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कविता

रंज
नीलेश रघुवंशी


अगर मैं
किसी दुख से दुखी न होऊँ
किसी सुख की चाह न करूँ
रोग भय और क्रोध से पा जाऊँ छुटकारा
तो क्या और कैसा होग?
जीवन कितना उबाऊ और नीरस होगा !

जिया नहीं जिसने जीवन को
पिया नहीं उसने मृत्यु को...!

मृत्यु से छुटकारा और जीवन से राग
सुख को देहरी का जलता दिया बनाया
दुख को जलाया खेत में कूड़े के संग
सुख को पकड़ा दुख को छोड़ा
ईमान छोड़ा अपनों को छोड़ा खुद को न छोड़ा
बीत गया आधा जीवन कोई न पहचाना
ये रंज मेरे भीतर तक पैठ गया है !


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