छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक प्रख्यात कवि, कहानीकार, नाटककार और
उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद पर उनके साहित्य पर तमाम नज़रियों से तमाम चर्चाएँ
हुई हैं। प्रसाद के साहित्य में जो लालित्य है, जो सौंदर्य है, स्थितियों और
कथावस्तु की जो गंभीरता है वह उनकी अपनी विशेषता है। लेकिन अक्सर उनके साहित्य
पर बात करते हुए उन्हें संस्कृतनिष्ठ और प्राचीन परंपराओं का वाहक साहित्यकार
भी कहा गया। उनके साहित्य पर इतिहास के कोरे प्रभाव की भी गलतफहमियाँ हुई हैं।
दरअसल प्रसाद का साहित्य जितना सीधा सरल दिखता है उतना है नहीं। यानी जब तक
उनके साहित्य के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों को ध्यान से न देखा जाए तब तक
कथावस्तु के आधार पर इसी तरह के सपाट मूल्यांकन होते रहेंगे। प्रसाद के
साहित्य में आधुनिकता की बात स्वीकार करने के बावजूद बहुत सटीक तरीके से
मूल्यांकन नहीं किया जा सका है क्योंकि इस बात को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता
कि अधिकांश मूल्यांकन कथावस्तु के आधार पर ही किए गए हैं और यह भी नि:संदेह है
कि कथावस्तु के आधार पर आधुनिकता के संबंध में प्रसाद के साहित्य में कुछ भी
ठोस नहीं मिलने वाला। प्रसाद के साहित्य में समसामयिकता या आधुनिकता पर बात
करना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि प्रसाद के साहित्य में कथानक और
भाषा एवं वर्णन शैली के आधार पर एक अरसे से उसे 'रोमांस' और 'रहस्यवाद' का नाम
देकर उसकी जो व्याख्या की गई है - कहना न होगा कि उस व्याख्या ने प्रसाद के
साहित्य के प्रति साहित्य के नए विद्यार्थियों व शोधार्थियों को उदासीन बनाया
है। ऐसे में हमें उनके साहित्य में ऐतिहासिक स्रोतों की ओर रुख करना ही होगा।
प्रसिद्ध आलोचक शिवकुमार मिश्र एक तरफ प्रसाद की राष्ट्रीय चेतना के विश्व
मैत्री व विश्वबंधुत्व में परिणत हो जाने की सराहना करते हैं तो दूसरी ओर उनके
अतीत के गौरवगान की प्रवृत्ति को संकुचित बताते हैं। शिवकुमार मिश्र लिखते
हैं- "प्रसाद अपने भावबोध को सीमित और अपनी राष्ट्रीय मनोभूमि को संकुचित वहाँ
करते हैं जब वे सरलीकरण पर उतर आते हैं और पश्चिमी जगत तथा भारत को भौतिकता
तथा अध्यात्म, अनात्मवाद और आत्मवाद के संघर्षों में बांधकर भारत की अतीत
ज्ञान-संपदा को ही विश्व की सारी समस्याओं का निदान मानने लगते हैं।" 1 लेकिन इस लेख की अगली कड़ी में ही मिश्र जी के स्वर प्रसाद के इस
पक्ष पर अन्तर्विरोधग्रस्त दिखाई पड़ते हैं। वे प्रसाद को धार्मिक तो मानते हैं
लेकिन 'धर्म के रूढ़ अर्थों में नहीं भारतीय दर्शन व संस्कृति पर
प्रसाद की निष्ठा को मिश्र जी 'सेलेक्टिव निष्ठा' कहते हैं। और सबसे
महत्वपूर्ण बात जो है वे यह कि जब मिश्र जी यह स्वीकार करते हैं कि- "नवजागरण
काल में उभरने वाला हिन्दू धर्म पुराना हिन्दू धर्म न हो कर अपने समय की छाप
को लेकर उभरने वाला हिन्दू धर्म था, इसी प्रकार नवजागरण कालीन पुनरुत्थानवाद
भी काम्य न होते हुए धर्म की भाँति उपनिवेशवाद और सामंतवाद विरोधी संघर्ष में
एक हथियार बना था।
इस कथन के परिप्रेक्ष्य में दो महत्वपूर्ण बाते हैं- पहली बात कि 'नवजागरण
कालीन हिन्दू धर्म पर अपने समय की छाप था' और दूसरी बात है कि 'पुनरुत्थानवाद
उपनिवेशवाद एवं सामंतवाद विरोधी संघर्ष का हथियार था।' इन दोनों तथ्यों के
आलोक में यदि हम प्रसाद-साहित्य के ऐतिहासिक स्रोत के परिप्रेक्ष्य पर बात कर
लें तो मामला और स्पष्ट हो सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवादी इसिहास
लेखन के दौर पर भी नजर डालनी होगी कि ये जो इतिहास लेखन का पूरा दौर है उसमें
अंग्रेजों ने जो शुरुआती काम किए थे जिसमें इलियट और डॉसन वगैरह का काम आता है
- उन इतिहासकारों की कुछ स्थापनाएँ ऐसी थी जिसमें मौर्य और गुप्त काल को
स्वर्ण काल बताया गया और मुगलकाल या मुसलमानों के काल को अंधकार काल और
अंग्रेजों के काल को सभ्यता का काल बताया गया। बाद के दिनों में जो
राष्ट्रवादी इतिहासकार और प्राच्यवादी या भारतविद वगैरह थे - उनका जो काम
सामने आया - तो उसमें भी इसी को सत्यापित करने की कोशिश की गई थी। ऐसे
प्राच्यविदों एवं भारतविदों में विलियम जोन्स के काम का बड़ा प्रभाव माना जा
सकता है। जोन्स की भाषा विज्ञान और आर्य नस्ल की जो अवधारणा सामने आई उसे
शुरुआती राष्ट्रवादी इतिहास लेखन के दौर में काफी सकारात्मक तौर पर लिया गया।
कहना न होगा कि इसका संबंध सीधे-सीधे पुनरुत्थानवाद से है। वो ऐसे कि दरअसल
1860 के आस पास ज्ञान के दो नए अनुशासन प्रवेश पाते हैं - ऐतिहासिक
भाषाविज्ञान और नृतत्वशास्त्र। तो नृतत्वशास्त्र में जो नस्लीय वर्गीकरण हुआ
उसमें भारतीयों को बिछुड़े हुए आर्य बताया गया और इनका उद्धार करना, सभ्यता और
संस्कृति सिखाना ये दायित्व पश्चिम के कंधों पर बताया गया। दरअसल पहले
'ह्वाइट्स मैन बर्डन' का एक पदबंध चलता था - मतलब 'श्वेतांगों का दायित्व' -
यानी ऐसे नृतत्वशास्त्रियों का मानना था कि श्वेतांग सीधे-सीधे ईश्वरीय कृपा
से युक्त हैं, श्रेष्ठ हैं, इन्हें ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं - तो इनका
दायित्व बानता था कि जो लोग असभ्य हैं, बर्बर या सांस्कृतिक सीढ़ी पर पिछड़े हुए
हैं - उनको सभ्य बनाने का जो प्राकृतिक और नैतिक दायित्व है वो श्वेतांगों के
साथ है। तो इस पदबंध के उद्देश्य स्वरूप उन्होंने ईसाई धर्म और भारतीय सनातन
धर्म को बाइबिल और वेदो-पुराणों के हिसाब से मिला कर जो तमाम थियोलॉजी थी -
उसे रचना शुरू किया। ये जो एक पीठिका है - ये चीजें भारत में जब आई तो भारत का
जो एक मध्यवर्ग या विशेष रूप से अंग्रेजीदां समाजिक वर्ग था वो हठात ही एक
प्रकार की गौरवदीप्ती से भर उठा और खुद को पश्चिमी श्वेतांगों के समानान्तर या
समकक्ष मानने लगा। उसके बाद पार्थ चटर्जी का जो मानना है कि हमारे यहाँ
औपनिवेशिकता के विरोध में जो पूरा ज्ञान काण्ड बना उसके दो हिस्से थे - एक
हिस्सा बाहरी या भौतिक था और दूसरा हिस्सा भीतरी था जिसे वो सांस्कृतिक कहते
हैं। भौतिक हिस्से के अंतर्गत अंग्रेजों की नकल करना जैसे विज्ञान पढ़ना, भाषा
पढ़ना, इकानॉमिक्स पढ़ना, नौकरी करना आदि में उनका अनुकरण करना होता था। लेकिन
एक जो आंतरिक या सांस्कृतिक क्षेत्र था उसमे उन्हें हीन समझना और अपने अतीत का
गौरवगान करते हुए ये मानना कि हमारी संस्कृति वेदों-उपनिषदों की संस्कृति है,
हमारे पूर्व मनीषी चिंतन के उच्च शिखर पर पहुँचे हुए हैं आदि। तो ये रवैया
शुरुआती दिनों में एकांगी था लेकिन बाद के दिनों में ये सांस्थानिक होता गया।
वैसे प्रसाद अतीत के गौरवगान और पुनरुत्थानवाद से जुड़े हुए जरूर थे लेकिन यह
भी स्वीकार करना होगा कि प्रसाद के साहित्य में इसके स्रोत शुद्ध रूप में नहीं
मिलते। क्योंकि हम देख सकते हैं कि प्रसाद देसी स्रोतों से भी जुड़े थे और अपने
नाटकों में अपने परम्परागत इतिहास के स्रोत, पुराण, उपनिषद आदि संस्कृत
साहित्य के बारे में लम्बी लम्बी भूमिकाएँ भी लिखी हैं।
इस ऐतिहासिक स्रोत का दूसरा सिरा जो है वो उत्तर प्रदेश से संबद्ध है - मतलब
वह पूरा क्षेत्र जिसमें अलीगढ़, लखनऊ से लेकर बनारस तक का क्षेत्र आता है। तो
उस संदर्भ में हम देखें कि अलीगढ़ में सैय्यद अहमद खाँ द्वारा 1875 में मुस्लिम
विश्वविद्यालय की स्थापना हुई और कुछ वर्षों बाद बनारस में 1898 में नागरी
प्रचारणी सभा की। ऐसे में खड़ी बोली हिन्दी और उर्दू के विवाद वाले मसले को भी
देखा जाना चाहिए। वैसे इसमें एक गैप दिखाई देता है लेकिन उस गैप को हम नवजागरण
से भर सकते हैं। असल में 1870 के बाद भारतेन्दु युग के जितने भी लेखक हैं
उनमें मुस्लिम इतिहास खण्ड को लेकर एक प्रकार की दूसरी धारणा मिलती है। उन
लेखकों की रचनाओं में लगभग सारे मुस्लिम पात्रों को अत्याचारी और व्याभिचारी
के तौर पर ही दिखाया गया है। तो इस ढंग से चीजों को एक साम्प्रदायिक रंग में
देखना - यानी कि अंग्रेजो को शिक्षा और संस्कृति के प्रचारक के तौर पर देखना
लेकिन दो संस्कृतियों के अध्ययन के बरक्स एक जो 'अन्य' की परिकल्पना होती है -
तो उसमें अंग्रेजो से 'अन्य' मुस्लिम युग को देखा गया और इसके बरक्स हिन्दू
अतीत की परिकल्पना की गई। असल में नवजागरण के दो टुकड़ों में बंटने का कारण भी
यही था कि अपने अतीत का गौरवगान करने के लिए जब वापस लोग मुड़े तो हिन्दू अपने
हिन्दू अतीत की ओर मुड़े क्योंकि जेम्स मिल जैसे जो कुछ इतिहासकार थे उन्होंने
पूरे इतिहास को ही हिन्दू और मुस्लिम युग कर के विभाजित किया और अपने समय के
प्रख्यात्त इतिहासकार माने जाने वाले ईलियट और डॉसन भी कम साम्प्रदायिक नहीं
थे। उन्होंने अपने इतिहास में मुसलमानों का चित्रण काफी नकारात्मक लहजे में
किया है। तो तथ्यों के आधार पर देश में हिन्दी-उर्दू विवाद और प्रसाद जैसे
साहित्यकार की इतिहास दृष्टि में राष्ट्रवादी प्रवृत्ति के साथ एक हिन्दूवादी
पुनरुत्थानवादी चेतना का भी पुट देखने को मिलता है। फिर जब अतीत के गौरवगान के
प्रसंग में शिवकुमार मिश्र के इस कथन को देखें कि 'पुनरुत्थानवाद सामंतवाद और
उपनिवेशवाद से संघर्ष का हथियार था तो प्रसाद के अतीत के गौरवगान की प्रवृत्ति
को वैचारिक संकुचन के तौर पर देखना थोड़ा अजीब लग सकता है। क्योंकि इसमें दो
राय नहीं कि ब्रिटिश प्रशासन अतीत की गौरवमयी स्मृतियों को राष्ट्रवादी चेतना
के विकास का स्रोत बनने से रोकने का हर संभव प्रयास कर रहा था। इसी बिंदु से
मिश्र के कथन के पहले पहलू 'नवजागरणकालीन हिन्दू धर्म पर अपने समय की छाप' का
मूल्यांकन किया जा सकता है।
ऐसा नहीं था कि 18वीं और 19वीं सदी में प्राच्यविदों एवं भारतविदों द्वारा जो
भी अन्वेषी परियोजनाएँ की गई वे शत प्रतिशत ईमानदार थीं। राजीव मल्होत्रा की
पुस्तक 'भारत विखण्डन' में विलियम जोन्स के कार्य-प्रणाली की व्याख्या कुछ और
ही कहानी बयान करती है- वे भारतीय तत्व जो बाइबिल में स्वाभाविक रूप से सटीक
नहीं बैठे, उनको या तो जबरन सटीक बैठाने के लिए तोड़ा-मरोड़ा गया या सीधे-सीधे
अस्वीकृत कर दिया गया। ... अगर संस्कृत ग्रंथों में किसी बात का उल्लेख था जो
किसी तरह बाइबिल में सटीक नहीं बैठा तो उसपर मिथक का ठप्पा लगा दिया गया। जिस
किसी बात को 'सटीक' बैठा दिया गया वह जोन्स के अनुसार भारतीयों का इतिहास हो
गया।"5 इस विवेचन के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि नवजागरणकालीन
हिन्दू धर्म अपने समय की कौन सी छाप लिए हुए था। यह छाप काफी पहले से
साम्राज्यवादी शासकों द्वारा प्राच्यवादी अध्ययन की परियोजनाओं के मार्फत लगाई
जा रही थी। इस सत्य को भाँपने का नतीजा ही था कि हिन्दू समाज के एक सुसंगठित
इकाई के रूप में मौजूद होने की कल्पना राष्ट्र निर्माण का आधार बनती चली गई।
राष्ट्र निर्माण का यही आधार बंगाल के नवजागरण से जुड़े तमाम चिंतकों राधाकांत
देव और बंकिम से लेकर महाराष्ट्र में सावरकर और तिलक से होते हुए उत्तर भारत
में भारतेंदु और बाद के साहित्यकारों में प्रसाद तक दिखलाई पड़ता है। कहना न
होगा कि प्रसाद के साहित्य में अतीत के गौरवगान, सांकृतिक उपलब्धियों का
आख्यान जैसे तत्व ब्रिटिश शासकों के इतिहासलेखन संबंधी इसी विकृत नजरिए के
प्रतिरोध स्वरूप हमारे सामने आता है।
ऐसा भी एकबारगी नहीं समझ लेना चाहिए कि प्राच्यवादियों का पूरा कुनबा ही
भारतीय संस्कृति की ऐसी ही व्याख्या पर जोर देता था। जोन्स ने जिस परियोजना के
तहत रॉयल एशियाटिक सोसाएटी का गठन किया था और जिस ढर्रे पर काम किया था वह
प्राच्यवादियों के शुरुआती परियोजनाओं का हिस्सा था। युवा आलोचक वैभव सिंह
प्राच्यवाद को समझाते हुए लिखते हैं- "पश्चिमी साम्राज्यवाद के हित में भारतीय
उपमहाद्वीपीय, मध्य एशिया और अफ्रीका के इतिहास-संस्कृति के अन्वेषण की जो
व्यापक योजना आरंभ की गई उसे ही बौद्धिक जगत में प्राच्यवाद के नाम से जाना
गया। ... प्राच्यविद्या का संबंध तो उस दृष्टिकोण से है जिसका इस्तेमाल
औपनिवेशिक शक्तियों के द्वारा 17वीं से 20वीं सदी तक अपने उपनिवेश के
इतिहास-संस्कृति के अन्वेषण के लिए किया गया।" लेकिन इन सबके बावजूद वैभव
प्रख्यात प्राच्यविद एडवर्ड सईद की इस बात पर किसी न किसी तरह असहमत दिखते हैं
कि 'प्राच्यवाद एक अर्थ में ओरिएंट यानी पूरब को पश्चिमी नजरिए से पहचानने,
उसे जीतने, उसका पुनर्निमाण करने और उस पर प्रभुत्व जमाने का जरिया था।'
दरअसल यदि प्रसाद के संदर्भ में बात की जाए तो उनके लेखन पर गलतफहमियों की एक
मोटी चादर मिलती है - आदम जमाने के चरित्र, पलायनवादी और मध्यकालीन विलास और
खुमारी तक की गलतफहमी। लेकिन छायावाद के मर्मज्ञ नन्ददुलारे बाजपेयी के
अनुसार- प्रसाद का साहित्य सच्चे अर्थ में नवीन जीवन से संबद्ध है और वह
आधुनिक समस्याओं को प्रतिबिंबित करता है। क्योंकि नवजागरण के अंतर्विरोधों का
चरित्र थोड़ा भिन्न था। हिन्दी क्षेत्र में स्वाधीनता की बड़ी लड़ाई लड़ी गई।
राष्ट्रीय चेतना पर उसका प्रभाव पड़ा। स्वाधीनता आंदोलन के काल में जातीय
इतिहास और संस्कृति के प्रति गौरव एवं गरिमा से मंडित दृष्टि, अस्मिता की
पहचान तथा अभिव्यक्ति का शक्तिशाली माध्यम हो सकती है- इस बात को प्रसाद काफी
पहले ही समझ चुके थे। यही कारण है कि उस दौर में अपने अतीत का स्मरण और
सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का आख्यान निश्चय ही प्रसाद के लिए एक प्रेरणादायक अनुभव
था। जैसा कि हम पहले भी कह आए हैं कि अतीत का यह स्मरण पुनरुत्थानवाद की
प्रवृत्ति स्वरूप ही है लेकिन इसमें लेखक के जातीय अभिमान और राष्ट्रीय
स्वाधीनता की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इस
संबंध में कुंवरपाल सिंह की बात सटीक मालूम पड़ती है कि- "प्रसाद जातीय गौरव
तथा देश और समाज के लिए बलिदान की भावना जाग्रत करने वाले रचनाकार हैं। वे
नाटकों और कहानियों में इतिहास की पुनर्रचना और प्रासंगिकता रेखांकित करते
हैं।"
स्वाधीनता आंदोलन के संदर्भ में भारतीय अस्मिता की पहचान का कार्य प्रसाद अपनी
कुछ सामाजिक कहानियों द्वारा भी करते हैं। इस प्रसंग में उनकी 'ग्राम' और
'शरणागत' जैसी कहानियों का उल्लेख किया जा सकता है। 'ग्राम' का भू-स्वामी
मोहनलाल अंग्रेजी सभ्यता और तौर तरीकों वाला है- 'विलायती पिक का वृचिस पहने,
बूट चढ़ाए, हंटिंग कोट, धानी रंग का साफा, अंग्रेजी-हिन्दुस्तानी का महासम्मेलन
बाबू साहब के अंग पर दिखाई पड़ रहा है।'9 यह वस्तुत: सद्य:विकसित उस
नव धनाढ्य वर्ग का प्रतिनिधि पात्र है, जो प्रथम स्वाधीनता-संग्राम की असफलता
से पैदा हुई हताशा के परिणामस्वरूप औपनिवेशिक प्रभु वर्ग का मातहत हो चुका था।
इस वर्ग की ऐतिहासिकता को देखें तो कहा जा सकता है कि यही शिक्षित वर्ग
पश्चिमी प्राच्यविदों या भारतविदों के परियोजनओं का रखवाला भी होता था। लेकिन
इस वर्ग के प्रतिकार स्वरूप अपनी इस कहानी में प्रसाद ने विस्तार से ग्राम
सभ्यता की सहजता, उमंग और उत्सवप्रियता प्रस्तुत की है। किशोर और उसकी माँ की
निराडंबर सहजता उस भारतीय दृष्टि का प्रतीक बनकर कहानी में उपस्थित है, जो
सारी संपत्ति और वैभव से वंचित होकर भी आत्मगौरव और सम्मान का रास्ता चुनती
है। लेकिन 'शरणागत' कहानी प्रसाद की विशफुल थिंकिंग की कहानी है। इसमें एक
अंग्रेज युवती भारतीय जीवन-पद्धति की ओर आकृष्ठ दिखाई जाती है- बहुत कुछ
'चंद्रगुप्त' की कार्नेलिया की तर्ज पर।
जो लोग प्रसाद पर आरोप लगाते हैं कि वे शुद्ध रोमांटिक और रहस्यवादी रचनाकार
हैं, वे कल्पना की टेक वाले लेखक हैं जहाँ यथार्थ का आत्मबल नहीं। उन्हें
प्रसाद के जीवन को भी देखना चाहिए कि जीवन के बालपन में ही माता-पिता का जाना
और कच्ची गृहस्थी में विधवा भाभी और विस्तृत व्यवसाय का बोझ सम्हालने वाला
यथार्थ से भाग भी कैसे सकता है ? और यदि दुख और संघर्ष के सजीव चित्रण को ही
यथार्थ मानते हैं तो 'बेड़ी' के अंधे भिखारी की त्रासदी क्या कुछ कम थी जो अपने
बेटे से भीख मंगवाने के लिए और उससे अलग होने के भय से उसके पैरों मे बेड़ियाँ
डालता है और कहानी के अंत में जब इसी बेड़ी की वजह से लड़का गाड़ी के नीचे आ कर
मर जाता है तो अन्धा बूढ़ा दुर्घटना के नतीजे को न देखकर कहता है- 'काट दो बेड़ी
बाबा, मुझे न चाहिए।'
चर्चा यथार्थवाद की हो और प्रेमचंद का नाम ना आए ? अध्येता प्रेमचंद और प्रसाद
की तुलना करना भी नहीं भूलते और प्रेमचंद को यथार्थवादी, प्रगतिशील और प्रसाद
को रहस्यवादी और संस्कृति चेतस बताना भी। बकौल काशीनाथ सिंह 'जबकि प्रेमचंद ने
'हंस' के पहले ही अंक में 'मधुआ' कहानी छापी थी। जबकि प्रेमचंद के आग्रह पर ही
प्रसाद में 'कंकाल' लिखा था। जबकि 'हंस' और 'जागरण' को प्रसाद अपनी ही पत्रिका
मानते थे और उनमें बराबर लिखते थे।' असल में लोग यह देखना भूल ही जाते हैं कि
प्रेमचंद ने भारतेंदु की गाँवों की ओर जाने वाली राह पकड़ी और प्रसाद ने
भारतेंदु की पुराणों और इतिहासों में उतरने वाली सीढ़ियाँ। स्वाधीनता की लड़ाई
दोनों ही लड़ रहे थे - प्रेमचंद सूरदास और होरी के साथ, प्रसाद स्कंदगुप्त और
चन्द्रगुप्त के साथ। और यदि प्रसाद को सांस्कॄतिक चश्में से ही देखना हो तो
यथार्थ और संस्कृति को अलगाकर देखने की भी हिमाकत नहीं की जानी चाहिए, जब तक
कि संस्कृति पर धर्म का मुलम्मा न चढ़ाया जाए। ऐसे में प्रसाद की 'मधुआ' और
'गुंडा' कहानियों को कैसे भूला जा सकता है? 'मधुआ' का निकम्मा शराबी बच्चे की
पीड़ा पर व्यथित मात्र नहीं होता। वह उसके जीवन का सम्बल बनता है, कर्मवादी
होकर 'घरबारी' बन जाता है। और 'गुंडा' के नन्हकू सिंह ने तो 'गुंडा' शब्द का
अर्थ ही बदल डाला। मानों लेखक नन्हकू सिंह को गुंडा कह कर समाज की कायर और
दब्बू वृत्ति के तर्क-कवच पर व्यंग्याघात कर रहा हो - "वीरता जिसका धर्म था,
अपनी बात पर मर मिटना, सिंह वृत्ति से जीविका ग्रहण करना, प्राण-भिक्षा मांगने
वाले कायरों तथा चोट खा कर गिरे हुए प्रतिद्वंद्वी पर शस्त्र न उठाना, सताए
निर्बलों को सहायता देना और प्रत्येक क्षण प्राणों को हथेली पर लिए घूमना,
उसका बाना था। उन्हें लोग काशी में गुंडा करते थे।" और उसी गुंडे ने राजा
चेतसिंह और राजमाता पन्ना की रक्षा में अपने प्राणों का बलिदान दिया। कह सकते
हैं कि उसने एक साथ मनुष्यता और राजभक्ति दोनों का निर्वाह किया। इस संदर्भ
में कुंवरपाल सिंह का मानना है कि- "प्रसाद मानवता के पक्षधर थे। सामाजिक
विषमता के विरुद्ध तथा मानवता के प्रति लेखक की आस्था कई कहानियों में
परिलक्षित हुई है। इसका अन्यतम उदाहरण है- 'गुंडा' कहानी। नन्हकू सिंह जीवन की
विषम परिस्थितियों में भी मानवीय ओज बनाए रखता है।
तो असल बात यह है कि जब तक प्रसाद के साहित्य के विषय में इन सबके ऐतिहासिक
संदर्भ विस्तार न मालूम हो एवं उन संदर्भों पर विस्तृत विचार विमर्श न किए
जाएँ तब तक प्रसाद के साहित्य में आधुनिकता के बारे में बात करने में बड़ी
कठिनाई है। वहाँ दृष्टि से स्तर पर आधुनिकता की बात की जा सकती है। लेकिन
आधुनिकता की प्रचलित समझदारी के आधार पर विशेष तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
लेकिन प्रसाद की कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, काव्य आदि जहाँ से निकल कर आ रहे
हैं, यानी जिस चेतना या मकसद से - तो जब हम उसको पकड़ने और समझने की चेष्टा
करेंगे तो निश्चित ही प्रसाद अपने दौर की आधुनिकता के साथ कदमताल करते हुए जान
पड़ेंगे।
संदर्भ
-
1. मिश्र, शिवकुमार, राष्ट्रीय नवजागरण के आलोक में प्रसाद, राष्ट्रीय मुक्ति
आंदोलन और प्रसाद, पृ.-103
2. मल्होत्रा, राजीव, भारत विखण्डन, हार्पर कॉलिन्स, 2013, पृ.-63
3. सिंह, वैभव, इतिहास और राष्ट्रवाद, आधार प्रकाशन, 2007, पृ.-42
4. बाजपेयी, नन्ददुलारे, जयशंकर प्रसाद, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और प्रसाद,
पृ.-46
5. सिंह, कुंवरपाल, राष्ट्रीय नवजागरण और प्रसाद का कथा साहित्य, पृ.-281
6. प्रसाद, ग्राम, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल प्रकाशन, 2001, पृ.-06
7. स्रोत : 1989 में आकाशवाणी के लिए प्रसाद पर तैयार दृश्यालेख
प्रसाद, गुंडा, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल प्रकाशन, 2001, पृ.-143