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प्रेमचंद और दलित प्रश्न : एक पुनर्विचार



इस प्रश्न पर विचार करने से पहले दो-तीन सावधानियाँ ध्यान में रखना जरूरी हैं। एक तो यह कि जब हम प्रेमचंद और दलित प्रश्न पर विचार करते हैं तो यह जो समकालीन दलित साहित्य या दलित विमर्श है, उसके साथ इसको घालमेल ना करें। समकालीन दलित साहित्य या दलित विमर्श यह एक अलग साहित्यिक प्रवृत्ति है। जिसकी अपनी वैचारिकी है। जबकि इस वैचारिकी के आकार लेने के पहले से भी हिंदी साहित्य में दलितों का सवाल उठाया जाता रहा है। दोनों आपस में जुड़े हुए जरूर हैं लेकिन दोनों आपस में स्वतंत्र भी हैं। दूसरी बात प्रेमचंद संबधी दलित साहित्य का जब हम मूल्यांकन करें तो उसे हम दो स्तरों पर बाँट सकते हैं - (क) एक तो वैचारिक चिंतन के स्तर पर और (ख) दूसरे साहित्यिक कृतित्व (संवेदना) के स्तर पर। विचारों के स्तर पर जो उनके लेखों में आई बातें हैं और संवेदना के स्तर पर जो उनके कहानियों और उपन्यासों में दलित जीवन से संबंधित जो प्रसंग आए हैं। तीसरी बात ये कि प्रेमचंद के दलित संबंधी चिंतन या विचारों पर बात करें तो आज हमारे जो मूल्य और प्रतिमान हैं, उनको प्रेमचंद पर हम आरोपित ना करें। प्रेमचंद का मूल्यांकन उनके समकालीन रचनाकारों और उनके अपने समय के साथ रखकर करना ही ज्यादा उचित होगा।

जब हम कहते हैं कि प्रेमचंद का मूल्यांकन करते समय समकालीन दलित साहित्य या दलित विमर्श के साथ उनका घालमेल ना करें, तो हमें उसको अलगाने वाले बिंदुओं पर बात करना जरूरी है। जब हम यह स्पष्टीकरण लाएँगे कि प्रेमचंद समकालीन दलित विमर्श या दलित साहित्य के लेखक नहीं हैं, तो हमें उनको न तो दलित साहित्य के मसीहा के रूप में साबित करने की कोशिश करनी चाहिए और न उन्हें दलित विरोधी के रूप में अपना निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए खारिज करने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि तभी हम सही मूल्यांकन कर पाएँगे तथा सही दिशा में आगे बढ़ पाएँगे। इसकी वजह यह है कि जो समकालीन दलित विमर्श है या दलित साहित्य है उसका इतिहास महज पच्चीस से तीस साल पुराना है। जबकि दलितों के प्रश्न पर लगातार लेखन हुआ है। इस परंपरा को हम भारतीय भाषाओं में बुद्ध तक ले जा सकते हैं क्योंकि उन्होंने सर्वप्रथम जाति के प्रश्न को संबोधित करते हुए कहा था कि ''किसी आदमी के 'जन्म' से नहीं, बल्कि उसके 'कर्म' से ही उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए''। बुद्ध के विचारों तथा थेरी गाथाओं में तमाम जगह पर दलित प्रसंग हैं। बाद में इसे हम नाथों, सिद्धों की परंपरा से भी जोड़ सकते हैं और बीच में ऐसे प्रसंग हमें कबीर, रैदास जैसे संतों (कवियों) के यहाँ भी मिलते हैं। आधुनिक काल में आकर मराठी में लिखा गया। यानी दलितों पर लोग पहले से ही लिखते आए हैं।

हिंदी साहित्य की जब हम बात करते हैं तो हम कबीर, रैदास तथा निराला जैसे प्रगतिशील कवियों/लेखकों को लेते हैं। निराला ने चतुरी चमार नामक उपन्यास लिखा। साथ ही में अन्य रचनाकारों ने भी जैसे कि नागार्जुन ने कई महत्वपूर्ण रचनाएँ लिखीं। जिनमें से बलचनमा एक नजीर है। प्रेमचंद ने कई रचनाएँ लिखीं। अमृत लाल नागर की कुछ रचनाएँ हैं। यानी जो संवेदनशील रचनाकार हैं, वे अपने समय के दबाव में अपने समय को चिन्हित व अभिव्यक्त करने के लिए दलितों के सवाल पर लिखते आए हैं। लेकिन उनका लिखा हुआ या लेखन की वह परंपरा जिसमें दलितों के सवाल आते रहे हैं, वह दलित साहित्य नहीं है। तब प्रश्न यह उठता है कि दलित साहित्य क्या है? इसका समाधान यह है कि जैसे भारतेंदु के समय से ही हम देखते आ रहे हैं कि लोग प्रगतिवादी रचनाएँ करते आए हैं। प्रगतिवाद एक मूल्य है जिसमें हम किसान और मजदूर की दृष्टि से देखते हैं और इसी में सौंदर्य खोजते हैं। यह एक नया मूल्यबोध है जो मार्क्सवाद के प्रभाव से हिंदी में आया। इस तरह का मूल्यबोध हमें 1936 से पहले भी मिलेगा और आज भी इस तरह की रचनाएँ रची जा रहीं हैं। लेकिन हम उन्हें प्रगतिवादी नहीं कहते हैं। ठीक इसी तरह दलितों पर लिखी गई जो लेखन परंपरा है, वह पूरा का पूरा दलित साहित्य नहीं है।

साहित्य मूलतः 1980 के दशक में शुरू हुआ। दलित साहित्य को एक तरह से कह सकते हैं कि वह दलित रचनाकारों का एक आंदोलन है। जिसमें मुख्य रूप से दलित रचनाकार आए और उन्होंने अपने दुख व पीड़ा को मुख्य रूप से आत्मकथाओं के माध्यम से तथा अन्य विधाओं के माध्यम से भी व्यक्त किया। उन्होंने इसे एक अलग साहित्यिक आंदोलन के रूप में पहचान दिलाने की कोशिश की। जिसमें उनकी विचारधारा अंबेडकरवादी थी। वे अंबेडकर से ही ऊर्जा लेते हैं व उन्हीं के सैद्धांतिक या वैचारिक आधार पर रचनाएँ करते हैं। जिसका मुख्य प्रतिपाद्य जाति व्यवस्था का विरोध है। तो हम कह सकते हैं कि यह दलित रचनाकारों द्वारा चलाया गया एक सैद्धांतिक आंदोलन है। और इसको उन्होंने बाकी हिंदी जगत में दलित-सवाल के लेखन की जो परंपरा रही है उससे खुद को पृथक करने के लिए भी एक सैद्धांतिकी निर्मित की। जिसमें अधिकांश दलित रचनाकार या चिंतक यह मानते हैं कि ये फला चीज दलित साहित्य के अंदर नहीं आएगी और ये दलित साहित्य के अंदर आएगी। एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में यह सत्तर-अस्सी के दशक में शुरू हुआ और इसकी शुरुआती अभिव्यक्ति को हम सारिका नामक हिंदी पत्रिका में देख सकते हैं। जिसमें 1975 में दो दलित विशेषांक आए थे। सारिका के इन विशेषांकों में जो लेख आए वह हिंदी में थे, लेकिन उसमें लिखने वाले सब मराठी के दलित लेखक थे। मराठी में दलित साहित्यकारों ने हिंदी से पहले लिखना शुरू किया था। इसके भी ऐतिहासिक कारण हैं। डॉ. अंबेडकर के आंदोलन की लहर पूरे देश में थी लेकिन मुख्य तौर से महाराष्ट्र में। डॉ. अंबेडकर के निधन के बाद, उन्होंने (अंबेडकर) जो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (R.P.I) बनाई थी, उसकी कई शाखाएँ-उपशाखाएँ होती चली गई, लेकिन इसके प्रभाव में पूरे महाराष्ट्र में उनका आंदोलन जारी रहा। जबकि हिंदी क्षेत्र में ऐसा नहीं हो पाया। इस क्षेत्र में बहुत बाद में खासतौर पर कांशीराम के आने बाद में दलित आंदोलन जैसा कुछ दश्य दिखाई पड़ता है। जो अंबेडकर के प्रभाव में महाराष्ट्र में आंदोलन चल रहा था, उसी का एक नया रूप 1972 में दिखाई पड़ता है, जिसको दलित पैंथर कहते हैं। दलित पैंथर ने पहली बार मार्क्सवाद और अंबेडकरवाद को मिलाकर एक नया प्रयोग किया। जिसमें नामदेव ढसाल और राजा ढाले मुख्य तौर पर उसके अगुआ थे। जिन्होंने माना कि जो गरीब हैं और जो दलित हैं, संयोग से दोनों एक ही हैं। इसलिए गरीब, जिसका हम आर्थिक आधार पर निर्धारण करते हैं तथा जो दलित हैं जिसका हम वर्ण के आधार पर निर्धारण करते हैं दोनों के लिए सम्मिलित रूप से एक आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। और इसी के परिणामस्वरूप दलित पैंथर नाम से एक संगठन बना। जिसने सबसे पहले जो मराठवाड़ा विश्वविद्यालय है, उसके नामांतरण का एक आंदोलन खड़ा किया था जिसका नाम वे बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम से कराना चाहते थे। उल्लेखनीय है कि यह एक किताबी आंदोलन नहीं बल्कि एक जनांदोलन या सामाजिक आंदोलन था। जिसके परिणामस्वरूप उसमें से बड़ी संख्या में साहित्यकार भी निकल कर आए। आज हम मराठी के जितने दलित साहित्यकारों को जानते हैं अधिकांश दलित पैंथर से निकले हुए साहित्यकार हैं। उन्हीं दिनों ओमप्रकाश वाल्मीकि चंद्रपुर, महाराष्ट्र में रहते थे। वे भी इसके प्रभाव में आए और हिंदी के रचनाकारों में भी इसकी छाया बाद में दिखाई पड़ी। जो लोग तब मराठी में लिख रहे थे, उनके द्वारा मराठी में लिखा गया दलित साहित्य एक विशिष्ट आंदोलन के रूप में अपनी एक खास पहचान बनाया। उसी के प्रभाव में हिंदी की साहित्यिक पत्रिका सारिका ने दलित विशेषांक निकाले, जिसमें मराठी के लेखकों ने लिखा। उसके बाद हिंदी में भी एक सुबगुबाहट शुरू हुई और जल्द ही आजादी के बाद दलितों या अस्पृश्यों के लिए संविधान में जो विशेषाधिकार निर्धारित किए गए थे या सामाजिक न्याय के तहत उन्हें जो अधिकार मिले थे, उससे जो पीढ़ी पढ़ी-लिखी या जो नौकरीपेशा थी उसकी आर्थिक स्थिति बेहतर हुई और जो पीढ़ी पढ़ने-लिखने की स्थिति में थी, उसने अपने दुख-दर्द का बयान करना शुरू किया, उनको अभिव्यक्त करना शुरू किया। अस्सी के दशक से स्वयं ओमप्रकाश वाल्मीकि भी लिखना प्रारंभ करते हैं और कई अन्य रचनाकारों ने भी। उन्होंने फिर धीरे- धीरे 1990 तक आते-आते इसको एक अलग साहित्य के रूप में पहचान दिलाने के लिए एक मुहिम चलाई, उस साहित्यिक आंदोलन को हम हिंदी दलित साहित्य कहते हैं।

अब इसमें एक सवाल स्वानुभूति और सहानुभूति का उठता है। स्वानुभूति का सवाल दलितों के भीतर से आया और उन्होंने कहा कि जो सहानुभूति के आधार पर लिखा हुआ साहित्य है, उसे दलित साहित्य नहीं मानेंगे। लेकिन स्वानुभूति और सहानुभूति का सवाल मूलतः दलितों की चिंता नहीं है और न दलित रचनाकारों ने इसे उठाने की कोशिश की। कुछ दलित साहित्यकार थे जिहोंने यह सवाल उठाया, लेकिन यह एक प्रमुख सवाल नहीं था। दलित साहित्य की प्रमुख चिंता जाति से मुक्ति का सवाल था, कि कैसे हम जाति व्यवस्था खत्म करें, उससे कैसे मुक्त हों। इसलिए यह स्वानुभूति का सवाल बाहरी लगता है क्योंकि किसी किताब की सृजन से कालजयी होने की प्रक्रिया ऊँची जातियों के हाथ में है। तो ऐसे में कोई कहे कि दलितों ने हमकों इस आंदोलन से बाहर कर दिया, जबकि हम तो लिखना चाहते थे, इसलिए हम नहीं लिख पाए। यह तो मुद्दे को गुमराह करने वाली बात है। क्योंकि कोई भी किसी विषय पर लिख सकता है जो कि एक मौलिक अधिकार है।

हालाँकि स्वानुभूति के सवाल की कुछ सीमाएँ भी हैं : जैसे कि एक तो जब हम स्वानुभूति की बात करते हैं तो इसका मतलब मेरी स्वयं की अनुभूति से है। अब सवाल यह उठता है कि मान लीजिए कोई दलित समाज में पैदा होता है और वह कहता है कि मेरी बहुत सी ऐसी पीड़ाएँ हैं जो सवर्णों ने नहीं भोगी है। लेकिन साहित्य की विशेषता यह है कि इसमें व्यक्ति सिर्फ अपनी पीड़ाओं का बयान नहीं करता क्योंकि साहित्य परकाया प्रवेश की एक साधना है। अर्थात् जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के अंदर घुसकर उसके दुख-दर्द को समझने की कोशिश करता है वही एक सच्चा लेखक है। और अपने को भी पूर्णता में व्यक्त करने के लिए पार्थक्य (detachment) जरूरी है। दूसरे इस तर्क पर दलितों की रचनओं में जिन सवर्णों का जिक्र आता है वह प्रमाणिक नहीं होगा क्योंकि वह उनके (दलितों) स्वानुभूत का विषय नहीं है। हो सकता है कि दलितों ने सवर्णों का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया हो? तीसरी बात यह कि दलित रचनाकार जो स्वानुभूति का दावा करते हैं। स्वयं उनकी रचनाओं में उनके घरों की स्त्रियों की कहानी झूठा सच के रूप में आई। इसलिए दलित स्त्री साहित्यकारों ने दलित स्त्री विमर्श में इसका विरोध किया और दलित लेखकों की सीमाओं को रेखांकित किया। कि ये स्वानुभूति का दावा करते हुए कहते हैं कि सवर्णों से हमारा बहुत शोषण हुआ है लेकिन ये स्वयं अपनी स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? इसका एक अच्छा उदाहरण तमिल लेखक मुरुशेखर का नाटक बलि का बकरा है। जिसमें इस कार्य-प्रणाली को बखूबी दिखाया गया है कि कैसे दलित पुरुष अपनी स्त्रियों के साथ बलि के बकरे जैसा व्यवहार करता है। जैसे कि इस नाटक में जब एक दलित युवक को जब बलि के लिए पकड़ कर ब्राह्मण ले जाते हैं तो उसकी पत्नी रोती-कलपती पीछे आती है, कि मेरे पति छोड़ दो, लेकिन ब्रह्मणों का दिल नहीं पसीजता है। लेकिन उसके पति के दिमाग में एक बात आती है तो वह कहता कि दलित की ही बलि देनी है तो मेरी पत्नी को बलि दे दो, मुझे जाने दो। तो हम यहाँ देखते हैं कि एक दलित पुरुष अपनी स्त्री पर इतना अधिकार जमा रहा है, जिसका खुद अपने जीवन पर कोई अधिकार नहीं है। ठीक इसी तरह या कमोबेश हिंदी दलित विमर्श भी स्त्री, दलित-स्त्री की आवाज को नहीं उठाता है। इस संदर्भ में प्रो. वीर भारत तलवार ने ठीक ही कहा हैं कि ''किसी भी उत्पीड़ित समुदाय की मुक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि दूसरे उत्पीड़ित समाजों की मुक्ति के बारे में वो क्या सोचता है? कोई भी उत्पीड़ित समाज सिर्फ अपनी मुक्ति के बारे में सोचता है, तो वो कभी मुक्त नहीं हो सकता, जब तक कि वो दूसरे उत्पीड़ित समाजों की मुक्ति के बारे में भी न सोचे, उनके प्रति एक सही रवैया न रखे, उनके साथ मिलकर चलने को तैयार न हो।'' तो यहाँ स्वानुभूति के सवाल पर यह प्रश्नचिह्न उठता है कि इस आधार पर दलिल लेखक दलित स्त्रियों के बारे में नहीं लिख सकते, क्योंकि उसके लिए जैसे एक सवर्ण पुरुष है, वैसे ही दलित पुरुष। कहने का मतलब यह है कि स्वानुभूति का तर्क एक सीमा तक ही आप का साथ दे सकता है क्योंकि उसके आगे अभिव्यक्ति की प्रमाणिकता चलती है। यानी जो हमने लिखा है वह कितना प्रामाणिक है। समाज की प्रामाणिक अभिव्यक्ति के बाद रचनाकार की जाति महत्वपूर्ण नहीं रह जाती।

लेकिन एक तरफ स्वानुभूति के तर्क की सीमाएँ हैं तो दूसरी तरफ जो लोग स्वानुभूति पर सवाल उठाते हैं तथा दलित साहित्य पर भी, उनकी भी सीमाएँ हैं कि यदि ये लोग इस विषय पर पहले से लिख रहे थे तो दलितों को लिखने की जरूरत क्यों पड़ी? साथ ही वर्णगत स्थिति से अभिव्यक्ति में अंतर आ जाता है जैसे कि कबीर और तुलसी तथा हीरा डोम और निराला में इस अंतर को देखा जा सकता है जैसी कि हीरा डोम कहता है कि -

''खंभवा के फारी पहलाद के बंचवले।

ग्राह के मुँह से गजराज के बचवले।

धोतीं जुरजोधना कै छोरत रहै,

परगट होके तहाँ कपड़ा बढ़वले।

मरले रवनवाँ कै पलले भभिखना के,

कानी उँगुरी पै धैके पथरा उठले।

कहंवा सुतल बाटे सुनत न बाटे अब।

डोम तानि हमनी क छुए से डेराले।।''

और निराला कहते हैं कि -

''दलित जन पर करो करुणा।

दीनता पर उतर आये

प्रभु, तुम्हारी शक्ति वरुणा।

हरे तन मन प्रीति पावन,

मधुर हो मुख मनभावन,

सहज चितवन पर तरंगित

प्रभु, तुम्हारी किरण तरुणा

देख वैभव न हो नत सिर,

समुद्धत मन सदा हो स्थिर,

पार कर जीवन निरंतर

रहे बहती भक्ति वरुणा।''

तो हम देखते हैं कि दलित साहित्य, समकालीन जो दलित लेखन है, उसके द्वारा एक अलग श्रेणी के रूप में, एक अलग आंदोलन और एक अलग पहचान के रूप में आया है। अतः हिंदी साहित्य में जो दलितों के विषय में लिखने की परंपरा है उसका मूल्यांकन हमें सजग होकर करना चाहिए। और खासतौर पर प्रेमचंद का मूल्यांकन करने के वक्त इसको दो हिस्सों में हम बाँट सकते हैं -

1. एक विचार के स्तर पर

2. दूसरा संवेदना के स्तर पर

इन दोनों में किस रूप में दलितों का चित्रण हुआ है। इसके लिए पहले विचार के स्तर पर प्रकाश डालना ज्यादा उचित होगा।

जब प्रेमचंद ने लिखना शुरू किया उस वक्त तक कांग्रेस के मंचों व राष्ट्रीय परिदृश्य में दलितों के सवाल अक्सर नहीं उठाए जाते थे। इतना ही नहीं बल्कि दलितों के सवाल उस तरह केंद्रीय सवाल भी नहीं थे, जिस तरह से किसानों और मजदूरों के सवाल आंतरिक माने जाते थे। और गांधी जी की भी समझदारी थी कि जब देश आजाद हो जाएगा तब हम इन सवालों को सुलझाएँगे। इसी तरह दलितों के सवाल पर कांग्रेस में एकाध बार 1920 में रिजुलेशन पास किए गए। वह भी दलितों के नहीं बल्कि अस्पृश्यता के सवाल पर, छुआछूत के सवाल पर। उसकी भी एक वजह है, एक पृष्ठभूमि है। आर्य समाज ने छुआछूत के खिलाफ उन्नीसवीं सदी में आंदोलन चलाया था और स्वयं प्रेमचंद भी आर्यसमाजी थे। प्रेमचंद पर एक तरफ आर्य समाज का प्रभाव है तो दूसरी तरफ गांधी का। आश्चर्य की बात है कि गांधी ने खुद अफ्रीका में अश्वेत होने की वजह से भेदभाव के उत्पीड़न को झेला, लेकिन भारत में आकर जातिवाद, अस्पृश्यता को केंद्रीय सवाल के रूप में नहीं उठाया। जब अंबेडकर के आंदोलन से ये सवाल राष्ट्रीय राजनीति में प्रधान होने लगते हैं तब गांधी और कांग्रेस भी जाति और अस्पृश्यता के सवाल को महत्वपूर्ण मानकर सक्रिय हो जाते हैं। इसलिए हमें प्रेमचंद का मूल्यांकन करते वक्त उस समय के परिदृश्य को ध्यान में रखना चाहिए।

प्रेमचंद, गांधी और अंबेडकर के चिंतन के महत्व को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि अश्पृश्यता और दलितों के सवाल को ये (प्रेमचंद, गांधी और अंबेडकर) किस ढंग से देखते हैं। कांग्रेस और गांधी के लिए दलितों का सवाल एक धार्मिक सवाल है जबकि अंबेडकर के लिए यह एक धार्मिक सवाल मात्र ही नहीं बल्कि राजनीतिक सवाल भी है। आर्य समाज का आंदोलन मूलतः धार्मिक सुधार के लिए था, गांधीजी भी यही सोचते थे कि दलितों का सवाल प्रधान रूप से धार्मिक सवाल है, धर्म के सुधार का सवाल है। गांधी जी छुआछूत को खत्म करने के पक्ष में होते हुए भी वर्णाश्रम व्यवस्था को बनाए रखना चाहते थे और आर्यसमाजी भी वर्णाश्रम धर्म के समर्थक थे, लेकिन वे वर्णों का आधार जन्मना को नहीं कर्मणा को मानते थे। अंबेडकर कहते थे कि यह वर्ण और जाति व्यवस्था ही दलितों के शोषण का आधार हैं, इसलिए जब तक वर्ण और जाति व्यवस्था खत्म नहीं होगी तब तक अस्पृश्यता और जाति की समस्या भी खत्म नहीं होगी। मंदिर प्रवेश के सवाल पर शुरू में अंबेडकर को लगा कि दलितों का सामाजिक अधिकारों से वंचित रह जाने के पीछे धर्म की अहम भूमिका है, इसलिए दलितों को मंदिरों में प्रवेश मिलना चाहिए, लेकिन उन्हें धीरे-धीरे लगने लगा कि सिर्फ मंदिर प्रवेश से बात नहीं बनेगी, यह एक आर्थिक और राजनीतिक सवाल भी है। इसके लिए उनको देशद्रोही तक कहा गया तथा मीडिया ने इनको खलनायक साबित करना चाहा। अंबेडकर कहते थे कि जब तक दलितों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक अधिकार नहीं मिलेंगे तब तक उनको अपने व्यवसायों और अपमान से मुक्ति नहीं मिलेगी। इसीलिए उन्होंने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन, प्रतिनिधित्व तथा स्कूलों-कॉलेजों के खोलने की माँग की। इसी समय 19 दिसंबर, 1932 में प्रेमचंद ने 'महान तप' नाम से एक लेख लिखा। प्रेमचंद मूल रूप से गांधी जी के पक्ष से सोचना शुरू करते हैं लेकिन वे इस प्रश्न पर जब लगातार विचार करते हैं तो वह कई जगह गांधीजी का अतिक्रमण भी करते हैं। गांधी जी के लिए दलितों का प्रश्न मूल रूप से हिंदू धर्म को बचाने का प्रश्न है। वे कहीं स्पष्ट, तो कहीं अस्पष्ट रूप से कहते हैं कि यदि दलित अलग हो जाएँगे तो हिंदू धर्म कमजोर हो जाएगा। यानी गांधीजी की मूल चिंता हिंदू धर्म को बचाने की थी। प्रेमचंद अपने लेख में लिखते हैं कि 'हम स्वीकार करते हैं, शूद्रों के साथ हमने अन्याय किया है। हमने उन्हें जी भर कर रौंदा, कुचला, दला। इस अन्याय ने जिस हृदय को सबसे ज्यादा दुखी किया है, वह उसी तपस्वी का हृदय है, जिसने अपना जीवन दलित भाइयों की सेवा में ही व्यतीत किया है। आज वह देखता है कि उसके जीवन की सारी तपस्या, सारी साधना धूल में मिली जा रही है। उसने जिस राष्ट्रीय एकता का भवन खड़ा करने के लिए एक-एक कंकड़ जमा किया था, वह सारी सामग्री उसके आँखों के सामने बिखरी जा रही है। ...महात्मा उन व्यक्तियों में हैं, जो दलितों के उद्धार में ही हिंदू जाति के उत्थान और उत्कर्ष का रहस्य छिपा हुआ देखते हैं, जो हिंदू जाति के मुख से अन्याय के इस कलंक को मिटा देने के लिए अपने प्राणों को भी अर्पण कर देने को तैयार हैं। जिस पौधे को उन्होंने तीस साल तक अपने रक्त से सींचा, उस पर कुठाराघात होते देखकर वह कैसे शांत बैठे रहते!'' इससे पता चलता है कि उस समय जैसे पूरा मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग अंबेडकर के खिलाफ था, वैसे प्रेमचंद भी। इस प्रक्रिया से एक बड़ा फायदा यह हुआ कि पूरे देश का दलित समस्याओं की तरफ ध्यान गया। गांधी जी दलितों के मंदिर प्रवेश के पक्ष में थे लेकिन इसका पहला विरोध काशी के मंदिरों के मठाधीशों ने किया। इसके खिलाफ प्रेमचंद 'काशी का कलंक' नाम से एक लेख लिखते हैं और उसमें लिखते हैं कि ''इस समय जब कि सारे देश में अछूतों को अपनाने और गले लगाने की धूम मच रही है, तब वे लोग मुश्किल से सिर्फ काशी में ही कुल सौ के करीब हैं - नक्कारखाने में तूती की आवाज सुनाने का हौसला बाँधे हुए हैं। वे अछूतों को हिंदू मानते हैं - बंधु और वात्सल्यास्पद कहते हैं, मगर कोई सामाजिक अधिकार नहीं देना चाहते, सदा उन्हें दलित और पतित ही बनाए रखना चाहते हैं। अब तो उपाय यह है कि जो हिंदू महात्मा गांधी को हिंदू जाति का सच्चा रक्षक समझता है, वह इस बात की प्रतिज्ञा करे कि महात्माजी के प्राणप्यारे अछूत जिस मंदिर में न जाने पावेंगे, उसमें हम भी नहीं जाएँगे, और जो शास्त्राभिमानी पंडित, पुजारी या पंडा महात्माजी को धर्म-द्रोही, और अहिंदू कहेगा, उसको किसी प्रकार का दान या चढ़ावा नहीं देंगे। जो लोग अछूतों को हिंदू बनाए रखते हैं और इसी में हिंदू जाति का सच्चा कल्याण समझते हैं, वे प्रतिज्ञापूर्वक अछूतों के लिए अलग मंदिर बनावें और धर्मप्राण पंडे-पुजारियों को पैसे और दक्षिणा देकर अपमान खरीदने से बचे रहें। ...अब शाश्त्री लोग अपना शास्त्र लेकर बैठे रहें और केवल उन्हीं से दान-दक्षिणा पाने की आशा रखें, जो उनकी बात मानें।'' यानी गांधीजी की तरह बीच का रास्ता प्रेमचंद भी चुनते हैं। प्रेमचंद फिर एक और लेख 'हरिजनों के मंदिर-प्रवेश का प्रश्न' लिखते है यानी वे मंदिर प्रवेश के मुद्दे पर हमेशा खड़े होते हैं। यह मूलतः हिंदू धर्म को बचाने की चिंता है न कि दलितों के सामाजिक, राजनैतिक अधिकार की। नागपुर में अंबेडकर के प्रभाव में एक दलित छात्रालय बनाया जाता है। उस पर प्रेमचंद 5 दिसंबर 1932 को एक टिप्पणी हरिजन बालकों के लिए छात्रालय नाम से लिखते है कि ''नागपुर में हरिजन बालकों के लिए एक छात्रालय बनाया गया है इससे तो अछूतपन मिटेगा नहीं और दृढ़ ही होगा।'' यानी प्रेमचंद विशेषाधिकारों के खिलाफ थे।

कुल मिलाकर प्रेमचंद, गांधी जी और आर्य समाज के प्रभाव में अस्पृश्यता के खिलाफ थे, दलितों के मंदिर प्रवेश पर उनके साथ थे और इसके लिए काशी के ब्राह्मणों की कटु आलोचना भी की। लेकिन इसके आगे जब राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की बात होती है तो वहाँ पर लगता है कि प्रेमचंद गांधी जी का अतिक्रमण नहीं कर पाते हैं। अर्थात् प्रेमचंद को सिर्फ हिंदू धर्म की ताकत और संख्या बनाए रखने की चिंता है न कि दलितों के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक सवालों (अधिकारों) की। यहाँ तक तो उनके वैचारिक लेखन की बात हुई, अब उनके संवेदानात्मक लेखन पर विचार करना सही होगा।

यदि बात उपन्यास के उदय की जाए तो यह हम सबको विदित ही है कि उपन्यास की उत्पत्ति का मध्यवर्ग से गहरा रिश्ता है। प्रेमचंद के पहले के उपन्यासों, कहानियों को देखा जाए तो उसके पात्र और पाठक दोनों मध्यवर्गीय हैं लेकिन प्रेमचंद के यहाँ बाद में आकर यह धारणा टूटती है। प्रेमचंद एक बड़ा काम यह करते हैं कि समाज का जो सबसे दलित, पिछड़ा या कमजोर व्यक्ति है उसको नायक बनाते हैं। इससे यह स्थापित हुआ कि पाठक और कथानक दोनों निम्नवर्ग के हो सकते हैं। हो सकता है कि प्रेमचंद, महात्मा गांधी ने अपने साथियों को जो एक स्वराज का जंतर दिया था उससे प्रभावित हुए हो क्योंकि गांधी जी ने अपने इस जंतर में कहा है कि 'मैं तुम्हें एक जंतर देता हूँ। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी अपनाओ, जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा, क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुँचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर काबू रख सकेगा? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है। और तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम समाप्त होता जा रहा है।'' प्रेमचंद की जो कहानियाँ उन्हें महत्वपूर्ण लेखक बनाती हैं और मशहूर हैं अधिकांश दलित जीवन से संबधित हैं, जैसे - दूध का दाम, ठाकुर का कुआँ, सवा सेर गेहूँ, कफ़न, मंत्र, मंदिर और घासवाली आदि महत्वपूर्ण कहनियाँ है। लेकिन विडंबना यह है कि प्रेमचंद का मूल्यांकन 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मुरति देखी तिन तैसी' (रामचरित मानस : बालकांड) वाली मानसिकता से की गई है। क्योंकि आमतौर से प्रेमचंद को या तो दलित विरोधी या दलित मसीहा के रूप में सिद्ध किया जाता रहा है। इसका भी कारण है क्योंकि प्रेमचंद विचार के स्तर पर दलित विरोधी लगते हैं और संवेदना के स्तर पर वे अपने युग से बहुत आगे निकल जाते हैं, इसलिए दलित मसीहा लगते हैं। इसलिए इन दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर ही प्रेमचंद का सही मूल्यांकन कर सकते हैं। प्रेमचंद जब लिख रहे थे तो उस समय तक दलितों को केंद्र में रखकर हिंदी साहित्य में कथा लेखन की कोई परंपरा नहीं थी। हालाँकि ज्योतिबा फुले का आंदोलन था और अंबेडकर भी राष्ट्रीय राजनीति में दखल कर रहे थे लेकिन प्रेमचंद इन सबके पहले और इनके समानांतर भी बहुत बेहतरीन कहानियाँ लिख रहे थे। तब उन दलित चिंतकों और आलोचकों को इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर आलोचना करनी चाहिए जो प्रेमचंद की दलित जीवन से संबंधी कहानियों और उपन्यासों पर यह आरोप लगाते हैं कि उनकी कहानियों और दलित पात्रों में कोई विद्रोह की भावना नहीं दिखाई पड़ती या दलितों की समस्याओं को कुछ हद तक उठाया हैं लेकिन उनका उद्देश्य समाज में परिवर्तन लाना नहीं था। बल्कि अंबेडकर के आंदोलन का दौर (फैशन) चल रहा था इसलिए वे दलित पात्रों को ले आए। उनके दलित पात्र दब्बूपन के शिकार हैं। लेकिन प्रेमचंद की निंदा करने से पहले उन लोगों को अपने गिरेबान में झाँक लेना चाहिए कि उन्होंने जो रचनाएँ की हैं उनमें उनके घर की स्त्रियों, अन्य स्त्रियों तथा उनके समाज का कितना सही चित्रण हुआ है और पता होना चाहिए कि गढ़ी हुई कहानियाँ प्रभाव नहीं छोड़तीं हैं। प्रेमचंद की कहानियाँ प्रभाव छोड़ती हैं और उनकी कफ़न कहानी में आए चमारों का कुनबा शब्द को लेकर उनको दलित विरोधी बताया है लेकिन इस शब्द के अभाव में वह यथार्थ न आता जो इसके रहने से आया हैं। प्रेमचंद इस शब्द का प्रयोग दलितों को संवेदनहीन दिखाने के लिए नहीं करते बल्कि उन लोगों पर व्यंग्य करने के लिए करते हैं जो दलितों को इस शब्द का प्रयोग करके बदनाम करते हैं। प्रेमचंद पर यह आरोप लगाना भी सही नहीं है कि उनके दलित पात्र विद्रोही नहीं दब्बू हैं क्योंकि उनके यहाँ ऐसे ढेर सारे प्रसंग है जहाँ दलित विद्रोह करते हैं, जैसे - सद्गति कहानी में दलितों का दुखी की लाश को न उठाना, कफ़न कहानी में उचित मजदूरी न मिलने से घीसू और माधव की काम के प्रति उदासीनता, दूध का दाम कहानी में मंगल और सुरेश के संवाद में मंगल का यह कथन कि क्या हम ही लगातार घोड़े बनते रहेगें? गोदान उपन्यास में चमारों द्वारा मातादीन के मुँह में हड्डी ठूँस देना आदि विद्रोह के ठोस उदाहरण हैं।

ऐसे में यह कहा जा सकता है कि प्रेमचंद अपनी दलित कहानियों के माध्यम से जाति व्यवस्था, जातिवादी शोषण का इतिहास लिखते हैं, जो कहीं अन्य जगह नहीं मिलता। क्योंकि इतिहास में गौरवपूर्ण घटनाओं का इतिहास लिखा जाता है शोषण का इतिहास नहीं लिखा जाता, लेकिन प्रेमचंद अपनी कहानियों में यह काम करते नजर आते हैं। हिंदुस्तान में आम दलित, किसान, ग्रामीण और आम आदमी की त्रासदी की शुरुआत के कारक या बिंदु धर्म और संस्कृति हैं जिसकी कार्य-प्रणाली को सवा सेर गेहूँ और सद्गति कहानी में शंकर और दुखी के शोषण में दे खा जा सकता है। दूध का दाम कहानी से पता चलता है कि ब्राह्मणों का ब्राह्मणत्व और समृद्धि दलितों की मेहनत पर फल फूल रहा है और जिसको धर्म का तंत्र वैधता प्रदान करता है। उपरोक्त कहानियाँ दलित चेतना की भी कहनियाँ है क्योंकि जातिवादी शोषण के विविध रूपों का उद्घाटन और उसके बारे में (मतलब उसकी कार्यप्रणाली के बारे में) पात्रों/पाठकों में जागरूकता पैदा करना भी दलित चेतना हैं। इस कसौटी पर ये कहानियाँ फिट हैं क्योंकि इन कहानियों में दलित चेतना की अभिव्यक्ति कई बार शोषण के विविध रुपों के पर्दाफाश करने में और कई बार विरोध के रूप में अभिव्यक्ति हुई है। अतः प्रेमचंद की कहानियों को दलित चेतना-विहीन कहना गलत है। प्रेमचंद दलितों और जातिव्यवस्था को संबोधित करते समय यथार्थपरक ढंग से अभिधा में अपनी बात करते हैं लेकिन जाति के व्यवस्थापकों (ब्राह्मणों) पर व्यंग्य की शैली में बात करते हैं यानी कहें तो भिगो-भिगो के मारते हैं, जैसे - सद्गति और सवा सेर गेहूँ कहानी में दुखी और शंकर पर यथार्थपरक ढंग से अभिधा में बात करते हैं तो पंडितों पर व्यंग्यवाणी में बात करते हैं, जैसे कि दुखी जो लकड़ी की गाँठ चीरते हुए मर जाता है उसमें एक गहरा व्यंग्यार्थ छिपा है कि दलित इस जाति व्यवस्था को चीरने की लगातार कोशिश करता है और खुद मर जाता है लेकिन यह खत्म नहीं होती। यह खत्म कैसे होगी इसके लिए प्रेमचंद मार्क्स की घोषणा कि 'दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ' की सहायता लेते है जो हमें सद्गति में गोंड के संवाद में दिखाई पड़ता है कि कोई दुखी की लाश को उठाने नहीं जाए। इसी तरह मार्क्स के अलगाववाद के सिद्धांत को उनके कफ़न कहानी में घीसू और माधव की काम के प्रति उदासीनता में देखा जा सकता है। मतलब कि प्रेमचंद के यहाँ गांधी, अंबेडकर तथा मार्क्स का सम्मिलित रूप देखने को मिलता है और यह जरूरी भी है क्योंकि इन तीनों को मिलाकर ही भारत में परिवर्तन हो सकता है।

प्रेमचंद की एक कहानी ठाकुर का कुआँ है। जो बहुत छोटी लेकिन मार्मिक कहानी है और यथार्थ को जितने गहराई से प्रस्तुत किया गया है, वह बहुत ही जबरदस्त है। यह शायद अंबेडकर द्वारा चलाए गए महार आंदोलन के प्रभाव में लिखी गई कहानी है। क्योंकि वहाँ एक तालाब था जिसमें सभी पानी पी सकते थे यहाँ तक की पशु भी, लेकिन दलित नहीं। अंबेडकर सभी के लिए उस तालाब को खोलने के लिए आंदोलन चला रहे थे। इसी प्रकार इस कहानी का नायक जोखू एक दलित है जो बीमार तथा प्यासा है और जिसके खातिर पानी के लिए उसकी पत्नी गंगी ठाकुर के कुएँ से पानी लेने जाती है। क्योंकि दलित बस्ती के कुएँ में कोई जानवर गिर पड़ा, जिससे कुएँ का पानी प्रदूषित हो गया है। लेकिन गंगी ठाकुर के कुएँ से पानी लाने में सफल नहीं होती हैं जिसके परिणाम-स्वरूप उसके पति को गंदा पानी पीने के विवश होना पड़ता है। इस दृश्य को प्रेमचंद जाति व्यवस्था की त्रासदी के रूप में दिखाते हैं। प्रेमचंद, अंबेडकर की तरह हिंदू धर्म के उन समर्थकों पर सवाल उठाते हैं जो कहते हैं कि यह दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्म है लेकिन जहाँ प्राकृतिक तथा सर्वसुलभ स्वच्छ पानी पीने के लिए भी जाति व्यवस्था का सामना करना पड़ता है जो पानी पीने से रोकती है। तो इस तरह से जाति व्यवस्था के एक और पक्ष को प्रेमचंद बड़ी मार्मिकता के साथ लाते हैं।

जो धर्म दलितों और पिछड़ों को नीच बनाता है तथा जो उनको गैर-बराबरी के दलदल में ढकेलता है। लेकिन ये बड़ी त्रासदी है कि उस धर्म के सबसे बड़े समर्थक दलित और पिछड़े ही हैं। इसके शुरुआती संकेत को प्रेमचंद की मंदिर कहानी में देखा जा सकता है। इसी तरह से प्रेमचंद अपनी मंत्र नाम की दोनों कहानियों में जाति के सवाल को एड्रेस करते हैं कि सिर्फ एक साथ खाना खाने से या किसी के घर जाकर बराबर बैठने से जातिवाद नष्ट नहीं होगा, जब तक कि ये जो ऊँची जातियों के लोग हैं, इनके अंदर सत्कार भाव नहीं आएगा।

उपर्युक्त विवेवना से यह तथ्य सामने आता है कि प्रेमचंद विचार के स्तर पर गांधी जी के इर्द-गिर्द घूमते हैं लेकिन संवेदना के स्तर पर वे बहुत आगे निकल जाते हैं। जिस तरह के प्रसंग प्रेमचंद के कथा साहित्य में हैं वे गांधी जी के लेखन तथा भाषण में देखने को नहीं मिलते हैं। इसी तरह प्रेमचंद को दलित विरोधी तथा दलित मसीहा कहना भी उचित नहीं हैं। इनके यहाँ गांधी, अंबेडकर तथा मार्क्स का सम्मिलित रूप देखने को मिलता है और यह जरूरी भी है क्योंकि इन तीनों को मिलाकर ही भारत में सार्थक परिवर्तन हो सकता है।

संदर्भ सूची

1. हिंदी समय डॉट काम, प्रेमचंद समग्र

2. प्रेमचंद के विचार भाग- एक, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण 2010.

3. ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, नई दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन, 2001.

4. सं. सदानंद शाही : दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचंद, प्रेमचंद साहित्य संस्थान, गोरखपुर, 2002.

विकास कुमार यादव

शोध छात्र, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय (जे.एन.यू.), नई दिल्ली, 110067.

परिचय

जन्म: 13 अगस्त 1992, जौनपुर (उत्तर प्रदेश)

भाषा: हिंदी

विधाएँ: आलोचना, समीक्षा, शोध

मुख्य कृतियाँ

पुस्तक तथा प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में आलोचना, पुस्तक समीक्षा और शोध आलेख प्रकाशित। यथा-

• पुस्तक: कविता में आग, विकास कुमार यादव, अक्षरशिल्पी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018

• लेख: नया ज्ञानोदय, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली

''गोबिन्द प्रसाद का काव्य संसार'', ''प्रेमचंद और स्त्री प्रश्न कुछ बातें'' तथा ''मेरी कविता ही मेरी वसीयत है'' आदि।

• शोध: समकालीन हिंदी कविता, समकालीन हिंदी काव्यालोचना

संपर्क

कमरा सं. 118, कावेरी हॉस्टल, जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय, नई दिल्ली, 110067.

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