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वैचारिकी संग्रह

सावरकर समग्र खंड 5

विनायक दामोदर सावरकर


 

सावरकर समग्र

 

स्वातंत्र्यवीर

विनायक दामोदर सावरकर

प्रभात प्रकाशन,दिल्ली

आभार- स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक

२५२ स्वातंत्र्यवीर सावरकर मार्ग

शिवाजी उद्यान,दादर,मुंबई-२८

प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन

४/१९ आसफ अली रोड

नई दिल्ली-११०००२

संस्करण - २००४

© सौ. हिमानी सावरकर

मूल्य - पाँच सौ रुपए प्रति खंड

पाँच हजार रुपए (दस खंडों का सैट)

मुद्रक - गिर्राज प्रिंटर्स, दिल्ली

SAVARKAR SAMAGRA (Complete Works of Vinayak Damodar Savarkar Published by Prabhat Prakashan, 4/19 Asaf Ali Road, New Delhi-2

Vol. V Rs. 500.00 ISBN 81-7315-325-6

Set of Ten Vols. Rs. 5000.00 ISBN 81-7315-331-0

विनायक दामोदर सावरकर : संक्षिप्त जीवन परिचय

श्री विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी तथा अग्रणी नक्षत्र थे। 'वीर सावरकर' शब्द साहस, वीरता, देशभक्ति का पर्यायवाची बन गया है। 'वीर सावरकर' शब्द के स्मरण करते ही अनुपम त्याग, अदम्य साहस, महान् वीरता, एक उत्कट देशभक्ति से ओतप्रोत इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हमारे सामने साकार होकर खुल पड़ते हैं।

वीर सावरकर न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु वह एक महान् क्रांतिकारी, चिंतक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वह एक ऐसे इतिहासकार भी थे जिन्होंने हिंदू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढंग से लिपिबद्ध किया तो '१८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर' का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला डाला था।

इस महान् क्रांतिपुंज का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के ग्राम भगूर में चितपावन वशीय ब्राह्मण श्री दामोदर सावरकर के घर २८ मई, १८८३ को हुआ था। गाँव के स्कूल में ही पाँचवीं तक पढ़ने के बाद विनायक आगे पढ़ने के लिए नासिक चले गए।

लोकमान्य तिलक द्वारा संचालित 'केसरी' पत्र की उन दिनों भारी धूम थी। 'केसरी' में प्रकाशित लेखों को पढ़कर विनायक के हृदय में राष्ट्रभक्ति की भावनाएँ हिलोरें लेने लगीं। लेखों, संपादकीयों व कविताओं को पढ़कर उन्होंने जाना कि भारत को दासता के चंगुल में रखकर अंग्रेज किस प्रकार भारत का शोषण कर रहे हैं। वीर सावरकर ने कविताएँ तथा लेख लिखने शुरू कर दिए। उनकी रचनाएँ मराठी पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होने लगीं। 'काल' के संपादक श्री परांजपे ने अपने पत्र में सावरकर की कुछ रचनाएँ प्रकाशित की, जिन्होंने तहलका मचा दिया।

सन् १९०५ में सावरकर बी.ए. के छात्र थे। उन्होंने एक लेख में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया। इसके बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का कार्यक्रम बनाया। लोकमान्य तिलक इस कार्य के लिए आशीर्वाद देने उपस्थित हुए।

सावरकर की योजना थी कि किसी प्रकार विदेश जाकर बम आदि बनाने सीखे जाएँ तथा शस्त्रास्त्र प्राप्त किए जाएँ। तभी श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सावरकर को छात्रवृत्ति देने की घोषणा कर दी। ९ जून, १९०६ को सावरकर इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए। वह लंदन में इंडिया हाउस' में ठहरे। उन्होंने वहाँ पहुँचते ही अपनी विचारधारा के भारतीय युवकों को एकत्रित करना शुरू कर दिया। उन्होंने 'फ्री इंडिया सोसाइटी' की स्थापना की।

सावरकर 'इंडिया हाउस' में रहते हुए लेख व कविताएँ लिखते रहे। वह गुप्त रूप से बम बनाने की विधि का अध्ययन व प्रयोग भी करते रहे। उन्होंने इटली के महान् देशभक्त मैझिनी का जीवन-चरित्र लिखा। उसका मराठी अनुवाद भारत में छपा तो एक बार तो तहलका ही मच गया था।

१९०७ में सावरकर ने अंग्रेजों के गढ़ लंदन में १८५७ की अर्द्धशती मनाने का व्यापक कार्यक्रम बनाया। १० मई, १९०७ को 'इंडिया हाउस' में सन् १८५७ की क्रांति की स्वर्ण जयंती का आयोजन किया गया। भवन को तोरण-द्वारों से सजाया गया। मंच पर मंगल पांडे, लक्ष्मीबाई, वीर कुँवरसिंह, तात्या टोपे, बहादुरशाह जफर, नानाजी पेशवा आदि भारतीय शहीदों के चित्र थे। भारतीय युवक सीने व बाँहों पर शहीदों के चित्रों के बिल्ले लगाए हुए थे। उनपर अंकित था -१८५७ के वीर अमर रहें'। इस समारोह में कई सौ भारतीयों ने भाग लेकर १८५७ के स्वाधीनता संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। राष्ट्रीय गान के बाद वीर सावरकर का ओजस्वी भाषण हुआ, जिसमें उन्होंने सप्रमाण सिद्ध किया कि १८५७ में 'गदर' नहीं अपितु भारत की स्वाधीनता का प्रथम महान् संग्राम हुआ था।

सावरकर ने १९०७ में १८५७ का प्रथम स्वातंत्र्य समर' ग्रंथ लिखना शुरू किया। इंडिया हाउस के पुस्तकालय में बैठकर वह विभिन्न दस्तावेजों व ग्रंथों का अध्ययन करने लगे। उन्होंने लगभग डेढ़ हजार ग्रंथों के गहन अध्ययन के बाद इसे लिखना शुरू किया।

ग्रंथ की पांडुलिपि किसी प्रकार गुप्त रूप से भारत पहुँचा दी गई। महाराष्ट्र में इसे प्रकाशित करने की योजना बनाई गई। 'स्वराज्य' पत्र के संपादक ने इसे प्रकाशित करने का निर्णय लिया; किंतु पुलिस ने प्रेस पर छापा मारकर योजना में बाधा डाल दी। ग्रंथ की पांडुलिपि गुप्त रूप से पेरिस भेज दी गई। वहाँ इसे प्रकाशित कराने का प्रयास किया गया; किंतु ब्रिटिश गुप्तचर वहाँ भी पहुँच गए और ग्रंथ को प्रकाशित न होने दिया गया। ग्रंथ के प्रकाशित होने से पूर्व ही उसपर प्रतिबंध लगा दिया गया। अंतत: १९०९ में ग्रंथ फ्रांस से प्रकाशित हो ही गया।

ब्रिटिश सरकार तीनों सावरकर बंधुओं को 'राजद्रोही' व खतरनाक घोषित कर चुकी थी। सावरकर इंग्लैंड से पेरिस चले गए। पेरिस में उन्हें अपने साथी याद आते। वह सोचते कि उनके संकट में रहते उनका यहाँ सुरक्षित रहना उचित नहीं है। अंतत: वह इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए।

१३ मार्च, १९१० को लंदन के रेलवे स्टेशन पर पहुँचते ही सावरकर को बंदी बना लिया गया और ब्रिक्स्टन जेल में बंद कर दिया गया। उनपर लंदन की अदालत में मुकदमा शुरू हुआ। न्यायाधीश ने २२ मई को निर्णय दिया कि क्योंकि सावरकर पर भारत में भी कई मुकदमे हैं, अत: उन्हें भारत ले जाकर वहीं मुकदमा चलाया जाए। अंतत: २९ जून को सावरकर को भारत भेजने का आदेश जारी कर दिया गया।

१ जुलाई, १९०९ को 'मोरिया' जलयान से सावरकर को कड़े पहरे में भारत रवाना किया गया। ब्रिटिश सरकार को भनक लग गई थी कि सावरकर को रास्ते में छुड़ाने का प्रयास किया जा सकता है। अत: सुरक्षा प्रबंध बहुत कड़े किए गए। ८ जुलाई को जलयान मार्सेल बंदरगाह के निकट पहँचने ही वाला था कि सावरकर शौच जाने के बहाने पाखाने में जा घुसे। फुरती के साथ उछलकर वह पोर्ट हॉल तक पहुँचे और समुद्र में कूद पड़े।

अधिकारियों को जैसे ही उनके समुद्र में कूद जाने की भनक लगी कि अंग्रेज अफसरों के छक्के छूट गए। उन्होंने समुद्र की लहरें चीरकर तैरते हुए सावरकर पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। सावरकर सागर की छाती चीरते हुए फ्रांस के तट की ओर बढ़ने लगे। कुछ ही देर में वह तट तक पहुँचने में सफल हो गए किंतु उन्हें पुन: बंदी बना लिया गया।

१५ सितंबर, १९१० को सावरकर पर मुकदमा शुरू हुआ। सावरकर ने स्पष्ट कहा कि भारत के न्यायालय से उन्हें न्याय की किंचित् भी आशा नहीं है, अत: वह अपना बयान देना व्यर्थ समझते हैं।

२३ दिसंबर को अदालत ने उन्हें ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र रचने, बम बनाने तथा रिवॉल्वर आदि शस्त्रास्त्र भारत भेजने आदि आरोपों में आजन्म कारावास की सजा सुना दी। उनकी तमाम संपत्ति भी जब्त कर ली गई।

२३ जनवरी, १९११ को उनके विरुद्ध दूसरे मामले की सुनवाई शुरू हुई। ३० जनवरी को पुनः आजन्म कारावास की सजा सुना दी गई। इस प्रकार सावरकर को दो आजन्म कारावासों का दंड दे दिया गया। सावरकर को जब अंग्रेज न्यायाधीश ने दो आजन्म कारावासों का दंड सुनाया तो उन्होंने हँसते हुए कहा, 'मुझे बहुत प्रसन्नता है कि ईसाई (ब्रिटिश) सरकार ने मुझे दो जीवनों का कारावास दंड देकर पुनर्जन्म के हिंदू सिद्धांत को मान लिया है।'

कुछ माह बाद महाराजा नामक जलयान से सावरकर को अंदमान भेज दिया गया। अंदमान में उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी जाती थीं। कोल्हू में बैल की जगह जोतकर तेल पिरवाया जाता था, मूंज कुटवाई जाती थी। राजनीतिक बंदियों पर वहाँ किस प्रकार अमानवीय अत्याचार ढाए जाते थे, इसका रोमांचकारी वर्णन सावरकरजी ने अपनी पुस्तक मेरा आजीवन कारावास में किया है।

सावरकरजी ने अंदमान में कारावास के दौरान अनुभव किया कि मुसलमान वॉर्डर हिंदू बंदियों को यातनाएँ देकर उनका धर्म-परिवर्तन करने का कुचक्र रचते हैं। उन्होंने इस अन्यायपूर्ण धर्म-परिवर्तन का डटकर विरोध किया तथा बलात् मुसलिम बनाए गए अनेक बंदियों को हिंदू धर्म में दीक्षित करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने अंदमान की कालकोठरी में कविताएँ लिखीं। 'कमला', 'गोमांतक' तथा 'विरहोच्छ्वास' जैसी रचनाएँ उन्होंने जेल की यातनाओं से हुई अनुभूति के वातावरण में ही लिखी थीं। उन्होंने 'मृत्यु' को संबोधित करते हुए जो कविता लिखी वह अत्यंत मार्मिक व देशभक्ति से पूर्ण थी।

सावरकरजी ने अंदमान कारागार में होनेवाले अमानवीय अत्याचारों की सूचना किसी प्रकार भारत के समाचारपत्रों में प्रकाशित कराने में सफलता प्राप्त कर ली। इससे पूरे देश में इन अत्याचारों के विरोध में प्रबल आवाज उठी। अंत में दस वर्ष बाद १९२१ में सावरकरजी को बंबई लाकर नजरबंद रखने का निर्णय किया गया। उन्हें महाराष्ट्र के रत्नागिरी स्थान में नजरबंदी में रखने के आदेश हुए।

'हिंदुत्व', 'हिंदू पदपादशाही', 'उ:श्राप', 'उत्तरक्रिया', 'संन्यस्त खड्ग' आदि ग्रंथ उन्होंने रत्नागिरी में ही लिखे।

१० मई, १९३७ को सावरकरजी की नजरबंदी रद्द की गई।

नजरबंदी से मुक्त होते ही सावरकरजी का भव्य स्वागत किया गया। अनेक नेताओं ने उन्हें कांग्रेस में शामिल करने का प्रयास किया; किंतु उन्होंने स्पष्ट कह दिया, 'कॉंग्रेस की मुसलिम तुष्टीकरण की नीति पर मेरे तीव्र मतभेद हैं। मैं हिन्दू महासभा का ही नेतृत्व करूँगा।'

३० दिसंबर, १९३७ को अहमदाबाद में आयोजित अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अधिवेशन में सावरकरजी सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने 'हिंदू' की सर्वश्रेष्ठ व मान्य परिभाषा की। हिंदू महासभा के मंच से सावरकरजी ने 'राजनीति का हिंदूकरण और हिंदू सैनिकीकरण' का नारा दिया। उन्होंने हिंदू युवकों को अधिक-से-अधिक संख्या में सेना में भरती होने की प्रेरणा दी। उन्होंने तर्क दिया, 'भारतीय सेना के हिंदू सैनिकों पर ही इस देश की रक्षा का भार आएगा, अत: उन्हें आधुनिकतम सैन्य विज्ञान की शिक्षा दी जानी जरूरी है।'

२६ फरवरी, १९६६ को भारतीय इतिहास के इस अलौकिक महापुरुष ने इस संसार से विदा ले ली। अपनी अंतिम वसीयत में भी उन्होंने हिंदू संगठन व सैनिकीकरण के महत्त्व, शुद्धि की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। भारत को पुन: अखंड बनाए जाने की उनकी आकांक्षा रही।

ऐसे वीर पुरुष का व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी हमारे लिए पथ-प्रदर्शक का काम करने में सक्षम है।

-शिवकुमार गोयल

सावरकर समग्र


प्रथम खंड

पूर्व पीठिका, भगूर, नाशिक

शत्रु के शिविर में

लंदन से लिखे पत्र

द्वितीय खंड

मेरा आजीवन कारावास

अंदमान की कालकोठरी से

गांधी वध निवेदन

आत्महत्या या आत्मार्पण

अंतिम इच्छा पत्र

तृतीय खंड

काला पानी

मुझे उससे क्या? अर्थात् मोपला कांड

अंधश्रद्धा निर्मूलक कथाएँ

चतुर्थ खंड

उ:शाप

बोधिवृक्ष

संन्यस्त खड्ग

उत्तरक्रिया

प्राचीन अर्वाचीन महिला

गरमागरम चिवड़ा

गांधी गोंधल

पंचम खंड

१८५७ का स्वातंत्र्य समर

रणदुंदुभि

तेजस्वी तारे

 

षष्टम खंड

छह स्वर्णिम पृष्ठ

हिंदू पदपादशाही

सप्तम खंड

जातिभंजक निबंध

सामाजिक भाषण

विज्ञाननिष्ठ निबंध

अष्टम खंड

मैझिनी चरित्र

विदेश में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

क्षकिरणे

ऐतिहासिक निवेदन

अभिनव भारत संबंधी भाषण

नवम खंड

हिंदुत्व हिंदुत्व का प्राण

नेपाली आंदोलन

लिपि सुधार आंदोलन

हुनदु राष्ट्रदर्शन

दशम खंड

कविताएँ

भाषा-शुद्धि लेख

विविध लेख


अनुवाद:

प्रो. निशिकांत मिरजकर, डॉ. ललिता मिरजकर,

डॉ. हेमा जावडेकर, श्री वामन राव पाठक, श्री काशीनाथ जोशी,

श्री शरद दामोदर महाजन, श्री माधव साठे, सौ. कुसुम तांबे,

सौ. सुनीता कुट्टी, सौ. प्रणोति उपासने

संपादन:

प्रो. निशिकांत मिरजकर, डॉ. श्याम बहादुर वर्मा,

श्री रामेश्वर मिश्र 'पंकज', श्री जगदीश उपासने,

श्री काशीनाथ जोशी, श्री धृतिवर्धन गुप्त, श्री अशोक कौशिक

मार्गदर्शन :

श्री त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी, डॉ. हरींद्र श्रीवास्तव,

श्री शिवकुमार गोयल

अनुक्रम

अठारह सौ सत्तावन का स्वतंत्रता संग्राम १५

भाग-१ : ज्वालामुखी १७

१. स्वधर्म और स्वराज्य १९

२. कारण परंपरा ३०

डलहौजी ३२

३. नाना साहब और लक्ष्मीबाई ४०

४. अयोध्या ५०

५. धकेलो उसमें ५६

६. अग्नि में घी ६०

७. गुप्त संगठन ६७

 

भाग-२: विस्फोट ८३

१. शहीद मंगल पांडे ८५

२. मेरठ ९0

३. दिल्ली ९८

४. मध्यांतर और पंजाब १०७

५. अलीगढ़ और नसीराबाद १३४

६. रुहेलखंड १४०

७. बनारस और इलाहाबाद १५०

८. कानपुर और झाँसी १७४

९. अयोध्या का रण २०४

१०. संकलन २१९

भाग-३ : अग्नि कल्लोल २३५

१. दिल्ली लड़ती है २३७

२. हैवलॉक २५३

हिंदू धर्म और हिंदू राज्य के लिए फिर एक बार जूझना होगा २६१

३. बिहार २६३

४. दिल्ली हारी २७७

५. लखनऊ २९०

६. तात्या टोपे ३१५

७. लखनऊ का पतन ३२४

८. कुँवरसिंह और अमरसिंह ३४३

९. मौलवी अहमदशाह ३५९

१०. रानी लक्ष्मीबाई ३९५

 

भाग-४ : अस्थायी शांति३९५

१. विहंगावलोकन ३९७

२. पूर्णाहुति ४२०

यत्र-तत्र तात्या टोपे ४२०

३. समारोप ४३६

रणदुंदुभि ४४१

१. हिंदू संगठनकर्ता स्वराष्ट्र का इतिहास किस तरह लिखें और पढ़ें ४४३

इतिहास को कैसे पढ़ा जाए? ४५०

२. शिव छत्रपति की जयजयकार ४५३

३. शिवाजी महाराज की यशस्वी राजनीति का एक सूत्र ४६६

४. लानत है तुमपर! ४७४

५. डॉ. आंबेडकर को उत्तर-विजयशील हिंदू राष्ट्र ४८१

आंबेडकर का निर्लज्ज आक्षेप ४८१

६. अटक पर हिंदू विजय का भगवा ध्वज ४९६

जयंती और विजयंती ४९८

७. मुसलमानों की खिलाफत का उदय-अस्त और विनाश ५०६

'हिजरी' अर्थात् पलायन संवत् का आरंभ ५०६

छठवाँ खलीफा येसिड ५१०

शिया पंथ के इमाम ५११

अन्योन्य प्रतिस्पर्धी खलीफा ५१२

दमास्कस के उमैयद खलीफा ५१२

अब्बासी खलीफा ५१४

तुर्की सुलतान ५१७

सुलतान पद और खिलाफत का संपूर्ण विनाश ५१७

८. कमाल पाशा द्वारा तुर्किस्तान से अरब संस्कृति का उच्छेद ५१८

अरब संस्कृति की पूर्वकालीन उपयुक्तता ५१९

संस्कृति की उन्नति की सीमाएँ ५१९

तरुण तुर्कों की बगावत ५२०

अरबी साम्राज्य में तुर्कों का प्रवेश ५२१

तुर्की सुलतानों का उदय ५२३

अरब खिलाफत का उच्छेद ५२४

अरब धर्मनियमों का उच्छेद ५२६

धर्म-स्वातंत्र्य की घोषणा ५२८

अरबी लिपि की परिसमाप्ति ५२८

अरबी भाषा की परिसमाप्ति ५२९

पूजा-प्रार्थनादि अरबी धर्माचारों का उच्छेद ५३०

फेज टोपी फेंक दी गई ५३०

मुसलिम पुराणपंथियों की बगावत ५३२

कल का पाखंड, आज का पुण्यश्लोक! ५३२

तेजस्वी तारे ५३३

१. वंदे मातरम् ५३५

२. ऐतिहासिक पुरुषों के उत्सव क्यों मनाने चाहिए? ५४३

३. देशभक्त पं. श्यामजी कृष्णवर्मा ५५१

होमरूल ५५४

अभिनव भारत ५५५

४. बालमुकुंद और लज्जावती ५५९

५.देशवीर शचींद्रनाथ सान्याल ५६३

६. वीरमाता क्षीरोदवासिनी ५७१

७. वीर युवक शशिमोहन डे ५७६

८. आंध्रप्रांतीय भारतवीर श्रीराम राजू ५८२

वह अपराधी नहीं है ५८२

प्राचीन परंपरा ५८३

बचपन एवं शिक्षा ५८४

संन्यासी श्रीराम ५८५

राजू का लोगों पर प्रभाव ५८५

रीजंसी में असंतोष ५८६

जनसंग्रह ५८७

स्वराज्य प्राप्ति का मार्ग ५८७

छोटा सा कैसर ५८७

ब्रिटिश-सिंह से लड़ाई ५८८

९. देशवीर विष्णु गणेश पिंगले ५८९

१०. जतींद्रनाथ का बलिदान ५९७

भगतसिंह-दत्त, सतीन-सेन इत्यादि ५९८

हुतात्मा देशवीर रामरखा और अंदमान के अन्न-त्यागी ५९८

११. लाला हरदयाल ६०७

तीव्र बुद्धिमत्ता ६०७

ईसाई धर्म का प्रभाव ६०७

इंग्लैंड में ६०८

क्रांति की प्रतिज्ञा ६०८

एकांतिक भावना ६०९

क्रांति का जोर ६०९

गुप्त सिपाहियों को चकमा ६१०

जर्मनी से दोस्ती ६१०

महात्मा गांधी की नीति ६११

मन की दुविधा ६११

तत्त्वज्ञान की तरफ झुकाव ६१२

नया धर्म ६१२

विश्वयुद्ध का अवसर ६१२

बीस साल पहले की राजनीति ६१३

अमेरिका की कैद से पलायन ६१३

विद्रोह की तैयारी ६१४

उपकारकर्ता की उपेक्षा ६१४

१२. क्रांति की चिनगारियाँ ६१६

१३. हमें शस्त्राचारी कहिए, अत्याचारी नहीं ६२२

अठारह सौ सत्तावन

का

स्वतंत्रता संग्राम

भाग-१

ज्वालामुखी

प्रकरण-१

स्वधर्म और स्वराज्य

धर्मासाठी मरावे, मरोनि अवघ्यांसी मारावें।

मारिता मारिता घ्यावें, राज्य आपुलें॥

-स्वामी रामदास

अर्थात्-

धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें;

मारते-मारते जीतें, राज्य अपना।

कोई छोटा सा घर बनाना हो तो भी इतनी मजबूत नींव तो बनाई ही जाती है कि वह उसका भार सह सके। नींव मजबूत और घर का भार सँभालने योग्य न हो तो उस नींव पर निर्मित मकान ताश के तंबू से अधिक भव्य या विशाल कभी भी नहीं माना जा सकता, यह बात अशिक्षित-गँवार भी जानता है। परंतु किसी सामान्य मनुष्य को भी ज्ञात यह व्यवहार-ज्ञान भुलाकर जब कोई लेखक प्रचंड क्रांति का इतिहास लिखते हुए इस तरह की बात करे कि उस क्रांति के भव्य और विशाल भवन का भार सहन कर सकनेवाली वह नींव कौन सी थी कि या फिर वह प्रचंड क्रांति मंदिर किसी घास के तिनके पर निर्मित था तो या तो वह पागल होता है या फिर क्षुद्र प्राणी। वह इन दोनों विशेषणों में से किसी एक का भी पात्र हो तो इतिहास लेखन के पवित्र कार्य के लिए वह पूरी तरह अयोग्य है।

बड़ी-बड़ी धर्म क्रांतियों या राज्य क्रांतियों के सतही स्वरूप में विहित असंबद्धता या असमानता की निरंतरता उन क्रांतियों के मूल तत्त्व को समझे बिना कभी भी समझ में नहीं आ सकती। अनेक चक्र और अनेक लौह मार्गोंवाला कोई विशाल संयंत्र प्रचंड शक्ति से काम करता हो तो वह शक्ति किस यंत्र-शास्त्रीय नियम से उत्पन्न की गई है, यह पूर्ण रीति से समझे बिना, देखनेवालों को आश्चर्य मिश्रित विस्मय होगा। उसे ज्ञान से प्राप्त समझ या बूझ कभी नहीं कहा जा सकता। फ्रांस की राज्य क्रांति या हॉलैंड की धर्मक्रांति जैसी अद्भुत घटनाएँ जब पाठकों एवं लेखकों को अपनी भव्यता से चकित करती हैं तब उनकी उस भव्यता में हक्काबक्का होकर पाठक की दृष्टि और लेखक की लेखनी भी उसके मूल शक्ति स्रोत को देखने-दरसाने की हिम्मत नहीं कर पाती। परंतु उस मूल शक्ति को जाने बिना उस क्रांति का वास्तविक रहस्य कभी भी समझ में नहीं आता, अतः इतिहास शास्त्र में वर्णन से अधिक मूल स्रोत को दरसाना ही अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है।

यह मूल स्रोत दरसाते हुए बहुत बार इतिहास-लेखक और एक चूक करते हैं। प्रत्येक कार्य में कुछ प्रत्यक्ष, कुछ अप्रत्यक्ष, कुछ विशिष्ट और कुछ सामान्य, कुछ आकस्मिक और कुछ प्रधान कारण निहित होते हैं और उनका वर्गीकरण करने में ही इतिहास-लेखक का वास्तविक कौशल होता है। परंतु कुछ इतिहासकार यहाँ भ्रमित होकर इस वर्गीकरण में आकस्मिक कारणों को प्रधान कारण का स्वरूप दे देते हैं। किसी घर को आग लगने पर उस आग को लगानेवाले व्यक्ति को छोड़ उसके हाथ की माचिस की तीली पर सारा आरोप लादनेवाले मूर्ख न्यायाधीश की तरह वह इतिहासकार भी हास्यास्पद हो जाता है। आकस्मिक कारण को ही प्रधान कारण मानकर किसी ऐतिहासिक घटना का इतिहास लिखने से उस घटना का वास्तविक महत्त्व कभी भी समझ में नहीं आता, उलटे वह अद्भुत एवं क्रांतिकारी घटना न कुछ कारणों से घटित हुई देखकर उस घटक और उसमें सम्मिलित व्यक्तियों के लिए तुच्छ भावना उत्पन्न होने लगती है। इसलिए ऐतिहासिक घटनाओं का और विशेषकर क्रांतिकारी घटनाओं का इतिहास लिखते समय उसका केवल वर्णन लिखने से उसकी समुचित कल्पना प्रस्तुत करना संभव नहीं होता या उसका उद्गम उसके निमित्त कारण तक ही खोजकर लौट आने से भी उसका यथार्थ स्वरूप ज्ञात नहीं होता। अतः जिसे सत्य, पक्षपात रहित और मर्मस्पर्शी इतिहास लिखना हो, उसे उस घटना और उस क्रांति की ज्वाला की नींव के कारणों का, उसके मूल में क्या तत्त्व थे, उसके प्रधान कारण क्या थे, इन सबका पर्यालोचन अवश्य करना चाहिए।

'हर क्रांति की नींव में कोई-न-कोई तत्त्व होना ही चाहिए'-इटली के प्रख्यात दार्शनिक और देशभक्त मैजिनी ने कार्लाइल लिखित फ्रांसीसी राज्य क्रांति की एक पुस्तक पर टीकात्मक लेख में ऐसा कहा है। क्रांति अथवा इतिहास में मनुष्य जाति के जीवन की उठा-पटक होती है। जिसके लिए लाखों जूझते हैं, राजसिंहासन जिस कारण डगमगाते हैं, स्थापित मुकुट लुढ़कते हैं, अजन्मे मुकुट सिर चढ़ते हैं, स्थापित मूर्ति भंग होकर नई मूर्ति की स्थापना भी जिसके कारण होती है, और प्रचंड समूह को लगने लगता है कि इसके आगे रक्त बहाना तो कुछ भी नहीं, ऐसे किसी विक्षोभक तत्त्व के सिवाय किसी अन्य क्षुद्र व क्षणिक नींव पर क्रांति के भव्य भवन का निर्माण असंभव है। पर क्रांति की नींव का यह तत्त्व जिस प्रमाण में पवित्र या अपवित्र हाता है उसी प्रमाण में उस क्रांति के कार्यकर्ता-व्यक्ति के स्वरूप और कृत्य भी पवित्र या अपवित्र होते हैं। हेतु से जैसे कृत्य की परीक्षा सामान्य व्यवहार में की जाती है उसी तरह इतिहास में भी व्यक्ति या राष्ट्र के हेतु से उसके कृत्य का स्वरूप निश्‍चित होता है। यह कसौटी यदि छोड़ दें तो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को मारना या किसी एक सेना द्वारा दूसरी सेना को मारने में कोई भेद नहीं रहेगा। साम्राज्य के लिए सिकंदर की चढ़ाई और इटली की स्वतंत्रता के लिए गैरीबाल्डी द्वारा की गई चढाइयाँ दोनों समान मूल्य की मानी जाएँगी। इन भिन्न घटनाओं का यथोचित परीक्षण करने के लिए जैसे उनका हेतु समझ लेना आवश्यक है उसी तरह हर क्रांति का यथोचित विवेचन करने के लिए उसका हेतु क्या था, अंतर्निहित इच्छा क्या थी, किस तत्त्व दर्शन से उसका उद्भव हुआ था, यह सब जानना आवश्यक है।

सारांश यह कि ऐतिहासिक क्रांति के इतिहासकार को उस क्रांति में असंबद्ध दिखाई देनेवाले प्रसंगों को या उनकी अद्भुतता को देखकर विस्मित होकर वहीं बैठ नहीं जाना चाहिए अपितु उसके उद्गम की खोज करते जाना चाहिए। इतना ही नहीं अपितु उस खोज में असंगत एवं आकस्मिक रूप से निकल आई शाखा को छोड़कर मूल तत्त्व तक की खोज करनी चाहिए और फिर उस मूल तत्त्व की दूरबीन लेकर उस क्रांति के विस्तीर्ण प्रदेश का निरीक्षण करना चाहिए। इस तरह प्रारंभ किए जाने पर अनेक असंबद्ध घटनाओं में पूर्ण संबद्धता दिखने लगती है, वक्र रेखा सरल रेखा प्रतीत होती है और सरल रेखा वक्र लगने लगती है। अंधकार में प्रकाश दिखने लगता है और प्रकाश में अँधेरा दिखाई देता है। नीचता में उच्चता और उच्चता में नीचता दृष्टिगोचर होती है, विद्रूपता में सुरूपता और सुरूपता में विद्रूपता मिलती है और अपेक्षित या अनपेक्षित रीति से परंतु स्पष्ट स्वरूप में वह क्रांति इतिहास के सामने आती है।

परंतु हिंदुस्थान में सन् १८५७ में घटित प्रचंड राज्य क्रांति का इतिहास उपरोक्त शास्त्रीय पद्धति से किसी भी स्वदेशी या विदेशी ग्रंथकार ने नहीं लिखा। कुछ अंग्रेज लेखकों ने उसका वर्णन करने के सिवाय कुछ प्रयास ही नहीं किया। परंतु अधिकतर लेखकों द्वारा यह प्रयास दुष्टतापूर्ण बुद्धि से और पक्षपातपूर्वक किए जाने के कारण उनकी दूषित दृष्टि को उस क्रांतियुद्ध के मूल तत्त्व दिखाई नहीं दिए या दिखाई देते हुए भी उन्होंने उनकी अनदेखी की।

सन १८५७ जैसी प्रचंड क्रांति बिना हेतु के घटित होना संभव है क्या? पेशावर से कलकत्ता तक जो आँधी चली उसका हेतु इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि उसे अपनी सामर्थ्य भर कुछ खास चीजों को नष्ट कर देना है। दिल्ली पर डाले गए घेरे, कानपुर में हुए कत्ल, साम्राज्य के ऊँचे उठे ध्वज और उस ध्वज की छाया में लड़ते-लड़ते रणतीर्थ में शूरों द्वारा लगाई गई छलाँगें जैसी उदात्त एवं स्फूर्तिजनक घटनाएँ किसी एक अति उदात्त एवं स्फूर्तिजनक हेतु के बिना संभव थीं क्या? कोई हर हफ्ते लगनेवाला बाजार भी अकारण नहीं लगता। फिर जिस बाजार का आयोजन करने की तैयारी वर्षों से चल रही थी, जिसकी दुकानें पेशावर से कलकत्ता तक के हर सिंहासन पर सजनेवाली थीं, जिसमें राज्य और साम्राज्य का लेन-देन चल रहा था और जहाँ रक्त और मांस के सिक्कों के सिवाय और किसी सिक्के की पूछ नहीं की-वह बाजार क्या यूँ ही लगा और यूँ ही उठ गया? ऐसा नहीं हो सकता। ज्ञात होना बहुत कठिन है इसलिए नहीं अपितु वह ज्ञात हुआ, यह मानना अपने हित में न होने के कारण इस मुद्दे की ओर अंग्रेज इतिहासकारों ने दुर्लक्ष्य किया है। परंतु इस दुर्लक्ष्य से भी अधिक उलझानेवाली और सन् १८५७ के क्रांतियुद्ध के स्वरूप को सर्वाधिक भ्रष्ट करनेवाली दूसरी युक्ति या चूक विजातीय एवं उनकी झूल ओढ़नेवाले स्वजातीय इतिहासकरों ने जो की है, वह यह है कि इस सन् १८५७ के प्रलय का कारण दूसरा कुछ नहीं, मुट्ठी भर लालची लोगों द्वारा उठाई गई कारतूसों की अफवाह है। अंग्रेज इतिहासकार और अंग्रेजों की कृपा पर पले-बढ़े एक देसी ग्रंथकार कहते हैं-कारतूसों में गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है, केवल इतना सुनकर ही मूर्ख लोग भड़क गए। सुनी हुई बात सच है या झूठ, इसकी खोज किसीने नहीं की। एक ने कहा इसलिए दूसरे ने कहा और दूसरा बिगड़ गया इसलिए तीसरा बिगड़ गया, ऐसी अंधपरंपरा चली जिससे अविवेकी मूर्खों का समाज जमा हुआ और विद्रोह हो गया।

कारतूसों की बात पर लोगों ने अंधपरंपरा से विश्वास किया या क्या हुआ, इसका निर्णय आगे यथास्थान किया जाएगा। परंतु ये सच्चे या झूठे विश्वास विद्रोह की जड़ें थीं, यह विचार उत्पन्न करने का कैसा सुदीर्घ प्रयास चल रहा था यह इससे स्पष्ट होता है। सन् १८५७ जैसी प्रचंड क्रांति ऐसे कारणों से उत्पन्न होगी, यह कहनेवाले मंद या कुटिल बुद्धि के लोगों को क्रांति एक अविवेकी मूर्खों का समाज लगता है; लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यदि सन् १८५७ की क्रांति मुख्यत: कारतूसों के कारण ही प्रदीप्त हुई तो उसमें नाना साहब, दिल्ली का बादशाह, झाँसी की रानी या रोहिलखंड का खान बहादुर कैसे सम्मिलित हए? इनको अंग्रेजी सेना में नौकरी करनी नहीं थी या घर बैठे भी वह फौजी कारतूस तो तोड़ने ही होंगे, ऐसा आदेश भी किसीने उन्हें नहीं दिया था। यदि यह विद्रोह केवल या मुख्य रूप से कारतूसों की चरबी से ही हुआ था तो हिंदुस्थान के अंग्रेज गवर्नर जनरल द्वारा उसे उपयोग में न लाने का आदेश देते ही उसे तुरंत ठंडा हो जाना चाहिए था। पर सिपाही अपने हाथ से अपने कारतूस बना लें, ऐसी अनुमति मिलने पर भी उसका उपयोग न कर या सेना की नौकरी छोड़ सारी किटकिट से परे न हटकर, सेना के सिपाहियों ने ही नहीं बल्कि सेना से जिनका दूर का भी संबंध नहीं था ऐसे लाखों लोगों ने, राजा-महाराजाओं ने, अपने प्राण रणभूमि पर क्यों अर्पित किए? फौजी और सामान्य जन, राजा और रंक, हिंदू और मुसलमान इन सबको एक साथ आवेशित करनेवाली बातें क्षुद्र नहीं होतीं, उसके मूल में होते हैं तात्त्विक कारण।

कारतूसों का डर ही विद्रोह का प्रमुख कारण है-इस कथन में जितनी अयथार्थता है उतनी ही इस तर्क में भी कि उस विद्रोह का उद्गम केवल अयोध्या का राज छीनने में था। अवध के राज्य के हित-अहित से जिनका कुछ भी संबंध नहीं था ऐसे कितने ही लोग इस भयंकर क्रांति में सिर हाथ पर लिये लड़ रहे थे। फिर उस लड़ाई से उनका क्या हेतु था? स्वयं अयोध्या का नवाब तो कलकत्ता के किले में बंद था और उसकी प्रजा अंग्रेज इतिहासकारों के कथनानुसार नवाब के शासन से बेहद नाखुश थी। फिर पंजाब से बंगाल तक केवल राजा या लश्कर के लोग ही नहीं अपितु हर असल हिंदू व्यक्ति अपनी शमशीर ताने क्यों खड़ा था? सन् १८५७ की क्रांति पर लिखा एक लेख किसी हिंदू ने उसी समय इंग्लैंड में प्रकाशित कराया था। उसमें वह हिंदू कहता है-"जिन्होंने अवध के नवाब को जन्म से भी कभी नहीं देखा था और न आगे देखने की संभावना थी, ऐसे कितने ही सरल और दयालु लोग अपनी-अपनी झोंपड़ियों में नवाब पर आ पड़े दुःखों को कहते जार-जार रोते थे, इसकी कल्पना आपको नहीं है। और ऐसे आँसू बह जाने के बाद, जैसे स्वयं पर ही क्रूर प्रहार हो रहे हों, ऐसा मानकर वाजिद अलीशाह के अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा कितने सिपाही प्रतिदिन कर रहे थे, यह भी आपको ज्ञात नहीं[1]..."

१. यह लेख इंडिया ऑफिस के ग्रंथालय में है। यह लेख अनेक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस लेख में से निम्न उद्धरण दिए बगैर रहा नहीं जाता-

"Your (Englishmen's) conduct has all along been mean and pettifogging. You accuse our ancient moghul rulers of despotism. They were despotic to some extent; but on the whole, they knew how to govern an empire-you know how to keep a shop. They had a large mind; you have an ingenious and a crafty one. They could conceive of grand projects. Despite their faults, they were loved by a grand people

इन सिपाहियों को उससे सहानुभूति क्यों होने लगी और जिन्होंने नवाब को जन्म से नहीं देखा था उनकी आँखें और कंठ क्यों भर आए? अतः अयोध्या का राज्य हड़पने से विद्रोह नहीं उपजा अपितु इन राज्यों को हड़पने में जिस तत्त्व का हनन हो रहा था उसके कारण विद्रोह उपजा। कारतूसों का डर या अयोध्या का राज्य हड़पना गौण और आकस्मिक कारण थे। इन्हीं को प्रधान कारण मानने से सन १८५७ की क्रांति का वास्तविक स्वरूप कभी भी ज्ञात नहीं हो पाएगा।

इन निमित्त कारणों को ही मूल कारण मान लें तो उसका अर्थ यह होगा कि यदि ये विशिष्ट कारण घटित न हुए होते तो उनका कार्य भी घटित न हुआ होता। यदि कारतूसों का डर न होता या अयोध्या का अधिग्रहण न किया गया होता तो सन् १८५७ की क्रांति घटित न होती। परंतु इस प्रकार के विचार से अधिक भ्रामक और मूर्खतापूर्ण अन्य कोई मान्यता मिलना असंभव है। कारण, उस डर के मूल में छिपा तत्त्व यदि किसी और घटना द्वारा प्रकट हो जाता तो भी यह क्रांतियुद्ध होता ही, भले ही अयोध्या का राज्य हड़पा न गया होता, क्योंकि उस राज्य को हड़पने के मूल में छिपा तत्त्व किसी दूसरे राज्य को हड़पने में प्रकट हो जाता। फ्रांस देश की राज्य क्रांति का प्रधान कारण जैसे अनाज के बढ़े हुए मूल्य या बास्‍तील या राजा का पेरिस छोड़कर जाना या दावतों का रंग नहीं था वैसे ही उपरोक्त आकस्मिक एवं विशिष्ट घटनाएँ इस प्रचंड क्रांति के प्रधान कारण न होकर केवल निमित्तभूत कारण हैं। जैसे सीता-हरण रामायण का केवल निमित्त है और मुख्य या प्रधान कारण उसके मूल में छिपे तत्त्व ही हैं।

वे तत्त्व कौन से थे? हजारों शूरों की तलवारों को उनकी म्यानों से खींचकर रणांगण में चमचमानेवाले वे तत्त्व कौन से थे? निस्तेज हुए मुकुटों को सतेज करनेवाले और टूटे पड़े ध्वजों को फिर से खड़ा करनेवाले वे तत्त्व कौन से थे जिनपर हजारों व्यक्तियों ने अपने उष्ण रक्त का अभिषेक करना वर्षानुवर्ष अखंड प्रेम से चालू रखा है, ऐसे तत्त्व कौन से थे? मौलवी जिनका उपदेश करते थे, ब्राह्मण जिन्हें विजयी भवः कहकर आशीर्वाद देते थे, दिल्ली की मसजिद से और काशी के मंदिरों से जिनकी यश:प्राप्ति के लिए परमेश्वर की ओर दिव्य प्रार्थनाएँ

(like us. They settled in the country and tried to improve it. Your servants come here only to make money and go home as soon as they have satisfied themselves on that score. Indeed, in as much as we have come to know you, we have learnt to despise you. With increasing knowledge we have known that the Anglo-Saxon race is selfish and hypocritical in the extreme and always unprincipled in matters of gain!money and go home as soon as they have satisfied themselves on that score. Indeed, in as much as we have come to know you, we have learnt to despise you. With increasing knowledge we have known that the Anglo-Saxon race is selfish and hypocritical in the extreme and always unprincipled in matters of gain!"

यह लेख करीब २५ पृष्ठों का है और दि. १३.१०.१८५७ को प्रकाशित हुआ है।)

भेजी जाती थीं, जिनकी सहायता के लिए श्रीमंत हनुमानजी ने स्वयं कानपुर के रण-मैदान पर हुंकार भरी और जिनके लिए झाँसी की महालक्ष्मी ने शुंभ-निशुंभ के रक्त से भीगी अपनी पुराण-प्रसिद्ध तलवार फिर से चलाई, ऐसे वे तत्त्व कौन से थे?

सन् १८५७ की क्रांति के प्रधान कारण, जो दिव्य तत्त्व थे वे थे स्वधर्म व स्वराज्य। अपने प्राणप्रिय धर्म पर भयंकर, विघातक एवं कपटपूर्ण हमला हुआ है, यह यथार्थ दिखते ही स्वधर्म रक्षणार्थ जो 'दीन-दीन' की गर्जना शुरू हुई उस गर्जना में और अपनी प्रकतिदत्त स्वतंत्रता के कपटपूर्वक छीने जाने पर और अपने पैरों में पड़ी राजनीतिक गुलामी की जंजीरें देखते ही स्वराज्य प्राप्त करने की पवित्र इच्छा उत्पन्न होने के कारण इस दास्य श्रृंखला पर जो प्रचंड आघात किए गए उन्हीं में इस क्रांतियुद्ध की जड़ें हैं। स्वधर्म प्रीति एवं स्वराज्य प्रीति के तत्त्व हिंदुस्थान के इतिहास में जितनी स्पष्टता से एवं उदात्तता से दिखते हैं उससे अधिक वे किस इतिहास में मिलनेवाले हैं? विदेशी और स्वार्थी इतिहासकारों ने इस दिव्य हिंद का चित्र चाहे कितने ही गंदे रंगों से भरा हो, फिर भी जब तक हमारे इतिहास के पृष्ठों पर से चित्तौड़ का नाम पोंछा हुआ नहीं है, सिंहगढ़ का नाम मिटा नहीं है, प्रताप आदि का नाम मिटा नहीं है या गुरु गोविंदसिंह का नाम पोंछा नहीं गया है, तब तक ये स्वधर्म और स्वराज्य के तत्त्व हिंदुस्थान के रक्तमांस में जमे रहेंगे। उनपर क्षण भर गुलामी के भ्रम के बादल चाहे आएँ-सूर्य पर भी बादल आते हैं परंतु वह क्षण समाप्त होते-न-होते उस तप्त सूर्य की उष्णता से वे पिघल जाएँगे, इसमें शंका नहीं।

स्वराज्य के लिए हिंदुस्थान ने कौन सा प्रयास नहीं किया और स्वधर्म के लिए हिंदुस्थान ने कौन सी दिव्यता अंगीकार नहीं की।.."सूरा सो पचाजिए जो लढ़े दीन के हेत। पुरजा-पुरजा कट मरे तबहु न छोड़े खेत।" (गुरु गोविंदसिंह) इस रीति से स्वधर्म के लिए रण-मैदान में टुकड़े-टुकड़े हो जाने पर भी जो हटते नहीं वीरों की ऐसी घटनाओं से भारतभूमि का संपूर्ण इतिहास भरा हुआ है।

इस परंपरागत एवं दिव्य तत्त्व का संचार होने के लिए सन् १८५७ के वर्ष में जितने कारण घटित हुए उतने पहले कुछेक बार ही घटित हुए थे। इन विशिष्ट घटनाओं से हिंद भूमि के शरीर में किंचित् प्रस्फुरण हुआ, इन मनोवृत्तियों को विलक्षण चेतना मिली और स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए लोकशक्तियाँ सज्जित होने लगीं। दिल्ली के बादशाह द्वारा स्वराज्य स्थापना के लिए जारी घोषणापत्र में वे कहते हैं-"हिंदवासियो, यदि हमसब मन में ठान लें तो शत्रु को क्षण भर में धूल चटा सकते हैं और अपने प्राणप्रिय धर्म एवं प्राणप्रिय देश को पूरी तरह भयमुक्त कर सकते हैं।" [2]

इस वाक्य में उल्लिखित दिव्य तत्त्वों के लिए जो क्रांति होती है, अपने प्राणप्रिय धर्म को एवं अपने प्राणप्रिय देश को बंधनमुक्त करने के लिए जो क्रांतियुद्ध होता है उस क्रांतियुद्ध से अधिक पवित्र विश्व में दूसरा क्या मिलनेवाला है? स्वदेश रक्षा, स्वराज्य संस्थापन एवं स्वधर्म परित्राण के लिए दिल्ली के सिंहासन से प्रार्थित इस स्पष्ट दिव्य एवं स्फूर्तिजनक मंत्र में ही सन् १८५७ की क्रांति का बीज है। बरेली में मुद्रित कर प्रकाशित किए हुए, अयोध्या के नवाब द्वारा निकाले गए दूसरे एक आज्ञापत्र में वे कहते हैं-"हिंदुस्थान के सारे हिंदुओ और मुसलमानो, उठो। स्वदेश बंधुओ, परमेश्वर की दी हुई सौगात में सबसे श्रेष्ठ सौगात स्वराज्य (Sovereign) ही है। यह ईश्वरीय सौगात जिसने हमसे छल से छीन ली है उस अत्याचारी राक्षस को वह बहुत दिन पचेगी क्या? यह ईश्वरीय इच्छा के विरुद्ध किया गया कृत्य क्या जय प्राप्त करेगा? नहीं, नहीं। अंग्रेजों ने इतने जुल्म ढाए हैं कि उनके पाप के घड़े पहले ही लबालब भरे हुए हैं। और उसमें हमारे पवित्र धर्म का नाश करने की कुबुद्धि और समा गई है। अब आप अभी भी शांति से बैठे रहेंगे क्या? आप शांति से बैठें, यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है। क्योंकि सारे हिंदुओं और मुसलमानों के हृदय में उसी की इच्छा उत्पन्न हुई है-परमेश्वर की इच्छा-और आपके पराक्रम से जल्दी ही उनका ऐसा सर्वनाश हो जाएगा कि अपने हिंदुस्थान में उनका छिलका, टुकड़ा भी नहीं रहेगा। छोटे-बड़े के सारे भेदभाव भुलाकर इस सेना में सब ओर समता का राज हो। क्योंकि पवित्र धर्मयुद्ध में जो वीर स्वधर्म के लिए अपनी तलवार म्यान के बाहर निकालते हैं वे सब समान योग्यता के होते हैं। वे भाई-भाई हैं। उनमें किसी तरह का भेद नहीं है। इसलिए फिर से एक बार मैं सारे हिंदू बंधुओं का आह्वान करता हूँ-उठो और इस परम ईश्वरीय और दिव्य कर्तव्य के लिए रण-मैदान में कूद पड़ो। [3]

ये तत्त्वरत्न देखकर जिसे इस क्रांतियुद्ध की ओजस्विता भासित नहीं होगी उसे या तो मंदबुद्धि या दुर्बुधि होना चाहिए। ईश्वर प्रदत्त अधिकारों के लिए लड़ना मनुष्य मात्र का कर्तव्य है और स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए लड़ने को ही उस समय के भारतीय शूरों ने अपने शस्त्र निकाले थे, यह सिद्ध करने के लिए इससे सबल साक्ष्य और क्या दिया जा सकता है ! भिन्न-भिन्न स्थानों और भिन्न-भिन्न कालों में निकाले गए ये घोषणापत्र इस क्रांतियुद्ध की मीमांसा करने के लिए एक अक्षर भी और अधिक लिखने की आवश्यकता शेष नहीं रहने देते। ये घोषणापत्र ऐरे-गैरे द्वारा निकाले हुए नहीं हैं-सबके आदरणीय एवं सर्वाधिकारी सिंहासन के शासनपत्र हैं। उस समय की क्षुब्ध मनोवृत्ति की उष्ण उसाँसें हैं। संकोच या भय के कारण जब वास्तविक मनोवृत्ति दबाए रखने की कोई आवश्यकता नहीं होती, ऐसे रण-प्रसंग के समय ये हृदय से निकले स्पष्ट बोल हैं। इस युद्ध में जो भी शमशीर निकालते हैं वे सब समान योग्यता के हैं। धर्मयुद्ध में उठी यह वीर गर्जना 'स्वधर्म एवं स्वराज्य' दोनों तत्त्वों का उच्चारण एवं जयघोष करती है।

पर क्या ये दोनों ही तत्त्व (स्वराज्य-स्वधर्म) परस्पर विरुद्ध या भिन्न समझे जाते थे? स्वधर्म एवं स्वराज्य का एक-दूसरे से किसी भी अर्थ में संबंध नहीं है, ऐसी कम-से-कम प्राचीन लोगों की धारणा कभी नहीं थी। मैजिनी के कथनानुसार, स्वर्ग और पृथ्वी को किसी एक बाँस के बीच में बाँधकर अलग नहीं किया गया है, ये दोनों तो एक ही वस्तु के दो छोर हैं। ऐसी ही प्राचीन जनों की पूर्वा पर यथार्थ एवं परिपक्व धारणा है। हमारी स्वधर्म की कल्पना स्वराज्य से भिन्न नहीं है। ये दोनों साध्य नाते से संलग्न हैं। स्वधर्म के बिना स्वराज्य तुच्छ है और स्वराज्य के बिना स्वधर्म बलहीन है। स्वराज्य नामक ऐहिक सामर्थ्य की तलवार स्वधर्म नामक पारलौकिक साध्य के लिए हमेशा बाहर निकली रहनी चाहिए। यह प्राचीन जनों के मन का रुझान इतिहास में पग-पग पर दिखेगा। प्राचीन काल में हुई क्रांतियों को धार्मिक स्वरूप क्यों मिलता है, या यह कहें कि धार्मिक पवित्रता के या धर्म संलग्नता के सिवाय प्रचंड क्रांति का होना-यह बात प्राचीन इतिहास में बिलकुल भी क्यों ज्ञात नहीं है, इसका बीज भी धर्म के इस विश्व व्यापक स्वरूप में ही है। हिंदुस्थान के इतिहास में आज तक अखंड रूप से व्यक्त होते आए स्वराज्य एवं स्वधर्म के साधन और साध्य तत्त्व इस सन् १८५७ के क्रांतियुद्ध में भी व्यक्त हुए, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है। दिल्ली के बादशाह द्वारा पहले-पहल निकाले गए घोषणापत्र का उल्लेख पहले किया गया है। उसके बाद जब दिल्ली को अंग्रेजी सेनाओं ने घेर लिया और युद्ध घमासान हो गया तब बादशाह ने हिंदुओं के लिए दूसरा घोषणापत्र जारी किया। उसमें वे कहते हैं-"जमी राजगान वो रोसाए हिंद पर वाझे होके तुम बेहामा उजू: नेकी और फय्याजी में मुश्तईर उद्दईर हो"खुदावंत ने तुमको ये मर्तबए आली और मुल्क और दौलत और हुकूमत इसी वास्ते बख्शी है कि तुम उन लोगों को, जो तुम्हारे मजहब में दखलंदाजी करें, गारद करो" (हमें ईश्‍वर ने संपत्तिఀ देश, अधिकार किसलिए दिए हैं? ये सभी केवल व्‍यक्ति से संबंधित सुख-भोग के लिए न होकर स्‍वधर्म संरक्षण के पवित्र हेतु के लिए हैं।)

परंतु इस पवित्र एवं अंतिम हेतु के ये साधन कहाँ हैं? पहले दिए हुए घोषणापत्र के अनुसार परमेश्वर की सब सौगातों में अत्यंत श्रेष्ठ स्वराज्य की सौगात कहाँ है? दौलत कहाँ है? मुल्क कहाँ है? हुकूमत कहाँ है? गुलामी के प्लेग में यह सारी दैविक स्वतंत्रता मतप्राय हो गई है। गुलामी का प्लेग किस तरह संहार कर रहा है, यह दिखाने के लिए उपरोक्त घोषणापत्र में नागपुर का, अयोध्या का, झाँसी का स्वराज्य, सब कैसे धूल में मिला दिए गए, इसका मार्मिक वर्णन करने के बाद ऐसी चेतावनी दी गई है कि इस तरह धर्म रक्षण के साधन गँवाने पर तुम परमेश्वर के दरबार में अपराधी और धर्मद्रोही माने जाओगे।

"ईश्वर की आज्ञा है कि स्वराज्य प्राप्त करो। क्योंकि स्वधर्म रक्षण का वह मूल साधन है। जो स्वराज्य को प्राप्त नहीं करता, जो गुलामी में तटस्थ रहता है वह अधर्मी एवं धर्मद्रोही है। इसलिए स्वधर्म के लिए उठो और स्वराज्य प्राप्त करो।

'स्वधर्म के लिए उठो और स्वराज्य प्राप्त करो'-इस तत्त्व ने हिंदुस्थान के इतिहास में कितने दैवी चमत्कार किए हैं ? श्री समर्थ रामदास ने महाराष्ट्र को ढाई सौ वर्ष पहले यही दीक्षा दी थी-"धर्मासाठी मरावें। मरोनि अवघ्यांसि मारावें। मारिता मारिता घ्यावें। राज्य आपुलें।"

धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें;

मारते-मारते जीतें, राज्य अपना।

सन् १८५७ के क्रांतियुद्ध का यही तात्त्विक कारण है। इस क्रांतियुद्ध का यही मनःशास्त्र है। जिस दूरबीन से उस युद्ध का स्पष्ट एवं सत्य स्वरूप दिखेगा, ऐसी खरी दूरबीन अर्थात् "धर्म हेतु मरें, मरते हुए सारों को मारें, मारते-मारते जीतें राज्य अपना।

इस दूरबीन से उस क्रांति की ओर देखें तो कितना अलग दृश्य दिखने लगता है ! स्वधर्म एवं स्वराज्य-इन दो पवित्र कारणों से जो क्रांतियुद्ध लड़ा गया उसकी पवित्रता पराजय से भंग नहीं होती। गुरु गोविंदसिंह के प्रयास तादृश रीति से विफल रहे, इस कारण उसका दिव्यत्व कम नहीं होता। या सन १८४८ में इटली में राज्य क्रांति की जो विशाल लहर उठी उसमें उस क्रांति के नेताओं की संपूर्ण पराजय हुई, इस कारण उनके हेतु का पुण्य क्षीण नहीं होता।

जस्टिन मैकार्थी ने कहा है-"वस्तुस्थिति यह है कि भारतीय प्रायद्वीप के संपूर्ण उत्तरी एवं उत्तरी-पश्चिमी प्रदेशों में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध देशीय जातिया ने विद्रोह कर दिया था। केवल सिपाहियों ने ही विद्रोह नहीं किया, इसे कोरा सैनिक क्रांति का ही नाम नहीं दिया जा सकता। यह तो भारत पर आंग्ल सत्ता के विरुद्ध सैनिक कठिनाइयों, राष्ट्रीय घृणा और धार्मिक कट्टरता का संयुक्त उभार था। इसमें देशी राजाओं और सैनिकों ने भी भाग लिया। मुसलमान और हिंदुओं ने अपने शताब्दियों के धार्मिक विरोध को भुलाकर ईसाइयों के विरुद्ध हाथ मिलाए थे। घृणा और चिंता ने इस महान् विद्रोही आंदोलन को प्रोत्साहित किया था। चरबीवाले कारतूसों के विवाद ने तो केवल चिनगारी दहकाई और उस चिनगारी ने सभी ज्वलनशील पदार्थों में आग भड़का दी। यदि इस चिनगारी से अग्नि प्रज्वलित न होती तो किसी अन्य माध्यम से भी यही कार्य संपन्न हो जाता। "मेरठ के सिपाहियों ने क्षण भर में ही एक नेता पा लिया, उन्हें एक ध्वज भी मिल गया और उद्देश्य भी और यह विदोह एक क्रांतियुद्ध में परिणत हो गया। जब वे प्रात:कालीन सूर्य की रश्मियों से जगमगाती यमुना के तट पर पहुँचे तो उन्होंने अनजाने में ही इतिहास की एक निर्णायक घड़ी को प्राप्त कर लिया तथा सैनिक विद्रोह को एक राष्ट्रीय धर्मयुद्ध में परिणत कर दिया।" [4]

चार्ल्स बाल लिखते हैं-"आगे चलकर धारा किनारों को तोड़कर बह निकली और उसने भारत की सैनिक वसुंधरा को आप्लावित कर दिया। उस समय तो यही आशा की जाती थी कि ये धाराएँ संपूर्ण यूरोपीय तत्त्वों को विनष्ट कर निगल जाएँगी। जिस समय विद्रोह की यह धारा पुनः मर्यादित होगी और अपने आपको सीमाओं में आबद्ध कर लेती तो राष्ट्रभक्त भारत अपने विदेशी शासकों से अपने आपको स्वतंत्र कर लेगा तथा वह देशी राजाओं के स्वतंत्र राज्यदंड के सम्मुख नतमस्तक होगा। अब यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण रूप ग्रहण कर चुका था। यह विद्रोह उस संपूर्ण जनता के विद्रोह का रूप धारण कर चुका था जो काल्पनिक गलतियों से क्षुब्ध होकर भड़क उठी थी और घृणा और कट्टरता के भ्रम में आबद्ध हो चुकी थी।" [5]

'कंप्लीट हिस्ट्री ऑफ दि ग्रेट सेपॉय वार' शीर्षक की अपनी पुस्तक में ह्वाइट लिखते हैं-"यदि मैं अवधवासियों के द्वारा प्रदर्शित साहस की प्रशंसा नहीं करूँगा तो एक इतिहासकार का पावन दायित्त्व न निभा पाऊँगा। नैतिक दृष्टि से अवध के तालुकेदारों की एक महान् भूल यह थी कि उन्होंने हत्यारे विद्रोहियों से हाथ मिलाया। किंतु इसके लिए भी उन्हें सद्उद्देश्य से प्रेरित निष्ठावान देशभक्तों के रूप में मान्यता दी जा सकती है, क्योंकि वे अपनी मातृभूमि और सम्राट के लिए संग्राम कर रहे थे। स्वराज्य और स्वधर्म के लिए संघर्षरत हुए थे।"

प्रकरण-२

कारण परंपरा

स्वधर्म एवं स्वराज्य-इन दो देवताओं का अधिष्ठान रखकर सन् १८५७ में प्रारंभ हुए इस रण-यज्ञ का संकल्प कब लिया गया? अंग्रेज इतिहासकारों के अनुसार इस रण-यज्ञ का संकल्प डलहौजी साहब के कार्यकाल में लिया गया था। उनकी यह धारणा भ्रमपूर्ण है। जिस क्षण हिंदुस्थान के तट पर परतंत्रता ने पहला कदम रखा तभी। बेचारा डलहौजी! उसने अधिक बुरा किया ही क्या? हिंदुस्थान की जन्मजात स्वतंत्रता का हरण कर उसके बदले गुलामी और स्वधर्म के स्थान पर ईसाइयत लादने का पातकी विचार जब पहले-पहल अंग्रेज व्यापारियों के मन में आया, तभी से हिंद भूमि के हृदय में क्रांति चेतना का संचार हुआ है। सन् १८५७ के क्रांतियुद्ध का कारण अंग्रेजों के 'अच्छे शासन' या 'बुरे शासन' में न होकर केवल 'शासन' में है। अच्छा या बुरा का प्रश्न गौण है, मुख्य प्रश्न 'शासन' है। जिस देश को हिमालय ने उत्तर और समुद्र देवता ने 'दक्षिण' की ओर से सुरक्षित किया हुआ है उस निसर्गतः बलिष्ठ एवं निसर्गप्रिय हिंदुस्थान पर अंग्रेजों की सत्ता चलने देना है या नहीं यह मुख्य प्रश्न सन् १८५७ के समर-पट पर हल किया जा रहा था, यह यदि सत्य है तो फिर इस समर की मूल उत्पत्ति तभी ही हुई होगी जब यह प्रश्न पहले-पहल सामने आया होगा।

मैजिनी कहता है-"स्वतंत्रता प्रत्येक का प्रकृतिप्रदत्त अधिकार है और इसलिए इस पवित्र अधिकार का अपहरण करने की इच्छा के अत्याचार को मिटाना भी प्रत्येक का प्रकृतिप्रदत्त कर्तव्य है। व्यक्ति की, राष्ट्र की एवं मनुष्य जाति को प्रगति के लिए उसमें चैतन्य चाहिए। परंतु जहाँ स्वतंत्रता नहीं होती वहाँ चैतन्य रहना संभव नहीं। जो लोगों की स्वतंत्रता छीन लेता है वह लोगों की प्रगति का विरोध कर पर पीड़न का अक्षम्य पाप करता है। इतना ही नहीं अपितु अनजाने सारी मानव जाति का अर्थात् अपनी ही गरदन पर कुल्हाड़ी मारकर आत्महत्या के भयंकर पाप का भी भागीदार हो जाता है। यह पाप करके आज तक किसका उद्धार हुआ है? ये गुलामी की बेड़ियाँ परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपने मानवी बंधुओं के पैरों में जकड़कर आज तक किस पक्ष की विजय हुई है? स्वतंत्रता और गुलामी के झगड़े में अंतिम जय स्वतंत्रता की ही होती है।" [6]

सीले कहता है-"अंग्रेजों का हिंदुस्थान से संबंध प्रकृति से मजाक है। इन दो देशों में किसी तरह का प्राकृतिक बंधन नहीं है। उनका रक्त भिन्न है।" [7] पर यह सब भूलकर जिस वर्ष क्लाइव ने स्वार्थ और अन्याय का साम्राज्य स्थापित करने के लिए प्लासी के मैदान पर रक्त-मांस की नींव रखी उस सन् १६५७ के ही वर्ष इस क्रांतियुद्ध का संकल्प लिया गया।

इस स्व-स्वातंत्र्य-संपादन-संकल्प को अन्य किसी भी बात से अधिक अंग्रेजों की ही जंगी सहायता मिली है। उन्होंने इस क्रांतियुद्ध के बीज कहाँ-कहाँ नहीं बोए? हेस्टिंग्स ने काशी, रोहिलखंड और बंगाल में वे बीज बोए तो वेलेजली ने मैसूर, आसई, पुणे, सतारा एवं उत्तर हिंदुस्थान की उपजाऊ भूमि में उसकी बुआई की। इस बुआई में उन्हें कुछ भी कष्ट नहीं हुए, ऐसा नहीं है। तलवार और तोपों से हिंदुस्थान की भूमि जोतनी पड़ी। क्योंकि अन्य किन्हीं ऐरे-गैरे हलों को श्री वर्धन के परकोटे, शनिवार के बाड़े, सह्याद्री के टीले, आगरा के बुर्ज और दिल्ली के भारी सिंहासन दाद न देते। इस पथरीली भूमि पर हल चलाकर उन्हें इकसार करने के बाद बीच में बचे-खुचे छोटे-बड़े ढेलों को भी फोड़ा गया। वचन भंग, अविश्वास, घात, जुल्म आदि छोटे-बड़े हथौड़ों से छोटे-छोटे रियासतदार समाप्त किए गए। सेना में नेटिव सिपाहियों का अपमान होने लगा। उनपर उन्मत्त फिरंगी अधिकारियों के हाथों कोड़ों की मार पड़ने लगी। उनके पराक्रम से नए प्रदेश मिलने पर मराठे या निजाम की ओर से उन्हें जागीरें मिलती थीं। परंतु कंपनी की ओर से मिलती केवल मीठी-मीठी गप्पें। [8] जिनकी तलवारों ने अंग्रेजों के लिए सारा हिंदुस्थान जीता था, उन सिपाहियों से इतना क्रूर व्यवहार किया जाता कि जनरल ऑर्थर वेलेजली घायल हुए सिपाहियों का उपचार करने के स्थान पर उन्हें तोप से उड़ा देता। इस तरह हिंदुस्थान के कोने-कोने में भयंकर क्रांतियुद्ध के बीज अंग्रेज़ लगातार बोते आ रहे थे और उनके इन प्रयासों को सफलता जल्दी ही प्राप्त होगी, ऐसे चिह्न प्रादुर्भूत होने में अधिक देर नहीं लगी।

डलहौजी

जिस दिन स्पेन ने नीदरलैंड की भूमि पर परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपनी गुलामी लादी, उसी दिन यह निश्‍चित हो गया था कि नीदरलैंड और स्पेन के मध्य हजारों लड़ाइयों से भरा हुआ क्रांतियुद्ध होगा। वह कब, कहाँ और कैसे होगा केवल इन गौण बातों का निर्णय आल्वा नामक स्पेन के गवर्नर ने किया। जिस क्षण ऑस्ट्रिया ने इटली के पैरों में गुलामी की बेड़ियाँ डालीं, उसी दिन अनेक पराजयों परंतु अंतिम जय से घटित होनेवाला प्रचंड क्रांतियुद्ध निश्‍चित हो गया था। केवल शेष रहा तिथि निर्णय, वह मैटरनिख के जुल्मों से हो गया। उसी तरह जिस समय आंग्ल भूमि हिंद भूमि पर दासता लादने के लिए किसी राक्षस की तरह दौड़कर आई उसी दिन अंग्रेजों और हिंदुओं का जो भयंकर, क्रूर और घमासान युद्ध होना है यह तय हो गया, केवल उसका आरंभ कब हो यह डलहौजी ने तय कर दिया। डलहौजी के शासनकाल में हुए अमानुषी अन्याय कुछ सीमा तक नरम भी हुए होते तो भी उसके कारण अंतिम रणसंग्राम टल नहीं सकता था, क्योंकि प्रत्येक देश स्वतंत्र रहे, यही प्राकृतिक दर्शनशास्त्र का अबाधित रहनेवाला अंतिम सिद्धांत है। इस प्रकृति-हेतु के विरुद्ध कोई राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र के पैरों में बलपूर्वक गुलामी की बेड़ियाँ, फिर भले ही वह सोने से मढ़ी क्यों न हों, डाल दे तो काल के घन प्रहार के नीचे उनके टुकड़े होना निश्‍चित है। तथापि जहाँ-जहाँ गुलामी होती है।

वहाँ-वहाँ अत्याचार होना स्वाभाविक है और जहाँ-जहाँ फिरंगी शासन है वहाँ-वहाँ डलहौजी आने ही चाहिए, क्योंकि बिना अत्याचार के जिस तरह गुलामी असंभव है उसी तरह बिना डलहौजी फिरंगी राज्य असंभव बात है।

विदेशियों पर अपना अन्यायमूलक शासन चलाना जहाँ सर्वसम्मत हो, वहाँ अपने शासन में जो सर्वाधिक क्रूर होगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा अर्थात् जो जितना ही अन्यायी है और उसे उस अन्याय का कमाल दिखाने के सिवाय अपना श्रेष्ठत्व बनाए रखने की दूसरी कोई युक्ति नहीं बचती। इस तरह अन्याय और अधमता में जहाँ खुली स्पर्धा शुरू होती है वहाँ डलहौजी ही पैदा होंगे। अनीति मूलक साम्राज्य जहाँ-जहाँ बढ़े वहाँ-वहाँ ऐसे डलहौजियों के जंगल ही शेष रहे।

पर इन सब डलहौजियों को पीछे छोड़ देनेवाला एक आंग्ल डलहौजी सन् १८४८ में हिंदुस्थान आया। डलहौजी को अंग्रेजी इतिहासकार 'साम्राज्य का प्रणेता' कहते हैं-इस बात से अलग डलहौजी के अधम और नीच कर्मों के लिए अन्य किसी साक्ष्य की आवश्यकता ही नहीं है। सौ वर्ष तक चलाई गई अंग्रेजी अनीति का मूर्त परिणाम, स्वभाव से जिद्दी, जो मैं कहूँ वही होगा, इस टेक पर रहनेवाला, साम्राज्य की चटक और उसका घमंड जिसके रक्त-मांस में घुला हुआ था, ऐसा धूर्त न भी हो पर दुस्साहसी राजनीतिज्ञ, हिंदुस्थान की भूमि को सपाट करने के लिए इस भूमि पर उतरा।

डाकुओं के मुख्य नायक की दृष्टि में जिसके घर में संपत्ति भरी हुई है पहले उधर जाना स्वाभाविक है। ऐसा संपत्ति भरा घर दिखते ही वह उस घर पर, चाहे जिस रीति संभव से हो, डाका डालने की योजना बनाने में जुट जाता है। इस जल्दी में न्याय-अन्याय का विचार पूरी तरह अस्वाभाविक, असंभव और घातक होता है। जब न्याय-अन्याय का विचार शुरू हो जाता है तो उसी समय डाकूगिरी समाप्त हो जाती है। ऐसी ही वस्तुस्थिति होने से अंग्रेजों के हिंदुस्थान पर डाले गए भयंकर डाकों [9] में अंग्रेजों के शासन में उस शासन को स्थिरता देनेवाले और उस डकैती को बढ़ानेवाले उनके कृत्य न्यायसंगत थे या अन्यायी, यह निश्‍चित करने के लिए घिस-घिस करना इतिहास की व्यर्थ खींचतान करना है। संधिपत्र, वचन, दोस्ती आदि शब्दों का डाकेजनी के शास्त्र में स्थान नहीं होता, इतना ध्यान में रखा जाए तो फिर इतिहास बहुत सी असंगतियों से बच जाएगा। फिर वॉरेन हेस्टिंग्स ने नंदकुमार को न्याय से मारा या अन्याय से और उस वॉरेन हेस्टिंग्स को अंग्रेजों ने निरपराध मानकर क्यों छोड़ दिया, यह तय करने के लिए कागजों के ढेर खराब करने की आवश्यकता नहीं होगी। अज्ञानी लोग अपने भोले स्वभाव के अनुसार संधिपत्रों की सूचियाँ लेकर, उनकी तिथियाँ देकर, धर्मशास्त्र के वचन देकर, तर्कों के ताने-बाने रच या पिछली परंपराओं के आधार देकर, अपने घर पर आक्रमण करने के लिए आए डाकुओं में परावृत्ति या सहानुभूति उत्पन्न करने का भ्रमपूर्ण प्रयास भले ही करें, परंतु धूर्त लोग इन निष्फल, बाँझ प्रयासों पर हँसे बिना नहीं रहेंगे। डाकुओं पर लागू ये सारी बातें डलहौजी की डकैतियों पर तो विशेष रूप से लागू होती हैं, अतः उसके शासनकाल में घटित कृत्यों में न्याय-अन्याय निश्‍चित करने का प्रयास करना मूर्खता है। हिंदुस्थान की भूमि समतल करके उसपर तांडव करने डलहौजी आया था, इतना ध्यान में रखा जाए तो काफी होगा। जिसका अंतिम उद्देश्य प्राकृतिक रूप से सुंदर हिंद भूमि को अपनी दासी बनाना था, ऐसे दुर्योधन के लिए न्याय कैसा और अन्याय कैसा? इस पाप वासना को तृप्त करने के लिए जो भी साधन मिलें वे सारे वह उपयोग में लाता ही।

इन साधनों में से पहला साधन था पंजाब से हुई लड़ाई। डलहौजी के पैरों का स्पर्श हिंदुस्थान के किनारे से होते ही उसे तुरंत यह ध्यान में आया कि पंजाब में जब तक रणजीतसिंह है तब तक अपनी पाप वासना पूरी करना इंग्लैंड के लिए बहुत भारी होगा। यह देखकर उसका दृढ़ निश्चय बना कि उस पंजाबी सिंह को किसी तरह गुलामी के जाल में फँसाना ही चाहिए। यद्यपि चिलियनवाला के द्वार से बाहर आकर उस पंजाबी सिंह ने एक भयंकर आघात अपने शत्रु की छाती पर किया, लेकिन गुजरात के पिछले द्वार से शत्रु अंदर घुसा और सिंह-गुफा जल्दी ही सिंह का पिंजड़ा बन गई। रणजीतसिंह की पटरानी चंदकुँवर लंदन में घुटकर मरी और रणजीतसिंह का पुत्र दिलीप सिंह दूसरे के दरवाजे टुकड़े जोड़ता पड़ा रहा। [10]

अब हिमालय से कन्याकुमारी तक तो सारा हिंदुस्थान लाल हो गया, परंतु अभी भी सिंधु नदी से इरावती (नदी) तक जैसा चाहिए था वैसा लाल नहीं हुआ था। फिर देर क्यों? ब्रह्मदेश में एक शांति मिशन भेजा कि फतह हुई। केवल वह शांतिमिशन शांति का इतने प्रेम से आलिंगन करे कि उसकी पसलियाँ चूर-चूर हो जाएँ। यह अति प्यारा कार्य भी अंत में संपन्न हो गया और ब्रह्मदेश लाल रंग में रंग गया। अब सिंधु नदी से इरावती तक और हिमालय से रामेश्वरम तक सारा हिंदुस्थान सचमुच लाल हो गया! पर जल्दी ही रक्तरंजित नहीं होगा, यह कैसे कहें?

पंजाब और ब्रह्मदेश अंग्रेजों ने जीते अर्थात् क्या किया, उसकी कल्पना केवल नामों से नहीं हो सकती। अकेले पंजाब का अर्थ था पचास हजार वर्ग मील का प्रदेश और चालीस लाख जनसंख्या। जिन पाँच नदियों के तट पर ऋषियों ने वेदमंत्र गाए, उनके द्वारा सिंचित यह प्रदेश-पंजाब। यही प्रदेश लेने अलेक्जेंडर आया और इसी प्रदेश को बचाने के लिए पोरस लड़ा। इसी प्रदेश को लेकर रावण की भी महत्त्वाकांक्षा पूरी हो गई होती। परंतु डलहौजी को पंजाब और ब्रह्मदेश जैसे विस्तृत प्रदेश लेकर भी कोई संतोष न हुआ। हिंदुस्थान की सरहद तो अवश्य बढ़ी, परंतु अब भी अंदर पूर्व बादशाहों के कुछ मजार शेष थे, अत: उन्हें भी उखाड़कर सर्वत्र सपाट मैदान करने की उसने प्रतिज्ञा की। पुरानी बादशाही के ये मजार स्थान घेरे हुए थे; केवल इतना ही नहीं, इन पुराने मजारों में गड़े प्रेतों से ही भावी बादशाही के पुनर्जीवित होने की संभावना थी और यह संभावना डलहौजी को पूरी तरह समझ में आ गई थी। सतारा के मजार में हिंदू पदपादशाही गड़ी हुई थी और यीशु मसीह के पुनर्जीवन की तरह उन गाड़े हुए प्रेतो में से कदाचित् किसी भावी बादशाही का पुनर्जीवन होगा, यह डर यीशु के चरित्र पर विश्वास रखनेवाले डलहौजी को लगा हो तो कोई आश्चर्य नहीं। सन् १८४८ के अप्रैल माह में सतारा के अंतिम महाराज अप्पा साहब दिवंगत हुए। यह समाचार मिलते ही डलहौजी ने वह रियासत हथियाने का निश्चय किया। कारण यह कि राजा की जायज संतति नहीं थी। जायज संतति न होने से गँवार मजदूर की झोंपड़ी भी लावारिस नहीं हो जाती। वह उसके द्वारा नियुक्त दत्तक को या उसके निकट संबंधी को दे दी जाती है। पर सतारा? वह तो किसी गँवार की झोंपड़ी न होकर अंग्रेजों के बराबरी की 'दोस्त सरकार' थी। [11] सन् १८३९ में प्रताप सिंह छत्रपति पर अंग्रेजी राज्य उलटने के षड्यंत्र का आरोप लगाकर उन्हें गद्दी से हटाने के बाद उनके स्थान पर छत्रपति अप्पा साहब की नियुक्ति अंग्रेज सरकार ने ही की थी। इस पदच्युति के संबंध में मि. आर्नोल्ड अपने ग्रंथ 'Dalhousie's Administration' में कहते हैं-"It is not pleasant to dwell upon the circumstances of the dethronement--so discreditable they were." परंतु इस बेहूदी पदच्युति के बाद जिसे अंग्रेजों ने सतारा की गद्दी पर बैठाया वह प्रताप सिंह का जायज पुत्र न होकर भाई था। अर्थात् जायज पुत्र के अभाव में हिंदू शास्त्र के अनुसार अन्य संबंधियों का सिंहासन पर अधिकार बनता है, इस समय तक अंग्रेजों ने यह स्पष्ट स्वीकार किया है। यह स्वीकृति अपनी नियमित विश्वासघाती रीति के अनुसार डलहौजी साहब ने अस्वीकार कर दी। यही सत्य है। विभिन्न राजाओं से किए गए समझौतों में हमने दत्तक संतति पहले ही अमान्य की हुई है, ऐसा वे कभी भी नहीं कह सकते थे। सन् १८२५ में कोटा के राजा का दत्तक स्वीकार करते समय अंग्रेजी सरकार ने ऐसा स्पष्ट कहा था-

"कोटा के राजकुमार के इस अधिकार को मान्यता दी ही जानी चाहिए कि उन्हें शास्त्रों के नियमानुसार दत्तक पुत्र ग्रहण करने और उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने का अधिकार है।" [12]

पुनः सन् १८३७ में जब ओरछा के राजा ने दत्तक लिया तब अंग्रेजों ने उसे स्वीकार करते हुए वचन दिया था

"हिंदू नरेशों को यह अधिकार है कि वे स्ववंश की शाखा में उत्पन्न उत्तराधिकारी से अलग भी किसीको गोद ले लें। ब्रिटिश सरकार को ऐसे दत्तक को मान्यता देनी होगी; किंतु गोद लेने की यह प्रक्रिया हिंदू शास्त्र के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए।" [13]

इतनी स्पष्ट भाषा में और इतने साफ-साफ दिए गए वचन कागजों में लिखे होते हुए भी यह कहने की हिम्मत अंग्रेज प्रवक्ता और अंग्रेजी नीति के सिवाय और कोई नहीं कर सकता कि वे हमने दिए ही नहीं थे। उपरोक्त दोनों उद्धरण देने का आशय बस इतना ही है। केवल यही दो उद्धरण हों ऐसा नहीं, हिंदू शास्त्र के अनुसार दत्तक लेने का रजवाड़ों का अधिकार अंग्रेजों ने अनंत बार और अनंत करने का मूल कारण उपरोक्त समझौतों एवं वचनों की भाषा में खोजने का अर्थ पूर्व शब्दों में मान्य किया हुआ था। केवल सन् १८२६ से सन् १८४७ तक अंग्रेज सरकार ने एकदम स्पष्ट शब्दों में लगभग पंद्रह राज्यों की गद्दियों पर दत्तक राजाओं की योजना एवं अधिकार मान्य किए हैं-इतना कहना पर्याप्त है। क्योंकि इन रियासतों को अधिग्रहण दिशा की खोज में उत्तर दिशा को जाना है। 'हिंदुस्थान की भूमि सपाट' करने के लिए डलहौजी आया था और सातारा के हिंदू पदपादशाही की कब्र अपना सिर ऊँचा करना चाहती थी। अर्थात् प्रताप सिंह एवं अप्पा साहब इन दोनों ही भाइयों ने शास्त्रोक्त पद्धति से दत्तक लिये थे फिर भी अंग्रेजों ने उन्हें सातारा राज्य का वारिस न मानते हुए उसका अधिग्रहण कर लिया। सातारा का राज्य, सातारा की गद्दी! सन् १६७४ में गागाभट्ट के हाथों अभिषिक्त और शिवाजी जिसपर विराजे थे, वह वही गद्दी थी। जिस गद्दी को पहला बाजीराव अपनी विजय अर्पण कर मुजरा करता था यह वही सिंहासन था। महाराष्ट्र ! देख, शिवाजी जिसपर बैठता था और संताजी, धनाजी, निराजी, बाजी-जिनके आगे जी' कहकर लोग नम्रता से झुकते थे तेरा वही सिंहासन डलहौजी ने टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया। अब तू चाहे अर्जियाँ लिख या डेपुटेशन भेजता रह । डलहौजी नहीं सुनता तो फिर नहीं ही सुनता। इंग्लैंड में उसके वरिष्ठ अधिकारी तो जीवित हैं न? डलहौजी एक सामान्य आदमी है, पर उसके वे वरिष्ठ अधिकारी देवता भी हो सकते हैं? हमने उन्हें देखा ही कहाँ है? यह रंगो बापूजी बहुत बढ़िया और स्वामीभक्त व्यक्ति है-सातारा की शिकायत लेकर उसका इंग्लैंड जाना उचित है। कृपा की तो देव नहीं तो पत्थर ! पर वे कृपा करते हैं या नहीं, इसकी बाट जोहता तू कितनी देर बैठेगा? कृपा अब होगी तब होगी, इस आशा में रंगो बापूजी लंदन के लीडन हॉल स्ट्रीट की सीढ़ियाँ कितनी बार चढ़े-उतरेंगे। अपमान होने तक-मजाक बनाए जाने तक-करोड़ों रुपए अंग्रेज बैरिस्टरों की जेब में पहुँचाने पर लौटने के लिए दमड़ी भी न बचने तक-और अंत में हम सातारा नहीं देंगे, ऐसा गर्वीला उत्तर मिलने तक, रंगो बापूजी लंदन का मृगजल पीते रहें।

जब रंगो बापूजी लंदन जाने की तैयारी में लगे थे तब डलहौजी का ध्यान दूसरा षड्यंत्र रचने में लगा था। मराठा सत्ता का एक पौधा, नागपुर की गद्दी के स्वामी रघोजी भोंसले अपनी आयु के सैंतालीसवें वर्ष में ही अचानक स्वर्ग सिधार गए। इस राज्य से अंग्रेजों के संबंध स्नेहपूर्ण थे। और अंग्रेजों का स्नेह ही सबके नाश का कारण बना। जिन्हें यह ज्ञात रहा कि अंग्रेज हमसे द्वेष करते हैं वे बच गए। परंतु जिन्होंने भी यह माना कि अंग्रेजों से हमारा स्नेह है, उनकी गरदन मीठी छुरी से कटी। विदर्भ का राज्य अंग्रेजों की जागीर नहीं थी या वह उनकी मातहत रियासत भी नहीं थी; वह एक स्वतंत्र और बराबरी की सरकार थी। ऐसे राज्य का राजा निस्संतान मर गया तो उस राज्य को अधिग्रहण करने का अधिकार किस पूर्व पश्चिम के न्याय से मिलता है, यह सिद्ध करके दिखाने के लिए जे. सिल्वियन ने अंग्रेज सरकार का आह्वान किया था। सारी मिलीभगत। एक खाए दूसरा हजम करे। एक गला काटे दूसरा पूछे कि किस प्रकार से गला काटा? मानो गला काटनेवालों को कानून का बहुत डर रहता है। सन् १८५३ में डलहौजी ने अपने मित्र की गरदन उतार दी। कारण दिखाया-राजा ने दत्तक लिया ही नहीं था। राजे रघोजी संतान प्राप्ति की संभावना की आयु में एकाएक दिवंगत हो गए। उसमें यदि वे दत्तक न लेते हुए दिवंगत हुए थे तो भी वह अधिकार उनकी पत्नी को प्राप्त था। राजा की मृत्यु के बाद राजपत्नी द्वारा लिये गए दत्तक अंग्रेजों ने पहले स्वीकार न किए होते तो बात दूसरी थी। परंतु सन् १८२६ में दौलतराव सिंधिया की पत्नी का दत्तक, सन् १८३६ में जनकोजी सिंधिया की पत्नी का दत्तक, सन् १८३४ में धार की राजपत्नी द्वारा लिया दत्तक, सन् १८४१ में किशनगढ़ की रानी का लिया हुआ दत्तक-एक-दो नहीं अनेक दत्तक अंग्रेजों ने स्वीकार किए थे। परंतु उस समय उन्हें स्वीकारने में लाभ था और आज रघोजी के पीछे उनकी पत्नी द्वारा लिये गए दत्तक को नकारने में लाभ था। क्या लाभकारी था, यह मुख्य प्रश्न था और उसीके अनुसार सारी बातें तय होती थीं। दत्तक नहीं लिया इसलिए नागपुर का राज्य अधिग्रहीत किया तो लिया हुआ दत्तक वारिस नहीं होता, इसलिए सातारा का राज्य अधिग्रहीत किया। अपने प्राण बचाने की वास्तविक इच्छा हो तो तर्कशास्त्र के चक्कर में न पड़ें, यही उचित है!

नागपुर का राज्य अधिग्रहण कर डलहौजी ने ७६,४३२ वर्ग मील का विस्तीर्ण प्रदेश, ४६,५०,००० जनसंख्या और पाँच लाख वार्षिक आमदनी का राज्य हड़प लिया। राजवंश की गरीब रानियाँ दुःख से रो रही थीं। ठीक उसी समय राजमहल के दरवाजे को खटखटाया गया। कौन है, यह देखने के लिए द्वार खोला तो अंग्रेजों के सिपाही महल में घुसने लगे। तबेले से घोड़े छोड़े गए, हाथी पर बैठी रानियों को नीचे उतारकर उन हाथियों को बाजार में बिकने भेजा गया-वैसे ही राजमहल की सोने-चाँदी की वस्तुएँ छीन-छीनकर नागपुर के बाजारों में बिकने के लिए रखी गईं। राजपत्नी के कंठ में शोभित हार बाजार में धूल खाता पड़ा रहा। हाथी जहाँ सौ रुपए में बिका, उसी नीलामी में घोड़े की कीमत-जिस घोड़े को डलहौजी के घोड़े से अधिक मूल्यवान खुराक मिलती थी उस घोड़े की कीमत-बीस रुपए और दूसरा जोड़ा पाँच रुपए में बिका तो क्या आश्चर्य! हाथी के और हाथी के हौदे, घोड़े और बैलों की पीठ की झूलें बेची गईं। परंतु अभी रानियाँ और रानियों के अलंकार रह गए हैं। फिर उन्हें भी क्यों न बेचा जाए? शरीर के सारे अलंकार छिन जाने से रानियाँ निष्कांचन हो गईं। फिर भी अंग्रेजों का स्नेह कम नहीं हुआ था। फिर राजभवन खोदा जाने लगा। स्वयं रानी के शयनकक्ष में फिरंगियों की कुदाल चली। पाठक! ठहरें, इतनी जल्दी शरीर में सिहरन मत आने दें। क्योंकि यह खुदाई अभी तो आगे भी चलेगी। देखिए, वह रानी के शयनकक्ष के पलंग को तोड़-फोड़कर उसके नीचे की भूमि खोदने लगा। [14]

और यह कब? जब बराबर के कक्ष में महारानी अन्नपूर्णाबाई जीवन के अंतिम क्षण गिन रही थीं। नागपुर के भोंसले घराने की राजपत्नी की अंतिम साँस अपमान की वायु से चल रही है और बराबर के अंत:पुर में रानी के शयन के पवित्र पलंग पर बैठकर अंग्रेज उस अंतिम साँस के ताल पर कुदाली चला रहे हैं। और अपराध कौन सा? वह यह कि राजा रघोजी दत्तक लेने से पहले स्वर्गवासी हो गए।

अन्नपूर्णाबाई अंततः उस असह्य अपमान से मर गईं। परंतु रानी बांकाबाई की विलायत से न्याय पाने की आशा अभी नहीं मरी थी। पर जल्दी ही अंग्रेजी डॉक्टरों को लाखों रुपए चराने के बाद उन्होंने जो रामबाण औषधियाँ दी उनसे वह आशा भी निजधाम चली गई। फिर रानी बांकाबाई क्या कर रही थी? वह अपनी शेष आयु 'राजनिष्ठा' में बिता रही थी। जब सन् १८५७ में झाँसी में बिजली कड़क रही थी तब इधर 'बांका' नागपुर में अपने पुत्रों के मन में स्वराज्य के लिए तलवार उठाने की इच्छा जाग्रत होने की संभावना को देख "मैं स्वयं तुम्हारे नाम सरकार को बताऊँगी और तुम्हारे सिर कलम करने की सलाह दूंगी"ऐसी धौंस दे रही थी। कुल कलंकिनी बांका, जा पड़ नरक में-यदि वहाँ भी देशद्रोहियों को प्रवेश हो तो।

प्रकरण-३

नाना साहब और लक्ष्मीबाई

महाराष्ट्र की पुण्य भूमि में माथेरान के गिरि शिखर के गौरव और उस गिरि शिखर की तलहटी में हरी चादर से शोभित भूमि के गौरव में से किसका वर्णन अधिक किया जाए, इसका निर्णय करना असंभव है। इस शानदार माथेरान की देखरेख में और इस सुंदर भूमि की गोद में वेणु नामक एक छोटा सा गाँव अपनी सहज सुंदरता से पहले से ही सुंदर उस प्रदेश को और अधिक सुंदर बना रहा था। वेणुग्राम में जो कुलीन एवं सदाचारसंपन्न परिवार थे उनमें माधवराव नारायण का परिवार मुख्य रूप से गिना जा सकता था। माधवराव नारायण और उनकी सुशील भार्या गंगाबाई का जोड़ा गृह दरिद्रता से पीड़ित होकर भी परस्पर प्रेम के सुख में स्वयं को भाग्यवान समझता था। उस पवित्र परिवार के उस छोटे से घर में सन् १८२४ में सबके मन और बदन उस समय उल्लास से खिल उठे जब साध्वी गंगाबाई ने पुत्र को जन्म दिया। वह सत्पुत्र और कोई नहीं, श्रीमंत नाना साहब पेशवा ही थे जिनके नाम से अत्याचारी राजाओं की देह काँपने लगती थी और जिन्होंने स्वराज्य और स्वतंत्रता के लिए मर मिटनेवालों में अपना नाम अजर-अमर किया। जिस दिन यह भाग्यशाली बालक जनमा वह दिन कौन सा था, इसकी भी इतिहास को जानकारी नहीं। जिस दिन की जयंती मनानी चाहिए उस दिन की स्मृति इतिहास में न हो, यह बात कितनी उद्वेगकारी है। ऐसे दिन राष्ट्र के इतिहास में बहुत अधिक नहीं होते। हिंदुस्थान में गुलामी के गोबर में सड़ते हुए गोबर के कीड़ों को जन्म देनेवाले दिन लाखों उदय या अस्त होते हैं। परंतु अपनी ईश्वरदत्त स्वतंत्रता और स्वराज्य का अपहरण करनेवाले का रक्त-प्राशन करने के लिए तृषित, मानधन नाना साहब को जन्म देनेवाले दिन शताब्दियों में एक-दो ही होंगे। ऐसे अलभ्य दिन की यह अवमानना देखकर परमेश्वर ऐसे अपात्र को फिर से दान नहीं करेगा, इसकी लज्जा महाराष्ट्र, तुझको होनी चाहिए। जिसने तेरे लिए और तेरे सम्मान के लिए रणांगण में अपना रक्त उँडेला-उसकी जन्मतिथि तुम्हें ज्ञात न हो-और हायहाय! उसकी मृत्युतिथि भी तुझे ज्ञात न हो! तेरे स्वाभिमानी पुत्र कब जनमे यह तुझे ज्ञात न हो और तेरे ही विश्वासघात के कारण कब मरे? यह भी तुम्हें ज्ञात न हो! इस अक्षम्य कृतघ्नता के लिए तुम्हारे लिए गुलामी की बेड़ियों का दंड ही उचित है ! और वही तुम भोग भी रहे हो!

यह गुलामी की बेड़ी आठ लाख रुपयों में पहली बार खरीदनेवाले कुलकलंकी अंतिम रावबाजी पुणे की राजगद्दी से उतरकर भागीरथी के तीर पर इसी समय आए थे। उनके साथ ही महाराष्ट्र से बहुत से परिवार भी आए थे और यह सुनकर कि उन सब परिवारों का योगक्षेम अपनी पेंशन से उत्तम रीति से करने की उदारता उनमें है, अन्य अनेक परिवार भी उनके आश्रय में आकर रहने लगे। माधवराव नारायण भी इन्हीं लोगों के साथ सन् १८२७ में बह्मावर्त में रावबाजी के आश्रय में रहने सपरिवार चले गए। वहाँ रावबाजी की माधवराव के पुत्र से बहुत ही ममता हो गई। सारे दरबार में नाना साहब छोटे-बड़े सबके आनंद-विधान हो गए। उनके बाल-तेज को देखकर रावबाजी इतने चकित हो गए कि माधवराव उनके सगोत्री हैं यह ज्ञात होते ही उन्होंने नाना साहब को ७ जून, १८२७ को दत्तक के रूप में ग्रहण कर लिया। उस समय नाना साहब की आयु केवल ढाई वर्ष की थी। इस तरह वेणुग्राम में जनमा यह बालक अपने पूर्वसंचित पुण्य अंश के कारण महाराष्ट्र राज्य के अधिपति की गद्दी का वारिस हो गया। पेशवा की गद्दी का वारिस होना महाभाग्य की बात है। परंतु ऐ तेजस्वी राजकुमार! उस भाग्य के साथ ही आनेवाला उत्तरदायित्त्व भी तुम्हें स्मरण है कि नहीं? पेशवाओं की गद्दी प्राप्त करना कोई सामान्य बात नहीं। इसपर बाजीराव बैठे हैं। इसने पानीपत की लड़ाइयाँ लड़ी हैं। इसने बड़गाँव की संधि की और सबसे विशेष महत्त्व की बात यह कि अब शीघ्र ही अपवित्र स्पर्श से इसके भ्रष्ट होने का अवसर आनेवाला है या आ ही गया है, यह सब तुझे मालूम है या नहीं? गद्दी का वारिस होने का अर्थ होता है उसके संरक्षण और सम्मान की रक्षा करना। फिर पेशवाओं की इस गद्दी के सम्मान की रक्षा करेगा या नहीं या तो विजय का मुकुट इस गद्दी के सिर पर रखना पड़ेगा अन्यथा चितूर की मानिनी की तरह दीप्त चिता में जलना होगा। इसके सिवाय पेशवा की गद्दी का सम्मान तीसरे किसी उपाय से नहीं होगा। हे तेजस्वी राजकुमार! यह दायित्व ध्यान में रखकर तु महाराष्ट्र की गद्दी पर सुख से बैठ। पेशवा की गद्दी शरणागत हुई, यह सुनने का अवसर तेरे बाप के कारण आने से सब ओर लज्जा की कालिमा छा गई थी और सबकी यह इच्छा थी कि पेशवा की गद्दी का अंत होना ही है तो वह उसके प्रारंभ जैसा उज्ज्वल हो। मरना हो तो मारते-मारते मरे। बालाजी विश्वनाथ जिस गद्दी का पहला पेशवा था उस गद्दी का अंतिम पेशवा श्रीमंत नाना साहब था, यह अभिमानपूर्वक इतिहास को कहा जा सके, इसलिए हे राजतेजयुक्त बालक, तू महाराष्ट्र की पेशवाई गद्दी पर चिरकाल विराजमान हो।

इसी समय श्रीक्षेत्र काशी में मोरोपंत तांबे और उनकी सुशील पत्नी भागीरथी चिमणाजी अप्पा साहब पेशवा के आश्रय में रहते थे। इस दंपती को अपना नाम इतिहास में अजर-अमर होनेवाला था, लेकिन हिंदुस्थान के हाथ में दामिनी-सी दमकनेवाली खड्ग जैसी कन्या को जन्म देने का सौभाग्य उसे प्राप्त है, उस समय उस दंपती को यह शायद ही ज्ञात होगा। १९ नवंबर, १८३५ में उपरोक्त दंपती की गोद में महारानी लक्ष्मीबाई साहब ने जन्म पाया। उस शौर्यशालिनी का बचपन का नाम मनुबाई था। इस सुलक्षणी कन्या का जन्म हुए तीन-चार वर्ष बीतते-न-बीतते सारा परिवार काशी छोड़ बाजीराव के उदार आश्रय में ब्रह्मावर्त आ गया और वहाँ लक्ष्मीबाई और नाना साहब के मेल से रत्न और कांचन का जो संयोग बना उसे देखकर किसे आनंद न हुआ होगा? आगे चलकर अपने स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए तलवारें कैसे चलानी हैं, इसका प्रशिक्षण लेते हुए शस्त्रशाला में राजपुत्र नाना साहब एवं मनोहारिणी छबीली लक्ष्मीबाई को साथ-साथ खेलते देखकर किन नेत्रों को हर्ष नहीं हुआ होगा? मनुष्य की शक्ति कितनी मर्यादित है ! जिस समय राजपुत्र नाना और छबीली लक्ष्मी तलवार का खेल एक साथ सीखते थे, उस समय लोगों को उन अद्वितीय बच्चों का भावी दिव्यत्व नहीं दिखा और अब जब वह दिव्यत्व उन्हें दिखता है, तब उनकी वह भूतकालीन बाल लीलाएँ नहीं दिखतीं। लेकिन मनुष्य के चर्मचक्षु की वह अदूरदृष्टि दूर करने को यदि कल्पना का चश्मा मिले तो भूतकाल की वह बाललीला हम सहज ही देख सकेंगे। श्रीमंत नाना साहब और उनके बंधु राव साहब जब अपने शिक्षक के पास विद्याभ्यास कर रहे थे तब यह तेजस्विनी छबीली भी अटक-अटककर पढ़ना सीख रही थी। [15] हाथी के हौदे में नाना साहब बैठे हैं और यह चपल कुँवरी कुमारी मुझे ऊपर लो न, लाड़ में ऐसा हठ कर रही है। एक घोड़े पर नाना बैठे हैं और दूसरे पर बैठकर यह मूर्त लक्ष्मी कब आती है, इसकी प्रतीक्षा में लगाम खींचे खड़े हैं-तभी कमर में तलवार लटकी हुई, वायु के कोमल झोंके से जिसके घुघराले केश किंचित् मात्र हिल रहे हैं और जिसकी गौर तनु उन्मत्त घोड़े को नियंत्रण में रखने के श्रम से गुलाबी हो गई है-ऐसी छबीली अपने घोड़े पर साथ आते ही दोनों ही दौड़ते निकल जाते हैं। नाना की आयु लगभग अठारह और छबीली की सात वर्ष के आसपास थी। सातवें वर्ष से भावी धर्मयुद्ध के इन दो प्रमुख योद्धाओं की कवायद प्रारंभ हुई, यह कितनी मनोरम बात है ! इन दो मानवी रत्नों का तब से एक दूसरे पर बहुत प्रेम था। इन दो भाईबहनों की यम द्वितीया के दिन भाईदूज होती थी। सुंदर, सतेज, मनोहारी छबीली हाथ में सोने का दीप लेकर उस तरुण राजकुमार की आरती उतारती थी।

सन् १८४२ में छबीली का झाँसी के महाराज गंगाधर राव बाबा साहब से विवाह हुआ और वह झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई बनी। महारानी लक्ष्मीबाई झाँसी में अपने पति सहित लोकप्रिय हो ही रही थी कि सन् १८५१ में बाजीराव साहब का देहांत हो गया। बाजीराव साहब की मृत्यु के लिए एक बूँद आँसू भी नहीं बहाना है, क्योंकि सन् १८१८ में स्वयं का राज्य बेचकर इस कुल कलंकी ने दूसरे राज्य को डुबोने में अंग्रेजों की सहायता की थी। अपनी आठ लाख की पेंशन में से बहुत सारा धन बचाया था। अफगानिस्तान की लड़ाई में जब अंग्रेजों को धन की भारी टूट पड़ी तब बाजीराव ने अपनी बचत में से पाँच लाख रुपया अंग्रेजों को भेजा। फिर आगे जब पंजाब में सिख राष्ट्र से अंग्रेजों की लड़ाई शुरू हुई तब ब्रह्मावर्त का मराठामंडल सिखों से मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध उठेगा, ऐसा दिखने लगा, परंतु तभी इस बाजी ने उसे बेरंग कर दिया। उसने, शिवाजी के इस पेशवा ने अपनी गाँठ का व्यय करके एक हजार पैदल और एक हजार घुड़सवार अंग्रेजों की सहायता के लिए भेज दिए। इस बाजीराव के पास स्वयं का शनिवार वाड़ा बचाने के लिए सेना नहीं थी पर सिखों का बाड़ा अंग्रेजों को सौंपने के लिए भरपूर सेना थी। हाय रे राष्ट्र! मराठे सिखों का राज लेंगे और सिख मराठों का राज्य लेंगे। किस कारण से? इसलिए कि दोनों की छाती पर अंग्रेज नाच सकें। ऐसा बाजीराव मरा, इसके लिए मृत्यु का आभार ही माना जाए। बाजीराव ने मृत्यु-पूर्व ही मृत्युपत्र लिखकर श्रीमंत नाना साहब को पेशवाई के सारे अधिकार और अपने वारिसदारी के सारे हक सौंप दिए थे। परंतु बाजीराव के मरने का समाचार मिलते ही अंग्रेज सरकार ने घोषित किया कि नाना साहब को आठ लाख रुपयों की पेंशन पर किसी भी तरह का अधिकार नहीं है। अंग्रेज सरकार का यह निर्णय सुनकर नाना को कैसा लगा होगा? उनके हृदय में चल रही बेचैनी का कुछ प्रतिबिंब उनके द्वारा स्वयं लिखवाए गए पत्र में प्रतिबिंबित हुआ है। वे पूछते हैं-"हमारे विख्यात राजवंश से आपका यह कृपण व्यवहार पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है। हमारा विस्तृत राज्य और राज्य-शासन जब आपको श्रीमंत बाजीराव से प्राप्त हुआ तब वह ऐसे समझौते पर प्राप्त हुआ कि आप उसके मूल्य के रूप में आठ लाख रुपया प्रति वर्ष दें। यह पेंशन यदि हमेशा रहनेवाली नहीं है तो उस पेंशन के लिए दिया हुआ राज्य हमेशा आपके पास कैसे रहेगा? उस समझौते की एक शर्त तो तोड़ी जाए और दूसरा बनी रहे यह अनुचित है।" [16] बाद में ऐसा जो कहा जा रहा था कि आप दत्तक पुत्र हैं इसलिए आपका हक नहीं बनता, उसके संबंध में साफ-साफ और तर्कसंगत निवेदन करने के बाद श्रीमंत नाना साहब कहते हैं-" श्रीमंत बाजीराव साहब ने अपनी पेंशन में मितव्ययता से कुछ राशि बचाई इसलिए अब पेंशन चालू रखने का कोई कारण नहीं है, ऐसा यदि कंपनी कहती है तो इस तर्क का सारे इतिहास में उदाहरण मिलना कठिन होगा। यह पेंशन जो दी गई वह समझौते की शर्त के रूप में दी गई। उस समझौते में बाजीराव उस पेंशन को किस तरह व्यय करें, उस शर्त में क्या यह भी तय किया गया था? दिए हुए राज्य के लिए यह पेंशन मिलती है। उसे कैसे व्यय करना है यह कहने का इस जगत् में किसीको तनिक भी अधिकार नहीं है। इतना ही नहीं अपितु श्रीमंत बाजीराव इस पेंशन की सारी-की-सारी राशि यदि बचाते तो भी वैसा करने में वे पूरी तरह स्वतंत्र थे। कंपनी से मैं यह पूछता हूँ कि उनके कर्मचारियों की पेंशन का व्यय किस तरह होता है, क्या इसकी जाँच करने का अधिकार उसे है? कोई भी पेंशनभोगी कितना खर्च करता है, क्या बचाता है यह स्वयं के नौकरों से भी पूछना संभव है क्या? परंतु जो प्रश्न नौकरों से भी नहीं पूछा जा सकता वह एक विख्यात राजवंश के अधिपति से पूछा जा रहा है।" यह आवेदन लेकर नाना के विश्वासपात्र वकील अजीमुल्ला खान विलायत गए।

इस सन् १८५७ के क्रांतियुद्ध में जो महत्त्व के पात्र हैं उनमें अजीमुल्ला खान का नाम स्मरणीय है। अजीमुल्ला खान पहले बहुत निर्धन होते हुए भी अपने बुद्धिबल से अपनी उन्नति कर नाना के एकनिष्ठ वकील हो गए थे। [17] वे पहले एक अंग्रेज के यहाँ घरेलू नौकर थे। उस अति सामान्य नौकरी में भी अपनी महत्त्वाकांक्षा न छोड़ते हुए वहाँ उन्होंने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा का अच्छा परिचय प्राप्त किया। ये दो भाषाएँ अच्छी तरह सीख लेने पर उन्होंने कानपुर के एक स्कूल में शेष अध्ययन किया और थोड़े ही दिनों में वहाँ की सरकारी पाठशाला में शिक्षक हो गए। उनकी बुद्धिमत्ता की कीर्ति नाना साहब के कानों में पड़ते ही उन्होंने उन्हें अपने दरबार में रख लिया। नाना साहब की सारी व्यवस्था में अजीमुल्ला खान का स्थान महत्त्वपूर्ण था। सन् १८५४ में अजीमुल्ला खान इंग्लैंड गए। अंग्रेजी रीतिरिवाजों की संपूर्ण जानकारी होने से लंदन के लोगों में वे बहुत प्रिय हो गए। अपना आकर्षक और मीठी वाणी, अपने शारीरिक तेज एवं अपनी असीम उदारता के कारण अजीमुल्ला अनेक अंग्रेजी ललनाओं के गले का हार बन गए। लंदन के सार्वजनिक बगीचों में या ब्राइटन के समुद्र किनारे पर रत्नजड़ित पोशाक में इस 'भारतीय राजा' को देखने आंग्ल नर-नारियों की भीड़ इकट्ठी होती थी। कुछ अंग्रेज युवतियाँ तो अजीमुल्ला पर इतनी लटू हो गई थीं कि उनके वापस हिंदुस्थान आ जाने पर भी उन्हें अत्यंत आदर और प्रेम की भाषा में लिखे उनके प्रेमपत्र आते थे। हेवलोक की सेना ने जब ब्रह्मावर्त जीता तब उसे इंग्लैंड की अनेक भद्र महिलाओं द्वारा अपने प्रिय अजीमुल्ला खान को भेजे हुए पत्र देखने को मिले। अजीमुल्ला खान के प्रति महिलाओं के मन आकर्षित हो गए थे तो भी ईस्ट इंडिया कंपनी का मन उसको ओर आकर्षित न हुआ और उसने अनेक दिन चक्कर लगवाकर उन्हें साफ जवाब दिया कि 'गवर्नर जनरल द्वारा किया गया फैसला हमको पूरी तरह मान्य है और इसलिए बाजीराव के दत्तक का उनकी पेंशन पर किसी तरह का अधिकार शेष नहीं रहता।' इस तरह मुख्य कार्य के संबंध में निराश हो जाने पर अजीमुल्ला खान इंग्लैंड छोड़कर हिंदुस्थान की ओर आने के लिए फ्रांस के रास्ते निकले। हम उन्हें यात्रा में ही छोड़कर यह देखें कि नाना साहब उस समय क्या कर रहे थे?

श्रीमंत नाना साहब पेशवा के जीवन की विस्तृत जानकारी प्रकाशित करने का सुअवसर महाराष्ट्र के इतिहास के भाग्य में है क्या? वह अवसर जब आएगा तब आएगा पर अभी उनके संबंध में जो भी जानकारी मिली है, यद्यपि वह उनके शत्रुओं की ओर से ही प्राप्त हुई है तब भी उसका संकलन करके रखना बुरा न होगा। श्रीमंत के बचपन की थोड़ी-बहुत जानकारी ऊपर दी जा चुकी है। ब्रह्मावर्त एक छोटा सा परंतु ठाठदार नगर था। नगर से लगा हुआ भागीरथी का पाट था। सुंदर घाट, अनेक देवालय और नाना भूषणों से मंडित वहाँ आनेवाले नर-नारी के समूह की शोभा से वह ब्रह्मावर्त नगर और वह भागीरथी का पाट बहुत सुंदर लगता था। श्रीमंत का बाड़ा बहुत विस्तीर्ण और उत्तम साज-सामान से सुशोभित था। अलग-अलग रंग को मूल्यवान दरियों और गलीचों से उस बाड़े के दीवानखाने सजे हुए थे। यूरोपियन कारीगरी का भिन्न-भिन्न रंगों में काँच का सामान, मोमबत्तियों के बड़े-बड़े दर्पण, हाथी दाँत और सोने से निर्मित रत्नजड़ित नक्काशी के काम, संक्षेप में हिंदुस्थान के राजमहलों में दिखनेवाली सब प्रकार की कमनीयता श्रीमंत के उस दीवानखाने में दिखती थी। [18] घोड़ों और ऊँटों के सारे उढ़ावन चाँदी के होते थे। श्रीमंत को घोड़ों का बहुत शौक था और उत्तर हिंदुस्थान में उनकी अश्वविद्या बड़ी धूम थी। उनकी घुड़साल उत्तम और होशियार घोड़ों से हमेशा भरी रहती थी। अलग-अलग जाति के हिरन, शिकारी कुत्ते, सॉभर, ऊँट एवं हिंदुस्थान के सब के जानवर पालने में उनकी बहुत रुचि थी। परंतु इन सब वस्तुओं की तुलना में श्रीमंत का शस्त्रागार बहुत उत्तम था। उसमें अलग-अलग तरह के शस्त्र, तेज धारवाली तलवारें, एकदम नई बंदूकें और सब तरह की तो बहुत थीं। श्रीमंत स्वभाव से स्वाभिमानी थे। हम एक बड़े राजवंश के अंगभूत हैं और उस महान और प्रथित वंश को सोहे ऐसा जीवन जी सकें तो जीना है अन्यथा पूरी तरह नामशेष हो जाना ही अच्छा, यह उनका निश्चय था। अपने आभिजात्य और कुल की महानता का उनके द्वारा भेजे गए आवेदन में बार-बार साभिमान उल्लेख हुआ है। मराठों के विस्तृत साम्राज्य का अधिपति होते हुए भी पेंशन के लिए दूसरों के दरवाजे पर निवेदन करने की मजबूरी का उनको बहुत दु:ख होता था। 'संभावितस्य चाकीर्तिमरणादतिरिच्यते' के अनुसार अकीर्ति की अपेक्षा मृत्यु का आलिंगन करनेवालों में से वे थे। उनका स्वभाव राजा जैसा उदार और शूरों जैसा स्वाभिमानी था। कभी-कभी कानपुर की सेना के यूरोपियन अधिकारियों को वे पार्टियाँ देते थे, परंतु उनके निमंत्रण को वे कभी स्वीकार नहीं करते थे क्योंकि उनकी पात्रता के अनुसार तोपों की सलामी देना कंपनी को स्वीकार न था। [19] वे अपने प्रदेश के लोगों से बहुत स्नेह करते थे। उनका स्वभाव गंभीर और रहन-सहन बहुत सादा था। किसी तरह के दुर्व्यसन का उन्हें रत्ती भर भी शौक नहीं था। [20] उनका कई बार निरीक्षण कर चुके एक सज्जन लिखते हैं-

"मैंने जब उन्हें देखा, उस समय उनकी आयु लगभग २८ वर्ष होगी; पर वे चालीस के आसपास के दिखते थे। शरीर उनका स्थूल था, चेहरा गोल, आँखें उग्र, पानीदार और चंचल, कद-काठी सामान्य, स्पेनिश लोगों जैसा गोरा रंग और बातचीत कुल मिलाकर आनंदी और कुछ विनोदी थी। [21] दरबार में वे किनखाबी पोशाक पहनकर बैठते थे।" उनके शरीर पर पहने अलंकार और उनके सिर के अत्यंत मूल्यवान मुकुट को देख यूरोपियन महिलाएँ ललचा जाती थीं-ऐसा ट्रेवेलियन लिखता है। नाना का व्यवहार भी इस भव्यता को शोभा देने योग्य उदार और दयालु था। वे स्वयं की प्रजा पर कृपा करते थे इसमें तो कोई आश्चर्य ही नहीं, परंतु जिन्होंने उनसे बेईमानी कर उनके जीवन का सत्यानाश किया, उन अंग्रेज लोगों पर भी वे हमेशा कृपा करते रहते थे। कितने ही अंग्रेज युवा दंपतियों को हवाखोरी करने की इच्छा होने पर महाराज की बग्घी उनके लिए भेज दी जाती थी। कितने ही अवसरों पर महाराज के घर अंग्रेज अधिकारी तथा अन्य लोग अपनी मैडमों के साथ बुलाए जाते और उत्तम शालें, मूल्यवान मोती, रत्न आदि वस्तुएँ उनको उपहारस्वरूप दी जातीं। १व्यक्ति के लिए द्वेष उनकी उदार आत्मा को कलुषित नहीं करता था यह इससे अच्छी तरह सिद्ध होता है। राष्ट्रयुद्ध में जिनकी देह के टुकड़े-टुकड़े करना है उन्हीं प्रतिस्पर्धियों को अन्य अवसरों पर उपकृत करना, यह वीरता की उच्च कल्पना हिंदुस्थान के काव्य और इतिहास में हर क्षण दृष्टिगोचर होती आई है। राजपूत वीर अपने कट्टर शत्रु से भी युद्ध-अवसर को छोड़ ऐसी ही उदारता से व्यवहार करते थे। श्रीमंत नाना अपनी उदारता के कारण उस समय के अंग्रेजों के बहुत प्यारे हो गए थे, यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। १श्रीमंत नाना के आतिथ्यसत्कार का जब तक आनंद ले रहे थे तब तक अंग्रेज अधिकारियों और मैडमों के वे गले का हार बने हुए थे। परंतु कानपुर के रण-मैदान में स्वराज्य के लिए और स्वधर्म के लिए उनके द्वारा तलवार उठाए जाते ही उनपर दुःशब्दों और निम्न स्तर की गालियों की बौछार शुरू हो गई। ऐसे इन कोतवाल को डाँटनेवाले कृतघ्न चोरों से ही हिंदुस्थान में अंग्रेजी इतिहास भरा है। श्रीमंत नाना साहब एक विद्याचारसंपन्न व्यक्ति थे। उन्हें विश्व की राजनीति में बहुत रुचि थी और उसके लिए वे बहुत से प्रमुख अंग्रेजी पत्र खरीदते थे। हर रोज दैनिक पत्र आते ही महाराज वह सब पढ़वा लेते थे। इस काम के लिए मि. टॉड नामक एक अंग्रेज नियुक्त था। वे प्रोफेसर भी कानपुर के कत्ले-आम में मारे गए। इंग्लैंड और हिंदुस्थान में अंग्रेजों की राजनीति पर नाना बहुत बारीकी से चर्चा किया करते थे। अयोध्या के राज्य के संबंध में वे उसी अंग्रेज व्यक्ति से बहस किया करते थे। 3 श्रीमंत नाना साहब पेशवा के व्यक्तित्व से संबंधित चरित्र की ऊपर दी हुई जानकारी उनके ही शत्रुओं के इतिहास से शब्दश: ली जाने के कारण एक बात समझ लेनी चाहिए, वह यह कि उस जानकारी में यदि सद्गुणों का वर्णन है तो वह बहुतायत से सत्य होना चाहिए। क्योंकि अंग्रेजों जैसा दीर्घद्वेषी शत्रु नाना जैसे कट्टर प्रतिद्वंद्वी का सद्गुण विवशता से ही किंचित्मात्र देगा। ऐसी स्थिति में उपर्युक्त वर्णन पढ़कर श्रीमंत के लिए मन में आदर हिलोरें मारता है और जिस वंश का बालाजी विश्वनाथ से उद्गम हुआ है, उस रण-विख्यात भट वंश के इस अंतिम पेशवा की वह गोरी और भव्य मूर्तिमस्तक पर रत्नजडित मुकुट लकदक कर रहा है, कांतिमान देह पर किनखाबी पोशाक पहनी है, सतेज और चपल नेत्रों में मानभंग से उत्पन्न गुस्से की लालिमा है, कमर में तीन लाख रुपयों की तलवार लटकी हुई है और स्वराज्य एवं स्वधर्म का प्रतिशोध लेने के लिए गुस्से की ज्वाला जिसकी देह से और पानीदार तलवार जिसकी म्यान से बाहर कूदने को तैयार है-उस अंतिम पेशवा को प्रणाम करने के लिए मस्तक नत होने लगता है।

अंत में अंग्रेजों का अंतिम उत्तर आया कि 'आपका बाजीराव की पेंशन पर तिनके बराबर भी अधिकार नहीं था। इतना ही नहीं, आपका ब्रह्मावर्त की ओर के प्रदेश पर स्थापित स्वतंत्र शासक का अधिकार भी अब आपको नहीं मिलेगा।' ऐसा अंतिम उत्तर अंग्रेजों की ओर से नाना को आया और हम जो कर रहे हैं वही न्याय है यह भी कहा गया। न्याय? अब यह न्याय है या अन्याय, इसका ठीक-ठीक उत्तर देने का कष्ट अंग्रेज सरकार को उठाने की आवश्यकता नहीं है। उधर कानपुर के मैदान पर जल्दी ही इस प्रश्न का यथार्थ निर्णय करने की जंगी तैयारी शुरू हो चुकी है और मराठों के हृदय को दुखाना न्याय है या अन्याय, इसकी पूरी चर्चा अब वहीं होगी। अंग्रेजों के कटे सिर, उनकी कटी हुई गरदनें, चीरे हुए शरीर और बहनेवाले रक्त का लाल-लाल नाला, ये सब इस प्रश्न की यथायोग्य चर्चा करेंगे और इस चर्चा को शांति से सुन कानपुर के कुएँ पर बैठे गिद्ध इस प्रश्न का निश्‍चित उत्तर देंगे कि यह न्याय था या अन्याय।

नाना के घर ऐसे विशाल समारोह की तैयारी शुरू है तो उधर उनकी बहना छबीली भी शांत नहीं बैठी है। उसके भी सामने 'न्याय या अन्याय' यही प्रश्न आ पड़ा है। सन् १८५३ में उसके पति अचानक परलोक सिधार गए और उसके दत्तक लिये प्रिय पुत्र दामोदर को उत्तराधिकारी के अधिकार न देते हुए अंग्रेज सरकार ने झाँसी अधिग्रहीत कर ली। परंतु ऐसी चिट्ठी-पत्री से अधिग्रहीत होनेवाली वह रियासत नहीं थी। उस झाँसी की रियासत पर नागपुर की बांका का राज्य नहीं था, वहाँ तो नाना की 'छबीली' बहन महारानी लक्ष्मीबाई राज्य कर रही थी। वह ऐसे अधिग्रहण की क्या परवाह करे? अंग्रेजों का यह कुटिल और जल्लादी कृत्य देखकर दु:ख, अपमान, मानभंग के बादलों की गड़गड़ाहट होने लगी और उनमें से झाँसी की उस चपला ने कड़कड़ाहट की-"अपनी झाँसी मैं नहीं दूंगी।"

अपनी झाँसी मैं दूँगी नहीं-जिसमें हिम्मत हो वह लेकर देखे!

प्रकरण-४

अयोध्या

मानव जाति के दुर्भाग्य से इस जग में चोर को छोड़ संन्यासी को फाँसी देने का न्याय हमेशा होता आया है। पर राजनीति के क्षेत्र में तो यह खुल्लम-खुल्ला किया जाता है। जुल्म और अन्याय दोनों भाववाचक कल्पनाएँ मानवीय मन को स्वीकार नहीं होतीं, अतः उनके कारण होनेवाले त्रास का प्रतिशोध लेने के लिए जब वह झल्लाकर बाहर निकल पड़ता है तब यह नहीं देखता कि उस जुल्म और अन्याय की जड़ में कौन है और जो सामने पड़ जाता है उसी गरीब को मारने लगता है। इस उतावली में जो अन्याय की जड़ या आत्मा है उसे भुला दिया जाता है। इस घालमेल के कारण कोई बड़ी हानि यदि नहीं होती तो उस उपेक्षा को क्षमा किया जा सकता है। परंतु सच में देखा जाए तो इस घालमेल के परिणाम बहुत भयंकर होते हैं। चोरों को मारने के लिए बनाए गए फंदे संन्यासियों को मारने में खप जाते हैं और उधर चोर के सुरक्षित बच जाने से चोरी की घटनाएँ पहले से भी अधिक होने लगती हैं। लेकिन इस फाँसी पर संन्यासी के बदले यदि एकाध चोर को भी चढ़ा दिया गया तो भी उस चोरी का सारा क्रोध उस एक ही चोर पर उतार दिए जाने से बाकी के चोर निर्भय होकर-'पुनश्चः हरिः ओम्' करने को तैयार हो सकते हैं। विषवृक्ष का वास्तविक नाश उसकी शाखाएँ और पत्तियाँ तोड़ते रहने से नहीं हो सकता-वह तो तब होगा जब उन शाखाओं और पत्तों को बार-बार आगे धकेलती हुई और उनका पोषण करती हुई उस वृक्ष का जड़ें खोदकर उनका सर्वनाश किया जाए।

डलहौजी किसी परिस्थिति का परिणाम है। वह परिस्थिति जब तक बनी हुई है तब तक एक डलहौजी जाए तो उसकी जगह दस डलहौजी आएँगे। परंतु यह सिद्धांत भूलकर अंग्रेज इतिहासकार जान-बूझकर और हिंदुस्थानी लोग भोलेपन और अज्ञान से डलहौजी के शासनकाल में हुए सारे अत्याचारों का दोष इतने जोर से उसपर थोपते हैं मानो वही मुख्य कर्ता था। परंतु यह मानना पूरी तरह गलत है। इस मान्यता का यह परिणाम होता है कि डलहौजी को छोड़ मुख्य कारण की ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता। यदि इंग्लैंड की सरकार की सम्मति न हो तो डलहौजी की हिम्मत है कि वह इधर का पैर उधर रख सके। डलहौजी के हर कृत्य को इंग्लैंड की सरकार की स्वीकृति मिले बिना हिंदुस्थान में एक पत्ता भी हिलना असंभव है। ऐसी स्थिति में डलहौजी यदि एक अंश का दोषी है तो उसके पीछे छिपकर यह अधम कृत्य करनेवाले ठगों पर दस गुना दोष आना चाहिए। परंतु इंग्लैंड की सरकार माने वहाँ के मुट्ठी भर अधिकारी-इन मुट्ठी भर अधिकारियों को इंग्लैंड की जनता के सामने कँपकँपी आती है। अंग्रेज जनता की अनिच्छा हो तो इन अधिकारियों को एक क्षण भी अपने अधिकार सँभाले रहना संभव न हो। ऐसी परिस्थिति में ये अधिकारी भी डलहौजी के पापी कृत्यों को मान्यता क्यों देते थे? वह इसलिए कि उनके सारे कृत्य सारी अंग्रेज जनता को पसंद थे। इस तरह देखें तो इंग्लैंड नामक पूरा राष्ट्र ही इस अन्याय और अत्याचार का दोषी है। साम्राज्य के रक्त की चटक लग जाने से पूरा राष्ट्र ही क्रूर, निर्दयी बन गया है। जब सारा इंग्लैंड मधुमक्खी का छत्ता है तो डलहौजी नामक एक मधुमक्खी पर सारा गुस्सा उतारने से क्या लाभ? जब तक यह छत्ता बना हुआ है तब तक ये मधुमक्खियाँ हिंदुस्थान के फूलों से मधु ले जाकर उसके बदले में विष भरे डंक मारती ही रहेंगी। उस छत्ते को सीने से चिपकाए रखें और उसमें से मधु लेने के लिए आनेवाली मधुमक्खियों को गाली-गलौज करें कि ये डंक बहुत मारती हैं तो इसमें कोई तुक नहीं। यह मूर्खतापूर्ण कल्पना और यह अभागी अंधता सन् १८५७ के नेताओं की दृष्टि को स्पर्श न कर सकी। यही उस क्रांतियुद्ध का मुख्य रहस्य है। उसका हेतु (साध्य) अमुक कानून रद्द करो या अमुक डलहौजी हटाओ, यह न होकर कानून बनाने की या उस डलहौजी को भेजने की मुख्य शक्ति अर्थात् राज्यसत्ता को प्राप्त करना ही था। सभी अंग्रेज डलहौजी हैं और उस छत्ते की सारी मधुमक्खियों का उद्देश्य अपने भारतीय फूलों से मधु लेकर उसके एवज में विष भरे डंक मारते रहने का है, यह अंतिम सत्य उन चतुर और माननीय पुरुषों के ध्यान में है और ऐसे इन अंग्रेजों से पूरी तरह संबंध तोड़े बिना, गुलामी की शाखाएँ न तोड़ते हुए उस हलाहल भरे कँटीले वृक्ष को समूल उखाड़े बिना, संक्षेप में यह कि स्वराज्य प्राप्त किए बिना इस असाध्य रोग की दूसरी रामबाण औषधि नहीं है, और

स्वराज्य की यह औषधि संग्राम भूमि के अतिरिक्त कहीं और नहीं मिलती। ये वास्तविक सत्य उनकी कुशाग्र बुद्धि को ज्ञात होते ही एक क्षण भी न रुकते हुए वे अपने प्राण अपने हाथों में और तलवार शत्रु की गरदन पर रखने रण-मैदान में कूद पड़े।

सन् १८५७ के क्रांतियुद्ध की पवित्रता और महानता इसी सत्य ज्ञान उसके लिए किए गए प्राणदान में है। जिन्हें डलहौजी ही सारे अत्याचारों का मुख्य कारण लगता है उन्हें इस युद्ध की वास्तविक महानता ज्ञात नहीं होगी। ऐसे अज्ञानी व्यक्तियों को यदि सत्य ज्ञात करने की इच्छा हो तो वे विशेषत: अयोध्या का राज्य किसने अधिग्रहण किया यह देखें, और क्यों अधिग्रहीत हुआ, यह समझ लें। अयोध्या का वह विस्तृत और संपन्न राज्य डलहौजी के पहले एक शताब्दी तक अधिग्रहण होता रहा था।

अयोध्या के नवाब ने जब से अंग्रेजों से रिश्ते बनाए तब से उसके राज्य का एक-एक टुकड़ा अंग्रेजों की ओर जाने लगा था। सन् १८०१ में एक समझौता वजीर के सिर पर जबरन लादा गया, उसमें यह अपहरण की इच्छा पूरी निर्लज्जता से प्रदर्शित की गई थी। नवाब वजीर उस समय पहले से ही कंपनी की सहयोगी सेना के लिए प्रतिवर्ष पचहत्तर लाख रुपए दे रहा था। कंपनी की इस डकैती से नवाब का खजाना कठिनाई में आ गया था। पर अंग्रेजों ने जबरन यह माँग की कि नवाब अपनी सेना हटाकर उसके स्थान पर कंपनी की सेना रखे। इस सेना का खर्च और सहयोगी सेना का खर्च उठाने की शक्ति नवाब के खजाने में नहीं है यह अंग्रेज अच्छी तरह जानते थे। बल्कि यह जानकारी थी इसीलिए उन्होंने यह माँग की थी। नवाब के पास खजाना नहीं था, किंतु प्रदेश था, अंत में उसमें से एक उपजाऊ टुकडा तोड़कर नवाब ने अंग्रेजों को दिया और नाहीं-नाहीं कहते भी नवाब के सिर यह संरक्षक सेना बैठ ही गई। इस सन १८०१ के समझौते की तीसरी धारा का अर्थ था-"नवाब अपने प्रदेश की व्यवस्था प्रजा को सुखकर करे और हर काम में वह कंपनी के अधिकारियों से सलाह-मशवरा करे।" अब यह प्रजा को सुखकर व्यवस्था कैसे रखनी है? यदि नवाब कोई सुधार करने की इच्छा करे तो उसकी इच्छा के विरुद्ध कंपनी उसपर गुर्राए। फिर भी आग्रह था कि प्रजा के लिए सुखकर व्यवस्था की जाए। नवाब का खजाना बार-बार डकैती डालकर खाली किया जाता और उसपर नई माँग भी रखी जाती और इस डकैती की पूर्ति के लिए जब नवाब को कर लादने की विवशता होती तो कंपनी कहती कि प्रजा को सुखकर व्यवस्था होनी चाहिए। नवाब को जब इस तरह स्वयं के राज्य में सुधार करना असंभव हो जाए और प्रजा विद्रोह कर राज्य में सुधार का प्रयास करे तो उसका बंदोबस्त करने अंग्रेजी बैनेट और संरक्षक सेना की तलवारें प्रजा की गरदन पर रख उसे हुँ-चूँ भी नहीं करने देना[22]-इस प्रकार कंपनी का आग्रह बना ही रहता कि प्रजा के लिए सुखकर व्यवस्था की जाए! इस तरह एक ओर नवाबों और जनता को राज्य व्यवस्था सुखकर करना पूरी तरह असंभव बनाकर दूसरी ओर कंपनी कहती कि राज्य व्यवस्था सुखकर करनी ही होगी। यह स्थिति कुछ ऐसी ही थी कि कोई अत्याचारी बाप बच्चे को जोर से पीटता जाए और कहे चुप रह, खबरदार जो रोएगा तो ! इसमें फर्क इतना ही है कि वह बाप ऐसा मूर्खतापूर्ण कार्य कम-से-कम सद्हेतु से तो करता है ! परंतु कंपनी नवाब का मुँह बाँधकर जो पिटाई कर रही थी वह तो केवल उसका गला दबाकर प्राण लेने के लिए ही थी। यह प्राणघात जितनी जल्दी और जितनी सुलभता से हो, करने के लिए अंग्रेजों ने हजारों अड़चनें और हजारों तिकड़में भिड़ाईं-उन सबका वर्णन स्थानाभाव के कारण संभव नहीं। फिर भी उदाहरण के लिए एक अत्यंत नीच तिकड़म दिए बिना रहा नहीं जाता। वह तिकड़म थी, सन् १८३७ में लॉर्ड आक्लैंड द्वारा नवाब से किया हुआ समझौता कुछ ही वर्षों बाद साफ तौर पर अस्वीकार करना। यह समझौता होते ही इंग्लैंड उसे भूल गया हो ऐसा नहीं, क्योंकि सन् १८४७ में लॉर्ड हार्डिंगटन ने उस समझौते को माना था। कर्नल सलीम ने सन् १८५१ में वही समझौता माना था। सन् १८५३ में हिंदुस्थान में चालू समझौते की सूची में भी वह सन् १८३७ का समझौता लिखा हुआ था। [23] पर सन् १८५३ में जो समझौता इंग्लैंड की स्मृति में था वह समझौता उसी वर्ष वास्तविक समय आने पर इंग्लैंड एकदम भूल गया। सन् १८३७ के उस समझौते के अनुसार वह रियासत अधिग्रहण करना संभव नहीं था, यह देखते ही एक घंटे पहले तक मान्य किया हुआ और चालू समझौतों की सूची में लिखकर भेजा हुआ समझौता हिंदुस्थान सरकार साफ अस्वीकार करने लगी। ऐसा कोई समझौता हुआ ही नहीं था, ऐसा धड़ल्ले से कहते समय अंग्रेज सरकार लज्जित कैसे नहीं हुई-हिंदुस्थान का अंग्रेजी इतिहास जिसने थोड़ा-बहुत भी पढ़ा है, उसे इसपर बहुत आश्चर्य नहीं होगा। क्योंकि अंग्रेज सरकार को अयोध्या का राज्य चाहिए था और वह राज्य हड़पने के लिए सन् १८३७ के समझौते की अपेक्षा सन् १८०१ का समझौता अधिक लाभदायक था।

ये सारी तिकड़में डलहौजी के पहले ही हो चुकी थीं, इतना अवश्य ध्यान में रखना चाहिए जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि डलहौजी ने अयोध्या के अधिग्रहण करने में कुछ अपूर्व पातक नहीं किया। अयोध्या का प्रदेश सबको चाहिए था, पर उसको कैसे हथियाया जाए? इसका निर्णय डलहौजी के हाथ से हुआ। पंजाब की तरह या ब्रह्मदेश की तरह उसपर चढ़ाई कर उसे जीता नहीं जा सकता था। क्योंकि वहाँ के लोगों ने कभी ब्रिटिशों से झगड़ा नहीं किया था। नवाब ने उनसे कभी प्रेम से व्यवहार नहीं किया, ऐसा आरोप लगाना भी संभव नहीं था। क्योंकि आज तक हर कठिन अवसर पर नवाब ने अंग्रेजों की सहायता की थी। जब अंग्रेजों की जेब में पैसा नहीं था तब नवाब ने उन्हें पैसा दिया। और जब बड़ी-बड़ी लड़ाइयों में अंग्रेजों के पास खाने को कुछ नहीं था तब उन्हें अनाज भिजवाया। नागपुर की तरह वहाँ कोई वारिस नहीं है, ऐसी शिकायत नहीं थी। क्योंकि राजमहल औरस संतति से भरा हुआ था। वहाँ झाँसी की तरह दत्तक का भी कोई बखेड़ा नहीं था। क्योंकि वर्तमान राजा मृत राजा का औरस पुत्र था और राज्य पर जमा हुआ था। इस तरह लखनऊ के इस नवाब ने उपरोक्त अपराधों में से एक भी अपराध नहीं किया था। यद्यपि ये सारे अपराध नवाब ने नहीं किए थे फिर भी उस मूर्ख के हाथों एक बड़ा प्रमाद हो ही गया। वह प्रमाद यह कि नवाब के राज्य का प्रदेश बहुत ही उपजाऊ, सुंदर और धनी था। यह उसका अपराध अंग्रेजों के बहुत पहले से ही ध्यान में आया हुआ था। अयोध्या के सुंदर प्रदेश का वर्णन करते हुए अंग्रेजी ब्ल्यू बुक की सुकोमल भाषा में भी कविता फूट पड़ी है-"इस सुंदर प्रदेश में कहीं-कहीं बीस तो कहीं-कहीं दस फीट पर ही भरपूर जल भंडार हैं। सारा प्रदेश हरे-भरे खेतों से भरा हुआ है। अमराई की छाया से शीतल, बाँस के ऊँचे-ऊँचे वन अपने सिर ठाठ और शान से उठाए हुए, इमली की घनी छाया, नारंगी की गंध, अंजीर के वृक्षों की विचित्रता और पुष्पराग का परिमल आदि सारी प्रकृति की अवर्णनीय सुंदरता फैली है।"

ऐसा यह प्रदेश अपने कब्जे में रखने का प्रचंड अपराध अयोध्या के नवाब ने किया था, इसलिए सन् १८५९ में डलहौजी ने उसे गद्दी पर से उठाकर फेंक देने का आदेश दे दिया और उस आदेश को समस्त अंग्रेजों की अनुमति और सहयोग मिलने से अयोध्या एक झटके में अधिग्रहीत कर ली गई। कारण यह बताया गया कि नवाब अपने राज्य में सुधार नहीं कर रहा था। ओहो! ईसा मसीह भी इस उदारता के आगे नतमस्तक हो जाएँ। नवाब के राज्य में जो एक गनी दरिद्रता थी, उसे चौगुनी करने, जो कुछ चैतन्य था, उसे समाप्त करने और अयोध्या के तन पर फटापुराना ही सही, पर स्वतंत्रता का जो कपड़ा था उसे फाड़कर नंगा करने तथा उसके सिंहासन पर बलात्कार करनेवाले इंग्लैंड की यह अव्यवस्था की बात यदि एक बार मान ली तो हिंदुस्थान पर तेरा राज क्या एक दिन भी रह पाएगा? आज चीन में अफीम की लत है, अफगानिस्तान में अत्याचार है, बहुत क्या तेरे पैर के नीचे स्थित रशिया में अंधाधुंधी फैली है, क्या वहाँ के जार को अव्यवस्था के अपराध के लिए दंडित कर रशिया को अपने देश से जोड़ सकते हो? तेरे पड़ोसी के घर का सामान अव्यवस्थित है, इसलिए उसके घर में घुसकर उसे बाँधकर वह घर अपने कब्जे में लेने का अधिकार तुम्हें कैसे मिला? पर डलहौजी के प्रशासन के संबंध में लिखनेवाला आर्नोल्ड कहता है-"नवाब ने इसके सिवाय भी कितने ही अपराध किए थे। जैसे वह अपनी दासियों को जरी की साड़ियाँ भेंट देता था। दूसरा अपराध यह कि उसने ११ मई को आतिशबाजी का जलसा किया। और यह भी कि एक दिन सुबह ही उसने दवाई पी और शाही बेगम और ताज बेगम से भोजन का आग्रह किया। अब इससे भयंकर अपराध और क्या हो सकता है? फिर भी धन्य हैं अंग्रेज कि नवाब सुबह दवाई पीता था फिर भी उस (अपराध) की ओर ध्यान न देकर उसे राज्यच्युत नहीं किया। पर अंत में सारे उपाय व्यर्थ गए। कारण, एक दिन नवाब के सामने कुछ घोड़ियों पर घोड़े छोड़े गए। अर्थात् अंग्रेज सरकार को उन घोड़ियों की पवित्रता भंग होने पर बहुत दया आई और उन्होंने उस भयंकर अवसर पर वहाँ खड़े नवाब के अपराध पर उसे राज्यच्युत कर दिया।"

ऐसी घिनौनी बातें कहकर नवाब की राज्य व्यवस्था संबंधी अक्षमता का ढोल पीटना चाहनेवाले मूर्ख और ईर्ष्यालु अंग्रेज इतिहास-लेखकों को यह सब देखने हिंदुस्थान आने का कष्ट करने की आवश्यकता ही क्या थी? उन्हें इंग्लैंड में कहीं भी रोनाल्ड के ग्रंथ मिल सकते थे या लज्जावश किसीने न दिए हों तो इंग्लैंड के राजमहलों से भी उन्हें बहुत सारी जानकारी मिल गई होती और घोड़ियों का पातिव्रत्य भंग करने से भी बड़े व्रतों को भंग करनेवालों की जिंदगी और राज्य अधिग्रहण कर लेने तथा स्वयं के घर के छेद भरने में वे अपने समय का अधिक उपयोग कर सकते थे।

प्रकरण-५

धकेलो उसमें...

अब इच्छित राष्ट्रकार्य की तिथि पास आती जा रही है अतः ऐसे समय इष्ट सिद्धि के लिए कुल देवताओं की कृपा प्राप्त करनी ही चाहिए। इस प्रचंड राष्ट्र विक्षोभ के कुलदेव की प्रसन्नता ही प्रतिशोध है। इसे प्रसन्न किए बिना और अपनी सहायता के लिए आने को बाध्य करने के सिवाय सन् १८५७ में लिये गए संकल्प की सिद्धि नहीं होगी। इसलिए हवन कुंड को प्रदीप्त करो और उसमें इतनी दिव्य हवन सामग्री डालो कि मुख्य कुलदेव चैतन्य होकर प्रकट हो ही जाएँ। इंद्रजीत के प्रचंड यज्ञ से अजेय-रथ बाहर निकलने तक जैसे हवनों का धूम-धड़ाका उड़ाया गया वैसे ही इस यज्ञ से जब तक मूर्तिमंत प्रतिशोध अपनी सहस्र जिह्वाएँ और सहस्र दाँतों से युक्त होकर आविर्भूत न हो तब तक हवनकुंड में हवन करते ही जाना है। इंद्रजीत के समय वानर उस यज्ञ को भंग करने के लिए प्रयासरत थे। परंतु सौभाग्य से इस राष्ट्र यज्ञ में सहायता करने के लिए अंग्रेज स्वयं ही उतावले हो रहे हैं। फिर विलंब क्यों? कोप की अग्नि भभक रही है और उसकी सातों जीभे लपलपाती हुई उछल रही हैं। फिर विलंब क्यों? चलो, आहुति डालना प्रारंभ करो !

पंजाब के इतिहास प्रसिद्ध कोहिनूर के तेज के गिरिवर से और इस राजचिह्न के राजा से पहले आहुति दान का सम्मान पाने योग्य दूसरा कौन होगा! इसलिए चल आजा! रे डलहौजी, उस कोहिनूर को उसके वास्तविक मालिक से छीनकर ले आ। पंजाब की स्वतंत्रता का खून हुआ है-यह उस राष्ट्रक्षोभ के कुलदेव को सूचित करने के लिए वह अग्नि चेत गई है। इस कोहिनूर को फेंक दो उसमें !

इस ब्रह्मदेश को दूसरा सम्मान मिलना उचित है, इसलिए चल आ, रे डलहौजी, उस ब्रह्मदेश को उसके असली मालिक से छीनकर ले आ। अग्नि चेत गई है तो इष्ट सिद्धि के लिए इस ब्रह्मदेश को धकेलो उसमें!

सातारा के शिवाजी की गद्दी कहाँ है? उसका मान तीसरे हवन का है। इसलिए उसपर बैठे राजाओं को श्मशान में बैठने को कहकर वह गददी, अंग्रेजो जाओ और जल्दी ले आओ! यह अग्नि भभक रही है, इसलिए मराठों की ओर से सातारा की इस राजगद्दी को धकेलो उसमें!

इस चौथे हवन को केवल नागपुर की गद्दी कैसे पूरी पड़ेगी! तदर्थ उस गद्दी के साथ ही नागपुर के सारे भवन, हाथी, घोड़े, राजा, रानियाँ, रानियों के अलंकार, आक्रोश, चिल्लाहट जो भी मिले वह सब जल्दी लाओ! यह अग्नि भभक रही है इसलिए पूरा नागपुर धकेल दो उसमें!

अब हवन कुंड सच में जाज्वल्य दिखने लगा है। ऐसे समय उतनी ही जाज्वल्य हवि चाहिए। पर ऐसी आग से भी तेजस्विनी हवि ब्रह्मावर्त के सिवाय और कहाँ मिलेगी? अग्नि प्रज्वलित हो गई है इसलिए ब्रह्मावर्त के मुकुट को उसमें धकेलो!

राष्ट्रक्षोभ के न्याय देव 'प्रतिशोध' को प्रसन्न करने के लिए नई हवि ऐसी चुनो कि बस! यह मान उसीका। इस नीति होत्र की ज्वाला आकाश छूने लगे इसलिए यह झाँसी की बिजली धकेलो उसमें!

देखो, देखो, इस दिव्य हवन कुंड से सारे पापी दुर्योधनों के शरीर काँपने लगे हैं, इसलिए प्रतिशोध का सिर ऊपर दिखने लगा है। ऐसे समय आविर्भूत होने को तत्पर उस देवता को पूर्ण संतुष्ट करने के लिए हवनों का आक्रमण होना चाहिए। इसलिए चलो, ये हैं अर्काट के नवाब, धकेलो इन्हें!

तंजावुर की गद्दी, धकेलो उसमें!

अंगूल के राजा, धकेलो उसमें!

सिक्किम के भाग, धकेलो उसमें!

संबलपुर के राज्य, धकेलो उसमें!

खैरपुर के अमीर, धकेलो उसमें!

ऐसे रुपए और चिल्लर कितने गल गए, इसकी कोई गिनती नहीं! इसलिए ऐसे हविर्दान कौन गिने! अत्यंत पुष्ट और पूरी तरह निरपराध बलि लखनऊ के नवाब के अतिरिक्त मिलना कठिन है इसलिए लखनऊ के नवाब को धकेलो उसमें!

अहा-हा! इस अग्नि कल्लोल से ऊपर निकलते देवता की यह कैसी उग्रता! इस प्रतिशोध के भयानक जबड़े में सारा जगत् ही पिस जाएगा। परंतु उस जबड़े की धार जब तक अधिक तेज न हो जाए तब तक ठहरना उपयोगी नहीं। इसलिए दिल्ली के राजमहलों को ताले लगा और वहाँ के मयूरासन पर बैठनेवाले अकबर के वंशज को खींचकर धकेलो उसमें!

अयोध्या प्रांत के बड़े-बड़े तालुकेदार [24] क्या कर रहे हैं? उनकी सारी जमीनें और उनके सारे हक छीनकर उन्हे जंगली पशुओं जैसा घेरकर लाओ इधर! वैसे ही बंबई प्रांत के (इनाम कमीशन आदि के द्वारा) हजारों हकदारों के हक फेंक-फाँककर उन्हें भी लाओ इधर ! हवन कुंड प्रज्वलित है। इसलिए जमींदार, जागीरदार, तालुकेदार, वतनदार आदि सारे दारों को कंगाल कर धकेलो उसमें!

राजा, महाराजा, बादशाह, प्रधान, नवाब, वजीर जैसी उत्तम हवियाँ इस हवन कुंड में पढ़ें और हमारे राष्ट्रक्षोभ 'कुलदेव' को प्रसन्न करें! हमारी यह वर्तमान दुर्दशा और गुलामी देखकर हमारे पूर्वजों की आँखों से बहनेवाले आँसू उस देवता को अच्छी तरह स्नान करावें। सातारा की गद्दी के टुकड़े देखकर गुस्से में भरे शिवाजी उस देवता को चैतन्य करें। अयोध्या के राजमहल की बेगमों के कष्ट और नागपुर के महलों में अपमान के कारण मरी हुई अन्नपूर्णाबाई की आत्मा हमारे उस राष्ट्रीय प्रतिशोध को चेताए। हे प्रतिशोध, जग के न्याय, तलवार की धार पर तू चढ़ता है तो तू देवों को भी वंदनीय और ऋषियों को भी स्तुत्य हो जाता है। सज्जन रक्षक प्रतिशोध! तेरा डर न हो तो अन्याय का कलि इस दुनिया पर निरकुंश होकर नाचने लगे। हे प्रतिशोध, तेरी उग्रता से ही कंपित होकर पापियों को पुण्यवान होना पड़ता है। तू ही रावण का राम था। तू ही दुर्योधन का भीम था, तू ही हिरण्यकशिपु का नरसिंह था। उनके समय में तुम्हें प्रसन्न करने के लिए जितना हविर्दान नहीं हुआ था उतना इस प्रचंड हवन कुंड में लगा हुआ है। एतदर्थ, जग से अन्याय और अंधेर समाप्त हो, परवशता और परदासता मिट जाए, स्वतंत्रता और स्वराज्य की जय-जयकार हो, ऐसी परमेश्वर की इच्छा हो तो तू इस यज्ञ से मूर्तिमंत हो प्रकट होना। धन्य-धन्य!! 'मृत्यु सर्वहरश्चाहम्'-ऐसी गर्जना करते यह मूर्तिमंत राष्ट्रक्षोभ ऊपर आ रहा है। इस भयंकर मूर्ति को शतशः प्रणाम है। जिसके भयंकर जबड़ों में उन्मत्त राजा पिस जाते हैं, जिसके हाथ के घन से निरपराध देशों के पैरो में पड़ी दासता की बेड़ियाँ तडाक से टूट जाती हैं, जिसके नेत्रों से निकलनेवाली ज्वालाएँ अत्याचारों की काली कोठरियों को जलाकर भस्म करती हैं और जिसकी लपलपाती तप्त जिह्वा हजारों दुःशासनों का रक्त गटागट पीती है उस भयंकर, उग्र एवं भयानक राष्ट्रीय प्रतिशोध को शतशः प्रणाम-

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशंति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।

केचिद्विलग्ना दशनांतरेषु संदृश्यंते चूर्णितैरुत्तमाङ् गैः॥

हे हिंदभूमि, अंततः इस महायज्ञ से तेरा 'प्रतिशोध' सभी में मूर्तिमंत रीति से प्रादुर्भूत हो गया। पर वह क्या-क्या करने से शांत होकर संपूर्ण रूप से अंतर्धान होगा, क्या यह भी तुझे ज्ञात है?

प्रकरण-६

अग्नि में घी

विश्व में ऐसा कौन सा सद्धर्म है कि जिसमें परतंत्रता और दासता को धिक्कारा नहीं गया हो। इसी कारण जहाँ परमेश्वर होगा वहाँ परतंत्रता कभी नहीं रह सकती और जहाँ परतंत्रता है वहाँ परमेश्वर का अधिष्ठान नहीं, वहाँ धर्म नहीं। एतदर्थ किसी भी प्रकार की परतंत्रता का अर्थ धर्म का उच्छेद एवं ईश्वरीय इच्छा का भंग होना है।

क्या मनुष्य जाति की उन्नति के लिए उत्पन्न हुए सारे धर्म मनुष्य जाति की अवनति के लिए उत्पन्न हुई परतंत्रता को एक क्षण भी जीवित रखने की आज्ञा देंगे? उसमें भी राजनीतिक परतंत्रता सभी परतंत्रताओं से मनुष्य जाति की अत्यंत भयानक अवनति करनेवाली है, इसलिए इस अधम राक्षस का कंठच्छेदन करने की आज्ञा प्रमुखता से ही दी गई होगी। जो अन्यों को गुलाम बनाते हैं और जो गुलामी में रहते हैं, वे दोनों ही मनुष्य जाति को नरक की ओर धकेलते हैं। इसलिए मनुष्य जाति को स्वर्ग की ओर ले जानेवाले सद्धर्म इस राजनीतिक गुलामी को नष्ट करने के लिए अपने अनुयायियों को बार-बार उपदेश देते हैं। उनका यह उपदेश अस्वीकार करनेवाले सारे लोग धर्मद्रोही हैं। दूसरों को गुलामी में ढकेलनेवाले अंग्रेज भले ही रोज चर्च में जाएँ, वे धर्मद्रोही ही हैं और परतंत्रता के नरक में सड़नेवाले भारतीय रोज शरीर पर भभूत मलते रहें तब भी वे धर्मद्रोही ही हैं। जो किसी भी तरह की दासता में रहते हैं वे सारे हिंदू धर्मभ्रष्ट हैं और वे सारे मुसलमान भी धर्मभ्रष्ट हैं, फिर वे चाहे रोज हजार बार संध्या वंदन कर रहे हों या हजार बार नमाज पढ़ रहे हों। यह ध्यान में रखकर ही श्री समर्थ रामदास ने स्वराज्य प्राप्ति को धर्म का मुख्य कर्तव्य कहा है। जो राज्य अपनी इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक अपने पर थोपा गया है-ऐसे पर-राज्य को उखाड़ फेंकना, गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ देना और मनुष्य जाति की उन्नति का जो प्रथम साधन होता है, वह स्वराज्य प्राप्त करना, स्वतंत्रता प्राप्त करना धर्म का प्रधान कर्तव्य है, ऐसा प्राणनाथ प्रभु का छत्रसाल को किया गया या समर्थ का शिवाजी को दिया गया उपदेश दो शताब्दियों बाद हिंदुस्थान की पुण्यभूमि के पुरुषों के कान में ज्ञात या अज्ञात रूप से सन् १८५७ में फिर से गूंजने लगा।

हिंदुस्थान की पुण्यभूमि की स्वतंत्रता का हरण कर अंग्रेजों ने सभी धर्मों को तो अपने पैरों तले कुचला ही था, परंतु धर्म का सैद्धांतिक अपमान पूरा नहीं है ऐसा लगने पर ही शायद, इस हिंदुस्थान के पवित्र धर्म का व्यावहारिक अपमान करने के लिए वे बहुत आतुर थे। अफ्रीका और अमेरिका में वहाँ के निवासियों को ईसाई धर्म की दीक्षा देने के काम में मिली सफलता से बहके हुए पश्चिमवासियों को अफ्रीका की भाँति ही हिंदुस्थान में भी सारे लोगों को ईसाई बना डालने की भारी आशा थी। वेद और प्राचीन हिंदू धर्म तथा ईसाइयत की पीठ पर नृत्य करते इसलाम के जड़-मूल कितने गहरे हैं, इसका उन्हें जरा भी ज्ञान नहीं था। दर्शनशास्त्र, भक्तिप्रेम एवं नीति निपुणता में सारे जग का आदिगुरु आर्य धर्म आज तक कितनों के ही नामकरण और नामशेष देखता आया है, यह इन अल्प बुद्धिवालों को कैसे ज्ञात हो ! उन्हें आज पूरे हिंदुस्थान को ईसाई बनाने की रत्ती भर भी आशा शेष नहीं है-फिर भी सन् १८५७ तक उन्हें इस सफलता के संबंध में पूरा विश्वास था। औरंगजेब जैसे खुले द्वेष से भी भयानक गला काटनेवाला द्वेष करने और हिंदुस्थान को अनजाने ईसामय बना डालने का उनका दृढ़ उद्देश्य था। इतना ही नहीं अपितु इस हेतु उनके खुले प्रयास भी चल रहे थे। हिंदुस्थान में पाश्चात्य शिक्षा पद्धति प्रारंभ करनेवाला मैकाले अपने एक निजी पत्र में लिखता है, अपनी यह शिक्षा प्रणाली ऐसी ही बनी रही तो तीस वर्ष में पूरा बंगाल ईसाई हो जाएगा। [25] इस टिटहरी की ऐसी आशा और विश्वास था कि अपनी चोंच से मैं यह अगाध समुद्र देखते-देखते पी जाऊँगी। सारे हिंदुस्थान को ईसाई बना डालने के लिए हर अंग्रेज की कुछ-न-कुछ योजनाएँ अवश्य होती थीं। इस धर्म प्रवर्तन को प्रकटतः मदद करनेवाला हजारों मिशनरियों द्वारा किया जानेवाला निवेदन मानकर उसके अनुसार हिंदू और इसलाम धर्म की गरदन पर तलवार चलाने का कार्य भी अंग्रेजी सरकार द्वारा किया जाता था, परंतु उस राष्ट्र को धर्म प्रवर्तन की अपेक्षा व्यापार प्रवर्तन और यीशु की तुलना में द्रव्य भक्ति अधिक होने के कारण ऐसे खुले कार्य करके धर्म के लिए हिंदुस्थान का राज्य होने से निकलने देने कीगलती उसने नहीं की। इच्छा नहीं थी ऐसा नहीं, पर हिम्मत नहीं थी। फिर भी बड़े-बड़े नाम देकर और अपना मूल हेतु छिपाते हुए सती प्रथा प्रतिबंध, विधवा विवाह को समर्थन, दत्तक पुत्राधिकार की समाप्ति आदि अवसरों पर हिंदुस्थान की धर्म आस्थाओं में परिवर्तन करने का प्रयास उन्होंने प्रारंभ कर ही दिया था। मिशनरियों के तहत चलनेवाले स्कूलों को सरकारी पैसे की सहायता बिना रुके मिल रही थी। बड़े-बड़े आर्कबिशपों के वेतन-बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों द्वारा हिंदुस्थान की जनता को निचोड़कर जमा किए गए धन से दिए जाते थे। ये अधिकारी अपने अधीनस्थ लोगों को अपने पवित्र धर्म को त्यागकर ईसाई होने का उपदेश करते। सरकारी कागजों में हिंदुस्थान के लोगों का उल्लेख 'Heathen' शब्द से किया जाता। अंग्रेजी कर्मचारियों का अधिकतर समय आसमानी बाप का शुभ चरित सुनाने में ही जाता था।

सेना में जो अंग्रेज घुसते थे उनमें से कितने ही केवल अधिकार के बल पर भारतीय धर्म की खिल्ली उड़ाने के लिए ही घुसते थे। शांति काल में सेना के लोगों को कोई काम न होता था, अत: उस समय हिंदू और मुसलमान सिपाहियों को यीशू का चरित सुनाने को विपुल समय मिलने से लश्करी विभाग में यत्र-तत्र इन मिशनरी कर्नलों और सेनापतियों की आवाजाही बढ़ गई थी। जिस रामचंद्र के पवित्र नामोच्चार से हर हिंदू के हृदय में भक्तिभाव उमड़ पड़ता है और जिस मोहम्मद के नाम से सारे मुसलमानों के रग-रग से प्रेम झलक पड़ता है उस रामचंद्र के और उस मोहम्मद के नाम को वे पादरी कर्नल गालियाँ बकते। उठते-बैठते भारतीय सिपाहियों को अधिकार के जोर से चुप बैठाकर वे उनके सामने उनके प्राणप्रिय वेदों और कुरान की डटकर निंदा करते थे। इन मानवी राक्षसों का यह उद्योग किस तरह निरंतर चल रहा था और इस कार्य का उन्हें कितना अभिमान था, इसका स्वरूप स्पष्ट करने के लिए एक व्यक्ति से संबंधित उदाहरण देना आवश्यक है। सारे धर्मों का जनक आर्य धर्म तथा ईसाइयत की गरदन पर छुरी रखकर आगे बढ़ा हुआ मोहम्मदी धर्म, इन दोनों धर्मों को और उनके अनुयायियों को अपने टटपुंजिया शुभ चरित से ठगना चाहनेवाले इन पादरी सेनापतियों में से बंगाल पैदल रेजीमेंट का एक कमांडर बड़े घमंड से कहता है-"मैं गत बीस वर्षों से यह शुभ चरित का कार्य निरंतर कर रहा हूँ। इन काफिर लोगों की आत्मा को शैतान से बचाना एक फौजी कर्तव्य ही है।" हिंदुस्थान के धन पर मोटे हुए ये पादरी वीर एक हाथ में लश्करी आदेशों की पुस्तक और दूसरे हाथ में बाइबिल लेकर इस देश के सिपाहियों को धर्मच्युत करने का प्रयास दिन-रात करते रहते थे। इतना ही नहीं अपितु उस प्रयास में जल्दी सफलता मिले इसके लिए धर्मांतरण करनेवाले सिपाही को पदोन्नति का खुला वचन देते थे। सिपाही अपना धर्म छोड़े तो हवालदार हो जाता था और हवालदार-सूबेदार, मेजर। इस प्रकार सेना विभाग एक तरह से बलात् ईसाई बनाने का मिशन हो जाता था। हिंदुस्थान के धन से मुटाए हाथ और हिंदुस्थानी पैसे से खरीदी गई तलवार से हिंदुस्थानी धर्म को ही चोट पहुँचाने के अंग्रेजों के इस हेतु के विरुद्ध संशय उत्पन्न हुआ और उसमें हर रोज जुड़ती नई-नई घटनाओं के कारण सारे हिंदुस्थान को ईसाई बनाने की अंग्रेजी नीति सबको स्पष्ट दिखने लगी। अपने सनातन आर्य धर्म का व अपने प्राणप्रिय इसलाम धर्म का मीठी छुरी से गला काटा जा रहा है यह देखते ही हिंदू और मुसलमान क्रोधित हो उठे। फिरंगियों के असह्य अत्याचारों से उनके शरीर जलने लगे और धर्म रक्षा के लिए प्राण भी देने के लिए वे शपथ लेने लगे।

और इसी भड़कती आग में घी डालने को हिंदुस्थानी लश्कर में नए कारतूस उपयोग करने का आदेश आ गया। नए प्रकार की बंदूकों के लिए नए कारतूस काम में लाने की आवश्यकता पड़ जाने से इन कारतूसों का कारखाना हिंदुस्थान में लगाने का प्रस्ताव सरकार ने किया। यह प्रस्ताव यद्यपि सन् १८५७ के आरंभ में अमल में आया, फिर भी इन कारतूसों का प्रवेश पहले ही हो गया था। हिंदुस्थान के हिंदू और मुसलमानों की धर्मनिष्ठाओं को तुच्छ माननेवाली फिरंगी सरकार ने इंग्लैंड में तैयार गाय की चरबी लगे ये कारतूस सन् १८५३ में ही हिंदुस्थान में भेजे थे, ऐसा अब सिद्ध हो गया है। अंग्रेजों ने यह बात गुप्त रखकर कि उन कारतूसों में किसकी चरबी लगी है कानपुर, रंगून एवं फोर्ट विलियम की हिंदुस्थानी फौज के हिंदूमुसलमानों को सन् १८५३ में ही धर्मच्युत कर दिया था। यह विश्वासघात सन् १८५७ में खुलने तक कारतूसों को चाहे जो भी चरबी लगाने की अंग्रेजों ने जानबूझकर व्यवस्था की थी। यह बात अनुमान से नहीं कही गई है। क्योंकि सन् १८५३ के दिसंबर में कर्नल टक्कर द्वारा भेजी गई सरकारी रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है। [26] स्वयं कमांडर-इन-चीफ को यह बात ज्ञात थी। ऐसा होते हुए भी हिंदुस्थानी सिपाहियों को वे कारतूस देकर उनके पवित्र धर्म को भ्रष्ट करने का अधम कृत्य निरंतर चालू रखा गया था। अंग्रेजों के मन के इस विश्वासघात की कल्पना सन् १८५३ में भारतीय सिपाहियों को बिलकुल भी न थी, अत: उन्होंने इन कारतूसों का प्रयोग बिना किसी शंका के किया। इस तरह अपनी कपट भरी योजना सफल होते देख उन कारतूसों के निर्माण का कारखाना दमदम में चालू किया गया। इस कारखाने में तैयार किए गए कारतूसों को पहले जैसी ही चरबी लगाई जाती थी पर ऐसा करने में हिंदुस्थानी लोगों को धर्मच्युत करने का सरकार का हेतु नहीं था इसे कोई भी भूले नहीं! ऐसा उद्देश्य न होते हुए भी हमारा देश मिट्टी में मिल गया। ऐसा कोई उद्देश्य न होते हुए भी हमारा स्वराज्य चर-चर चीर दिया गया और ऐसा उद्देश्य न होते हुए भी हमारे धर्म का नाश हो रहा था। कमांडर-इन-चीफ को चरबी की बात मालूम होते हुए भी उसने क्योंकर हिंदुओं के मुँह में गाय का मांस एवं मुसलमानों के मुँह में सूअर का मांस ठुसा? इस एक व्यवहार में अंग्रेजी सरकार ने कितनी बार सफेद झूठ बोला, यह देखें तो रक्त की हर बूंद खौलने लगती है।

कारतूस को गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है, इस अफवाह पर सिपाहियों ने अंधविश्वास किया, ऐसा कहनेवाले निर्लज्ज लोग, दमदम कारखाने में जो ठेकेदार चरबी देता था उसका करार पत्र अवश्य देखें [27] जिससे इसका स्पष्ट उत्तर मिलेगा कि उन कारतूसों में गाय की चरबी का उपयोग किया जाता था या नहीं। [28] हिंदू लोग जिसे माँ मानते हैं उस गाय की चरबी की पूर्ति दो आने की एक पौंड की दर से की जाती थी और उस चरबी में सूअर की चरबी का अंश मिलाया जाता था, यह भी असंभव नहीं है। इन कारतूसों का हल्ला होते ही सन् १८५७ की २९ जनवरी को एक सरक्यूलर भेजा गया था। उसमें से सरकारी हुकूमत कहती है" नेटिव सिपाहियों के लिए बननेवाले कारतूसों को केवल बकरी या बकरे की चरबी लगाई जाए, सूअर या गाय की चरबी बिलकुल काम में न ली जाए।" जल्दबाजी में निकाले गए सरक्यूलर से यही सिद्ध होता है कि गाय या सूअर की चरबी न लगाने का इसके पहले नियम नहीं था। दमदम और मेरठ में इन कारतूसों के कारखाने थे। दमदम के कारखाने में काम करनेवाले एक मेहतर ने एक ब्राह्मण से उसके लोटे का पानी माँगा। ऐसा करने पर वह लोटा भ्रष्ट हो जाएगा, उस ब्राह्मण के ऐसा कहते ही वह मेहतर बोला-"अब सब ओर भ्रष्टता फैलेगी। जिन कारतूसों को तुम दाँत से तोड़ोगे उन कारतूसों पर गाय और सूअर की चरबी मढ़ी जा रही है।" यह सुनते ही वह ब्राह्मण दूसरे सिपाहियों को वह बात कहने लगा। दमदम में जल्दी ही सारे सिपाही संशयग्रस्त हो गए और उन्होंने पड़ताल की तो यह सत्य स्पष्ट हो गया कि कारतूसों को गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है। दमदम का यह समाचार आग की तरह सब ओर फैल गया। हर सिपाही को अपने हाथों में गाय और सूअर की चरबी लगी दिखने लगी। और हर लश्करी शिविर में ईसाई लोगों के इस षड्यंत्र से हर एक को अपने धर्म और अपने अस्तित्व का एक क्षण का भी भरोसा नहीं रहा। यह देखकर अंग्रेजी सरकार घबरा उठी और उसने अपना कुकृत्य छिपाने के लिए ऐसी झूठी और नीच बातें कहना शुरू किया जिससे कि मनुष्य जाति को कालिख पुती रहे। कारतूसों को गाय और सूअर की चरबी लगाई हुई थीं, यह जब अस्वीकार करना कठिन हो गया, तब हिंदुस्थानी सरकार के लश्करी सचिव बर्च ने सरकारी घोषणा की कि मेरठ और दमदम में तैयार होनेवाले नए कारतूस हमने अभी तक बिलकुल नहीं बाँटे हैं। उसका यह कथन बिलकुल झूठ था। अंबाला, सियालकोट और बंदूकों के प्रशिक्षण के लिए चलाए गए नए लश्करी वर्गों में ये चरबी लगे कारतूस सन् १८५६ से ही भेजे जा रहे थे। अंबाला डिपो में २२,५०० और सियालकोट को १४,००० कारतूस २३ अक्तूबर, १८५६ का भेजे गए, फिर भी कर्नल बर्च जनवरी १८५७ में सरकारी घोषणा करता है कि कारखाने से एक भी कारतूस नहीं भेजा गया। जहाँ लश्करी वर्ग चल रहे थे वहाँ नई बंदूकों के प्रशिक्षण में इन कारतूसों का उपयोग नहीं किया गया, यह असंभव था। इसके पहले लिखा जा चुका है कि सन् १८५३ में यही कारतूस भारतीय सिपाहियों को कोई जानकारी न देते हुए उपयोग के लिए दिए गए थे। गुरखा पलटन में तो ये कारतूस खुलेआम बाँटे गए थे। फिर भी बर्च किसी उस्ताद उचक्के जैसा सीना तानकर कहता है कि चरबी लगा एक भी कारतूस नहीं बाँटा गया था। [29]

भोले सिपाहियों को चाहे जैसी लुका-छिपी कर धोखे में रखना चाहनेवाली सरकार का यह प्रयास विफल हो जाने पर अब सिपाही को ऐसी अनुमति दी गई कि वे चाहे कोई भी चिपचिपी वस्तु अपने कारतूसों में स्वयं ही लगा लें। इस अनुमति का परिणाम जो होना था वही हुआ। सरकार द्वारा चरबी लगाने की जिद इतनी जल्दी छोड़ देने का अर्थ है कि एक तरफ चुप करके दूसरी ओर से छल करने की उसकी योजना होगी-ऐसा उनको पक्की तरह लगने लगा। चरबी की जगह पर चाहे कोई भी चिपचिपी वस्तु लगाने को कहा अवश्य गया, परंतु जिस सरकार ने चुपके से चरबी में गाय का और सूअर का मांस डाला था वह सरकार इन कारतूसों पर लगे कागज पर वैसा चिपचिपापन लाने के लिए ऐसा ही कोई धर्मबाह्य पदार्थ लगाने का प्रयास नहीं करेगी, इसको कैसे माना जाए? अत: ये कारतूस किसी भी मूल्य पर नहीं लेना है, यह दृढ़ निश्चय सब लोगों को करना चाहिए।

पर यह निश्चय हो गया तो भी इतने से मुख्य आपदा तो टलनेवाली नहीं है। बहुत हुआ तो ये कारतूस नहीं दिए जाएंगे। परंतु इनके स्थान पर कल कोई दूसरी आपदा आएगी। अर्थात् इन कारतूसों को न लेने से भी धर्म पर आई वास्तविक आपदा टलनेवाली नहीं है। गुलामी के नरक में गिरे लोगों का धर्म पवित्र कैसे रह सकता है ! गाय की चरबी तो क्या, देशमाता की चरबी काटकर निकाली जा रही है-इस बात को भुला देनेवालों का धर्म जीवित कैसे रह सकता है? सद्धर्म स्वर्ग में रहता है और गुलामी में पड़े लोग नरक में रहते हैं। अत: यदि उन्हें धर्म चाहिए तो उन्हें गुलामी की गंदगी अपने और अपने शत्रुओं के रक्त से धोकर साफ करनी चाहिए।

इसलिए अब कारतूस लें या न लें, हे हिंदुस्थान, धर्मरक्षण यदि आवश्यक हो, धर्म के उद्देश्य के लिए मानव का जो प्रगमन आवश्यक है उसे साधने का यदि तेरा हेतु हो और यदि अपमान पर तुझे लज्जा आती है, तो इस गुलामी को भंग करने को तैयार हो जा। धर्म के लिए मर, मरते-मरते सबको मार और मारते-मारते स्वराज्य प्राप्त कर। सन् १८५७ का वर्ष उदय हो चुका है, इसलिए उठ! हिंदुस्थान उठ! और स्वराज्य प्राप्त कर!

प्रकरण-७

गुप्त संगठन

जैसाकि पिछले अध्याय में वर्णन किया गया है, जब सारे हिंदुस्थान में क्रांति की सामग्री इधर-उधर तैयार हो रही थी तब उस सामग्री की यथोचित योजना कैसे तैयार की जाए और उसमें क्रांतियुद्ध का भवन किस तरह बनाया जाए, इसका नक्शा ब्रह्मावर्त में तैयार हो रहा था।

पूर्व प्रकरण में हमने अजीमुल्ला खान को यूरोप प्रवास पर छोड़ दिया था। उस प्रवास में जाने के पहले लंदन में उसी समय सातारा की गद्दी का झगड़ा सुलझाने हेतु रंगो बापूजी नामक एक चतुर और कर्मठ सज्जन गए हुए थे, उनसे अजीमुल्ला खान ने भेंट की। सातारा की गद्दी का प्रेत दहन करने आए हुए रंगो बापूजी और पेशवा की गद्दी का प्रेत दहन करने आए हुए अजीमुल्ला खान, इनकी उन दोनों इतिहास प्रसिद्ध गद्दियों के प्रेत संस्कार के समय क्या वार्ता हुई, अपने देश का सर्वनाश करनेवाले फिरंगियों की पिटाई करने के लिए उन्होंने कैसी शपथें ली और हिंदुस्थान में लौटकर सातारा में रंगो बापूजी ने और ब्रह्मावर्त में अजीमुल्ला खान ने प्रचंड युद्ध की रचना करने के लिए क्या-क्या मंत्रणा की, इतिहास कभी भी यह शब्दश: नहीं बता पाएगा, फिर भी सन् १८५७ का युद्ध हुआ यह जितना सत्य है-इस युद्ध की योजना लंदन में अजीमुल्ला खान और रंगो बापूजी ने बनाई थी, यह बात भी उतनी ही सत्य है। लंदन से रंगो बापूजी सीधे सातारा को लौट गए और उत्तर की ओर ब्रह्मावर्त में जिस भवन का निर्माण हो रहा था उस भवन के निर्माण की सामग्री जुटाने लगे। परंतु अजीमुल्ला खान सीधे हिंदुस्थान न आकर यूरोप में प्रवास करने लगे। उस समय क्रिमिया द्वीप में अंग्रेजों का रूस से घमासान शुरू था और रूसी भालुओं के पंजों तले ब्रिटिश शेर भी गाय बनता जा रहा था। अजीमुल्ला खान को यह समाचार ज्ञात होते ही उसके मन में घुमड़ते महान् कार्य को बल मिला। स्वदेश के सीने पर नाचते अंग्रेज शेर को रूस ने कहाँ तक घायल किया है, उसके कितने पंजे काटे हैं तथा शेष को काटने के लिए अपने प्रिय हिंदस्थान में होनेवाले प्रयासों में रूस की कितनी सहानुभूति या सहयोग प्राप्त करना संभव है, इसकी प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त करने अजीमुल्ला खान क्रिमिया द्वीप गए।

यूरोप के प्रवास से अजीमुल्ला खान के हिंदुस्थान लौटने के बाद ब्रह्मावर्त के राजभवन में निराला ही वातावरण बन गया। सारे हिंदुस्थान पर विजय-आनंद से लहरानेवाला पेशवाओं का वह ध्वज 'जरी पटका' आज तक उस राजभवन में धूल खाता पड़ा हुआ था। जिसके सुर सुनकर लाखों मराठी तलवारें रणांगण में शत्रु पर टूट पड़ती थीं, वह दुंदुभि उस राजभवन में वीर रस को त्याग करुण रस के सुर निकालने लगी थी। वह देशव्यापी राजमुद्रा भी, जिसके मुद्रण पर दिल्ली की घटनाएँ अवलंबित थीं, अपने स्वयं के वैधव्य पर सिक्का मारते पड़ी थी। परंतु अजीमुल्ला खान के यूरोप से लौटते ही ऐसा लगने लगा जैसे उन वस्तुओं को एक विलक्षण चैतन्य प्राप्त हुआ हो। धूल खाती हुई जरी पटके में फिर से चमक मारने लगी और श्रीमंत नाना साहब के उस तेजस्वी, चपल और उग्र नेत्रों में असह्य अपमान से उत्पन्न हुए प्रतिशोध से अधिक उग्रता एवं 'तस्मात् युद्धाय युज्यस्व' की चेतना से अधिक तेजस्विता आने लगी। तस्मात् युद्धाय युज्यस्व' क्योंकि स्वराज्य की होली हो चुकी है। तस्मात् युद्धाय युज्यस्व! क्योंकि स्वदेश में, इस अपने हिंदुस्थान में फिरंगी चोरों की बढ़त हुई है। तस्मात् युद्धाय युज्यस्वस्वधर्म को पैरों तले कुचला जा रहा है और स्वतंत्रता का हनन हो रहा है। तस्मात् युद्धाय युज्यस्व! स्वदेश स्वतंत्रता आज तक किसी को भी युद्ध के बिना प्राप्त नहीं हुई। छत्रपति को जिसके लिए ताना की बलि देनी पड़ी थी, वह स्वराज्य का सिंहगढ़ युद्ध के बिना कभी नहीं मिलेगा। धर्मरक्षा के लिए जो स्वराज्य संपादन नहीं करता वह महाराष्ट्र धर्म का असल मराठा नहीं और जो महाराष्ट्र धर्म का असल मराठा है वह, स्वराज्य संपादन का जो एकमात्र मार्ग है उस समर-मार्ग में कदने से कभी भी पीछे हटनेवाला नहीं। एतदर्थ युद्धाय युज्यस्व! श्री छत्रपति द्वारा प्रारंभ किए गए स्वतंत्रता यज्ञ के होता का कंकण बाँधने जो हाथ आगे आता है वह हमेशा ही धन्य है।

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं, जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् !

तस्मात् युद्धाय युज्यस्व!!

ऐसी दैवी चेतना श्रीमंत नाना साहब के नेत्रों को अधिक उग्रता और अधिक तेजस्विता देने लगी। श्री शिवराय को जो कर्तव्य निभाना पड़ा वही महान् कार्य अपने हिस्से में आया है इसलिए जय या पराजय जो भी मिले, मुझे तो स्वतंत्रता का नूतन 'शिवराज' या प्रथम पेशवा का मान बढ़ानेवाला अंतिम पेशवा बनना है उनके मन ने यह दृढ़ निश्चय किया।

अपने देश और स्वराज का भविष्य निश्‍चित करने का वीरोचित निर्णय हो जाने के बाद श्रीमंत नाना का एकमात्र लक्ष्य था उस निर्णय को कार्य-रूप देना। स्वराज्य प्राप्ति के लिए जो क्रांतियुद्ध लड़ना है उसे सफलता मिले, इसके लिए दो बातें अनिवार्य थीं। पहली बात हिंदुस्थान के समस्त लोगों में स्वतंत्रता की जंगी और अनिवार्य इच्छा उत्पन्न होना और फिर उस इच्छा की सिद्धि के लिए-एक ही समय में पूरे देश द्वारा विद्रोह करना; हिंदुस्थान के इतिहास को स्वतंत्रतागामी करना, ये दोनों ही काम विदेशियों को चकमा देकर ही किए जा सकते थे। क्योंकि जिस किसी परतंत्र देश के मन में स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने की इच्छा हो उस देश में उस संग्राम की तैयारी गुप्त रीति से ही करनी पड़ती है। अन्यथा आत्म में ही अमोघ शक्ति से हमला कर बलवान शत्रु उस प्रयास को चूर-चूर कर सकता है। यह ऐतिहासिक सत्य जानकर दोनों महान् विभूतियों श्रीमंत नाना साहब और अजीमुल्ला खान ने सन् १८५६ के प्रारंभ में स्वतंत्रता के लिए हिंदुस्थान को तन और मन से जाग्रत करने के लिए युद्ध संगठन बनाया।

हिंदुस्थान में जितने राजे-रजवाड़े हैं उन सभी में यदि अंग्रेजों के विरुद्ध उठने की इच्छा उत्पन्न हो गई तो एक क्षण में ही अपना देश अपने हाथ आ जाएगा। यह तथ्य नाना के ध्यान में पहले ही आ गया था। इन हिंदुस्थानी सिरचढ़े राजाओं से आगे-पीछे अंग्रेजी राज को धोखा होगा, यह जानकर ही अंग्रेजी सरकार एक के बाद दूसरी रियासत छीनती चली जा रही है, यह वास्तविक स्थिति सारे राजेरजवाड़ों के आगे रख उनके मन को स्वतंत्रतागामी करने के लिए नाना ने हर दरबार में अपना दूत भेजना प्रारंभ किया। कोल्हापुर, दक्षिण की सारी पटवर्धनी रियासतों, अयोध्या के जमींदारों और दिल्ली से मैसूर तक की सारी राजधानियों में नाना के दूत और उनके पत्र सारे हिंदुस्थान को स्वतंत्रता युद्ध के लिए उठने की चेतना देते हुए घूम रहे थे। अंग्रेजी सत्ता के नीचे स्वराज्य और स्वधर्म की कैसी छीछालेदर होती जा रही है, जो रियासतें आज जीवित हैं, वे भी कल किस तरह नामशेष होनेवाली हैं तथा अंग्रेजों की विश्वासघाती गुलामी में अपने प्राणप्रिय हिंदुस्थान की कैसी बरबादी हो रही है-यह सब स्पष्ट और मार्मिक रीति से जनता के मन में भरते हुए मौलवी, पंडित एवं राजनीतिक संन्यासी सारे हिंदुस्थान भर में गुप्त रीति से विचरने लगे। दासता और गुलामी के प्रति गुस्सा उत्पन्न करते हुए यह दास्य नामशेष करना कितना सुलभ है, हिंदुस्थान के हृदय में हिंदुस्थान की तलवार ही कैसे र्धेसाई जा रही है और हिंदस्थानी लोग स्वदेश के लिए मर मिटने के लिए तैयार हो जाएँ तो एक क्षण में उन्हें अपना देश फिरंगियों के चंगुल से मुक्त करना कितना सरल है यह सब राजा से रंक तक हर भारतीय हृदय को वे राजनीतिक संन्यासी भली प्रकार समझाकर कहते थे। हम सब देशबंधु एक हो जाएँगे तो मुट्ठी भर गोरों को धूल चटाकर स्वदेश को क्षण भर में स्वतंत्र कर सकते हैं, यह आत्मविश्वास हर सिपाही और हर नागरिक के मन में इन राजनीतिक संन्यासियों ने किस तरह उत्पन्न किया था, यह उस समय के देशभक्तों के उद्गार में पग-पग पर दिखता है। काली नदी की लड़ाई में हारे हुए अंग्रेजों ने प्रश्न किया कि 'हमारे विरुद्ध उठने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?' इस अक्खड़ प्रश्न के उत्तर में सिपाहियों ने कहा-"हिंदुस्थानी सिपाही एक हो गया तो गोरा चटनी के लिए भी नहीं मिलेगा।"

अंग्रेज सरकार ने सन् १८५७ के प्रारंभ में ही सिपाहियों की चिट्ठियाँ खोलनी शुरू कर दी थीं। उन पत्रों में से एक पत्र हिंदुस्थान के लोगों की शक्ति के संबंध में कहता है-"विदेशियों को हम ही सिर चढ़ाए हुए हैं ! यदि हम उठे तो फिरंगियों के मुट्ठी भर लोगों को तलवार के एक झटके में गारद कर सकते हैं। कलकत्ते से पेशावर तक मैदान साफ है।"

श्रीमंत नाना साहब के स्वयं के हस्ताक्षर के पत्रों ने और ब्रह्मावर्त से भेजे गए संन्यासियों ने ऐसी उदात्त आत्मनिष्ठा के बीज भारतीय मन में बो दिए। परंतु आज उपलब्ध जानकारी से ऐसा दिखता है कि अयोध्या का राज्य अधिग्रहीत होने तक इन बीजों में जोरदार अंकुर नहीं फूटे थे। [30]

सन १८५६ में अयोध्या का राज्य अधिग्रहीत होते ही अकस्मात् सब लोगों में परतंत्रता के प्रति घृणा उत्पन्न हुई। स्वतंत्रता का रम्य एवं पुण्य दर्शन श्रीमंत नाना की तीक्ष्ण दृष्टि को इसके पहले ही हो चुका था और गुलामी की गंदगी की दुर्गंध बडी दर से उन्हें आने लगी थी। परंतु जड़बुद्धि सामान्य जनसमूह प्रत्यक्ष साक्ष्य के बिना उसे ग्रहण न कर सका। फिर भी अयोध्या का राज्य अधिग्रहीत होते ही हर कोई अपने अस्तित्व को धिक्कारने लगा और गुलामी में सड़ने की अपेक्षा मरना भला, ऐसी गर्जना कर अपनी तलवारों पर पानी चढ़ाने लगा। इसी समय हिंदुस्थान की इतिहास प्रसिद्ध राजधानी को भी मानो नई चेतना मिल गई और दिल्ली के राजमहलों में स्वतंत्रता संग्राम की मंत्रणाएँ शुरू हो गईं। दिल्ली के बादशाह की बादशाही लेकर ही अंग्रेज नहीं रुके अपितु उनकी 'बादशाह' की शाब्दिक पदवी भी उनके बाद न चले, यह भी तय कर लिया। ऐसी विपन्नावस्था में अपना पूर्व वैभव प्राप्त करने हेतु एक बार अंतिम प्रयास करके देखें और मरना ही है तो बादशाही की शान से मरें-ऐसा विचार राजमहल में होने लगा। इस काम में प्रमुख इसलामी सत्ताओं की सहायता मिले इसलिए मैं सुन्नी पंथ छोड़कर अयोध्या के नवाब और ईरान के शाह का शिया पंथ स्वीकार करता हूँ, ऐसी घोषणा भी बादशाह ने की। इसी समय अंग्रेजों की ईरान से लड़ाई शुरू हुई। हिंदुस्थान में भी उसी समय विद्रोह होना अपने लिए लाभदायक है, यह देखकर ईरान के शाह ने सन् १८५६ में दिल्ली के बादशाह की सहायता करने का वचन लिख भेजा। इतना ही नहीं सन् १८५७ के प्रांरभ में दिल्ली की मसजिदों से इसी प्रकार की सार्वजनिक घोषणाएँ होने लगीं-"फिरंगियों के कब्जे से हिंदुस्थान को मुक्त करने ईरानी फौज जल्दी ही आ रही है इसलिए बूढ़े, जवान, छोटे-बड़े, सुशिक्षित-अशिक्षित, रैयत और लश्कर सारे लोग इन काफिर लोगों के शिकंजे से मुक्त होने के लिए रणांगण में कूद पड़ें।" [31]

इस घोषणापत्र को सारे भारतीय समाचारपत्रों ने प्रकाशित किया और दिल्ली के लोगों में क्रांतियुद्ध की लहर दौड़ गई। दिल्ली के बादशाह के सचिव मुकुंदलाल कहते हैं-"राज मंदिर के द्वार पर और महल में मुगल खुले मन से युद्ध की चर्चा करते रहते थे। सिपाही जल्दी ही विद्रोह कर राजमहल की ओर आएँगे और फिरंगियों का जुआ उतार फेंककर फिर से अपना राज्य स्थापित करेंगे ऐसी निश्चयपूर्वक बातें वे करते और अपना राज्य हो जाने पर अपने देश की सारी सत्ता एवं सारे अधिकार अपने ही हाथों में रहेंगे ऐसी आशा से सब लोग उत्साहित हो जाते।" इस लोक जागति को उत्तेजना देने के लिए शाहजादे और राजवंश अन्य पुरुषों ने अलग-अलग उपाय किए और दिल्ली में क्रांति की ज्वालाएँ सब ओर से सुलगने लगीं।

इस तरह दिल्ली के दीवाने-आम में और ब्रह्मावर्त के राजमंदिर में स्वतंत्रता संग्राम की गुप्त तैयारी हो रही थी। हिंदुस्थान की क्रांतिकारी शक्तियों को इकट्ठा और संगठित करने के लिए इन दो राजमहलों से जो प्रचंड प्रयास चल रहे थे वे इतने गुप्त रीति से किए जा रहे थे कि अंग्रेजों जैसे धूर्त लोगों को भी सन् १८५७ में तोपों की गड़गड़ाहट होने तक उसकी रत्ती भर भनक नहीं थी। हजारों रुपयों की तनख्वाह और हाथियों का पुरस्कार देकर इस राजनीतिक जिहाद का उपदेश करने के लिए बड़े-बड़े मौलवी भेजे गए। वे गाँवों और शहरों में इस राजनीतिक धर्मयुद्ध का उपदेश गुप्त सभाओं में देते हुए घूमते थे। सिपाहियों के शिविरों में रात को इनके व्याख्यान होते थे। लखनऊ की मसजिदों में मौलवी जिहाद शुरू करने संबंधी खुले भाषण किया करते। पटना और हैदराबाद में रात में सभाएँ होतीं और विभिन्न मौलवी सब स्तर के लोगों को स्वतंत्रता की रक्षा करने और स्वधर्म के लिए युद्ध करने की शिक्षा देते थे। जिनके पवित्र नाम से अपने हिंदुस्थान देश का इतिहास भूषित हुआ और जिनके पावन चरित्र का कथन आगे यथाप्रसंग किया जानेवाला है, उन देशभक्त मौलवी अहमदशाह को लखनऊ में हिंदू और मुसलमानों को फिरंगियों के विरुद्ध एक साथ विद्रोह करने का खुला उपदेश देने के कारण फाँसी का दंड दिया गया था।

उपरोक्त मौलवी की तरह ही सैकड़ों प्रचारक फकीरों और संन्यासियों का बाना धारण कर स्थान-स्थान पर गुप्त प्रचार करने लगे। भीख माँगने के बहाने हर घर में जाना सुलभ होने से और इस तरह शत्रु के मन में किसी तरह की आशंका उत्पन्न न होने के कारण ये देशभक्त फकीर और संन्यासी दर-दर घूमकर दासता के प्रति घृणा और भावी स्वतंत्रता की अभिलाषा लोक समूह में प्रदीप्त किया करते थे। विशेषत: सेना में इन लोगों का उपयोग बहुत था। क्योंकि हर टुकड़ी में एक पंडित और एक मुल्ला धार्मिक कार्यों के लिए रखना अनिवार्य होने से उस स्थान पर यही लोग जाकर बैठते थे। सिपाहियों के मन पर उनके धर्मगुरु का दबाव और प्रभाव होने से इन्हीं लोगों के द्वारा स्वतंत्रता के पवित्र धर्म की दीक्षा देना आवश्यक था। स्वतंत्रता के बिना धर्मरक्षण असंभव है, यह मर्म जानकर हजारों धर्मगुरु इस राजनीतिक जिहाद का आह्वान करने आगे आए। यह हिंदुस्थान के इतिहास के लिए हमेशा-हमेशा के लिए अभिमान की बात है। मेरठ में सन् १८५७ के अप्रैल माह में ऐसा ही एक देशभक्त फकीर वहाँ की सैनिक छावनी में आया। उसके पास हाथी-घोड़े आदि तथा अन्य सरंजाम भी था। वहाँ के सिपाहियों को राजनीतिक जिहाद की दीक्षा देने में वह मग्न था-परंतु अंग्रेज अधिकारियों को उसपर शंका हुई और उन्होंने उसे वहाँ से निकल जाने का आदेश दिया। यह आदेश होते ही फकीर वहाँ से तो निकल गया परंतु पास के ही एक गाँव में घुसकर फिर अपनी गुप्त रचना का कार्य करने लगा। [32] ऐसे कितने ही स्वतंत्रता के भक्त लोग अपनी जान हथेली पर लिये उस अपार रचना का गुप्त कार्य बड़े कौशल से कर रहे होंगे। परंतु वे थे कौन? कहाँ के? यह भी स्मृति आज जनता में नहीं रही-हाय हाय !!

जिस प्रकार मसजिद, मंदिर और भिक्षा के बहाने घर-घर में स्वतंत्रता की चेतना उत्पन्न करने मौलवी और पंडित, फकीर और संन्यासी भेजे गए वैसे ही विभिन्न स्थानों से अधिक महत्त्व के स्थान पर उपदेशकों और शिक्षकों को भेजा गया था। हिंदुस्थान में विभिन्न प्रदेशों के लोगों के एकत्रित होने के मुख्य स्थान बड़े-बड़े तीर्थ क्षेत्र हैं। ये क्षेत्र एक प्रकार से सारे प्रदेशों के लोगों के राष्ट्रीय सम्मेलन-स्थल ही हैं। मसजिदों में स्थानीय लोग ही आएँगे परंतु तीर्थों में भी राजकीय महंत नियुक्त किए गए और जल्दी ही गंगा के पुण्य स्नान के लिए आनेवाले हजारों बंधुओं को हिंदुस्थान के मन में मचल रहे स्वतंत्रता युद्ध में सम्मिलित होने का गुप्त उपदेश देते-देते पंडित लोग प्रत्येक तीर्थ में घूमने लगे। [33]

विराट् जनसमूह के मन में एक ही इच्छा उत्कटता से उत्पन्न करने और उसकी अक्षय मुद्रा उनके हृदय पर अंकित करने के लिए कविता जैसा उत्तम साधन नहीं है। मार्मिक शब्द और आकर्षक पद्धति से पद्य में गुंथा हुआ सत्य जनता के हृदय में बहुत तेजी से अंकुरित होता है। इसीलिए राष्ट्रगीत की महत्ता बहुत मानी जाती है। राष्ट्रगीत राष्ट्र के हृदय की भावना एक वाक्य में प्रकट कर सकते हैं। जब-जब किसी प्रबल भावना से राष्ट्रीय आत्मा छटपटाने लगती है तब-तब उससे निकले सहज बोल ही तो राष्ट्रगीत हो जाते हैं। फ्रांस की राष्ट्रीय आत्मा के बोल हैं-ला मार्सेलीज। सन् १८५७ में स्वधर्मरक्षण की उदात्त भावना से भारत भूमि की आत्मा फड़फड़ाते समय उसके मुख-मार्ग से ऐसा कोई राष्ट्रगीत निकला न होतो तो आश्चर्य ही होता। दिल्ली के बादशाह के एक निजी गवैया ने सारे हिंदुस्थान के कंठ से निनादित होनेवाले एक राष्ट्रगीत की रचना स्वयं की थी। [34] अपने पूर्वजों के पराक्रम का वर्णन करने के पश्चात् उस राष्ट्रगीत में वर्तमान की अवनति को करुण रस में चित्रित किया गया था। जो लोग एक दिन हिंदुस्थान के इस छोर से उस छोर तक विजयशाली वैधव से अभिषिक्त हुए थे उन्हीं लोगों को आज विश्व में गला कहलाने की बारी आए, उनका धर्म अनाथ हो जाए और उनके अभिषिक्त सिर विदेशियों के पैरों तले कुचले जाएँ-इस विपरीत और लज्जास्पद स्थिति के लिए उस राष्ट्रगीत में भारत माता आक्रोश कर रही थी। परंतु अब उसका यह आक्रोश हमें सुनाई देगा क्या? क्या अब वह सन् १८५७ का गीत हम फिर सुन सकेंगे? उस राष्‍ट्रगीत का प्रारूप यदि कोई खोजकर निकाले तो अपने इतिहास पर उसके अक्षय उपकार होंगे। तल तक इतिहास इतना ही कहता है कि अपनी धरती माता सन् १८५७ में आक्रोश कर रही थी और कानपुर के मैदान में कूदते समय नाना के कान में वही आक्रोश भयंकर रूप से गूंज रहा था।

विस्तीर्ण रचना के साधन भी विस्तीर्ण ही होते हैं। जर्जर हुई मातृभूमि को मदोन्मत्त अत्याचारों के हाथ से छुड़ाने जैसा कठिन कार्य करने के लिए पहली मूलभूत एवं महत्वपूर्ण कोई बात है तो वह है सब लोगों का मनःप्रवर्तन। वस्तुस्थिति में क्रांति करनी हो तो सबसे पहले मनःस्थिति पर विजय पानी चाहिए। यह मनः कोति संपादित करने के लिए मन की ओर जो भी रास्ते जाते हैं उन सारे रास्तों पर क्रांति की चौकियाँ स्थापित करनी चाहिए। मानव मन सहज ही उत्सवप्रिय होता है अतः सामान्य जनसमूह को वश में करने के लिए उत्सव के अतिरिक्त दूसरा राजमार्ग नहीं दिखता। इन उत्सवों को शक्कर में घोलकर सिद्धांतों की गोली दी जाए तो समाज का बालमन उसे रुचि से गटक लेता है और उससे रोग भी ठीक हो जाते हैं। ऐसे गहरे विचार से उस गुप्त संगठन के कार्य में विभिन्न चित्ताकर्षक उत्सवों से सामान्य जन को स्वतंत्रता युद्ध की शिक्षा देने की व्यवस्था की गई थी। विभिन्न प्रकार के चित्रों के खेल तैयार कर, स्वधर्म की और स्वतंत्रता की कैसी अवहेलना हुई है-इसका हबह नाटक उन चित्रों द्वारा प्रस्तुत कराया जाता था; और उस सारे अपमान, गुलामी और परतंत्रता का प्रतिशोध किस तरह लिया जाए इसके

(जिसको राज दरबार के संगीतज्ञ ने रचना की है,जिसमें बड़े ही मार्मिक शब्दों में उनकी जाति के पराभव और उनके उस प्राचीन धर्म की अवमानना का वर्णन उपलब्ध है जो कभी उत्तर की हिममालाओं से दक्षिणी राज्यों तक व्याप्त था;किंतु जो अब शैतानों और विदेशियों द्वारा पददलित किया जा रहा है।"-देवेलियन कृत-कानपुर । मेरे मत से-वृत्ति का अभिप्राय समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ संथकार को इतना लिखना ही पड़ा,यह उस राष्ट्रगीत की सुंदरता का परिचायक है।)

उददीपक और अनिवार्य चेतना देनेवाले चरित्र इन तारों से बँधी गड़ियों से दर्शाए जाते थे। चौपाल, पनघट, चौकी, धर्मशाला आदि बस्ती की खुली जगह में वीर रसोत्पादक गीत आदि गाकर लोगों को चेताया जाता था। उत्तर हिंदुस्थान का अति प्रिय गीत आल्हा, जिसे सुनने पर आठ दिन में कहीं-न-कहीं लड़ाई होनी ही चाहिए ऐसी धारणा है, वह वीर रस से भरा गीत गाते-गाते लोगों की बाँहें फड़कने लगीं। पूर्वजों के पराक्रम के स्मरण से जब उनका रक्त खौलने लगता तो तुरंत विषय घुमाकर वर्तमान दासता की पूरी बात प्रस्तुत की जाती, इसपर जो हर-हर महादेव की गर्जना न करे ऐसा कापुरुष कौन होगा?

राष्ट्रकार्य के लिए केवल उस राष्ट्र के पुरुषों की अनुमति होने से ही बात पूरी नहीं होती। इसके लिए तो पुरुषों को जन्म देनेवाली कोख में भी राष्ट्रक्षोभ के बीज अंकुरित होना आवश्यक है। भारतीय महिलाओं की शूरता कितनी सहायक होती है-यह सिखों का और राजपूतों का इतिहास अभिमानपूर्वक कहता है। भारतीय स्त्रियों की मन:सामर्थ्य संपादन हेतु इस गुप्त संगठन के कार्यक्रम में वैदू लोगों की महिलाओं को लगाया गया था। [35] इन वैदू महिलाओं की घरेलू दवाइयों एवं सामान्य ज्योतिष कार्य के लिए हिंदुस्थान के सामान्य वर्ग की महिलाओं में हमेशा आवाजाही होती है। अत: भारतीय स्त्रियों को ऐसी दवाई देने के लिए जिससे अपनी मातृभूमि का यह गुलामी का रोग ठीक हो और वह दवाई देने पर गुलामी का भूत माँ को कब छोड़ेगा और यह भूत-बाधा उतरते ही उसे स्वतंत्रता का सुंदर बालक कब उत्पन्न होगा, यह भविष्य बताने का कार्य ये वैदू महिलाएँ जितनी कुशलता से करती थीं उतना कोई धन्वंतरि भी नहीं कर सकता था। इन वैदू महिलाओं ने महिलाओं में और मौलवी तथा पंडितों ने पुरुष समाज में जिस तरह प्रचंड जागृति उत्पन्न कर दी, उसी तरह गाँव-गाँव घूमनेवाले तमाशेवालों ने भी इस राष्ट्रक्षोभ को बहुत बढ़ाया। ये तमाशगीर अपने खेलों में गुलामी से घृणा उत्पन्न करने का प्रयास करते थे। इस प्रकार हर तरह के और हर स्तर के लोगों में अंग्रेजी शासन पलट देने के लिए सन १८५७ के उस गुप्त संगठन के प्रचंड प्रयास चल रहे थे।

इस संगठन के गुप्त केंद्र अब सब स्थानों पर फैल गए थे। [36] इस गुप्त संगठन की जिस राजभवन में प्रथम प्राणप्रतिष्ठा हुई उस ब्रह्मावर्त में तो उसकी बढ़त जोरदार ही रही थी; परंतु श्री नाना के और अजीमुल्ला के पत्रों ने और उपदेशकों ने अब हजारों स्थानों पर उस रचना की शाखाएँ खोल दी थीं। ब्रह्मावर्त में नाना का निवास आगामी मंगल कार्य की तैयारी में जैसे जुटा दिखता था वैसी ही दिल्ली के महल में भी तैयारी की धूमधाम थी। इधर लखनऊ और आगरा में उस देशभक्त मौलवी अहमद शाह ने इस स्वतंत्रता संग्राम के जिहाद का प्रचंड केंद्र निर्माण किया था। पटना शहर में जिहाद के बीज इतने गहरे उतर गए कि वह सारा शहर जैसे किसी क्रांतिकारी दल का गढ़ बन गया। मौलवी, पंडित, जमींदार, किसान, व्यापारी, वकील, विद्यार्थी ऐसी सारी जातियाँ और सारे पंथ स्वधर्मार्थ और स्वदेशार्थ अपने प्राणदान करने की दीक्षा लेकर सज्जित हो गए थे और इस गुप्त रचना की अगुवाई करनेवालों में सबसे अग्रणी नेता एक पुस्तक विक्रेता था। कलकत्ता में तो स्वयं अयोध्या के भूतपूर्व नवाब और उनके मुख्य वजीर अली नक्की खान ठहरे हुए थे। उपरोक्त मुख्य वजीर ने सन् १८५७ की घटना में जितना धैर्य, चतुराई और साहस दिखाया उतना बहुत कम दिखा पाए होंगे। कलकत्ता में मुख्य काम-बैरकपुर, दमदम आदि स्थानों पर रह रहे सिपाहियों को राज्य क्रांति के लिए अनुकूल कर लेने का था। वह बहुत नाजुक काम अली नक्की खान ने इतनी सफाई से किया कि सन् १८५७ का वर्ष आते ही सारे सिपाही राष्ट्रकार्य में मिल जाने के लिए शिवजी का बेल-पत्र उठाकर या गंगाजल हाथ में लेकर या कुरान की कसम लेकर वचनबद्ध हो गए थे और अयोध्या के नवाब ने भी उन्हें उदारता का वचन दिया था। सिपाहियों के सारे ठिकानों पर रात को गुप्त बैठकें होती और वहाँ शपथ-विधि संपन्न होते ही दूसरे दिन उस रेजिमेंट का सूबेदार नवाब के यहाँ जाकर स्वतंत्रता संग्राम के लिए उनसे मिलने का वचन दे आता। इन सिपाहियों के मिलने के मुख्य स्थान मेरठ और बैरकपुर ही थे। उत्तर में जैसी संगठित और नियमित रचना थी वैसी ही दक्षिण में बनाने के लिए रंगो बापूजी प्रयासरत थे। पटवर्धनी रियासतों और कोल्हापुर के दरबार में क्रांतियुद्ध के लिए जाल बुना जा रहा था। अधिक क्या कहा जाए, परंतु ठेठ मद्रास तक इस क्रांतियज्ञ की ज्वालाएँ भड़कने लगी थीं। सन् १८५७ की जनवरी में निम्न घोषणापत्र प्रकाशित हुआ- "हे देशबंधुओ और धर्मनिष्ठो, उठो! काफिर अंग्रेजों को अपने देश से भगा देने के लिए सारे उठो! इन अंग्रेजों ने न्याय के सारे सिद्धांत मटियामेट कर दिए हैं। उन्होंने हमारा स्वराज्य लूट लिया है और स्वदेश को धूल में मिलाने का उनका दृढ़ निश्चय है। अंग्रेजों की इन भयानक यातनाओं से अपने हिंदुस्थान को मुक्त करने के लिए केवल एक ही उपाय शेष रह गया है और वह उपाय है तुमुल युद्ध करना। ऐसे युद्ध में जो रण-मैदान में खेत रहेंगे वे अपने देश के शहीद होंगे। जो स्वदेश एवं स्वधर्म के लिए लड़ेंगे और मरेंगे उन वीर्यवान शहीदों के लिए स्वर्ग के दरवाजे खुल रहे हैं और जो डरपोक और देशद्रोही अधम इस राष्ट्रकार्य से परावृत्त होंगे उनके लिए नरक के द्वार खुले होंगे! देशबंधुओ, इनमें से तुम क्या स्वीकार करोगे?" [37]

ऐसी स्थिति में सन् १८५७ का उदय हुआ और ऐसी सूचनाएँ आने लगीं कि हिंदुस्थान में यत्र-तत्र सांकेतिक महत्कार्य का मुहूर्त आ गया। इसी समय कारतसों का बखेड़ा खड़ा हुआ। हर एक सिपाही दिन में अपनी बंदूक को रगड़-रगड़कर साफ करता और रात होते ही अपनी रेजिमेंट के सूबेदार मेजर के बँगले पर आयोजित होनेवाली गुप्त बैठकों में जाकर स्वतंत्रता संग्राम के लिए शपथ लेने के लिए उत्सुक रहता। सिपाहियों के भिन्न-भिन्न रेजिमेंट परस्पर शपथ दिलाने के लिए भोज के कार्यक्रम आयोजित करते। इन भोजों के समय एक-दूसरे से योजना कही जाती और उन योजनाओं को फिर नाना साहब या अली नक्की खान को बताया जाता। कुछ रेजिमेटों में ऐसी क्रांति-घटना चलते हुए गलती या विश्वासघात से वह जानकारी सरकार के कानों तक गई तो एक-दो रेजिमेंटों को नि:शस्त्र कर दूर कर दिया गया। बहुत बढ़िया! ये सारे सिपाही स्वयंसेवक बनकर गाँव-गाँव जाते और क्रांतियुद्ध के जिहाद का उपदेश करते। सिपाहियों के सब ठिकानों से वचन-पत्र भेजे जाते पर वे सब सांकेतिक भाषा में लिखे होते। अंग्रेज ये पत्र डाकखाने से चुराकर खोलते थे। सातवीं अयोध्या रेजिमेंट का अड़तालिसवें रेजिमेंट को भेजा गया वचन-पत्र ऐसा था-"रेजिमेंट के हमारे भाई का मत हमें स्वीकार है। कारतूसों के बारे में उनके जैसा ही व्यवहार करेंगे और समय आने पर टूट पड़ेंगे।" [38] बैरकपुर से सियालकोट जैसे दूर देश भेजे गए पत्र पकड़े गए थे। उनमें एक में बैरकपुर के सिपाही सियालकोट के सिपाहियों को लिखते हैं-"भाइओ, शत्रुओं के विरुद्ध उठो!"

रूसी क्रांति की तरह ही हिंदुस्थान के क्रांतियुद्ध में भी पुलिसवाले जनता से बहुत सहानुभूति बरतते थे। क्रांति के गुप्त संगठन यंत्र का प्रचंड पहिया अब तीव्र गति से घूमने लगा था। ऐसे समय में विभिन्न पहियों की गति एक लय में घूमने लगे, ऐसा प्रयास आवश्यक था। इसी उद्देश्य से क्रांति पक्ष का एक दूत हाथ में रक्त कमल पुष्प लेकर बंगाल की सैनिक छावनी में प्रवेश करता और अपने हाथ का फूल पहली टुकड़ी के मुख्य भारतीय अधिकारी को देता। भारतीय अधिकारी उसे अपने निचले आदमी को देता। और इस तरह वह कमल हर सिपाही के हाथ से होकर अंतिम सिपाही तक और अंतिम सिपाही से फिर आए हुए उस क्रांतित के हाथ लौट आता। बस! इतना काफी था! इस तरह एक शब्द भी बोले बिना वह क्रांतिदूत तीर की तरह आगे बढ़ता और रास्ते में दूसरी टुकड़ी मिलते ही उसके मुखिया के हाथ में वह रक्त कमल दे देता। इस रीति से कँवल काव्य में पूर्ण हुआ संगठन क्रांति के एक ही रक्तमय विचार से भर जाता। यह रक्त कमल मानो क्रांति की अंतिम राजमुद्रा ही थी। इस रक्त कमल को स्पर्श करते ही सिपाहियों के मन में किन भावनाओं का उछाल आता इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। वस्तुतः किसी महान् वक्ता को अपने अतुल्य शब्दों से श्रोताओं में जो वीर वृत्ति जाग्रत कर पाना कठिन था उस वीर वृत्ति का संचार इन लड़ाके सैनिको में उस निर्वाक कमल पुष्प ने अपने रक्तिम वर्णीय संकेत से किया।

कमल पुष्प! शुचि, यश और प्रकाश का कविजनों का मान्य काव्य प्रतीक! और उसका वर्ण? रक्तोज्ज्वल!! उस पुष्प के स्पर्श मात्र से हृदय पुष्प विकसित हो उठे, इतना वह मृदुचेतन! सैकड़ों सिपाहियों द्वारा जब वह कमल पुष्प इस हाथ से उस हाथ में दिया गया होगा तब उस पुष्प के मूक वाक् संदेश से भी बहुत बड़े गूढार्थ एवं उदात्त ध्येय की स्फूर्ति संचरित हो जाती होगी, यह बात निश्‍चित है। इस रक्त कमल के कारण सबके हृदय सच में एक हो गए। क्योंकि बंगाल में सिपाही, और किसान दोनों ही एक ही बात बोलते हुए दिखाई देते कि 'सबकुछ लाल होगा।' और यह कहते हुए उनकी आँखों में कुछ ऐसी हलचल होती कि उनके उस बोल में कुछ गहरा अर्थ छिपा है यह बात तत्काल प्रतीत हो जाता। 'सबकुछ लाल होगा!' सब ओर अब लाल होना है। 1

उस रक्त कमल और उसके द्वारा संचरित भावना ने हर व्यक्ति के हृदय में एक ही ध्वनि का निर्माण किया था। सिपाही द्वारा सिपाही को लिखे पत्र भी इसी रीति से लिखे होते थे। परंतु इस संगठन के नेताओं के पत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते थे अत: उन्हें बहुत सावधानी से लिखा जाता। अधिकतर योजना एवं रचना प्रत्यक्ष व्यक्ति भेजकर ही निश्‍चित की जाती। परंतु पत्र भेजना ही हो तो अत्यंत अस्पष्ट भाषा में लिखे जाते थे। इतना ही नहीं अपितु ये अस्पष्ट पत्र पकड़े जाने पर कदाचित मुश्किल हो जाएगी इसलिए चतुर नेता लोग अपना सारा पत्राचार सांकेतिक भाषा में ही करते थे। कुछ बूंदों की और आँकड़ों की लिपि बनाकर उसका इस गुप्त संगठन में उपयोग किया जाता। [39]

परंतु इन संकेत चिह्नों और इन गुप्त पत्रों में भी जो राष्ट्रीय उद्बोध न दिया जा सका वह उद्बोध हिंदुस्थान की भविष्यवाणी ने दिया। भविष्य कथन मन के आगामी काल में होनेवाली कूद है। मन के दिव्यत्व पर भविष्य का दिव्यत्व अवलंबित होता है। सन् १८५७ में हिंदुस्थान का मन स्वतंत्रता के प्रकाश से दिव्य हो गया इसलिए सन् १८५७ में हिंदुस्थान के भविष्य कथन में अति महत्त्वपूर्ण और सन् १८५७ के इतिहास पर उसके कितने ही पृष्ठों पर मुद्रांकित हुआ वह भविष्य यह था कि कंपनी का राज ठीक सौ साल में समाप्त हो जाएगा। प्लासी की लड़ाई को सन् १८५७ में सौ वर्ष पूरे हो रहे थे। अत: इस वर्ष की जनवरी से एक विलक्षण आशा और एक विलक्षण चेतना पूरे देश के कण-कण में संचार कर रही थी। इस एक भविष्य कथन ने देखते-ही-देखते राष्ट्र में ऐसी आशा उछाल दी कि अंग्रेजी राज डूब जाएगा। इस भविष्य काल को वर्तमान काल में बदलने के लिए हर कोई सज्जित होने लगा।

सन् १८५७ के साल में अंग्रेजी राज डूबेगा इस भविष्य कथन द्वारा राष्ट्र विभूति को स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए पहले ही तैयार किया गया। वह इसीलिए कि रण-देवता से स्वतंत्रता का दान मिलते ही किसी तरह का आकस्मिक घोटाला न होने पाए; सिपाही, सेनापति, पटेल, जमींदार आदि अंग्रेजी शासन में जिस-जिस पद पर थे उसी पद पर रहकर स्वतंत्र राज्य की सेवा किसी तरह की गड़बड़ी न करते हुए करें, ऐसी योजना बनी थी। गुप्त संगठन के नेताओं ने कितनी कुशलता से सारे राष्ट्र को सूत्रबद्ध कर दिया था, इसे ध्यान से देखने पर मन धन्य हो जाता है।

जनक्षोभ को उत्तेजित करने रोज लखनऊ में उत्तेजक और क्रांतिकारी घोषणापत्र लगाए जाते। इन घोषणापत्रों में सारे भाई एक साथ उठे और हिंदुस्थान का राज्य वापस लें, ऐसा उपदेश अति उत्तेजक भाषा में दिया जाता। सुबह होते ही शहर के हर चौराहे पर इस अर्थ के नए घोषणापत्र और परचे लगे मिलते। ये बातें अंग्रेज अधिकारियों के कानों में पहले ही पड़ी होने पर भी उन्हें ये पत्र और परचे पढ़ने और उनके लेखकों को गाली देते हुए कुढ़ते रहने के सिवाय कुछ करते बनता नहीं था। क्योंकि पुलिसवाले कहते कि ये पत्र-परचे लिखता कौन है? चिपकाता कौन है? इसे खोज पाना कठिन है। कुछ ही दिनों में अंग्रेजों को ज्ञात हो गया कि ये पुलिसवाले ही क्रांति पक्ष के नेता थे। [40] गुलामी की सुरक्षा की अपेक्षा स्वतंत्रता की रक्षा करनेवाले पुलिसवाले रूस की राज्य क्रांति में ही दिखते हैं ऐसा नहीं, वे हिंदुस्थान की राज्य क्रांति में भी थे। उत्तरी हिंदुस्थान में जैसे यह गुप्त संगठन कुशलता से खड़ा हो गया था वैसे ही यदि दक्षिण में भी होता तो कैसी बहार आ जाती!

इस तरह इधर-उधर मन:प्रवर्तन की लहरें उठा देने के बाद श्री नाना साहब फिर सारे केंद्रों को भी सूत्रबद्ध कर डालने के लिए और मुख्य-मुख्य गुप्त संगठनों में एकवाक्यता लाने के लिए ब्रह्मावर्त से बाहर निकले। सन् १८५७ के अप्रैल में श्रीमंत अपने साथ अपने भाई बाबा साहब और अपने मंत्री अजीमुल्ला खान को लेकर दिल्ली की ओर गए। दिल्ली के वातावरण में उस समय नाना ने क्या मंत्र पढ़े और दिल्ली के दीवाने-आम में बादशाह से नाना ने क्या निजी बातें कीं इसकी स्मृति केवल उस वातावरण और दीवाने-आम को ही होगी! अंग्रेज लोगों में से मोर्लड नाम का अधिकारी आगरा में जज के पद पर था। वह उस समय नाना से मिलने गया था और उसका नाना द्वारा उत्तम स्वागत हुआ था, इस कारण अगले तीन माह बाद अंग्रेजों के कैसे स्वागत की तैयारी नाना कर रहे थे इसकी उसको हवा भी नहीं लगी। दिल्ली की सारी तैयारी देख और वहाँ के सारे काम जाँच, नाना लखनऊ चले गए। सन् १८५७ के गुप्त संगठन के केंद्रों में लखनऊ अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र था। १८ अप्रैल को नाना साहब लखनऊ की ओर चले। उसी दिन सुबह लखनऊ के चीफ कमिश्‍नर सर हेनरी लारेंस की बग्गी के पीछे दौड़ते हुए लोगों ने उसपर कीचड़ के लड्डू फेंके थे और जल्दी ही इससे अधिक प्रभावी लड्डू कैसे फेंके जाएँ, यह बताने के लिए नाना की सवारी वहाँ आई थी। फिर क्या? उस लखनऊ शहर के उत्साह और साहस की कोई सीमा नहीं रही। लखनऊ के प्रमुख रास्तों से नाना की जंगी शोभा यात्रा निकली और स्वतंत्रता के अपने इस भावी योद्धा को देखकर सारे क्रांतिकारियों में एक अनिवार्य चैतन्य उत्पन्न हुआ। नाना स्वयं सर हेनरी लारेंस के यहाँ गए थे और हम लखनऊ शहर देखने यहाँ आए हैं, ऐसा उससे कहा। लखनऊ शहर देखने का अर्थ क्या है, इसकी उस समय उस पगले को क्या कल्पना होती। नाना इसी माह कालपी शहर देखने भी गए। आगे स्वतंत्रता संग्राम में जिन्होंने अपने अतुल देशाभिमान और रण-कुशलता से पूरे जग को चकित किया उस जगदीशपुर के कुँवरसिंह से नाना की राजनीति चल रही थी और उधर के सारे आंदोलन का नक्शा भी इसी समय अंतिम आकार ले पाया था। इस रीति से दिल्ली, लखनऊ, कालपी, जगदीशपुर आदि स्थानों पर स्थित प्रमुख नेताओं से प्रत्यक्ष मिलकर और उनकी सलाह से भावी क्रांति का पक्का नक्शा बनाकर श्री नाना साहब अप्रैल के अंत में ब्रह्मावर्त लौट आए।

प्रमुख नेताओं से मिलकर बात पक्की करने नाना साहब जब इधर प्रवास कर रहे थे तब उधर सारे देश में भावी मंगल कार्य की सुपारी देने के लिए राज्य क्रांति के संदेशवाहक अपने कार्य में संलग्न थे। वे आज ही अवतरित हुए हैं ऐसा बिलकुल नहीं है। क्योंकि वेल्लोर के विद्रोह के पहले भी उधर ऐसी ही रोटियाँ भेजी गई थीं। सन् १८५७ के आरंभ में गुप्त पंखों के ये देवदूत सारे हिंदुस्थान में भावी मंगल कार्य का समाचार देते हुए भ्रमण करने लग गए थे। वे कहाँ से आए और किधर जाएँगे यह कोई भी नहीं जान पा रहा था। ये देवदूत जिसे समझ में आता उसीको मुख्य संदेश देते और जिसे ठीक न समझते उससे खूब बतियाते। इस विचित्र रोटी को कुछ पगले अंग्रेज अधिकारियों ने पकड़-पकड़कर उसका चूरा किया और फिर उस चूरे का भी चूरा बनाकर उससे कुछ कहलवाने के प्रयास किए परंतु किसी चुडैल की तरह उस चपाती को बोलने को कहते ही वह अपने मुँह की जीभ ही नष्ट कर देती; और जिससे मन होता उसीसे बोलती। वह रोटी गेहूँ या बाजरे के आटे की बनी होती थी। उसपर यद्यपि कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता था फिर भी वह हाथ में आते ही, उसका स्पर्श होते ही हर व्यक्ति की देह में क्रांतिचेतना संचार करने लगती। हर गाँव के मुखिया के पास वह रोटियाँ आतीं। वह स्वयं उसका एक टुकड़ा खाता और उसको प्रसाद के रूप में सारे गाँव में बाँट देता। फिर उतनी ही ताजा रोटियाँ बनवाकर वे गाँववाले पड़ोस के गाँव में भिजवा देते।

जा, हे क्रांति के देवदूत, ऐसे ही आगे जा। अपनी प्रिय माता, अपनी स्वतंत्रता के लिए जिहाद करने को तैयार हो गई है, यह शुभ वार्ता उसके बच्चों को सुनाने दसों दिशाओं में दौड़कर जा। तुम्हारी माँ पर संकट है अत: उसके बचाव के लिए दौड़! दौड़!! ऐसी कर्कश चिल्लाहट करते हुए आधी रात में भी न रुकते निरंतर दौड़ता रह! गढ़ और कोट के दरवाजे बंद हैं, तथापि उनके खुलने तक न रुकते वहाँ आकाश मार्ग से पहुँच जा।

घाटियाँ गहरी हैं, कगार टूटे हुए हैं, नदियाँ विराट हैं, वन भयानक हैं। परंतु इस कारण एक क्षण भी न सहमते हुए यह भयंकर राष्ट्रसंदेश लेकर तू तीर की गति से बढ़ता जा। तेरी गति पर हमारी इस माता का जीवन और मृत्यु अवलंबित है। इसलिए तेरे पंख जितनी काट सकें उतनी दूरी कम करते हुए पूरे वातावरण में उड़ान भरता जा। शत्रु ने तेरी देह के किसी अंग का भंग किया तो भी हे मायावी देवदूत, हमारे राष्ट्र के इस संकट समय में तू हजारों, लाखों देह धारण कर उस हर देह में जीभ लगाकर बढ़। पत्नी एवं पति, माता एवं बालक, बहन एवं भाई सबको स्वतंत्रता संग्राम की कार्य सिद्धि के लिए सपरिवार आने का निमंत्रण देना। कानपुर के देवता को बुलाना, शंख, भेरी, दुंदुभि, ध्वज, पताका, रणगीत, गर्जना, गड़गड़ाहट आदि सारे सगे-संबंधियों को इस युद्ध कार्य की इष्ट सिद्धि के लिए बुला लाना। कुल देवता, ग्राम देवता, एवं राष्ट्र देवता अपने-अपने अनुचरों सहित स्वातंत्र्य समर के मंगल समारोह के लिए सुसज्ज होकर उत्सुक हैं-उन सबसे कह- 'अति समयो वर्तते' सावधान!

सावधान, मित्रो! सावधान !! और अपनी ही अकड़ में उस हरे-भरे पर्वत पर शांति से लेटे शत्रुओ, अब सावधान ! यह पर्वत ऊपर से जितना हरा-भरा दिखता है उतना ही वह अंदर से भी हरा-भरा होगा इस विश्वास से [41] तुम इसके माथे पर लातें मार रहे हो क्या? मारो वैसे ही मारते जाओ लातें! जल्दी ही तुम्हें कालिदास के 'शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमास्ति तेजः' इस वचन की सच्चाई ज्ञात होगी। हे विश्व, यह हमारा तपोधन हिंदुस्थान शम-प्रधान है, यह सच है पर इसलिए तुम इसके इस शम-प्रधानत्व का अनुचित लाभ मत उठाना। क्योंकि इस तपोनिधि के शरीर में प्रदाहक, प्रचंड शक्तियाँ भी गूढता से भरी हुई हैं। शंकर के तीसरे नेत्र की कथा क्या तुमने कभी सुनी है? वह नेत्र जब तक खुला नहीं बहुत शांत रहता है। परंतु उसके खुलते ही पूरे विश्व को राख करने में सक्षम ज्वालाएँ उसी में से निकलती हैं। तूने कभी ज्वालामुखी को देखा है। वह ज्वालामुखी ऊपर से हरा-भरा रहता है पर यदि वह एक बार अपना जबड़ा खोलने लगे तो उसके उबलते अग्नि रस से दसों दिशाएँ जलने लगती हैं। परंतु इस सामान्य ज्वालामुखी से भी जाज्वल्यतर यह हिंदुस्थान का जीवित ज्वालामुखी अब खौलने लग गया है। उसके उदर के भयंकर अग्नि रस में लहरें उठने लगी हैं। उसके दाहक द्रव्य एक-दूसरे में मिल रहे हैं और उनपर स्वातंत्र्य प्रेम की चिनगारी गिर गई है। उसके मस्तक पर नाचनेवालो, एक क्षण और कि दिग्गजों के कान भी बधिर हो जाएँ ऐसी कड़कड़ाहट होनेवाली है; फिर मदांध जुल्म को यह ज्ञात होगा कि हिंदुस्थान के ज्वालामुखी का प्रतिशोध कैसा होता है।

१. अंग्रेज को हिंदूस्‍तान की मनोवृत्तियाँ इतनी ज्ञात थीं कि सत्‍तावन की फरवरी में अंग्रेजी पत्र एवं अंग्रेजी सरकारी रिपोर्ट कहती है-''संपूर्ण देश पूर्णरूपेण शांत है।''

- चार्ल्‍स बाल

भाग-२

विस्फोट

प्रकरण-१

शहीद मंगल पांडे

सन् १८५७ के क्रांतियुद्ध के इतिहास में एक आश्चर्यजनक बात थी उसकी परम गोपनीयता। पूरे युद्ध की रचना गुप्त रीति से हुई। सारे हिंदुस्थान भर में क्रांति रचना का दौर-दौरा चलते हुए भी अंग्रेजों जैसे धूर्त राज्यकर्ताओं को उस विद्रोह की इतनी कम जानकारी मिल पाई थी कि प्रत्यक्ष विद्रोह होने के एक वर्ष बीत जाने के बाद भी अंग्रेजों के अनेक अधिकारियों को विद्रोह का प्रमुख कारण कारतूस ही लगता था। कारतूस कितना निमित्त मात्र कारण था, यह अब कहीं जाकर अंग्रेजी इतिहासकारों को ज्ञात होने लगा है और सन् १८५७ के भयंकर युद्ध में स्वदेशाभिमान और स्वधर्माभिमान का पवित्र स्फुरण उन योद्धाओं में कैसे संचरित हुआ था यह स्पष्ट रीति से कुछ इतिहासकार डरते-डरते अब स्वीकार करते हैं। [42]

हिंदुस्थान जैसे विस्तीर्ण देश में राज्य क्रांति जैसे गंभीर काम को अंग्रेजी जैसे धूर्त अधिकारियों को हवा भी न लगने देते हुए इतनी गोपनीयता से संगठित करने का कार्य जिन्होंने किया उन श्रीमंत नाना साहब, मौलवी अहमद शाह, वजीर अली नक्की खान आदि नेताओं की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम है। सिपाही, पुलिस, जमींदार, राजस्व अधिकारी, किसान, व्यापारी, साहूकार आदि सारे वर्गों में और हिंदू और मुसलमान इन दोनों जातियों में अपूर्व दोस्ती और प्रचंड क्रांति के बीज बो दिए और वे बीज अंकुरित होते ही उन सबने उत्कृष्ट संगठन कर अंग्रेजों को उस प्रचंड हलचल की हवा भी लगने नहीं दी। यह गुप्त संगठन पूर्ण आकार ले पाए इससे पहले बंगाल में सरकार ने सिपाहियों पर नए कारतूस बलजोरी से लादना प्रारंभ कर दिया। पहले १९वीं पलटन पर प्रयोग किया जाएगा, ऐसा रंग दिखने लगा। बंगाल में फरवरी माह में सारी पलटनों की अपेक्षा ३४वीं पलटन राज्य क्रांति के लिए अति उत्सुक हो गई थी। इस ३४वीं पलटन का मुख्यालय बैरकपुर में होने से और वजीर अली नक्‍की खान उसके पास-कलकत्ता में होने से उन्होंने सारी पलटन को शपथपूर्वक राज्य क्रांति-कार्य से जोड़ लिया था। इस पलटन की कुछ टुकड़ियाँ १९वीं पटलन में भेजी गई थीं। इस कारण उन टुकड़ियों ने १९वीं पलटन को भी राष्ट्रकार्य में खींच लिया। परंतु परिस्थिति यह हो गई कि राज्य क्रांति की प्रचंड घटना की बिलकुल भनक न लगने, अंग्रेज अधिकारियों को उसकी कोई जानकारी न होने से, उन्होंने उस १९वीं पलटन पर ही कारतूसों का पहला प्रयोग किया। परंतु वे कारतूस लेने से वह पलटन खुले रूप से मुकर गई और समय आया तो शस्‍त्र उठाने तक का अपना निश्चय है, यह प्रकट किया। वह कृत्य देखते ही हमेशा की तरह अंग्रेजों ने 'नेटिवों' को धौंस पट्टी दिखाना चालू किया। परंतु अब वहाँ पहले के 'नेटिव' नहीं थे, यह बात उस पलटन में हो रही तलवारों की खनखनाहट से जल्दी ही गोरे अधिकारियों की समझ में आ गई। अब यह मानभंग चुपचाप पी जाने के सिवाय दूसरा रास्ता नहीं था। क्योंकि उस सारे प्रदेश में ऐसी एक भी पलटन नहीं थी जो इस नेटिव सेना को नियंत्रण में रख सके। यह बाधा दूर करने के लिए मार्च के प्रारंभ में ब्रह्मदेश में स्थित फिरंगी पलटन कलकत्ता लाई गई और १९वीं पलटन को नि:शस्त्र कर काम से हटाने का आदेश जारी हुआ। इस आदेश पर कार्यवाही बैरकपुर में की जाए, यह निश्‍चित किया गया।

(जिन कारतूसों की टोपी दाँत से तोड़ने पर अपने धर्म से ही हाथ धो बैठने का भय निर्माण कर बात का बतंगड़ बनाया गया था , हमसे युद्ध करते समय उन्हींको वे ही सिपाही हमपर चलाते समय किसी प्रकार के संकोच का प्रदर्शन नहीं करते थे।")

अपने बंधुओं को अपनी आँखों के सामने दंडित किया जाएगा, यह सुनकर भी शांत रहनेवाला-बैरकपुर नहीं था। वहाँ स्वतंत्रता की ज्योति हर तलवार में चमकने लग गई थी। परंतु इन सबसे अधिक मंगल पांडे की तलवार प्यान में अधीर हो रही थी। १९वीं पलटन की तरह ही ३८वीं पलटन को भी समय आते ही कंपनी की नौकरी को लात मारकर निकल जाने की इच्छा थी। इसलिए ११वीं पलटन की कंपनी अपने आप ही निकाल रही है, यह बहुत बढ़िया हो रहा है-ऐसा सार स्वदेशाभिमानियों को लग रहा था। सब ओर का एकमत होने तक एक माह रुका जाए, ऐसा चतुर नेता कह रहे थे और सारे हिंदुस्थान में अलग-अलग पलटनों में कौन सा दिन निश्‍चित किया जाए इसके लिए बैरकपुर से संकेत भाषा में पत्र भी भेजे गए थे। परंतु मंगल पांडे की तलवार को धीरज कौन बँधाए? मंगल पांडे ब्राह्मण कुल में जन्मा और क्षात्रधर्म में दीक्षित हट्टा-कट्टा जवान था। स्वधर्म पर प्राणों से अधिक निष्ठा रखनेवाला, आचरण से सदशीलवान, स्वभाव से तेजस्वी और आयु से तरुण, मंगल पांडे के पवित्र रक्त में देश-स्वातंत्र्य की विद्युत् चेतना प्रवेश कर गई थी। फिर उसकी तलवार कैसे धीरज रखे? शहीदों की तलवार को कभी धैर्य रहता है क्या? जय-पराजय की रत्ती भर भी परवाह न करते हुए अपनी तत्त्वनिष्ठा पर जो स्वयं के रक्त का अभिषेक करते हैं ऐसे ही लोगों के सिर पर बलिदानी मुकुट झिलमिलाता है और इस निष्फल-से लगते उखा रक्त से ही विजय की मूर्ति प्रकट हुआ करती है। अपने स्वदेश बंधुओं का अपनी आँखों के सामने अपमान हो यह बात मंगल पांडे के अंतरतम को असहा पीड़ा देने लगी और अपनी रेजिमेंट उसी दिन विद्रोह करे, वह ऐसा आग्रह करने लगा। गुप्त समिति के नेता आज विद्रोह करने को अनुमति नहीं दे रहे हैं ऐसा जात होते ही उस जवान का साहस रुकना दुष्कर हो गया। उसने लपककर अपनी बंदक उठाई और 'पर्ट हो वो उठो' ऐसी गर्जना करते हुए परेड मैदान में कूद पड़ा। "अरे अब पीछे क्यों रहते हो? भाइयो, आओ, टूट पड़ो। तुम्हें तुम्हारे धर्म की सौगंध है-चलो अपनी स्वतंत्रता के लिए शत्रु पर टूट पड़ो।" ऐसी गर्जना करते हुए वह अपने स्वदेश बंधुओं को अपने पीछे आने का आह्वान करने लगा। यह देखते ही सार्जेंट मेजर ह्यूसन ने सिपाहियों को मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश दिया। परंतु अंग्रेजों को आज तक मिले देशद्रोही सिपाही अब बचे नहीं थे। उस साजेंट का आदेश उसके मुँह से निकलने पर एक भी सिपाही मंगल पांडे को पकड़ने नहीं हिला। और इधर मंगल पांडे की बंदूक से सन्-सन् करके निकली गोली ने उस हा्सन का शव तत्काल भूमि पर पटक दिया। यह गडबड हो ही रही थी कि इतने में लेफ्टिनेंट बॉ भी वहाँ आ गया। इससे पहले कि उसका घोडा नाचते-नाचते आगे सरकता मगल पांडे की बंदूक से दूसरी गोली छूटी और वह उस घोड़े के पेट में घुसते ही घोडा लेफ्टिनेंट को लेकर धड़ाम से गिरा। मंगल पांडे को बंदूक भरने का अवसर मिले इसके पहले ही धूल में पड़े उस लेफ्टिनेंट ने अपनी पिस्तौल निकाल ली। यह देखते ही मंगल पांडे ने तिल भर भी डगमगाए बिना अपनी शमशीर निकाली। बॉ ने पिस्तौल चलाई पर गोली चूक गई और वह तलवार निकाले उसके पहले ही मंगल पांडे की तलवार का वार हुआ और बॉ मिट्टी सूंघने लगा। इतने में मंगल पांडे पर उस पहलेवाले गोरा को हमले की तैयारी में बढ़ता देख पास के एक सिपाही ने बंदूक के दस्ते से उसका सिर फोड़ दिया और सारे सिपाहियों ने गर्जना की-"मंगल पांडे को कोई हाथ न लगाए।" तभी कर्नल ह्वीलर वहाँ आया और मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश देने लगा। हम अपने आदरणीय ब्राह्मण के बाल को भी नहीं छुएँगे', फिर ऐसी गर्जना हुई और अंग्रेजों के गाढ़े लाल रक्त के उस दृश्य के आगे अधिक न रुकते हुए वह कर्नल जनरल के बँगले की ओर भाग गया। इधर मंगल पांडे अपने रक्तरंजित हाथ उठाकर-'मर्दो, बढ़ो!' ऐसी भयानक गर्जना करते हुए इधर-उधर घूम रहा था। जरनल हीर्से को यह समाचार मिलते ही वह कुछ और यूरोपियन लेकर मंगल पांडे की ओर दौड़ता आया। अब निश्‍चित ही शत्रु पकड़ लेगा, यह जान उस देशवीर मंगल पांडे ने फिरंगियों के हाथों पकड़े जाने की अपेक्षा मृत्यु को अपनाने का निश्चय किया और अपनी बंदूक अपने ही सीने की ओर कर ली और तत्काल उसकी पवित्र देह घायल होकर गिर गई। तुरंत उस घायल युवक को अस्पताल ले जाया गया; और उस एक सिपाही ने जो बहादुरी दिखाई उससे लज्जित होकर सारे अंग्रेज अधिकारी अपने-अपने तंबू में चले गए। यह सन् १८५७ के मार्च की २९ तारीख थी।

मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल कर जाँच-पड़ताल हुई। उस जाँच में वह अन्य षड्यंत्रकारियों के नाम बताए, इसके लिए बहुत प्रयास हुए। परंतु उस तेजस्वी युवक ने 'वह किसी के भी नाम बताने को तैयार नहीं है, 'यह उत्तर दिया। उसने यह भी बताया कि मैंने जिनपर गोलियां चलाईं उन अंग्रेज अधिकारियों से मेरा किसी तरह का व्यक्तिगत द्वेष नहीं था। यदि व्यक्तिगत द्वेष होता तो उनकी हत्या खून मानी जाती। मंगल पांडे का मंगल नाम शहीदों की सूची में न जाकर खूनी मनुष्यों की सूची में डालना पड़ता। परंतु मंगल पांडे का वह साहस सिद्धांतों के लिए था। स्वदेश और स्वधर्म की रक्षा के लिए-'सुख-दु:खे समे कृत्वा' मंगल पांडे की तलवार म्यान से बाहर निकली थी। स्वदेश और स्वधर्म का अपमान देखने से मृत्यु भली है-यह वज्र निश्चय करके ही वह बाहर निकला था। इस कार्य में जैसी उसकी स्वदेश भक्ति और स्वधर्म प्रीति दिखाई दी, वैसा ही उस युवा की तलवार का पानी भी दिखाई दिया। ऐसे युवा को फाँसी का दंड सुनाया गया। दिनांक ८ अप्रैल उसकी फाँसी के लिए तय हुआ। शहीदों के रक्त में क्या तेज होता है, यह तो ज्ञात नहीं परंतु उसके नाम-स्मरण से भी मन की उदात्त वृत्तियाँ खिलने लगती हैं। परंतु जिनकी दृष्टि को मंगल पांडे के प्रत्यक्ष दर्शन का लाभ हुआ था-बैरकपुर के ऐसे सारे नागरिकों के हृदय में उसके प्रति दिव्य प्रीति उत्पन्न हुई हो तो इसमें क्या आश्चर्य? उस सारे बैरकपुर शहर में मंगल पांडे को फाँसी देने के लिए एक भी जल्लाद नहीं मिला। अंत में उस अमंगल कार्य के लिए कलकत्ता से चार जल्लाद लाए गए। दिनांक ८ अप्रैल को सुबह मंगल पांडे को फाँसी-स्थल की ओर ले जाया गया। चारों ओर लश्करी लोगों का पहरा था। उनके बीच से मंगल पांडे गर्व से चलता चला गया और फाँसी पर चढ़ गया। 'मैं किसीके नाम नहीं बताऊँगा,' यह एक बार फिर से कहते ही उसके पैर के नीचे का सहारा निकाल लिया गया और मंगल पांडे की देह से उसकी पवित्र आत्मा स्वर्ग चली गई।

इस तरह सन् १८५७ के क्रांतियुद्ध की पहली भिडंत हुई और इस रीति से उस क्रांतियुद्ध का पहला शहीद स्वर्गवासी हो गया। जिसके रक्त से सन् १८५७ की शहादत की नदी का उद्गम हुआ उस देशवीर, धर्मवीर मंगल पांडे का नाम हर एक के कंठ एवं हृदय में अक्षय बना रहना चाहिए। सन् १८५७ में हिंदुस्थान के स्वतंत्रता बीज में अंकुर फोड़ने के लिए मंगल पांडे ने अपना उष्ण रक्त सबसे पहले अर्पित किया। उस स्वतंत्रता की फसल आगे-पीछे कभी लहलहा उठी तो उसके पहले नैवेद्य का अधिकारी मंगल पांडे है।

मंगल पांडे नहीं है पर उसका चैतन्य सारे हिंदुस्थान में फैला हुआ है और जिस सिद्धांत के लिए मंगल पांडे मरा वह सिद्धांत चिरंजीवी हो गया है। मंगल पांडे ने सन् १८५७ के क्रांतियुद्ध को अपना रक्त दिया, इतना ही नहीं अपितु उस क्रांति में जो-जो स्वदेश के और स्वधर्म के लिए लड़े उन सबको 'पांडे' उपाधि लगाने का प्रयत्न शुरू हो गया। [43] और इसीलिए यह नाम हर माता अपनी संतान को साभिमान बताने लगी।

प्रकरण-२

मेरठ

देशवीर मंगल पांडे के बलिदान से सन् १८५७ का बीज जमते ही उसे अंकुरित होने में देर क्यों हो? जिस १९वीं रेजिमेंट में मंगल पांडे था उस रेजिमेंट के सूबेदार को भी इस आरोप में फाँसी दी गई कि उसने रात में क्रांतिकारी बैठकें की और १९वीं रेजिमेंट व ३४वीं रेजिमेंट इन दोनों ने मिलकर पूरे प्रदेश में विद्रोह करने का गुप्त षड्यंत्र रचा-यह उनके पास मिले कागज-पत्रों से सिद्ध हो जाने पर उन्हें निःशस्त्र कर नौकरी से निकाल देने का दंड दिया गया। सरकार के हिसाब से वह दंड था; परंतु इन दोनों ही रेजिमेंट के सिपाहियों को यह अपना बड़ा सम्मान लग रहा था। जिस दिन उन्हें शस्त्र नीचे रखने का आदेश हुआ उस दिन यूरोपियन सेना को पूरी तरह तैयार रखा गया था। अंग्रेज अधिकारियों को विश्वास था कि नौकरी से निकाल देने के दंड से सिपाही पश्चात्ताप करेंगे, परंतु उन हजारों सिपाहियों ने किसी बहुत ही अपवित्र वस्तु की तरह कंपनी की दासता पर खुशी से लात मारी। अपने बूट और यूनिफॉर्म फाड़-फूड़कर फेंक दिए। उन सिपाहियों को अपने वेतन से सैनिक टोपियाँ लेनी पड़ती थीं। अत: उसे उनकी निजी संपत्ति मान कंपनी ने उन्हें छुट दी थी कि वे चाहें तो उसे ले जाएँ। परंतु नदी में नहाकर बाहर आने के बाद फिर से गुलामी का चिह्न सिर पर ढोना? अपनी भले ही हो, पर उसपर कंपनी की छाप तो है। खबरदार! किसीने उस दास्य चिह्न को स्पर्श किया तो। अब हिंदस्थान को कोई दूसरा आकर टोपी पहनाए वे दिन लद गए हैं। फेंक दो दासता की टोपियाँ। हजारों टोपियाँ आकाश में दिखने लगीं। परंतु गुरुत्वाकर्षण के जिद्दी स्वभाव के कारण वे फिर से हिंदुस्थान की भूमि पर ही गिरी। फिर से भू देवी को दासता की छूत लगी, दौड़ो सिपाहियो, उन दास्य चिह्नों को उन अंग्रेजी अधिकारियों के सामने फाड़कर और पैरों तले कुचलकर धूल में मिला दो। हजारों सिपाही उन टास्यदषित टोपियों को कुचलने लगे और बलहीन हुए अंग्रेज अधिकारी अपनी सत्ता का खुला अपमान करता यह भारतीय नृत्य देखते रहे। [44]

उत्तर प्रदेश के उच्च पुरबिया ब्राह्मण कुल में जनमे मंगल पांडे का रक्त केवल बंगाल में ही स्वतंत्रता के बीज नहीं जमा रहा था, उधर अंबाला में भी उसकी विद्युत् चेतना का संचार हो गया था। अंबाला अंग्रेजी सेना का अड्डा था और वहीं पर कंमाडर-इन-चीफ अॅन्सन रहता था। अंबाला में सिपाहियों ने एक नई पद्धति चालू की थी। वह था-यदि कोई अधिकारी उनके विरुद्ध जाए तो उसका घरबार जलाकर भस्म कर डालना। रोज रात को देशद्रोहियों और विदेशियों के घर जलने लगे। यह काम इस झटके से और गुप्त ढंग से होता मानो प्रत्यक्ष अग्नि नारायण ही क्रांति पक्ष की गुप्त समिति का सदस्य बन गया है। बहुत आग लगी और जो आग लगानेवाले को पकड़वा देगा उसको हजारों रुपयों के इनाम भी घोषित किए गए। पर एक आदमी भी सूचना न देता। अंत में परेशान होकर स्वयं कमांडर-इन-चीफ अॅन्सन, गवर्नर जनरल को लिखता है-

"It is really strange that the incendiaries should never be detected. Everyone is on the alert here, but still there is no clue to trace the offenders." फिर अप्रैल के अंत में वह लिखता है-"We have not been able to detect any of the incendiaries at Ambala. This appears to me extraordinary; but it shows how close the combinations among the miscreants who have recourse to this mode of revenging what they conceive to be their wrongs and how great the dread of retaliation to anyone who would dare to become an informer."

हिंदुस्थान के देशद्रोहियों पर तो अंग्रेजी साम्राज्य आधारित था! परंतु अंबाला में एक भी देशद्रोही न मिला। इससे स्वयं कमांडर-इन-चीफ गऊ बन गया और सिपाहियों के गुप्त षड्यंत्र की स्तुति करते हुए उनपर गुस्सा करता रहा तो इसमें आश्चर्य की बात क्या थी!

अब यह आग हिंदुस्थान में जगह-जगह प्रारंभ हो गई थी। अंतिम विशाल आग भड़काने के पहले इधर-उधर छोटी-बड़ी चिनगारियाँ उड़ना स्वाभाविक था। लखनऊ में नाना की यात्रा के बाद से बड़ी गड़बड़ शुरू हो गई थी। अंबाला की भाँति वहाँ भी अधिकारियों और देशद्रोहियों के घर सुलगने लगे थे। दिनांक ३१ मई को सारा हिंदुस्थान एक साथ सुलगा दिया जाए, जिससे इधर-उधर जान छिपाने का अवसर न पाकर परतंत्रता अंदर-ही-अंदर राख हो जाएगी, यह निर्धारित योजना लखनऊ की गुप्त समिति को यद्यपि मान्य थी, फिर भी वहाँ के तेजस्वी सिपाही बहादुरों को अपना गुस्सा दबाए रखना कठिन हो गया। उसमें भी हर रात की गुप्त सभाओं में चल रहे उद्दीपक भाषणों और जलनेवाले घरों के भयंकर दृश्यों से सिपाहियों को रुकना और अपने को रोकना कठिन हो गया। मई की तीन तारीख को ऐसे ही चार अटल सिपाही बहादुर बलपूर्वक लेफ्टिनेंट मेशम के तंबू में घुसे और बोले-"आपसे यद्यपि हमारा कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं है फिर भी चूँकि आप फिरंगी हैं इसलिए आपको मारना होगा।" [45]

राक्षस रूप में आए उन सिपाहियों को देखते ही भयभीत हुआ वह लेफ्टिनेंट उनसे घिघियाकर कहने लगा-"आप चाहें तो मुझे एक क्षण में मार सकते हैं, परंतु मुझ गरीब को मारने से आपको क्या मिलेगा? दूसरा कोई आएगा और मेरा काम करने लगेगा। अपराध मेरा न होकर इस राज्य व्यवस्था का है। फिर मुझे क्यों नहीं छोड़ते?" इन बातों से सिपाही बहादुर थोड़े होश में आए और सारी राज्य व्यवस्था को एकदम मारना चाहिए, यह मानकर लौट आए। पर यह बात अधिकारियों तक गई और तुरंत ही हेनरी लॉरेंस ने पलटन को धोखे से तोपखाने की मार में खड़ा करके निःशस्त्र कर दिया।

परंतु मेरठ की ओर तो दाँव इससे भी अधिक रंगत पकड़ रहा था। कारतूसों के संबंध में सिपाही वास्तविक शिकायत करते हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए एक कुटिल चाल कुछ अंग्रेजों ने सोची और उन्होंने दिनांक ६ मई को घुड़सवारों की एक टुकड़ी को वे कारतूस देने का निश्चय किया। उस परेड में आए नब्बे सिपाहियों में से पूरे पाँच ने भी उन कारतूसों को नहीं छुआ। परंतु वे कारतूस फिर से दिए गए। फिर से सिपाहियों ने उन्हें स्पर्श करने से मना किया और वे अपने-अपने स्थान पर चले गए। उनका यह आचरण जनरल के कानों तक जाते ही उसने कोर्ट मार्शल के सामने उन सारे सिपाहियों को खड़ा कर पचासी घुड़सवारों को आठ से दस वर्ष तक सश्रम कारावास का दंड दिया।

मई की ९ तारीख को एक हृदयद्रावक घटना घटी। यूरोपियन कंपनी और तोपखाने की मार के पहरे में ऊँचाई पर पचासी सिपाहियों को खड़ा किया गया। शेष नेटिव सिपाहियों को यह तमाशा देखने को जान-बूझकर बुलाया गया और फिर उन पचासी देशभक्त सैनिकों को अपने कपड़े उतारने का आदेश दिया गया। उनके हाथ के शस्त्र छीनकर, उनके शरीर से कपड़े उतरवाकर भारी-भारी लोहे की बेडियाँ उनके पैरों और हाथों में ठोंक दी गईं। शत्रु की छाती में घुसनेवाली तलवार के सिवाय जिनके हाथों में अन्य कुछ भी न पड़ा था अपने उन मर्द स्वदेश बंधुओं के हाथ में आज फिरंगियों ने लोहे की बेड़ियाँ ठोंक दीं, यह देखकर सारे भारतीय सिपाहियों के शरीर थर्रा उठे। पर सामने ही खड़ी तोपों को देखकर हर तलवार म्यान में ही फडफडाती रही। फिर उन पचासी शर सिपाहियों को तुम्हें दस वर्ष के कठोर कारावास का दंड दिया गया है-यह सुनाया गया और हाथ-पैर की भारीभारी बेडियों के बोझ तले झके वे धर्मवीर कारावास की ओर चल दिए। उस समय अपने धर्म की रक्षा के लिए कारावास में जा रहे उन सिपाहियों को स्वदेश बंधुओं ने कैसे नेत्र संकेत किए, यह भविष्य शीघ्र ही कहेगा। गाय और सूअर के रक्त से बने कारतूस अपने पर जबरन लादे जाएँ और उसे कोई रोके तो उसे दस वर्ष के कठोर कारावास का दंड भुगतना पड़े, ऐसा भयंकर अपराध जिस दासता में होता है, उस फिरंगी दासता का हम टेटुवा दबाएँगे और दस वर्ष के लिए तुम्हें पहनाई गई बेड़ियाँ और सौ वर्षों से अपनी मातृभूमि के पैरों में पड़ी गुलामी की बेड़ियाँ-इन दोनों को जल्दी ही तोड़ देंगे। यह उन नेत्र संकेतों का अर्थ हो सकता है।

यह घटना प्रात:काल की थी। प्रिय देशबंधुओं को अपनी आँखों के सामने परदेसी और परधर्मी लोग बेड़ियाँ डालकर कारावास में डालें और उस दृश्य को खुली आँखों से देखें, इसका दुःख झेलते, मन-ही-मन जलते सिपाहियों का अपनीअपनी बैरकों में लौटते ही धीरज टूटने लगा। शहर के बाजार में वे गए तो वहाँ की महिलाएँ उनका तिरस्कार कर कहने लगीं-"तुम्हारे बाप कारावास में भेजे गए हैं और तुम यहाँ मक्खियाँ मारते फिर रहे हो। थू तुम्हारी जिंदगी पर !! [46] पहले ही गुस्से से पगलाए सिपाहियों को यह कैसे सहन होता कि रास्ते में औरतें उनके जीवन पर थूकें? उस दिन रात में सारी लाईन पर सिपाहियों की गुप्त बैठकें होती रहीं। क्या अब भी मई की ३१ तारीख तक रुकना है? इधर अपने भाइयों के कारावास में पड़े होते हुए हम नामों की तरह चुप होकर बैठें! रास्ते में औरतें-बच्चे अपने पर देशद्रोही कहकर थूकने लगें, फिर भी दूसरों की राह देखते चुप बैठना? ३१ मई की तारीख अभी कितनी दूर है। तब तक उन फिरंगियों के झंडे तले रहना? नहीं-नहीं; कल ही रविवार है, इस रविवार का सूर्य नारायण अस्तमान होने के पहले कारावास के उन देशवीरों की बेड़ियाँ टूट ही जानी चाहिए। स्वदेश जननी की बेड़ियाँ टूटनी ही चाहिए और स्वतंत्रता का झंडा लहराना ही चाहिए। तत्काल दिल्ली संदेश भेजे गए-"हम तारीख ११ या १२ को वहाँ आ रहे हैं; सारी तैयारी करके रखो।" [47]

१० मई का रवि उदय हुआ। सन् १८५७ की गुप्त तैयारी की अंग्रेजों को इतनी कम जानकारी थी कि मेरठ के सिपाहियों की दूसरों से तो क्या आपस में भी कुछ सामान्य योजना बन रही है, इसकी भी उनको आशंका नहीं हुई। रविवार की सुबह उनका नित्यकर्म शांति से शुरू हुआ। घोड़े की गाड़ियाँ, शीत उपचार, सुगंधित फूल, हवाखोरी, गाना-बजाना सारी बातें हमेशा की तरह चालू हो गईं। साहबों के घर के नेटिव नौकर अकस्मात् नौकरी पर नहीं आए, इसका भी उन्हें कोई अधिक आश्चर्य नहीं हुआ।

इधर सिपाहियों के बीच बहस चल रही थी कि पूरा कत्लेआम करना है या नहीं। २०वीं पलटन और तीसरी घुड़सवार पलटन के सिपाही बोले-"चर्च में फिरंगियों के जाते ही हर-हर महादेव बोलो। और लश्करी और मुलुकी, सैनिक और नागरिक, बच्चे-औरतें, मर्द जो मिले उसे काटते दिल्ली चलो!" यही अंत में तय हुआ।

इधर मेरठ में पास-पड़ोस के गाँवों से भी टूटे-टाटे शस्त्र हाथ में लिये हजारों लोग आकर मिल रहे थे। स्वदेश कार्य के लिए आए उन ग्रामीणों की तरह मेरठ के नागरिक भी सज्जित होने लगे। फिर भी अंग्रेजों को तिनके भर जानकारी नहीं थी।

रविवार की शाम के पाँच बजे चर्च का घंटा उस शांत वातावरण में हलके-हलके बजने लगा और अंग्रेज लोग अपनी-अपनी पत्नियों सहित हँसते-खेलते चर्च की ओर जाने लगे। परंतु उस दिन का चर्च का घंटा अंग्रेजों के लिए प्रार्थना नहीं बजा रहा था-वह तो उनकी मृत्यु वेला बजा रहा था। क्योंकि उधर सिपाहियों की लाइन में एक ही गर्जना उठ रही थी-'मारो फिरंगी को'। इस ध्वनि से सारा वातावरण भर गया।

सबसे पहले कारावास में पड़े धर्मवीरों की बेड़ियाँ तोड़ने सैकड़ों घुड़सवार उधर गए। उस कारावास के रक्षक भी क्रांति पक्ष के ही थे, अत: 'मारो फिरंगी को' की रण-ध्वनि सुनते ही वे कारागृह छोड़कर अपने साथियों से मिल गए। दूसरे ही क्षण उस अभागे कारागृह की दीवारें ढहने लगीं। दस वर्ष कठोर कारावास भोगने के लिए फिरंगियों द्वारा पहनाई गई बेड़ियाँ थर-थर काँपने लगीं। एक देशाभिमानी लूहार आगे आया और उसने जल्द ही उन बेड़ियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। प्रचंड वीर गर्जना करते वे कारावास भोग रहे धर्मवीर बाहर आए, घोड़ों पर चढे और अपनी मक्ति के लिए आए देशबंधुओं के साथ उस कारावास को पीछे छोड़ चर्च की ओर पूरे जोश से दौड़े। इधर पैदल टुकड़ी ने दंगा शुरू कर दिया। ग्यारह पलटनों का कर्नल फिनीस अपने घोड़े पर बैठ यँ ही उधर आया था। सिपाहियों के सामने खडा होकर हमेशा की अकड के साथ उन्हें डॉटने-डपटने लगा तो सिपाही उसका काल बन उसपर दौड पडे। २०वीं पलटन के एक सिपाही ने अपनी पिस्तौल उसपर चलाई और वह कर्नल अपने घोड़े के साथ भूमि पर गिर गया। पैदल और घुड़सवार, हिंदू और मुसलमान सारे-के-सारे गोरे रक्त के लिए इतने बेचैन हो गए थे कि यह फिनीस का रक्त तो दरिया में खसखस थी। मेरठ के बाजार में यह समाचार पहुँचते ही वह पूरा शहर जलने लगा और जहाँ-जहाँ भी अंग्रेज मिला वहाँ-वहाँ उसे गारद किया गया। सदर बाजार के सारे लोग हाथ में तलवारें, भाले, लाठियाँ, छुरियाँ-जो जिसके हाथ में लगा वह शस्त्र लेकर गली-गली में दौड़ने लगे। जिस किसी भवन पर अंग्रेजी सत्ता के चिह्न थे वे सारे भवन, बँगले, कार्यालय सब आग में जलने लगे। आकाश में धुएँ के बादल, अग्नि की रंग-बिरंगी ज्वालाएँ, हजारों लोगों के हल्ले-गुल्ले की मिली-जुली आवाजें, और सबसे ऊँची आवाजमारो फिरंगी को-से मेरठ का आकाश भयानक हो उठा। विद्रोह प्रारंभ होते ही पूर्व संकेतों के अनुसार मेरठ से दिल्ली की ओर जानेवाली तार तोड़ डाली गई और उस रास्ते पर अपना कड़ा पहरा बैठा दिया। वह अँधियारी रात होने से अंग्रेजों की बड़ी आफत हुई। कोई तबेले में छुपा तो कोई सारी रात पेड़ के नीचे बैठा रहा-कोई घर की तीसरी मंजिल पर तो कोई जमीन के गड्ढे में। किसीने किसान का वेश बनाया तो कोई बटलर के पाँव पकड़े रहा। विद्रोही सिपाही अँधियारा होते ही दिल्ली की ओर कूच करने लगे थे, परंतु उनके प्रतिशोध का अधूरा काम मेरठ के लोगों ने स्वयं ही पूरा किया। अंग्रेजों के लिए इतना गुस्सा उत्पन्न हुआ था कि अंग्रेजों के स्पर्श होने से जो घर जलाने लायक हो गए थे पर पत्थर के होने से जलाए नहीं जा सकते थे, उन्हे चूर-चूर कर दिया गया। वहाँ के कमिश्नर ग्रीदेड के बँगले को आग लगा दी गई, फिर भी वह अंदर ही छिपा बैठा रहा। यह बात बाहर ज्ञात हुई तो मेरठ के लोग सशस्त्र होकर कर्कश गर्जना करते इकट्ठा हो गए। तब वह कमिश्नर अपने बटलर के पाँव पड़ने लगा और पैरों के नीचे फैली आग और चारों ओर शत्रुओं का घेराव, मृत्यु के ऐसे जबड़े से अपने परिवार को बचाने के लिए उसकी चिरौरी करने लगा। वह बटलर उसपर द्रवित हो गया और क्रांतिकारियों से बोला, "कमिश्नर घर में नहीं है" और जहाँ वह छिपा था उसकी विपरीत दिशा में चलने का आग्रह करते हुए उन्हें दूर तक ले गया। इतने में वह कमिश्‍नर गिरते घर से भाग गया। मिसेज चेंबर्स के बँगले में विद्रोहियों ने उसे छुरा भोंककर, खींच-घसीटकर फेंक दिया। कैप्टन क्रेजी ने अपनी पत्नी और बच्चों का गोरा रंग छिपाने के लिए उन्हें घोड़े की जीन पहनने को दी और उन्हें काले रंग से रँगकर एक मंदिर के खंडहर में रात भर छिपाके रखा। डॉक्टर ख्रिस्टे और व्हेटरनरी सर्जन फिलिप्स को पत्थरों से कुचलकर मारा गया। लेफ्टिनेंट टेंपलर का कचूमर निकालकर फेंक दिया गया। कैप्टन टेलर मैकडोनल, लेफ्टिनेंट हेंडरसन और लेफ्टिनेंट पेंट का पीछा कर उन्हें गारद कर दिया गया। घरों में आग लगाने से कितने ही औरत-बच्चे जल मरे। जैसे-जैसे अंग्रेजी रक्त अधिकाधिक गिरता गया वैसे-वैसे विद्रोहियों की कर्कश गर्जना और भयानक अट्टहास का उत्साह बढ़ने लगा। रास्तों में पड़े अंग्रेजों के शवों को लोग लतियाने लगे। बीच में किसी विद्रोही को गोरे लोगों पर वार करते किंचित् दया आ जाती तो अन्य हजारों लोग 'मारो फिरंगी को' कहते-चिल्लाते-दौड़ते आते और कारावास में डाले गए उन पचासी निरपराध धर्मवीरों में से एकाध वहाँ होता तो उसके हाथ पर चढ़ाई गई फिरंगी बेड़ी के निशान की ओर अँगुली दिखाकर'इसका प्रतिशोध लेना है' कहते हुए वार-पर-वार करने लगते। [48]

वास्तविकता यह थी कि यदि कहीं पहले विद्रोह खड़ा होने की संभावना नहीं थी तो वह मेरठ मे; क्योंकि वहाँ नेटिव सिपाहियों की दो पैदल रेजिमेंट और एक घुड़सवार रेजिमेंट थी। परंतु गोरे सिपाहियों की एक पूरी रायफलमेंस बटालियन और एक ड्रॅगून रेजिमेंट के साथ एक उत्तम तोपखाना उनके पास था। ऐसी स्थिति में सिपाहियों को सफलता मिलने की संभावना बिलकुल नहीं थी। विद्रोह होते ही वहाँ अंग्रेजों से प्रतिशोध लेने का कार्य मेरठ शहर को सौंपकर विद्रोही सिपाही तत्काल इसी उद्देश्य से दिल्ली की ओर जा रहे थे। उनका पीछा कर उन्हें रोकना और पूर्ण नाश करने का काम भी बड़ा सरल था। पर अंग्रेजी सेना और उनके अधिकारियों में उस समय जो भीरुता, अव्यवस्था और चिंता दिखाई दी उसपर तो अंग्रेज इतिहासकारों को भी बहुत लज्जा आती है। नेटिव घुड़सवारों का कर्नल स्मिथ, उसकी पलटन विद्रोह कर गई है, यह ज्ञात होते ही उधर देखे बिना भाग खडा हआ। तोपखाने का अधिकारी तैयार होकर कुछ करे इससे पहले सिपाही दिल्ली की ओर चल पड़े थे। उसमें भी आगे न बढ़ते हुए अंग्रेजी सेना घबड़ाई सी जगह-जगह सारी रात पड़ी रही। वास्तविकता यह है कि मेरठ के विद्रोह से अंग्रेजों का बड़ा नुकसान हुआ। यह अभूतपूर्व और अकस्मात् घटित प्रचंड घटना क्या है, इसका दूसरे दिन तक उन्हें कुछ पता न चला। इधर सिपाहियों ने नक्शा अच्छी तरह बनाया हुआ था। विद्रोह करते ही कारागार से बंदियों को छुड़ाना और बाद में अंग्रेजी रक्त की बरसात करना। इस अकस्मात् हमले से अंग्रेज लोग बुरी तरह घबड़ा उठे। उस एक झटके में मेरठ शहर ने विद्रोह करके सब ओर आग लगाकर एवं चारों ओर से मार-पीटकर अंग्रेजों के लिए यह पता कर पाना असंभव बना दिया कि वास्तव में दंगा किधर हुआ। वे यह जान पाते तब तक सैनिक दिल्ली की ओर रवाना हो गए। यह दिल्ली की ओर जाने की योजना बहुत चतुराई की थी। पहले झटके में दिल्ली पर कब्जा कर विद्रोह को एक क्षण में राष्ट्रीय क्रांति का स्वरूप देने में और अंग्रेजी अभिमान पर कुल्हाड़ी चलाने में गुप्त योजनावालों ने अपनी अप्रतिम चतुराई दिखाई, इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं। यह योजना जितनी कुशलता से बनाई गई उतनी ही तेजी से उसे पार भी लगाया गया। विद्रोह होने की सूचना अंग्रेज अधिकारियों के कानों तक पहुँचती, तभी दिल्ली की ओर जानेवाले तार तोड़कर और रास्ता रोककर, कारागृह से अपने धर्मवीरों को मुक्त करके, अंग्रेजों के रक्त के नाले बहाकर, वे दो हजार सिपाही गोरे रक्त से रँगी अपनी तलवारें ऊँची उठाकर गर्जना करने लगे-'दिल्ली ! दिल्ली!! चलो दिल्ली!!!'

प्रकरण-३

दिल्ली

श्रीमंत नाना साहब पेशवा अप्रैल के अंतिम भाग में दिल्ली आ गए थे। तब निश्‍चित हुई बातों के अनुसार ३१ मई के रविवार की सारे लोग उत्सुकता से राह देख रहे थे। दिनांक ३१ को सारे हिंदुस्थान भर में 'हर-हर महादेव' एक साथ गूंज उठा होता तो सच में अंग्रेजी साम्राज्य की इतिश्री होने और स्वतंत्रता की विजय दुंदुभि बजाने के लिए इतिहास को अधिक देर ठहरना न पड़ता; परंतु मेरठ के अग्रिम विद्रोह से क्रांति की तुलना में अंग्रेजों को अधिक लाभ हुआ। [49] मेरठ के बाजार में जिन तेजस्विनी महिलाओं ने सिपाहियों की जिंदगी पर थूका और 'मर्द हो तो कारागृह के वीरों को छुड़ाकर लाओ,' ऐसा कहकर हमारे इतिहास की नारियों की तेजस्विनी चेतना में एक स्फूर्तिदायी कथा तो जोड़ी फिर भी उन्होंने परदेसियों को बिना बताए सावधान कर अपने स्वदेशी नेताओं को अकल्पित गड्ढे में डाला। दिल्ली में सारे सिपाही नेटिव ही थे। उन्हें भी मंगल पांडे का समाचार सुनने के बाद से धीरज रखना कठिन हो रहा था। पर बादशाह और बेगम जीनत महल ने बड़ी कशलता से सारी दिल्ली शांत बनाए रखी थी। इतने में १० मई को मेरठ की गुप्‍त समिति की ओर से दिल्ली की गुप्त समिति को संदेश आया कि हम कल आ रहे हैं, तैयारी रखो!! यह अपूर्व और आकस्मिक संदेश दिल्ली में पहुँचते-न-पहँचते मेरठ से दो हजार सिपाही 'दिल्ली: दिल्ली !!' की गर्जना करते हुए निकल गए। उस रविवार की रात को पूर्ण रतजगा रहा। हजारों घोड़े दौड़ रहे हैं, हिनहिना रहे हैं, तलवारों और बैनेटों की खनखनाहट हो रही है, दो हजार रणोद्धत वीरों की कर्कश चिल्लाहट और गुप्त बातचीत निरंतर चल रही है-ऐसा यह भयानक दृश्य देखते हुए रात जाग रही थी। अंत में भोर हुई और अपना पीछा करता मेरठ का तोपखाना अभी भी नहीं आया, यह देखकर उत्साहित वे सिपाही रात भर हुए कष्टों को भूलकर एक क्षण भी कहीं न ठहरकर वैसे ही आगे बढ़े। मेरठ से दिल्ली कोई ३२ मील है। सुबह के आठ बजे सेना के प्रमुख हिस्से को यमुना का पवित्र दर्शन हुआ। स्वतंत्रता के पवित्र कार्य के लिए जानेवाले योद्धाओं को अपने शीतल जल से सिंचित कर प्रोत्साहन देनेवाली भगवती यमुना उन्हें दिखते ही उन हजारों योद्धाओं ने 'जय जमुनाजी' कहकर उसका वंदन किया। यमुना से दिल्ली शहर को जोड़नेवाले नाव के पुल पर से भारतीय घोड़े दौड़ते चले जा रहे थे। पर वे किसलिए दौड़ रहे हैं, यह यमुना नदी को ज्ञात है क्या? उसे यह बताए बिना जाना इष्ट नहीं है तो पकड़ो, वह कोई अंग्रेज पुल पर से जा रहा है, उसे और उसके गोरे रक्त को फेंक दो इस काली कालिंदी में। सिपाही क्यों दौड़े जा रहे हैं, इसका पूरा समाचार वह रक्त यमुना नदी को दे देगा।

वह नाव का पुल उतरकर सिपाही दिल्ली की प्राचीर से भिड़ गए। यह मनक लगते ही दिल्ली में स्थित अंग्रेज अधिकारी नेटिव सिपाहियों को परेड पर बुलाकर उन्हें राजनिष्ठा के व्याख्यान देने लगे। फिर ५४वीं पलटन को लेकर कर्नल रिप्ले विद्रोहियों का सामना करने निकला। ५४वीं पलटन के नेटिव सिपाहियों ने निकलते समय ही कहा कि कर्नल साहब, उन मेरठ के सिपाहियों को दिखाइए तो सही; फिर हम उन्हें देख लेंगे। क्या देख लेंगे, ये उस कर्नल को क्या मालूम? उसने बड़े गर्व से उन्हें शाबासी दी और वह पलटन विद्रोहियों का सामना करने चल दी। थोड़ा आगे जाते ही प्राचीर से मेरठ के घुड़सवार दौड़ते हुए आते दिखाई दिए। गुस्से से उग्रतम हुए और गोरे रक्त की अनिवार्य माँग करनेवाले उन घुड़सवारों के पीछे लाल रंग की वरदी में मेरठ का पैदल दल भी था। एक-दूसरे को देखते ही उन्होंने एक-दूसरे को सलामी दी और मेरठ की सेना दिल्ली की सेना से मिलने लगी। मेरठ की सेना ने-फिरंगी राज्य का नाश हो और बादशाह की जय हो-के नारे लगाए। ये नारे सुनते ही दिल्ली की सेना ने मारो फिरंगी को' की प्रति-गर्जना की। यह या है? कहनेवाला कर्नल रिप्ले क्षण में ही गोलियों की बौछार में भूमि पर गिर गया और फिर उस रेजिमेंट के साथ आए सारे अंग्रेजों को एक साथ कत्ल कर दिया गया। इस तरह अपने स्वदेश प्रेम पर फिरंगी रक्त की मुहर लगाकर मेरठ के घुड़सवार नीचे उतरे और दिल्ली के सिपाहियों से गले मिलने लगे। यह समाचार सुनते ही शहर का कश्मीरी दरवाजा खुल गया और उस इतिहास प्रसिद्ध दरवाजे से 'दीन-दीन' की गर्जना करते स्वतंत्रता योद्धा दिल्ली में प्रवेश कर गए।

मेरठ सेना की दूसरी टुकड़ी कलकत्ता दरवाजे से अंदर घुसने लगी। वह दरवाजा पहले बंद किया हुआ था, परंतु इन सिपाहियों की भयानक थपकी पड़ते ही वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगा और जल्दी ही उस दरवाजे पर नियुक्त पहरेवालों ने 'दीन-दीन' कहते विद्रोहियों को अंदर कर लिया। कलकत्ता दरवाजे से अंदर घुसे सिपाही प्रथम दरियागंज के यूरोपीय बँगलों की ओर गए और वे भवन कुछ क्षणों में आग बन गए। जो अंग्रेज आग से बचे वे तलवार के भक्ष्य बने। पास में ही अंग्रेजी अस्पताल था। उन्होंने विदेशी लोगों को आश्रय दिया हुआ है, यह ज्ञात हुआ। विलायती आदमियों को अंदर लेने के कारण दरियागंज के घरों को जो दंड मिला उसे देखने के बाद भी यह अस्पताल यदि विलायती लोगों को अंदर लेने का साहस करे तो किसीको भी गुस्सा आना स्वाभाविक है। उस अस्पताल की जमकर पिटाई करने के बाद वह शस्त्रधारी उग्रता अपने असंख्य अवयवों के साथ दिल्ली के घर-घर में गोरे रक्त को सूंघने चली! पर निशान के बिना सेना कैसी? और ऐसी सेना को कपड़े का निशान किस काम का? इसलिए जहाँ भी गोरा सिर मिले वहाँ उसे भाले पर टाँगकर उसका भयानक निशान 'दीन' के ताल पर नाचते हुए वह अपूर्व सेना आगे घुसती गई।

बादशाह के नाम का जयघोष करते हुए सिपाही और शहर के सैकड़ों लोग दिल्ली के राजमहल में घुसने लगे। रास्ते से घायल होकर भागता आया कमिश्‍नर फ्रेजर एक छोटे दरवाजे पर खड़ा था। उसे देखते ही मुगल बेग नाम के आदमी ने उसके गाल पर वार किया। यह इशारा होते ही सब विद्रोही दौड़ पड़े और सीढ़ियों पर क्षत-विक्षत हुआ कमिश्‍नर फ्रेजर आने-जानेवालों के पैरों तले कुचला जाने लगा। उसे कुचलते सिपाही वहाँ न रुककर ऊपर चढ़ गए और जिस कमरे में जेनिंग और उसका परिवार रहता था, वहाँ जाकर वे डरावने राक्षस की तरह खड़े हो गए। इतने में किसीने उस कमरे का दरवाजा लगाने का प्रयास किया पर वह एक धक्के से चरमरा गया और सिपाहियों की तलवार के नीचे वह जेनिंग, उसकी युवा कन्या, उसके यहाँ की मेहमान एक अंग्रेज स्त्री का खत्मा हो गया। दिल्ली के रास्ते पर से मरते-मरते दौड़ा कैप्टन डगलस कहाँ है? भेजो उसे यम के घर! और ये कोने में घसे कलेक्टर साहब? उन्हें भी जीवन की पेंशन पर भेजो। अब दिल्ली के राजमहल में फिरंगी सत्ता का नाम भी शेष नहीं रहा। अब जरा शांत बैठने में कोई हानि नहीं। घुडसवारों ने अपने घोड़े राजमहल के मैदान में बाँधे और सारी रात दौड़ते आए सिपाही दीवानेखास के राजमहल में अपना सामान रख विश्राम करने लगे।

इस तरह दिल्ली का राजमहल लोक-सेना के हाथ आ गया और अब आगे क्या करना है, इस विषय पर बादशाह, बेगम साहिबा और सिपाहियों के नेता वार्ता करने लगे। पहले निर्धारित योजना के अनुसार ३१ मई तक रुकना अब मूर्खता थी। अतः कुछ सोच-विचार के बाद बादशाह ने क्रांतिकारियों से मिल जाना तय किया। इतना होते-होते मेरठ से विद्रोह कर निकला तोपखाने का बहुत सा भाग दिल्ली आ पहुँचा और उसने बादशाह के सम्मान में और स्वतंत्रता के लिए राजमहल में आकर इक्कीस तोपों की सलामी दी। सिपाहियों और अन्य लोगों की वार्ता के बाद भी जो थोड़ी चंचलता बादशाह के मन में शेष थी वह भी इन तोपों की गड़गड़ाहट में पिघल गई। और उस राजकीय सलामी की घन गर्जना में उस वृद्ध बादशाह के हृदय का अनंत राजतेज हड़बड़ाकर जाग उठा। उसकी उस भव्य और आदरणीय मूर्ति के सामने फिरंगियों के रक्त से सनी तलवार चलाते हुए सिपाहियों के नेता ने कहा, "खाविंद! मेरठ में अंग्रेजों की पराजय हो चुकी है, दिल्ली अपने हाथ में है और पेशावर से कलकत्ता तक के सारे सिपाही आपके आदेश की राह देख रहे हैं। अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियाँ तोड़कर अपनी प्रकृतिदत्त स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सारा हिंदुस्थान जाग उठा है। ऐसे समय में यह स्वतंत्रता का निशान अपने हाथ में लें जिससे हिंदुस्थान के सारे बहादुर उसके सम्मान के लिए मरने को तैयार हो जाएँगे। हिंदुस्थान अपना स्वराज्य वापस लेने के लिए लड़ने लगा है और अब उसका नेतृत्व यदि आपने स्वीकार किया तो पल भर में हम उस फिरंगी राक्षसों को या तो समुद्र में डुबो देंगे या उनके शवों की दावत गिद्धों को देंगे। [50] हिंदू और मुसलमान दोनों ही जातियों के नेताओं का यह एक स्वर और उद्दीपक भाषण सुनकर बादशाह को स्वतंत्रता का उत्साह आने लगा। उसकी कल्पना के सामने शाहजहाँ और अकबर की मूर्तियाँ आने-जाने लगी और अब गुलामी में रहने की अपेक्षा स्वदेश को स्वतंत्र करते-करते मरना ही अधिक श्रेयस्कर है, ऐसी दैवी स्फूर्ति उसके हृदय में संचरित होने लगी। आगे बादशाह ने कहा-"मेरे पास खजाना नहीं है और तुम्हें वेतन भी नहीं मिलेगा।" तब वे सिपाही बोले-"हम अंग्रेजों का खजाना लूटेंगे और आपके खजाने में भरेंगे।" [51] "तो फिर आपका नेतृत्व में स्वीकार करता हूँ।" ऐसा अभिवचन उस वृद्ध बादशाह से मिलते ही उस राजभवन में जमा उस प्रचंड जनसमूह ने बड़े जोर से गर्जना की।

राजमहल में जब यह सब गड़बड़ी चल रही थी तब शहर में जोर का ऊधम हो रहा था। दिल्ली के सैकड़ों लोग घर में जो शस्त्र मिले वही लेकर विद्रोही सिपाहियों से मिल रहे थे और यूरोपीय लोगों को काट डालने के लिए यहाँ-वहाँ घूम रहे थे। बारह बजे के आसपास दिल्ली के बैंक पर हमला हुआ। उसमें बैंक का मैनेजर बेरेस फोर्ड, उसकी पत्नी और उसके पाँच बच्चे मार डाले गए। वह भवन भी नष्ट कर दिया गया। फिर दिल्ली गजट के छापाखाने की ओर लोग गए। मेरठ का समाचार छापने के लिए कंपोजिटर कंपोजिंग कर रहे थे तभी दरवाजे पर 'दीन-दीन' की गर्जना हुई और कुछ ही देर में छापाखाने का हर ईसाई चीर दिया गया। वहाँ का सबकुछ-मशीनें आदि जो कुछ भी था-फिरंगियों के स्पर्श से अपवित्र हो गया था, अतः उसको नष्ट करके क्रांति की यह भयानक हवा आगे बढ़ी। परंतु अभी भी वह चर्च खड़ा होकर अपने धर्मयुद्ध की ओर देखता रहे, यह पूरी तरह अनुचित है। इस चर्च में हिंदुस्थान की दासता बनी रहने के लिए प्रार्थनाएँ की गई हैं। हिंदुस्थान में तुम्हारा राज्य रहना ही भयानक पाप है, अपने अनुयायियों को एक दिन भी इस चर्च ने ऐसा कहा था क्या? उलटे ऐसे पाप के अधिकारियों को ऐहिक और पारलौकिक संरक्षण देने के लिए इस पक्षपाती चर्च ने अपने पंखों को फैलाया हुआ है। हिंसा की ऐसी गुफा हमने अपने देश में निर्मित होने दी, उसका प्रायश्चित्त गाय और सूअर के रक्त से बने कारतूसों के रूप में हमें मिला। अभी भी सँभलो और उस चर्च की व्यवस्था करने के लिए पहले उसीकी ओर बढो! देखते क्या हो? फोड़ो वह क्रॉस! दीवारों की सारी चमड़ी उखाड़ो, उस व्यासपीठ का चूरा बनाओ और बोलो दीन! रोज चर्च में आते समय यह घंटा बजता है। अब हम उसको घनघनाएँ। बज घंटा, बज! आज तू इतना बज रहा है पर कोई गोरा तेरी ओर क्यों नहीं बढ़ रहा। तुझे इन काले हाथों का स्पर्श भाता है क्या? हाथ का स्पर्श भला न लग रहा हो तो गिर जा नीचे! हमारे वे बंधु अपने पैरों का स्पर्श करने बुला रहे हैं। सारे घंटे टूटकर नीचे गिरने के बाद उनके गिरने की आवाज के साथ वे सिपाही भी विकट हास्य करते हुए एक-दूसरे को कहने लगे-"कैसा तमाशा है! क्या मजा है !!"

परंतु उधर दूसरी तरफ इससे भी भयानक तमाशा चल रहा था। राजमहल के एक और अंग्रेजों की सेना के लिए तैयार किया हुआ एक बारुदखाना था। इस बारूदखाने में लड़ाई में आवश्यक सारा सामान लूंस-ठसकर भरा हुआ था। उस कम-से-कम नौ लाख कारतूस, आठ-दस हजार बंदूकें, तोपें और सीजट्रेन भी हाई थीं। यह बारूदखाना अपने कब्जे में लेने का क्रांतिवीरों ने दृढ़ संकल्प किया। पर यह काम सरल नहीं था। उस बारूदखाने में नियुक्त अंग्रेज चाहे तो वहाँ लड़ने पहुँचनेवाले सबका नाश करने में एक क्षण भी लगनेवाला नहीं है। क्योंकि उस बारूदखाने को सुलगा देने के लिए एक तीली जलाकर डालना काफी था। इस काम में हाथ डालना बहुत ही जोखिम का था। काम फिर भी वह बारूदखाने कब्जे में लिये बगैर क्रांति का जीवन क्षण भर भी सुरक्षित न रहता, अत: यह काम पूरा करने हजारों सिपाही तैयार हो गए। उन्होंने उस बारूदखाने के अंग्रेज अधिकारी को शरण आने के लिए बादशाह के नाम से संदेश भेजा। परंतु ऐसे कागज के टुकड़ों को मान देकर अंगेजों ने इस देश का शासन प्राप्त नहीं किया था। लेफ्टिनेंट बिलोमी ने उस चिट्ठी को उत्तर देने का भी मान नहीं दिया। यह अपमान देखकर गुस्सा हुए हजारों सिपाही उस बारूदखाने की दीवार पर चढ़ने लगे। बारुदखाने के अंदर नौ अंग्रेज और कुछ भारतीय लोग थे। दीवार पर दिल्ली के बादशाह का निशान लगा देखकर भारतीय लोग अपने स्वदेश बंधुओं को तेजी से आकर मिलने लगे और उन नी अंग्रेजों पर निराशा की छाया मँडराने लगी। सिपाहियों की लगातार मार के आगे अंग्रेज कितनी देर टिक सकेंगे, यह दिख ही रहा था। उन्होंने समय आने पर बारूदखाना उड़ा देने का निश्चय किया था, इसमें संदेह नहीं; क्योंकि यदि वे बारूदखाना स्वयं सौंप देते तो भी उनके प्राण सिपाही न लेते, इसपर उनका कोई भरोसा नहीं था। इधर सिपाही भी यह जानते हुए भी कि बारुदखाना उड़ाया जाएगा तो अपनी ओर की प्रचंड हानि होगी, टूट पड़े थे। इतने में दोनों ओर के लोग जिस भयानक आवाज की प्रतीक्षा में आशंकित थे वह हजारों तोपें एक साथ छूटने की जंगी आवाज हुई और उस बारूदखाने से आग की प्रचंड ज्वाला आकाश की ओर बढ़ गई। उन अंग्रेज वीरों ने स्वयं के प्राणों की आशा छोड़कर वह बारूदखाने शत्रु के कब्जे में न देते हुए अपने हाथों से सुलगा दिया और उस एक आवाज के साथ करीब पच्चीस सिपाही और आसपास के रास्तों पर के तीन सौ आदमी आकाश में उड़ गए।

परंतु क्रांति पक्षवालों ने इस बारूदखाने की आग में जान-बूझकर जो अपना नाश करवा लिया वह यूँ ही नहीं था। क्योंकि जो लोग इस बारुद के विस्फोट में बलि हुए, उनके आत्मयज्ञ से उस राज्य क्रांति को अपूर्व शक्ति मिली। जब तक यह प्रचड बारूदखाने अंग्रेजों के कब्जे में था तब तक मुख्य केंद्र के नेटिव सिपाही अपने अधिकारियों की अधीनता में थे। वे अपने स्वदेश बंधुओं पर हमला नहीं कर रहे थे, पर अंग्रेजों के विरुद्ध भी नहीं हुए थे। दोपहर चार बजे सारा दिल्ली शहर हिलानेवाले विस्फोट की आवाज सुनते ही वे केंटोन्मेंट के सिपाही इकट्ठे हुए और 'मारो फिरंगी को' की गर्जना करते हुए अंग्रेजों पर टूट पड़े। मुख्य रक्षक गार्डन को किसीने उड़ा दिया। स्मिथ और रेह्वले को मार डाला और गोरा रंग दिखते ही 'टूट पड़ो-मार डालो' की ध्वनि होने लगी। एक शतक के बाद जाग्रत हुआ राष्ट्रक्षोभ अपने उग्र जबड़े के नीचे पुरुष, महिलाएँ, बच्चे, घर, दरवाजे, पत्थर, ईंटें, घड़ियाँ, मेज-कुरसियाँ, रक्त, मांस, अस्थियाँ-जिन-जिन चीजों को फिरंगी स्पर्श हुआ था सब पर क्रांतिकारियों का आक्रोश टूटा। उस सारी सचेतन दिल्ली के बादशाह का बहुत सख्त आदेश हो जाने के बाद ही बहुत से अंग्रेज लोग मृत्यु से बच पाए और राजमहल की कैद में पहुँचा दिए गए। परंतु लोकमत बादशाह के इस कृत्य के इतना विरुद्ध था कि चार-पाँच दिन खींचतान करने के बाद उसे अपने कब्जे के उन पचास फिरंगियों को लोगों को सौंप देना अनिवार्य हो गया। १६ मई को एक सार्वजनिक मैदान पर वे पचास फिरंगी ले जाए गए। वह दृश्य देखने के लिए इकट्ठा हुए हजारों नागरिकों ने उनके सामने फिरंगी राज्य और अंग्रेजों की बेईमानी की पूरी-पूरी निंदा की और फिर सिपाहियों का आदेश होते ही एक क्षण में उन पचासों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। सिपाही की तलवार से बचने कोई महिला या बच्चा गिड़गिड़ाने लगता तो-'मेरठ की बेड़ियों का बदला, गुलामी का बदला, बारूदखाने का बदला'-कहते हुए लोग बड़े जोर से चिल्लाने लगते। इस बदले की धार चढ़ी तलवार वह गिड़गिड़ाता भूरा सिर छाँट देती। ११ मई को अंग्रेजों के कत्लेआम का आरंभ होकर उसकी पूर्णाहुति १६ मई को हुई। इस बीच सैकड़ों अंग्रेज जान बचाके दिल्ली से भाग गए। किसीने मुँह पर काला रंग पोतकर नेटिव होने का स्वाँग रचा तो कोई जंगल-जंगल भागता धूप के कारण मर गया; किसीने कबीर के दोहे याद कर संन्यासी का स्वाँग बनाकर गाँवों में छिपने का साहस किया, पर भेद खुलते ही गाँववालों के हाथों मारा गया। कोई-यात्रा में थककर रास्ते में बैठ जाने पर-पास-पड़ोस के गाँववालों द्वारा फिरंगी कहकर काट डाला गया और कोई दयालु गाँववाले मिल जाने से उनकी कृपा पाकर मेरठ छावनी पहुँच गया।

बारूदखाने के विस्फोट में विद्रोही सैनिकों को भरपूर बंदूकें मिलीं और उसके कारण हर सिपाही के हिस्से में जो कत्ल हुआ, उसका समाचार सुनते ही सैकड़ों गाँवों ने अपनी सीमा में फिरंगी को घुसने न देने का संकल्प लिया। परंतु इन गाँवों या दिल्ली में इतने बवंडर के चलते हुए भी एक भी अंग्रेज महिला के शील पर किसीने आक्रमण नहीं किया था। यह बात अब अंग्रेजों द्वारा की गई जाँच-पड़ताल में ही सिद्ध हुई है। [52] दिल्ली में कत्ल हो जाने के बाद उस अवसर के प्रत्यक्ष देखे हए वर्णन के नाम पर कितने ही अंग्रेज धर्माधिकारियों ने जो भयंकर वर्णन किए हैं उनसे अधिक निंदात्मक, असत्य और घटिया बयान आज तक किसीने नहीं किया होगा। दिल्ली के रास्तों पर महिलाओं को नंगा कर घुमाया, सार्वजनिक रूप से उनका शील भंग किया गया, उनके स्तन काटे गए, छोटी बच्चियों पर अत्याचार किए गए आदि अमानवीय झूठ जिनके धर्मोपदेशक प्रकाशित करते हैं उन अंग्रेज लोगों की सत्यनिष्ठा कितनी घटिया होगी। [53] सन् १८५७ की राष्ट्रीय क्रांति इसलिए नहीं हुई थी कि हिंदुस्थान के लोगों को गोरी औरतें नहीं मिलती थीं। उलटे, गोरी महिला के मनहूस कदम (मराठी में पाढरा पाप अर्थात् गोरे पाँव) फिर से अपने घर में न पड़ें इसलिए सन् १८५७ का राष्ट्रक्षोभ उद्भूत हुआ था।

इस तरह मेरठ की महिलाओं के फुफकार से उठे उस भयानक चक्रवात के चक्कर में पड़ पाँच दिन के अंदर हिंदुस्थान में सौ वर्ष से जमा हुआ गुलामी का विषवृक्ष भरभराकर गिर गया। इन पहले पाँच दिनों में क्रांति पक्ष के नेताओं को जो अपूर्व सफलता मिली, उसका मूल कारण था अंग्रेजों की गुलामी से छूटने की उत्कट इच्छा का सारी जनता में पैदा होना। मेरठ की महिलाओं से दिल्ली के बादशाह तक सबके हृदय में स्वतंत्रता और स्वधर्म रक्षण की अनिवार्य इच्छा प्रादुर्भूत होने से और उस इच्छा को गुप्त संगठन के द्वारा पहले से ही व्यवस्था प्राप्त हो जाने से केवल पाँच दिन के अंदर हिंदुस्थान की इतिहास प्रसिद्ध राजधानी में स्वराज्य की प्राणप्रतिष्ठा हो गई। दिनांक १६ मई को दिल्ली में फिरंगी सत्ता का एक भी चिह्न शेष नहीं रहा था। अंग्रेजी वस्तुओं से दिल्ली को इतनी घृणा हो रही थी कि कोई अंग्रेजी भाषा का एक शब्द भी बोले तो उसे जमकर मार खानी पड़ती। अंग्रेजी निशान के टुकड़े गली-कूचों में कुचले जा रहे थे। और अपने आज तक के अपमान के दाग दासता के उष्ण रक्त से धोकर स्वच्छ हुआ स्वराज्य का चिह्न उस प्रचंड क्रांति के सिर पर डोल रहा था। यह स्वतंत्रता की इच्छा इतनी प्रबल थी कि पहले पाँच दिन में देशद्रोह की छूत कहीं नहीं लगी। पुरुष और महिलाएँ, श्रीमंत व गरीब, तरुण और वृद्ध, सिपाही और नागरिक, मौलवी और पंडित, हिंदू और मुसलमान सारे-के-सारे स्वदेश के निशान के नीचे अपने-अपने शस्त्र निकालकर परदेसी दासता पर हमले कर रहे थे। ऐसी विलक्षण स्वदेश प्रीति और स्वातंत्र्य प्रीति उबल रही थी और पर-सत्ता के प्रति इतनी घृणा उत्पन्न हो गई थी। इसलिए मेरठ की ललनाओं के वाक् बाणों से दिल्ली का सिंहासन प्रादुर्भूत हुआ।

ये पाँच दिन हिंदुस्थान के इतिहास में हमेशा चिरस्मरणीय रहें। क्योंकि मोहम्मद गजनी के आक्रमणों से प्रारंभ हुआ हिंदू और मुसलमान का प्रचंड युद्ध समाप्त हो जाने की घोषणा इन पाँच दिनों में हुई और हिंदू और मुसलमान के बीच का परायापन तथा विजेता-विजित भाव नामशेष होकर उनमें आपसी बंधुत्व भाव इन्हीं दिनों में प्रकट हुआ। मुसलमानों की परतंत्रता से श्री शिवराज, प्रतापसिंह, छत्रसाल, प्रतापादित्य, गुरु गोविंदसिंह तथा महादजी शिंदे द्वारा मुक्त भारत हुई माता ने-'इसके बाद तुम सब समान और सहोदर हो और मैं तुम दोनों की माँ हूँ' इस दिव्य मंत्र का उच्चारण किया। हिंदुस्थान अपना देश है और हमसब सगे भाई हैं, ऐसी गर्जना करते हिंदू-मुसलमानों ने सम समानता से और एकमत से दिल्ली के तख्त पर स्वराज्य का उभय स्वीकृत झंडा तभी खड़ा किया। ऐसे ये पाँच दिन इतिहास में चिरस्मरणीय रहें।

इन पाँच दिनों में हिंदुस्थान में लोकशक्ति का प्रथमोदय हुआ। अपने पर कौन राज्य करे, इस प्रश्न का निर्णय करने का कार्य लोकपक्ष का है। इस संवेदना का जन्म हिंदुस्थान में इन पाँच दिनों में हुआ। लोकपक्ष ने ही उस राज्य सिंहासन पर स्वसम्मत पुरुषार्थ की योजना की। लोगों को जो पसंद होगा उसीका राज्य स्वदेश पर चले, यह भावना और राजनीति लोकपक्ष का कर्तव्य है, यह चेतना हिंदुस्थान के शरीर में इन पाँच दिनों में उदय हुई।

लोकपक्ष की यह जयंती हिंदुस्थान के इतिहास में अविस्मरणीय रहे।

प्रकरण-४

मध्यांतर और पंजाब

दिल्ली स्वतंत्र हो जाने की वार्ता विद्युत् वेग से फैलते ही उसकी आकस्मिकता ने सारे हिंदुस्थान में अपनों और परायों दोनों को क्षण भर के लिए तो चकित कर दिया। अंग्रेजों को तो तुरंत यह भी समझते न बना कि हम जो सुन रहे हैं उसका अर्थ क्या है? सारे देश में शांति का साम्राज्य है, ऐसा जान कलकत्ता में लॉर्ड केनिंग सोए पड़े थे और इधर कमांडर-इन-चीफ अॅन्सन शिमला की ठंडी हवा में जाने के लिए सज रहे थे। उन्हें पहले जब दिल्ली स्वतंत्र हो जाने का अधूरा तार आया तब उस तार का वास्तविक अर्थ ही उनके ध्यान में न आया। यह वार्ता सुन अंग्रेजों में कितनी हड़बड़ी मची, उतनी हड़बड़ी चकित-विस्मित सारे हिंदुस्थानी लोगों में भी मची हुई थी। क्योंकि दिल्ली के इस अकल्पनीय विद्रोह से क्रांति रचना की सारी व्यवस्था ही मानो बिगड़ गई और दिल्ली के विद्रोह के आकस्मिक हल्ले में अंग्रेजों को भावी संकट की सूचना मिलने से उस संकट का परिहार करने का अवसर मिल गया। अकल्पित हमले से दिल्ली का सिंहासन जैसे एक-दो दिन में उनसे झटक लिया गया, वैसे ही ३१ मई को निश्‍चित पूर्व संकेत के अनुसार एक समय में यदि सब जगह विस्फोट होता तो सारे हिंदुस्थान का सिंहासन एक झटके में हथियाया जा सकता था। अब वह योजना तो मेरठ के विद्रोह के कारण उलझ गई थी, फिर भी दिल्ली कब्जे में आ जाने से विद्रोह को राज्य क्रांति का स्वरूप मिल गया और इस असंभव वार्ता से एक विलक्षण चेतना का जन्म हो गया था। अब इस चेतना का लाभ उठाकर एकदम विद्रोह किया जाए या पूर्व नियोजित संकेत के अनुसार ३१ मई की राह देखी जाए? दिल्ली के विद्रोह की वार्ता सुन अन्यत्र क्या योजना चल रही है? दिल्ली की जल्दबाजी से जैसा घोटाला हुआ वैसे ही अन्य स्थानों की सम्मति लिये बिना हम भी विद्रोह करें और अधिक घोटाला फैल गया तो क्या होगा? ऐसी अनेक अनिश्‍चितताओं के कारण क्रांतिकारी नेताओं को आगे क्या होना है-उसकी प्रतीक्षा करते हुए अपनी-अपनी जगह रुका रहना पडा। मंद गति जैसा क्रांति का प्राण हरण करनेवाला दूसरा विष नहीं है। क्रांति का विस्तार जितना त्वरित और जितना आकस्मिक होता है उतनी ही उसकी विजय की संभावना अधिक होती है। यह विस्तार का वेग शिथिल हुआ तो शत्रु को संरक्षण का अवसर मिल जाता है। जो पहले उठते हैं उनका उत्साह यह देखकर घटने लगता है कि अपने साथ कोई आ नहीं रहा और जो बाद में आते हैं उनके रास्ते में बीच के अवसर का लाभ लेनेवाला चतुर शत्रु अनेक बाधाएँ खड़ी कर देता है। इसलिए उठाव और प्रसार के बीच में अधिक समय जाने देना क्रांतियुद्ध के लिए हमेशा हानिकारक होता है। फिर भी जहाँ तक बने एक साथ विद्रोह करना निश्‍चित होते हुए भी बीच में ही आ पड़े पेंच के कारण विभिन्न स्थानों के क्रांतिकारी नेताओं को न ठहरते बन रहा था और न आगे बढ़ते।

क्रांतिकारी पक्ष की इस अपरिहार्य स्तब्धता का अंग्रेजों को बहुत लाभ हुआ। अंग्रेजों के पैर हिंदुस्थान में पड़ने के बाद से आज तक उन्हें ऐसी भयानक वार्ता सुनने का अवसर कभी भी नहीं आया था। इस मई माह में बैरकपुर से सीधे आगरा तक कोई सात सौ पचास मील में केवल एक गोरी रेजिमेंट थी। ऐसी स्थिति में क्रांतिकारी पक्ष के पूर्व संकेतानुसार यदि यह सारा प्रदेश एकदम उठ गया होता तो दस इंग्लैंड भी इकट्ठा हो जाते तो भी हिंदुस्थान कब्जे में न रहता। यह गोरी रेजिमेंट दानापुर में रखी गई थी। उधर पंजाब में सरहद पर पर्याप्त गोरी सेना थी। परंतु उसे उधर ही रखना आवश्यक था। ऐसी स्थिति में लॉर्ड केनिंग का पहला प्रयास था अधिक-से-अधिक गोरी सेना को जमा करना। उसी समय अंग्रेजों के भाग्य से ईरान की लड़ाई समाप्त हुई थी इसलिए उस सेना को हिंदुस्थान जल्दी आने के आदेश हुए। ईरान की लड़ाई समाप्त होते ही अंग्रेजों ने चीन से बखेड़ा खड़ा कर उधर सेना भिजवाई थी। परंतु हिंदुस्थान में यह भयानक आँधी आते ही केनिंग ने चीन की ओर जानेवाली सारी सेना बीच में ही रोक लेने का निश्चय किया। इन दो सेनाओं के सिवाय रंगून में स्थित गोरी रेजिमेंट भी कलकत्ता में रख ली गई और मद्रास फ्युजिलियर नामक गोरी सेना को तैयार रखने को लिखा गया।

ये गोरी सेनाएँ जब सभी दिशाओं से यथासंभव वेग से कलकत्ता के लिए चल रही थीं तब केनिंग ने सिपाहियों के मन को फिर से एक बार कब्जे में लेने का प्रयास किया। उसने कहा, आपकी जाति और वर्ण विषयक रीति में हाथ डालकर हिंदुस्थान के धर्म को दुखाने का हमारा कोई इरादा नहीं है। सिपाही चाहें तो कारतूस अपने हाथों से बना लें। कंपनी का नमक जिन्होंने खाया है उनका ही यह विद्रोह करना पाप है। इस प्रकार की बातों से भरा एक घोषणापत्र निकालने का अधिकार है या नहीं, जहाँ यही विवादास्पद विषय है वहाँ नया घोषणापत्र निकालने का अर्थ वह विवाद समाप्त करना नहीं बल्कि उसे चिढ़ाना है। लेकिन हिंदुस्थान के पास अब ये घोषणापत्र पढने का समय नहीं है, क्योंकि दिल्ली में उसी समय घोषित दिव्य घोषणापत्र की ओर सबकी आँखें लगी हुई हैं। एक ही समय दो घोषणापत्र जारी हुए। कलकत्ता में गुलामी का, दिल्ली में स्वतंत्रता का। हिंदुस्थान को उस समय दिल्ली का घोषणापत्र भाया इसलिए केनिंग ने कलम तोड़कर कमांडर-इनचीफ, दिल्ली को तुरंत तोपें दागने का आदेश दिया।

कमांडर-इन-चीफ अॅन्सन जब शिमला में था तब उसे दिल्ली के विद्रोह का तार मिला। उसे पढ़कर, अब क्या करना चाहिए इसका विचार वह कर ही रहा था कि केनिंग ने उसे तुरंत दिल्ली जीतने का आदेश दिया। विद्रोहियों की योजना का या शक्ति का अंग्रेजों को इतना अज्ञान था कि उन्हें लगता था, दिल्ली एक हफ्ते में छीनी जा सकती है और एक बार दिल्ली जीती तो उस माह के अंत में विद्रोह का अंत हो जाएगा। पंजाब का मुख्य अधिकारी सर जॉन लॉरेंस भी दिल्ली पर कब्जा करने को जोर डाल रहा था। परंतु दिल्ली जीतना कितना कठिन है, इसका केनिंग और लॉरेंस की तुलना में कुछ अधिक सही अनुमान अन्सन को था, अतः समुचित सामग्री इकट्ठी करने के पहले दिल्ली की ओर नहीं जाने की नीति उसने बनाई। शिमला की ठंडी हवा छोड़ मुख्य सेना स्थल की ओर अॅन्सन आ भी न पाया था कि वहाँ शिमला में हुल्लड़ मच गया। गुरखाओं की नासिरी बटालियन ने विद्रोह किया, यह समाचार शिमला आते ही अंग्रेजों का धीरज छूट गया। उस वर्ष शिमला में भी इतनी गरमी थी कि अंग्रेजों को सहन न हो सके। ऐसे आसार दिखने लगे कि शिमला में बनाए गए हवादार बँगलों और वृक्षों के बगीचों में आज तक भोगे राजविलास का अब भयंकर किराया देना पड़ेगा। गुरखा पलटन आई, ऐसा एक शोर होते ही गोरी औरतें और बच्चे जिधर राह दिखे उस तरफ भाग निकले। इस भागमभाग में अंग्रेज पुरुषों ने स्वाभाविक ही महिलाओं को पीछे छोड़ दिया और वह भी अपने सामान के थैले पीठ पर बँधे होते हुए। अंग्रेजी धैर्य का प्रदर्शन दो दिन निरंतर चलता रहा लेकिन जब गुरखा न आए तो हारकर वह प्रदर्शन बंद करना पड़ा। इसी समय कलकत्ता में भी रोज ऐसा ही होता था। कलकत्ता के पास बैरकपुर की नेटिव रेजिमेंट ने विद्रोह किया, यह अफवाह बार-बार उठती और अंग्रेजों की औरतें, बच्चे और पुरुष रास्ते से पोर्ट की ओर दौड़ते दिखाई देते। कितनों ने इंग्लैंड का टिकट निकाल लिया, कितनों ने अपनी गठरियाँ बाँधकर पोर्ट की ओर भागने की तैयारी रखी और अनेक दफ्तर के काम छोड कोने-कोने में छिपे रहते। ऐसा डर मेरठ और दिल्ली में था फिर भी अंग्रेजों का कानपुर अभी बचा हुआ था।

कमांडर-इन-चीफ अॅन्सन ने अंबाला आते ही दिल्ली पर घेरा डालने के लिए सीजट्रेन तैयार करना शुरू किया। हिंदुस्थान पर आज तक कभी ऐसा संकट न आया था। अंग्रेजों की शक्ति की बंद मुट्ठी लाख की होते हुए भी अंदर की स्थिति शोचनीय थी। अॅन्सन को किसी तरह भी जल्दी करना असंभव हो गया। अंग्रेजों के काले सिपाहियों को 'चल' कहते ही चलाया जा सकता था, परंतु अब गोरे सिपाहियों को केवल 'चल' कहने से कैसे चलेगा? उनका एक-एक का दिमाग और आज तक बढ़ता मिजाज अब एकाएक कैसे सँभले! उसमें भी अब नेटिवों से पहले जैसी हर तरह की सहायता मिलना पूरी तरह असंभव था। गाड़ियाँ मिली नहीं, मजूर मिले नहीं, रसद मिले नहीं, जख्मी लोगों के लिए डोली मिली नहीं। ऍडज्यूटेंट, क्वार्टर मास्टर, कमिसारी, मेडिकल चीफ हर कोई अपने-अपने विभाग की तैयारी करना छोड़ नकार' का घंटा बजाने लगा। हिंदुस्थानी लोगों के आश्रय बिना अंग्रेजी सत्ता धूल पर की गई लिपाई जैसी है। सन् १८५७ में इस कुचली हुई धूल में थोड़ा चैतन्य आते ही अंग्रेजों को अंबाला से दिल्ली तक आना कठिन हो गया। क्योंकि- "Natives of all classes stood aloof, waiting and watching the issue of events. From the capitalists to the coolie all shrunk alike from rendering assistance to those whose power might be swept away in a day." [54]

उपर्युक्त लेखक कहता है, हिंदुस्थान के नेटिव ऐसे ही चुप हो बैठते तो अंग्रेजी सत्ता वास्तव में एक दिन में फेंक दी गई होती। परंतु सन् १८५७ में वह दिन उगनेवाला नहीं था। सन् १८५७ उस दिन के भोर की रात थी। जिन्हें वह भावी भोर दिखने लगी वे नींद छोड़कर उठे। परंतु जिन्हें वह तत्कालीन रात ही दिखी वे अपना गुलामी का खींचा हुआ ओढ़ावन और खींचकर सो गए। इन उनींदे लोगों में कुंभकर्ण का सम्मान पानेवाली पटियाला, नाभा और जींद ये तीन रियासतें थीं। इन रियासतों के हाथों में सन् १८५७ की क्रांति का जीवन या मृत्यु थी। ये रियासतें दिल्ली और अंबाला के बीच में थीं, अत: उनके आधार के बिना अंग्रेजों की पीठ बिलकुल सुरक्षित रहनेवाली नहीं थी। ये रियासतें अन्य रियासतों की तरह केवल चुप रही होती तो भी क्रांति सफल होने की बहुत संभावना थी। परंतु पटियाला, जींद और नाभा इन तीनों ने जब अंग्रेजों से भी अधिक क्रूरता से सन् १८५७ की राज्य क्रांति को चोट पहुँचाना प्रारंभ किया तब पंजाब और दिल्ली, इन दो हिस्सों की यह जंजीर एकाएक टूट गई और उस क्रांति के अवयवों की संगति क्षणार्ध में नष्ट हो गई। इन रियासतों ने दिल्ली के बादशाह की ओर से आए निमंत्रण को धिक्कार दिया; निमंत्रण देने आए सवारों को मार डाला; स्वयं के खजाने से अंग्रेजों पर पैसों की सतत वर्षा थी। जिस प्रदेश से अंग्रेजी सेना जानेवाली थी उस प्रदेश को सैन्य संरक्षण दिया; अंग्रेजों के साथ दिल्ली पर हमला करने गए सैनिक और पंजाब के क्रांतिकारी लोग जब दिल्ली के स्वदेशी निशान को सँभालने घर-द्वार छोड़कर दौड़ने आए तब इन सिख रियासतों ने-इन गुरु गोविंदसिंह के चेलों ने- अत्यधिक क्रूरता से उनका वध किया, यंत्रणा दी। [55]

पटियाला, नाभा और जींद की सहायता मिलना पक्का होते ही अंग्रेजों में विलक्षण धीरज आ गया। पटियाला के राजा ने अपने भाई के साथ उत्तम सेना और तोपें देकर उसे ठाणेश्वर का रास्ता रोकने भेज दिया और जींद के राजा ने पानीपत की चौकी पर कब्जा जमाया। ये दो अति महत्त्वपूर्ण चौकियाँ इस तरह परस्पर रोकी जाने से अंबाला से दिल्ली तक के मार्ग और पंजाब का निरंतर यातायात-ये दो बहुत नाजुक बातें संरक्षित हो गईं और कमांडर-इन-चीफ ने २५ मई को अंबाला छोड़ दिल्ली की ओर स्वयं कूच किया। पर दिल्ली स्वतंत्र हो जाने का समाचार सुनने के पश्चात् उसके धक्के से अॅन्सन पूरी तरह हताशा से भर गया था। उसमें भी शिमला की ठंडी हवा में जो आज तक कभी अनुभव नहीं हुई ऐसी गरमी में उसे झुलसना पड़ा था। इन मानसिक और शारीरिक चिंताओं से कश हुआ वह कमांडर-इन-चीफ करनाल तक आते-आते २७ मई को कोलरा की बीमारी से मर गया। उस दिन उसके अधीनस्थ अधिकारी बर्नार्ड ने कमांडर-इन-चीफ के अधिकारों को सँभाला।।

इस तरह पुराने कमांडर-इन-चीफ को गाड़कर अंग्रेजी सेना नए कमांडर के नेतत्व में दिल्ली की ओर बढ़ी। उस समय उस अंग्रेजी सेना में इतना उत्साह था कि सुबह लड़ाई आरंभ कर शाम को दिल्ली शहर में शत्रु का रक्त गटगट पिएँगे, ऐसी घमंड भरी बातें वे खुलेआम करने लगे। गोरे सिपाहियों के काले हृदय में कितना हलाहल भरा हुआ है यह सेना अंबाला से दिल्ली आ रही थी उस समय वे पूरे जग को यह दिखा रहे थे कि मेरठ की नेटिव सेना का क्या? वे तो हर तरह से काफिर (Heathen) थे। उन्होंने कारतूसों के निर्माण में हड्डियों का चूरा मिलाने की गप पर विश्वास कर मेरठ और दिल्ली में निरपराध अंग्रेजों को कत्ल किया। यह नेटिव के देश और धर्म का जंगलीपन था, परंतु इसके नीचे जो ढका हुआ है, संभव है वह कभी स्पष्टता से प्रकट भी न हो। क्योंकि काफिरों की अपेक्षा ईसाई गप्पों की विश्वसनीय बातों और जंगलीपन में सुधार को ही परमेश्वर अधिक धिक्कारेगा और उस गंदगी को धोने के लिए उसे रक्त की वर्षा करनी पड़ेगी।

अंबाला से दिल्ली की ओर आते समय हजारों गाँवों में से जिन-जिनपर हाथ डाला जा सका, उन सारे भारतीय आदमियों को एक साथ पकड़ा जाता और तुरंत आधे घंटे में उनका कोर्ट मार्शल कर पंक्ति में खड़ा कर, सबको फाँसी का दंड देकर, तरह-तरह की यंत्रणाएँ देकर मार डाला जाता। मेरठ में नेटिवों ने भी अंग्रेजों को मार डाला था। परंतु वह जंगलीपन से अर्थात् एक आघात से मारा गया था। परंतु अंग्रेजों ने उस त्रुटि को सुधारकर बहुत अच्छा किया। वे कोर्ट मार्शल के आगे केवल दृष्टिपात होते ही फाँसी का दंड दिए गए सैकड़ों लोगों को, उनके फाँसी के खंभे खड़े करते हुए ही पैशाचिक यंत्रणाएँ देने लगते, उनके सिर के बाल तडातड़ तोड़ते, उनके शरीर में बैनेट के सिरे से आर-पार छेद किए जाते और तत्पश्चात् इन सारी यंत्रणाओं और प्रत्यक्ष मृत्यु को भी जिसके आगे आनंद से स्वीकारा होता वह भयंकर पाप उन्होंने उनसे करवाया। गोरे सिपाही उन गरीब, निर्दोष और निरपराध हिंदू लोगों के मुँह में, उनके फाँसी पर चढ़ने को तैयार होने पर भी जबरन गाय का कच्चा मांस कुचल-कुचलकर भरते। [56]

वह कोर्ट मार्शल क्या झमेला था, यह जंगली पाठक वर्ग को बताना रह ही गया। गाँवों के निरपराध लोगों को सैकड़ों की संख्या में पकड़कर उनका न्याय किया जाता। इस न्याय की घुट्टी यूरोपियन राष्ट्र पहले से ही पिए होते है। नीदरलैंड की राज्य क्रांति में अल्वा ने भी ऐसा ही एक न्यायासन स्थापित किया था। उस न्यायासन की कार्यवाही इतने ध्यान से चलती कि वहाँ के न्यायाधीश बीच में ही सो जाते और दंड देने का समय आने पर उन्हें हिलाकर जगाए जाने पर जितने कैदी सामने दिखते उतनों की ओर एक गंभीर नजर डालकर वह कहते-'चढ़ाओ इन्हें फाँसी पर!' नीदरलैंड के इतिहास में अंकित इस 'यमासन' को अंग्रेजो ने सुधारकर विकसित किया था, इसमें कोई शंका नहीं, क्योंकि इनके न्यायाधीश कभी भी सोते नहीं थे। इतना ही नहीं, कोर्ट मार्शल पर नियुक्त होने के पूर्व उन्हें यह शपथ लेनी पडती थी कि हम निरपराध या अपराधी यह भेद न करके सबको फाँसी का दंड देंगे। [57] यह पवित्र शपथ लेकर अंग्रेज लोग निरपराध नेटिव को फाँसी पर चढाने के लिए जहाँ न्याय करते हैं उस स्थान को अंग्रेजी भाषा में कोर्ट मार्शल' कहा जाता है।

मेरठ और दिल्ली में मारे गए मुट्ठी भर अंग्रेज लोगों के लिए हजारों निरपराध लोगों से ऐसा पैशाचिक प्रतिशोध लेते हुए कमांडर बर्नार्ड दिल्ली के पास पहुँचने के पहले मेरठ में शेष बची गोरी सेना से मिलने का अवसर देख रहा था। मेरठ में अंग्रेजों की बड़ी सेना थी, यह पहले कहा जा चुका है। वह सेना अंबाला से निकली सेना से मिलने नीचे उतर रही थी। परंतु इन सेनाओं के मिलने के पहले ही उनसे दो-दो हाथ करने क्रांतिकारी दिल्ली से आगे आए हुए थे। हिंडन नदी के किनारे दोनों ३० मई को मिले। क्रांतिकारियों का दायाँ बाजू तोपों से सुरक्षित था। अत: उस ओर मुँह मारने का प्रयास करने में अंग्रेजों को सफलता नहीं मिल रही थी। दाईं ओर तोपों और संगीनों की लड़ाई अच्छी जम रही थी, इतने में अंग्रेजों की मार के सामने बिलकुल न टिकते हुए क्रांतिकारियों का बायाँ बाजू उखड़ने लगा। यह देखते ही उनकी पंक्तियों में भगदड़ मच गई और पाँच तोपों को शत्रु के हाथों छोड़कर वे दिल्ली लौट आए। इस पहली लड़ाई में क्रांतिकारियों की हुई हार का अपयश देखकर ११वीं रेजिमेंट के एक शूर सिपाही ने तत्काल मृत्यु गले लगाई। अन्य अपने कर्तव्य करें न करें परंतु स्वयं मरने के पहले अपना जीवन किसी तरह सार्थक कर जाऊँ, ऐसी उदात्त स्फूर्ति से उस ११वीं रेजिमेंट के सिपाही ने अंग्रेजों के हाथों तोप पड़ेगी, यह जानते ही जान-बूझकर तोप और बारूदखाने में बंदूक चलाई। उसके जंगी धमाके में कैप्टन एंड्रयूज और उसके सारे साथी जलकर खाक हो गए तथा अनेक अंग्रेज घायल होकर गिर पड़े। स्वदेश भूमि को इतने शत्रुसिरकमल अर्पित करने के बाद उस देशवीर ने अपना भी सिरकमल उसकी सेवा में अर्पित किया। दिल्ली में बारूदखाना उड़ा देने के लिए कैप्टन विलोबी के स्तुति स्तोत्रों में जिस तरह अंग्रेज इतिहासकार रम जाते हैं, वैसे ही केवल राष्टकार्य के लिए प्राण निछावर करनेवाले उस शूर सिपाही के स्तुति स्तोत्र गाने में क्या उसके देशबंधुओं को नहीं रँगना चाहिए? पर इस शहीद का नाम भी इतिहास को ज्ञात नहीं। इस देशवीर के लिए 'के' कहता है-"विद्रोहियों में भी ऐसे अनेक शरवीर विद्यमान थे जो अपने राष्ट्र-कार्य की सफलता हेतु प्रसन्न वदन मृत्यु का आलिंगन करने को तत्पर रहते थे तथा काल को भी चुनौती देते थे।" [58]

इस पहली लड़ाई में अंग्रेजों की पूर्ण विजय हो जाने से कलकत्ता तक इस अनुमान से डाक द्वारा यह पूछताछ होने लगी कि अब एक-दो दिन में दिल्ली गिरने को है; परंतु वास्तविक स्थिति कितनी अलग थी। इस अभूतपूर्व, आकस्मिक और अस्त-व्यस्त क्रांतियुद्ध का विकराल स्वरूप देखकर भी वह पहला धक्का सहकर उसपर अंकुश लगाने की खूबी और हिम्मत यद्यपि उत्पन्न नहीं हुई थी, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रुकना नहीं, यह इच्छा अवश्य अति उत्कटता से दिल्ली के हजारों नागरिकों के हृदय में उछल रही थी और इसीलिए दिनांक ३० की पराजय के लिए सारी रात नागरिकों द्वारा धिक्कारे गए सिपाही फिर से ३१ मई को बाहर निकले। क्रांतिकारियों की तोपों की भारी मार शुरू होते ही अंग्रेजों ने भी अपनी तोपें दागनी शुरू की। क्रांतिकारियों की तो आज अच्छे अनुशासन और बड़ी जिद से हमला कर रही थीं, इसलिए अंग्रेजों की प्राणहानि भी बहुत होने लगी। मई माह की धूप अंग्रेजों को असह्य थी सो अलग। फिर भी अंग्रेजों ने कल की तरह हमला करने का प्रयास किया, पर वह सफल नहीं हो रहा था। अंत में शाम को अंग्रेज अंतिम हमला करने निकले। इसके आगे उन्हें रोकना कठिन होगा, यह देखते ही क्रांतिकारियों ने तोपों का एक भयानक हमला किया और उस हमले से अंग्रेजों की तितर-बितर हुई सेना फिर से एकत्रित हो तब तक अपनी तो सँभालते हुए रणांगण छोड़ दिया। कोई बात नहीं, एक दिन में स्थिति कुछ सुधरी ही है। कल और ऐसी तीसरी पराजय झेली तो भी अंगेजों की दर्दशा होगी, क्योंकि अब उनमें क्रांतिकारियों से छोटी हाथापाई करने लायक भी शक्ति नहीं है। जून की पहली तारीख को ऐसी चिंता में पड़े अंग्रेजी कैंप के पीछे से एक सेना आती दिखी। अपनी पिछाड़ी पर चली आ रही यह सेना काले रंग की है, यह देखते ही अंग्रेजों में हड़बड़ी मच गई और वे किसी तरह संरक्षण के लिए तैयार होते तभी उनके ध्यान में आया कि वह क्रांतिकारियों की सेना नहीं है अपितु मेजर रीड की अधीनता में अंग्रेजों की ओर से लड़ने गुरखे आ रहे हैं। अंबाला से नीचे आ रही अंग्रेजी फौज को सिखों की सहायता और मेरठ से नीचे आ रही फौज को गुरखों की सहायता! ऐसी स्थिति में बेचारे गरीब क्रांतिकारी क्या करेंगे? ये दोनों अंग्रेजी सेनाएँ ७ जून को एक-दूसरे से मिल गईं। इस समय दिल्ली पर घेरा डालने के लिए तैयार करवाई गई। सीजट्रेन भी नाभा के राजा की सहायता से सहीसलामत आ पहुँची। इस सीजट्रेन के अंबाला पहुँचते ही उसे साथ लेकर ५वीं रेजिमेंट सहित अंग्रेजों की इकट्ठी हुई वह सेना हमला करने के लिए दिल्ली के पास के अलीपुर गाँव तक आ पहुँची।

अंग्रेजी सेना के अलीपुर पहुँचने का समाच र सुनते ही क्रांतिकारी फिर से दिल्ली के बाहर निकले और उनका बुंदेल की सराय नामक स्थान पर अंग्रेजी सेना से सामना हुआ। इस समय अंग्रेजों की सेना भरपूर सामग्री, उत्तम सेनापति, ताजा दम सैनिकों और लाभ का स्थान, इतनी बातों से युक्त थी तो क्रांतिकारियों की ओर उनकी सदिच्छा के सिवाय दूसरी कोई शक्ति नहीं थी। जिसने रणभूमि का कभी मुँह भी नहीं देखा, ऐसे एक राजपुत्र पर सेनापतित्व का दायित्व था। उनकी संख्या में सिपाहियों से असैनिक ही अधिक थे और उसमें भी अपने ही देशबंधु सिख और गुरखा-फिरंगियों की ओर होने से उनका मन निरुत्साहित था। ऐसी स्थिति में यह लड़ाई एक बहुत बड़ा तमाशा होगा, ऐसा विश्वास अंग्रेजों को था। परंतु इतनी विरोधी बातों की भी परवाह न करती स्वराज्य की विलक्षण चेतना उन सिपाहियों के मन में उत्पन्न हो गई थी जिससे उन्होंने अंग्रेजी सेना को टक्कर देने में ऐसा कमाल किया कि अंग्रेजों को जल्दी ही समझ में आ गया, यह तमाशा न होकर वास्तव में जान लेने या देनेवाली लड़ाई है। दिल्ली की सेना की तोपें इतनी जिद और जोर से मार करने लगीं कि ऐसा लगने लगा जैसे उसके सामने अंग्रेजी सेना की कुछ भी नहीं चलेगी। अंग्रेजी तोपखाने के गोलंदाज और अधिकारी चट-पट मरने लगे और क्रांतिकारियों की तोपों की मार और भी तेज हो गई। यह देखते ही अंग्रेजों ने अपनी पैदल सेना को तोपों पर हमला करने का कड़ा आदेश दिया। यह अंग्रेजी पैदलों का हल्ला देखते-ही-देखते क्रांतिकारियों के तोपखाने से आकर भिड़ गया, फिर भी उस दिन क्रांतिकारी तोपें छोड़कर एक इंच भी इधर-उधर नहीं हुए। स्वराज्य और स्वदेश के लिए लड़नेवाले वीरों को शोभा दे, ऐसी ही अटल रीति से अंग्रेजी सेना की संगीन छाती में घुसने तक उन्होंने अपना स्थान नहीं छोड़ा। परंतु ऐसे शूर मर्दो को अपनी कति से उत्तेजना देना तो दूर, उनके साथ अंत तक केवल खड़ा रहनेवाला सेनापति भी उन्हें नहीं मिला था, बल्कि जब अंग्रेजों की संगीन छाती में घुसने के बाद भी अपना स्थान छोडकर एक पैर भी पीछे न हटानेवाले वीर स्वदेश और स्वधर्म के लिए प्राण न्योछावर कर रहे थे तो उनका कमांडर-इन-चीफ तोप की पहली आवाज होते ही सिर पर पाँव रखकर दिल्ली भाग गया था। इतने में उस अभागी सेना की बाईं ओर अंग्रेजों के घुड़सवार टूट पड़े और उनपर पीछे से होपग्रांट ने घुड़सवार-तोपखाने से हमला किया। इस तरह अपनों और परायों द्वारा अनाथ हुई वह सेना दिन भर लड़ी गई लड़ाई का कुछ भी श्रेय न मिलने पर तितरबितर होकर दिल्ली में घुसने लगी। जनरल बर्नार्ड ने इस विजय का अधिकतम लाभ प्राप्त करने हेतु अपनी सेना को उन्हें वैसे ही धकियाते जाने का आदेश दिया और वह अंग्रेजी सेना उस दिन शाम तक दिल्ली की दीवारों से आ भिड़ी। उस दिन की लड़ाई में क्रांतिकारियों का शहर-बाहर का सारा कब्जा नष्ट हो गया और अंग्रेजों को दिल्ली पर मोरचा लगाने के लिए अति उत्तम स्थान मिल गए। यहाँ यह कहना आवश्यक है कि उस दिन की लड़ाई में सीमूर की गुरखा पलटन ने बड़ा पराक्रम दिखाया, इसलिए अंग्रेजी इतिहासकार उन्हें बहुत शाबासी देते हैं। स्वदेश स्वतंत्रता के गले पर छुरी चलाने के काम में अति उत्सुकता और अद्वितीय शूरता दिखाने के कारण उन गुरखों के नाम सदा-सर्वदा के लिए शापित हुए हैं, इसमें तिल भर भी शंका नहीं।

इन देशद्रोही गुरखों की सहायता से अंग्रेजों ने बुंदेल की सराय की लड़ाई जीती अवश्य, परंतु इस जय ने उनके मनोराज्य को धूल में मिला दिया; क्योंकि दिल्ली के बाहर दोपहर लड़ाई लड़कर उस दिन की रात दिल्ली के राजमहल में रिपुरक्त का प्राशन करते बिताएँगे, ऐसी जो अंग्रेज सैनिकों को आशा थी वह इस लड़ाई ने पूरी तरह खत्म कर डाली। दिल्ली में केवल असैनिक लोग ही नहीं भरे थे, स्वराज्य और स्वधर्म के रक्षणार्थ म्यान से बाहर निकली तलवारें भी सिद्धांतनिष्ठा के संकल्प के साथ उस प्राचीर पर बीच-बीच में झलकती हैं, यह अप्रिय सत्य अंग्रेजों की नजर में इस लड़ाई ने ला दिया। इस लड़ाई में अंग्रेजों के एक सौ चौंतीस लोग घायल हुए तथा चार अधिकारी और सैंतालीस लोग मारे गए। परंतु इन सब मृतकों में अंग्रेजी लश्कर में दु:ख और उदासीनता फैलानेवाली जो मृत्यु हुई वह ऍडज्यूटंट जनरल कर्नल चेस्टर की थी। लड़ाई की भीड़ में यह मृत्यु हुई। क्रांतिकारियों की ओर की हानि बताते हुए अंग्रेज इतिहासकार उपन्यासकारों से भी बढ़-चढ़कर कैसा वर्णन करते हैं यह आगे दिखेगा। परंतु इस प्रथम महत्त्वपूर्ण लड़ाई की गड़बड़ में भी विशेष रूप से उल्लेखनीय एक बात अवश्य कहनी है कि उस दिन अंग्रेजों के हाथ लगी क्रांतिकारियों की तोपों की संख्या एक तेरह कहता है और दूसरा पूरी छब्बीस, जबकि ये दोनों ही वहाँ उपस्थित सरकारी अधिकारी थे।

इस तरह दिनांक ८ जून को संध्या समय अंग्रेजी सेना ने दिल्ली की प्राचीर तक आकर तंबू ठोंके। अंबाला और मेरठ से दिल्ली की ओर अंग्रेजी सेना को अबाधित रीति से लाने का कार्य-पंजाब की स्थिति पर पूरी तरह अवलंबित होने से उस महत्त्वपूर्ण प्रांत में मेरठ के विद्रोह के क्या परिणाम हुए, वहाँ के स्वदेशी लोगों ने क्या प्रयास किए और उनका प्रतिकार करने के लिए अंग्रेजों के सोचे हुए उपायों को कितनी सफलता मिली, इस सबका जायजा लेना अति आवश्यक है। सिखों का साम्राज्य डुबोकर पंजाब प्रांत को पूर्णतया ब्रिटिशों के अधीन लाने के बाद डलहौजी ने उन लोगों का सैनिकी बाना और स्वतंत्रता प्रेम, इन दो सद्गुणों का नाश करनेवाली अपनी राज्य व्यवस्था की नीति रखी। सर हेनरी लॉरेंस और सर जॉन लॉरेंस इन दो प्रमुख कूटनीतिज्ञों को प्राप्त इस नवीन प्रांत की राज्य व्यवस्था मिलते ही उन्होंने पंजाब के लोगों को पूरी तरह नि:शस्त्र कर दिया। उनमें से अधिकतर सिख सिपाहियों को उन्होंने अपनी सेना में मिला लिया। उत्तर हिंदुस्थान की अंग्रेजी सेना का अधिकांश ऊपर लाकर उसके डेरे पूरे पंजाब भर में फैला दिए और इस योजना से सारे सूत्र चलाए कि सब लोग खेती की ओर ध्यान देकर अपनी उपजीविका कमाने के नशे में गर्क हो जाएँ। लोगों के किसान हो जाने पर उनके सैनिकी गुण घुटते जाते हैं, वे शांति के बहुत भूखे हो जाते हैं और उनकी खेती में बाधक राज्य क्रांतियों की लहरों को उनकी अनुमति सहज नहीं मिलती। ऐसी गहरी राजनीति से प्रेरित अंग्रेजों की नीति का पंजाब के लोगों पर जल्दी ही प्रभाव पड़ा और रणजीतसिंह का साम्राज्य और स्वतंत्रता नष्ट हुए दस वर्ष बीतते-बीतते पंजाब में हर कोई तलवार छोड़कर हल की गूंठ पकड़ने लगा और जिसने स्वयं हल नहीं पकड़ा ऐसे सिख सिपाहियों ने अंग्रेजी लश्कर में प्रवेश कर वह (हल) अंग्रेजों की ओर से अपनी मातृभूमि पर चलाया। ऐसी स्थिति में पंजाब में वास्तव में कुछ भी गड़बड़ नहीं होगी, ऐसा उस प्रांत के मुख्य अधिकारी जॉन लॉरेंस को विश्वास था। मई माह प्रारंभ होने तक अन्य अंग्रेज कूटनीतिज्ञों की तरह उस प्रांत के मुख्य अधिकारी सर जॉन लॉरेंस को भावी संकट की कुछ भी कल्पना न होने से वह गरमी के कारण लाहौर छोड़कर 'मरी' हिल्स की ठंडी हवा में जाने को तैयार हुआ कि तभी १० मई को मेरठ के विद्रोह की और ११ मई को दिल्ली स्वतंत्र होने का विद्युत् समाचार पंजाब पर आ गिरा। यह सुनते ही पंजाब के उस चाणक्य (धूर्त) चीफ कमिश्‍नर को समाचार की भयंकरता पूरी तरह समझ में आ गई और अंग्रेजी साम्राज्य को उलट देनेवाले इस आघात से निपटने वह रावलपिंडी में ही जमकर बैठ गया।

इस समय पंजाब की अंग्रेजी सेना का अधिकतर हिस्सा मियाँ मीर में था। मियाँ मीर की छावनी लाहौर के बहुत पास थी, अत: लाहौर के किले पर उन्हीं सिपाहियों में से चुने हुए सिपाही सुरक्षा के लिए रखे गए थे। इस छावनी में देसी सिपाही यूरोपियन सोल्जर से चार गुना अधिक होते हुए भी मेरठ का समाचार आने तक उनके लिए अंग्रेजी अधिकारियों के मन में कोई विशेष आशंका नहीं थी और इसीलिए वे क्रांतिकारियों से मिले हुए हैं या नहीं, यह एकाएक निश्‍चित करना बहुत कठिन हो गया। उस समय लाहौर में रॉबर्ट मोंटगोमरी मुख्य अधिकारी था। मोंटगोमरी और जॉन लॉरेंस ये दोनों ही डलहौजी की प्रशिक्षा में तैयार हुए थे, अतः त्वरित बुद्धि और अकस्मात् आ पड़े संकट से पार पाने में आवश्यक साहस और धैर्य में प्रवीण थे। फिर भी पंजाब के सिपाहियों में स्वतंत्रता की चेतना कहाँ तक उत्पन्न हुई है, इसकी सही जानकारी प्राप्त करना आवश्यक था। इस कार्य पर एक ब्राह्मण डिटेक्टिव की मियाँ मीर के सिपाहियों का मन जानने के लिए नियुक्ति की गई। उस ब्राह्मण ने अपना देशद्रोही कार्य उत्तम रीति से सिद्ध करके मोंटगोमरी से निवेदन किया कि 'साहब, वे सारे फसादी हैं और फसाद में बुरी तरह डूबे हुए हैं।' ऐसा कहकर उसने अपना हाथ अपने गले से लगाकर दिखाया। इस ब्राह्मण की यह वार्ता सुनकर अंग्रेजों की आँखों का भ्रम पटल हट गया। विद्रोह की गुप्त तैयारी केवल उत्तर हिंदुस्थान में ही नहीं अपितु उसकी ज्वालाएँ सारे पंजाब में उचित अवसर पर उफन पड़ने तक दबी बैठी हैं, यह उन्हें स्पष्ट नजर आ गया और यह भयानक रहस्य प्रकट करनेवाले मेरठ के विद्रोह को धन्यवाद देते हुए मोंटगोमरी ने मियाँ मीर की नेटिव सेना को तत्काल निःशस्त्र करने का आदेश दिया। मई माह की तेरहवीं तारीख को सुबह के समय मियाँ मीर में एक जनरल परेड बुलाई गई। सिपाहियों को इसकी कोई पूर्व सूचना न मिले इसलिए उस सुबह के पहले दिन सारे अंग्रेज लोगों के लिए एक जंगी बॉल कार्यक्रम आयोजित किया गया। अंग्रेजों के इस बाहरी मनोरंजन का मर्म नेटिव सिपाहियों के ध्यान में आने के पूर्व ही उन्हें अचानक यूरोपियन सोल्जरों, घुड़सवारों और तोपखाने के घेरे में ले लिया गया और इस कपट नाटक का नेटिव सिपाहियों को पता चलते ही हमेशा की तरह परेड के बीच ही एकाएक तोपखाने को बत्ती लेकर तैयार रहने का आदेश हुआ और यह विचित्र आदेश सुनकर चकित उन रेजिमेंटों को हथियार नीचे रखने के आदेश दिए गए। गुस्से से गुर्राए पर प्रदीप्त तोपखाने के कारण हताश उन हजारों नेटिव सिपाहियों ने अपने-अपने हथियार नीचे डाले और एक अक्षर भी बोले बिना अपनी-अपनी लाइनों की ओर लौट गए।

अति शूर और जिसके पराक्रम से ही अफगानिस्तान में अंग्रेजों के प्राण बचे थे, उसी पंजाबी सेना को मियाँ मीर में नि:शस्त्र करने की इस विधि-प्रक्रिया में ही वहाँ की सेना की एक टुकड़ी लाहौर के किले पर भेजी गई। उस टुकडी ने लाहौर किले के तोपखाने पर नियुक्त अंग्रेजी सोल्जर की सहायता से वहाँ के नेटिव सिपाहियों को निःशस्त्र कर किले से निकाल दिया और किला अपने कब्जे में ले लिया। १३ मई को अंग्रेजों ने जिस फुरती से यह साहस भरा कृत्य पूरा किया उस फुरती में यदि एक अणु मात्र भी ढील हुई होती तो उस दिन से पंद्रह दिन के अंदर सारा पंजाब विद्रोह की आग में जलने लगा होता। क्योंकि पेशावर, अमृतसर, फिल्लौर, जालंधर इन अलग-अलग स्थानों पर स्थित पलटनें बड़ी उत्सुकता से इसकी प्रतीक्षा कर रही थीं कि मियाँ मीर के सिपाही लाहौर के किले पर कब टूट पड़ते हैं। फिरंगियों द्वारा मियाँ मीर के सिपाहियों को निःशस्त्र कर लाहौर का किला कब्जे में लेने का समाचार फैलते ही पंजाब भर में अंग्रेजों का दबदबा फिर बढ़ने लगा। [59]

परंतु लाहौर के दुर्ग से भी अति महत्त्पूर्ण स्थान अमृतसर का गोविंदगढ़ था। अमृतसर नगर सिखों के लिए काशी क्षेत्र होने से यहाँ किसी प्रकार की गड़बड़ी होने पर उन सारे लोगों के संतप्त हो जाने की संभावना थी इसलिए क्रांतिकारी सिपाहियों की उसपर अधिक नजर थी। मियाँ मीर के निःशस्त्र सिपाही गोविंदगढ़ जीतने के लिए अमृतसर की ओर आ रहे हैं, यह अफवाह उठ जाने से अंग्रेजों में दहशत फैल गई और उन्होंने अमृतसर को बचाने के लिए सिख और जाट किसानों से विनती की। इस विनती को उन राजनिष्ठ देशद्रोहियों ने माना और अमृतसर का किला-लाहौर के किले की तरह ही अंग्रेजों ने पूरी तरह अपने अधिकार में ले लिया। इस तरह १५ मई के पहले ही लाहौर और अमृतसर, ये दो शहर तात्कालिक रूप से क्रांति की ज्वालाओं से सुरक्षित कर लिये गए।

इतनी सुरक्षा होते ही सर जॉन लॉरेंस केवल अपने मातहत प्रदेश की चिंता नहीं कर रहा था; दिल्ली का समाचार मिलते ही उसने कहा कि यह सिर्फ विद्रोह नहीं है अपितु राज्य क्रांति होनेवाली है। फिर भी उसका अनुमान था कि दिल्ली यदि झटके में वापस आ गई तो फिर और कहीं विद्रोह नहीं होगा। इसी आधार पर उसने जनरल अॅन्सन को जून माह के पहले दिल्ली जीत लेने के लिए पत्र-पर-पत्र लिखे। इतना ही नहीं अपितु पंजाब में सब ओर शांति बनाए रखने का काम अपने जिम्मे लेकर दिल्ली पर हमला करने के लिए और अंबाला में सेना की कमी को पूरी करने के लिए पंजाब से लश्कर भेजना प्रारंभ किया। इस सहायता की पहली खेप डॉली के अधीन भेजी गई गाइड कोर रेजिमेंट थी। जॉन लॉरेंस का डॉली की बहादुरी पर बहुत विश्वास था और इसीलिए दिल्ली पर चढ़ाई करने के लिए उसने उसीको चुना। डॉली अपनी रेजिमेंट लेकर मंजिल-दर-मंजिल दिल्ली की ओर बढ़ा और बुंदेल की सराय की लड़ाई के दूसरे दिन वहाँ की अंग्रेजी सेना से आकर मिल गया। दिल्ली के घेरे में अब दो नेटिव रेजिमेंट हो गई थीं-एक गुरखों की रीड के अधीन और दूसरी डॉली के अधीन पंजाब से आई हुई। इन दोनों रेजिमेंटों पर अंग्रेजों की बड़ी कृपा थी और वह अनुचित थी यह कौन कहे? इन नेटिव रेजिमेंटों ने उस कृपा के बदले वैसा ही देशद्रोह किया था।

डॉली की रेजिमेंट के दिल्ली की ओर रवाना होने के बाद सर जॉन लॉरेंस ने पंजाब की कुल परिस्थिति का सूक्ष्म निरीक्षण किया। उस प्रदेश में हिंदू, सिख और मुसलमानों का आपस में अखंड द्वेष शुरू था। उत्तर हिंदुस्थान में हिंदू और मुसलमान दोनों को ही स्वदेशाभिमान का जैसा चैतन्य मिला हुआ था वैसा पंजाब के लोगों को उस समय मिला नहीं था। वास्तव में उनकी स्वतंत्रता गए दस वर्ष भी नहीं हुए थे। अंग्रेजों के कंठनाल पर सन् १८४९ में जो सिख सिपाही कुल्हाड़ी चला रहे थे वे ही सन् १८५७ में उनके गले क्यों लगने लगे, इस विलक्षण कूट प्रश्न का खुलासा इसी बात में होनेवाला है कि उनकी स्वतंत्रता जाते-न-जाते ही सन् १८५७ की क्रांति आ गई थी। मुसलमानों की परतंत्रता पर जिस शूर और स्वाभिमानी जाति को इतना गुस्सा आया था कि सौ वर्ष तक अखंड लड़ाई कर अंत में पंजाब को स्वतंत्र किए बिना उन्होंने तलवार नीचे नहीं रखी, उसी खालसा पंथ के अनुयायियों ने अंग्रेजों की गुलामी को इतना चाहा हो, ऐसा बिलकुल नहीं है। पर अंग्रेजों का राज गुलामी है या नहीं, यह उन सिपाहियों की बुद्धि में पूर्णता से आ भी नहीं पाया कि सन् १८५७ आ गया। अंग्रेजों का राज हिंदुस्थान पर ऐसे ही समय आया जिस समय हिंदुस्थान में एक ऐतिहासिक जल प्रलय शुरू हो गया था। अनेक सदियों के बाद स्थान-स्थान पर अलग-अलग जमा जलसर अपने-अपने अपेक्षित बाँधों को फोड़कर एक प्रचंड महानदी में विलीन हो रहे थे। यह महानदी थी हिंदुस्थान की एकराष्ट्रीय प्रवृत्ति। आज विश्व में जो-जो राष्ट्र एकीकृत और संगठित हुए हैं उन सबको वह एकीकृत अस्तित्व आने के पहले, और आने के लिए ही ऐसी अराजकता और गृह कलह की अग्नि में पिघलना पड़ा था। इटली का गृहयुद्ध, जर्मनी का गृहयुद्ध और स्वयं इंग्लैंड का रोम साम्राज्य के पतन के बाद का गृहयुद्ध-उनमें उनके विभिन्न प्रांतों और विविध जातियों की कड़ी शत्रुता और प्रतिशोध लेने के लिए एक-दूसरे पर किए गए अत्याचार-आदि की ओर देखें तो ऐसा लगता है जैसे हिंदुस्थान का यह गृहयुद्ध कुछ भी नहीं था। परंतु उपर्युक्त देशों को गृह कलह की भयानक आग में तथा गुलामीगिरी की अत्यंत तीव्र उष्णता में पिघलना पड़ा इसीलिए आज उनका एक संगठित, सुंदर और सबल व्यक्तित्व बना है, यह भी कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। वैसी ही ऐतिहासिक उत्क्रांति से भारतभूमि की घटना गुजर रही थी। गुलामी की आँच हिंदुस्थानी लोगों को अच्छी तरह लग जाने से वे संगठित होने लगे थे। परंतु पंजाब को वह गुलामीगिरी की आँच पूरी तरह लगने में दस वर्ष की अवधि कम थी और इसीलिए विशेषत: सिख सन् १८५७ के उबलते राष्ट्रतेज में विलीन न हो सके थे। [60]

पंजाब के अंग्रेज अधिकारियों के ध्यान में यह सत्य आ गया था और इसीलिए उन्होंने सिखों और जाटों में मुसलमानों के प्रति द्वेष अधिक-से-अधिक भड़का देने का कार्य शुरू किया। सिख लोगों में मान्य एक पुराने भविष्य कथन का उन्हें स्मरण कराया गया। पहले मुगल बादशाह ने जहाँ अपने गुरु को मार डाला था उसी दिल्ली पर 'खालसा साहब' एक बार हमला कर उसे धूल में मिला देनेवाले हैं, ऐसा भविष्य संदेश हर सिख को दिया गया था। उस भविष्य कथन की पूर्णता होने का समय अब सच में ही आ गया। पर इस समय कदाचित् केवल 'खालसा साहब' ही दिल्ली पर चढ़ाई कर बैठा और उसने दिल्ली जीत ली तो इस भविष्य की पूर्णता का 'कंपनी साहब' को क्या लाभ? बहादुरशाह के स्थान पर कोई रणजीतसिंह दिल्ली पर राज्य करने लगेगा? हिंदुस्थान में रणजीतसिंह और बहादुरशाह दोनों ही न हों, इस हेतु जो प्रयास कर रहे थे उनको इस एकांगी भविष्य में कुछ संशोधन करना आवश्यक और सहज था। संशोधन करके जारी किए गए भविष्य के नए संस्करण में ऐसा लिखा हुआ था कि दिल्ली मिट्टी में तब ही मिलेगी जब खालसा साहब और कंपनी साहब एक होंगे। भविष्य तो भविष्य ही है। एक बात बुरी है, वह यह कि आज के भविष्य कल भूत हो जाते हैं। पर कम-से-कम आज जितना हो सके उतना लाभ ले लेना बुद्धिमानी है। इस भविष्य के अतिरिक्त सिख लोगों में दिल्ली के प्रति अधिक गुस्सा दिलाने के लिए एक झूठी घोषणा की गई कि दिल्ली में बादशाह ने यह आदेश जारी किया है कि 'सारे सिखों को एक साथ कत्ल किया जाए!' अरे रे! बेचारा गरीब बादशाह !! इसी समय वह दिल्ली की सड़कों पर स्वयं घूम-घूमकर यह कह रहा था कि यह युद्ध केवल फिरंगियों के विरुद्ध है, अतः स्वदेशी लोगों को खरोंच तक न लगने दी जाए। [61]

परंतु क्रांतिकारियों के बहुत जोर लगाने पर भी सिख अंग्रेजों की ओर ही रहे। पंजाब में जहाँ-जहाँ सेना की रेजिमेंट थीं वे अधिकतर हिंदुस्थानी लोगों की थीं। इस कारण उन सबने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए कमर कसी हुई थी और वे अपने नियत संकेत-समय की प्रतीक्षा में रुके थे। केवल हिंदुस्थानी सिपाही ही पंजाब में स्वातंत्र्य को ललचाए थे, ऐसा बिलकुल नहीं था, लश्कर के बाहर हर तरह के व्यवसायी नागरिक भी राज्य क्रांति के 'बीज' यहाँ-वहाँ छितराए हुए थे। मियाँ मीर के सिपाहियों को नि:शस्त्र करने के बाद जल्दी ही ज्ञात हुआ कि वे जिस पर्वत पर शांति से सो रहे थे उसमें कितने विस्फोटक पदार्थ भरे पड़े हैं। लाहौर और अमृतसर के किले यद्यपि अंग्रेजों ने सुरक्षित कर लिये तब भी फिरोजपुर में रखा गोला-बारूद का भंडार अभी असुरक्षित ही था। उस भंडार के लालच में वहाँ के नेटिव सिपाही विद्रोह करने को तैयार हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए १३ मई को एक परेड की गई। सिपाहियों ने परेड पर अपना व्यवहार इतना शांत रखा कि उस समय उनके हृदय में भड़क रही क्रोधाग्नि की एक चिनगारी भी बाहर नहीं आई। अतः उनको निःशस्त्र करने का विचार त्यागकर तथा उनको केवल अलग-अलग रखने का निर्णय लेकर उनमें से एक पलटन को शहर के बाजार में से ले जाया गया। परंतु किस लेन-देन के लिए वह फिरोजपुर का बाजार भरा था, इसकी भनक अंग्रेजों को कैसे लगे? सिपाही लोग उस बाजार से चले तो उन्हें दुकानदारों और दूसरे लोगों ने स्वराज्य की हवा बेचना प्रारंभ किया जिससे बाजार से निकलते-निकलते सिपाहियों के मन की चंचलता नष्ट हो गई; दृढ़ निश्चय हो गया और 'हर-हर महादेव' की घोषण हो गई। सिपाहियों के आक्रमण से गोला-बारूद का भंडार बचाना कठिन लगते ही उसे उड़ा देने के सिवाय अंग्रेजों को अन्य उपाय ही न रहा। बारूद का भंडार उड़ा देखकर स्वराज्य का निशान जिस दिल्ली की प्राचीर पर स्वदेश वीरों को बुला रहा था उस प्राचीर की ओर सिपाही दौड़ चले। इसी समय फिरोजपुर शहर भी विद्रोही हो गया और यूरोपियन लोगों के बँगले, तंबू, भोजनालय, प्रोस्टेंट चर्च, कैथोलिक चर्च जलाते, गिराते, लूटते, नष्ट करते लोग यूरोपियन कहाँ हैं, इसकी पूछताछ करते यहाँ-वहाँ घूमने लगे। परंतु मेरठ के तार से चेते हुए यूरोपियन पहले ही बैरकों के पीछे जाकर सुरक्षित बैठे थे। सिपाहियों का पीछा करने जो अंग्रेजी सेना भेजी गई थी वह, जो सामने आया उसे मारते और अपनी क्रूरता पर घमंड करते हुए लौट आई।

पंजाब में अंग्रेजों की सत्ता को जैसे अंदरूनी असंतोष का डर था वैसे ही उसे सरहद पार के अफगानी डकैतों का भी डर था। सन् १८५७ के क्रांतियुद्ध की गुप्त चर्चा के समय लखनऊ की गुप्त समिति ने काबुल के अमीर की सहायता माँगने का प्रयास किया था। क्योंकि सन् १८५६ के अगस्त माह में मि. फारसिथ के हाथ एक पत्र पड़ा था जिसमें यह स्पष्ट लिखा था-"लखनऊ के मुसलमानों ने अमीर दोस्त मोहम्मद से संबंध जोड़े हैं। अयोध्या का राज्य अधिग्रहीत हो गया है और अब हैदराबाद पर एक कुल्हाड़ी चलते ही मुसलमानी सत्ता का नाम भी फिर से सुनाई न देगा। इसका समय पर ही कुछ उपचार करना होगा। यदि लखनऊ के लोगों ने स्वराज्य के लिए विद्रोह किया तो आपकी ओर से-हमारे दोस्तों की ओर से-कहाँ तक सहायता मिलने की संभावना है?" लखनऊ के इस प्रश्न का उस राजनीतिपटु अमीर ने अस्पष्ट उत्तर दिया-"जो होगा, देख लेंगे।" परंतु काबुल के अमीर से अंग्रेजों का हाल ही में समझौता हो जाने के कारण उन्हें अमीर से अधिक पेशावर के नजदीक की स्वतंत्र मुसलमान जमातों से अधिक डर था और मुसलमानी जमातों में कोई अंग्रेजों से मिल न जाए, यह उपदेश करने सैकड़ों मुल्ला यात्रा पर निकले थे। पेशावर में इस समय जो अंग्रेज अधिकारी थे वे सारे ही साहसी, राजनीतिपटु और युद्ध विशारद थे, इसमें कोई शंका नहीं। निकल्सन, एडवर्ड्स, चेंबरलेन आदि अधिकारियों के उत्साह के कारण और उन्हें जॉन लॉरेंस जैसे वरिष्ठ अधिकारी से प्राप्त अचूक सहायता के कारण पेशावर की ओर का यह संकट बड़े धैर्य से टाला गया। उन्होंने तत्काल ही जान लिया कि विद्रोह करना चाहनेवाली मुसलमान जमातों को किस तरह अपनी ओर करना चाहिए और धन का लालच मिलते ही वे सारे पहाड़ी लोग अंग्रेजी सेना में नौकरी पाने की जल्दी करने लगे। पहाड़ी लोगों को धनबल पर खरीदते ही जॉन लॉरेंस ने पंजाब में इधर-उधर सुलगते असंतोष को वहीं-का-वहीं दबा देने के लिए एक घुमंतू सेना का निर्माण किया। इस सेना में अनुभवी, कसे हुए, जिनकी ईमानदारी पर अंग्रेजों को पूरा विश्वास था, ऐसे नेटिव सिपाही एवं अंग्रेज सोल्जर लिये जाते। इस सेना का गठन होते-होते ही उसके लिए एक काम तैयार हो गया, क्योंकि पेशावर की ओर के भारतीय सिपाहियों में मियाँ मीर की नि:शस्त्रता की घटना का समाचार पहुँचते ही बड़ी खलबली मच गई थी इसलिए इस भारतीय सेना पर स्वयं पहली चोट करने की योजना पेशावर के साहसी अंग्रेज अधिकारियों ने बनाई और वे उस सारी सेना को नि:शस्त्र करने को तैयार हो गए। परंतु उस भारतीय सेना के अंग्रेज कमांडर आदि अधिकारियों को अपने सिपाहियों का यह अपमान बहुत बुरा लगा। सन १८५७ में जो एक विलक्षण गुप्तता चारों ओर रखी गई थी उसीके जाल में फँसे ये अंग्रेज अधिकारी यह मानने को बिलकुल तैयार नहीं थे कि उनके अधीनस्थ सिपाही विद्रोह पर उतारू हैं। फिर भी कॉटन और निकल्सन ने इन नेटिव सिपाहियों को २१ मई को सुबह के समय यूरोपियन सेना से घेरकर निःशस्त्र करने का आदेश दिया। इस अकस्मात् हुए हमले से बच पाना असंभव है, यह देखकर सारे सिपाहियों ने अपने हथियार नीचे रखे और यह अपमान भरा कृत्य देखकर क्रोधित उनके अंग्रेज अधिकारी भी अपने सिपाहियों के साथ कंपनी को धिक्कारने लगे।

पेशावर की नेटिव सेना को निःशस्त्र करने के बाद पंजाब सरकार को होती-मर्दान में रखी ५५वीं नेटिव रेजिमेंट की ओर देखने की फुरसत मिली। यह ५५वीं नेटिव रेजिमेंट विद्रोही हो गई है, इस संबंध में सरकार को विश्वास हो गया था। परंतु उन सिपाहियों के मुख्य सैनिक अधिकारी कर्नल स्पॉटिस वुड को सरकार के इस संदेह पर बहुत खेद हुआ।

हमारे सिपाही सरकार से कभी भी बेईमानी नहीं करेंगे, यह वह जी तोड़कर कहता रहा, फिर भी जब सरकार पर सवार खून नहीं उतरा तो उसका हृदय टूट गया। २४ मई को सिपाहियों के नेताओं ने कर्नल के पास आकर पूछा-"अंग्रेजी सेना पेशावर से हमपर हमला करने आ रही है, क्या यह समाचार सच है?" इस प्रश्न का कर्नल ने गोलमोल उत्तर दिया। सिपाहियों को उससे संतोष न होते हुए भी वे लौट गए। उस ५५वीं नेटिव रेजिमेंट का पेशावर की सेना की तरह खात्मा करने के लिए अंग्रेजी सेना वास्तव में चढ़ी चली आ रही थी। वह दुष्टतापूर्ण कार्य देखते बैठने की अपेक्षा कर्नल स्पॉटिस वुड ने अपने कमरे में जाकर आत्महत्या कर ली। यह समाचार ५५वीं रेजिमेंट को ज्ञात होते ही उसने खजाने पर हमला किया और अपने-अपने शस्त्र, निशान और वह खजाना लेकर वे सारे सिपाही फिरंगियों की गुलामी को लात मारकर आगे चले। परंतु होती-मर्दान से दिल्ली कोई पास नहीं थी। सारा पंजाब युरोपियनों की सुसज्ज सेना से अटा पड़ा था और यूरोपियन सेना पिछाड़ी पर टूटी पड रही थी। ऐसी स्थिति में सफलता इतनी कठिन थी कि पेशावर के सिपाहियों की तरह ही चुपचाप शस्त्र नीचे रखकर फिरंगियों के शरण जाने की बात भी उनके मन में आने लगी। परंतु अब फिरंगी दासता की बेड़ियाँ पैरों में डाल लेने की अपेक्षा यमपाश गले में डलवा लेना उन वीरों को पसंद आया और अपने पीछे लगी अंग्रेजी सेना को उसने यह बात कह दी कि 'अब लड़ते-लड़ते ही मरेंगे।' और इस ५५वीं रेजिमेंट ने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए सचमुच ही लड़ते-लड़ते प्राण दिए। इस ५५वीं रेजिमेंट की कहानी भी इतनी हृदयद्रावक है कि उसे सुनने पर-'अपि ग्रावा रोदत्यपि दलति वज्रस्य हृदयम्!' उनका पीछा करने के लिए निकल्सन इतना कठोर हो गया था कि वह चौबीस घंटे तक घोड़े से नीचे नहीं उतरा। सैकड़ों लोग उस लड़ाई में मारे गए और शेष लड़ते-लड़ते सरहद के बाहर निकल गए। परंतु वहाँ भी उन्हें आश्रय कौन दे? वहाँ की मुसलमान जमातों ने उनका स्वागत बहुत ही भयंकर तरीके से किया। उनमें से हिंदुओं को अकेले-अकेले पकड़कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया जाने लगा। तब वे अभागे सिपाही यह सोचकर कि अपने हिंदुत्व की रक्षा करने में कश्मीर का हिंदू राजा समर्थ होगा, आश्रय पाने, धर्मरक्षण करने एवं देशसेवा करने गुलाबसिंह के प्रदेश की ओर चल पड़े। रास्ता पथरीला, वहाँ अन्न नहीं, वस्त्र नहीं, विश्राम नहीं-ऐसे संकटों और कठिनाइयों से जूझते वे सैकड़ों हिंदू सिपाही-अपने धर्म का आज तीनों लोकों में कोई त्राता नहीं, इस दु:ख के अश्रु बहाते कश्मीर की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्हें चींटियों, कीड़ों की तरह मसल डालने को अंग्रेजों ने हर कदम पर तलवार चलाई। परंतु फिर भी अपने धर्म का त्राता कश्मीर में है, ऐसी उत्कट भावना से वे हजारों सिपाही कश्मीर की ओर बढ़ ही रहे थे। धर्म का त्राता! हाय!! हाय!!! यह ज्ञात होते ही कि वे कश्मीर की ओर आ रहे हैं, वहाँ के राजा राजपूत कुलोत्पन्न गुलाबसिंह ने उन अनाथ हुए और धर्मरक्षा के लिए मृत्यु से भी बच निकलनेवाले हिंदू लोगों को अपने राज्य में प्रवेश करने से मना किया। इतना ही नहीं अपितु इन हिंदुओं में से जो कोई जहाँ कहीं भी मिल जाए उसे वहीं काट डालने का कड़ा आदेश अपने लश्कर को देकर उसने अपना यह सद्कृत्य अंग्रेजों के दरबार में बड़े गर्व से सूचित किया। अब या तो धर्मांतरण करना या फिर गुलामी स्वीकार करना या मृत्यु का आलिंगन करना, यही कुछ करना था उन्हें । इन तीनों में से उन हिंदू शूरों ने तीसरा रास्ता अपनाया। अंग्रेजों ने कदमकदम पर निष्ठुरता से इतने कत्ल किए कि मैदानों में स्थित वधस्तंभ निरपराध हिंद रक्त से भीगकर सड़ने लगे। फिर भी अंग्रेजों को उस रक्तपात से घृणा नहीं हुई। वधस्तंभ-स्थायी वधस्तभ-जब रात-दिन काम करते वधिक थक गए तब तोपों के मुँह खोले गए। और जिस ५५वीं रेजिमेंट ने अंग्रेजों के रक्त की एक बूंद भी नहीं बहाई थी उसका हर सिपाही तोप से उड़ा दिया गया। एक हजार हिंदू चुटकी बजाते गारद कर दिए गए। परंतु उस अंतिम समय में भी उन हिंदू वीरों ने अपना वीरत्व नहीं त्यागा। क्योंकि फाँसी या तोप के प्रश्न के उत्तर में वे अटल होकर उत्तर देते"कुत्ते जैसे फाँसी पर नहीं मरेंगे-हमें तो तोप से उड़ाया जाना ही इष्ट है।" [62]

घोर जंगली आदमी भी लज्जित हो जाए, ऐसी क्रूरता से उपरोक्त शूरवीरों को काट डालने के लिए अंग्रेजी इतिहासकार कहते हैं-'यह दंड क्रूरतम था इसमें कोई शंका नहीं, परंतु उस समय की क्रूरता ही सर्वकालीन भूतदया है। भूतदया के लिए ही वह क्रूरता करना इष्ट था।' अंग्रेजी इतिहासकारो, तुम अपने ये बोल ध्यान में रखना, अच्छा! "घड़ी भर की क्रूरता में सदैव के लिए मानवता का मंगल निहित था।" इस वाक्य का जो अर्थ तुम अभी कर रहे हो वैसा ही वह तुम्हें क्या और थोडी देर बाद भी स्मरण रहेगा? सार्वकालिक भूतदया के लिए यह तत्कालिक क्रूरता कर रहे हो वह तो ठीक है, पर उधर कानपुर में हिंदुओं का नाना साहब बैठा हुआ है, यह भी थोड़ा ध्यान में रखना।

यहाँ एक बात और कहनी चाहिए कि क्रांतिकारियों द्वारा की गई मारकाट का वर्णन जो अंग्रेजी इतिहासकर कमाल की नाटकीयता से करते हैं वे ही (अंग्रेजी इतिहासकार) अंग्रेजों द्वारा किए गए अक्षम्य, अनन्वित एवं अमानुषिक अत्याचारों को जान-बूझकर छिपाने का प्रयास करने लगते हैं। उपर्युक्त दुर्दैवग्रस्त परंतु स्वाभिमानी रेजिमेंट का कत्लेआम जब चल रहा था तब उनके मृत्यु पूर्व तक अंग्रेजों के राक्षसी विद्वेष ने उन्हें कैसी-कैसी यंत्रणाएँ दी होंगी, वह केवल ईश्वर को ही ज्ञात होगा। क्योंकि उन भयानक कहानियों को इतिहास से पोंछ डालने के लिए अंग्रेजी इतिहासकारों ने उसका कोई संकेत भी अब रहने नहीं दिया है। स्वयं 'के', जो प्रमुख अंग्रेज लेखक है, कहता है-"यद्यपि मेरे सामने अंग्रेजों द्वारा की गई भयंकर क्रूरतापूर्ण यंत्रणाओं के वर्णन के ढेर सारे पत्र पड़े हैं, फिर भी यह विषय फिर से विश्व के सामने न आ पाए इसलिए मैं उस हेतु एक अक्षर भी नहीं लिखता।" ये हैं इतिहासकार ! जिन लोगों ने दिल्ली के रास्ते पर गरीब और निरपराध ग्रामीणों के मुँह में मरने के पहले गाय का मांस ठूसा, उन लोगों ने ५५वीं रेजिमेंट के धर्मनिष्ठ सिपाहियों के मुँह में गाय का मांस लूंसकर ही उन्हें तोप से उड़ाया होगा, इसमें शंका की गुंजाइश कहाँ?

पेशावर की ओर ऐसी अमानवीय घटनाएं हो रही थीं और इधर जालंधर की ओर विद्रोह की आग चेत रही थी। पंजाब में जॉन लॉरेंस नेटिव सिपाहियों को लगातार सपाटे से नि:शस्त्र करता जा रहा था और उसी सपाटे में अब तक जालंधर और फिल्लौर भी पड़ जानेवाला था। परंतु फिल्लौर के नेटिव सिपाहियों ने जो आत्मसंयम और घटना चातुर्य दिखाया वह वास्तव में बड़ी चालाकी का था। पंजाब में सारे नेटिव सिपाहियों की जैसी एकदम उठने की तैयारी हुई थी वैसी ही जालंधर-दोआब में भी नेटिव सिपाहियों की थी। दिल्ली जीतते समय उस लड़ाई में घायल पड़े एक देशभक्त हवलदार ने स्पष्ट कहा है और सरकारी रिपोर्ट में यही मान्य है कि सारे जालंधर-दोआब भर में एकाएक विद्रोह करने का पक्का निर्णय हो चुका था। जालंधर की सेना ने एक टुकड़ी होशियारपुर भेजी और यह संदेश भी कि वहाँ ३३वीं पैदल रेजिमेंट विद्रोह करे और वह न हो सके तो ३३वीं पैदल रेजिमेंट वहीं रहे। (उसी तरह वे रहे भी) बाद में उन सब लोगों के फिल्लौर की ओर आते ही फिल्लौर की तीसरी रेजिमेंट विद्रोह करे और फिर सब मिलकर दिल्ली की ओर चलें। अन्य स्थानों पर भी ऐसी ही योजनाएँ चल रही थीं। परंतु उसपर कार्यवाही का समय आने के पहले ही सब बात फूटने से अंग्रेज सावधान हो जाते। हाँ, फिल्लौर के रेजिमेंट ने अंत तक आश्चर्यजनक गोपनीयता बनाए रखी। दिल्ली के लिए जब सीजट्रेन ले जाई गई उस समय उसके टुकड़े कर देना उनके हाथ में था। परंतु इससे सारी योजना ही न फूट जाए, इसलिए इस रेजिमेंट ने अंत तक ऊपरी शांति बनाए रखकर कमाल किया। आखिर में ९ जून को जालंधर की ओर पक्की सूचना दी गई-क्वींस रेजिमेंट के कर्नल के बँगले को आग लगाई गई। यह संकेत होते ही आधी रात को जालंधर के सिपाहियों ने विद्रोह किया। वास्तव में वहाँ यूरोपियन सेना के अधीन तोपखाना और अंग्रेजी सेना थी। पर सिपाहियों का विद्रोह इतना अचूक और तेजी से हुआ कि उनकी कर्कश रणध्वनि होते ही अंग्रेजों का साहस टूट गया। अंग्रेज महिला, बच्चे, पुरुष अपनी-अपनी जान बचाने के लिए तेजी से भागने लगे। परंतु जालंधर के सिपाहियों को अभी फिरंगियों को काटने के लिए समय ही नहीं था। उधर दिल्ली में स्वतंत्रता के निशान पर अंग्रेजी तोपें निशाना साधे हुए थीं, इसलिए हर एक का मन उधर दौड़ रहा था। अँडर्जटेंट बागशा व्यर्थ में बीच में आ रहा था, इसलिए एक घुड़सवार ने दौड़कर उसे गोली मारकर समाप्त किया। परंतु जालंधर के सिपाही हमारे पूर्ण विश्वास के हैं, इसलिए उन्हें निःशस्त्र न करें, ऐसा वहाँ के अंग्रेजी अधिकारियों ने अंत तक सरकार को सूचित किया हुआ था और उनका सचमुच उन सिपाहियों पर विश्वास था। इस कारण भी सिपाहियों ने उनपर आक्रमण नहीं किया। इतना ही नहीं अपितु जालंधर छोड़ते समय भी उन्होंने उनके हाथ में आए अधिकारियों को जीवनदान दिया। जालंधर के सानका ने अपनी योजना को कितना गुप्त रखा था, उस गुप्तता के झांसे में आकर हा जिन व्यक्तियों ने उनपर विश्वास किया था, उनके उस विश्वास के फलस्वरूप हा उन्हें जीवनदान देने की उदारता सिपाहियों ने दिखाई। [63] और उन व्यक्तिगत संबंधों को राष्ट्रकार्य में बाधा न बनने देकर यद्यपि अपनी रेजिमेंट पर सरकार खुश थी, तब भी मातृभूमि की स्वतंत्रता के युद्ध का शंखनाद होते ही उस उदात्त कर्तव्य पर उन्होंने कैसा आत्मार्पण किया, यह उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट दृष्टिगत होता है।

उस आधी रात को विद्रोह शुरू करने के पहले ही वह समाचार फिल्लौर के देशवीरों को बताने के लिए एक घुड़सवार दौड़ता गया था। जालंधर से स्वतंत्रता के इस दूत के आते ही फिल्लौर के सैनिकों ने विद्रोह किया। अब केवल जालंधर के लोगों के फिल्लौर पहुँचाने भर की देरी थी। पर अंग्रेजों के तोपखाने और घुड़सवारों को अनदेखा कर जालंधर से फिल्लौर आना कोई सरल काम नहीं था। परंतु अंग्रेजों में इतना गड़बड़ घोटाला फैल गया था और विद्रोहियों का नक्शा इतना सही था कि जालंधर के सारे सिपाही अपना अनुशासन बनाए हुए फिल्लौर पहुँच गए। अपने इन हजारों स्वदेश बंधुओं को अपनी ओर आते देखकर फिल्लौर के सिपाही प्रेम से

(सार्थक है,सुनते ही रक्त जम जाए,अंग्रेजों के ऐसे एक शूर कृत्य का वृत्तांत उसमें सम्मिलित एक क्रूर कर्मी ने ही अपने मुँह से बयान किया है-"हथियार रखवा लिये जाएँ,इस सकारण भय से भाग रहे सिपाही,जिनपर केवल आशंका में ही गोलीबारी चालू थी,ऐसे कुछ सिपाही पंजाब में अजनाला के पास एक द्वीप में छिपे बैठे थे। इन सारे दो सौ बयासी सिपाहियों को कूपर पकड़कर अजनाला ले आया। अब इनका क्या करना है,यह प्रश्न उसके सामने आ खड़ा हुआ। जहाँ उनकी कायदे से छानबीन करनी थी,वहाँ तक वाहन न होने से उन्हें ले जाना संभव नहीं था। परंतु इन लोगों को एक साथ ही मृत्यु का दंड दिया जाए तो अन्य टुकड़ियों और विद्रोह करनेवालों में भी उससे दहशत बैठने से आगे होनेवाला संभावित रक्तपात अपने आप टल जाएगा। पर यह अपने सिर बड़ी जोखिम होगी,'इस बात की अनुभूति कूपर को थी। फिर भी उन सबको मार डालने का निर्णय उसने लिया। दूसरे दिन प्रातः उन्हें दस-दस की टोली में बाहर निकलवाकर सिखों से उनपर गोलियाँ चलवाई गईं। इस तरह दो सौ सोलह लोगों को किनारे लगा दिया गया। परंतु अभी भी तहसील की गढ़ी में बंद छियासठ लोग रह गए थे। यह जानते हुए कि प्रतिरोध होगा,फिर भी कूपर ने दरवाजे खोलने का आदेश दिया। परंतु कोठरी से हलचल की कोई ध्वनि सुनाई नहीं दी। अंदर देखा गया तो छियासठ में से पैंतालीस के शव पड़े थे। इसका कारण,जो कूपर को ज्ञात नहीं था,वह यह था कि उस कोठरी की खिड़की,दरवाजे आदि इतने पक्के बंद कर दिए गए थे कि उन अभागे सिपाहियों के लिए वह गढ़ी काल कोठरी ही साबित हुई। शेष जीवित बचे इक्कीस भी गोलियों से भून दिए गए (दिनांक १.८.१८५७) । कूपर द्वारा किए गए इस कार्य पर अज्ञानी भूतदया प्रेरित लोगों ने भारी हल्ला-गुल्ला कर उसका विरोध किया। परंतु कूपर के इस आचरण से ही लाहौर की टुकड़ियों में असंतोष का प्रसार टल सका,ऐसा बलपूर्वक कहकर रॉबर्ट मोंटगोमरी अट्टहास के साथ प्रतिपादित करता है कि कूपर एकदम सही था।

-होम्स कृत-'हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्युटिनी',पृष्ठ ३९३)

उमड़ पडे तथा अपनी लाइनें छोड़ भागकर आलिंगनबद्ध हुए और वह विशाल सेना स्वदेशी जमादारों, सूबेदारों की आज्ञा में दिल्ली की ओर चल पड़ी। रास्ते में एक नदी थी और उसके पार लुधियाना शहर था, जो उन देशवीरों की चरणधूलि की बाट जोह रहा था।

लूधियाना शहर में उस दिन प्रातः ही अंग्रेज अधिकारियों के पास जालंधर विद्रोह का तार आ गया था। पर वह जब तक मिले तब तक उस शहर के सिपाहियों को कब्जे में रखने की सारी आशा नष्ट हो चुकी थी। क्योंकि यह तार आने के पहले ही अपने भाइयों के जालंधर छोड़कर निकल पड़ने का समाचार उन्हें मिल गया था। लधियाना के अंग्रेज अधिकारियों ने फिल्लौर से आ रही सेना को दोनों शहरों के मध्य स्थित सतलुज नदी पर रोकने का निश्चय किया। उस नदी का नावोंवाला पुल तोड़कर यूरोपियन, सिख और नाभा द्वारा सहायता के लिए भेजा लश्कर-ये सब नदी किनारे की सुरक्षा करने लगे। क्रांतिकारियों को जब यह पुल तोड़े जाने का समाचार मिला तो बे वहाँ से चार मील दूर जाकर नदी के पार उतरने लगे। उनकी कुछ सेना नावों द्वारा उस पार हो गई थी, कुछ हो रही थी और कुछ किनारे पर ही खड़ी थी। यह अवसर उचित व अनुकूल समझकर अंग्रेजों और सिखों ने उनपर तोपखाने से हमला शुरू कर दिया। यह समय रात के दस बजे का था, इसलिए अंग्रेजों की सेना निकट ही है, इस बात का क्रांतिकारियों को अनुमान नहीं लग रहा था। उनकी तोपें भी अभी नदी पार नहीं हुई थीं। ऐसी कठिन परिस्थिति में फँसे उन क्रांतिकारियों पर तोपखाने के साथ अंग्रेज और सिख अचानक आ टूटे थे। परंतु उनके हमले का पहला जोर समाप्त होते ही सिपाहियों ने तनिक भी पीछे न हटते हुए उनपर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। अंग्रेजी तोपों और सिखों की मार के सामने नदी उतरते वे बिखरे हुए सैनिक अडिग होकर लड़ रहे थे। इतने में अंग्रेज सेनापति विलियम के सीने में एक सिपाही की सनसनाती हुई गोली आ घुसी और वह मरणासन्न हो गिर पड़ा। तभी उस भयंकर रणभूमि में आधी रात का अँधियारा दूर करने और स्वतंत्रता भक्तों के संतप्त सिरों पर शीतल चंद्रिका की वर्षा करने हेतु रजनीनाथ का आकाश में उदय हो गया था। इस चंद्र प्रकाश से क्रांतिकारियों को अग्रेजों की सारी व्यह रचना समझ में आ गई और वे अपना स्थान छोड़कर अंग्रेजों पर पूरी शक्ति से टूट पड़े। इस अद्भुत आक्रमण के सामने अंग्रेजी सेना, सिख और अन्य राजनिष्ठ अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए।

अपनी इस आधी रात की विजय और जल्दी ही उदित उषाकाल की सुंदर प्रभा से और अधिक खिली वीरश्री से वे सारे क्रांतिकारी सैनिक दूसरे दिन दोपहर के लगभग लुधियाना शहर में घुसने लगे। लुधियाना में एक मौलवी अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होकर स्वराज्य संस्थापना करने के लिए लगातार उपदेश करता घूमता रहता था। उस मौलवी के प्रचार से लुधियाना शहर पंजाब में क्रांतिकारियों का एक सशक्त केंद्र बन गया था। गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने के लिए अंतिम चोट करने का समय आ गया है, ऐसी सूचना मिलते ही वह सारा शहर 'दीन' की गर्जना करता उठ खड़ा हुआ। सरकारी भंडार लूटे गए; यूरोपियन चर्च, यूरोपियनों के घर, अंग्रेजी अखबारों के छापाखाने, ऐसे सारे स्थान जलाकर खाक कर दिए गए और जब सिपाही अंदर घुसने लगे तो उन्हें साथ लेकर यूरोपियनों के प्रमुख स्थानों और विशेष रूप से सरकार के आगे दुम हिलानेवाले सारे नेटिव कुत्ते खोज निकालने के लिए नागरिकों में स्पर्धा शुरू हो गई। कारावास तोड़े गए। जो कुछ भी सरकारी था या जो कुछ अंग्रेजों का था वह अग्नि की भेंट न चढ़ पाया तो चूर-चूर कर दिया गया और इस तरह लुधियाना शहर विद्रोह की आग में जलने लगा।

विद्रोहियों का दिल्ली जाना आवश्यक था; जबकि लुधियाना के किले पर रहकर पंजाब का वह नाका पकड़े रहना भी अत्यावश्यक था। यदि दिल्ली की भाँति लुधियाना भी विद्रोह का केंद्र हो जाता तो उससे अंग्रेजी सत्ता को जोरदार धक्का लगा होता। हालाँकि विद्रोही यह समझते नहीं थे, ऐसा कदापि नहीं था, पर उस परिस्थिति में बिलकुल असंभव था। ये सारे लोग थे सिपाही; न उनका कोई सेनापति था, न ही कोई नेता। उनके पास यात्रा हेतु आवश्यक सामग्री भी नहीं थी। ऐसे समय में वहाँ कोई नाना साहब, खानबहादुर या मौलवी अहमदशाह होता तो उसने लुधियाना को कभी न छोड़ा होता। परंतु उन सबके न होने के कारण उन्हें दिल्ली की ओर जाने के सिवाय दूसरा मार्ग ही नहीं था और इसीलिए-स्वराज्य या गुलामी, इसका अंतिम निर्णय अब दिल्ली की प्राचीर पर ही होगा-ऐसी गर्जना करते हुए वे दिल्ली की ओर चल पड़े। उस समय अंग्रेजों की कमर इतनी टूटी हुई थी कि वे क्रांतिवीर दिल्ली की ओर दिन-दहाड़े गाते-बजाते जा रहे थे, फिर भी उनका पीछा करने की किसीमें हिम्मत नहीं थी।

मेरठ के विद्रोह के कोई तीन हफ्ते बाद तक क्रांतिकारियों को जो शांति बनाए रखना अनिवार्य हो गया था, उस शांति का लाभ अंग्रेजों ने पंजाब में पूरी तरह उठाया। पंजाब में यूरोपियन सेना अधिक होने कारण वहाँ की नेटिव रेजिमेंटों को या तो निःशस्त्र करना या असमय और अपरिपक्व अवस्था में विद्रोह करने को बाध्य करके उनका सहज नाश करना बहुत ही सुलभ हो गया। राज्य क्रांति के पक्ष से सिख रियासतदार और अन्य सिख लोग मिलकर अपने से ही मिल रहे हैं, यह देखकर ही वे सरहद से सतलज तक पंजाब में जितने भी हिंदुस्थानी थे उन्हें वहा से भगाकर पंजाब में विद्रोह का बीज समाप्त कर सके। इस समय लश्कर में ही नहीं अपितु गाँवों और शहरों में आराम से रह रहे हजारों हिंदुस्थानी लोग पंजाब से अंग्रेजों की इच्छा के कारण सीमा पार कराए गए और इस तरह पंजाब हाथ में आते ही वहाँ की यूरोपियन सेनाओं को दिल्ली की ओर तीव्रता से भेजा जाने लगा।

पंजाब के अंग्रेजों के पूर्ण नियंत्रण में रहने के दो मुख्य कारण थे। एक तो यह कि सिखों ने अंग्रेजों का साथ दिया। इन लोगों ने उस समय केवल चुप्पी ही साध ली होती तो अंग्रेजों के हाथों में पंजाब एक दिन भी नहीं रह पाता। इन सिख लोगों को क्रांतिकारियों ने अपनी ओर करने के लिए प्रयास नहीं किए, ऐसा भी नहीं था। दिल्ली के स्वतंत्र होते ही बादशाह के एक ईमानदार सेवक' ने उन्हें पंजाब के सारे समाचार सूचित करने के लिए एक लंबा, विस्तृत एवं बहुत ही मार्मिक पत्र लिखा था। उसमें वह ईमानदार पत्र-लेखक ताजुद्दीन लिखता है-"पंजाब के सारे सिख सरदार कायर, डरपोक और हिंदुस्थानी लोगों का साथ न देकर फिरंगियों के कुत्ते बने हुए हैं। मैं स्वयं उनसे मिला, उनसे संवाद किया और उनको जी-जान से कहा कि फिरंगियों से मिलकर जो तुम देशद्रोह कर रहे हो वह किसलिए? स्वराज्य में तुम्हारा लाभ नहीं है? फिर अपने इस लाभ के लिए ही तुम्हें बादशाह से मिलना चाहिए। इसपर वे मेरे सामने कहते हैं-देखिए, हमसब अवसर की प्रतीक्षा में हैं। दिल्ली के बादशाह का हुकुम आते ही इन काफिरों का खात्मा एक क्षण में कर देंगे।" पर जब दिल्ली के बादशाह का आदेश लेकर घुड़सवार सिख राजाओं के पास आए तब उन्होंने उन्हें मरवा दिया। पंजाब पर नियंत्रण रखना अंग्रेजों को सुलभ हुआ, उसका यह पहला और विशेष कारण है। सिखों के इस विरोध की परवाह न कर पंजाब से अंग्रेजों को भगाना किसी तरह भी संभव नहीं, ऐसा नहीं था। अंग्रेज जिस विलक्षण ढीलेपन से मई माह तक रहते थे उस ढीलेपन का लाभ उठाकर पूर्व संकल्प के अनुसार सब ओर एक साथ विद्रोह हुआ होता तो सिखों पर भी क्रांतिकारियों का आतंक छाने से कम-से-कम उनमें फूट तो निश्‍चित ही पड़ जाती। विशेषकर पंजाब के नेटिव सिपाहियों को एक-एक कर पकड़कर अंग्रेज जिस तरह उन्हें नरम कर सके वैसा बिलकुल नहीं हो पाता। पंजाब में स्वराज्य की इच्छा नहीं थी। ठाणेश्वर के ब्राह्मण, लुधियाना के मौलवी, फिरोजपुर के दुकानदार और पेशावर के मुसलमान-सभी स्वराज्य और स्वधर्म के लिए जंगी जेहाद करो,' ऐसा उपदेश देते हुए घूम रह थे। उपर्युक्त पत्र लेखक भी लिखता है-"बादशाह के दरबार से यदि कोई सरदार सेना के साथ इधर भेजा जाए तो पंजाब चुटकी बजाते ही स्वतंत्र हो जाएगा। सारी हिंदुस्थानी सेना विद्रोह कर उनके झंडे के नीचे आ जाता और सिखों का भागना मुश्किल हो जाता। मेरा ऐसा विश्वास है कि सारे हिंदू और मुसलमान आपके भाग्यशाली सिंहासन का प्रेम मुजरा करेंगे। और यह भी कि जून माह में ही विद्रोह करना इष्ट है, क्योंकि अंग्रेज सोल्जरों को धूप की गरमी में लड़ना बहुत कठिन होता है। वे लड़ने के पहले ही चटापट मरने लगते हैं। इसलिए आप कोई सरदार पंजाब में पत्र देखते ही भेजें।"

पंजाब के लोकमत का झुकाव दिल्ली की ओर होते हुए भी वह दिल्ली का लाभ नहीं ले सका, इसका कारण यह था कि दिल्ली में विद्रोह हो जाने के बाद तीन सप्ताह तक क्रांति की लहर का ठहरी रहना अपरिहार्य हो गया था। यही विद्रोह यदि पहले से निश्‍चित संकेतों के अनुसार एक सप्ताह में होता तो अंग्रेज कहीं भी हलचल नहीं कर सकते थे। पंजाब में अकेली एक-एक और अनाथ सेनाएँ निःशस्त्र नहीं की जा सकती थीं। क्रांति की लहर निरंतर उबलने से सिखों जैसे अनिश्‍चित विचार के लोग भी उसमें बह सकते थे और प्रारंभ में ही विजय प्राप्त हो जाने पर जिनके मन क्रांति की ओर झुके हुए थे, पर क्रांति में सम्मिलित होने से डरते थे, उन्हें भी जोश आ जाता।

सारांश यह है कि सिख लोगों के देशद्रोह के कारण और अधपकी स्थिति में विद्रोह हो जाने से पंजाब में क्रांति जड़-मूल से खोद दी गई और पंजाब चूँकि दिल्ली की रीढ़ की हड्डी था, दिल्ली का इस समाचार से उत्साह भंग हुआ।

इन तीन सप्ताहों के दिल्ली और पंजाब के समाचार ऊपर दिए हुए हैं। दिल्ली में अंग्रेजों ने इन तीन सप्ताहों में चारों ओर यथासंभव बंदोबस्त करके कलकत्ता से इलाहाबाद तक यूरोपियन सेनाओं का निरंतर प्रवाह चालू रखा था। बंबई, मद्रास, राजपूताना और सिंध प्रांत में विद्रोह से सहानुभूति रखनेवाले कोई हैं या नहीं, इसकी बारीकी से जाँच कर उनको पंजाब की भाँति ही समय रहते पूरी तरह नष्ट कर डालने के प्रयास प्रारंभ हो गए थे। और इस अग्रिम सूचना के लिए ईश्वर का आभार मानते हुए अब विद्रोह की ज्वालाएँ स्थान-स्थान पर समाप्त कर दी गई हैं, यह विश्वास भी उन्हें होने लगा। इन तीन हफ्तों में अंग्रेजों की कार्यवाहियों के चलते क्रांति पक्ष की ओर से इक्का-दुक्का विद्रोह को छोड़कर सब ओर यथासंभव गोपनीयता रखी गई थी।

३० मई तक दोनों पक्षों की ऐसी स्थिति थी। यह स्थिति मई की ३० तारीख के बाद किस तरह पलट गई, अंग्रेजों के मन में उत्पन्न होता विश्वास कैसे चकनाचूर हुआ और इन तीन हफ्तों में हुई हानि की परवाह न करते हए क्रांति की ज्वालाएँ कैसे एकाएक भड़क उठीं, यह देखना आवश्यक है। राज्य क्रांतियाँ किसी सूत्रबद्ध नियम से नहीं चलती। राज्य क्रांति कोई घडी की तरह ठीक-ठीक चलनेवाला यंत्र नहीं है। राज्य क्रांतियाँ स्वैर संचारप्रिय होती हैं। उनपर सिद्धांतों का बंधन ही रह सकता है, बाकी फुटकर नियम उनके अपर्व धक्के से गिर जाते हैं। राज्य क्रांति का एक नियम है और वह यह कि उसकी पकड़ बनी रहनी चाहिए। मध्यांतर में चाहे नई और अकल्पित परिस्थितियाँ उत्पन्न हों, परंतु उनके कारण रुके बिना उन्हें एक तरफ करते हुए आगे बढ़ना होगा। राज्य क्रांति एक विचित्र पक्षी है, जो बहुत दिनों बाद पिंजरे से बाहर निकलने पर गंतव्य को जाने के पहले आकाश में देर तक उड़ान भरता है। जिसे उस गरुड़ जैसे पक्षी पर बैठकर इच्छित स्थान को पहुँचना हो वह उसकी पीठ पर अटल आसन लगाए। उड़ान भरकर उसकी मस्ती ठंडी हो जाने के बाद तक जो उसकी पीठ पर जमकर बैठा है उसीके पूरे नियंत्रण में वह आ जाता है।

मेरठ के लोगों ने इस राज्य क्रांति के पंछी को पिंजरे से कुछ पहले ही उड़ा दिया था; फिर भी उससे न घबराए श्रीमंत नाना साहब, लखनऊ के मौलवी, झाँसी की बिजली, छबीली आदि धुरंधर उस्तादों ने उस पक्षी की कैसे पकड़ की, वह सब हे इतिहास, अब तू हमें बता। उस गरुड़ पक्षी को पकड़े रखने की दृढ़ता हिंदू भूमि के सब हाथों में न होने के कारण वह गरुड़ आकाश में कैसे उड़ गया, हे इतिहास, यह तू हमें बता। तू हमारे साथ पहले वर्ग के स्तुति गीत गा और दूसरे वर्ग के लिए हमारे साथ-साथ आक्रोश करने लग!

प्रकरण-५

अलीगढ़ और नसीराबाद

मेरठ में उत्पन्न भूकंप का धक्का जैसे ऊपर अंबाला और पंजाब की ओर सारा प्रदेश ध्वस्त कर रहा था वैसे ही उस भूकंप के धक्के की दूसरी लहर मेरठ के निचले प्रदेश की उस सारी भूमि को कंपित कर रही थी। दिल्ली के नीचे अलीगढ़ शहर में नौवीं नेटिव पैदल रेजिमेंट थी। इस रेजिमेंट को अलीगढ़ के मुख्य थाने के साथ-साथ मैनपुरी, इटावा और बुलंदशहर में भी रखा हुआ था। इस रेजिमेंट पर सरकार का इतना विश्वास था कि चाहे हिंदुस्थान के सारे सिपाही विद्रोह कर जाएँ, फिर भी ९वीं रेजिमेंट राजनिष्ठ बनी रहेगी। बुलंदशहर के बाजार में राज्य क्रांति के गुप्त षड्यंत्र प्रारंभ होने का समाचार कानों में आ जाने के बाद भी इस क्रांति से ९वीं रेजिमेंट के सिपाही निश्‍चित ही अलग रहेंगे, ऐसा समझकर बुलंदशहर के अधिकारी सबकुछ सुरक्षित अनुभव करते रहे।

मई माह के करीब बुलंदशहर के आसपास के गाँवों ने अपने में से एक माननीय, विश्वस्त एवं स्वातंत्र्यप्रिय ब्राह्मण चुना और उसे तत्काल बुलंदशहर भेज दिया। एक तरफ जिसकी राजनिष्ठा पर अंग्रेजों का अपना पूरा विश्वास है और दूसरी ओर जिसे मातृभूमि अपने अश्रुपूरित नेत्रों से अपलक देख रही है-ऐसी उस बुलंदशहर की सैनिक छावनी की ओर वह ब्राह्मण भयानक कल्पनाओं और अपने भावी यश-अपयश के बादलों से घिरा अपना हृदय लिये तेजी से जाने लगा। मातभमि की स्वतंत्रता और स्वधर्म की रक्षा के लिए क्या मेरे स्वदेश बंधु मेरा निवेदन मानेंगे? क्या स्वराज्य के उच्चतर वातावरण में उड़ान भरने में सक्षम पंख इन सैनिक बंधुओं के पास हैं ? मेरे इस भविष्यवाद को धिक्कारकर गुलामी के अँधियारे के गह्वर में सोए सुंदर उष:काल के दर्शन हेतु मैं उनकी उस नींद को भंग कर रहा हूँ। इसलिए मेरे सिर पर ये देशबंधु आघात ही करेंगे? मनोविकारों की ऐसी उथल-पुथल हृदय में चलते हुए भी जिसके चेहरे पर मूर्त शांति विराजमान थी, ऐसा वह ब्राह्मण अपना विलक्षण संदेश लिये लश्कर में प्रवेश कर गया। उन सिपाहियों को दीक्षा देते हुए उसने कहा कि एक बड़ी सी बारात निकालकर उस हल्ले-गुल्ले में आप सब विद्रोह करें और सारे अंग्रेजों को मौत के घाट उतारकर दिल्ली की ओर चलें। अंग्रेजों का राज्य उलटने के सिद्धांत का विरोधी कोई था ही नहीं; पर उसमें भी उस सिद्धांत को यथार्थ में कैसे बदला जाए, इस प्रश्न का हल भी सुनकर उसकी ग्राह्यता-अग्राह्यता पर विचार चल रहा था। तभी उस रेजिमेंट के तीन सिपाहियों ने अंग्रेजों को यह समाचार देकर उस ब्राह्मण को कैद कर लिया। तत्काल बुलंदशहर से उस ब्राह्मण को रेजिमेंट के मुख्य थाने की ओर रवाना किया गया और उन सब सिपाहियों के सामने फाँसी पर लटकाने का दंड दिया गया। यह घटना जब अलीगढ़ में घटित हो रही थी तभी इधर बुलंदशहर के उन तीन राजनिष्ठों पर सब ओर से थूथू होने लगी। उनपर गालियों की बौछार करते हुए बुलंदशहर का सारा लश्कर अधिकारियों की अनुमति न लेते हुए जिस स्थान पर वह क्रांतिदूत ले जाया गया था उस अलीगढ़ शहर की ओर चल दिया। दिनांक २० मई की शाम को उस ब्राह्मण को फाँसी दी गई। बगल में सारी रेजिमेंट खड़ी की गई थी। अब क्या करें? दिनांक ३१ मई तक रुकें तो ब्राह्मण हाथ से निकलता है-ऐसा आपस में बतियाते ऊपर देखते हैं तो सबने देखा कि ब्राह्मण निकलता नहीं, निकल ही गया है और फाँसी पर उसकी मृत देह प्रतिशोध का बीभत्स व्याख्यान देती लटकी हुई है। भयानक व्याख्यान! शब्द के स्थान पर जहाँ रक्त की धाराएँ स्खलित बह रही हैं। उस भयानक वक्ता ने जीवित रहते जो व्याख्यान कभी न किया हो वह आज फाँसी पर लटके एक शब्द भी न बोलते हुए कर दिया था। क्योंकि आधे क्षण में ही उन असंख्य सिपाहियों की भीड़ में से उछलकर एक सिपाही आगे आया और अपनी तलवार उस फाँसी पर लटकते ब्राह्मण की ओर करके चिल्लाया-"अरे यार, यह शहीद रक्त में नहा रहा है।" बारूद के ढेर पर चढ़ी चिनगारी भी किंचित् देर से सुलगती, पर उस शूर सिपाही के मुँह से छूटी तेजस्वी चिनगारियों को उन हजारों सिपाहियों के हृदय में घुसने में उतना भी समय नहीं लगा। उन्होंने अपनी तलवारें बाहर निकाली और 'फिरंगियों का नाश हो' की गर्जना करते क्रोध से पगलाए वे हजारों सिपाही नाचने लगे।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यह देखते ही अंग्रेज कर्मचारी भयभीत हो गए। राजनिष्ठ ९वीं रेजिमेंट विद्रोह कर उठी। इतना ही नहीं, उसने अंग्रेजों को सूचित किया कि अपने प्राण बचाने हों तो तत्काल अलीगढ़ छोड दें। इस उदारता का लाभ लेकर अलीगढ़ के सारे अंग्रेज अधिकारी, उनकी पत्नियाँ, बच्चे, लेडी आउटॅरम आदि सारे-के-सारे अंग्रेज चुपचाप उस शहर से निकल गए। रात बारह बजे तक अलीगढ़ में अंग्रेजी सत्ता का नामोनिशान न रहा।

अलीगढ़ स्वतंत्र हो जाने का समाचार २२ मई की शाम को मैनपुरी पहुंचा। मैनपुरी में ९वीं रेजिमेंट का कुछ हिस्सा रहता था, यह पहले ही बताया जा चुका है। उन सिपाहियों के मन में क्या था, यह अलीगढ़ की ओर के बंधुओं के समाचारों से स्पष्ट है। मई की १० तारीख को मेरठ में क्रांति होने के बाद अंग्रेजों से लड़े सिपाही राजनाथ सिंह के अपने गाँव जीवंती लौटने का समाचार मैनपुरी के अधिकारियों को मिलने पर उन्होंने अपनी ९वीं रेजिमेंट के कुछ सिपाहियों को उसे पकड़ने के लिए भेजा। परंतु उन सिपाहियों ने राजनाथ सिंह को पकड़ने की जगह सुरक्षा के साथ उसे जीवंती के बाहर पहुँचा दिया और अंग्रेजों को रिपोर्ट दी कि जीवंती में राजनाथ सिंह नाम का कोई व्यक्ति रहता ही नहीं। सिपाही रामदीन सिंह ने आदेश की अवहेलना की, इसलिए उसे कैद कर अंग्रेज अधिकारियों ने सिपाहियों के पहरे में अलीगढ़ भेज दिया। परंतु आधे रास्ते में आने के बाद पहरे के सिपाहियों ने रामदीन सिंह को मुक्त कर दिया। उन्होंने उसकी बेड़ियाँ काट डालीं और वे चुपचाप मैनपुरी लौट आए। [64]

इस स्थिति तक पहुँचा वह नेटिव लश्कर केवल संकेत समय के लिए रुका हुआ था और उस एक निश्‍चित समय के पूर्व शत्रु को अपने पैर काट डालने का अवसर न मिले, इसलिए ऊपर से इतना शांत व्यवहार कर रहा था कि यह ९वीं रेजिमेंट 'राजनिष्ठतम' गिनी गई। परंतु ऊपर बताए गए ब्राह्मण के दौरे के बाद से सिपाहियों का ही नहीं अपितु अलीगढ़ की सारी जनता का गुस्सा अतिरेक की सीमा तक चला गया था। यह ९वीं रेजिमेंट अलीगढ़ में फैलते जा रहे असंतोष को दबाने जब शहर में भेजी गई तब शहर से निकलते समय बाजार के खटीक और कसाई लोगों ने उन सिपाहियों से पूछा कि यूरोपियनों को कब मारेंगे और स्वतंत्रता के लिए कब उठेंगे? खटीक और कसाई भी जिसके लिए जल्दी कर रहे हों वह कृत्य अब भी टालना सिपाहियों को अच्छा कैसे लगे? और तभी अलीगढ़ का समाचार आया। रेजिमेंट के अन्य लोगों द्वारा विद्रोह कर देने के बाद अब केवल अपना ही रुका रहना निंदनीय है, यह देखकर मैनपुरी का लश्कर विद्रोह कर उठा। उन्होंने भी अलीगढ़ के अपने भाइयों की भाँति अंग्रेजों को जीवनदान दिया, शस्त्रागार से शस्त्र और भरपूर गोला-बारूद ऊँटों पर लादकर उन सारे सिपाहियों ने २३ मई को दिल्ली की ओर तत्काल कूच किया।

इसी समय इटावा की टुकड़ी में भी धुआँधार हो रही थी। इस इटावा शहर के मुख्य मजिस्ट्रेट एवं कलेक्टर एलन ओ. हयूम को मेरठ का समाचार मिलते ही उसने असिस्टेंट मजिस्ट्रेट डेनियल की सहायता से पड़ोस के रास्ते पर गश्त करने को एक चुनी हुई सेना तैयार की। १९ मई को मेरठ से आए कुछ सिपाही इस सेना से मिले। वे मुट्ठी भर सिपाही शरण में आ गए और उन्हें कुछ थोड़े लोगों के सशस्त्र पहरे में रखने का आदेश मिला। यह आदेश हमारे सिरमाथे पर है, ऐसा दिखाते हुए मेरठ के उन सिपाहियों ने अपने शत्रु को पूरी तरह असावधान कर दिया और फिर वे ही शस्त्र लेकर उन्होंने उन सबको कत्ल कर दिया। यह समाचार फैलते न फैलते वे सिपाही पड़ोस के एक हिंदू देवालय में जा घुसे और अंदर शस्त्रसज्जित हो घात लगाकर बैठ गए। इटावा शहर के कलेक्टर मि. एलन ह्यम ने यह समाचार पाते ही मि. डेनियल के साथ कुछ नेटिव सेना लेकर उस मंदिर पर हमला करने निकला। ह्यम को यह विश्वास था कि उसके सिपाहियों के हमला करने के पूर्व उन विद्रोहियों को गाँववालों ने मार ही डाला होगा। परंतु मंदिर के पास आने पर उसने देखा कि गाँववालों ने उनका सफाया करना छोड़ उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें ढेर सारी रसद पहुँचा दी थी। गाँववालों ने हमें धोखा दिया; पर कम-से-कम अपने साथ आए सिपाही और पुलिस तो धोखा नहीं देंगे, इस विश्वास से मंदिर पर सामने से आक्रमण करने का आदेश देकर मि. डेनियल स्वयं आगे बढ़ा। पर पीछे-केवल एक नेटिव उसकी सेना का सैनिक बनने को तैयार हुआ। और फिर उस गोरे सेनापति और उस काले सेवक को मंदिर से चली गोलियों ने धराशायी कर दिया। यह भयंकर स्थिति देखते ही आक्रमण करने आए ह्यम साहब उन सिपाहियों को उनके मंदिर में छोड़कर इटावा की ओर भाग गए।

उस दिन अर्थात् तारीख १९ मई को ही इटावा की नेटिव सेना विद्रोह करेगी, ऐसी खबर सब ओर थी। परंतु उस सेना का मुख्यालय अलीगढ़ में होने से और उधर से विद्रोह का आदेश अभी न मिलने से इटावा की नेटिव सेना अवश्य ही चुप होकर बैठ गई होती, परंतु मध्यांतर में ही उस शहीद ब्राह्मण के आत्मयज्ञ की ज्वालाएँ एकाएक भड़क उठने का समाचार इटावा में २२ तारीख को पहुँच जाने से वहाँ के सिपाहियों को विद्रोह करना आवश्यक हो गया। दिनांक २३ मई को वहाँ की सारी सेना ने 'हर-हर महादेव' की घोषणा कर दी और एक हाथ में तलवार तथा दूसरे हाथ में जलती मशाल लेकर सिपाहियों ने यूरोपियनों की छावनी पर धावा बोल दिया। सारा खजाना कब्जे में ले लिया गया। कारावास तोड़ दिए गए और सारे अंग्रेजों को कह दिया गया कि वे तुरंत भाग जाएँ, अन्यथा एक सिरे से उनका कत्ल होगा। यह अभूतपूर्व एवं भयप्रद समाचार सुनते ही भयभीत हुए अंग्रेज लोग अपनी पत्नी-बच्चों सहित जिधर रास्ता सूझे उधर दौड़ पड़े। स्वयं एलन ओ. ह्यम ने नोटिस सिपाहियों की उदारता का लाभ लेकर, एक नेटिव महिला का वेश धारण कर 'य: पलायति स जीवति' का आश्रय लिया। [65] इस ह्यमबाई के भागते ही इटावा पूर्ण स्वतंत्र हो जाने की मुनादी पीटी गई और बाद में वे सारे सिपाही दिल्ली की ओर जानेवाली अपनी रेजिमेंट के मुख्य भाग से मिल गए।

इस तरह यह पूरी रेजिमेंट एक व्यक्ति के कारण एकाएक विद्रोह कर उठी। इतना ही नहीं अपितु खजाना लूटना, देश स्वतंत्र करना, विदेशियों को अपनी तलवार की नोंक पर रहते हुए भी जीवन दान देना और बढ़ जाना, इस सारे कार्यक्रम का अभ्यास अलीगढ़, बुलंदशहर, मैनपुरी और इटावा जैसे दूर-दूर के भाग में भी एक साथ करने, दिल्ली का सारा नेटिव लश्कर विद्रोह कर दे फिर भी वे विद्रोह नहीं करेंगे, जिसपर यह विश्वास सरकार का था वही रेजिमेंट कोई और नहीं उठा उससे पहले तलवार निकालकर उठ खड़ी हुई। यह सब समाचार मिलने के बाद अंग्रेजों को अपने जीवन का तनिक भी भरोसा नहीं रह गया था।

अजमेर से कोई छह कोस पर नसीराबाद नाम का गाँव है। वहाँ अंग्रेज सिपाहियों की छावनी थी और वहाँ तीसवीं नेटिव पैदल रेजिमेंट, नेटिव तोपखाना, पहली बंबई लांसर और मेरठ से वहाँ लाई गई १५वीं रेजिमेंट-इतनी सेना इकट्ठा थी। मेरठ से कुछ दिनों पूर्व ही लाई गई इस रेजिमेंट में अंग्रेजी सरकार के प्रति अति द्वेष और उसे उतार फेंकने की उत्कट लालसा पूरी तरह भरी हुई थी। मेरठ की गुप्त सभाओं में जो-जो प्रस्ताव हुए वे सब आमने-सामने नसीराबाद के सिपाहियों को समझाकर कहने को प्राप्त हुआ। यह दुर्लभ अवसर मेरठ के उन एक हजार राजनीतिक प्रचारकों (उपदेशकों) ने व्यर्थ गँवाया होता तो ही आश्चर्य होता। बंबई लांसर्स के कुछ गैर नेटिवों को छोड़कर सारा नेटिव लश्कर एकमत हो गया और वे उचित अवसर की राह देखते ठहरे रहे। २८ मई को वह अवसर प्राप्त हो गया, क्योंकि उस दिन तोपखाने का प्रभाव बहुत ढीला हो गया था। अतः निर्धारित संकेत मिलते ही मेरठ की १५वीं रेजिमेंट ने पहले तोपखाना हथिया लिया। उसे वापस लेने बंबई के लांसर्स के साथ अंग्रेज अधिकारी आगे बढ़े। परंतु कुछ ही देर में उस लांसर्स के सिपाही मैदान से भाग गए और उनके अंग्रेज अधिकारी प्रेत बनकर भूमि पर गिर गए। इतना ही नहीं, उनके शरीरों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। कर्नल पेनी, कैप्टन स्पॉटिस वुड भी इस लड़ाई में मारे गए। फिर उस शहर से आशा छोड़कर सारे अंग्रेज बोरिया-बिस्तर लिये भाग खड़े हुए। विद्रोहियों ने खजाना। अपने नियंत्रण में लिया और उनमें से सर्वसम्मति से चुने गए नेटिव सेनापति ने दिल्ली के बादशाह के नाम से सिपाहियों में इनाम बाँटे। यूरोपियनों के घर जलाए गए, नसीराबाद स्वतंत्र हो जाने की घोषणा की गई। विद्रोहियों का दो-तीन हजार लोगों का वह समुदाय अपने शस्त्र चमकाता लश्करी ठाट से अपने स्वदेशी नए सेनापति के अधीन लश्करी बैंड बजाता हुआ दिल्ली की ओर बढ़ चला।

प्रकरण-६

रुहेलखंड

रुहेलखंड प्रदेश की मुख्य राजधानी का शहर बरेली है। इस राज्य में रोहिला जाति के पठानों का राज था और उसे जब से अंग्रेजों ने छीना तभी से इस अपमान का बदला लेने के लिए घात लगाए बैठे शूर, बलिष्ठ और क्रूर मुसलमानों की एक बड़ी बस्ती वहाँ थी। सन् १८५७ के आसपास अंग्रेजों के शिकंजे से छूटने के लिए विद्रोह की चर्चा जिन किन्हीं प्रदेशों में रंग ला रही थी उसमें रुहेलखंड की और उसकी राजधानी की भी गिनती करनी होगी। बरेली में इस समय आठवीं इर्रेग्यूलर घुड़सवार, नेटिव पैदल की अठारह और ६८वीं रेजिमेंट तथा नेटिव तोपखाने की एक बैटरी-इतनी नेटिव सेना थी। इस ब्रिगेड का ब्रिगेडियर सिवाल्ड था। अप्रैल में कुछ सिपाहियों ने कारतूसों के संबंध में आशंका व्यक्त की थी। परंतु उधर ध्यान न देते हुए सरकार ने सिपाहियों को एक-एक में अलग करके उनसे कारतूस चलवाए। आगे भी एक-दो बार गड़बड़ होने से सिपाहियों में क्षोभ बढ़ ही रहा था; फिर भी सरकार को उनके चेहरों पर संतोष ही दिखता रहा।

इसी समय १४ मई को मेरठ विद्रोह का समाचार बरेली में आ पहुँचा। यह समाचार आते ही अंग्रेजों ने अपने बाल-बच्चे नैनीताल भेजकर घुड़सवारों को तैयार रहने का आदेश दिया। यह घुड़सवार पलटन नेटिव ही थी, पर थी सरकार के पूर्ण विश्वास की। इस घुड़सवार रेजिमेंट के साथ बरेली के सभी नेटिव सिपाहियों को परेड पर बुलाकर अंग्रेज अधिकारियों ने दिनांक १५ मई को उन्हें उत्तम आचरण रखने का आदेश किया। नए कारतूस अब काम में नहीं लाए जा रहे हैं, सिपाहियों को जो पसंद हैं वही पुराने कारतूस वे काम में लाएँ। नए कारतूस यदि दिखाई दिए तो मैं उनका चूरा कर दूंगा, ऐसा स्पष्ट कहते हुए एक अधिकारी ने सिपाहियों में व्याप्त कारतूसों का डर दूर करने का प्रयास किया। वास्तव में देखें तो अब सिपाहियों के भय पर व्याख्यान देते समय कारतूसों की बात करना विषयांतर ही था। स्वयं कमांडर-इन-चीफ द्वारा सारे हिंदुस्थान में सिपाहियों को सैनिक आदेश से यह घोषित कर दिया गया था कि आगे से नए कारतूस काम में लाना सरकार ने बंद कर दिया है। मेरठ के विद्रोह के बाद जब सरकार ने स्वयं ही कदम पीछे हटा लिया और जिन कारतूसों के लिए मई माह के पहले इतनी जिद की थी वे ही कारतूस काम में लाना स्वयं ही बंद किया तो-इस आदेश में सरकार के भयग्रस्तता और दुर्बलता के सिवाय सिपाहियों और लोगों को कुछ और नहीं दिखा। कारतूसों के कारण सिपाही भड़के हैं, यह समझने में सरकार से जो गलती हुई उसका पूरा विस्फोट बरेली में होने का अवसर आ गया था। ब्रिगेडियर ने यह कहकर कि नया कारतूस दिखते ही मैं उसे चूरा कर दूँगा, उनका डर दूर करने का प्रयास किया। परंतु अब इस तरह के आदेश से शांति स्थापित होने के दिन नहीं रहे थे; क्योंकि सिपाहियों को डर कारतूसों का नहीं था, वहाँ कारतूसों के संबंध में कैसा भी आदेश दिया जाए तो भी उसका क्या उपयोग? अंग्रेजों को आदेश देने का अधिकार रहे या न रहे, यही जहाँ चर्चा थी वहाँ नया आदेश देने से वह चर्चा बंद न होकर उलटे अधिक तीव्र होनी थी। अब कारतूसों के प्रकरण में अच्छा या बुरा कैसा भी व्याख्यान देना विषयांतर ही था। क्योंकि दिल्ली में स्थापित स्वकीय सिंहासन की ओर से हिंदुस्थान का स्वातंत्र्य ध्वज थामे रखने के लिए रुहेलखंड के लोगों के लिए आग्रहपूर्ण और एक आवश्यक निमंत्रण आया हुआ है। अब इस निमंत्रण पत्रिका को ठुकराना है क्या?

'दिल्ली के फौजी बहादुरों की ओर से बरेली के फौजी बहादूरों को प्रेमालिंगन ! भाई, दिल्ली में अंग्रेजों से लड़ाई हो रही है। परमेश्वर की कृपा से अपनी एक पराजय भी उनकी दस पराजय के बराबर हानि कर रही है। अनगिनत स्वदेशी वीर इधर आ रहे हैं। ऐसे समय आप वहाँ भोजन कर रहे हों तो हाथ धोने यहाँ आना। शाहों का बादशाह और वैभव का आगार जो अपना दिल्ली का बादशाह है वह आपका बढ़िया मान-सम्मान करेगा और आपकी सेवा का उत्तम पुरस्कार भी देगा। आपकी तोपों की गड़गड़ाहट के लिए हमारा कार्य और आपके दर्शनों के लिए हमारे नेत्र चातक की तरह बाट जोह रहे हैं। आइए, जल्दी आइए! क्योंकि बंधु! भवदागमन के बसंत के बिना यहाँ गुलाब कैसे खिलेगा? दूध के सिवाय बच्चा कैसे जीएगा?' [66]

अब ऐसी निमंत्रण पत्रिका को कैसे ठुकराया जाए? ऐसे निमंत्रणों के बीच रुहेलखंड के अंतिम स्वतंत्र रोहिला सरदार हाफिज रहमत का वंशज भी बरेली में गुप्त षड्यंत्र के ताने-बाने बुन रहा था। इस खानबहादुर खान को अंग्रेजों की ओर से वह हाफिज रहमत खाँ का वंशज होने के नाते 'एक' और वह अंगेज सरकार में साल जज था, इसलिए 'दूसरी'-ऐसी दो पेंशनें मिलती थीं। अंग्रेज अधिकारियों का मुँह-लगा बना रहने में खान बहुत ही कुशल है उधर यह कहा जाता था। सरकार का भी उसपर वैसा ही विश्वास था और बरेली के सारे गुप्त षड्यंत्रों का प्राण भी यही था।

बरेली स्थित सारे नेटिव सिपाही और रुहेलखंड की स्वतंत्रता-प्रेमी जनता से इस निमंत्रण पत्र द्वारा जल्दी दिल्ली आने का आग्रह यद्यपि किया गया था, तब भी पहले से निश्‍चित ३१ मई के दिन की राह में बरेली के सारे सिपाही अंग्रेजों के लश्करी आदेशों का पालन पूरी तरह करते हुए अपने-अपने काम कर रहे थे। इस बीच मेरठ से चले सौ सिपाही चुपके से लाइन में कुछ दिन रहकर और उधर के उत्क्षोभक समाचारों से क्रांति की हवा अधिक भरकर चले गए। फिर भी सिपाहियों ने ऊपर से शांति बनाई हुई थी। यूरोपियन लोग अपने बाल-बच्चे वापस बुला लें. यह निवेदन उनसे सिपाहियों के सूबेदार कर रहे थे। परंतु यह निवेदन माना जाने से पहले ही २९ मई को ऐसी भूमिका बनी कि प्रात: नदी पर नहाते समय उस दिन दोपहर को दो बजे ही यूरोपियनों को कत्ल करने की शपथ सिपाहियों ने ले ली। तत्काल अंग्रेजों ने अपने भरोसे की घुड़सवार रेजिमेंट तैयार की। वह भी बिना नानुकुर किए तैयार हो गई। परंतु वह पूरा दिन बीत गया, पर सिपाही उठे नहीं। यह समाचार झूठ निकला; फिर भी एक बात सिद्ध हो गई कि घुड़सवार पूरी तरह अपने अधीन हैं, यह कहते हुए अंग्रेज रात को लौट गए। फिर दूसरा पक्का समाचार आया कि घुड़सवार रेजिमेंट ने तो पहले ही शपथ ले ली है कि हम अपने देशबंधुओं पर शस्त्र नहीं उठाएँगे और फिरंगियों की ओर से नहीं लडेंगे। ऐसे में किस बात पर विश्वास किया जाए, यह अंग्रेजों की समझ में नहीं आ रहा था। इस तरह २९ मई ही नहीं, ३० मई भी निकल गई और उस दिन तो सिपाहियों का आचरण इतना राजनिष्ठ हो गया था कि वैसा शायद कभी नहीं था। ऐसे में सैनिक-असैनिकसारे अंग्रेज अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि संकट टल गया है और अब डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।

३१ मई उदित हई। उस दिन कैप्टन ब्राउन लो के घर को एकाएक आग लग गई थी। परंतु अंग्रेजों के मन में डर उत्पन्न हो, ऐसा कोई विशेष कारण नहीं था। वह दिन रविवार का था। रविवार को होनेवाली लश्करी हाजिरी हो गई। नेटिव अधिकारियों की रिपोर्ट आ गई। अंग्रेज अधिकारियों को यह भी लगा कि आज सिपाही लोगों में विशेष संतोष और शांति दिख रही है। चर्च में अंग्रेजों ने प्रार्थना भी की। कहीं अणु मात्र भी गड़बड़ नहीं दिखी। घड़ी ने दोपहर के ग्यारह बजाए।

तभी सिपाहियों की लाइन से एक तोप छूटी। तोप छूटते ही बंदूकों की आवाजें और चिल्ल-पों से आकाश भर गया। बरेली की क्रांति इतनी सूत्रबद्धता से की गई थी कि क्रांति आरंभ होते ही कौन किस यूरोपियन का खून करेगा, यह पहले ही ठहरा लिया गया था। ग्यारह बजते ही ६८वीं पैदल सेना ने अपनी लाइन के पास के यूरोपियनों पर आक्रमण किया। छोटी-छोटी टुकड़ियाँ अलग-अलग बँगलों की ओर तुरत-फुरत चल पड़ीं। बाकी बचे सिपाहियों ने इधर-उधर भागना चाहनेवाले अंग्रेजों की व्यवस्था करने, उनके घर लूटने, उनमें आग लगाने की दौड़ लगाई। उन कर्कश चीत्कारों को सुनकर डरे-सहमे यूरोपियन लोग घुड़सवारों की लाइन की ओर दौडे। वहाँ सारे मुलुकी और लश्करी अधिकारियों की आश्रयार्थ इकट्ठे होने की योजना पहले से बनी थी। वहाँ जाते ही नेटिव घुड़सवार रेजिमेंट को विद्रोहियों पर आक्रमण करने का आदेश दिया गया। पर उस रेजिमेंट का मुख्य नेटिव अधिकारी मोहम्मद शफी विद्रोहियों से मिला था। घुड़सवारों को अपने पीछे दौडकर आने का आदेश देता वह विद्रोहियों की ओर दौड़ चला। उसने घुड़सवारों को-'स्वधर्म के लिए बलिदान दो। देखो, वह हरा निशान तुम्हें बुला रहा है।' ऐसा चिल्लाकर कहा और सारे घुड़सवार दौड़ पड़े। फिर भी जो कोई शेष रहे उन्हें लेकर अंग्रेजों ने एक बार परेड की ओर आने का प्रयास किया। पर विद्रोहियों की मार के आगे एक क्षण भी रुकना असंभव होने के कारण उन्होंने उधर से पीठ फेरी और सबके सब नैनीताल की ओर भागने लगे। ब्रिगेडियर सिवाल्ड इस पहले ही हमले में मारा गया। कैप्टन की, लेफ्टिनेंट फ्रेजर, सार्जेंट वाल्डन, कर्नल ट्रप, कैप्टन राबर्ट्सन आदि जो भी अधिकारी विद्रोहियों के हाथ लगे उन्हें उन्होंने काट डाला। इस कत्लेआम से बचकर कोई बत्तीस अधिकारी नैनीताल तक सहीसलामत पहुँच सके। इस तरह छह घंटों के अंदर बरेली में अंग्रेजी शासन का अंत हो गया।

अंग्रेजी निशान उतार फेंककर बरेली में स्वतंत्रता का झंडा फहराते ही नेटिव तोपखाने के मुख्य सूबेदार बख्तर खान ने सारी नेटिव सेना का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। बख्तर खान का नाम आगे दिल्ली की लड़ाई में हमको सुनने को मिलेगा। इस सेनापति ने सारे नेटिव सिपाहियों को स्वतंत्रता के बाद किस तरह व्यवहार करना है और नव स्थापित स्वराज्य में क्या-क्या कर्तव्य करने चाहिए, इसपर एक भाषण दिया और बाद में अंग्रेज ब्रिगेडियर की बग्घी में बैठकर यह स्वदेशी ब्रिगेडियर बरेली के रास्ते से जाने लगा। [67] उसके साथ अलग-अलग अंग्रेज अधिकारियों की गाड़ियों में नव नियुक्त अधिकारी भी चल दिए। खानबहादूर खान के नाम का जयघोष करके दिल्ली के बादशाह के सूबेदार की हैसियत से उन्होंने रुहेलखंड का शासन अपने हाथ में लिया। बरेली में स्थित यूरोपियनों के घर-द्वारों को जलाकर, लूटकर भस्म करने के बाद फिर कैद किए गए यूरोपियनों को खानबहादुर ने अपने सामने बुलवाया। अंग्रेजी शासन में जज का काम करने से उन्हें अंग्रेजी न्याय कैसे किया जाता है, यह ज्ञात ही था। इसलिए उन्होंने उन यूरोपियन अपराधियों की जाँच के लिए एक कोर्ट नियुक्त किया। इन अपराधियों में वायव्य प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर का दामाद डॉ. 'हे' भी था। बरेली के सरकारी कॉलेज का प्रिंसिपल डॉ. कर्सन भी था। बरेली का जिला मजिस्ट्रेट भी था। एक दिन पूर्व ही राजनिष्ठ खानबहादुर खान इसके गले में गलबहियाँ डालकर बैठे थे। आज ये सिंहासन पर और वह अपराधी के पिंजरे में था। ज्यूरी की शपथ लेकर रीति अनुसार न्यायासन पर बैठे। अलग-अलग आरोप अलग-अलग अपराधियों पर लगाकर उन्हें फाँसी का दंड सुनाया गया और उन छह यूरोपियन लोगों को तुरंत फाँसी पर चढ़ा दिया गया। तुरंत ही खानबहादुर के आदेश से एक विज्ञापन छापा गया कि यूरोपियन कमिश्नर भाग गया है। उसे जो पकड़कर लाएगा या उसका सिर काट लाएगा उसे एक हजार रुपए का पुरस्कार सरकार के खजाने से दिया जाएगा। इस तरह यूरोपियन रक्त और मांस से अपना सिंहासन पक्का जमाने के बाद खानबहादुर ने सारा रुहेलखंड स्वतंत्र होने का समाचार दिल्ली भेजा। उस दिन विद्रोह ग्यारह बजे प्रारंभ हुआ और शाम को सूर्यास्त के पूर्व सारा प्रांत स्वतंत्र हो जाने की घोषणा दिल्ली की ओर चल दी।

वह सारा प्रांत स्वतंत्र हो जाने की घोषणा केवल शाब्दिक थी, ऐसा भी नहीं है। उधर बरेली में विद्रोह की तोपें अपनी गड़गड़ाहट से अंग्रेजी सत्ता को कँपा रही थीं, इधर शाहजहाँपुर में भी गोरे रक्त का छिड़काव होने लगा था। बरेली से शाहजहाँपुर कोई चालीस मील की दूरी पर है। वहाँ २८वीं नेटिव पैदल रेजिमेंट थी। मेरठ की खबर शाहजहाँपुर १५ मई को पहुँची। परंतु अंग्रेज अधिकारियों को पता चल जाए, ऐसा एक भी खुला कृत्य न होने से ३१ मई का दिन भी अन्य दिनों की तरह बड़ी शांति, संतोष और उल्लास में उदय हुआ। वह रविवार का दिन था। सारे अंग्रेज चर्च में भी गए। उनकी प्रार्थना अभी आधी ही थी कि चर्च की ओर सिपाही तीव्रता से दौड़ते हुए आने लगे। उस चर्च का चॅप्लेन बाहर आया तो उसका हाथ सिपाहियों ने उड़ा दिया और विद्रोह की शुरुआत हो गई। शहर का मजिस्ट्रेट रिफेटस भागते हुए मारा गया। सर बाडोर को चर्च के अंदर ही कुचल दिया गया। चर्च पर आक्रमण करने एक टोली इधर आई; तभी दूसरी एक टोली कैंटोनमेंट में यरोपियनों को मारने के लिए भेजी गई थी। उसने उधर आग लगाने और लूटने का काम चालू कर दिया था। असिस्टेंट मजिस्ट्रेट जान बचाने भागा तो बरामदे में ही काट डाला गया। सिपाहियों से दो बातें कहने का प्रयास डॉ. बाउलिंग ने किया और सिपाही भी उसकी बात सुनने लगे; परंतु दुर्भाग्य उसने उनको 'राजद्रोही' कह दिया। उसके मुँह से यह शब्द निकलना था कि एक गोली सनसनाती हुई आई और वह चल बसा। चर्च की ओर जो विद्रोही गए थे वे केवल तलवारें और लाठियाँ लेकर गए थे, इसलिए वे बंदूकें लेने लाइनों की तरफ आए। इसी बीच सिख सिपाही और बावरची आदि नौकरों ने कुछ अंग्रेज स्त्री-पुरुषों को पास के एक राजा के यहाँ पहुँचाया। पर राजा द्वारा अपनी असमर्थता व्यक्त कर उन्हें निकाल देने पर वे उघड़े बदन, नंगे पैर महमंदी की ओर निकल गए। इस तरह ३१ मई की संध्या तक शाहजहाँपुर भी स्वतंत्र हो गया।

बरेली से वायव्य दिशा में कोई अड़तालीस मील की दूरी पर मुरादाबाद जिला मुख्यालय है। वहाँ २९वीं नेटिव पैदल रेजिमेंट और नेटिव तोपखाने की आधी बैटरी-इतनी सेना थी। मेरठ के समाचार के बाद इस सेना के मन में कितनी राजनिष्ठा है, यह देखने का एक अपूर्व अवसर आया। मेरठ के कुछ सिपाही मुरादाबाद के पास ही ठहरे हुए हैं, ऐसा समाचार अंग्रेज अधिकारियों को १८ मई को मिला तो उन्होंने उनपर रात में ही छापा मारने का आदेश उस रेजिमेंट को दिया।

उस आदेश को सिर-माथे लेकर उन सिपाहियों ने उस रात मेरठ के जंगल में सो रही सेना पर बहुत जोर का आक्रमण किया। परंतु जाने क्या हुआ कि मेरठ की उस मुट्ठी भर सेना पर सोते हुए-आकस्मिक और प्रबल आक्रमण होने पर भी उसमें से एक को छोड़ सारे सैनिक जीवित भाग गए। पर सिपाही उसके लिए क्या करें? उस रात अँधियारा भी विकट था। अंग्रेज अधिकारियों ने कहा, "सिपाहियों ने कमाल का आक्रमण किया; पर अँधियारे के कारण ही शत्रु जीवित भाग सका।" अब यह ज्ञात हुआ कि मेरठ की सेना पर मुरादाबाद के सिपाहियों ने दिखावे का आक्रमण किया था। इतना ही नहीं, उस रात भागे हुए मेरठ के कुछ सिपाही मुरादाबाद के सिपाहियों की लाइन में ही आकर रहने लगे थे। परंतु अंग्रेजों का २९वीं रेजिमेंट पर उस कमाल के आक्रमण से भारी विश्वास जम गया और वह भंग हो, ऐसा उन सिपाहियों के आचरण से मई माह की समाप्ति तक कुछ भी घटित नहीं हुआ।

३१ मई उदित हुई और परेड पर सिपाही पूरे अनुशासन में एकत्र होने लगे। आदेश के बिना तुम लोग यह क्या कर रहे हो, ऐसा अंग्रेज अधिकारी जो पूछने लगे तो सिपाहियों ने उन्हें आदेश दिया कि कंपनी का राज समाप्त हो गया है, अत: आप प्रदेश छोडकर भाग जाएँ नहीं तो आपको कत्ल किया जाएगा। तुरंत नहीं जा सकते तो दो घंटे की मोहलत दी जा सकती है। परंतु उतनी देर में मुरादाबाद खाली करना होगा। सैनिकों के इस आदेश के साथ ही मुरादाबाद की पुलिस ने भी अब अंग्रेजों के आदेशों का पालन न करने की घोषणा की और शहर के नागरिकों ने भी उससे सहमति जताई। एक ही समय तीनों ओर से चेतावनी मिलते ही मुरादाबाद के जज साहब, कलेक्टर साहब, मजिस्ट्रेट साहब, सर्जन साहब और अन्य सारे साहब अपने बाल-बच्चे लेकर एक पल भी विलंब न करते हुए मुरादाबाद छोड़कर भाग गए। जो कोई यूरोपियन या ईसाई इस चेतावनी के बाद भी मुरादाबाद में दिखे उन्हें काट डाला गया। मि. पॉवेल आदि कुछ लोगों ने इसलाम धर्म अपनाया और अपने प्राण बचाए। सैनिकों ने खजाने पर कब्जा किया। सारी सरकारी संपत्ति पर भी कब्जा किया गया और मुरादाबाद पर ३१ मई की शाम से पूर्व ही हरा झंडा लहराने लगा। [68]

बरेली और शाहजहाँपुर-इन दो शहरों के बीच बदायूँ नामक जिले का मुख्यालय है। उस जिले का कलेक्टर और मजिस्ट्रेट मि. एडवर्ड्स उसी शहर में रहता था। अंग्रेजी राज के प्रारंभ से पुराने जमींदारों की दुर्दशा और लगान वसूली के लिए झटपट की जानेवाली नीलामी में हाथ से जाती हुई जमीनों से पूरे रुहेलखंड के बड़े-बड़े जमींदार और किसान बहुत त्रस्त हो गए थे। उसमें भी बदायूँ में लगान पद्धति का इतना अत्याचार था कि यह जिला अंग्रेजी राज को मिटा देने के लिए किसी भी अवसर की ताक में था। यह बात स्वयं एडवर्ड्स को भी ज्ञात थी और इसलिए उसने बरेली से सेना की सहायता माँगी थी। परंतु स्वयं बरेली के उस समय क्या हाल थे, यह पहले बताया ही जा चुका है। फिर भी बरेली से यह लिखित प्राप्त हुआ कि १ जून को हम यूरोपियन अधिकारी के अधीन सेना भेज रहे हैं। यह समाचार आते ही एडवर्ड्स बहुत खुश हुआ। वह १ जून को बरेली के रास्ते की ओर आँखें गड़ाए बैठा रहा। उस रास्ते पर कोई सरकारी आदमी दौड़ता आ रहा है, वह भी उसे दिखने लगा। अर्थात् बरेली से आनेवाली सहायता का यह हरकारा ही है, यह मान एडवर्ड्स ने उतावली में उससे प्रश्न किए। परंतु प्रश्न के उत्तर में बरेली से बदायूँ को सेना सहायता के लिए आ रही है, यह न बताते हुए यह बताया गया कि बरेली में ही अंग्रेजी सत्ता समाप्त हो गई है। बदायँ में खजाने की सुरक्षा के लिए कुछ सिपाही रखे हुए थे। उसके अधिकारी से एडवडर्स ने पूछा, 'बरेली स्वतंत्र हो गई। बदायूँ का क्या होगा?' अधिकारी ने कहा, 'मेरे सिपाही राजनिष्ठ हैं। कोई डर नहीं है।' उसने यह आश्वासन दिया ही था कि शाम को बदायूँ में विद्रोह हो गया। खजाने के सैनिक, पुलिस और नागरिक-सबने फिरंगी राज डूब जाने की घोषणा कर दी और वह सारा जिला खानबहादुर खान के नियंत्रण में चला गया। सैनिकों ने खजाना लेकर दिल्ली की ओर कूच किया और बदायूँ के सारे अंग्रेज अधिकारी रात में ही जंगलों में होकर भागने लगे। खाने को अन्न नहीं, पहनने को कपड़ा नहीं ऐसी स्थिति में छिपते-छिपते कभी-कभी किसी गाँववाले के घर भैसों के पीछे, जहाँ गोबर की दुर्गंध से नाक फट रही थी वहाँ हफ्ते-हफ्ते बिताते अंग्रेज महिलाएँ, अंग्रेज कलेक्टर, मजिस्ट्रेट अपने प्राण बचाते भाग रहे थे। कुछ मारे गए, कुछ मर गए, कुछ दयालु नेटिवों के कृपाश्रय में प्राण बचाए बने रहे।

इस तरह पूरा रुहेलखंड एक दिन के अंदर विद्रोह कर उठा। बरेली, शाहजहाँपुर, मुरादाबाद, बदायूँ आदि जिलों के शहरों में स्थित सेना, पुलिस और जनता ने एक चेतावनी में ही दो घंटे के अंदर ब्रिटिश सत्ता को सीमा पार कर दिया। ब्रिटिश सिंहासन औंधा हुआ, उसपर स्वकीय सिंहासन विराजमान हुआ। ब्रिटिश झंडा उतारकर उसके स्थान पर हरे झंडे लगाए गए। ब्रिटिश कोर्ट, कार्यालयों और थानों से हिंदुस्थान पर अधिकार करनेवाला इंग्लैंड अपराधी के कटघरे में खड़ा हो गया। ऐसा यह विलक्षण परिवर्तन सारे प्रदेश में दो घंटे में हो गया। रुहेलखंड से अंग्रेजी शासन का उन्मूलन करने के लिए स्वदेशी रक्त की एक बूंद भी खर्च नहीं करनी पड़ी। यह कितना बड़ा आश्चर्य था। रुहेलखंड गुलाम है, यह न कहकर रुहेलखंड स्वतंत्र है, ऐसा सबने कहा और वह स्वतंत्र हुआ। सेना, सिपाही, नागरिक सबके विद्रोह करते ही हर जिले के मुख्य शहर से दो-चार यूरोपियन अधिकारियों को निकाल देने से अधिक उस प्रदेश को स्वतंत्र करने को कुछ भी अधिक काम नहीं करना पड़ा। गुप्त कार्यक्रम, मजबूत संगठन और उसके द्वारा की गई त्वरित कौशलपूर्ण कार्यवाही-इन बातों के आधार पर अंग्रेजों के कब्जे से निकलते ही रुहेलखंड ने खानबहादुर खान का शासन स्वीकार किया। पहले बताया गया है कि यहाँ के सारे सैनिक बरेली के तोपखाने के सूबेदार बख्तर खान की अधीनता में दिल्ली की ओर लड़ने चल दिए। उसके बाद खानबहादुर खान ने प्रदेश का बंदोबस्त रखने के लिए नई सैनिक भरती चालू की और राजधानी के अधिकतर नागरिकों को सिपाही के रूप में तैयार किया गया। सारे स्थानीय विभागों की व्यवस्था करके उसमें अधिकतर पहले के लोग ही रखे गए और वरिष्ठ स्थानों पर नए स्वदेशी अधिकारियों की नियुक्ति की गई। सरकारी पैसा दिल्ली के बादशाह के नाम पर वसूल किया जाने लगा। न्याय देने के लिए पहले जैसे ही कोर्ट खोले गए और पहले के ही नौकर नियुक्त कर दिए गए। संक्षेप में, जहाँ यूरोपियन अधिकारी होते थे वहाँ हिंदुस्थानी नियुक्त करने के सिवाय किसी भी विभाग में राज्य क्रांति के धक्के से अन्य तरह का परिवर्तन नहीं हुआ। खानबहादुर खान ने अपने सूबे की यह सारी जानकारी दिल्ली के बादशाह को लिखकर भेज दी और रुहेलखंड में निम्नलिखित राजकीय घोषणापत्र लगाया गया।

'हिंदुस्थान देश के वासियो ! स्वराज्य-प्राप्ति का दुर्लभ अवसर तुम्हें प्राप्त हो गया है। उसको स्वीकार करोगे या अनादर? इस अपूर्व और असाधारण अवसर का तुम लाभ लोगे या उसे हाथ से फिसल जाने दोगे? हिंदू बंधुओ और मुसलमान भाइयो! यह ध्यान में रखना कि यदि अपने हिंदुस्थान देश में इन अंग्रेजों को तुमने रहने दिया तो ये तुम्हारे देश का सत्यानाश और तुम्हारे धर्म का विनाश किए बिना कभी भी रहनेवाले नहीं हैं। [69] अंग्रेजों के फरेब के कारण आज तक हिंदुस्थान के निवासियों ने अपनी गरदन अपनी ही तलवार से काटी है। अतः वह गृह-कलेश की गलती हमें अब ठीक कर लेनी चाहिए। मुसलमानों से लड़ने की सलाह हिंदुओं को देना और हिंदुओं के विरुद्ध चलने की बात मुसलमानों को कहना-इस कपट नाटक का प्रयोग अंग्रेज लोग अब भी करना चाहेंगे। परंतु हिंदू बंधुओ, आप उनके जाल में मत फँसना। चतुर हिंदू बंधुओं से यह कहना आवश्यक नहीं कि अंग्रेज लोग अपने वचन का कभी भी पालन नहीं करते। झूठी-सच्ची बातें कहकर बहलाने में वे उस्ताद हैं। वे पृथ्वी से अन्य धर्मियों का नाश करने के लिए आज तक प्रयास करते रहे। उन्होंने दत्तक संतान के अधिकार छीने। देशी राजाओं के प्रदेश और राज्य उन्होंने खा लिये। नागपुर का राज्य उन्होंने अधिग्रहण किया। लखनऊ का राज उन्होंने डुबो दिया। हिंदू और मुसलमान दोनों को ही उन्होंने पैरों तले कुचला। मुसलमान भाइयो, तुम्हें कुरान की परवाह हो और हिंदुओ, आपको गो माता की चिंता हो तो अब आपस के भेदभाव भूलकर इस जिहाद में सब लोग सम्मिलित हो जाओ। एक झंडे के नीचे लड़ते-लड़ते मैदान में कूद पड़ो और हिंदुस्थान से अंग्रेजों का नाम रक्त के प्रवाह से धो डालो। हिंदुस्थान से फिरंगियों को नष्ट करने के लिए यदि हिंदू लोग मुसलमानों के साथ लड़ेंगे, यदि स्वदेश की मुक्ति के लिए वे रणांगण बनाएँगे तो उनके देशाभिमान के इनामस्वरूप गो माता का वध बंद किया जाएगा। इस धर्मयुद्ध में जो स्वयं लड़ेगा या दूसरों को लड़ने के लिए द्रव्य सहायता करेगा वह ऐहिक और पारमार्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करेगा। परंतु यदि कोई इस स्वदेश युद्ध के विरुद्ध जाएगा तो "तो वह स्वयं के सिर पर आघात करके आत्महत्या का अपराधी होगा।'



 

१. लेकी द्वारा लिखित-'फिक्शन एक्सपोस्ड'।

१. लेकी कृत-'फिक्शन एक्सपोस्ड' में वर्णित यह घोषणापत्र उस क्रांतियुद्ध के समय लोक वृत्ति किस तरह चेत गई थी-यह दरसाने को बहुत उपयोगी है। इसका काफी कुछ अंश आगे भी दिया जाएगा।

[4] हिस्ट्री ऑफ अवर ओन टाइम', खंड ३।

१. 'हिस्‍ट्री ऑफ अवन ओन आइम', खंड 3 ।

2. इंडियन म्युटिनी', खंड १, पृष्ठ ६४४।

[6] मानव के कर्तव्य'।

[7] इंग्लैंड का विस्तार', पृष्ठ २१४

3.''यदि उसे (देशी सैनिक) को अपना संपर्ण जीवन अपनी पूर्ण क्षमता का प्रदर्शन करते हुए सेना में लगाना पड़ता था तो जो सर्वाधिक सम्‍मान उसे प्राप्‍त हो पाता था- वह थी सूबेदारी। एक अंग्रेज सार्जेंट भी अपने से उच्‍' पद पर नियुक्‍त देशी अधिकारियों पर हुकुम चलाता था। परेड में भी अंग्रेज अधिकारी भूल करते थे तथा आदेश देते समय गलत शब्‍दों का प्रयोग करते थे; किंतु इसका संपूर्ण दोष सिपाहियों पर डालकर वे उनकी निंदा और भर्त्‍सना किया करते। इतना ही नहीं,

जो देशी अधिकारी सेना में सेवा करते-करते वृद्ध हो गए थे उन्‍हें भी यूरोपियन खुलेआल अपशब्‍द कहते थे।... देशी शास्‍कों की सेनाओं के समान उन्‍हें यात्रा को पूर्ण करने के लिए हाथी और पालकियों प्राप्‍त नहीं होती थीं, फिर चाहें कितनी भी लंबी यात्रा क्‍यों न करनी पड़े। वे कहते थे-निजाम और मराठी सरदारों के सिपाही भी हमारे सूबेदारों और जमादारों से अच्‍छा जीवन व्‍यतीत करते थे। अंग्रेज अधिकारी देश की सुंदरतम महिलाओं के जनानखानों में भी प्रविष्‍ट हो सकते थे ।... और इस सबकी पराकाष्‍ठा तो तब हो गई थी जबकि जनरल ऑर्थर वेल्‍जली ने अपने घायल सैनिकों को निर्ममता सहित गोलियों से उड़ा देने का आदेश दे दिया था।

-के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड १, पृष्ठ १६०-६१

[9] मॉलकम लेविन कहता है-"...Grasping everything that could render life desirable, we have desired to the people of the country all that could raise them in society, all that could elevate them as men...we have delivered up their pagoda-property to confiscation; we have branded them in our official records as 'heathens. 'We have seized the possessions of their native princes and confiscated the estates of the nobles; we have unsettled the country by exactions and collected the revenue by means neighbour's purse for what it contains.

[10] रणजीतसिंह के साम्राज्य के उत्तराधिकारी दिलीपसिंह की दुर्दशा सुनकर किसीको भी दया आएगी। किंतु 'निष्पक्ष के ने लिखा है-"दिलीपसिंह के लिए यह एक सुखद परिवर्तन था कि अपने जीवन के १२वें वर्ष में ही वह गवर्नर जनरल का आश्रित हो गया और उसे बंगाल की सेना के एक सहायक कर्मचारी की देखरेख में रखा गया, जो इस कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति था, जिसके निर्देशन में सिख राजकुमार का विकास एक भद्र ईसाई, एक अंग्रेज दरबारी के रूप में हुआ।"

[11] सतारा की गद्दी पर सन् १८१९ में छत्रपति की पुनर्योजना करते हुए अंग्रेजी सरकार द्वारा किए गए समझौते की पहली धारा निम्नवत् थी-"अंग्रेज सरकार अपनी ओर से वह देश अथवा क्षेत्र, जिसको विशेष रूप से निर्दिष्ट किया गया है, सरकार अथवा महाराजाधिराज छत्रपति (सतारानरेश) को देने पर सहमत है । हिज हाइनेस महाराजा छत्रपति और उनके पुत्र और उत्तराधिकारी

पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रभुसत्ता प्राप्त राजाओं के रूप में इस क्षेत्र पर शासन करते रहेंगे।"

1 पार्लियामेंटरी पेपर्स, १५ फरवरी, १८५०, पृष्ठ १५३।

[13] वही, पृष्ठ १४१।

[14] 'डलहौजीज एडमिनिस्ट्रेनशन', पृष्ठ १६५-६८।

१ पारसनी क्रूट 'झाँकी की रानी का चरित्र', पृष्ठ २८-२९।

१ 'नाना साहिब्स क्लेम अगेंस्ट ईस्ट इंडिया कंपनी' में यह मूल पत्र दिया हुआ है।

२थॉमसन कृत- 'कानपुर'।

१ थॉमसन कृत-'कानपुर' में कानपुर के कत्लेआम में से जो दो व्यक्ति बचे हुए थे थॉमसन

उन्हों में से एक थे, अतः उपरोक्त पुस्तक का किंचित् महत्त्व है।

२ थॉमसन कृत-'कानपुर', पृष्ठ ४८ ।

३ सर जान के कहता है-"A quiet unostentatious young man not at all addicted to any Extravagant habits."

४ चार्ल्स बाल कृत- 'दी हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्यूटिनी', खंड १, पृष्ठ ३०५।

१ 'डलहौजीज एडमिनिस्‍ट्रेशन,' पृष्‍ठ 348-41

२ सर जॉन के ने कहा है-"सत्यता यह है कि यह एक ऐसी त्रुटियुक्त प्रणाली थी कि जिसकी जितनी अधिक भर्त्सना की जाए, कम ही है। इस प्रकार उसने निकृष्ट श्रेणी का द्वैध शासन आरंभ कर दिया था। राजनैतिक और सैनिक सत्ता तो कंपनी के हाथों में थी; किंतु अवध का आंतरिक शासन अभी भी नवाब, वजीरों के हाथ में था।" -खंड १, पृष्ठ ८२

3 'डलहौजीज एडमिनिस्‍ट्रेशन,' खंड २, पृष्‍ठ 367

[23] डलहौजीज एडमिनिस्ट्रेशन', खंड २, पृष्ठ ३६७।

[24] अयोध्या के राज्य को अधिग्रहीत करने के बाद वहाँ के अत्यंत कुलीन, प्रभावशाली और प्रमुख लोगों की जो दुर्दशा हुई उसका वर्णन बहुत भयंकर है। वंश परंपरा से प्राप्त जमीनें और वतन एक क्षण में नष्ट हो गए। इन अभागे तालुकेदारों के लिए 'के' लिखता है-"The charges against him were many and great for he had diverse ordeals to pass through and he seldom survived them all. ...When the claims of a great talukdar could not be altogether ignored, it was declared that he was a rogue or a fool. ... They gave him a bad name and traightway they went out to ruin him!...It was at once a cruel wrong and a grave error to sweep it away as though it were an encumbrance and an usurpation."

जो व्यवस्था नवाब नहीं कर सकते थे उस राज्य की ऐसी व्यवस्था करने पर सारे जमींदारों को कंपनी ने जल्दी ही बेरहम मार लगाई, यह आगे वर्णित है। इनाम कमीशन जो नियुक्त किया उसने तो विकट कहर ढाया। अंग्रेजों को जैसे बड़े-बड़े राजा नहीं चाहिए थे वैसे ही सिरजोर जमींदार भी नहीं चाहिए थे। जो जमीनें और जागीरें तलवार के जोर पर प्राप्त की थीं उनके कागज नहीं थे इसलिए उन्हें एक सिरे से अधिग्रहीत किया गया। कम-से-कम पैंतीस हजार वतन' और बड़ी जागीरें छानबीन के लिए निकालीं और उनमें से केवल पाँच वर्ष में तीन पंचमाश समाप्त कर दीं।

[25] "हमारी अंग्रेजी पाठशालाएँ दिन-प्रतिदिन आश्चर्यजनक ढंग से प्रगति करती जा रही हैं। अकेले हुगली नगर में ही १४०० बालक अंग्रेजी सीख रहे हैं। इस शिक्षा का प्रभाव ही नितांत चमत्कारपूर्ण हो रहा है। मेरा यह सुदृढ़ विश्वास है कि यदि यह शिक्षा योजना सुचारु रूप से जारी रही तो तीस वर्ष पश्चात् बंगाल में एक भी मूर्तिपूजक न रह जाएगा।"

-मैकलेज लेटर टू हिज मदर, १२ अक्तूबर, १८३६

[26] के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड १, पृष्ठ ३८० ।

[27] के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड १, पृष्ठ ३८१ ।

[28] "चरबी की बनावट में गाय की कुछ चरबी होती थी, इस विषय में तनिक भी संदेह नहीं है।"

--के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड १, पृष्ठ ३८१

[29] "ठीक अंतिम समय पर कर्नल बर्च सिपाहियों को यह आश्वासन देने हेतु आगे आया कि उन्हें दिए गए किसी कारतूत में चरबी नहीं लगाई गई है। उसका यह कथन सर्वथा मिथ्या था। सिपाही इससे धोखे में आनेवाले नहीं थे। जैसाकि एक साहसी लेखक ने लिखा है कि सरकार तो केवल झूठ का पुलिंदा ही खोल रही है।"

-बंगाल के एक हिंदू का पत्रक, १८५७

[30] विभिन्न प्रांतों में भेजे गए राजकीय दूतों में से एक दूत मैसूर में पकड़ा गया। उसका कहा निम्न भाग बहुत महत्त्वपूर्ण होने से पूरा-का-पूरा यहाँ दिया जा रहा है-"श्रीमंत नाना ने अयोध्या अधिग्रहीत होने के पूर्व दो-तीन माह से पत्र-प्रेषण शुरू किया था। परंतु पहले उन्हें उत्तर नहीं आए। किसीको भी आशा नहीं थी। अयोध्या का राज्य अधिग्रहीत हो जाने पर नाना ने पत्रों की अधिक मार की तब जाकर केवल लखनऊ के साहूकार नाना के विचार पढ़ने लगे। पुरबिया लोगों का राजा मानसिंह भी मिल गया। फिर सिपाही लोगों ने अपनी-अपनी तजवीजें' करनी शुरू की और लखनऊ के साहूकारों से उन्हें सहायता मिलने लगी।" अयोध्या अधिग्रहीत होने तक बिल्कुल उत्तर नहीं आया परंतु वह राज्य अधिग्रहीत होते ही सैकड़ों लोगों ने हिम्मत से आगे आकर नाना को वचन-पत्र भेजे। सिपाहियों की तजवीजें पहले से ही शुरू हो गई थीं। फिर कारतूसों की घटना हुई और उस असंतोष पर नाना के पत्रों की बरसात होने लगी। जम्मू के गुलाब सिंह ने-मैं सेना और खजाना लेकर तैयार हूँ-ऐसा पत्र लिखा। और लखनऊ के साहूकारों ने धनराशियाँ भी भेज दीं।

[31] के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड २, पृष्ठ ३० ।

[32] मि. विलियम कृत-'दि मेरठ नैरेटिव'।

[33] ट्रेवेलियन कृत-कानपुर।

[34] "दिल्ली के राजमहल से बहुत पहले ही एक राजाज्ञा प्रसारित की गई थी, जिसमें मुसलमानों को यह निर्देश दिया गया था कि वे अपने सभी महत्त्वपूर्ण समारोहों पर एक गीत का गायन करें

[35] ट्रेवेलियन।

[36] अपने विस्तृत इतिहास के अंत में मैलसन लिखता है-"इस षड्यंत्र का नेता निश्चित रूप से मौलवी ही था। इस संगठन की शाखाएँ संपूर्ण भारत में फैल गई थीं। निश्चित रूप से ही आगरा में, जहाँ यह मौलवी यदा-कदा रहता था और दिल्ली, मेरठ, पटना एवं कलकत्ता में भी जहाँ अवध का भूतपूर्व नवाब रहता था, इस क्रांति संगठन का प्रभाव प्राय: व्यापक ही था।"

[37] चार्ल्स बाल कृत-'म्युटिनी', खंड १, पृष्ठ ४०।

[38] रेड पैम्फलेट, खंड १।।

[39] इन्स कृत-'सेपॉय रिवॉल्ट', पृष्ठ ५५ ।

[40] रेड पैम्फलेट, खंड २।

[41] अंग्रेजों को हिंदुस्थान की मनोवृत्तियाँ इतनी ज्ञात थीं कि सत्तावन की फरवरी में अंग्रेजी पत्र एवं अंग्रेजी सरकारी रिपोर्ट कहती है-"संपूर्ण देश पूर्णरूपेण शांत है।"

-चार्ल्स बाल

[42] मैलसन ने लिखा है-"एक बहाने मात्र के रूप में ही और केवल इसी रूप में ही कारतूस क्रांति का कारण सिद्ध हुए थे। षड्यंत्रकारियों ने इस बहाने का पूर्ण लाभ उठाया था और उन्हें यह अवसर इसलिए उपलब्ध हुआ था, जैसाकि मैंने सिद्ध करने का प्रयास भी किया है कि सैनिकों तथा जनता के कतिपय वर्गों के मन में यह विश्वास बद्धमूल करा दिया गया था कि उनके विदेशी स्वामी प्रत्येक कार्य ही दुष्ट हेतु को लेकर कर रहे हैं।"

मेडली ने अपनी पुस्तक में लिखा है-"वस्तुत: चरबी से चिकने किए गए कारतूसों की बात ने तो केवल उस सुरंग में अंगार मात्र ही लगाया था जिसका निर्माण अनेक कारणों द्वारा किया गया था।" श्री डिजरैली ने तो सुस्पष्ट शब्दों में इस धारणा को अस्वीकार किया था कि "चिकने कारतूस ही इस विद्रोह का मूल कारण थे।"

-चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड १, पृष्ठ ६२९

इससे भी एक पग आगे रखकर एक लेखन ने अपने ग्रंथ में लिखा है-"यह तो असंदिग्धरूप से सिद्ध कर दिया गया है कि कारतूसों का भय था, तो अनेकों के लिए बहाना मात्र ही था।

[43] . "यह नाम भारत भर में सभी विद्रोही सिपाहियों के लिए उपनाम के रूप में ख्याति प्राप्त कर गया।"

-चार्ल्स बाल

"सिपाहियों को सामान्यतः 'पांडे' कहकर संबोधित किए जाने का उद्गम स्थल यह नाम हा था।"

-लॉर्ड राबर्ट कृत-'फोरटी वन ईयर इन इंडिया'

[44] रेड पैम्फलेट, खंड १, पृष्ठ ३४ ।

[45] "व्यक्तिगत रूप से तो तुम्हारे प्रति हमारे मन में कोई द्वेष भावना नहीं है; किंतु तू फिरंगी है, अतः तुझे मरना ही चाहिए।" -चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड १, पृष्ठ ५२

[46] जे.सी, विल्सन।

[47] रेड पैम्फलेट, खंड १।

[48] एक हिंदू द्वारा लिखित 'विद्रोह के कारण'।

[49] "इतना सुनिश्चित था कि यदि संपूर्ण हिंदुस्थान में सहसा ही विद्रोह की ज्वाला धधक उठती और अंग्रेजों को इस विद्रोह के होने से पूर्व इसका पता न लग पाता तो हमारे (गोरे) बहुत ही थोड़े व्यक्ति इस वेगवान संहार से बच पाते। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश राष्ट्र के लिए भारत पर पुनः विजय प्राप्त कर पाना एक अत्यंत ही कठिन कार्य होता अथवा अपने पूर्वी साम्राज्य में पराजय का एक अमिट कलंक सर्वदा के लिए हमारे मस्तक पर अंकित हो जाता।" -मैलसन, खंड ५

"मेरठ के इस भयानक विद्रोह से हमें एक महान् लाभ अवश्य हुआ। वह यह था कि समूचे भारत के सैनिकों के विद्रोह का कार्यक्रम ३१ मई, १८५७ के निश्चित दिन क्रियान्वित होना था। किंतु इस समय से पूर्व भड़के उभार ने हमें समय से ही जागृत कर दिया।"

-हाइट का इतिहास, पृष्ठ १७

[50] चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड १, पृष्ठ ७४

[51] मेटकॉफ।

[52] "चाहे कितनी भी क्रूरता अथवा रक्तपात क्यों न किया गया और बाद में कितनी भी जन श्रुतियाँ क्यों न प्रसारित की गई हों कि महिलाओं से भी छेड़छाड़ की गई है, उनका अपमान किया गया है, किंतु जहाँ तक मैंने जाँच की है, इसकी सत्यता का कोई भी प्रमाण मुझे नहीं मिला।"

-आनरेबल सर विलियम म्यूर, के.सी.एस.आई., गुप्तचर विभाग के प्रमुख

[53] चार्ल्स बाल, खंड १, पृष्ठ १०५ ।

[54] के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड २।

[55] इस वर्णन से अधिक हृदयद्रावक वर्णन सत्तावन के क्रांतियुद्ध में मिलना मुश्किल है। जिस प्रदेश से अंग्रेजों को संरक्षण मिलता था उसी प्रदेश से स्वधर्म और स्वराज्य के लिए हथेली पर सिर लिये स्वकीयों को केवल रास्ता भी न मिले! इतना ही नहीं अपितु उनमें के हजारों लोगों को शत्रु से भी अधिक यंत्रणा देकर मार डाला जाए! इस अमानुषिक पाप का प्रायश्चित्त हिंदुस्थान के इतिहास में कभी हो तो हो। इस यंत्रणा का वर्णन-'ट्र नेटिव नैरेटिव्स ऑफ दि म्युटिनी इन दिल्ली में देखने को मिलेगा।

[56] होम्स कृत-'हिस्ट्री ऑफ दि सीज ऑफ दिल्ली।

[57] "सैनिक पंच न्यायालय के आसन को ग्रहण करने के पूर्व प्रत्येक पंच द्वारा यह शपथ ग्रहण की जाती थी कि मैं बंदी के अपराधी अथवा निर्दोष होने की चिंता न करते हुए उसे प्राणदंड दूंगा। आर यदि उनमें से कोई इस विवेकहीन निर्णय के विरुद्ध अपना मुख खोलता भी था तो उसके अन्य साथी उसका मुख बंद कर देते थे। निर्णय के तत्काल उपरांत ही फाँसी के फंदों पर जाते हुए बदियों को प्रताड़ना दी जाती थी और उनका उपहास भी किया जाता था। उन्हें अनाड़ी-हत्यारे भाति-भाँति की यंत्रणाएँ देते थे और पड़े-लिखे अधिकारी मनोरंजन करते थे।"

-होम्स कृत-'हिस्ट्री ऑफ दि सेपॉय वार', पृष्ठ १२४

[58] के कृत-'हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्युटिनी', खंड २, पृष्ठ १३८ ।

[59] "यदि पंजाब हाथ से चला जाता तो हमारा सर्वनाश हो जाना निश्चित था। ऊपरी प्रदेश में सेना पहुँचने से पहले ही सभी अंग्रेजों की अस्थियाँ धूप में सूखने के लिए डाल दी गई होतीं। इस संकट से बचकर पूरब में अपनी सत्ता पुनः स्थापित करना तथा गर्व से माथा ऊँचा उठाना इंग्लैंड के लिए असंभव ही हो जाता।"

-लाइफ ऑफ लॉर्ड लारेंस

[60] सर जॉन लारेंस ने अपने २१ अक्तूबर, १८५७ को लिखे गए एक पत्र में लिखा था-"यदि सिख हमारे विरुद्ध क्रांतिकारियों के साथ मिल जाते तो हमारी रक्षा करना मानवी शक्ति से परे था। किसीको यह आशा नहीं थी, न ही कोई यह कल्पना ही कर पाया था कि अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता को हड़पनेवालों से प्रतिशोध लेने का अवसर ये लोग गँवा देंगे और इस लोभ का संवरण कर लेंगे।"

[61] मेटकॉफ कृत-'टू नेटिव नैरेटिव्स ऑफ दि म्युटिनी'।

[62] के द्वारा प्रस्तुत वृत्तांत।

[63] अंग्रेजों ने एक झूठी गप उड़ाकर उसे 'कलकत्ता की काल कोठरी' नाम दिया और अंग्रेजों के अपन कुटिल मस्तिष्क से निकले इस भयंकर शोधकार्य पर विश्वास कर सारा विश्व सिराजुद्दौला का स्मृति को गाली-गलौज करता है। वास्तविक अर्थ में 'काल कोठरी' नाम जिसके लिए

[64] चार्ल्स बाल, खंड १, पृष्ठ १३४।

[65] रेड पैम्फलेट, खंड २, पृष्ठ ७० ।

[66] असली पत्र : कॉलिंस नैरेटिव, पृष्ठ ३३ ।

[67] चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड १, पृष्ठ १७५ ।

[68] चार्ल्स बाल, भाग १।

[69] "हिंदू एवं मुसलिम बंधुओ, भलीभाँति समझ लो कि यदि तुमने अंग्रेजों को हिंदुस्थान में रहने दिया तो वे निश्चित रूप से ही तुम्हारा धर्म भ्रष्ट करेंगे और तुम्हारा नरमेध भी होगा अंग्रेज अब भी हमारे साथ कुटिलता की नीति का ही पालन करेंगे। वे हिंदू को मुसलमान के विरुद्ध उभारने में कदापि नहीं चूकेंग"

-दि दफ्टर ऑफ खानबहादुर खान, ट्रांस्लेटेड बाइ क्रासॉफ्ट विल्सन

प्रकरण-७

बनारस और इलाहाबाद

कलकत्ता से लगभग चार सौ साठ मील दूर श्री जाह्नवी के किनारे बनारस शहर अपने पुरातन वैभव के साथ बसा हुआ है। भागीरथी के पवित्र, शीतल और धवल जल में प्रतिबिंबित होने का महद्भाग्य जिन शहरों को है बनारस उन सब शहरों की पटरानी लगता है। गंगा के घाट से एक पर एक चढ़ती भुवनराजि, उनके मस्तकों पर सुवर्ण मुकुटों-से चमकते ऊँचे-ऊँचे मंदिरों के कलश, उनपर चँवर जैसे डोलते फल-पुष्पों से भरे घने वृक्ष, भिन्न-भिन्न देवालयों में बजते हजारों घंटों के अलग-अलग स्वर एक-दूसरे से मिलकर उनसे उत्पन्न होनेवाली कर्ण मधुर एक तान और सारी सुंदरता पर स्थापित श्री काशी विश्‍वेश्‍वर के अधिष्ठान आदि से बनारस शहर को अनन्य शोभा प्राप्त हुई है। आसक्ति के लिए भोग-विलासाकांक्षी, भक्ति के लिए भजनलोलुप, वैराग्य के लिए वैरागी और मुक्ति के लिए मुमुक्षु इस काशी क्षेत्र में अपने-अपने साध्य की सिद्धि पाते हैं। जग में वैभव का उपभोग कर पूर्णकाम हुए लोगों के लिए काशी क्षेत्र वानप्रस्थाश्रम या संन्यासाश्रम है। इस जग में सारी आस और उपभोग दुष्ट दुर्जनों के मत्सर या दीप्ति के कारण छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। ऐसे भाग्यहीन और वैभवविहीन लोगों का काशी क्षेत्र और वहाँ की भी भागीरथी का प्रसन्न जल-तुषार-श्रमपरिहारक शांति भवन हैं।

ऐसे इस शांति भवन में अपना श्रम परिहरण करने के लिए आनेवाले भाग्यहीन लोगों की सन् १८५७ में अंग्रेजों की कृपा से बिलकुल कमी नहीं थी। दिल्ली की अमीरी बंद होने से अशरण हुए कितने ही राजपुत्र और अन्य कितने ही मुसलमान, सिख और मराठों के नष्ट-वैभव हुए राजकुल उस बनारस शहर में अपन दुःखों की कहानी मंदिर-मंदिर और मसजिद-मसजिद में कहने बैठे हुए हैं। ऐस इस शहर में हिंदुस्थान में चल रही स्वधर्म की दुर्दशा और स्वराज्य का नाश आदि पर चर्चा हिंदू और मुसलमानों में विशेष जोर-शोर से चले, इसमें कोई आर्श्‍चय नहीं। बनारस से कुछ ही दूरी पर स्थित सिक्रोली गाँव में उस प्रदेश के लश्कर की छावनी थी। वहाँ नेटिव पैदलों की ३७वीं रेजिमेंट, लुधियानवी सिख रेजिमेंट और एक घुड़सवार पलटन भी रखी हुई थी। वहाँ का तोपखाना अवश्य जान-बूझकर यूरोपियनों के कब्जे में रखा हुआ था। इन लश्करी सैनिकों में अलग-अलग रूप से स्वराज्य और स्वधर्म के लिए विद्रोह करने की लालसा गुप्त रीति से उत्पन्न हुई थी। जैसे-जैसे सन् १८५७ का साल करीब आने लगा वैसे-वैसे बनारस के लोक समुदाय में विलक्षण खलबली मचने के चिह्न स्पष्ट होने लगे। उस शहर का मुख्य कमिश्नर टक्कर, जज म्यूबिन, मजिस्ट्रेट लिंड आदि स्थानीय अधिकारियों और कैप्टन ओलफर्ट, कर्नल गॉर्डन आदि लश्करी गोरे अधिकारियों ने पहले से ही बनारस में रह रहे अंग्रेज लोगों के संरक्षण की बहुत व्यवस्था की हुई थी; क्योंकि उस शहर में लोक-क्षोभ-कभी-कभी गोपनीयता की सीमा के बाहर फूटने सेका जोर रोकना कठिन हो जाता। पुरबिया लोग 'हे रामजी, इन फिरंगियों की गुलामी से मुक्त करो' कहते हुए खुलेआम मंदिरों में प्रार्थना करने लगे। [1] अन्य स्थानों की तैयारी कितनी क्या हुई, इसकी पक्की जानकारी ज्ञात करने हेतु समितियाँ स्थापित की गईं। मई माह आते ही सैनिक छावनियों में मुसलमान मौलवियों का जमघट बढ़ गया। शहर की दीवारों पर और सार्वजनिक चौतरों पर लोक शक्ति प्रचंड विद्रोह करे, इस हेतु घोषणाएँ चिपकाई गईं और बात इतनी बढ़ गई कि हिंदू पंडित मंदिरों में इकट्ठे होकर स्वराज्य की विजय और फिरंगियों का नाश हो, इस हेतु सार्वजनिक प्रार्थना करने लगे। [2] उसी समय बाजार में अनाज के भाव बहुत ही अधिक बढ़ने लगे। भाव इतने अधिक बढ़ गए तो अनाज व्यापारियों की ही अंतिम हानि कैसे है, यह अर्थशास्‍त्रीय सिद्धांत जब बाजार में घूमकर अंग्रेज अधिकारियों ने समझाना चालू किया तब लोग उनसे मुँह पर ही पूछने लगे कि हमारे देश में महँगाई कर अब हमें ही उपदेश देने क्यों तैयार हुए हो? बनारस शहर में इस लोक-क्षोभ का विकराल रूप देखकर अंग्रेजों को इतना डर हो गया कि विद्रोह होने के पहले ही बनारस छोड़कर जाने का आग्रह स्वयं ओलफर्ट और कैप्टन वॉटसन करने लगे। अंत में म्यूबिन ने बेचैन होकर उनसे कहा, 'I will go on my knees to you not to leave Banaras!' (बनारस न छोड़ें, मैं आपके पाँव पड़ता हूँ।) इस पैर पकड़ने के प्रभाव से बनारस छोड़कर जाने का विचार तात्कालिक रूप से रद्द कर दिया गया और वह क्यों न किया जाता? कारण, बनारस के सिख स्वयंसेवक टोलियाँ बना ली गई थीं। वारेन हेस्टिंग्स के लतियाए चेतसिंह का वंशज भी आज अंग्रेजों की ओर नहीं जा मिला था? इतनी राजनिष्ठा कायम होने पर अंग्रेजों के लिए बनारस छोड़कर जाने का कोई कारण ही नहीं था।

परंतु इस राजनिष्ठा पर सवार होकर अंग्रेज लोग बनारस में अपना आसन अटल करने की बात सोच ही रहे थे कि पडोस के आजमगढ़ से भयंकर गर्जना सुनाई देने लगी। आजमगढ़ बनारस से लगभग साठ मील दूर बसा था। वहाँ १७वीं देशी रेजिमेंट रखी हुई थी। इस रेजिमेंट में ३१ मई से रोज भयानक खलबली मचने लगी। उसे शांत करने के लिए वहाँ का मजिस्ट्रेट मि. हार्न रोज सैनिकों को व्याख्यान देने लगा। पर ऐसे व्याख्यानों से दिल बहलने के दिन अब नहीं रहे थे। ३१ मई उदय हुई। उस प्रांत के सिपाहियों ने विद्रोह की सूचना देने के लिए बनारस में बैरकों को ही आग लगा दी। अत: जून के पहले हफ्ते में विद्रोह हो जाना है। आज ३ जून है। यह मुहूर्त कोई बुरा नहीं है। क्योंकि गोपालपुर में आ रहे खजाने में आजमगढ़ का खजाना मिलाकर सात लाख रुपयों का खजाना बनारस की ओर जा रहा है। इससे उत्तम मुहूर्त कौन सा होगा।

तारीख ३ जून की संध्या काल की प्रभा रात्रि में विलीन हो रही थी। सारे गोरे सैनिक अधिकारी अपने क्लब में इकट्ठा होकर खाना खा रहे थे और उनके बाल-बच्चे वहीं हँस-खेल रहे थे। इतने में धूम-धड़ाके का क्या अर्थ होता है, यह जून के पहले हफ्ते में अंग्रेजों को जबानी याद था। उनकी भयभीत शांति 'विद्रोह हुआ' ऐसा एक-दूसरे को कहने लगी। तभी नगाड़ों और दुंदुभि की ध्वनि शुरू हो गई। एक क्षण भी नहीं गया और जिनके हृदय में मेरठ की स्मृतियाँ ताजा थीं वे गोरे लोग सिर पर पैर रखकर भागने लगे। औरतें-बच्चे, अधिकारी-सबने प्राणों की आशा छोड़ दी। पर आजमगढ़ के सैनिकों ने इस तरह मरे हुए से लोगों को देखकर अधिक प्रतिशोध लेने का विचार छोड़ दिया था। उन्होंने उन गोरे लोगों को जीवित रखने के लिए अपने कब्जे में ले लिया और आजमगढ़ छोड़कर तुरंत चले जाने को कहा। परंतु कुछ भीमकाय सैनिकों ने अंग्रेजी रक्त चखने की भीषण प्रतिज्ञा की हुई थी, उनकी उस भीष्म प्रतिज्ञा का क्या हो? [3] तो लेफ्टिनेंट हचिन्सन साहब और क्वार्टर सार्जंट लुई साहब, कम-से-कम तुम्हारे शरीर में तो ये हमारी गोलियाँ घुसनी ही चाहिए। बस, अब शेष चाहें तो भाग जाएँ। वे दौड़कर नहीं जा सकते हों तो गाड़ियों में बैठकर आजमगढ छोड दें। फिर भी हमें कुछ कहना नहीं है। पर यूरोपियन अधिकारी और उनकी पलियाँ कहने लगीं-'पर हमें अब गाडियाँ भी कौन देगा?' सैनिकों ने कहा-'उसकी चिंता न करें। हम देते हैं गाड़ियाँ।' ऐसी विलक्षण उदारता देख कर्ण भी सिर नवाए, इसमें कोई शंका नहीं। सैनिकों ने स्वयं गाडियाँ मँगवाईं और उसमें उन कैदी अंग्रेजों को मुक्त कर बैठाया। साथ में कछ संरक्षक सैनिक भी दिए और आजमगढ़ की अंग्रेजी सत्ता के नाम-निशान के साथ वे सारे बनारस की ओर चल दिए। उधर वह सात लाख का खजाना, अंग्रेज सैनिकों का तोपखाना, अंग्रेजी सत्ता की मुहर जिसपर थी वह जेल, कार्यालय, रास्ते, बैरकें सब पर जो सैनिकों ने अधिकार किया उसकी अगुवाई किसने की? विद्रोह का समाचार मिलने पर यदि सैनिक विद्रोह कर ही दें तो अपनी सुरक्षा हो सके इसलिए जिन अति विश्वसनीय सिपाहियों को अंग्रेजों ने नियुक्त किया था, उन सिपाहियों ने। यह पुलिस विभाग भी सेना की तरह अंदर से खोखली सुरंग थी। संकेत मिलते ही उन्होंने यूरोपियन घरों और कारागृह पर स्वराज्य का निशान लगाना प्रारंभ किया। बनारस की ओर जाती गाड़ियों में, जिन्हें जगह न मिली ऐसे कितने ही अंग्रेज गाजीपुर की ओर भाग गए और दूसरे दिन का सूर्य अपनी अनुपस्थिति की अल्पावधि में हुए इस विलक्षण रूपांतर की ओर साश्चर्य देखते-देखते आजमगढ़ पर फहराते हरे निशान को प्रकाशित करने लगा। [4] जो हृदय में डोल रहा था वही हिंदुस्थान का हरा निशान आज अपने सिर पर भी मँडरा रहा है, यह देखकर विजयी रंग में रँगे सारे सैनिकों ने एक बड़ा भारी सैनिक जुलूस निकाला और लश्करी बैंड के ताल-सुर पर अपना हरा निशान लहराते हुए वे फैजाबाद की ओर चले गए।

आजमगढ़ स्वतंत्र होने का समाचार बनारस पहुँचते ही उस शहर की हलचलों से अंग्रेजों में उत्पन्न हुए भय का निराकरण होने के संकेत दिखने लगे। मेरठ के विद्रोह का समाचार सुनकर पंजाब से जॉन लारेंस और कलकत्ता से लॉर्ड केनिंग यूरोपियन सेना को विद्रोह के मुख्य स्थान की ओर भेजने के लिए अश्रांत श्रम कर रहे थे। उत्तर की ओर से भेजी गई गोरी सेना दिल्ली को घेरकर बैठी होने से दिल्ली के निचले हिस्से में सभी ओर असहायता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी और अंग्रेज अधिकारी कलकत्ता को-कृपा करके यहाँ यूरोपियन भेजो (For Godl sake send us Europeans) यह माँग बिलकुल रोते हुए कर रहे थे। इस समय लॉर्ड केनिंग ने मद्रास, बंबई तथा रंगून से यूरोपियन सेना कैसे मँगाई और चान पर होनेवाली चढ़ाई रद्द कर वह सारी सेना हिंदुस्थान में ही कैसे रोककर रखी, इसका वर्णन ऊपर आ चुका है। उस जगह-जगह से मँगाई गई यूरोपियन सेना में से मद्रास के फ्युसिलियर के साथ जनरल नील इस समय बनारस तक आ पहुँचा था। यूरोपियन सेना की यह पहली कुमुक और वह भी जनरल नील जैसे बहादूर, साहसी और कठोर सेनापति के अधीन आ जाने से बनारस के अंग्रेजों में बहुत धीरज आ गया। इसी समय दानापुर की अंग्रेजी सेना भी बनारस आ गई। बनारस के लोगों की विलक्षण बेचैनी और वहाँ के सिपाहियों का शहर के लोगों से सहयोग होने के स्पष्ट प्रमाणों आदि की जानकारी के आधार पर वहाँ के अंग्रेज अधिकारियों ने विद्रोह को उसके गर्भाशय में ही मसल डालने का निश्चय किया। जनरल नील की यूरोपियन सेना और बनारस के सिख सरदार और सिख सिपाहियों एवं तोपखाने की सहायता से विद्रोह को मसल डालने की योजना सहज ही सिद्ध हो जाएगी, इसका अधिकारियों को पहले से ही पूरा भरोसा था। आजमगढ़ का समाचार ४ तारीख को बनारस में पहुँचते ही बनारस के नेटिव सिपाही विद्रोह करें इसके पहले ही उन्हें निःशस्त्र कर दिए जाने का निश्चय बहुत चर्चा के बाद हुआ और उस दिन दोपहर को जनरल परेड का आदेश दिया गया।

यह आदेश सुनते ही आगे क्या होगा, सिपाहियों को स्पष्ट दिखने लगा। अंग्रेज तोपखाना तैयार करके लाए हुए हैं यह गुप्त समाचार भी उन्हें मिल गया था। परेड के मैदान पर अंग्रेज अधिकारी शस्त्र नीचे रखने का आदेश देकर हमें नि:शस्त्र कर तोपों से उड़ा देनेवाले हैं यह उन्हें स्पष्ट दिख गया और इसलिए शस्त्र नीचे रखना छोड़ उन्होंने समीप के शस्त्रागार पर ही हल्ला बोल दिया और कर्कश गर्जना करते हुए वे अंग्रेज अधिकारियों पर ही टूट पड़े। उनपर दबाव बनाए रखने के लिए मँगाई गई सिख रेजिमेंट भी वहाँ आ गई। उन सिख सिपाहियों में राजनिष्ठा का उफान इतने जोरों पर था कि वे हिंदुस्थानी सेना से भिड़ने का अवसर प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों के पैर पड़ रहे थे। यह देखते ही उनके कमांडर पर एक हिंदुस्थानी सैनिक ने हमला किया और कमांडर न्युइस तत्काल मर गया। उसके स्थान पर ब्रिगेडियर जनरल हड्सन अभी आ भी न पाया था कि तभी एक सिख सिपाही को जोश आया और उसने उसे गोली मार दी। परंतु यह अक्षम्य अपराध सहन न होने से उसके पास खड़े एक सिख सिपाही ने अंग्रेज को मारना चाहने वाले सिख को तत्काल काट डाला। इस राजनिष्ठा के कृत्य को क्या पुरस्कार मिलता है यह देखने के लिए दूसरे सिख उत्सुक थे-तभी उन सबपर अंग्रेजी तोपखाना बरसने लगा। सिख सिपाहियों में हिंदुस्थानी सिपाहियों द्वारा मचाई घालमेल देखकर सिख रेजिमेंट ही विद्रोही हो गई है-ऐसी गलतफहमी अंग्रेज अधिकारियों को होने पर उन्होने हिंदुस्थानी रेजिमेंट के साथ सिख रेजिमेंट पर भी गोलीबारी शरू कर दी। अब उन अभागे सिखों को विद्रोहियों से मिल जाने के सिवाय दूसरा रास्ता ही न बचा। उन सब भारतीय लोगों ने मिलकर अंग्रेजी तोपखाने पर तीन हमले किए। हिंदू, मुसलमान और सिख मिलकर अंग्रेजी तोपों पर टूटे पड़ रहे हैं-सन् १८५७ के इतिहास में ऐसा अकेला अवसर यही था। प्रसन्नता की बात यह कि इस अवसर पर हो रहे पाप का शमन करने के लिए उसी समय बनारस शहर में सिख लोग अश्रांत प्रयास कर रहे थे। क्योंकि सिपाहियों और अंग्रेजों की जब बैरकों की ओर लड़ाई हो रही थी तब शहर के लोग भी विद्रोह करेंगे, इस डर से अंग्रेज अधिकारी, उनके बाल-बच्चे सारे रास्तों पर भाग रहे थे, उस समय उन्हें आश्रय देने के लिए सिख सरदार सूरतसिंह आगे आया। बनारस के खजाने में लाखों रुपया जमा था और उसीमें सिख लोगों की भूतपूर्व पटरानी से अंग्रेजों के छीने हुए बहुत मूल्यवान रत्नालंकार भी भरे हुए थे और उस खजाने पर सिखों का कड़ा पहरा था। अर्थात् यह खजाना अपने कब्जे में लेकर, सीमापार की हुई अपनी रानी के अलंकार वापस लेने की अनिवार्य इच्छा सिखों के मन में उत्पन्न होना अस्वाभाविक नहीं था। परंतु उनका नेता राजनिष्ठ सूरतसिंह आगे आया और उसने खजाने से एक दमड़ी भी बाहर न जाने देने की पक्की व्यवस्था अपने जात-भाइयों को वहाँ से हटाकर की। और जल्दी ही वह खजाना यूरोपियन सेना को सुरक्षित सौंप दिया गया। इसी समय एक बड़ा पंडित गोकुलचंद भी अंग्रेजों के पक्ष में मिल गया था और स्वयं बनारस के राजा ने भी अपनी शक्ति, सारी संपत्ति, सारे अधिकार सबकुछ अपने प्रभु के-काशी विश्वनाथ नहीं, अपितु अंग्रेज के चरणों में अर्पित कर दिए। सिपाही तोपों के सामने भी न झुकते हुए लड़ते-लड़ते अंग्रेजों की मार से बाहर सारे प्रांत में फैल गए।

अंग्रेज लोगों ने जॉन लॉरेंस की पंजाबी युक्ति अपनाकर बनारस शहर का विद्रोह गर्भावस्था में ही मसल दिया, यह बात सच थी; परंतु इस मसल डालने के समाचार से अधिक बनारस में विद्रोह हुआ, यह समाचार सारे हिंदुस्थान में बिजली सा फैला और बनारस से संकेत प्राप्त करने आँखें गड़ाए बैठे उस प्रांत के सारे क्रांति केंद्रों ने विद्रोह का धूम-धड़ाका शुरू कर दिया।

बनारस से निकले सारे सिपाही मंजिल-दर-मंजिल बढ़ते जौनपुर आ रहे हैं यह समाचार ज्ञात होते ही वहाँ के अंग्रेजों ने जौनपुर की सिख टुकड़ी को राजनिष्ठा पर व्याख्यान देना प्रारंभ किया। परंतु ये व्याख्यान समाप्त होते-न-होते बनारस के सिपाहियों की पदचाप सुनाई देने लगी। जौनपुर में जो थोड़े सिख सिपाही थे वे सब बनारस की सिख रेजिमेंट के ही थे सो वे तत्काल विद्रोहियों से मिल गए और सारा जौनपुर शहर विद्रोही ज्वाला में जलने लगा। यह देखकर ज्वॉइंट मजिस्ट्रेट क्यूपेज फिर से एक बार व्याख्यान देने खडा हो गया। परंतु अब तालियों की जगह एक गोली सूऽऽऽ करते हुए श्रोताओं में से बाहर आई और मजिस्ट्रेट साहब की मरुत देह गिर पड़ी। कमांडिंग आफिसर लेफ्टिनेंट 'मारा' भी गोली लगकर गिरा। यह देखते ही विद्रहियों ने खजाने पर हमला किया और यूरोपियनों को जौनपुर छोड़ देने का आदेश दिया। अब तक बनारस के घुड़सवार भी शहर में घुस गए थे। युरोपियन दिख जाए तो उसे जीवित नहीं छोड़ना है, ऐसी कठोर प्रतिज्ञा उन्होंने की थी। एक बूढ़ा डिप्टी कलेक्टर भागता दिखा-घुड़सवार दौड़े। जौनपुर के कुछ लोग बीच-बचाव करने लगे- "इस गरीब को छोड़ दो, वह बहुत दयासागर है।" सिपाहियों ने उत्तर दिया- "ऐसा कुछ नहीं, वह यूरोपियन है और उसे मरना है।" [5]

इस जोश से भरे माहौल में भी विद्रोहियों ने यूरोपियनों को शस्त्र नीचे रखकर चुपचाप भाग जाने की जो अनुमति दी उसका लाभ लेकर सारे अंग्रेज लोग जौनपुर खाली कर भागने लगे। उन्होंने बनारस की ओर भागने के लिए गंगा किनारे नौकाएँ कीं। परंतु आधे प्रवाह में आने के बाद मल्लाहों ने उन सब अंग्रेजों को लूटकर रेत पर ले जाकर छोड़ दिया। इधर जौनपुर में 'दीन-दीन' का नारा लगा सारा शहर सड़कों पर आ गया। उन्होंने सारे यूरोपियन घरों को लूटकर जलाकर नष्ट किया। अंग्रेजी शासन की, उनके बहते रक्त के सिवाय सारी पहचान धूल में मिला दी और जितना हो सके उतना खजाना लेकर सिपाही अयोध्या की ओर बढ़ने लगे। बाद में शहर की वृद्ध महिलाएँ और जीवन में दमड़ी भी जिसने नहीं देखी उन कंगालों को यह खजाना दिया गया, जिसपर उन्होंने जमकर स्वराज्य और दिल्ली के बादशाह का मन से आभार व्यक्त किया।

इस तरह ३ जून को आजमगढ़, ४ जून को बनारस और ५ जून को जौनपुर के उठते ही बनारस का सारा प्रांत क्रांति-ज्वाला में भड़क उठा। प्रांत का मुख्य शहर छूटते ही, साधारणतः राज्य क्रांति का उस प्रांत में जोर नहीं रहता। परंतु राजधाना के ऊपर राज्य क्रांति जैसे अनिश्‍चित अवसर पर अवलंबित रहना क्रांतिशास्त्र में बहुत नाशकारी दोष माना जाता है। मैजिनी कहता है-"जहाँ हमारा निशान लहराए वहीं हमारी राजधानी। अपनी राजधानी जिधर विद्रोह हो उधर ले जानी चाहिए। विद्रोह राजधानी के पीछे रहे यह अच्छी बात नहीं।" राज्य क्रांति के नक्शे पहले कितने भी सोच-विचारकर बनाए हुए हों-बिलकुल वैसे ही घटनाएँ घटित होना असंभव होता है। इसलिए चाहे राजधानी में क्रांति दुर्बल पड़ जाए, पर प्रांत को उस छोड़ नहीं देना चाहिए। इस नियम का पालन बनारस प्रांत में बहुत मजबूती से हुआ इसमें कोई शंका नहीं। क्योंकि उस प्रांत की राजधानी बनारस शहर अंगेजों के अधीन होते हुए भी बनारस प्रांत में चुटकी बजाते ही राज्य क्रांति की आँधी दस दिशाओं को धुंधला करती बह रही थी। जमींदार, किसान, सिपाही सब लोगों ने फिरंगी शासन को गोमांस की तरह आपत्तिजनक मान लिया। छोटे-छोटे गाँव में अपनी सीमा में गोरों के आने की खबर लगते ही उन्हें मार-पीटकर भगा दिया जाता। [6] विशेष बात यह कि केवल अंग्रेज लोगों के लिए ही नहीं अपितु उनके द्वारा किए गए हर काम के ल