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निबंध

बातचीत
बालकृष्ण भट्ट


इसे तो सभी स्‍वीकार करेंगे कि अनेक प्रकार की शक्तियाँ जो वरदान की भाँति ईश्‍वर ने मनुष्‍यों को दी हैं, उनमें वाक्शक्ति भी एक है। यदि मनुष्‍य की और-और इंद्रियाँ अपनी-अपनी शक्तियों से अविकल रहतीं और वाक्शक्ति उनमें न होती तो हम नहीं जानते इस गूँगी सृष्टि का क्‍या हाल होता। सब लोग लुंज-पुंज से हो मानो एक कोने में बैठा दिये गये होते और जो कुछ सुख-दु:ख का अनुभव हम अपनी दूसरी-दूसरी इंद्रियों के द्वारा करते उसे अवाक् होने के कारण आपस में एक दूसरों से कुछ न कह सुन सकते। अब इस वाक्शक्ति से अनेक फायदों में 'स्‍पीच' वक्तृता और बातचीत दोनों हैं किंतु स्‍पीच से बातचीत का कुछ ढंग ही निराला है। बातचीत में वक्ता को नाज-नखरा जाहिर करने का मौका नहीं दिया जाता कि वह एक बड़े अंदाज से गिन-गिनकर पाँव रखता हुआ पुलपिट पर जा खड़ा हो और पुण्‍याहवाचन या नांदीपाठ की भाँति घड़ियों तक साहबान मजलिस, चेयरमैन, लेडीज एंड जेंटिलमेन की बहुत सी स्‍तुति कर कराय तब किसी तरह वक्तृता का आरंभ किया गया जहाँ कोई मर्म या नोंक की कोई नुकीली चुटीली बात बड़ा वक्ता महाशय के मुख से निकली कि करतल-ध्‍वनि से कमरा गूँज उठा। इसलिए वक्ता को खामखाह ढूँढ़ कर कोई ऐसा मौका अपनी वक्तृता में लाना ही पड़ता है जिसमें करतल-ध्‍वनि अवश्‍य हो। वह हमारी साधारण बातचीत का कुछ ऐसा घरेलू ढंग है कि उसमें न करतलध्‍वनि को कोई मौका है न लोगों को कहकहे उड़ाने की कोई बात उसमें रहती है। हम तुम दो आदमी प्रेम पूर्वक संलाप कर रहे हैं कोई चुटीली बात आ गई हँस पड़े तो मुस्‍कराहट से होंठों का केवल फरक उठना ही इस हँसी की अंतिम सीमा है। स्‍पीच का उद्देश्‍य अपने सुनने वालों के मन में जोश और उत्‍साह पैदा कर देना है। घरेलू बातचीत मन रमाने का एक ढंग है इसमें स्‍पीच की वह सब संजीदगी बेकदर हो धक्‍के खाती फिरती है।

जहाँ आदमी को अपनी जिंदगी मजेदार बनाने के लिए खाने-पीने चलने-फिरने आदि की जरूरत है वहाँ बातचीत की भी हमको अत्यंत आवश्‍यकता है। जो कुछ मवाद या धुआँ जमा रहता है वह सब बात-चीत के जरिये भाप बन बाहर निकल पड़ता है चित्त हल्‍का और स्‍वच्‍छ हो परम आनंद में मग्‍न हो जाता है। बातचीत का भी एक खास तरह का मजा होता है। जिनको बात करने की लत पड़ जाती है वे इसके पीछे खाना-पीना तक छोड़ देते हैं अपना बड़ा हर्ज कर देना उन्‍हें पसंद आता है पर बातचीत का मजा नहीं खोया चाहते। राबिनसन क्रूसो का किस्‍सा बहुधा लोगों ने पढ़ा होगा जिसे सोलह वर्ष तक मनुष्‍य का मुख देखने को भी नहीं मिला। कुत्ता, बिल्ली आदि जानवरों के बीच रहा किया; सोलह वर्ष के उपरांत जब उसने फ्राइडे के मुख से एक बात सुनी, यद्यपि इसने अपनी जंगली बोली में कहा था, उस समय राबिनसन को ऐसा आनंद हुआ मानो उसने नये सिरे से फिर से आदमी का चोला पाया। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्‍य की वाक्शक्ति में कहाँ तक लुभा लेने की ताकत है। जिनसे केवल पत्र-व्‍यवहार है कभी एक बार भी साक्षात्‍कार नहीं हुआ उन्‍हें अपने प्रेमी से कितनी लालसा बात करने की रहती है। अपना आभ्‍यंतरिक भाव दूसरे को प्रकट करना और उसका आशय आप ग्रहण कर लेना केवल शब्‍दों ही के द्वारा हो सकता है। सच है -

''तामर्द सखुन गुफ्ता बाशद।

ऐबो हुनरश निहफ्ता बाशद''

''तावच्‍च शोभते मूर्खो यावत्किंचिन्‍न भाषते''

बेन जानसन का यह कहना कि - ''बोलने से ही मनुष्‍य के रूप का साक्षात्‍कार होता है'' बहुत ही उचित बोध होता है।

इस बातचीत की सीमा दो से लेकर वहाँ तक रखी जा सकती है जितनों की जमात मीटिंग या सभा न समझ ली जाय। एडिसन का मत है असल बातचीत सिर्फ दो में हो सकती है जिसका तात्‍पर्य यह हुआ कि जब दो आदमी होते हैं तभी अपना दिल दूसरे के सामने खोलते हैं जब तीन हुए तब वह दो की बात कोसों दूर गई। कहा है -

''षट्करणो भिद्यते मंत्र:''

दूसरे यह कि किसी तीसरे आदमी के आ जाते ही या तो दोनों हिजाब में आय अपनी बातचीत से निरस्‍त हो बैठेंगे या उसे निपट मूर्ख और अज्ञानी समझ बनाने लगेंगे। इसी से -

''द्वाभ्‍यां तृतीयो न मवामि राजन्''

लिखा है जैसा गरम दूध और ठंडे पानी के दो बर्तन पास-पास साट के रखे जायें तो एक का असर दूसरे पहुँचता है अर्थात् दूध ठंडा हो जाता है और पानी गरम। वैसा, ही दो आदमी आस-पास बैठे तो एक का गुप्‍त असर दूसरे पर पहुँच जाता है। चाहे एक दूसरे को देखे भी नहीं तब बोलने की कौन कहे पर एक का दूसरे पर असर होना शुरू हो जाता है एक के शरीर की विद्युत दूसरे में प्रवेश करने लगती हैं। अब पास बैठने का इतना असर होता है तब बातचीत में कितना अधिक असर होगा इसे कौन न स्‍वीकार करेगा। अस्‍तु, अब इस बात को तीन आदमियों के संगम में देखना चाहिए मानो एक त्रिकोण सा बन जाता है तीनों का चित्त मानो तीन कोण हैं और तीनों की मनोवृत्ति के प्रसरण की धारा मानो उस त्रिकोण की तीन रेखायें हैं। गुपचुप असर तो उन तीनों में परस्‍पर होता ही है जो बातचीत तीनों में की गई वह मानो अँगूठी में नग-सा जड़ जाती है। उपरांत जब चार आदमी हुए तब बेतकल्‍लुफी को बिलकुल स्‍थान नहीं रहता खुल के बातें न होंगी जो कुछ बातचीत की जायगी वह 'फार्मेलिटी' गौरव और संजीदगी के लच्‍छे में सनी हुई। चार से अधिका की बात-चीत तो केवल राम रमौवल कहलायेगी। उसे हम संलाप नहीं कह सकते।

इसी बातचीत के अनेक भेद हैं। दो बुड्ढों की बातचीत प्राय: जमाने की शिकायत पर हुआ करती है, बाबा आदम के समय का ऐसा दास्‍तान शुरू करते हैं जिसमें चार सच तो दस झूठ। एक बार उनकी बातचीत का घोड़ा छूट जाना चाहिये पहरों बीत जाने पर भी अंत न होगा। प्राय: अंग्रेजी राज्‍य पर देश और पुराने समय की बुरी से बुरी रीति नीति का अनुमोदन और इस समय के सब भाँति लायक नौजवान की निंदा उनकी बातचीत का मुख्‍य प्रकरण होगा। अब इसके विपरीत नौजवानों की बातचीत का कुछ तर्ज ही निराला है। जोश-उत्‍साह, नई उमंग, नया हौसिला आदि मुख्‍य प्रकरण उनकी बातचीत का होगा। पढ़े लिखे हुए तो शेक्‍सपीयर, मिलटन, मिल और स्‍पेन्‍सर उनके जीभ के आगे नाचा करेंगे। अपनी लियाकत के नशे में चूरंचूर हमचुनी दीगरे नेस्‍त। अक्‍खड़ कुश्‍तीबाज हुए तो अपनी पहलवानी और अक्‍खड़पन की चर्चा छेड़ेंगे। आशिकतकन हुए तो अपने-अपने प्रेमपात्री की प्रशंसा तथा आशिकतन बनने की हिमाकत की डींग मारेंगे। दो ज्ञात-यौवन हम उमर सहेलियों की बातचीत का कुछ जायका ही निराला है रस का समुद्र मानो उमड़ चला आ रहा है इसका पूरा स्‍वाद उन्‍हीं से पूछना चाहिए जिन्‍हें ऐसों की रस-सनी बातें सुनने को कभी भाग्‍य खड़ा है।

''प्रजल्‍पन्‍मत्‍पदे लग्‍न: कान्‍त: किं''? नहि नूपुर:।

''वदन्‍ती जारवृत्तान्‍तं पत्‍यौ धूर्ता सखी धिया।।

पति बुद्ध्‍वा सखि तत: प्रबुद्धास्‍मीत्‍यपूरयत्''।

अर्द्धजरती बुढ़ियाओं की बातचीत का मुख्‍य प्रकरण बहू-बेटी वाली हुई तो अपनी-अपनी बहुओं या बेटों का गिला-शिकवा होगा या बिरादराने का कोई ऐसा राम-रसरा छेड़ बैठेंगी कि बात करते-करते अंत में खोढ़े दाँत निकाल-निकाल लड़ने लगेंगे। लड़कों की बात-चीत में खेलाड़ी हुए तो अपनी आवारगी की तारीफ करने के बाद कोई ऐसी सलाह गाठेंगे जिसमें उनको अपनी शैतानी जाहिर करने का पूरा मौका मिले। स्‍कूल के लड़कों की बातचीत का उद्देश्‍य अपने उस्‍ताद की शिकायत या तारीफ या अपने सहपाठियों में किसी के गुनऐगुन का कथोपकथन होता है। पढ़ने में तेज हुआ तो कभी अपने मुकाबिले दूसरे को कैफियत न देगा सुस्‍त और बोदा हुआ तो दबी बिल्‍ली सी स्‍कूल भर को अपना गुरु ही मानेगा। अलावे इसके बातचीत की और बहुत सी किसमें हैं। राजकाम की बात, व्‍यापार संबंधी बातचीत, दो मित्रों में प्रेमालाप इत्‍यादि। हमारे देश में नीच जाति के लोगों में बात कही होती है लड़की लड़के वाले की ओर से। एक-एक आदमी बिचवई होकर दोनों के विवाह संबंध की कुछ बातचीत करते हैं उस दिन से बिरादरी वालों को जाहिर कर दिया जाता है कि अमुक की लड़की से अमुक के लड़के के साथ विवाह पक्‍का हो गया है और यह रसम बड़े उत्‍साह के साथ की जाती। एक चंडूखाने की बातचीत होती है इत्‍यादि, इस बात करने के अनेक प्रकार और ढंग हैं।

यूरोप के लोगों में बात करने का एक हुनर है 'आर्ट आफ कनवरसेशन' यहाँ तक बढ़ा है कि स्‍पीच और लेख दोनों इसे नहीं पाते। इसकी पूर्ण शोभा काव्‍यकला प्रवीन विद्वन्‍मंडली में है। ऐसे-ऐसे चतुराई के प्रसंग छेड़े जाते हैं कि जिन्‍हें सुन कान को अद्भुत सुख मिलता है सहृदय गोष्‍ठी इसे का नाम है कि सहृदय गोष्‍ठी के बातचीत की यही तारीफ है कि बात करने वालों की लियाकत अथवा पांडित्य का अभियान या कपट कहीं एक बात में न प्रकट हो वरन् जितने क्रम रसाभास पैदा करने वाले सबों की बरकाते हुए चतुर सयाने अपनी बातचीत का उपक्रम रखते हैं जो हमारे आधुनिक शुष्‍क पंडितों की बातचीत में जिसे शास्‍त्रार्थ कहते हैं कभी आवे ही गा नहीं। मुर्ग और बटेर की लड़ाइयों की झपटा-झपटी के समान जिनकी काँव-काँव में सरस संलाप का तो चर्चा ही चलाना व्‍यर्थ है वरन् कपट और एक दूसरे को अपने पांडित्‍य के प्रकाश से बाद में परास्‍त करने का संघर्ष आदि रसाभास की सामग्री वहाँ बहुतायत के साथ आपको मिलेगी। घंटेभर तक काँव-काँव करते रहेंगे तय कुछ न होगा। बड़ी-बड़ी कंपनी और कारखाने आदि बड़े से बड़े काम इसी तरह पहले दो चार दिली दोस्‍तों की बातचीत ही से शुरू किए गये उपरांत बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक बढ़े कि हजारों मनुष्‍यों की उससे जीविका और लाखों की साल में आमदनी उसमें है। पचीस वर्ष के ऊपर वालों की बातचीत अवश्‍य ही कुछ न कुछ सार गर्भित होगी। अनुभव और दूरंदेशी से खाली न होगी और पच्चीस से नीचे वालों की बातचीत में यद्यपि अनुभव दूरदर्शिता और गौरव नहीं पाया जाता पर इसमें एक प्रकार का ऐसा दिल बहलाव और ताजगी रहती है कि जिसकी मिठास उससे दसगुना अधिक बढ़ी-चढ़ी है।

यहाँ तक हमने बाहरी बातचीत का हाल लिखा जिसमें दूसरे फरीक के होने की बहुत ही आवश्‍यकता है। बिना किसी दूसरे मनुष्‍य के हुए जो किसी तरह संभव नहीं है और जो दो ही तरह पर हो सकती है या तो कोई हमारे यहाँ कृपा करे या हमीं जाकर दूसरे को सर्फराज करें। पर यह सब तो दुनियादारी है जिसमें कभी-कभी रसाभास होते देर नहीं लगती क्‍योंकि जो महाशय अपने यहाँ पधारें उसकी पूरी दिलजोई न हो सकी तो शिष्‍टाचार में त्रुटि हुई। अगर हमीं उनके यहाँ गये तो पहले तो बिना बुलाये जाना ही अनादर का मूल है और जाने पर अपने मन माफिक बर्ताव न किया गया तो मानो एक दूसरे प्रकार का नया घाव हुआ इसलिए सबसे उत्तम प्रकार बातचीत करने का हम यही समझते हैं कि हम यह शक्ति अपने में पैदा कर सकें कि अपने आप बात कर लिया करें। हमारी भीतरी मनोवृत्ति जो प्रतिक्षण नये-नये रंग दिखलाया करती है और जो वाह्य प्रपंचात्‍मक संसार का एक बड़ा भारी आईना है जिसमें जैसी चाहो वैसी सूरत देख लेना कुछ दुर्घट बात नहीं है और जो एक ऐसा चमनिस्‍तान है जिसमें हर किस्‍म के बेल-बूटे खिले हुए हैं इस चमनिस्‍तान की सैर क्‍या कम दिल कहलाव है? मित्रों का प्रेमालाप कभी इसकी सोलहवीं कला तक भी पहुँच सकता है? इसी सैर का नाम ध्‍यान या मनोयोग या चित्त का एकाग्र करना है जिसका साधन एक दो दिन का काम नहीं वरन् साल दो साल के अभ्‍यास के उपरांत यदि हम थोड़ा सी अपनी मनोवृत्ति स्थिर कर अवाक् हो अपने मन के साथ बातचीत कर सके तो मानो अति भाग्‍य है। एक वाक्-शक्तिमात्र के दमन से न जानिये कितने प्रकार का दमन हो गया। हमारी जिह्वा जो कतरनी के समान सदा स्‍वच्छंद चला करती उसे यदि हमने दबा कर अपने काबू में कर लिया तो क्रोधादिक बड़े-बड़े अजेय शत्रुओं को बिन प्रयास जीत अपने वश कर डाला। इसलिये अवाक् रह अपने आप बातचीत करने का यह साधन यावत् साधन का मूल है, शांति का परम पूज्‍य मंदिर है, परमार्थ का एकमात्र सोपान है।

(अगस्‍त, 1891)


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