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कविता

एफ.आई.आर.
नीलेश रघुवंशी


खुद को चोर होने से रोक सकती हूँ
मेरे घर में चोरी न हो
यह भला कैसे रोक सकती हूँ!
खुद को चोर होने से रोका
कोई बड़ी बात नहीं
चोर को चोर होने से रोक सकती
तो कुछ बात बनती
घर में ताला लगाकर चाभी चोर के यहाँ रखती
इस तरह
किसी और युग में न जाकर
किसी और ग्रह को न ताककर
चोर के संग
एफ.आई.आर. के रजिस्टर के पुरजे पुरजे कर
यहीं धरती पर पानी की नाव बनाती...!


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