और कविता की विभिन्न शैलियों से भलीभाँति परिचित थे और उनका यथास्थान प्रयोग करते थे। श्रीधर पाठक को काव्य सृजन की कला उनके पूर्वजों से विरासत में मिली थी। जिस समय खड़ी बोली काव्य की आवश्यकता समझी जा रही थी या यह समझा जा रहा था कि गद्य और पद्य की भाषा में समानता हो उस समय पाठक की सृजनशीलता बाल्यकाल की थी। भारतेंदु मंडल के सदस्य इस बात पर राजी थे कि गद्य की भाषा तो खड़ीबोली होनी चाहिए परंतु काव्य खड़ीबोली में संभव नहीं है। पाठक जी भी ब्रजक्षेत्र से होने के कारण शुरुआती काव्य रचनाएँ ब्रजभाषा में ही लिखा करते थे यद्यपि बहुत जल्द उनको इस बात का आभास हो गया की गद्य और पद्य की भाषा एक होनी चाहिए। फिर क्या था वे खड़ीबोली में अद्वितीय काव्य सृजन प्रारंभ कर दिए।

सन 1884 ई. में जिस समय खड़ीबोली काव्य आंदोलन अपने चरम पर था उस समय पाठक ने खड़ीबोली में देशप्रेम और स्वजाति उत्थान की कविता लिखकर अपना पक्ष स्पष्ट किया। यहाँ पर 'हिंद वंदना' नामक लंबी कविता के द्वारा इसे देखा और समझा जा सकता है -

जय देश हिंद, देशेश हिंद। जय सुखमा-सुख निःशेष हिंद

जय धन-वैभव-गुण-खान हिंद। विद्या-बल-बुद्धि-निधान हिंद

रसखान हिंद, जस-खान हिंद। गुण-गण-मंडित विद्वान हिंद।

इस काव्य खंड में एक ओर जहाँ खड़ीबोली हिंदी का निर्वाह हुआ है, वहीं दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जन्म (1885 ई.) से एक वर्ष पूर्व स्वदेशी भावना का स्वर उठाया है जिसकी उस समय में नितांत आवश्यकता थी, उसी समय की एक और कविता 'भारतवासी सुनिए विनती एक ध्यान धर के' भी गौर करने योग्य है -

भारतवासी सुनिये विनती एक ध्यान धर के।

अपनी देश-दशा को देखो तो निहार कर के।।

थे तुम क्या पहले, अब क्या हो, क्यों यह दीन दशा।

फूट द्वेष दारिद्र दुःख-दल घर-घर बीच बसा।। ...

सोचो, समझो, चेतो, अगलों को कुछ याद करो।

यह उन्नति का समय, न चूको, बढ़ के पैर धरो।।

देश-दशा के विषय में 1884 में लिखी गई यह कविता 1912 ई. में मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित काव्यखंड 'भारत-भारती' में पल्लवित होते हुए दिखाई पड़ती है। इससे मिलती-जुलती 'भारत-भारती' की कुछ पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं-

हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी

आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।

इस काव्य-संग्रह की पूर्वपीठिका श्रीधर पाठक द्वारा इतना पहले प्रस्तुत करना उनकी देश-भक्ति और दूरदृष्टता एवं भावी परिवर्तन की आकांक्षा का परिचायक है। इस कविता में खड़ीबोली को प्रतिष्ठित करने के स्वर स्पष्ट सुनाई पड़ते हैं। श्रीधर पाठक आधुनिक हिंदी साहित्य के पहले व्यक्ति थे जो भाषा और विचार के पुराणपंथी नजरिए के विरुद्ध और यथार्थवादी दृष्टिकोण से विमर्श, शास्त्रार्थ और सृजन के क्षेत्र में एक साथ सक्रिय हुए। 1883 ई. में पाठक ने भौतिकतावादी दृष्टिकोण से एक लंबी कविता लिखी थी। इस कविता को अयोध्या प्रसाद खत्री ने 'खड़ीबोली का पद्य' नामक पुस्तक के दूसरे भाग में 'पंडित स्टाइल' के अंतर्गत सम्मिलित किया था। कविता का कुछ भाग इस तरह से है-

कहो न प्यारे मुझसे ऐसा - "झूठा है यह सब संसार।

थोथा झगड़ा, जी का रगड़ा, केवल दुख का हेतु अपार।।"

***

जगत है सच्चा, तनक न कच्चा, समझो बच्चा इसका भेद।

पीओ-खाओ, सब सुख पाओ, कभी न लाओ मन में खेद।।

श्रीधर पाठक काव्य सृजन से एक ओर सरसता की अपेक्षा रखते हैं तो दूसरी ओर सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में। इनकी दृष्टि का दायरा बहुत बड़ा है। वे आस्तिकता, रसिक भावना, प्रकृति-प्रेम, देश-प्रेम, सामाजिक समरसता, समाज सुधार और भौतिकतावादी यथार्थ की गहराइयों तक पहुँचने का प्रयास करते हैं और सफल भी होते हैं। स्त्रियों की दयनीय अवस्था और विधवाओं की दुर्दशा जैसे विषयों पर पाठक जी ने गंभीरता से अपनी लेखनी चलाई है। जिस समय वर्ण व्यवस्था अपने चरमोत्कर्ष पर थी उस समय पाठक जी ने 'मनुवाद' पर व्यंग्य शैली में कटाक्ष किया और लिखा कि -

मनूजी तुमने यह क्या किया?

किसी को पौन, किसी को पूरा, किसी को आधा दिया

***

और अधिक क्या कहें बाप जी, कहते दुखता हिय

जटिल जाति का, अटल पात का, जाल है किसका सिया?

मनूजी तुमने यह क्या किया?

आज जिस जातिव्यवस्था के दुष्परिणाम स्वरूप दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श जैसे जाति विषयक विमर्शों का जन्म हुआ है, उसका बीजारोपण पाठक जी ने सौ साल पहले ही कर दिया था। इसी कविता को रेखांकित करते हुए अज्ञेय ने अपनी पुस्तक 'आधुनिक हिंदी साहित्य' में लिखा है कि "श्रीधर पाठक यहाँ सनातन परिपाटी की दुहाई नहीं देते और न उस परिपाटी को वेदों की भाँति अपौरुषेय अथवा पूर्वजों को त्रिकालदर्शी सर्वविद मानते हैं। यह स्पष्ट स्वीकार करते हैं कि मानव ने ही मानव को रूढ़ियों में बांधा है और ये बंधन असहनीय है : और अधिक क्या कहें बाप जी, कहते दुखता हिया। जटिल जाति का, अटल पाँत का जाल है किसका सिया? मनूजी, तुमने यह क्या किया? ऐसे स्वरों को ध्यान में रखकर, अनेक दोषों के रहते हुए भी श्रीधर पाठक की "स्वस्थ, उदार, भविष्योन्मुख लौकिक सांस्कृतिक दृष्टि को स्वीकार करना ही होगा।" अज्ञेय की उपर्युक्त पंक्तियों से यह स्पष्ट होता है की श्रीधर पाठक की रचना दृष्टि सर्वकालिक है।

प्रकृति-वर्णन की दृष्टि से पाठक जी की कविता 'कश्मीर-सुषमा' बहुत उल्लेखनीय रही है। बचपन से हिंदी साहित्य और हिंदी भाषा से संबंध रखने वाले पाठक इस लोकप्रिय कविता को पढ़ते आ रहे हैं। इस कविता का सबसे बड़ा महत्व इस बात में है कि इसमें प्रकृति को देखने की एक नूतन दृष्टि का परिचय मिलता है। कवि ने प्रकृति को आलंबन रूप में ग्रहण करके परंपरागत रूढ़ बंधनों से आगे बढ़कर प्राकृतिक छटा का उन्मुक्त चित्रण किया है और प्रकृतिजन्य आनंद की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। पाठक के काव्य सृजन से संबंधित आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन विशेष उल्लेखनीय है। शुक्ल जी ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में लिखा है कि "हरिश्चंद्र के सहयोगियों में काव्यधारा को नए-नए विषयों की ओर मोड़ने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ी, पर भाषा ब्रज ही रहने दी गई और पद्य में ढाँचों, अभिव्यंजना के ढंग तथा प्रकृति के स्वरूप निरीक्षण आदि में स्वच्छंदता के दर्शन न हुए। इस प्रकार की स्वच्छंदता का आभास पहले-पहल श्रीधर पाठक ने ही दिया। उन्होंने प्रकृति के रूढ़िबद्ध रूपों तक ही न रहकर अपनी आँखों से ही उसके रूपों को देखा। ...उन्होंने खड़ीबोली पद्य के लिए सुंदर लय और चढ़ाव-उतार के कई नए ढाँचे भी निकाले और इस बात का ध्यान रखा कि छंदों का सुंदर लय से पढ़ना एक बात है, राग-रागिनी गाना दूसरी बात। ...इन सब बातों का विचार करने पर पंडित श्रीधर पाठक ही सच्चे स्वच्छंदतावाद (रोमांटिसिज्म) के प्रवर्तक ठहरते हैं।"

श्रीधर पाठक की खड़ीबोली कविता का पूरा परिचय उनकी मौलिक और अनूदित दोनों तरह की रचनाओं में प्राप्त होता है। उनकी अनूदित कृतियों में 'एकांतवासी योगी' की चर्चा बहुत अधिक हुई। हिंदी साहित्य में उस समय ऐसा पहली बार देखने को मिला कि किसी कवि की मौलिक रचना के साथ-साथ उसकी अनूदित काव्य कृतियों को भी मुक्तकंठ से सराहा गया। पाठक ने ओलिवर गोल्डस्मिथ की तीन काव्यकृतियों का काव्यानुवाद किया। जिसमें से दो का खड़ीबोली में और एक काव्य-संग्रह का ब्रजभाषा में। 'दि हर्मिट' का हिंदी में 'एकांतवासी योगी' नाम से काव्यानुवाद प्रस्तुत किया। यह काव्यानुवाद हिंदी खड़ीबोली की पहली प्रमुख रचना मानी जाती है। 'एकांतवासी योगी' रचना की प्रस्तावना (preface) में स्वयं पाठक जी ने अँग्रेजी में लिखा है, "The story presented to the public in these pages is a translation of Goldsmith's well-known poem- 'The Hermit.' Two lovers, long separated and lost to each other, quite Providentially come to meet at last never to part again." अर्थात इन पंक्तियों का मूल भाव यह है कि दो प्रेमी लंबे समय तक एक-दूसरे से जुदा रहे और एक दूसरे को खो चुके थे। अचानक भगवान की दया से अंत में फिर से कभी न अलग होने के लिए मिल जाते हैं। यही मूल भावना पाठक के इस काव्‍यानुवाद को आगे लेकर चलती है। इस रचना में मुक्‍त प्रकृति के बीच स्‍वच्‍छंद प्रेम की कहानी खड़ीबोली हिंदी में कही गयी है।

आचार्य शुक्ल जहाँ श्रीधर पाठक को 'स्वच्छंदतावाद का प्रवर्तक' मानते हैं वहीं अज्ञेय ने इनके विषय में लिखा है कि "बाद की 'नई कविता' की प्रवृत्तियों के अंकुर श्रीधर पाठक में पाए जा सकते हैं। ...यह कहना कदाचित इस युग के कवि-समुदाय के साथ अन्याय न होगा कि श्रीधर पाठक इसके सर्वाधिक कवित्व संपन्न कवि थे। भारतेंदु को खड़ीबोली युग का प्रवर्तक मानकर भी कहा जा सकता है की श्रीधर पाठक ही उसके वास्तविक आदिकवि थे।" पाठक खड़ीबोली हिंदी के प्रथम कवि के साथ-साथ प्रथम काव्यानुवादक भी थे। उन्होंने अँग्रेजी और संस्कृत दोनों भाषाओं की रचनाओं का काव्यानुवाद हिंदी खड़ीबोली में प्रस्तुत किया है। पाठक की खड़ीबोली के कई उदाहरण हैं हमारे सम्मुख, जिनमें कि ब्रजभाषा और खड़ीबोली दोनों का मिश्रित रूप देखने को मिलता है। उन्होंने पूरबी भाषा और लोकभाषाओं का अच्छा प्रयोग किया है। लोकभाषा में कजली और मजदूरिनों के लिए गीतों की रचना की है। खड़ीबोली कविता में गद्यात्मक वाक्य-विन्यास की शुरुआत पाठक जी से मानी जा सकती है। इस दृष्टि से 'सांध्य-अटन' और 'अटवि-अटन' कविताएँ विशेष उल्लेखनीय हैं। कविता के साथ पाठक ने गद्य के मैदान में भी अपनी प्रतीकात्मक उपस्थिति दर्ज कराई है। खड़ीबोली आंदोलन से संबंधित 'पोलेमिक्स' लिखने के अलावा भाषा-साहित्य संबंधी व्याख्यान तथा किशोर पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गयी उपन्यासिका 'तिलिस्माती मुँदरी' इस दृष्टि से उल्लेख के योग्य है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि आधुनिक हिंदी के शुरुआती दिनों में जिन कवियों ने खड़ीबोली को काव्य की भाषा बनाने का प्रयत्न किया, उनमें श्रीधर पाठक अग्रणी हैं। वैसे तो उनकी लेखनी ने ब्रजभाषा में भी अपने परचम लहराए हैं परंतु समय को देखते हुए खड़ीबोली की तरफ बढ़ जाना, उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है। क्योंकि उनको पता था कि आगे आने वाला समय भाषिक परिवर्तन का होगा, इसलिए शीघ्रातिशीघ्र ब्रजभाषा क्षेत्र से निकलना होगा और खड़ीबोली कविता का मार्ग चुनना होगा। जिस समय आचार्य द्विवेदी ने साहित्य की भाषा को अनुशासित करना शुरू किया उसी समय पाठक जी ने खड़ीबोली पद्य में नई लोच पैदा कर, उसके विकास के लिए नए-नए मार्ग तलाश कर, नए रचनाकारों और पाठकों को प्रेरणा और ऊर्जा प्रदान की। खड़ीबोली काव्य के लिए उन्होंने नए ढाँचे, नई दृष्टि और नवीन संवेदना की खोज की। इस बात की स्वीकारता महादेवी वर्मा के इस कथन से स्पष्ट होती है कि "मेरी भाषा को पं. श्रीधर पाठक की भाषा से संस्कार मिला।" आधुनिक हिंदी काव्य जगत में पाठक जी के इस योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

सहायक-पुस्तकें

1. सलिल, सुरेश, श्रीधर पाठक रचनावली, भाग 1-2, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लिमिटेड, नई दिल्ली, 2013

2. नवल, नंदकिशोर,आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2014

3. शर्मा, कुमुद, हिंदी के निर्माता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2012

4. वर्मा, लक्ष्मीकांत, हिंदी आंदोलन, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, 1964

5. स्वच्छंदतावाद और श्रीधर पाठक का काव्य, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहर लाल नेहरू, विश्वविद्यालय, दिल्ली, 1992

6. शुक्ल, आचार्य रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण 2008

7. मिश्र, रामचंद्र, श्रीधर पाठक तथा हिंदी का पूर्व-स्वच्छंदतावादी काव्य, रणजीत प्रिंटर्स एंड पब्लिशर्स, दिल्ली

8. रघुवंश, श्रीधर पाठक, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली


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