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वैचारिकी संग्रह

सावरकर समग्र खंड 10

विनायक दामोदर सावरकर


सावरकर समग्र

स्वातंत्र्यवीर

विनायक दामोदर सावरकर

प्रभात प्रकाशन, दिल्ली

आभार- स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक

२५२ स्वातंत्र्यवीर सावरकर मार्ग

शिवाजी उद्यान, दादर, मुंबई-२८

प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन

४/१९ आसफ अली रोड

नई दिल्ली-११०००२

संस्करण - २००४

© सौ. हिमानी सावरकर

मूल्य - पाँच सौ रुपए प्रति खंड

पाँच हजार रुपए (दस खंडों का सैट)

मुद्रक - गिर्राज प्रिंटर्स, दिल्ली

SAVARKAR SAMAGRA (Complete Works of Vinayak Damodar Savar Published by Prabhat Prakashan, 4/19 Asaf Ali Road, New Delhi-2

Vol. VIII Rs. 500.00 ISBN 81-7315-328-0

Set of Ten Vols. Rs. 5000.00 ISBN 81-7315-331-0


प्रथम खंड

पूर्व पीठिका, भगूर, नाशिक

शत्रु के शिविर में

लंदन से लिखे पत्र

द्वितीय खंड

मेरा आजीवन कारावास

अंदमान की कालकोठरी से

गांधी वध निवेदन

आत्महत्या या आत्मार्पण

अंतिम इच्छा पत्र

तृतीय खंड

काला पानी

मुझे उससे क्या? अर्थात् मोपला कांड

अंधश्रद्धा निर्मूलक कथाएँ

चतुर्थ खंड

उ:शाप

बोधिवृक्ष

संन्यस्त खड्ग

उत्तरक्रिया

प्राचीन अर्वाचीन महिला

गरमागरम चिवड़ा

गांधी गोंधल

पंचम खंड

१८५७ का स्वातंत्र्य समर

रणदुंदुभि

तेजस्वी तारे

षष्टम खंड

छह स्वर्णिम पृष्ठ

हिंदू पदपादशाही

सप्तम खंड

जातिभंजक निबंध

सामाजिक भाषण

विज्ञाननिष्ठ निबंध

अष्टम खंड

मैझिनी चरित्र

विदेश में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

क्षकिरणे

ऐतिहासिक निवेदन

अभिनव भारत संबंधी भाषण

नवम खंड

हिंदुत्व हिंदुत्व का प्राण

नेपाली आंदोलन

लिपि सुधार आंदोलन

हुनदु राष्ट्रदर्शन

दशम खंड

कविताएँ

भाषा-शुद्धि लेख

विविध लेख


अनुवाद:

प्रो. निशिकांत मिरजकर, डॉ. ललिता मिरजकर,

डॉ. हेमा जावडेकर, श्री वामन राव पाठक, श्री काशीनाथ जोशी,

श्री शरद दामोदर महाजन, श्री माधव साठे, सौ. कुसुम तांबे,

सौ. सुनीता कुट्टी, सौ. प्रणोति उपासने

संपादन:

प्रो. निशिकांत मिरजकर, डॉ. श्याम बहादुर वर्मा,

श्री रामेश्वर मिश्र 'पंकज', श्री जगदीश उपासने,

श्री काशीनाथ जोशी, श्री धृतिवर्धन गुप्त, श्री अशोक कौशिक

मार्गदर्शन :

श्री त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी, डॉ. हरींद्र श्रीवास्तव,

श्री शिवकुमार गोयल

विनायक दामोदर सावरकर : संक्षिप्त जीवन परिचय

श्री विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी तथा अग्रणी नक्षत्र थे। 'वीर सावरकर' शब्द साहस, वीरता, देशभक्ति का पर्यायवाची बन गया है। 'वीर सावरकर' शब्द के स्मरण करते ही अनुपम त्याग, अदम्य साहस, महान् वीरता, एक उत्कट देशभक्ति से ओतप्रोत इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हमारे सामने साकार होकर खुल पड़ते हैं।

वीर सावरकर न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु वह एक महान् क्रांतिकारी, चिंतक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वह एक ऐसे इतिहासकार भी थे जिन्होंने हिंदू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढंग से लिपिबद्ध किया तो '१८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर' का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला डाला था।

इस महान् क्रांतिपुंज का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के ग्राम भगूर में चित्तपावन वंशीय ब्राह्मण श्री दामोदर सावरकर के घर २८ मई, १८८३ को हुआ था। गाँव के स्कूल में ही पाँचवीं तक पढ़ने के बाद विनायक आगे पढ़ने के लिए नासिक चले गए।

लोकमान्य तिलक द्वारा संचालित 'केसरी' पत्र की उन दिनों भारी धूम थी। 'केसरी' में प्रकाशित लेखों को पढ़कर विनायक के हृदय में राष्ट्रभक्ति की भावनाएँ हिलोरें लेने लगीं। लेखों, संपादकीयों व कविताओं को पढ़कर उन्होंने जाना कि भारत को दासता के चंगुल में रखकर अंग्रेज किस प्रकार भारत का शोषण कर रहे हैं। वीर सावरकर ने कविताएँ तथा लेख लिखने शुरू कर दिए। उनकी रचनाएँ मराठी पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होने लगीं। 'काल' के संपादक श्री परांजपे ने अपने पत्र में सावरकर की कुछ रचनाएँ प्रकाशित की, जिन्होंने तहलका मचा दिया।

सन् १९०५ में सावरकर बी.ए. के छात्र थे। उन्होंने एक लेख में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया। इसके बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का कार्यक्रम बनाया। लोकमान्य तिलक इस कार्य के लिए आशीर्वाद देने उपस्थित हुए।

सावरकर की योजना थी कि किसी प्रकार विदेश जाकर बम आदि बनाने सीखे जाएँ तथा शस्त्रास्त्र प्राप्त किए जाएँ। तभी श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सावरकर को छात्रवृत्ति देने की घोषणा कर दी। ९ जून, १९०६ को सावरकर इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए। वह लंदन में इंडिया हाउस' में ठहरे। उन्होंने वहाँ पहुँचते ही अपनी विचारधारा के भारतीय युवकों को एकत्रित करना शुरू कर दिया। उन्होंने 'फ्री इंडिया सोसाइटी' की स्थापना की।

सावरकर 'इंडिया हाउस' में रहते हुए लेख व कविताएँ लिखते रहे। वह गुप्त रूप से बम बनाने की विधि का अध्ययन व प्रयोग भी करते रहे। उन्होंने इटली के महान् देशभक्त मैझिनी का जीवन-चरित्र लिखा। उसका मराठी अनुवाद भारत में छपा तो एक बार तो तहलका ही मच गया था।

१९०७ में सावरकर ने अंग्रेजों के गढ़ लंदन में १८५७ की अर्द्धशती मनाने का व्यापक कार्यक्रम बनाया। १० मई, १९०७ को 'इंडिया हाउस' में सन् १८५७ की क्रांति की स्वर्ण जयंती का आयोजन किया गया। भवन को तोरण-द्वारों से सजाया गया। मंच पर मंगल पांडे, लक्ष्मीबाई, वीर कुँवरसिंह, तात्या टोपे, बहादुरशाह जफर, नानाजी पेशवा आदि भारतीय शहीदों के चित्र थे। भारतीय युवक सीने व बाँहों पर शहीदों के चित्रों के बिल्ले लगाए हुए थे। उनपर अंकित था - '१८५७ के वीर अमर रहें'। इस समारोह में कई सौ भारतीयों ने भाग लेकर १८५७ के स्वाधीनता-संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। राष्ट्रीय गान के बाद वीर सावरकर का ओजस्वी भाषण हुआ, जिसमें उन्होंने सप्रमाण सिद्ध किया कि १८५७ में 'गदर' नहीं अपितु भारत की स्वाधीनता का प्रथम महान् संग्राम हुआ था।

सावरकर ने १९०७ में '१८५७ का प्रथम स्वातंत्र्य समर' ग्रंथ लिखना शुरू किया। इंडिया हाउस के पुस्तकालय में बैठकर वह विभिन्न दस्तावेजों व ग्रंथों का अध्ययन करने लगे। उन्होंने लगभग डेढ़ हजार ग्रंथों के गहन अध्ययन के बाद इसे लिखना शुरू किया।

ग्रंथ की पांडुलिपि किसी प्रकार गुप्त रूप से भारत पहुँचा दी गई। महाराष्ट्र में इसे प्रकाशित करने की योजना बनाई गई। 'स्वराज्य' पत्र के संपादक ने इसे प्रकाशित करने का निर्णय लिया; किंतु पुलिस ने प्रेस पर छापा मारकर योजना में बाधा डाल दी। ग्रंथ की पांडुलिपि गुप्त रूप से पेरिस भेज दी गई। वहाँ इसे प्रकाशित कराने का प्रयास किया गया; किंतु ब्रिटिश गुप्तचर वहाँ भी पहुँच गए और ग्रंथ को प्रकाशित न होने दिया गया। ग्रंथ के प्रकाशित होने से पूर्व ही उसपर प्रतिबंध लगा दिया गया। अंतत: १९०९ में ग्रंथ फ्रांस से प्रकाशित हो ही गया।

ब्रिटिश सरकार तीनों सावरकर बंधुओं को 'राजद्रोही' व खतरनाक क्रांतिकारी घोषित कर चुकी थी। सावरकर इंग्लैंड से पेरिस चले गए। पेरिस में उन्हें अपने साथी याद आते। वह सोचते कि उनके संकट में रहते उनका यहाँ सुरक्षित रहना उचित नहीं है। अंतत: वह इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए।

१३ मार्च, १९१० को लंदन के रेलवे स्टेशन पर पहुँचते ही सावरकर को बंदी बना लिया गया और ब्रिक्स्टन जेल में बंद कर दिया गया। उनपर लंदन की अदालत में मुकदमा शुरू हुआ। न्यायाधीश ने २२ मई को निर्णय दिया कि क्योंकि सावरकर पर भारत में भी कई मुकदमे हैं, अत: उन्हें भारत ले जाकर वहीं मुकदमा चलाया जाए। अंतत: २९ जून को सावरकर को भारत भेजने का आदेश जारी कर दिया गया।

१ जुलाई, १९१० को 'मोरिया' जलयान से सावरकर को कड़े पहरे में भारत रवाना किया गया। ब्रिटिश सरकार को भनक लग गई थी कि सावरकर को रास्ते में छुड़ाने का प्रयास किया जा सकता है। अत: सुरक्षा प्रबंध बहुत कड़े किए गए। ८ जुलाई को जलयान मार्सेलिस बंदरगाह के निकट पहँचने ही वाला था कि सावरकर शौच जाने के बहाने पाखाने में जा घुसे। फुरती के साथ उछलकर वह पोर्ट हॉल तक पहुँचे और समुद्र में कूद पड़े।

अधिकारियों को जैसे ही उनके समुद्र में कूद जाने की भनक लगी कि अंग्रेज अफसरों के छक्के छूट गए। उन्होंने समुद्र की लहरें चीरकर तैरते हुए सावरकर पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। सावरकर सागर की छाती चीरते हुए फ्रांस के तट की ओर बढ़ने लगे। कुछ ही देर में वह तट तक पहुँचने में सफल हो गए; किंतु उन्हें पुन: बंदी बना लिया गया। १५ सितंबर, १९१० को सावरकर पर मुकदमा शुरू हुआ। सावरकर ने स्पष्ट कहा कि भारत के न्यायालय से उन्हें न्याय की किंचित् भी आशा नहीं है, अत: वह अपना बयान देना व्यर्थ समझते हैं।

१४ दिसंबर को अदालत ने उन्हें ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र रचने, बम बनाने तथा रिवॉल्वर आदि शस्त्रास्त्र भारत भेजने आदि आरोपों में आजन्म कारावास की सजा सुना दी। उनकी तमाम संपत्ति भी जब्त कर ली गई।

२३ जनवरी, १९११ को उनके विरुद्ध दूसरे मामले की सुनवाई शुरू हुई। ३० जनवरी को पुनः आजन्म कारावास की सजा सुना दी गई। इस प्रकार सावरकर को दो आजन्म कारावासों का दंड दे दिया गया। सावरकर को जब अंग्रेज न्यायाधीश ने दो आजन्म कारावासों का दंड सुनाया तो उन्होंने हँसते हुए कहा, 'मुझे बहुत प्रसन्नता है कि ईसाई (ब्रिटिश) सरकार ने मुझे दो जीवनों का कारावास दंड देकर पुनर्जन्म के हिंदू सिद्धांत को मान लिया है।'

कुछ माह बाद महाराजा नामक जलयान से सावरकर को अंदमान भेज दिया गया। वे ४ जुलाई, १९११ को अंदमान पहुँचे। अंदमान में उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी जाती थीं। कोल्हू में बैल की जगह जोतकर तेल पिरवाया जाता था, मूँज कुटवाई जाती थी। राजनीतिक बंदियों पर वहाँ किस प्रकार अमानवीय अत्याचार ढाए जाते थे, इसका रोमांचकारी वर्णन सावरकरजी ने अपनी पुस्तक 'मेरा आजीवन कारावास' में किया है।

सावरकरजी ने अंदमान में कारावास के दौरान अनुभव किया कि मुसलमान वॉर्डर हिंदू बंदियों को यातनाएँ देकर उनका धर्म-परिवर्तन करने का कुचक्र रचते हैं। उन्होंने इस अन्यायपूर्ण धर्म-परिवर्तन का डटकर विरोध किया तथा बलात् मुसलिम बनाए गए अनेक बंदियों को हिंदू धर्म में दीक्षित करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने अंदमान की कालकोठरी में कविताएँ लिखीं। 'कमला', 'गोमांतक' तथा 'विरहोच्छ्वास' जैसी रचनाएँ उन्होंने जेल की यातनाओं से हुई अनुभूति के वातावरण में ही लिखी थीं। उन्होंने 'मृत्यु' को संबोधित करते हुए जो कविता लिखी वह अत्यंत मार्मिक व देशभक्ति से पूर्ण थी।

सावरकरजी ने अंदमान कारागार में होनेवाले अमानवीय अत्याचारों की सूचना किसी प्रकार भारत के समाचारपत्रों में प्रकाशित कराने में सफलता प्राप्त कर ली। इससे पूरे देश में इन अत्याचारों के विरोध में प्रबल आवाज उठी। जाँच समिति ने अंदमान जाकर जाँच की। अंत में दस वर्ष बाद १९२१ में सावरकरजी को अंदमान से मुक्ति मिली। उन्‍हें अंदमान से लाकर रत्‍नागिरी तथा यरवडा की जेलों में बंद रखा गया। तीन वर्षों तक इन जेलों में रखने के बाद सन् १९२४ में उन्‍हें रत्‍नागिरी में नजरबंद रखने के आदेश हुए। रत्नागिरी में रहकर उन्‍होंने अस्‍पृश्‍यता निवारण, हिंदू संगठन जैसे अनूठे कार्य किए।

'हिंदुत्व', 'हिंदू पदपादशाही', 'उ:श्राप', 'उत्तरक्रिया', 'संन्यस्त खड्ग' आदि ग्रंथ उन्होंने रत्नागिरी में ही लिखे।

१० मई, १९३७ को सावरकरजी की नजरबंदी रद्द की गई।

नजरबंदी से मुक्त होते ही सावरकरजी का भव्य स्वागत किया गया। अनेक नेताओं ने उन्हें कांग्रेस में शामिल करने का प्रयास किया; किंतु उन्होंने स्पष्ट कह दिया, 'कांग्रेस की मुसलिम तुष्टीकरण की नीति पर मेरे तीव्र मतभेद हैं। मैं हिन्दू महासभा का ही नेतृत्व करूँगा।'

३० दिसंबर, १९३७ को अहमदाबाद में आयोजित अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अधिवेशन में सावरकरजी सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने 'हिंदू' की सर्वश्रेष्ठ व मान्य परिभाषा की। हिंदू महासभा के मंच से सावरकरजी ने 'राजनीति का हिंदूकरण और हिंदू सैनिकीकरण' का नारा दिया। उन्होंने हिंदू युवकों को अधिक-से-अधिक संख्या में सेना में भरती होने की प्रेरणा दी। उन्होंने तर्क दिया, 'भारतीय सेना के हिंदू सैनिकों पर ही इस देश की रक्षा का भार आएगा, अत: उन्हें आधुनिकतम सैन्य विज्ञान की शिक्षा दी जानी जरूरी है।'

२६ फरवरी, १९६६ को भारतीय इतिहास के इस अलौकिक महापुरुष ने इस संसार से विदा ले ली। अपनी अंतिम वसीयत में भी उन्होंने हिंदू संगठन व सैनिकीकरण के महत्त्व, शुद्धि की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। भारत को पुन: अखंड बनाए जाने की उनकी आकांक्षा रही।

ऐसे वीर पुरुष का व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी हमारे लिए पथ-प्रदर्शक का काम करने में सक्षम है।

- शिवकुमार गोयल

अनुक्रम

कविता१९

१.स्फुट कविता २१

१.श्रीमंत सवाई माधवरावजी का रंगोत्सव २१

२. स्वदेशी का जोशीला गीत २३

३. चाफेकरजी और रानडेजी पर जोशीला गीत २५

४. देश रसातल को जा पहुँचा ३३

५. नासिक की गुफाएँ देखकर ३४

६. शाम ढले बीहड़ में भटका मेमना ३४

७. नारोशंकर का देवालय ३८

८. गोदा-तट पर रात्रि-दृश्य ३८

९. श्री तिलक स्तवन ३८

१०. केतकर प्रशस्ति ३९

११. यह शौक नहीं अच्छा ! ४०

१२. लेडी ऑफ दि लेक: सर्ग ५ अनुवाद ४१

१३. श्रीशिवगीत (आर्या) ४१

१४. गोदा वकिली ४३

१५. पवन लीला ४३

१६. 'केरल कोकिल' वालों का स्वागत ४४

१७. वृषोक्ति ४६

१८. श्री शिवाजी महाराज की आरती ४८

१९. हुआ विश्व में शाश्वत अविचल आज तक कभी कोई ? ४९

२०. बाल विधवा : दुःस्थिति-कथन ५०

२१. हे सदय गजानन, तार ! ५७

२२. शिववीर ५८

२३. स्वतंत्रता का स्तोत्र ६०

२४. प्रे. क्रूगरजी की मृत्यु ६१

२५. मित्रवर वामनराव दातारजी को पत्र ६५

२६. सिंहगढ़ का पोवाड़ा ६६

२७. श्री बाजी देशपांडेजी का पोवाड़ा ७७

२८. तारकाओं को देखकर ८६

२९. श्रीमान् राजा कृष्णशहा से ८९

३०. हिंदसुंदरा वह ! ९१

३१. प्रियतम हिंदुस्थान ९२

३२. प्रभाकर के प्रति ९३

३३. हे सागर ९५

३४. सांत्वना ९७

३५. मेरा मृत्यु पत्र ९७

३६. आत्मबल ९७

३७. पहली किश्त ९८

३८. सप्तर्पि ९९

३९. चंदामामा चंदामामा ! थक गए क्या ? ११७

४०. सायंघंटा १२१

४१. निद्रे १२८

४२. मूर्ति दूजी वह १३२

४३. बेड़ी १४७

४४. कोठरी १४८

४५. रवींद्रनाथजी का अभिनंदन १५०

४६. हलाहल बिंदु १५४

४८. जगन्नाथ का रथोत्सव १५४

४७. आकांक्षा (Aspiration) (किसी शापित गरुडकन्या की) १६१

४९. सूत्रधार से १६२

५०. अज्ञेय का रुद्धद्वार १६३

५१. मृत्युसम्मुख शय्या पर १६५

५२. हिंदू नृसिंह १७२

५३. हिंदुओं का एकता-गान १७३

५४. हमारा स्वदेश हिंदुस्थान १७४

५५. दीपावलि का लक्ष्मी पूजन १७५

५६. दुष्ट शराबी ! १७६

५७. जाओ जूझो ! १७६

५८. माला गूँथते जी १७७

५९. सुखशय्या मंचक १७७

६०. अखिल-हिंदू-विजय-ध्वज-गीत १७८

६१. सूतक युगों का खत्म हुआ १७९

६२. हा भगतसिंह ! हाय हा!! १८०

६३. सुन लो भविष्य को। भव्य भीषण को १८१

६४. संत रोहिदास १८२

६५. पानी बना आग ज्यों १८४

६६. यात्रा पर जाते समय १८४

६७. हिंदू जाति द्वारा श्री पतितपावन का आवाहन १८५

६८. मुझे प्रभु का दर्शन करने दो १८७

६९. मथुरा जाते समय १८८

७०. हिंदू-मुसलमान संभाषण १८८

७१. चिपक जा मुझसे ! १९०

७२. भू माता से १९०

७३. प्रतिज्ञा कर लो १९१

७४. देहलता १९१

७५. शस्त्रगीत १९१

७६. अनंत की आरती १९२

२. कमला १९३

३. विरहोच्छ्वास ! २२२

४. महासागर २४५

५. गोमांतक २५६

गोमांतक (पूर्वार्ध) २५६

गोमांतक (उत्तरार्ध-१) ३१७

महाराष्ट्र-भाट का विजयगीत ! ३५०

गोमांतक (उत्तरार्ध-२) ३५९

६. सावरकरजी की अप्रसिद्ध कविताएँ ४१२

नासिक के सन् १८९७ के गणेशोत्सव पर कुछ आर्याएँ ४१२

श्रीतिलक-आर्यभू मिलन ४१४

अन्य स्फुट कविताएँ ४१४

मातृशोक-अलाप-अष्टक ४१७

मेरी विनम्र शिकायत ४२०

एक स्वप्न ४२६

श्री तिलक-मुक्ततोत्सव ४२९

विविध लेख ४३१

१. वैनायक वृत्त की विशेषता ४३३

२. स्वतंत्रता के गायक : कवि गोविंद ४४४

कवि गोविंदजी की पूर्वपीठिका ४५१

कविवर गोविंदजी की जन्मतिथि ४५३

कवि गोविंदजी की जन्मपत्री ४५४

कविवर गोविंदजी की जाति ४५४

श्री गोविंदजी की प्रथम कविता ४५८

तमाशागर की मठी से गोविंद गुप्त होता है ४६०

श्री गोविंदजी का वीर सावरकरजी से प्रथम संभाषण ४६३

३. लालाजी के वाङ्मय का परिचय ४६९

४. हे मन, आज तुझे सुखोपभोग का अधिकार नहीं है! ४७७

५. अंदमान के उपनिवेशों का पुनर्विचार ४८२

मुख्य प्रश्न उपनिवेश के सुधार का है, उपनिवेश को तोड़ने का नहीं ४८२

अंदमान की जानकारी की माँग ४८४

अंदमान के उपनिवेश का महत्त्व ४८५

विधि समिति के प्रतिनिधियों के निरीक्षक मंडल को अंदमान में भेजिए ४८६

अंदमान हिंदुस्थान का शिशु अपत्य है ४८७

६. गोमांतक को मत भूलिए ४८८

गोमांतक का कर्तव्य ४९१

गोमांतक के शुद्धीकरण का प्रश्न ४९२

७. कै. भाऊराव चिपळूणकर (ससुर) ४९५

८. महाराष्ट्रीय तेजस्विता की सुघड़ मूर्ति ४९८

धर्मवीर भोपटकर ४९८

महाराष्ट्र के मार्गप्रदर्शक ४९९

भगवान् उन्हें हमारे कल्याण के लिए उदंड आयुरारोग्य दे दे ५००

'कानून' शब्द निकालिए ५००

९. लेखनियाँ तोड़िए और बंदूकें लीजिए ५०१

१०. लेखनी (सरकंडे की लेखनी) तोड़िए और बंदूक लीजिए, यानी क्या ५१३

११. सम्म्राट् विक्रमादित्य का चरित्र और महत्त्व ५१७

अभिमान का घमंड तो हम ही कर सकते हैं ५१७

हिंदुस्थान नवरत्नों की खान है ५१८

विक्रम नाम नहीं, संस्था है ५१९

हुण लोगों का संपूर्ण विनाश किसने किया ? ५२०

यह नक्शा देखिए और वह नक्शा देखिए ५२१

१२. नाट्य शताब्दी ५२३

१३. श्री सावरकर और बोलपट सृष्टि ५२५

भाषाशुद्धि लेख ५२७

१. भाषाशुद्धि ५२९

२. भाषाशुद्धि के मूल तत्त्व ५३०

२. मराठी भाषा का शुद्धीकरण (पूर्वार्द्ध) ५३१

मुसलमानों की अपनी भाषा ही नहीं है ५३१

अखिल मुसलमानों की एक भाषा होना संभव नहीं है ५३२

उर्दू की उत्पत्ति ५३२

उर्दू यानी विकृत और म्लेछीकृत हिंदी है ५३४

हिंदी की दुःस्थिति या दुरवस्था ५३४

मराठी पर आया हुआ प्रथम संकट और उसका प्रथम प्रतिकार ५३५

मराठी पर दूसरा आक्रमण और प्रतिकार ५३५

परकीय शब्दों का स्वकीय शब्दों पर होनेवाला वर्चस्व ५३६

काव्य में कठिनाई ५३७

आज का कर्तव्य और उसके बारे में लोगों की अपेक्षा ५३८

पुरानी मराठी की विपर्यस्त कल्पना और शाहिरी कविता ५३८

यह प्रश्न एकाध दूसरे शब्द का निश्चित रूप से नहीं है यह प्रवृत्ति का प्रश्न है ५३९

मुसलमानों की घातक महत्त्वाकांक्षा ५४०

लज्जास्पद बात-हिंदू लेखक भी उर्दू को ही परिपुष्ट कर रहे हैं ५४०

'उर्दू को राष्ट्रीय भाषा और पर्शियन लिपि को ही राष्ट्रीय लिपि कौजिए'

कहनेवाला मुसलमानों का दुरभिमान ५४१

शुद्ध हिंदी भाषा का पुनरुज्जीवन ५४२

महाराष्ट्र को पीछे नहीं रहना चाहिए ५४३

योग्यता की दृष्टि से मराठी साहित्य बँगला या हिंदी साहित्य से हीनतर नहीं है ५४४

इसीलिए हमें भी उन्हीं के जैसे शुद्धीकरण की तरफ ध्यान देना आवश्यक है ५४५

प्रत्येक भाषा में कुछ विदेशी शब्द होंगे ही ५४५

देश-देश के भिन्न-भिन्न और विशिष्ट पदार्थबोधक शब्द अगर विदेशी भाषा के

हों तो कोई प्रत्यवाय नहीं है ५४६

परंतु जहाँ जिस वस्तु को या कल्पना को उत्तम प्रकार से निर्दिष्ट करने के लिए

एक से अधिक शब्द अपने पूर्व व्यवहार में मातृभाषा में विद्यमान हैं, वहाँ उस

वस्तु को या भावना को संबोधित करने के लिए सभी स्वदेशी शब्द छोड़कर

लापरवाही से विदेशी शब्दों का उपयोग करने की बात निषिद्ध होनी चाहिए ५४६

विदेशी शब्दों के उदाहरण ५४७

कुछ शब्द यद्यपि पर्शियन भासमान होते हैं, फिर भी वे शब्द स्वदेशी हैं ५४८

दृष्टिकोण ही बदलना होगा ५४९

कष्ट होंगे, पर इसीलिए निश्चय दोगुना होना चाहिए ५५०

हमारा उद्देश्य स्पष्ट है ५५०

प्रेमद्वेष का संभ्रम ५५१

छत्रपति शिवाजी और विष्णु शास्त्री चिपळूणकर ५५३

ऊँट का शावक-छौना ५५४

अभिमान का अतिरेक ५५४

एस्पेरॅन्टो का मायावी रूप ५५५

संस्कृत भाषा से शब्द लेने के लिए भी क्या आपका विरोध है? ५५६

उर्दू भाषा मर्द की भाषा है ५५६

जिनको यावनी संपर्क से ही मराठी जोशीली हुई है ५५६

मुसलमानी शब्दों का उच्चारण है ५५८

पारिभाषिक शब्द ५६१

पुराने उर्दू शब्दों का क्या करना है? ५६३

शब्द-संपत्ति का आडंबर ५६५

कुछ उदाहरण: प्रथम वर्ग ५६६

दूसरा वर्ग ५६७

उर्दू का सिरचढ़ापन ५६९

हास्यकारक प्रतिक्रिया : स्वदेशी शब्द भी विदेशी प्रतीत होने लगते हैं ५६९

संशयास्पद फुटकर या फुटकल कठिनाई का आसान उपाय और संशयित शब्द पहचानने के नियम ५७०

इस परिभाषा के निष्कर्ष पर परीक्षा लेकर हम शब्द-प्रयोग करने का प्रयत्न करते हैं ५७१

अतिरेक त्याज्य है और सुवर्ण मध्य ही ग्राह्य है ५७२

अतिरेक चुनना अनिवार्य हो तो ५७२

यही भ्रष्ट अतिरेक ५७३

दुकान के नाम-पटल पर और नाम की पट्टी पर अंग्रेजी शब्द तथा नाम भी आद्याक्षर में लिखने की मूर्खता ५७४

सदैव नए विदेशी शब्दों को स्वीकार करने की निरर्थकता ५७५

ये ही लोग कहते हैं कि स्वदेशी नए शब्द रूढ़ होना जरा कठिन है! ५७५

विष्णु शास्त्री चिपळूणकर उर्दू शब्दों के विरुद्ध क्यों नहीं थे? ५७६

हमें भी परिस्थिति ने ही उर्दू शब्दों के बहिष्कार के लिए विवश किया है ५७७

मराठी पर उर्दू का संकट आया ही नहीं है ५७८

अहो! भाषा भाषा की बली होती है- यह नियति ही है ५७८

जो विदेशी अनुकरण लोकहितवर्धक होगा, वह त्याज्य नहीं है ५७९

इसलिए चुपचाप बैठना नहीं है ५७९

लेखकवृंद और अध्यापक वर्ग ५८०

राजनीतिक सत्ता जैसे-जैसे स्वकीय हो जाएगी, वैसे-वैसे वे शब्द भी सहज परिवर्तित होंगे ५८०

चर्चा में सहभागियों का आभार और अब विदा ५८१

३. कायदे कॉन्सिल के इलेक्शन के कैंडीडेटों का मैनिफेस्टोज ५८२

४. भाषाशुद्धि और श्री श्री. कृ. कोल्हटकर ५८९

फिर यह नियम उर्दू शब्दों पर भी क्यों नहीं लागू किया जाता ? ५९१

मुसलमानी शब्दों पर बहिष्कार, यानी मुसलमानों का द्वेष ! ५९२

श्री कोल्हटकरजी के विरुद्ध श्री कोल्हटकर ५९४

इस विरोध का मूल कारण है दूषित अभ्यास ५९६

५. पंचवार्षिक समालोचना ५९९

पुराने शब्दों का पुररुज्जीवन ६०७

६. हमारी राष्ट्रभाषा और भाषाशुद्धि ६१४

उर्दूनिष्ठ पक्ष के आग्रह से हिंदुस्थानी का नाम निर्देश ६१४

यह प्रस्ताव इतना अनिश्चित कैसे हुआ ? ६१४

'संस्कृतनिष्ठ' विशेषण क्यों लगाना पड़ा? ६१५

महाराष्ट्रीय लोगों का नेतृत्व ६१५

सच्चा वादकेंद्र अंग्रेजी नहीं है ६१६

एक की विजय होने पर भी दूसरे की पराजय निश्चित नहीं है ६१६

राज्यघटना को तुच्छ समझकर 'उर्दूनिष्ठ हिंदुस्थानी' की चालबाजियाँ शुरू ६१७

और एक कौतुक ६२०

उर्दूनिष्ठ हिंदुस्थानी के वेग की रामबाण औषधि- भाषाशुद्धि ६२१

रूढ़ विदेशी शब्दों की मालिका ६२२

उर्दू और हिंदी में होनेवाला मूलभूत प्रभेद ६२३

भाषाशुद्धि के सूत्र ६२३

प्रयोगसिद्ध प्रमाण ६२४

डॉ. रघुवीर ६२५

७. प्राध्यापक क्षीरसागर और भाषाशुद्धि ६२७

भाषाशुद्धि के मूलसूत्र ६२९

शुद्ध झूठा अभियोग ६३०

यह 'जातिवंत' मराठी का अभिमान ६३२

यह जातिमान कैसी? यह तो पाकिस्तानी मराठी है ६३३

८. भाषाशुद्धि-शब्दकोश ६३६

परिशिष्ट ६५७

भाषाशुद्धि विषयक मराठी शब्दकोश ६५७

स्‍फुट कविता

श्रीमंत सवाई माधवरावजी का रंगोत्‍सव

(परिचय : सावरकरजी द्वारा ग्‍यारह वर्ष की आयु में लिखा गया जोशीला गीत)

धन्‍य कुलों में धन्‍य सवाई, भाग्‍य धन्‍य श्रीराजा का ।

सेवक तत्‍पर साथ जुड़े हैं, पुण्‍य बहुत श्रीचरणों का ।।१।।

राजश्री का भाग्‍य अलौकिक, श्रम से द्वादश वर्ष जिए ।

जरिपटका भगवा फहराया, अटक-जीत का श्रेय लिए ।।२।।

रजपूतादिक वीर शत्रु भी, श्रीवर को शरणागत हैं ।

मुघल राज से प्रसन्‍न होकर वजीर पद जो अर्पित है ।।३।।

जहाँ तहाँ था नाम पेशवा, जिस से दुश्‍मन डरते थे ।

प्रजा चैन से सुख पाई थी, रिपु सब दूर हटाए थे ।।४।।

नाच-तमाशा-खेल बहुत से जनता में रँगाते थे ।

धनी पेशवा रंगोत्‍सव के आयोजन में मशगूल थे ।।५।।

राजा का मन-भाव देखकर, सहमति दी सब जनता ने ।

हर्षघोष से चली प्रजा तब वर्ष प्रतिपदा मनवाने ।।६।।

सरदारों ने, सकल जनों ने, सरकारी लोगों के संग ।

दो तर्फा की खूब सजावट, जगह-जगह बनवाए रंग ।।७।।

घुड़सवार, सम्‍मानित सैनिक, कार्यकारि औ' सरदार ।

श्रीमंत-प्रभु-राव सहित आ पहुँचे थे तब दरबार ।।८।।

अटक जीत कर वहाँ शान से, भगवा फहराया जिसने ।

महादजी वे अगुआई कर पहुँचे प्रभु को ले जाने ।।९।।

हाथी, घोड़े, फौज, पौर जन रोक खड़े उत्‍कंठा को ।

आज्ञा कर दी प्रभु ने तब,' अब शुरू करो तुम उत्‍सव को ' ।।१०।।

मुट्ठी-मुट्ठी गुलाल फेंके, टंकी रंग भरी सारी ।

खाली कर दी सब लोगों ने, साथ मूर्ति प्रभु की प्‍यारी ।।११।।

तीन प्रहर के बाद चले श्री स्वामी सेना सज-धज के ।

छोड़ हवेली, बाई तरफ से, मार्ग चले बुधवारे * के ।।१२।।

आगे-आगे गजारूढ प्रभ, साथ हाथी अन्‍यों के ।

चंद्र-बिंब से चमकें स्‍वामी, अन्‍य सितारों-से दमकें ।।१३।।

पिचकारी से रंग उड़ाया बहुत मजे में बुधवारे ।

कपड़े के हाटों से होकर पहुँचे सब तब इतवारे ** ।।१४।।

हरीपंत के बाड़े पर तो रंग केशरी खूब चला ।

नागझरी से रंग पाट कर हुजुम झूमता-सा निकला ।।१५।।

रास्‍ते जी के गलियारे से रंग प्रवाहित था जम के ।

छज्‍जे और अटारी पर से रंग उँडेला था जम के ।।१६।।

सलाम-मुजरे, रिवाज-रस्‍में सभी नागरिक भूल गए ।

द्वापर-युग में रंगोत्‍सव ज्‍यों प्रेम-भाव से श्‍याम किए ।।१७।।

भींग गए घर-द्वार सलोने रंगविभोर चितेरे-से ।

द्वापर में प्रभु श्‍याम रंग से रंगान्वित खेले जैसे ।।१८।।

झूम-झूमते चले सभी औ ' पहुँच गए जब वानवडी ।

दो घंटों तक नाच देखकर, रंगों की भरमार बढ़ी ।।१९।।

लाखों हौद भरे रंगों से, पिचकारी की मार चली ।

भीड़ बहुत रंगों से रँगी, हर्षोल्‍लास किए उछली ।।२०।।

दो-दो हाथों गुलाल फेंके राव-प्रभु ने मस्‍ती में ।

हास्‍यवदन शोभायमान बहु शूर सिपाही फौजों में ।।२१।।

रंग खेलकर बहुत देर तक, उठे स्‍नान के लिए पति ।

गंधित जल की कड़ाहियाँ तब चढ़ीं आँच पर अनगिनती ।।२२।।

सेवक-जन सब खड़े हो गए मालिश करने, नहलाने ।

तरह-तरह के तेल सुगंधित लिए स्‍वामि के सिरहाने ।।२३।।

हुए स्‍नान संपन्‍न सभी के, बहुत शान से, इत्मिनान से ।

वस्‍त्र दिए थे शिंदेजी ने बाँट सभी को, बहुत प्रेम से ।।२४।।

नए वस्‍त्र पहने पहुँचे सब पुनरपि तेजी से दरबार ।

नाच हो गया शुरू, बाँटकर बीड़े औ ' फूलों के हार ।।२५।।

शिंदेजी ने प्रभु को अर्पण किया नया सिरपेंच महान् ।

बहुत प्रेम से और उन्‍होंने तभी किया सबका सम्‍मान ।।२६।।

सूर्य-बिंब को शरमाते-से, मशाल लेकर रात, सभी ।

वापस लौटे साथ स्‍वामि के नानादि परिवार सभी ।।२७।।

शोभा देखत नर-नारी-गण दीप जलाकर सौधों पर ।

वाद्यध्‍वनि के साथ लौटते प्रभु को अपने बाड़े पर ।।२८।।

(भगूर, १८९४)

टिप्‍पणियाँ : १. प्रभु, स्‍वामी, राजा, श्रीमंत = पेशवा सवाई माधव राव ।

२. महादजी, शिंदेजी = महादजी शिंदे, ग्‍वालियर के राजा, पेशवा के सरदार ।

३. नानादि परिवार = नाना फडनवीस आदि सचिव-गण ।

४. वानवडी = शिंदेजी का मोहल्‍ला, जहाँ अब महादजी की समाधि स्थित है ।

५. इस कविता में वर्णित घटना के समय पेशवा की आयु मात्र बारह साल की थी ।

स्‍वदेशी का जोशीला गीत

(परिचय : यह जोशीला गीत सावरकरजी ने सन् १८९८ में, अर्थात् पंद्रह साल की आयु में रचा और उसी वर्ष यह पुणे के 'जगद्धितेच्‍छु ' वृत्‍तपत्र में प्रकाशित हुआ ।)

आर्य बंधुओ ! उठो, उठो, अब अनाड़ी न बनो, सोचो भी ।

छोड़ो हठ, अब करो प्रण, ले न लें म्‍लेच्‍छवस्‍त्र को पुन: कभी ।।१।।

काश्‍मीर-बनी शालें ले लो, क्‍यों लेते हो वस्‍त्र विदेश ।

मलमल अपनी भली, किसलिए हल्‍के पट, ये बने विदेश ।।२।।

राजमहेंद्री चिट अपनी है, क्‍यों लेते हो चिट नकली ?

भाग्‍य से मिली छोड़ कटोरी, क्‍यों लेते हो नारियली ? ।।३।।

कहत पराए लोग नागपुरवाला रेशम खद्दर है ।

उनकी अपनी रठ्ठ बनावट तुम्‍हें मुलायम लगती है ।।४।।

छोड़ पितांबर पतलूनों की बनावटी की साटिन को ।

क्‍यों लेते हो, कैसे कुछ भी नहीं समझता है तुमको ।।५।।

तुमने ही जब मुँह फेराया तब तो सारी कला गई ।

हरण किया धन सब, अब तुम भी मर जाओगे, देख भई ! ।।६।।

सोचो, हम ही पहले थे जो सकल कलाओं की खान ।

भरतभूमि की कोख में पले अब हम जैसे हैवान ।।७।।

पूर्ण जगत में कभी हमारा था व्‍यापार, बचा अब न ।

कलाभिज्ञ थे तब हम, अब तो शत्रु बन गया धीमान ।।८।।

हमने ही मयसभा बनाई थी, पांडव तुम याद करो ।

मूढ लोग तुम, शर्म न कोई, मोटे बनना बंद करो ।।९।।

धोति समाई जाती थी, तब एक आम की गुठली में ।

प्रतिब्रह्मा थे लोग यहाँ के, धिक् ! हम कैसे जनमे ! ।।१०।।

देख, पराए लोग भुलाएँ, भरमाएँ मधु वाणी से ।

अपना मतलब साध्‍य करें वे सदा हरामी वृत्ति से ।।११।।

कामधेनु है भरतभूमि, फिर भीख माँगती क्‍यों विचरे ।

सहस्र कोसों से प्रभुदीक्षा धन अपना सब हरण करे ।।१२।।

लेकर कच्‍चा माल हमारा बना-बनाया बेचत हैं ।

हमें लूटकर भूख मिटाते, फिर भी रोब जमावत हैं ।।१३।।

देखो, उनकी रीत यही है, सीमा नहीं बुराई की ।

करतूतों से, षड्यंत्रों से लूट मचाई भारत की ।।१४।।

रूमाल हाथों में लेकर, फहराते ध्‍वज अपने ऊँचे ।

हडेलहप् करते-करते ये सिपाही चले, सर ऊँचे ।।१५।।

तरह-तरह के रंग जमा के रंगपुष्‍प आकर्षक हैं ।

मोर, कौए, कबूतर तथा खरगोशों के चित्र भी हैं ।।१६।।

राजमहल, प्रासाद अनेकों ऊँचे-ऊँचे चित्रित हैं ।

सुंदर ललनाएँ उन में स्थित सुखदु:खान्वित चित्रित हैं ।।१७।।

तरह-तरह की फसल उगी है, वसुधा मंडित चित्रित है ।

चावल, गेहूँ, सरसों से यह सस्‍य श्‍यामला सुंदर है ।।१८।।

ऊँचे-ऊँचे पहाड़ उन पर हरी झाडि़याँ, बहु मोद ।

जैसे वत्‍सल पिता बिठाए बच्‍चों को अपनी गोद ।।१९।।

विभिन्‍न ऐसे चित्र दिखाकर तुम्‍हें उन्‍होंने भरमाया ।

तुम भी देख उन्‍हें, फिर अपने वस्‍त्रों को यूँ भुला दिया ।।२०।।

इसका अब तो उपाय एक ही, अपने मन में ठान लो ।

गर्व से उन्‍हें, चलो, हरा दो, स्‍वदेश के ही पट ले लो ।।२१।।

लोग पराए, मीठी बातें कितनी भी यदि करते हैं ।

मियान सुंदर, अंदर घातक तलवारें ही रहती हैं ।।२२।।

रावबाजि जो ख्‍यात हो गए, राज्‍य उन्‍होंने डुबो दिया ।

लोग पराए अपना कर, यह देशविघातक काम किया ।।२३।।

आपस का फिर बैर छोड़ दें, कृपा करे प्रभु, दु:ख भागें ।

निश्‍चय अब तो हो ही गया, विदेश वस्‍त्रों को त्‍यागें ।।२४।।

चलो, चलो अब ले लेंगे, सब स्‍वदेश के पट झट सारे ।

खद्दर जैसे क्‍यों न हों, पर उन्‍हें पहन लेंगे सारे ।।२५।।

स्‍पर्श ना करें विदेश के उन पाशवी पटों को अब हम ।

भले मुलायम क्‍यों न हों, उन्‍हें विष-सम मानेंगे अब हम ।।२६।।

आज तक यदि भूल हो गई, वश में उन के आए भी ।

जाने दो अब, चलो, स्‍मरण भी गत बातों का न करें कभी ।।२७।।

धन की खान खोद रहे हैं लोग पराए जी भर के ।

एकचित्‍त होकर अब हम धन जीतेंगे यह प्रण कर के ।।२८।।

विश्‍वेश्‍वरि वह, नारायणि वह, यम हरहर अदि सुर वरिणी ।

कर्मसिद्धि का दान करेगी मोद लुटाएगी जननी ।।२९।।

दमनरूप यह रजनी जावें, साड्ग चमक लें सूर्य महान ।

वरण करें रत्‍नांकित कड्कण रणविजयान्‍ते आर्य महान ।।३०।।

कवितारूपा अर्पित माला आर्य जनों को, धन्‍य अहा !

भक्‍तों के द्वारा प्रभु को ही अर्पित सेवा धन्‍य अहा ! ।।३१।।

(नासिक, १८९८)

टिप्‍पणियाँ : १. रावबाजी = अंतिम मराठा पेशवा, जिन्‍होंने अपने गृहकलह में अंग्रेजों से सहायता लेकर मराठी साम्राज्‍य को डुबो दिया ।

२. इस जोशीले गीत के २९ तथा ३० वाली द्विपदियों में कविवर्य 'विनायक दामोदर सावरकर' जी ने शब्‍दों के आद्य अक्षरों में अपना नाम किस तरह चातुर्य के साथ गूँथा है, यह इस कविता के मोटे अक्षरों से ध्‍यान में आ जाएगा ।

चाफेकरजी और रानडेजी पर जोशीला गीत

(परिचय : चाफेकर तथा रानडेजी को फाँसी हो जाने की वार्त्‍ता आते ही सावरकरजी ने सन् १८९९ के मध्‍य में इस जोशीले गीत की रचना की । उस समय उनकी आयु केवल सोलह-सत्रह साल की थी)

अंत में जिस दिन चाफेकरजी, रानडेजी को फाँसी पर चढ़ाने की वार्त्‍ता आ पहुँची, उसके बाद एक-दो दिनों में ही कुमार सावरकरजी ने अपनी कुल स्‍वामि‍नी अष्‍टभुजा देवी के सामने प्रतिज्ञा कर ली कि ' चाफेकरजी के अधूरे रहे कार्य को मैं आगे चलाऊँगा ! अपने देश को स्‍वतंत्र करने के लिए मैं सशस्‍त्र क्रांति का उत्‍थापन करूँगा !!

कार्य छोड़कर गिरे जूझते, दुखी न हो जाइए, अभी ।

कार्य चलाएँगे हम अब दुहराएँगे शौर्य सभी ।।

सन् १९००-१९०१ के उस जमाने में चाफेकर, रानडेजी को 'राष्‍ट्र वीराग्रणी' तथा 'अनुकरणार्ह' कहकर इतने खुलेआम उनका अभिनंदन करनेवाला यह जोशीला गीत छापना बहुत कठिन बात थी । छापनेवाला भी कौन मिलेगा ? तब इस जोशीले गीत को जितना हो सके सौम्‍य बना देने के लिए इन लोगों ने सावरकरजी से कहा । उन्‍होंने भी मूल नीति को छोड़े बिना कुछ बदलाव तथा काँट-छाट करके इसे यथासंभव सौम्‍य बना दिया । पर उसे भी छापने के लिए 'काळ' वालों ने भी मना कर दिया ।

इसी सौम्‍य प्रति को बनाते समय सावरकरजी ने मूल जोशीले गीत में अंतिम चरणों में अपना नाम जो सीधा डाल दिया था, उसे बदल दिया और चित्रकाव्‍य का आश्रय लेते हुए उसे अंतिम चार-पाँच पंक्तियों में कूटस्‍थ रूप में गूँथा । इस जोशीले गीत में अंतिम चार-पाँच पंक्तियों में मोटे अक्षरों में यह नाम मुद्रित है ।

अनेक वर्षों तक अनेक लोगों के द्वारा मौखिक रूप से गाए जाने से तथा गुप्‍त रूप में प्रसृत किए जाने से इस जोशीले गीत में कतिपय पाठांतर प्राप्‍त हुए । उनका संकलन तथा समन्‍वय करके इसकी शुद्ध प्रति पूरे पचास वर्षों के बाद सन् १९४६ में पहली बार छापी गई । उसी का यह अनुवाद है ।

: १ :

महच्‍चरित सत्‍सुधांबुधी में करें सुमन की पनडूबी ।

अखंड-सद्गुण-मंडित-मौक्तिक-निधान सद्यश मिले तभी ।।ध्रु.।।

हांगकांग से चिनगारी जो निकली पहुँची मुंबई में ।

अपूर्व अवचित प्‍लेग-हुताशन प्रकट हुआ बहु मात्रा में ।।

'हाय बाप ! हा ! हाय !' करें जब नर-महिलाएँ भयभीत ।

शेष फेंकने निकला पृथ्‍वी भयाण ध्‍वनि से भ्रमचित्‍त ।।

युवतीस्‍फुंदन, वृद्धाक्रंदन, प्राणांतिक वह कराहना ।

भूतों की चीखों से बढ़कर भयानक रहा सब सपना ।।

काल पुरुष से क्रूर और वह विष से बढ़कर विषयुक्‍त ।

चपल पवन से होकर भी वह गिरि से भी था मजबूत ।।

भारत-भू की चमक-दमक के लिए जहाँ थी आजादी ।

ऐसे पुणे शहर से मिलने उसने दौड़ लगा ही दी ।।

अस्‍मानी संकट से भारी सुल्‍तानी संकट ठहरा ।

प्रजाहिताहित सोचे बिन ही कानून बनाया बहु गहरा ।।

प्‍लेगनिवारक नियम बनाए भयकारी औ ' बहुत कठोर ।

लोगों की सम्‍मति लेने का सोचा न कभी, तो भड़का शोर ।।

प्रदीप्‍त ऐसी प्‍लेग-अग्नि में घृत बन बैठा कानून ।

रैंड-हुताशन विमुक्‍त होकर लगा जलाने बेभान ।।

: २ :

देख-देखते क्षण के अंदर काल दबोचे लोगों को ।

न्‍याय की हुई विडंबना, श्रम उदास दु:खी लोगों को ।।

शव के प्रति ज्‍यों गिद्ध झपट ले, वैसा सत्‍वर दौड़त है ।

पिशाच-गण सम मृत के घर यह सोजिर-गण तब पहुँचत है ।।

क्रूर, मदोद्धत, मानो भैरव शराब पीकर मस्‍त सदा ।

आप्‍तवियोगाहत लोगों से कठोर भाषण करे तदा ।।

मौत प्‍लेग से हो न हो, इन्‍हें अंदर घुसने का मौका ।

लूटपाट मनचाही कर के पूर्ण मिटाते आशंका ।।

अपनी इच्‍छा से घर घुसकर गृहस्‍वामी को कैद करें ।

चीज उठा लें मनचाही, बस, अपनी इच्‍छा से विचरें ।।

जिस मंदिर में कदम रखें यदि म्‍लेच्‍छ, सिर तभी कटवाते ।

ऐसे पवित्र स्‍थान हाय ! ये सोजिर उद्धत मैलाते ।।

कभी पकड़कर भ्रष्‍ट करें ये पतिव्रता अबलाओं को ।

अधमों ! सोचो ! समय न स्थिर, भुगतना पड़ेगा फिर तुमको ।।

आर्या-माताओं को देते हुए कष्‍ट बन गए तुम मदमस्‍त ।

नरसिंह प्रकट हो जाएगा तब कहाँ छुपोगे, रे कंबख्‍त ! ।।

: ३ :

बहुत कष्‍ट देते लोगों को स्‍वेच्‍छाचारी ये सोल्‍जर ।

प्रजा त्रस्‍त जब हुई तब हुए खून, न कोई आश्‍चर्य ! ।।

अबला-बाला-शाप हजारों गिरे हुए थे तब तुम पर ।

मीठी लगती थी जो कृति, ये कटु फल आए हैं सत्‍वर ।।

धर्माज्ञा का, ईशाज्ञा का, तथा समाज-कर्तव्‍यों का ।

पालन करके, प्राणार्पण के लिए सिद्ध है मन जिनका ।।

स्‍वजन कष्‍ट की वार्त्‍ता सुनकर तप्‍त युवक जो बनते हैं ।

देश के लिए प्राण त्‍यागकर ' धन्‍य-धन्‍य !' कहलाते हैं ।।

आपस में मंतव्‍य करत हैं, उपाय मन में आवत हैं ।

'अरे, रैंड यह अधम, इसी का वध करना आवश्‍यक है ।।

अरे, बहुत यह मन में चुभता, लोगों को भी पीड़त है ।

भीरु देखकर नचा रहा हैं, यम-सम क्रूर दिखावत है ।।

जीव सैकड़ों मर जाते हैं,कोई गिनति नहीं उनकी ।

देश के लिए जो मरते हैं, सदा प्रशंसा हो उनकी ।।

शीघ्र मरण को वरण करेंगे अमर तभी हो जाएँगे ।'

ऐसी बातें हो जाने पर प्रभु से आशीर्वच माँगे ।।

: ४ :

विनयशालिनी विनयधारिणी आंग्‍ल कहें जो यशवंती ।

रानी उनकी विजया विजयी भाग्‍यशालिनी जो बनती ।।

चिरायु हो, इसलिए महोत्‍सव आंग्‍ल समाज मनावत है ।

उचित समय वध करने खातिर अच्‍छा खासा मुहूर्त है ।।

स्‍वजन-कष्‍ट-निवारण करने सज्‍ज समर्पण प्राणों का ।

मोह से बिदा लेकर निकले, करत त्‍याग अपने घर का ।।

वीरश्री से शोभित, हर्षित सत्‍य-प्रतिष्‍ठा करने से ।

स्‍फूर्ति संचरत, मन में चमकत, सतेज जो भी यौवन से ।।

लाल सुर्ख थे नेत्र, बंधुवर बालकृष्‍ण ढ़ाढ़स बाँधे ।

दामोदरजी सिद्ध हो गए, खल-वध करने सौगंधे ।।

कांता बोली,' नाथ, तुम चले हित-कर्तव्‍य निभाने को ।

बिदा ले चलो, शीघ्र वरण कर लो अब अपनी कीरत को ।।'

शीघ्र पवन-सम गति से पहुँचत ' गणेशखिंड ' दामोदरजी ।

घात लगाकर बैठे करते उचित-समय-प्रतीक्षा, जी ! ।।

भक्ष्‍य रैंग जब निकला, दौड़ा शेर बगी की ओर तदा ।

गोली दाग़ी, ढेर कर दिया, दुष्‍ट नराधम मरा पड़ा ।।

: ५ :

कितने लोगों को मारा था, आज तक जहाँ आंग्‍लों ने ।

सजा न कोई उन्‍हें मिली थी, न्‍याय कहाँ का, वे जाने ! ।।

पर देखो, वह राजदूत, नहिं ! प्‍लेग दूत ! जन-पीड़ा दे ।

करे सो भरे ! परंतु ऐसी सोच किसी को शोभा दे ? ।।

योग कहो या रैंडसाब का अजीब दृढ़-संकल्‍प कहो ।

मरने पर भी उसके कारण जनसाधारण पीड़ि‍त हो ! ।।

पागल बनकर शासन निकला काट सभी को खाने को ।

सुमनांजलि थी अर्पित जिनको ऐसे भी कुछ लोगों को ।।

कभी बढ़ाया पुलिस-दल को, कभी ले गए नातू को ।

यत्र-तत्र सर्वत्र देखने लगे रैंड के खूनी को ।।

देशवीर प्रभु शूर तिलकजी ! कुशल उन्‍हीं का रहे सदा ।

सच्‍चा हीरा खरा यही था, भय से आहत नहीं कदा ।।

शाम गगन में चमकत जुगनू बहुत, एक पर रहे शशी ।

उसी तरह थे तिलक सुधाकर,अन्‍य सभी थे कृमि-राशि ।।

रण के भीतर खरे ठहरते वीर अडिग जो डटे रहें ।

और कौन हैं देशद्रोही, साफ-साफ इंसाफ रहे ।।

: ६ :

'दगाबाज',' गद्दार ' आदि थे अक्षर जिनके भालों पर ।

जिनके कारण राष्‍ट्रदेवि थी परेशान बहु जोरों पर ।।

द्रवीड बंधुद्वय, दो कुत्‍ते, दगाबाज हो गए तभी ।

उदरपूर्ति के खातिर करते बिना शर्म के काम सभी ।।

देशकार्य के लिए कार्यरत नरश्रेष्‍ठों को चकमाते ।

दगा करा के अनर्थकारी द्रव्‍य बहुत वे इठलाते ।।

कुकर्म कर सामने सभी के खतरा भी तो मोल लिया ।

अपने हाथों सदा के लिए अकीर्ति-ध्‍वज को फहराया ।।

पीड़क उद्धत, परंतु कीरत पीड़ि‍त की ही होती है।

चाफेकर यश-रत्‍न प्रकाशित, द्रवीड-कृत अँधेरा है ।।

चाफेकरजी कैद हो गए फरासखाने में तुरंत ।

मन में सोचत, 'अपराधों को स्‍वीकृत करना ही उचित ।।

जिसकी खातिर मोल लिया है संकट मैंने यह सहसा ।

देशबंधु जन भुगत रहे यह होगा न्‍याय उचित कैसा ? ।।

सज्‍जन लोगों पर ढलते हैं दु:खों के मजबूत पहाड़ ।

दस लोगों के हित के खातिर एक जाऊँ मैं, करूँ दहाड़ !'।।

: ७ :

' हाँ जी, हाँ जी' करे सर्वदा म्‍लेच्‍छों की बहु मदद करे ।

पेट के लिए करे सभी कुछ, सदैव गौरव शत्रु करे ।।

परवशता के कीचड़ में जो देश डुबो दे वह राजा !

राजद्रोही उसे कहत हैं कठोर दे जो उसे सजा ! ।।

उदात्‍त जिसके विचार, धीरत विशाल, देशप्रीति भली ।

खूनी उसको घोषित करने पर मचनी थी खलबली ।।

सजा मृत्‍यु की हुई इसी का दु:ख न कण भी कोई करे ।

देशपिता को खूनी कहलाए जाने पर क्षोभ करे ।।

न्‍यायाधीश बन गया पुरोहित, मुहूर्त सूर्योदय का था ।

सत्‍य, देशहित, कीर्ति, नीति का लगा अलौकिक मेला था ।।

गणेशपूजन तिलक वंदना, फाँसी विवाह-देवी थी ।

गीता मंत्र-पाठ, मुक्ति ही दामोदर की दुल्‍हन थी ! ।।

विवाह ऐसा विचित्र, चित्रित चित्र भयानक क्रोध भरे ।

बदला लेने वासुदेव मन में अपने योजना करे ।।

: ८ :

द्रवीड के प्रति क्रोध धधकता, शोले नेत्रों में भड़के ।

दसों दिशाओं में प्रकटें,' बदला !' अक्षर अग्नि-लिखे ।।

होंठ चबाए, मले हाथ, कुछ सोचा क्षण निश्‍चल बैठ ।

' बदला !' कानों में ध्‍वनि गूँजी, वासुदेव का स्मित अस्‍फुट ।।

बोला,'मच्‍छर ! शेर को भाग निकलते काहे को ?

करूँ तबादला यमपुर तेरा, चलो, उठा लो थैले को ।।

काट बदन तब टुकड़े-टुकड़े करूँ सैकड़ों उसके मैं ।

उजड्ड भैंसे , उकसाया है बाघ को तुमने बीहड़ में ।।

सत्‍य-देश-हितकर्ता जो था उसको दी पीड़ा तुमने ।

कृतघ्‍न ! खाकर घूस चुन लिया बलि बनना मेरा तुमने ।। '

चाफेकरजी और रानड़े दोनों में बहु दोस्‍ती थी ।

द्रविड-होम की दोनों ने भी मन में बात अब ठानी थी ।।

अधम-शांति-सिद्धार्थ हाथ में कंकण जो अब बाँधा था ।

बंधु-प्रेम का ऋत्विज था औ' दर्भ खड्ग का न्‍यारा था ।।

कोप-हुताशन प्रदीप्‍त करके द्रवीड की आहुति दे दी ।

हुआ अवभृथ स्‍नान लहू में, पूर्ण प्रतिज्ञा कर ही दी ।।

: ९ :

पीड़ा बहु पहुँचाई जब कुल लोगों को फिर म्‍लेच्‍छों ने ।

उससे आहत स्‍वयं बताया जनवत्‍सल इन दोनों ने ।।

' बदला लेने प्रिया भ्राताओं का मैंने ही खून किया ।

वासुदेव मैं, सज्‍जन तारक, दुष्‍ट द्रविड को खत्‍म किया ।।'

'मित्र का किया साथ, द्रविड पर मैंने भी तो वार किया ।

नाम रानडे, मित्र के लिए प्राण दाँव पर लगा दिया ।।'

न्‍यायालय में भीड़ अनगिनी जगह न खाली रत्‍ती भर ।

मूर्ति मनोहर देख लोग सब स्मित हो गए थे पल भर ।।

लगा टकटकी सभी देखते, 'धन्‍य शौर्य !' फिर कह देते ।

'धैर्यशील', 'पागल' भी कोई, 'शूरवीर' कोई कहते ।।

फाँसी घोषित, फिर भी अविचल थीं उनकी वे स्थिर नजरें ।

राजनीति की चाल चलाने कोई अवसर ना उभरे ।।

धन्‍य हो गया येरवडे का कारागृह उनके कारण ।

शत-शत नमन कालगति को भी हुआ तभी जिसके कारण ।।

फाँसी दे दी प्राण पखेरू देह छोड़कर चला गया ।

वीर-कृति से सभी राष्‍ट्र ने शौर्य-तेज को ग्रहण किया ।।

: १० :

काल की तरह पति को खोया अबला बन गईं बालाएँ ।

राजमहल सौभाग्‍यरूप जो बिजली गिरकर टूट गए ।।

हे बहनो, इस असह्य संकट को मानो तुम कीर्तिप्रद ।

ज्ञान स्‍वीकारो, कीर्ति करो, जानकी बनो तुम अभिसंभत ।।

माँ की तो ना दूजी उपमा भरा आसमाँ विलाप से ।

तीनों लाल निगल चुका यम विकराला दंष्‍ट्राओं से ।।

त्‍यागो शोक माताजी, उपजे रत्‍न तुम्‍हारी कोख से ।

कीरत उनकी बहू तुम्‍हारी अमर, चूम लो अभी उसे ।।

पुत्रत्रय का पिता बन गया निपुत्रिक भला कैसे जी ?

अथवा विधि ने अनुभव के बिना न मान लिया यह शोक सह्य, जी ? ।।

अद्वितीय यश तीनों का यह, देशपिता ये कुलदीपक ।

शतांश उनके यश न हमारा जीते भी यदि पूर्ण श‍तक ! ।।

अजरामर वे पुत्र तुम्‍हारे कीरत उनकी महान है ।

हीरे हैं वे, मर्त्‍य जगत में अमर बने, क्‍या कमाल है ! ।।

नररत्‍नों के वियोग से पशुपक्षी भी शोकाकुल हैं ।

वीरों के बलिदान बिना पर, राष्‍ट्रोद्धार न संभव है ।।

: ११ :

लात मारकर स्‍वार्थ हटाया सज्‍जन-पीड़ा-शमनार्थ ।

चाफेकरजी वंदन करने लायक ठहरे परमार्थ ।।

राजनीति-षड्यंत्र नष्‍ट कर देश कार्य को साध्‍य किया ।

चाफेकरजी वंदन करने लायक, उनको नमन किया ।।

प्राण निकल जाने के क्षण भी असत्‍य मुँह से ना निकला ।

चाफेकरजी वंदन करने लायक, अर्पण करूँ माला ।।

सज्‍जन-पीड़क-द्रवीड-वध के लिए सज्‍ज जो हुए तदा ।

चाफेकरजी वंदन करने लायक ठहरे नित्‍य सदा ।।

जीवन भर जो कभी न वंचित जगदीश्‍वर के भजनों से ।

चाफेकर-त्रय-बंधु वंद्य हैं वंदन शत-शत नमनों से ।।

महाघोर भवपाश तोड़कर माया का विच्‍छेद किया ।

चाफेकर-त्रय-बंधु वंद्य हैं, शत-शत उनको नमन किया ।।

प्राणों की ना फिक्र, सत्‍य ही, जनहित करने को जनमे ।

धन्‍य मित्रता ! धन्‍य रानडे वीर युवक ! है नमन तुम्‍हें ।।

तेज वीरता का न सहन कर निंदा यद्यपि उल्‍लू करें ।

नई पीढि़याँ प्रमुदित होकर वीर कथा का गान करें ।।

: १२ :

यद्यपि गुण बहु शोभत हैं रिपु के भी स्‍वभाव-जीवन में ।

गर्व मुझे लगता है अपने लोगों के गुण गाने में ।।

डरे नहीं यम से भी यदि वे देशकार्य करते-करते ।

क्‍यों भय पाऊँ मैं कविता में उनके गुण गाते-गाते ? ।।

पक्ष विरोधी जिनके वे भी सराहते हैं जिनका त्‍याग ।

कृतज्ञ होकर क्‍यों न मैं करूँ उनका गौरव-स्‍तव-अनुराग ? ।।

सदियों पीछे यही चमकता है जो आज विनिंदित है ।

अंधों, धूर्तों और कायरों को दिखता वह सत्‍य न है ।।

वितंड-ज्ञानी पंडित बनता है औ' साधु बनत धूर्त ।

सद्गुण नाहक बनते दुर्गुण, वक्‍त बहुत यह है विचित्र ।।

अन्‍याय-प्रवणों का दंडन करने नित जो सरसाते ।

वे नाहक कैसे अपराधी देशकार्य नित जो करते ।।

फाँसी ना वह यज्ञवेदिका, रक्‍त तुम्‍हारा अर्पित है ।

उसी समर में रक्‍त हमारा सार्थक नित्‍य समर्पित है ।।

कार्य छोड़कर गिरे जूझते, दुखी न हो जाइए अभी ।

कार्य चलाएँगे यह हम अब, दुहराएँगे शौर्य सभी ।।

टिप्‍पणियाँ : १. प्‍लेगनिवारक व्‍यवस्‍था अधिकारी रैंड ने पुणे के लोगों के साथ अनगिनत ज्‍यादतियाँ की थीं, जिसके कारण जनप्रक्षोभ हुआ था ।

२. चाफेकर बंधुओं रैंड की हत्‍या कर दी । द्रवीड बंधुओं ने विश्‍वासघात करके उन्‍हें पकड़वाया । इसका बदला लेने हेतु वासुदेव चाफेकर तथा उनके मित्र रानडे ने द्रवीड बंधुओं की हत्‍या की ।

३. 'काळ'= शिवराम महादेव परांजपे द्वारा संचालित साप्‍ताहिक पत्रिका जिसमें उनके अपने तेजस्‍वी लेख छपते थे ।

४. रानी विजया = रानी विक्‍टोरिया

५. 'चिरायु हो इसलिए महोत्‍सव'= रानी विक्‍टोरिया का हीरक महोत्‍सव ।

६. 'गणेशखिंड'= पुणे शहर का एक इलाका, जहाँ उस समय गवर्नर हाउस था, आज वहाँ पुणे विश्‍वविद्यालय स्थित है ।

७. नातू = पुणे के एक प्रतिष्ठित सज्‍जन ।

८. तिलकजी = लोकमान्‍य बाल गंगाधर तिलक,जिन्‍होंने अपने 'केसरी' में रैंड के खून की जिम्‍मेदारी ब्रिटिश सरकार के अत्‍याचारों पर रहने की बात निर्भयतापूर्वक कही थी ।

देश रसातल को जा पहुँचा

देश रसातल को जा पहुँचा,

स्‍वतंत्रता का महल जला ।

परकीयों ने धावा बोला,

उठो, तुम्‍हें लूटते चला !!

बाड़ तोड़कर घुसा आ गया,

टिड्डी दल सा हमला आया ।

मरे-मरे-से क्‍यों बैठे हो,

स्‍वतंत्रता को लूट ले गया ।

नासिक की गुफाएँ देखकर

पांडव गुंफा कभी देखते,

मित्रों के संग रमा हुआ था ।

सुरम्‍य सुंदर दृश्‍य देखकर,

मेरा मन बहु मुदित हुआ था ।

क्षण के बाद हर्ष सकुचाया,

शोक-अग्नि धधकी थी मन में ।

महान् विद्वान पितरों के भी,

हम जैसे क्‍यों कुपुत्र जनमे ?

शाम ढले बीहड़ में भटका मेमना

क्‍यों भटक रहा तू यहाँ ?

क्‍यों नेत्र सजल हैं तेरे ?

क्‍यों, किसने दी है पीड़ा ?

बोल रे !!

क्‍या मालिक बर्बर तेरा ?

क्‍या माँ ने क्रोध उतारा ?

या माँ से तू है बिखरा ?

बोल रे !!

मेमना निरागस छोटा ।

बें बें करत चिल्‍लाता ।

गोद में उठा ही लिया था ।

प्रेम से !!

क्‍यों छटपटा रहा है ?

मैंने जो उठा लिया है!

चल घर, वहाँ सब सुख है,

अजी, सुन रे !!

क्‍या क्रूर दिख रहा हूँ मैं ?

मन तेरा आतंकित है ?

भय छोड़, झूठा जो है,

सुन, सुन रे !!

यदि चाँद रम्‍य है यह,

रात्रि के समय तो ना वह ।

भेड़ि‍या भगाएगा, यह,

जान ले !!

वह दूर दिख रहा कौन ?

वह घात करेगा यवन !

काटेगा नाजुक गरदन !

जान ले !!

कम है ना घर में कुछ भी ।

मैं दूँगा दूध तुझे भी ।

इक रात नींद गहरी भी ।

मिल सके !!

माता तब यहाँ सवेरे ।

आएगी, साथ बहुतेरे ।

सौंपूँगा तुझे सहारे ।

उन सबके !!

प्‍यार से उसे सहलाया ।

मैं अपने घर ले आया ।

घरवालों को भी भाया ।

मेमना !!

सहलाते कोई उसको ।

चूमते भी कोई उसको ।

कुछ हँसते भी थे मुझको ।

व्‍यंग्‍य से !!

नाजुक-सा पिल्‍ला काला ।

नौ-दस दिन का भोला ।

घुँघराले बालों वाला ।

मृदु-मृदु !!

घबड़ाता क्‍यों है प्‍यारे ?

मैं तत्‍पर सेवा में, रे !

यह कच्‍ची मेथी खा रे !

प्‍यार से !!

देख ले, दिया यह सारा ।

दूध से भरपूर कटोरा ।

उसका न एक भी कतरा ।

क्‍यों न ले ?

तब माता क्षण भर बिछड़ी ।

इसलिए सूरत तब बिगड़ी ।

मेरी भी माता बिछड़ी ।

सदा के लिए !!

माँ कल ही मिलेगी तुझसे ।

पर मुझे न मिलनी फिर से ।

जीवनांत कभी भी अब से ।

हाय रे !!

मिथ्‍या है जग यह सारा ।

है नश्‍वर जीवन सारा ।

ममता का नाटक पूरा ।

विश्‍व‍ में !!

हे दुखदायी जग, प्‍यारे !

ये रिश्‍ते-नाते सारे !

इसलिए शांत-मन हो, रे !

तू अभी !

इतने पर कुछ ना खाया ।

तब कठोर रुख अपनाया ।

बलपूर्वक मुँह खुलवाया ।

नन्‍हा-सा !!

धीरे-से थोड़े दूध को ।

निगलकर, हटाया मुँह को ।

कुछ समझ रहा ना उसको ।

भ्रांति से !!

है स्‍वतंत्रता जब खोई ।

परवशता नसीब आई ।

त्रिभुवन में सुख तब कोई ।

मिल सके ?

सीने से चिपका सोया ।

समय भी शीघ्र बिताया ।

विश्‍व को मुदित बनाया ।

सूर्य ने !!

फिर उसी स्‍थान पर उसे ।

सहलाकर पुन: फिर फिर से ।

छोड़ा जो बहु प्रेम से ।

सुबह को !!

तब माता उसी दिशा को ।

ढूँढ़ती दूर तक शिशु को ।

हर पत्‍थर, हरेक तरु को ।

देखती !!

बें बें जब उसकी सुन ली ।

आनंद सिंधु लहराई ।

स्‍तन प्रति शर-सम लगाई ।

दौड़ भी !!

डोलते मुदित तरुवर जो ।

सप्रेम पक्षि गाते जो ।

गूँजती प्रतिध्‍वनि तब जो ।

हर्ष से !!

हे प्रभो, हर्षाया इसको ।

पर बहुत रुलाया मुझको ।

क्‍यों छुपा दिया माता को ।

यूँ मुझसे ?

नारोशंकर का देवालय

दिल्‍ली का पद हिला-हिलाकर,

जिसने अर्जित की संपदा ।

निर्मोह स्‍वयं रहकर उसने,

अर्पित कर दी शंभुपदा ।।

ऐसे थे पुरखे तुम्‍हारे,

यश जिनका न कभी टूटा ।

कहती ऐसी हमें कहानी,

नारोशंकर मंदिर-घंटा ।।

( नासिक घाट पर आज भी यह देवालय तथा वह घंटा मौजूद है ।)

(नासिक, १९००)

गोदा-तट पर रात्रि-दृश्‍य

गंगा की धारा में बिंबित दीपशिखा पर कदापि कज्‍जल न ।

सज्‍जन-हृदय हमेशा दोष त्‍याग, गुण करे सदा ग्रहण ।

(नासिक, १९००)

श्री तिलक स्‍तवन

लज्जित है तुमने किया,

निज यश से हिम-आलय को ।

जनसेवा में खपा दिया,

क्‍यों न स्‍फूर्ति तुम कवियों को ?

निशिदिन जनकार्यों के हेतु,

रक्षा करो प्रभु, तिलकजी की ।

शुक्‍लेंदु-सी देख सफलता को,

लज्‍जा उपजै कुटिल मन की ।

स्‍वार्थों के वश कभी किया ना,

महिमा-मंडित दुष्‍कृति को ।

उत्‍सुक होंगे कान सभी के ।

जिसकी कीरत सुनने को !!

जनसेवा करने के कारण,

बाल तिलक को कारा दी ।

दु:ख-पीड़ा के घूँट पी गया,

आर्य-भाल का तिलक यही !!

धीर रखो हे वीर केसरी,

व्‍यर्थ न शर बरसाओ ।

जो न पात्र हैं 'केसरिया' के,

उन पर शर ना बरसाओ !!

राष्‍ट्रहितैषी जनसेवक को,

मिले स्‍नेह दृढ़ तिलकजी का ।

राष्‍ट्र विघातक अरि को लागे,

रूप भयंकर केसरि का !!

साधु-सज्‍जनों औ ' देवों का,

खूब मिला है प्रेम तिलक को ।

यमदूतों को भय ही होगा,

छूने राष्‍ट्रहितैषी को !!

कीर्ति-नीति का अद्भुत धन यह,

हे प्रभु, है सौंपा तुझको ।

होकर रक्षक चौकन्‍ने तुम,

छूने दो मत चोरों को !!

मयूरेश से मिली प्रेरणा,

नम्र विनायक नायक को ।

नायक वह जगदीश्‍वर सुनता,

तिलक-प्रशंसा गायन को !!

(नासिक, १९००)

(टिप्‍पणी : 'मयूरेश' - मराठी के विख्‍यात पंडित-कवि मोरोपंत ।

केतकर-प्रशस्ति

(परिचय : लोकमान्‍य तिलकजी के नासिकवाले संबंधी तथा मान्‍यवर नेता स्‍व. गंगाधरपंतजी की स्‍मृत्‍यर्थ नगरगृह का निर्माण किया गया । इस ' केतकर नगरगृह ' की नींव डालने हेतु न्‍यायमूर्ति रानडेजी आए थे । उस समय सावरकरजी ने इन श्‍लोकों का लेखन किया । ये श्‍लोक उस समय 'लोकसत्‍ता' पत्र में प्रकाशित हुए थे ।)

विमल कीर्ति में हुआ मग्‍न जो मातृभूमि का पूत ।

उदारता-संपन्‍न अलौकिक देश कार्य संप्राप्‍त ।

देशभक्‍त जो यशान्वित सदा सज्‍जन-गण-स्‍तवित ।

ऐसे केतकर स्‍वभूति हितकर मुझसे भी वंदित ।।१।।

किसी व्‍यक्ति को कुशब्‍द कहकर कष्‍ट दिए ना कभी ।

देशहितार्थ प्रयत्‍न करते त्‍याग दिए स्‍वार्थ भी ।

कीरत जिसकी सदैव प्रसृत ग्रामांत देशांत भी ।

गंगाधरजी को ले जाने आतुर था काल भी ।।२।।

देशहितार्थ प्रयास करनेवाले हैं भी कितने ?

तिस पर छाई परवशता से कुंठित सारे सपने !

ऐसे में प्रभु, ले जाते हो ऐसे देशहितैषी !

आर्यों की दीनावस्‍था में बढ़ोतरी क्‍यों ऐसी ? ।।३।।

सत्‍कृति करनेवालों की हो चिरस्थायिनी स्‍मृति ।

इसी हेतु से स्‍मारक बनते लोगों की सम्‍मति ।

नासिक के श्री केतकर महान ऐसे हमें प्राप्‍त थे ।

उनके स्‍मारक-सुयोग्‍य जन में आनंद को बाँटते ।।४।।

नगरगृह-निर्माण-प्रकल्‍पन, नींव डालने उसकी ।

आए ' जस्टिस ' रानडे निमंत्रित, है बात बहु हर्ष की ।

महान लोगों की सराहना महान व्‍यक्ति करें ।

ऐसे सुयोग से हम सब कृतार्थ अनुभव करें ।।५।।

(नासिक, १९००)

यह शौक नहीं अच्‍छा !

(परिचय : यह लावणी किसी तमासगीर फड़ के लिए रचाई थी ।)

स्‍त्री : हे मेरे प्रेम-सरोवर, गणिका का यह शौक

प्रियकर, अच्‍छा नहीं यह शौक !

पति : मजबूर हूँ मैं,

मोहवश करत मुझे सुंदरी ।

स्‍त्री : दिलवर, है पर,

रम्‍यमुखा यह खाई !

साथ रहे यदि मोहित होकर

काल-सिंह तब शोभित होकर,

गला घोंटकर,

हरण करेगा प्राण सही !

पति : प्‍यार-भरे हैं, नखरे उसके

बाहें डालत कंठ में ।

स्‍त्री : अजी, नहीं जी, भालू है यह

नख मारत बदन में

तत्‍पर खातिर करने में, यदि जेब भरी पैसों से

मुड़कर भी ना देखेगी यदि समाप्‍त होंगे पैसे ।

पति : मेरे बिन,वह नहीं करेगी और किसी से प्‍यार ।

स्‍त्री : नहीं जी, लक्ष्‍मी से अस्थिर !

पति : पाँव दबाती कोमल हाथों,

कैसे चकमाएगी ?

स्‍त्री : दो रोटी भी जब न मिलेगी

सड़ जाएँगे अंग,

हँसी उड़ाएगी जब दुनिया

उतरेगा तब रंग !

पदमर्दन तब छोड़ प्रियकर,

भरे बाजार घुमाएगी !

(नासिक, १९००)

टिप्‍पणियाँ : १. लावणी = श्रृंगारिक गीत ।

२. तमासगीर फड़ = महाराष्‍ट्र की श्रृंगार प्रचुर नृत्‍य-गान-लोककला, जिसे 'तमाशा' कहते हैं, उसे मंचान्वित करने वाला कलाकारों का व्‍यावसायिक गुट ।

लेडी ऑफ दि लेक : सर्ग ५ अनुवाद

सावरकरजी अब अंग्रेजी छठी कक्षा में पढ़ते थे तब उन्‍होंने यह अनुवाद मराठी में किया था । चूँकि यह सावरकरजी की अपनी प्रातिभ निर्मिति नहीं थी, यहाँ हमने इसका अनुवाद नहीं किया है, क्‍योंकि अंत में वह टेनिसन की कविता का ही हिंदी अनुवाद होता, न कि सावरकरजी का ।

श्रीशिवगीत (आर्या)

धर्म नष्‍ट करते, देते पीड़ा द्विज-गायों को जो ।

उनसे रक्षा करने श्रीशंकर शिवरूप लेत, तुम समझो ! ।।१।।

सच्‍छीला, सद्वृत्‍ता, जानकि-सम सब लोग प्रणत जिसको ।

ऐसी जीजाबाई देत जनम शिवरूप शिवाजी को ।।२।।

धन्‍य यवन-तम-हर्ता धन्‍य तथा तत्पिता शहाजी भी ।

रिपु-करिवर-मद से जो निडर रहे औ' परास्‍त यवन सभी ।।३।।

श्रीमद्भारत रामायण रम्‍य कथा-सुधा सदा पी ली ।

श्रीरामकृष्‍ण-सी फिर अधमों को कड़ी सजा कर ली ।।४।।

धन्‍या जिजा कहत है, 'सुन ले शिवबा यही सुजत नीति ।

देत सुनार कनक को, सुमाता स्‍वपुत्र को, दीप्ति ।।५।।

अतितर दुर्लभ है यह मानुष्‍य तथा हि उच्‍च कुल जनन !

सो पा लो सत्‍कीर्ति, क्‍या पाकर लाभ दुकुल और धन ? ।।६।।

भवसागर-लांघन की, हे सुत, केवल स्‍वधर्म है नौका ।

सो धर्म-छलक अधमों को दे दंड, हरण कर भार वसुधा का ।।७।।

जो जन्‍म देत, पालत है, उसका तुम सदैव इष्‍ट करो ।

शिवबा, प्रण कर लो तुम, मातृभूमि को विमुक्‍त-क्‍लेश करो ।।८।।

संप्रति हो रहा है यवनमय अहा ! पूर्ण भरतखंड ।

कर दे मुक्‍त इसे तू, कर दे नष्‍ट पाप उद्दंड ।।९।।

कर मुक्‍त मातृभू को, निर्दय बन, धर्मांत कर परास्‍त ।

यदि फोड़ा बढ़ता है तो देना काट ही महा उचित ।।१०।।

औ' क्‍या कहूँ ? करो तुम रक्षा नित साधु-सज्‍जनों की ।

यवनतृण खाने की है भूख प्रदीप्‍त शौर्य-शोलों की ' ।।११।।

शिवराज हृदय घट में बोधामृत भर दिया जिजाई ने ।

जैसे आम्र-वन में परिमल भर दिया चमेली ने ।।१२।।

लेकर पिता तनय को जात विजापुर यवनराज के पास ।

नमन किए बिन बैठे रुठे शिवबा त्रस्‍त औ' उदास ।।१३।।

'राजसभा-रीति नहीं मालूम इसे' वदत शहाजी तब ।

लेकर सुत को लौटे, कुलबुलता जो ' होंगे स्‍वतंत्र कब ?' ।।१४।।

राय शहाजी कहते, 'कर यवनाधारना' शिवाजी से ।

'पाकर खुश हूँ दौलत मैं तो केवल उनकी मर्जी से' ।।१५।।

छोड़ो यवनद्वेष, पा लो उनका प्रेम हितकर जी !

यह जान उन्‍हीं को अर्पण करके यश प्राप्‍त करो तुम, जी ! ।।१६।।

विश्‍वासघात उसका जो देता है अन्‍न भेजता नर्क ।

स्‍वामिद्रोही में और विषधर में नहीं है कोई फर्क ! ।।१७।।

आपे से हो बाहर शिवबा, कोमल गाल बहत जलधारा ।

सहसा कहे,'पिताजी,अस्‍त हुआ क्‍या तेज आपका सारा ?' ।।१८।।

गो-द्विज त्रस्‍त इन्‍हीं से, जरिए इनके मातृभूमि विगताभ ।

स्‍वामी इनको कहने कैसे यह सिद्ध हो गई जीभ ? ।।१९।।

हर-हर! प्रतिदिन काटत नित्‍य सवत्‍सा धेनु दुष्‍ट सर्वस्‍वी ।

क्‍या आर्य सूर्य से भी यवन रूप खद्योत बनत तेजस्‍वी ? ।।२०।।

सब कुछ लूट लिया है, जिसने माँ-बहनें भ्रष्‍टाई हैं ।

हे तात ! आप ही कह दो, क्‍या अधम यहीं हमें वंद्य भी है ? ।।२१।।

मर जाऊँगा, लेकिन कभी शरण में जाऊँ ना मैं इनकी ।

चाहूँ ना मैं धन, गज, चाहूँ मैं मृत्‍यु सिर्फ इसकी ! ।।२२।।

(नासिक, १९००)

गोदा वकिली

(परिचय : नासिक में प्‍लेग फैलने के कारण सावरकरजी अपने मामाजी के यहाँ कोठूर ग्राम गए थे । मराठी के पंडित कवि मोरोपंत की 'गंगा वकिली' के तौर पर उनकी इच्‍छा 'गोदावकिली' लिखने की हुई । गोदा के घाट बैठ उस ग्राम के लोगों के बारे में उन्‍होंने यह कविता लिखी है । सावरकरजी को मोरोपंत की आर्याएँ बचपन से अच्‍छी लगती थीं । यमक सिद्ध करने में मोरोपंत की जो कुशलता थी, उसका अनुकरण सावरकरजी बड़े चाव से करते थे । यह कविता 'सावरकर समग्र' खंड एक में पृष्‍ठ २७८-२८२ तक दी हुई है ।)

पवन लीला

(परिचय : यह कविता नासिक में गोदावरी के महिला-घाट पर पवन लीला देख रचाई है ।)

देख रहा था परम मित्र की मैं जोहत बाट ।

रम्‍य विराजित ऐन सामने युवति-युक्‍त घाट ।।

तभी सुरभि दक्षिणी बहत है मंद-मंद वात ।

मेरी नजरों सहित घुसत है युवति समूहांत ।।१।।

देख, चेहरा जिसका लज्जित होत पूर्ण चंद्र ।

और मोती भी मुख पर अंकित धर्मबिंदु सांद्र ।।

ऐसी सुमुखी वहाँ धो रही थी अपने अंबर ।

चाँदनी जैसी हल्‍की सी मृदु हँसी चेहरे पर ।।२।।

धर्मबिंदुओं की बहु सुंदर जाली नाजुक सी ।

भालस्थित, बहु शोभा बिखरत थी मोती जैसी ।।

हिला-डुलाकर रखा वायु ने जब इस जाली को ।

मोति-जड़ि‍त बिंदी की शोभा प्राप्‍त सुंदरी को ।।३।।

सुंदरता की खान पर सतर्क नागिन-सी जैसी ।'

चोटी, गूँथा लाल फूल फणि पर स्थित मणि जैसी ।।

आशंका वायु के मन में, डरकर भाग गया ।

जाना जब ना जान है इसमें, वापस मुड़ आया ।।४।।

आभा तन की दमक रही थी गीले कपड़े में ।

कोई सती जब पहन रही थी धोती जल्‍दी में ।।

शरारत भरा स्‍पर्श वायु ने उसको तनिक किया ।

वस्‍त्र उड़ाकर ले जाने का उसने सोच लिया ।।५।।

हरकत उसकी धृष्‍ट देखकर सती क्रुद्ध हो गई ।

कोप-हुताशन की मानो तब ज्‍वाला भड़क गई ।।

तीखी नजरों से देखा जब उसने वायु को ।

लगा, जला देगी अब साध्‍वी पूरी दुनिया को ।।६।।

थर्राया बहु वायु भयाकुल और शर्म से झुका ।

महासती के कोमल चरणों पर सिर उसका टिका ।।

भाग गया फिर शीघ्र वहाँ से पवन कहीं दूर ।

इतने में आ पहुँच ही गया मित्र वहीं आखिर ।।७।।

(नासिक, १९०१)

'केरल कोकिल' वालों का स्‍वागत

(परिचय : नासिक में उस समय जो मित्रमेला संस्‍था स्‍थापित हुई थी उसमें भेंटवार्त्‍ता करने' केरल कोकिल ' के संपादक आनेवाले थे । उस समय सावरकरजी ने ये श्‍लोक रचे थे ।)

श्री शिवजी के सिर पर शोभत गोदावरी सर्वदा ।

पापक्षालनकाम मुनिवरों से वेष्टिता सर्वदा ।।

हो के श्रेष्‍ठपदस्थिता निकलती धोनेसभी लोक को ।

श्रेष्‍ठा मूर्ति उसी तरह तव पहुँची इसी ग्राम को ।।१।।

कीर्तिदेवी थी बहु आदर से सेवा में तत्‍पर ।

गीताजननी आ पहुँची सप्रेम तुम्‍हारे घर ।।

सास की पीड़ा की शंका से भाग निकल वह गई ।

मेरे कानों की राहों से, सुन लो बात सही ।।२।।

श्री राजा शिव शत्रुनाशक, भले वीर भरारी दादा ।

तुमने स्‍तोत्र रचाए उनके, हमारी यह संपदा ।।

जिह्वा जपत उनको रात-दिन, कर्ण लुब्‍ध हो गए ।

अब तो नैन भी मूर्ति तुम्‍हारी निरख दंग हो गए ।।३।।

बूँद-बूँद से झील बने, यह सृष्टि का कायदा ।

हिंदू जो भी हैं, सब मिलकर पक्‍की करें एकता ।।

निंदा कर जनघातक सुख की देशभक्ति को वरो ।

शुक्‍ल-इंदु-सम वर्धमान यश हो, इतनी कृपा तो करो ! ।।४।।

'आओ, राष्‍ट्रहितार्थ यत्‍न कर लो, कर्तव्‍य पूरा करो ।

करने शासन दुष्‍ट पर‍कीयों का सुनिश्‍चय करो ।।

छोडो व्‍यर्थ विवाद, संघ करके उद्धार लो यह धरा ।'

ऐसा उच्‍च सु-हेतु साध्‍य करने यह सिद्ध है सुंदरा ! ।।५।।

आज आकर समय अपना बहुमूल्‍य तुमने दिया ।

उपकृत होकर अब तुम्‍हें यह अर्ज हमने किया ।।

'युवकों को प्राशन करा लो बोध, कर लो क्षमा- ।

दोषों के प्रति, धन्‍य कर लो इस प्रसंग की महिमा ! ।।६।।

(नासिक, १९०१)

टिप्‍पणियाँ : १. 'श्री शिवजी के सिर पर शोभत गोदावरी'= चूँकि गोदावरी नदी 'त्र्यंबकेश्‍वर' से निकलती है, उसे भी गंगा के समान 'शिवजी के सिर पर शोभित' माना है ।

२. अतिथि महोदय कवि के रूप में विख्‍यात थे । परंतु जबसे उन्‍होंने 'भगवद्गीता' का मराठी में अनुवाद किया, उनकी बाकी कविता को लोग लगभग भूल ही गए । इस बात पर कल्‍पना की गई है कि गीता जननी के आने पर सास की पीड़ा से आशंकित कीर्ति देवी भाग गई । किंतु यह कीर्तिदेवी सावरकरजी के कानों की राहों से भागी, क्‍योंकि उनके कानों में पहले वाली कविता अभी भी गूँज रही है ।

३. श्री राजा शिव = शिवाजी ।

४. वीर भरारी दादा = वीर पेशवा रघुनाथ राव, जिन्‍होंने अटक तक मराठी साम्राज्‍य को स्‍थापित किया । इस पराक्रम के लिए वे 'राघोभरारी' कहलाते थे, और उनका घरेलू नाम 'दादा साहब' था ।

५. '....यह सिद्ध है सुंदरा'= यह सुंदर संस्‍था अर्थात् मित्रमेला ।

वृषोक्ति

(परिचय : जव्‍हार जा‍ते समय जो विचार मन में आए, उन्‍हें इस कविता में ग्रंथित किया है । यह कविता 'काळ' में छपी थी ।)

गाड़ी में जो जोड़ दिया है बैल,

वहत है गरदन पर वह जुआ ।

ऊँची घाटी में चढ़ने पर,

थका बहुत, साँस भी फूल गया ।।

धीरे-धीरे बहु चलता था,

ढोता गाड़ी थकान थी भारी ।

देख उसे इक हिंदू बोलत,

धिक्-शब्‍दांकित वाणी कटु भारी ।।१।।

'धिक्‍कार तुम्‍हें हे वृष,

गुलाम जैसे गरदन झुकाकर चले ।

भारी इतना जुआ लिये,

चढ़ाव तगड़ा विश्राम बिन जो चले ।।

मुँह में झाग भरी,

जान निकली, औ ' फिर धनी पीटता ।

साक्षात् पाप ही जनम है यह भला,

रे बैल तू काटता' ।।२।।

चुप्‍पी लेत सुनत सब भाषण,

वृष भी तब शांति से साँवरे ।

औ' फिर मंद मुसकराहट करे,

धिक्‍कार सूचित करे ।।३।।

'निंदा भरे इन शब्‍दों से तुम,

करते हो निंदा मेरे धनी की ।

कैसे पेश आता है लेकिन,

धनी तुम्‍हारा तुम्‍हें न फिक्र इसकी ?

लेता है मुझसे बहु कष्‍ट,

पर मुझे खाने को भी देता है ।

लेकिन मूढ़ ! धनी तुम्‍हारा,

कितना वेतन तुम्‍हें देता है ? ।।४।।

जिसको राज्‍य आर्यवसुधा का,

विशाल सौंपा हे तुमने ।

दोनों हाथों दुहने जिसको,

सुवर्णभूमि दे रखी है तुमने ।।

जिसकी अपनी थी लोहे की,

भूमि, उसे कर दिया स्‍वर्णमय ।

स्‍वामी वह क्‍या वेतन देत है,

तुम्‍हें, कह दो, कर लो न्‍याय ।।५।।

अथवा तुम कह दोगे, धनी,

करत है धन्‍यवाद तुम्‍हारा ।

'राजा', 'रावबहादुर' जैसी उपाधियों से ।

करत वह सम्‍मान तुम्‍हारा ।।

उपाधियाँ ये कुबूल कर लीं,

औ' स्‍वतंत्रता की दौलत दे दी ?

हाय ! लिया जी गधा, पागलों,

जिसके बदले सुरभि दे दी ।।६।।

'जे.पी. बैल','महावृषभ' अथवा,

'सी.एस.आय. नंदी' जैसी ।

उपाधियाँ ना मिलत मुझको,

इसमें धनी की न कंजूसी ।।

देत रहत है नित्‍य हरा तृण,

खाने-पीने शीतल जल भी ।

नमक पर वह कर भी न लेत है,

क्‍या धन्‍य न मैं हूँ आज भी ? ।।७।।

बहुत दया दिखाकर कहते -

हो, मैं भारी जुआ ढोत हूँ ।

अंधे ! तुम क्‍या देख न सकते,

अपनी गरदन पर, मैं पूछत हूँ ।।

जो भी हैं कुल वसुधा पर चीजें,

उन सब में बहुत ही भारी ।

जुआ रखा है देख तव गरदन,

पर, बात कहता हूँ मैं न्‍यारी ! ।।८।।

अन्‍याय जिसके भीतर रहत हैं,

अनगिनत नभस्‍थ नक्षत्रों से ।

आग से भी है जो दाहक,

बेहतर यमलोक जिस से ।।

जो विनाशों का कराल मुँह है,

जो हे पीहर दुर्दशा का ।

ऐसा जुआ तुम ढोते हो,

है नाम 'परतंत्रता' जिसका ।।९।।

माँ आर्यवसुधा को परकीय भोगत हैं,

सामने तुम्‍हारी आँखों के ।

दरिद्रता-परतंत्रता को रख रहे हैं,

गरदन पर तुम्‍हारी थोप के ।।

सोच लो, मनुष्‍य जन्‍म को पाकर,

क्‍या किया है, साध्‍य तुमने ?

व्‍यर्थ ही अभिमान के भार को,

ढोया तुम्‍हारे चित्‍त ने ।।१०।।

तुम हो निहत्‍थे, पर पास मेरे,

हैं सींग ये मेरे नुकीले ।

फाड़ सकता हूँ तुम्‍हें मैं, पर,

छोड़ देता हूँ समझ लें ।।

छोड़ अभिमान, देश का बोझ हल्‍का,

करने की कुछ बात कर लो ।

भगवान् के चरणों पर झुको,

आशीष उसका प्राप्‍त कर लो ।।११।।

(जव्‍हार, १९०१)

श्री शिवाजी महाराज की आरती

(परिचय : फर्ग्‍युसन कॉलेज में 'आर्यसंघ' नामक चौथे भोजनसंघ में हर सप्‍ताह गाने के लिए यह आरती रची ।)

ॐ जय शिवराय, स्‍वामी, जय जय शिवराय ।

आओ, रक्षा कर लो, शरणगत आर्य ।।ध्रु.।।

आर्यों के वतनों पर होवे म्‍लेच्‍छातिक्रमण ।

आए हमला करके, तुम रहो सावधान ।।

गद्गद होकर वसुधा दे आवाज तुम्‍हें ।

करूणार्ता आवाज न कैसी गूँजत है मन में ? १।।

श्री जगदंबा ने जिस खातिर युद्ध किया ।

जिसके लिए राम ने दशमुख मार दिया ।।

वह पूता भूमाता अब म्‍लेच्‍छों के द्वारा ।

संत्रस्‍ता है तुम बिन उसका कौन सहारा ? २।।

त्रस्‍त-दीन हम आए शरण तुम्‍हारे, जी ।

परवशता के मारे मरणोन्‍मुख हैं, जी ।।

साधू की रक्षा औ' करने नष्‍ट दुर्जनों को ।

भगवन् याद करो अब गीता-वचनों को ।।३।।

सुनकर पुकार आर्यों की हो गद्गद शिवराय ।

करुणा उपजी मन में स्‍वर्ग से निकले शिवराय ।।

देशकार्य के लिए स्‍वीकारी तनु शिवनेरी में ।

देशकार्य करते-करते ही मृत्‍यु रायगढ़ में ।।

स्‍वतंत्रता का दाता जो था याद उसे कर लो ।

बोलो तत्-श्रीमत्-शिवनृप की बोलो, जय बोलो ।।४।।

(पुणे, १९०२)

टिप्‍पणी : शिवनेरी = पहाड़ी किला, जहाँ शिवाजी का जन्‍म हुआ था । रायगढ़ = शिवाजी की राजधानी वाला पहाड़ी किला ।

हुआ विश्‍व‍ में शाश्‍वत-अविचल आज तक कभी कोई ?

(परिचय : निम्‍न कविता 'आर्यन वुइक्‍ली' के लिए पहले लिखी गई । बाद में 'काळ' पत्रिका में भी प्रकाशित हुई)

पूरब सारे महाद्वीप जिस ताकत ने जीते थे ।

दरिद्रता औ' भय भी कंपित जिससे नित होते थे ।।

वही पारसिक हुआ नष्‍ट इक क्षण में, देखो भाई !

हुआ विश्‍व में शाश्‍वत-अविचल आज तक कभी कोई ? १।।

जीता जिसने पारसिक, किया आहत पूरे जग को ।

दिशा-दिशाओं में फहराया था जिसने विजयी ध्‍वज को ।।

ऐसे महान् सिकंदर की रोम ने शान खस्‍ताई ।

हुआ विश्‍व में शाश्‍वत-अविचल आज तक कभी कोई ? २।।

जिसका था साम्राज्‍य अनगिनत दुनिया में फैलाया ।

ऐसे महान् रोमन-कुल को भी हूणों ने कुचलाया ।।

बेबस औ' आतंकित करके कर दी बहुत बुराई ।

हुआ विश्‍व में शाश्‍वत-अविचल आज तक कभी कोई ? ३।।

समुद्र में भी उन्‍नति-अवनति नित्‍य क्रिया चलती है ।

भास्‍कर रवि भी उदित तथा असंगत नित होता है ।।

उच्‍च स्थिति औ' अव‍नति दोनों की है समान बँटाई ।

हुआ विश्‍व में शाश्‍वत-अविचल आज तक कभी कोई ।।४।।

जो मत बहुत ताकत से अपनी होते हैं अभिमानी ।

उनके मन में भी आती है उदासता-बेजानी ।।

इसे जान लो, चिंतन कर लो, अपने मन में भाई !

हुआ विश्‍व में शाश्‍वत-अविचल आज तक कभी कोई ? ५।।

(पुणे, १९०२)

टिप्‍पणियाँ : १. पारसिक = ईरान का प्रथम साम्राज्‍य, जिसे सिकंदर ने जीता ।

२. सिकंदर की शान = सिकंदर की राजधानी में रोमन सेना घुस गई ।

३. रोम-कुल को हूणों ने कुचल दिया ।

बाल विधवा : दु:स्थिति-कथन

(परिचय : मुंबई के हिंदू यूनियन क्‍लब की हेमंत व्‍याख्‍यानमाला समिति द्वारा निम्‍न विषय पर उत्तम कविता के लिए बीस रुपए का पुरस्‍कार रखा था । उसके अनुसार जो अनेक कविताएँ समिति के पास आई उनमें श्री श्रीपाद नारायण मजूमदार, बी.ए. और श्री विनायक दामोदर सावरकर दोनों की कविताएँ समिति की राय से लगभग समान योग्‍यता की पाई गई । अत: मूल राशि में और दस रुपए जोड़ करके उन्‍हें पंद्रह-पंद्रह रुपयों का पुरस्‍कार दिया गया ।

परीक्षकों द्वारा नियत विषय : 'प्रस्‍तुत काल में जो ग्रांथिक सन्निपात हो रहा है, उसने उन हिंदू स्त्रियों की, जिन पर अल्‍प आयु में वैधव्‍य का आघात हो गया है, स्थिति दर्पण करके, उनका दु:ख कम करने हेतु उपाय प्रयुक्‍त करने का प्रयास करना चाहिए । इस प्रकार नई तथा पुरानी धारणाओं के लोगों को कवि द्वारा प्रोत्‍साहनपरक विनती की जाए । '

सावरकरजी की काव्‍य-रचना की प्रगति तथा सामाजिक धारणाओं की उदारता इस कविता से प्रतीत होती हैं ।)

परवशता पाने को रचाया गया अकाल-पत्‍थरों से ।

अवनति-कृतांत-केलि-प्रसाद किया जडित प्‍लेग-मणि से ।।१।।

नंदन वन सम मोहक, दुनिया में श्रेष्‍ठभूत यह देश ।

देख उसे हो जाऊँ धन्‍य, यही था प्‍लेग का भी उद्देश्‍य ।।२।।

आर्य-देश वह पहुँचा, मुंबई में पैर जमाए उसने ।

हो गया सुखों का अंत, विपदाएँ खड़ी करा दीं उसने ।।३।।

जो भी कभी सुना था उससे भी सौ गुना रहे धन्‍या ।

देख हृदय लुभाया, बोला,'ऐसी जगह नहीं अन्‍या' ।।४।।

विविध-स्‍थल-स्थिा श्री देख-देखकर नित्‍य नई मैंने ।

तय कर लिया यही कि बस जाऊँ यहीं बहुत महीने ।।५।।

करके निश्‍चय ऐसा सहलाकर मुंबई हतप्रभ की ।

अपना चित्‍त रमाने चल पड़ा पुणे, रहा बड़ा सनकी ! ।।६।।

गोदा-स्‍नान करे वह जाके त्र्यंबकपुरी सहज रूप ।

आया पंचवटी में, वहाँ से करे दर्शन प्रभु-रूप ।।७।।

औ' क्‍या कहें ? कर दिया पूरे महाराष्‍ट्र का परिभ्रमण ।

पवन-जवन से भी शीघ्र-गति था, तनिक भी थका न ।।८।।

प्‍लेग कहाँ का, भाई, यह तो भेग हीन कर्मों का ।

कर्मायत्त फलों को भुगतने बिन अवतरण हो किसी का ? ९।।

कर दे भयाण पत्‍तन, पत्‍तन सम घना सर्व वन बनता ।

हताश होकर पूरी हतसत्त्व हो गई सभी जनता ।।१०।।

लाल गुलाल से औ 'उँडेली सब कावडियों से भी ।

रक्तिम सड़कों पर से रक्‍तप्रिय नाचते समय सभी ।।११।।

'बोलो भाई राम' ध्‍वनि गूँजत है समग्र पत्‍तन में ।

वातावरणस्‍थों का प्‍लेग-जनक बुखार तेजी में ।।१२।।

गृहनिर्गत सर्वत्र धुआँ भरा है अशुभ क्रियाओं का ।

उसके साथ चले औ' शोकजनक विलाप विधुरों का ।।१३।।

'हे कांते ! हे कांते ! दे दो प्रतिसाद बुलाता मैं ।

कैसा बे-पहिया यंह भारी रथ गृहस्थि का चलाऊँ मैं ? ।।१४।।

मैं शून्‍यहृदय, मेरी हृदयस्‍था कामि‍नी गुजर गई !

क्षण रुक जाओ, सुंदरि ! आता हूँ मैं, करो मत रुलाई' ।।१५।।

और यहाँ से कोमल किसका आ रहा रुदन स्‍वर ?

हाँ, समझा, धीरे से रोता बच्‍चा यहाँ करुण स्‍वर ।।१६।।

'तात, माँ गई कल ही छोड़ मुझे, तो आप भी मुझको ।

आज ही त्‍याग करके क्‍यों निकले शीघ्र स्‍वर्ग जाने को ? १७।।

अथवा निकले उसका साथ निभाने वहाँ स्‍वर्ग में भी ?

लेकिन तात नहीं मैं अपने बल जीने समर्थ अभी !' ।।१८।।

हा ! हाय ! हृदय जलाते मंजुल-रव-संघ रुदन स्‍वर ।

आते रहे कहाँ से ? अथवा पुरदेवताकदंब-स्‍वर ।।१९।।

'मत्‍सौभाग्‍यश्री-पति, मत्प्रिय, मज्‍जीवमीनकासारा'!

कैसे खोई सहसा प्रीति की धवल-मधुर-धारा ? २०।।

क्‍यों बात नहीं करते ? क्‍यों रुठे हैं आज अभागन से ?

सहमी-सहमी हूँ मैं; प्रियकर, अब प्‍यार कीजिए मुझसे ! ।।२१।।

सहवास भोग लिया ना जी भरके पूर्ण साल भी एक ।

साजन ! क्‍यों अकेले सिद्ध हो गए जाने यमलोक ? २२।।

जो हम ने बिताए प्रणय भरे कौमुदी-युक्‍त मधुर ।

क्‍या याद हैं तुम्‍हें वे दिन, जो लगते केवल निमिष भर ? २३।।

जब मैं थी अकेली तब आए थे आप डराने को ।

आहट सुनकर मैंने विफल किया आपके इरादे को ।।२४।।

उस से खा कर खार, क्‍या मौन हुए अब मुझे डराने को ?

बहुत डरी हूँ मैं अब, हँसूँगी कभी नहीं अग प्रियतम को ।।२५।।

मन में क्रोध किए बिन व्‍यर्थ अबोले कतिमय होते थे ।

अनजाने में ही फिर बातें करना शुरू भी करते थे ।।२६।।

मामूली वजहों से भी गुस्‍सा करके रूठ गए कितने ।

नजरों से जब नजरें मिल जाती तब हँसे भी थे कितने ।।२७।।

क्‍या याद है सभी कुछ ? क्‍या सुख होता है इन यादों से ?

क्‍यों फिर बात न करते ? मेरा मन तो आहत है भय से ।।२८।।

तो क्‍या पति गुजर गए ? क्‍या मंगलसूत्र टूट गया ?

हे राम ! फिर तो मेरा हृदय भी कैसे न टूट गया ? २९।।

जो मम संकट को अब दूर करेगा ऐसा कोई है ?

अब मैं किसके पास जाऊँ जब नसीब टूटा है ।।३०।।

स्‍त्री का नाथ मरे जब, बन जाए वह गाय से गरीब ।

ऐसी अबलाओं को ले जाना यम के लिए मुनासिब ।।३१।।

न बंधु, न आप्‍त, न कोई, हो जाएँगे निरर्थ सब जिसको ।

ऐसी मैं दु:खी हूँ, क्‍या मेरी दया न है प्रभु को ? ३२।।

मैं अल्‍पवयस्‍क बाला, मेरा सौभाग्‍यनिधि जल गया है ।

वैधव्‍य रूप भयंकर गिरि मुझ पर प्रचंड आ गिरा है ।।३३।।

क्‍या कर सकती हूँ मैं ? सुन लो मेरे आप्‍त-बंधुजन प्‍यारे ।

मदद करो जी मेरी, देख रहे जो पीड़ा मेरी, सारे ।।३४।।

क्‍या कोई देगा भी प्रतिसाद कभी अबला-आवाहन को ?

बोलो जी, बोलो जी, धैर्य जुटानेवाले शब्‍दों को ।।३५।।

धत् ! कोई क्‍यों देगा अबला की दुर्दशा-प्रति ध्‍यान ?

अपने सुख में सारे व्‍यस्‍त रहे हैं, करत बंद कान ।।३६।।

बंधुजनो, क्‍या सुनते हो ये मेरे दर्द भरे शब्‍द ?

क्‍या सच लग रहा है अथवा लगते झूठ तुम्‍हें ये दर्द ।।३७।।

पल भर सदय बनो औ' सारे मिलकर गौर कर लो, जी ।

अंधी जिद को छोड़ो, भूलो न न्‍याय को अभी तुम, जी ।।३८।।

आया प्‍लेग तभी से करने इनका इलाज प्रयास किए ।

कोई यश ना पाया, इनके प्राण अंत में उखड़ गए ।।३९।।

'इंस्‍पेक्‍शन', 'डिस्‍इंफेक्‍शन' की बातें बहुत बहस चली ।

पर प्‍लेग को हटाने में सब कोशिश निरर्थ ही निकली ।।४०।।

लेकिन असफलता का दोष नहीं हैं कोई आप पर, जी ।

'यत्‍ने कृते न सिद्धयति को दोषो' कह गए महात्‍मा, जी ।।४१।।

पर जिन कोमल बालाओं पर वैधव्‍य-पहाड़ टूट गया ।

विरहाग्नि ने अचानक जिनका पूरा बदन जला ही दिया ।।४२।।

वैधव्‍य-जनक उनके दु:सह दु:ख का शमन करने ।

यत्‍न किया क्‍या कोई, अथवा सोचा उपाय भी तुमने ? ४३।।

उनकी दुस्थिति हटाने 'इंस्‍पेक्‍शन' कौन सा कराओगे ?

उनके बदनसीब को अब किस-किस मंत्र से हटाओगे ? ४४।।

बेचारी बालाएँ अबला पहले, अनाथ ऊपर से ।

हाय ! लोग सब उनको देखेंगे अब घृणार्ह नजरों से ।।४५।।

पति की अकाल मृत्‍यु कर देती सब जगत शून्‍य उनको।

यदि मायका दरिद्री, तब तो जीवन असह्य हो उनको ।।४६।।

'पैरा बुरा इसी का, पति को खाया इसी अभागन ने' ।

देवर-ननद हमेशा तत्‍पर कटु-शब्‍द-शर चुभाने ।।४७।।

जी, प्‍यार से बुलाने लायक इस क्षण कोई न है मेरा ।

जिसके कंधे पर मैं सिर रख रो लूँ दु:ख मेरा ।।४८।।

युवतियाँ अन्‍य हम-उम्र पति के संग करत प्‍यार बहुत ।

देख उसे विरहाग्नि अधिकाधिक दु:सहा इसे बनत ।।४९।।

वदन छुपाए संतत, शरमाती हे आने लोगों में ।

मुश्किल से ही बिताए बचे-खुचे दिन अपने जीवन में ।।५०।।

नेत्र सजल संतत, अश्रु भिगावत कोमल मृदु गाल ।

तन की आभा जावत, यक्ष्‍मासूचक शरीर बे-हाल ।।५१।।

पति-बिना अन्‍य किसी को सपने भी कभी न चाहा है ।

जिसने पति-उपरांत सबकुछ सुख त्‍याग डाला है ।।५२।।

शय्या धरती केवल, खाना केवल एक बार दिन में ।

जित-काम-मोह है जो, जिसको गावें सती कीर्तनों में ।।५३।।

उसका मुख-दर्शन भी अशुभ, उसे विश्‍वयोषिता कहते ।

सुंदर सुर-गो को ये अज्ञानी दुष्‍ट गर्दभी कहते ।।५४।।

स्‍त्री के निधनोत्‍तर यदि विधुर कभी अशुभ न माने जाते ।

तो विधवा-दर्शन ही कैसे जी अशुभ व्‍यर्थ कहलाते ? ५५।।

व्‍यर्थ अनादर-वचनों को बोलत हैं, पीड़त विधवाओं को ।

जो दुष्‍टों की जिह्वा, प्रभु क्‍यों अब सजा न दे उसको ? ५६।।

चाहे जितने खा ले विधुर सभी पकवान रसयुक्‍त ।

नित्‍यैकभुक्‍त रहकर विधवाएँ बन जाएँ नि:शक्‍त ।।५७।।

आभूषण-वस्‍त्रों से विधुरजनों का शरीर बोझिल है ।

हल्‍के वस्‍त्रों से औ' विधवा-तनु सदैव लिप्‍त रहे ।।५८।।

मांगल्‍यप्रद ठहरा विधुरों का वदन तथा भ्रमण।

गुरु कहता शिष्‍यों से, 'विधवा का अशुभ नख-दर्शन ! ।।५९।।

साठ साल के बूढ़ों, विधरों, नववधू वरण कर लो ।

हफ्ते बाद बनी जो विधवा उसको विवाह मना कर लो ।।६०।।

यह न्‍याय कहाँ का जी ? विधवा-विधुर बीच भेद क्‍यों ऐसा ?

क्‍या अपराध किया है अबलाओं ने ? दंड यह कैसा ? ६१।।

क्‍या श्रुति कहती है कि विधवाओं को अशुभ सदा मानो ?

क्‍या उसकी पीड़ा को निगमलेख देत मान्‍यता, जानो ? ६२।।

अथवा स्‍मृति की आज्ञा ? अथवा है धर्मशास्‍त्र की सिद्धि ?

सन्‍मति-विचारपूर्वक अथवा यह उचित मान ले बुद्धि ? ६३।।

पत्‍नी-मृत्‍यु विधुर का सामाजिक अधिकार नष्‍ट ना करत ।

स्‍त्री का समाज-सम्‍मत रिश्‍ता क्‍यों पति-मृत्‍यु नष्‍ट करत ? ६४।।

अस्‍मत्‍समाज वर्तत अन्‍याय सहित, यदि न दुष्‍टता सहित ।

विधवाओं के साथ, इतना कि परकीय होत स्तिमित ।।६५।।

लज्‍जास्‍पद है, पर हम तो सिद्ध इसे सदैव मानत हैं ।

धर्म, न्‍याय, तर्क औ' विवेकमति भी यही सुनावत हैं ।।६६।।

आज तक किया इकट्ठा पातक यह नित्‍य दुष्‍ट, अन्‍यायी ।

उसका क्षालन करके पुण्‍य करें अब स्‍वर्गफलदायी ।।६७।।

तिस पर औ' दुर्भाग्‍य भेज देत है प्‍लेग-रोग-जहर ।

प्रतिदिन असंख्‍य बालाएँ बनती हैं विधवा, हो कहर ।।६८।।

सुहागरात के दिन कतिपय बालाओं के पति मरते ।

कतिपय उससे पहले अमंगला यह वार्त्ता सुन पाते ।।६९।।

अपवाद नहीं है यह, नित्‍य घटित है आजकल सर्वत्र ।

इससे और भयानक प्‍लेग कर सके कोई न औ' घात ।।७०।।

जिनकी गृहिणी मरे, वे कालांतर में गृहस्‍थ बन जाते ।

कन्‍यापुत्र जनत हैं, जीवन में चैन-सुख पाते ।।७१।।

वृद्ध गँवाता सुत को, ले सकता है गोद किसी को भी ।

मर जाए यदि तात, उसके बिन सुत पात सर्व सुख भी ।।७२।।

सबके दु:ख पर है जब उपाय कोई शास्‍त्रों में, रूढ़ि में ।

पर विधवा की अनुकंपा न उपजत किसी शास्‍त्र-रूढ़ि‍ में ।।७३।।

शास्‍त्र करत उपेक्षा, पीडि़त हैं शतगुना रूढ़ि‍ से जो ।

अबला-विधवाओं के उद्धार हेतु अब तो कुछ कीजो ।।७४।।

अब भी करें उपेक्षा दु:स्थिति से यदि उन्‍हें उठाने की ।

तो इस पातक-पर्वत को होगी अक्षम धरा उठाने की ।।७५।।

वैदिकों, उपाध्‍यायों, समाजसेवक सुधारकाग्रणि, जी ।

दया दिखाकर कोई अबलाओं का उद्धार अब करो, जी ।।७६।।

देखे बिन वदन पति का विधवा जो आकस्मिक बन जाए ।

क्‍यों पुनर्विवाह करने की अनुमति नवसमाज दे पाए ? ७७।।

धर्म-गर्व कोई सुविवेक का अभाव तो नहीं है !

काल स्थिति वश धर्म हे, यह सिद्धांत आज सम्‍मत है ।।७८।।

सुज्ञान-सुविचारों से स्थित्‍यनुरूप धर्म को सुधरें ।

आपद्गति के केवल रूढ़ मार्ग के लिए जिद न करें ।।७९।।

संस्‍थापक धर्मों के, ज्ञाता श्रुतिशास्‍त्रतत्त्‍व कर्म के भी ।

आचार्य भी हमेशा घोषित करते यही मर्म सभी ।।८०।।

उसी पीठ के स्‍वामी पूज्‍य हमें तत्‍समान आजकल भी ।

दु:ख निवारण अबलाओं का करने उन्‍हें मनाएँ सभी ।।८१।।

साठ साल का बूढ़ा नववधु यौवन रूप वरण करे ।

पर हम ना माँगत हैं जरठा विधवा पुनर्विवाह करे ।।८२।।

पर जिनको पतिसुख की कोई ना कल्‍पना तनिक आई ।

उनके पुनर्विवाह का प्रस्‍ताव नहीं विकल्‍प तो कोई ।।८३।।

अब भी यदि ना करते इस मसले का स्‍पष्‍ट समर्थन तुम ।

यह प्‍लेग स्‍त्री-जाति नष्‍ट करेगा समस्‍त, देखो तुम ।।८४।।

अब पूछोगे हँसकर, स्‍त्री-पुरुषों को समान खतरा है ।

स्‍त्री-जाति नष्‍ट होगी, ऐसी क्‍यों बात बना दी है ? ८५।।

तब सुन लो, पहले ही पुरुषों जितनी स्त्रियाँ भी मरती हैं ।

जो पुरुष मर‍ते हैं, उनकी तो पत्नियाँ भी मृतवत् हैं ।।८६।।

ऐसी नौबत दुगुनी आई है स्‍त्री-जाति के ऊपर ।

उनका तारण कर लो, भगवन् है अब भरोसा तुम पर ।।८७।।

आप हमारे धर्माचार्य, आपके बिना कभी कोई ।

होगा न सर्वसम्‍मत, बात हमारी सुनेगा न कोई ।।८८।।

जो दीन बाल विधवाएँ है, उनका विवाह मान्‍य करो ।

कर लो दया, प्रतिष्‍ठा न्‍याय-सत्‍य की स्‍थापित आज करो ।।८९।।

अपमानजनक वर्तन विधवाओं के प्रति करे समाज ।

आज्ञादंड उठाके उसका प्रतिरोध तुम करो आज ।।९०।।

विद्या-दान कराने विधवाओं को, स्‍कूल तुम निकालो।

अज्ञान सुविधा से होगा नष्‍ट पूर्ण यही समझ लो ।।९१।।

'विद्या-दान स्‍त्रीप्रति अर्थ न कोई, अनर्थ निकलेगा' ।

ऐसा कहनेवालो, अमृत पी के कौन मृत्‍यु पाएगा ।।९२।।

इस पर न काहो तुम कि अमृत न देते दैत्‍यों को कोई ।

तो क्‍या माँ-बहनों को दैत्‍य कहेगा कभी यहाँ कोई ।।९३।।

विधवा विदुषी बनने, स्‍थापन कर लो अनाथ बालाश्रम जी !

जोड़ो पुण्‍य, न होगा क्‍या भगवान् तुष्‍ट इससे जी ।।९४।।

नीतिव्‍यवहारादिक महान् लोगों की सीख ही पढ़ा लो ।

फसल ज्ञान की उगेगी सच्छिक्षा वृष्टि से यही समझ लो ।।९५।।

होगा शिक्षित महिलाओं का एक नया समाज यहाँ ।

गृहशिक्षा देकर जो सुदृढ़ करेगा भावी पीढि़ को हाँ ! ।।९६।।

तारण करने माता-बहू-स्‍वसा-भौजाई-पुत्री का ।

होगा सिद्ध न कौन, सुष्‍ट सहृदय स्‍वभाव है जिसका ।।९७।।

सिंदूर बिना ये माँगें युवतिजनों की संतत अनगिनत ।

देख शर्म से नैन ढक ही लेंगे साधु और संत ।।९८।।

वृद्ध युवा, नए-पुराने, नर्म-तेज, सब सुनो लोग प्‍यारे ।

विधवा दु:स्थिति हरने खातिर कर लो प्रयास बहुतेरे ।।९९।।

सत्‍वर तोड़ो, फोड़ो, दुष्‍ट रूढ़ि‍ के अनिष्‍ट बंधन को ।

तोड़ो दु:स्थिति बेड़ी अबलाओं की, प्राप्‍त करो यश को ।।१००।।

धर्म उजागर करने, अज्ञान रूढ़ि‍ का दूर तथा करने ।

ईश्‍वर प्रसन्‍न होकर आ गए मुदित भक्‍त-मन करने ।।१०१।।

ईश्‍वर का आवाहन करके रख दे कलम 'विनायक' भी ।

जगदीश्‍वर सुनता है, पूर्ण करत है भक्‍त कामना भी ।।१०२।।

(पुणे, १९०२)

हे सदय गजानन, तार !

(परिचय : गणेशोत्‍सव में बच्‍चे जो गीत-नृत्‍य का कार्यक्रम प्रस्‍तुत किया करते थे, उसके लिए सावरकरजी अनेक गीत बना देते थे । उनमें से नमूने के तौर पर यह गीत लिया है ।)

हे सदय गजानन, तार ! अब तेरा ही आधार!

तू ही माँ-बाप साकार । अब तेरा ही आधार ।।

देश के शत्रु है बहुत ।

हृदय के शत्रु छह होत ।

शाप से, शस्‍त्र से कर अंत ।

ब्राह्मण जो खाए अब अरि के लातों की भी मार ।।१।।

देश पर आक्रमण आया ।

जूझकर पुरुष मर गया ।

अग्निप्रवेश स्‍त्री ने किया ।

राजपुतों को परवशता का भूत सताए, तार ।।२।।

अटक में ध्‍वज फहराया ।

रिपुसेना को हटवाया ।

दिल्‍ली-पति भी बन गया ।

जो शूर मराठा, उसके देखो बुरे हो गए हाल ।।३।।

(नासिक, १९०२)

शिववीर

(परिचय : महिलाओं की विनती के अनुसार उनके लिए यह गीत रचा है ।)

यवनों का हो गया धरती को भार,

बहु भग्‍न किए मंदिर ।

वेदशास्‍त्रों को भ्रष्‍ट किया दुष्‍टों ने,

गोवध भी कर दिए कितने !

उद्दंडों ने लातें दीं ब्राह्मण को ।

प्रभु धारण करत शिवरूप को ।

देशोद्धारार्थ किया नष्‍ट सभी अधमों को,

प्रभु धारण करत शिवरूप को ।।१।।

हिंदुओं के देश के देखकर ये कष्‍ट,

जगन्‍माता होत बहु रुष्‍ट ।

प्रति यवनों के, क्रोध भरी नजरों से,

शिववीर जनम ले उससे ।

सुरवर-किन्‍नर हो गए मुदित बहु सारे,

प्रभु शिवरूप बनत शिवरेरे ।।२।।

रघुपति की कौसल्‍या, हरि की यशोदा,

शिवबा की जिजाई जन्‍मदा ।

' रघुपति ने ज्‍यों राक्षस-वध कर डाला,

यवनों का वध करूँ', बोला ।

शशिसम वृद्धिंगत होना था जिसको,

प्रभु धारण करत शिवरूप को ।।३।।

'जय जय राम प्रभु',तभी गर्जना गूँजी,

रामदास मूर्ति देखो, जी ।

चरणों पर सिर टेकत ज्‍यों शिवाजी,

आशीर्वच देत स्‍वामी जी ।

उद्दंड यवन अफजुल्‍ला दुष्‍कीर्ति,

तोड़ दी भवानी-मूर्ति ।

बहु क्रुद्ध हुआ होंठ काट-काटत,

शिवबा पर हमला करत ।

वधार्थ उद्दंड के, विदारण करत उदर को,

प्रभु धारण करत शिवरूप को ।।४।।

स्‍वतंत्रता-देवी का जागरण मनाया, जी !

अतिथि हैं श्री शिवाजी ।

साँवले वर्ण के वे मावले शूर अभिभूत,

प्रेम से पुजारी बनत ।

परवशता का बकरा बलि चढ़ाया,

प्रभु शिवरूप बनकर आया ।।५।।

धर्म का तारण औ' निर्दलन रिपुओं का,

सम्‍मान बढ़ाया देश का ।

अवतार-कार्य को यश पाकर पूर्ण किया,

शिवप्रभु स्‍वस्‍थल लौट गया ।

विनायक सहित अनेक कवि गाते गीतों को,

प्रभु धारण करत शिवरूप को ।।६।।

(त्र्यंबकेश्‍वर, १९०३)

टिप्‍पणियाँ : १. मराठी जनमानस में यह धारणा प्रतिष्ठित है कि प्रभु श्री शंकरजी ने शिवाजी का अवतार धारण किया । इस कविता में इसी का जिक्र है । शिवाजी, शिव, शिवबा-सारे शिवाजी के ही नाम है ।

२. 'शिवनेरी'= किले में शिवाजी का जन्‍म हुआ था ।

३. 'जिजाई'= शिवाजी की माता का नाम, जिसने राम की कहानी सुनाकर अन्‍यायी दुष्‍टों का वध करने की प्रेरणा शिवाजी के मन में जाग्रत् कर दी ।

४. 'रामदास'= महाराष्‍ट्र के प्रवृतिवादी कवि तथा साधु, जो शिवाजी के गुरु कहलाए जाते हैं ।

५. 'अफजुल्‍ला'= विजापुर के आदिल शाह का सरदार अफजल खाँ, जिसने शिवाजी को जिंदा पकड़ लाने का बीड़ा उठाया था । शिवाजी पर हमला करते समय उसने अनेक मंदिरों को ध्‍वस्‍त किया और देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ डालीं, जिसमें तुळजापुर की भवानी की मूर्ति भी शामिल थी । संधि के बहाने दोनों का जब मिलन हुआ तब महाकाय अफजल खाँ ने शिवाजी को अपनी बाहों में कसकर उसका दम घुटाने की कोशिश की, तब शिवाजी ने उसका उदर विदारण करके उसे मार डाला ।

६. 'मावले'= साधारण खेतीहर लोग, जिनके मन में स्‍वतंत्रता की प्रेरणा उदित करके शिवाजी ने उन्‍हें जुझारू वीर बनाया था ।

७. 'विनायक'= विनायक दामोदर सावरकर ।

स्‍वतंत्रता का स्‍तोत्र

जयोऽस्‍तु ते, श्रीमहन्‍मंगले, शिवास्‍पदे शुभदे ।

स्‍वतंत्रते, भगवति ! त्‍वामहं यशोयुतां वंदे !

राष्‍ट्र चेतना मूर्त रूप तू नीतिसंपदा की ।

स्‍वतंत्रते, भगवति ! श्री-मती, रानी तू उनकी ।।

परवशता के नभ में तू ही एकमात्र तारा ।

स्‍वतंत्रते भगवती ! दीप्तिमय आसमंत सारा ।।

कपोलस्थित फूलों पर अथवा फूलों के गालों पर ।

स्‍वतंत्रते भगवती ! रक्तिमा तेरे ही बल पर ।

तू सूरज का तेज अदधि की गंभीरता तू ही ।।

स्‍वतंत्रते भगवती ! अन्‍यथा ग्रहण नष्‍ट विरही ।।

मोक्ष, मुक्ति ये रूप तुम्‍हारे, तुम्‍हें ही वेदांते ।

स्‍वतंत्रते भगवती ! योगिजन परब्रह्म कहते ।।

जो हैं उत्‍तम, उदात्‍त, उन्‍नत, महन्‍मधुर सारे ।

स्‍वतंत्रते, भगवती, सर्व वे सहचारी तेरे ।।

हे अधम-रक्‍त-रंजिते ! सुजन-पूजिते ! स्‍वतंत्रते !

त्‍वदर्थ मरना है जीना ।।

तुम बिन जीना है मरना ।

तुम सकल-चराचर-शरणा ।।

भरतभूमि को दृढ़ आलिंगन कब दोगी, वरदे !

स्‍वतंत्रते भगवति ! त्‍वामहं यशोयुतां वंदे !!

हिमगिरि के उस हिम-आँगन से शिव भी लोभ करे ।

क्रीड़ा करने से ऐसे स्‍थल तेरा मन मुकरे ?

जो दर्पण था देवस्त्रियों का रूप निरखने का ।

त्‍याग कर दिया सुधाधवल उस गंगा की धारा का ?

स्‍वतंत्रते ! इस स्‍वर्णभूमि में क्‍या कमी थी तुझको ?

कोहिनूर के पुष्‍प से सजा ले अपनी चोटी को ।।

यह सकल-श्री-संयुता ! हमारो माता ! भारती माता !

क्‍यों तुमने त्‍याग कर दी ?

ममता समाप्‍त कर दी ?

औरों की दासी बना दी ?

व्‍याकुल प्राण, क्‍यों त्‍याग कर दिया, इसका उत्‍त्‍र दे दे ।

स्‍वतंत्रते भगवति ! त्‍वामहं यशोयुतां वंदे !!

(पुणे, १९०३)

टिप्‍पणी : अन्‍यथा ग्रहण नष्‍ट विरही = सूरज का तेज ग्रहण लगने पर नष्‍ट हो जाता है, और उदधि की गंभीरता भी अगस्ति द्वारा उसे 'ग्रहण' करने पर निरर्थ हो गई ।

प्रे. क्रूगरजी की मृत्‍यु

(परिचय : क्रूगरजी अफ्रीका के ' फ्री स्‍टेट' तथा 'ट्रांसवाल' ह्मोअर लोगों के (डच लोगों के) गणतंत्र राज्‍य के अध्‍यक्ष थे । दोनों राज्‍यों को निगलने हेतु अंग्रेजों ने उनपर आक्रमण किया । अंत तक अत्‍यंत निर्धार के साथ लड़ने पर भी जब ऐसा प्रतीत हुआ कि बलशाली अंग्रेजों के सामने टिके रहना कठिन है, तब अंग्रेजों सामने आत्‍मसमर्पण नहीं करना है, ऐसा निश्‍चय करके प्रे. क्रूगर ने बाह्य देशों से सहायता प्राप्‍त करने के प्रयास किए । इतने में, उनके देश के हताश लोगों ने अंग्रेजों को आत्‍मसमर्पण का पत्र लिख भेजा और बाहर के जिन राष्‍ट्रों ने सहायता का प्रलोभन पहले-पहले दिखाया था, उन्‍होंने भी मना कर दिया । तब प्रे. क्रूगर अंग्रेजों के हाथ न लग पाने के इरादे से स्‍वदेश छोड़ वीरान में चले गए और अंग्रेजों के द्वारा आक्रांत स्‍वदेश के लिए दु:ख करते-करते शीघ्र ही गुजर गए । जब सावरकरजी ने प्रे. क्रूगर की मृत्‍यु की वार्त्‍ता सुन ली, तब उन्‍होंने निम्‍न कविता की रचना की । रचनाकाल : २८ जुलाई, १९०४ ।)

कोई साधु अधम छल से बंदी कारागृह में ।

स्‍वतंत्रता को खोए कोई खल-बल से जीवन में ।।

ये तो नित्‍य घटित होती हैं घटनाएँ ! उसका क्‍या !

खेद करें ? आँसू बहाएँ समुद्र-जल जितने क्‍या ? १।।

अथवा कोई नृपति जनता-धर्म-गोप्‍ता चल बसा ।

मिथ्‍या शंका साफ नहीं थी, मरण उसको कैसा ।।

स्‍वतंत्रता की खातिर लढ़ते वीर कभी मरते हैं ।

मर जाते तो उभय-लोक में धन्‍य वही होते हैं ।।२।।

हाँ, देवी, हाँ, इतनी रोती क्‍यों हा करुण स्‍वर में ?

बता ही दो कि अशुभ क्‍या हुआ इतना इस दुनिया में ।।

हा धिक् मृत्‍यु ! अब पता चला, ले गई तुम निर्दया ।

स्‍वतंत्रता के विमल-तिलक श्री क्रूगर को बेहया ।।३।।

अच्‍छे रत्‍नों की हवस है जो तुम्‍हारी सदा की ।

सारे तुम ही लूट ले चली हो, यह नीति कहाँ की ?

इस दुनिया में प्रकटत हैं जो, इमें गर्व है जिनपर ।

लगातार तुम लुटा रही हो उन्‍हें ही यमनगरी पर ।।४।।

प्रबल बहुत हो, लूट हमें, पहुँचाती हो क्‍यों कष्‍ट ?

निर्बल को कुलचाना है क्‍या गुण प्रबल का श्रेष्‍ठ ?

यदि स्‍वर्ग की भी ऐसी है नीति दुष्‍ट, तो पुरखो !

निर्बल मनुजो ! इह-पर-लोक न कहीं सहारा तुमको ।।५।।

गए वीर नृपति स्‍मृतिपंथ औ' पंडित भी चले गए ।

मानवता की यही है स्थिति, कितने संकट आए ।

उसका कोई खेद नहीं है मन में कदापि मेरे ।

उनके उपकारों को लेकर दु:ख करूँ बहुतेरे ।।६।।

अपने सुत के समान जिसका संगोपन कर दिया ।

स्‍वतंत्रता के अनुपम सुख के लायक बना दिया ।।

जिसके खातिर तन-मन-धन को सदा समर्पित किया ।

जिसको सारे संकट-समयों में रक्षित कर दिया ।।७।।

जिसकी रक्षा रकते रण में गरम रक्‍त बहाया ।

जिसके खातिर कुछ भी करके जग विस्मित कर दिया ।।

ऐसा राष्‍ट्र तुम्‍हारा, क्रूगर ! परवश अब बन गया ।

अंत समय में स्‍मरण-कोष में क्‍या-क्‍या याद किया ? ८।।

राष्‍ट्र को परवश तुम्‍हारे करनेवाले दुष्‍ट जो ।

कह रहे हैं दुर्वचों को, दु:ख उसका न मानिजो ।।

चोरी करके, तिस पर अपनी ही गावत महिमा ।

ऐसे अंग्रेजों से केवल भरी नहीं धरती-माँ ।।९।।

चौराहे के कुल में जनमा, फिर भी जिसका पौरुष ।

शास्‍ता बनकर उजागर हुआ राष्‍ट्राध्‍यक्ष महाधीश ।।

उसकी शक्ति गौण नहीं है, व्‍यर्थ करत निंदा ।

उसके शत्रु दिखावत केवल अपनी ही नीचता ।।१०।।

निज शक्ति की सहायता से स्‍वतंत्रता को पाया ।

देशोन्‍नति को सुसाध्‍य कर, सब संकटों को भगाया ।।

आया जब हमला भी रिपु का आकस्मिक औ' क्रूर ।

देश के लिए मृत्‍यु भुगतने सिद्ध हो गया वीर ।।११।।

षड्यंत्रों में बुद्धि-विभव से अतुल विजय पाई थी ।

बड़े-बड़े रणयोद्धाओं को जमकर हार चखाई थी ।।

हड्डी कर दी नरम शत्रु की जिसने नित्‍य समर में ।

इसके कारण उसकी गणना महामानवों में ।।१२।।

स्‍वतंत्रता की रक्षा के बहु-पुण्‍यप्रद कार्य में ।

आशा कोई न थी, तथापि डटा रहा रण में ।।

नहीं रहा जब बिलकुल कोई उपाय अपने देश में ।

विदेश गया देश के लिए वह सहायता-खोज में ।।१३।।

पहले बातें बहुत जिन्‍होंने की थीं, मदद बखशाई ।

काम आ सके समय पर उनमें से ऐसा दिखा न कोई ।।

नहीं समर्थता, अरि भारी है, द्रव्‍य नहीं, न सहायता ।

फिर भी आत्‍मसमर्पण करने को दिल कतई न मानता ।।१४।।

'मैं सत्‍कार्य हेतु लडूँ तब ईश्‍वर करे सहायता ।

नीच के प्रति आत्‍मसमर्पण करने को दिल कतई न मानता ।।

मेरे लहू का निकल रहा हो जब अंतिम कतरा ।

तभी समर में नित्‍य रहेगा आगे कदम मेरा' ।।१५।।

निष्‍ठा ऐसी लेकर किए प्रयास बहुत विदेशों में ।

सूत्र वहाँ से चला दिए थे, बहुत जिद थी मन में ।।

हाय ! किंतु उस राष्‍ट्र को लिया घेर परवशता ने ।

साधु-सज्‍जनों को कुचलाया ऐसे नित दुर्भाग्‍य ने ।।१६।।

कोई पक्षी उड़ रहा हो अं‍तरिक्ष में दूर वहाँ ।

औ' वार्त्‍ता आ पहुँचे उसका घोंसला हुआ नष्‍ट यहाँ ।।

नहीं स्‍थल उसे पीछे मुड़ने शक्ति नहीं आगे जाने ।

लगता है वह चीं-चीं करते वही गोल सा मँडराने ।।१७।।

छोड़ पत्‍नी-बच्‍चों को, जब वह महात्‍मा विदेश में ।

कर हा था कोशिशों को तब फँसा इस दुर्दशा में ।।

जिसके खातिर देहधारणा, आज तक रहा जीवन-हेतु ।

उसी राष्‍ट्र के विनाश से, लो, टूट ही गया प्राण-तंतु ।।१८।।

हाय ! नहीं वसुधा पर कोई देश अब उसके लिए ।

सभी जगत् हो गया विमुख अब अचानक सा उसके लिए ।।

अब चिंता हृदय में एक ही, यही विचार सताएँगे ।

जीवन के जो दिन बचे हैं, कम कैसे हो जाएँगे ।।१९।।

एकांत की अब रुचि बन गई, रह रहा एकांत में ।

बना रखी थी एक झुग्‍गी जो, निरा अकेला उसमें ।।

देश के लिए बार-बार वह आँसू बहा रहा था ।

नाला था एक समीप, उसमें रेला नित लाता था ।।२०।।

तभी एक दिन पड़ा कंठ में कालपाश अनजाने ।

समझ गया अब इस दुनिया में खत्‍म हुए दिन अपने ।।

'अब तुम्‍हारा कैसे होगा ? हे मेरे प्रिय राष्‍ट्र !'

काल से भी बढ़कर रिपु की पीड़ाएँ औ' कष्‍ट ।।२१।।

जनम पाकर मृत्‍यु भी अब पा ली है मैंने ।

स्‍वतंत्रता को प्राप्‍त लेकिन नहीं किया राष्‍ट्र ने ।।

हे मछेश ! उपकार मुझ पर बहुत किए तुमने ।

ऋण तुम्‍हारा नहीं चुकाया कुछ भी, पर, मैंने ।।२२।।

मृत्‍यु वाशिंगटन की, अथवा मृत्‍यु मैझिनी की !

शत्रु को हराकर जिन्‍होंने मुक्ति देश की की ।।

कर दिखाया कुछ जगत् में, जन्‍म उसका ही खरा ।

क्‍या हमारी मृत्‍यु, जिसका जन्‍म ना उतरा खरा ।।२३।।

अंत में मैं याद करके ईश को, यह कह रहा हूँ ।

देश-बिन यदि अन्‍य कोई विषय में ललचा रहा हूँ ।।

गद्दार अथवा स्‍वार्थ हेतु मैं कभी यदि हो चुका हूँ ।

तो पाप से उस नर्क में मैं सदा गिरता रहूँ ।।२४।।

जाना जरूरी है यहाँ जो जनमे उसे, मैं जा रहा हूँ ।

मातृ-भू की परतंत्रता को देख, दु:खी हो रहा हूँ ।।

है कोई, जो सबल उसको मुक्‍त करने के लिए ?

आओ ! आओ ! त्‍वरित ! फिर मैं सिद्ध मृत्‍यु के लिए ।।२५।।

आशा ऐसी लेकर, क्रूगर ! बहुत बहुत बार ।

आत्‍मा तव तो आई होगी लौट फिर शरीर ।।

गात्र हो गए विकल, हो गई पूर्ण विफल आस ।

त्‍यागी तनु तब प्रणति करके देशरक्षार्थ ईश ।।२६।।

गा लो, स्रोत सुरस तुम, हे यक्ष-गंधर्व, गा लो !

अप्‍सराओ, सिंगार करके स्‍वागतार्थ निकालो ! ।।

ले लो मालाएँ फूलों की, देवियो, सज्‍ज बन लो ।

लो, पधारा विमल-चरित क्रूगर श्रेष्‍ठ, सुन लो ।।२७।।

गधर्वों ने तनन करके तान लिए सुमधुर ।

थै थै ताल पकड़ नाचत है अप्‍सरा-गण सुंदर ।।

मुदित स्‍वर्ग-निवासी जन तब करत पुष्‍पवृष्टि ।

श्रीमद् धीर-प्रवर-नृवर क्रूगर की प्रविष्टि ।।२८।।

मानो जाए प्रतिनिधि यहाँ बोअरों की तरफ़ से ।

स्‍वतंत्रता के लिए माँगने मदद सुर-नृपति से ।।

राजकीय सम्‍मान उसका कर रहे हैं देवता ।

इस बहाने सूचित करते अपनी अनुकूलता ।।२९।।

दुर्बल देशों को जो पीड़ा देते हैं दुनिया भर में ।

उन सभी के नाम, क्रूगर, अब बता दो इस घड़ी में ।।

भरमानेवाले चोरों की पार्लमेंट के जैसे ।

देवताओं की सभा में न्‍याय के न तमाशे ।।३०।।

देश हेतु-प्राणार्पण-कारण स्‍वर्ग प्राप्‍त है जिनको ।

ऐसे वाशिंगटन, शिवाजी, दर्शन देंगे तुमको ।।

स्‍वतंत्रता की पुन: स्‍थापना इस दुनिया में करने ।

इस सबको तुम मना लो पुन: भूप्रदेश अवतरने ।।३१।।

अधम नृप, तुम सुन लो सारे, पाप किए जितने भी ।

दुर्बल देशों को तरसाने के, भुगत लो सभी अभी ।।

श्रीशाज्ञा से सुर-बल-युत श्री क्रूगर औ' अन्‍य वीर ।

स्‍वतंत्रता के रिपु से लड़ने आएँगे सत्‍वर ।।३२।।

हे वाग्‍देवी ! आई ऐसी यह मंगल-धारा ।

स्‍वतंत्रता की विजयश्री वा स्‍वर्ग-जनित धारा ।।

देंगे वार्त्ता परवश जनों को, उन्‍हें धैर्य देंगे।

स्‍वतंत्रता के गीतों को धरती पर गाएँगे ।।३३।।

मित्रवर वामनराव दातारजी को पत्र

(परिचय : सावरकरजी का आग्रह था कि उनके बालमित्र 'वामन दातार ' वैद्यक की पढ़ाई करें । उसके अनुसार सत्रह-अठारह की आचु में वामनराव जी मुंबई में एक विख्‍यात वैद्यजी के पास वैद्यक की पढ़ाई करने हेतु गए । इन वैद्यजी के घर में ही उनकी आज्ञा में कुछ काम करके वे वैद्यकीय विद्या सीखने लगे । किंतु परगृह में रहना उनके लिए शुरू-शुरू में बहुत कठिन रहा । अत: उनको प्रात्‍साहित करने के उद्देश्‍य से यह कविताबद्ध पत्र भेजा गया था ।)

दाते, आया पत्र तुम्‍हारा ।

प्रफुल्‍ल हो गया चित्‍त हमारा।।

यद्यपि स्‍याही-मलिन था हुआ ।

शुभ्र प्रेम तब प्रकट कर रहा ।।१।।

देख चंद्रमा तव प्रेम का ।

छलकत समुद्र मेरे मन का ।।

समा सके ना अंतरंग में ।

धारा बहने लगी नयन में ।।२।।

तुम हो प्‍यारे, वामन-मूर्ति ।

नभ को छू ले तुम्‍हारी कीर्ति ।।

यद्यपि छोटा शशि दिखने में ।

खिलत कौमुदी पूर्ण जगत् में ।।३।।

हिमांशु देखो, शांत-चित्‍त है ।

स्‍वयं शंभु सिर पे वाहत है ।।

वह भी तो नित कृश रहता है ।

कष्‍टरूप परनिवास लगत है ।।४।।

किंतु मित्र, सुखसागर के प्रति ।

दु:ख बिना नहीं मार्ग संप्रति ।।

सहन करे जो कष्‍ट मार्ग के ।

सुख सागर में विहार कर सके ।।

सिंहगढ़ का पोवाड़ा

(परिचय : स्‍वातंत्र्यवीर सावरकरजी ने सन् १९०५ में सिंहगढ़ का पोवाड़ा रचा । उन दिनों 'स्‍वराज्‍य' शब्‍द का प्रयोग 'होमरूल' के पर्याप्‍त अर्थ से भी करना अपराध माना जाता था । ब्रिटिशों की राजकीय सत्‍ता के अंतर्गत केवल घरेलू 'स्‍वराज्‍य' के ध्‍येय का भी उच्‍चारण अथवा प्रसार करने के लिए श्रीमती ऐनी बेसंट अथवा लो, तिलक जैसे ख्‍यातनाम नेताओं को भी राजद्रोह के आरोप के साथ कोर्ट में खींच लिया गया । ऐसे समय में, जिस गुप्‍त संस्‍था ने 'स्‍वतंत्रता' (absolute political independence) का ध्‍येय अपने सामने रखा था तथा उसकी प्राप्ति के लिए सशस्‍त्र क्रांति कराना अनिवार्य साधन होने से ऐसी क्रांति करने की प्रतिज्ञा जिसने की थी तथा आगे चलकर जो यूरोप-अमेरिका तक विस्‍तारित तथा बहुचर्चित हुई, उस 'अभिनव भारत' की स्‍थापना नासिक में की गई । यथासंभव नैर्बंधिक सीमा के अंतर्गत खुला प्रचार तथा प्रकट आंदोलन करनेवाली 'मित्र मेला' नामक उसकी प्रकट शाखा बनाई गई थी । इस संस्‍था की ओर से, लोकमान्‍य तिलकजी द्वारा संचालित शिवाजी-उत्‍सव, गणेशोत्‍सव आदि सार्वजनीन आंदोलन में अपना स्‍वतंत्रतावादी तथा सशस्‍त्र क्रांतिकारी उपदेश ऐतिहासिक तथा पौराणिक प्रसंगों की आड़ में लोगों में फैलाने के लिए 'मित्रमेला' नाम से ही एक गीत-नृत्‍य-मंच निकाला गया । मेले के लिए स्वातंत्र्यकवि गोविंद तथा स्‍वातंत्र्यवीर सावरकर दोनों संवाद, गीत और पोवाड़े रचते थे । इसी मेले के लिए सावरकरजी ने सिंहगढ़ व 'बाजी देशपांडे' दो पोवाड़े रचे ।)

इन पोवाडों को गाने के‍ लिए जिनको सर्वप्रथम चुना गया था वे पंद्रह-सोलह की आयु से कम आयु के बच्‍चे भी इन पोवाड़ों की तरह तेजस्‍वी थे । दत्‍तू, श्रीधर और बाल उनके नाम थे, जो उस समय के उन लोगों में प्रिय थे । 'अभिनव भारत' की बालशाखा में ये ही प्रमुख थे । हुतात्‍मा कर्वे तथा देशपांडे इसी बालशाखा में थे । चूँकि उन पोवाड़ों के प्रत्‍येक शब्‍द के मर्म को ये बच्‍चे समझते थे तथा उनके हृदयों में ही इन पोवाड़ों की स्‍वतंत्रता-चेतना की ज्‍योति धधकती थी, उनके मुँह से गाए जाते समय ये पोवाड़े विशेष प्रभावी बन जाते थे । इन बच्‍चों को स्‍वयं स्‍वातंत्र्यवीर सावरकरजी अभिनव सिखाते थे; और पोवाड़े को स्‍वरबद्ध करके बच्‍चों का साथ करनेवाले उस्‍ताद तबलावादक थे स्‍वयं कवि गोविंद ! ईसवी १९०५-०६ के शिवाजी तथा गणेश महोत्‍सव में ये पोवाड़े नासिक में जब प्रथम गाए गए, तब उनकी ख्‍याति उस इलाके में बातों-बातों में ही फैल गई । साहित्‍य के शस्‍त्रागार से सूचना, लक्षणा, ध्‍वनि, व्‍यंग आदि शब्‍दशस्‍त्रों की अचूक भरमार करनेवाले ये पोवाड़े सुननेवाले सहस्रावधि लोगों के मन में समकालीन परतंत्रता के प्रति तीव्र क्रोध तथा उसकी श्रृंखलाअें को तोड़ डालने की जिद प्रेरित करते थे । थोडे ही दिनों में इस मेले की कीर्ति पुणे तक पहुँच गई और सावरकरजी से मशविरा करके सुप्रसिद्ध 'काळ' कर्ता शिवरामपंत परांजपेजी ने इस मेले को पुणे में निमंत्रित किया । वहाँ के शिवजयंती उत्‍सव तथा गणेशोत्‍सव में ये पोवाड़े इतने जनप्रिय हो गए कि गायकवाड हवेली के गणपति के सामने लोकमान्‍य तिलकजी ने भी इस मेले का स्‍वागत किया । श्रोताओं की बहुत भीड़ इनके कार्यक्रम में आ जाती थी और उस भीड़ पर उनका ऐसा प्रभाव पड़ता था कि हर समय एक नया, दीप्तिमान संदेश मिले, एक नया तेज प्रज्‍वलित हो जाए। इन पोवाड़ों तथा गीतों को जिन तीन बच्‍चों ने प्रथम गया था वे थे दत्‍तू, श्रीधर तथा बाल अर्थात् आगे चलकर विख्‍यात बने प्रा. दत्‍तोपंत केतकर, श्रीधरपंत वर्तक (विधिज्ञ, नासिक) और डॉ. नारायण राव सावरकर । आगे चलकर अभिनव भारत गुप्‍त संस्‍था की शाखाओं तथा उपशाखाओं पर जब परकीय सरकार ने आग बरसाई तब इन तीनों युवकों को राजनीतिक आपत्तियों का तथा पीड़ाओं का सामना करना पड़ा ।

इन पोवाड़ों के तेजस्‍वी प्रभाव के बारे में, जब्‍तशुदा होने के पहलेवाला एक संस्‍मरण बताने लायक है । इसी समय लोकमान्‍य तिलकजी ने प्रत्‍यक्ष रायगढ़ पर शिवाजी उत्‍सव मनाना प्रारंभ किया । इस उत्‍सव के समय महाराष्‍ट्र के प्रमुख कार्यकर्ताओं की तरह‍ शतावधि मावलों की भी भीड़ रायगढ़ पर इकट्ठा होती थी । मुंबई के विख्‍यात वकील तथा तिलक पक्ष के नेता श्री दाजी आबाजी खरे इस उत्‍सव के अध्‍यक्ष की हैसियत में लो. तिलकजी तथा 'काळ' कर्ता परांजपेजी के साथ रायगढ़ पधारे थे । उनकी अध्‍यक्षता में इन पोवाड़ों का कार्यक्रम जब चल रहा था तब उनमें निहित उस समय अपूर्व तथा अत्‍यंत 'तेज' लगनेवाले विचार पहली बार सुनने से श्री खरे जैसे नाम-नापकर कदम बढ़ानेवाले नेता को लगने लगा कि यह अवांछित संकट अपनी अध्‍यक्षता के समय मोल लेना ठीक नहीं है, और वे बेचैन हो गए । इतने में 'बाजी देश पांडे' का पोवाड़ा शुरू हो गया । उसका पहला ही पद रंग जमाते-जमाते जब उस पद का अंतिम चरण 'हे वीर मावलो, बोलो, हर हर महादेव बोलो, गाए जाने लगा तब वहाँ उपस्थित अभिनव भारत के अनेक गुप्‍त क्रांतिकारियों के साथ ही वे शतावधि मावले भी उद्दीपित होकर 'हर हर महादेव' की गर्जनएँ गूँजने लगीं । तब श्री खरेजी लोकमान्‍यजी से कहने लगे कि वे इसके आगे अध्‍यक्ष स्‍थान में रहकर लोगों के इस मर्यादाहीन तथा अनैर्बधिक (गैर कानूनी) व्‍यवहार का दायित्‍व स्‍वीकृत करना नहीं चाहते, अत: कार्यक्रम को बंद किया जाए । तब लोकमान्‍यजी ने नहले पर दहला बनकर सभा को संबोधित किया कि अध्‍यक्षजी यात्रा के कष्‍टों से परेशान हैं, सो हम दोनोंजा रह हैं । इसके आगे परंजपेजी की अध्‍यक्षता में सभा जारी रहेगी । लोकमान्‍यजी उन्‍हें ले गए । परंतु 'काळ' कर्ता ने अध्‍यक्षता का दायित्‍व स्‍वीकृत करके कार्यक्रम को वैसे ही आगे चलाया ।

ईसवी १९०६ के आस-पास बाबाराव सावरकरजी ने इन पोवाड़ों को छपवाया । पूरे महाराष्‍ट्र में सहस्रावधि स्‍त्री-पुरुषों तथा आबाल-वृद्धों के मुँह ये प्रचलित हो गए । उनकी मात्रा शुद्ध तथा उत्‍तेजक स्‍वरयोजना भी इतनी जनप्रिय बन गई कि आगे चलकर अनेक साल 'सिंहगढ़ की स्‍वर योजना' अर्थात् 'पोवाड़ो की स्‍वरयोजना' यह समीकरण बना रहा । जब शीघ्र ही अभिनव भारत के सभी क्रांतिकारी प्रकाशनों की ब्रिटिशों की क्रोधाग्नि में होली बन गई तब से दो पोवाड़े भी ईसवी १९०९ के आस-पास जब्‍तशुदा हो गए ।

यह बंधन इतना तगड़ा था कि इन पोवाड़ों को कहीं भी मुँह से गाने पर गानेवालों को सजा हो जाती थी । उल्‍टे लोग भी इनकी पांडुलिपियाँ बनाकर घर-घर में किसी मूल्‍यवान् निधि की भाँति रखने लगे । हरेक इलाके में जब तलाशियों का सिलसिला लगातार चल रहा था, तब अभिनव भारत साहित्‍य का इस तरह का लिखा हुआ या छपा हुआ पन्‍ना भी इस बात का प्रबल सबूत माना जाता था कि संबंधित सज्‍जन क्रांतिकारी षड्यंत्र में समाविष्‍ट है । किंतु इस प्रकार की दु:सह पीड़ाओं को सहन करके भी जनता ने इस साहित्‍य को जीवित रखा। शतावधि माता-पिताओं ने अपने बच्‍चे-बच्चियों से इन पोवाड़ों को कंठस्‍थ कराया । धार्मिक समारोहों में, गृहमंगल‍ कार्यों में, स्‍कूलों-कॉलेजों के सम्‍मेलनों में इन पोवाड़ों को अंतस्‍थ तरीके से गाया जाता । पुन: गुप्‍त रूप में इन्‍हें छपवाया भी जाता था । एक के बाद एक पीढ़ि‍यों ने ऐसी एकनिष्‍ठ आस्‍था के तथा धैर्य के साथ इन ज़ब्‍तशुदा पोवाड़ों को जीवित रखा है । आज भी सहस्रावधि स्‍त्री-पुरुषों को ये कंठस्‍थ हैं ।

मुद्रण के अथवा लेखन के अभाव में लोगों की जिह्वा पर ही जो जीवित रहता है, वह सच्‍चा लोकगीत । लोगों की कांक्षाओं तथा भावनाओं का सहज उच्‍चारण ! तिस पर भी उस काव्‍य को इस प्रकार जिह्वा पर जीवित रखना जब परकीय राजसत्‍ता द्वारा दंडनीय अपराध माना जाता है, उसके लिए सजाएँ भुगतनी पड़ती हैं, तब भी जो काव्‍य अथवा साहित्‍य पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की जिह्वा पर जीवित रहता है, वह काव्‍य अथवा साहित्‍य न केवल लोगों की कांक्षाओं तथा भावनाओं का उच्‍चारण होता है अपितु उनके जीवन से जुड़ा होता है, इसीलिए वह जीवित रहात है । इस तरह जीवित रहने का सम्‍मान जिस साहित्‍य को प्राप्‍त है, उसमें इन पोवाड़ों की गणना की जाती है ।

इन पर लगाए गए बंधनों को हटाने के लिए, सरकारी आज्ञा का खुलेआम भंग करके अनेक बार प्रकट सभाओं में भी इन पोवाड़ों को गाया गया । ऐसी ही एक सभा में साहित्‍य सम्राट् श्री तात्‍याराव केलकरजी ने भी 'सिंहगढ़' के पोवड़े के चरणों को प्रकट रूप में प्रस्‍तुत किया ।

किंतु ब्रिटिश सरकार ही क्‍या, पर पहले कांग्रेस मंत्रिमंडल ने भी ऐसे तेजस्‍वी सावरकर साहित्‍य पर पाबंदी को उठाया नहीं । कारण क्‍या ? तो कहते हैं, इससे हिंसा की गंध आती है !

किंतु लोगों का निग्रह भी, जैसा कि ऊपर लिखा है, चरम सीमा तक पहुँचने के कारण तथा सन् १९४२ के आंदोलन से अहिंसा की अरगल लागों के द्वारा उड़ा दी जाने के कारण पूरे चालीस सालों के बाद इन पोवाड़ों पर तथा कुल सावरकर साहित्‍य पर पाबंदी को उठाना कांग्रेस मंत्रिमंडल के लिए अनिवार्य हो गया ।)

धन्‍य शिवाजी वह रणगाजी, धन्‍य तानाजी ।

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।ध्रु.।।

देश भर आतंक हो गया परवशता-विष से ।

हलाहल-प्राशन अच्‍छा है ऐसे परदास्‍य से ।।१।।

गोमाता-ग्रीवा औ' देखो शिखा ब्राह्मणों की ।

एक साथ काटत है भाई, छुरी गुलामी की ।।२।।

देश हिंदु का, हाय ! उसी का मालिक म्‍लेच्‍छ बना ।

परंतु ईश्‍वर ने कितने दिन चलने यह देना ।।३।।

फिर आर्यदेश तारण । अधम-मारण । जीतने रण ।

परदास्‍य-रात्रि हटाने को ।

प्रभु प्रकटत शिवनेरी को ।

स्‍वातंत्र्य सूर्य उगने को ।

उसी सूर्य की किरण समर में दमकत तानाजी ।

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।४।।

: २ :

जगह जगह पर वीर मावले भाला हाथ लिए ।

रामदासमत शिवराजा के अनुयायी बन गए ।।१।।

स्‍वतंत्रता का तोरण तोरणगढ़ भी जीत लिया ।

भगवा ध्‍वज उस भाले के संग ऊँचा फहराया ।।२।।

प्रसन्‍न करने प्रतापगढ़ की स्‍वतंत्रता देवी ।

अफजल खाँ का उदर-विदारण किया, बलि चढ़ाई ।।३।।

वे धन्‍य मराठा वीर । जूझते धीर । चपल माहिर ।

देशार्थ मृत्‍यु स्‍वीकृत है ।

शास्‍ता खाँ सजा भुगत है ।

गनिमों के दिल में डर है ।

रिपु हतबल, पर अभी सिंहगढ़ पर है कब्‍जा , जी !

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।४।।

: ३ :

जरा ढिलाई देख कहत है जिजा शिवजी से ।

जब तक यह गढ़ जीत न लोगे मुकरो भोजन से ।।१।।

वहाँ पराए भूमाता पर लात जमावत हैं ।

खाना खाना हमारे लिए मांस गाय का है ।।२।।

गुलामी की यह बेड़ी पैरों में क्‍यों रख दी है ?

गुलामी के नर्क में किसलिए अब तक रहते हैं ।।३।।

बेजान रोटि का कोर । शत्रु का उदर । अभी चीर कर ।

आँतों से भूख मिटाओ ।

खून से भूख मिटाओ ।

मांस से भूख मिटाओ ।

जीत लो अभी होंठ चबाकर फते करो तुम, जी !

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।४।।

: ४ :

धन्‍या माता जिजा जिसी का शिवबा सुत शोभत ।

स्‍वतंत्रता के लिए पुत्र को खाना भी ना देत ।।१।।

स्‍वतंत्रता की खान जनत है स्‍वतंत्र वीरों को ।

मिलत गुलामी के घूरे में जन्‍म गुलामों को ।।२।।

कुत्‍ता भी तो पेट. भरत है चबा चबा टुकड़े ।

गोबर में सुख पाते हैं औ' गोबर के कीड़े ।।३।।

जीवन यदि ऐसा जीना । मनुज क्‍यों बना ? व्‍यर्थ वंचना !

फिर कीड़ा क्‍यों न बनत है ।

जो गुलाम होकर खुश है ।

परदासता मनावत है ।

शिवबा कह दे, 'धिक् ! धिक् ! गढ़ को ले के रहेंगे, जी !'

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।४।।

: ५ :

भोर हो गई, वाद्य सुमंगल, मुहूर्त शादी का ।

विवाह-वेदी पर आ पहुँचा सुत तानजी का ।।१।।

ठीक समय को देख, पुरोहित मुहूर्त-वेला को ।

शांति करा के शुरू करत हैं मंगल-वाचन को ।।२।।

कहता ब्राह्मण, 'आया कोई तानाजी से मिलने' ।

तलवारों की खन-खन ध्‍वनि लगि मंडप में गूँजने ।।३।।

हर-हर गर्जत लोग । चमकती तेग । सभी हैं दंग ।

शिवराज-दूत आ गए ।

शादी सब भूल ही गए ।

हम देश-कार्य के लिए ।

हम धर्म-कार्य के लिए ।

बच्‍चा-बूढ़ा सभी चलत हैं, आगे तानाजी !

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।४।।

: ६ :

परमात्‍मा से जीवात्‍मा का मिलन आज हुआ ।

पवनपुत्र वा रामचरण से फिर से लिपट गया ।।१।।

अरुण ही मानो जगन्मित्रवर रवि की बाहों में ।

तानाजी श्रीशिवराजा की शोभत बाहों में ।।२।।

मुलाकात औ' हुआ मशविरा, 'मुझे भेज दो, जी !

मर जाऊँ पर गड़ ले लूँ मैं' कहता तानाजी ।।३।।

यह पर्व स्‍वतंत्रता का । शत्रु के लहू का । स्‍नान बहु सुख का ।

होने दो जी, शिवराया ।

देशार्थ समर्पित काया ।

धर्मार्थ समर्पित काया ।

व्‍यर्थ ना रहे यह काया ।

आखिर निकला शिवधनुष्‍य से तीर तानाजी ।

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।४।।

: ७ :

हे शिवबा के तीर ! जाओ, तानाजी, वीर !

वीरों में तुम श्रेष्‍ठ बनो, रिपु मारो, रणधीर ।।१।।

सिंहगढ़ पर शोकमग्‍न है आर्य-भूमि, देखो ।

जाओ, परवशता को मारो, राहत दो उसको ।।२।।

सुनो देवता-दूतो ! पालन करने कर्तव्‍य का ।

निकल पड़ा है तानाजी, तुम ध्‍यान रखो उसका ।।३।।

हे मंगल तारा-गण । अप्‍सरा-गण । करो तुम गमन ।

तानाजी लड़ने आया ।

रिपु बहुत, अकेला आया ।

धैर्य के साथ सरसाया ।

उसी धैर्य पर बरसो अमृत तथा फूल तुम, जी !

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।४।।

: ८ :

मध्‍यरात्रि का समय शांत पर भयकारी घोर ।

गढ़ के तले घनी झाड़ी में घना अंधकार ।।१।।

रात भी बहुत गाढ़ी सोई, किर्र ध्‍वनि बंद ।

झुरमुट में इक निकल पड़ा तब तेज स्‍वर बुलंद ।।२।।

'अरे, तुम्‍हारे पूर्वज देते हैं- सुन लो-आवाज ।

सुनो मराठो, गौर से सुना, यह स्‍वर्णिम आवाज ।।३।।

माँ तुम्‍हारी यह भूमाता, चमड़ी पर उसकी ।

चाबुक की फटकारें बहती धारा शोणित की ।।४।।

शोणित के उस एक बूँद के लिए लाख मुंड ।

रिपु के तोड़ो,कूटो, मरहम बना लो उदंड ।।५।।

असली जिसका बीज मराठा, मेरे संग चल दो ।

गढ़ लेने के लिए मृत्‍यु का वरण शीघ्र कर दो ।।६।।

बाकी सब भागो षंढ । अधोमुख साँड़ । बचा लो कंठ ।

गलसरी उसमें पहनना ।

यह उचित तुम्‍हारा गहना ।

तलवार कभी मत लेना ।

'हर, हर, हर' गर्जत झुरमुट से शेर निकला, जी ।

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।७।।

: ९ :

कगार सीधा चढ़ना दुर्घट गोह के लिए भी ।

पहरा गढ़ पर उसी स्‍थान पर नहिं बिलकुल कुछ भी ।।१।।

मौका पाकर यह, तानाजी वहीं पहुँच गया ।

चढ़ने-ना, ना ! अं‍तरिक्ष में उड़ने-सरसाया ।।२।।

कुलबुलत है कोई, 'यदि जो पैर फिसल जाए ?'

कहत वीर, 'देशार्थ गर्व से स्‍वर्ग सिधर जाएँ !' ३।।

यशवंति चढ़े अति त्‍वरित । हर्ष हो बहुत । डोर पर हाथ ।

तानाजी चढ़ने लगा ।

सद्भाग्‍य चढ़ने लगा ।

स्‍वातंत्र्य चढ़ने लगा ।

सम्‍हाल लो अब म्‍लेच्‍छो ! आया, आया तानाजी ।

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।४।।

: १० :

एक एक के बाद मराठा सरसर ऊपर चढ़े ।

हजार थे रिपु, फिर भी उनपर हमला कर दौड़े ।।१।।

कौन, कहाँ से, कितने, कैसे, कहाँ कहाँ लड़ते ।

कुछ न समझ पाए अँधेरे में रिपु हैं मरते ।।२।।

नीचे, ऊपर, पीछे, आगे, इधर-उधर भ्रमते ।

दिशाहीन सब दौड़त हैं तब भाले से गिरते ।।३।।

वह धन्‍य मराठा वीर । अरि-कलेवर । लगावत ढेर ।

कुचलते मांस का कीचड़ ।

तैरते लहू की बाढ़ ।

'लो, मारो' देत दहाड़ ।

दरवाजा कल्‍याण खटखटा खुलत, लेत बाजी !

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।४।।

: ११ :

बाजी मारी, है कहाँ पर अपना तानाजी ?

मार-काट में मग्‍न हो गया समरांगण में, जी ।।१।।

उदयखान को देखा तब झट उस पर टूट पड़ा ।

जूझत-जूझत सब देखत हैं शेर जब दहाड़ा ।।२।।

'सह्य-शैल के शेर को कहाँ, बकरे, खाते हो ?

खान, तुम्‍हारा बाप कौन था, याद कर रहे हो ? ।।३।।

धिक्-धिक् नीच ! बताते अपना कुल रजपुत-वंश ।

राम, कृष्‍ण औ' प्रताप का वह दिव्‍य महा-वंश ।।४।।

बाप तुम्‍हारा मुसलमान था, जो लड़ते हमसे ?

मातृभूमि को मुक्‍त करानेवाले वीरों से' ।।५।।

कहकर ऐसे टूट पड़ा फिर, यद्यपि थका हुआ ।

उदयभानु का वार अचानक तभी कारगर हुआ ।।६।।

बेहोश हो गया वीर । एक पल भर । हाय, रघुवीर !

तानाजी तभी गिर गया ।

धैर्य का शैल ढल गया ।

शिवबा का भाला गल गया ।

भूमाता की गोद में लेटा देखो तानाजी ।

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।७।।

: १२ :

तानाजी गिर गया, मराठे हटते हैं, देख ।

सूर्याजी की दहाड़ गूँजत भयकारी एक ।।१।।

'अरे मराठो, चले कहाँ तुम सारे के सारे ?

रख दो भाला, पहनो चूड़ी हाथों में सारे ।।२।।

डोर पकड़कर जाने का क्‍या सोच रहे तड़के ?

सुनो नपुंसको, डोर कभी का टूट गया लड़ के ।।३।।

बाप तुम्‍हारा लड़ते लड़ते मर पड़ा यहीं पर ।

अब पितरों को नर्क भेज दो तुम वापस जाकर' ।।४।।

धिक्‍कार श्‍ब्‍द गर्जत । पुन: लौटत । वीर राउत ।

फिर घना युद्ध जो छिड़ा ।

वीर से वीर जो भिड़ा ।

देशार्थ मराठा लड़ा ।

धर्मार्थ मराठा लड़ा ।

वीर रस का प्राशन उनको स्‍वतंत्रता कराए, जी !

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।५।।

: १३ :

अरे, पकड़ लो, मातृघातकी देशघातकी को ।

चलो, चलो जी, उसी स्‍थान पर, छोड़ो बातों को ।।१।।

सभी मराठे दौड़त उस स्‍थल बदला लेने को ।

उदयभानु पहले ही किसी ने भेज दिया नर्क को ।।२।।

उसके शोणित में भिगा दिया वस्‍त्र, ध्‍वज बनाया ।

स्‍वतंत्रता का ध्‍वज अनदेखा, अभी तक फहराया ।।३।।

जब तानाजी की ओर । मुड़त झकझोर । नैन में नीर ।

तानाजी कुछ उठ गया ।

जय देख, हर हर किया ।

'देथार्थ मरूँ', कह दिया ।

'धर्मार्थ मरूँ', कह दिया ।

फिर से गिरा, कहाँ का अब वह उठता तानाजी ।

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।४।।

: १४ :

फिर उस गढ़ की भू में लिपटा तानाजी दिल से ।

तब से रत्‍नाकर समुद्र भी जलता है उससे ।।१।।

स्‍वतंत्रता के रण में लड़ते स्‍वतंत्रता के लिए ।

उन लोगों के समर्थक स्‍वयं जगदीश्‍वर हो गए ।।२।।

धन्‍य मराठे पुनीत हुए अरि-शोणित के स्‍नान से ।

और 'विनायक' उनके निर्मल यश:-सुधा-पान से ।।३।।

अस्‍तु समाप्ति श्रीशिवबा की सरस्‍वती की, जी !

गढ़ आया पर सिंह खो गया, देखो, तानाजी ।।४।।

धन्‍य शिवाजी वह रणगाजी, धन्‍य तानाजी !

आज प्रेम से सिंहगढ़ का गीत गाओ, जी ।।५।।

टिप्‍पणियाँ : १. शिवाजी, शिवराजा, शिवबा, शिवराज, शिवराया = छत्रपति शिवाजी ।

२. तानाजी = तानाजी मालुसरे, शिवाजी के एक प्रमुख सरदार ।

३. सिंहगढ़ = पुणे के पास स्थित एक दुर्गम पहाड़ी किला ।

४. शिवनेरी = एक पहाड़ी किला, जहाँ शिवाजी का जन्‍म हुआ ।

५. मावले = मूलत: खेतिहर मराठा जनसाधारण, जिन्‍हें शिवाजी ने अपने स्‍वतंत्रता-संग्राम में नई चेतना के साथ समाविष्‍ट किया ।

६. रामदास = महाराष्‍ट्र के प्रवृत्तिवादी साधु, जिन्‍हें शिवाजी का गुरु माना जाता है ।

७. तोरणगढ़ = एक पहाड़ी किला, जिसे जीतकर शिवजी ने अपने स्‍वतंत्रता-संग्राम का श्रीगणेश किया ।

८. भगवा ध्‍वज = गेरुए रंग का शिवाजी का ध्‍वज ।

९. प्रतापगढ़ = एक दुर्गम पहाड़ी किला, जिसमें शिवाजी की आराध्‍य देवी भवानी का मंदिर है तथा जिसके तले शिवाजी और अफजल खाँ की इतिहास प्रसिद्ध भेंट हुई ।

१०. अफजल खाँ = विजापुर के आदिलशाह का महाप्रतापी बलिष्‍ठ सरदार, जिसने शिवाजी को जिंदा या मुरदा पकड़ लाने का बीड़ा उठाया था । शिवाजी से भेंट होने पर उसने अपनी बाँहों में शिवाजी की गरदन मरोड़ने का प्रयास किया, जिसके जवाब में शिवाजी ने उसका उदर बाघ नख से विदीर्ण करके उसे मार डाला ।

११. शास्‍ता खाँ = मुगल सम्राट् औरंगजेब का मामा, जिसे औरंगजेब ने बड़ी फौज देकर शिवाजी पर आक्रमण करने भेजा था । उसने पुणे में शिवाजी की हवेली पर कब्‍जा कर लिया था । मध्‍यरात्रि के समय शिवाजी ने कुछ चुनिंदा वीरों के साथ हवेली पर छापा मारा । मुठभेड़ में शास्‍ता खाँ का बेटा मारा गया और शास्‍ता खाँ के हाथ की अँगुलियाँ कट गईं ।

१२. जिजा = शिवाजी की माताश्री जिजाबाई, जिन्‍होंने शिवाजी के मन में बचपन से ही स्‍वतंत्रता की चेतना जगाई ।

१३. यशवंती = तानाजी की प्रशिक्षित गोह, जिसकी कमर में डोर बाँधकर उसे दुर्घट कगार क ऊपर भेजा गया और जब वह ऊपर जा कर पहाड़ से चिपक गई तब डोर से तानाजी और उनके साथी ऊपर चढ़ गए ।

१४. उदयखान = उदयभानु, मुगलों के राजपूत सरदार, जो सिंहगढ़ के किलेदार थे । यद्यपि उन्‍होंने धर्मांतरण नहीं किया था, मुगलों की सेवा में रत होने के कारण सावरकरजी ने उन्‍हें व्‍यंग्‍य से 'उदयखान' कहा है ।

१५. सूर्याजी = तानाजी के छोटे भाई ।

१६. विनायक = विनायक दामोदर सावरकर ।

श्री बाजी देशपांडेजी का पोवाड़ा

(परिचय : इस पोवाड़े को दिनांक ११ नवंबर, १९११ के सरकारी पत्रक के अनुसार आक्षिप्‍त ठहराया गया था । उसपर से पाबंदी दिनांक ७ अक्‍तूबर, १९३८ के सरकारी पत्रक से हटा दी गई । सिंहगढ़ के पोवाड़े के प्रारंभ में जो प्रास्‍ताविक दिया है, वही इस पोवाड़े के संदर्भ में भी प्रस्‍तुत है ।)

जयोऽस्‍तु ते श्रीमहन्‍मंगले शिवास्‍पदे शुभदे ।

स्‍वतंत्रते भगवति ! त्‍वामहं यशोयुतां वंदे ।।

स्‍वतंत्रते भगवती ! आइए प्रथम सभा में, जी !

गाते हैं हम आज गीत में महावीर बाजी ।।

चितौड़गढ़ के बुर्ज ! आइए जोहारों के संग ।

विक्रमशाली प्रतापसिंहजी ! आओ जी, रणरंग ! ।।

सिंहगढ़ ! तुम तानाजी के शार्य सहित आओ ।

रायगढ़ की दौलत ! तुम भी प्रेमपूर्ण आओ ।।

जरिपटका फहराते आओ धनाजि, संताजी !

भाऊ ! आओ, दिल्‍ली के तख्‍त की उड़ा धज्‍जी ।।

स्‍वतंत्रता के रण में मर के चिरंजीव हो गए ।

ऐसे सारे वीरो ! तुम अब शीघ्र पधारिए ।।

भीड़ भरी सभा में भारी । गर्जना सारी । होत भयकारी ।

जय स्‍वतंत्रता की बोलो ।

जय राष्‍ट्रदेवि की बोलो ।

जय भवानि की जय बोलो ।

सभी मावलो ! बोलो, 'हर हर महादेव' बोलो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।१।।

'हर हर' गर्जत सभी मावले वीर सज्‍ज बनते ।

लेकिन बाजी कहाँ खो गए ? क्‍यों न यहाँ दिखते ।।

हाय हाय ! वे म्‍लेच्‍छ-संग तब बना रहे थे, जी ।

स्‍वदेश-भू के पैरोंवाली दास्‍य-श्रृंखला जी ।।

सुनकर शिवबा-हृदय छटपटा, कहत 'दूत, जाओ ।

वीर बाजि को राष्‍ट्र कार्य का बोध तुम कराओ ।'

शिव-दूत जा पहुँचत । बाजि से कहत । छोड़ दे कु-मत ।

क्‍यों जीना तुच्‍छ बनाते ?

क्‍यों म्‍लेच्‍छ-कसाई भजते ?

क्‍यों दास्‍य-नर्क में पचते ?

स्‍वराज्‍य बिन औ' स्‍वदेश बिन तो देह तुच्‍छ समझ लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।२।।

बाजी देखा, म्‍लेच्‍छ सबल यह दोष नहीं काल का ।

नहीं देव का, नहीं धर्म का, नहीं मुकद्दर का ।।

देशद्रोही अधमों का यह भरा रहा बाजार ।

बेच रहे निष्‍ठा उनको जो दास्‍य देत अनिवार ।।

स्‍वतंत्रता को आप ही जैसे लोगों ने काटा ।

भू-माता की गरदन को निर्ममता से काटा ।।

सावधान बाजीराय । दास्‍य में काय । व्‍यर्थ गुमराह ।

श्रीशिवबा परमेश्‍वर ।

बुलाए स्‍वतंत्रता खातिर ।

तुम जाओ जी, सत्‍वर ।

देशभक्ति का अमृत पीकर प्रायश्चित्‍त कर लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।३।।

शिव-दूतों की बातें सुनकर बाजी सोचत है ।

काल-सर्प को कैसे मैंने मित्र बनाया है ?

घर में आया चोर, उसी को राजा मान लिया ?

शिवराजा के पूज्‍य कार्य को विप्‍लव मान लिया ।।

मेरी माँ को भ्रष्‍ट किया जिसने, निष्‍ठा उससे ?

मैं पापी लड़ रहा देश के रक्षणकर्ता से ।।

कह दो शिवनृप से, जी । मुझ जैसे पाजी । राजनिष्‍ठ को, जी ।

तुम पहले मारो जान से ।

मृत्‍यु जब मिलेगी तुम से ।

मैं शुद्ध हो जाऊँ दिल से ।

तेग तुम्‍हारे हाथ बनूँ मैं पुनर्जन्‍म में लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।४।।

देश‍भूमि के घातक को मैं क्‍यों निष्‍ठा दे दूँ ?

रोटी देता है इस कारण क्‍यों सेवा कर दूँ ?

किसकी रोटी, बोलो भाई, सेवा भी किसकी ?

रोटी भू-माता देती है, सेवा कातिल की ।।

राज छीनकर जीत लिया है देश अधमों ने ।

उनसे निष्‍ठा जता रहे हो, पाया नर्क तुमने ।।

यह सीख दास्‍यकारक । लो अभी सबक । अभी से देख ।

मेरा देश ही मेरा प्राण ।

वह राजा, वही भगवान ।

शिवबा पर जान कुरबान ।

राख उड़ गई, प्रदीप्‍त बाजी-वैश्‍वानर देख लो !

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।५।।

धूलि उड़ गई आसमान में,'दीन' शब्द आया ।

सिद्दी जोहर ने पन्‍हालागढ़ को घेर लिया ।।

लक्ष्‍मी का मृदु कमल, शारदामैया की वीणा ।

स्‍वतंत्रता का कलिजा गढ़ पर बंदी शिवराणा ।।

अफझुल्‍ला के वध के कारण फाजल सुत उसका ।

करता है प्रण शिव को जिंदा कैद करने का ।।

जिस वीर ने बाप को । हराया, उसको । कैद करने को ।

यदि कभी सफल तुम रहते हो ।

जीवंत हवा जो बहती है ।

पकड़ना उसे यदि संभव है ।

बेशक फिर, तुम हिरन ! पकड़ने दावानल दौड़ लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।६।।

बाजी ने कुछ खुसुर-फुसुर फिर कर दी शिवबा से ।

एक मावला भेजा नीचे मिलने सिद्दी से ।।

सिद्दी को जब देखा, सहसा हाथ खड्ग पर गया ।

रोक स्‍वयं को, कुर्निसात करके बतलाया ।।

'राजा शिव जीवंत आ रहा आपसे मिलने ।

सुबह करेंगे गढ़ को खाली, बतलाया उसने' ।।

सुन बात, सिद्दि बहु खुश । शत्रु मदहोश । उड़ गए होश ।

अजी खान, खान, खान जी ।

हुए शिकस्‍त मराठे, जी ।

फिर लड़ना अब क्‍यों जी ?

चलो, शराब पिएँगे जी ।

आप गाजी ! आप रणगाजी !

मदहोश किया अरि-सर्प बजाकर तुमड़ी, अब सुन लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।७।।

बहकाया अरि-सर्प को, शिव सपेरा गड़ पर ।

खास मराठी जादु चलावत प्रहर बीतने पर ।।

कृष्‍ण पक्ष की काली काली रात जब आई ।

घनी झाड़ि‍यों से डरकर तारकाएँ छिप गईं ।।

ऐसे अँधेरे में किसने दरवाजे खोले ?

बाजी, श्रीशिव और साथ में शत भाले निकले ।।

भाला कंधे पर घोड़े पर सवार जब वीर ।

घोड़ा थै थै नाचत, सीटी तभी बजत 'किर्रर्र' ।।

वीरो, अब मारो एड़ । होगी मुठभेड़ । घेरे को तोड़ ।

रिपु रौंद निकलो पार ।

चौकी दिखने खातिर ।

जुगनू पर रहो निर्भर ।

सत्‍तर मीलों तक निकला जी राजा, तुम सुन लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।८।।

झाँसा देकर सिद्दी को शिवराजा निकल गया ।

'अब्रह्मण्‍यम् !' कई अनाड़ी पंडों ने कह दिया ।।

अब्रह्मण्‍यम्' क्‍या है इसमें ? दोष कौन सा है ?

'शठं प्रति शाठयम्' नीति पुरातन चलती आई है ।।

साँप विषैला देशवासियों को डसने आया ।

उसे अचानक झाँसा देकर ऐसा कुचल दिया ।।

ये यथा प्रपद्यन्‍ते माम् । भजाम्‍यहं तान् । तथैव धीमान् ।

'भारत' में कृष्‍ण की राय ।

'अधम को अधमता' न्‍याय ।

राष्‍ट्र के लिए शिवराय ।

सावधान शिव राष्‍ट्रहितैषी ! रिपु पीछे, देख लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला बोलो ।।९।।

'पैर पड़ूँ, मैं हाथ जोड़ दूँ', बाजी कहता है ।

'गड़ दुर्गम रांगणा, वहाँ अब तुमने जाना है ।।

राष्‍ट्रदेवि का हाथ कुशल तुम, तब लाखों भाले ।

हम जैसे मिल जाएँगे औ' शत्रु भाग निकले ।।'

'क्‍या जाऊँ मैं, बाजि, मृत्‍युमुख छोड़ तुमको, जी ?

कभी शिवाजी सच्‍चा योद्धा डरा मौत से, जी' ।।

'शीघ्र चढ़ो गढ़ पर, तोपों को पाँच सुलगाओ ।

तब तक लड़ते रह जाएँगे, हम पर यकीन करो ।।

वसुदेव बनो जी तुरंत । कंस-षड्यंत्र । करो बेपर्द ।

स्‍वतंत्रता हरि-मूरत ।

ले जाओ अपने साथ ।

गड़-गोकुल में सुरक्षित' ।

शिवबा निकले, तो दर्रे में रिपु आया, देख लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।१०।।

गनीम आए, दर्रे में बहु तमतमाते आए ।

भाले लेकर वीर मराठे उनसे टकराए ।।

खड्गों की खनखनाहट तथा शर सन-सन करते ।

'मरना या मारना' हेतु से वीर रहे लड़ते ।।

तब 'हर हर' जो हो गई । विजय हो गई । रिपु-सेना हट गई ।

चलो, फिर से हमला करो ।

वीरो, फिर हमला करो ।

जिद लेकर हमला करो ।

मार-काट करते-करते रिपु दर्रे से भगा लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।११।।

म्‍लेच्‍छ हट गए, बाजी मुड़कर गढ़ को देखत है ।

श्रीशिव जाते देख मार्ग पर, वीर गर्जत है ।।

'गढ़ के अंदर जाएगा श्रीशिवराणा प्‍यारा ।

तब तक दर्रा रोक रखेंगे यही प्रण हमारा ।

प्रण के पहले समरांगण में मौत अगर आए ।

पुनर्जन्‍म तत्‍काल लेकर पुनरपि लड़ पाएँ ।।

रघुराय, रावणदमन । कंस-मर्दन । भो जनार्दन ।

मत्प्रिय देशजननी की ।

रक्षार्थ स्‍वतंत्रता की ।

बलि चढ़ा रहा हूँ खुद की ।

यदि पवित्र है कार्य, सुयश दो, आशीर्वच बोलो ।'

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।१२।।

आ गए फिर गनीम पुनरपि, हमला कर आए ।

पुन: मराठे भाले लेकर युद्ध-सज्‍ज हो गए ।।

'दीन दीन' रणशब्‍द उठा, 'हर शंकर' गूँज गया ।

दाँत होंठ में, और वक्ष में भाला टकराया ।।

हमला करके बार बार वे रिपु से भिड़ जाते ।

ठाठ शान में रण-भोजन में वीर-रस पीते ।।

मराठी भाला रुक गया । तो बाजी आया । पुन: सरसाया ।

रण-रंग पुन:जो चमका ।

गर्जते मराठे,'रिपु का ।

बदला ला, म्‍लेच्‍छ-दुर्जन का ।

मस्‍तक है गेंद, अब पक्‍का ।

समरांगण में गेंद-बल्‍ला खेल शुरू कर लो' ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।१३।।

वीर मराठों ने रिपु-सेना के छक्‍के छुड़ाए ।

विजय हुई, पर वीर मराठे काफी मारे गए ।।

उधर पाँच तोपें गढ़ पर क्‍यों न अभी बजतीं ?

वीर मराठे चिंतित, आशा परास्‍त होने लगती ।।

तिस पर ताजा टोली लेकर फाजल खाँ आता है ।

धन्‍य बाजि की ! पुन: उछलकर टूट पड़ता है ।।

तोप-दर्रे से निकला यह गोला श्रीबाजी ।

रण में दमकत वीरश्री का समर-पति यहाँ, जी ।।

तब गोली भिन-भिन आई । घात कर गई । मर्म विंध गई ।

श्रीबाजी घायल गिर गया ।

फिर तुरंत ही उठ गया ।

बेहोश वीर कह गया ।

'तोप से पहले नहीं गिरूँगा, मौत से बोलो !'

'तोप से पहले नहीं गिरूँगा, मौत से बोलो !'

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।। १४।।

'रुको वीर ! घाव तो तुम्‍हारा बाँधूँ, रुक जाओ !

'हर हर' रण में सुनकर, बाजी ! उछले ना जाओ' ।

'घाव कहाँ का, केवल मैं हूँ तृषाक्रांत थोड़ा ।

रिपु-शोणित को पी जाता हूँ, दो मेरा घोड़ा ।।

असली घाव भू-माता के तन, आक्रोशत, छोड़ो ।

खींच शत्रु की आँतें, कर दूँ पट्टी उसकी, छोड़ो ।।

भले ! मराठो ! लड़ो, तुम, आया मै, छोड़ो ।

लड़ो, लड़ो जी, छोड़ो मुझको, म्‍लेच्‍छ शत्रु को तोड़ो ।।

तोप भी अभी बज जाए । तनिक रुक जाएँ । जंग चलवाएँ ।

भू-माँ का ऋण चुकाने के ।

अब गर्म बिंदु शोणित के ।

दो गिनकर, बस, पूँजी के ।

सूद चुकाकर स्‍वतंत्रता का, कर्ज तुम मिटा लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।१५।।

'यह कैसी आवाज ?''बाजी, तोप नहीं बज गई ।

शिला ढल गई, पत्‍त्‍ो सरसरे, चिड़ि‍या चिल्‍लाई !'

'लड़ो वीर, फिर चलो, घुस गया समरांगण में मैं ।

नहलएँगे शोणित से हम भू को दर्रे में ।।

सौगंध तुम्‍हें वृक्ष-पक्षि-जल-शिला-तेज सारे ।

गिर जाऊँ यदि तोप से पहले, लड़ो आप सारे !'

जब धमाके हो गए । प्राण लौट आए । हास्‍यमुख हुए ।

यह धमाका शिवाजी का ।

यह धमाका निजधर्म का ।

यह धमाका निजदेश का ।

यह चौथा कर्तव्‍य का ।

तभी पाँचवाँ होत धमाका,'हर हर जय' बोलो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।१६।।

सावधान, यमदूत ! यहाँ लेटा है श्रीबाजी ।

छुओ नहीं उसके तेजस्‍वी शरीर को तुम, जी ।।

स्‍वतंत्रता के पहले यह रण-तीर्थ पहुँचा है।

देश-शत्रु-शोणित में रंगा लाल बन गया है ।।

रिपु-रुंडों की माला उसके सीने पर शोभत है ।

जिस पर 'हर हर महादेव' का मंत्र अंकित है ।।

ये देव-दूत आ गए । सूर्य आ गए । इंद्र आ गए ।

सुरगुरु सुरतरु सारे ।

औ' वर्षत देवगण तारे ।

मधु मृदुल हवा संचारे ।

करे आरती कीर्तिसुंदरी, श्रीबाजी , सुन लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।१७।।

दिव्‍य धुनी का प्रकाश पूरे जग में उभर गया ।

स्‍वतंत्रता देवि का दिव्‍य रथ अब अवतीर्ण हुआ ।

चित्‍तोड़, जागो, उठो, देवि को उत्‍थापन दो, जी ।

प्रतापसिंह, तुम उठो, देवि को प्रणाम कर लो, जी ।।

तानाजी, तुम उठो, छोड़ दो अब चिंता सारी ।

राय रांगणा में है रक्षित युगप्रिय अवतारी ।।

स्‍वतंत्रता का वीर-गान यह सुनने जो आए ।

उठो सभी स्‍वातंत्र्यवीर, जयमंगल हो जाए ।

श्री स्‍वतंत्रता भगवती । रथ में संप्रति । बाजि को लेती ।

गंधर्व तननतों करते ।

स्‍वर्गीय नगाड़े बजते ।

श्रीबाजी स्‍वर्ग में जाते ।

विश्‍व चराचर कहे, बाजि का जय जय जय बोलो ।'

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।१८।।

तभी मराठे रण में मृत औ' देवगण सारे ।

पावनदर्रे में बैठे जो, स्‍वर्ग सभी सिधरे ।।

श्रीबाजी का शोणित बोया, द‍र्रे में बिखरा ।

रायगढ़ में स्‍वतंत्रता का वही वृक्ष निकला ।।

अरे बंधुओ ! पूर्वज ऐसे स्‍वतंत्र रणगाजी ।

वंशज क्‍या उनके शोभत हैं हम सब ? सोचो, जी ।।

विनति विनायक करे, निहित जो अर्थ अब समझ लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।

स्‍वराज्‍य बिन औ' स्‍वदेश बिन तो देह तुच्‍छ समझ लो ।

स्‍वतंत्रता के रण में रिपु पर अब हमला कर लो ।।१९।।

टिप्‍पणियाँ : १. बाजी, श्रीबाजी = बाजी प्रभु देशपांडे, जो प्रारंभ में शिवाजी के उदात्‍त ध्‍येय को समझे बिना उसे केवल एक विप्‍लवी मानकर यवन राजा की सेवा में लगे रहे थे । शिवाजी द्वारा समझाए जाने पर वे शिवाजी के पक्ष में शामिल हो गए । सिद्दी जोहर का घेरा तोड़कर शिवाजी जब पन्‍हालगढ़ से निकलकर सुरक्षित रांगणगढ़ की ओर भाग रहे थे, तब बाजी प्रभु ने पीछा करने वाले गनीम को दर्रे में रोके रखने का जिम्‍मा उठाया । चंद वीरों के साथ, मर्मांतक घावों की परवाह किए बिना वे तब तक लड़ते रहे जब तक शिवाजी के रांगणागढ़ में सुरक्षित पहुँचने के इशारे में पाँच तोपें न दागी गई ।

२. पोवाड़े के प्रारंभ में, पोवाड़ा सुनने के लिए देवी-देवताओं को न्‍योता देने की प्रथा है । यहाँ सावरकरजी ने चित्‍तौड़गढ़, राणा प्रतापसिंह, सिंहगढ़, तानाजी, रायगढ़, धनाजी, संताजी आदि को न्‍योता दिया है ।

३. रायगढ़ की दौलत = शिवाजी के हिंदवी स्‍वराज्‍य की राजधानी ।

४. जरिपटका = शिवाजी का राष्‍ट्रध्‍वज ।

५. धनाजी, संताजी = धनाजी जाधव और संताजी घोरपड़े, दो वीर मराठा सरदार, जिन्‍होंने स्‍वयं औरंगजेब के तंबू पर हमला करके, उसके सोने के शिखर काटकर ले आए थे तथा मुगलों को जिन्‍होंने इतना आतंकित कर रखा था कि जब घोड़े पानी नहीं पीते थे तब मुगल सैनिक उनसे पूछते थे कि कहीं पानी में धनाजी-संताजी तो नहीं दिख रहे ।

६. भाऊ = सदाशिवरावभाऊ पेशवा, जिन्‍होंने दिल्‍ली का तख्‍त प्रत्‍यक्ष रूप में तोड़ा था ।

७. मावले = मूलत: किसान-वर्ग के जनसाधारण, जिनको शिवाजी ने प्रेरित करके वीर योद्धा बना दिया था ।

८. 'हर हर महादेव'= मराठों की रणगर्जना ।

९. शिवबा, श्रीशिव, शिवराणा, शिवनृप = शिवाजी महाराज ।

१०. सिद्दी जोहर = आदिलशाह का सरदार ।

११. अफझुल्‍ला = अफजलखाँ, आदिलशाह का सरदार

१२. विनायक = विनायक दामोदर सावरकर ।

तारकाओं को देखकर

(परिचय : मुंबई छोड़कर बैरिस्‍टर बनने के उद्देश्‍य से ईसवी १९०६ में सावरकरजी विलायत के लिए निकले । लंबी समुद्र यात्रा के दौरान केवल मनोरंजन के लिए तूफानी तथा निरभ्र रातों में वे जहाज के भाल पर घूमते थे । उस समय उन्‍होंने निम्‍न कविता का लेखन किया)

सुनील नभ यह, सुंदर नभ यह, अतल अहा ।

सुनील सागर, सुंदर सागर, सागर अतल अहा ।

नक्षत्रों से तारांकित नभ चम चम हँसता है ।

प्रतिबिंबों से सागर भी तारांकित लगता है ।

पता नहीं कब शुरू नभ, कहाँ जलसीमा ठहरी ।

नभ में जल औ' जल में नभ का संगम मनहारी ।

असली सागर ऊपर अथवा नीचे शोभत है ।

असली नभ कौन सा बताना सचमुच मुशकिल है ।

नभ के तारे सागर में प्रतिबिंबित होते हैं ।

अथवा नभ में सागर के ही मोती बिंबित हैं ।

अथवा नभ है केवल सारा, या सागर सारा ।

भवसागर कहते हैं जिसको पुराण-ऋषि न्‍यारा ।

हे तारके ! दिखती हो जैसी, सुखशीतल हो न ?

तुम्‍हें आग की ज्‍वाला कहते हैं, मैं मानूँ न !

विमल विरल मेघों की चद्दर ओढ़ सो जाए ।

कोइ अप्‍सरा, उसके सुंदर मुख-सम शोभत है ।

आल्‍हादक यह चंद्रबिंब, जो नंदसुधा वितरे।

दूरबीन पर तुलना उसकी वीरानों से करे ।

चंद्र-तारका नाप नापकर अंतर प्रभु जी ने ।

लगा दिए नभ में, नैनों में शीशे औ' ऐने ।

उनका रूप रिझावत लोगों को रहता अनिवार ।

विरूप उसको करनेवाली दुरबिन है बेकार ।

ज्‍योतिषज्ञ जो कहते हैं वे आग के शोले ।

कोई और रहेंगे तारे, ये अमृतवाले ।

सुर-असुरों ने क्षीराब्‍धी की जब की थी मथनी ।

अमृतकलश जब आया ऊपर, हो खींचातानी ।

खींचातानी से अमृत की बूँदें बिखर गई ।

उनको तारे कहनेवालों की मति भ्रष्‍ट हुई ।

अथवा देखत देव-रमणियाँ वसुधा पर ऐसी ।

चमेलि, जूही, शुभ्र मालती खिलती-हँसती-सी ।

उनके नंदन वन में भी हों ऐसे सुमन सभी ।

इसी हेतु से बोया अपना हास्‍य सुकोमल तभी ।

हास्‍य-लता के फूल खिल गए, वसंत ऋतु आई ।

उनको तारे कहनेवालों की मति भ्रष्‍ट हुई ।

नंदन वन के खद्योतों की चमचमाहट हुई ।

उनको तारे कहनेवालों की मति भ्रष्‍ट हुई ।

नीली साड़ी पर माया की बेलबूटियाँ सही ।

उनको तारे कहनेवालों की मति भ्रष्‍ट हुई ।

सुवर्णगौरा गौरी श्रीहर लीलारत जब थे ।

द्वार खटखटा, श्रीहरि उनसे मिलने आए थे ।

नग्‍ना गिरिजा जल्‍दी जल्‍दी वस्‍त्र पहन लेती ।

झटका लगने से माला के टूट गए मोती ।

इधर-उधर सब बिखरे, कैसी हालत यह बन गई ।

उनको तारे कहनेवालों की मति भ्रष्‍ट हुई ।

दुष्‍ट दशानन उठा ले गया सीता देवी को ।

दु:खी देवी मुक्‍त बहावत अश्रुबिंदुओं को ।

दिव्‍य शक्ति से दमकत सुस्थिर रहत अश्रु जब वहीं ।

उनको तारे कहनेवालों की मति भ्रष्‍ट हुई ।

हमला करके चित्‍तौड़ पर जब आया नर्कपति ।

देवगणों को वार्त्‍ता देने तुरंत शीघ्रगति ।

सिद्ध-अग्नि से झट से ज्‍वालाएँ नभ में भभकीं ।

चित्‍तौड़वासिनि देवियाँ सभी आरूढ़ा हो गई ।

ज्‍वालारूढ़ा सभी देवियाँ दमकत तेजस्विनी ।

उनको तारे कहनेवालों की मति भ्रष्‍ट हुई ।

प्रभुविरचित नव नाटक 'मायाविजय' जगद्रूप ।

खेला जता है, तब सुरगण-स्त्रियाँ सुस्‍वरूप ।

नभ के नाट्यालय के छज्‍जे से कौतूहल से ।

चमकत-दमकत झाँक देखती हैं सब ऊपर से ।

वदन-कमल उन देवियों के देखत चकराई ।

उनको तारे कहनेवालों की मति भ्रष्‍ट हुई ।

नभस्थित ग्रंथालय को जब अर्पित ग्रंथ किया ।

कालपुरुष ने जिसमें विश्‍वेतिहास दर्ज किया ।

रौप्‍यमुद्रांकित उसकी यह रचना भी कर दी ।

उसको तारे कहनेवालों की मति भ्रष्‍ट हुई ।

भीलनि के पीछे भागे थे कामव्‍याकुल शिवजी ।

पुराण में है यही कहानी, मेरी बात नहीं जी ।

नाचत भागे माया भीलनि पीछे भागत शिवजी ।

कामव्‍याकुल, आसमान के आँगन में, देखो जी ।

वीर्य प्रभु का टपका, बूँदे बिखरत फैल गई ।

उनको तारे कहनेवालों की मति भ्रष्‍ट हुई ।

परंतु सागर ! साफ बताओ, अथल-पुथल यह कैसी ?

चमक चाँदनी कौन निकलकर नभ से आई कैसी ?

रात्रि-समय में निरी अकेली जल्‍दी से घुस गई ।

तेरे जलमंदिर के भीतर गायब-सी हो गई ।

शरमाओ मत, विलास भोगो, कामोत्‍सुक तुम हो ।

शत-जलतरंग-मंजुल सुख तुम उससे भोगत हो ।

परंतु जिनकी प्रेम तारका दूर अकेली है ।

कितने यात्री निकट तुम्‍हारे व्‍याकुल बैठे हैं ?

साथ तुम्‍हारी प्रिय दयिता से तव संगम देख।

ईर्ष्‍या ना, पर असह्य लगता वियोग का दु:ख ।

हे तारो ! क्‍या पता है तुम्‍हें, आए हो कहाँ से ?

कहाँ चल पड़े ? यात्रा करते हो किस उद्देश्‍य से ?

कौन हेतु है, जिसके खातिर गगनगामि बन गए ?

सूरज से इतनी दूरी पर भू के भ्रमण हुए ?

छोटी तितली हाथी से भी सुंदर शोभत है ।

बीज खिलत है, पुन: सूखकर बीज बनता है ।

छोटे-मोटे घटिका-यंत्रों बीच यंत्र सारे !

अपनी अपनी गति से विचरत एकलक्ष्‍य सारे ।

ऐसा क्‍या उद्देश्‍य, सिद्धि के लिए सत्‍य जिसकी ।

विशाल घड़ि‍ के पहिए घूमत हैं, पूरे विश्‍व की ।

जानते न हम, पूछ रहा हूँ, क्‍या तुम जानत हो ?

अथवा अनजाने में करना कार्य जानते हो ?

(समुद्रमार्ग, १९०६)

श्रीमान् राजा कृष्‍णशहा से

(परिचय : कवि सावरकरजी के ससुरजी जव्‍हार राज्‍य के प्रशासक थे । वे स्‍वयं तथा राजा कृष्‍णशहा दोनों 'अभिनव भारत' संस्‍था के हितैषी थे ।)

यद्यद् विभूति-द्युतिमद् सुसत्‍वं,

तत्‍तद् मदात्‍म-प्रभवं श्रृणु त्‍वम् ।

इति स्‍वयं श्रीभगवान् प्रसिद्धं,

गीता-वधू-रत्‍नमुवाच तत्‍वम् ।।१।।

श्रीमान् नृप ! तुम द्युतिमान् शोभत,

विशिष्‍टता से सदैव युक्‍त ।

अर्थात् प्रभू के महनीय अंश,

व्‍यक्तित्‍व में तव देत प्रकाश ।।२।।

पट्टाभिषिक्‍त ! स्‍वयमेव, और,

सक्षेम रानी तव शंखगौर ।

ज्‍यों मोति में, या नदि में, तुम्‍हारी,

कटार में तेज सदैव भारी ।।३।।

परस्‍परालिंगन-लालसा से,

नृपाल-राज्ञी विरक्‍त जैसे ।

सस्‍पर्ध यच्‍चुंबन देत नित्‍य,

युवराज दोनों-प्रति प्रेमलिप्‍त ।।४।।

या कंठ में जो सुभगा सलीला,

चंपावती चंपक-पुष्‍प-माला ।

श्री राजबंधु-प्रमुखाप्‍त राय,

जो लोकहित में अतिदक्ष कार्य ।।५।।

जो द्रव्‍य से औ' विरला गुणों से,

प्रपूर्ण भांडार राजस्‍व जैसे ।

गुणज्ञ, वेत्‍ता, अधिकार-ज्ञानी,

समर्थ है तव सुमंत्रि-श्रेणी ।।६।।

लता-वृक्ष-मेला सुहास्‍य-प्रसन्‍न,

रता नाथयुक्‍ता सती हास्‍यवदन ।

सुदग्‍धा सुवत्‍सा सु-गोसंघशाला,

तुम्‍हारा यशोगीत नभ में उजाला ।।७।।

उचित-दंड विप्‍लव, प्रजा शांतियुक्‍त,

सदानंद रहता प्रशासन सुतृप्‍त ।

प्रजापालनार्थे सदा दक्ष-पाल,

यथार्था हुई जो उपाधि 'नृपाल'।।८।।

ऐसी पवित्रा दत्‍ता उपाधि,

राजा, तुम्‍हें ईश द्वारा गुणाब्धि ।

ऐसे महान् राघव का चरित्र,

क्‍या तुम पढ़ोगे नित पूर्वरात्र ? ९।।

समुद्र मध्‍ये राक्षस-द्वीप लंका,

दशाननार्थे जगत्‍कलंका ।

जिसने महापीड़ि‍त की धरित्री,

राजा, हमारी जो जन्‍मदात्री ।।१०।।

भूक्रंदनार्थे प्रभु चापपाणी,

सलज्‍जता से युत, नैन पानी ।

कहे,'शत्रु ने जो आतंक छाया,

धिक्‍कार ! मैंने कुछ भी नहीं किया ।।११।।

क्‍या दास-जाति स्‍वयं मैं तथापि,

राजा बना दूँ विगत-प्रतापी ?

सीना हमारा रावण ने लताड़ा,

फिर भी पहन लूँ किरीट व्रीडा' ।।१२।।

श्रीराम रिपु से भिड़ने चला था,

उद्दंड को दंडित जो किया था ।

काटे दसों आनन वे रिपू के,

दुर्भाग्‍य पलटे वसुंधरा के ।।१३।।

चरित्र उद्बोधक है प्रभू का ।

चरित्र उत्‍तेजक है प्रभू का,

चरित्र सांकेतिक है प्रभू का,

दिन-रात कर लो जी पाठ उसका ।।१४।।

राजा, तुम्‍हें श्रीजगदीश-प्रेम,

सद्राजवंशीय सुपुण्‍य जन्‍म ।

तुम भाग्‍यशाली, तुम ईश्‍वरांश,

तुम्‍हारी प्रजा के आधार-विश्‍व ।।१५।।

इसलिए केवल माँग मेरी,

स्‍वार्थार्थ इच्‍छा कोई न मेरी ।

क्‍या आपने कुछ कम भी दिया है ?

यत्‍कारणे जो मन चाहता है ।।१६।।

परंतु अपनी यह आर्य-भूमि,

माता हमारी बहु चारु-भूमि ।

जो कुछ गँवाया उसने उसी को,

पुन: प्राप्‍त करने करो कुछ कृति को ।।१७।।

दुर्गम जव्‍हार जैसे वन का जो व्‍याघ्र महाराणा,

श्रीकृष्‍णशहा नामक, राजसभा में मेरा नजराना ।।

(लंदन, १९०६)

हिंदसुंदरा वह !

हिंदसुंदरा है, धरा यह, धन्‍य प्रसूना है ।।धृ.।।

ऋग्‍यजु: सामवेदा । उपनिषद्-ज्ञान-छंदा ।।

प्राचीना गायत्री । यह देवी संधात्री है ।।१।।

भरद्वाज-जनक की । वसिष्‍ठ-शुक-सनक की ।

गर्गमुनि आदि ऋषियों की । सदा यह जन्‍मदात्री है ।।२।।

रामायण-कवि को । श्रीमत् वाल्मिकि को ।

तथा उस व्‍यास महर्षी को । सिखाती तुतली बोली है ।।३।।

रघु-नल-दाशरथी । धर्मराज नृपती ।

आदि सभी को मातृरूप । यह वंदिता रही है ।।४।।

गार्गी औ' विदुला । पाँचाली मैथिली ।

झाँसी की लक्ष्‍मी भी । जिसकी कोख में जनी है ।।५।।

गौतम-चैतन्‍य को । महाप्रभु, गुरु नानकजी को ।

स्‍तन्‍य दिया सबको । सार्थ है विश्‍वजननि-पद को ।।६।।

प्रताप-शिव-बंदा को । श्री गुरु गोविंदसिंहजी को ।

संभव देती, उद्भव देती। सदा जो स्‍फूर्ति बन रही है ।।७।।

शास्‍त्रों की जननी । कलाओं की नलिनी ।

सुजल जल को, सुफल फल को । रुचिर रस को बनाती है ।।८।।

पुत्रवती ऐसी । सफलतम गोद भरी जिसकी ।

वसुमति सुखराशी । आज क्‍यों दासी बन बैठी है ? ९।।

सूर्यग्रहण की तो । जिंदगी क्षण की होती है ।

रवि की दीप्ति । किंतु हमेशा अमर ही रहती है ।।१०।।

शीघ्र ही हो जाएगी वह । मुक्‍ता शुभमूर्ति ।

स्‍वतंत्र होकर । विश्‍व के लिए उद्धारक बननी है ।।११।।

(लंदन, १९०९)

प्रियतम हिंदुस्‍थान

सकल जगत् की शान । मेरा प्रियतम हिंदुस्‍थान ।

केवल पंचप्राण । मेरा प्रियतम हिंदुस्‍थान ।। ध्रु. ।।

बहुत सुने हैं, देखे भी हैं, देश अन्‍य, इससे हैं सान ।

मिसर, आंग्‍ल भू, जापान, चीन हैं इससे सारे सान ।।१।।

गिरिवर गिन लो, फिर भी अद्भुत हिमगिरि धवल महान् ।

कौन नदी है श्रीगंगा-सम पावन अमृतपान ।।२।।

कस्‍तूरी-मृग-परिमल-पूरित जिसके पूरे वन ।

उषाकाल में कोकिल-कूजित अमराई गुण-खान ।।३।।

यज्ञ-धूम की गंध सुगंधित, सामवेद-स्‍वर-गान ।

सुनकर उतरे देवगण जहाँ करे सोमरस-पान ।।४।।

कालिदास के काव्‍य जहाँ औ' सांख्‍य गौतमी ज्ञान ।

म्‍लेच्‍छ विनाशक विक्रम दे दें स्‍वतंत्रता का दान ।।५।।

जिजा शिवाजी को जनम दे, गुरुपुत्रों के प्राण ।

जिसके खातिर कुमारियों का शोलों में बलिदान ।।६।।

तेरा ही जल तर्पण करके पूजे पितर महान् ।

पुण्‍यभूमि तू, पितृभूमि तू, तू मन का अभिमान ।।७।।

जननि ! जगत् में कौन कर सके तेरा अब अपमान ?

प्राण-दान को सिद्ध तुम्‍हारे त्रिदश-कोटि संतान ।।८।।

ज‍ननि ! तुम्‍हारी रक्षा करने न्‍योछावर हैं प्राण ।

शत्रुकंठ हो चीर, करेंगे तुझको शोणित-स्‍नान ।।९।।

(लंदन, १९०८)

प्रभाकर के प्रति

(परिचय : सावरकरजी का प्रथम पुत्र प्रभाकर चार वर्ष की आयु में बचपन में ही गुजर गया । यूरोप में जब यह वार्त्‍ता मिली तब उसकी स्‍मृति में उन्‍होंने यह कविता लिखी ।)

सुनकर यौवन-लतिका पर तू पहला फूल खिला ।

हे सुत, गद्गद तन स्‍नेहार्द्रा नैन हुए सजला ।।

परंतु यौवन अभिनव, तिस पर पितृत्‍व पहली बार।

अत: जग गई लज्‍जा मन में, विनय करे बेकार ।।

नवप्रसूता जननी तेरी दिखा रही थी, तो भी ।

गुरुजन-मर्यादा के कारण तुझे न देखा भी ।।

चुपके-चुपके कभी तुम्‍हारा अर्धस्‍फुट चुंबन ।

लिया, तभी सुख अनुभव करके मूँद लिये नैन ।।

प्रभाकर प्रिय, थे तुम ऐसे बहुत दिनों तक, रे !

एक कल्‍पना अमूर्त-सी, मधु-मधुर, सुखात्‍मक रे ।।१।।

शीघ्र छोड़कर गोद जननि की नन्‍हे कदमों के ।

घर में जब तुम दौड़ोगे तब देखूँ जी भर के ।।

सोच इस तरह, उत्‍सुक था मैं, तभी विदेश की ।

यात्रा करना बाध्‍य हो गया, विरह-व्‍यथा मन की ।।

माता का तू दूध पी रहा था, तब दोनों का ।

चुंबन लेकर, रास्‍ता नापा मैंने विदेश का ।।

विरह प्रीति का हो जाने पर, दु:ख बहुत हुआ ।

सच बोलूँ तो विरह तुम्‍हारा प्रतीत बहु न हुआ ।।

स्‍वदेश जैसे विदेश में भी तुम सन्निध मेरे ।

अमूर्त-सी कल्‍पना एक मधु-मधुर सुखात्‍मक रे ।।२।।

अतनु मूर्ति तव गले लगाकर सोता था मैं भी ।

हँसती थी जो, कई बार मधु-आशान्वित वह भी ।।

धर्म-कार्य-सिद्ध्यर्थ भेजकर रण में सशस्‍त्र से ।

बाल बाल-योद्धा अपने श्री गुरुजी ने जैसे ।।

हुतात्‍म होते हँसते देखे, सुकीर्ति यह सुनकर ।

मैंने भी कई बार तुम्‍हारी मूर्ति देखि स-समर ।।

एक बार यह प्रभाकर ! प्रिय ! विषम वृत्‍त आया ।

वसंत विह्वल लता वृक्ष पर तड़ि‍ताघात हुआ ।।

मृत्‍यु द्वारा तुझे हटाकर वंचित वे सब हुए ।

परंतु मैं सच कहूँ, मुझे तो आघात न कुछ हुए ।।

पहले जैसे थे तुम, वेसे अब भी प्रिय मेरे ।

अमूर्त-सी कल्‍पना एक मधु-मधुर सुखात्‍मक रे ! ।।३।।

जब तक मेरा हृद् जीवित है, ऐसे ही तुम रहो ।

पूर्वार्जित यह गेह तुम्‍हारा, प्रिय शिशु, सुखी रहो ।।

किंतु हवा ज्‍यों बरसाती है मेघ-शिला-धारा ।

सुरक्षित रहे न गेह यह भी, क्‍या होगा तेरा ?

महाराष्‍ट्र-वाक्-सुंदरी जहाँ श्री गुरु गोविंद की ।

सुंदर-मणिमय-मंदिर में नित रहे प्रेम-भक्ति ।।

तुझे गेह यह अर्पित प्रिय मम, सरस्‍वती द्वारा ।

जहाँ क्रांति की हवा न चलती अग्नि-मेघ-द्वारा ।।

रहो प्रिय शिशु, अमर सदन में, ऐसे सलील रे !

अमूर्त-सी कल्‍पना एक मधु-मधुर सुखात्‍मक रे !! ।।४।।

(लंदन, १९०९)

पश्‍चाल्‍लेख

जहाँ न करने स्‍पर्श असंभव अग्नि-मेघ-तूफान ।

वहाँ जा सके क्रांति-प्रेरित अग्नि, मेघ, तूफान ।।

(अंदमान, १९१२)

टिप्‍पणियाँ : १. श्री गुरु गोविंद सिंहजी ने ।

२. स्‍त्री-पुरुष मित्रों पर ।

३. क्रांति के तूफान में यह मेरा हृदय, यह शरीर फँस गया है । अत: तुम्‍हें रहने के लिए सुरक्षित नहीं है । परिणामत:, तुम्‍हारी स्‍मृति चिरकाल रहे, इस उद्देश्‍य से, गोविंद सिंहजी की वीरता का गौरव जिस सिखों के इतिहास में है उस इतिहास का मराठी में रचाया हुआ जो ग्रंथ मैनें लिखा, उसे मैं तुम्‍हारे नाम अर्पित कर रहा हूँ । अर्थात् वह ग्रंथ जब तक है तब तक तुम्‍हारी स्‍मृति रहेगी । इस भावना के साथ यह कविता अर्पण पत्रिका के रूप में लिखी ।

४. परंतु सावरकरजी का यह 'सिखों का इतिहास' भी जब्‍त हो गया । प्रकाशित होने से पहले ही पांडुलिपि पकड़ी गई । क्रांति की अग्नि में जो स्‍थान सुरक्षित लगा था वह भी उस अग्नि में दग्‍ध हो गया । इस आश्‍चर्य का उल्‍लेख इस 'पश्‍चाल्‍लेख' में हैं ।

हे सागर

(परिचय : 'अभिनव भारत' संस्‍था के प्रति वक्रदृष्टि हो जाने पर, अब हमारे लिए हिंदुस्‍थान लौटना असंभव हो गया है और शीघ्र ही हम पकड़े जाएँगे, ऐसा सावरकरजी ने निश्चित रूप में मान लिया । लंदन से लगभग पचास मील दूरी पर 'बायटन' के समुद्र-किनारे जब वे गए थे तब अपने लोगों की स्‍मृति होने पर उन्‍होंने यह कविता लिखी । अब यह कविता स्कूली किताबों में छपी है । कैसेट भी बने हैं । महाराष्‍ट्र में घर घर में, गाँव गाँव में यह गाई जाती है ।)

ले चल मुझको पुन: मातृ भू के स्‍थल ।

हे सागर, मन है व्‍याकुल ।

भू-माता के चरणतल-क्षालन का ।

मैंने जो नित दृश्‍य देखा ।

तुमने ही कहा, अन्‍य देश चल जाएँ ।

सृष्टि की विविध देखें

जननी-हृद् शक् करता था ।

पर तुमने वचन दिया था ।

मार्गज्ञ स्‍वयं, पृष्‍ठ इसे ढो लूँगा ।

शीघ्र ही लौट आऊँगा ।

विश्‍वास किया इन वचनों पर ।

जगदनुभव लेने था तत्‍पर ।

तव अधिक शक्‍त उद्धरता पर ।

आऊँगा मै, कहकर चला मैं चंचल ।

हे साग, मन है व्‍याकुल ।।१।।

शुक पंजर में, हिरन फँसा पाशों में ।

लो, फँसा यहाँ वैसा मैं ।

भू-विरह-व्‍यथा सहन करूँ अब कैसी ।

दश-दिशा तमोमय जैसी ।

गुण-सुमनों को इस हेतु से चुना था ।

कि उसको परिमल मिलता ।

यदि उसके ही अभ्‍युदयार्थ न शक्‍त ।

मम विद्या सारी व्‍यर्थ !

वह आम्रवृक्ष वत्‍सलता रे ।

नव कुसुम युता वह सुलता रे ।

वह बाल गुलाब की ममता रे ।

वह फूल भरा बाग हो गया धूमिल ।

हे सागर ! मन है व्‍याकुल ।।२।।

नभ-आँगन में तारे, फिर भी प्‍यारा ।

है मुझे भरत-भू-तारा ।

प्रासाद यहाँ भव्‍योत्‍तमता भारी ।

पर कुटिया माँ की प्‍यारी ।

उस बिन मुझको राज्य न वांच्छित, मन में ।

वनवास वहाँ के वन में ।

अब व्‍यर्थ भुलावा तेरा रे ।

अब आतुर मन है मेरा रे ।

सरिता से प्रेम तुम्‍हारा रे ।

सौगंध तुम्‍हें उसकी, सुन शंकाकुल ।

हे सागर ! मन है व्‍याकुल ।।३।।

है निर्दय ! तू हँसता फेन-बहाने ।

क्‍यों वचन चुराया तुमने ?

तव स्‍वामिनि बन, संप्रति है जो ऐंठे ।

उस आंग्‍ल भूमि से डरते ?

मन्‍माता को अबल समझकर छलते ।

क्‍यों कपट-कार्य ये करते ?

हे आंग्‍लभूमि-भयभीता रे ।

अबला ना मेरी माता रे ।

कर याद अगस्‍ती आता रे ।

जो अंजुलि में तुझे पी गया अध-पल ।

हे सागर ! मन है व्‍याकुल ।।४।।

(ब्रायटन, १९०९)

टिप्‍पणी : १. घर के बड़े लोग, युवक-युवतियाँ तथा बालक आदि विशेषकर सावरकरजी की भाभी, पत्‍नी और छोटे भाई ।

सांत्‍वना

(परिचय : ईसवी के १९०९ साल के जून महीने में श्री. गणेशपंत सावरकरजी को आजन्‍म कारावास-काले-पानी की सजा हो गई और जल्‍द ही आगे चलकर उनके छोटे बंधु 'बाळ' (डॉ. सावरकर) को भी बंदी बनाया गया । गणेशपंत की पत्‍नी यशोदाबाई ने ये दोनों वार्त्‍ताएँ विनायकरावजी सावरकर को विलायत में पहुँचाई । उस समय अपनी संत्रस्‍त दु:खी भाभी को उन्‍होंने जल्‍दी-जल्‍दी लिखा गया काव्‍यबद्ध पत्र सावरकर समग्र खंड एक में पृ. ६१३-६१५ पर देख सकते हैं ।)

मेरा मृत्‍यु पत्र

(परिचय : १९१० के मार्च में विनायकरावजी सावरकर विलायत में पकड़े गए । तब इस जन्‍म में जिसकी भेंट फिर से होना लगभग असंभव हो गया था ऐसी अपनी पूजनीय भाभी को अपने बंदी बनने के वृत्‍त कथन का कठोर आघात करने का कटु कर्तव्‍य निभाते-निभाते ही उसका उदात्‍त, आकर्षक, दिव्‍य मर्म अभिव्‍यक्‍त करने हेतु विनायकरावजी ने लंदन की ब्रिक्‍स्‍टन जेल से अपना इस जन्‍म का लगभग अंतिम संदेश यह मृत्‍यु पत्र लिख भेजा था । यह काव्‍यमय पत्र सावरकर समग्र खंड एक, पृ. ६१६-६१९ पर देखा जा सकता है ।)

आत्‍मबल

(परिचय : क्रांतिकारी सावरकरजी को लंदन से गिरफ्तार करके भारत लाया जा र‍हा था । तब उन्‍होंने मार्सेलिस में जहाज से निकल भागने का प्रयास किया था । इसका बदला लेने हेतु पहरेदारों से उन्‍हें अमानुष यातनाएँ दी जाने लगीं । ऐसी यातनाओं को सह लेने के धैर्य को प्राप्‍त करने के कवचमंत्र के रूप में सावरकरजी ने यह कविता लिखी । यह भी मंत्र आजकल अत्‍यंत लोकप्रिय है । अनेक स्‍थानों पर छापा जाता है । गाया जाता है ।)

अनादि मैं, अनंत मैं, अवध्‍य मैं भला ।

मार सके कौन मुझे, जगति रिपु पला ।।ध्रु.।।

करते जब अट्टहास धर्महेतु मैं ।

मृत्‍यु को पुकारता प्रविष्‍ट समर में ।।ध्रु.।।

अग्नि से अदग्‍ध मैं, अभेद्य खड्ग से ।

भाग चली मृत्‍यु शबल, भीत मुझी से ।

अनाडि शत्रु ! मृत्‍युसमेत ।

मृत्‍यु का ही भय दिखा मुझे डरा रहा ।।१।।

हिंस्र सिंह के पंजर फेंक दो मुझे ।

नम्र दास सम मेरे चरण छुएगा ।

लहलहती ज्‍वाला में फेंक दो मुझे

हटकर बन जाएगी शीत वारिगा ।

ला तेरी तोपें, ला क्रूर पलटनें ।

यंत्र-तंत्र शस्‍त्र-अस्‍त्र आग उगलता ।

हलाहल ज्‍यों । त्रिनेत्र शिव ।

वैसे मैं निगल तुम्‍हें अब खा जाता ।।२।।

पहली किश्‍त

(परिचय : १९१० साल का दिसंबर । अभियोग का निर्णय घोषित होकर फाँसी की तथा काले पानी की सजा अभियुक्‍तों को होनेवाली है । सावरकरजी को सबसे कठोरतम सजा प्राप्‍त होकर उनके स्‍वतंत्र जीवन का अंत होनेवाला है, यह जानकर उन्‍होंने अपने सहकारी देशभक्‍तों में से जो शीघ्र मुक्‍त हो जाने वाले थे, उनके हाथों अपनी मातृभूमि के लिए तथा देशबंधुओं के लिए उनके ऋण विमोचन की यह 'पहली किश्‍त' भेज दी ।)

लो मान इसे । हे जननी । लो मान इसे ।

अल्‍प स्‍वल्‍प जो । सेवा अपने अर्भक बच्‍चों से ।।ध्रु.।।

सीमा न है ऋण को । तब स्‍तनों का स्‍तन्‍य पिलकर धन्‍य किया हमको विमोचन ऋण का हो । किश्‍त प्रथम यह स्‍थंडिल में मम देह समर्पित हो, तुरंत जन्‍म पाऊँ । त्‍वन्‍मोचन हवानार्थ देह मम पुन: हवी कर दूँ ।

सारथी जिसे अभिमान । कृष्‍ण भगवान् । राम पुरश्‍चरण

है तीस करोड़ी सेना

जो हम बिन कहीं रुके ना

पर करके दुष्‍टदल दलना

स्‍वयं फहराए । स्‍वतंत्रता का ध्‍वज हिमनग पर गौरव अपनाए ।

(मुंबई, १९१०)

सप्‍तर्पि

कारागृह की प्रथमान्हिकी (पहले दिन की डायरी)

(परिचय : दो आजन्‍म कारावासों की पचास साल की भयंकर सजा वज्रलेप हो गई, ऐसी पक्‍की वार्त्‍ता जिस दिन आई, स्‍वतंत्र नागरिक के कपड़े छीनकर पुन: जनम भर में कभी न उतारने के लिए काले पानी के कपड़े उनके बदन पर पहनाए गए, तब उनकी स्थिति बिलकुल वैसी ही बन गई जैसी सती होने के लिए चिता पर अटल स्‍थान प्रस्‍थापित करने पर भी चिता प्रत्‍यक्ष रूप में भभकने पर सती को जिस तरह असली जलन महसूस होती है । विह्वलता के ऐसे विष उपाय स्‍वरूप मन जो विवेक का प्रतिविष पीने लगा तब वह भी, पीते-पीते तो विष की ही भाँति दु:सह होगा ही ! विष-प्रतिविष की उन लहरों का पहला झटका, मन में मची हुई वह विरह-विवेकों की खलबली, उन्‍होंने स्‍वयं सन् १९११ में काव्‍यबद्ध कर दी है । वही है यह कविता ।)

सप्‍तर्षियो ! इस तरह साथ तुम्‍हारे विश्‍ववाद हो जाए

क्‍या खेद है, कहीं भी जीवन मेरा समाप्‍त हो जाए ।

अँधेरी कोठरि के औ' हृद के तिमिर को हटाने को

मालाएँ सप्‍त तुम्‍हारी दे दें विश्‍वदीप्ति मुझको

रुद्राक्षों की भाँति जिसके बालों में ये मालाएँ

उस व्‍योमकेश प्रभु को अर्पित मेरी ये सब कविताएँ

आशा विफला होवे, एक हि आघात धैर्य को तोड़े ।

कच्‍चा घट है तेरा, हे मन ! मुक्‍ता कहत, सुन भगोड़े ।।१।।

गेह गेह में, पुर में, घूमत लेकर हाथों में दीप ।

जिनकी खोज करत हैं, वापस जब आवत हैं आप ।।२।।

तस्‍कर वे, अपने ही घर में निश्चिंत बने बैठे सब ।

दीप ! तुम्‍हारे नीचे पटल तिमिर का छिपा हुआ है सब ।।३।।

याद करो, तुम जग को नैष्‍काम्‍य का देत नित्‍य उपदेश ।

स्‍पृहणीय था तुम्‍हारा उत्‍साह, अदम्‍य-सा आवेश ।।४।।

हे मेरे मन ! ऐसे तुझको, मेरे ये अश्रु अब सच में ।

अपहसनीय बनाएँगे दुनिया की विषाक्‍त नजरों में ।।५।।

एक साल गुजरा है, कारागृह बन गया गेह मेरा ।

कोई मोह न मन में, विरह न करे चंचल मन मेरा ।।६।।

सोचा था, अब मेरा स्‍वभाव ही बन बया हत:काम ।

हे मन ! थी वह भ्रांति, स्‍पष्‍ट है निरुत्‍साह के नाम ।।७।।

न्‍यायालय में होगा निर्णय क्‍या, यह अनिश्चितता ।

समाप्‍त होकर, असंभव मोचन है यही सुनिश्चितता ।।८।।

सोचा नहीं इसलिए मान लिया था शमित हो गए हैं ।

न दिख पड़े इसलिए सोचा था जो विनष्‍ट हो गए हैं ।।९।।

परंतु बुझ जाते ही अनिश्चितता-रूप मार्ग-दीप ।

हमला कर आए है विकार तस्‍कर जो छिपे रहे समीप ।।१०।।

आशा ! यही फलाशा ! स्‍वार्थजनित ना, तथापि आशा ही !!

बुनत परार्थाशा भी स्‍वार्थ की तरह पाश सही ।।११।।

कदम न नौ भी लंबी, चौड़ी तो पाँच कदम नहीं है ।

जिसकी दीवारों पर भय-सम काला तारकोल पोता है ।।१२।।

खिडकी ना, जाली ना कोई, कमरा, दरार भी न कोई ।

बंदीशाला में जो कहलता एकांत-निवास सही ।।१३।।

लोहे की सलाखें तंग द्वार में, ताला दिन में भी ।

ठीक लगा के रखते, निरर्थ जैसी आँखे उल्‍लू की ।।१४।।

पास में न कोई आस-पास की कोठरि में रहत ।

बातें करने कोई मनुष्‍य न मिले, नीच भी न क्‍यों होत ।।१५।।

और जहाँ तरु-पल्‍लव एक भी कभी दिखाई न देत ।

आँगन तंग, उदास, दिखत सामने दिन में भी त्रस्‍त ।।१६।।

सूख धूप में पड़ते कैदियों के कंबल औ' टाट ।

कौए-उल्‍लू बाहर दीवारी पर बना रहे कोट ।।१७।।

मानवजाति-बहिष्‍कृत, देखत ही मन होत भयग्रस्‍त ।

राज्‍यप्राप्ति के खातिर भी जिसका नामोच्‍चरण है भयद ।।१८।।

ऐसे पापी लोगों से भी बातें करना चाहूँ, जी ।

संभाषणप्रिय होता है मानव का मनस्‍वभाव अजी ।।१९।।

संभाषण मुशकिल है यही वजह है प्रमुख यातना की ।

चड्डी औ' बंडी थी पेहनावे में भद्दी खादी की ।।२०।।

टोपी बेढ़ंगी-सी पोली थी, जो सिर ढका करती ।

छोटा कंबल काला, बिस्‍तर को कँटेरि चटाई थी ।।२१।।

स्‍नान-पान-प्रातर्विधि सबके खातिर मात्र एक ही था ।

जलपात्र, अपात्र, छोटा जो जस्‍ते का क्षुद्र बनाया था ।।२२।।

जस्‍ती पदक हमेशा सीने पर घोषित सजा करत झूले ।

चरणों में लोहे की बेड़ी दु:स्‍वन भीषण ध्‍वनि कर ले ।।२३।।

जिसकी कड़ि‍याँ कँटेरी, तीन शेर का था वजन भारी ।

खाती थी बेचारे नव-बंदियों की खाल छीलकर सारी ।।२४।।

चिपकी थी वह कटि से, कदम बढ़ाना कठिन दिन में भी ।

बदलत करवट सपने में तो डस लेत रात को भी ।।२५।।

नौ कदमों का कमरा, भोजन कर लें उसी जगह कुंडी ।

जिससे आती बदबू घ्राणेंद्रिय को रुलावत घमंडी ।।२६।।

तनु घृण्‍य ! निंद्य तनु है !'-बोध करत अवधूज ज्ञानी ।

शौचादि कर्म के लिए एक अनावृत थी चतुष्‍कोंणी ।।२७।।

खाने की मिट्टी की थाली, लँगोटि, बस औ' न कुछ भी ।

यही सब संपत्ति हमारी, इससे ज्‍यादा जरूरत न कुछ भी ।।२८।।

जितनी वाञ्छा लेकर लोग प्रयास बहुतेरे करते है ।

पाने को, वह ज्‍वर-सम श्रांत-क्षीण उस मनुष्‍य को करते है ।।२९।।

सुबह-सुबह आ पहुँचा बतलाने यह कारागृह-पति देख।

'हो गइ सजा अहा जी ! पचास सालों की पूरी ठीक' ।।३०।।

अभ्‍यास कठोर जिनका उनका भी हृदय व्‍यथित हुआ ।

लेकिन यह सुनकर भी मेरे मुख का स्मित न लुप्‍त हुआ ।।३१।।

तभी वस्‍त्र सब मेरे अपने लेकर छीन, त्‍वरित मुझको ।

देत बंदी के, तो राम-सम किया धारण मैंने उनको ।।३२।।

बार-बार तब मैंने मंत्र स्‍फूर्त्‍यर्थ याद कर लिया था ।

वर्णित रामविवासन कालिदासकृत श्‍लोक जप लिया था ।।३३।।

जब चला गया अधीक्षक छोड़ मुझे वहाँ श्रृंखलायुक्‍त ।

सहसा धारा तत्‍क्षण दु:खाश्रुओं की अदम्‍य-सी बहत ।।३४।।

साल पचास ! अहा जी ! साल पचास जी ! अहा ! अहा ! सुन लो !'

ध्‍वनि बार-बार मुझ पर बरसत जैसे बारिश ही ले लो ।।३५।।

वर्णित-राम-विवासन मंत्रजाप फिर बार-बार मैंने ।

किया, तभी पलटकर जवाब दे दिया गतधैर्या स्‍मृति ने ।।३६।।

सीता संग अविकृत ऐसे तव राम ने कर दिया था ।

सीता बिन वन व्‍याकुल, घोर करुण-सा विलाप कर लिया था ।।३७।।

अश्रु तुम्‍हारे विरह के, वृत्ति प्रीते ! क्‍या न कोमल है ?

यह शान है हृदय की, प्रीते ! तुम बिन न चाह कुछ भी है ।।३८।।

और पुन:-पुन: भी जब मैं करता रहा मना मन को ।

मुक्‍त्‍यब्‍द कौन देखे ! छोड़ न दे असंभव चाहों को ।।३९।।

यावज्‍जीव सजा भी साल सिर्फ पच्‍चीस ही रहती ।

पापकृत्‍तम को भी इससे ज्‍यादा अवैध कहलाती ।।४०।।

था सिद्ध मैं भुगतने अधिकतम सजा कड़ी इस तरह की ।

कुर्बानी अत्‍युत्‍तम जीवन के पच्‍चीस सालों की ।।४१।।

कारानल में हुत मैं तिल-तिल जैसी जला-जला देह ।

कार्य करूँ अत्‍युत्‍तम उद्धार करूँ मातृभूमि का गेह ।।४२।।

द्वीपांतर में भी जो धैर्य बढ़ाया एक ही खयाल ।

अंत-समय आ जाऊँ, मातृभूमि पर हो जाऊँ निढाल ।।४३।।

'साल पचास !' सुनकर यह भी सारी उम्‍मीद खत्‍म हुई ।

मृगजल में लहराई थी जो अंतिम लहर, समाप्‍त हुई ।।४४।।

परचक्रदुर्विलासग्रस्‍त देश जब अंधकार भरा ।

अपराध देशजागृति, परवशता का घोर नियम खरा ।।४५।।

फिर भी सजा अमानुष यावज्‍जीवन समाप्‍त हो न सके ।

चाहत हैं ये शायद, भुगत लूँ उसे पुनर्जन्‍म ले के ।।४६।।

सजा की परिसीमा की परिसीमा ! सुदुर्भगा देखो ।

सपने में भी कई शक्‍त न ऐसी कल्‍पना भी करने को ।।४७।।

दीर्घ-आयु की कीरत-कृति भी कितनी स्‍मरण करी मैंने ।

बंदीगृह में कितने महापुरुष-व्‍यक्तित्‍व याद किए मैंने ।।४८।।

अस्‍सी साल उम्र में नवरोजी हैं स्‍वराज्‍य कार्यरत ।

वह कँवरसिंह भी तो, जिसकी तेजस्विता सदा नमित ।।४९।।

व‍ह डिजरायलि उसका प्रतिपक्षी भी, सुवाक्-प्रभुवर जी ।

जो मल्‍ल जूझते थे लोकसभा की विवाद-भू पर, जी ।।५०।।

वे यदि अस्‍सी की भी उम्र में युवक-कार्य करते हैं ।

क्‍यों फिर यह निराशा मेरे मन को व्‍यर्थ घेर लेती है ।।५१।।

श्रीभाष्‍य की गूँथी पावन-वाक्-कुसुम-शुभ्र-माला भी ।

वह शुद्ध बुद्धभगवान् वीर पराभव करत भवार्णव का भी ।।५२।।

वह बुद्ध अहा ! उसकी तृष्‍णाच्‍छेदक पवित्र स्‍मृति से ही ।

आ जाती है लज्‍जा से मेरेमन की मौत सही ।।५३।।

तृष्‍णासमर्थनार्थ विवाद करे जब विमूढ-सी आशा ।

तृष्‍णाच्‍छेदक उसकी मारजित के स्‍वकीयसुख विनाशा ।।५४।।

सत्‍कार्य पिपासा भी तृष्‍णा १० ही तो है ! न सुखविलास ।

तो देशकार्य-आसक्ति विरह से भी करे मन उदास ।।५५।।

हैरान मैं हुआ जब धृति का नियम ढल गया नित्‍य ।

गति दु:सहा हुई जब स्‍वीकार करी हार स्‍वयं त्‍वरित ।।५६।।

आशा को दग्‍ध किया ! त‍भी आश्‍चर्य एक घटित हुआ ।।

आशा की रक्षा से मंजूषा का प्रदीप्‍त जन्‍म हुआ ।।५७।।

मन में उत्‍साह भरा; तरकीब चलाई कृपा महात्‍मा की ।

तुकाराम ११ की, टूटी ताले की तब मुहर अहंता की ।।५८।।

ढक्‍कन खुला निराशा का, अंदर था भरा सुखनिधान ।

सर्वोपाधि-प्रभु जो और मोक्ष का था महाविधान ।।५९।।

यह वैराग्‍य ! विराश न अनुरागों का विकास १२ ही सत्‍य ।

चिंतामणि-सम चमके ! चिद्गम्‍य मुझे महोत्‍सव ही नित्‍य ।।६०।।

बंदी पचास न साल ? पचास तो मात्र कल्‍पना है ।

आभास-काल केवल, वस्‍तुस्थिति की न चीज कोई है ।।६१।।

बंदी ? वह तो अंदर-बाहर शिव को सदैव ही जीव की ।

हावी जब तक तुम पर पंच-वृत्तियाँ तब तक न कहीं की ।।६२।।

मुक्ति प्राण्‍य तुम्‍हें, है मन कारागृह तुम्‍हारा सदैव ।

उसके बंदी हो तुम जुआ उठा लो यह भी स्‍वयमेव ।।६३।।

पर यदि कर लोगे तुम चित्‍तवृत्ति का निरोध, समता से ।

मन पर काबू करके, रख पाओगे खड्गवत् मियान से ।।64।।

हृद्गत ईश-प्रणिधानीय जानकर जनक की भाँति ।

गुण मौजूद गुणों में, मैं केवल साक्षि-रूप ज्‍योति ।।६५।।

जो सत्‍य परम शाश्‍वत वहाँ स्‍थापना मति की कर लोगे ।

उपहास अन्‍य किस्‍मों की गतिविधियों का तुम कर लोगे ।।६६।।

यदि मस्‍त हो जाओगे तुम परमानंद लेत मधुर क्रीडा ।

तो एकांतवास अथवा अँधेरी कोठरी क्‍या करे पीड़ा ।।६७।।

तुम हो अंतर्ज्‍योति ! अँधेरे में क्‍यों तुम डरते हो ?

सुख-दु:खों का साधन बाह्य न पर मन के भीतर जब हो ।।६८।।

राजगृह में क्‍या है कमी ? पकवान पाँच बनते हैं ।

प्रासाद-तल स्‍फटिक के, कलश स्‍वर्ण के बनाए होते हैं ।।६९।।

अभिमान से दमकते अनुदिन शत-समस्र प्रणामों पर ।

जिनके आदेशों का पालन करने सिद्ध सैन्‍य-दल तत्‍पर ।।७०।।

पर यदि प्रासादों के निरखोगे सूक्ष्‍म अंतरंग कभी ।

यदि तुलना कर लोगे पर्ण कुटी-स्थित महंत से भी ।।७१।।

जान सकोगे तब तुम कि बाह्य निधि में रहे न सुखधन, जी ।

रागोपहतिर्भोगान्‍नच औ' संतोष सौख्‍यसाधन, जी ।।७२।।

पकवान पाँच ही हैं, छठा नहीं, इसलिए महाराजा ।

कोई दासी अपनी साध्‍य न होती, अत: युवा राजा ।।७३।।

स्‍वर्ण-कलश हैं, पर रत्‍नों के न हैं, अत: महाराजा ।

किया न प्रणाम किसी सामंत ने, अत: युवा राजा ।।७४।।

बनूँ हाय ! कब मैं अधिराजा, इसलिए महाराजा ।

बजूँ कब महाराजा मैं ऐसी इच्‍छा करत युवा राजा ।।७५।।

दु:खी सदैव !! राजा पागल भी हो गए असंख्‍यात ।

कतिपय राजाओं ने कर लिया था स्‍वयं आत्‍मघात ।।७६।।

वह भीमसिंह१३, एलाग्‍याबूलस १४ और शाहजहाँ १५ भी ।

माधव १६ -जनमे थे ये अमीर परिवारों में ही न सभी ।।७७।।

देखो इहन चित्रों को-और देख लो चित्र तुकया का १७

नित्‍यानंद हृदय में अविचल रहता सदैव मन जिसका ।।७८।।

मैं जब था बंदी डोंगरि में १८ तब सुनी यही वार्त्‍ता ।

था सन्निध ही कोई संत-महात्‍मा कुटिया में रहता ।।७९।।

अनगिनत लोग तिष्‍ठत बंद द्वार के निकट दिन-रात ।

अंदर संत आत्‍मरत डोलत-झूमत अपने में मस्‍त ।।८०।।

परमानंद कभी जब हृद में उनके समा न जा सकत ।

संत नशे में नाचत, पैर तले कुसुम कुचल जात ।।८१।।

भावमुग्‍ध भक्‍तों ने खिड़की से जो अंदर फेंके थे ।

कुसुम वहीं पर सारे जमीन पर बस पड़े ही रहते थे ।।८२।।

बंद मठी के अंदर लोग दूर से जो कुछ फेंक देते ।

प्रात:काल वहाँ जो झाडू करने आता उसे ही मिल जाते ।।८३।।

मोती, मखमल, मेवा-ढंग से वहाँ यदि वह रख देता ।

तो- 'ले जाओ ! क्‍यों जी, कूडा-कर्कट यहीं छोड़ जाता' ।।८४।।

व्‍याकुलता से ऐसी विनती करके खाली कमरे में ।

हो जोते महात्‍मा पुन: आत्‍मरत अपनी मस्‍ती में ।।८५।।

दस साल वहीं पर वे कुटिया में बस अकेले रहे थे ।

खाते, भूखे रहते, पहनाते या विवस्‍त्र रहते थे ।।८६।।

एक भी खेत, जहाँ से न कोई मंजुल विहग, या बरखा ।

आकाश भी न दिखे, वर्ष-मास दिन नहीं होत पक्‍का ।।८७।।

जो नित्‍य तमसाच्‍छन्‍ना ऐसी मेरी कोठरी-कारा ।

एकांतवासी न उतनी अथवा उतनी न तिमिरविहारा ।।८८।।

उस कोठरि में अपरिग्रह १९ देत लाभ को एक अति श्रेष्‍ठ ।

कैवल्‍यानंदाश्रय विषयों के सुख-चैन से श्रेष्‍ठ ।।८९।।

'विषमप्‍यमृतं' 20 न 'क्‍वचित्' नित्‍य सुखद हो दु:ख विष अभीष्‍ट ।

कैवल्‍यानंदाश्रय विषयों के सुख-चैन से श्रेष्‍ठ ।।९०।।

जो सुख बाह्य विषयों पर निर्भर हो, आखिर दु:ख-प्रद ।

सुख-सत्त्व विशुद्ध वही, जो आत्‍मरतिजन्‍य देत आनंद ।।९१।।

यह सत्‍य हुआ प्रकाशित ! धृति से मन पुन: उभर आया ।

कैसा मुझे उदासी ने क्षण भर के लिए हताश किया ।।९२।।

ऐसी लज्‍जा मन को लज्जित करता तनु-भय निकल गया ।

मेरे मन ने मेरा ही पहला वह कथित याद किया ।।९३।।

कथित किया था मैंने अपने लोगों का धैर्य बढ़ाने को ।

जब सज्‍ज हुआ स्‍थंडिल में अर्पण करने अपने प्राणों को ।।९४।।

'यदि निढ़ाल हो जाएँ शत-शत मत्‍सम, भारत ना दीन ।

श्रीकृष्‍ण सारथी है जिसका रथ हाँकने स्‍वयं लीन' ।।९५।।

हे मूर्ख ! क्‍या रुकेगी पृथ्‍वी यदि तुम कारा में मरते ।

उपहास करत मेरा, मेरा ही वचन याद जब करते ।।९६।।

निश्चिंत फिर बैठा मैं, पल भर, यह देख कुपित हो करके।

नारियल छीलने को बतला गए 'नाइक' डाँट करके ।।९७।।

करने जुट गया मैं शांत मन से, श्रम जो नियत किए हैं ।

स्‍वे-स्‍वे कर्मण्‍यभिरत संसिद्धि को प्राप्‍त कर लेते हैं ।।९८।

नारियल छीलते ही छिल जाते हैं हाथ अपने भी ।

जितना नियत किया था, सोने जैसा तोल दिया फिर भी ।।९९।।

दिन ढल गया तभी, सो नियम बनाया रखा स्‍वयं मैंने ।

चित्‍तैकाग्र कर लिया, सोचा कैसे बीते छह महीने ।।१००।।

ख्‍यात विवेकानंद प्रभु ठहरे जी सुमहावितृष्‍ण के ।

शिष्‍योत्‍तम श्रीमान् भगवद् भूदेव रामकृष्‍ण जी के ।।१०१।।

जड़वादी अश्रद्धा मति का कुछ विकल्‍प असत्‍य से ।

हमको कपिल पतंजलि सूत्रित उस सुसूक्ष्‍म सत्‍यों से ।।१०२।।

जड़वास्‍तुशास्‍त्रभाषा में ही समझाया था सब उन्‍होंने ।

योग न गौप्‍य, शास्‍त्र है, बतलाया था स्‍पष्‍ट तब उन्‍होंने ।।१०३।।

इसी नियम को लेकर एकाग्रचित करने को, जी ।

नियत श्रम निपटाकर, धोकर हाथ, सिद्ध मैं बन गया, जी ।।१०४।।

योगिराज प्रभु का यह ग्रथ श्री राजयोग खोला, जी ।

शांत रस का प्‍याला दूर हटाने जी नहीं कर रहा, जी ।।१०५।।

तत्रस्‍थ समाधिस्‍था उस मुरत को प्रणाम करके, मैं ।

नासाग्र पर नजरों को स्थिर कर मन शांत कर रहा मैं ।।१०६।।

मन तो बहु चंचल है, दुर्निग्रह साधुसंतन को भी ।

जड़ जीव हम अनभ्‍यस्‍त ही, स्थिर हो न पा रहा एक पल भी ।।१७।।

प्रिय-अप्रिय जानत है, समझ न पाए विहित या हित को ।

इधर-उधर दौड़त है, भरमाते बुद्धि को, इंद्रियों को ।।१०८।।

दीवानी प्रकृति भी, मनुष्‍य ऐसा शबल-मन यदि है ।

फिर भी दुष्‍कर भूसेवाव्रति उसके काबू में आता है ।।१०९।।

कर्मयोग निष्‍काम है, एक विरासत सशक्‍त बहु मेरी ।

लेश वशंवद होती है गति उसकी चंचल बहुतेरी ।।११०।।

वह यदि यदा-तदा ही अन्‍यत्र कभी उछल जाता है ।

तो भी अंकुश लगने पर लज्‍जाहत सजग होता है ।।१११।।

धीरे-धीरे जब मन ध्‍यानस्‍थ बन वृत्तिविलय होता है ।

तब सुखद आत्‍मरति का प्रसाद उसको प्राप्‍त होता ।११२।।

मोहक-मोहक बहते शांत रस के झरने तब दिल में ।

कैवल्‍यामूत निधि के तुषार उड़ते ध्‍यान मुद्रा में ।।११३।।

तिल भर प्रसाद प्रभु जी ! पर्याप्‍त मुझे त्‍वदीय चरणों का ।

यदि शीतल करता है पल भर में भी त्रिताप शरणों का ।।१४।।

होगा अवश्‍य वह तो अधरामृतपान तव कर आए ।

हे केवल ! कैवल्‍यानंदरूप जलस्रोत में नहाए ।।११५।।

बंदी पुन: पुनरपि 'कस्‍मै देवाय' कहत ! वही भाव ।

लाभ-हेतु-स्‍तवार्हा सद्गुरु के यह चित्‍त लुब्‍ध हो जाए ।।११६।।

श्रीरामकृष्‍ण जैसे सुनकर जड़वाद दिव्‍य हेतुओं का ।

मोक्षार्थ ही अश्रद्ध के, सत्‍यार्थ यदि तर्क केतुओं का ।।११७।।

अन्‍वर्थ नरेंद्र का जो 'ईश्‍वर नहीं है' कहत 'कहो; वरना ।

आस्तिक सत्‍य, फिर भी मुझको प्रत्‍यक्ष प्रभु दिखा देना ।' ।।११८।।

हँसकर बोले,'बाल ! तुरंत देखोगे तुम ईश्‍वर को ।

लो यह स्‍पर्श स्‍वीकारो, केवल सनना न व्‍यर्थ बातों को' ।।११९।।

केवल स्‍पर्शमात्र से वैसे प्रभु को दिखा सकेगा जो ।

ऐसा गुरु यदि मुझको मिल जाए तो परम भाग्‍य समझो ।।१२०।।

सकल गुरुओं के गुरु भगवान् श्रीकृष्‍ण ने स्‍वयं बतलाई ।

अमृता अमृत जैसी धर्मक्षीराब्धि से निकल आई ।।१२१।।

भिन्‍नमता लगती है यद्यपि बहु भिन्‍न-दिक् प्रवाहों से ।

रस-वाहिनी धरा पर, लगता निष्‍ठुर विरोध भी इससे ।।१२२।।

दूरी शत-शत कोसों की अपने पंथ के ही अनुसार ।

पर अचलाधिप शिखर पर, निश्‍चल कुछ पल रहते हैं सुस्थिर ।।१२३।।

विस्‍तीर्ण आसमंतात् पृथ्‍वी का चित्रपट अशेषतया ।

निहारता है जो भी विरोध कोई लगता न तनिक नया ।।१२४।।

करके द्यौ स्‍तन के पय का प्राशन फिर विभिन्‍न मार्गों से ।

प्रभुनियत कर्म करें जब शस्‍य-सुफल-जल-फूल-गानों से ।।१२५।।

विभिन्‍न याग्‍यों भोग्‍यों से करके बहु रंजन स्‍वदेश का ।

अंतिम एक ही समिंदर होता है प्रिय सबही नदियों का ।।१२६।।

ज्ञान-भक्ति-कर्मादिक विभिन्‍न मत उसी तरह होते हैं ।

जिसको उचित लगे उसके खातिर वही सुनिश्चित है ।।१२७।।

जिसकी स्‍वर्णप्रभा से जीवों का उद्धरण होता है ।

ऐसी 'भगवद्गीता' पढ़ने को जी सदैव चाहत है ।।१२८।।

छाँव शाम की आवत पढ़ना मुश्किल हुआ, न दिख पाया ।

फिर जो मानव-तनु को लेकर वेकुंठ सिधर पाया २१ ।।१२९।।

ऐसे तुकया के मधु-भक्ति-रसान्वित अभंग२२गाने को ।

प्रारंभ किया मैंने, साथ-साथ ही चहलकदमी को ।।१३०।।

बाँहों में, पाँवों में, जो थी बेड़ी उसी की ध्‍वनि को ।

ताल बनाकर गाया मैंने कतिपय सुंदर भजनों को ।।१३१।।

रात शुरू होते ही मंदिर से शुभ प्रभु दर्शन करके ।

महिलाएँ घर अपने लौट, जलाती हैं शोले चूल्‍हों के ।।१३२।।

हाथों में लेती है जब जूही-से चावल-दानों को ।

करती है याद अपने हँसमुख शिशु के कोमल दाँतों को ।।१३३।।

गुनगुनाति गीतों को, जल्‍दी-जल्‍दी चावल पकने को ।

रखकर अभी उन्‍होंने पहन लिया हो न धूत वस्‍त्रों को ।।१३४।।

ऐसी शाम की वेला रात में जो पूर्ण न घुल जाए ।

निर्दीपा एकांते सभी तरफ घन-तिमिर भरी छाए ।।१३५।।

प्रसृत कर किरणों को, मुझको केवल दिखा रहा तम को ।

आसन्‍नमरण नाड़ी जैसी निस्‍तेज चमक है जिसको ।।१३६।।

अपने बीच ही रहता, जिसको देख घूक भी न डरता है ।

टिमटिमाता एक ही लालटेन कुछ दूर जल रहा है ।।१३७।।

द्वार निकट आ बैठा, लोहे की थीं जिसे सख्‍त सलाखें ।

आई हँसी मुझे, जब अँधेरे को घूरने लगीं आँखे ।।१३८।।

दृक्शून्‍य तिमिर के भीतर नैनों को भी क्‍या दिख रहा था ?

जो धर्म इंद्रियों का, उसका केवल पालन हो रहा था ।।१३९।।

देखी मैंने सहसा तेजस्‍वी कुछ चमक अंधुक-सी ।

झुककर देखा फिर से तो चमकी एक तारका जैसी ।।१४०।।

ज्‍योतिर्विद जिस रीति निहारते हैं व्‍योम निरंतर जी ।

सौ बार यत्‍न करके खोज कर लेत नभोगण, जी ।।१४१।।

बाएँ, दहिने, फिर से झुककर, ऊपर, और खींचकर जी ।

नलिका सु-दर्शन-क्षम करने की कोशिश करते, जी ।।१४२।।

मैने गरदन वैसी सौ बार उन्‍हीं सलाखों सहित ।

टेढ़ी करके देखा, पर वह अटकी रहती थी सीमित ।।१४३।।

जिस दरार से देखी चमक जहाँ से, उसी निशाने में ।

नीचे मरोड़ बैठे फर्श पर, रखे हाथ सलाखों में ।।१४४।।

ऊर्ध्‍वमुखाकुंचित तनु, प्रभु के सम्‍मुख भक्‍त नमन करता-सा ।

कोठरि से नभ दिख दे स्‍पष्‍ट रूप, जो कोन बनाया ऐसा ।।१४५।।

टुकड़ा नभ का छोटा दृश्‍य यहाँ से, लेकिन संगम जी ।

सप्‍तर्षियों की मालाओं के उसमें देख, सोचा जी ।।१४६।।

विराजत विरल ही तारक नील गगन का टुकड़ा, लगता है ।

देवी अनंतता की चुनरी का पल्‍लो दिखता है ।।१४७।।

भास्‍वान् कहलाते हो, हे भानो ! विश्‍वचक्षु शोभत हो ।

अपने तेजोबल से हमें सृष्टि का परिचय देते हो ।।१४८।।

दृश्‍य अशेष धरित्री पर ! जब ढूँढ़ती उषा युवती ।

आते हो पूर्व दिशा में भास्‍कर ! तुम, तुरंत तेजव्रती ।।१४९।।

प्रत्‍येक कीट, चींटी, मशक, रज:कण सूक्ष्‍म जो भी हैं ।

बनते दृग्‍गोचर, जब तेज तुम्‍हारा उन्‍हें दिखाता है ।।१५०।।

संशय किमपि तथापि छिपा रहे हो समस्र तुम जैसे ।

ब्रह्मांड मनुष्‍यों की नजरों से, अपनी इच्‍छा से ।।१५१।।

अकृत्रिम कृतज्ञ पूर्वज दिवस जब कभी समाप्‍त होता है ।

रात अनंतर आती, तब सबकुछ और दिखता है ।।१५२।।

दिखाकर एक ग्रह को, छुपा रहा है शायद बहुतों को ।

जो श्रीकृष्‍ण मुख सम दिखाकर विश्‍वरूप भक्‍तों को ।।१५३।।

कौन यथार्थ तिमिस्र !जिसको दृक्साफल्‍य दान करते हो ?

सुनहरी तुम जैसी या दिव्‍य श्‍यामल कांति छिपाते हो ।।१५४।।

संशय है मन में जो, दिनकर ! कब उगता है सच्‍चा जी ।

उदयोत्‍तर या अस्‍तोत्‍तर तुम्‍हारे दिन खरा है जी ।।१५५।।

तुच्‍छ उपग्रह जो है स्वयमपि परभुक्‍त धरती का ।

दौड़त दिन-रात उसी के चक्‍कर में, दास है दासी का ।।१५६।।

उच्छिष्‍ट सूर्यकिरण को चुरावत है भूमि की दया पर, जी ।

शान दिखावत है फिर अपना सिंत छत्र उठाकर, जी ।।१५७।।

निर्जीवन नीरस निस्‍तेज कलंकित तनु है यह जिसकी ।

ऐसे शशि को कहते हैं 'तारापति !', पर अनंत आभा की ।।१५८।।

दुनियाएँ सात आप जो, सप्‍तर्षियो, आपको भी 'तारे' ।

कहते हैं, ऐसे ही बुद्ध्यंधों के नगर में नजारे ।।१५९।।

क्षुद्र धरा पर स्थित मैं अत्‍यंत क्षुद्र एक कीटक हूँ ।

निरखत आपके वदनों को जो एकाग्र यहाँ बैठा हूँ ।।१६०।।

क्‍या देख रहे हैं आप ? अन्‍यथा किरणों के घोड़े ।

ऐसे दौड़ा कर ही आपने पहरे ये तोड़े ।।१६१।।

कोई न मदद कर सके, मुझसे ना कोई बात करे ।

मेरे जलते दिल को सहानुभूति का स्‍पर्श न कोई करे ।।१६२।।

दीवारें दीवारों पर, ताले तालों पर भी लगते हैं ।

भरमाकर सबको ही आप इस तरह आकर मिलते हैं ।।१६३।।

ऋषियोग्‍य ऋषीश्‍वर जी ! उपकृत हूँ मैं, कितने गुण गाऊँ ।

दीनदयालु हैं जी आप, आपकी महिमा मैं गाऊँ ।।१६४।।

बंदी में देख मुझे क्‍या दिल आपका दुखावत है ?

दिल व्‍याकुल होता है, ऐसी क्‍या आपकी भावना है ।।१६५।।

अथवा बहत हवा है, ढोती है सुगंध सुमनों की ।

निरपेक्ष भला करना अथवा है वृत्ति सुमनों की ।।१६६।।

वैसे क्‍या अनजाने, अथवा पूरे ज्ञान के ही साथ ।

हित करते है जग का जलकर आप अग्नि में सात ।।१६७।।

सप्‍त अग्नि में जलकर क्‍या स्‍वर्ग में साध्‍य कर रहे हैं ?

अथवा ब्रह्मचर्य के पालन में कोई उपाधि नहीं है ।।१६८।।

फिर भी रविमाला यह जैसे तम को दूर करती है ।

किसके तम को आपकी मालाएँ सात दूर करती हैं ।।१६९।।

अथवा ऋषियों जैसे प्राचीन आप भी ऋषि होकर भी ।

भोग रहे हैं स्‍त्री का आलिंगन सुख गृहस्‍थ रूप सभी ।।१७०।।

पांडव जैसे आप भी क्‍या भोगत हैं एक ही ललना ?

या हरेक की इक राम सम सती अलग है ललना ।।१७१।।

जिसकी एक पत्‍नी २३ यात्री उसकी समुद्र रशना को ।

छूकर गर्भस्‍थापन करता है, न अन्‍य ललना को ।।१७२।।

सद्धर्मभीरु भास्‍कर इस व्रत का करता है पालन, जी ।

आपकी एक ही पत्‍नी, सप्‍तर्षियो, वैसा न कोई, जी ।।१७३।।

यद्यपि संयमशील है, अनेक स्त्रियाँ क्‍यों आशिक उस पर ?

क्‍या आपके यहाँ भी अनेक पृथ्वियाँ आशिक सूरज पर ।।१७४।।

क्‍या सेतु विमानों का उस पृथ्‍वी पर बनाया गया है ?

जैसे प्रेम के लिए, विजय के लिए, राम जाता है ।।१७५।।

क्‍या मोर वहाँ भी हैं रंगबिरंगी कलाप फैला के ।

नाच करत ?क्‍या वन हैं कुंजों से भरे लताओं के ।।१७६।।

क्‍या मृगजल के पीछे हिरन मनोहर ऐसे धावत हैं ?

क्‍या मानव वहाँ के ऐसे ही बहु सुखानुगामी हैं ।।१७७।।

विद्युत्‍शास्‍त्रविद्या जानत हैं क्‍या लोग वहाँ के भी ?

सागर में क्‍या तैरत हैं ऐसी बाष्‍प-नौका भी ।।१७८।।

अथवा उन लोगों की क्‍या गति विज्ञान में हमसे है ?

क्‍या उनके बच्‍चे भी बादल तक विमान ले जाते हैं ।।१७९।।

रस, रूप, गंध, शब्‍द, स्‍पर्श आदि का अनुभव करते हैं ?

क्‍या ऐसे हम जैसे मानव उस भू पर रहते हैं ।।१८०।।

उत्‍क्रांति‍गति से अथवा जो इंद्रियरस अनुभव करते हैं ।

इन पाँचो से ज्‍यादा, जो बिखरे यत्रतत्र होते हैं ।।१८१।।

हम न जानते हैं, लेकिन जो भी इन्‍हें जानते हैं ।

रहस्‍थ सृष्टि के सारे, क्‍या वे मानव वहाँ उपस्थित हैं ।।१८२।।

सूर्य से हमारी पृथ्‍वी जितनी दूर है, न उतनी ।

मंगल समीप जितनासूर्य के समीप भी न उतनी ।।१८३।।

ऐसी धरा आपकी क्‍या दोनों के बीच भ्रमती है ?

क्‍या विशिष्‍ट गर्भ तेजस्‍वी वह आपसे धारण करती है ।।१८४।।

अश्रुत, अतर्क्‍य, अद्भुत, उत्‍क्रांति क्रम धारण करता है ।

क्‍या विश्‍व आपका पूरा आमूलात् भिन्‍न होता है ।।१८५।।

विमानमय बनवा दो आसमान में लीलापुर कोई ।'

बाजी लगा रही जो ललना उसको प्राप्‍त करे कोई ।।१८६।।

पवनाकर्षित सत्‍वाहारी२४जब वे जीव सब बनते ।

विलुप्‍तहत्‍या होकर भू-जल-गगन-भूतमात्र रमते ।।१८७।।

करके संगठन भी एक राष्‍ट्र में एकराट् प्रभु जी के ।

भूतदया प्राप्‍त्‍यर्थे सभा बना के मंदिर में विभु के ।।१८८।।

मृग, मत्‍स्‍य, सिंह, मूषक, नाग, वान, श्‍येन, चटक या नर भी ।

ना पंजों के जरिए, पंचों से करत निर्णय सभी ।।१८९।।

मंजुलता के साथ ही क्‍या संगीत वहाँ सुगंधमय भी है ?

अथवा चंदनवन में क्‍या गंधित गीत खिलते हैं ।।१९०।।

क्‍या गुलाब बोल सके ? अथवा खिलते गुलाब मनुजों पर ?

बताइए सप्‍तर्षियो ! क्‍या-क्‍या अद्भुत चीज है वहाँ पर ? ।।१९१।।

यज्ञोय अश्‍व जैसा रण में अधृत वैसी नभी में है ।

कितनों को चकमा के किरण यहाँ पहुँच पाई है ।।१९२।।

किरण आपकी ऋषियों, निकली थी कब आपके यहाँ से ?

मैंने जब देखी तब आभा उसकी विलुप्‍त ही यहाँ से ।।१९३।।

अति तेज दौड़ने वाले घोड़े चुनकर वायु के सु-तेज ।

दौड़ाने अति तेज ही पीठ पर वनरूप लगाए तेज ।।१९४।।

चाबुक हजार-फल का, मारा पूरा जोर से तडाड ।

फिर भी जिनकी तुलना में बेचारे मच्‍छर या काड ।।१९५।।

ऐसी भी घोड़ों को, सम्‍तमुखों को, हे प्रकाश ! तुम छोडें ।

बिलकुल पानी पीने को भी समय न गँवा तेज दौड़े ।।१९६।।

पल में पार करेंगे लक्ष-लक्ष कोस भी यदि बेचारे ।

फिर भी शत-शत वर्षों तक पहुँच न पाएँगे वे सारे ।।१९७।।

ऐसे नभ के प्रांगण में तप करते पीकर आतप, जी ।

हे सप्‍तर्षियो ! तुम्‍हारी तरह कभी अन्‍य ॠषि न तपते, जी ।।१९८।।

फिर जो प्रत्‍यावर्तित सदियों पूर्व प्रकाश धरती का ।

वह आज ही अहा ! उन तारों पर स्थित है, निश्‍चय पक्‍का ।।१९९।।

यदि होगा, छायालिपि का तुम ॠषियो ! प्रयोग कर देखो ।

जो उन किरणों से देख सकेगी तत्‍कालिन पृथ्‍वी को ।।२००।।

हड्डियाँ ढूँढ़कर खोदकर जमीन और शुष्‍क नदियाँ ।

भग्‍नसेतु, चट्टानें, करत इकट्ठा फटी-टूटी चिट्ठियाँ ।।२०१।।

ये इतिहासान्‍वेषक पागल क्‍यों कष्‍ट उठाते हैं ?

तर्क-वितर्को को लेकर सत्‍य को चिनष्‍ट कर देते हैं ।।२०२।।

होते हुए बहुत ही उत्‍तम सा यह उपाय, छोड़ उसको ।

सुविधा अद्भुत सीधी दिखा सके जो समक्ष घटना को ।।२०३।।

प्रत्‍यक्ष दिखाएगी, जैसे झाँकी तत्रस्‍थ घटनाओं की ।

अनुमान बनाने के लिए जरूरत नहीं घट-पटों की ।।२०४।।

केवल विमान तत्‍क्षम२५लेकर भरते उड़ान आप सभी ।

बीच वायुमंडल के, अथवा उसके परे शून्‍य में भी ।।२०५।।

केवल यदि सपरिवार भी निकलेंगे आप जनहितार्थ।

अयुताब्‍दलभ्‍य तारों तक पहुँचेंगे पथज तनुज के साथ ।।२०६।।

तो प्रत्‍यक्ष देख ही लो कैसे झाँसी वाली रानी ने ।

कैसे युद्ध स्‍वधर्म का किया युद्ध-कुशल लक्ष्‍मी ने ।।२०७।।

दूरस्‍थ उसी से भी तारों से तुम स्‍वयं देख लो, जी ।

पाषाण द्रवित हो जाएँ ऐसी सुन लो भूप-विनति, जी ।।२०८।।

'दो बंधु ! दान जीवन दे दो !' ना सुनते हाय ! प्रखर-सी ।

लालच के कारण ही भारत बंधु को, बात यह कैसी ।।२०९।।

वह मारे, जो श्रीमान् भारत नृपधर्म मूर्त प्रकट हुआ ।

सुश्‍लोक राजयोगी योगीराजा अशोक २६ सिद्ध हुआ ।।२१०।।

निर्मल हिमशीतल यद्वचनों से चित्‍त‍ सुशांत बने ।

भेजे ईश्‍वर जिसको, ऐसा वह देवदूत ही बने ।।२११।।

उस शांत-दांत-भगवद्-यश-पावन ईसा के चरणों को ।

करके उस महात्‍मा का पुनरुत्‍थान स्‍वयं पुन: देखो ।।२१२।।

जब तक मानव जीते हैं जग में इस, तब तक यश जिसको ।

देखो गाते अपना रचा इलियड स्‍वयं ही होमर को ।।२१३।।

माक्षिक २७ देशे जाकर सचमुच क्‍या भारतीय रहते हैं ।

श्रीरामचरण कमले क्‍या उस देश के भ्रमर रमते हैं ।।२१४।।

बीस सहस्र वर्षों की गणना कर, उसकी किरण अभी ।

होगी किन तारों के जग में प्रस्‍तुत सोचकर सभी ।।२१५।।

उन तारों के ऊपर जाकर फिर देख लो तसल्‍ली से ।

पावन आर्यभूमि में आर्यर्षि लोग रहत थे कब से ।।२१६।।

क्‍या उत्‍तरीय ध्रुव में देवासुर बार-बार लड़ते थे ?

मंथन करते ? पर तुम मोहिनि के रूप में न बनो रमते ।।२१७।।

क्‍या वह हिमनिधि २८ अथवा वह हिमकर था मूल लोक पितरों का ?

प्रभव-प्रलय भी देखो, जीवाणुओं २९ तथा हि अन्‍यों का ।।२१८।।

अन्‍यों का अर्थात् जो भौमिक थे ! न संभव सभी का ।

विश्‍वेतिहास-लिप्‍से ! तुम्‍हें शाप है अकाट्य विकलता का ।।२१९।।

कल्‍पविमानों में भी तुम तारों की सीढ़ि‍याँ बनाकर भी ।

जाओगी ऊँचाई पर ढूँढ़ती हुई दूर कितनी भी ।।२२०।।

इतिहास-पृष्‍ठ पहला मिलेगा कभी न देखने तुझको ।

'आरंभ दूसरे पन्‍ने से' है यह अभिशाप सदा इसको ।।२२१।।

फिर जो कह डालेंगे कहते हैं जो मनचाही बातें ।

इतिहास-कथन ना ! उपहास-कथाएँ लोग सब रचाते ।।२२२।।

जैसेकि विश्‍व में तुम जैसे पहले अनंत ये बनाए ।

तारे प्रभु ने रंजन करने मानव का सभी बनाए ।।२२३।।

मृग-मत्‍स्‍य बनाए क्‍योंकि हम उनको जब चाहें तब खा लें ।

फिर क्‍यों शेर बनाए, क्‍या इसलिए कि वे हमें खा लें ।।२२४।।

विस्‍तीर्ण बने सागर नमक-भरे, जो हमें नमक देने ।

ऊँचे पहाड़ औ' शीघ्रगती नदियाँ, जंगल घने ।।२२५।।

कोशिश करते सारे कि हम उनका भोग करें सदय ।

हम-बिन सृष्टि व्‍यर्थ ! हो जाएगा शीघ्र तभी प्रलय ।।२२६।।

चमगादड़ जैसे पैरों को उल्‍टे लटकाकर अपने पर ।

सोचत है मेरे पग ही तोल रहे हैं यह सारा अंबर ।।२२७।।

अपनी महानता के मोहजाल में वैसे फँसते हैं ।

किंवदंतियों को धर्मकथा मान जो मूर्ख बैठे हैं ।।२२८।।

वे न देखते हैं, भू को यदि पापी किसी दुष्‍टता से ।

पकड़ कुचल भी डाला गया धधकते पुच्‍छल तारे से ।।२२९।।

तो इस विश्‍वगोल में उतना भी ना घाटा हो जाए ।

जितना खो जाने पर एक मशक, पक्षिकुल में हो पाए ।।२३०।।

हम क्‍या हैं ! जिसको अचला विश्‍वंभरा स्थिरा धरती ।

कहते हैं उसकी यह हीन दशा ! फिर क्‍या सूर्य की स्थिति ? ।।२३१।।

यह सूर्य हमारा, जिसकी सुभगा त्रिविक्रम ख्‍याति ।

जिसकी वेदों ने भी पूजा करके उतार दी आरती ।।२३२।।

वे नारायण महान् ? पर बस नभ में जो दिखती है, जी ।

यह दिव्‍य वियद्गंगा, उसके उड़ते तुषार हैं ये, जी ।।२३३।।

जिसकी गणना करते-करते ॠषियो ! होत बधिर मति ।

ऐसी दूरी पर जो अभी विराजत है आपकी स्थिति ।।२३४।।

वहाँ यदि तुम पर भी जो दूरबीन को लगा दिया जाए ।

ज्‍योतिर्विद वहाँ भी गिनती में फिर से लग जाएँ ।।२३५।।

इतनी दूरी पर भी, पुनरपि और दूरी पर भी ।

होंगे उनको दिखनेवाले कतिपय तारे कितने‍ भी ।।२३६।

उससे ऊपर ? ऊपर ? हे प्रभु ! ढालकर दिव्‍य हेम जल ।

एक पर एक ऐसे कितने तुमने बना दिए अतल ।।२३७।।

अनगिनत होने पर, अंतिम जो है, उसके ऊपर भी ?

नैन मूँदकर पूछत-पूछत, ना समाप्‍त प्रश्‍न कभी ।।२३८।।

विश्‍वस्थिति सीमा का जब हो जाए विस्मित-सी मति पर ।

संस्‍कार असीम, यदि उसे सीमित माना काव्‍यकृतियों पर ।।२३९।।

तो किमपि तदर्थक यह मिल जाए शब्‍द एक हताश तदा ।

अनंत ! अनंत !! अनंत !!! कहते जाएँ अनंत ही शतधा ।।२४०।।

वल्‍मीक तुच्‍छ भू का, मानव हैं चीटियाँ यहाँ क्षुद्र ।

तुच्‍छतम होकर भी रहते हैं खुश अपने वैभव पर ।।२४१।।

क्षणिक, क्षुद्र कितने ! आशा, हर्षोल्‍लास, शोक हमरे ।

बूझेंगे इक दिन ये ॠषियो ! सूरज सात भी तुम्‍हारे ।।२४२।।

प्राणप्रिय प्रियतम को मारते देख अंतिम क्षण में ।

अथवा योगयुक्‍त बन भगवद्गीता‍र्थ सोचते मन में ।।२४३।।

उपरति ना बन पाए यदि मन में, मान लो, किसी जन के ।

आशा की बातों से ऊब न जाए हृदय भग्‍न होके ।।२४४।।

आश्‍चर्य न होता है कदापि मुझको; पर इसपर होता है ।

कि जिन्‍होंने ज्‍यातिर्विधा के मत पूर्ण रट लिये हैं ।।२४५।।

जो विश्‍वदर्शनों के आदी हैं रोज, वे विचारक भी ।

संसार-जाल में फँसते हैं कीटक-से ज्‍योतिर्विद भी सभी ।।२४६।।

ना ये तारे ! ना वे वेद ! दिव्‍य ये प्रखर अक्षर सभी ।

दिशारूप ३८ पत्रों पर प्रकट हुए अपौरुषेय अभी ।।२४७।।

हे दिव्‍य वेद-रूपो ! अर्थ-स्‍फुरण क्‍या होता है तुमको ?

अथवा नरसंवेदनशीलता सदा हेत अर्थ तुमको ।।२४८।।

क्‍या फिर मगज पिंड में ब्रह्मांड का लय तेजरूप अनंत ?

अंत ३१ मन में उसका जिसको यह मन मान ले अनंत ।।२४९।।

नैन बिना न सूरज, तो फिर सूरज बिना नैन कैसे ?

बीजवृक्ष की पहेली सुलझाएँगे फिर कभी, न ऐसे ।।२५०।।

यक तेजोमय सागर बन जाएँगे क्रमश: पेयों के ।

पृथ्‍वी, प्राणी, मानव संज्ञावत् वा स्‍वयं हि धेयों के ।।२५१।।

हम मनुजों की यह पार्थिवता जूझती विकारों से ।

तेजोमय राशि न क्‍यों बन जाए व्‍युत्‍क्रम कोटि से ।।२५२।।

तुम जैसों का हममें, हम जैसों का तुममें भी रूप ।

रूप-द्वैत मिटा के प्रकट होत है सत्त्व एकरूप ।।२५३।।

सप्‍तर्षियो ! इस तरह साथ तुम्‍हारे तत्त्ववाद हो जाए ।

यह बाष्‍पबिंदु मेरा विश्‍वसिंधु में विलुप्‍त हो जाए ।।२५४।।

वसंत ॠतु में बीतें दिन वैसी बीती रात कारा की ।

आज्ञा अब दी जाएगी पहरा ३२ बदलते ही सोने की ।।२५५।।

अंधेरी कोठरि के औ' हृद् के तिमिर को हटाने को ।

मालाएँ सप्‍त तुम्हारी दे दें विश्‍व‍दीप्ति मुझको ।।२५६।।

रुद्राक्षों की भाँति जिसके बालों में ये मालाएँ ।

उस व्‍योमकेशप्रभु को अर्पित मेरी ये सब कविताएँ ।।२५७।।

(रचनाकाल, १९११)

टिप्‍पणियाँ : १. संत मुक्‍ताबाई, अथात् संत ज्ञानेश्‍वर की छोटी बहन । बालभक्‍त नामदेवजी ज्ञान के बिना केवल ईश्‍वर की सगुण भक्ति संतुष्‍ट थे, तब मुक्‍ताबाई ने उन्‍हें 'कच्‍चा घट' कहा था ।

२. 'दधतो मंगलक्षौमे वसानस्‍य च वष्‍कले । दह्शुर्विस्मितास्‍तस्‍य मुखरागं समं जना: ।।' - कालिदास

३. 'आजीवन कारावास' अथवा 'उम्र कैद' का मतलब था पच्‍चीस सालों का कारावास । परंतु दो उम्र कैदें गिनकर पचास साल का काला पानी जैसी सजा उस समय भी एक अश्रुतपूर्व बात थी । सजा की परिसीमा उम्र कैद । परंतु यह थी उम्रकैद पर और उम्र कैद । परिसीमा की परिसीमा ।

४. दादाभाई नौरोजी ।

५. सन् १८५७ के क्रांतिशुद्ध के स्‍वतंत्रतावीर राज कुँवरसिंहजी अस्‍सी साल के होते हुए भी अतुल वीरता के साथ लड़े । अनेक रणों में विजय पाकर समरांगण में धराशायी हुए ।

६. डिजरायली ।

७. उनके प्रत्‍याशी ग्‍लैंडस्‍टन ।

८. श्रीरामानुज अस्‍सी साल की आयु में प्रचार कार्य करते थे ।

९. भगवान् गौतम बुद्ध । ये भी अस्‍सी साल जिए । उसी तरह मैं भी जीऊँगा तथा यह पचास सालों की सजा भुगतकर मातृभूमि में देहत्‍याग करने के लिए ही क्‍यों न हो, लौट जाऊँगा, यह भावार्थ ।

१०. समर्थ रामदास कहते है,'स्‍वार्थ तो चला गया, पर परमार्थ की उपाधि चिपक गई ।'

११. संत तुकाराम ।

१२. अनुरागों का विनाश असल में विद्वेषयुक्‍त है । सच्‍चा वैराग्‍य अनुरागों का विकास ही है ।

१३. राजपूत राणा, जो पागल बना और मर गया ।

१४. रोम का पातशाह ।

१५. मुगल सम्राट् ।

१६. सवाई माधवराव पेशवा, जिसने अपनी ही हवेली में छज्‍जे से छलाँग लगाकर आत्‍महत्‍या कर ली ।

१७. संत तुकाराम ।

१८. मुंबई की डोंगरी जेल ।

१९. 'अपरिग्रह प्रतिष्‍ठायाम् सर्वरत्‍नोपलाभ: ।' - योगसूत्र

२०. 'विषमप्‍यमृतं क्‍वचिद् भवेदमृतं वा विषमीश्‍वरेच्‍छया ।' -कालिदास

२१. संत तुकाराम सदेह वैकुंठ गए, ऐसी जनश्रुति है ।

२२. मराठी संत कवियों ने अपने अनुभवों को ग्रंथित करने हेतु निर्मित काव्‍यविशेष ।

२३. सूर्य की पत्‍नी पृथ्‍वी । वही उसकी समुद्र रशना को अपने कर से स्‍पर्श करके उसके भीतर भूतमात्र का गर्भ स्‍थापित करता है ।

२४. वायु से तत्त्व आकृष्‍ट करके उसी का आहार करनेवाले ।

२५. उस कार्य के लिए सक्षम, अर्थात् सप्‍तर्षि तक तथा आगे भी उड़ान भरनेवाला विभाग ।

२६. देखो, क्‍या यह बात सच है कि अशोक ने अपने भाई का वध किया ?

२७. मक्सिको देश में हिंदुओं निवासों को देखो । कहते हैं कि इन बस्तियों में रामलीला के महोत्‍सव मनाए जाते थे । देखो, क्‍या यह सच है ।

२८. हिमनिधि : हिमरूप उत्‍तर ध्रुवीय समुद्र ।

२९. मनुष्‍यों के प्रभाव की खोज करते-करते मूल जीवणुओं की मूल उत्‍पत्ति तक सबकुछ देख लो ।

३०. दिशारूप पत्रों पर नक्षत्र रूप चाँदी के अक्षर सच्‍चे अपौरुषेय वेदों को प्रकट करते हैं ।

३१. तो क्‍या जब तक मन है तब तक विश्‍व है ? क्‍या मन के बाहर यह सारा विश्‍व नहीं हैं ?

३२. जेल में रात को ज्‍यादा देर तक जागने नहीं देते । जब पहरा बदला जाता है तब सोना अनिवार्य होता है ।

चंदामामा चंदामामा ! थक गए क्‍या ?

(परिचय : अंदमान के कारागृह में कमरे बदलते-बदलते एक बार सावरकरजी का वास्‍तव्‍य ऐसे कमरे में रहा कि रात को चंद्रलेखा दिख सके । बहुत दिनों के बाद सहसा ही चंद्रलेखा देखकर जो मन-ही-मन हर्ष हो गया, उसके नशे में चंद्रमा को निरखते हुए वे निश्चिंत रूप में कितनी देर तक छोटे कंबल पर लेटे रहे थे । उस समय, बचपन में घर में तथा ननिहाल में चाँदनी में बचपन का वह ' चंदामामा-चंदमामा' का गीत गाते हुए जो खेल उन्‍होंने खेले ‍थे, उनकी नन्‍हीं याद उन्‍हें आने लगी । कितनी देर तक उस अकेलेपन के बीच यह 'चंदामामा-चंदामामा' को बचपन वाला गीत गुनगुनाते हुए कारागृह की भीषण रात्रि में जो क्षणिक मनोरमता महसूस हुई, उसी को इस गीत में गाया है ।)

: १ :

जेल में तब मै वैसा । स्‍वर्ग में मिलत सुख जैसा ।

शाम को बंदियों को वे । कोठरियों में बंद करके ।

अधिकारी कारागृह के । घर जाते थे लौट के ।

रात में फिर रक्षक ये । आते-जाते रहते हैं ।

दुष्‍ट सपने हवा में ये । आते-जाते रहते हैं ।

पत्‍थर की भीषण कारा । पचा लेती भोजन सारा ।

कभी बीच में ही चीख । नींद मारत हैं देख ।

फिर भी इस कारागृह में । निर्जन वन सम शांति रहे ।

लोहे की मम कोठरि में । थीं सलाखें, उनके तल में ।

डाल कंबल अपना, मैं । लेट गया, तो अंबर में ।

सहसा मैंने जब देखा । दमकत थी तब शशिलेखा ।

'शशिलेखा ! रे, शशिलेखा ' । मन में हर्ष तभी छलका ।

बजा तालियाँ, खुद को ही । बता दिया इस वार्त्‍ता को ।

छह मासों में भी न कभी । चंद्रमा न दिख पड़े तभी ।

वर्ष कौन सा, पता नहीं । तिथि फिर कौन बताए सही ?

होगी पंचम या चौथ की । कला सुकोमल चंदा की ।

पहली बार किसी ने भी । देखा होगा चंद्र तभी ।

वर्ष नहीं होगा इतना । मैंने पाया तब जितना ।

तदा बीच बुद्धि-मन के । हुई बातचीत यूँ करके ।

'हर्ष बनत शोक ही अंत में ।

शशिलेखा न दिखेगी तभ में ।'

'जब न थी तब व्‍यर्थ कभी । चाह रखी थी मैंने भी ?

फिर जब यह अब दिखती है । तब हर्ष न क्‍यों छलकता रहे ?'

जेल में तब मैं वैसा । स्‍वर्ग में मिलत सुख जैसा ।

: २ :

लेकिन हर्ष की वे लहरें । बातचीत को करत परे ।

ले जाती थीं दूर कहीं । ऊँचाई पर बहुत सही ।

धाराएँ घुलमिल सबकी । जहाँ नील औ' अनिलों की

मधुर स्‍मृति की, विस्‍मृति की । प्रमोद की औ' कौमुदि की ।

मधुमखियाँ ज्‍यों छत्‍ते में । अपने लघु-लघु नीड़ों में ।

कल्‍पनाएँ मधु वैसी । शहद हर्ष का खाती-सी ।

शत गाने मेरे सिर में । गुनगुनाती हैं मस्‍ती में ।

शहनाइयाँ, पर शत-शत । समा सकत ना जो संगीत ।

वह गीत कहत मेरे दिल में । 'तत: कुमुदनाथेन' जिसमें ।

तान कोयल की कैसे । कहे स्‍वप्‍न बुलबुल जैसे ?

'भ्रमण, परावर्तन' आदि सभी । कुछ बोझिल संज्ञाएँ भी ।

गुलाब पुष्‍प कैसे खिलते । ऐसे समझाए जाते ?

मोहकता उस सुगंध की । न बुद्धि की, बात है दिल की ।

दिल की भाषा अपनाओ । कौमुदि की कविता गाओ ।

हास्‍य मधुर औ' आँसू भी । मूक बोल हैं वहाँ सभी ।

चिटकीली औ' मिटकीली । छांद-वृत्तियाँ मधुर भली ।

दिल की भाषा सरसाए । कौमुदि की कविता गाए ।

गाए कविता कौमुदि की । चंदा-चंदामामा की ।

हिमजल जब भी जम जाता । चंदामामा बन जाता ।

उसको स्‍पर्श करे जैसे । शब्‍द हृदय के भीतर से ।

आया याद, लो, खश रहो । 'चंदामामा, थक गए हो ?'

वह कौमुदिवाली ।

हो-हो-ही-ही वाली ।

कविता मतवाली

और वे गीत । बुलबुल के स्‍वप्निल गीत !

'चंदामामा, चंदामामा, थक गए क्‍या ?

नीम के पेड़ में छिप गए क्‍या ?'

: ३ :

हँसता हृदय, हँसता है मन । कैसा, क्‍यों, यह पूछे कौन ?

खाजा बचपन का मीठा । कौन देत है, किसे पता !

जैसे जननी का स्‍तन है । वेसा चंद्र 'हमारा' है ।

फिर गाने में कैसी हया । 'चंदामामा, थक गए क्‍या ?

चित्र स्‍मृति के, बिजल-से । चमक दमक करते फिर से ।

'चंदामामा, चंदामामा, थक गए क्‍या ?

नीम के पेड़ में छिप गए क्‍या ?'

नीम का पेड़ डेरेदार । चलचित्र मन-पटलों पर ।

बीत गया बचपन मेरा । वही पुराना घर हमरा ।

आँगन सुंदर जिसमें था । दादी का मधु प्‍यार भी था ।

वहाँ बचपने खेल सभी । शाम के समय कभी-कभी ।

भाई-बहनें सब बैठते । हँसते, गाते या रूठते ।

आँगन की पूरब में था । नीम सुंदर-सा रहता ।

पत्‍ते उसके हिलते थे । लहरें जैसे दिखते थे ।

सहसा उनमें चमकत थी । एक शाम को देखी थी ।

धारा बहती चाँदी की । लेखा नाजुक चंदा की ।

तभी सभी सहसा उठते । हम बच्‍चे गाने लगते -

'चंदामामा चंदामामा, थक गए क्‍या ?

नीम के पेड़ में छिप गए क्‍या ?

नीम का पेड़ डेरेदार ।

मामा की हवेली शानदार ।'

'मामा की हवेली' अब मन में । बिजली-सी दमके क्षण में ।

मामा हमारा प्‍यारा था । ननिहाल का राजा था ।

उसकी हवेली प्रकट हुई । यादों से जो गंधमयी ।

ननिहाल के प्‍यार का । माया का औ' ममता का ।

अस्‍फुट-सा स्‍मृतिपुंज अभी । उसमें लेकिन कहीं, कभी ।

पुष्‍पगुच्‍द इक छिपा हुआ । बिन-देखे परिमल आया ।

कौमुदि का मधु अनुपान । गीतों की सुमधुर तान ।

मन के पटलों पर ऐसे । स्‍मृति चित्रों के थे जलसे ।

देखत उनको, सुनत तथा । रंग जमा के यथा तथा ।

पुन:-पुन: सुख मैंने पाया । 'चंदामामा थक गए क्‍या ?'

लेकिन क्‍यों मन में मेरे । बार-बार इक बात उभरे ।

हर्षमहोत्‍सव के भीतर । इसमें रहता स्‍वाद मधुर ।

तानों के, रसपानों के । भीतर सब क्रीड़ाओं के ।

सोने के धागे से ही । एक स्‍मृति गूँथी-सी रही ।

जो उन हर्षोल्‍लासों में । मधुस्रव कौमुदि-धारा में ।

अनजाने ही गूँजत थी । एक चेतना भर देती ।

रूप न अब कुछ प्रकटत है । केवल अस्‍फुट स्‍मृति ही है ।

आँगन की मधु कौमुदि में । दादी को भाते मन में ।

ऐसे गीतों को गाते । हम सब बच्‍चे बैठे थे ।

कोई बाला हंसमुख-सी । शरारती थी प्‍यारी-सी ।

बीच में ही गाती क्‍या ?'चंदामामा थक गए क्‍या ?

उसकी शायद यही स्‍मृति । जी हाँ, उसकी ही स्‍मृति ।

सुखावत थी वह हँसती-सी । आज शशिकला यह जैसी ।

दोनों एक-समान ही हैं । हँसती है, और भाती हैं ।

लेखा नाजुक चंदा की । लड़की लालिम होंठों की ।

(अंदमान, १९९२)

टिप्‍पणियाँ :१. बुद्धि ने कहा,'जनम से तुम दु:ख के साथ बँधे हुए हो, सो क्षणिक हर्ष में लिप्‍त मत हो जाओ, अन्‍यथा आगे चलकर शोक होगा ।' मन ने उत्‍तर किया, 'ऐसा क्‍यों ? इसीलिए न कि हर्ष की शशिलेखा झट से अदृश्‍य हो जाएगी ? किंतु दु:ख की अनंत अँधेरी रातें जो मैंने बिताईं और बिता रहा हूँ, उनके दरम्‍यान हर्ष की शशिलेखा के लिए, वह नहीं थी इसलिए, ज्‍यादातर चाह करते कहाँ पड़ा था ? न होगी तो न सही, परंतु यदि सहजता से दिख पड़ी तो फिर उस हर्ष की शशिलेखा को, वह सहजता से दिख रही है तब तक, क्‍यों न हँसते-हँसते निरख लूँ ?'नहीं' वाले सुख के लिए रोते न बैठा जाए, उसी तरह 'है' वाले सुख के बीच भी रोते न बैठा जाए ।'

२. कल्‍पना के आसमान में स्थित नीले रंग के ।

३. वायु के ।

४. छोटे-छोटे मज्‍जापिंडों के भीतर वे भावनाएँ रहती हैं, जैसे कि छत्‍ते के घरों में मधुमक्खियाँ ।

५. वैसे हर्ष को मन सहजता के साथ अभिव्‍यक्‍त करने लगा । वह सर्वप्रथम 'महाभारत' के 'तत: कुमुदनाथेन कामिनी गण्‍डपाण्‍डुना । नेत्रानन्‍देन चन्‍द्रेण माहेन्‍द्री दिगलंकृता ।' श्‍लोक में अभिव्‍यक्‍त हो गया । परंतु उस गंभीर वर्ण के मोटे सूत्र में गूँथते समय वह कच्‍चा हर्ष फूल की भाँति मसला जाने लगा । उसी प्रकार पृथक्‍करणीय बुद्धि भी 'चाँदनी क्‍या है' विषय पर शास्‍त्रीय व्‍याख्‍यान देने लगी । पृथ्‍वी का 'भ्रमण', किरणों का 'परिवर्तन' और बुलबुल के गाने का स्रोत ढूँढ़ने के लिए उस पक्षी का ही विच्‍छेदन, यदि कोई करने लगा तो उससे उसका मधुर गीत जैसे कत्‍ल किया जाए, उसी तरह विश्‍लेषणात्‍मक बुद्धि के द्वारा वह हर्ष कत्‍ल किया जाने लगा ।

६. हृदय की कविता के छंद तथा वृत्‍त होंगे हास्‍य और आँसू तथा चिटकिली-मिटकिली जैसे निरर्थ लयबद्ध शब्‍द ।

सायंघंटा

(परिचय : जेल में शाम को जो घंटी बजती है, वह कैदियों को विश्राम दिलाने हेतु कोठरियों में बंद करने के लिए होती है । उसे सुनकर कम मुद्दत के कैदियों को यह सोचकर स्‍वाभाविक रूप से हर्ष होता है कि सजा का एक दिन कम हो गया, परंतु ज्‍यादा मुद्दत के कैदियों की वह पीड़ादायक प्रतीत होती है । अंदमान में एक दिन इस घंटा के समय साथ बैठे जंगली मले जाति के कैदी के साथ सावरकरजी का संभाषण हुआ, जिससे उनके मन में भावनाओं की खलबली मच गई । यह संभाषण तथा उससे जनित अपना चिंतन सावरकरजी ने इस कविता में ग्रथित किया है ।)

पशु सम जो अविश्रांत सुबह से सदा

कोल्‍हू से जोते-से घूम रहे थे

बंदी, जब मुक्‍त होत दुष्‍ट जुए से,

आए हैं आँगन में बस अभी-अभी,

कोल्‍हू में गोल-गोल दिन भर घूमे

पेर अभी टूट रहे दर्द से बहुत

धर्म बिंदुओं के उनके स्राव से भरा

भूवर्तुल सूख रहा बस अभी-अभी ।

इतने में हीन स्‍वर परिचित आया

दंड काष्‍ठ ऊँचा कर, तंडेल ने कहा,

'जोड़ा ! हाँ जोड़ा !' तो शीघ्र ही सभी

बंदी दो-दो करके युगल बन गए

'नीचे ! ना, ऊपर ! मूँ बंद ! बे-उठो'

स्‍वविरोधी आज्ञाशत पालन करते

सब हैरान हुए ! अंत में कभी

पंक्ति सिद्ध भोजनार्थ बंदिजनों की

कष्‍टों से, धर्म विद्ध क्लिन्‍नगंध वे

भोजनार्थ सिद्ध हुए,'रोटि डाल दो !'

दाल-रोटि थाली में डाल दी गई

'खाओ बे ! जन्दि-जल्दि !' जलदि हो गई

खाने की कैदियों की, आज्ञा तब 'उठो'!

हाय ! तभी स्‍नेहशून्‍य सूखे ही सूखे

टुकडों को मुँह में सब चबाते रहे,

भुक्‍त, अर्धभुक्‍त, रिक्‍त-जठर या सही

जो भी तब जैसा हो, सभी उठ गए

बंदिवान गालियाँ मुँह से निकालते

जूठन सब धरती से निकाल के, मुँह

धोकर फिर जोड़ों में लौट आ गए

असहाय क्रोध भरे हृदय से सभी

लौट फिर आँगन में आकर बैठे

जोड़े के पीछे फिर जोड़ा, इस क्रम में

बंदिवान लोगों की कतार लग गई

तंडेलादिक सारे दंडधर तभी

स्‍वस्‍थचित्त, बंदिप आ कोठरियों में

रात्रि समय के पहले बंद करेगा

अर्ध घटिका का है कुछ वक्‍त अभी

ढीलाढाला बनके कैदी बैठे

जोड़े के बंदी से गुप्‍त बात भी

करने में चुपके से सब जुट गए ।

* * *

तभी जो जोड़े में उस दिन साथी था

वह बंदी टोंक मुझे बात कर रहा

उत्‍साहित कहत 'देख, देख जरा उधर !

देख सुंदर चाँद ! दिखत बहुत दिनों बाद'

वह था इक निकोबार का कोई-सा

वन्‍यजाति-जनित जिसे कहत हैं 'मले'

मद्य चुराने खातिर दंडित था वह तब

घना अरण्‍य जिसका था मूल पालना

पुर भी जिसके मन में पंजर-सा लगे

उसे बंदिगृह में जब बंद कर रखा

तीन मास भी जिसकी तीन जन्‍म-से

स्‍वाभाविक रूप में वह चंद्र देखकर

उल्‍हसित बहुत हुआ, ढककर मुँह को

चुपके से कहत एक-एक शब्‍द को

गिनती कर उँगलियों से 'एक और,

एक और, हाँ, पर ना तीसरा कभी

मास मुझे रहना है ! केवल ये दो

चंद्र मुझे इस जगह ऐसी स्थिति में

देखेंगे, किंतु चंद्र तीसरा कभी

देखेगा ना मुझको कोठरी में यहा !

लेकिन उस बहु विशाल सागर तट पर

हाँ, हमारे निक्‍कोबारीय समुद्र के

जलतरंग हिंडोले पर खेलूँ मैं

देखेगा चंद्र मुझे तीसरा वहाँ

डुंगी मे मेरी, जब खेऊँगा मै

और करूँ हर्षोल्‍लास की अदाएँ

गीतों का साथ प्रिया जो कर लेगी

या गाते-गाते मैं हाथ उसी की

कटि से लिपटाकर जब बीच-बीच में

खेएगी वह भी जब नैया खुशी से

अथवा उस चाँदनि में धुली हुई सी

उस सुंदर शुभ्र रेत में समुद्र की

विहरत या दौड़त या पकड़ते कभी

एक-दूसरे को, अथवा चुनने में लगे

शंख, सीप, शुभ्र कंकर चमकीले

चाँद तीसरा मुझको देखेगा ऐसे !'

मुसकराकर मैंने कहा, 'बहुत खूब !

सुखमय हो जाए तब दोस्‍त ! तुम्‍हारी

मुक्ति ! और शीघ्र ही सुख पाओगे तुम !'

निश्चितांत कर लेता है दु-ख को सुसह,

क्‍यों न फिर निश्चित शीघ्रांत को करे

दु:ख को अभी के भी सुख पोषक ही !

सम-पीड़ा मुझसे फिर दिखाने प्रति

सहज ही मुझसे उसने तब प्रश्‍न कर लिया -

'कहो मित्र, चाँद बिताने हैं कितने

अभी ऐसी दुष्‍ट स्थिति में तुम्‍हें ऐसे ?'

मन में जो भाव उभर आए मेरे

उनकी अभिव्‍यक्ति हेतु मैने कह दिया,

'कौन करेगा गिनती ! चाँद दो ही या

तीन, चार, चालिस-बस, छोड़ दो इसे

पक्ष, मास, ॠतु, अयन या वर्ष भी सभी

तीन, चार, चालिस की गिनती, हाथों की

और पाँवों की उँगलियाँ एक साथ भी

गिनकर ना आएगी गिनती उसकी !

शायद मुझको न कोई चाँद देख ले

और यहाँ चाँद तीसरा तेरे लिए !

चाँद मुझे कोई भी देख न पाए

लिपट-लिपट कटि से किसी प्रिया की

रमत या दोड़त या पकड़त उसको !

निश्चित है बात यही ! उल्‍टी जो है

सब अनिश्चित है वह ! क्‍यों न मान लें ?

मैंने ही अनिष्‍ट की प्रचंड शिला को

लटकाकर स्‍वकंठ से, कूद लिया था

इसी तेरे निक्‍कोबारीय समुद्र के

रौद्र-शांत जल में निर्धृण रूप में !

अब जो कुछ डूबना है, वह अटल है

तैरना है अपवाद ही, यदि क्‍वचित् घटे !'

* * *

तभी घणण, घणण, घणण ध्‍वनि गूँज उठी

हुक्‍म पर हुक्‍म छूटत : ' हो खड़े ! खड़े !'

कोठरियों में लोगों को कर बंद

बंदीगृह रात भर ही बंद करने

की यह घंटा है ! शब्‍द यदि कभी

कारा में भी सुनकर हृदय के लिए

कुछ हल्‍कापन हो जाता, इच्छित दिशा में

एक कदम बढ़ ही गया ऐसा लगता है

आशा कुल मन बनता कारा में भी,

तो वह भी सायंकालीन परिचिता

घंटा की ही ऐसी घणण ध्‍वनि से

अथवा जब आते है रथ यामिनि में

स्‍वप्‍नों के, भू-जल-ख-ग, कैदी को भी

देह को, मकान को जैसे, छोड़कर

बंदी का स्‍वेच्‍छा संचार बन सके

प्रिय संग ही, भुक्‍तभोग या नवीन भी !

इसीलिए घंटा को ऐसे सुनकर

हल्‍का-सा बोझ हृदय का कम हो जाए

साँस एक छोड़ लंबी, अस्‍फुट स्‍वर में

हर कोई कहता है ' दिन बीत गया !'

मरा शत्रु एक और : दुष्‍ट दशा की

दिवसों की सेना का एक सिपाही

मर के अब गिर ही गया और एक जो !

दिवस-मृत्‍यु-घंटा, तुम गर्जना करो :

सोच भी न सकता हूँ मै यदि, तुमको

गरजना पड़ेगा ऐसे और कई बार

युद्ध में इस भयाण, हे दिनांतके !

फिर भी यह निश्चित है कि होगी जो भी-

संख्‍या इन दिवसों की, कुछ-न-कुछ कभी

विधिनियता दासता की भरतभूमि के

उनमें से एक अधिक दुष्‍ट दिवस यह

मार दिया है तुमने, और इस तरह

मोचन उस माता का, वही हमारा

अन्‍वर्थक मोचन ही होने वाला !

देय प्रभुनियत स्‍वातंत्र्य मूल्‍य जो

हमारे लिए, उस मूल्‍य का यह एक

उग्र तपोदिन-दिनार डालते ही अब

जमा करके बंदी-निधि में, निकली

यंत्रचल प्रतिध्‍वनि ही यह रसीद की

हे सायंघंटा ! तव ध्‍वनि है ऐसी !

जिस दिन भी हिंद-भूमि अति कठोर इस

दंडरूप बंदीनिधि को पूर्ण करेगी

दिन-दिनार दारुण दुर्दशान्वित देकर

बलिदानों की यह नवरात्रि टलेगी

पूर्णाहुति पाकर शक्ति-होमहुताशी

जब विजयादशमी को प्रज्‍वलोज्‍ज्‍वला

उस ज्‍वाला-माली से तृपत चंडि के

होगा फिर मुकुट दिव्‍य-दीप्‍त हमारा

ग्रहण-मुक्‍त-सूरज-सम प्रकट पुनरपि

उस दिन वह विजयवृत्‍त करने हेतु

प्रथित दिशाओं में सारी आध्रुवध्रुव

सिंधु तटोतट प्रतिध्‍वनि कर उठे

जाएगा तब जयघंटा का महान् घोष

पुनरुत्थित राष्‍ट्र के, नाद-सिंधु के

उसका यह एक सही नाद-बिंदु है

कष्‍टगणक घंटा, यह नाद तुम्‍हारा

बिंदु-बिंदु से ऐसे सिंधु १० बनेगा !

गरजो फिर तुम स्‍वाहा कार बली के

दास्‍य-दिनों के अस्‍मत्‍प्राणहवि के !

गर्जना तुम्‍हारी ऐसी दुर्दिनांत के

घंटे, उस शुभ दिन को लाती है अब

एक-एक दिन सन्निध ! दास्‍य मुक्ति के

सुदिन को-मेरे ना-पर हिंदु जाति के !

मुक्‍त उसी का जीवन ध्‍येय हमारा !

कौन जिएगा यदि हिंद मर गया ?

कौन मरेगा यदि जीवित हिंद रह गया ?

(अंदमान, १९१३)

टिप्‍पणियाँ : १. कारागृह का एक अधिकारी ।

२. आज्ञा सुसंगत रूप में देने की बुद्धि भी इन अनाड़ी अधिकारियों के पास नहीं थी । मूर्खता से रोब जमाकर वे एक आज्ञा देते थे और तुरंत स्‍वयं उसके विपरीत आज्ञा देते थे । 'बैठो' शब्‍द उच्‍चारण करते ही 'उठो' कहते थे ।

३. 'रोटी डाल दो'- ये सभी ऐसे अधिकारियों को आज्ञाएँ थीं । स्‍नान के समय भी 'लवा' कहते ही सभी ने झुकना होता था,'बरतन भरो','बदन पर उँडेलो','बदन मलो'-सभी आज्ञाएँ !

४. डुंगी-मले लोगों द्वारा लकड़ी को कुरेदकर बनाई हुई नाव ।

५. दु:ख का अंत निश्चित रूप में फलाँ समय होने वाला है, इस तरह के अवधिज्ञान से भी दु:ख हल्‍का हो जाता है । फिर जल्‍द ही अवधि खत्‍म होने वाली है, ऐसे ज्ञान से न केवल वह दु:ख हल्‍का हो जाता है, अपितु सद्य:कालीन दु:ख पश्‍चात् सुख को अधिक सुखद बनाने का कारण बन जाता है । ऐसा दु:ख-सुख पौष्टिक होता है ।

६. पृथ्‍वी, जल, आकाश सर्वत्र संचार करने वाले तथा बंदिवानों के शरीरों को भी सूक्ष्‍म माया के प्रभाव से जहाँ चाहे वहाँ ले जाने वाले, स्‍वप्‍नों के रथ ।

७. दिन के अंत में बजने वाला यह घंटा ऐसा महसूस कराता था कि बंदी की सजा के दिनों में से एक दिन मर गया, कम हो गया, मुक्ति एक दिन और निकट आ गई ।

८. एक पूर्वकालीन सिक्‍का । भारत की बंधमुक्ति के प्रीत्‍यर्थ जो मूल्‍य देना है, पीड़ाओं के जितने दिनों को भुगतना है, उनमें से यह एक पीड़ाओं का दिनरूप दिनार हमने जमा कर दिया ।

९. कुछ यंत्र रूप संदूकें ऐसी होती हैं कि उनमें एक छेद से सिक्‍का अंदर डालने पर उतने मूल्‍य की एक चीज यंत्र की गति से दूसरे छेद से बाहर आ जाती है । कुछ संदूकों में अंदर सिक्‍का गिरने पर यंत्र की प्रतिध्‍वनि बजती है और उसके अनुरूप रसीद प्राप्‍त हो जाती है । उस कारागृह रूप संदूक में पीड़ाओं के सिक्‍कों से एक दिनार जमा हो गया, ऐसी रसीद दिलाने वाली यंत्र की प्रतिध्‍वनि ही शाम की उस घंटा के नाद में प्रतीत होती थी ।

१०. भारत की मुक्ति का मूल्‍य चुकाने के लिए जिस बलिदान की पीड़ाओं का दंड चुकाना है, उन पीड़ाओं की गणक यह हर रोज दिन के अंत में बजने वाली बंदी-घंटी बन गई थी । इस तरह पीड़ाओं के, पराजय के दिन एक-एक करके गिन लेने पर वह विमुक्ति का अंतिम विजय-दिन दिखने वाला है ! उस दिन जो विशाल विजय-घंटा सागर-सागर के किनारों पर हिंदुस्‍थान की विजय की गवाही देती हुई गरजती जाएगी, उसके 'नाद-सिंधु' का 'नाद-बिंदु' यह पीड़ा-गणक घंटा ध्‍वनि थी । क्‍योंकि बलिदान की रसीद के, इस घंटा के ये बिंदु गिर-गिरकर ही वह विजय घंटा का नाद-सिंधु भरनेवाला है ।

निद्रे

(परिचय : यद्यपि बंदीगृह में परेशानी-ही परेशानी थी, एक सुख सावरकरजी के भाग्‍य में पहले कुछ वर्ष तो कायम था । वह था निद्रा का सुख । उन्‍हें एक बार दिन के कष्‍ट समाप्‍त होने पर जब शाम को कोठरी में बंद किया जाता था तब झट से नींद आ जाती थी । वह इतनी सुखद तथा गाढ़ी होती थी कि कई बार सुबह जब घंटा बज जाता था तब आँखे खुलने पर उन्‍हें एहसास भी नहीं होता था कि हम बंदीगृह में हैं । प्रियजनों के बारे में सपनों से अथवा सुखद भुलक्‍कड़ अवस्‍था से बहुत देर के बाद बंदीगृह के परिसर का अभिज्ञान उतर आता था, ऐसी स्थिति थी । सारे साथी तथा सहकारी जब दूर हो गए थे जब जो एकमात्र ही साथी उन्‍हें प्राप्‍त थी उस निद्रा के प्रति उनके मन में जो कृतज्ञता थी उसी को इस कविता में उन्‍होंने व्‍यक्‍त किया है ।)

आओ, निद्रे आओ ! तव आगमन की

जब खबरें तारों से मम नसों को

आती हैं तब जैसा बाग दूर से

योजन-गंध बनकर लुभा रहा हो

परिमल से भँवरों का, औ' मेरा भी

मन आकृष्‍ट करो, है पुष्‍पोद्यान

स्‍वप्‍न-स्‍वर्ण-पुष्‍पों के !, सकुशल जैसा

शस्‍त्रवैद्य शल्‍य शरीरांतर्गत भी

निकालते समय दर्द जान ना सके

एतदर्थ सुँघाते है मोह कुप्‍पी

उसी तरह, हीन-दीन दिन बीत गया

उसका विक्षत वह वीर उठाकर

रुग्‍णालय में रात्रि के, देत है तभी

सूँघने माहकुप्‍पी, वही तुम ही हो !

विश्‍वकुशल वैद्यजी की, जीर्ण को नया,

ताजा जो सूख गया पूर्ण उसी को

इस मेरे घर में तुम बनाकर गई

पता भी न चले ! यही सात्विक रूप

दान का चिह्न सत्‍य, भाग्‍य कितना,

मेरा, जो देह को प्रथम जिस दिन को

मैंने अपने हाथों रचाकर चिता

रखा था उस पर, जब चंडिका करूँ-

सुतृप्‍ता !- जब उस अग्निकुंड में कराल,

हे निद्रे, भार्यासम तुम सहगमन करके

आई हो यमपुरी में यहाँ मेरे संग !

मम शय्या बंदीगृह में तेरे संग

प्रेम मृदुल, मोहक, मानो सजी फूलों से

हे प्रभु, इस निद्रा को तो अब से तुम

मत ले जाओ दूर मुझसे, यद्यपि सबकुछ

ले गए ! क्‍या न है वह यहाँ मेरे लिए ?

पंखों पर ले आती है दुनिया को

कारागृह के भीतर वह मेरे लिए !

बाग, कुसुम, फौव्‍वारे, प्रियसंग, रंग भी ।

अद्भुत, अतिभव्‍य, भयद प्रत्‍यक्ष से सभी

अती विचित्र नवनवीन घटनाओं को

ले आती है, निद्रे, तब माया का स्‍वप्‍नपट

खुलता है जब ! मृत्‍यु के चक्रव्‍यूह में

पीछे न एक कदम भी हटे बिना आगे

और-और आगे ही दौड़ते प्रवेग

तीव्र गति रथ में काल के अनावरोध

जीवन के अभिमन्‍यु १० को तुम फिर से ही

ले जाती हो स्‍वेच्‍छा पीछे मन चाहे

काल के रथ में तुम आरूढ़ होती हो

और तुरग तव लगाम के वश हो जाते

सुनहरे स्‍वप्‍नों के, और उस रथ में भी

वृद्धों को उस ययाति सम दे देती हो

नवयौवन, औ' ले जाती हो रति-देश,

पूर्व प्रियाओं के फिर कराती हो

प्रथम चुबन फिर इक बार !- विरह विह्वल को

सत्‍य समालिंगन सुख !- जो हताश हैं

उनको फल लभ्‍य कराती हो !- अस्‍त उदित भी,

विगत बनत आगत ही ! खुलता है जब

स्‍वप्‍नचित्रपट निद्रे, तुम्‍हारी बिजली का !

भूत बनत वर्तमान-और कहते हैं कोई ११

विगत ही आगत न अनागत भी बनत है

आगत तव रथ में भविष्‍य के लिए भी,

चर्मचक्षु देख न सकत अभी जिसको

ऐसा भी चित्रशाला के बीच प्रवेश की

बनती हो दर्शिका भी १२ तुम ! योगी जब भी-

मान लेत इस अगम्‍य, अतींद्रिय में

एक तुम ही हो इंद्रिय जो व्‍यक्‍त कर सके

अव्‍यक्‍त को, १३ हे सुषुप्ति, बद्धजनों को ।

देह ही १४ न आत्‍मा है, यही बीज मंत्र

धर्मों का अखिल, हमें क्‍या दे देती हो

तुम ही प्रथम ? ऐसे फिर तुम्‍हारे जादू को

स्‍वप्‍नों के दर्पण में देह के बिना

आत्‍मा को आत्‍मा ही दिखला देती हो ?

साधारण को गोचर सात्विकोपमा

वेदांत के लिए, जो एक ही सुलभ

कैवल्‍यानंद के लिए, सुषुप्ति, वह-

उस केवल आनंद की, तुम्‍हारे ही, सत्‍य !

और यद्यपि, हे निद्रे !- मृत्‍यु भी होगी

तुम्‍हारी ही उच्‍च स्थिति १५ - अंतिम स्थिति

तो मधुर मृत्‍यु कितनी ! मृत्‍यु मुक्ति है !!

टिप्‍पणियाँ : १. नसों की तारों से- अर्थात् तारायंत्र से-नींद आने पर जो मधुर शिथिलता तथा सुखद विश्रांति बदन में संचारित हो जाती है, वह 'नींद आ रही है' वार्त्‍ता की प्राप्‍त 'तारे' ही होती हैं ।

२. सुख स्‍वप्‍नों के स्‍वर्णपुष्‍पों से भरा बाग-सुखनिद्रा ।

३. क्‍लोरोफार्म अथवा अन्‍य तत्‍सम मूर्च्‍छक द्रव्‍यों की कुप्‍पी ।

४. ईश्‍वर ।

५. शरीर में ।

६. देवी, असुरमर्दिनी, ध्‍येयमूर्ति को ।

७. कारागृह में ।

८. वास्‍तव में जो घटनाएँ असंभव हैं, ऐसी विचित्र घटनाएँ भी तब सत्‍य जैसी अनुभव होती हैं, जब स्‍वप्‍नों का चित्रपट खुलता है ।

९. काबू में न रहने वाला ।

१०. जीवन अभिमन्‍यु की भाँति मृत्‍यु के चक्रव्‍यूह में लगातार आगे बढ़ता है । इसीलिए जिंदगी में बीते हुए क्षण का फिर से सच्‍चे रूप में अनुभव नहीं किया जा सकता । किंतु निद्रा ऐसा अनुभव प्राप्‍त कराती है । काल के रथ को बलात् पीछे ले जाती है, और पीछे की घटनाओं का बिलकुल वास्‍तव की तरह, बिलकुल आज की तरह अनुभव कराती है । सुनहरे स्‍वप्‍न निद्रा की लगाम होते हैं । ये स्‍वप्‍न काल के घोड़ों को खींचकर पीछे ले जाते हैं ।

११. कुछ लोगों का अनुभव है कि आगे घटित होने वाली घटनाएँ भी कभी-कभी स्‍वप्‍न में पहले दिखाई देती हैं ।

१२. दर्शिका = टिकट । भविष्‍य की चित्रशाला में जो कुछ चित्र धीरे-धीरे दर्शकों के लिए अनावृत होने वाले हैं, उन्‍हें निद्रा का टिकट काटने पर कभी पहले भी देखा जा सकता है ।

१३. सुषुप्ति में = गाढ़ी नींद में । यह स्थिति मूल अव्‍यक्‍त की द्वंद्वरहितता की किंचित् कल्‍पना करवा सकती है । समाधि के लिए 'योगनिद्रा' नाम दिया जाता है, उसका कारण भी यही हे कि जनसाधारण के लिए उस समाधि की कल्‍पना करने के लिए गाढ़ी निद्रा की एकमात्र उपमा उपलब्‍ध है ।

१४. देह ही आत्‍मा नहीं है । स्‍पेंसर आदि बहुतेरे भौतिक शास्‍त्रज्ञ भी प्रतिपादन करते हैं कि नींद में हमारी देह जहाँ होती हैं वहाँ से अन्‍यत्र हमारा संचार होता है । नींद के ऐसे अनुभव से ही कल्‍पना आ गई थी कि देह आत्‍मा नहीं है ।

१५. उच्‍च स्थिति = संपूर्णत: भग्‍न होने वाली गाढ़ी निद्रा की जो आंशिक द्वंद्वतीतता वही कभी भग्‍न न होने वाली बनकर जिसमें पूर्णत: रहती है ऐसी नींद अर्थात् मृत्‍यु । इसीलिए 'मधुर मृत्‍यु कितनी !'

मूर्ति दूजी वह

(परिचय : ईसवी १९१० में जब सावरकरजी फ्रांस से इंग्‍लैंड लौटे, तभी पकड़े गए । जब वे प्रथमत: लंदन की पुलिस-कस्‍टडी में बंद कि गए, तब इतनी ठंड पड़ने लगी, जो इंग्‍लैंड के हिसाब से भी ज्‍यादा थी । तिस पर उस कोठरी की दीवारें पत्‍थर की बनी हुई थीं ! फर्श भी पत्‍थर वाला ! वे बिलकुल बर्फ की तरह ठंडी हो जाती थीं । पास में बिछाने के लिए तो क्‍या, ओढ़ने के लिए भी पर्याप्‍त साधन हीं । दिन-रात पैर पटक लें, हाथों को मल लें, उस पंद्रह-बीस कदमों की लंबाई में ही जल्‍दी-जल्‍दी फेरे लगाएँ, तब कहीं ठंडा पड़नेवाला खून कुछ गरमाहट पा सकता था । ऐसी भयानक शारीरिक ठंडक का असर मानसिक उत्‍साह भी ठंडा हो जाने पर न हो जाए, इस उद्देश्‍य से अपने मन को वज्रशाली बनाने हेतु जो विचारों की परंपरा हृदय के भीतर प्रदीप्‍त कर दी, उसे इस कविता में ग्रथित किया है ।)

अपरिचित न जो तुम्‍हारे मधु विलास से :

रम्‍य सरोवर, कमल, नाल सुभग-से,

वे परिमल भृंगगुंज, वे सुमंजुला

सारंगियाँ, वे गीत मधुर-मधुर से

दयित-स्‍मृति आलिंगन जिसे सुखद सा,

खेती हरी-भरी, आह्लादित बाग वे,

सरितापुलिनोत्‍थ ठंडे तरबूज वे,

मुक्‍त नील आकाशश्री मनोहरा,

मुक्‍त नील सागरतल, मुक्‍त वायु वे,

भक्ति के सुपंथ पर महा गजर मधुर सा

ताल-मृदंगों का हरि-नाम-मत्‍त वह,

चंद्रबिंब शारद मेघों में दौड़े,

जैसी आशा रिक्‍त संशय में सुखेन :

ऐसा जो नव, संगत, मंजु, मुक्‍त जो

उसमें स्थित मधुर विलास तुम्‍हारी

मूर्ति की सुंदरता वर्णन करते

भाट ही ललचायित : देवि ! वही मैं

आज चाहता हूँ रूप देखने

वह दूजा ! तव दूजी मूर्ति ही सही !

* * *

मूर्ति मधुर ना, परंतु वह भयंकरा

तव दूजी घोर मूर्ति दिखा दो मुझे !

क्‍योंकि तुम देख रही हो मुझे यहाँ

इस तरह लोह-पंजर में ही बंद किया

हिंस्र कोई पशु जैसा वध्‍य उसी तरह;

और सुन रही हो न लोग क्‍या इधर

एक-दूजे से कहते हैं मेरे प्रति :

'होता यदि हिंस्र कोई पशु ही यह शख्‍स

कर लेता सहन यहाँ पंजर की कैद

यह तो है पर केवल कवि भावुक सा

शोभा की एक चीज ! शयन-रंग में

वीणा है विजयायुध, पर वह कभी

विजयायुध बनती है समरांगण में ?

कैसी वह कविता भी सुखभोग-लोलुपा

फिर कभी न आएगी पास इसी के

कवि न सहन करत कभी, यह क्‍या बचेगा ?'

* * *

क्‍यों ? क्‍या कविता है पण्‍य अँगना

जो जब तब उत्‍सवीय मनविमोह का

सुवर्ण रत्‍नभौक्तिक से तनु अलंकृता

तब तक ही मुसकराती बाँहों में आवे ?

और अचानक ऐसे भाग्‍य का कभी

अकाल हो जाए, जैसे सूखे पुष्‍करिणी

उसी तरह रिक्‍तरस हृदय उसी का

बनता है और दूर खिसक जाती है ?

ना, ना, ना ! कुसुम सुगंधीय लास्‍य में

वीणा के नाद सहित नाच करत हैं,

वे उसके पद बनकर वज्र-कर्कश भी

खड्ग की धार पर नाच करत हैं !

ना कविता भक्‍त का त्‍याग कभी करे !

भक्‍त उसे ज्‍यागे, पर वह त्‍यागत ना उसे !

* * *

क्‍योंकि मूर्तियाँ उसकी जो दो होती हैं

कर्तव्‍य को निभाती हैं, उसके पुजारी की

अथवा प्रिय की भिन्‍न समयों में रक्षा करती हैं

एक मूर्ति नाचत है हृदयमंच पर

रसिक-मन की वीणा उसके कर में

तारों को छेड़त है कुशल स्‍पर्श से

प्रेम की विद्युत् फिर चमक उठत है,

भावों को मोहित कर वह बनाती है

मक्‍खन-से कोमल-इतने कोमल कि

जाएँगे चाँदनी से भी पिघल वे !

और दूजी मूर्ति तुम्‍हारी प्रखर है

कविते, असिधारा व्रत लेकर वह

प्रविष्‍ट होत अट्टहास करत चिता में !

प्रथम मूर्ति तव, यमुना-पुलिन आर्द्र-सा

चाँदनि में शीतल उस रात बन गया,

जिस रात्रि में कमलनयन श्‍याम के संग

रासलीलांतर्गत मधु-मधुर सुंदरा

हृदय-हृदय नाचत है हर्षपूरित-सा;

लाता है हर्षोत्‍सुक किंकिणी प्रति

हास्‍य-लास्‍य-मग्‍न-गोपिका-हृदय का

ताल धरत मंजुल रुण झुणु झुणू झुणू !

* * *

किंतु यमुना-पुलिन पर नंद‍किशोर के

रसभरित कोमल मृदुल-मृदुल-से

नाजुक-से अधरों पर मधुर बनत है

जो मुरली, वही मृदुल और कोमल

अधरों पर कर्कश-रव-रणश्रृंग रूप में

रणवेताल के भीषण तांडव के संग

ताल देत भारतीय रणसंगर में

' अच्‍छेद्योऽयमदाह्योऽशोष्‍य एव च,

लोकक्षयकृत् प्रवृद्ध काल, काल हूँ मैं ।'

दंष्‍ट्रा विकराल, गर्जना भयद कितनी

कविते, तव !- जो सहस्र संवत्‍सरों में

गूँजत है आज भी, करत भू कंपित-सी !

- उस छंद में, उस वृत्‍त में, समरभीषणा

प्रकट होत चंडमूर्ति जो तुम्‍हारी

देवि, आज दे दे वह दर्शन मुझको !

क्‍योंकि आज प्रस्‍तुत है भिन्‍न-रूप यह

कर्तव्‍य क्रकच-तीक्ष्‍ण ! आज नहीं है

तन्‍मुद्रा स्मितशुभ्रा, लिबास न सौम्‍य

बूटी का रोब-ऐश रंग राग भी

रत्‍नजड़ि‍त मुकुट भी आज नहीं है

वाद्य नहीं मंजुल, ना गीत मधुर-सा

ना जत्‍थे रँगीले नौटंकियों के !

आज दोनों तरफ से न रास्‍ते में कहीं

फूल बरसतें हैं, न हर्षोत्‍फुल्‍ल हैं

ललनाओं के लोलनयन; गर्जना न करत हैं

कृतज्ञ लोकसंघ जयध्‍वनियों की !

आज सेवकों की बख्‍शीश सुवर्ण के

बाँटते नहीं आ रहा है धनी

स्‍वयं सैनिकों को उसके आज छुट्टी भी

मिल नहीं रही है स्‍वेच्‍छाविलास की

' अशिथिल परिरंभी परिमृदितमृणाली -

दुर्बल-से अंगकों, से लिपटकर किसी

अविदितगतयाम यामिनी के लिए !

आज उल्‍टा है सब ! उग्र, ना-हिडिस्‍स-सा

लोहे का मुख अपना खोलकर भयाण

कर्तव्‍य प्रकट आज ! काटने मुझे

दाँतों की दो पंक्तियों की तीक्ष्‍ण आरी में !

पत्‍थर से निर्दय है हृदय उसी का

लिबास भी बर्बरता को न ढक सके

उसकी तनु की नंगी तलवार की !

बाप रे बाप ! ठंड यह भयंकर है !

निर्दयता से भी ठंडी ! जम गया

नद-नदियों में पानी औ 'इस शरीर में

रक्‍तपिंड पिंड निरा जाए शरीर में

इस भयाण एकांत में पूर्ण अकेला

नि:सहाय, निंदित, मैं देख रहा हूँ

जीवन रस धमनियों में मेरे ही

ठंडा अब हो रहा है ! पत्‍थर-चूने की

इन आँधियारी नंगी दीवारों से भी

ठंडी ठंडक बदन में असह भर गई !

कारा की ऐसी नंगी कोठरि में यहाँ

नंगा कर्तव्‍य मुझे पकड़ लेत है !

और अधर में वायु के शिखर पर अभी

संतुलन सम्‍हाल के चढ़ते दौड़ने

की आज्ञा देत मुझे ! पीठ पर लादकर

पर्वत सम दुर्धर सद्गर्वभार यह

अखिल राष्‍ट्र को ! तो आ भी जाओ

तुम भी ! तुम्‍हारी दूजी चंडमूर्ति का

दर्शन दो मुझे ! कविते, और वह दूजा

छेड़ो स्‍वर कर्कश, जो भयद भैरव !

सूर ललित ना ! रुण झुण ताल-तोल ना !

प्रिय जिनके आघात मृदुल कोमल होते हैं

हृदयकुंज में लहराते हैं मधु लहरें

मंजु गीतगोविंद के मधुर छंद वे

अबलाओं के हृदयों के अधिक अबल बनाते

वे बिल्‍हणीय करुण छंद भी ना लाओ अब ।

पर, कविते, रणभेरी के सूर दूजे

छेड़ो अब, अबलाओं के मृदु हृदयों-

को जो बना देते हैं प्रबल सिंधु-से !

मृत्‍युंजय मंत्र कोई प्रकट करेगा

मूर्ति चंडिका की उद्दंड, दे सके

चंड मनोबलदाता वर मुझे अभी !

घुँघराले पवनमुक्‍त केश मृदुल वे,

क्रोध से खुरदरे खड़े शीघ्र-से

टूटे खत्‍ते से जैसे सर्प दौड़ते

वैसे जूड़े से खुलकर तेज दौड़ते

कंधे पर, वक्ष पर, पीठ पर, मुँह पर

विकराल क्रोध से अति भयंकरा

अपने ही हाथों से स्‍वयं काटकर

खड्ग से अपना ही मुंड, फल जैसा,

अपने ही हाथ में लेत, और फिर तभी

शोणित की धारा उछले ऊपर सहसा

लाल-लाल चिपचिपी विकट गले से

धारा उस क्रुद्ध मुख से प्राशन करती

प्‍याले से लाल मद्य जैसे पीते हैं !

पीकर अपना ही रक्‍त अपनी ही प्‍यास

बुझानेवाली उस प्रचंड रौद्रभीषणा

रुंडधरा छिन्‍न-मुंड मूर्ति को प्रणाम

नमोनम : सहस्रधा प्रमत्‍त-नर्तने !

तुम ही हो कर्तव्‍यमूर्ति ! यदि तुम ऐसी

सद्य:कर्तव्‍यमूर्ति मेरे हृदय-समीपे

रुंडधरा, छिन्‍नमुंड, खंड-कृपाणा

ऐसी ही मूर्ति लिये, तुम भी आ जाओ

कविते, कर लेंगे हृदय-कामना !

जो वेतालीय, कालभैरवीय जो

मार‍क जो, दु:सह जो, कठिण कटु-कटु

वही आज आरोग्‍यद बलद बनेगा !

या जैसा हो जाए, अटल ज्‍यों चढ़े

वीरवर श्रीबंदा वध-शिला पर ।

* * *

श्रीबंदावीर

क्रूर लोह-पंजर में तंग-से यहाँ

तीक्ष्‍ण खाँग !- लोह के दाँत रक्‍त पी

उसी तरह सुरसुराते, न देत बिलकुल

उसकी तनु को किंचित् मुड़ने !

पीते हैं रक्‍त लोह-दंत चुभकर

देह की बनी है केवल छाननी

निजरक्‍त में नहाया कौन शख्‍स यह

पंजर में बंदिवान ? शेर ही जैसा !

पंजरस्‍थ शेर की इर्दगिर्द ज्‍यों

कुत्‍ते मँडराते रक्‍तपिपासी

भाँकत हैं, घात लगा बैठे हैं खाने,

उसी तरह शत्रु के खड्गधारि जत्‍थे

भौंक भौंक पंजर को धकेलते जाते !

दिल्‍ली का बहु विशाल मैदान यहाँ है

लोहे की सलाखों का बाड़ा मजबूत :

उसके चारों तरफ सहस्र लोग हैं

नर-नारी भीड़ करत दूर-दूर तक

देखने हेतु हिंदुओं का रक्षणकर्ता

देखने हेतु हिंदुओं का रक्षणकर्ता ही

ना, परंतु हाय हाय ! उसका वध भी !

देखने हेतु ! तभी मुख्‍य कसाई,

बादशाह कहलाता, वह भी आया !

धीरे से फाटक कर्रर्र ध्‍वनि से खोल

पंजर किंचित् खोला : खींच श्रृंखला

फर्र-फर्र घसीटते मारपीट कर

बंदिवान को पटका मैदान में तभी ।

खनखना खींचकर तानकर चारों तरफ

शस्‍त्र-अस्‍त्र शतश: सहसा सुसज्‍ज थे

एक एक शिष्‍य उसी वीर गुरु का

श्रृंखलाबद्ध, आगे लाया गया था

' क्‍या बनोगे मुसलमान ? तभी बचोगे !'

' हिंदू मैं ! सिख हैं हम ! मृत्‍यु दो मुझे !'

'यह कुराण-यह कृपाण ' बोलो फिर से

पुनरपि औ' पुनरपि औ ' पुन: - पुन: - पुन:

प्रत्‍युत्‍तर घोरनिश्‍चयोत्‍थ शीघ्र वही

' हिंदू मैं ! सिख हैं हम ! मृत्‍यु दो मुझे !'

एक-एक उत्‍तर दुतकारत कुराण को

आते ही गिेर जाता धर्मवीर का

एक-एक शीर्ष बलि क्रूर कृपाण का

सौ बार भी प्रश्‍न गूँजन बर्बर स्‍वर में

' क्‍या बनोगे मुसलमान ? तभी बचोगे !'

सौ बार उत्‍तर भी गूँजत गगन में :

'हिंदू मैं ! सिख हैं हम ! मृत्‍यु दो मुझे !'

एक-एक करके दो सौ धर्मवीर

त्‍याग भय, गर्जत जय धर्मगुरु का

वधशिला पर अपना शीर्ष दे गया !

भोथरा हुआ कृपाण : डूब गई वह

सद्यउष्‍ण-उष्‍ण खून में वधशिला :

अति अघोर अति उदास दिन भी बन गया

बदमस्‍त, लाल-लाल रक्‍त प्राशन करके ।

हाय, अजी ! किंतु उसी अति घृणाई ही

बीभत्‍स स्‍थान में ठीक इसी वक्‍त कैसा,

क्‍यों आया अति कोमल अति करुण बच्‍चा ?

और लिपटकर बंदी वीरवर से ही

सहसा यह बच्‍चा फुदक-फुदक कह पड़े :

'हाय पिताजी ! हाय हाय, क्‍या दशा बन गई

राजसाजभूषित-से तव शरीर की !'

राजराजभेषणार्ह बंदिवान वह

वीरवर श्रीबंदा हाय ! तब अपने

इकलौते बेटे का भाल चूमकर

कहता है : 'बेटे ! मैं नहीं तेरा पिता !

हिंदू धर्म ही, बेटे, पूज्‍य नव पिता !

माता तव हिंदू जाति : जाओ उस पर

न्‍योछावर कर दो यह कमल-कोमला

तनु तुम्‍हारी शीघ्र अभी, प्रिय वत्‍स मेरे !'

शीघ्र ही अश्रुयुक्‍त, फिर भी उछाल से

उठ खड़ा हुआ राजस वीरतनय वह ।

'क्‍या बनोगे मुसलमान ? तभी बचोगे !'

'हिंदू धर्म-मंगलार्थ मृत्‍यु दो मुझे !'

और, हाय ! हाय ! उस छोटे बच्‍चे को भी

ले जाते हैं नृशंस वधशिला की ओर :

धीरे ले जाओ, धीरे ! सम्‍हलकर बच्‍चा

छोटा है इतना कि वहाँ जम गए

शोणित के डबरे में ही डूब जाएगा

जाते-जाते वहाँ वधशिला की ओर !

भोथरा १० कृपाण फिर भी कठिणतम ही था

आसानी से निपटा कर्म भयंकर !

कठिणतम बलिदान में अति सहजता से

वीरसुत श्रीबंदा वीरवर का

निज तनु की नवताल से तोड़कर स्‍वयं

चढ़ा देत हिंदू-धर्म-मंगलार्थ ही

समर-चंडिका-चरण-स्‍थंडिल पर ही

निज सुंदर मुखमंडल कमल-कुसुम-सा !

हर हर ! सत् श्री अकाल ! जय ! पुन: - पुन:

श्रीबंदा गर्व से करत गर्जना !

वीर गर्जना करत, शोक करत पिता - ११

कितना प्‍यारा, शूर कितना ! बच्‍चा इकलौता

छोड़ गया वह भी अब मुझ अभागी को :

श्रीबंदा शोक करत हृदयांतर में !

लो, देखो आ ही गए कोपातिशय से

कंपित-से शब्‍द, शाप, गालियाँ सभी !

और शब्‍द जिसका अखिल पंचनद प्रदेश

गूँजत है, जैसे गुफा में सिंहगर्जना

जिसके कारण अक्षरश: मुसलमान सब

ग्रामधाम छोड़ भाग जात विजन में !

घोरी से १२ लेकर जो शल्‍य घोर था

दास्‍य का चुभत हृद में पंचनद के

उसे उखाड़ शतकों का प्रतिशोध लेत है

यत्‍कृपाण : उस बंदा वीरवर को

वे ही मुसलमान आज श्‍वान की तरह

भौंक रहे हैं श्रृंखलान्वित सिंह पर

भौंक-भौंककर पूछत है कई बार,

'यह कुराण, यह कृपाण ! बोलो फिर से,

' काफिर, बन मुसलमान : तभी बचोगे !'

धर्मांध ! तुम्‍हें य:कश्चित् सैनिक ने भी

कौड़ी का मोल नहीं दिया कुराण को

सेनानी कैसे फिर देगा भी कभी

मूढ़, कोई कीमत ऐसे पागल डर को ?

'सचमुच क्‍या ऐसा है ? मुख्‍य कसाई,

कहलात बादशाह, बीच में कहे

' हो जाए फिर सेनानी प्रति ऐसे

सेना से अधिक समादर समर्पित !'

वह कुराण फेंकत है ? फेंक दो कृपाण

ले आओ तीक्ष्‍णाग्र-सा सँड़सा यहाँ

लोह का, लाल गर्म करके लाओ '

लाल-लाल सँड़से तीक्ष्‍णाग्र तीर-से

ले आया हत्‍यारा, अविचल आसन में

वीर बैठा योगयुक्‍त, बोला पुनरपि,

' बनोगे न मुसलमान ?' एक-एक उस

प्रश्‍न के प्रश्‍नचिह्न समान अंत में

तप्‍त लोह का सँड़वा शीघ्र घुसत है

वीर के शरीर में, तीर तूणीर में !

प्रश्‍नांत में एक-एक काटकर बलात्

मांस की बोटी खींच निकाल देते हैं

लाल तप्‍त सँड़से से नोंच-नोंचकर !

अक्षरश: छल अघोर रिपु करत है !

अक्षरश: वीर धैर्य अघोर धरत है !

वह बंदा अखिल-हिंदु-वंद्य हुतात्‍मा !

'छल अघोर, फिर भी यह धैर्य न छोड़े,

तो फिर और अघोर करो छल इसका'

बादशाह के निधि में क्‍या कभी कहीं

क्रौर्य की कमी होती ? अधिकार छल

करने की सोचत है हत्‍यारा, तभी बादशाह

गरजत है : 'ना ऐसे मूढ़ ! सैकड़ों

आघातों से कोई न घाव बदन पर

ऐसा होगा घाव मन पर जब हो आघात

एकमात्र ! काफिर कपूत का

मृत शरीर काटो-काटो हृदय ही !'

वीर तनय की तनु काट, हृदय निकाला

क्रव्‍याद क्रूरों ने : और, हाय ! हाय !

उष्‍ण रक्‍त लथपथ टपकत था जिससे

प्‍यारे राजस जानी प्रियतम लाडले

इकलौते बेटे का हृदय वही, जी,

जन्‍मदाता के मुँह में ठूँस देत हैं

हाय हाय-धन्‍य-धन्‍य हाय हाय का !

धन्‍य धन्‍य धन्‍य ! फिर भी धैर्य बरकरार !

उफ् भी न निकलत मुँह से, सत्‍य-सत्‍य ही

योगीवर की आत्‍मा, हे क्रूरो, उसको

पहली ही गति है जो ' विचाल्‍यते

गुरुणापि स दु:खेन न यत्र आगत: १४ !

शैतान ही ! शैतान ही इसमें घुसकर

मुँह चिढ़ावत है : नर न, भूत है यह !

चिल्‍लाकर भौंक भौंकत हैं नीच

बाद में आसन्‍न-मृत्‍यु वीरश्रेष्‍ठ को

सभ्‍य मृत्‍यु का भी सुख न मिलने पाए

इस हेतु ऊँट पर उल्‍टा लटकाया

और लाखों लोगों की भीड़ में वहाँ

दिल्‍ली की गली-गली में महाभयंकर

जुलूस वह माते ! लोगों ने देखा !

लोगों ने देखा, उनकी ही रक्षा में

प्राणदान करनेवाले का घोर वध ऐसा :

हिंदुओं के बीज के लक्ष-लक्ष वे

लोग थे, जिनके दो-हाथ, लंबी मूछें भी

मूँछ वाले भी बिलकुल षंढ बन गए

हिंदुओं के धर्मरक्षक को देख रहे थे

उस दशा में, उस दुर्बीभत्‍सना में !

यदि एक ही माई का लाल उन्‍हीं में -

जीवित माँ का दूध पिया जिसने

यदि होगा इनमें ? धत् ! धिक्‍कार

धिक् तुम्‍हारा जीवन हो ! लक्ष नर हैं तुम

लहर की तरह यदि उछल जाते

तो सहसा एक साथ डुबो ही देते-

बिलकुल कुचला देते इन दैत्‍य-शतों को

अथवा अपने भीरुता के कलंक को !

लेकिन अब यह कलंक हिंदुता पर ही

निज मारक छाया ना फैलाएगा पुन:

जो उसपर शोणित को उष्‍ण-उष्‍ण से

हृदय के अपने ही, डालकर अहा

शुद्ध करके हिंदू ध्‍वज पुन: रँगाया,

हिंदू वीर यह बंदा हिंदू हुतात्‍मा !

धर्मवीर यह बंदा हिंदू हुतात्‍मा !

देशवीर यह बंदा हिंदू हुतात्‍मा !

निकल रही घृणार्ह-सी बदबू जिससे

सड़े हुए गंद भरे मूत्रमलों की

शहर के ऐसे कूड़ेदान पर दूर

ले जाकर फिर कसाइ फेंक देते है

अमर-मृत को !' जा काफिर ! रक्‍तमांस को

खा जाएँ अब तेरे, गृध्र-श्‍वास-सूकर :

और अगर आत्‍मा है काफिरों की भी

खा जाए आत्‍मा को तेरी नर्क, जाओ !'

तो क्‍या हुआ ? अजी, वहाँ जड़ पकड़ लिया

उसी रक्त-मांस ने उस अमर मृत के,

उससे फसल उस हुतात्‍मा के

प्रतिशोध की उग आई अकस्‍मात्

माना जिको मूषक १५ क:पदार्थ जिन्‍हें -

वे ही अजी सिंहासन को कुरेदकर

उन १६ आक्रामक सिंहों के क्रूर, भीषण

मुँह के साथ ही बना रहे हैा निज बिल !

मृत हो उठा जीवित ! मृत ही आक्रामक !

गायों ने मार दिया दुष्‍ट कसाई

चिड़ि‍यों ने मार दिया क्रूर बाज ही !

पैरों तल की रेत तप्‍त हो गई

जो भूनकर भस्‍म करत पैदल फौज १७

और कुत्‍ता भी तुच्‍छ मान ले जिसे

ऐसी दुर्गति हो गई बादशाह की-

बंदा के सिंहनाद ने जब लिया

रूपांतर हिंदूडिंडिम में अति महान् !

और ईश्‍वर ने दिया यश भी अंत में

मूर्तिभंजकों पर मूर्तिपूजकों को !

* * *

लेकिन यह होगा ऐसे न जानते हुए

होगा भी न ऐसे, यह भी जानते हुए

अति भयाण अति महान् उच्‍च स्‍थान पर

अंधकार में, भयाण दक्षिणायन में १८

कटवाकर निज तनु को वध्‍य पशु जैसे,

धर्म के लिए जो नर्क में पचा

वह वीर श्रीबंदा हिंदू हुतात्‍मा

बाज रहे ध्‍येय मुझे एकमात्र ही !

वही नर्क १९ लगे मुझको आज श्रेष्‍ठ-सा

सातें स्‍वर्गों से ! विजय-गीति ना,

-उसकी गाओ, स्‍फूर्ते, असह अपजय को

जिस सुर में बंदा के हृदय-तंतु को

लगाकर तुमने गीत गा लिया

व्‍यक्ति-मृत्‍यु सौख्‍य की असह-उसी को

-उसी सुर में कविते ! तनुतंतुवाद्य यह

मेरा भी जोड़ दो : राग वही गाओ :

धैर्य का परम वही ! क्‍यों न फिर वहीं ?

मैं न क्‍या एक यद्यपि क्षुद्र-सी टहनी

फिर भी उसी प्रथित-से अश्‍वत्‍थ वृक्ष की

हिंदवीय वंश के ? वह यदीय20है

शाखा, यद्यपि दिक्‍क्‍ुंजरहस्‍त दीर्घ-सी

हिंदू हुतात्‍मा बंदा वीरश्रेष्‍ठ की ?

वही रक्‍त, अल्‍प सत्‍व क्‍यों न हो, मुझमें

वही बीज, जीवन वह, मृत्तिका भी वही !

वह सह सका श्रीबंदा हिंदू हुतात्‍मा

असहनीय छल-पीड़ाएँ, फिर मैं

क्‍यों न सह सकूँगा इन पीड़ाओं को

मैं भी हिंदू ही हूँ ! इन्‍हें सहूँगा -

इनसे भी भयकारी छल पीड़ाएँ

सहन करूँ, जीवनांत कष्‍ट करूँगा

करने खातिर विमुक्‍त मातृभूमि को !

मुक्‍त पुन:, शक्‍त पुन: मनुजमंगला

पुण्‍यभूमि पुनरुत्थित पतितपावना !

(अंदमान)

टिप्‍पणियाँ : १. कभी-कभी, यथासंभव सुख का उपभोग करना ही कर्तव्‍य बन जाता है । गणेशोत्‍सव, जुलूम, सभा, सम्‍मेलन ऐसे सुखद कर्तव्‍य के ही उदाहरण हैं । किंतु 'उस दिन' कोई दूसरा ही कर्तव्‍य सामने उपस्थित था । 'आज उल्‍टा सब !' यही भाव उस छेदक में वर्णित है ।

२. छुट्टी जो सैनिकों को मिलती है । 'हमारे मालिक ने अर्थात् ईश्‍वर ने आज हमें कार्य के लिए आज्ञा दी है । विजय के उपरांत प्राप्‍त होनेवाली छुट्टी हमारे हिस्‍से आज अथवा क्‍वचित् कभी भी आनेवाली नहीं है ।'

३. भवभूति के 'उत्‍तररामचरित' से 'परिमृदितमृणालीदुर्बलान्‍यंगकानि । त्‍वमु‍रसि मम कृत्‍वा यत्र निद्रामवाप्‍ता ।'' अशि‍थिलपरिरंभव्‍यापृतैकैकदोष्‍णों: ।अविदितगतयामा रात्रिरेव व्‍यरंसीत् । श्‍लोकों का संदर्भ सूचित है ।

४. यह उस समय के इंग्‍लैंड की कड़ाके की सर्दी का वर्णन है तथा उसमें मानसिक प्रतिबिंब भी ध्‍वनित है ।

५. वायु के अत्‍युच्‍च शिखर पर चढ़ जाना जितना कठिन, उतना ही केवल कल्‍पना की सृष्टि में ही निहित ध्‍येय के लिए जान की बाजी लगाना कठिन है ।

६. शाक्‍त संप्रदाय में यह चंडिका 'छिन्‍नमुंडा' नामक तात्विक रूप प्रसिद्ध है ।

७. श्रीबंदा शिखों का विख्‍यात नेता । श्री गुरुगोविंदजी का शिष्‍य । मुसलमानों की इसने भयंकर दुर्दशा कर दी । अंत में वह पकड़ा गया ।

८. पंजाब से बंदावीर को पकड़कर दिल्‍ली लाया गया । तब लोहे के पिंजडे में बंद करके उसे लाया गया । क्‍योंकि मुसलमानों के दिल में उसकी फुरती की तथा कामयाबी की इतनी दहशत थी कि वे समझते थे कि उसके पास उद्भुत सिद्धि तथा जादू है और वह मनचाहे बिल्‍ली का ऐच्छिक रूप धारण करके निकल भाग सकता है ।

९. सद्य = ताजा । बंदावीर के पहले उसके दो सौ शिष्‍यों की हत्‍या उसके सामने की गई । और तिसपर भी जब वह गलितगात्र न हुआ तब अंत में उसका इकलौता राजपुत्र उसके सामने बहुत यातनामय तरीके से मारा गया- यह वर्णन इसमें तथा अग्रिम छेदक में है ।

१०. दो सौ से अधिक शिष्‍यों की हत्‍या (मुसलमान धर्म को स्‍वीकार न करने पर) करने से भोथरा हुआ मुसलमानी खड्ग ।

११. वीर के कर्तव्‍य के रूप में बंदावीर को अपने पुत्र के शहीद हो जाने से एक तरफ हर्ष ही हुआ । परंतु उसका पिता-हृदय दूसरी तरफ प्राकृतिक अपत्‍य-प्रेम से भीतर-ही-भीतर विह्वल हो रहा था । अपने पुत्र की रक्षा करने में असमर्थ अपनी दुखद स्थिति से आकुल था ।

१२. महम्‍मद गोरी से ।

१३. कपूत = बंदावीर का हत पुत्र । उसका हृदय निकालकर बंदावीर के मुँह में ठूँसा गया । इसलिए कि ऐसे छल से ऊबकर वह मुसलमान बन जाए !

१४. यस्मिंस्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्‍यते । -गीता ।

१५. बंदावीर की हत्‍या के उपरांत यद्यपि कुछ समय के लिए हिंदुओं का आंदोलन दबा रहा, फिर भी वह पुनरपि प्रदीप्‍त हुआ । क्‍योंकि जिन्‍हें मुसलमानों ने 'मूषक' कहकर नीचा दिखाया था, वे महाराष्‍ट्रीय वीर अटक तक हमला कर विजय प्राप्‍त कर गए । सिख भी पुन: प्रबल हो गए और उन्‍होंने पंजाब में एक प्रबल हिंदू राज्‍य स्‍थापित किया । इस इतिहास का यहाँ संदर्भ है ।

१६. सिंहासन को धारण करनेवाली, पैर के स्‍थान पर बनाई गई सिंह की आकृतियाँ । लक्षणा से मुसलमानी साम्राज्‍य का आधारभूत उनका बल ।

१७. मुसलमानी सेना । पैरों तले कुचली गई हिंदू शक्ति की मिट्टी-रेत ऐसी तप्‍त हो गई कि उसने उसे कुचलने वाले शत्रु की पैदल फौज को जलाकर भस्‍म कर दिया ।

१८. दक्षिणायन = प्रतिकूल काल ।

१९. नर्क समान उस स्‍थान पर बंदा का शव फेंका, नर्क समान असह हिंदुओं की अवनत स्थिति में बंदावीर ने शूरता छोड़े बिना अग्रिमों के यश के लिए प्रस्‍तुत अपयश को स्‍वीकार किया, जिस नर्क में उसकी आत्‍मा गिर जाएगी, ऐसा मुसलमानों ने शाप दिया-आदि सभी अर्थ इस पंक्ति में सूचित हैं ।

२०. यदीय ='बदावीर जिस हिंदू वंशवृक्ष की एक शाखा है, उसकी एक टहनी मैं हूँ ।'

बेड़ी

( परिचय : जेल में कैदियों को सजा के रूप में जो बेड़ी मिलती है, उसे किसी आभूषण की तरह माँज-पोंछकर चमकीली रखना होता है । इस व्‍यावहारिक विरोधाभास से एक दार्शनिक विरोधाभास सावरकरजी के मन में आया, जो इस कविता में प्रस्‍तुत है ।)

' चमकाते चमकाते । अपने हाथों में

क्‍या लेकर रहते दिन भर, बोलों तुम

बंदी ! चाँदी के । अथवा सोने के

क्‍या अलंकार ये, जिको ढोते तुम ?'

अजी नहीं, नहीं भाई । केवल लोहे की

बेड़ी मेरी सदैव दु:ख देती

जकड़कर मेरे । इन पैरों को

गति को मेरी सदैव रोके रखती

'तोड़-फोड़कर जिसे । जला दे सही,

क्‍या उसको ऐसा चमकाना होता है ?

स्‍वयं ही, अपनी ही । यह बेड़ी

क्‍या उसको ऐसा प्रेम दिलाना है ?'

छूटे टूटे ना । यह कभी भी ।

पर जब तक मेरे इन पैरों में

तब तक यदि इसको । जंग लगे

तो और करेगी पीड़ा पैरों में

'चरणों में इच्‍छा के । जो बद्ध रहे

किन विधिनियमों से बनी है बेड़ी ?'

जाने कौन अजी । स्‍पष्‍टतया

पर मुझे लगे ऐसा कि

इच्‍छा बन जाए । उसकी तो

बेड़ी ही बने पिपासा ।'

(अंदमान)

( परिशिष्‍ट : बंदीगृह में सजा के रूप में पहनाई गई बेड़ी को साफ ही क्‍यों किया जाए, ऐसा सोचकर बहुत बार बंदी बेड़ी को साफ करना छोड़ देते हैं । और सजा की बेड़ी का लालन-पालन नहीं किया इसलिए बंदिपाल से दूसरी सजा लेनी पड़ती है । इसके अलावा अंत में साफ न करने पर उस बेड़ी को जंग लग जाता है और वह अपने पैरों में अधिक ही चुभने लगती है । अर्थात् शत्रु क्षरा दी गई एक सजा को ठीक से न सहलाने पर स्‍वयं को चौगुना सजा स्‍वयं द्वारा ही दिलाई जाती है । परिणामत: अंत में सजा की बेड़ी को ही किसी आभूषण की तरह माँज-पोंछकर चमकीली रखनी पड़ती है । इस विरोधाभास से स्‍वाभाविक रूप में इस जगत् की 'इच्‍छा के' पैरों में स्थित उस मूल बेड़ी की, उस 'विधिनिषेधीय बेड़ी' की धर्माधर्म की स्‍मृति हो जाती थी । यह लोहे की बेड़ी उस मूल बेड़ी केवल एक आंशिक श्रृंखला है । इच्‍छा स्‍वातंत्र्य को धर्माधर्म की बेड़ी की जो सजा प्राप्‍त होती है, उसे भी इसी कारण से सहलाते बैठना पड़ता है । ' विधिनिषेधों' की बेड़ी भी उल्‍टे पोंछकर रखनी पड़ती है । अन्‍यथा और भी दु:ख प्राप्‍त होता है । इस विचार-परंपरा की धारा में ही अग्रिम प्रश्‍न आ जाता है । विधिनिषेधों की यह मूल श्रृंखला किसने बनाई ? इच्‍छा के पैरों में उसे किसने डाला ? इसे कौन बताए ?|)

कोठरी

( परिचय : जेल में आने पर कैदी अपनी-अपनी कोठरी को ममता से साफ रखने लगते हैं । अपनी कोठरी साफ करते समय उनके मन में जो खयाल आए उन्‍हें सावरकरजी ने इस कविता में प्रस्‍तुत किया है ।)

'लीप-पोतकर जो । इतना तुम

दिन भर सजा रहे हो

हे बंदी ! मंदिर ना । या कोई

महल सुशोभित हो ?'

नहीं जी, केवल ये कारा की

दीवारें अँधियारी

रखे बनाए मेरी । अमावस ये,

पूर्णिमा दूर जो ठहरी

'फिर ये कोठरी की । दीवारें

क्रूर, तोड़ने सारी

सरसाओगे तुम । तो, होगी न

संभव मुक्ति तुम्‍हारी ?'

मुक्ति नहीं जी छोड़ो । दीवारें

हैं ये यदि मिट्टी की

तट जो कारा का । उसकी तो

दीवारें पत्‍थर की

' आशा मत छोड़ो । दुनिया में

पत्‍थर की दीवारें

ढल ही जाती हैं । तट भी तो

टूट टूटते सारे !'

फिर भी क्‍या, वह तो । आंशिक ही

न पूर्ण मुक्ति भी होगी

इस कारा के पार । क्षितिजों की

दीवारें फिर होंगी !

'सुना पर हमने हैं । लोगों ने

उनको भी लाँघा है

वृत्ति रूप क्षितिजों के । परे स्थित

असली मुक्ति भी है !'

रंगों में उषा के । तथा शाम के भी

चित्रित प्रभुद्वारा । सत्‍यों के

रूप मनोहर भी

उस ' मैं ' के वे रूप । हल्‍के से

नभस्थित छत पर भी,

हास्‍य-अश्रु के ये । झूले हैं,

उनपर झूम रहा था

दिखते थे तब तक । मैं उनको

निष्‍पल देख रहा था !

(अंदमान)

परिशिष्‍ट : बंदीगृह की कोठरी को प्रत्‍येक बंदी झाड-पोछा करके साफ रखने लगता हैं, क्‍योंकि उसमें उसे रहना ही है । आगे चलकर बिलकुल खुद की स्‍वच्‍छंदता की उमंग के रूप में सालोसाल के सान्निध्‍य से उस कोठरी को बिलकुल ममता के साथ साफ करते हुए औरों से स्‍पर्धा करने लगता है, कि मेरी कोठरी साफ है या तेरी ? ऐसे समय उस कोठरी को साफ करने में मग्‍न होते-होते मन में जो विचारतरंग आते थे उन्‍हें इस कविता में गूँथा है । आशंका मन से प्रश्‍न करती थी कि इस कोठरी को तोड़ा जाए या उल्‍टे उसकी लिपा-पोती की जाए ? किंतु आशंका को बुद्धि जवाब देती थी कि जिस तरह कोठरी बंदीगृह है, उसी तरह यह शरीर भी एक बंदीगृह ही है, परंतु क्‍या हम उसे साफ-सुथरा नहीं रखते हैं ? दूसरी बात यह कि यदि आप 'मुक्‍तता कहेंगे तो उसकी व्‍याप्ति बंध की विस्‍तीर्णता के साथ बढ़ती ही जाती है । उस मुक्‍तता को मात्र इस भौतिक एकांतवासिनी को तोड़कर कैसे पा सकते हैं ? इसके आगे बंदीगृह का पत्‍थर वाला परकोटा और मानसिक इच्‍छाक्षितिज का तृष्‍णारूप परकोटा ! पूर्ण मुक्‍ताता कहाँ है ? आशंका फिर से कहती थी, लंकिन वे 'जीवन्‍मुक्‍त' कौन हैं फिर ? क्‍या उन्‍होंने चित्‍तवृत्तियों के क्षितिजों को लाँघकर संपूर्ण मुक्ति नहीं पा ली ? तिसपर उल्‍टा जवाब आता था, उनकी मृत्‍युओं के उपरांत आत्‍मा का भाव क्‍या हो गया, इसे ज्‍यादातर वे ही जानें, परंतु जीवन्‍मुक्‍त जब तक जीवित थे, तब तक उस वेदांतिक कुलालचक्र की पूर्वगति के लिए क्‍यों न हो, पर बंधनों में फँसे हुए ही दिख पड़ते थे । 'उषा' के अर्थात् जन्‍मप्रभाव के और 'शाम के' अर्थात् मृत्‍युप्रलय के रंग से चित्रित इस 'मैं' के अर्थात अहंकारी व्‍यक्तित्‍व के आकाश में आँसू-हास्‍य की, सुख-दु:ख की जो खूँटियाँ ठोकी गई हैं, उनसे टँगे हुए वृत्ति-रूप झूले पर ही उनको सुख-दु:ख के झोंके लेते हुए देखा था ! इस जीवन में जीवन्‍मुक्‍त भी पूर्ण मुक्‍त-से दिखाई नहीं देते हैं । श्रीकृष्‍ण क्रुद्ध हो जाते थे, पार्थ की जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा पूरी कैसी होगी- इस चिंता में रात भर करवटें बदलते रहते थे । बुद्ध के पेट में दर्द था । रामकृष्‍ण को भूख ने रुलाया था, अपने शिष्‍य युवक न दिखाई देने पर रामकृष्‍ण शोक करते थे ! तुकाराम पंढरी की राह पर रोते बैठते थे। चैतन्‍य ने 'हे प्रिय, है प्रिय' करते-करते वन-बीहड़ में भटकते-भटकते समुद्र का नीलश्‍यामल रंग देखकर उसी को घनश्‍याम मानकर उसमें छलाँग लगाकर देहत्‍याग किया !

रवींद्रनाथजी का अभिनंदन

(परिचय : सन् १९१३ साल के श्रेष्‍ठ साहित्‍य के लिए दिया जाने वाला नोबेल पुरस्‍कार कविवर रवींद्रनाथ टैगोरजी को प्राप्‍त हुआ, यह सुनकर सावरकरजी को अत्‍यंत हर्ष हुआ और उस हर्ष के आवेश में उन्‍होंने यह कविता रची, जो उन्‍होंने अंदमान से रवींद्रनाथजी को भेज दी ।)

: १ :

समर-वाष्‍परथ-कक्ष बैठकर

चिर-विवासिता देवी सुंदर

भारती राजधानी पर । लौटत है

बहु भीड़ भाट-बंदी की

सुस्‍वर में लहरी स्‍वर की

ध्‍वनि घोर रणघोषों की । क्रांति के

मैं युवा धृष्‍टता युक्‍त

कह पड़ा तब अकस्‍मात्

'मेरा भी वीर-रस गीत । सुना जाए'

'है कक्ष पूर्ण कवियों का

पर वहाँ पड़ा है सूखा

क्रांति के वाष्‍पयंत्रों का । कक्ष जो !'

देवी की आज्ञा सुन, मैं

मलधूम कोयलागर में

उस अग्निप्रेरक कक्ष में । लग गया

यह घुमत आज जय किसका ?

भारवी-कालिदासों का

कुकुट ले, मान हो किसका ? यह रवि !

मलधूम गंद से हटके

चमड़े को उड़ा-उड़ा के

जयघोष तव विजय के । मैंने किए ।

: २ :

उस यज्ञ समारोह में

ऋषियों के सम्‍मेलन में

आहुति होत हवनों में । अर्चना

लटकाए कली बालों में,

इक अन्‍य कली ले कर में,

यज्ञ के समारोह में । भारती

निजदास्‍यविमोचनार्थ

हाथ की कली ही त्‍वरित

हवन में अर्पण करत । मम माता

बालों की कली खिल गई

भ्रमरों की भीड़ लग गई

मधु-सुगंध वितरित हुई । दूर तक

यश उसका घोषित करता

अलि-पुंज गुंज-रव करता

परिपूर्ण होत सुमनता । तब उसकी

हे फूल ! केश में खिलते,

हे फूल ! हिलते-डुलते,

अभिनंदन हवन में जलते। करत मैं

: ३ :

यह चंदन-तोरण-हार

शोभत है देवद्वार

दिव्‍यार्थ कला सुंदर। सूचित

कांचनमय शोभत सारा

मणि-रत्‍नजड़ि‍त है प्‍यारा

फूलों से मंडित न्‍यारा । गंधित

इस पुण्‍य-उष:काल में

पूजार्थ भरी भीड़ में

सैकड़ों लोग रत स्‍तुति में । तोरण के

मंदिर में एक पुजारी

जगदंबा-पूजन जारी

चंदन को घिसता भारी । प्रेम से

चकली पर घिसते-घिसते

चंदन जो तुम प्रति देते

स्‍वीकरो बधाई हँसते । तोरण रे !

: ४ :

श्रीविक्रम सिंहासन वह

चिरलुप्‍त दिव्‍य, दिव्‍या वह

वीणा भी, गाती थी वह । मेघदूत

श्रीविक्रम सिंहासन वह

लुप्‍त है अभी भी, पर वह

वीणा है प्रगटत अब यह । तव यश में

जो गान लुभावत उसका

संतुष्‍ट चित्‍त वसुधा का

अवतरत कविकुलगुरु का । काल ही

कारा में, कांचन दीप्ति

हे रवींद्र, तव यश-कीर्ति

श्रृंखलाबद्ध ही कवि मैं । लो प्रणाम ।

टिप्‍पणियाँ : १. भारतमाता अपनी राजधानी को वापस लेने हेतु सैनिक वाष्‍परथ में निकल पड़े ।

२. इस कार्य में कवियों की कमी नहीं है, कमी है तो उस समररथ के यंत्र में कष्‍ट करनेवालों तथा स्‍वयं कोयला बनकर जलकर गति देनेवालों की; सो वहाँ जाओ ।

३. इसलिए महाकवि की उमंग छोड़कर मैंने इस दूसरे कर्तव्‍य को स्‍वीकार किया और महाकवि बनने का सम्‍मान जो उन्‍हें प्राप्‍त हुआ, उसी में मैंने संतोष मान लिया ।

४. रवींद्रनाथ ।

५. इस समय अंदमान में सावरकरजी चमड़े की चद्दर लपेटकर कोयला भरने का काम कर रहे थे । स्‍वाभाविक रूप में रूमाल की जगह उसी चद्दर को ही उड़ा-उड़ाकर रवींद्रनाथजी का अभिनंदन उन्‍होंने मनाया ।

६. भारतमाता के विमोचनार्थ जो यज्ञ हो रहा था उसके पूजनार्थ उसने एक कली चढ़ा दी और दूसरी बालों में लटका दी । बालों में जिस कली को लटकाया वह खिल सकी । उसके गौरव में समूचे पुष्‍पजाति का ही गौरव हो गया, उसी तरह रवींद्रनाथजी के गौरव में अखिल भारतीय कवियों का राष्‍ट्रीय गौरव हो गया, ऐसे मानकर उस यज्ञ की अग्नि में जलनेवाला यह दूसरा फूल उस पहले फूल का अभिनंदन कर रहा है ।

७. भारतीय महाकवि बनकर तोरणा बनने की मनीषा कवि के मन में थी; परंतु चकली पर घिस-घिसकर देवी की पूजा संपन्‍न करने का कार्य उसके जिम्‍मे आ गया । अपनी अधूरी आकांक्षा को किसी भारतीय ने पूर्ण कर दिया, जगत् को भारतीय प्रतिभा ने चकाचौंध कर दिया इसके लिए कवि कृतार्थता का अनुभव कर रहा है ।

हलाहल बिंदु

(परिचय : 'गोमांतक' काव्‍य में भार्गव गाँव के मठ में एक साधू रहता था । उसके द्वारा की गई शिवजी की प्रार्थना इस पद्य में निहित है ।)

हलाहल प्राशन । किया जब । हलाहल प्राशन

प्रभुजी देखो, बिंदु उसी का नीचे अवतीर्ण ।।ध्रु.।।

उपाय तुम कितने । करेगे । उपाय तुम कितने

सुख-दु:खों के जहर हलाहल का उपशम करने

शत सूर्यलताओं के नव-नव सोमपुष्‍प कितने

अमृतार्द्र, लाकर निचोड़े शीर्षोपरि अपने

फेंक दिए निर्माल्‍य बनाकर वापस भी कितने

चंद्रमौलि भोला । तथापि । चंद्रमौलि भोला

उस अमृत का कोई बिंदु नीचे ना निकला ।।१।।

महादेव तुम हो । प्रभु जी । महादेव तुम हो

इन दीनों के मन में तुमसे ईर्ष्‍या कभी न हो

अमृतवल्लि छोड़ो । तुम्‍हारी । अमृतवल्लि छोड़ो

विवेक बूटी का ही थोड़ा अनुपान कराओ

जला देत पूर्ण । विश्‍व को । जला देत पूर्ण

सुख दु:खों का जहर हलाहल नीचे अवतीर्ण ।।२।।

आकांक्षा (Aspiration ) (किसी शापित गरुडकन्‍या की)

(परिचय : यह काव्‍य 'मेघदूत' के यक्ष संदेश के तथा 'भागवत' की रुक्मिणीपत्रिका के आधार पर रचा गया है । इसमें किसी शापित गरुडकन्‍या ने अपना प्रेमपूर्ण मनोगत नारद के हाथों अपने विजयी प्रियकर का विदित किया है । उसके माँ-बाप स्‍वकुल की महानता का अभिज्ञान शाप के प्रभाव से भूल जाते हैं, परंतु गरुडकन्‍या उसे भूल नहीं पाती । भारतीय जनता की गत पीढ़ी अपनी महानता को यद्यपि किंचित् काल भूल गई, तो भी भावी पीढ़ी उसे भूल नहीं पाएगी, ऐसी ध्‍वनि इस काव्‍य में है ।)

हेमाद्री के गरिगह्वर में घोंसले को बनाता,

उसमें कल्‍पद्रुम कुसुम की मृदुल शय्या रचाता,

ऐसे विहग-श्रेणि-सम्राट् तेजसंपन्‍न खग को

शापों से ही करत आहत काल, दे दंड उसको ।।१।।

वह कांता के सह खगपती शाप से बिद्ध होकर

अपनी पहचान विस्‍मृति मे सात सालों में खोकर

जैसे तारे टूट जाएँ, वे गिरत आसमाँ से

आए भू पर शीघ्र गिर के लो-से या शिला-से ! ।।२।।

कौओं में ही गिनति अपनी युगुल वे कर, सुखेन

गरुड होकर अधमता से बीतते काल मलिन

उस दंपति की कोख से मैं जन्‍म लेकर पधारी

शापग्रस्‍त भ्रमित मन से काक रूपेण सँवरी ।।३।।

माता ने तो बरगद-तरु में पालना भी बनाया

पर मेरा दिल बहुत ऊँचे पर्वतों ने लुभाया

स्‍वप्‍नों में मैं बात करती बिजलियों से, हवा से,

सुनकर माता बहुत डरती थी अशुभ-शंका से ।।४।।

देता था जब प्‍यार-सँवरा कवल मृत्पिंड जनक

इस बाला के नयन सहसा बनत रे, लाल-सुर्ख !

सुरसुराते दंत-नख थे, घोर फूत्‍कार सुनती,

जिह्वा मेरी रस अपरिचित-से के लिए तिलमिलाती ।।५।।

सहज मुझको उड़ना आया तब सभी काक-संघ

ले जाते थे मुझ गुरुडजा को सभी साथ-संग

तब चीत्‍कारों को करत थे गृध्र औ' बाज पक्षी

देख मुझको उड़ जाते थे भीत वे मांसभक्षी ।।६।।

गाते थे जब काक सहसा देख कीड़े-मकोड़े

उच्छिष्‍टों को ले जाते थे, ज्ञातिकौशल्‍य चाढ़े

शर्म मुझको आती थी तब, मैं स्‍वयं तेज उड़ लूँ

तूफानों में भयद सागर उफनता जब देख लूँ ।।७।।

ऐसे ही एक दिन हम सब जा रहे थे कहीं से

जाते-जाते भ्रमित होकर भटकते जंगलों से

कौओं में तब भयविकट-सी खलबली मच गई थी

जब अपरिचिता आग सहसा बदन को छु गई थी ।।८।।

सों-सों फूँ-फूँ कर रहे थे घोर विष के फुआरे

तेज गति से बह रहे थे वायु के भी नजारे

आकर्षण में बहुत भीषण जब सभी फँस गए थे

आक्रोशत तब उड़ न पाते, निम्‍न वे गिर रहे थे ।।९।।

जैसे सणसण झुंड निकले कृष्‍णपुच्‍छक शरों के

सीधे गिरते इक गह्वर में घोर-चंडी गुफा के

फूत्‍कारों में दहन-वमते, तेज रफ्तार से वे

पत्‍ते जैसे खग टपटपा भस्‍म होते चले वे ।।१०।।

मैं भी वैसी अवश बन गई, भिन्‍न थीं पर वजहें

फूँ-फूँ ध्‍वनि को सुनकर बनी थीं मदोन्‍मत्‍त चाहें

उत्‍तेजित होकर उठ गई, भूख भी दीप्‍त हो गई

पंखों-दाँतों में सनसनी तीव्र-सी इक मच गई ।।११।।

नीचे से उस भयप्रद कुहर ने तभी खींच लिया

उत्‍सुकता की नव अवशता ने मुझे निगल लिया

मैंने नीचे तेज गति से, निडर बन, कूद लिया

लेकिन उस क्षण 'हाय, बाले !' आह को श्रवण किया ।।१२।।

देखा तो क्‍या, जनकजननी घोर गह्वर में जाते,

होने वाले थे दहन ही, खींचते निम्‍न जाते

अपनी गति को रोक, मैंने प्रथम उनको उठाया

ऊँचे से इक शिखर पर ले जाकर उन्‍हें बिठाया ।।१३।।

इतने ऊँचे उस शिखर पर स्‍वप्‍न या सत्‍य देखा

मेघावलि गिरि पर मृदुल-सी शुभ्र कर्पास-रेखा

उसको करते तितर-बितर यह घुस गया एक पक्षी

पंखों से सब मेघ बिखरे, बन गई चारु नक्षी ।।१४।।

आया जब उस भयद गह्वर के पास ही, कुछ रुका-सा

पक्षी अपनी तनु अधर में तोलकर स्‍तब्‍ध जैसा

कुछ रुककर वह शीघ्र तिरछा ले निशाना सुसज्‍ज ।।१५।।

गह्वर में उस घुस गया जी बाण जैसा सुसज्‍ज

प्राणी ही था विवर-मुख सा ! न गह्वर ! क्रूर कर्म

देता-घेता, चिपक खग को, घोर आधात मर्म

खग कुछ हटा, फन उठ गया, मत्‍त आह्वान फूँ-फूँ ।।१६।।

लिपट ही लिया, कभी डस गया, ध्‍वनि उठे एक फूँ-फूँ

कुछ ऐसी ही पकड़-पकड़ी खून से लिप्‍त होकर

दाँतों पर उन क्रकच-नखरों की झपट हो भयंकर

दो तूफानें एक-दूजे से कभी टकर जाएँ

वैसे दोनों जूझ निकले, खून ही खून आए ।।१७।।

झपट-झपटें, पकड़-पकड़ी अंत में फन विषैला

सहसा मुड़कर फँस गया जी, चोंच में तब कराला

गुस्‍से में वह गरल ओका, पीस लीं उग्र दाढ़ें

पुच्‍छ पटका तड़ि‍त जैसा भूमि पर तड़-तड़ाड़े ।।१८।।

आतिशबाजी में निकलता अग्नि का बाण जैसा

अरि को लेकर दमन करता गगन में दूर वैसा

मर्मांतक अहि लिपटकर जब जोर से दम घुटाया

हा-हा ! पक्षी रिपुसहित ही भूमि पर उतर आया ।।१९।।

चंचू में कसकर फँस गया कंठ ओकत लहू तब

ओकत शोणित विहग तरु से लपेटें दबातीं जब

छोड़े ना यह खग पर फन को, यह लपेटें न छोड़त

रिपुओं की इक पल भर हुई स्‍तब्‍ध-सी जूझ किंचित् ।।२०।।

उसकी हिम्‍मत शिथिल पड़ गई और दम घुट गया था

ऐसे मौके को विहग भी बस अभी चाहता था

उसने अपना जोर पूरा प्राण-पण से लगाया

सारी उसकी वे लपेटें तोड़ मुझको हँसाया ।।२१।।

या गिर गया बदले के कोड़े का यह रज्‍जु ही

प्राणी अपनी तनु बनाता वर्तुलाकार सच ही

अंते प्राणों सहित ओकत दीप्तिमान एक रत्‍न

जैसे निद्राधीन रवि परिवेष के साथ शयन ।।२२।।

विहग लेटत दूर कुछ औ' हाँफता थक गया-सा

मृत, परि रिपु, को स्‍पर्श करने को नहीं धैर्य जैसा

नि:शंका पर अचिर जयश्री विहग को हार डाले

स्‍पर्धा मुझसे सहजता से कर रही, प्रिय सुन ले ।।२३।।

वह चंचू, वे क्रकचनखर, वह हैमपक्ष्‍मप्रभा भी

रोबीली वह जय-शिथिलता, पांख की खोज वह भी

ग्रीवा वह जो प्रबल, झुकना मानती ही न बिलकुल

बन जाऊँ मैं विहग‍पति की पट्टरानी समाकुल ।।२४।।

दर्प की जो मूर्त विलसत उन्‍नता औ' वक्रता भी

शौर्य की ही असिदललता पर फली लालगर्भी

या मछली को कालरूपी, पकड़ने का वक्र कँटिया

ऐसी चंचू का मधु चुंबन करने को जी ललचाया ।।२५।।

लेकिन 'आओ घर' सुनकर ही आर्तवाणी पिता की

लौटी घर, पर तिलमिलाती, देर से ही आइ झपकी

तब सारी वे दिन भर घटीं घटनाएँ विचित्र

घुलकर स्‍मृति में उभर आए रम्‍य-से स्‍वप्‍नचित्र ।।२६।।

प्राणी की उस मृदुल तनु की एक शय्या बनी, जी,

और मुझको विहग ने दृढ प्रेम-आलिंगन किया, जी !

मर्मस्‍पर्शी अभिनव कला ! उफ् कितनी मधुर-सी !

इतने में माँ खींच मुझको, हाय रे ! तेज बरसी ।।२७।।

'बेटी, पागल हो गई तुम ! छोड़ दो यह खयाल ।

उसकी धुन में मोल लोगी संकटों का ही जाल ।

खाना पिंडों को ही घर में, नींद में मस्‍त रहना

ऐसी सुख की जिंदगी को छोड़ क्‍यों कष्‍ट करना ?' ।।२८।।

इतने में तूफान आया, तिमिर छाया निराला

बारिश की ही बोझ से नभ झुक गया, सिंधु खौला

दारू पी के प्रकृति सहसा झूम लेती हवा के

झूले पर, करकर पकड़ के डोर भी बिजलियों के ! ।।२९।।

दो-दो क्रोधोद्धत गरजते मेघ ग्रांडील आए

इक-दूजे से धडड टकरत रहत, हम देख पाएँ

दोनों को फिर विलग करता, पंख फैले हुए-से

पक्षी शोभत अधर दोनों-बीच में पूल जैसे ।।३०।।

दोनों मेघों पर हम तभी हो गए जी सवार

चंचू का अंकुश चुभाकर मत्‍त-गज-सम खुमार

रोबीली फिर यह सवारी चल पड़ी दूर दूर

कोई मंदिर पूर्व में था मणिखचित-सा सुदूर ।।३१।।

रानी थी रति, मदन राजा था जहाँ प्रेममग्‍न

ऐसे कोई राज्‍य में हम आ गए शीघ्र-पवन

हैमी हौदों में भर रखा था उष:काल संग

मार्गों में औ' छिड़कते थे चेतना-दिव्‍य-रंग ।।३२।।

उन रंगों से इंद्रधनु की सज्‍ज पिचकारियों से

लीला में हम रंग-रँगे, सुख बढ़ा गीत-मधु से

आई वर्षा गगन भर में कौमुदी की झनाझन

प्राणों के ही कलश भर के कर लिया स्‍नान, प्राशन ।।३३।।

प्राणी की उस विपुल तनु की मांसला मृदुल शय्या

मेघों की एक मृदु रजाई ओढ़ने हेतु रम्‍या

मेरा प्‍यारा प्रियकर मुझे फैल बाँहें, बुलाता

जाने को मैं बहुत आतुर, पर नहीं पैर बढ़ता ।।३४।।

सारे गात्र ही जम गए-से, हिल न पाती तभी मैं,

मुझको सारे कीट-कृमि भी हँस रहे दिल्‍लगी में

लज्‍जा से मैं छटपटाती, जा मिलूँ प्रिय विहग से

ऐसी हालत बन गई औ' जग गई में शयन से ।।३५।।

वैसी ही मैं भ्रांतचित्‍ता छोड़ घर चल पड़ी थी

सपने जैसी निबिड वन में शीघ्र ही आ गई थी

फैला के गिरि-स्थित मेघों की राह मैंने बनाई

हा-हा ! लेकिन प्रियकर रहीं ना दिया जी दिखाई ।।३६।।

श्रांता, भ्रांता, मैं पिया की याद में कर रुलाई

दिव्‍या मूरत एक सहसा गगनगामी दिखाई

वीणा हाथों में मधुस्‍वनी, मेघ भी दाद देत

पैरों में पहनी खड़ाऊँ, जो सितारों से जड़ि‍त ।।३७।।

मेरे शोकान्वित बदन को देख, वे निकट आए

वार्त्‍ता सारी शाप-खल की विदित मुझसे कराएँ

'बाले, तू है गरुडतनया, प्रेम जिससे तुझे है

वह भी तुझसे प्रणयवश है, बस, यही चाहता है ! ।।३८।।

मिट्टी में वह विकल लेटा आँसुओं को बहाता

जिंदा नागों की तरफ भी नजर ही ना बढ़ाता

प्राणों की रक्षा तुम दोनों की, तथा माँ-पिता की

शापों से भी मुक्ति करने प्रणय उ:शाप बाकी ।।३९।।

ऐसा सोचे, देख उसको तीव्र शोकायमान

मैं दौड़ा जी मदद करने, पर वह स्‍वीकारे न

दुष्‍टों ने जो गलत अफवाह की प्रसारित कभी से

'मैं हूँ पक्‍का कलहकर्ता' - मान्‍यता दे उसी से ।।४०।।

मैं ही क्‍यों जी, कलह करने में मजा लेत सर्व !

फिर मैंने तो बहुत सालों से दिया छोड़ सर्व !

लोगों की ही मदद करने मैं सदा यत्‍नरत हूँ,

तो भी कोई सच न माने, इसलिए दु:ख कर लूँ ! ।।४१।।

ऐसी बाते हृदयस्‍पर्शी सुन रही, और सहसा

मैं देवर्षी के चरण में गिर पड़ी हत-पिपासा

आश्‍वस्‍ता कर, मुझ अभागिन को उन्‍होंने उठाया

आज्ञा दे दी जो उन्‍होंने, पत्र मुझसे लिखाया ।।४२।।

फट जाए वह काक-घर, या मैं बनूँ जीव क्षुद्र

क्‍यों ऐसी यह विषम-वार्त्‍ता, शापवृत्‍तांत शीघ्र

इसको पहले व्‍यसन-सम जो तिमिरग्रस्‍ता किया है

दिव्‍यालोकन प्रिय अब तुमको प्रेम अर्पण किया है ।।४३।।

मंथन कर लूँ विषधर विष-व्‍याप्‍त रत्‍नप्रभा का

माध्‍याह्नों में दौड़ सह लूँ ताप आदित्‍य-मणि का

तूफानों में झूम लूँ मै, यह सभी हर्ष देता

कौओं के घर रहकर जिऊँ, यह तभी मृत्‍यु देता ।।४४।।

पंखों में, जी, प्रबल मुझको खींच लो अब प्रियोत्‍तम !

अंगों में है तीव्र इच्‍छा : कब कसेगा प्रियोत्‍तम ?

ताक्र्ष्‍या की अब लाज राखो, काकगतति से छुड़ा लो ।

आओ ! आओ ! प्रिय विहगजी, अब मुझे तुम बचा लो ! ।।४५।।

रति से अनुकंपा से, अथवा दाक्षिण्‍य से हि तुम आओ

रानी हो या दासी, कुछ भी मुझको मान, ले जाओ

'हाँ' में है यह जीवन,'ना' में तुम्‍हारी मृत्‍यु है जिसकी

मूर्तिमती आकांक्षा मैं हूँ, तुम हो मूरत ध्‍येयों की ।।४६।।

टिप्‍पणियाँ १. किसी भयानक तथा गहरी गुफा की भाँति जिसका प्रचंड मुख खुला है, ऐसा वह प्राणी अजस्र तथा भयंकर महासर्प था ।

२. वह महासर्प ।

३. महासर्प ।

४. वह प्राणी अर्थात् वह महासर्प जब मरणासन्‍न-होकर गिर गया तब ऐसा लगा कि मानो मूर्तिमंत प्रतिशोध के चाबुक की रस्‍सी ही नीचे गिर गई ।

जगन्‍नाथ का रथोत्‍सव

(परिचय: जगन्‍नाथपुरी क्षेत्र में रथ की शोभायात्रा प्रतिवर्ष निकली जाती है । यह शोभयात्रा एक उदात्‍त तथा विशाल प्रतीक है, ऐसी कल्‍पना करके उसका वर्णन इस कविता में किया है । इसमें आश्‍चर्य के साथ प्रश्‍न किया है कि गतियों के अश्‍व जोड़े हुए दिक्क्षितिजों के रथ में बैठ विश्‍वनियंता जगन्‍नाथ काल की अटूट ढलान पर कहाँ जा रहा है ?)

: १ :

ऐश्‍वर्य के साथ । इस तरह ऐश्‍वर्य के साथ

महाराज, आपका कहाँ पर निकल रहा है रथ ।।धृ.।।

दिक्-क्षितिजों का दीप्तिमान रथ त्‍वर्य

इस काल मार्ग की ढलान पर अनिवार्य

नक्षत्र-कणों की धूलि उड़त वैद्वर्य

युगक्रोश अमित । संचरत । युगक्रोश अमित

महाराज, आपका कहाँ पर निकल रहा है रथ ?

: २ :

पूछना ही व्‍यर्थ । प्रश्‍न मम । पूछना ही व्‍यर्थ

शोभायात्रा कहाँ चल पड़ी, और फिर किमर्थ ?

दूजे किस द्वार । दूजे किस द्वार

अथवा केवल दमक-चमककर लौटे निज मंदिर

ये शतसूर्यों की बहुत मशालें जलतीं

बीच में शतावधि चंद्रज्‍योति भी चलती

सरसर्राते धूमकेतु-शर, न गिनती

कई बार मत्‍त । यह भी । कई बार मत्‍त

चमक दमकती रात्रि पुरातन अंधकार-ग्रस्‍त

: ३ :

लंबी सी पीठ पर । आगे या । लंबी सी पीठ पर

गति प्रत्‍यक्षा यत्‍न कर रही रथ को खींचा कर

इच्‍छाओं में औ' भूतमात्र वेगों की

गूँथी है यह लगाम तव इच्‍छाओं की

उस ढलान पर, अनिवार्य जो काल की

अधर ही खेलत । रथोत्‍सव । अधर ही खेलत

महाराज, आपका कहाँ पर निकल रहा है रथ ?

(अंदमान)

टिप्‍पणियाँ १. जगन्‍नाथ की शोभायात्रा काल की जिस ढलान पर आ रही है, उस कालपथ के कोस युग ही हैं । सुष्टि विकास का यह रथ जैसे ही धड़धड़ाता आगे निकल जाता है, मार्ग पर कुचलकर फैल गई नक्षत्र मालिकाओं की धूलि पीछे उड़ती है ।

२. आतिशबाजी वाली । श्‍लेष से, विभिन्‍न सूर्यमालाओं के चंद्र-आज प्रकाशमान होनेवाले और कालांतर से नामोनिशानी तक न रहे ऐसे बुझ जानेवाले चंद्रज्‍योति समान जो चंद्र - उनकी ज्‍योतियाँ ।

३. मूलरात्रिर्महारात्रि । 'आसीदिदं तमोमूढं प्रसु‍प्‍तमिव सर्वश:' अथवा भौतिक विज्ञान की दृष्टि में जडद्रव्‍य का विकास होते-होते उसी के भीतर चेतना, अभिज्ञान स्‍फुरित हो जाता है । 'चमक-दमकती'= पुन: वह संघात पृथक् बनते ही अभिज्ञान, ज्‍योति विनष्‍ट होकर जड़ पीछे रह जाता है ।

४. जगन्‍नाथ का रथ खींचने हेतु प्रत्‍यक्ष 'गति' ही घोड़ा बन गई है । मज्‍जापिंडों के रसों में जो स्‍पंदन होता है और भावभावनाएँ प्रकट हो जाती हैं, उस स्‍पंदन से लेकर जड़ की भौतिक गति तक सभी स्‍फोट - विकास - प्रगति जगन्‍नाथ की इस शोभायात्रा को आगे ले जा रहे हैं ।

५. ऊपरी तौर पर मनचाही लगने वाली घोड़े की रफ्तार में, मालिक की इच्‍छा के अनुसार हिलनेवाली लगाम गूँथी होती है, उसी तरह सभी भूतमात्र की, वस्‍तुजात की रफ्तार में ईश्‍वरेच्‍छा का रश्मि गूँथा है ।

६. जिसका तल नहीं है, आधार नहीं है, ऐसे पथ पर । निरुद्देश्‍य - निरावलंब आदि दार्शनिक संदर्भ भी इस शब्‍द से ध्‍वनित हो जाते हैं ।

सूत्रधार से

सूत्रधार, सुन लो । जरा सा परदा हटा लो ।।धृ.।।

कोई मुझको बता रहा है, पीछे इस परदे से

रंगभूमि से रंगकक्ष ही मंडित आश्‍चर्य से

'त्रिरंग-प्‍याली एक है वहाँ, जिसके भीतर से

सभी नटों के साथ उभरते दृश्‍य अनेकों-से'

'कैसी प्‍याली, रंग कहाँ के, क्‍या कुछ बकते, जी,

सूत्रधार जादू रच लेता अपनी साँसों से, जी !'

'प्रत्‍यक्ष के लिए प्रमाण की क्‍या कोई जरूरत है ?

हमने देखा पीछे परदे के अँधेरा है !'

'अंदर जो झाँके वह तिमिरग्रस्‍त होता है

परदे के अंदर जाकर जो हमने देखा है'

'असंख्‍य ! एक के पीछे दूजा और तीसरा है !

परदे के पीछे परदा ही हमने देखा है !'

'देखा है जी ! सचमुच जो देखा है, कहता हूँ !'

कहते सारे ! आप्‍त समूचे, किस पर यकीन करूँ ?

हटा लो अभी ! अथवा न सही ! आत्‍मा मम धन्‍य

विजय तुम्‍हारी रंगभूमि का रंग दृश्‍यमान !

(अंदमान)

अज्ञेय का रुद्धद्वार

जिस घर से हैं ये मार्ग निकलते सारे

आएँगे घर को मार्ग उसी वे सारे

सुनकर तुम्‍हरे भाटों की

बातें मीठीं वे उनकी

लेने आया तुम्‍हरे धाम

थक गया खटखटा करके, खुले ना पर रे

अंदर से तुम्‍हरे द्वार बंद हैं सारे

विस्‍तीर्ण अनंता भू पर

और भी किसी के घर पर

खटखटा करते रहने से

लूँगा मैं आश्रय दिल से

आऊँगा फिर से कभी न घर तुम्‍हारे, रे

ये वज्र-कठिन-से बंद द्वार जिसके रे

जो गाते गीत राजा के

सुनहरे राजमहलों के

मैं मार्ग पुराणज्ञों के

ले चला ढूँढ़ घर उनके

चल पड़ा युगों की क्रोशशिलाएँ देख

औ' पथांत पर यह गेह तुम्‍हारा एक

दुदुंभी नगाड़े श्रृंग

गरजत हैं, ध्‍वनि बेढंग

क्रांति के वीर रणरंग

मदहोश नाच में दंग

मैं जाता घुलमिल उनमें उस पथ पर, रे

अंत में खड़ा घर तभी तुम्‍हारा यह, रे

* * *

किस स्‍थल से कहाँ तक, रे

चिंता न किमपि करके, रे

यह जुलूम जब मुझको, रे

सजधज कर इस पथ पर, रे

ले गया, तभी बेढंग नाच करते, रे

पथ घुसा श्‍मशान में ! जिसमें घर तेरा, रे

छोड़कर शोरगुल सारा

एकांत मार्ग अनुसारा

देत हैं सितारे जिस पर

सुनसान रोशनी मंथर

पर टेढ़े-मेढ़े मोड़ उसी के सारे

अंत में आ चुके इसी गेह के द्वारे

यदि राजमार्ग विस्‍तीर्ण

घर तुम्‍हरे जाते पूर्ण

घर अन्‍य कहीं पर होगा

इस तंग गली में होगा

यह सोच, मैंने तंग सुरंगों में, रे

बहु ढूँढ़ लिया, पर पाया घर तुम्‍हरा रे

घर दूजा बनवा ना दे

अपना भी खुलने ना दे

ऐसा यह यत्‍न चले ना

संभव न छोड़ भी देना

खटखटा रहा हूँ आज इसलिए फिर, रे

घर के ये तुम्‍हरे द्वार बंद हैं सारे !

(अंदमान)

मृत्‍युसम्‍मुख शय्या पर

(परिचय : सन् १९९१ से १९२१ तक अंदमान में सावरकरजी की तबीयत लगातार खराब होती गई । डॉक्‍टरों को भी भ्‍य लगने लगा कि कहीं टी.बी. रोग तो नहीं हो रहा है । केवल थोड़े से दूध पर रह के महीनों तक वे बिस्‍तर पर लेटे रहे । ऐसी अवस्‍था में उन्‍हें लगने लगा कि इससे मृत्‍यु बेहतर है । एक बार तो मृत्‍यु उनके बिस्‍तर तक आ पहुँची भी ! उस समय मृत्‍यु की गंभीर छाया में उन्‍होंने इस कविता का लेखन किया ।)

आ मृत्‍यो ! आ तू या, आने के लिए

निकली ही होगी तो आ रही जा अभी !

मुरझाने के डर से डर जाएँ फूल

अंगूर भी रसभीने, सूख जाने से

डर जाऊँ क्‍यों तुझसे, मैं, किसलिए ?

मेरे इस प्‍याले में पीते-पीते

कभी न खत्‍म होनेवाली है अभी भरी

आँसुओं की मदिरा बस मेरे लिए ।

आ, यदि तू भूखी है नैवेद्य के लिए

और अभी दिन यद्यपि यौवनयुक्‍त

फिर भी सारे मेरे छोटे-मोटे

काम खत्‍म हो गए हैं इस दिन के,

किसी तरह कर जुगाड़ ऋण चुकता किया

जन्‍मार्जित जो-जो सब, ऋषिऋण के लिए

श्रुतिजननी चरणतीर्थ सेवन करके,

आश्रय कर ध्रुवपद का संतत-उसके

और आचरण करके एक तप ऐसे

आशा के श्‍मशान में घोर तपस्‍या

देवऋण के लिए, रणवाद्य बजा के

धडड धडड, और बढ़ आगे

हमला करके ठीक उसी क्षण को

जब हो गई प्रभु की प्रथम रणाज्ञा

और उसी रणयज्ञ-अग्नि में जली

अस्थि-अस्थि, मांस-मांस, ईंधन जैसी

जलते-जलते अब तो शेष बच गई

राख यौवन की मम ! और इसलिए

आज चुकाने हेतु पितृ-ऋण मैं

शास्‍त्र के तहत करके दत्‍तविधान

निपुत्रकत्‍व नष्‍ट किया पुत्र है अखिल

अभिनव भारत ही मम ! जहाँ-जहाँ भी

विकसित करता है वह नयन-कमल को

वहाँ-वहाँ मैं देखूँ सृष्टि-कुतूहल

नव उन्‍नति शौल भालपटल पर अंकित

उदयोन्‍मुख तेज तरुण, तब पुन:-पुन:

मेरे भी उदयोन्‍मुख होत हृदय में

आशा नव, आकांक्षा उच्‍च, भासमान

अस्‍मदीय वंशवृक्ष का गौरव

भारतीय केवल ना, मानवीय भी

वंश के गौरवार्थ ! अखिल मानवीय

यौवन में अनुभव करूँ मैं यौवन

और पितर मेरे वे प्रेम तर्पण !

आ जा तू मृत्‍यु-इस तरह मैंने

जुगाड़ करके ही ऋण चुका दिए,

और लगभग सारे खत्‍म हो गए

दिन के वे कार्य भी : यद्यपि कभी

उदित होत है दिन, कब अस्‍त होत वा;

कर्म कौन से हैं, कार्य कौन से

इसके बारे में पंचांग भिन्‍न-भिन्‍न हैं

भट्ट तथा पंडित भी भिन्‍न राय देत,

फिर भी लोकसंग्रहार्थ, धारण के लिए

मानवीय आत्‍यंतिक आत्‍म-स्‍वहित के

सज्‍जन को जो उचित ऐसे ही सब

कार्य धर्म्‍य माने मैंने, उनमें से ही

तद्नुरूप एक का जो बोझ नियत है

मैंने अपना वह बोझ उठा लिया

याथाशक्ति यथापरिस्थिति अभंग-सा

धारित यह व्रत कदापि किमपि न भय से ।

सत्‍कुल, अव्‍यंग देह, परम दयालु

जनक तथा जननी भी, उनसे भी और

वत्‍सलता से जिसने पाला-पोसा

अग्रज, जो अग्रगण्‍य तपस्वियों में

मूर्त विनय ऐसा अनुज, अद्वितीय-सा

प्रेयों का प्रेमपुण्‍य; धन्‍य और वह

ध्‍येय महत्, देता जो नित जीवन को

सार्थकता मनुजों के, काव्‍यमय बना

देता जो जिंदगी को, पूत चरित्र को;

तप भी कुछ, जय भी कुछ, यश भी कुछ वह,

कुछ थोड़ी मान्‍यता सरस्‍वती की

राज्‍यसभा में कविरत्‍नभूषिता

चख लिये रस विभिन्‍न, सूँघ लिये वे

शतभूजलवायुललित शतपरिमल भी

पंचाग्नि में प्रखर दाहयुक्‍त-से

उत्‍ताप से लेकर प्रीति के मृदुल

स्निग्‍ध परिष्‍वंगों तक सभी-सभी

शीतल, शीतोष्‍ण, उष्‍ण अनुभव कर लिये

कटिबंधस्‍पर्श और श्रवण भी किए

स्‍वरशत, शतभाषा, शतगीति नवनूतन

शतमंजुल कंठों से-और मृत्‍यु के

शतकठोर कंठों से घर्घर करते;

विभिन्‍न जन, जनपद औ' जाति विभिन्‍ना

देश और दृश्‍य कितने, भूमि के महा-

संग्रहालयों में विचरत देख लिये ।

सुरूप और सुरेख और सुललित ऐसा

देखा है आँखों ने किमपि क्‍यों न हो

मृत्‍यो ! इन नयनों को मिटा दे अभी !

-यदि तू आवश्‍यक मानत है मिटाना !

जो सुरेख देखा है-किमपि पर वह था !

प्रीति विपल : विरह चिरंतन ! यौवन में,

प्रौढ धुरंधर जिसको ना उठा सकें,

ऐसी महनीय धुरा सम्‍हालना पड़ा !

इसलिए अभी अधूरी ही रह गई

खेल की उमंग रम्‍य चाँदनी रात में

इस जीवन के मम ! फिर भी जानकर यही

कि ययाति की हवस भी न पूर्ण हुई

यद्यपि सारी उसकी जिंदगी उसने

एक खेल बना दी थी, और देखकर

इच्‍छा के बीजों का फल भोग जब बना

इच्‍छा के बीज ही उसके अंदर हैं,

और अनुभव करके एक भूख की

एक भोजन से जो तृप्ति हो गई

तृप्ति हजारवें भी भोजन से मिलती

है उतनी ही औ' ठीक वैसी ही;

मैं देता हूँ अनुमोदन तुझे इस तरह

खत्‍म करा देने को जीवनलेख इसी पृष्‍ठ पर

पृष्‍ठ जो अग्रिम हैं वे पीछे के

पृष्‍ठों की पुनरुक्ति ही क्‍यों न हैं, तभी !

मैंने जब दिन था तब कभी व्‍यर्थ न गँवाया

दिन के अस्‍तार्थ अत: दु:ख ना मुझे ।

-डर नहीं कल का भी ! मृत्‍यु के पश्‍चात्

यदि होगा इस अंधकार-लता का

खिलता दूजे दिन का फूल भी, तो भी

डर न मुझे, क्‍योंकि जो बोया हमने

वहीं खिलता औ' फलता, कहते हैं वहाँ ।

और मैंने बोए हैं बहुत कष्‍ट से

बीज वही जो चुनकर दिए थे मुझे

उन्‍होंने ही अत्‍युत्‍तम देख, मानकर

बोने फलाशाविरहित तुम यदि वैसे

वर्तन कर लेंगे ऐसी स्थिति में अन्‍य भी;

तो भी लोकोन्‍नति-विनाश हो ना जाए ऐसा

वर्तन करो' वैसा ही यत्‍न किया मैंने

बचपन से । 'जिस तरह अन्‍य तेरे साथ

व्‍यवहार करें, ऐसा लगता हो कभी तुझे

तू भी कर व्‍यवहार औरों के संग'

-संतवचन का पालन कर दिया मैंने

यदि आपद्धर्म कभी स्‍वीकृत कर लिया

वह भी इसलिए कि कभी स्‍वयं धर्म ने

कर दिया हवाले आपत्ति के ही मुझको !

जब हरित घास के मृदुल कालीन-

पर दस कदम ही आँगन में यहाँ

कारागृह में कभी मैं चल पड़ा

आत्‍मौपम्‍य बनत चित्‍त द्रवित-सा तदा

कई बार पैर अकस्‍मात् उस समय

स्‍तंभित हो जाते थे पल-पल में

कुछ भी करने पर उस तरुण कच्‍ची

घास के अंकुरों को दर्द हो जाएगा ।

इस डर से पैर उनपर पड़ना ना चाहता

हाथ का कँवल कभी हाथ में रहे

इसलिए कि उसमें होते थे जो दाने

वे बीज ही तो थे ! हम खाते थे

फल जो, वह भ्रणघात ? और कभी-कभी

मुझे आशंका हो जाती, पागल हुआ हूँ !

आत्‍मौपम्‍य वर्तन इस तरह का

मन मेरा करता था, तब हर कदम

मृत्‍युसमान दु:ख होत देख जगत् में

पूर्ण असंभव इसका आचरण होता

फिर भी मैंने कोशिश की; अज्ञता से

या असंभवनीयता से पद कभी

स्‍खलित होगा भी तो होगा ही सही

इसलिए न डर कल भी है । श्‍मशानभूमि का

परतट प्रदेश जो अपरिचित वहाँ

सुखकर यात्रा करवाएगा ऐसा ही

पहचान-पत्र है हमारे पास ही स्‍वयं

भगवान् श्रीकृष्‍ण का-श्रीमत्‍तां गृहे

शुचीनां चं ! वा गेहे योगिनामपि

'कश्चित् कल्‍याणकृच्‍च तात दुर्गतिम्

नहि गच्‍छति' नहि गच्‍छति कह दिया तथा

वे निरीश्‍वर स्‍वभाववादि भी मुझे;

इसलिए यदि सत्‍य ही जो कह रहे हैं

स्‍वर्ग, नर्क, जन्‍मांतर, बंध, मुक्ति वा

निज कर्म का ही सब परिपाक है

मृत्‍यु का नगरद्वार जिसमें खुलता है

उस अदृष्‍ट नगर के अति सुरम्‍य-से

आरक्षित रख दिए है बँगले

पहले ही हमने ही जमा करके

कर्म का, धर्म का नियत बनाया !

फिर भी यदि स्‍वर्ग, जीव, बंध, कर्म वा

ऐहिक ही इंद्रजाल हैं, औ' यदि

संघातोत्‍पन्‍न भाव है यह जीव

मृत्‍युपृथक्‍करण में अभाव मेंखोता

तो भी सर्वोत्‍तम ही ! मृत्‍यु एक सुषुप्ति

अथवा प्रत्‍यक्ष मुक्ति ! पंच भी ऐसे

मिश्रित भूतांश पृथक् मुक्ति पाकर

विहार करें स्‍वेच्‍छा से नए मिश्रण में,

या स्‍वयं, या शून्‍य में ! इंद्रधनु वैसा

संज्ञा के अंबर में विपल ठहरकर

विपल में ही यह मेरा भी यद्यपि

विश्‍व के अंतर्हित 'मैं' में विलुप्‍त हो

तो भी मृत्‍यु ! मृत्‍यु न तू ! मृत्‍यु ही मुक्ति !

-विपल में ही ! पर विनति बस इतनी-सी

आना है तो झट से आ जाओ, तेरा

दुर्लौकिक दुनिया में, लोग जो तेरा

द्वेष करते हैं, न इसलिए कि तू

निर्दय वा निंद्य है, देखकर तुझे

कोई न जो लौटा है, कि जो कह सके

तू कैसा है ! पर विशेषत:

मृत्‍यु ! तू अप्रिय-सी विश्‍व में कि तेरा

सैन्‍य, पुरस्‍सर, पीड़क जो घृणास्‍पद

बीमारी का क्रूर, उसके कारण ही !

न मैं केवल, पर अजातशत्रु विश्‍व में,

तुल्‍य जिसे प्रिय-अप्रिय, हानि-लाभ ऐसे

गभवान् श्री गौतमजी को भी लगा था

रोग जरा अप्रिय ही : लाभ न दुजा

स्‍वास्‍थ्‍य सम दुनिया में' धर्मपद कहे

फिर भी जो कोई ना खोलेगा तुझे

स्‍वेच्‍छा से दरवाजा, दुर्ग वे हठी

जीतने जीवन के, तू भेज दे सही

रोगों की सेना जो पीड़ा करती

मैं तो जो न खुल पाएँगे तो टूटेंगे

ऐसे दरवाजे खोलकर स्‍वयं

इस मेरे गृह के, तव स्‍वागातार्थ ही

हे अनिवार्य ! सिद्ध यहाँ, इसलिए अभी

आ जा तू अखिल वीर-वीर विजेता ।

बस अकेला, अपुरस्‍सर और अकस्‍मात

यदि असंभव है ऐसे अकेले ही आना

तेरे लिए, तो उस क्रूर पीड़ादायक भी

रोग की सेना का क्षोभ झेलने

मैा हूँ सिद्ध । अभी ये दो वर्ष ही

देख ही रहा है तू मुझको ऐसे

शरपंजर से जकड़ा ! जिसे मधुर लगा

जीवन का मधु, प्रकाश चक्षु को,

प्रीति हृद को, ऐसा मैं उस सभी सुख के

मूल्‍य के तौर पर मृत्‍यु की पीड़ाएँ भी

मान कर्तव्‍य सहन करने सिद्ध हूँ यहाँ

(अंदमान)

टिप्‍पणियाँ १. अर्थात् यह जीवन । यह जन्‍म ही इसका आरंभ है या केवल रूपांतर, मृत्‍यु ही अंत है या केवल तिरोधान, इसे कौन बताए ?

२. अर्थात् स्‍मृति आदि ग्रंथ, स्‍मृतिकार, दार्शनिक- 'नैको ॠषिर्यस्‍य वच: प्रमाणम्' ।

३. इस शब्‍द का श्‍लेषार्थ उस रूपक के मानसिक तथा भौतिक दोनों अर्थों को पुष्‍ट करता है ।

४. दूजे दिन का फूल = पुनर्जन्‍म । अगर दूसरा जन्‍म होगा तो वह कर्मफल के अनुसार होगा, यह सिद्धांत भी सत्‍य होगा ।

५. धर्म ही अपनी रक्षा के लिए कभी-कभी आपद्धर्म का हथियार अपनाता है ।

६. जो कुछ खाने को प्रारंभ करें, उसकी हत्‍या की आशंका से कँवल निगला ही न जाए । फल भावी वृक्ष का गर्भ ही है । जो नारियल हम खाते हैं, वह भ्रूणघात ही है, ऐसा सोचकर जीना असंभव तथा अनीतिकारक लगता था । पागल जैसी अवस्‍था बन जाती थी ।

७. निरीश्‍वरवादी, स्‍वभाववादी- बुद्ध की तरह, सांख्‍यों की तरह । कर्मफलों का तथा पुनर्जन्‍म का सिद्धांत उनका तथा परमेश्‍वरवादी श्रीकृष्‍णादियों का एक ही है ।

८. अभाव में । चार्वाक अथवा आधुनिक विचारक स्‍पेंसर, मिल आदि प्रतयक्षवादी दार्शनिक जो कहते हैं उसी को सच मान लेने से भी चिंता नहीं है ।

९. धर्मप्रद । ' न ह्यारोगसमो लाभ: संतुष्टि परमं धनम्' -धर्मप्रद ।

हिंदू नृसिंह

: १ :

हे हिंदू शक्ति-संभूत-दीप्‍ततम तेज

हे हिंदू तपस्‍या-पूत ईश्‍वरी ओज

हे हिंदू श्री-सौभाग्‍य-भूति के साज

है हिंदू नृसिंह प्रभो शिवाजीराज

यह हिंदू राष्‍ट्र करता है । वंदन

करता है तुम्‍हारा अभि-नंदन

तव चरणों पर भक्ति का । चंदन

गूढ़ कामना पूर्ण करा दो, कह न सकत जो आज

है हिंदू नृसिंह प्रभो शिवाजीराज !

: २ :

प्राचीर भग्‍न है किले-किले की आज

यह भग्‍न पड़ा जयदुर्ग कीर्ति का ताज

लग गया जंग तलवार भवानी पर,

इसलिाए खो गया भवानी का आधार

गढ़ किले दुर्ग सारे ही । भग्न हैं

ऐश्‍वर्य राजधानी का । लुप्‍त है

परदास्‍य-पराजय में जन । तुष्‍ट हैं

दुनिया में ऐसे जीना है इक लाज

हे हिंदू-नृसिंह प्रभो शिवाजीराज

: ३ :

जो शुद्धि हृदय की रामदास ने देखी

जो बुद्धि पाँच रिपुओं ने परखी

जो युक्ति कूटनीति में खलों ने देखी

जो शक्ति बलोन्‍मत्‍तों को कुचलती सनकी

वह शुद्धि ध्‍येय-कर्मों में । आज दे

वह बुद्धि मासूमों को । आज दे

वह शक्ति खून में ही । आज दे

जो मंत्र रामदास ने दिया, दे आज

हे हिंदू नृसिंह प्रभो शिवाजीराज !

(रत्‍नागिरी, १९२६)

टिप्‍पणियाँ : १. शिवाजी की तलवार का नाम 'भवानी तलवार' था ।

२. देवी भवानी ।

हिंदुओं का एकता-गान

(परिचय : यह पद अखिल हिंदू मेले के लिए पहले-पहले शिरगाँव में (रत्‍नागिरी के निकट) रचा । आगे चलकर बड़ी-बड़ी सभाओं में ब्राह्मणों से लेकर महार-भंगियों तक हिंदुओं के हजरों नर-नारियों द्वारा इसे गाए जाने की परिपाटी पूरे महाराष्‍ट्र में प्रचलित हो गई और यह एक वृंदगीत बन गया । अन्‍य भाषाओं में भी अनूदित होकर यह अनेक राज्‍यों में गाया जाता है ।)

आप और हम सकल हिंदू । बंधु-बंधु

महादेव हैं पिता हमारे नमन उन्‍हें कर दूँ ।।ध्रु.।।

ब्राह्मण या क्षत्रिय कोई । यदि भले

कोई भी रूप या रंग । पहन लें

वह महार अथवा मांग । सब सुन लें

यह एक हमारी हिंदू जाति माँ, उसे नमन कर दूँ ।।धृ.।।१।।

एक ही देश है अपने । प्रेम का

एक ही छंद जीवों के । काव्‍य का

एक ही धर्म है हम । सकल का

यह हिंदू जाति की गंगा हम सब उसके ही बिंदु ।।धृ.२।।

रघुवीर रामजी प्रभु का । जो भक्‍त

गोविंद पदांबुज पर जो । अनुरक्‍त

गीता का गायन करके । निश्चिंत

वह हिंदू जाति की नौका में तर जात भवसिंधु ।।धृ.३।।

हम दोष एक दूजे के । मिटा दें

द्वेष और दुष्‍ट रूढी को । छोड़ दें

माता के खातिर सख्‍य । जोड़ दें

अपराधों को भूलेंगे हम, प्रेम करेंगे बंधु ।।धृ. ४।।

बच्‍चे हैं हिंदू जाति के । हम सभी

अस्‍मदीय हिंदू धर्म की । हम सभी

प्राणार्पण करके रक्षा । करें तभी

एक पूर्वजों का ध्‍वज लेकर हम सारे बंधु ।।धृ. ५।।

(रत्‍नागिरी, १९२५)

हमारा स्‍वदेश हिंदुस्‍थान

(परिचय : रत्‍नागिरी के अखिल हिंदू-मेले का पद ।)

हमारा स्‍वदेश हिंदुस्‍थान

हिंदुओं का वही हमारा केवल है, जी, प्राण ।।ध्रु.।।

देवालय यह पवित्र अपने । देवों का सुमहान

पुरखों का यह सुंदर मंदिर । स्‍वर्ग मृतों का जान

नन्‍हे मुन्‍हो की दाई यह । कराती है पय-पान

फल-फूलों से डँवरा है यह । प्रेम का उद्यान

सत्‍ता अपनी मत्‍ता अपनी । यह रत्‍नों की खान

अगर चुराने आया कोई । न्‍याछावर हैं प्राण

(रत्‍नागिरी, १९२५)

टिप्‍पणी : स्‍वतंत्रता के बाद किया गया सुधार-'लेंगे उसके प्राण' ।

दीपावलि का लक्ष्‍मी पूजन

(परिचय : यह गीत रत्‍नागिरी की हिंदू सभा के उस मेले के लिए बनाया था, जो दीवाली में विदेशी पटाखे आदि चीजों का बहिष्‍कार करने का उपदेश करते घूमता था ।)

लक्ष्‍मीपूजन आज घरों में यद्यपि होता है

प्रसन्‍न पूजा से न होत है, लक्ष्‍मी कुपिता है

अंग्रेज वहाँ पूजा करत न लक्ष्‍मी-मूर्ति की

सेवा करती दरवाजे पर ऋद्धि-सिद्धि उसकी

सुनो बंधुओं, क्‍या है कारण ? लक्ष्‍मी रूठी क्‍यों ?

ठुकराती है पूजा हमरी शतकों की देखो

क्‍योंकि पुष्‍प हम अर्पण करते हैं, पर ना दिल से

विष्‍णुसम उसे जीत न लेंगे कभी पराक्रम से !

लक्ष्‍मीपूजन करने हेतु जब स्‍नान करते हैं

साबुन, तेल भी सभी पराया प्रयोग करते हैं

विदेश के रेशम की धोती करके परिधान

विदेश के रंगों से मंदिर करते रंगीन

विदेश की शर्करा डालकर भोग चढ़ाते हैं

ऐसे पूजन से लक्ष्‍मी को प्रसन्‍न करते हैं ?

साबुन ले जाए करोड़, औ' करोड़ ले जाए तेल

लूटकर हमें विदेश होता है मालामाल

लक्ष्‍मीजी को भोग चढ़ाने चीनी विलायती

ले आए, जो करोड़ रुपए विदेश पहुँचाती

इस प्रकार से लक्ष्‍मी को पहुँचा के विदेश में

लक्ष्‍मीपूजन करते बैठे केवल मंदिर में

और विदेशी आतिशबाजी करके मस्‍ती में

ऐलान करेंगे अपने पागलपन का दुनिया में

अजी हिंदुओ, करोड़ रुपयों की इस इक दिन में

लक्ष्‍मीपूजन हेतु भेज दी लक्ष्‍मी विदेश में

अ‍त: आज लक्ष्‍मी का पूजन घर में होता है

प्रसन्‍न पूजा से न होत है, लक्ष्‍मी कुपिता है

सुनो हिंदुओ, घर में लक्ष्‍मी को पहले लाओ

विदेश की चीजें न छुएँगे, यही प्रण मनाओ

देशी तेल, औ' देशी, साबुन, देशी वस्‍त्रों से

देशी चीनी, देशी अस्‍त्र औ' देशी शस्‍त्रों से

स्‍वदेश लक्ष्‍मी की पूजा हम मंगल वेला में

करेंगे तभी गजांतलक्ष्‍मी आएगी घर में !

(रत्‍नागिरी, १९२५)

दुष्‍ट शराबी !

(सन् १९२६ पूर्वास्‍पृश्‍यों के मेले के लिए रखा गया गीत ।)

तुम छोड़ो जी भाई । दुष्‍ट शराब को ।।धृ.।।

ललचाया है इस प्‍याले ने । कैसा जी तुमको ।। दुष्‍ट १।।

पैसा देकर विष पीते हो । जानो इस सच को ।। दुष्‍ट २।।

कमा रहे हो जो कुछ दमड़ा । देते बोतल को ।। दुष्‍ट ३।।

दोगे फिर अब भूख मिटाने । क्‍या कुछ बच्‍चों को ।। दुष्‍ट ४।।

होश गँवा के पीट रहे हो । गरीब बीवी को ।। दुष्‍ट ५।।

क्षणिक ऐश के लिए व्‍यर्थ क्‍यों । करते जीवन को ।। दुष्‍ट ६।।

जाओ जूझो !

(परिचय : रत्‍नागिरी की तरुण हिंदू मंडळ नामक क्रांतिप्रवण संस्‍था के लिए यह गीत रचाया ।)

निजजाति-दमन से हृदय क्‍यों न तिलमिलता ?

तुम युवक, रंगों में रक्‍त नया सनसनता

यह नया रक्‍त तो बिजली-सा जल जाए

तुम स्‍वयं मृत्‍यु से जाकर गले लगाएँ

फिर मुकुट हमारा किसने । तोड़ा है

हिंदवी ध्‍वज किसने भी । तोड़ा है

आशा का अंकुर किसने । तोड़ा है

यह सोच-सोचकर क्रुद्ध आँसु दहकाते

दिन-रात चक्षुओं में क्‍यों ना आते ?

इस भारतभू के समर-रंग में सारे

इस चिंता से बहु वीर युद्ध में गुजरे

कुछ भाषण पीड़ा चिताग्नि में जल गए

फाँसी के फंदे में कुछ अविचल-से रह गए

इस क्षण उनकी इच्‍छाएँ । अतृप्‍त

आवाज दे रहीं तुमको । संतप्‍त

क्‍या कोई सुन सकता है । अंतस्‍थ

यदि सुन सकते हो, उठो, जो भी तुम हो, जी

सर हाथ लिये जाओ, तुम जूझो, जी

(रत्‍नागिरी, १९२६)

माला गूँथते जी

माला गूँथते जी । सुनो कविता को । कौन कैसे गूँथता माला को

पहनत जगदंबा । त्रिगुणातीत को । त्रिगुणी बिल्‍वदल माला को

प्रकृति गूँथती है । प्रभु विराट् को । नव-नव सूर्य-मालिकाओं को

प्रलयंकर माली । गूँथत महाकाल को । नरमुंड चंडमाला को

उद्भव करती है । करती उद्भव को । सृष्टि भूकंप माला को

गूँथत सत्‍यभामा । सत्‍य श्रीहरि को । हरसिंगार-पुष्‍पमाला को

माला मोतियों की । गूँथत है, देखिए । रानी राजा के लिए

फूलों की माला । माला गूँथत रती । अनंग-आलिंगन करती

विरहिणी बेचारी । प्रिय-स्‍मरण-काल को । गूँथत माला में आँसुओं को

(रत्‍नागिरी, १६२६)

सुखशय्या मंचक

(परिचय : मराठी के पंडित कवि मारोपंत के वंशज श्री रा.द. पंत पराडकरजी ने सावरकरजी को एक लोहमंचक 'सुखशय्यामंचक' नाम से उपहार में दिया । इस उपहार को स्‍वीकार करने वाला निम्‍न कविताबद्ध पत्र सावरकरजी ने उन्‍हें भेजा ।)

आप हैं मयूरवंशज, कवि का उस भक्‍त पुरातन मैं हूँ

आपको तथा उनको सम्‍मानार्थे प्रणाम करता हूँ

आर्या-केका-स्‍वाहाकार-कार्य में आप निमग्‍न हैं

पंत पराडकर, ऐसे सुनकर मुझको हर्ष हो रहा है

जब तक ध्‍येयप्राप्ति न , जब तक टूटे न राष्‍ट्र का पाश

तब तक हिंदू जाति के गौरव-रवि को बद्ध राहु-पाश

तब तक यह बिस्‍तर जो आपने उपायन भेजा

उस निद्रा को दे दें, जिसमें नित कर्तव्‍य का मुलाहजा

इस देह को थकी-सी करने पुनरपि युद्ध-उद्युक्‍त

यह सुखशय्या दे दें निद्रा, निरपवाद औ' युक्‍त

(रत्‍नागिरी, १९२६)

टिप्‍पणियाँ : १. मोरोपंत द्वारा लिखित 'आर्या केका' नामक काव्‍य का आवर्तन, जो राममंदिर में उनके वंशज द्वारा आयोजित था ।

२. उपहार ।

३. मंचक का नाम 'सुखशय्या' था । कवि कहते हैं कि यद्यपि यह 'सुखशय्या' है, वह मेरे लिए तब तक 'रणशय्या' बने, जब तक हिंदू जातीय राष्‍ट्र-स्‍वतंत्रता का ध्‍येय प्राप्‍त न हो जाए । रोज के युद्ध में थका हुआ जीव कल के युद्ध का सामना करने के लिए पुन: समर्थ हो जाए इतनी ही निद्रा जिस तरह सैनिक को दी जाती है, उतनी ही मुझे प्राप्‍त हो जाए ।

४. कवि उस समय उम्रकैद के कारावास से अभी-अभी छूटकर आए थे । उस 'थकान' का उल्‍लेख पराडकरजी के पत्र में था । वही यहाँ सूचित किया है ।

अखिल-हिंदू-विजय-ध्‍वज-गीत

अखिल-हिंदू-विजय-ध्‍वज को उठा लो पुन: ।।ध्रु.।।

उस समय इसी ध्‍वज को, जी। फहराया लंका पर, जी

जब रामचंद्र ने साधी । रावणवध-कामना ।।१।।

करत ज्‍यों सिकंदर हमला । चंद्रगुप्‍त को विजयमाला,

पहनाकर हिंदूकुश पर भी । इसकी का चढ़ना ।।२।।

रक्षार्थ इसी ध्‍वज की, जी । शालिवाहन महा-गाजी,

छिन्‍न-भिन्‍न करत समर में जी । शकों की सेना ।।३।।

विक्रमादित्‍य ने हूणों को । हराया था जिस स्‍थल को,

उस मंदोसर के रण की । यही गर्जना ।।४।।

करते थे हिंदू महा-नृप । अश्‍वमेध का संकल्‍प,

तब करता था यह ध्‍वज ही । विजयघोषणा ।।५।।

प्रतिशोध हिंदू-पीड़ा का । मद-मर्दन मुसलिमों का,

करके ही, करत शिवाजी । वीर वंदना ।।६।।

ध्‍वज यही लेकर गया । दिल्‍ली तक पहुँच गया,

मुसलमानी तख्‍ता तोड़त है । भाऊ दनदना ।।७।।

आंग्‍ल दैत्‍य भी जब आया । समुद्र से उतर, घुस गया,

समुद्र में उसे डुबाया । करत क्रंदना ।।८।।

टिप्‍पणी : १. भारत जब परतंत्र था तब यह ध्‍वजगीत रत्‍नागिरी में ईसवी १९३४ में सावरकरजी ने रचा था । उस समय उसकी आठवीं कड़ी इस प्रकार थी-

'आगे खंडित यश हो गया । ध्‍वज हाथों से गिर गया

प्राणों की बाजि लगा के । उठा लें पुन:'

हिंदुस्‍थान जब स्‍वतंत्र हो गया तब सन् १९५१ में इस आठवीं कड़ी के स्‍थान पर, आंग्‍लदैत्‍य को भी समुद्र में डुबाने वाली कविता में दी हुई नई कड़ी सावरकरजी ने रची ।

सूतक युगों का खत्‍म हुआ

(परिचय : रत्‍नागिरी के सबसे प्राचीन श्रीविट्ठल मंदिर में पहली बार भरी सभा में पहला पूर्वास्‍पृश्‍य जिस दिन प्रवेश कर सका, उस समय यह पद गाया गया । शिवू भंगी नामक एक भंगीपुत्र ने सभा मंडप की अंतिम पौड़ी पर सभा की अनुज्ञा से इस पद को गाना प्रारंभ किया । उसके वे करुण-मधुर आलाप तथा साभिनय विनती सुनती हुई करीबन तीन हजार लोगों की सभा इतनी प्रभावित होती चली कि पौड़ी के बाद पौड़ी-चढ़ने की अनुज्ञा प्राप्‍त होते वह भंगी कुमार विट्ठल के सभामंडप के भीतर आकर खड़ा हो गया ! अस्‍पृश्‍यता का तथा भगवान् के मंदिर में पूर्वास्‍पृश्‍यों को मना करने का अन्‍याय दूर करने के लिए स्‍पृश्‍यों का धन्‍यवाद अदा करने का उत्‍तान अर्थ यद्यपि इस पद में है, तो भी उन धन्‍यवादों की अपेक्षा जो घोर अन्‍याय आज तक चल सका उसी का प्रच्‍छन्‍न धिक्‍कार उसमें तीव्रता के साथ ध्‍वनित हो रहा है ।)

दिया आने को तुमने प्रभु के द्वार

मैं मानूँ जी आभार ।।ध्रु.।।

वरदान दिया छू के सिर यह पतित

मैलाया अपना हाथ

इन चरणों पर दिया मुझे रखने को

मेरे इस पतित ही सिर को

तुम सूरज हो धर्म के, पर अद्भुत किया

तिमिर का छू लिया साया

जो बहिष्‍कृत था उसको लाया अंदर

गाँव के बाहर जाकर

तुम हिंदू हो, करीब लिया हिंदू को

अहिंदू से, अजीब यह देखो

यह सूतक युग-युग का, जी

खत्‍म आज हो गया है, जी

झगड़ा ही सब मिट गया, जी

शत्रु का जाल टूटा, जी

हम सदियों के दास : आज सहकार

मैं मानूँ जी आभार !

(रत्‍नागिरी, १९२९)

हा भगतसिंह ! हाय हा !!

(परिचय : सरदार भगतसिंहजी को २३ मार्च, १९३१ के दिन फाँसी हो गई ।उस समय स्‍वातंत्र्यवीर वि. दा. सावरकर रत्‍नागिरी में स्‍थानबद्ध थे । उन्‍हें भगतसिंह की फाँसी की खबर दूसरे दिन मिल गई । इस वार्त्‍ता से उनका जो मन: क्षोभ हुआ, उसी के फलस्‍वरूप यह कविता उन्‍होंने रची । तुरंत रत्‍नागिरी के 'हिंदू तरुण मंडळ' के युवकों ने इसे गुप्‍त रूप से कंठस्‍थ किया और दूसरे दिन भोर के समय, पुलिस सतर्कता के पहले ही, उन चुनिंदा युवकों ने इस गीत को गाते-गाते रत्‍नागिरी नगर में प्रभात फेरी निकाली और सारा रत्‍नागिरी नगर भगतसिंह की तथा स्‍वातंत्र्यलक्ष्‍मी की जय-जयकार से दनदनाया ।)

हा भगतसिंह, हाय हा

तुम हमारे ही लिए जी, जा रहे हो, हाय हा !

राजगुरु तुम, हाय हा !

राष्‍ट्र-रण में, जूझते ही, गिर रहे हो, हाय हा !

हाय हा, जय जय अहा !

आज की यह 'हाय हा' ही कल बनेगी जय, अहा !

मुकुट धारण वह करे

मृत्‍यु का ही मुकुट सिर पर प्रथम जो धारण करे !

शस्‍त्र लेंगे हम सभी

जिसे लेकर समर में तुम लड़ रहे थे आज भी !

अधम भी तो कौन है ?

वीरता के हेतु की तब शुद्धता जो न स्‍तवत है

हुतात्‍माओ, जाइए !

प्रतिज्ञा हम कर रहे हैं, उसकी गवाही देखिए !

शस्‍त्रसंगर चंड है

जूझकर हम विजय पाएँगे यही निर्धार है !

हा भगतसिंह, हाय हा !

सुन लो भविष्‍य को । भव्‍य भीषण को

(परिचय : स्‍वतंत्र हिंदू राज्‍य नेपाल के प्रतिनिधियो, नेपाल के गुरखा संघ के अध्‍यक्ष श्रीमान् लेफ्टिनेंट ठाकुर चंदनसिंहजी और श्रीमान् कैप्‍टन फ्रिस हेमचंद्रसमशेर जंग बहादुर राणा महाशय, को रत्‍नागिरी नागरिकों की ओर से २ नवंबर, १९३१, शुक्रवार को सम्‍मानपत्र दिया गया । इस समारोह के पहले चित्‍पावन ब्राह्मण स्‍वातंत्र्यवीर बै. वि. दा. सावरकर, नेपाल के स्‍वतंत्र हिंदू राज्‍य के राणावंशीय क्षत्रिय प्रिंस समशेर जंग और रत्‍नागिरी के एक सभ्‍य हिंदू भंगी तीनों ने कंधे से कंधा मिलाकर पतितपावन के चरणों में पुष्‍पांजलि अर्पण कर दी । उस समय हजारों लोगों ने तालियों की झड़ी लगाई । इसके बाद जो सम्‍मान समारोह संपन्‍न हुआ, उस समय बीस युवतियों ने यह स्‍फूर्तिमय गीत गाया ।)

सुन लो भविष्‍य को । भव्‍य भीषण को ।।

विगत भयहत वर्तमान में ।

हिंदू जाति अब प्रण लेकर चल पड़ी रण को । भव्‍य ।।ध्रु.।।

एक-एक हर कोई । एकरूप ही बन जाए ।

करोड़ संख्‍य हिंदूजाति । सुसज्‍ज इस क्षण को ।। भव्‍य १।।

सहनशीलता स्‍तंभ । टूटकर विकराल जृंभ ।।

संचरत अब नृसिंह । करत आघात अब चल पड़ी रण को ।। भव्‍य २।।

आज तक कष्‍ट दिए । उसके प्रतिशोध लिए ।।

दु:शासन कशिपु कंस । छूट ना किसी को चल पड़ी रण को ।। भव्‍य ३।।

प्रभु स्‍थापित सिंहासन । प्राणों की लेन-देन ।।

अपने अस्तित्‍व की ही बाजी लगाकर चल पड़ी रण को ।। भव्‍य ४।।

स्‍वयं होकर मुक्‍त । विश्‍व करेंगे मुक्‍त ।।

ममता की समता की सुजनों की रक्षा को ।। भव्‍य ५।।

(रत्‍नागिरी, १९३१)

संत रोहिदास

(परिचय: रत्‍नागिरी के 'अखिल हिंदू मेले' के लिए रचा हुआ गीत ।)

: १ :

संत रोहिदास । रोहिदास संत

प्रभुप्रिय एक भागवत ।।ध्रु.।।

जाति से हिंदू ।। हिंदू चमार

मन में प्रेम की भरमार

नित्‍य कर्म उसका । उसका सीने का

चप्‍पलें जोड़ा जूतों का

उसी पर चलाए । चलाए गृहस्‍थी

मन में न ईर्ष्‍या एक रत्‍ती

सी के देत है । देत है दान में

जूते भक्‍तों को नंगे पाँवों में

स्‍नानोत्‍तर लेत । लेत वह मुँह से

नाम विट्ठल का बहुत प्रेम से

नित्‍य पूजा का था । पूजा का था बाण

शालिग्राम दिव्‍य महाप्राण

उसे रखता था । रखता था चमड़े का

संपुट बनाके सुंदर-सा

आसन भी उसका । चमड़े का

बैठता-नाचता भक्ति प्रेम

संत रोहिदास । रोहिदास संत

प्रभुप्रिय एक भागवत

: २ :

उससे लोग हँसकर । हँसकर कहते थे

चमड़ा अशुद्ध उसके बीच

देवमूर्ति कैसे । कैसे रखी जाए

कैसे न उसको छूत लगे

उनसे संत कहत । कहत, भाई सुना

कहता हूँ उसका अर्थ जानो

चमड़े के भीतर । भीतर गर्भ के

बैठा था मनुष्‍य माता के

माता देत दूध । दूध बहुत प्‍यार से

स्‍तनों की चर्म-कुप्पियों से

मुख मढ़वाया है । मढ़वाया है, भाई,

चमड़े से ही, प्रभु ने सभी का ही

मढ़वाए हैं हाथ । हाथ-पाँव, भाई,

प्राण भी चमड़े से, प्रभु ने ही

ऋषि-मुनि बैठते । बैठते तपस्‍या में

दोष न देखते मृग चर्म में

और व्‍याघ्र चर्म । चर्म महारुद्र

चाव से स्‍वीकरत उपवस्‍त्र

सांब महारुद्र । रुद्र जिसे स्‍पर्शत

चर्म वह अशुद्ध कैसे होत

अशुद्ध ना चर्म । चर्म ना चमार

वही है उसका अधिकार

अधिकारी सत्‍य । सत्‍य जो है भक्‍त

मांग या महार अथवा शाक्‍त

प्रेम ही अधिकार । अधिकार भक्ति

दे देत नाम-भजन मुक्ति

ऐसा हिंदूधर्म । धर्म विट्ठल का

सनातन उद्धार करत सबका

चित्‍त से जो शुद्ध । शुद्ध वही होता है

फिर उसकी जाति कोई भी है

अशुद्ध यदि चित्‍त । चित्‍त अशुद्ध यदि है

ब्राह्मण भी अस्‍पृश्‍य बनता है

क्षत्रिय भी अस्‍पृश्‍य होता है

महार था चोखा । चोखा मेळा संत

भगवान् उसको आलिंगत

और फिर सजण । सजण कसाई को

प्रसन्‍न प्रत्‍यक्ष प्रभु उसको

धंधा यह सारा । सारा उपकारी

उसके बिन बात नहीं प्‍यारी

इसलिए कोई । कोई भी कर्म की

छूत न मानें सत्‍य बाकी

यही हिंदू धर्म । धर्म विट्ठल का

धर्म है हमारे पुरखों का

आप हम हिंदू । हिंदू जाति के हैं

सारे विट्ठल के भक्‍त ही हैं

बचाएँगे धर्म । धर्म विट्ठल का

धर्म है हमारे पुरखों का

ऐसा रोहिदास । रोहिदास संत

प्रभुप्रिय एक भावगत्

पानी बना आग ज्‍यों

मेरा अद्भुत है यही, भभकती ज्वाला जलांतर्गत

सत्‍ता लेत सभी बलात् तब उसी सामर्थ्‍य को दहकत

बंदी में तुम जो अनन्वित छलों को अश्रु देते चले

वे ही अश्रु अभी असीम जलते शोले बने निश्‍चले ।।१।।

बंदीगेह तभी अदम्‍य भभका पानी बना आग ज्‍यों

फाँसी के जलने लगे चबूतरे स्‍फुल्लिंग-आघात ज्‍यों

गुस्‍से का ज्‍वर हो उदीप्त तुझको, उत्‍ताप ऐसा महा

बेड़ी भी पिघली अभी जब उसे शोले लगे दु:सहा ।।२।।

ऐसे ही कुछ काल अश्रु बहने दो तप्‍त, चिंघाड़ लो

ऐसा ही कुछ काल शोक कर लो, बरदाश्‍त पीड़ा करो

ज्‍यों-ज्‍यों पुष्‍ट-महान् आग भभकी जाए निरी अश्रु से

त्‍यों-त्‍यों पीड़क के समेत दहके पीड़ा तभी आग से ।।३।।

यात्रा पर जाते समय

भक्ति से अपनी बनाया देवता को भक्‍त तुमने

नैन-शर से विद्ध करके सिंह जीता हिरनी ने

कल जिसे ना जानता था, रह सकूँ ना उसके बिना

इस तुम्‍हारी तनुलता से लिपट लूँ मैं दिल अपना ।।१।।

बाहती हो स्‍वप्‍न में तुम, सुन रहा हूँ जागृति में

'और एक ही' के बहाने खो जाऊँ मैं चुंबनों में

जकड़ लेने पर बाँहों में, दिल न भरता नजदीकी से !

दूर जाने पर अचानक, दिल फटेगा दूरियों से ।।२।।

मुसकराती कब समुत्‍सुक आ सकोगी मिलने मुझसे

आ सकोगी क्‍या कभी तुम यह बताओ, मिलने मुझसे

जाना है अनिवार्य ! पर अब जब कभी लौट आओगी

प्रीति की थाती हमारी सूदसहित लौटा सकोगी ।।३।।

हिंदू जाति द्वारा श्री पतितपावन का आवाहन

(परिचय : रत्‍नागिरी में श्री पतितपावन मंदिर के देवता-प्रतिष्‍ठापन का अभूतपूर्व उद्घाटन-समारोह संपन्‍न हुआ । उस समय मुख्‍य सभा में यह पद गाया गया । हिंदुस्‍थान में भी अपूर्व ऐसे उस अखिल हिंदू मंदिर में ब्राह्मण-क्षत्रियों से लेकर महार-भंगियों तक समस्‍त हिंदू बंधुओं का वह पाँच हजार से अधिक सम्मिश्र समाज, महाराष्‍ट्र के अनेक नेतागण, संत-महंतो के सहित शंकराचार्य डॉ. कुर्तकोटीजी की अध्‍यक्षता में हिंदूमात्र को वेदोक्‍त का तथा देवतापूजन का समान अधिकार न केवल शब्‍दों के द्वारा अपितु प्रत्‍यक्ष आचरण में वहीं के वहीं देनेवाला वह दृश्‍य कम-से-कम रत्‍नागिरी में तो पहले हजार सालों में किसी ने देखा नहीं होगा । उस समय यह एक समाजक्रांति के आंदोलन के रूप में ही विख्‍यात हुआ । उस समय भंगी, महार, मराठा, ब्राह्मण, वैश्‍य आदि जातियों की बोस चुनिंदा युवतियों ने सम्मिश्र रूप में खड़े होकर इस अखिल आवाहन का मंगलाचरण गाया था ।)

उद्धार करो हिंदू जाति का अब, जी

हे हिंदूजाति के प्रभु जी ।।ध्रु.।।

आब्राह्मण चांडाल पतित ही हम हैं

औ' आप पतितपावन हैं

निजशीर्ष अशुद्ध हो जाएगा डर से

काटे थे स्वपाद कब से

और पैरों ने स्‍व-शुद्धता-रक्षार्थ

कदमों को काटा व्‍यर्थ

कभी सुन न सके अपने ही ये कान

इसलिए मुख न कहत ज्ञान

दाएँ कर की बाएँ कर से जलन

बेचत है शत्रु को बदन

जो बंधुओं को बंद करत दरवाजे

चोर वे गेह के राजे

पाप का भरा यह प्‍याला । रे

जो बोया वह फल-फला । रे

हृदय में चुभत है भाला । रे

अब दया करो । मृत्‍युदंड या दो ! जी

हे हिंदूजाति के प्रभु जी !

अनुपात प्रभो, जला देत सब पाप

अब दे दो जी, उ:शाप

निपटा के सब आज भेद-दैत्‍यों को

हिंदू-जाति स्‍मरत है प्रभु को

संजीवन दो तुम विच्छिन्‍न अंगों को

जोड़ दिया पुन: अब जिनको

दे दो बल जी, वामन को इस क्षण में

गाड़ दो बली पाताल में

यदि शस्‍त्र नहीं पागल इल हाथों में

है गदा तुम्‍हारे कर में

यदि मानोगे यह तुम अब । रे

हम कुछ भी कर दिखाएँ । रे

हम उठे, हाथ दो अब । रे

जैसा कि दिया कंस-वध किया तब, जी

हे हिंदू जाति के प्रभु जी !

(रत्‍नागिरी, १९३१)

टिप्‍पणियाँ : १. केवल अस्‍पृश्‍यों को ही पति‍त कहने से क्‍या लाभ ? सच देखा जाए, तो हिंदू राष्‍ट्र का पूरा-का-पूरा राष्‍ट्र पतित हो गया है ।

२. हिंदू समाज पुरुष के विराट् शरीर का 'ब्राह्मण' शीर्ष है, ऐसी कल्‍पना की गई हैं, किंतु खुद को छूत लग जाएगी इस आशंका से मस्‍तका पैरों को काट दे, ऐसी ही मूर्खता शूद्र को जन्‍म से ही दूर धकेलकर शरीरबंध को आमूलाग्र तोड़ डालने में किया ।

३. अच्‍छा, स्‍पृश्‍यों के अलावा हिंदू तो एकजाति, एकजीव रह गए, ऐसा भी नहीं है । शूद्रों ने भी छूत लगने के भय से अतिशूद्रों को 'अस्‍पृश्‍य' माना । शरीरबंध बिलकुल तोड़ डाला, पैरों ने छूत के भय से अपने ही कदमों को काट दिया ।

४. ब्राह्मणोऽस्‍य मुखमासीत्, परंतु जिन्‍हें ज्ञान बताने के खातिर वे 'मुख' बन गए ऐसे श्रोताओं को, अर्थात् कानों को ही, इस मुख ने वेदादि पवित्र नाम बताने से इनकार कर दिया । ऐसे सभी तरह से शरीर का शरीर बंधविच्‍छेद शरीर ने ही चलाया । अंग ने अंगों को काट दिया ।

५. वही बात क्षत्रियों की । जयचंद ने पृथ्‍वीराज को जीतने के लिए महम्‍मद गौरी को अपनी स्‍वतंत्रता बेच दी । दाएँ हाथ ने बाएँ हाथ की शान मिटाने के लिए अपनी पूरी देह को ही किसी के हाथ सौंप दिया । किंतु इसके साथ हम भी लूले बन रहे हैं, यह समझ में नहीं आ रहा था ।

६. जिस जन्‍मजात जातिभेद ने समाज के टुकड़े कर दिए उस भेददैत्‍य का निर्दलन करने के लिए आज सारी जातियाँ एक 'हिंदूजाति में' सम्मिलित होकर हिंदुत्‍व के वेदोक्‍तादि समसमान संस्‍कारों का आचरण करते हुए यहाँ हम खड़े हैं । अब आगे का महत्‍कार्य करने के लिए शक्ति दो, साधन दो ।

मुझे प्रभु का दर्शन करने दो

(परिचय : रत्‍नागिरी के किले पर स्थित श्रीमंत कीरसेठजी का प्रसिद्ध भागेश्‍वर मंदिर पूर्वास्‍पृश्‍यों के लिए खुल गया । उस समारेह में प्रभु की पूजा के लिए पूर्वास्‍पृश्‍यों के दिल की तिलमिलाहट को व्‍यक्‍त करने वाला सावरकर रचित यह पद पूर्वास्‍पृश्‍यों की ओर से भंगियों की दो कन्‍याओं ने गाया ।)

मुझे प्रभु का दर्शन करने दो,

मुझे जी भरके प्रभु देखने दो ।।ध्रु.।।

जो तुम करते हैं दिन-रात

उस मल से मैले मेरे हाथ

इसलिए विमल हृदय की बात

हृदय अर्पण करने दो ।।१।।

मैं प्‍यास, जल वही जानो

मैं देह, प्राण वह मानो

मैं भक्‍त, वही भगवान्

चरण उसके अब छूने दो ।।२।।

वह हिंदू-देव, मैं हिंदू

मैं दीन, वह दया-सिंधु

आप हैं मेरे धर्मबंधु,

मत रोको, मुझे जाने दो ।।३।।

मथुरा जाते समय

तव संगति के गोकुल को, री छोरी,

छोड़ना अटल है अब, री

यह राजा का क्रूर दूत आया है

मथुरा को ले जाता है

हम राजा को मारें या मर जाएँ

रण होगा मथुरा में, री

हा हाय ! प्रिये अंतिम हो सकती है

यह भेंट सखि, हमारी

इसलिए प्रिये, इस वेला में । री

विरह के तीव्र बोलों में । री

अश्रु की रचित कविता में । री

मैं देता हूँ तुम्‍हें प्रीति-दानों की

यह रसीद प्रिये, लो तुम्‍हारी

हिंदू-मुसलमान संभाषण

(परिचय : रत्‍नागिरी के अखिल हिंदू मंडल के लिए यह संभाषण स्‍वातंत्र्यवीर सावरकर ने रचाया । 'आप और हम सकल हिंदू बंधु-बंधु' जैसे हिंदुओं के एकता-गान के बाद इस संभाषण का मंचन किया जाता था ।)

पहला हिंदू: एकता मान लो,नमन करूँ चरणों का ।

यह हिंदुस्‍थान है, हिंदू मुसलमानों का ।।ध्रु.।।

मुसलमान : देश को अभी भी हिंदुस्‍थान कहते हो,

एकता बनाने चरण भी पकड़ते हो ।।

पहला हिंदू :जी ! गलती मेरी !! हिंदुस्‍थान मिटा दो !

इसलाम-वतन कह देंगे यदि तुम कह दो ।।

मुसलमान : हिंदी का खून कर दो (पहला हिंदू : मान्‍य जी )

उर्दू की चलती कर दो (पहला हिंदू : मान्‍य जी )

नागरी लिपि छोड़ दो ( पहला हिंदू : मान्‍य जी )

पहला हिंदू: कर लेंगे जो जो कह दोगे तुम, भाई ।

एकता मान लो, पाँव पड़ें हम, भाई ।

मुसलमान : शुद्धि की, परंतु, सनक बंद कर दो जी ।

दूसरा हिंदू : पर तुम भी तो धर्मांतरण छोड़ो जी ।।

मुसलमान- 'पर', यदि' वगैरा शर्ते रखते किससे ।

पाला पड़ना है मुसलमान बंदों से ।।

पहला हिंदू : हाँ ! खान ! भाई हाँ ! क्षमा कीजिए साहिब !

यह झगड़ालू है हिंदू संगठन रोब ।।

मुसलमान : बना देंग मुसलिम हम हिंदू को । ( पहला हिंदू : मान्‍य जी )

तुम नहीं बदलना किसी मुसलिम को । ( पहला हिंदू : मान्‍य जी )

शुद्ध ना करो कभी भी भ्रष्‍टों को । ( पहला हिंदू : मान्‍य जी )

पहला हिंदू : पाना न कभी, खोना ही व्रत हिंदू का ।

एकता मान लो, नमन करूँ चरणों का ।।

दूसरा हिंदू : पर भगा लेत हैं हिंदू लड़कियाँ जो तुम ।

मुसलमान : एकता न होगी यदि लाओगे यह तुम ।।

पहला हिंदू : मत करना गुस्‍सा, मियाँ, छोड़ दो इनको ।

तुम ले जाओ जी मेरी भी बेटी को ।।

मुसलमान : स्‍वेच्‍छा से हिंदू भ्रष्‍टत है मलबार में ।

पहला हिंदू : हाँ, एक कहीं थोड़ा-सा पीड़ि‍त उनमें ।।

दूसरा हिंदू : कोहाट में तो बहुत हिंदू मारे गए ।

पहला हिंदू : ये कायर हिंदू क्‍यों वहाँ मरने गए ।

मुसलमान : और कलकत्‍ते में मुसलमान मर गए ।

पहला हिंदू : ये अत्‍याचारी हिंदुओं ने वध किए ।।

मुसलमान : खलीफा को मानत गुरु ही मुसलिम राज्‍य ।

पहला हिंदू : इसलिए हमें भी स्‍वपिता से वह पूज्‍य ।।

मुसलमाल : 'मुसलिम राज करेंगे' कहते हैं धर्म ।

पहला हिंदू : तो तुम ही कर दो, हिंदू न जानत मर्म ।।

मुसलमान : वाद्यों को अपने तोड़ दो । (पहला हिंदू : मान्‍य जी )

गोवध की निंदा छोड़ दो । (पहला हिंदू : मान्‍य जी )

मृर्तियाँ तुम अपनी तोड़ दो । ( पहला हिंदू : मान्‍य जी )

दूसरा हिंदू : ( पहले हिंदू से ) 'मान्‍य जी ! मान्‍य जी !' क्‍या यह रट पागल की ।

बस करो प्रदर्शनी अपनी नपुंसकता की ।।

(पहले हिंदू को धक्‍का देकर हटाता है, और आगे कहता है )

यह देखो तुम मुसलमान भाई हैं ।

पर बंधु सम यदि व्‍यवहार तुम्‍हारा है ।।

अन्‍योन्‍य हितार्थे हो जाए एकता ।

यदि अडिग रहोगे, चलने दो दूरता ।।

यदि आओगे तो साथ, नहीं तो हम ही ।

लड़ लेंगे अकेले, जीतेंगे युद्ध ही ।।

जीता था शक-हूणों को जिन वीरों ने ।

औरंग तथा अफ़जुल्‍ल मिटाए जिन्‍होंने ।।

उन हिंदुओं को तुच्‍छ भी । क्‍यों मानते

नभ में यदि मेघखंड भी । न दिख पड़े

तूफान बिजलियों का भी । आ सके

तूफान अचानक वैसे आ जाएँगे

हिंदू ही कलियुग तहस-नहस कर देंगे ।।

(रत्‍नागिरि)

चिपक जा मुझसे !

मनमोहक ललने आ चिपक जा मुझसे ।।ध्रु.।।

ऊपर उठकर लगा ले अभी गाल मेरे मुख से ।।

चिपक जा मुझसे ।।१।।

मधुर चुंबनों का चोगा औ' अधर पान दिल से ।।

चिपक जा मुझसे ।।२।।

हास्‍य-अश्रु की माला पहना दो, कह अनंग से ।।

चिपक जा मुझसे ।।३।।

हृद की तव बाँसुरी बजा ले मेरे गायन से ।।

चिपक जा मुझसे ।।४।।

आ, न मुकर जा इस उत्‍सुकता की उत्‍कटता से ।।

चिपक जा मुझसे ।।५।।

भू माता से

माते, घर में आज तुम्‍हारे घुसे पराए दस्‍यू कैसे ?

पहले इन लोगों के घर में हम ही घुस न गए कैसे ।

जब था बल, तब लूट मचाना पाप सदा माना मैंने ।

बल जाते ही लगता है, दे दिया शाप मुझको उसने ।।

माते, किस कारण से होती है हिंसा यह तुम्‍हारी भी ?

हिंसा करने आती ना मम पुत्रों को हिंस्रों की भी !

नृसिंह-त्राता-प्रभु को छोड़ा गया पूजते बैठा मैं ।

इसीलिए तो गाय ही बना शेर झपट आया तब मैं ।

कौन तुम्‍हें डसता है ? विष से घायल कर देता है ?

मैंने दूध दिया जिसको वह सर्प उलटकर आया है !

(रत्‍नागिरी)

प्रतिज्ञा कर लो

प्रतिज्ञा कर लो । युवकों ! मरें देश के लिए ।।प्रतिज्ञा।।

सुस्‍त क्‍यों बैठे । कैसा जी । तिलमिल चित्‍त न करे ।।सुस्‍त।।

तिलमिला रहे हैं । तिलक जी । उनका इप्सित कर लें ।। तिलमिला ।।

इप्सित सिद्ध करें। बजाकर । हिंदू दुंदुभी रे ।।ईप्सित।।

बता-बताकर ही । सूख गया । मेरा आज गला ।।बता।।

फिर भी आग नहीं । लगती है । हृदय को तुम्‍हारे ।।फिर।।

नहीं तो अब समझो । देश यही । नष्‍ट हो गया क्षण में ।।नहीं।।

(रत्‍नागिरी)

देहलता

सुबह-सुबह तुम तोड़ रही थी जूही के फूलों को

ऊपरवाली मंजिल से सखि, देखा मैंने तुमको

उठा लिये जब तुमने अपने हाथ चोलि तब तंग हुई

पल्‍लो कसकर साड़ी जैसी कटि तटि से ही चिपक गई

घुँघराले इन बालों से तब ग्रीवा नाजुक शोभत है

मेरे आलिंगन की स्‍मृति से मन में लहर उठावत है

देख रही हो चुपके से मैं कहीं तुम्‍हें दिख पड़ता हूँ

नजरें जब मिलती हैं तब मुख उषास्मितयुत निरखता हूँ

ऐसे ऐन सवेरे तुमको फूल तोड़ते जब देखा

पुष्‍पलता को छोड़, तुम्‍हारी देहलता को ही निरखा !

शस्‍त्रगीत

(परिचय : शस्‍त्रनिर्बंध हटाने की माँग के लिए पुणे में छात्रों ने बड़ा जुलूस निकाला, तब उनके लिए सावरकरजी ने यह पद रचना की ।)

व्‍याघ्र-नक्र-सर्प-सिंह-हिंस्र-जीव-संगर ।

शस्‍त्रशक्ति से मनुष्‍य जी रहा धरा पर ।।

रामचंद्र चापपाणि चक्रपाणि विष्‍णु भी ।

आर्तरक्षणार्थ शस्‍त्र लेते हैं ये सभी ।।

शस्‍त्र पाप ना स्‍वयम्, शस्‍त्र पुण्‍य ना स्‍वयम् ।

इष्‍ट वा अनिष्‍ट बनत हेतु से निराभयम् ।।

राष्‍ट्र-सुरक्षा हेतु शस्‍त्र इष्‍ट है जहाँ ।

आंग्‍ल, जर्मनी तथा जापान में जहाँ-तहाँ ।।

भारत में ही फिर देश-सुरक्षा हेतु ।

शस्‍त्र धारण करने में बंधन है किस हेतु ?

शस्‍त्र-बंधनों को अब पूर्ण हटा दे दो, जी ।

शस्‍त्र सज्‍ज बन जाओ तुरंत शक्तियुक्‍त, जी ।।

होने को देश सिद्ध अपनी रक्षार्थ, अजी ।

नूतन पीढ़ी को अब शस्‍त्र सज्‍ज कर दो, जी !

(पुणे, १९३८)

अनंत की आरती

तेजोमय तुम, फिर भी तेजोमय उतारते हैं ।

आरती, प्रभु उतारते हैं ।।ध्रु.।।

आसमान के प्रांगण में तव ।

सहस्र सूर्यों का दीपोत्‍सव ।।

एक दिया उसकी पूजा में सभी जलाते हैं ।

आरती, प्रभु, उतारते हैं ।।१।।

सहस्र सूर्यों से ना निपटा ।

एक दीये से उसे समेटा ।।

नैनों में जो भरा पड़ा वह अंधकार लव है ।

आरती, प्रभु, उतारते हैं ।।२।।

माता के ही उपवन से ये ।

ताजा-ताजा फूल चुन लिये ।।

माता की ही चोटी में उनको सजाते हैं ।

आरती, प्रभु, उतारते हैं ।।३।।

टिप्‍पणी : १. श्राद्धालु भक्ति ।

कमला

परिचय : वीर सावरकरजी ने इस काव्‍य को रचना अंदमान के बंदीवास में की और उनकी मुक्‍तता के पूर्व ही सन् १९२२ में इसकी प्रथम आवृत्ति 'विजयवासी' उपनाम के साथ प्रसिद्ध हो गई । इसके लिए उन्‍होंने बंदीवास से ही जो छोटी सी प्रस्‍तावना लिखकर भेज दी वह भी किसी कविता की तरह ही मनोवेधक है । वह इस प्रकार है -

'नृशंस गुफाओं की अंधुक रोशनी में किसी संगत काव्‍य की माला पूजा के लिए गूँथी जाए, इस उद्देश्‍य से इकट्ठा किए हुए ये वन्‍य फूल और पत्‍ते, उस माला का योग अभी भी दुर्घट दिख रहा है इसलिए, वैसे ही बिखरे हुए सूखे जा रहे हैं । गुलदस्‍ते के लिए ही जिन्‍हें काटा-तोड़ा गया; वे अलग रूप में विसंगत तथा एकाकी तो दिखेंगे ही । फिर भी रूखे, सुनसान तथा कँटीले जंगल में खिलनेवाले, जिनका न कोई नाम है न कोई पहचान, ऐसे वन्‍य फूल होते भी कैसे है, इसी कौतूहल से यदि किसी ने उनको उठा लिया, तो गौरव के लिए नहीं, बल्कि वनस्‍पति विज्ञान की प्रयोगशाला में पँखुड़ी-पँखुड़ी तथा केसर-केसर तोड़ा जाकर ज्ञानदेवी को बलि चढ़ाने हेतु; कम-से-कम जो अँधेरे में सूख जानेवाले थे वे रोशनी में तो सूख जाएँ इसलिए; यह उन फूलों की पहली टोकरी गाँव-चौकी की पौड़ि‍यों पर ला उँडेली है ।')

-विजनवासी

फुलबाड़ी शोभत है छोटी-सी नखरेबाज

सज-धज के बन-ठन के करती है नखरे-नाज

हरा-हरा कभी सालू, सित मलमल का कभी,

रेशमी बूटी वाले पल्‍लो में जिसके सभी

नित्‍य ताजा शुभ्र मोती मर्कत माणिक शोभत

हवा से ही उन्‍हें कैसी सजाती हिलाती नित

हँस पड़ी तो कुंददंती मन्‍मथ को भी लुभा सके

सुगंध मुसकराहटों की उसे पागल बना सके

नजारे-नखरे ऐसे कामिनी करती रहे

निज मोहक सुंदरता को सबको दिखा रहे !

नौका में चाँदनी की हुए रममाण सुंदर

फुलबाड़ी योजनगंधा वनदेव पराशर !

फुलबाड़ी-राहों पर दोनों ओर ही सेमल

क्रीड़ामग्‍न शानदार गाते हैं मस्‍त बुलबुल

बुलबुलों के गीतों की साथ करते फूल लाल

फलियाँ हरी झुलाती हैं मन में कल्‍पना-हिलोल

सचेतन माणिक-मर्कत मूठ पर जड़ा दिए

मर्कतों के मियानों में खड्ग तैय्यार रख दिए

लटकते जिनकी कटि से ऐसी भीषण-सुंदर

बना दी युवती-सेना रक्षार्थे स्‍वीय मंदिर

प्रतीहारी-कार्य-हेतु देती है यह पिक-सवर

पुकारें पहले की औ' करती क्षमनिवेदन !

कमान स्‍वागतार्था यह गूँथी मृदु चमेली ने

सु-स्‍वागत अतिथियों का फूलों के स्मित-सुगंध ने

फूल ? अजी, फूल ना ये, यहँ करने विचरण

रात्रि में चोरी-चोरी आते हैं अप्‍सरा-गण

पकड़ा उनको और करने दर्ज गुनाह ये

देवी-द्वारप लेते हैं ठप्‍पे चुंबनरूप ये !

वी‍थिका कदलियों की उपवन के संगमरमर

पंथ के दो-तरफा ही शोभत है अति सुंदर,

आते-जाते मुसाफिरों पर छत्र शीतल ये करें

सप्रेम पंखा झलती विनम्र सेवा करें

निर्गंधता क्षम्‍य जिन की नम्रता-गुण से जभी

ऐसे फूल केले के, गोरे मधुर घौद भी,

दल सुलोल सारे ये जाते हैं घुल‍-मिल जभी,

अव्‍यवस्थित-सी शोभा देख मन सोचता तभी !

कालिंदी-पुलिनों में ही जिन्‍होंने तब भोगा था

यथेच्‍छ वनमाली को, तृप्ति को पूर्ण पाया था,

भुक्‍तकामा, रतिश्रांता, हृदय जिनका हरिमय

सखी रूपेण बन गई जो समतृपत निरामय

विगत-ईर्ष्‍या तथा बन गई प्राप्‍तवल्‍लभ जो तभी

यही हैं वे शांतमनसा खड़ी व्रजनारियाँ सभी

गले में एक-दूजे के डाल बाँहें सुकोमल

हरि के जाने पर भी वैसे ही स्थित निश्‍चल

लोल कोमल पंखों को झलती वा कोई देख लो

गालों पर गाल रगड़ाती मंत्रमुग्‍धा यह देख लो

हेमगौरमुखी कोई अपनी लाडली सखी -

के कंधे पर सिर टिका के विश्रब्‍ध पल भर रुकी !!

सेवंती यह; हर गया था जब उसको पकड़ने

बनाया था ढ़ाल इसके कुसुम को कुसुमशर ने

और हे स्‍वर्णचंपक, कहाँ तुमने पा लिया

यह अद्भुत जादू, जो हम नरों ने पा लिया ?

चाँदी का भी कभी सोना हमने न बना लिया

तुमने सूर्यकिरणों को बस मिट्टी में धुला दिया

मृदुचेतन सोने के, स्‍वर्णचंपक ! फूल ये

सुगंधित देखकर हम तो भौचक्‍का रह गए !

प्रिया स्‍वर्णचंपक की, चमेली कितनी हसीन

दोनों एक-दूजे पर बरसाते सदा सुमन !

जाति से शुचिवर्णा जो, जो भूषा नारि-वृंद की,

मधु-भोजन के लिए होती सदा हवस भृंग की

प्रभु के शुभ चरणों में शशी अर्पण ज्‍यों करे

स्‍वकला, त्‍यों खंड अपनी तनु के अर्पित करे

स्‍वार्थ पाने हेतु ? ना, ना ! स्‍वार्थ का लवलेश न

लोगों का सिर्फ कल्‍याण चाहती नित्‍य लेकिन

मुनियों की साधना करने फलद्रूप ही मोक्ष से

गौरी हर की बाँहों में करे बिनती प्रेम से

ऐसी केतकी की गंध को, हे वायो ! दसों दिशाओं में

फैलाकर उसको करते हो धवलयशा

हाँ, लेकिन यश प्रसृत करते हो, न कुवार्ता

कि नित्‍य यह होती है सुगंधा उरगलिप्‍ता

एक अक्षर भी उसका मुँह से न निकालकर

पवन तुम बने पावन ! स्‍वार्थ से परे हठकर

लाखों लोगों के खातिर जो नित्‍य कार्यरत हैं,

जिनके बिन वसुधा भी अल्‍परत्‍ना लगत है,

ऐसे महात्‍माओं की गृहस्‍खलित बात हो

तो सज्‍जन रखते हैं गोपनीय उस बात को !

फिर से ढूँढ़ते मुझको क्‍या अब ऐसा ही घूमता

त्रिनेत्र का नैन क्रुद्ध तीसरा नित धधकता ;

देख भास्‍कर को खाए डर भरी अनंग भी

दूध से जीभ जलती तब डरा देता ही छाछ भी

इसीलिए सूरजमुखी ! नियुक्‍त तुम को किए

मीन केतन पागल-सा सूरज पर जासूसी करे !

तभी तुम सदा रखते हो नजर रवि के प्रति

और यह मीन केतन भी लेता है रात में गति !

विविध बाल-तरु लाके दूर-दूरस्‍थ देश से,

पूर्ण जिनके रंग-बिरंगे शोभायमान फूल-से,

वैसे ही फूल के वृक्ष विचित्र बाँके भले,

सुरचित मार्ग पर शोभा बढ़ाते चारु गमले

फुलबाड़ी की चारों ओर वर्तुलाकृति में बने

तृणस्‍तवक जो बिलकुल हरे-भरे थे सुहावने;

प्रभात काल में उनकी लताओं पर सफेद-से

नन्‍हे-नन्‍हे फूल खिलते रमणीय अनगिनत से

मनोज्ञ बहु वह शोभा ! मानो रात्रि की अवधि

बहती थी यहाँ जो भी ज्‍योत्‍स्‍ना की रसिता नदी

प्रभात-काल की ठंडक में वह बन गई धनीभूत -

चमचमाते फूल ना ये, चाँदनी के कण बृहत् !!

वशीकरण-चूर्ण है यह तो बलबूते ही जिसके,

मंत्रों के साथ, कलियों को भोग-क्षम बना सके,

फूल को फूल से अन्‍य पूर्णत: वश ठान ली

इसका चुंबन दे उसको, उसका दे इसे अलि

दयिता-दयिताओं में सुमलोकस्थिता अभी

नित्‍य चक्‍कर काटे यह मधुपानार्त दूत भी !

धतूरे के फूल सबसे शिवजी को पसंद हैं,

गुणांधता भी बड़ों की तो बड़ी नित होत है !

फूल रजनिगंधा का ! दिल को आतुर बना सके

कामसेना-पुरोगामी चाँदी का सींग ही दिखे !

छोटा-सा स्‍फटिकमय यह अठपहला सरोवर

नित्य जल भरा स्‍वादु शीतलता का आगर !

फुहारा शतधाराओं का शोभत है नीर में

तेजोबिंब जब बिंबमान बिंदुओं के नृत्‍य में

तब लगता है, आता है उड़-उड़कर वहाँ भला

जत्‍था इंद्रधनुष के नन्‍हे पिल्‍लों का अतिकोमला !

शोभाय माना नलिनी ये जलार्धमग्‍न नाला

शोभती हैं लज्‍जानम्रा यमुना में गोप बाला

हृद-चोर कृष्‍ण ले जाता वस्‍त्र सारे जिसी क्षण

और उस प्रिय पापी का संतुष्‍ट करने मन

यथासंभव नग्‍न तन्‍वंग उठा ऊपर नीर के,

'दे दो जी हरि, वे वस्‍त्र'-याचना वहु झेंप के !

-न माने पर यह झूठा, कहता 'आओ जी ऊपर'

उसकी अदाओं से लुब्‍धा होती हैं नारियाँ चतुर

आईं तट पर नग्‍ना ही, अहा ! सब नई-नई

लावण्‍य की परतें दिव्‍य तट पर तब खुल गईं

विकसती गई ज्‍यों-ज्‍यों रवि को करती नमन

वायु निश्‍चष्‍ट, सूरज के अंशु आनत, तृप्‍तमन

किया तब जिन्‍होंने ही देवप्रिय प्रदर्शन

विश्‍वमोहन मदिरा के प्‍याले, मृदु सचेतन

जीवन की उषाएँ जो, जो रति के हृद सुंदर

प्रेमकल्‍प फूल वे ये-गुलाब चेतोहर !

ऐसे कुंज की मानो देवी कोई मनोरम

एक बाला वहाँ आती थी लेने मधु कुसुम

बगीचा राह पर फूलों को बरसाता देख उसे

चाँद को देखकर तारे आते हैं नभ में जैसे

प्रभात-कौमुदी में जैसी उषा घुल-मिल जाती है

कैशोर-यौवनों में वह शोभायमान होती है

तुषारमय धाराओं की झारी से कभी-कभी

शुचिस्मिता स्‍वयं नहलाती थी पुष्‍पलता सभी;

पोंछती थी मलमल से पत्‍ते उनके, न धैर्य पर

नर्म मलमल से भी पोंछने को फूलों के पर;

पोंछती थी गुलाबों की पँखुड़ि‍यों से फूल और

होंठों की पँखुड़ि‍यों से गुलाबों को चूमकर

पयोघटों से उसके द्वारा मिलता सलिल जब

वर्षा से भी बगीचे को ग्रीष्‍म प्रिय होता था तब

लुप्‍तान्‍ह श्रावणी या उन झड़ि‍यों से हवा खुली

होते ही भानु की कच्‍ची किरणों जैसी वह खुद चली

लताओं में घुस, पानी से लबालब भरे हुए

फूलों के, कमलों के वे प्‍याले सब रीते किए

खाते हैं लताफूलों को ऐसे कीड़े दूर से

नौकरों के हाथ पकड़वा लेती थी चुपके से

जिनमें बिछाए मत्‍ते फूल भी बिखरे हुए

ऐसे डिब्‍बों में भरकर दूर भेज ही दिए

लीलावती यदि बैठी लता के पास ही कभी

कढ़ाई करती चोली पर सुंदर सुकुशल तभी

झेंप जाता दिल उसका और कहती लज्‍जाममुखी,

'सत्‍य ! मैं कितनी स्‍वार्थी ! हे लते, रूठ मत सखि,

ले, कढ़ाई करती हूँ यह तेरे आलवाल में !'

रम्‍याकृति में लिख देती नाम अपना सुरम्‍य और

नाम उस लता का भी लिखती अपनी चाली पर

राई-राई जैसे ही सुशोभित पुष्‍पवेष्टिता

रम्‍याकृति खिलती तब चोली का करत स्‍वीकृता

कभी-कभी सुमनों से भ्रमरों की मृदु-मधुर

सुनकर प्‍यार भरी गुफ्तार कहती,'मुझ से मधुर

गुफ्तगू कर रे फूल ! बता दे, क्‍या बता रहा

भृंग को तू, वह तुझसे क्‍या-क्‍या बातें चला रहा ?'

लता से सटाकर गाल प्‍यार से कहती कभी

पुष्‍प के साथ सुकुमारी बातें करती जभी-तभी !

पदाघात ही जिसका अशोक को पल्‍लवित करे

ऐसी सुंदर स्‍त्री का गाल ही स्‍पर्श जब करे

तब वज्र भी गाएगा । ये तो बस, फूल कोमल !

ऐसे मधुर गाते थे, लगते थे कि बुलबल !!

प्रात: समय सास उसकी प्‍यार से कहती कभी

'चोटी में गूँथने हेतु फूल ले आ स्‍वयं अभी'

बगीचे में चली जाती, किंतु हाथ न बढ़ाती वह

देखती रहती कि लता देगी क्‍या फूल अब यह :

और सचमुच उसके केश देख मुक्‍त खुले

फूल ही क्‍या, लताएँ दे देती थीं कलियाँ खिलीं !

निजाभरण कार्यार्थ न फूल तोड़ती कभी

प्रभु-पूजार्थ भी उसका मन सोचत यही सभी

फूल को तोड़ने पर जो आता था रस, देखकर

लगता था खून उसका, सास समझती थी पर

'प्रभुकार्य में, अहा, बाले, लताओं के ही फूल क्‍या,

यौवन के फूल को भी किसी ने समर्पित किया !'

चाँदनी रात में विचरण करती थी सुमोहना

रममाण स्‍वेच्‍छया जैसी प्रीति-स्‍वप्‍न-सुचेतना !

कमलिनी के निकट जाती, न कदमों की आहट

सुख में सो रही है इतना देख चल पड़ी पथ

गुजरती हरसिंगार के नीचे से जभी-जभी

स्‍वर्ग के स्‍वप्‍न आते थे हरसिंगार को तभी

जब से ले आई थी सत्‍यभामा पुरातन

आज देख लिया स्‍वर्ग ! आँसू टपकत, फूल न !!

बचपन में ही हुई शादी; तब से इन फूलों को

छोड़ जाने पर होता है दु:ख इतना पगली को

कि पीहर जाने को भी न इसका दिल करे

माँ समान सास उसकी फिर उसकी सांत्‍वना करे

'मत रो, लाडली बेटी, जब तक तू लौट आएगी

तेरे जैसी समझकर लताओं को सम्‍हालूँगी '

मंगलागौरि आते ही कितना दिल उछलने लगे

सुशुभ्र-वसना शुद्धा बाग में विचरने लगे

फूलों को चुनते-चुनते आ जाती उस स्‍थान पर

जहाँ वेला के फूलों की वृष्टि पूरी जमीन पर

तब दिखती समाविष्‍टा फूलों के बीच सुंदरी

हिमालय में व्रती जैसी दिख पड़ी थी महेश्‍वरी ।

वन-उपवन की नाना पँखुड़ि‍याँ, कलियाँ तथा

कोंपल, दल, फूल सारे, वनफूल भी सर्वथा

रंग विविध फूलों के ! टोकरी में भरे हुए !

गुलाब, कमल, चंपा भी, बकुत्रादि सजे हुए !!

पूजा के लिए बैठा करती थी फूल रचाकर

बीच कल्‍पनाओं के माने कविता प्रकटत मान्‍यवर !!

पर्ण करा के समर्पित, पूजा करवा के द्विज

जाते थे घर; फिर भावपूर्णा ललना ही सहज

मंगला मंगला गौरी गौरी-संतोष के लिए

चढ़ाती वह दल, फूल नाम-जाप करते हुए :

पुष्‍परूप कुप्पियों से रंगों का व सुगंध का

रस डाले उसके मन में सुप्रसन्‍न अंबिका

संपन्‍न व्रत इस तरह से हुआ सुंदर रूप में

पारमा‍र्थिक तथा प्रपंचिक दोनों भी दृष्टि में ।

भाव हो गए जिसके पुष्‍ट फूलों की गंध से,

राजहंस होते हैं जैसे कमल-नाल से;

ॠतुजा, शुचिता, दैवी सात्विकता भी क्‍या सभी

ऐसे दिलवाली की बतानी पड़ती कभी ?

शांत दृष्टि में उसकी सारी सृष्टि ही शांतिमय

रूप में, यौवन में, हृद में सदा रहती निरामय

रूप से, कुल से, उम्र से भी पति था यथानुरूप

देहली पर यौवन की पहुँचा था अभी सुरूप

सास भेज देती थी उसे खाना परोसने

अथवा यदृच्‍छया आते कभी आमने-सामने

पति की नजरों से तब नजरें मिलतीं कभी

'कमला' की हृदय में लेकिन केवल सातिवकता अभी;

प्रभुमूर्ति बनाते हैं जैसे पूजन के लिए

चंद्रामृत पीते हैं जैसे बिन स्‍पर्श किए

मन के भीतर ही भीतर गायत्री मंत्र गात हैं

कमला के मन में पति पर भाव ऐसे ही आते हैं

* * *

नूतन-वृद्धि का दिन है आज वर्ष-प्रतिपदा

शुभे, यह शिव हो वर्ष, हरण करे सर्व आपदा !

आशाएँ मंगलमय सारी, नव-वर्ष-प्रतिपदा

शुभे, यह शिव हो वर्ष, हरण करे सर्व आपदा !

वसंत ॠतु में कोयल गाती है स्‍वर-संपदा

शुभे, यह शिव हो वर्ष, हरण करे सर्व आपदा !

नई तिथि, नया मास, नव वर्ष, ॠतु नई

आज क्‍यों न सजा ले तुम, रूपश्री भी नई-नई !

लावण्‍य लक्ष्‍मी उसकी रोज यद्यपि देखती

सास को उस सवेरे वह लगी नव-रूपमती;

मन में आशंका औ' आशा उत्‍सुक हृदय में

फिर भी माता-समा सास ने कहा बस प्रकट में

'मत जा कहीं अब बेटी, खुले केश ही लेकर

आज है शुभ दिन, तेरी उतारूँगी मैं नजर !'

चोटी बनाने बैठी जब सास प्‍यार-दुलार से

कमला मुसकरा रही थी मग्‍न अपने आप से

'क्‍यों हँस रही, कमला ?' कुछ नहीं, कल रात को

सपना आया मजेदार, मेरी प्रिय नलिनी को

देखा मैंने, वही जो सर के दाहिनी तरफ है !

जिसकी पहली कलियाँ अभी खिलने वाली हैं !

- वह और मैं गई दोनों ढूँढ़ने तत्प्रिय अलि

उष:काल की हवा के मृदु झोंके पर बैठ मलमली,

गाते थे हम- 'तुम्‍हारी ही प्रतीक्षा करती रही-

ये कलियाँ ! आओ भृंग, स्‍पर्श से फुलाओ सही !'

आया लुब्‍ध अलि भी ! पर छोड़कर नलिनी प्रिया

मुएँ ने मेरे ही होंठों को दंश जो किया !

क्‍या यह सपना नलिनी के लिए मंगल है सहीं ?'

सास के नैन से सुख की अश्रुधारा तभी बही !

स्‍वप्‍नार्थ हृष्‍ट तो था ही, उससे भी हृष्‍ट थी नता

मासूमियत बाला की, उससे हृदय मुग्‍ध था

चोटी बन जाने पर सास ने पीठ थपथपी !

माँ के चुम्‍मे से भी थी वह मधुर थपथपी !

किशोर-उम्र जे जिसने यौवन में पद रख दिया

जैसे कि छात्र ने अंतिम पदवी को ग्रहण किया

ऐसे बुद्धिमान् और सुंदर-सा उसका पति

माता के कहने में आया त्‍योहारार्थ संप्रति

पुष्‍पमाला गुढी की वह थी गूँथ रही जहाँ

उद्यान में, खिड़की से वह देखता था सही वहाँ

हे भृंग ! सम्‍हालो जी, वसंत-मधुमास में

कहीं कैद न करें इसकी अदाएँ प्रेमजाल में ।

और धीरज टूटा ही; आज निश्‍चय कर लिया

पहली बात करने का मन में तय कर लिया ।

माँ को दे के चकमा, सारा धैर्य जुटाकर,

आवागमन किया उसने कूटनीति अपनाकर,

आया ! आया अभी पीछे ! आते ही पर सम्‍मुख

चुपचाप ही चला आगे, शब्‍द ना निकले इक !

जाना ही इस तरह उसका बना मूक सवाल ही

'जी हाँ' अश्रुता-सहिता तन में उभरा जवाब ही !

उठ गई नतमुखी, गाल रंगत, गिर गई सुई;

फूल जैसी चीज कोई हृदय में जो चुभ गई !

सास से चुरा के रख ले ऐसी पहली ही बात थी

पहली बार आँखें भी आज उसकी अशांत थीं

मिष्‍टान्‍न खिलाए सास, मीठी उससे निरामय

छटपटी अभी की वह दोनों को लगत निश्‍चय

तीसरे प्रहर में भी न लगे इस कारण

गई वह लताओं के बीच करने विचरण

सरोवर-किनारे पर लाड़ला बकुल ही उसे

शाखा झुकाकर थोड़ी रोक लेती है प्‍यार से;

'क्‍या है ?' वह करे पृच्‍छा स्‍नेह से सहलाकर

'रे बकुल ! कह दे ऐसा चुप न रह शरमाकर !'

अचानक याद आया जो पढ़ा था कहीं कभी

' -कौन जोन ! पर दय्या, कवि जो कहते सभी

सत्‍य है ?' मन में औ' द्रवित होकर 'मै' नहीं

तो और कौन कर लेगा पूरी जिद यह तेरी ही !'

उत्‍सुकता से, प्‍यार से भी, तन्‍वी ने उस ताल के

पानी से भर मुँह अपना कुल्‍ली कर दी बकुल के

तन पर, पुन: देखा, पुन: कर दी अशब्‍द ही

लज्‍जा रोक रही थी, फिर भी कोई ना आस-पास ही

तभी सर्रसराया कुछ तो कुंज में ! देख तो सही !

कौन यह कमले, आया ! चोर वाकिफ ही यही !

आया ! सम्‍हाल, आया ! हाँ, रुको जी, यह क्‍या है ?

असावधान पर हमला करना ना उचित बात है !

पकड़ ही लिया पंछी ! वृद्धता से अंध है -

अन्‍यथा आकाशवाणी कहती,'ना धर्मयुद्ध है !'

बदन चुराती कटि को पकड़े हाथ थिरकत,

शरमाते गाल से भिड़ गए शरमीले होंठ अकस्‍मात् !

साचीकृतानना, लज्‍जाचित्र हृद्य अति मोहक !

ऐसी प्रिया पहला चुकबन वह लेत युवक !

हे प्रिया के पहले लज्‍जाचंचल चुंबन !

कौन प्राणी दुनिया में है जो भूलेगा तव क्षण !

'पल' होत हुए भी जो कराए तब पान जब

शत वर्षों से भी वह 'अपल' हो जात है तब !

तुझ में दिव्‍य जो चोरी, और शीतल दाह जो,

त्‍वरा रोकने वाली, सख्‍ती इष्‍ट, सु-मान्‍य जो;

हे पहले चुबन ! तुझमें सुख मादकता सभी

प्रियाननार्पिता; मदिराओं में भी न मिले कभी !

व्‍यर्थ ही रूठकर रिश्‍तेदारों को घर बुलाया

आपस में बात करने का मौका पूरा गँवा दिया

किसी को न पता ऐसे चिट्ठी डाली जभी कभी

कुचलाकर निकल जाते हैं ऐसे ये लोग सभी

हे चुंबन ! मानिनी को सपने में तुम दीखते

तब बाजार में चंदन-पद्मों के भाव भड़कते !

जिंदगी में भयातुर जो सहारा स्‍नेहशून्‍य है

ऐसे बीहड़ में जब जीव व्‍याकुल होत है;

अथवा जाल मकड़ी का मात्र एक मजा जहाँ

ऐसी काल-कोठरी में बंदी कोई सड़े वहाँ,

हे प्रिया के प्रथम चुंबन ! मुग्‍ध, प्रेमल, आतुर !

तुम्‍हारी स्‍मृति ही रखती प्राणों को तन में स्थिर !

आहट हुई ! भृंग भागा, चूमकर चला गया

स्‍पर्श सुख-उत्‍कटता से कली का दिल भर गया ।

कहती है सास से वह : 'पेट में दर्द हो रहा !'

पेट में अथवा दिल में ? उसको सूझ ना रहा !

दर्द न शशिलेखे, यह ज्‍योत्‍स्‍ना की खिलती कला !

मधु-प्रतिपदा हो जाए तुमको नित्‍य-मंगला !

* * *

बहू रंग में रँगी जैसी सुमंगला उषा

उसकी सास के मन में हर्ष हो बेतहाशा !

बहू कल्‍प प्रसूनों की लता शोभत थी भली

सास के दिल में मच गई प्‍यार की बहु खलबली

देहधर्म तया समझा, नया अस्‍पर्श्‍य बैठना

स्‍पर्श के बिन लोगों का झाँक-झाँककर देखना

स्थित्‍यंतर कारण उसका झेंपता नाजुक मन

जैसे पराए लोगों के बीच कर रही भ्रमण

सास का देखकर हर्ष आश्‍वस्‍त पर वह हुई

सास को हर्ष है जिसमें वह घटना शुभ ही हुई

प्रेमाशीर्वचनों की तो वर्षा उसपर हो गई;

न सिर्फ उसके बल्कि हर घर में खुशी हुई

सुरम्‍य 'मखर' के बीच रमणी को बिठा दिया

कालिदासकृत श्‍लोकों में उपमा जैसी सजा दिया !

पौर बालांगनाओं का रम्‍य मंडल जम गया ।

हर किसी का उसकी सेवा में दिल लग गया

कोई बनाए रँगोली, वाद्य मंगल बज रहे

बाँटती कोई इत्र, सुमन-कुंकुम बँट रहे,

भोग जैसी सजा थाली, धूपदानी परे रखी

'खा लो कुछ तो' ऐसी प्रत्येक ने विनती की;

मांगल्‍य-देवि जैसी वह स्त्रियों के बीच शोभती,

मंदिर का ही रूप आया 'मखर' को तभी संप्रति !

लेकिन उस युवा के आते लगता यह जाएगा कब !

जाते ही उसके लगता अब फिर आएगा कब !

और करे भी क्‍या वह ! अजी, व्‍यर्थ पुन: -पुन:

वस्‍त्र, पुस्‍तक, कुछ ना कुछ, रहे उसका यहीं पुन: !

ठाठ वह उस 'मखर' का, वह भीड़ वहाँ जमी हुई,

सलील ललनाओं की अदाएँ मोहक नई

किंतु यह सब होते भी उसे विस्‍मृति ना हुई

उसके प्रिय लता-फूलों के विरह-दु:ख की

उसे रिझाने हेतु सहेलियाँ अति उत्‍साही

उससे भी ज्‍यादा सेवा लताओं की ही कर रहीं !

आतीं जब 'मखर' में सुंदर, रंगीन तितलियाँ

उसे लगता बगीचे ने भेजा है संदेश नया !

स्‍वच्‍छंद उनको रमने देती थी भोजनपात्र पर :

'खाओ यथेष्‍ट हे मेरे फूलों के प्रिय प्रियकर !

और जा बताओ कि बहु दु:खित करे यह

लताओ, कमला को ही तुम्‍हारा दुष्‍ट विरह;

'सुख जाएँगी लताएँ जी अब तुम्‍हारे स्‍पर्श से'

ऐसा वचन बुजुर्गों का रखता है दूर तुमसे !'

गई बाला नहाते ही बाग में चौथे दिन

जैसा हवा का झोंका बगीचे में करे भ्रमण !

रमी बचपन की भाँति उछल-कूद करे वहाँ !

बकुल के पास आते ही-मदन व्‍याकुल हो वहाँ !

गुलाब खिल गए गालों पर जूही के फूल और-

अंदर से कोई मारे, ऐसा अनुभव था मधुर !!

पहले से ही प्रिय बकुल था, औ' फिर उसकी ही छाँव में

दिया, नहीं-नहीं, लिया पहला चुंबन उस नटखट ने !

दोहरा प्रिय बना ऐसा वह बकुल उसके लिए

कुल्‍ली वह, चुंबन वह चिरस्‍मरणीय हो गए

और अचानक आई आशंका पुष्‍पवती को

कुल्‍ली से फूल आते हैं बाला को या बकुल को !

-और लज्‍जान्वित किंचित् सी सुहागन ॠतुम‍ती !

पुष्‍पलता जैसी ही होती है जी पुष्‍पवती !

मुहूर्त पर मंगलोत्‍सव के आयोजन किए गए

जिसमें सम्मिलित होने पीहर के लोग आ गए

उस दिन थी पूर्ण सौख्‍या वह ! एक साथ ही संभव

पीहर, ससुराल और उद्यान तीनों का संग अभिनव !

दुकूल वसना-सालंकृता कमला, पति आतुर

युवा युगुल को ऐसे शुभ दिन मुहूर्त पर

एकासन पर बिठाया होमहवन के समय

चंद्र-रोहिणी सम शोभत है युगुल वह निरामय !

दक्षिणार्चि हुताशन में हवि अर्पण ज्‍यों किया

पुरोहित के कहने पर हस्‍तस्‍पर्श तभी किया,

अंगुलियों से अंगुलियाँ, हाथ से हाथ मिल गए

होंठों के समान ही ये मिष्‍ट चुंबन थे नए

शर्म से हलाक पहले, प्रेमधीटठ तुरंत ही

पति के कर ने उसकी अंगुलियाँ दबाईं ही

वादिका चतुरा वह औ' वीणादंडस्‍पर्श हुआ

दो हृदयों के तारों से मधुर गीत खुला नया !!

शुक्र तारे में जैसे सूर्य विलुप्‍त होत है

वैसे होम की अग्नि उस गीत में विलुप्‍त है

चौक में सजी रँगोली, चौकी चंदन की लिए

चारों कोनों में जिसके चाँदी के फूल जड़ा दिए,

नहलाने ले जाती हैं दोनों को नारियाँ वहाँ

अटारी में लगी भीड़ तमाशा देखने अहा !

विविध गंधित तेलों से मालिश करने हेतु जब

ललनाओं में लगी होड़, दोनों शरमा गए ही तब

सुख स्‍पर्श करते पानी की धारा जब शुरू हुई

अटारियों से दोनों पर फूलों की वृष्टि हो गई

किसी ने बहकाया पति को उँडेलने जल वधू पर

किसी ने कहा कमला से 'कर दो कल्‍ली उसपर'

कोई फेंके फूल, कोई केसरिया रंग डालकर

छिपकर पिचारी की मार करत युगुल पर

अटारी से उतरते और फिर से चढ़ते पुन:

युव‍ती-युवकों की वह हड़बड़ी मनरंजना !

वामास्‍वन खिलखिलाहट में युवा-स्‍वन भी मिल गए

शहनाई के सुरों में ज्‍यों नगाड़े घुल मिल गए !

जैसे कि ॠचाओं और मंत्रों का अभिसिंचन

प्रेमसिंहासनाधिष्टित कमला रति, पति मदन !

न केवल युवक-युव‍ती करते थे शोरगुल वहाँ

बल्कि वृद्ध भी बालों से खिलखिलाते रहे वहाँ

एकासन पर नहाते वक्‍त कितने चुरा लिए, पर

बदन लगते एक-दूजे से, सुख होता निरंतर;

मुलायम मृदु-मृदुल सा कुछ सुख-स्‍पर्श तभी हुआ

गिरते-गिरते पति ने उसे सीने लगा लिया !

गुलाल और जलधाराओं के परदे की आड़ में

पति के उसे दिया मौका जो चाहत हृदय में

इस तरह परिचिता हुई जब प्रियमूर्ति यथाक्रम

दूर से न, होंठों से प्राशिता शशिकला सम !

आए सौगात, हुए संपन्‍न पुण्‍य ब्राह्मणभोजन,

रचाए सुखशय्या भी तत्‍पर युवती जन

भुलावा देकर ले जाती हैं उसको उसी स्‍थल

खिलखिलाईं युवतियाँ सारी भीरु जब हुई चंचल !

वधू-विभूषणा लज्‍जा के मारे भाग वह गई

माता तथा सास उसकी बैठी थीं वहाँ तक गई

दिख पड़ा सहसा उसको पति भी बैठा वहीं !

मुसीबतें आती हैं दुनिया में एक साथ ही !

मुसकराकर प्‍यार से, लेकर बाँहों में उसको तभी

सहलाकर दोनों को कहा सास व माँ ने भी

'शरमाओ मत, यहाँ बैठो, दोनों अब एक साथ ही

जी भरकर देखेंगे हम हमारे प्राण ही !'

देखकर युगुल को दोनों ऐसी गद्गद हो गईं

कौन सी माँ कौन सास दोनों की मति खो गई

'मुकुंद के पिताजी यदि होते जीवित इस दिन

कितने हृष्‍ट हो जाते देखकर बहु हसीन !'

'और मेरी विमला भी यदि होती जीवित

जीजाजी के कौतुक में रस लेती अनन्वित !'

'जो है' उसके उत्‍सव में 'जो नहीं' उसकी स्‍मृति

खुशी के आँसुओं में ही दु:खाश्रु को यूँ मिलाती

मुकुंद का प्रिय सखा बचपन का मित्र प्रेमल

कुकुल वहाँ आया तब चुपके से उसी पल

कमला को न पता लगते पीछे से ही झपटकर

आँखें बंद कर दीं उसकी हाथों से, बहु तत्‍पर

'नाम लो, भीभा ! आँखे छोडूँगा न उसके बिना !

कलियुग में आगे वाले वादे पर यकीन ना !

अच्‍छा ! मुकुंद के बाद लोगी न नाम आप भी ?'

उसका मौन बताता था, 'हाँ जी, हाँ, मान्‍य है सभी !'

शरमाते हुए नाम लिये कमला-मुकुंद ने

तब माताओं से भी ज्‍यादा मनाया हर्ष मुकुल ने

बाँह में बाँह लटकाए, तेज: प्रेम गुणादि से

समान सुहृदों की जोड़ी चल पड़ी जब वहाँ से

नटखट तभी फिर से मुड़कर शरारत भरा

मुकुल कह पड़ा, कैसा दाँव मैंने किया खरा;

'शादी तुम्‍हारी होगी तब मैं भी देखूँ उसी समय !'

स्‍नेहघोर प्रतिज्ञा जो मधुस्‍वना करे उस समय

राजीव-लोचनों वाली गुण-रूप-मनोहर

जोड़ी जानी दोस्‍तों की आ पहुँची सरोवर

उदासीन सा कुछ होकर मुकुंद तब मुकुल से

कहे, 'हो रही मन में बेचैनी आज कब से !

क्‍या कारण न जानूँ मैं ! उत्‍सव के लिए भी अभी

रम रहा न मन !' झट से मुकुल भी कहे तभी

मुसकराकर, 'सचमुच रवि कितना मूर्ख है !

ऐसे दिन भी वृथा धीरे-धीरे मार्ग क्रमत है !'

मर्माघात करे लेकिन विनोद सहसा तभी

कहे मुकुंद, 'इतना मैं कामी बन गया अभी ?

देख मुकुल, मुझे तुम बिन न कोई जगत् में

स्‍थान पूर्ण भरोसे का, फिर बताता हूँ तुम्‍हें !

पिताजी गुजर गए मेरे छोटा था जब मैं तभी

बढ़ाया, पाला-पोसा, माता ने ही किया सभी

प्रिय मेरी बहुत माता, परंतु फिर उसको

मर्यादा के कारण मैं कुछ बातों को न बात सकूँ

कामिनी को न बता सकता ऐसी कोमल भावना

मित्र से कोई होता है जगत् में स्‍थान अन्‍य ना

पुण्‍य या पाप जो भी है मन में तुझसे कहूँ

तुम से भी छुपा रख दूँ कुछ, ऐसा पापी न मैं रहूँ

बचपन से, मुकुल, तुम और मैं दोनों एकजीव हैं

अभिन्‍नहृदय हैं हम, भले ही देह भिन्‍न है

तुमने मुझे न मैंने तुमको कभी छोड़ भी दिया

छाया की भाँति रहते थे, याराना हमने किया

सुभाषित या शास्‍त्रों के महाप्रमेय बड़े-बड़े

विशिष्‍ट प्रिय जो लगते दोनों ने मिलकर पढ़े

साथ में जूझे थे हम म्‍लेच्‍छों से रणरंग में

सदा साथ रहे थे हम संपत्ति-विपत्ति में

सोये साथ, उठे साथ, पहने साथ लिबास भी

लोग पहचान ना लेते कौन सा कौन है तभी

मेरे बिना न कभी जिसने सुख का भोग कर लिया

ऐसे तुम्‍हें छोड़ आज सुख मैंने अलग पा लिया !

कामिनी के संग का ! -ऐसा द्रोह सु-मित्र का

रूप लंपटता का ही है मंगल ॠतुशांति का !

अ‍त: हे मुकुल ! जब तक तुम हो अविवाहित

स्‍पर्श बिलकुल ना करूँ मैं मत्प्रिया को सुनिश्चित !

अथवा याद कर लो कुंती का वह भाषण!

अलौकिक प्रेम के खातिर तुच्‍छ लौकिक बंधन !

हमारी उनसे प्रीति और सम्‍मति हृदय में

प्रेमला कमला की भी हम से है न शक में

वृत्ति कोमल जो पाँचों पांडवों की सदा रही

मुझे भी व्‍याकुल करती है !' 'हाय ! क्‍या बात यह कही ?'

बीच में ही मुकुल बोले साश्रु गद्गद, 'पावन

क्‍या चुकता कर सकूँगा मैं इस प्रेम का ॠण ?

बंधु ना, ना स्‍वसा जिसकी, ना माता ना पिताजी भी

मेरे अबोध बचपन में ही तो गुजर गए सभी,

ऐसे मुझको प्रेम सारे दिव्‍य ये फिर से मिले

तुम्‍हारे प्रेम के द्वारा, ऐसे प्रिय तुमको मिले-

सौख्‍य, तभी सौख्‍य मुझको ! तुम्‍हारा मंगल सभी

मंगलप्रद मुझको भी ! सोच लो किंतु यह अभी-

अविवाहित जब तक हूँ मैं तुम रहोगे व्रतस्‍थ ही

मेरे खातिर : पर मेरी वह लाडली कमला सही ?

चमेली के फूल से भी उसकी मधु मुसकराहट

संन्‍यासी बन जाओगे यदि तुम तब आहत

आग में झुलस जाएगा, फूल वह जल जाएगा

फूल को देख खिलने के बजाय जलता हुआ

सुख से मत्‍त होगा जो ऐसा निर्घृण निर्दय

क्‍या है मन यह मेरा ? हाय ! और निरामय-

समान हम दोनों को मातृप्रेम जो देत है

अलौकिक मित्रता को देख संतुष्‍ट होत है

मुकुंद ! ऐसी तुम्‍हारी माता को वंशवृक्ष का

निष्‍फल होना कैसे देखा जाए ? जननी का-

हृदय हमेशा होता है सुख से उत्‍फुल्‍ल खिला

ॠतुस्‍नान स्‍नुषा से जबब पुत्र को देखती मिला

क्‍या कारण है न जानूँ मैं, हर्ष होता यह अगम्‍य सा :

वशीकृत जगत् अथवा वंश सातत्‍य लालसा :

भावी ऐहिक सुखों की आशाएँ या शुभभूति की

नई निश्चितता दूजी परत्रा या श्रेय की

यौवन की अशांति की शांति की स्‍मृति निश्चित

अपने-अपने ईप्सितों से अनजाने विमोहित

अथवा देखकर मात्र पुत्र को मंगलकार्य में

अहेतु हर्ष ही रोमांचित तनु करे प्रेम में;

अथवा सीज्ञी वृत्तियाँ ये : किंतु जननी हृदय में

उत्‍कंठा है सुतभुक्‍ता बहू को निरखने में !

तिस पर भी पिता जिसका बचपन में ही गुजर गया

कुल के लिए मात्र एक जो आधार रह गया

तिल का ताड़ बनाया जो ऐसा नंदन लाड़ला

पुण्‍यशय्या पर बहू के संग प्रथम रम गया

अत्‍यधिक उल्‍हास के कारण लगता जननी-हृदय को

सही फल मिल गया है आजन्‍म परिश्रमों को !

तिसपर भी मेरी या तुम्‍हारी माँ के केवल

सुख का कमला के भी नहीं है यह सवाल !

नहीं, मित्र, अनिरुद्ध का ही मात्र एक उजागर

अशेष-जन-सौख्‍यार्थ पालना रति के घर ।

अशेष-जन-सौख्‍यार्थ जो है धर्म वही खरा :

धर्मदा शर्मदा देवी रति-ना सुखद सुंदरा !

राष्‍ट्रसेवाव्रत जो हमने जीवन भर स्‍वीकृत किया

ऐसे रामदासीयों को यही धर्म जँच गया

ओजस्वि वीर्य-गांधर्व-विधि से तुम संप्रति

पूता विवाहवेदी से बढ़ाओ निज संतति !'

'मुकुल, फिर तुम भी क्‍यों विवाह करते नहीं ?

तुम्‍हारे समान मुझमें आत्‍मप्रत्‍यय है नहीं

यद्यपि राष्‍ट्रधर्म का है बीजमंत्र विवाह ही

गंगास्‍नान करें कैसे यदि शुष्‍क है जाह्नवी ?'

परंतु परतंत्रता की आपदा प्रिय भू पर

धर्मार्थ ही होता आत्‍मबलिदान शुभंकर

अर्धभुक्‍त तभी पत्‍नी की बाँहों को हटाकर

होता है रे मित, जाना, हाय ! रण में भयंकर

ऐसा हवि प्रीति का देने धैर्यशील भी डरते हैं

वज्र के प्रहारों से शैल भी गिर जाते हैं

पुण्‍य भी, श्‍लाघ्‍य भी होते हैं वैवाहिक बंधन

आत्‍मदुर्बल मुझ जैसे जो, उन को ये अति कठिन

रोगी के लिए पौष्टिक खाद्य वर्ज्‍य ही होत है

वैसे ही रति का मंगल हमारे लिए वर्ज्‍य है

अल्‍पधर्म के खातिर महद्-धम्र न हो गलत

अत: विहित है इनको रहना अविवाहित

परंतु जो दोनों धर्मों को निभा सकता है

कामिनी के कटाक्षों से जो रोका न जाता है

धर्मवीर्यत्‍व ना जिसका लुप्‍त हो संग उसके

बल्कि उसी को भी अपने साथ जो ले जा सके

धन्‍य-धन्‍य ही वह धीमान् धर्मवीर चितौर का,

राजीवाक्ष अयोध्‍या का, कन्‍हैया भारतभूमि का !

तुम मुकुंद, बनो ऐसे, बन सकोगे सत्‍य ही

विश्‍वास है मेरे मन में, मेरा है यह स्‍वप्‍न ही !

हमारी देशभक्ति है जी निर्नदीकसरोपम

तुम्‍हारी है जनम पावे गंगा जिसमें उसी सम !

धर्मार्थ एक ही त्‍याग हम करेंगे प्राण का :

पर तुम करोगे त्रिविध कांता, सुत, स्‍व-प्रण का !

ध्‍येय मेरा राष्‍ट्रभक्ति : पर तुम्‍हारा जीवन-

ध्‍येय है पितृत्‍व, पतित्‍व, केवल, राष्‍ट्रभक्ति न !!

तुम पूछ रहे हो कि मेरा सुख है कौन सा :

मत्‍सखा मत्‍सखी दोनों का हो सहवास रम्‍य-सा

द्विधा प्रीति यही मेरी मिश्र हो काम-रस में

धृतैकतनु हो जाए चुंबनालिंगन में !

शुद्ध-संचित तेजस्‍वी-काम्‍यवीर्य कुमार तुम

कामयज्ञ के लिए दीक्षित उचित हो सर्वथैव तुम !

धर्माज्ञा औ' मदाज्ञा है कि जाओ स्‍वीकरो कमला को

ताला दृढ़ आलिंगन का लगा दो मेरी थाती को !!

'मुकुंद, मुकुल !' ऐसी मंजुल-स्‍वर पुकारती

आ पहुँची बाला सुंदर वहाँ नाचती-कूदती :

मुकुंद की माँ ने जिसको प्‍यार से पास रखा था

प्रेमला कमला की थी जुड़वाँ बहन अंकिता

'मुकुंद, मुकुल ! कहा उसने,'छिप-छिप के आ गए

अकेली छोड़कर मुझको ? अच्‍छे अब पकड़े गए !'

'पकड़े गए ! पकड़े गए !' - कमल से चेहरे पर

मंजु आघात करती कह रही वह बार-बार

कहा मुकुंद ने, 'पता था कमलों की गंध है मधुर

किंतु आज पता चल गया, स्‍पर्श उनका अधिक मधुर !

'सही बिलकुल !' व्‍यंग्‍य हास्‍य करती वह कहे उसको,

'पता चला नहाते वकत ! देख लो और रात को !

मधुर-मधुर स्‍पर्श जिसका किया महसूस तुमने भी

उसी तुम्‍हारे 'कमल' ने भेजा है मुझको अभी

पूछा था जब मैंने ही,'ताजा-ताजा फूल ये

किसलिए चुन रही हो ?' तब उसने कहा, 'प्रिय,

शाम को जाना है ना प्रभुदर्शन के लिए,

राम मंदिर में !' 'ना जी, काममंदिर में प्रिये,

कामदेवदर्शनार्थ, कमले !' कहा जब सत्‍वर

मैंने तब वह रूठी, मन में प्रमुदिता पर

'श्रीरामपूजन में हमने देखान तुमको कभी

ऐसी तत्‍परता से तुम फूल चुन रही अभी !

रूठी हो ?''प्रेमले, तुमने ही तो अभी-अभी कहा,

कामपूजन है आज, चुन लो फूल तुम, अहा !'

हँसा मुकुल,'लगता है निशाना मदन मारत

न केवल कमला को, बल्कि तुमको भी निश्चित !'

तब आया क्रोध कितना ! फूल सब कुचले गए

दिखने में उष्‍ण-शीत मानो शोले भड़क गए

झुकती सी दौड़ी चपला, अहा ! कौन पकड़ सके

तितली जैसी उड़ती है लता‍ओं पर झूम के !

'प्रेमले, प्रेमले' कितना पुकारा मुकुल-मुकुंद ने

मिन्‍नतें कितनी सारी, सुना पर कछ न उसने

गए पकड़ने दोनों, परंतु चपला तभी

खिसक गयी आगे, पीछे दोनों दौड़ पड़े जभी

'गलती हुई, क्षमा माँगूँ, रुक जाओ तनिक जरा'

कहते ही पैर में साड़ी अटकी औ' लड़खड़ी जरा

और उसे पकड़ा आखिर ! पर स-स्‍वेद भाल वह

धूप में मुकुल का देख खिलखिलाने लगी वह

'मुकुंद, इतने-से श्रम से देखो पसीना मुकुल का

बताते हो कि वीर है यह उदगीर-संग्राम का !'

मुकुंद कहे, 'न मैं ही, बल्कि रण-दक्ष, प्रेमले,

स्‍वयं वीरश्रेष्‍ठ भाऊ उस दिन यही बोले :

जब घुसा था यह उसके इशारे पर जूझ में

गिराया म्‍लेच्‍छ-सेना के प्रमुख का कबंध रण में !'

'गिराया होगा, ' हँस पड़ी प्रेमला,'कबंध को :

काट दिया होगा किसी और ने जब सिर को !'

'शीषहीन क्‍यों ना हो, गिराया कबंध ही

तुम्‍हारी घिग्‍गी बँध जाएगी बस सिर्फ देखकर ही'

हँसने लगा मुकुल ऐसे; तो सावेश रमणी वहीं

कहे, 'देख लूँ, दे दो, तुम्‍हारी तलवार ही !

दुर्गा जैसी रण में लूँगी मंडल ! क को दो लम्‍हे

तेज घोड़ा मुझे दो जो पेशवा ने दिया तुम्‍हें'

'वही लो, वही घोड़ा प्रेमले ! लेकर तुम्‍हें

सामने, जब बैठेगा दूल्‍हा राजा बारात में !

लेकिन तलवार मेरी ? यदि दुर्गा की तरह

आठ होंगे हाथ तुम्‍हरे तब कहीं उठाओगी यह !'

'बस करो, जी, बस', खींचे कुकुल का हाथ वह तभी

अपने हाथ को उसमें गूँथ देती तुरंत ही

कहे हँसते, 'आओ तुम जी, मुकुंद कह दो अभी

कि इनमें कौन सा कर किसका है, कर सकते फर्क भी ?'

और कैशोर-लीला में जो मोहक गूँथ दिया

निष्‍कलंक हाथों का गोप उसने उठा लिया :

उनमें रूप से स्‍पष्‍ट कौन सा किसका है कर

कैशोर-कुड्मल के बीच निहित स्‍त्री-पुरुष-केसर !!

'कौन सा कर है किसका,' मुकुंद ने झट से कहा,

'प्रश्‍न भी न रहा पगली, प्राणिग्रहण से अहा !'

शुक, सारस, मैना औ' मोर, बुलबुल ने कहा,

'सही ! पाणिग्रहण के बाद दूजापन नहीं रहा !'

'अर्धांग युवा, अर्धांगिनी युवती, अनंग अब

करे पूणैकांग दोनों को !' हवा से उठे शब्‍द :

फौहारे की झारी से संकल्‍पोच्‍चारण किया

अप्‍सराओं ने : इंद्रधनु के पिल्‍लों ने नाच भी किया

मधुर मंगलाष्‍टक-गीतों को गाया तब पपीहा ने :

गुलाबजल का सिंचन कर दिया गुलाब-लता ने :

इत्र की कुप्पियों अपनी खोलकर प्‍यार से खड़ी

मालती-रजीगंधा की कलियाँ तब आगे बढ़ीं :

पुष्‍परूप अक्षताएँ फेंकती ये लताएँ

तरु डोलें, कहें बुलबुल : 'अर्धांगिनी की अदाएँ !'

सृष्टि ही सभी ऐसी दिल्‍लगी जब उड़ा रही

जवाब वह किसे देगी, बेचारी चुप हो गई !

ओर तिसपर यह न जाने कि बाह्य सृष्टि की कह रही

अथवा आं‍तरिक सृष्टि की केवल प्रतिध्‍वनि हुई !!

तभी 'मखर' की कोमल कदलियों से झाँक कर

कमला ने देखा जैसे देखे चाँद झुककर

'आई-आई ! मुझे छोड़ो ! कमलाजो बुला रही !'

दिल्‍लगी से भागने की अच्‍छी यह तरकीब रही !

लेकर बीच में उसको; तीनों फिर चल ही पड़े

उसने दोनों की कटि में अपने कर लिपटा दिए

रात में फलाहार करने नव-दंपति को बिठा‍ दिया

तांबूल तोड़ते होंठों में होंठ मधुर आ गया

ऐसे दिन भर में जो नव प्रभु-देवतार्चन किया

मनोभव मन में साक्षात् प्रभु प्रकट हो गया !

स्‍व-स्‍व-प्रथम ॠतु की शांति की स्‍मृति से तभी

कामव्‍याकुल हो जाती थीं वे कामिनियाँ सभी

पूजाक प्रमुखा जो थी मदनोत्‍सव-मंदिर

उस व्रत की व्रतस्‍था वह कोमला कमला, पर !

गूढ़ अद्भुत सा सचमुच कुछ घटित हो रहा है :

अतर्क्‍य सौख्‍यभय का दिल में तूफान मच गया है :

लज्‍जा अकृत्रिमा तन में यद्यपि स्‍वेदोद्गम करे :

शीलवती के मन में पूरी सात्विकता भरे

जड़-सा विषय में ऐसा तमोपहत ना कहीं !

किमपि भला उसे स्‍पर्श करे अशिव भी कहीं ?

उसकी प्रिय लताओं के गूँथे फूल सुचारु-से

प्रेमला ने जब उसके बालों में बहु प्‍यार से :

मर्कत-मणिक-मोती के आभूषण बिखेरते

उसके मुख पर अपनी किरणों को उछालते

प्रणाम करेन पर औ' चुम्‍मा लेकर सास ने

'अष्‍टपुत्रवती वत्‍से, जाओ !' कहे बोल सुहावने

तभी उसके मन में सास के 'जाओ' शब्‍द से

नए जगत् जाग्रत् हो उठे दिव्‍य मधुर से !

शुभाशीर्वचनों की वह वृष्टि नई-नवेली पर :

वे मंदिर की पूजाएँ, वह सजाया हुआ 'मखर' :

वह होमदीप्ति, वे धूम स्‍वच्‍छ, आहुतिगंध वह,

श्रुतिमंगल मंत्रों का उच्‍च-दिव्‍य गजर वह,

अभ्‍यंगस्‍नान, वे अंगस्‍पर्श, वे मुसकराहटें,

पुण्‍य ब्रह्मणभोजन वह, दक्षिणा-दान, आहटें,

उपहार वे, वीड़े वे, वे 'उखाणे' पुष्‍पशय्या,

वह मेला इष्‍टमित्रों का, सालंकृत सुंदरा स्त्रियाँ :

इन सभी से, रस्‍मों से मुग्‍धा नई-नवेली पर

पृथक प्रतिक्षण हुए जो संस्‍कार दुलहनिया पर

उस 'जाओ' का प्रेमपावन स्‍पर्श होते ही ये तभी

धरोदात्‍तेक संस्‍कार में विद्रुत हो गए सभी !

कि देवताओं ने, द्विजों ने महत्‍कार्य हेतु से

निर्वाचिता किया मुस्‍को, नियुक्‍ता कर प्रेम से !

इष्‍ट जो पितरों का है, जो करे मुदिता मही

जिसकी विजय के खातिर लुब्‍ध होंगे विरक्‍त भी,

ऐसे लोककल्‍याण की सिद्धि-ना सुख केवल

अग्निसाक्षी प्रिय के संग व्रत किया बहु मंगल

गोत्र-ॠषि का करके नव प्रतिनिधित्‍व ही

यह चली मैं जहाँ करती हैं 'जाओ' सास भी, वहीं !

सोल्‍हास और निकली वह वहाँ जाने ही-लेकिन

क्‍या हुआ कमले ? -हाय ! गति को रोके मदन !

धकेला सखियों ने ही जबरन प्रति के मंदिर

दिल आगे बढ़े, यद्यपि हटते पीछे ही ये पैर !

लगा दी कुंडी भी अब खटखटाना व्‍यर्थ है

मुग्‍धे, अब इन पैरों की बात को न मानना है

सुन लो बात दिल की, कमले कमनीय बनो अब

प्राणवल्‍लभ बुलाता है, जाओ, आगे बढ़ो भी अब !

पुण्‍यमंचकशय्या है : बैठो, बैठो, शुभे यहाँ

चुंबन लेते ही क्‍यों ऐसी खिसक जा रही हो वहाँ !

बैठो शय्या पर आओ : स्‍वयं जनककन्‍यका

जहाँ रमी थी वह रतिशय्या धन्‍य है बहुपुण्‍यका !

देहधर्म न अच्‍छा है ? पावने, प्रकट हो रही

स्‍वर्गंगा जीवन की यह, गंगोत्रि तुझमें रही !

डाले हिरण्‍यगर्भा यह स्‍वयंभू भगवान् ही

नरों में जो झरना है, तुम में प्रविष्‍ट हो वही !

तीर्थों की तीर्थता आवे सुजनों में, और तुम

स्‍वीकरो उसे ॠतुस्‍नाते, तीर्थता पाओगी तुम

तो डालो गले में उसके पुष्‍पमाला और फिर

फूलों से भी मृदुल माला अपनी बाँहों की सुंदर

फूलों से भी मुलायम और चीनी से भी मधुर ही

प्रमदे, आलिंगन कर लो, लिपट जाओ उससे ही

मीठा-मीठा आलिंगन ? रे पगली, आगे और भी

आलिंगनामृत की मिठास, प्राशन कर लो तुम अभी !

अंग-अंग लिपट जाओ, विलंब पल ना करो :

असाधारण पल यह देवी, इसपर पूरा यकीन करो !

कौन जाने, पाताल में नागकन्‍याएँ तथा

आकाश में अप्‍सराएँ खड़ी होंगी ही सर्वथा

लेकर करों में अपने आरती मंगला तथा

शहनाइयाँ लगाकर होंठों पर सिद्ध ही सर्वथा

देवदूत-दूतियाँ भी प्रतीक्षा में क्षण के इसी,

वर्णन करेंगे कवि भी 'प्रसन्‍नदिक्', 'शुभशंसि'!

हे कल्‍याणि, इस पल में दो हृदयों को जोड़कर

अनंग सृजन करता है अमृत में अमृत डालकर

-कौन जाने ! -इसी दिव्‍य कृति में संभव होगा भी

जन्‍म किसी घनश्‍यामल राम का शायद अभी :

अथवा काल-गुणादि से जो ठहरा था आद्यकवि

महाकवियों में, दुनिया में, उसके समान कोई कवि :

कोई गीता-द्रष्‍टा वा धुनर्धर का सारथी :

वाग्‍मी बृहस्‍पति : शिल्‍पी मय : भीष्‍म महारथी :

अथवा मदालसा, मुक्‍ता, मीरा या विदुला कोई

लावण्‍य रूप लता अथवा उमा देवविमोहिनी :

अथवा विश्‍ववेधों का मनु भास्‍कर नूतन :

आश्‍चर्यजनक अजिंठा का निर्माता, नट, नर्तन

नाट्यकार या कोई जग में अद्भुत-सा नया

आसन्‍नमृत्‍यु राष्‍ट्रों ने जिसकी प्रतिभा में पाया

नवजीवन, ऐसा कोई चंद्रगुप्‍त : अमात्‍य भी :

अथवा विक्रमादित्‍य जिसका विक्रम दिव्‍य भी :

हिंदु छत्रपति श्रीमान् शिवाजी वीराग्रणी

गुरु गाविंद या बंदा धर्मवीर महागणी

मंगलमय परा सीमा ! सृजन में इष्‍ट संभवा

लेनी होगी इसी दिव्‍या देवभूमि तुममें शिवा

जन्‍मजन्‍मांतर की जिसकी तप:सिद्धि फलोन्‍मुखा

रही होगी इसी क्षण की प्रतीक्षा में समुत्‍सुका

आत्‍मा अंतिम जन्‍म को पाकर अंतत: मुक्‍त होगी भी

बुद्ध, शंकर या जीवन्‍मुक्‍त देहूस्थित संत भी !!

प्रेय का स्‍वर्ग भोगो तब श्रेय का स्‍वर्ग स्‍वीकरो

हे प्रिय, समुपभोगी तुम कसकर आलिंगन करो

मत चुराओ बदन सुभगे ! निर्विकल्‍प समाधि का

मूल आसन है कामासन ! अनुभव कर लो उसका !

और हे पंचशर आओ : पाँचों शर इसी पल

मार दो, यह सुकुमार मन्‍मथाधीन युगुल !

कार्यरत रहोगे यदि ऐसे ही शुभ कार्य में,

तो, हे मदन, क्‍यों शंकर आ जाएँगे ताव में ?

ले लो सम्‍मोहनास्‍त्र भी तुम, प्रयुक्‍त कर दो अभी

मुकुंद-कमला दोनों समाधिस्‍थ हैं तभी !

रति मूर्च्छित दोनों को आलिंगन-विमान में

ले जाओ, अनंग, ऊँचे सुख के आसमान में !

मंजु मंजुलगीतों की वर्षा होगी निरंतर

चंद्रिका-चंद्रकांतों का रस झरेगा निरंतर !!

मुसकराईं लताएँ तब आशीर्वाद शुभंकर

शुभे, यह शिव हो तुमको नया वर्ष मन्‍वंतर !

प्रेय का छोड़कर स्‍वर्ग सुख के आसमान से

कर्मभूमि लौटोगे यही सूचित करते-से

डरते-डरते दूर से ही हवा बह रही तभी

अश्‍वों की दौड़ की आईं क्षीण प्रतिध्‍वनियाँ जभी

'अश्‍व ?' स्‍पष्‍ट हो गई ध्‍वनियाँ ! किसके ? इस समय कहाँ ?

तभी शय्यागृह का द्वार खटखटाया किसने वहाँ ?

' मुकुंद !' खटखटाया ज्‍यों, तभी द्वार खुल गया

मुकुंद बाहर निकला, मुकुल का कर ले लिया

'स्‍मृति प्रिय तुम्‍हारी ही हो रही थी अभी मुझे !'

'प्रिय नहीं, अप्रिय वार्त्‍ता को कहने दो तनिक मुझे

मुकुंद, पढ़ लो तुम ही राजाज्ञा ! अब इसी क्षण

मुझे निकलना है रण में,' 'और मुझको भी तत्‍क्षण !

रण में गिर गए शिंदे ? मराठा तब कौन सा

दत्‍ताजी के प्रतिशोध में निकलेगा न सहसा ?'

'मुकुंद, तिसपर भी औ' शत्रु यहाँ के कोई

दुर्वार्त्‍ता सुनकर ऐसी करने को हाथापाई

जंगल में इकट्ठा होते हैं यहीं पर, उनको तभी

कड़ी सजा करने की आज्ञा है मुझको अभी

अत: इसी मौके पर हमला कर लूँ भयानक

असावधान दुश्‍मन को खत्‍म कर दूँ अचानक

उद्युक्‍त अश्‍वसंधों के लगाम आतुर खींचकर

प्रतीक्षा कर रहे हैं मेरे आक्रामक घुड़सवार

रूठ जाओगे यदि जाऊँ वैसे ही : इसलिए यहाँ

मिलने आया हूँ मैं, 'और मैं रुकूँ यहाँ ?'

नहीं, नहीं, कभी नहीं जी ! क्‍या मराठा नहीं हूँ मैं ?

लेकिन मुकुल ना बोले, संकोच बहु मन में

अंत में अधोवदन ही प्रेमगद्गद कह पड़े,

'मुकुंद, मेरी कमला जग रही या सोई पड़ी ?'

'अभी लग गई आँख जरा सी' तब क्‍या करें

शिलानिष्‍ठुर दिल से त्‍याग हम उसका करें ?

सुख-स्‍वेद-ज बिंदुओं की बिंदियाँ डोल रही हैं;

प्रेम-शय्या पर अभी तो जरा झपकी आई है

ऐसी हालत में कैसे कमला को छोड़ें हम ?

फेंक देंगे ज्‍वाला में ही कमल को कैसे हम ?'

'अग्नि में कमल को ऐसे फेंक देना भी ठीक है

देवकार्य-महामख में यदि वह प्रज्‍वलित है !

मित्र मुकुल, तुमने ही सर के पास था कहा :

धर्मार्थ ही होते हैं आपद्धर्म बलि आह !

शत्रु दसों दिशाओं में ! फिरंगाण तुराण से

सेतुबंधों तक जो भी म्‍लेच्‍छ और अ-हिंदू-से

वे सारे मिलकर आए हैं विनष्‍ट करने सही

शिव छत्र, हिंदुओं का जो हैं प्राण अनन्‍य ही !

अहिंदू आक्रामक है सारा ! और क्‍या हिंदू भी कभी

शय्यागृह की खिड़की से देखते रह जाए भी ?

हिंदु सारा न उठे तो भी मराठा अखिल जुटाकर

आबाल-बालिका मरेंगे मारते-मारते समर !

क्‍या समर्थ की दीक्षा को हमने स्‍वीकृत नहीं किया ?

तुमने भी जान की बाजी लगाने का ही तय किया !

वीर, तुम हो श्रीमंत भाऊ के सरदार ही

क्‍या मैं भी नहीं दूँ देह इक दूजी तुम्‍हारी ही ?'

तभी हल्‍की बजी सीटी ! स्‍फूर्ति का संचरण हुआ

वीरश्री की प्रभा फैली, वीरबाहु प्रस्‍फुरित हुआ

'आह !' मुकुल ने कहा सहसा, कदम आगे बढ़ा दिया

'सर्व सिद्धि हुई ऐसा सीअी ने इशारा दिया !

विलंब पल भर भी ना करना है ! तुम भी चलो !

लेकिन अंतिम बार दोनों कमला को देखें, चलो !

और गद्गद दोनों भी जैसे मंदिर-द्वार में

सकंप कर जोड़े ही शय्यागृह के द्वार में

मुकुल ने कहा, 'प्रभुजी, हमारी कमला की और-'

'हमारी प्रेमला की !' जोड़ा मुकुंद ने अति तत्‍पर :

'हमारी प्रेमला और कमला की, 'तब दोनों ही

एक साथ बोले, 'प्रभु, रक्षा करो, विनती यही !'

राजीव-लोचानों वाली यौवनोदय भास्‍वर

जोड़ी घनिष्‍ठ मित्रों की साश्रु ही अति सत्‍वर

सोए हुए जीने को भी न जगाते हुए चली

उतरकर सीढ़ि‍याँ, घर से तुरंत ही निकली !

उच्‍छृंखलाश्‍व संघों के लगाम हो गए ढीले

जंगल के पास आते ही सिद्ध हो उठे भाले !

हिनहिनाता न घोड़ा, ना सवार साँस छोड़त है

रिपु की छावनी पर ज्‍यों घोर हमला होत है !!

धड़ड़ धड़ड़ शोले बंदूकों से निकल गए !

दमकत तलवारें, घूमत रणगर्जनाएँ !

छोड़ न घंटा भी हो गया प्रेयसी को

रण प्रतीत हुआ क्षण स्‍वप्‍न सा मुकुंद को !!

औ' भड़क उठा ज्‍यों दीप दावग्नि निकली

बहत रुधिर-रंग प्रीति का चंड उछली

दयित ! बकुल ! आवाजें सभी व्‍यर्थ होत

नींद बिखर गई जब स्‍वप्‍न भी सत्‍य होत !!

विरहोच्‍छ्वास !

(विरह की लंबी साँसें !)

( परिचय : 'कमला' काव्‍य में मुकुंद और मुकुल नामक जो दो पात्र आए हैं, उनमें मुकुल का अग्रिम वृत्‍तांत इस तरह वर्णन करने की योजना थी कि वह वीर युवक अपनी वीर दयिता प्रेमला के साथ हिंदू पदपादशाही के लिए जब लड़ रहा था तब उसके दस्‍ते से अलग होकर मुसलमानों के हाथ में अकेला ही अपने दस्‍ते के साथ आ जाता है । और मृत्‍युदंड की अपेक्षा करते हुए काल कोठरी में बंदी बन जाता है । उसे पीड़ा देकर परास्‍त करने का तथा उसके द्वारा स्‍वधर्म द्रोह कराने का यत्‍न शत्रु कभी मृत्‍यु का भय दिखाकर तो कभी उसकी दयिता से मिलन कराने का लालच दिखाकर करते रहते हैं । अत: इस उद्देश्‍य से कि ऐसे शत्रु को अपनी विरह-व्‍याकुल दयनीय अवस्‍था दिख न पड़े और अपने साथी सैनिकों का भी धीरज न छूट जाए, वह ऊपर-ऊपर कठोरता धारण करता है और अपने खोए हुए प्रियजनों के बारे में पूछताछ भी नहीं करता है । किंतु वीर कर्तव्‍य के लिए स्‍वीकृत कठोरता के कवच के नीचे उसका प्रेमी हृदय पहले वाली प्रिय संगत के सुखों का स्‍मरण करके विरह से लगातार व्‍याकुल होता रहता है । मन-ही-मन उसके व्‍याकुल अश्रु लगातार झरते रहते हैं । ऐसे दुखोद्वेग को हलका करने के लिए उसके प्रेम व्‍याकुल हृदय ने जो लंबी साँसे छोड़ीं उन्‍हीं की प्रतिध्‍वनियाँ बन गए ये गीत !

मूल पानीपत का काव्‍य अधूरा रह जाने के कारण उसका, पूर्वोक्‍त 'कमला' के सर्ग की तरह ही, यह सर्ग भी स्‍वतंत्र रूप से आगे दिया है । जाहिर है, उसमें जिन मूल घटनाओं की ओर संकेत है- जिनको मूल काव्‍य में विस्‍तार के साथ वर्णित करने की योजना थी- उनको अब टिप्‍पणियों के सहारे अनुमानित करना ही पाठकों के लिए क्रम प्राप्‍त है ।)

: १ :

मैं लिखता हूँ शब्‍द, पुंज अर्थों के

मिटावत नैन-जल तड़के ।।

हे विरह, तुम्‍हारा यह दंश विषैला

पिलावत है मिष्‍ट-विष-प्‍याला ।।

इस जल का ही हो जाए अनुपान

सौगंध स्‍वीकरत अन्‍य !

हा, हाय, तुम्‍हारा यह गीत मधुर-सा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

सुमकोमल-से प्रेमानुभवों में जब

हे प्रीति, लिपट लूँ तब तब,

यह जो भी है काल नाम दुनिया में

भूलकर उसे मधु नशे में ।।

जब मग्‍न हुए संग-सुख-प्राशन में,

शाश्‍वत का अनुभव क्षण में,

हाँ ! विरह भयानक देखो

प्रेम की अनंतता को

आरोपित करके क्षण को ।

यदि अंत को । हम उसी क्षण को

भूले थे, पर अंत न भूलत सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !!धृ.।।

: २ :

तुम आँखों से ओझल हो जाते ही

सखि, तुरंत कोशिश की ही

क्‍यों तुमने भी पल भर नहीं दिखाया

कमलाक्षि, तुम्‍हारा साया ?

'तुम याद करो आलिंगन-वचनों को

अश्रु में भिगाकर उनको !'

यह समाधान ना मुझमें

उस पल भर की झाँकी में

जो प्रेम, न वह मीलन में

तमन्‍ना मन में । मेरी बाँहों में

तुम होगी और देखें जन विस्मित-सा

करत हे प्राण व्‍याकुल-सा !!

: ३ :

अब कुछ भी ना अच्‍छा लगता मुझको !

ना चैन कहीं भी दिल को !

वीरानों से ऊबकर लोगों में,

आ जाऊँ फिर वीरानों में !

मैं बाल सँवारूँ, फिर से बिखरूँ भी

भूलूँ सब याद करके भी

भ्रमण कर, एक पल बैठूँ

देखकर, नैन कुछ मूँदूँ

पर हाय ! अनुक्षण भर दूँ

आह पीडा की । चैन ना दिल की

पल विरम नहीं, तव स्‍मृति उछलत सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: ४ :

जो खिलते हैं फूल, तोड़ लेता हूँ :

फिर उनको कुचलात हूँ !

'लटका दूँ मैं तेरे की बालों में' :

अब कहूँ कहाँ सखि, पर मैं !

सखि, पहले ये प्रेमदूत थे तुम्‍हरे :

बनत अब दु:खकर मेरे !

कुछ खाने की मिन्‍नत सब करते हैं

भूख ही चली जाती है !

याद है, मैं रूठा था

कुछ हठ कर ही बैठा था

तुमने ही तब खिलाया था

अपने मुख से । कँवल अमृत-से

मधु अधरों का मिश्रित जिनमें सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: ५ :

जब गाय कभी बछड़े को चाटत है,

उपचारनिभावत ना है !

जब चोंच मिलाए चोंच से खग युगुल

तब रुचि लेता है विपुल;

अँगूरों का, आम्रफलों का, मधु का !

स्‍वाद है भिन्‍न अधरों का ।

जो अधर है यौवनमत्‍त,

अँगूर, आम्रफल, मद्य,

इन सबसे भी उन्‍मत्‍त

अधिक स्‍वाद है !! मन उत्‍सुक है

चखने को, दे दो चुंबन फिर मधुर-सा ।

करत है प्राण व्‍याकुल-सा ।

: ६ :

हे चुंबन ! है वही मूढ, जो तुझको

जानत ना रति-भाषा को !

वह बहरा है कानों से औ' दिल से

जो सुनत न तेरे जलसे !

रतिदेवी का मुख हो तुम ! तुम मुखिया

विश्‍व के सब मधु-रसों का ।

वाणी भी औ' मन भी झेल न पाए

तव हृदय ताल में गाए

आजन्‍म सुनाते है चुंबन सारे

जो गीत श्रवण से भी परे !

मुरली मे जो न आ पाए

जो मेघदूत में न समाए

जो ताजमहल में न आए

वह तुम ही हो न, सुन हे चुंबन,

तुम प्रीति का हो प्रणव ! रति-वीणा-सा ।

करत है प्राण व्‍याकुल-सा ।

: ७ :

यह उषा जब कभी रंग खेलती आई ।

मैंने तब उड़ान लगाई,

कमलों को, औ' बागों को, खेतों को,

लाँघकर चला मैं सबको

गत्‍युत्‍सव में मग्‍न था तभी देखी

तव मूर्ति रम्‍य अनोखी !

विहगों में, वैसे कभी न रति के नभ में

युगुल था हमारी तुला में !

भर-भर के देकर हृदय रसीला अपना

चंचु में चंचु, मधु सपना !

शतजन्‍म-उपार्जित पल, या

जो लगे हाथ में आया

उस क्रौंचमिथुन गति १० सम या

जो बद्ध पग में । अनदेखी में

वह डोरी ११ दुष्‍टा दूर करत री सहसा !

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: ८ :

मैं राज्‍य, और हे प्रीति ! तुम्‍हीं हो रानी !

तुम रत्‍न, मैं रहूँ खानी !

मैं पागल, तुम हो चटुल जादूगरनी

मैं मोर, मूर्त तुम वाणी !

मैं लिखता हूँ शब्‍द, पुंज अर्थों के

मिटावत नैन-जल तड़के !

हे विरह ! तुम्‍हारा यह दंश विषैला

पिलावत है मिष्‍ट-विष-प्‍याला !

इस जल का १२ ही हो जाए अनुपान !

सौगंध स्‍वीकरत अन्‍य !

जो फिर से दिख ना पाएँ

उन स्‍तनंधयों की माँएँ,

बाला जो ससुराल जाए,

विरहिणी, विधुर : सुन लीजिए !

इस गाने को । समसतार को । अपने हृद को ।

एक ही होत है प्रीति सभी की सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: ९ :

औ' तिस पर भी वह प्रीति यौवनमत्‍ता :

जो उषा-स्‍वप्‍न में स्‍नाता !

मधु जवान फूलों से झरती कैशोरी !

जिस ॠतु में हृद में सारी

हे वसंत, १३ हमाको वत्‍सलता-शाखा पर

तुम बिठा रहे झूलों पर !

वह कुछ-कुछ मंजुल दिल में जो होता है

जब ऊँचा वह १४ जाता है !

रूप में तथा हृदय में

समानता सुंदरता में

माधुरी घुल गई सबमें

हृदय में भरा । प्रेम-सहारा

जिसका निवास यौवन में सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: १० :

यौवन में जो था लोभ एक-दूजे का,

सर्वस्‍व समर्पित पक्‍का !

तुम सखी, स्‍वसा, शिष्‍य, भाई भी छोटा

दु:ख में सहारा माता !

साथी तुम थी चंडी के मंदिर का १५

सहतपी रण-तपस्‍या का !

तेज से अहा सिंहों के भरपूर

ललनाभा-स्निग्‍ध भी और ।

ऐसे रस से पूरित

तव हृदय-पात्र जो सतत !

मुँह लगा लिया तृषार्त ।

मैंने भी जब । अचानक ही तब

भूचाल १६ भयानक हो जाए सहसा !

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: ११ :

मध्‍याह्न भयानक : आहें भी गर्मीली

भरत ज्‍यों हवा यह चली :

गुस्‍सैल धनी १७ : औ' बोझ : दूर जाना है

चलते ही पैर जलते हैं :

इक नन्‍ही-सी ही कुटिया के तुम पास

दिख पड़ी बुझावत प्‍यास !

कर दिया तभी ज्‍यों मधुर इशारा तुमने

बरसे थे फूल चमन में !

उँडेली तुमने गागर

अंजुलि से वह प्राशन कर

मैं चला जभी पुर:सर ।

अधिक जोर से । प्‍यास कसमसे । तुम्‍हारे जल से ।

लौटा मैं फिर से ! -जादूरगनी, ऐसा

करत है प्राण व्‍याकु-सा !

: १२ :

यह जान चली ! भरने दो जी इसको

चुंबनमय मधु प्‍याले को

आतुर हैं जी, गले तुम्‍हारे पड़ने

हास्‍याश्रु-रूप ये गहने !

यह टीस रहा हृदय-स्‍तन पेन्‍हाया

रे नन्‍हे, पी लो माया !

जब नींद टूट जाए और

मम सीने से लिपटाकर

सोई-सी तुम्‍हें देखकर

कब पी लूँ मैं । मधु चाँदनी में । मुखमंडल में ।

इक हिमकर की किरण मधुर-सी सहसा ।

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: १३ :

हा ! हाय ! अभी मिलन भी होगा कैसे ?

आशा भी रूठी मुझसे !

तब मिन्‍नत से मैंने समझाया था,

पहले ही कहा नहीं था ?

'मिलन की है एक यही तो रात :

रह जाए ना फिर बात !'

जो दीपों की १८ बढ़ा-बढ़ाकर बाती

रात में राह देखी थी !

आहट-सी कभी सुनकर चौंका था मैं

बैठा फिर उदासता में !

तब दरवाजा खुल गया

तुम ही थी ! आलिंगन किया

बहुत-सी भरी सिसकियाँ

(पर मैंने) भूलकर रात, शेष लवमात्र, मिलन की बात,

तब दूर किया था तुम्‍हें रूठकर १९ सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: १४ :

प्रेमियो, सुनो, तुम दूर न जाओ पल भर

अभिमान जरा भी लेकर !

इस पल की तो दीर्घ प्रतीक्षा में ही

शत सूर्य बुझ गए यूँ ही !

औ' सूख गए शत सिंधु तब कहीं उभरा

यह क्षणांत २० मिलन तुम्‍हारा !

शत अंध वियोजक शक्तियाँ

कालाब्धि बीच इकसरिया

केंद्रस्‍थ वियोगावर्तियाँ

प्रीतिपर्व यह । मिलन पर्व यह

जयशालिनी प्रिया प्रीति समर्पित २१ मनसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा

: १५ :

उस दुर्भागी क्षण में पथ पर दिखता

वह कौन ? -तुमने पूछा था

भ्रू कुंचित, भू पर दमखम पद, सीने पर-

उपवीत, कृष्‍ण तनु, तेवर

यह तूफानी विद्युन्‍मेघ-सा २२ दिखता

कौन है तुम्‍हें डरपाता ?

हा ! प्रीति ! न क्‍या तुम जानत यह चेहरा ?

गुस्‍सैल धनी यह मेरा !

बुद्धि ने जनम से मुझको

बेचा है दास्‍य में इसको २३

कहते हैं धर्म इसी को

जनम से तथा । मुझे बेचा था

हृदय ने तुम्‍हारे चरणों में दास-सा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा

: १६ :

तोड़कर तभी द्वार, तपोमय मूरत २४

घुस गई, समय प्रभात

इक दर्भ तभी फेंक हमारे बीच

कह दिया,'दूर हो नीच !'

मैं हकलाया, 'मान्‍य', करत वह आज्ञा

संपन्‍न करो अब यज्ञ

मिल लिया न पूरी तरह

रह जाए अधूरा मिलन यह २५ ।।

अब दूर ही रह जाए यह

जो अँधियारी । भयाण खाई

जाओ अब तुम, रहो वहाँ बंदी-सा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: १७ :

हा ! हाय ! अभी मिलन होगा कैसे ?

आशा भी रूठी मुझसे !

हा ! हाय ! हमारी बुद्धि भली कैसी

इस फँदे में आ फँसी ?

ना दोष निकालना कहीं संभव है

विप्र २६ की दासता है !

पर करूँ क्‍या इसी दिल को ?

तिलमिलाती इन आहों को-

' हृद्-दयिते ! देख लूँ तुझको !'

जो बहुतेरे । अर्पित सारे । उनमें मेरे

इस व्‍याकुलता को मानो २७ पूजन-सा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: १८ :

उम्र कच्‍ची जो यौवन को छूती-सी,

तलवार तेज औ' ऐसी !

मूर्च्‍छा आती, गला सूख जाता है

हर कदम तोल ढलता है,

प्‍याला हाथों में, आँसू २८ भरे सम्‍हाले

बूँद भी न गिरने पाए !

यह बीजीगरी क्रूर खेल चलता है !

तलवार पर नाचना हे !

यह खून गिरा, पर मैंने

प्‍याला न दिया वह गिरने

और कहा- ' धिक्' २९ लोगों ने,

'हाथ में लिया । खाली प्‍याला !'

तुम मानो ना इसे कभी भी सच-सा !

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: १९ :

औ' तुम्‍हरे भी हाथों, है परमेश्‍वर,

यह कैसा विषम व्‍यवहार ?

जो पी न सकें पिलाएँ नहीं, पगला

आँसुओं भरा यह प्‍याला !

सुम-कोमल क्‍यो हृदय दिया, औ' उसको

वज्र से कहा लड़ने को !

सखि ! कोई कहे, 'प्रेम आदि जो कुछ है

न इसका दिल छूता है !'

जो हिरनी व्‍याकुल भूख से

निर्दुग्‍ध उसी के थन से

छटपटा रहत हैं जैसे ।

बछड़े वे उसके। उससे लिपट के । मेरे हृदय के -

साथ वैसे ही स्‍मृतियाँ करत हैं सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: २० :

पर हे सखि, ना मान असह दिखता हूँ

इसलिए मैं न सहता हूँ

या कहता हूँ, असह दु:ख भुगता हूँ

हसलिए न प्‍यार करता हूँ !

हे प्रीति ! तुम्‍हारे विरह में मिठास

है 'तुम्‍हारा' सही खास !

यह शोक भला कविता में रखता हूँ

हृत्‍पात्र भर लेता हूँ

स्‍मृति ३० दूर मलय की लहर

लहराती दिल का पोखर

छेड़ती वृत्ति-इंदीवर

तनु की तार । अति मधुमधुर

उसे छेडूँ तो गीत प्रसृत करुण-सा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: २१ :

बहु आशा यह, हाय ! प्रिये, मेरी थी

प्रथम जब उषा ३१ आई थी ।।

सुम कानन में, समुद्र-तट पर शांत

देखकर कहीं एकांत,

यह छोटा-सा एक बँगला, जितनी

जो चीजें जरूर उतनी;

तुम गीता, वह आदिकाव्‍य, वह वीणा

फूलों का सदा नजराना

तव सुख का चित्र बनाने

पटभूमि खंड भी जितने

हैं जरूर, जुटकार उतने

साथ तुम्‍हारे । सुख में सारे

दिन ३२ गुजारूँ मैं अनजाने में सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: २२ :

पर भग्‍न किया प्रभु ने उस आशा को

दिन ऐसा उसी उषा को !

यह ठीक हुआ, प्रभु ने अपनी शक्ति

दिखलाई, तभी तो भक्ति !

यह छोटी-सी नाव, विशाल है सिंधु२३,

डूबेगी, तो क्‍या कह दूँ ?

जो हेतु लिये आएँ द्वार तुम्‍हारे

उसके बिन सब कुछ सँवरे !

शोक के गेह से निकले

जो गुलाम तुम्‍हरे भोले

प्रिय विरह मरुस्‍थल वाले

उनको भी न, प्राप्‍त जो धन, वह दास धन ३४

वह आँसुओं का ऐश: न मिले सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा

: २३ :

जो दिया कभी उसका न जिक्र करता हूँ

अकृतज्ञ इतना नहीं हूँ !

जो दिया कभी, था मात्र बिंदु, फिर भी

पर्याप्‍त न सिंधु में भी !

निश्‍चक्षु ३५ निशे ! प्रभात जिसको न कभी

बतलाता हूँ अब मैं भी :

वह ३६ प्रकाश है प्रथम, अनंतर नैना

सुख न, देता है पर सपना !

मैं दु:खों का प्‍याला पीकर झट से

पूछूँगा दु:खवादी से :

सुख अधिक नहीं दुनिया में तो फिर

जीने को जग क्‍यों आतुर?

ना प्रभो चारु मूरत को

दिल की प्रिय चंद्रिका को

इस पल तो भोगा उसको

उसी सभी की, रसीद पक्‍की, आज दर्ज की

एक ही मुझे प्रश्‍न : हुआ यह कैसा ?

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: २४ :

क्‍या कहते हो ? सब्र कर ! उष:काल ३७

है अभी बहुत ही काल !

दिन पूरा है पड़ा, क्‍या होगा भी

ज्ञात है तुम्‍हें कुछ भी ?

भूकंपों का पर्व है : क्‍वचित् इसमें

भड़केगी आग दिशा में

भड़केंगे शोले, उनसे

नवद्वीप महासागर से

नव महासिंधु द्वीपों से

शकल ३८ सभी के, सभी शकल के, अंदर क्षण के

होगा कल ही ध्‍येय सिद्ध भी सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: २५ :

वह ध्‍येय महान् ! प्रभु लालयित जिससे !

कल्‍पवृक्ष जीवित जिससे !

उज्‍जयनी ३९ के स्‍वर्णसुशोभित शिखर

फहराते नवध्‍वज जिनपर !

चिरमूक, अजी देवदुंदुभी गर्जो :

भाटो, तुम गाओ, नाचो :

सिंहासन पर होत विराजित आज ।

आदित्‍य विक्रमराज ४० !

नवजीवन की शुभ धारा

मिटा देत पल्‍वल ४१ सारा

जो पुण्‍यशील जलधारा

राष्‍ट्र-जाह्नवी । सनातन नई !

बढ़कर तेजी से हरिपद छूगी सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: २६ :

'भवसागर में प्रभु ने ही बनवाया

भवद्वीपस्‍तंभ हिमालय !

तिसपर और धर्मदीप उज्‍ज्‍वलता

आध्रुव ध्रुव को पथदाता

रक्षा जिसकी करती हैं कल्‍याण

नव जल-स्‍थल-वियत्‍सेना

संपन्‍न जभी विप्रयज्ञ ४२ हो जाए

एकांत स्‍थल पर जाएँ

औ' तुम अपनी उसी प्रिया से मिलना

आलिंगन-' यह मत कहना !

फिर से मत डालो जी अब बातों में

मुझको भी मोहपंजर में !

अभी-अभी अँधेरे में

देखने ४३ लगा हूँ जो मैं

आशा की क्षणिक झलक में

अधिक बनत मै । व्‍याकुल मन में

नैनों के आगे अँधेरा-सा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: २७ :

ले गए कहाँ मूर्तिभंजक मेरी

वह मूरत प्‍यारी-प्‍यारी ?

मंदि सूना, पुष्‍पों की पूजा को

अब अर्पण कर दूँ किसको ?

क्‍या सब्र करूँ ?- पर यह भीषण ताप !

सूख जाएँगे ये पुष्‍प !

होगा बासा नीर भी उषा ४५ का व्‍यर्थ

यह नेत्राभिषेक पात्र !

निर्मूर्ति मंदिर में जी

मेरे दिल में आज

व्‍याकुल है विधवा-सम जी

यौवनलता देखो । अपने फूलों को

अपने तन पर मुरझाते ही सहसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: २८ :

यह आसक्ति ४६ है ? ना, ना, यह है प्र‍ीति ।

और नहीं कहाँ आसक्ति ?

फिर व्‍याकुल क्‍यों हुए थे तब समर्थ ४७

जब खोया शिष्‍य पवित्र ?

क्‍यों तिलमिलाया कृष्‍ण स्‍वयं भगवान्

भांजे का जब गया प्राण ? ४८

'खो गए कहाँ हाय ! गोपाल !'

मीरा का क्रंदन-हाल !

क्‍यों तुकाराम राहों पर

संदेशा सुनने आतुर ? ५०

'हा सीते !' क्रंदत रघुवर ५१

आलिंगन करत । पेड़-पत्‍थर नित

अश्रुमेघ के बिन इंद्रचाप५२वह कैसा ?

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: २९ :

औ ' विरह हमेशा होगा प्रीति में !

'प्रीति दो भिन्‍न हृदयों में !

पर दिल में तुम स्‍वयं आत्‍मरत होगे ।

विरह से मुक्ति पाओगे !५३'

फिर बताओ जी खिलते हुए सुमन को

अपनी ही गंध सूँघने को !

या झरने रव मधु कहो मुरली से

स्‍पर्श बिन किसी अधर से !

व्‍यंजन खा गए खोया !

देखेगी राह पगडंडिया !

स्‍वजल-स्‍नात गंगा मैया !

चंद्रिका बनत । आह्लादक तब

जब आँखें ही करत चकोर की प्‍यासा ५४

करत है प्राण व्‍याकुल-सा ।

: ३० :

विरहाश्रुओं की नदी एक सीमा सच

जारिणी-विरहिणी बीच !

पेय वदन के भासार्थ जिन्‍होंने भी

नभ को चूमा न कभी

मधु अधर उन्‍हीं के न मिला होंठों में

बिजली न दमकत दिल में !

प्रिय विरह-दिवस-देवों ने

पर्याय-प्राशन करने

पांडुरा मूर्ति ली चुनने

तब प्रीति की । मधु संभोग की

गत पूर्णिमा की याद तनुकला ५५ सहसा !

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: ३१ :

न कुछ भी अब अच्‍छा लगता मुझको

आता न चैन कहीं मुझको !

और लगता कुछ अचानक कभी अच्‍छा

मन भुगत मरण ५६ को सच्‍चा !

मुझे सुख भी तो दु:ख देते है ! क्‍यों अब

सुख चाहूँ तुम हो ना जब !

रुसूख चलाकर सुख में

तुम आई थी जिस गृह में

उस सुख को उसी गेह में

बंद या खुले । होत द्वार ये

तुम्‍हारे रुसूख ५७ से ! यह व्‍यवहार चतुर-सा ।

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

: ३२ :

ये आँसू पुष्‍ट होत विरहाग्नि से

विरहाग्नि पुष्‍ट आँसुओं से :

ऐसे ही ये जीते रहें सुखावत

यह विरह, आँसू और वह !

मुझे सुख मिलता है दु:ख में, दु:ख ही

है सुखद : तपस्‍याग्नि ही !

हे तपस्वियो ! फलद हो तुम्‍हें तुम्‍हरी ।

औ ' मुझे तपस्‍या मेरी !

चाहूँ न शिला या मूरत

भावन के बिला दिखावत

आलिंग्‍य, चुंब्‍य जो रहत

प्रत्‍यक्ष वही । तब मूर्ति सही । समचेतन ही ५८

मैं देखूँ उसी में अपना प्रभु ऐसा

करत है प्राण व्‍याकुल-सा !

टिप्‍पणियाँ : १. आरोपित = ऐसा आभास हुआ कि जो प्रेम अनंत सा प्रतीत हुआ, उसकी अनंतता की तरह वह सहवास का क्षण भी अनंत ही है । मैं भूल ही गया कि यद्यपि प्रेम अनंत होता है, क्षण के लिए अंत अनिवार्य है ।

२. प्रेमदूत = पहले ये प्रेमदूत जब तुम्‍हारा संदेश ले आते थे तब उनका दर्शन होते ही मैं हर्ष से मुसकराता था । उस आदत के कारण आज भी उनका दर्शन होते ही मुझे आदत से मुसकराहट आती है । परंतु तुरंत याद आता है कि अब तुम्‍हारा संदेश वे नहीं ला सकते और फिर मन व्‍याकुल हो जाता है ।

३. उपचार = गाय बछड़े को चाटती है, उस समय वह केवल प्रीति को अभिव्‍यक्‍त करेन का औपचारिक संप्रदाय नहीं निभाती है । उसे बछड़े की एक विशिष्‍ट तथा इष्‍ट गंध प्रत्‍यक्ष रूप में प्राप्‍त होती है । प्रत्‍यक्ष स्‍वाद का आनंद लेती है । आगे चलकर इस विशिष्‍ट स्‍वाद को ग्रहण करने के लिए मानवीय इंद्रियाँ इतनी सूक्ष्‍मग्राही नहीं रहीं, फिर भी प्रीति का आनंद अभिव्‍यक्‍त करने की यह पद्धति रूढ़ हो गई । उसी का रूपांतर चुंबन, अधरपान आदि में हो गया ।

४. हे चुंबन ! वही आदमी मूढ़ है जो तुम्‍हें अर्थात् रति-भाषा को जानता नहीं ।

५. चूँकि चुंबन मुख से लिया जाता है, उसे रति-देवी का मुख कहा है ।

६. जो प्रेम कृष्‍ण की मुरली से,'मेघदूत' से, ताजमहल से प्रेमियों द्वारा पूर्णत: अभिव्‍यक्‍त नहीं हो सका, उसे चुंबन अधिक वक्‍तृतापूर्ण वाणी से तथा अधिक संतोषजनक रीति से अभिव्‍यक्‍त करता है ।

७. प्रणव = आरंभ तथा समाप्ति ।

८. वीणा = क्‍योंकि चुंबन मधुर ध्‍वनि करता है ।

९. क्रौंच = जिसे बिद्ध होते हुए देख वाल्‍मीकि ने श्‍लोक उच्‍चारित किया : 'मा निषाद प्रतिष्‍ठां त्‍वमगम: शाश्‍वती: समा । यत्‍क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम् ।'

११. वह नियति का पाश रज्‍जु ।

१२. जल का = इन विरह विकल आँसुओं का अर्थ वही जान सकेगा । अन्‍यों को यद्यपि वे असंबद्ध तथा असमंजस लगे, तो भी उसके हृदय के भीतर जो शोक-क्षोभ उभर आया है उसे ये आँसू ही हलका कर देंगे ।

१३. वसंत = नवयौवन ।

१४. वह = हृदय का झोंका ।

१५. हिंदू पदपादशाही के ध्‍येय को लेकर जो रणदेवता की उग्र आराधना की थी उस तपस्‍या में मेरा सहतपी, सहसैनिक ।

१६. भूचाल = मातृभू को कंपित करानेवाले राष्‍ट्रीय युद्ध के झटके अचानक आ गए और सबकुछ उलटा-पुलटा हो गया ! प्रेम का प्‍याला होंठों से लगते ही खिसक गया !

१७. धनी = वह ध्‍येय ! धर्म ! उस ध्‍येय की खातिर देवकार्य का बोझ सिर पर लिये उग्र कर्तव्‍य मार्ग पर मैं चल पड़ा । आगे के वर्णन में भी यही ध्‍वन्‍यर्थ अभिप्रेत है ।

१८. दिपों की = नियत समय जैसे-जैसे निकला जा रहा था वैसे-वैसे दीपों की बात बढ़ा-बढ़ाकर मैं प्रतीक्षा करता रहा कि और थोड़े समय के बाद आ जाएगी ।

१९. मिलने आने में तुमने इतना विलंब किया कि रात समाप्‍त होने लगी थी, तो जाओ, मैं भी बात नहीं करूँगा ! इस प्रकार प्‍यार में रूठने का अंदाज ।

२०. प्रेमिका के मिलन का यह योग जितना दु:साध्‍य, उतना ही क्षणिक ! ये दो दिल एक-दूजे से मिलने के लिए कितनी सूर्यमालिकाओं से रूपांतरण करते-करते आज इन रूपों में यहाँ एकबारगी एक-दूजे से मिल पाए ! तिस पर भी 'संयोगा: विप्र योगान्‍ता:' ! इसीलिए अनुचित रूठने में-प्रणयी अभिमान में-दूर मत हो जाओ, झट से मिल लो ! यदि यह क्षण निकल गया तो एक क्षण का अभिमान शायद पूरी जिंदगी के पश्‍चात्‍ताप का कारण बन जाएगा । ऐसा क्षण दोबारा नहीं आएगा !

२१. अभिमान शत्रु के साथ, स्‍नेह का भूषण है समर्पण ! प्रीति समर्पण के द्वारा ही तो प्रिय जन पर पूर्णत: विजय प्राप्‍त कर लेती है !

२२. जिस तूफान में बादलों पर बिजली दमक रही है ऐसे तूफान की भाँति जिसके वक्षस्‍थल पर यज्ञोपवीत दमक रहा है ऐसा उग्र विप्र-वह धर्म ! प्‍यार के रूठने के अंदाज में उस अंतिम रात को हम दूर-दूर हैं, तभी रात समाप्‍त होकर प्रभात के समय अचानक हमें हमेशा के लिए दूर करने वाला कठोर कर्तव्‍य सामने आ खड़ा हुआ !

२३. कर्तव्‍यबुद्धि जनम पाते ही धर्म की दास बन गई । परंतु हृदय प्रीति का दास बन गया । जब तक प्रीति और धर्मकर्तव्‍य एकरूप थे तब तक दोनों की भी सेवा सुसंगत हो रही थी । परंतु उस रात को कर्तव्‍य का तथा प्रीति का खिंचाव एक-दूसरे के साफ विरुद्ध होने लगा और उस दोहरे दास्‍य में चयन करने की नौबत आ गई !

२४. उस विप्र की (उस कर्तव्‍य की) वह मूर्ति !

२५. 'उस रात को उस प्‍यार के रूठने के अंदाज में थोड़ा समय बीत जाता है, तभी प्रभात हो गई और उसी के साथ अचानक शत्रु का हमला होकर सखी के सहवास को हमेशा के लिए खो देनेवाला, इस शत्रु के हाथ में कालकोठरी के अंदर आजन्‍म बंदी में डालने वाला, यह दुर्धर कर्तव्‍य सामने आ खड़ा हुआ !' -यह भावार्थ ।

२६. विप्र = पिछले छेदक में वर्णित कर्तव्‍य ।

२७. मेरे द्वारा किए गए सभी त्‍यागों में यह प्रियजनों का त्‍याग, कर्तव्‍य के लिए मैने जो पीड़ाएँ भुगत लीं उन सभी पीड़ाओं में यह विरह की पीड़ा, यही ध्‍येय के, धर्म के चरणों में समर्पित महापूजा है ! अत: यह व्‍याकुलता दोषपरक नहीं, अपितु कर्तव्‍य तत्‍परता की असली कसौटी है । क्‍योंकि विरह से इतना व्‍याकुल होते हुए भी मैं कर्तव्‍य के पालन में कोई कमी नहीं रखता हूँ !- यह भावार्थ ।

२८. आँसुओं से पूरा भरा प्‍याला ।

२९. वीरता के धर्म की शर्त ही उस स्थिति में ऐसी थी कि हँसते-हँसते इस उग्र व्रत का पालन करो । अत: खून गिरने पर भी प्रकट रूप में अश्रु गिरने नहीं दिया । किंतु इसे विपर्यास करके सहानुभूति-शून्‍य लोगों ने कहा, कि इसके हृदय में अश्रु ही नहीं हैं ! मानवीय कोमल भावों का अभाव है ! यह राक्षस है ! परंतु तुम्‍हारी प्रीति की बलि चढ़ाने वाली यह मेरी सतही कठोरता को देख, हे सखि, तुम तो इस आरोप को सही नहीं मानोगी न ?

३०. स्‍मृति ही दूरस्‍थ मलयगिरि; उसपर बहनेवाली हवा अर्थात् प्रियजनों की प्‍यार भरी स्‍मृतियाँ ।

३१. नवयौवन।

३२. यह जीवन काल ।

३३. हे प्रभु ! तुम्‍हारा सागर ।

३४. दासधन = रोमन गुलामों को दासधन रखने की अनुज्ञा थी, उतना तो ऐश करने के लिए रखा जा सकता था । उसी प्रकार शोक के, दु:ख के दासों को रोकर दु:ख हलका करने का मौका रहता है । किंतु जिस स्थिति में इस शोक की कैंची में मैं फँसा हूँ उसमें 'अश्रुओं का ऐश' भोगना भी निषिद्ध है । रोना भी मना है ।

३५. निश्‍चक्षु = जिसमें आग का (भविष्‍य) कुछ भी नहीं दिखता, ऐसा यह संकटकाल, यह काल कोठरी में बंदीवास ।

३६. प्रभु ।

३७. उष:काल = तुम्‍हारे जीवन का प्रभात-समय । अभी तो यौवन प्रकट हो रहा है । अभी जीवन का पूरा दिन बाकी है ।

३८. शकल = खंडित विभाग; टुकड़े-टुकड़े । किसी भूचार-राष्‍ट्रीय महत्‍वपूर्ण घटना के कारण, आज जो तुम्‍हारा केवल 'ध्‍येय' है वह कल का 'दृश्‍य' क्‍यों नहीं हो जाएगा ?

३९. उज्‍जयनी = उज्‍जयनी नगर (श्‍लेषार्थ से विजयवती) । यह भारत की भावी राजधानी बनेगी । उसपर नए ध्‍वज फहराएँगे ।

४०. आदित्‍य विक्रमराज = राष्‍ट्रीय विक्रम का सूर्य (श्‍लेषार्थ से कोई नया विक्रमादित्‍य) ।

४१. हिंदू राष्‍ट्र की जो महान् जीवनधारा आज जात-पाँत के भेदों के कुंडों से, पल्‍वलों से खंड-विखंड हो गई है वह क्रांति के महाकंप के साथ एकजीव होकर अखंड तथा प्रतिहत प्रवेग से बाढ़ के रूप में अपना जीवन मनुष्‍यमात्र के कल्‍याणार्थ प्रभु की चरणसेवा में समर्पित करेगी ।

४२. विप्रयज्ञ = पीछे उल्‍लेखित जिस विप्र के-धर्म के-कार्य में तुम समर्पित हो गए, वह धर्मकार्य, वह महायज्ञ, इस तरह यथारूप संपन्‍न होते ही ।

४३. इस दु:ख के इस अँधेरे के जो मेरे नैन आदी बन रहे हैं (मुझे अभी-अभी सहनीय हो रहा है) वे केवल काल्‍पनिक आशा की क्षणिक रोशनी से चकाचौंध हो जाते हैं और उनको अँधेरा और घना प्रतीत होने लगता है ।

४३. 'सब्र करो- जिंदगी में आगे कभी तुम्‍हारी मुक्ति हो जाएगी और तुम्‍हारी दयिता के साथ मिलन भी होगा !' -ऐसी सलाह को संबोधित करके ।

४४. 'परंतु इस नवयौवन की सुंदरता का यह जल, ये रसभरी भावनाएँ, आज बासी हो रही हैं, विरह के ताप से इस यौवनपूर्ण तनुलता के ये़ फूल सूख रहे हैं- उनके सूख जाने से पहले मिलन की उमंग थी ! वह पूरी होना तो संभव नहीं है न ? जीवन सुंदरता वि‍हीन, रूक्ष, निर्माल्‍यवत् बन जाने के बाद ही मेरी प्रीतिदेवता की भेंट होगी तो होगी !' -यही भावार्थ है ।

४६. ये विरहाश्रु तुम्‍हारी आसक्ति का फल हैं ! आसक्ति का त्‍याग करके प्रीति करो तो विरह का दु:ख नहीं होगा ! इस प्रकार योगीवरों के उपदेश से मन की सांत्‍वना करने का प्रयास करते ही मन जवाब देता था,'प्रीति की बात तो छोड़ ही दीजिएगा, पर प्रीति के अनासक्‍त रूप के तौर पर जिसे आप भक्ति कहते हैं वह भी आसक्ति के बिना कहाँ थी ? वह भी विरह के साथ इसी तरह अश्रुव्‍याकुल बन जाती है !'

४७. समर्थ अर्थात् स्‍वामी रामदास, अपने प्रिय शिष्‍य शिवाजी की मृत्‍यु के उपरांत दु:खी हो गए । उन्‍होंने अन्‍न त्‍यागकर देहत्‍याग किया ।

४८. अभिमन्‍यु ।

४९. संत मीराबाई, उसके गोपाल के विरह से व्‍याकुल पद 'बता दे सखि कौन गली गए श्‍याम' आदि प्रसिद्ध हैं ।

५०. तुकाराम जब पंढरपुर नहीं जा सकते थे तब राह में तब तक बैठे रहते जब तक वारकरी पंढरपुर से लौट नहीं आते और अश्रु गद्गद होते हुए पूछते कि क्‍या विट्ठल ने मेरे बारे में कुछ पूछताछ की ?

५१. सीता-विरह-व्‍याकुल अवस्‍था में सीता मानकर लताओं का आलिंगन करने वाला रामचंद्र ।

५२. प्रीति का इंद्रचाप अश्रुओं के मेघों में ही संभव होता है ! आसक्ति के आँसुओं में ही प्रीति का प्रतिबिंब रंग धारण करता है ।

५३. 'द्वैत रति में विरह की संभावना होती है, परंतु अद्वैत आत्‍मरति में इसकी संभावना नहीं होती । इसलिए तुम आत्‍मरत बनो, ताकि विरहव्‍यथा समाप्‍त हो जाएगी ।' ऐसी सांत्‍वना आप करेंगे । लेकिन आत्‍मरति में विरहव्‍यथा नहीं होगी तो प्र‍ीति का सुख भी नहीं है ! क्‍योंकि प्रीति की भावना ही द्वैत रूप है । प्रीति के लिए किसी और प्रीतिभाजन की आवश्‍यकता होती ही है । अद्वैत में 'प्रीति' शब्‍द ही संभव नहीं होता ।

५४. चंद्रिका के अंतर्गत स्‍वयंमेव आह्वादकता नहीं है । उसके आह्वाद का भोग वह स्‍वयं नहीं कर सकती- चंद्रिका इसलिए आह्वाददायी बनती है, क्‍योंकि चकोर के नेत्र तृषि‍त है ।

५५. एक कविसंकेत है कि चंद्रमा की कलाओं को देवता बारी-बारी से प्राशन कर लेते हैं जिसके परिणामस्‍वरूप वह क्षीण बनते-बनते शुक्‍ल प्रतिपदा को कृशतम बन जाता है । उसी तरह तुम्‍हारे पूर्व सहवास-सुख की पूर्णिमा को जो यह मेरी तनु पूर्ण कलाओं से विकसित थी वह विरह से क्षीण बनते-बन‍ते आज उस प्रीति-पूर्णिमा की उत्‍कटता की याद दिलाने लायक मात्र कला बची है !

५६. कुछ अच्‍छा लगते ही यह सोचकर लज्‍जा के मारे मन मृतवत् बन जाता है कि तुम्‍हारे बिना कुछ अच्‍छा लगे, यह तुम्‍हारे साथ प्रतारणा ही है !

५७. तुम्‍हारी प्रीति अत्‍यंत सुखद थी, इसलिए तुम्‍हें प्रथम चाहा; परंतु इस प्रकार सुख की सिफारिश लेकर तुम मेरे जिस घर की (जीवन की) स्‍वामिनी बन गई उसी घर में तुम्‍हारी सिफारिश के बिना सुख के लिए आना मना है । अगर तुम हो, तो सुख चाहिए । तुम नहीं हो, तो सुख भी अनचाहा बन जाता है ।

५८. शिला की अथवा धातु की मूर्ति की आराधना करते हुए उन प्रतीकों के साथ मीरा, तुकाराम, चैतन्‍य आदि की तरह मानवीय रिश्‍ते जोड़ लेने से यदि प्रीति अंत में भक्ति पद पाकर प्रभु के साक्षात्‍कार का साधन बन जाती है, तो शिला से सचेतन, और मेरी प्रेम-भावनाओं के साथ समवेदन बनके प्रत्‍यक्ष संभाषण-संनिवास-समालिंगन करनेवाली तुम्‍हारी इस सजीव मूर्ति को ही मैं प्रभु का प्रतीक मानकर उससे उत्‍कट प्रेम करने लगा, तो ऐसी साधना भी अंत में उस जड़मूर्ति से भी प्रभु के साक्षात्‍कार का सुलभतर साधन क्‍यों न बन जाए ? भक्तिमार्ग में किसी मानवीय प्रियजन को ही मूर्ति की तरह प्रतीक मानकर उसी से असीम प्रीति करनेवाला एक साधना संप्रदाय है । भैरवी, रामकृष्‍ण आदि की ऐसी साधना प्रसिद्ध ही है ।

महासागर

(परिचय : पानीपत के संकल्पित महाकाव्‍य में समाविष्‍ट करने के उद्दश्‍य से सावरकरजी ने ' महासागर ' ना से कुछ सर्गों की रचना की, जिनमें अंग्रेज और मराठों के बीच सिंधुयुद्ध का वर्णन किया । उनके प्रारंभ में कहानी का मराठी नायक अपनी नौका में बैठ सागर को स्‍तोत्रांजलि अर्पण कर रहा है और जल्‍द ही उसको अंग्रेज शत्रु की एक रणनौका दिखाई देती है, जिसके साथ युद्ध करने का प्रसंग आता है । ये दो घटनाएँ जिनमें वर्णित हैं, वे स्‍तवक आगे दिए हैं । काव्‍य वैनायक छंद में लिखा गया है ।

इस कविता की रचना सावरकरजी ने अंदमान में ही कर दी । परिणामत: यह उनकी स्‍मृति में ही थी । लेकिन अंदमान से आठ-दस वर्षों के बाद मुक्ति हो जाने पर इसे लिखित रूप दिया गया । परंतु यह पूर्णरूप में स्‍मृतिबद्ध नहीं थी । उसके कुछ स्‍तवक विस्‍मृति में विलुप्‍त हो गए थे, जो अब उपलब्‍ध नहीं हैं ।)

: १ :

विहितकर्म पुण्‍यदूत ब्राह्मणों के

अंतिम अर्घ्‍य का स्‍वीकार कर गभस्‍ती

भगवान्, अभी-अभी पश्चिम दिशा के

अंत:पुर के बीच प्रविष्‍ट हो गए

चुंबन करके मधुर चंचलता वह

विरहोत्‍सुक दयिता के लाल गुलाबी

गाल थरथरा रहे; थर्राहट दिल में

नवजीवन; नखशिखांत चेतना नई ।

म्‍लानवदन प्राची लेत पल्‍लो तक का

उसकी संध्‍या का दिन आया प्रतीचि का !

: २ :

स्‍वच्‍छ शांत गगन नील, शांत-वृत्ति यह

सांध्‍य-समाधिस्‍थ जैसा नील जलनिधि

नौका पर मात्र एक शान्‍त सलिल में

यह यात्रापटु अशांत गति-युता कितनी !

'जान रही हो, नौके ? कि यात्रा यह

कहाँ से है और जा रही कहाँ'

'हाँ जी, हाँ कविराज, जहाँ से और फिर

जहाँ तुम्‍हारी यात्रा हो रही है :

जान रहे हो जितना मनुष्‍य तुम सभी

उतना तो नौकएँ जानत हैं हम !'

: ३ :

द्वितला नौका में मजबूत, दीर्घ, रम्‍य

उच्‍चतल पर नौयायिन विचरण करते;

भाव ही वे मूर्तसंज्ञ उसके-करुणा,

दाक्षिण्‍य, प्रीति, भीति ! और भासमान्

भासमान् न अल्‍पसंज्ञ भाव रह रहे

मध्‍यतल पर; औ' तल में बिलकुल

लुप्‍त-संज्ञ अनजाने में श्रमते हैं

धारणार्थ, पाचक परिमार्जक भी हैं

कर्णधार और हृदय में, ज्ञात है उसे

क्‍या, क्‍या नौका का हाय हमें भी ?

: ४ :

अस्‍वाद करे उच्‍च तल पर मुक्‍त हवा का

उन नौयायिजनों में ऐ युवा;

गंभीराकृति विशालवक्ष वदन पर

ब्रह्मतेज भास्‍वर उत्‍साह भी नया

चिंता ही राष्‍ट्र की अखिल जिस की

धारणार्थी निर्मित है वैसे उसका

प्रतिभा-संपन्‍न भाल ! वह रहा वहाँ

अकेला अनेकों में मंत्रमय शब्‍दों में

गगन के तले गगन सम उदार-सी

नमन करता हे महच्‍छक्ति के यश को !

: ५ :

'प्रणाम, हे महच्‍छक्ति !' वंदन करत है,

'हे प्रणितामह सिंधो ! मेरे अनंत ही

अनंत प्रणाम तुम्‍हें ! अतला, अतुला !!

शांत कितनी तुम आज ! पर प्रथम

सूर्यगर्भतूणीर से मुक्‍त हो गई

थी जब तुम द्यु:शिर से मीनह्वी; और

लगी दमकने वहाँ आग्‍नेय मंडल

बनाती हुई ! संभ्रम क्‍या एस क्षण में

हो गया होगा नभ में ! जनमय ग्रहों पर

वंदन किया होगा सभ्‍य तुम्‍हें ही !!

: ६ :

देख नया दिव्‍य जन्‍म ! गति अतर्क्‍य-सी

भापने समर्थ सिर्फ देवता रहे !

भविष्‍यकथन किया होगा जिन ज्‍योतिषियों ने

प्रभव के पूर्ण तुम्‍हारे, होगा ही

सम्‍मानित किया उनको उसके नामों से

नामकरण किया था तव ग्रहों-ग्रहों पर

अपर अग्निसम रूप, परंतु सौम्‍यता कितनी

पित्रप्रदक्षिणाव्रती तव अविरम है !

अतलपूर्ण-खोते न हो ! यहाँ अधर ही

अलिप्‍त ही ! भ्रमण करत देवमार्ग पर !!'

: ७ :

हुआ चकित चलित लेश मुंजुवीचि वह

सांध्‍य समाधिस्‍थ सिंधु; कहने पर कि

'अतल लगता है तुमको तल तदीय वह

अर्धकरां गुलि जिसकी स्‍पर्श कर सके;

अतुल और बच्‍चे, जो लगता तुमको

वह मैं हूँ ओस-बिंदु सूर्यकमल पर

कमल कानन में जिसके, इस पल भर में

है यथार्थ अतल वही ! अतुल भी कितना !'

लहरों में गीत मधुर गूँज उठा है

है यथार्थ अतल वही ! अतुल है हरी !!

'प्रिय शंकर !' उस विचारमग्‍न उदार

युवक को नजदीकी से छेड़कर किसी

प्रौढ़ किंतु प्रियदर्शी पुरुष ने कहा,

'कहा था तुमने, वह आज याद आ रहा ?'

दिखाओगे गाकर कुछ समाधि शांत से

वेदस्‍वर वेदमंत्र ? गा लो फिर अब '

' अमरसूनु उल्‍हास ' और हो उठा

गंभीर स्निग्‍धकंठ नव निनाद ही :

प्रश्‍न परम वह ! युगों को गत युगों का !

'केंद्र कहाँ भुवनों का ? नाभिनभों का ?'

: ९ :

'अहो सुभव्‍यता !' उसी सुवाक् समीर को

मंत्र से रोमाचिंतगात्र सादर

अमरसुनु उद्गार अहो भव्‍यता !

निश्‍चल निश्‍चेष्‍ट खड़ा पुनरपि 'अरे,

प्रिय शंकर, भवन का मर्म ही यही

स्‍पर्श करे मंत्र महान् ! परिधिशून्‍य-से

केंद्र जगच्‍चक्र का 'मैं' ही हमारा

शून्‍य के गमन में निरवयव निश्‍चल

चलमध्‍यद तारा 'मै' यही उग आया !

: १० :

'मै' के भीतर संभाव्‍य दशदिशा

यह प्राची प्रतीचि भी ! चलित मैं फिर भी

प्राच्‍य है वह प्रतीच्‍य ! और ऐसी ही

संज्ञाओं की विलुप्‍त लुप्‍त 'मैं' फिर भी

यद्यपि आंतरिक न 'मैं' प्राची औ' प्रतीचि

एक दूजे में विलुप्‍त मूल्‍यशून्‍यता

शेष पुन : ! प्रत्‍यक्ष रूप सिद्ध है तभी

बुद्धिगम्‍य जो भी है जाना जाता है !

प्रत्‍यक्ष के बाद पद अंध जो गिरे,

ईश या परेश या अनवस्‍था होत है !

: ११ :

और हे शंकर सेवा मनुष्‍य की

भक्ति परा यही, यही धर्म मनुज का

किंबहुना देवालय कभी न उदित है

होगा वह प्रेत-भूत-देवनिष्‍ठ भी

मनुज हिताहित है जिसको अनन्‍य-सा

जाने-अनजाने में नहीं हो गया

नींव और शिखर यह और ! स्‍वर्ग है रसा

मनुज सुखासुख पुण्‍यापुण्‍य प्रभु को

आवे सापेक्ष ही निरपेक्ष भाव से;

प्रभु मनुष्‍य का प्रतिमा अधिनरीकृता

: १२ :

वह कृपालु शीतलतल बोधिवृक्ष हो,

या वह गिरि जो बिजलियों में गरजे,

किंतु विषय में अनन्‍य तत्‍व यही है,

देता हे सुख प्रभु औ ' ले जाता नृशंस !

'और शक्ति जो' अथवा 'शक्ति जो भी हो'

'प्रवर्तन करती हैं विश्‍व‍चक्र का !' वह,

वह' जी हाँ अटक गए क्‍यों, अमर ! अग्रणी

वही ! वह गम्‍य और अगम्‍य एक वह !

विभूतिमत्‍व जाग्रत् करता है श्रद्धा को

अग्रपूजनीय है विश्‍वविभूति !

: १३ :

किंतु पीठ फेर के भी उसकी ओर पूजे

मानुज्‍य को मानुज, जैसे कि कीट ही !

तब उसमें न कुछ भी तुम्‍हें क्‍यों स्‍वयं

लगता है विपर्यस्‍त, सत्‍वहीन ही ?

देखो अमर जरा ऊपर से फूल जैसे

गूँथ एक सूत्र में गति-गतियों के

इन अनंत तारों की माला ऐसी

गले में विराट् नर के शोभत है जिस

उसके आगे सास्थि न यह लौह भी यद्यपि

होते नर जानू-नमते ही तत्‍पल !

: १४ :

न जाने कहकर भी जो जरा-सा समझे,

जानत है कहते ही जानत वह न समझा

लाभ क्‍या है बैठ निरुत्‍तर या बलात्

प्रतिस्‍पंदन में हृदय पुकारता जहाँ

'विश्‍वंभर ! विश्‍वकार !' धन्‍य-धन्‍य है !

सिंधु धर्मबिंदु तुम्‍हरा ! और तुम्‍हारे

चंड कारखाने में सूर्य शत भी वे

उड़ती चिनगारियाँ बुझतीं-चमकतीं

अहरण पर स्‍थल की कितने भी ऐसे

कालप्रहार से बनत विश्‍व और संहरत !

: १५ :

तुम कर्ता, करवाता, कार्य, तुम क्रतु

निरपेक्ष भी तुम, सापेक्ष पूर्तता,

सांख्‍य पुरुष पुरुषोत्‍तम योगयुक्‍त तुम

स्‍यात् तुम, तुम शून्‍य और सत् भी तुम हो,

हे अणोरणीयान् ! महातोऽपि महीयान् !

बोल न सकत वाणी न मौन रहत मानुषी,

फिर भी विश्‍वगीत त्‍वत्‍स्‍तोत्र यह महान्

प्राण का तार-तार थरथराया है

गाता हूँ गीत वही बिना समझे ही

प्रभु, प्रवृत्ति पर तुम्‍हारी अवश यह मौन !

: १६ :

स्‍तोत्र महान् प्रभु का ! जो ! सजके अपने

बूटी के वसन में तितलियाँ यदा

पंखों के बैठ विभान में नन्‍हे से

अणुसम-तृण कुसुमलुब्‍ध गूँजत हैं -तदा;

और दूजा मानकर महासागर ही नभ को

जा चढ़कर उसपर सस्‍पर्ध यह यदा

क्रुद्ध महासागर रण में खड़ा रहे

मेघों के बजा के रणदुंदुभि-तदा

है गीत ! जो गाए तव महानता

गति जितनी गीति, स्थिति एक तानता !!

: १७ :

बिना समझे लेकिन ! क्‍यों यह प्रभव होत है

सफल प्रलय में केवल ! धर्म में किसलिए

ग्‍लानि ही है प्रथम, यद्यपि पुनरपि

तुम्‍हें अभुत्‍थान अवतारकार्य है ?

मिट्टी के क्‍यों महल-कष्‍टी बनकर ही

बन जाएँ मिट्टी फिर से ? लगाई कब से

दौड़ ऐसी गगन-मंडल में, क्‍यों, किसने,

इन सहस्र सूर्यों की ? क्रीड़ा में ही ?

काल से न क्‍या तुम भी उकताते हो ?

लगाकर फिर तोड़ डालने में जन्‍म व्‍यतीत हो !!

: १८ :

समझोगे 'तुम' भी या कैसे ? यह जहाँ

क्षुद्र 'मैं' ही न समझ आ रहा मुझे

मुरली को, मुरलीधर ! बजाओगे जो

बजाए बगैर गीत कभी रहा न जाए !!

इसीलिए धर्मवीर ये समरांगण में

'मान' के लिए मरते ? रणगर्जना वही

गूँजत शतकों में से आज इस क्षण

रक्‍त बिंदु-बिंदु में देत प्रतिध्‍वनि !

देत मात्र प्रतिध्‍वनि ही-ना समझे ही

प्रभु ! प्रवृत्ति को तुम्‍हारि-अवश यह मौन

: १९ :

सहसा उस नौका के नैनों में चकाचौंध

तेजस्‍वी लखलखाहट नभ में भर गई,

तामसि का गर्भपात होकर जैसे

अचानक ही दिनरूप भ्रूण गिर गया

भेदकर घन तम का, सहमी सहमी

नौका को एक जगह रोककर रखा

वह प्रकाशलेखा घटिमात्र; जैसे कि

चाँदी का वह कील ही घुसा हृदय में !

ज्‍यों-ज्‍यों उससे खिसकने चाहे वह

तीक्ष्‍ण किरण त्‍यों-त्‍यों उधर ही उसी पर

: २० :

अब तो ऊँचे खनखनाते पुकारते

सींग भी रुको-रुको करते बजते हैं,

जी हाँ ! मराठे ही ! मराठे ही ! वे वहाँ

किरणें चंद्रज्‍योति की जहाँ से निकलतीं,

लव रुकती, लव दौड़ती, नाव अंत में

रुक ही गई, सन्निध आते ही रिपु-नौका;

ध्‍वनि देत कप्‍तान 'महाराष्‍ट्र भूपति-

-नौवाह को सलाम करत आंग्‍ल नौका'

'प्रतिप्रणाम !' कहते महाराष्‍ट्र-रणनौका

रोककर, सादर ही फिर, उसको पकड़ती

: २१ :

'यह ढोती है यात्री वाणिज्‍य को नौका'

कप्‍तान ने कहा,' आंग्‍ल-मित्र मराठे :

उनकी ही रणनौका रोक रही है

हमको क्‍यों इस तरह शत्रु जैसे'

'क्‍योंकि,' नौवाह ने जवाब दिया, 'किसी ने

अस्‍मदीय ध्‍वजवाली नौका को लूट लिया

जलदस्‍यु घूम रहे हैं सागर में

शक है कि इसी आंग्‍लनौका में लूट हैं,

तलाशी देकर हमको शीघ्र आप करें

झूठा है इललाम ऐसी तसल्‍ली'

: २२ :

धड़ड़ धड़ड़ तोपें तब आग निकलतीं

सहसा ही बजने लगीं, आंग्‍ल नौका में

बूझ गई चंद्रज्‍योतियाँ जल उठीं

ज्‍योतियाँ रणतेज की हृदय-हृदय में

सींग से ऊँचे-ऊँचे स्‍वर गूँज उठे

'आ जाओ ! जहाँ भी हो सारे मराठे

धैर्य वीर ! धैर्य वीर ! वीर, धैर्य लो !

गूँज उठा शत-शत वह दुंदुभि तभी

धड़ड़ धड़ड़ तोपों पर तोपें बरसीं

शतदा अँधेरा सभय चौंक उठ गया !

: २३ :

अंत में वे फँस गए घेरे में जब

घेरा डालत शिप १० फ्रिगेट जहाज स्‍वयं

गोले गोलों से बारूद से बारूद

ध्‍वज ध्‍वज से नौ वीर से वीर भिड़ गए !

निर्भय नि:शंक जहाज से जहाज ही

भिड़ गया, आए चढ़कर मराठे

हाथ से हाथ और सिर से सिर भी-

भिड़ने पर पतन चनले कौन किसे मारे !

जोड़ का तोड़ फिर जूझ रहे वे

सिंधु महासागर में आंग्‍ल-मराठे !

: २४ :

क्रोध से पैर पटकते तभी उस समय

प्रथम बूँद टपके फिर बौछार हो गई

हवा भी चलने लगी तेज निरंकुश

जलदों की रिक्‍त करत नभ लक्ष पखालें !

लहरों पर लहर चढ़े ! सिंधु सिंधु से

उछल-उछलकर भिड़ा ! जूझ तगड़ा हो रहा !

अब यह फिर वह ऐसे कुक्‍कुट जैसे

सिंधु चढ़ा लड़ा उड़ा डूबा रहा जहाज

बिजली कड़कड़ा रही, फुफकारतीं जैसे

उसे सृष्टिक्षोभ की दंतपंक्तियाँ !!

: २५ :

तभी उस क्षणदा में इक क्षण दिखे कालाग्नि में झोंक दी ।

वैसे सिंधु-भीतर डुबा मस्तिष्‍क नौ डुबा दी ।।

तापों की भरमार भीषण महाराष्‍ट्र-प्रतापी बली ।

सारा नौदल छिन्‍नभिन्‍न रिपु का सिंधुतल में बलि ।।

टिप्‍पणियाँ : १. यात्री ।

२. क्‍या नाव अपने हृदयस्‍थ कर्णधार को जानती थी ? और हम भी ?

३. सूर्य से टूटकर पृथ्‍वी का ग्रह जब पहली बार अंतराल में उसके चारों तरफ मँडराने लगा तब उस नए उतप्‍त अग्निगोल को देखकर, जिन अन्‍य तारों पर तथा ग्रहों पर मनुष्‍य की बस्तियाँ होंगी उनको कितना अचंभा हुआ होगा ।

४. जिन ज्‍योतिषियों ने भविष्‍य कथन किया होगा कि ऐसा नया अग्निगोल जन्‍म लेनेवाला है, उन्‍हीं का नाम इस अग्निगोल को उन लोगों ने दिया होगा ।

५. सेनाय नामक पहाड़ पर जब ईश्‍वर स्‍वयं मोझेस् को धर्माज्ञा देने हेतु आया, तब एक मेघस्‍तंभ ने उस पहाड़ को परदे की भाँति आच्‍छादित कर दिया । प्रचंड तेज से स्रोत चारों तरफ से उठने लगे और उस तेजोमेघ के भीतर से 'जेहोवा', क्रुद्ध ईश्‍वर, ने आज्ञाएँ दे दीं, ऐसी किंवदंती बाइबिल में है ।

६. 'ईश्‍वरस्‍तत्र पुरुषविशेष : ' - योगसूत्र ।

७. 'यदा यदा हि धर्मस्‍य ग्‍लानिर्भवति भारत ।

अभ्‍युत्‍थानमधर्मस्‍य तदा आत्‍मानं सृजाम्‍यहम् ।।' - भगवद्गीता ।

८. जगत् में जो भी घटनाएँ घटित होती हैं वे सारी भगवान् की केवल 'लीला' है, प्रभु केवल अपने मनोरंजन के लिए विश्‍व की उथल-पुथल कर रहा है । 'काल: काल्‍या भुवनफलके क्रीडति प्राणिशार:' भर्तहरि, इस मत की ओर यहाँ संकेत है ।

९. तेज रोशनी । आज जिस तरह विद्युत्-प्रकाश की तेज रोशनी डाली जाती है, उसी तरह पुराने जमाने में अँधेरे में चोरीछिपे समुद्र पर जा रही जलदस्‍युओं की नौकाओं को पकड़ने हेतु अनेक चंद्रज्‍योतियों को एक साथ जलाकर उनका पीछा करनेवाली युद्धनौकाएँ उन्‍हें ढूँढ़ लेती थीं ।

१०. शिप, फ्रिगेट आदि नाम उस समय अंग्रेजों की विशिष्‍ट रणनौकाओं के होते थे ।

गोमांतक

(परिचय : इस काव्‍य की प्रस्‍तावना के रूप में मुंबई के डॉ. बा.दा. सावरकर के संपादन में प्रकाशित 'श्रद्धदानंद' शीर्षक पत्रिका में सन् १९२७ में आया अभिप्रायही कोष्‍ठक में दी हुई नई घटनाएँ, वर्तमान कालानुरूप हैं, डालकर नीचे दिया है । वह अभिप्राय इस प्रकार -

सन् १९२२, कारावास में महा‍कवि वि.दा.सावरकर ने जो 'गोमांतक' शीर्षक महाकाव्‍य की रचना की वह सन् १९२४ में प्रकाशित हुआ । उसमें कवि ने प्रतिभा की दुरबीन से भविष्‍य की घटनाएँ उनके घटने से बहुत पहले ही यथातथ्‍य रीति से देखीं तथा उनका वर्णन किया है, जैसे उन्‍होंने प्रत्‍यक्ष देखा है । 'गोमांतक' काव्‍य न केवल काव्‍य है बल्कि अचूक बताया गया भविष्‍य ही है । क्‍योंकि अब गोमांतक में घटित शुद्धि आंदोलन, शुद्धि समारोह (पुर्तगालियों की राजसत्‍ता का उच्‍छेद, आज वहाँ प्रस्‍थापित हो रहा स्‍वतंत्र भारत का नौदल अड्डा) आदि घटनाएँ इस काव्‍य में कुछ ही वर्ष वर्णित तथा भविष्‍य की कथन की हुई पढ़कर ऐसा प्रतीत होता हे कि वर्तमानकालीन घटनाएँ उन वर्णनों के मात्र छायाचित्र हैं - इतना विस्‍मयजनक सादृश्‍य उनमें है । द्रष्‍टा कवि का अक्षर-अक्षर किस तरह सत्‍य सिद्ध हो रहा है । 'वाचमर्थोऽनुधावति' इस उक्ति का अनुभव हो रहा है । कल्‍पना-दृष्टि ज्‍यों-की-त्‍यों वास्‍तव में उतरी । प्रतिभा की सिद्धि जैसा चमत्‍कार जिन्‍हें प्रत्‍यक्ष देखना हो वे महा‍कवि हिंदू सम्राट् विनायक दामोदर सावरकर का 'महाराष्‍ट्र-चारण' उपनाम से विरचित 'गोमांतक 'महाकाव्‍य अवश्‍य पढ़ें ।)

गोमांतक (पूर्वार्ध)

थी एक सरिता दापगा तापहारका ।

प्रतिपदा चंद्रलेखा सम तन्‍वंगी धवलोदका ।।१।।

हर का हलाहल ताप हरण में

जो पापक्षालिनी नदी व्‍यस्‍त स्‍वर्ग में ।।२।।

भगीरथ सम सम्राट् कुलों के वसुधा तल में ।

भागीरथी व्‍यस्‍त भी सतत महत्‍कार्य में ।।३।।

एतदर्थ ही जो महान् न हुआ ऐसे ।

दीनों का तृष्‍णा सान्‍त्‍वन पुण्‍य हो ऐसे ।।४।।

यही जानकर तृषार्त गाँवों को शीतला ।

नदी नन्‍ही सी पिलाती जल सज्‍जला ।।५।।

सिंहनी यिद दूध पिलाती है अपने छौने को ।

पिलाती है हिरनी भी दूध निज छौने को ।।६।।

दारका के रम्‍य तट पर ग्राम इक सोहत ऐसा ।

मोतिया की बेला पर फूलों का गुच्‍छा जैसा ।।७।।

लहलहाते खेत चारों ओर बीच बसा यह ग्राम ।

सोहत है जैसे सागर से घिरे द्वीप समान ।।८।।

गीत मधुर 'ओ बैल रे' हाँकता स्‍वर ऊँचा गूँज उठा ।

खुले गगन में भोर की सुरभित वायु के संग ।।९।।

रहट से गिरे जलप्रपात से गूँज उठा नभ सारा ।

स्‍नेहिल-गंभीर स्‍वर से नाच मयूर ने पंख पसारा ।।१०।।

था प्रकृति का उन्‍मुक्‍त वरदान इस ग्राम को जैसा ।

आज भी पाया वरदान वही इस ग्राम ने वैसा ।।११।।

किंतु सुंदर तन हो जाए रोग-जर्जर जैसे ।

या तड़ि‍ताघात से कोई पादप जले वैसे ।।१२।।

परचक्राघातों से ग्राम हतभागा बनकर ।

छाई उदासी वर्तमान की उस गतगर्व मुख पर ।।१३।।

टूटे परकोटे की ऊँची भित्त्‍िा नभ को भिड़ी ।

हृदयभग्‍न अर्धशल्‍य का शेषार्ध जैसी खड़ी ।।१४।।

था निकट जीर्ण-शीर्ण शिवालय शेष एक ।

समाज के एकमात्र धर्मकेंद्र का प्रतीक ।।१५।।

ईश-दर्शना आईं देवियाँ परिक्रमा करतीं ।

गूँथते शिशु-गण झरते चंपकों की मालाएँ जल्‍दी ।।१६।।

मठ के आँगन में निकट वृक्ष जो हरसिंगार का ।

फूलों से लदा-फदा सर ऊँचा करता गाँव का ।।१७।।

जो पारिजातक कथा दंतकथा कथी ।

वह नारद को कहे स्‍वयं अर्जुन-सारथी ।।१८।।

भामा रुक्मिणी दोनों को एक-दूजे के ।

आँगन में पारिजात सहा न गया ।।१९।।

दोनों की ईर्ष्‍या हरणार्थ हरी ने सहसा उठाया ।

उस पारिजात को भृगु मुनि के पग पर अर्पित किया ।।२०।।

किया मुनिवर ने निज आश्रम में उसका आरोपण ।

है वही मठ वह और पारिजात भी वही समझो जन ।।२१।।

गाँव के मध्‍य में हाट था जिसमें थीं दुकानें पाँच ।

दीवालें रँगी चूने से उनपर गेरू के बेलबुटों का नाच ।।२२।।

नाम मिला उसे 'मुखपेठ' औ' वैसा सम्‍मान मिला ।

संध्‍या समय टहलते वहाँ रँगीले छैल-छबीले ।।२३।।

प्रात: समय रख जातीं नारियाँ यहाँ तेल की शीशियाँ ।

औ' समय घर ले जातीं भरी-भरी शीशियाँ ।।२४।।

लेता कौड़ि‍यों का चलनसार गोल मिर्च जीरा देता ।

बनिया कभी 'मूल' से भी दुगुना दाम वसूल करता ।।२५।।

वहीं एक सेठ था जिसकी तोंद निकली थी ।

तनिक बड़ी थी दूकान उसकी तो समझे लोग आढ़ती ।।२६।।

कुछ आवारा बालक वहाँ भीख माँगते शोर मचाते ।

तलुवों की आग पेट में जाती, सेठ आगबबूला होते ।।२७।।

किंतु उठाकर डंडा पैरों पर सँभालते विशाल देह ।

उससे पहले ही चंचल चपल बालक होते नौ दो ग्‍यारह ।।२८।।

गाय छोड़ने प्रात विप्र जो प्राय विलंब करे ।

चरवाहों के बालक लेते प्रतिशोध उस पंडित पर ।।२९।।

आते-जाते कहीं मिले यदि उसके वस्‍त्र धूत ।

छू लेते उनको और तुरंत हो जाते चंपत ।।३०।।

निकटवर्ती गाँव में प्रतिवर्ष मेला लगता, दंगल होता ।

भार्गव गाँव का नवमल्‍ल भी खम ठोककर उतरता ।।३१।।

जाते-जाते माता के भी चरणों को छूता,

'सँभल के' माँ कहती, तो हँसकर निकल पड़ता ।

निकलकर सीधे मेले में मल्‍लरंगण में उतरता ।।३२।।

अपने से दुगुने जवान की पीठ टिककर सत्‍वर ।

लौटे विजेता का सेहरा सर पर बाँधकर ।।३३।।

वीर विजयी की आगवानी के लिए सिंहद्वार पर ।

ताँता लगता जयघोष से फटा गाँव का लघु अंबर ।।३४।।

बाजे-गाजे के साथ डोलता वीर सीना तानकर ।

जैसे रावण-वध कर लौटे हैं प्रभु-राम साकेत पर ।।३५।।

गाँव में ही पीहर पर ना भेजे ससुरजी ।

तो भैया गोरी का बैठे घात में मिलने जी ।।३६।।

भैया से मिली सौगात जब मिलन हो नदी-पथ पर ।

मावा, मिठाई या चूमा जो उससे भी था मधुर ।।३७।।

पंचायत सभा पंचों की जो सब विवाद निपटाती ।

पटेल मुखिया गाँव का जो रक्षार्थ निकट रहता ।।३८।।

ग्राम पुरोहित लोगों को नित्‍यनैमित्तिक सिखाते ।

और जनों के पाप-दूरित दूर-दूर भगाते ।।३९।।

दैवी भौतिक विपदाओं का ऐसा होता परिहार ।

कृषक अपना तन-मन कृषि में लगाते निश्चिंत होकर ।।४०।।

हरे-भरे खेतों पर लहलहाती सुनहरी बालियाँ मुकुट समान ।

घर-घर में संतोष बिखरता जैसे डोले तन में प्राण ।।४१।।

कुम्‍हार, जुलाहे, बढ़ई, लुहार बनजारे प्‍यारे ।

जो-जो साल भर हाथ बँटाते हलधर का सारे ।।४२।।

सभी सहायक प्रसन्‍न कृषक से भरपूर पाते ।

अनाज का हिस्‍सा जो है निश्चित न्‍यायोचित लेते ।।४३।।

रखकर साल भर का पर्याप्‍त अनाज बहुजना ।

शेष सारा जो कि जिसका संप्रति काज ना ।।४४।।

बहुजन हिताय वह संयुक्‍त निधि में ।

पटेल भरकर रखत गाँव के भंडार में ।।४५।।

दुर्भाग्‍य से सूखे का संकट करे सबका शोषण ।।४६।।

ऐसी थी भई ग्राम-पंचायत की सुव्‍यवस्‍था ।

जिसके कारण हर गाँव मानो जनतंत्र राज्‍य था ।।४७।।

आज है पर आसन्‍नमरण संस्‍था और जनता अति ।

विदेशियों की हुकूमत से बन रही पराकृति ।।४८।।

मध्‍य-बस्‍ती में खुली हुई कितनी मधुशालाएँ ।

पीसा जा रहा किसान बावला लादे गए कर नए-नए ।।४९।।

पर इस ग्रामसंस्‍था से भी पूर्व थी एक ऐसी,

प्राणभूत ही ग्राम की संस्‍था दूसरी जैसी ।।५०।।

वह है यह वटवृक्ष युगस्‍थायी महायशी ।

फैली थीं जिसकी जटाएँ, प्रतिवृक्ष-सी ।।५१।।

लौट न सका कभी यहाँ आया नवागत पाहुना ।

इस वृक्ष को देखे बिना, इस कथा को सुने बिना ।।५२।।

वीरोत्‍तम भार्गव ने पहले किया जिस दिन ।

किया संकल्‍प सिंधु को हटाने का शतयोजन ।।५३।।

उसी दिन उस वीर ने विजय ध्‍वज फहराया ।

वट वृक्षारोपण किया औ' इस गाँव को बसाया ।।५४।।

इर्दगिर्द वृक्ष के विशाल चबूतरा अनघड़ शिलाओं का ।

अपूर्व, अनोखा, अलौकिक बिना चूना-गारे का ।।५५।।

बना वार्त्‍तालाप मंच राहगीर, मुसाफिरों का ।

राजकाज भी यहीं पर चलता सारे गाँव का ।।५६।।

दिन में सभागार बनता और रात भर ।

बन जाती आम रंग भू मुक्‍त द्वार ।।५७।।

झाँझ-मँजीरा ढोलक तबले का रंग जमता ।

लोकगीत लावणी* को रात-समय भी कम होता ।।५८।।

कभी कोई रमता जोगी साधु बैठे धूनी जमाए ।

सकल जन की विनती से बातें करे दुनिया भर की ।।५९।।

छोड़त धुआँ चिलम का जो शब्‍द-शब्‍द पर ।

कहे विलायत है काशी से तनक ही दूर ।।६०।।

अवधूत हो दुलहनियाँ बूढ़े वट की श्रद्धा से ।

उपासना करतीं जलते नव वृक्ष ईर्ष्‍या से ।।६१।।

उस वंद्य वटाध्‍यक्षत्‍व के वत्‍सल छाँव तले ।

प्रजाजन करते छावनी अपनी निश्चिंत भले ।।६२।।

वैसी यहाँ छावनी अब हुई है लुप्‍तश्री का ।

थामे शिविरध्‍वज कई राज्‍याधिकारियों का ।।६३।।

तहसीलदार दौरे पर आता करता वहाँ बसेरा ।

सारे गाँव में हड़कंप होता जो 'बड़ा साब आया' ।।६४।।

किसी बहाने हर कोई वहाँ से गुजरता प्‍यारा ।

देखत डर-डर के चौकी जैसा हे पुच्‍छलतारा ।।६५।।

___________________

* एक तरह का चलता गाना ।

पटेल बाबा की गलमूँछें कभी अति भव्‍य थीं ।

पटवारी की भी लेखनी लचीली थी ।।६६।।

खूब बढ़ाता तन्‍महत्त्व भय अंतर में ।

एक दिन के लिए क्‍यों न हो ग्रामवासियों के मन में ।।६७।।

दोनों झुककर उस तहसीलदार को करते सलाम ।

वे भी सर हिलाकर कबूल करते उनका सलाम ।।६८।।

खुल गया था पाखलों का एक स्‍कूल वहीं पर ।

आचार्य का हमरे क्रोध जाता सातवें आसमान पर ।।६९।।

भई वीरान पाठशाला और परस्‍थ पर धर्मदा ।

स्‍कूल में बच्‍चे रटते भ्रष्‍ट-अशिष्‍ट शब्‍द तदा ।।७०।।

'ईसा मसीह' 'क्रूस' 'कुलंबीया' 'अल्‍बुकर्क' अलाँ फलाँ ।

हाय ! हाय ! श्रीगणेश बिन वे पढ़ते वर्णमाला ।।७१।।

पुर्तुगीज ! सुनते शब्‍द ही गत शत वत्‍सरे ।

करते आए इस गाँव में भय ग्रस्‍त जनांतरे ।।७२।।

जैसे धेनु आए चपेट में वृक के, शेर झपटे उसपर ।

क्रूर मुख से धेनु पड़ी क्रूरतर मुख में सत्‍वर ।।७३।।

पाखलों के पग जमते ही ऐसी स्थिति गोवा की हुई ।

इसलाम के मुख से धरती ईसा के मुख में गई ।।७४।।

व्‍याघ्र संत्रस्‍त वन में मरत मरते जैसे ।

जीते हैं मृग झुंड में देखो जैसे-तासे ।।७५।।

मृग झुंड में गोमांतक के घन वन में ।

था इक झुंड यह भार्गव गाँव उनमें ।।७६।।

उस सरल ग्राम में एक निरीह, प्रिय, सुशील-सा ।

बसा था विप्र परिवार जो भला, सुप्रतिष्ठित ऐसा ।।७७।।

श्री महामंडलाधीश कदंब नृपति के काल में निरंतर ।

पाता राजपुरोहित का सम्‍मान यह कुलवर ।।७८।।

जिस दुर्दिन में देश का इस भाग्‍य फूटा ।

हाय ! स्‍वतंत्रता का कैसा खड्ग यहाँ टूटा ।।७९।।

उस दिन इस कुल के गिरे नर जूझकर जैसे ।

पहले सभांगण में अब धर्मरणांगण में ऐसे ।।८०।।

तुर्क अधिकारियों ने इस कुल की स्‍त्री को एक बार ।

पकड़कर सहसा उसे रखा गुलाम बनाकर ।।८१।।

ऐसी बंदिनी हिंदू नारियों के संग बेचकर ।

चढ़ा दिया उसे एक अरबी जहाज पर ।।८२।।

सुना है मानवी दया से ऊबकर सागर में साध्वियाँ ।

कूद पड़ीं भले समझकर क्रूर नक्र मछलियाँ ।।८३।।

मूर्तिभंजक तुर्कों से नाना देवता भागे दूर-दूर ।

मंगेश शांता दुर्गा केवल स्थिर थे अपने स्‍थान पर ।।८४।।

तुर्कों से भी बनकर क्रूर आघात किए पाखलों ने ।

भंग किए कितने मंदिर इन नृशंस पागलों ने ।।८५।।

प्रखर होकर भी ये दोनों मूर्तियाँ कंपित हो अंतर में ।

भला बल इतना कहाँ होगा, दुर्बलों के ईश्‍वर में ।।८६।।

चिंता न की अपने प्राणों की तब भक्‍त विप्रों ने ।

उठाकर मूर्तियाँ गुप्‍त हुए वे निमिषमात्र में ।।८७।।

उन विप्रों में एक था इस कुल का दीपक जिसने ।

'अंभुज' में स्‍थापित करते मूर्तियाँ लज्जित किया रिपु को उसने ।।८८।।

दैवी, दैशिक, भाषण तूफानों से बचता रहा ।

वंशवृक्ष का एक ही अंकुर जो शेष रहा सहा ।।८९।।

पुरखों के घर अपने युवक सुख-चैन से रहता ।

जाते-जाते तुरंत स्‍वर्ग पथ में अपने पिता ।।९०।।

अर्धांगिनी उसकी अभी नवयौवना नाजुक-सी ।

गृहिणी पद कर्तव्‍य निभाती प्रौढ़ा ललना सी ।।९१।।

गेह निर्मल, भोजन षड्रसपूर्ण होता सदा ।

आबालवृद्धों की तो थी वह सखि प्रियंवदा ।।९२।।

गुरुजनों की सेवा करती औ' बच्‍चों को पढ़ाती ।

मधुर वाणी से सेवक को वेतन से भी सुख देती ।।९३।।

कोई कृषक ॠण लेने आता उसके द्वार पर ।

भोजन से वह प्रसन्‍नवदना उसे तुष्‍ट कर ।।९४।।

आम के बगान के आमों से घर भर जाता जब ।

उनमें से सुरंग, सुरस, स्‍वादु फल चुनती तब ।।९५।।

सब जाति की सुहागनों को घर पर न्‍योता देती ।

आँगन में उस आम्रराशी को उनमें लुटाती ।।९६।।

माता का दूध पीए अंबा कांचन-गौरवा ।

स्‍तनंधये दो लोभों के मध्‍ये स्‍तंभित वानवा ।।९७।।

किंचित् क्रोधी था, पर प्रेम कोमल उसका साजन ।

थी वह उसकी प्राणप्रिया, मधुरा सखी सजनी ।।९८।।

केश सँवारता उसके, अपने हाथों से नहलाता प्रेम से ।

लज्‍जा से चूर होती तो रूठ जाता कृतक कोप से ।।९९।।

ऐसे परस्‍पर सुख में मग्‍न थे रमा माधव जब ।

खिला सुख दूजा वह भी फीका करे पहला तब ।।१००।।

यथकाले जनी साध्‍वी रमा वह रमणीयशा ।

तनवा प्रसूता एक उरेक जो कुल का यशवर्धना ।।१०१।।

उस दिव्‍य शिशु, के जन्‍म पर हुई पुष्‍पवृष्टि नभ से ।

दिव्‍य विमानों के झुंड गगन में विचरने लगे ।।१०२।।

प्राचीन पूज्‍य ॠषि-मुनि आए देने आशीर्वचन ।

गाने लगे गंधर्ववृंद जो सुस्‍वर मधुरगान ।।१०३।।

मधुर चुंबनों से वत्‍सल वर्षा करे शिशु पर ।

उन माता-पिता का ध्‍यान कहाँ था नभ की ओर ।।१०४।।

पुत्र-जनम की उत्‍कट प्रीति प्रकट हुई जाग उठी ।

अयोध्‍या के अंत:पुर में दुंदुभि की गूँज उठी ।।१०५।।

तथापि रमामाधव के साधारण घर में थी ।

मूक वह उत्‍कट प्रीति पर असाधारण वैसी ही थी ।।१०६।।

स्‍तन में जब दूध भर आया पहली बार ।

शिशु ने छूआ स्‍तनाग्र को अपने मृदुलाधर से ।।१०७।।

नरम मृदु मंजुल उस स्‍पर्श से पल में रमा के ।

हृदय में ममता का हुआ तड़ि‍त संचार ।।१०८।।

क्‍या उसकी मधुरता कौसल्‍या सुख सम नहीं है ?

राजरानी हो वह क्‍या इसका सुख न्‍यून है ।।१०९।।

ख्‍यात पूर्वज जो मरे राष्‍ट्र संगर में उस कुल के ।

सपने में कहे 'मैं ही कोख में हूँ तेरे, बालिके' ।।११०।।

अ‍त: पुत्र का नाम रख 'शंकर' हे रमे ।

'उचित' 'उचित' तब सारा गाँव भार्गव कहे ।।१११।।

बालक ने पहली बार माँ करके पुकारा जब ।

ममता के आँसुओं से उसका आँचल भीगा तब ।।११२।।

माता को स्‍तनपान तथा पिता का चुंबन ।

हुआ सुगठित तन बालक का मुदित मन ।।११३।।

कर्णभूषण प्‍यारे डोले जब वह ठुमक-ठुमककर चलता ।

कभी अपने हाथों से माँ के मुख में ग्रास देता ।।११४।।

'घोड़ा-घोड़ा' खेलने तात को नहीं जाने देता काम पर ।

कभी उनके वस्‍त्र छिपाता, कभी राह रोकता द्वार पर ।।११५।।

बालक गुणवान् ज्‍यों-ज्‍यों बड़ा होने लगा ।

रमा का श्रेय प्रेय सब एक हुआ जीवन में ।।११६।।

पहलौटी ने जैसे शिशु को स्‍तनपान सिखाया ।

वैसे प्रीति-रीति, नीति का भी पाठ पढ़ाया ।।११७।।

शिशु हो गया योग्‍य और संतान प्रतिपालन की ।

जीवन-गंगा को सृष्टि को नव गति प्राप्‍त हुई ।।११८।।

बालक संवर्धन का व्रत रमा ने उस आस्‍था से निभाया ।

जैसे पावन सुव्रत क्रम आस्‍था से जाता है निभाया ।।११९।।

एक सुहानी भोर में पंछी चहचहाने लगे ।

नित्‍य की भाँति रमा ने शय्या त्‍याग किया तब ।।१२०।।

छिड़काव सम्‍मार्जन स्‍वयं करे था दासियों का ताँता ।

स्‍वयं हो गई सुंदरी सुस्‍नाता औ शुचिर्भूता ।।१२१।।

की फुलवारी जो उसने पिछवाड़े आँगन में ।

ईश-पूजा के लिए लगी तोड़ने फूल उसमें ।।१२२।।

फूलों की सुगंध में उषा की सुरंग में ।

तन्‍मयता से लगी देखने सृष्टि कौतुक पल भर में ।।१२३।।

फूल चुनते-चुनते मुखरित हुआ मंजुल गीत सोणा ।

मूर्तिमान भयी जैसे भोर-शांति की मधुर वीणा ।।१२४।।

लौटकर वहाँ से पति-पुत्र को जगाया धीरे से ।

देखते सकुशल उन्‍हें नयन भरे प्रसन्‍नता से ।।१२५।।

फिर निकट तुलसी के बैठी पूजा जप के लिए ।

बालक उसका उसे देखता प्‍यार भरी चितवन से ।।१२६।।

मैया की पूजा चलते छूने लगे उसे पल-पल में ।

अगरबत्‍ती धुआँ पकड़ने दौड़े बालक चंचलता से ।।१२७।।

फिर पुत्र को नहलाती रमा निर्मल उष्‍णोदक से ।

एकेक शब्द कहती ईश-स्रोत गवाती उससे श्रद्धा से ।।१२८।।

धीरे-धीरे खुलती कमल की एक-एक पंखुडी जैसे ।

उस पूर्णोत्‍फुल्‍ल कमल की शोभा देख चकित माली जैसे ।।१२९।।

वैसे देखत जननी कौतुक प्रिय आश्‍चर्य से ।

उत्‍फुल्‍ल हृदय में बालक की अर्थ-श्री विकसित होती ।।१३०।।

तुलसी को प्रणाम करवाकर वह सती उसको ।

खिलाती भोजन प्रेम से रमा अपने पुत्र को ।।१३१।।

शैशव में दूधभात तथा उसके आचार व्‍यंजन ।

थाली में जो दे मैया क्‍या है भला उसके समान ।।१३२।।

मिलता है भला कौन सा पक्‍वान्‍न जीवन में ऐसा ।

माँ का वह निस्‍स्‍वार्थ प्‍यार देता है कौन ऐसा ।।१३३।।

'अजी सुनते हो' सुहास्‍य वदना नारी मोहक ।

पूछने लगी पति से अपने एक दिन अचानक ।।१३४।।

पाँचवें जेठ में इस वर्ष पाँचवाँ वर्ष शंकर को ।

जन्‍मगाँठ पर उसके वनभोज का आयोजन करो ।।१३५।।

शंका, टीका टिप्‍पणियाँ हो गई इस प्रस्‍ताव पर ।

अंत में सभी ने इस प्रस्‍ताव को स्‍वीकार किया ।।१३६।।

दोनों ने वनभोजनार्थ सुंदर बसंत चुन लिया ।

रमामाधव ने सम्‍मान से मित्रजनों को निमंत्रण दिया ।।१३७।।

नाना पकवान बनाए निपुण युवतियों ने घर में ।

अपने साथ ले आईं वे उस शुभ दिन में ।।१३८।।

मंगल वाद्यों की मंगल ध्‍वनि से प्रभात निनादित भया ।

छकड़ों को भी फूल-मालाओं से सजाया गया ।।१३९।।

गाड़ि‍याँ चलतीं अचानक हिलकोले खाती जब ।

टकराते नरनारियाँ हँसी के फव्‍वारे छूटते सब ।।१४०।।

खेत अनाज से भरे-पूरे पशु-पक्षी, फल-फूल पाता ।

राह चलते सौंदर्य वस्‍तुओं का भंडार देखता ।।१४१।।

शंकर सत्‍वर जिज्ञासावश किसी वस्‍तु का नामगुण पूछाता ।

कभी किसी वस्‍तु को निर्देशित कर प्रमुदित होता ।।१४२।।

चरमराते छकड़े जब दौड़ते वन में खेतों में ।

पक्षियों के झुंड गीत गाते रड़ते नभ में ।।१४३।।

मैया री ! उड़ सकेगा मानव कभी ऐसे व्‍योम में ?

पूछता शंकर प्रेम से माता उसे समझाती शांति में ।।१४४।।

दिए ईश ने पंख पाखी को नच मानव को बालक ।

न वा पंख घड़ाने आ विमानीय हमें नए कारक ।।१४५।।

संचित बालक पल भर, किंतु तुरंत बोले उक्ति ।

क्‍यों न मानव करता ऐसी सुलभ उड़ान की युक्ति ।।१४६।।

बैलों के बदले बला-बला सा ऐसा ।

पंछी पकड़कर उसे गाड़ी को बाँध दे ।।१४७।।

उड़ाकर उछे नीचे लगाम पकलकल ।

फिर भीतल बैठे लोग क्‍यों न उड़ेंगे ऊपल ।।१४८।।

कूक कोयलों की दमर से आई चहचहाट वणिक्‍तती ।

आम्रवन विभव को बखानकर ग्राहकों को पुकारती ।।१४९।।

आओ पांथस्‍थ ! इस पर्ण-मंदिर में आओ तो ।

बसंत बहार देखे अंबागन में ही भली देखो तो ।।१५०।।

माध्‍याह्न की गरम वायु से तन सारे तप्‍त हुए ।

भिलनियाँ वन से यही आतीं तृषा-शमन के लिए ।।१५१।।

आम्र-वृक्ष के पके फल हैं सुधारसपूर्ण ऐसे ।

त्‍यज सत्‍फलों को ये आम्रवृक्ष सोहत-योगी-मुनि जैसे ।।१५२।।

तन को शीतल करे छाया यहाँ और निर्मल झरना ।

रिझाती कोकिल-मैना गाकर आम-रस अमृत पीना ।।१५३।।

शैशव में शिशु, को मैया विरह में पिया को प्रिया ।

मोद से भर दे अमराई तीव्र ग्रीष्‍म में छाया ।।१५४।।

पुष्‍ट कृषक आए करे आगवानी उनकी ।

भेंट चढ़ाए ताजे फलमूल अति उत्‍सुक की ।।१५५।।

पूछत तुरंत, माँजी दर्शन करो सत्‍वर हमें ।

हमरे नन्‍हे जागीरदार बोलो हैं कहाँ कहो हमें ।।१५६।।

कंधे पर उठाकर शंकर को नाचने लगा कोई ।

और उससे नर्म-विनोद में मग्‍न हुआ कोई ।।१५७।।

नर-नारियों का झुंड अमराई में स्‍वच्‍छंद विहरता ।

संपूर्ण दिवस उनका था मोद भरा मन में प्रसन्‍नता ।।१५८।।

पीले-पीले सुंदर सुगंधित मधुर रस से भरे-भरे ।

चखे रस आमों का कि निहार शोभा निश्‍चय न करे ।।१५९।।

कँटीले कटहल लटकते मधुर कोयों के संग ।

बिना स्‍वाद लिये मधुरता का कैसा हो अंग ।।१६०।।

जिस स्‍थान पर एक ही वृक्ष को फल लक्ष-लक्ष ।

उसी स्‍थान पर बिना दाने के मरता है मनुज ।।१६१।।

सब जन चखते रसभरे मीठे आम और कोयें ।

कभी-कभी मजे से ताजे रसदार जामुन खाए ।।१६२।।

गुलाब पुष्‍पों की माला गूँथे, कभी गले में डालते ।

कहीं मयूर नृत्‍य देखते कभी कोमल बाग देखते ।।१६३।।

पंक्ति सजाए नाना विध पकवानों से सादर रसीले ।

साथ करते हास्‍य के नर्म-विनोद चरपरे चुटकुले ।।१६४।।

मोदमय वातावरण में शांति भरा ऐसा सीधा सरल सा ।

इन जनों का दिन बीता निरामय सात्विक उत्‍सव सा ।।१६५।।

उस ईश्‍वर को, जिसने दिया यह दिन स्‍मरते हुए ।

भावुकता से श्रद्धालुओं के नेत्र भर-भर आए ।।१६६।।

दिनकर ने अब संध्‍या शिविर में प्रवेश किया ।

औ' सृष्टि के दिन क्रमों का बंधन शिथिल किया ।।१६७।।

यहाँ-वहाँ चारा वा सुजल पीने के लिए विचरति ।

वियोग हुआ तनिक प्रिया का जो स्‍वच्‍छंदे संप्रति ।।१६८।।

नीड़ जाते ही निद्रा के लिए थके-माँदे बुलबुलं फाँहकवा ।

गाढ़ालिंगार्थ' चली आ चली आ' प्रिया का बुलावा ।।१६९।।

मुराले मंजुल सुनते चलीं दुधारु गौएँ घर ।

दारका नदी के निकट रुकीं जल पीने पल भर ।।१७०।।

जल पीते-पीते बछड़ों की आर्त-ध्‍वनि कानों पर पड़ी ।

सुनते ही उनसे मिलने ममता उनकी उमड़ पड़ी ।।१७१।।

असंयत होकर स्‍तन से उनके मंदोष्‍ण दुग्‍ध धाराएँ ।

बहने लगीं झर-झर हुआ मिलन मैया दारका के जल से ।।१७२।।

नीलश्‍वेत गंगा-यमुना जैसी मैया दारका सोहत ।

भार्गव ग्राम की सुंदरता जैसी प्रेम प्रयाग सोहत ।।१७३।।

संध्‍या सृष्टि की करुण-रम्‍य शोभा को जब आया निखार ।

तब संघ नर-नारियों का लौटा गाँवकी ओर ।।१७४।।

लौटे गाँव में पर गाँव में रखते ही पग अपने ।

घिर गए सब जन चारों ओर छाए सूनेपन ने ।।१७५।।

नेत्र चंचल सभी के गति सत्‍वर बावली ।

हँकवा करते कहीं-कहीं कानाफूसी पलपल में ।।१७६।।

जैसे भयभीत बावरी हिरनियों के झुंड में जरूर ।

घुसा है कोई हिंस्र श्‍वापद महा खूँखार ।।१७७।।

जैसे-तैसे तथापि वन भोजन मंडली वट के ।

परकोटे से निकट आई उस चबूतरे के ।।१७८।।

अचानक सामने उनके संगीनें तानकर ।

आते देख दल पाखलों के भर-भर ।।१७९।।

क्रोध भरे शब्‍द ही जिन से जन साधारण कंपित होता ।

शस्‍त्र तानकर आए दुष्‍टों पर किसका बस होता ।।१८०।।

हताश गाँव शरणागत बन उन दुष्‍टों की ।

आज्ञा से पूर्व ही हाथ जोड़कर खड़ा हुआ ।।१८१।।

कंपित स्‍वर से पूछे सब क्‍या हुआ ? क्रोध क्‍यों ?

पर प्रश्‍नसमाप्ति से पहले म्‍लेछो ने घेरा रमा-माधव को ।।१८२।।

और दोनों को बेदर्दी से दो क्रूर सैनिकों ने उसी क्षण ।

आव-न-ताव देखे बेदर्दी से घसीटा बेझिझक ।।१८३।।

गौर नायक जो बैठा या चबूतरे पर शान से ।

पटका सम्‍मुख उसके सर्प-बिल में मछली जैसे ।।१८४।।

अकस्‍मात् गदाप्रहार सर पर होते ही तैसी ।

रमा सती मूर्च्छित हो परस्‍पर्श से ऐसी ।।१८५।।

हो दु:खांत उसका ऐसा उसके दु:ख से कुपित ।

हो माधव जिसके क्रोध में उसका दु:ख हो अस्‍त ।।१८६।।

छाटने पर भी बेला चमेली फूल लटके उसपर ।

वैसे अबोध शिशु, चिपका बेसुध रमा के तन पर ।।१८७।।

कुपित गौरनायक ने पूछा, 'तेरा नाम क्‍या ?'

क्रुद्ध माधव प्रतिप्रश्‍न करे, 'साहसी तू है कौन' ।।१८८।।

गौरे ने उठकर एक क्रॉस ऊँचा उठाया ।

जैसे क्रुद्ध सर्प ने अपना फन ऊँचा उठाया ।।१८९।।

'अरे मूर्ख' जानो, हूँ मैं एक सेवक विनम्र सा' ।

उस प्रभु का, जिसका देवदूत भी गाते चरण-यशा ।।१९०।।

और क्रूस पर उस जो पवित्र प्रतिमा भली ।

उस दयाघन प्रभु के प्रियपुत्र की महान् ।।१९१।।

उस करुणाघन ईसा मसीहा की प्रतिमा को ।

चूमकर आगे कहत वह भक्ति गद्गद ।।१९२।।

उस प्रभु कार्य का विनम्र सेवक दीक्षित ।

अंतुनिया मैं करता सर्वस्‍व प्रभु चरण में अर्पित ।।१९३।।

उस प्रभु का पवित्र संदेश सारे विश्‍व में ।

सब पाखंड का खंडन कर दंडित करके ।।१९४।।

धर्मराज की पोपाज्ञा पुनीत देखो इस कर में थामे ।

पुर्तुगीज राज की राजाज्ञा उस कर में थामे ।।१९५।।

कहो मूढ, आज धर्म के नाम पर, आज्ञा भंग से ।

खुलेआम ये पाखंडकर्म तूने किए कैसे ? ।।१९६।।

कहे माधव न धर्माज्ञा ना ही राजाज्ञा का भंग ।

न मैंने किया, न वा पाखंड कर्म किसी के संग ।।१९७।।

'झूठ !' दहाड़ा अंतुनी सत्‍वर, थर्राए सभी ।

संबोधित कर कहे गाँव धुरीणों को सुनो सभी ।।१९८।।

अरे पतितो ! क्‍या सुनी नहीं कभी घोषणा बोलो ।

हिंदुओं के धर्मकृत्‍य जो सरेआम करे ।।१९९।।

उन पापियों औ' सहायकों उनके जलाएँ आग में ।

ईसाई धर्म के एवं हमारे शत्रु समझकर ।।२००।।

क्‍या तुमने कभी देखी नहीं गगन में प्रतिदिन ?

ऐसे पापी पाखंडियों की उठती लपटें दहनाग्नि की ।।२०१।।

हो भयकंपित जन मौन रहे दे न सके उत्‍तर ।

हाँ या ना तो कुपित अंतुनी दहाड़ा फिर ।।२०२।।

बंधु या भगिनी अथवा सुत या तुम्‍हारी सुता ।

बिना जलाए व्‍यथा कैसी भई समझ पाओगे ।।२०३।।

ऐसे गरजते जिस हाथ में था क्रूस पवित्र ।

उसी हाथ में चाबुक थामे झपट पड़ा माधव पर ।।२०४।।

बोल ! तूने खुलेआम धर्म कृत्‍य किया नहीं बैरी ?

किया नहीं ? अथवा उधेड़ दूँ मैं चमड़ी तेरी ।।२०५।।

बोल ! बोल ! ऐसे पूछे क्रोध से तार सप्‍तक में ।

कोड़ों के प्रहारों के साथ जैसे क्रूर ताल ग्रहण करे ।।२०६।।

मुख, हस्‍त, पाद, मस्‍तक से लहू के फव्‍वारे छूटे ।

पर 'उफ' नक नहीं किया माधव ने उसका भी धीरज ना छूटे ।।२०७।।

जन्‍म दिवस के शुभदिन पर धर्मकृत्‍य कर्तव्‍य हो ।

उत्‍सव में कोई उन्‍हें न धर्मकृत्य मानता* ।।२०८।।

_____________

* जन्‍म दिवस के समारोह को कोई धार्मिक कृत्‍य नहीं कहता । इन लोगों के साथ पुत्र-जन्‍मोत्‍सव के उपलक्ष्‍य में मैंने कोई धर्मकृत्‍य नहीं किया ।

कार्य में धर्मकृत्‍य हो ! तथापि सहित जन ।

पुत्रजन्‍मोत्‍सव किया न कोई धर्म कृत्‍य ।।२०९।।

माधव ऐसा उत्‍तर दे खरा-खरा बार-बार ।

चाबुक प्रहारों से उड़ती लहू की पिचकारियाँ ।।२१०।।

केवल दल तीस थे पाखलों के शस्‍त्र सहित ।

और ग्रामीण जन की संख्‍या तीन सौ से अधिक ।।२११।।

तथापि सम्‍मुख सभी के क्रूर कृत्‍य हो रहा था ।

चाबुक के प्रत्‍येक प्रहार के साथ लहू का फव्‍वारा उड़ा था ।।२१२।।

देखें यह बेचैन सभी पर साहस ना एक भी करे ।

होते हुए भी बहु पर एक का उस हाथ ना धरे ।।२१३।।

मुख-मस्‍तक, पाद-पीठ पर हो रहे घाव एकेक ।

तो भी न हो रही थी शमित गोरे की क्रूरता ।।२१४।।

स्‍वभक्‍त से बहाए लहू से सुस्‍नात जो हो रही ।

क्रूसस्‍था वह दयाशीला ईसा की प्रतिमा सही ।।२१५।।

तदनंतर रिक्‍त वैसा ही वह जैसा पात्र अभिषेक का ।

चाबुक नीचे रखकर नीचे देखत स्‍नातमूर्ति का ।।२१६।।

रूमाल लाता और पोंछता उसे पुन: ।

भक्ति भाव से उसे चूमकर बोले गद्गद जना ।।२१७।।

'अरे पतितो ! अब तो स्‍वीकारो सत्‍य यही ।

यश ईसा को छोड़कर सब पाखंड असत्‍य वही ।।२१८।।

तो फिर तुम्‍हरे पापों को क्षमा करने प्रभु से ।

और पोप से हम करें प्रार्थना अनुरोध से ।।२१९।।

अन्‍यथा कसम ईसा की खाकर कहता हूँ ।

एक ही हिंदू यहाँ से जीवित ना जा पाएगा ।।२२०।।

तम की कालिमा अब छा रही सृष्टि पर ।

उसमें गुप्‍त हो बोले-उसकी ही जिह्वा जैसी* ।।२२१।

पूर्वभीत होकर भी गए जन भी क्रम से ऐसे ।

रिक्‍त दु:ख में से जीवित कुलबुलाहट में ।।२२२।।

था वह भागने का इरादा तब उन पतितजनों को ।

घेरकर रोकने की योजना बनाए गौराधिपति तत्‍क्षण ।।२२३।।

______________

* उसकी वाणी मात्र सुनकर देती थी मानो तमोग्रस्‍त सृष्टि की जिह्वा ही बोल रही हो ।

जहाँ खून से लथपथ माधव पड़ा चबूतरे पर ।

पहरेदार सैनिक स्‍थापित किया वहाँ सत्‍वर ।।२२४।।

ऐसा प्रबन्‍ध करते उसने सब जन रोकने का ।

वह स्‍वयं और जनों को पकड़ने चला गया ।।२२५।।

सभी को रोकने-और सभी को ही इधर अहा ।

कोई साहसी बनकर अँधेरे में से खिसक गया ।।२२६।।

साहसी और दो-तीन झट से तीर से ।

घुसे चबूतरे में सर्प के बिल में जैसे ।।२२७।।

और अचानक उस एकाकी सैनिक पर ।

मारा झपट्टा कंठ पर जैसे पक्षीराज उरग पर ।।२२८।।

गुपचुप उस सैनिक को मूर्च्छित करते तत्‍क्षण ।

माधव, पुत्र तथा पत्‍नी को उठाकर हो गए हिरन ।।२२९।।

गाँव के अन्‍य मुखियों को पकड़कर गौराधिप।

लौटा चबूतरे पर लेकर इक जलता दीप ।।२३०।।

दीपालोक में देखा क्‍या राज्‍यपाल अंतुनी ने ।

मूर्च्छित बंदियों के स्‍थान पर था मूर्च्छित बंदीप ।।२३१।।

'दगा ! दगा ! पकड़ो, भागो' गरजत क्रोध भरे भय से ।

सम्‍मुख आए प्रत्‍येक को उसने लगा पगलाकर ।।२३२।।

देखते-देखते भय बँध टूटकर बहने लगा ।

रेत का बाँध तोड़कर जन प्रवाह बढ़ने लगा* ।।२३३।।

स्थिति का जायजा लेकर सूज्ञ अंतुनी पीछे हटा ।

प्रतिशोध मन में, पूँछ पर आघात किए साँप-सा ।।२३४।।

गाँव के धुरीणों को बाँधकर रात की वेला में ।

निज सैनिकों संग आश्रमार्थ चौकी में गया ।।२३५।।

केवल तीस रिपु को सौंपकर गाँव के अग्रणियों को ।

जान बचाकर ग्रामीण तीन सौ भागे दुम दबाकर ।।२३६।।

वह काली रात ! तीव्र यंत्रणा दी जाती उन बंदियों को ।

हंटर टूटे जब कोडों की बरसात हुई ।।२३७।।

______________________

* रेत का बाँध तोड़कर जिस तरह पानी का प्रवाह बहता है, उसी प्रकार भय मुक्‍त होकर सैनिकों का घेरा तोड़कर जनप्रवाह घरों की ओर बढ़ने लगा ।

रक्‍तरंजित वह । जैसी नागन डसती जनों विषैली ।

वह भीषण रात्रि ! वह अति आग । हिंसक गरजनों की भरी ।।२३८।।

हे प्रभो ! नित्‍य स्‍मरण इन लोगों ने अभी किया ।

तुरंत भाग्‍य में यह घोर रात, ऐसा क्‍या पाप किया ।।२३९।।

वह सौम्‍य रात ! निद्रिस्‍त इस मठ की छाया में ।

जुगाली करती किसी हिरनी सम है शांति ।।२४०।।

निश्चिंत मन से निद्रिस्त पाखी हरसिंगार पर ।

जैसे जहाँ में पासी का नामोनिशान भी न रहे ।।२४१।।

शांत कोमल गीतों का शीतल स्रोत झरे ।

सौम्‍य रात्रि में शीतल चाँदनी में संगीत समाए ।।२४२।।

अर्चना से अपनी तुष्‍ट किया शिवशंकर को ।

फूटे प्रेम के झरने चंद्रकांत के हृदय में* ।।२४३।।

साधु के हृदय में जो इस मठ में विराजमान ।

'आप कहाँ से ?' पूछते ही कोई खिली सहज मुसकान ।।२४४।।

अव्‍यक्‍ता‍दीनि भू‍तानि व्‍यक्‍तमध्‍यानि भारत ।

अव्‍यक्‍तनिधनान्‍येव तत्र ज्ञेया कथं गति: ।।२४५।।

'धाम कहाँ ?' 'वहाँ, बेटा जीव रमे जहाँ राम में ।

यद् गत्‍वा न निवर्तन्‍ते तद्धाम परमं च मे ।।२४६।।

आया एक दिन बसा आज यह और भविष्‍य में ?

जिसका हृद्गत न होई अन्‍य वा न ज्ञात उसे भी ।।२४७।।

स्‍वयं न किसे बुलाए पर उसे आते ढूँढ़ते जन ।

जैसे खिले कमल की ओर मुग्‍ध भँवर आप ही भागे ।।२४८।।

भार्गव में साधु के संग, मठ में आए जो वह ।

घोर रात्रि भी संगीत चाँदनी से एकरूप हुई** ।।२४९।।

शंकर भगवान् की पूजा से भी संतोष न मिला ।

तो साधु उसी आरती को दोहरा रहा बार-बार ।।२५०।।

_______________

* उस स्निग्‍ध वातावरण में बैठे हुए अमृत हृदय एक ऋषि अपनी अर्चना से प्रभु शंकर को रिझाकर ऐसे चमक रहे थे जैसे चंद्र को पाकर चंद्रकांत मणि अपनी किरणें फैला रही हो ।

** रमा माधव के कारण भीषण बनी रात्रि मठ में प्रवेश करते ही संत समागम से मानो कैसी प्रसन्‍न, सौम्‍य तथा शांत हो गई ।

(धुन-राम स्‍मरे राम)

आरती से आरती का भगवन्

दीप तुझे । उतारूँ रे ।।

आँगन में गगन के तेरे

सहस्र सूरज का दीपोत्‍सव

जलाते ये पथ पर अपने करें संपन्‍न ।। उतारूँ रे ।।

सहस्र सूरज जो शेष :

पथिक से ही हो स्‍फुरण

नयनों में ऐसा किंचित् तम ही भला ।। उतारूँ रे ।।

माता की ही बगियन से

ताजे-ताजे चुनकर फूल

गूँथे वेणी बालिकाएँ माँ की वेणी से फूल ।। उतारूँ रे ।।२५१।।

गाते-गाते शांत होकर कर जोड़कर बैठे ।

भोलापन मूर्तिमान् शिव सम स्मित करे ।।२५२।।

एकाएक वहाँ किसी का आर्त कराहता स्‍वर ।

सुना, 'महात्‍माजी ! साधो !' करुणा से भीगा ।।२५३।।

भला अमंगल का प्रवेश कैसा हो शिवालय में ।

साधु जो इस भाव से निश्चिंत सदा चौंका पुकार से ।।२५४।।

हाय ! कौन है तू ? क्‍या हुआ तुझे ? आगे आ, बोलो ।

आर्ता अंकी हो साधु गृहे स्‍वयं सिसकी भरे ।।२५५।।

रमणी एक देखी काँपती पुष्‍पलता-सी कंपित ।

इक मुरझाए फूल-से बालक को गोद उठाए खड़ी ।।२५६।।

बलवान् निडर पर विनम्र वीर तीन खड़े ।

पीछे उसके, सब सपना सा, साधु अवाक् रहे ।।२५७।।

असह्य शांति सहकर कुछ क्षण करे भंग ।

अग्रणी वीर अंत में आगे बढ़ा कुछ पग ।।२५८।।

विनम्रता से दोनों कर जोड़कर खड़ा ऐसा ।

शत्रु दुर्घर्ष भी किचिन्‍नतचाप गुणी जैसा ।।२५९।।

'प्रणाम विनम्र' कर बोले सुस्‍पष्‍ट वाणी से ।

अभय-याचना करते कहे रामकहानी संक्षेप में ।।२६०।।

हिरणों के झुंड पर कैसे उस दिन अचानक ।

व्‍याघ्र ने झपट्टा मारा खूँखार क्रूर हिंसक ।।२६१।।

दबोचा व्‍याघ्र ने माधव को पर तिकड़ी ने इस ।

ग्रासित व्‍याघ्र को निगलने नहीं दिया शक्ति बल से ।।२६२।।

दु:खी-दु:ख से उनके तदाकार ही सत्‍वर ।

साधु एकरूप हुए जेसे जल में मिले जल ।।२६३।।

घायल तन को उनके दी सुख सात्विक औषधी ।

उनकी पीड़ि‍त आत्‍मा को दी सुख सात्विक औषध* ।।२६४।।

कष्‍ट माधव का कम हुआ रमा के मन में भी ।

उत्‍पन्‍न हुआ विश्‍वास तो निद्रा सहलाती बालक को ।।२६५।।

कहत वीर अग्रणी साधु से, अच्‍छा हुआ सब यहाँ तक ।

अभयदान के आप के सत्‍य ही हमरा धीरज बढ़ा ।।२६६।।

पर देखें कर्तव्‍य आगे का प्रभु निभाते कैसे ।

कौन राखे खरगोश को चंगुल के बाज से ।।२६७।।

शंभो ! शंकर ! करो विश्‍वास पूरा उस पर ।

बिना उसके जगत् में कौन किसका रक्षक है ? ।।२६८।।

महात्‍मन् ! सत्‍य है वह सब पर क्‍या सत्‍य नहीं ।

कि उसके बिना जगत् में कौन किसका भक्षक करे ।।२६९।।

प्रभु की माया अतर्क्‍य उस अर्थ कौन कहें ?

बाज से कहे झपटो और खरगोश से भागो ।।२७०।।

सूक्ष्‍मो ही भगवान् धर्म : परोक्षो दुर्विचारण : ।

अत: प्रत्‍यक्षमार्गेण व्‍यवहार-विधिं नयेत् ।।२७१।।

यदि रातोरात किया न कुछ सदुपाय ।

तो साधो ! ब्राह्मण सदेह जला जाएगा ।।२७२।।

हाय ! इस सती को तथा सुलक्षणी बालक को ।

तनिक दया न करेंगे जीवित जलाने में ।।२७३।।

रातोरात इन्‍हें किसी अन्‍य सुरक्षित स्‍थल ।

तो जाने के सिवा सूझे न कोई उपाय दूजा ।।२७४।।

भला अन्‍य सुरक्षित स्‍थल कैसा हिंदू जना ।

रणधुरंधर बाजीराव के कृपाण रक्षित राज्‍य बिना ।।२७५।।

अत: शीघ्र ही अश्‍व लाकर उनपर ।

बिठलाकर इन तीनो को हम तीनों सत्‍वर ।।२७६।।

________________

* अपने दिव्‍य ज्ञान के तात्त्विक हितोपदेश द्वारा उनकी पीड़ि‍त आत्‍मा को भी सांत्‍वना दी ।

एक ही दौड़ में वायुवेग से वहाँ पहुँचाएँ इन्‍हें ।

राष्‍ट्रशक्ति केसर ध्‍वज भवानी का जहाँ डोले ।।२७७।।

ना मानूँ श्रद्धा भक्तिमात्र से इनकी रक्षा होगी ।

सोमनाथ भला क्‍यों अनाथसम कंपित हुआ ।।२७८।।

अरे बावले, क्‍या कहता है, देखो विश्‍वास करके ।

साक्षात् मृत्‍यु भी क्‍या बिगाड़ेगी उस मार्कंडेय का ।।२७९।।

पुत्र, शंका द्वेषवर्धिनी तो श्रद्धा है दयाघनी ।

शत्रु की बात क्‍या, भक्ति से पसीजता पाषाण भी ।।२८०।।

आने दो कल अंतु‍नीया को यहाँ उसे मैं सब ।

सत्‍यकथा कहूँ तो पसीजे मन अवश्‍य उसका ।।२८१।।

शस्‍त्र की भाषा का उत्‍तर मिलता है द्वेष से ।

सत्‍य की बोले भाषा उत्‍तर मिले दया से ।।२८२।।

सत्‍य की ही भाषा नहीं थी क्‍या हमरी विवशता वश ।

कंपित कंठी रमा वदे जैसे वंशी से सूर बजे ।।२८३।।

क्‍या बिना सत्‍य के हमने अन्‍य कुछ कहा भगवान् ?

पुत्रजन्‍मदिनोत्‍सव किया तो कौन सा पाप किया ।।२८४।।

सत्‍य जब कहने लगे तो दया तो दूर रही ।

पशु से भी बदतर उन पशुओं ने मुझे घसीटा ।।२८५।।

प्राण यदि वे मेरे लेते तो दु:ख न इतना होता ।

पर इन संकेत अँगुली से माधव प्रति दिखाती बाला ।।२८६।।

पर मेरे इन प्राणों से भी प्रिय जनों पर हाय !

हाय ! हाय ! कैसा यह भीषण कठोर आघात ।।२८७।।

धीरज जन लज्‍जा का बाँध तोड़ बह गया ।

जो अद्यापि महत्प्रयास से उसने रोक लिया ।।२८८।।

अपने ही आँसुओं की बाढ़ से हाय-हाय करते ।

वह सती ढह गई जैसे कदली का पेड़ गिरे ।।२८९।।

और पिया ! पिया ! पुकारे बाला गला फाड़कर ।

गिरी पति की गोद में विलापिनी पति को पुकारकर ।।२९०।।

देवी ! बेटी ! ध्‍यान दे अपने इस पुत्र पर ।

वीर साधु दोनों देने लगे समझ सांत्‍वना भर ।।२९१।।

झुलसी सुखी लता पर जल सिंचन जैसे ।

आँसुओं से सूखी जीभ सींचती बाला दीना ।।२९२।।

अंतुनीसम सर्प बिल में मत ढकेलो मुझे ।

दया करो मुझ पर मत बनो ऐसे कठोर ।।२९३।।

बेटी ! बेटी ! सहलाते उसे मुनिवर कृपालु ।

सौम्‍य स्मितसिक्‍त करुणार्द्र वाणी से कहे ।।२९४।।

आत्‍मा सर्वव्‍यापी आत्‍मा प्रेम ! प्रेमबल से डाटा ।

क्‍या अंतुनी बोले, होंगे सर्प स्‍ववश महा ।।२९५।।

ऐसे बतियाते कुछ दूर तक पग उठाते ।

वासुकी ! वासुकी ! पुत्र प्रेम से मधुर हाँक देते ।।२९६।।

बिल से एक साँप सुस्‍त सा फन डुलाता ऐसे ।

निकला बाहर न्‍यूनता से वासना जैसे ।।२९७।।

'आ ! आ ! जानत मैं तू बहुत भूखा होगा।

पर अतिथि ये आए हैं आज तेरे द्वार पर ।।२९८।।

उनकी सेवा में था मैं तनिक तो पूजा हो चुकी ।

पर भोग चढ़ाई दूध कटोरी देनी रह गई ।।२९९।।

तब आगे-पीछे बलखाते करते सरसराहट ।

बढ़ गया सर्प साधु के पदों को गया लिपट ।।३००।।

रखा सामने उस भुजंग के दूध मुख सम्‍मुख ।

मुसकाते साधु देखे अतिथियों को विस्मित ।।३०१।।

जिह्वा लपलपाते फन करता ऊँचा बार-बार ।

पीता दूध प्रेम से खेले आमोद-केलि ।।३०२।।

पीया दूध सर्प ने प्रेम से दु:ख ही सुख समझकर ।

पीकर रिक्‍त किया पात्र जैसे सगम कौतुक भर ।।३०३।।

हो तुष्‍ट मन में दूध पीकर जी भरकर ।

लिपटकर शिवलिंग से भुजंग डोले फन उठाकर ।।३०४।।

'वाह !' हँसकर बोले साधु आयु का दुग्‍ध पात्र किया रीता ।

मृत्‍यु ही मानो स्‍वयं मृत्‍युंजय के सर पर छत्र धरे ।।३०५।।

सर्प नहीं यह, जब एक ही धारा नाचे झरे ।

उस प्‍याले से हलाहल के भगवान् प्राशन करे ।।३०६।।

(उस दृश्‍य से मुनि को केवल काव्‍य ही स्‍फुरण नहीं हुआ, अपितु वह गाने भी लगा- )

पद

हलाहल पिया । जो तुमने, हलाहल पिया ।

प्रभुजी, देखो न बूँद एक नीचे गिर गई,

उपाय योजन करे तू कोटि-कोटि ।।

शमनार्थ रे ! सुख-दु:खों का हलाहल ।

शतसूर्य लताओं के सोमपुष्‍प नवनव ।।

लाकर अमृतार्द्र निचोड़े मस्‍तक पर ।

फिर फेंकते हो सदा निर्माल्‍य बनाकर ।।

चंद्रमौलि भोला । पर । चंद्रमौलि भोला ।

अमृतता की बूँद एक नीचे झरी* ।।१।।

देवदेव ही तू । ईश्‍वर । देव देव नही तू ।

इन दीन-दु:खियों को करनी नहीं स्‍पर्धा तुमसे ।

अमृतवल्‍ली रहे । तुम्‍हारी । अमृतवान्‍नति रहे ।

बूटी विवेक की थोड़ी सी अनुपानार्थ** दे दो ।।

जलाए विश्‍व को ! देखो । जलाए विश्‍व को ।

सुख-दु:ख के हलाहल का बिंदू जो झरा ।।३०७।।

ज्‍यों-ज्‍यों मंजुल ताल के संग भक्‍त हँसता ।

अहा ! मृत्‍युंजया ! मृम्‍युंजया ! शंकरजी अहा ।।३०८।।

(संचारित) भावावेश से हो विकसित आत्‍मशक्ति ।

डाले सब जनों पर वह अद्भुत मोहिनी-शक्ति ।।३०९।।

मुग्‍ध विषधर बार-बार फन डुलाकर अपना ।

ईश स्‍तुति स्‍तव मानो देता अनुमोदना ।।३१०।।

आभास निर्भयता का रमा को, माधव को अनुभूति ।

जैसे कोई उसके घाव पर डाले शीतल औषधि ।।३११।।

बालक शंकर मीठी नींद में देखे सपने मधुर ।

दिवा-स्‍वप्‍न सा सोचे जागृति में भी वह वीर ।।३१२।।

दूर कहीं से शोर अचानक सुनाई दिया ।

भविष्‍य के संकट का पदरव कान में पड़ा ।।३१३।।

वीर होकर सावधान तुरंत बोले साधु को ।

'सुनो ! सुनो' आया शत्रु इन्‍हें ढूँढते हुए ।।३१४।।

आत्‍म-बल पर आपके सत्‍य है मेरा विश्‍वास ।

पर आत्‍मबल की भी सीमा है देह-बल सम ।।३१५।।

__________________

* निर्माल्‍य : देवता प र चढ़ाए हुए फूल आदि को विसर्जन के बाद निर्माल्‍य कहते हैं ।

** अनुपान : दवा के साथ या दवा खाने के बाद ली जाने वाली वस्‍तु ।

आत्‍मबल से आपने एक सर्प वश में किया ।

पर क्‍या सहस्र नरसर्प होंगे भयंकर वश में ।।३१६।।

होगा भी माना, पर ऐसे प्रयोगार्थ सत्‍य ही ।

तीन जीव बलि चढ़ाना होगा यशवर्धक ? ३१७।।

तथापि सारा बोझ अपने सर पर उठाएँ भला ।

अवश्‍य ले पर मैं ना लूँ भई भय के कारण ।।३१८।।

हँसकर बोले साधुजी, पुत्र ! इन तीन जीवों का ही नहीं ।

तो शिव के जीव मात्रों का भार शिव हो शिव पर ही ।।३१९।।

भक्ति भाव के आगे माना व्‍यर्थ हो सब औषधी ।

साधो ! तो घाव पर माधव के क्‍यों बाँधी जड़ीबूटी ।।३२०।।

इस बूटी को शंकर बाँधे घांवों में जैसे ।

बाँधे अंतुनी के हृदय में प्रेम-बूटी वैसे ।।३२१।।

सुनकर यह वीर रमा-माधव की ओर घूमकर ।

बोला- 'लगे यदि साधु भाषण आपको उचित ।।३२२।।

तो लेता हूँ आज्ञा आप से, भला हो आपका ।

निष्‍ठा सिद्धि से करें सेवा साधु पद की ।।३३३।।

बोल ही रहा था कि धड़धड़ाते द्वार को ।

आँगन में अंतुनी का गौर सैनिक कोई ।।३२४।।

जिसे देखते ही गौरा रमा कदली सम ।

कंपित हो कहे- 'वीर ! साधो ! राखो हमें ।।३२५।।

'धीरज रखो !' साधु कहे परिपाठवश सत्‍वर ।

आगतों के स्‍वागतार्थ वह आँगन में आया ।।३२६।।

वीर शीघ्र उन तीनों को निकट कोठरी ले गया ।

जाकर वहाँ वहाँ का दीप शीघ्रता से बुझाया ।।३२७।।

मन में अंतुनी समझकर उस सैनिक को ।

संत उसे 'अंतुनी बेन आ जाओ 'कहे ।।३२८।।

चौंका गोरा मन में, नाम हुआ ज्ञात इसे ।

निश्‍चय ही माधव कथा भी ज्ञात होगी इसे ।।३२९।।

यही अपना नाम दिखाऊँ, देखो क्‍या कहता है ।

सोचत मन में बोले शुद्ध महाराष्‍ट्री में सत्‍वर ।।३३०।।

साधो ! जनों से सुनी आपकी अंतर्ज्ञान महिमा ।

है सत्‍य वह, अहा ! केवल दर्शन मात्र से ।।३३१।।

नहीं पुत्र, किसी अन्‍य से ज्ञात हुआ मुझे ।

ज्ञात शिव नच मैं ! आ तू शिवदर्शन करो ।।३३२।।

आओ भीतर, देख मूर्ति शिव की शुभंकरा ।

प्रेम गद्गद हो वंद्य महेश्‍वर को वंदन कर ।।३३३।।

देखकर शिवलिंग गोरे की छूट गई हँसी ।

एक मूषक तब उसपर चढ़ बैठा था ।।३३४।।

महाराज, जो ईश चूहे का भी न कर पाता निवारण ।

कैसा लाभ होगा सेवा उसकी करके सदा ।।३३५।।

अरे मूढ़ ! पूज्‍य पिता का चित्र काटते-काटते ।

क्‍या कट जाता है पिता, चित्र काटते-काटते ।।३३६।।

क्‍यों करे परम पिता प्रेमल संतानों का निवारण ।

तन पर चढ़ती प्रेम से वे तो, न कि बलात् ।।३३७।।

पद

ब्रह्म योनि में महेश्‍वर वीर्य रख चंडिका ।

जगत् की जननी पीडिका ।।

गर्भवती का दिगुदर दस दिशा फूली पल भर में ।

होने लगीं काल वेदनाएँ ।।

ब्रह्मांड का पिंड तब प्रसूत हो आज ।

कोख से उसकी सब ही ईश प्रजा ।।

मूर्ति जो-जो कृमि से कार्तिक तक ।

सबहु उस ईश की प्रजा ।।

(धुन) यह उद्दंड बालक मानुष बहु लालची ।

पितरों का जायज वारिस मैं रही हूँ ।।

तब मूषक जाए अन्‍य किसी घर ।

जी भरकर भोग करे प्रेम चंद्रिका,

जगत् की जननी यह पिंडिक ।।३३८।।

जीवात्‍मा की एकात न समझने के कारण अहा ।

आज तक हम पड़े अंतुनी के अज्ञान में महा ।।३३९।।

जीव जैसा अपना जीव दूजे का वैसा ।

यह जानकर प्रेम-मंत्र सरल । जीवन में स्‍वर्गीय रसा ।।३४०।।

हृदय तुम्‍हारा भक्ष्‍य बना द्वेषाग्नि का ।

सत्‍वर उसे बुझाओ, जलते घर को जैसे ।।३४१।।

अनुपात जल से बाबा क्षमा करो । वह करे ।

जगत् जनक कृपालु करे क्षमा तुझे तत्‍पल में ।।३४२।।

सत्‍य है, भगवन् ! गोरे ने सर हिलाकर कहा ।

देवपुत्र पुत्रों को अपने ऐसा ही संदेश दे ।।३४३।।

आप जैसे संत चाहे कहीं भी बसें ।

सत्‍य ही वह शिष्‍य ईसा का ही हो ।।३४४।।

कीर्ति आप की ऐसी सुनकर ही मिलने आया ।

दर्शन से ही आपके करने लगा पूजा आपकी ।।३४५।।

मात्र अंतर्ज्ञान से आपने नाम जाना मेरा ।

भला मम कर्म भी कैसे अज्ञात रहे आपसे ।।३४६।।

हे सद्गुरो ! हो रही मुझे उपरति मुझे अपने कर्मों की ।

हो रही है इच्‍छा क्षमा-याचना माधव की ।।३४७।।

मुझे ज्ञात हो कहाँ माधो औ' करे क्षमा मुझको ।

सुखी हो हे भगवन् मैं पुन: जीवन में ।।३४८।।

सुनकर उक्त्‍िा उसकी तुष्‍ट मुनि वर बोले ।

शुभ कामना यह हो कल्‍याणमयी अंतुनी ।।३४९।।

तेरे संबंध में विश्‍वास मैंने जो पूर्व ही किया ।

दयाशीलता से अपनी तूने सार्थक उसे किया ।।३५०।।

आपने की कृपा साधो, जिससे कुपात्र सुपात्र बने ।

बनाते सर्पों को भी प्रेमी हृदय हूँ मैं तो बस मानव ।।३५१।।

भई अंतुनीया ! क्‍या भुजंग के हृदय में दया नहीं ?

और हम मनुजों के हृदय में क्‍या विष नहीं ।।३५२।।

हम ऐसे पदाघात से देते है दु:ख जिसे ।

पग को डसते ही देते हैं दोष उसे ।।३५३।।

एक ही भूतात्‍मा प्राणीमात्र में बसे औ' सर्प भी ।

वश होते प्रेम से तो मनुष्‍य विद्वेष-विष के भक्ष्‍य ।।३५४।।

अतिशयोक्ति क्‍या देखत हो, यहाँ तो सर्प भी ।

भूतनाथ शंकर का प्रसाद पाने सदा होते खड़े ।।३५५।।

वासुकी तो निज सुखस्‍पर्श से दबाए ईश का तन ।

भृत्‍य भाँति छत्र धरे शिव पर फैलाकर फन ।।३५६।।

हँसकर बोला गोरा, खाते-खाते पचनार्थ सर्प ये ।

वृक्षों वा खंभों को लिपटकर फन उठा डोले ये ।।३५७।।

साधु भी हँसकर बोला, 'क्रूरता संबंधित तेरे ।'

वंदत तूने झूठी सिद्धनहीं की अनुताप से ।।३५८।।

वैसे हृदय शुद्धि से होगा ज्ञात तुझे अंत में ।

एक एव हि भूतात्‍मा भूते-भूते व्‍यवस्थित: ।।३५९।।

एतदर्थ निरपराधियों को पीड़ा देना छोड़कर ।

प्रेम मंत्र जाप करो जो है हृदय-शुद्धि कर ।।३६०।।

स्‍वीकार है साधो, क्रूरता की मेरी क्षमा करें ।

और तुरंत माधव के पाचारण की कृपा करें ।।३६१।।

चरणों को उसके वंदूँ, स्‍वीकार कर द्रव्‍य दंड ।

मुक्‍त कर सब जन को, तुरंत लौटूँ ससैन्‍य ।।३६२।।

आत्‍मशक्ति जो व्‍याघ्र को नत करे मृग सम्‍मुख ।

प्रतीत हो उस वीर को भी यह अपूर्व चमत्‍कार ।।३६३।।

उत्‍साह भीना साधु वीर मुख की ओर देखत ।

पर वीर बना था चिंता, उद्विग्‍नता की मूरत ।।३६४।।

यह अविश्रांत । शेष सब गए गृह में करने विश्राम ।

सुधी साधु ने किया उसके वर्तन का सरल अनुमान ।।३६५।।

पुत्र माधव ! आ बाहर तो रसवत्‍सलता जिसमें ।

रसमसा हो झरे ऐसी हाँक मधुर दे मुनिवर ।।३६६।।

हाथ पकड़कर साधु माधव को बाहर ले आया ।

गोरे ने उससे कहा, 'स्‍वामिन् क्षमस्‍व मुझे ।।३६७।।

मेघ जल बिना जैसे, कोशागार धन बिना ।

दंडशक्ति बिना तैसे क्षमादान विडंबना ।।३६८।।

आपके मन में सत्‍य ही अनुपात हो ।

अब से सुहृदों को मेरे ना दे कोई कष्‍ट ।।३६९।।

निश्चिंत रहें । बुलाएँ निज कांता तनय को ।

जो कहें वह सब देने पापदंड सिद्ध मैं ।।३७०।।

कुछ न कहा माधव ने वह वीर चुप रहा ।

तथापि उल्‍लसित साधु हाँक दे, 'आ बेटी चल ' ।।३७१।।

तुम तो हो वधु । देह दंड योग्‍य को भी ।

अनुताप से अधिक ना देते दंड सुधी ।।३७२।।

आप दोनों भी मुझे कर दें क्षमा ।

घर चलो अपने, मैं स्‍वयं पहुँचाऊँगा तुम्‍हें ।।३७३।।

गोरे का वचन सुन वीर से सहा न गया ।

निज मौन तोड़कर बोले अनुरोध से सत्‍वर ।।३७४।।

साधो ! हुआ अब तक जो सो हुआ पर ।

रात्रि में इन्‍हें अकेले न जाने दूँ इसके संग ।।३७५।।

शब्‍दों तथा आवेश से उसके जाना गोरे ने ।

इन्‍हें भगाकर मुक्‍त करने का काम किया इसी ने ।।३७६।।

अत्‍याग्रह से भविष्‍य कार्य ही बिगड़ेगा जान ।

उसने वीर का तुरंत किया समर्थन ।।३७७।।

किया बहु वार चरण वंदन प्रशंसा की बार-बार ।

विदा हुआ मठ से गोरा वांछित देखभाल कर ।।३७८।।

साथी को निज एक दो में से वीर ने सत्‍वर ।

निगरानी स्‍तव गोरे की भेजा सोचकर ।।३७९।।

सतर्क करने साधु को बोला, अजी महा धूर्त चर यह ।

अंतुनी नहीं ! पर है उसका सैनिक अहा !! ३८०।।

मिथ्‍या नाम से मिथ्‍या अधिकार लिये कपटी ने ।

कैसा अनुताप ! कैसी दया ! छला तुम्‍हें पापी ने ।।३८१।।

'मत कर संदेह वीर, देखने में वह भला ।

सेनापति-सैनिक का एक नाम न हो सकता भला ।।३८२।।

छलकर निर्धन गोसाई को मिले क्‍या उसे ।

वंचना ना ! जो कहा उसने सरल दया भाव से ।।३८३।।

साधु की मोहिनी स्‍वर्ग तुल्‍य रसभीनी-सी ।

दिखा रहा वीर श्रेष्‍ठ माधव को सच्‍चाई कठोर-सी ।।३८४।।

अंत में दुविधा में फैला माधव ने कहा साधु से ।

'है विप्र ! उपकार तुम्‍हारे अवर्णित है एक ही मुख से' ।।३८५।।

हे वीर श्रेष्‍ठ, कौन आप ? आए कहाँ से वा कैसे ?

पूर्व-पुण्‍य ही मेरा रक्षार्थ आया आपके रूप में ।।३८६।।

तथापि साधु के प्रेमभाव से परिवर्तन आया ।

अंतुनी में पर मेरे संदेह से क्रोधित वह ना हो ।।३८७।।

एतदर्थ आप जाएँ ग्राम शीघ्र ही कैसे कहाँ !

जिस-जिसका अनुमान किया उसे ढूँढ़ो वहाँ ।।३८८।।

'साधु' वीर बोले, छोड़े साथी रक्षा के लिए ।

चला गतिविधियाँ रिपु की देखने के लिए ।।३८९।।

उफ ! भयंकर रात ! अभागे बंदियों की घोर भयानक ।

यंत्रणाएँ कचहरी में, कंपित हुआ सारा गाँव ।।३९०।।

यातनाओं की वेदना हो असह्य उगलता अता-पता ।

मुख से किसी के जो नाम निकला भय से झट सुनता ।।३९१।।

भेजता अंतुनी दूत उस घर यथा रूचि ।

खोजने माधव को वा पकड़ने स्‍वामी को ।।३९२।।

माधव का सखा होने से पहले तदा ।

दूकानवाले सेठ के घर पड़ा छापा ।।३९३।।

'माधव यहाँ है ?' पूछते घर में उसके घुसे ।

की पिटाई सेठ की क्‍यों नहीं माधव यहाँ ?।।३९४।।

मै क्‍या जानूँ ठौर ठिकाना उसका कहा बिलखते सेठ ने ।

बता, क्‍या देखना है तुम्‍हें निज पुत्री को नग्‍ना ।।३९५।।

भौंकते हुए वह गोरा झपटे उस अबला पर ।

घसीटकर उस गिराया सम्‍मुख पिता के धरती पर ।।३९६।।

तीन सैनिक ही वहाँ ! हाय रोका न गया उन्‍हें ।

भरे-पूरे गाँव से एक भी नरवीर न आया सामने।।३९७।।

नेत्र भींचे पिता ने ! कन्‍या अधमरी-सी पड़ी ।

वह घोर रात भी न देख सकी दानवों की दानवता ।।३९८।।

विष वमन कर लौटता सर्प बिल में जैसे ।

रिक्‍तवीर्य तीनों दानव तत्‍पल निकले वैसे ।।३९९।।

पागल कुत्‍ता काटे कितनों को गिनती कौन करे ।

दावानल से जंगल जले, न केवल वृक्ष ही चार ।।४००।।

यह आतंक देख वह वीर न बढ़ा आगे-आगे ।

रोककर पग भागा उस बँधे अश्‍वतरु की ओर ।।

आतंक देख वह वीर ने पढ़ते पग रोककर ।

भागा झट से उस बँधे अश्‍वतरू की ओर ।।४०१।।

बँधे अश्‍व को खोलकर साथियों सह सत्‍वर ।

वायुवेग से मठ आते ही चपलता से कूदकर ।।४०२।।

बाधव से बोला 'धोखा ! अश्‍व सज्‍ज उठो-उठो ।

पल भी व्‍यर्थ गँवाया तो समझो श्‍मशान मठ को ।।४०३।।

संत तो संत ही हँसकर बोला, 'धीर' वी कहे तब ।'

शांत भाव आपका रिपु क्रूरता से अधिक संकटमय ।।४०४।।

चलना हो तो चलें मैं तो चला अन्‍यथा ।

भोलेपन से आपके कहीं गाँव जले सर्वथा ।।४०५।।

माँ-बहनों पर अत्‍याचार अपरहण करते ये उद्दंड ।

भेडिए ये क्‍या चिंता पुराणों की बलदंड ।।४०६।।

बिना किए हाँ-ना, तुरंत बिना सोचे बिना समय गँवाते ।

उठाकर पुत्र को रमामाधव झट से खड़े होते ।।४०७।।

तीनों को अश्‍वों पर बैठाने में जुट गए साथी ।

वीराग्रणी वह कर चरण-वंदन साधु का बोला ।।४०८।।

दया करें साधुजी, चलें आप भी मेरे साथ ।

चलें स्‍वराज्‍य में वहाँ आज भी धर्म सुरक्षित ।।४०९।।

'स्‍वराज्‍य वही है जो न बँधे दिक्‍काल की सीमा में ।

न भोग सकते स्‍वराज्‍य दिशा काल के बंधन में ।।४१०।।

अपने प्रयोगार्थ छत्रपति को दिए क्षेत्र यहाँ-वहाँ ।

प्रभु ने हमें अधिकार-पत्र से दिया सारा जहाँ ।।४११।।

मोहजाल में उसके पुन: फँसे मन अपना ना फँसे ।

भय से इस वीर ने भाषण पूरा ना सुना ।।४१२।।

साथी की नियुक्ति कर देखें होता क्‍या है आगे ।

पूर्व सज्‍ज अश्‍वों पर बैठ वह वहाँ से भागे ।।४१३।।

तीसरा वीर जो खड़ा वहाँ था, अब साधु से बोले ।

कृपा अब एक करें मुनिवर इस घोर संकटकाले ।।४१४।।

प्रश्‍न यह ना किसी एक विप्र का न, एक ना ।

कुटुंब रक्षण का भी प्रभु, विचार मन में करो ना ।।४१५।।

जिस कार्य में श्री रामचंद्र, श्री रामदास शिरोमणि ।

इन विरागियों का मन अनुरक्‍त इसमें जानि ।।४१६।।

धर्म संस्‍थापना वही, वही पाप विनाशाय ।

रण में खड़ा डटा महाराष्‍ट्र पूरे भारततारणाय ।।४१७।।

उस कार्य संपन्‍नार्थ रामचंद्र प्रभु की तलवार ।

वीर शिवाजी से आई उसे बाजीराव के थामे कर ।।४१८।।

गामोंतक में देखो पाखलों ने हिंदू को कैसे सताया ।

धर्मकार्य को भी महापाप समझा दंडनीया ।।४१९।।

अजी, मंदिर परशुराम का ही नहीं, जन में ।

खंडित की देवताओं की पूजा घर-घर में ।।४२०।।

है बालक उपनयन संस्‍कार बिन, युवतियाँ विवाह-बिन ।

सारी प्रजा संस्‍कार हीना, कैसी हुई पौरुष हीन ।।४२१।।

ध्‍वस्‍त देश, नष्‍ट ध्‍वज, अस्‍त धर्म यश हो ।

पस्‍त राज्‍य-राष्‍ट्र, अब क्‍या जाने को हो ।।४२२।।

राज्‍य पोर्तुगीजों के प्रदेश था जितना जिसे ।

गोमांतक संज्ञा थी जहाँ ना धर्म ना दया बसे ।।४२३।।

हिंदूमात्र वहाँ की जनता मिलकर निकल पड़ी ।

की अनिंद्य धर्म यश प्रार्थना यशवंत बाजी से ।।४२४।।

शास्‍त्री, पंडित, देसाई, देशमुख, संत-मुनि प्रेरित ।

म्‍लेच्‍छ विनाशार्थ जो मुनिवर आए निमंत्रित ।।४२५।।

सहयोग से उनके महाराष्‍ट्र वीर-राष्‍ट्र विमोचनाय ।

उठाकर खड्ग यहाँ सर्वत्र जूझ रहे नरवर ।।४२६।।

दे सहयोग उन्‍हें, जो प्रतिशोध करे शत्रु का ।

प्रोत्‍साहित करने उन्‍हें समय है ऐसे साहस का ।।४२७।।

ऐसी गुप्‍तचर सेना नाना रूपेण प्रेषिता यहाँ पर ।

लाल बाग डोलने लगे निदर्शन प्रदर्शन कर ।।४२८।।

सब षड्यंत्र का सूत्रधार है देसाई अंताजी ।

जो स्‍वदेश स्‍वधर्म की फहराए ध्‍वजा जी ।।४२९।।

जो माने अपने ही धर्म को सत्‍य केवल ।

जो-जो है विरोध में उसके, है पाखंड केवल ।।४३०।।

हिंदू धर्म को जब निषिद्ध रिपु ने माना ।

तब बोले अंताजी कर्तव्‍य मेरा स्‍वदेशी करना ।।४३१।।

स्‍वधर्म प्रेम उसका, थी वीरता उसकी पर ।

रिपु भागे पकड़ने उसे घोर अपराध समझकर ।।४३२।।

हे यज्ञप्रिय। अदृश्‍य करेंगे तेरी इच्‍छापूर्ति ।

धर्मशासन यज्ञ में चढ़ाएँगे तेरी आहुति ।।४३३।।

विपुल संपदा वंशीय पदाधिकार घरबार ।

नेता धर्मशासक बोले उसका सबकुछ लूटकर ।।४३४।।

मायाबल से महाराष्‍ट्र में उठाकर तलवार वीर ।

अंताजी कंपा रहा रिपु को बनकर कलिकाल ।।४३५।।

उस गुप्‍तचर सेना में हम तीनों गुप्‍त रूप से ।

टोह लेते पीछा करते अंतुनीय का चुपके से ।।४३६।।

भार्गव क्षेत्र कोंकण में स्‍वधर्म रक्षक बनकर कैसे ।

भार्गव भक्‍त ब्रह्मेंद्र खड़े रहे पालनहार जैसे ।।४३७।।

गोमांतक में आप भी स्‍वधर्म धुरीण बने वैसे ।

विश्‍वास करे हिंदू मात्र जन उत्‍कट आशा से ।।४३८।।

बल पर उस आशा से हम आए आप के शरण में ।

धर्म-धुरंधर आप ही जैसे गति दें स्‍वधर्म कार्य में ।।४३९।।

भयभीत हूँ मैं कि भोर होते-न-होते ही ।

सेना अंतुनिया की घेर लेगी मठ को झट से ही ।।४४०।।

माधव को यहाँ न देखकर तुम्‍हें देंगे कष्‍ट ऐसे ।

कहूँगा वह राम कहानी फिर कभी विस्‍तार से ।।४४१।।

रिपु न जाने गया कौन किस-किस दिशा में जब तक ।

ढूँढ़ेंगे वे दुष्‍ट उन्‍हें यहाँ-वहाँ ग्राम के तब तक ।।४४२।।

संधी में माधव को सुरक्षित स्‍थान पहुँचाकर ।

ग्रामरक्षार्थ आएँगे लौटकर ससैन्‍य वीर सत्‍वर ।।४४३।।

कष्‍ट कैसा ! आए कोई भी यहाँ मुझे देखने ।

सिद्ध है शिवशंभु सदा रक्षा जो मेरी करने ।।४४४।।

न छूएगा अनृत यहाँ, ना ही भय किसी से ।

बोलूँगा सत्‍य-ही-सत्‍य जो देखा निज नेत्रों से ।।४४५।।

चौंका साथी बोला, 'मुनिवर! न कर पाया आप से ।

मनोगत अपना स्‍पष्‍ट जो मेरे हृदय में बसे ।।४४६।।

मद्यपी को मद्य, कसाई को गोदान देना उचित ।

पर हिंसकों को सौंपना सज्‍जन हो कदापि अनुचित' ।।४४७।।

रिपु आने पर निर्भयता से उससे है कहना ।

ज्ञात नहीं हमें बंधु ! माधव का ठौर-ठिकाना ।।४४८।।

कब से हुआ असत्‍य वचन कर्तव्‍य अहा !

समझ लेना मन में पुत्र इन शब्‍दों का मेल कहाँ ।।४४९।।

असत्‍य-असत्‍य ही वत्‍स ! सत्‍यार्थ मरणं वरम् ।

न ही सत्‍यात्‍परो धर्म: नानृतात्‍पातकं परम् ।।४५०।।

पुण्‍यता सत्‍य की न शब्‍दों पर निर्भर हेतु पर ।

क्‍यों कहते हैं असत्‍य वचन 'पुत्र' मुझे बोलकर ।।४५१।।

'क्षमा करो भूल पर मेरी' 'ना मुनींद्र वह भूल नहीं ।

है सत्‍य का शुद्ध बुद्धि पर है जड़ शब्‍दों पर नहीं' ।।४५।।

शुद्ध बुद्ध है कौन, हम सकल हैं जानते ।

आत्‍महेतो : पदार्थे वा ये मृषा न वदन्ति ते ।।४५३।।

न केवल सुहाग रमा का न करुण कहानी बालक की ।

अपितु मुक्ति इस पल में शततीड़ि‍त जीवों की ।।४५४।।

निर्भर है साधो ! तव जिह्वाग्रे कम-से-कम कृपा करो ।

बहुजन हिताय । बहुजन सुखाय, मौनव्रत धरो ।।४५५।।

पर पीड़ि‍त जीवों के मोचनार्थ हे मानव !

सत्‍यं वदेति वेदाज्ञा । नच मौनं चरेति वा ।।४५६।।

'यही है यही है ! अपने खड्ग से उसे दिखाया ।

चिरमुक्‍त द्वार से वह गोरा गरजत आया ।।४५७।।

तत्‍काल कुछ सैनिकों ने मुनि को पकड़ लिया ।

शेष सशस्‍त्र सेना ने उस मठ को घेर लिया ।।४५८।।

वीर को देखकर 'कौन हो तुम' पूछा होकर लाल-पीला ।।

गरजा-लरजा अंतुनी 'पकड़ी इसे भी सत्‍वर' ।।४५९।।

पीकर लहू का घूँट साथी ने कहा ।

'साधारण यात्री हूँ में तो प्रभु ! अहा ।।४६०।।

'क्‍यों साधो ! सत्‍य है यह ? जी, अंतु इस मठ में ।

हम तुम सब यात्री, कौन है स्‍थायी इस जगत में ।।४६१।।

'कहाँ माधव ?' 'नहीं यहाँ' कहा मुनी ने ऐसा ।

आपा खोकर गुप्‍तचर गोरा बढ़ा आगे संतप्‍त-सा ।।४६२।।

इधर ! उधर चलो घुसो तोड़ो, पकड़ो यहाँ ।

चप्‍पा-चप्‍पा छाना मठ का पर माधव गया कहाँ ।।४६३।।

साथी के मन में खिली आशा पुन: ! धन्‍य ! कहा उसने ।

वाक्‍सत्‍य साधा कैसे घात न किया मुनी ने ।।४६४।।

साधारण साधु भी जगत् में असत्‍य ना बोले ।

योग्‍य आप तो महान् हैं जैसे शिव के आगे नंदी डोले ।।४६५।।

'सत्‍य कहो' 'अंतु, सत्‍य ही कहा मैंने असत्‍य नहीं ।

ईशोपासक सत्‍य वचनी को असत्‍य कभी भाता नहीं ।।४६६।।

'था माधव यहाँ ?' हाँ-हाँ' और साथ मैं कौन जी ?

'भार्या पुत्र साथ में' 'कौन लाया उन्‍हें यहाँ जो' ।।४६७।।

'तीनो जब ! जिनमें से यह एक बोले मुनिवर ।

बिना पूछे ही अंतुनी ने निर्देशित किया गया वीर ।।४६८।।

'अच्‍छा ! अच्‍छा ! सत्‍य ही तुम शिवभक्‍त: ! कहो आगे ।

बताओ टोली वह कहाँ छिपी है भागे-भागे ।।४६९।।

'जानत नाही !' साधुवचन निकला सत्‍वर ।

जो पुन: जगाएँ आशा वीर के मन में झरझर ।।४७०।।

'सत्‍य ही कैसे होगा ज्ञात' ठीक ! तुम्‍हें जब से ।

छोड़कर गया यहाँ से' गोरा चर पूछे उससे ।।४७१।।

'तब क्‍या कहा किसने, गया कौन, कैसे, कहाँ ?'

जानत तुम भी सार सब धर्म का सत्‍यमेव है जहाँ ।।४७२।।

महात्‍मा ने तब मानो पुस्‍तक विवरण पढ़ा जैसे ।

कथन किया बड़ी सरलता से समग्र वृत्‍तांत ऐसे ।।४७३।।

क्‍या-क्‍या कहा वीर ने, कैसे गया गाँव में आया कैसे ?

सब गए कहाँ कैसे, कब कही पूरी कथा ऐसे ।।४७४।।

चबाया होंठ क्रोध से वीर ने, लहू बहने लगा ।

शंकित मन साधु को अंतुनी का चर समझने लगा ।।४७५।।

गौर चर । ना साधु ! साथी अंतुनी समझा जिसे ।

हिंदुओं के षड्यंत्र का नायक समझा अंतुनी ने उसे ।।४७६।।

पंत अंताजी का नाम साधु कथन में आना ।

भय से उछला अंतुनी जैसे बिच्‍छू ने डस लिया ।।४७७।।

वीर का क्रोध देखकर डाँटा उसे, 'बोलो, बोलो' ।

अपने प्राणप्रिय हो तो अंताजी का पता बोलो ।।४७८।।

मैं एक यात्री स्‍वामी, न मैने पी भंग शिवभक्ति की ।

ज्ञात नहीं मुझे, ना नंदी सम सेवा की शिव की ।।४७९।।

गोरे चर ने वीर साथी को झट तलवार भोंकी ।

तेजी से रोका अंतुनी ने 'अनुचित है तेरा वार' ।।४८०।।

धर्मशासन से ही दंड ना ही किसी अन्‍य से ।

कलंकित ना करे ईसा के यश को अपने क्रोध से ।।४८१।।

सशस्‍त्र सिपाही गोरे पीछे करे सत्‍वर ।

साधु निर्दिष्‍ट वीर की दिशा भेजकर ।।४८२।।

क्‍वचित् मठ में किसी ना छिपे कोई गुप्‍तागार में ।

उस प्राचीन मठ को धकेला अग्नि ज्‍वाला के मुख में ।।४८३।।

साधु लहू से लथपथ, बंदी साथी के संग पथ पर ।

खड़ा, सशस्‍त्र सेना खड़ी सामने मठ को मशाल कर ।।४८४।।

ज्‍वाला संत्रस्‍त सर्प निकला मठ से आया पथ पर ।

जो सामने आया उस पैर को डसा फुफकारकर ।।४८५।।

आया पैर जो आगे वह साधु का था । लगाई डस ।

साधु के तन को विष से आग, जैसे मठ को गोरे ने ।।४८६।।

हँसा गोरा चर ! कैसा लगा विष दूध का ? मधुर ?

'शिशु भी तो काटे माँ का स्‍तन' बोला साधु मुसकराकर ।।४८७।।

'विषलहरियों सी अग्नि ज्‍वालाएँ अजी हाय रे ।

हरसिंगार पर बैठे पंछी भुने गए अरेरे ।।४८८।।

सशस्‍त्र सवार गोरों के निकले सनसनाते ।

दौड़ लगाते वीर पथ से भिड़ गए देखते-देखते ।।४८९।।

घायल माधव और अनभ्‍यस्‍त रमा को लेते ।

वीराग्रणी वे तेजी से मार्ग में कैसे चलते ?४९०।।

वायुवेग से रिपु पीठ पीछे आते समझा मन में ।

वीर अब दुर्घट है द्विजरक्षण इस पल में ।।४९१।।

एतदर्थ दी साथी को जो आज्ञा आगे बढ़ने की ।

अपना जो होगा सो होगा वेला नहीं चिंता करने की ।।४९२।।

मिलेगा जो प्रथम दल तुम्‍हें मराठों का ।

संदेश मेरा दो उसे जितना शीघ्र हो आने का ।।४९३।।

आज यहाँ से अंतुनी को जीवित न जाने दें ।

मिलने से किसी भारी सहायता, पूर्व ही उसे मार दें ।।४९४।।

पल-पल जितना विलंब करोगे इसपर क्‍या पाओगे ।

उतना ही अधिक स्‍त्री बालवृद्धों की हत्‍या करवाओगे ।।४९५।।

एड़ लगाते ही साथी ने अश्‍व सरपट लगा दौड़ने ।

वीर त्‍यज राजपथ अश्‍व को अन्‍य मार्ग से लगा भगाने ।।४९६।।

उसके घोड़े की टापों की ध्‍वनि से रिपुस्‍वार भी मुड़ते ।

अँधेरे का लाभ उठाकर वीर बच निकला उड़ते-उड़ते ।।४९७।।

तीर जो रिपु का अश्‍व के रमा के घोड़े में घुस गया ।

उछला अश्‍व उसी पल रमा को धराशायी किया ।।४९८।।

दुर्बलों की दशा ऐसी श्‍मशान बनी सारी धरा ।

अँधेरे में बने तीर का निशाना घातक सिद्ध मुनिवरा ।।४९९।।

वीर को तत्‍क्षण न केवल हताशा ने घेर लिया ।

फौं-फौं करते शत्रु-सवारों ने भी उसे घेर लिया ।।५००।।

निश्चित थी हार तब बोला वीर नीर भरे नयना ।

धीरज रखो, सज्‍जनो ! मुझे है तुम्‍हारी सहायता करना ।।५०१।।

इतने में शत्रु सेना ने मारते-मारते वीर को घेरा ।

लड़ते-लड़ते शूर वीर पार निकला तोड़कर घेरा ।।५०२।।

हाय ! हाथ लगा विप्र ! बिलखती रमा शिशु को लेकर ।

अजी, कौन करे बखान जी उस दु:ख का, भयंकर ।।५०३।।

कभी डूबती शोकाकुल आँसुओं की बाढ़ में ।

कभी बाढ़ के तट पर खड़ी ताकती बिंब अपना उसमें ।।५०४।।

अँसुवन में चित्र पीड़ा का जो हुआ अंकित ।

स्‍वयं ताकती रही वह दुखियारी उसे हो भयकंपित ।।५०५।।

हम चलीं पिया के संग प्रमुदित मन ।

जिस सवेरे बरसों से रवि भी सुप्रसन्‍न ।।५०६।।

जिस प्रात: काले रक्षार्थ प्रिय पुत्र तेरे ।

प्रभु तेरे दया स्‍मरण समय भर आए नेत्र मेरे ।।५०७।।

बन गया वह प्रात:काल कैसे सायंकाल में ।

निकलना भी हो गया कैसा ऐसे आने में ।।५०८।।

तब कृपा स्‍मरते हुए सुसिद्ध स्‍वाहाकार ।

क्‍यों क्रूरता दिखाते हैं निष्‍पापों के हाहाकार ।।५०९।।

चुप कर, रमा चुप कर । सह लो दु:ख जितने सहे ।

पर मत बहाओ आज सारे आँसू नए-नए ।।५१०।।

दु:ख के क्षितिज पर जो लगे सीमा परा ।

वही है अन्‍य दु:खों की देखा आगे सीमा परा ।।५११।।

बहाओगी ऐसे सारे आँसुओं को यदि अभी ।

कैसे बुझाओगी तुम दु:खों के दावानल सभी ।।५१२।।

पर धीरज ना खोना, बुझे दावानल कभी ।

वर्षा न हो घन बादलों के ढह गए फिर भी ।।५१३।।

'बुझेगा ही' न कहा किसी ने पर बुझेगा बस ।

अंधकार में उस वीर को पथ दिखाए यही एक आस ।।५१४।।

निकालकर पंथ जो निकला पंक्ति शत्रु की तोड़कर ।

अन्‍य मार्ग से घुसा गाँव में वीर पीछे मुड़कर ।।५१५।।

थोड़ी सी मदद मिले । बाहर से कुमक आए जब तक ।

ग्राम में मिली तो भी रोकूँ बाह्य सहाय न आए तब तक ।।५१६।।

किससे पूछूँ ? है एक मल्‍ल युवा उसे जो ।

हुआ इस गाँव का यात्रा में जानत मैं जिसे जो ।।५१७।।

है आगे अखाड़ा शेष है रात अभी ।

जन संमत है आज अखाड़े में कैसे भी ।।५१८।।

आते ही वीर के चंचल हुआ तनिक जन-मन ।

युवा मल्‍ल ने पहचाना वीर को बोला मुदित मन ।।५१९।।

आओ ! पर कैसे साहस किया घोर रात में ?

लगी आग इस गाँव को ! मत रहें इस गाँव में ।।५२०।।

उस दिन की घटना पर उन सीधे गाँव वालों में ।

परिवर्तन हुए कितने अब आया रूप अंतिम उसमें ।।५२१।।

श्रवण करे वीर कौतुक से कि अंतुनी निंदा करे ।

हिंदुता की दे यंत्रणा विप्रों को, क्रुद्ध हुए शिवशंकर ।।५२२।।

कोप से सृष्टि कंपित, सूरज छिपा भय के मारे ।

ब्रह्मा निकला, निकला विष्‍णु, शिव के संग निकले सारे ।।५२३।।

घोर अंधकार में अचानक अंतुनी था शून्‍य चेतन ।

देखते-देखते तीनों को लेकर हो गए त्रिमूर्ति हिरन ।।५२४।।

'मित्रो!' हँसकर वीर सखेद 'यदि यह सत्‍य है ।

इससे लज्‍जास्‍पद बात बोलो हो सकती क्‍या है ?' ५२५।।

क्‍या हाथ हमरे है बस इसके लिए कि वीरगाथाएँ ।

देवताओं की गाते-गाते मूँछों पर ताव देने के लिए ।।५२६।।

धिक्‍कार हो पौरुष का उस जिसके लिए भूतल पर ।

देवताओं को उनकी रक्षार्थ आना पड़े बार-बार ।।५२७।।

धिक्‍कार हो उन मल्‍लों का, अखाड़े में जिनके ।

बिना पवनपुत्र के जोड़ी अंतुनी को न मिल सके ।।५२८।।

ऊँचे नस्‍ल का घोड़ा चिढ़ता है चाबुक की फटकार से ।

युवा मल्‍ल ने आपा खोया वीर के उपहास से ।।५२९।।

चलो इसी पल आए हैं हम इसके लिए यहाँ ।

लगा रहा हूँ प्राणों की बाजी अपने, करें रिपु की हार यहाँ ।।५३०।।

हुए कौल-करार सत्‍वर आगे श्री हनुमान् के ।

जब तक मराठा न आवे तब तक म्‍लेच्‍छ को रोकें ।।५३१।।

अस्‍त हुई वह भीषण रात्रि उससे भी अति ।

घोर दिन चढ़ा जैसे कोश से सुतीक्ष्‍ण असि ।।५३२।।

गाँव के सारे जनों को खड़ा किया हाँककर ।

चबूतरे के सामने, तब भक्‍त अंतुनी चढ़ा ऊपर ।।५३३।।

घुटने टेके, नेत्र बंद गप-शप विनम्र होकर ।

क्रूसस्‍थ उस दयाशील यीशु की प्रतिमा को प्रणाम कर ।।५३४।।

और बुलंद स्‍वर से बोला ताकि सुन सके सब जन ।

प्रभो ! न्‍याय्य मति दो मुझे जब ग्रहण किया न्‍यायासन ।।५३५।।

वही आसन जो उसका न्‍यायासन होता ।

आरोपियों में से और द्विज लाया जाता ।।५३६।।

ब्रह्मा विष्‍णु महेश के भक्‍त हुए आश्‍चर्य से खदंग कैसे ।

देवताओं से विप्र खींचकर लाया ऐसे ।।५३७।।

औ' सैनिक बाला के साथ उस अबला को ले आए ।

दु:खद दृश्‍य से सभी जन के नेत्र भर आए ।।५३८।।

त्रस्‍त सेठ, क्रुद्ध मास्‍टर, आचार्य दीन-हीन ।

साधु नयन पटेल, उद्दंड साथी साधु सत्‍य वचन ।।५३९।।

सभी को एक ही रस्‍से में बाँधे पशु सम ।

प्रस्‍तुत किया गया सत्‍वर अंतुनी को निर्मम ।।५४०।।

धर्मशासन संस्‍था का धर्माध्‍यक्ष उसी क्षण ।

बाइबल के पृष्‍ठों में देखे धर्माधर्म पुन: - पुन: ।।५४१।।

और एकाग्र निष्‍ठा से अंत में अंतुनी निश्‍चयी ।

संबोधित कर माधव को बोले कठोर वाणी ।।५४२।।

जब कि माधव ! तूने हेतुत: आज्ञा भंग किया ।

पोपाज्ञा को ईसाई धर्म औ' उस प्रभु को ठुकराया ।।५४३।।

किया दैवी आज्ञा भंग औ' शैतान की आज्ञा-पालन ।

दिन-रात किया तूने रे मूर्ख ! पाखंड का आचरण ।।५४४।।

हिंदुओं के असत्‍य धर्म के साथ निंद्य कर्म निर्भयता से ।

जैसे तूने नारकीय स्‍नान किया क्रूरता से ।।५४५।।

एतदर्थ माधव ! अग्निकांड प्रायश्चित है उचित ।

ते हितार्थ तुझे देना है न्‍यायप्राप्‍त निश्चित ।।५४६।।

और पुत्र तव ! देखो वह भी है नायक इस नाटक का ।

तेरे भ्रष्‍ट संस्‍कार वश-आज है वह बालक * ।।५४७।।

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* यद्यपि तेरा पुत्र आज छोटा बालक है, तो भी बड़ा होकर यह भी इस भ्रष्‍ट धर्म का केंद्र बनेगा । इसलिए इसे भी आग में जीवित जलाने का दंड देना न्‍याययुक्‍त ही है ।


रमे ! तथापि तुम्‍हें नहीं दिया जाता अग्निदाह दंड ।

यद्यपि साथ दिया तूने पति के इस कार्य में पाखंड ।।५४८।।

प्रथा १० हिंदुओं के विवाह की होती है साथ-साथ रहने की ।

मात्र ईसाई विधि करे एकात्‍मता नरनारी की ।।५४९।।

हे पापिनी ! अवश्‍य तूने किया है भाग जाने का पाप ।

पर मेरे मन में जरा भी नहीं प्रतिशोध-संताप ।।५५०।।

आँसू रमा के सूख गए अचानक और निर्भयता से ।

खड़ी रही तनकर सीधी मुक्‍त हुई भय-ताप से ।।५५१।।

उसके मुख पर नया रम्‍य भीषण हास्‍य करे नर्तन ।

बोलने लगी गरिमा बाला यंत्र-चलित प्रतिमा समान ।।५५२।।

'यदि सत्‍य ही मानी तेरी राय धर्मात्‍मन् अंतुनी ।

कि सारी हिंदू वधुएँ वेश्‍या हैं, न ही विवाहिता मानिनी ।।५५३।।

तथापि मातृत्‍व का अधिकारी तो है हमारा ।

नहीं दिया जाता किसी को यह मानवी संस्‍कारा ।।५५४।।

पशु में भी होता है मातृत्‍व-भावन प्रकृति से ही ।

तब इस हिंदू जाति का इतना स्‍तर तो मानोगे ही ।।५५५।।

योग्‍य ना हो पत्‍नीपदा हिंदू-नारियाँ, पर माँ का हृदय उनमें ।

जिनके हृदय में हो ममता दुग्‍धमधु वत्‍सलता में ।।५५६।।

तूने भी किया अंतुनी । जीवन का वह सार मधुर ।

एक बार प्राशन किया । किसी की छाती से सटकर ।।५५७।।

स्‍मरण करो उस दूध का, स्‍मरो वह जननी स्‍तन ।

जब दाँत भी नहीं थे तेरे मुँह में जिसने पिलाया पुन: ।।५५८।।

क्‍यों देख रहे हो ऐसे ! नहीं स्‍मरण पूछो जाकर उससे ।

अपनी नस-नस में बहनेवाली लहू की बूँद-बूँद से ।।५५९।।

अंतुनी, तनू यदि अपनी जीवित माँ का दूध पिया ।

माँ का वह दूध जीने दे जो लहू के अणु-अणु में समाया ।।५६०।।

अनुभव कर उस तूफान का मेरे सातृ-हृदय में उमड़ा ।

उस तूफान से क्रूरता अपने हृदय की फेंक उखाड़ ।।५६१।।

अरे अल्‍हड़ बालकपन में माँ की गोद में सोए हुए ।

तुझे वहाँ से अचानक खींचकर घसीटते हुए ।।५६२।।

तुम्‍हें फेंका होता किसी ने आग में फूल जैसा ।

बता सकते हो तुम्‍हारी माता का हाल कैसा ? ।।५६३।।

माता वह जिस ने अंतुनी तुम्‍हें जनम दिया ।

दूध उसी का बनकर लहू नस-नस में कह दिया ।।५६४।।

जलाया वृक्ष जिस संगम से खिले फूल क्‍या जी लेती ?

फूल के लिए सूखती शाखा फिर भी जी लेती ।।५६५।।

न्‍याय से देना हे जीवनदान मुझे हे अंतुनी ।

दे पति को जीवनदान और फूल से पुत्र को भी अंतुनी ।।५६६।।

वध से उनके मेरा वध करोगे सहस्रदा ।

जलाएगी अग्नि उन्‍हें मुझे जलाएगी आपदा ।।५६७।।

न्‍यायालय में अंतुनी जैसा नाप-तोलकर न्‍याय ।

इस लोक में वैसा नयज्ञ क्‍वचित् जो दे निर्णय ।।५६८।।

एक बार जिन नियमों को नयदंडक मान लिया ।

पुन: न भय लोभ से उसने उसका भंग किया ।।५६९।।

धर्मशासन में हो गए नाना सुन यज्ञ अनेक ।

पर मिला होगा ऐसा धर्माध्‍यक्ष एक-ही-एक ।।५७०।।

ख्‍यात ११ पीटर सम कभी न पकड़ता अंतुनी ।

चुन-चुनकर सज्‍जनों को 'पकड़े जाते हैं वे' तुरंत ।।५७१।।

किंवा न्‍यायासन पर गाढ़ी निद्रा सोकर क्‍वचित् उठकर ।

जला दो सबको' बोले तनिक नेत्र खोलकर ।।५७२।।

कभी न था अंतुनी इस दूजे अध्‍यक्ष के समान ।

हाथ में न्‍याय-दंड पकड़ा न निद्रा में आरोपण ।।५७३।।

धर्मभीरु अहा ! उल्‍टा यह अपने नयन बाँधता ।

बाइबल पर अपनी सारी तैल दृष्टि उँडेलता ।।५७४।।

रमा रुक रही थी इतने में पड़ गई उसकी नजर ।

बाइबल के देवदूत के मधुर वचनों पर ।।५७५।।

पूर्व आचार्यों ने जैसा स्‍मरण है दिया आदेश ।

नेत्रार्थ नेत्र, दाँत के बदले दाँत, जैसे को तैसा ।।५७६।।

पर कहता हूँ मैं प्रतिशोध तुम्‍हें उचित नहीं ।

क्षमा करना उचित दुर्जन को दंड देना उचित नहीं ।।५७७।।

नेत्र संकुचित कर सूक्ष्‍म जंतु देखे जैसे पल भर ।

धर्मात्‍मा अंतुनी बैठे शून्‍यदृष्टि दृष्टि गाड़कर ।।५७८।।

सूक्ष्‍म होती है पहले ही धर्माधर्म विचारणा ।

पर सूक्ष्‍मतरा ऐसी ही धर्म-धर्म विचारणा ।।५७९।।

एक नेत्र पापी हो तो फेंकी उसे उखाड़कर ।

उस एक नेत्रार्थ तू आत्‍मघात मत कर ।।५८०।।

'क्षमा कर' इन द्वयुक्ति में उचित क्‍या समझे हम ।

दो नेत्रों में से एक को दंड तो दूजा हो क्षम्‍य ।।५८१।।

ऐसा ही कुछ विचार उसके मन में चल रहा था ।

धर्माध्‍यक्ष संकेत रमा को कर ठोस स्‍वर बोला था ।।५८२।।

न्‍याय के अनुसार देवी वधार्ह नहीं निश्चित तुम ।

आदेश प्रभु का है अपराधी को करे क्षमा ।।५८३।।

दे हाथ में दया न्‍याय की तलवार।

धर्मशासन की यह सुप्रणाली पूर्वापार ।।५८४।।

दे धन्‍यवाद तुम प्रभू की करुणा प्रति ।

कारण यह कि वध्‍य दोनों में से एक बचे संप्रति ।।५८५।।

पुत्र वा पति ? बोलो सत्‍वर । उनमें से ।

निज इच्‍छानुसार एक को खींची मृत्युमुख से ।।५८६।।

प्रच्‍छन्‍न रूप से खिलवाड़ क्‍यों किया मुझसे राक्षसी ।

यह तो प्रतिशोध की गंभीर नृशंसकता ऐसी ।।५८७।।

क्‍या यह मेरे पातिव्रत्‍य की परीक्षा है ?

या मेरी ममता का उड़ाया मखौल है ।।५८८।।

शंकिता, लज्जिता, क्रुद्धा अतिमात्र अनिश्चिता ।

रमा से 'बोलो जल्‍दी' ऐसे अंतुनी कहता ।।५८९।।

भावार्थ : धर्म क्‍या और नेत्र क्‍या- इसका विचार तो वैसे ही सूक्ष्‍म रहता है उसी में ये दोनों बातें धर्मानुकूल न दिखने के कारण उनमें से एक को चुनना सूक्ष्‍म विचार का ही विषय था ।

रमा से बोले, 'कहो जल्‍दी' अन्‍यता वधाज्ञा पर ।

वध के दोनों के करता हूँ हस्‍ताक्षर ।।५९०।।

अजी नहीं, नहीं बताती हूँ, सुनिये तो सही !

शब्‍दों का अर्थ मैं ना समझ सकी मन में ही ।।५९१।।

समझा अर्थ अब, समझ लिया । हाय समझ लिया ।

देखो बोलती हूँ । हाय ईश्‍वर । धीरज अस्‍त हो गया ।।५९२।।

भ्रांतावस्‍था में फूटे होश में होकर भी ।

बरबस फूट पड़े रोकने का प्रयास करने पर भी ।।५९३।।

'पुत्र ! पुत्र ! वद साध्‍वी ! बचा लो पुत्र को अपने ।

भ्रूण हत्‍या का घेर पाप न मत्‍थे मढ़ अपने ।।५९४।।

अरी ! देखा है हमने संसार, वह तो बाल अबोध ।

आत्‍मा वै पुत्रनामांसि सखे न कर पुत्र घात ।।५९५।।

ओदश माधव का 'पुत्र' 'शीघ्रता ' का धाक अंतुनी ।

रही घोर यह मानवी-अमानुष खींचातानी ।।५९६।।

हृदय रमा का छलनी हुआ अकुलाई सी रही ।

फिर भी धीरज का अणु-अणु बटोरती रही ।।५९७।।

बोली, 'अजी, कहो पुत्र या पति स्‍वयं आप ही' ।

धर्मात्‍मन् ! तब अमानुषी न्‍यायधर्म का है असह ।।५९८।।

दोनों वध्‍य हैं, वध्‍य हैं न्‍याय के अनुसार सही ।

अधीर अंतुनी गरजा अवध्‍य दोनों में से कोई नहीं ।।५९९।।

किंतु दोनों के वध से अवधार्ह तू भी मरेगी ।

सो जिसका मोह तुझे है, उस एक को दया मिलेगी ।।६००।।

तेरा मोह तू जाने, दया होगा तेरी याचना पर ।

बोल शीघ्रता से कर दूँ इसी मल हस्‍ताक्षर ।।६०१।।

ना, ना, लो मैं बोलूँ अभी तनिक दया कर ।

मम दुखियारी पर देखती बौराई सी तितर-बितर ।।६०२।।

पुत्र कहे साध्‍वी, मत डर किससे प्रिये ।

तेरा पति माधव स्‍वयं कह रहा तुझे प्रिये ।।६०३।।

लो हाय अजी 'पुत्र' शब्‍द बोलने गई ।

पर कौन दबा रहा कंठ यही नासमझ पाई ।।६०४।।

अकस्‍मात् हवन आलोक में चमचमाती ।

वधु कौन है, जो वर के संग फेरे सात लगाती ।।६०५।।

माधव मेरा फिर से नव तरुण बना अहा ।

यह नव-वधु रमा में हृदय में पुत्र तब था कहाँ ।।६०६।।

और कहने लगी 'पति' इतने में सहसा रतन में ।

शिशु के प्रथम स्‍तन-पान कर दूध गूँजे मंजुल 'माँ-री' में ।।६०७।।

किसी के कोमल हाथ नन्‍हे से बने कंठहार ।

कानों में गूँजे मैया री ! किसी की प्रथम कोमल गुहार ।।६०८।।

अनन्‍यशरणा माते, दुधमुँहा बालक तेरी गोद का मैं ।

तेरा बालक ! हे माँ ! ले लो अपने आँचल में ।।६०९।।

फिर से हृदय में उठा 'पुत्र' शब्‍द गले तक आया ।

पर रह गया कंठ में ही, फिर से किसी ने दबाया ।।६१०।।

हवन प्रकाश में चमचमाती सप्‍तपदी रोष भरी ।

कंठ दबाकर बोले, 'पुत्र कहाँ था तब बावरी' ।।६११।।

पावन सेज जिस पर प्रियतम ने रतिदान किया ।

जिस पर लज्‍जा का अंतिम छोर दूर हटाया ।।६१२।।

अंग-प्रत्‍यंग एक-दूजे का अंतरंग एकरूप हुआ ।

प्रियतम प्रिया को जिस पर उस रोज स्‍मरण हुआ ।।६१३।।

बोलो तब कहाँ था पुत्र ? सेज बरजोरी से पूछे ।

बोलो, तब कहाँ था पुत्र ? जब पति ने आँसू पोछे ।।६१४।।

करा रहा था स्‍नान अँसुवन से, वेणी गूँथे प्रेम से ।

बोल तेरा पुत्र कहाँ था जब पति बाल सँवारे तेरे ।।६१५।।

नयनों में नीर भर आए, रुँध सा गया गला ।

शब्‍द एक जिह्वा पर आता, तो दूजा मार्ग रोकता ।।६१६।।

कौन सा कर तोड़ूँ बायाँ या दाहिना अहा ।

कंठ पर करूँ वार तलवार के एक या अधिक महा ।।६१७।।

गला घोंटकर मारूँ या खौलते तेल में डुबो दूँ ।

विकल्‍पों से ऐसी दया बनी क्रूरता साक्षात् ।।६१८।।

अजी, ऐसे अमानुष विकल्‍पों में से क्‍या चूने भला ?

किंतु उपाय क्‍या है, कैसे बँधे धीरज भला ।।६१९।।

नृशंसक हो, पर उस पर्याय में ही हे नृशंसक ।

कैसा चयन ? वह भी करेगी बालिका एक ।।६२०।।

हाय ! किसका गला काटूँ ? पति का या पुत्र का ?

किसके लहू को जल बनाकर करूँ प्रक्षालन ।।६२१।।

इस कल्‍पना मात्र के उच्‍चारण से निकल रहे प्राण ।

छाया मात्र से उसके चक्‍कर खाए हृदय, मन, नयन ।।६२२।।

'हूँ बोल' स्‍वर अंतुनी को तन-मन कंपित कर ।

भीत चक्‍कर से खींचता वह जागृति में भयंकर ।।६२३।।

'हूँ बोल ! इसी पल ! देख है यह अंतिम अवसर ।

कि दोनों के वध आज्ञा-पत्र पर करूँ मैं हस्‍ताक्षर ।।६२४।।

पुत-पुत्र प्रिये बोले, वचन है विपरीत ।

पर मौन रहना तो है उससे भी अनुचित ।।६२५।।

पुत्र रहे जीवित साध्‍वी, जीवित रहे तब कांत की ।

मम आत्‍मा ही पुत्र, तव आत्‍मा ही पुत्र सखी ।।६२६।।

तप्‍त वालुका पर रखा तप्‍त तवा जैसा।

मरु-भूमि में भटकता फँसा प्राणी जैसा ।।६२७।।

बढ़ाए पग आगे तो भस्‍म, जलाए रहे तो निश्‍चल ।

तथापि स्‍वयं प्रेरित रमा अपने पग आगे ठेल ।।६२८।।

अनुरोध माधव का उसे आगे-आगे ठेलता ।

प्रतिध्‍वनित गई उसे 'पुत्र' शब्‍द निकलता ।।६२९।।

बोलकर बाला वह अचानक गिर पड़ी ऐसी ।

कुठार प्रहार से कटकर शिखा गिरे जैसी ।।६३०।।

फूट पड़ा उसके साथ अब तक था दबाया ।

आतंक से हृदय का हाहाकार उमड़ आया ।।६३१।।

'मैया, मैया री' करते बालक अल्‍हड़ जग गया ।

रख अपना कपोल उसके गाल पर उसे हिलाया ।।६३२।।

मैया, चलो घर, बाबा के संग उठो ना ।

पोंछे आँसू उसके आँचल को पुन:-पुन: ।।६३३।।

प्रिय साध्‍वी, धीरज रखा जैसे दु:ख समय में ।

अब हर्ष में हताशा क्‍यों ? उठो, लो पुत्र गोद में ।।६३४।।

हो जन्‍मदिन बनता आज मृत्‍यु-दिन जिसका ।

तुम्‍हारी धीरज साहबबाजी से हुआ पुनर्जन्‍म उसका ।।६३५।।

लेकर, चूमकर तनय को छाती से लगा ले ।

उठो सती, जाओ घर रक्षा वंश-दीप की कर ले ।।६३६।।

अमृतवाणी सुनकर माधव की रमा ने होश सँभाला ।

उठाया पुत्र को प्रेम-भाव से अपनी छाती से लगाया ।।६३७।।

की एक ही शब्‍द-शब्‍द स्‍पष्‍ट पुन:-पुन: ।

गरजा अंतुनी, ना घर कदापि ना ।।६३८।।

ना घर रमा जा पाओगी, ना ही तव सुता ।

मृत्‍युदंड माफ हुआ न कि दंड सर्वथा ।।६३९।।

तुम और बालक तेरा शेष सारे बंदीजन ।

बन गए कुसंस्‍कारी अंगभूत हर प्रकारेण ।।६४०।।

पापक्षालनार्थ तुम सब को जाना है ।

शरण ईसा की न अन्‍य कोई चारा है ।।६४१।।

स्‍वीकारो भक्ति से, अन्‍यथा बल से अपने ।

अजपाल कृपालु ले जाएगा झुंड में अपने ।।६४२।।

आओगे श्रद्धा से तो मिले स्‍वतंत्रता ।

आओगे जबरन तो सदा पाओगे दास्‍यता ।।६४३।।

सुनिश्चित मेरे युक्ति-युक्‍त सुनिर्णया ।

न बदले राजाज्ञा ना ही दुर्बल दया ।।६४४।।

धिक्‍कार ! उन भीत जन-वृंद में से स्‍वर उठा ।

समझ न सका कोई कहाँ यह आवाज उठा ।।६४५।।

धिक् ! धिक् ! गुलामों के आजार में बेचने को ।

न जलाकर जीवित रखा इन माँ-बेटे को ।।६४६।।

क्रुद्ध भरी गर्जना उठने से किसी के स्‍वर से ।

गरजा अंतुनी पर सहमा सा था भीतर से ।।६४७।।

समझ गया वे शब्‍द न किसी दीन दुर्बल के ।

था धिक्-धिक् भय विरहित किसी मन-शक्ति के ।।६४८।।

घृणित उस स्‍वर को झट से कर ।

अंतुनी गर्भित वाणी से बंदियों को संबोधित कर ।।६४९।।

गवाही, समर्थन की और सभी प्रार्थनाएँ सुनकर ।

मैंने व्‍यतीत की सारी रात निरंतर ।।६५०।।

अंग-अंग विचर करके दिया निर्णय सभी का ।

चलो सैनिको उठो, निबाह करके उस दंड का ।।६५१।।

ठहरो फिर भी अपराधी करते हैं आरोप जो ।

इन्‍हें न्‍याय निश्चित देने दंड-दंडक सजे ।।६५२।।

नियम अपराध के तुम्‍हें हमें सब ही हैं समान ।

दंडनीय है पापी चाहे हिंदू, ईसाई या मुसलमान ।।६५३।।

जन हो । तो भी वह धर्माध्‍यक्ष पूर्ण गंभीरता ।

के साथ देखकर लोकाकीर्ण ग्रामसभा से कहे ।।६५४।।

सत्‍य धर्म कार्य निर्वाह में राजाज्ञा पालन करने में ।

सैनिकों ने मेरे यदि किसी ने कर्तव्‍य निबाहने में ।।६५५।।

ग्राम में गृह में किया अत्‍याचार यदि कभी ।

धर्म नियम भंग करके घातपात किया कभी ।।६५६।।

बताओ तुम अथवा अभिशप्‍त जन में से कोई ।

चाहे कोई भी, जैसे तुम दंडय वैसे सैनिक भई ।।६५७।।

तथापि जो बंदियों में से प्रथम क्षण से ही सना ।

क्रोध में तनकर देखे अंतुनी को पुन:-पुन: ।।६५८।।

प्रत्‍येक के मन में मन के भाव प्रकटने की चाह ।

पर जुटा न पाया साहस बोलने का आह ।।६५९।।

बँधा हुआ चंचल अश्‍व हिनहिनाकर बार-बार ।

मन में धुँधुआते आवेग को दे मार्ग चीरकर ।।६६०।।

खाँसकर खँखारकर वा बलात् बार-बार ।।

कुढ़न भीतर की अभिव्‍यक्‍त कर ।।६६१।।

मिला अवसर आचार्य को जैसे ही सत्‍वर ।

बं‍किम‍ स्मित से बोले- 'हो कल्‍याण, अंतुनीवर ।।६६२।।

पाखंड का भंडाफोड़ में पूर्ण हो जीवन तेरा ।

ऐसा है आशीष पुत्र मुक्‍त ब्राह्मण का मेरा ।।६६३।।

धन्‍य प्रसवे १३ वह धन्‍या प्रसू १४ अक्षत कन्‍यका ।

धन्‍य सद्धर्म, ना वहाँ धर्म शासन १५ धन्‍य क्‍यों ।।६६४।।

वध : कार्यो न जीवानाम् 'येशूक्‍ती प्रथमा ऐसी ।

एतदर्थ ही तुम जीव-हत्‍या नहीं जलाते जैसे ।।६६५।।

'पारदार्यमकर्तव्‍यं ' येशूक्‍ती १६ का करते आदर ।

बलात्‍कार नहीं पर विवश स्‍वयं वरण कुमारी विवश कर ।।६६६।।

निषिद्धमपि चौर्य च येशूक्‍ती सिद्ध करने में ।

लूटपाट में तुमने छोड़ दी चोरी खटाई में ।।६६७।।

'मा गृधो गर्दभं कस्‍य' उक्ति सत्‍य सिद्ध करने ।

छोड़ा गर्दभ, घुड़सालों पर कब्‍जा, धाक उनपर जमाने ।।६६८।।

'मा गृध १७ कस्‍यचित् किंचित्' था आदेश ईसा का ।

किंचित् छोड़कर तुमने निगला पूरा राज्‍य अन्‍यों का ।।६६९।।

आज्ञाओं का बाइबल की पालन किया पूरा-पूरा ।

चला इन सब पर मात करने धन्‍य अंतुनी नर वरा ।।६७०।।

मत करो चर्चा बुराई की न्‍यायदंड धारण मत कर ।

पालन इसका भी किया तुमने अन्‍याय दंड धारण कर ।।६७१।।

धर्मशासक देंगे धन्‍यवाद तुम्‍हें शतधा ।

रक्‍त स्‍नाता बलभ्रष्‍टा पथ में कुँवारी पाई विविधा ।।६७२।।

पाखंड अश्‍वमेध का समाप्‍त करने इस पल में ।

नरमेध नए अपने दिग्विजय लालसा में जन में ।।६७३।।

नवाग्नि नरमेध की ले लो अपने आँचल में ।

इस ब्राह्मण की आहुति अंतुनी लो जो याचक मैं ।।६७४।।

तेरे धर्मप्रचार को रोका मैंने कैसे-कैसे ।

इस प्रांत में तुमने खोलीं बहुशालाएँ जैसे-जैसे ।।६७५।।

ना कभी स्‍वीकारी तेरी नौकरी तुझ से विवाद किया‍ ।

श्रीगणेश बिना कोई अक्षर सिखाने न दिया ।।६७६।।

जन्‍म-दिन उत्‍सव में कल के हाथ ही था मेरा ।

राशियाँ मेरे अपराधों की लगती नहीं पर्याप्‍त जरा ।।६७७।।

अग्नि समर्पित करने धर्म के तो सुन अंतुनी ।

प्रार्थना ईश्‍वर की करता हूँ प्रतिरात-प्रतिदिनी ।।६७८।।

कि राज म्‍लेच्‍छों का जाए सत्‍वर विलय हो ।

महाराष्‍ट्र धर्म की तलवार की सदा विजय हो ।।६७९।।

इतने में भीड़ में से लोगों की उठी गर्जना धिक्‍कार की ।

लोक कोल 'पकड़ो दौड़ो टूट पड़ो' शत्रु को मारने की ।।६८०।।

सुनकर गर्जना उठ खड़ा अंतुनी बार-बार ।

सेना उसकी सज्‍ज शस्‍त्र से रक्षार्थ घिर ।।६८१।।

उस लोक कोन गर्जना से जोश भरा जन में ।

शस्‍त्रों की चमक देख रोशनी में भय समाया मन में ।।६८२।।

निकट ही वह साधु जिसे बाँधकर रखा अभी तक ।

खड़ा था उदासीन हो तनिक बेचारा थका-थका ।।६८३।।

थक गया क्‍यों‍कि कल उसे सर्पदंश भया ।

वनस्‍पति बल से यद्यपि वध उसका किया ।।६८४।।

शांतमूर्ति वह अब हुआ था किचित् दु:चित-सा ।

सुनकर जनगर्जना अब वह बोले कैसा ।।६८५।।

'बंधो, गर्जन क्‍यों ? कौन शत्रु ? इस जगत् में अहा ।

सब आत्‍माएँ एक जगत् में उसके बिना शत्रु कहाँ ।।६८६।।

जा रहा अंतुनी बोलना बंद करने साधु का ।

पर रुका रहा वैसे ही देखकर रुख उसका ।।६८७।।

काम एष : क्रोध एष: रजोगुण समुद्भव:।

शत्रु है मानव का यह न अंतुनी म्‍लेच्‍छ महा ।।६८८।।

अंतुनी बंधु हमारा । बुद्धि भ्रष्‍ट हो उसकी भी ।

तनिक समझाओ उसे, क्‍या बैर से मिटता बैर कभी ।।६८९।।

अनाज ही लूटा, तो भी दो उन्‍हें धन की माया ।

जीतना है क्रोध उनका तो करो उन पर दया ।।६९०।।

भ्रष्‍ट की हमरी कुँवरियाँ हाय-हाय ! अजी ऐसा ।

एक पापी को दूजा पापी भला दे प्रायश्चित्‍त कैसा ।।६९१।।

जो नहीं पापी तुममें मारे पत्‍थर पहला ।

देवपुत्र १८ ही तो ऐसे ही प्रसंग में ही बोला ।।६९२।।

हो सकता है ईश्‍वर ही न्‍यायाधीश ऊपर नर का ।

पूछेगा वही ना तुम उसे उत्‍तर इसका ।।६९३।।

मिली हुई यातनाओं से हृदय मेरा दु:खी हुआ ।

उससे भी तुम्‍हारी क्रोधावृत्ति से दु:ख अधिक हुआ ।।६९४।।

किया दाहिने गाल पर आघात किसी मूढ़ ने ।

मत करो प्रत्‍याघात, दूजा गाल बढ़ाओ आगे ।।६९५।।

अहिंसा परमोधर्म युग-युग से सही रटने में ।

सर्व भाषाओं में भूभाग में सर्व वेद की ॠचा में ।।६९६।।

मरे एक ही जीव आघात से इस लोक में पर अहा ।

प्रत्‍याघात से मरे खोफ में लाख लाख जहाँ ।।६९७।।

क्रिया शक्ति आघात की सीमा बद्ध करती ।

अतृणे पतितो वन्हि: स्‍वयमेवोऽपशम्‍यति ।।६९८।।

ना प्रतिशोध करो क्षमा पुरुषार्थ पवित्र की ।

स्‍वरक्षार्थ किया प्रत्‍याघात दे पाप ही नारकी ।।६९९।।

जयो १९ वैरं प्रसवति दु:खं शेते पराजित: ।

उपसंत: सुखं शेते हित्‍वा जयपराजयौ ।।७००।।

शस्‍त्रों की चमक-दमक से पूर्व कंपित भयी ।

उन हृदयों को जनों के महात्‍मा की उक्ति-मुक्ति भई ।।७०१।।

गरज उठे निनामबाबा की जय । लोग पुन:- पुन: ।

निनाम बाबा नाम से ही ज्ञात संत था जना ।।७०२।।

तब अंतुनी भी हिलाकर सर धीमे से बोला ।

साधु ! साधु ! सत्‍कार्य में इससे कौन सहायक भला ।।७०३।।

शत्रु के स्‍तुति से महात्‍मा की मान्‍यता बढ़ गई ।

साधु की जय-जयकार से दश दिशा गूँजा गईं ।।७०४।।

कोन से वही गर्जना फिर उठी ।

जय-जयकार से भी ऊँची आवाज उठी ।।७०५।।

ठीक ही है यह उसे उस जन में बहुमान्‍यता ।

भीरुओं के समूह में कहे कायरता को पुरुषार्थकात ।।७०६।।

अकर्मण्‍यता को ही सत्‍कर्म का रूप देकर ।

अकर्मण्‍यता की शेष लज्‍जा भी विनाश कर ।।७०७।।

प्रिय होगा वह कायरों को वा क्ररों को भी ।

ऐसा मुनिवर सहजता से धाए अजातशत्रुता भी ।।७०८।।

जो कहे बल से पकड़ो चोरों को तो मिले नरक ।

चोरों को तो लगे जगद्गुरु ऐसा उपदेशक ।।७०९।।

जल बिना सुखी आत्‍मा जिनकी वे घर छोड़कर ।

भरी पूरी गंगा में डाले जल काँवर भरकर ।।७१०।।

शत्रु क्रोधाग्नि में जले घर साधु यह बुझाता नहीं ।

चला आया हमरी चूल्‍हें की आग बुझाने रही-सही ।।७११।।

वाहे सद्गुरु ! सबकी नाड़ि‍याँ ठंडी पड़ी थीं जहाँ ।

अभी आने लगी गरमी कुछ-कुछ तन में वहाँ ।।७१२।।

मद्धम सी तपिश की आँच से भी क्‍या ?

हे गुरो ! तेरा कोमल हृदय दहल गया ।।७१३।।

पर जिनकी मशाल में अंधाधुंध आग भड़काती ।

जलातीं मंदिरों, अट्टालिकाओं, जिते जीव शतावधी ।।७१४।।

उन हिंसा की मशालों का दाह ना करें ।

जगद्गुरो, दु:खी ना यदि वा करें ।।७१५।।

तो जा पढ़ा उन दुष्‍टों को अहिंसा की श्रेष्‍ठता ।

विरोध करने पर उनका क्‍या रह पाएगा तू जीता ।।७१६।।

निवैंर स्‍तोत्र यह, अप्रतिकार पुराण की गाथा ।

सुनाना छोड़ भेड़ि‍यों को बकरियों को बताता ।।७१७।।

अत्‍याचारी भूखे भेड़ि‍ए करे जन संहरण ।

पहले जो बोलो उनको रोको उनका प्रहरण ।।७१८।।

इसके पश्‍चात् प्रतिशोध त्‍याग का करो उपदेश ।

उस ब्राह्मण को माँ-बहनों को जिन्‍हें हुए क्‍लेश ।।७१९।।

अज्ञानी बालक, न वे अत्‍याचारी यह स्‍वकर्म फल है ।

रूप में उनके ईश्‍वर ही स्‍वयं हमें दंड देता है ।।७२०।।

'उत्‍तम तर्क' हँसा स्‍वर व्‍यंग्‍य से यह सुनकर ।

साधु का वचन वह । उत्‍तम तर्क बल पर ।।७२१।।

दंड जो रूप में उनके ईश्‍वर दे हमें यदि ।

अस्‍मत् क्रोध मिषे उन्‍हें हो दंड भी जल्‍दी ।।७२२।।

ईश्‍वर ही नियुक्‍त करे चोर को घात-पात करने ।

ईश्‍वर ही प्रेरित करे सज्‍जन को पकड़ने ।।७२३।।

भाइयो ! चलो घसो टूट पड़ो शत्रु न बच पावे ।

तीन सौ तुम ना नपुंसक ना ही तीस राक्षस वे ।।७२४।।

उठी गर्जना दूजे कोन से हर-हर का नाद उठा ।

अंग-अंग अंतुनी का रोम-रोम सिहर उठा ।।७२५।।

पूरा अमरीका और पूरा ढूँढ़कर अफ्रिका ।

सिंधुयान ने छूआ अंत में सुप्‍त भारत भूमिका ।।७२६।।

जिस दिन पुर्तगाल का त्‍यजकर किनारा ।

सिंधुयान घुसा ढूँढ़ते-ढूँढ़ते भारत सुंदरा ।।७२७।।

उस दिन से नाना द्वीप, देश शतश: ।

पेरु, मेक्सिको, मिस्र, पारस, हब्‍शी क्रमश: ।।७२८।।

पूरे अमरीका में अफ्रिका में पूरा ।

भंडार भिन्‍न भाषाओं का यदि भारत में भरा ।।७२९।।

तथापि पाखलों ने सुना कभी न ऐसा ।

कोटि भाषाओं में भी शब्‍द हर-हर जैसा ।।७३०।।

उस दिन जिस दिन सह्याद्रि की सुप्‍त गुफाओं में से ।

शेर झपटे सहसा भक्ष्‍य पर हर-हर गर्जना से ।।७३१।।

मूरो २० का भी जय से किया‍ 'दीन-दीन' हीन रण में ।

उस दिन से उनका हर ! हर ! दे मन में ।।७३२।।

तीर उनके चूकने लगे, खड्ग बोथर बन गिरे ।

मनोरथ बनाऊँ कोलंबिया २१ हिंद का टूट गिरे ।।७३३।।

उस दिन पाखलों ने पहली बार सुनी घोषणा ।

सह्याद्रि की गुफाओं से उठी हर-हर ! गर्जना ।।७३४।।

चिनगारी रण-गर्जना की जाए कर्ण संपुट में ।

पड़ते ही भयज्‍वाला उठे अंतुनि के अंतर में ।।७३५।।

जाओ, सशस्‍त्र टूट पड़ो उन पाखंडियों को ।

घुसो, आगे भीड़ खदेड़कर पकड़ो विद्रोही गर्जनवालों को ।।७३६।।

डोर आज्ञा की टूटते ही भूखे कुत्‍ते शिकारी ।

टूट पड़े निहत्‍थी भीड़ पर बीस सैनिक शस्‍त्रधारी ।।७३७।।

संगीनों से चीरते-फाड़ते बालवृद्ध वधू जैसी ।

जो पथ में आए उसे फाड़-फाड़कर सेना आगे घुसी ।।७३८।।

जवाब दिया जन धीरज ने भागना भी भूल गए ।

जो जहाँ जैसे था वहीं जख्‍मी होकर गिर गए ।।७३९।।

इतने में अंतुनी चबूतरे पर जो बचे दस ।

सैनिकों को आज्ञा दे न्‍याय-विभाग अब हो बस ।।७४०।।

विप्र बाँधकर वृक्ष से जीवित जला दो ।

कार्यान्वित दंड को फटाफट कर दो ।।७४१।।

यह स्‍त्री, बालक सारे बंदीजनों को इन्‍हें ।

ले जाओ गुलामों के बाजार में बेचने ।।७४२।।

ले जाओ, इस पल पैरों में बेड़ि‍याँ ठुकवाओ ।

जब तक हम आएँ गोवा की चौकी में रखो ।।७४३।।

उठ री बाँदी ! उसी पैर से ठोकर मारकर ।

सिपाही गरजा 'चलो' सभी को रस्‍सी खींचकर ।।७४४।।

दो तीर इतने में आए सनसनाते कहाँ-से-कहाँ से ?

दो सैनिक वहीं लुढ़के लथपथ लहू से ।।७४५।।

चबूतरे के पीछे निकट ही था एक मकान ।

लोग मानते भूत-प्रेतों का डेरा था वीरान ।।७४६।।

घर से तीर आए-भूतों ने ? किसने छोड़े तीर ?

किसने देखा, नहीं किसी ने देखा पूरा-पूरा ।।७४७।।

चौकी ! चौकी ! गरजा चबूतरा छोड़कर ।

अंतुनी सेना सह घुसा चौकी में बंदियों को खींचकर ।।७४८।।

लहू से सनी नोंक जिनकी लटकी अँतड़ि‍याँ ।

झट से करके ठीक वे सारी खूनी संगिनियाँ ।।७४९।।

छोड़कर जनों को सेना दौड़ी, लौटी सत्‍वरी ।

चौकी में देखा स्‍वकीय सेना है संकटों से घिरी ।।७५०।।

उसी लोक कोने से एक लोकसंघ घुसा आगे ।

भागते शत्रु के पीठ पर पुन: धावा बोलने भागे ।।७५१।।

धनुर्बाण के साथ 'जय हर हर' गर्जना के साथ ।

भूत घर से भी निकल पड़ा कोई भूतनाथ ।।७५२।।

तीर पर तीर मारते सनसनाते आगे चल पड़ा ।

अल्‍प साथियों के संग वह चौकी पर टूट पड़ा ।।७५३।।

वीर अंतुनी गरजा करके सेना की व्‍यूह रचना ।

चलो, जला दो इन बंदियों को यहीं इस आँगना ।।७५४।।

ईश्‍वर आज्ञा हुई, उसका पालन होकर ही रहेगा ।

ये कायर हिंदू क्‍या उनका पिता भी टाल सकेगा ।।७५५।।

चौखट, द्वार, उखाड़कर, बारूद तेल डालकर ।

चौकी के आँगन में चिता रची गई भयंकर ।।७५६।।

जन मुरदे को बाँधे चिता से स्‍वधर्म समझकर जैसे ।

उस गरीब ब्राह्मण को चिता से जीवित बाँधा वैसे ।।७५७।।

हाँ स्‍वधर्म समझकर आग भड़क उठी ।

और वह दीन गाय सहसा चीख उठी ।।७५८।।

मुझे ! मुझे भी जला दो, जला दो इस बालक को ।

ज्‍वालाओं के संग मैं निगलती हूँ अपने वचन को ।।७५९।।

तो वार तलवार की मूठ का हुआ उसके सर पर ।

रक्‍त रंजित मूर्च्‍छना पर ही उसका संतोष कर ।।७६०।।

आग भभककर आँगन में उठी ऊपर-ऊपर ।

जीभ वाक्‍पटु जैसी लोगों को ललकारे युद्ध कर ।।७६१।।

हाहाकार में जनों के हर-हर गर्जना भर गया ।

ठेलकर आगे, हो जनसंघ बढ़ गया ।।७६२।।

आज्ञा से अंतुनी के सेनाव्‍यूह सुबद्ध जो ।

झपट पड़ा भीड़ पर जैसा कंठ में एक कृपाण जो ।।७६३।।

भीड़ एक दूजे पर गिरती हुई पीछे हटी जैसा ।

पीते लहू बड़े आगे व्‍यूह संगीनों का वैसा ।।७६४।।

चौकी से जाते समय गोरी सेना थी दूरी पर ।

मौत के कोलाहल में भी तीन हिंदू वीर ।।७६५।।

खिसकर तेजी से झपटकर चढ़े ऊपर ।

छप्‍पर पर चढ़ उसमें से कूद पड़े चौकी पर ।।७६६।।

भिड़ गया खड्ग-से-खड्ग खनखनाता-सा ।

दो गोरे सैनिकों के साथ स्‍वयं अंतुनी रण में घुसा।।७६७।।

रस्‍से कटने से बंदी मुक्‍त हुए तेजी से ।

उस विप्र को सब जन मिलकर खींचा चिता से ।।७६८।।

पर हा ! अजी अब चिता में जलने से ।

अति दु:खद था मुक्ति पाना चिता से ।।७६९।।

फटकर नाड़ि‍याँ उष्‍ण धाराएँ लहू की बह रही ।

मांस धूँ-धूँ जला अस्थियाँ तड़-तड़ फूट रहीं ।।७७०।।

कैसा द्विज वह तो अर्धदग्‍ध हवि अहा !

मुक्ति पाना उसे अब असंभव-संभव या प्रतिशोध महा ।।७७१।।

अचानक जैसी मौत छापा मारकर आती ।

वैसे ही अंतुनी के बदन पर तलवार खड़ी गिरती ।।७७२।।

इतने में वह साधु महात्‍मा गिरा अंतुनी पर ।

'मा हिंस्‍यात् ' गऊ जैसा हत्‍या मत कर ।।७७३।।

लहू इसका तुम्‍हरे जैसा न कि थोड़ा भी दूजो ।

कसाई का कृत्‍य करना घोर घातक समझो ।।७७४।।

छोड़ पाखंडी, क्रोध संतप्‍त भूतनाथ दहाड़ा ।

अन्‍यथा म्‍लच्‍छ संग तुझे अभी चीर फाड़ा ।।७७५।।

लहू अंतुनी का ताजा ? द्विज रक्त जले वहाँ ।

क्‍या वह है गंदा पानी नाली का यह पानी गडहा ? ७७६।।

तथापि अंतुनी को पंछी राखे छौने को अपने ।

ढककर असि धारा ढाल की निज तन ने ।।७७७।।

भ्रमिष्‍ट हो, दंभी हो, गरिष्‍ठा हो वा दया ।

शांत करूँगा क्रोध को और सबके मन में दया ।।७७८।।

ये सब किस के रक्षण में ? उस राक्षस अंतुनी का ।

पर क्रुद्धावस्‍था में भी साहस नहीं साधु हत्‍या का ।।७७९।।

इतने में द्वार पर आया शस्‍त्र चाप खनखनाता ।

व्‍यूह संगिनी का ही जनमर्दन करके आता ।।७८०।।

मन में कसमसाया भारी शिकार निकले हाथ से ।

सिंह चिढ़कर बार-बार पूँछ पटकता है वैसे ।।७८१।।

उस गर्जना सुनकर वीर लौटे झट से ।

लौटना ही उचित है जानकर पग किए पीछे से ।।७८२।।

प्रथम झड़प में जिससे गोरे सैनिक दो मारे गए ।

वह भी मुक्‍त हुआ तीनों वीर पीछे हट आए ।।७८३।।

छूटा वह सेठ भी उसके सा‍थ पर वह जरा ।

थोड़ी दूर भागा, पर भागते ही गया घबरा ।।७८४।।

शेर को देखते ही जैसे भयभीत होकर ।

घुटने टेककर बैठती गौ वैसा ही बैठा चुप कर ।।७८५।।

उभरी हुई तोंद को देखकर बोला हाँफ-हाँफ कर ।

गहरी साँस में मुख से शब्‍द डालकर ।।७८६।।

बैठा छाती पर जिसने आजीवन तुझे पाला ।

अरे पेट, घात उसका किया कितना खोआ तू निकला ।।७८७।।

अच्‍दा पोषण तेरा किया तो तू चढ़ा छाती पर ।

औ 'भूखा मारा तुझे तो तू लग जाता है पीठ पर ।।७८८।।

उस मासूम को पुन: सैनिकों ने बलपूर्वक खींचा।

पुण्‍य समाप्ति पर प्राय: ऐसी ही मिलती है सजा ।।७८९।।

पंगु दुर्बल पुण्‍य होकर भी जीते हैं जब तक ।

व्‍याघ्र के चरणों में नख, मुख में भुजंग के विष तब तक ।।७९०।।

मठ में शत्रु के हाथ लगकर भी छूटा साथी मेरा ।

सही सलामत रहा नवचैतन्‍य उसमें भरा ।।७९१।।

वह अंतुनी पूरे हत्‍या होम का जजमान हुआ ।

कैसे हाथ लगकर मेरे बच निकला मूआ ।।७९२।।

रह-रहकर इन्‍हीं विचारों ने उसे पागल किया ।

मनक्षोभ में ऐसे उसे नहीं सूझ रहा जाए कहाँ ।।७९३।।

संगीनों के घातक हमलों से जन दश दिशा में ।

भागे लोग प्राण बचाकर सुरक्षित स्‍थान में ।।७९४।।

कुछ घायल होकर पथ में ही पड़े गिरकर ।

क्‍वचित् शूर कोई देशघ्‍नों से मरे जूझकर ।।७९५।।

तथापि लोकक्षोभ के तरंगों में डूबोकर ही ।

अत्‍याचारी शत्रु को, उद्दिष्‍ट यह हुआ निष्‍फल ही ।।७९६।।

पर पूर्णत: ही ना हेतु यह निष्‍फलहुआ नहीं ।

प्रत्‍याघात भी हिंदुओं का चखा अंतुनी ने आज ही ।।७९७।।

गोमांतक का जनवृंद हर-हर शब्‍द से रोमांचित हुआ ।

शत्रु का रक्‍त बहा ही था, पर हिंदू रक्‍त भी बहा ।।७९८।।

आज पहली बार रणदेवी हिंदू रक्‍त से तप्‍त न हुई ।

क्‍योंकि म्‍लेच्‍छों की भी रक्‍तबूँद उसमें मिश्रित हुई ।।७९९।।

मध्‍याह्न तक सात सैनिक मारे गए इस झड़प में ।

इतना ही नहीं स्‍वयं अंतुनी भी मारा जाता इस झड़प में ।।८००।।

हाय ! घटना का स्‍मरण होते ही विचारों में पुन: ।

अपनी अक्षम्‍य भूल वीर को चुभने लगी पुन: ।।८०१।।

एक अंतुनी मारा जाता तो सबकुछ वैसे ।

हार सेना की होती, छिन्‍न शीर्ष शरीर जैसे ।।८०२।।

और राज्‍य में सारी हिंदुता उठती सत्‍वर ।

वार्त्‍ता के विद्युत्-स्‍पर्श से नया साहस चेतना भर ।।८०३।।

सौ-सौ बार जहाँ तेज तलवार की पाती ।

पलक झपकने से पूर्व वहाँ तेजी से चमचमाती ।।८०४।।

धर्मग्रंथों के पठन की जुगाली की जिन्‍होंने ।

जीवन संग्राम में जिनमें से कुछ न किया किसी ने ।।८०५।।

वीराग्रणी वह शत्रु को झाँसा देकर ।

भाग जाते समय विचार कर ।।८०६।।

इतने में उस गाँव का युवा मल्‍ल सामने आया ।

'भूतनाथ की जय' बोलकर वीर को मुसकराया ।।८०७।।

हे वीरश्रेष्‍ठ ! भूतगृह से बाहर कूदकर आया ।

सत्‍य ही जन तुझे 'भूतनाथ' कहता आया ।।८०८।।

वीर ने बड़े दु:खद शब्‍द में कहे मान नहीं यह मेरा ।

उन शब्‍दों में स्‍वजाति का है अपमान भरा ।।८०९।।

देव-भूतकृत उस कृत्‍य को मानते जन है ।

जिन कृत्‍यों को हम साहस से न कर पाते हैं ।।८१०।।

ऐसे साहस को भूतनाथ पराक्रम भावना ।

प्रशंसा करना अक्षम्‍य भीरुता को प्रकट करना ।।८११।।

यह भीरुता गोमांतक में गुलामी अहा ।

देखकर जिसे आश्‍चर्य होता सहसा महा ।।८१२।।

अन्‍यत्र कहीं महाराष्‍ट्र में यह घटना होती तो वहाँ ।

स्त्रियाँ तीन सौ कभी न हारतीं तीस शत्रु से जहाँ ।।८१३।।

साथी बोला, 'लहू गोमांतक का हो तो क्‍या '?

उस महाराष्‍ट्र लहू का मात्र प्रवाह ही नहीं क्‍या ? ८१४।।

वही देश जाति वही लहू और नसें भी वही ।

एक बीज होकर भी भेद क्‍यों यह समझा नहीं ।।८१५।।

मूलत: न भेद कोई, उन्‍हें सन्‍मार्गदर्शक का लाभ हुआ ।

श्री समर्थ वहाँ, और यहाँ अलल बछेड़ों को मान हुआ ।।८१६।।

विश्‍वासघाती हुआ सत्‍य जहाँ-जहाँ अहा ।

हिंसक को हिंसा करने देना है इनकी अहिंसा महा ।।८१७।।

अमंगल कार्य करनेवालों को यहाँ बोलते साधु हैं ।

पागल कुत्‍तों को काटने छोड़ना ही इनकी दया है ।।८१८।।

छुरी डाकू की तथा असि भवानी२२जनमोचका ।

इनमें भेद नहीं समझती इनकी अंधभक्ति भाविका ।।८१९।।

अंधता वहीं की जहाँ प्रकाश करे रवि जहाँ ।

आलोक वह स्‍वहत्‍या का पथमात्र दिखाए वहाँ ।।८२०।।

पुरखों के नाम पर बेचे बड़प्‍पन जो यूँ ही ।

बाबा वाक्‍यं प्रमाणत्‍वं, कूपमंडूक प्रवृत्ति ही ।।८२१।।

तेरे दुर्गुण भारत तेरे लिए घातक जैसे ।

तेरे सद्गुण उससे भी अधिक घातक विघातक वैसे ।।८२२।।

तथा वे जगद्घात भी लाते, दुष्‍टों को बल देते ।

तेरे आभास मात्र सद्गुण उनका पोषण करते ।।८२३।।

युवा मल्‍ल बीच में बोला, 'सत्‍य है' जिस क्षण पर ।

हमें आपने जन में विभाजित किया इधर-उधर ।।८२४।।

वीर ने जब जय हर-हर की की गर्जना ।

उसी क्षण लोकसंघ पूरा युयुत्‍सु बना ।।८२५।।

किंतु साधु का भाषण जनों ने सुनकर ।

बोले, 'यही सत्‍यवचनी' दीनता से द्रवित होकर ।।८२६।।

भगवान् की कृपा उसपर कुछ अद्भुत-सा ।

चमत्‍कार कर सबको मुक्‍त करेगा निश्चित-सा ।।८२७।।

ओह ! चमत्‍कार तो सामने-घात देखो जला दिया ।

चौंकी ही ! सभी बदियों को बलात् ही जलाया ।।८२८।।

साथी चिल्‍लाए वीर वह तनिक रुक-रुककर ।

बोला घात है पर सर्वनाश पूरा न होकर ।।८२९।।

अरे, देखो मराठा घुड़सवार चलो सत्‍वर ।

आए हैं अपने बंधुओं की सहायतार्थ बोलो हर-हर ।।८३०।।

मल्‍ल, साथी उसके वीराग्रणी और साथी झट से ।

पुन: रणोत्‍साहे गरजे 'हर-हर महादेव' जोर से ।।८३१।।

वे दस घुड़सवार आए भाला चमकाते, साथी दूजा ।

उनके आगे ! उस रात जो संदेश देकर भेजा ।।८३२।।

सँभाल अंतुनी ! अब होगी भिड़ंत ऐसी ।

देखें सहस्र नरमेध का पुण्‍य रक्षा तेरी करे कैसी ।।८३३।।

गरजत बरसत सारी मराठी सेना ने उसपर ।

तीर के वेग से उस चौकी पर धावा बोला ८३४।।

भीषण दुर्गध जलते नरमांस की जिते जलते ऐसी ।

मूर्च्छित करे उन्‍हें या कोई वायवास्‍त्र ही राक्षसी ।।८३५।।

इतने में जगाए उन्‍हें बाप ! अहहह । कर्कश हाय ! हा !

जलनेवालों की भीषण चीत्‍कारपूर्ण कराह कानों पर पड़ी अब ।।८३६।।

होमकुंड के रक्षार्थ पुराने काल में क्षत्रिय जूझते ।

वैसे ही कली युग में हत्‍याकांड की रक्षार्थ पुर्तुगीज जूझते ।।८३७।।

जैसे शतावधि खड्गों से वैसे ही भिन्‍न सिंधु जल ।

भिन्‍न-भिन्‍न रणभूमि में जिन्‍होंने चखा हुआ जल ।।८३८।।

वीर पाखला ! वैसे ही लड़े रण में रहे उठे ।

हत आहत हुए बिना न कोई रण से हटे ।।८३९।।

अंत में हटते ही रिपु का प्रतिरोध जो ।

मराठा घुसे चौकी में जलती, बचाने जीवित जन को ।।८४०।।

'हाय ! हाय !' पर कहे क्‍या पाप ? क्‍या पुण्‍य भला-बुरा ।

निष्‍पक्ष अग्नि के मुख से कौन बचा जीता जरा ।।८४१।।

काल के प्रवाह में बची हो धुँधली स्‍मृति जैसी ।

एक आचार्य बचे आग से सुनाने घोर घटना वैसी ।।८४२।।

उन वीरों की शूरता रही अकारथ, सब भस्‍म हुए जलकर।

पर कहाँ अंतुनी, क्‍या वह भी वही भस्‍म हुआ जलकर ।।८४३।।

अभिशाप से साधु के वा पापों के निज जैसे ।

एक जीव हजारों की हत्या की तुलना कैसे ? ८४४।।

ना-ना ! उन यातनाओं में आचार्य बोले हँसकर ।

'अभिशाप से नहीं' होता ऐसा तो पुराना होता मरकर ।।८४५।।

पाप से ना ! इस लोक में पाप स्‍वयं होकर तब तक ।

न किसी को जलाता । कोई न सुलगाई जब तक ।।८४६।।

अंतुनी जला नहीं । वह सही-सलामत चला गया ।

समर्पित कर हमसब को अग्नि में चला गया ।।८४७।।

साधु को भी ? उसने ही उसका हित किया ।

सबसे पहले इसलिए ही उसे ही जला दिया ।।८४८।।

ऐसा कहकर, 'अरे गोसाई,' जनपूजा करें यद्यपि ।।

लोभी तेरे जैसा कायर आदमी न देखा कभी ।।८४९।।

जान बचाने अपनी कोई प्रत्‍याघात न करे ।

यह स्‍वयं कहता बार-बार चाहे प्राण हरे ।।८५०।।

पर हम है पापी, ईश्‍वर ही देखेगा हमें ।

ऐसा संकेत से बताने में लाज न आई तुम्‍हें ।।८५१।।

तेरा प्रभाव था जनपर भयंकर ।

भीरुता के कारण जो मेरे लिए हुआ लाभ कर ।।८५२।।

पर कल तेरा वही बने हमें विनाशकारी ।

न मैं समझूँ यह ऐसी अंधी नहीं दया मेरी ।।८५३।।

किया मैंने प्रतिकार तो मुझे अंतुनी ने जलाया ।

प्रत्‍याघात को जन में रोका तो मुनि को जलाया ।।८५४।।

इसके पश्‍चात् सैनिक की ओर मुड़कर अंतुनी ।

गंभीर शब्‍दे समझाने लगा नीति अपनी ।।८५५।।

वृक्ष निष्‍फल, सूखे पड़े अथवा जिन्‍हें ।

उखाड़कर शत्रु के खेत से नहीं रोपा जाता जिन्‍हें ।।८५६।।

बुद्धिमान् माली उन्‍हें ईंधनार्थ जलाता है ।

तथापि फले-फूले वृक्षों को कभी नहीं जलाता ।।८५७।।

न उन पौधों को, जो जिन्‍हें ले जाकर रोपा जाता ।

अपने खेत में सहजता से आग में जलाता ।।८५८।।

पतिता होकर नारी फले-फूलकर भी ।

न जलाए सूज्ञ माली नर सम उसे कभी ।।८५९।।

इस नारी को एवं बच्‍चे को बंदी बनाकर ले जाओ ।

इसी क्षण शत्रु के पुन: आने से पूर्व गोवा ले चलो ।।८६०।।

मूरों ने २३ जीत शत्रु से न धन कभी लिया ।

प्राय: स्त्रियों के रूप में ही कर-दंड वसूल किया ।।८६१।।

औ' अबोध शिशु जिनकी अनखिली स्‍मृति शक्ति ।

गुलाम कर उन्‍हें ले जाना बनी उनकी राजनीति ।।८६२।।

ये बालक यूनानी आज अपना यूनानीपन नहीं जानते ।

नहीं जानते अपने बाप-दादाओं को अपने शत्रु समझते ।।८६३।।

यूनानी बालक आज ग्रीकों के गले काटते वयस्‍क होकर ।

आज इसलाम विजयी हुआ जानी सारी २४ के बल पर ।।८६४।।

जीत स्त्रियों का वंश करोड़ों में बढ़ गया ।

ऐसे नीति-बल से जगत् में इसलाम पुष्‍ट बन गया ।।८६५।।

हमने भी गोवा में पाँव रखते ही युवति जन ।

मुरा के उस सहापत्‍या गुलाम करके पुन: ।।८६६।।

दी दीक्षा उन्‍हें ईसाई धर्म की आज संतान उनकी ।

हमसे भी अधिक अभिमानी है ईसाई धर्म की ।।८६७।।

विवरण दिया आचार्य ने तत्‍क्षण घोड़े पर ।

बलात् बाँधकर पुत्र के संग सती को सत्‍वर ।।८६८।।

आदेश दिया सेना को बंदी राख न हुए जलकर ।

तब तक पहरा दो इस जलती चौकी पर ।।८६९।।

साथ लेकर दो सैनिक अंतुनी घोड़े पर सवार ।

विजयी हुआ, जीवित रहा टेढे मार्ग से चलकर ।।८७०।।

विजयी, जीवित रहा यीशु का आदेश भंगी पग-पग पर ।

जले जीवित जो यीशु सम आचरण रखे जीवन भर ।।८७१।।

आज गाँव यह भी साधु संग जलता जीता ।

यदि यह वीर शत्रु को जनो न रोकता ।।८७२।।

'जन हो' तनिक साँस लेते कराहते पुन: ।

बोले आचार्य अग्निदाह सहते पुन: ।।८७३।।

ग्रामस्‍थ सैकड़ों भक्ति भाव से खड़े चारों ओर ।

बोला, जनो, न आते विरोधक बनकर ये वीर ।।८७४।।

तो अंतुनी ने जीवित ग्राम जला दिया होता ।

अथवा धर्मभ्रष्‍टता की तप्‍ततर आग में झोंक दिया होता ।।८७५।।

अजी आज एक अत्‍याचार का आपने अनुभव किया जैसे ।

दे रहा है अत्‍याचार की पीड़ा अंतुनी ग्राम-ग्राम वैसे ।।८७६।।

यह एक घोर दु:ख भरी कहानी कथन की है ।

ऐसी सैकड़ों दु:ख की कहानियाँ अनकही हैं ।।८७७।।

एक गन्‍ने को पाले पानी दे-देकर, दूजा पेरे कल में ।

गन्‍ना दोनों को लगे मधुर तथा करे दया सम भाव में ।।८७८।।

सारे खाते उसे चाव से छील-छीनकर।

कल में पेरनेवाला भी कहे, वाह ! कितना है रस मधुर ।।८७९।।

गति तुम्‍हारी ईख जैसी चाहो तो सुख से करो ।

जाओ, एक आत्‍मा की चिता में जलकर मरो ।।८८०।।

परंतु एकात्‍मता ॠषि-पुनीत पथ सही है ।

श्रीकृष्‍ण नीति का आचरण आदर्श लगता है ।।८८१।।

दुर्गत से निज देश की दिल पसीजता तुम्‍हारा ।

इन दुर्बल आँसुओं को पोंछो यही कर्तव्‍य तुम्‍हारा ।।८८२।।

आवेश से जय हर-हर गर्जना के साथ घुसो ।

राष्‍ट्र के वीर भद्र सैनिक बनकर महारण में घुसो ।।८८३।।

क्षीण साँस होने लगी, रोने लगा बिलख-बिलखकर ।

जनसंघ उस हुतात्‍मा के चरण में शिशु बनकर ।।८८४।।

धुँधली सी निर्भीक फिर भी वाणी गुरु की पुन: ।

माँगने लगी वचन एक है एक मनोकामना।।८८५।।

इधर, इस क्षण में तुम सारे निकट आओ मेरे।

आओ मुखियाजी, निकट आओ बंधुजन सारे।।८८६।।

इन हुतात्‍माओं की राख गरम है जब तक ।

फहराया जाय हिंदू पदपादशाही का ध्‍वज हम पर कब तक ।।८८७।।

शब्‍द बाहर निकलते ही हाँ-हाँ करते सारे जन ।

फूट-फूटकर रोते-रोते गरजते करते क्रंदन ।।८८८।।

घुड़सवार के साथ जो नई ध्‍वजा रही थी लहरा ।

वीर मराठों ने प्राणार्पण कर जिसे भारत में उभारा ।।८८९।।

वीर ने हुतात्‍मा के कर में 'गुरुवर तेरा सम्‍मान' ।

ऊँची हिंदू पद की यह ध्‍वजा पकड़ेगातू नहीं तो कौन ? ८९०।।

वहीं पर ग्राम मुखिया के संग सब जन प्रतिज्ञा कर ।

उष्‍ण रक्षा हुतात्‍माओं की साक्षी कर ।।८९१।।

पुन: पुर्तुगीजों को पाँव न रखने देंगे कभी ।

आज के पूर्वजानों से पूजित स्‍वतंत्र पवित्र हे मही ।।८९२।।

आँसू भरी नयनों से वीर ने सारा वृत्‍त्‍ लिख डाला ।

इसे अंताजी पंत को भेजने का प्रबंध कर डाला ।।८९३।।

राष्‍ट्रवीर प्रधान श्री बाजी हर्ष निधान से की प्रार्थना ।।

भार्गव ग्राम स्‍वराज्‍य में समाया यही हमरी अभ्‍यर्थना ।।८९४।।

ग्राम मुखिया ने पत्रिका पर किया हस्‍ताक्षर ।

उसमें रक्षा हुतात्‍माओं की विभूति रूप में दी भर ।।८९५।।

हाथ का ध्‍वज धीरे-धीरे थामकर मरणासन्‍न गुरु ने ।

नव शिष्‍य के हाथ थामकर 'ध्‍वजा कभी न देना झुकने' ।।८९६।।

भले ही प्राण जाए, हाँ चलो, बोलो हर-हर ।

जनवृंद ने रोते-रोते ही की गर्जना बार-बार ।।८९७।।

अंतिम पुष्टि देने के लिए उसी गर्जना में ।

शेष साँस अपनी हुतात्‍मा ने मिला दी उसमें ।।८९८।।

पर उसकी साँस ? हिरनी सम ले गए घसीटकर ।

किसमें मिलाएगी साँस अपनी रो-रोकर ।।८९९।।

प्रयास करने पर भी रमा न छोड़ सकी अंतिम साँस ।

दुखियों के प्राण भी ना छोड़े झट से तन की आस ।।९००।।

उसकी वाणी, निद्रा, भूख, आँसू हाँस।

सूख गया सबकुछ रमा बन गई जिंदा लाश ।।९०१।।

दशा थी उसकी गरमी की शुष्‍कजल नदी समान ।

अंतुनी के घर में पड़ी भ्रष्‍ट स्‍पृष्‍ट अबला समान ।।९०२।।

पुत्र या पति ? हाँ जी बोली पुत्र या पति ।

कभी ऐसे पूछती देखी गई भ्रष्‍ट मति ।।९०३।।

कभी तो वह प्रेम से गोद में ले लेती ।

कभी अचानक परे धकेलकर भाग जाती ।।९०४।।

'मुझे ! अजी जलाओ ! चाहे तो बच्‍चे को भी जलाओ' ।

इस अग्नि की ज्‍वालाओं संग वचन अपने निगलती ।।९०५।।

बंदीवास कुछ मास सहकर एक बार ।

सहसा मुक्‍त होकर भागे गोवा की सड़को पर ।।९०६।।

सुविशाल, निला-साँवला गहरा सागर ।

देखते ही तत्‍काल वह भागी उसकी ओर ।।९०७।।

'हाय ! हाय ! इतना पानी होते हुए संसार में ।

प्रचंड जलती आग देखती बैठी रही मैं ।।९०८।।

ऐसी सौ-सौ आग बुझाएगा ऐ तू सागर ।

तुझसे अधिक शीतल, दयाशील नहीं है ईश्‍वर ' ।।८०९।।

इतना कहकर धोती ऊपर समेट कूद पड़ी सागर में ।

समय डूबे काल सागर में वैसे गुप्‍त हुई महासागर में ।।९१०।।

किंतु शंकर ? ऐ जूही के कोमल फूल ! तेरा क्‍या होगा रे !

मैया के चले जाने पर दुधमुँहे मधुर बालक रे ।।९११।।

टिप्‍पणियाँ : १. संथागार - Town hall.

२. इसलाम - मुसलमानी धर्म ईसा ख्रिस्‍ती धर्म ।

३. पुर्तुगीजों ने गोमांतक जीता उस समय यात्री हवाई जहाज की खोज नहीं हुई थी ।

४. पोप - pope - ईसाइयों का धर्मगुरु ।

५. हिंदवी- हिंदू ।

६. बाजी- पहला बाजीराव पेशवा ।

७. सोमनाथ - सोरटी सोमनाथ - महमूद (गजनी) ने तोड़ी हुई मूर्ति ।

८. देवपुत - जीसस ख्राइस्‍ट ।

९. धर्मशासन इक्विशन नामक संस्‍था जो यूरोप की तरह ही गोवा मे भी प्रस्‍थापित की गई थी । उन हिंदुओं को जो सरेआम स्‍वधर्मकृत्‍य करेंगे, इस अदालत के सामने दंड दिया जाता और कभी-कभी जीवित जलाया भी जाता ।

१०. ईसाई धर्मविधि के अनुसार विवाह की न्‍योयोचित समझा जाता- इस प्रकार पुर्तुगीजों का नियम होने के कारण, हिंदू धर्म विधिनुसार संपन्‍न विवाह विवाह नहीं समझा जाएगा, ऐसी हिंदू स्त्रियों को विवाहित स्‍त्री का स्‍थान नहीं मिल सकता, उसे वेश्‍या ही समझा जाएगा । उस समय अनेक पुर्तुगीज अधिकारियों ने इस प्रकार के आदेश प्रसृत करते हुए उसके अनुसार नैबंधिक काररवाई की हैं ।

११. स्‍पैनिश धर्मशासन के इतिहास में यह पीटर 'Red rod और एक-दो न्‍यायाधीश तथा Inquisition के कार्य करनेवाले नेते विख्‍यात हैं ।

१२. अजपाल - ईसा मसीह और झुंड-ईसाई जनता ।

१३. प्रसव ।

१४. बाइबल कथा में कहा गया है कि किसी पुरुष से संबंध होने से पहले ही मेरी कोख में गर्भ ठहरा-वही ईसा है ।

१५. धर्मशासन - Inquisition संस्‍था ।

१६. ये सारी बाइबल की प्रमुख आज्ञाएँ हैं - Kill not, Commit not Adultery, steal not, Covet not by neighbour's house not his ox or his ass.

१७. क. Covet not thy neighbour's anything. ख. Judge not. th Bible.

१८. देवपुत्र - ईसामसीह एक बार एक व्‍यभिचार के अभियोग में ईसा ने दंड कबूल न करते हुए उत्‍तर दिया था ।

१९. यह श्‍लोक धम्‍मपद में भी आया है ।

२०. मूर-मुसलमानों को पुर्तुगीज 'मूर' कहा करते थे । उनके देश से मूरों की स्‍पॅनिश तथा पुर्तुगीजों द्वारा खदेड़ने पर वे उनका पीछा करते हुए विश्‍व भर में चले गए । हिंदुस्‍थान में भी मुसलमान देखते ही 'मूर' कहते हुए उनसे युद्ध करते ।

२१. कोलंबिया -अमेरिका ।

२२. भवानी-श्री शिवाजी महाराज की भवानी तलवार ।

२३. अ-सद्गुणविकृति-इसके विस्‍तृत विवेचनार्थ छह सुवर्ण पन्‍ने पढ़ें । समग्र सावरकर खंड-२१ ।

२४. मूर-मुसलमान राष्‍ट्र ।

२५. जानिसारी-तुर्कों ने मुसलमानों की रणनीति का अनुसरण करते हुए ग्रीकों के जो बच्‍चे गुलाम बनाकर उन्‍हें वे ले गए वही बच्‍चे मुसलमानी धर्म की दीक्षा देते हुए सुलतान के शरीर रक्षक दल में भरती किए गए । यही 'जानिसारी' नाम से इतिहास में प्रसिद्ध तुर्कों की अत्‍यंत विश्‍वसनीय सेना है ।

२६. इसलाम - मुसलमान ।

२७. पाखला-गोवा के भारतीय लोग पुर्तुगीजों को पाखला कहा करते ।

गोमांतक (उत्‍तरार्ध - १ )

(ईसवी १७५८ का समय )

सब पत्‍ते निकल गए, और शुष्‍क-से

अस्थिपंजर-सा खड़ा क्षीण वृक्ष जो

बरगद का, ॠतु वसंत की हवा जभी

मंद-मंद चलती है तब वन सारा

फल-फूलों से समृद्ध डोलत है, तभी

पल्‍लव-लक्ष्‍मी का ऐश्‍वर्य प्राप्‍त कर

शोभत है नवजीवन-पुष्‍ट बना-सा

इतना कि न जान सकें यही वृक्ष वह

जब तक कोई उसकी पहचान कराए

भार्गव भी अब बिना पहचान कराए

कोई ना जान सके । जलप्राशन करते

भीत हिरन-सा जो भय विह्वल था

बीस वर्ष पूर्व !! आज कोंकण-स्‍थल में

हिंदू स्‍वातंत्र्य वसंत ॠतु समीर से

वन सारा फल-पल्‍लव पुष्‍प सजा के

खिलता है तब नूतन जीवन रस से

लहलहा रही भार्गव की तरु-लताएँ ।

आज द्वार उसका यह लोह का बना

सुस्थिर, और बाँस का यह नया बना

परकोटा ऊँची दीवार का यहाँ

वैसे ही बलशाली वक्ष है तना,

राष्‍ट्र स्‍वातंत्र्यजनित आत्‍मतृप्ति से

क्षितिज उसी ग्राम की पूर्वदृष्टि का

विस्‍तृत अब, तेजस्‍वी नए सितारे

नव कांक्षाओं के अब उदित हो रहे

छोटे नभ में उस ग्राम जीव के ।

आज यहाँ आस-पास के किसी कहीं

मेले की दंगल की हो नहीं रही

चर्चा; पर दिल्‍ली की होत चाव से !

क्‍योंकि युवक ये कितने अब यहाँ के

महाराष्‍ट्र-भूसेना में दाखिल होकर

दूर-दूर के रण में आज कर रहे

अपनी तलवारों का अद्भुत तेज करिश्‍मा

और नौसेना में जलसमर में

हुतात्‍मा श्रीगुरुजी के पुत्रों में

काशी से वेदों को पढ़कर आया :

उस युवा पंडित ने गुरुगृह में ही

वेद-पाठशाला को स्‍थापित करके

पहले से शतगुना उसे बढ़ाया ।

मल्‍लयुवा जो वीरों के समेत ही

अंतुनी के साथ लड़ा, उसे बना दिया

ग्राम का पटेल ही पेशवा प्रभु ने ।

मूँछें उस पटेल की भव्‍य रोबीली

भय-आदर न ग्रामवासियों के केवल

बल्कि रिपुओं के मन में भी जगा रही

हैं अब । औ' आज उसी छोटे-से ही

अखाड़े का ही बन गया अकस्‍मात्

मंदिर प्रचंड एक; जिसमें युवकों ने

मूरत हनुमान की स्‍थापित कर दी हैं ।

हर हमेश जता है वहाँ नगाड़ा :

घुड़सवार सज्‍ज वहाँ पहरा करते ।

उस मंदिर से भी पर अति प्रचंड-सी

संस्‍था इस अवधि में जनम लेत है

भार्गव में; वह जिंदा जलाए हुए

हिंदु-हुतात्‍माओं की स्‍मृतिस्‍वरूप जो

दहनस्‍थल पर बनाई भव्‍य समाधि ।

इस समाधि-मंडप के लिए पेशवा

भूमि का प्रबंध करत, और स्‍वयं ही

मेले का आयोजन हर साल करत हैं ।

यह नक्‍शा बदल गया ग्राम का सभी

विगत बीस वर्षों में सब बदल गया :

लेकिन जो खिलते ही फूल लता का

टूट गया, उसका क्‍या हाल हो गया ?

प्‍यारे-से बच्‍चों का क्‍या हो गया ?

क्‍या पता !- परंतु एक दिन भार्गव में

अचानक ही प्रसृत हो गई वार्त्‍ता

हर कोई हर किसी से कहने लगा था

अचरज से चौंककर ! और जिसने यह

वार्त्‍ता बतलाई थी उस मनष्‍य को

पटेल भी इज्‍जत के साथ बुलाकर

पूछने लगा कि आखिर सत्‍य क्‍या है

मनुष्‍य ने कहा, 'यहाँ न मैं हूँ केवल

अनजान शख्‍स । बहुत-से लोगों ने भी

श्रीनिनामि बाबा के मठ के भीतर

बाबाजी की सेवा करते हुए मुझे

देखा होगा निश्चित उन दिनों में ।

विप्रज मैं, नाम शुक्र, सज्‍जन-सेवा में

जीवन बिता रहा, तीन साल पहले

इसी ग्राम में कांड हुआ था भयंकर,

सज्‍जनों को जिंदा जलाया पुर्तुगीजों ने :

सुनकर यह खबर और संत निनामी

बाबाजी की मृत्‍यु से शोक व्‍याप्‍त मैं,

आखिर यह सोचा कि तब तक जैसे

जीवन था मेरा ओदश से चला

उसी तरह अब उनसे पूछकर ही मैं

जानूँगा कार्य नियत क्‍या मेरे लिए

अत: मैंने निरशन व्रत अपनाया और

शिवमंदिर में बैठ गया घने जंगल में

तब नौवें दिन मैने दृष्‍टांत पा लिया

'जाओ ! औ' अंतुनी के कब्‍जे से अब

छुड़ा लाओ चिरंजीव रमापुत्र को

मुझ पर श्रद्धा रख के मृत्‍यु हो गई

उसके पति की, पर वंश-रक्षा करूँगा !!

जाओ, जाओ शीघ्र !!!'- सुनकर आज्ञा

प्रत्‍यक्ष संत-महात्‍मा की, मैं उठ गया ।

विनय मुझे कहने न देत पहुँचा कैसे

गोवा में; अंतुनी ने जान ही लिया;

कैसे मुझको दिख पड़ा वह बालक, पर मैं

किसी से भी अनदेखा पहुँच ही गया;

कैसे अदृश्‍य रूप में मैं सहसा

पहुँच गया उस दुर्जन के गृह में भी

और लेकर अर्भक निकल पड़ा मैं

वापस आने को; यह सब ब्‍योरा

विनय मुझे कहने ना दे रहा अभी ।

इतना ही कहता हूँ वे अद्भुत सारे

कार्य किए मैंने उस समय अचानक

वे सारे अत्‍यद्भुत संतशक्त्‍िा के

कार्य रहे !-मैं नाचीज क्‍या कर सकता ?

जननी उस बालक की थी रमा, वही

पहले ही मृत हुई, जब पता चला

तत्‍काल मैं निकल पड़ा तब वहाँ से ।

तब जैसे मुँह से यदि कोई छीन ले

कँवल तब टूट पड़त शेर दहाड़ के

वैसे ही टूट पड़ा अंतुनी मुझ पर ।

अस्‍त्रों की, शस्‍त्रों की, रिपुसेना ने

की थी भरमार !- किंतु मैं अकेला

ब्राह्मण था मंत्रबली पर्वत जैसा,

शत्रु आक्रमण सारा विफल हो गया !

लेकिन वह बालक था नाजुक-कोमल,

बुखार से, प्‍यास से और भूख से

व्‍याकुल बहु हो गया, मैं विवश हो गया

फिर भी तब तीन दिनों तक जूझा मैं

करुणाधन प्रभु के ही लीन पदों में

'आओ प्रभु ! मदद करो, तुम ही सहारा !'

सुनते ही मेरी यह करुण प्रार्थना

साक्षात् वे दिव्‍य विमान में बैठे

संतराज आ पहुँचे ! लेकर बच्‍चे को

दिव्‍य स्‍वर में मुझ से कहा उन्‍होंने

'जाओ हम वंश को पालें-पोसेंगे

स्‍वर्ग में !- वही पुण्‍य गति है इसकी !!

लेकिन अब एक ही कामना रही

इसी वंश की, उसको तुम ही निभा लो !

गाँव में है इस कुल की पूज्‍य वास्‍तु

उसमें इनके कुलदेवता की ही

स्थापना करो - औ' तुम नित पूजा करो !

यही तुम्‍हारी मोक्षेच्‍छा का साधन है

स्‍मृति इस कुल की शाश्‍वत भी यही करेगा !'

'आज्ञा ! पर मैं तो जानता नहीं

कौन देवता है जी इस कुल का भी ?'

पूछा मैंने : तब संत ने कहा

'जाओ ! औ' तुलसी के गृह-आँगन में

ताखे में मिल जाएगी कोदंडधारिणी

राम-मूर्ति, करो तुम स्‍थापना उसी की !

यही सबूत दिव्‍य रूप साक्षात्‍कार का

तुम्‍हारे लिए, तथा सभी के लिए !'

कहकर ऐसे, बालक को लेकर सहसा

देखते-देखते संत जी अदृश्‍य हो गए !!

तुकया का सतनु गमन सुना आपने ।

पर अत्‍यद्भुत यह श्रीसंतनिनामी

बावा का, सतनु शिशु को लेकर, नभ में

आरोहण साक्षात् देखा है मैंने !!'

और दिव्‍य दृश्‍य फिर से वह पुन:-पुन:

प्रत्‍यक्ष साकार हो, ऐसे नयन उस समय

विप्र के मुँद गए ! तनु कंपित हो गई;

सहसा ही शांत-मूक हो बैठा वह ।

अर्धसमाधिस्‍थ विप्र देख इस तरह,

लोगों के मन की आशंकाएँ सारी

मिटकर, श्रद्धा-आदर जग उठा सहज !

थोड़ी-सी चर्चा के बाद तय हुआ

जाएँगे, देखेंगे मूर्तियाँ वहाँ :

कुछ लोगों ने संशय व्‍यक्‍त भी किया

इतने दिन क्‍या सचमुच मूर्तियाँ होंगी ?

-उत्‍सुकता से ब्राह्मण ताली बजा के

बोल पड़ा 'होनी ही चाहिए वहाँ !

दिव्‍य वचन झूठ कभी होगा ही नहीं!

फिर भी पंचों को लेकर जाइए वहाँ

क्‍योंकि न आगे भी कभी व्‍यर्थ न कोई

पाखंड कहे मूर्तियाँ न असली है ये !'

पंचों के साथ चले गए लोग वहाँ

तब उसी स्‍थल रामप्रभु-मूर्तियाँ मिलीं !

लोगों की जयध्‍वनि से भरा आसमाँ !

बस फिर क्‍या ! दिव्‍य कथास्‍पर्श हो गया

ग्राम की महानता और बढ़ गई

ग्राम बना क्षेत्र: और विप्र महात्‍मा ।

इच्‍छा उस वंश की समझकर तभी

गेह बना मंदिर और भूमि वहाँ की

प्रभु का धन मानकर, अर्पित कर दिया

शुक्र को वहाँ के ही सभी जनों ने !!

और प्रतिवर्ष वहाँ लगने की लगा

मेला इक नया हुतात्‍म-वीरवरों का

भव्‍य समाधि-स्‍थल पर, उसमें वह द्विज,

जिस कथा-निरूपण को विनय रोकता

था पहले-वही कथा वर्णन करते

बैठता इतने प्रभाव के साथ कि देखो,

अठारह पुराणों की रम्‍य कथाएँ

उससे सब फीकी लगने लगी तभी

अद्भुतता के हिसाब से । औ' जल्‍द ही

राष्‍ट्र के संतकथा-सिंधु में इसी

कथारूप बिंदु का समावेश हुआ

ऐसी उसमें वह घुल-मिल गई

कि स्‍वयंप्रमाण बन गई नवकथा तभी ।

प्रतिवार्षिक पुण्‍यतिथि प्रथित हो गई :

मेले का रंग जमा जोर-शोर से

ग्राम के चारों तरफ आज भीड़ है

इतनी कि पहले देखी न कभी किसी ने !

क्‍योंकि है इसी वर्ष मेला बहुत ही

महत्‍वपूर्ण बन गया है आगमन से

कतिपय अधिकारी औ' शिष्‍ट जनों के,

जातिकार्य नव विशिष्‍ट करने हेतु

पूर्वकाल में लोगों को पीड़ा जब थी

तब म्‍लेच्‍छों के बल से या छल से खल

भ्रष्‍ट कर रहे थे दीन हिंदुओं को

उन सब परधर्महृत बंधुजनों को

पुनर्हिंदु संस्‍कारों से कर शुद्ध

सुस्‍वागत पितृगृह लाना है आज ।

इसी जातिकार्य हेतु आज यहाँ पर

मेले में यह अपूर्व भीड़ हो गई

छत्रपति ने भी इस कार्य के लिए

अनुमति दे दी है औ' अपनी तरफ से

भेज दिए है पंडित साभिनंदनम् ।

सम्‍मतता दरशाने शिष्‍यजनों को

भेज देत या आते है कितने ही

कोंकण के देशमुख्‍य राज‍कीय जो

अधिकारी, वे भी अपनी सेना के संग

सपरिवार आते हैं, तथा आंग्रे

घोरपडे, सावंत, सब सरदार सिंधु के

तंबू में, डेरे में, रावटियों में

शूरता, समृद्धता-पधारी यहाँ ।

पालकियों, मियानों में या कोई

हाथी के हौदे में रोब जमाकर

जाते है प्रथित महाराष्‍ट्र अग्रणी,

देखत है मुदित महाराष्‍ट्र भक्ति से ।

सींगों की खणणणण फूँक है वहाँ;

बजत नगाड़े औ' चौधड़े सभी;

घंटा या घंटी या गजर बजत है

पेड़े की, जलेबी की सजा-सजा के

थालियाँ हलवाई लाते, फलवाले भी

रस-भरे नए, नए फल बेचत हैं

टोलियाँ रंग भरी नौटंकी की ;

चक्रदोले नागरदोले और खिलौने,

झूले मजे-मजे के खेल-ऐसा

बड़ा मेला न किसी ने देखा है !

वीर हुतात्‍माओं की भव्‍य समाधि

उस स्‍थल पर चींटी भी जा न सकेगी !

संकीर्तन, भजन, नामघोष आदि से

चल रही बिना विघ्‍न वह उपासना ।

शत जन मन्‍नत माँगत : शत-शत और

मन्‍नत पूरी करते : और शतावधि

जन भाविक सुनते हैं दिव्‍य कथाएँ

सतनु रमातनय के सहित निनामी

बाबा के स्‍वर्गारोहण के विषय में,

और महान् सिद्धि के उत्‍तराधिकार

जो शुक्राचार्य विप्र कथा कहत हैं,

उनके चरणों का नमन पुन:-पुन: करते ।

हुत संत-महात्‍मा की पावन पादुकाओं के

दर्शन करने इतनी भीड़ लग गई

कि मंदिर वह प्रचंड लगा किरकिर हिलने !

चौकी का समाधिमंडप में सहसा

रूपांतर होत है : तब था असहनीय

दहनस्‍थल जो, वही यही ! जी बचाकर

जिससे दूर-दूर जितना हो सके

भागे थे लोग, मरते थे प्रतिपल ही :

-आज उसी वास्‍तु के आस-पास में

लोग भीड़ करत सहस्र, आगे बढ़ने

दहनस्‍थल रम्‍य, वहाँ पहुँचने हेतु

शीघ्र ,शीघ्र, शीघ्र ! काल उलटी गति लेता !

दिन सारा व्‍यतीत होत संकीर्तन में

नमन-अन्‍नसंतर्पण विक्रय-क्रय में

यात्रा में फिर आई क्रमश: वेला

मुख्‍य कार्य करने की शुभमंगल वेला

वृक्षमंडित उस विशाल आँगन में तब

लोग इकट्ठा होने लगे शौक से ।

बीचोबीच बैठक विस्‍तीर्ण सुशोभित

उस पर बिठा लेते थे बहु आदर से

पटेलजी स्‍वयं उनका स्‍वागत करते

कोंकण के नेता जो हिंदुजनों के,

प्रतिनिधिस्‍वरूप लोग इस सभा में

थे सारे उपस्थित, और अन्‍य भी कई

आए थे महाराष्‍ट्र से प्रमुख लोग सब

म्‍लेच्‍छीकृत निजबांधव-मोचन हेतु

कार्य के लिए उपस्थित सभा में ।

श्रृंगों की, सींगों की फूँक सैनिकीय

रणगीतों का गायन, बंदूक-बार भी !

सैनिक रणशूर शस्‍त्रसज्‍ज हो गए;

सैनिक जलशूर और नाविक दल के,

शास्‍त्री, विद्वान, वैद्य, वष्णिक और महान्

संन्‍यासी, योगी भी सभी आ गए ।

एक पालकी के पीछे और पालकी

एक के तुरंत बाद औ' सरदार :

संपन्‍न कार्य को करने भव्‍य-दिव्‍य-से

म्‍लेच्‍छीकृत निज बांधव-मोचन करने ।

आ पहुँचे राजमुख्‍य : उठकर सबने

सत्‍प्रलयुत्‍थान किया । शब्‍द विविध और

स्‍तब्‍ध हुआ, चित्र के समान स्थिर सभा ।

राजमुख्‍य सत्‍ता गंभीर, पर मृदु-

स्‍वर में करके स्‍वागत सभासदों का,

अखिल समागत निजजातीय जनों का,

कह पड़े : 'हे वीर राजकार्य कर :

सैनिकों, नौ सैनिकों विद्वान् अभिजनों

नागरिकों, जानपदों, आबालवृद्धों

आज हमारे इस परशराम क्षेत्र में

यह दिन अति हर्ष भरा उदित हुआ है

उदित हुआ, पर कैसा ? इसी वृक्ष के

तले यहाँ हीन-दीन हिंदूजनों के

अंतुनी का हिंस्र स्‍वर सुनने से ही

प्राण कभी चल पड़े ! महिलाएँ, बच्‍चे

आँखों के सामने भ्रष्‍ट किए थे

ले गए म्‍लेच्‍छ उन्‍हें, तब कोई भी

माई का लाल न था, जो रोक रहा था :

-उसी वृक्ष के तले आज इस प्रसंग में

हम हैं : ये शस्‍त्र तीक्ष्‍ण हैं हमारे :

यह भगवा झंडा; दुर्धर्ष और यह

हिंदूध्‍वज सुशोभित है ! आज कोंकण में

हिंदुओं का द्वेष-गोरा या काला,-

कौन है अब इस दुनिया में ही भला

देख सके जो इधर वक्र-दृष्टि से ?

न्‍यूनाधिक अवधि बीस वर्षों का ही

बीत गया आज उन दिनों के लिए

जिस दिन जिस नृशंस चिताग्नि में ही

जला दिया जिंदा ही लोगों को यहाँ

पुर्तुगीजों ने, केवल वे हिंदू इसलिए!

नित्‍य यही चलता था पोर्तुगीजों का

खेल एक मनगढ़ंत; यद्यपि ऐसे

गाँवों पर शत-शत थे चलाए तभी

धर्मपीड़न के हल, निर्दय-क्रूर

आज तक निर्लज्‍ज रूप में उन्‍होंने;

तत्रापि जभी जला दी थी नर-चिता

हाथ ही न जल गया था पर कभी-

जैसे सहसा उस दिन भार्गव में ही !!

न्‍यूनाधिक अवधि बीस वर्षों का ही

बीत गया होगा : उसी नर-चिता के

भस्‍म की धर्म हुतात्‍माओं के ही

सौगंध खाकर जनिका घोषण कर उठा

दास्‍य-मोचन की यह ग्राम छोटा-सा :

एक के तुरंत बाद एक नगर में

गूँज उठी दीप्‍त वही घोषणा महान्

रणगर्जना बनी शीघ्र उसी की !!

सिद्दी, अंग्रेज, पुर्तुगीज आसुरी

शक्तियों क सिंहासन जिस पर स्थित है-

स्‍तंभ को उसी हिंदू सहनशीलता के

हरि-विद्वेषान्वित असुर लात मारत हैं !

तभी असह कडकड ध्‍वनि के साथ देखिए

स्‍तंभ से उसी प्रकटत हिंदू शक्ति का

मूर्त-नृसिंह जैसा वह वीर चिमाजी !

कंप उठत असुरदल, निर्दालन किया

शामलीय कंद उखाड़ कंदन ही किया

रावण-से राक्षस का वध किया बली

सिद्दी सात : एक हाथ से : औ' देखो

हाथ से दूजे उस नरतिमिंगल

धर्मोन्‍माद को ही गौरासुरों के !

सिद्धांत अहिंसा का जब बतलाने गए

संत शतावधि, सारे हुए हुतात्‍मा

हिंसा के, जिस भयानक पशु की :

-व्‍याघ्र आफ्रीकी वह, वह वृक यूरप का ;

आज बना निरुपद्रवी सहसा वही

हिंसा करने की ना क्षमता अब उसकी !

आमूलात् साफ किए तोड़ उसी के

दाँत और नख सारे । गाय बन गया

धर्मखड्ग के प्रभाव से ! कोंकण में

हरिनामोच्‍चारण था पाप ही कभी

देहांत की थी सजा : आज परंतु

वहीं हरिनाम घोष, नित्‍य हो रहा

हरिभक्‍तों के जत्‍थे हर्षोत्‍कट हैं !

-आसमुद्र-सह्याद्रि ! प्रबल आज है

कोंकण में धर्म, ध्‍वज, धेनु और भी

हिंदू-स्‍वातंत्र्य है : हिंदू-यश भी है :

देवार्चन हो रहा मंदिर-मंदिर में

हत अहिंदू-खल बल है अब कोंकण में :

निर्विघ्‍न और होती है कोंकण में ही

मसजिद में, गिरिजाघर में अर्चना

अहिंदुओं की भी : हिंदूशक्ति का

है आत्‍मौपम्‍य मृदुल यह स्‍वभाव ही

बहुश: निरुपद्रविता परसहिष्‍णुता

आसमान चीरकर यह घोर रात्रि का

स्‍वर्गमय दिन आया है भूमि पर

लाने में इसको जो प्राणार्पण किया

धन्‍य हैं वे हुतात्‍मा ! अतुल भागवान् !!

देवभक्‍त, देशभक्‍त वीरगुरु श्री

ब्रह्मेंद्रस्‍वामी वे तपस्‍वी महान्;

हिंदुओं के थे वे मूर्त देवता

श्रीमथुरा देवी थी; सिंधुवीर थे

सेखोजी, मानाजी-वंश ही पूरा

आंग्रे का अखिल; अखिल खड्गधारी थे

मोड, मोहिते, शिंदे, शूर पिलाजी;

युद्धकुशल था वह बांकाजि वीर भी

शत्रु को ध्‍वस्‍त किया 'चिपळुण में ही;

खंडोजी धैर्यशील; रणकुशल खराडे;

अंताजी और रामचंद्र कावळे

गर्व जिन्‍हें हिंदुत्‍व का प्रखर रूप में ;

गंगाजी नाइक, पटवर्धन श्रमी

राणोजी-मुक्‍त किया डहाणू जिसने ?

वीर रेटरेकर, जो शत्रुघ्‍न महान्

तारापुर के हमले में जूझ-जूझकर

अभिमुख ही समरांगण में गिर गया;

वीर गिरा; वीर-ध्‍वज पर फहराया

तारापुर के हमले में रिपुसेना में

माहिम, शिवगाँव लिया । लिया बांदरा

धारावी, वासावे, और अंत में

भिड़ गए मराठे वसई से !- जिसका

नाम ही अतुल पराक्रम-चित्र को

दृष्टिगम्‍य करता है ! वीर हैं जयी :

और इन्‍हीं वीरों का अखिल विजेता

वीराग्रणि चिमणाजी वीर ही स्‍वयम् !

सैनिक या सेनापति किस किसी की

सराहना करें ! जो सहस्र गणना

योजक, जुझारू, धर्मवीर, हुतात्‍मा

धर्मयुद्ध-यज्ञ में प्राणार्पण करत हैं

पुण्‍य परशुराम क्षेत्र को करने हेतु

दैत्‍यमुक्‍त पुनरपि-वे धन्‍य सभी हैं !!

और उन सभी वीरों की उपकृति है

आज महाराष्‍ट्र अखिल और विशेषकर-

परशुराम क्षेत्र निवासी हम सब-

परम नम्रता से याद करते है यहाँ

हिंदुओं की शिखा की रक्षा कर दी !

चरणों में उन सबके यह सभा खड़ी

अति कृतज्ञ, औ' विनम्र, अर्पित करती-

है राष्‍ट्रीय पुष्‍पांजलि परम भक्ति से !!'

सर्व सभा ने तब प्रत्‍युत्‍थान कर दिया :

श्रृंग, शंख, सींग, ढोल और नगाड़े,

घोष सभी वाद्यों का अर्पण करने

धर्मवीरों की स्‍मृति को जनिक वंदना ।

गंभीर क्षण, कृतज्ञ साश्रु रूप में

निकल गए । वाद्यों का नाद भी सभी

शांत हुआ । वाक्पिपासु सभा हो रही ।

और राजमुख्‍य की युक्‍त्‍यलंकृता

वाणी पुनरपि अविरत प्रकट हो गई

'बंधुजनो ! हतवीर-स्‍मृति का कर लो

सम्‍मान कृतज्ञता से, लेशमात्र ही

पुण्‍यति‍थि के हा गए अग्रतम हम सभी

कर्तव्‍याचरण में : पर हतों से भी

पुण्‍य कार्य संगर में वैसा ही शौर्य

दिखाकर सुभाग्‍य से विजय देखने

जीवित जो रहे ऐसे महान् जनों की

उपकृति क्‍या थोडी भी न्‍यून होत है ?

तो भी अब इसी मुहूर्त पर पुण्‍यहतों के,

हिंदू स्‍वातंत्र्य रण में जूझे थे जो

कोंकण में उसी तरह;और कृपा से

ईश्‍वर की, आज भी जो उस ध्‍वजार्थ ही

अन्‍य दिशा में, अन्‍य क्षेत्रों में जूझत हैं-

उनकी भी स्‍मृति को हम क्‍यों न याद करें ?

उनकी भी सत्‍कृति क्‍या सत्‍कार्य नहीं है ?

पुण्‍यतिथि के समय पुण्‍यजनों के ?

इन ग्रामस्‍थों में ही है एक जो कभी

अंतुनी के विरोध में प्रथम खड़ा था

टूट पड़ा प्रथम, वीर पुरुष यहाँ भी

है अभी !' कौन वह, आप से भला

कहना क्‍या मुमकिन है !' जनिक गर्जना

'पटेल है ! पटेल हैं !' सभा में भरी

'हाँ, जो हाँ ! ये पटेल ही है ! और

जो हुतात्‍म रक्षा इस गाँव के खेतों -

को धन्‍य कर उठी, उसमें धन्‍यतमा जो

रक्षा उस गुरु की- तनय उसी का !

दोनों को आज मैं वर्तमान सभी

वीरों के अखिल स्‍थान पर बिठाकर

सार्वराष्ट्रिक सम्‍मान अर्पण करूँगा

आइए पटेल ! और पेशवे प्रभु ने

भेजा है स्‍वयं तीक्ष्‍ण कृपाण, लीजिए;

लटका भी दीजिए कटि पर, धर्मशत्रु को

रहे सदैव दुर्धर ही तेज इसी का !

और हे गुरुकुमार, वचन सत्‍य है

'आत्‍मा वै पुत्र :' तुम्‍हरी मूरत में ही

देखें हम मूर्ति तुम्‍हरे वीर-पिता की !

वही ठहरा अग्निहोत्री सत्‍य रूप में

होमाग्नि में बलि खुद की अर्पण कर दी

औ' अहिंदू-शत्रु-शक्ति की भी साथ ही !!

पूजा में गुरु चरण स्‍मृति की और

पांडित्‍य की पूजा में, पंडिताग्रणे !

एक पर्ण तुलसी का मानो जैसे

तुम्‍हें समर्पित है यह छोटा-सा उपहार !

श्रीमान् स्‍वयं पेशवे प्रभु ने ही यह

भेजी है शॉल तुम्‍हें-हिंदुत्‍व के ही

सम्‍मान में स्‍वीकार करो, पहन लो इसे !!'

सकल सभा जयध्‍वनि से गूँज उठी और

दोनों का सम्‍मान किया । तेगबहादुर -

पर पटेल शरमाए उस समय जरा

बोल उठे- 'सम्‍मान है उसी वीर का

जिसने मुझको तब यौवनोद्गम में

दीक्षा दी देश स्‍वातंत्र्य युद्ध की

तारापुर के हमले में और तभी जो

रणमुख में लड़ते-लड़ते ही गिर गया !'

मंत्र तभी ब्राह्मण भी साश्रु कह पड़ा

'तस्‍मै श्रीगुरवेदं ! न मम किंचित् !'

स्‍वयं इत्र, गुलाब औ' पान भी दिया

राजमुख्‍य ने दोनों वीरवरों को

खंडित वाणी फिर से झरने लगी

'राष्‍ट्र के लिए करते हैं प्रयास जो

उनकी उपकृति को जो न भुला दे

ऐसे ही राष्‍ट्र को संकट समय में

मिल जाते हैं उद्धारक । आज यह सभा

निभा रही ऐसे ही कर्तव्‍य को यहाँ,

सम्‍मानित करके इन वीरवरों को

याद कर रही है उनकी उपकृति ।

पर बंधुजनो, हिंदू स्‍वत्‍व और हिंदुओं -

का राज्‍य आज यह जो फलाफूला है

वह न मात्र वीरों के शोणित से ही;

बल्कि वृक्ष पात है पोषण काफी

उनकी घर-गृहस्‍थी की मिट्टी से :

जो तुम्‍हरे धर्मबंधु दुष्‍ट शत्रु ने

छीने है झपटकर जैसे शावक

हिरनों के जत्‍थे से भेड़ि‍या छीने

घर-गृहस्‍थी जिनकी मिट्टी में गई

वही मिट्टी बन गई खाद वृक्ष का

जिसकी छाया में है विगत-भय खड़ी

हिंदुश्री शीतलांग मुसकरा रही

-क्‍या उनकी याद हमें आती भी है ?

जो महिलाएँ सुंदर, जो कोमल बच्‍चे;

नि:सहाय बंधुजन हमारे सभी

म्‍लेच्‍छों ने छीन लिये जिंदा हमसे;

धर्म मार्ग से बलात् पाप-नर्क में

धकेल दिया था जिनको; स्‍वजन विरह से;

बिक जाते है वे तो सब विदेश में

बाजारों में जैसे पशु बिकते हैं;

तुच्‍छ पदों को सिर पें लेना पड़ता है

जबरन जिनको; जीवन बोझ अब जिन्‍हें :

बंधुओं का है जी दु:ख आज भी

वैसे के वैसे ही असहनीय-सा !!

परदास्‍य से हम अब मुक्‍त हो गए

चोरों के हाथों से पैतृक गृह को

छुड़वाया पैतृक-शत्रुता जगाकर :

पर जब आया है पैतृक धन हाथों में

उन्‍हीं दीन, पतित, हीन बंधुजनों को

पल भर भी न प्रवेश है उस घर में !

म्‍लेच्‍छगृह में जबरन ही जिनको

करना वह अपरिहार्य हो गया, उन्‍हें

जाति शत्रुओं ने तुम्‍हरे उस क्षण जैसे

उसी तरह तुमने भी निष्‍ठुर बनकर

करना है प्रतिबंध उन्‍हें पैतृक गृह में ?

बीच हमारे रहने के‍ लिए व्‍याकुल

सगे भाई-बहनों को हम अब अपने

खोलें न द्वार ! हाय ! हाय ! धिक् हमें !

-यह तो है ज्ञातिद्रौह और धर्म-घात

यही धर्मतत्‍व कहकर खुश रहते हैं !

ज्ञाति-कलंक की ऐसे शर्म मानकर

उन विधर्म-मकरग्रस्‍त बंधुजनों को

युद्ध कर, शुद्ध कर, वापिस फिर से

पितृगेह में लाएँ, बंधु-बंधु से

मिलवाएँ, मिलवाएँ हिंदू-हिंदू से

यह आशा है मेरी ! यह उत्‍कंठा !

पुण्‍यतिथि ठहराएगी आज की तिथि

पुण्‍यकार्य यदि कर ले आज यह सभा !

कहिए जी, विप्रवर्य ! क्‍या निर्णय है

धर्मशास्‍त्रविद् - द्विजवर-मंडल का भी :

शुद्धिकार्य कार्य है या अकार्य है ?

राजमुख्‍य गौरव से कहकर बैठे ।

मुख्‍याज्ञा के जवाब में द्विजवर्य

गुरु सुत भी उठा : क्षण देखा सर्वत :

अखिल-सभा हृद्गत को आजमा लिया

फिर जैसे विमल स्रोत शुद्ध बुद्धि का

निकले तद्-वागौघ गौरवान्वित-सा

' हे श्रीमन् राजमुख्‍य, और भाइयो !

म्‍लेच्‍छीकृत-पतित-परावर्तन के लिए

धर्मशास्‍त्र-सम्‍मति है अथवा नहीं है;

निर्णय करने हेतु आपने तभी

शास्‍त्रविद्-जन-समेत मुझको आज्ञा दी ।

तद्नुरूप हमने भी नव विचारणा

शास्‍त्र युक्ति सहित पूर्ण कर ली सारी

स्थिर व्‍यवस्थिति कर दी जो सुसम्‍मता,

द्विजवर मंडल ने मुझको आज्ञा दी है

ज्ञाति सभा में उसको बतलाने की ।

असंभव है बतलाना यहाँ विचारणा

समग्र रूप में, फिर भी संक्षेप में कहूँ

मुख्‍य कथ्‍य कह देता हूँ सारा मैं-

याचना करके आपकी कृपा की!

धारणाद्धि धर्म इति प्रमुख लक्षण से

जो करे प्रजा का उद्धार, अभ्‍युदय-

के प्रति ले जाए, वही धर्म है ।

धर्म का स्‍वरूप यही निश्चित है ही

न्‍यायशास्‍त्र से भी यही सिद्ध है

कि धारणा समाज की करे, जाति के

अभ्‍युदयार्थ कारण जो हो जाए, वही

देशकाल से होगा समाजधर्म ही ।

धर्म की द्विविधता इसी हेतु से

स्‍वास्‍थ्‍यकालत:, आपत्‍कालत: इति

सर्वस्‍मृतिसम्‍मत है । भिन्‍न अवस्‍था-

आवश्‍यकता- योगात् एक ही कृत्‍य

कभी मारक, कभी तारक हो सकता है

स्‍वस्‍थकाल धर्म में जो विहित है

'स्‍पृष्‍टा स्‍पृष्टिर्न विद्यते महाभये

संग्रामे यात्रायां देशविप्‍लवे,

ग्राम नगर दाहे वा' इसी हेतु से

धर्म का यही स्‍वरूप देखकर हमें

मुख्‍य यही एकमात्र दिख सकता है

प्रश्‍न विचारार्ह यहाँ, पतित जनों की

शुद्धि समाज-हित है या बहिष्‍कृति ?

हितकारी अभ्‍युदय प्रवण है यदि

पति‍त परावर्तन ही, धर्म्‍य है तभी ।

जातिसंघ या समाज जो प्रबुद्ध है

वह निश्चित कार्य के लिए ही हेतुत:

संघटना सिद्ध करता है प्रमाणत: ।

तदनुरूप बनाकर अपनी दंडसंहिता

व्‍यक्तिश: वह समाज उसे निभाता है

पर यिद कोई उस जीवन-साध्‍य को

अधूरा, असहनीय अथवा अपनी

जाति के लिए अवांच्छित मान लेत है

और यदि ऐसा जन त्‍याग करने को

निज समाज संघ का चाहे : तो फिर तब

दो ही हैं मार्ग उसी जाति के लिए :

एक : जबर्दस्‍ती उस व्‍यक्ति को सदा,

देहांत के समय तक दंडित करके

जातित्‍याग करने की सहूलत ना दें,

जातिनियम-भंग करने भी न दें कभी

दूसरा : अप्रीत उसी व्‍यक्ति को लगे

संबंध, उसे हम भी अपने मन से तुरंत

छोड़ दें; दे दें अपनी जाति से उसी

व्‍यक्ति को बहिर्भूत करके उसे ही

सत्‍य जो लगे दे दें आचरण करने

और हम करें आचरण जो हम चाहें

सत्‍य हमें जो लगे दोनों मार्गों में

आसुर है पहला औ' आर्य है दूजा,

आर्य मार्ग को ही इस बहिष्‍कृति कहते हैं

और बहिष्‍कृति का यह आर्य मार्ग ही

जाति-व्‍यक्ति के ऐसे कठिन समय में

हित है, सो विहित है । सत्‍याशोध में ,

आत्‍म-विकासार्थ भी, अथवा व्‍यष्टि का

तथा समष्टि का स्‍वत्‍व रक्षित करने,

जाति बलात्‍कार से सौ गुना रहे

जाति बहिष्‍कार ही भू‍तहितैषी

सामाजिक धर्म का सिद्धांत और

अर्थ बहिष्‍कार का निवेदन करके

हम देखेंगे अब प्रस्‍तुत समस्‍या

पतित परावर्तनीय शुद्धिवाद यह

शुद्ध वितंडा प्रतीत होने लगा तभी !

खल-दल-बल-शक्ति से विधर्मदस्‍यु जिसे

भगा ले जाए; उसे अपनी जाति से

बहिष्‍कृत करने का पहले न अधिकार किसी को !

जातिध्‍येय का अथवा जातिनियम का

भंग किया स्‍वेच्‍छा से न कभी जिन्‍होंने;

निजधर्म त्‍याग न कभी सपने में भी

मान्‍य जिन्‍हें हार्दिकत:, धर्मत: तभी

अधिकार है उनका जन्‍मदत्‍त ही

हिंदुओं में रहें हिंदूधर्मयुत

यह पूर्वार्जित घर तुम्‍हारा उसी तरह से

है उनका भी ! तुम हो कौन उन्‍हें

द्वार के बाहर रखने वाले ? अथवा

अंदर लेने वाले ? डकैतों ने

सबकुछ ही छीनकर वन में फेंका

जिसको, सुत वह माता का भाग्‍यत: यदि

ढूँढ़ते पहुँचा भी घर; तो फिर उसका

आलिंगन करके, उसको सहलाते ही

गोद में लेगी जननी : या फिर दूर

धकेल दे सकेगी ? राक्षसगणों में -

भी जननी ना ऐसी जो ऐसे क्षण

निज अपाप पुत्र को पतित कहकर

धकेल ही देगी दूर सूखी आँखों से !!

जातिजननि ! लेकिन तुमने सचमुच ही

पाप भी नहीं जहाँ, पतितत्‍व मानकर,

शुद्धि का, जो अबहिष्‍कार्य उन्‍हीं के,

देखकर शास्‍त्रार्थ शिलानिष्‍ठुर दिल से

बैठी हो द्वार बंद करके हृद का !-

जो वे तव चिरविरहित तनय, हाय, ये

अप्रतिष्‍ठ छिन्‍नमेघ सम इतस्‍तत:

निर्दय दुर्भाग्‍य-रूप आँधी में भटके

दुनिया के बाजारों में भटके है !!

शत्रु के द्वार के बिना न भीख भी

माँगते हैं स्‍थल दूजा ! भाई-बहनें

धुतकारत हैं उनको; और वहाँ जो

भाई-बहनें बनने तत्‍पर हैं, वे

सर्प-सर्पिणी जैसे लगत भयानक !

रात के कुएँ में कोई म्‍लेच्‍छ छुप के

फेंक देत अन्‍न थोडा, जो अभक्ष्‍य है :

मद्य की बूँद एक, डबलरोटी भी ।

दिन उगते ही गाँव की शत कुँवारियाँ

हास्‍यवदन आती हैं औ' सुहागनें

कटि पर घट स्‍वच्‍छ, और सर पे सुंदर

लेती हैं जल भर के, अपने घर जाने-

पर बुझाएँ प्‍यास हमारे प्रियजनों की ।

स्‍नान, दान, दवार्चन, भिन्‍न गृहविधि

पाक, तृषाहरण उस जल से घर में

लोग कर रहे बिना संशय के कोई

तभी सहसा चीख उठत चारों तरफ से

भ्रष्‍ट जलाशय ! जल भी- ! डबल रोटी है !

तभी आकर म्‍लेच्‍छ स्‍वयं दुष्‍ट कर्म को

निर्भय निज बतलाता लोगों के बीच !

पी गया जो भी जल अनजाने में भी

भ्रष्‍ट सभी ! मुश्किल है इनमें चुनना

कौन-कौन पी गया जल ! साफ है सभी

पी गए जल ! शास्‍त्रार्थ है त्‍यजेत्

'ग्रामं जनपदहिताय !' पतित ग्राम है

सारी वे हास्‍यवदन शत कुँआरियाँ,

वे सुहागनें सारी देवीसम भी

प्रियजन वे उनके, वे पितर वृद्ध भी :

देवार्चन करते ही गाँव अखिल वह

दैत्‍यार्चन करके जातिबाह्य हो गया !

प्रहसन में भी जो शर्मनाक लगे

बचकानी कृति बनी धर्मविधि यहाँ !

इतना अन्‍यत्र कभी किसी जाति का

बुद्धिभ्रंश दुनिया में नहीं हुआ था !

'जनहिताय ?' ना ! दारुण-जनपदाहितार्थ !

हिंदुजनो, सुना, तुम्‍हरे जिन बंधुओं -

की, तुम करोगे अवहेला यही

उनसे संबंध तुम्‍हारा है इतना

एकत्रित कर्मों से पूर्ण जुड़ा सा

'पतित ! पतित !!' कहकर जितने भी तुम

डुबो देंगे उनको दु:खार्णव में

गहराई तक उतने डुबाए जाओगे

तुम भी तो अवहेलित-बोझ से अभी !!

यह पीढ़ी उन अपाप बंधुजनों की

व्‍याकुल है, औ' तुम्‍हरे आँगन की ओर

दूर से ताकते जब मर जाएगी,

तब तुम्‍हें भीषण हित स्‍पष्‍ट दिखेगा !

क्‍योंकि इन एक-एक धिक्‍कृत जन की

संतानें जन्‍म लेंगी अहिंदू घरों में

लालन-पालन होगा शत्रुगृह में

परकीयों को, ही मानेंगी माँ-बाप :

उनका ही धर्म लिये, शत्रु उन्‍हीं के

अपने भी शत्रु हैं, ऐसी ही भावना

जनम से ही वर्धित हो जाएगी उनकी

आमूलात् हिंदूजाति-नाश हेतु वे

यत्‍न करेंगे खुद को अहिंदू मानकर

पीढ़ी पर पीढ़ी बढ़ती जाएगी

वैसे-वैसे वे बन जाएँगे कट्टर

शत्रु तुम्‍हारे, हिंदूजनों ! निश्‍चयपूर्वक !

पितृगेह लौटने सिद्ध अभी हैं,

दूर करो उनको अभिमान बढ़ाकर

एक-एक बंधु-भगिनि पतित मानकर

उससे ही पैदा होंगे दस-दस दुष्‍ट

म्‍लेच्‍छों की जाति को पुष्‍ट करेंगे,

और हमारी जाति का ही खून पिएँगे !

पुत्र की बलि चढ़ाकर शेर को पाले

जो माता आज; उसे, उसी खून को

पी के बलयुक्‍त बना शेर फाड़कर

शीघ्र खा जाएगा!- और बुद्धिहता

देहांत सजा के लायक है, न शक कोई !!

तीन जातियाँ जग में चिर बहिष्‍कृति

धर्मविहित मानत है : हिंदू : यहूदी :

और पारसिक पुराण : इन्‍हीं तीनों के

मांस को ही काट खाकर सहजता से

पुष्‍ट बन पाया इसलाम विशेषत:

किंतु जहाँ ईसाई पंथ अग्रिम हो

इसलामी वंश की न वृद्धि वहाँ है ।

क्‍योंकि ये करते हैं भ्रष्‍ट सभी को

तो भी ईसाई फिर से न केवल उन्‍हें

बल्कि मुसलिम बलवानों को भ्रष्‍ट करत है

स्‍पेन और पुर्तगाल में इसलाम ही

बलपूर्वक सुप्रतिष्‍ठ हो बैठा था

हावी हो गया था दोनों देशों में

लेकिन अब उन दोनों देशों में भी

अँगुलियों पर गिनने मुसलमान नहीं !

ख्रिस्‍त-विजय होते ही, पूर्वनिश्चित-से

एक दिन में ही । अजी, ख्रिस्‍तशरण हुआ

लक्ष मुसलमान ! अन्‍यथा मृत होए-

देश के बाहर या निकाला गया !!

और बलात्‍कार में होड़ लगाते

दोनों ही दैत्‍यगदाएँ हम पर

हिंदू जनो, देखा तो, आज आ गई

अकस्‍मात् पूरी ताकत लेकर !

दुष्‍टापत्ति में अब सत्‍य युग के

शांतिपाठ होंगे जी आत्‍मघातक !

नहीं-नहीं, जी ! कलि है यह ! हिंस्र आपदा !

-कलियुगीन आपद्धर्म ही कहो !

दुष्‍ट म्‍लेच्‍छ लोगों को तुम भी देख लो

धर्मबलात्‍कार करके भ्रष्‍ट करत हैं :

लेकिन बलात्‍कार न उतना जनों को

पूर्ण भ्रष्‍ट करता है, बहिष्‍कार-सा ।

वे जीत मानते हैं देहबलात्‍कार में

तुम मन को जीत लेते हो, बहिष्‍कार से

तुम ही हो शत्रु तुम्‍हारे सच्‍चे

उनसे भी ज्‍यादा ! भारतवर्ष में

मुसलमान आए कितने ?- कितने अब हैं ?

आए थे जब वे अल्‍पसंख्‍य, और

कुछ लोगों को जबरन छीन ले गए

-उनको पाताल में भेजते समय :

यहीं थे वे : सैकड़ों भाग्‍यहीन-से

चुपके से पालन हिंदूधर्म का करते :

उनको यदि तुम भी यह मौका बनाकर

कर लेते फिर से ही हिंदू, मान लो,

तो अब जो करोड़-संख्‍य मुसलमान हैं

लेके तलवार सिद्ध कंठ चीरने -

वे रहते ना तब तो लक्ष-संख्‍य भी !!

बल होता है जब तक, बलात्‍कार है :

सौ बार गया बल : क्‍यों ना फिर से आए

हिंदुओं में वे करोड़ हिंदू भी तभी ?

स्‍वेच्‍छा से रिपु-धर्म में नहीं र‍हे थे !

गुप्‍त रूप में भजते हिंदूधर्म को ।

नहीं आए वापस क्‍योंकि प्रथम पीढ़ि‍ को

जातिजननि, तुमने ही आने नहीं दिया ।

कैसा हा शस्‍त्र-बहिष्‍कार तुम्‍हारा !

धन तुम्‍हरा चोरों ने लूट जब लिया

करोड़ों की मत्‍ता बस चली गई

तुमने पर उसमें से कोई रुपय्या

भ्रष्‍ट मान, वापस भी कभी नहीं लिया !

पुण्‍यप्रद मान इसी को, हा धिक्

मूर्ख वणिक्‍चार्य ! तुम्‍हरा विनाश होगा,

अन्‍न-अन्‍न करते ही मर जाओगे

पाप आत्‍महत्‍या का तभी पाओगे !

हर एक राज्‍य के शस्‍त्रकारो,

लड़नेवाले शत्रु को एक तीक्ष्‍ण शस्‍त्र,

दे देना नित्‍य नित्‍यनियम बनाकर !

ऐसी क्‍या राजाज्ञा सुनी थी कभी ?

देखा था राजा भी ? अगर नहीं, तो

यहाँ आओ : हिंदुस्‍थान में पधारो

यहाँ पाओगे तुम इस आश्‍चर्य को भी !

मलय मे हिंदू नृप खुले रूप में

आज्ञा देता है इक हिंदूजाति को

'हरेक एक-एक पुत्र दिया करो

मुसिलम को स्‍वेच्‍छा से !' क्‍यों ? इसलिए

कि सामुद्रिक वाणिज्‍य में वृद्धि हो सके !!

हिंदूशास्‍त्र को न मान्‍य समुद्रगमन है :

परंतु हिंदूशास्‍त्र संतानों को भी

म्‍लेच्‍छों को दे देने में न हिचकता :

वेश्‍या सम अधिक द्रव्‍य कमाने हेतु !!

मूर्खों ! बहु दारुण औ' उत्‍कट-भीषण

बुद्धि की ही अंधता का कटु प्रभाव भी

शीघ्र इसी दुनिया में अनुभव करोगे !

कंठ सूख जाए, कँपकँपी हो तनु में

अंतर्गत भय कह दूँ !-घोर भविष्‍य !

इन बीजों से ही हिंदुओं के, आगे

क्रूर शत्रु हिंदुओं के, जनम पाएँगे

जाति-गोत्र-माँ-बापों को भूलेंगे

वे सारे राक्षस-सम 'महा-पिले १५ बने

'मान्‍य पुत्र' हैं ये हिंदुओं के ही

हिंदुओं के कंठों को काटेंगे

गायों के शोणित से भिगाकर मंदिर

हिंदू-बाल-पुत्रियों को भ्रष्‍ट करेंगे

हिंदू धर्म उखाड़ेंगे : कर देने हेतु

मलयभूमि की पूरी मसजिद ही सारी !!

एतदर्थ पूर्वोद्धृत धर्म-लक्षण हैं,

शास्‍त्र बहिंष्‍कार ही हमारा ऐसा

शत्रुबलात्‍कार से भी घोर शत्रु के,

हिंदू-जाति-नाश-घात करता है जो,

करेगा ही; वह कभी न हो सकता है

हिंदू समाज-स्‍वधर्म बनने काबिल !

धारक होता है धर्म, मारक न कभी !

एतदर्थ जिन्‍हें जबरन विधर्म रीति को

मात्र देह से अपनाना पड़ता है

वे बहिष्‍कार्य नहीं : न हिंदूबाह्य भी,

केवल जो भक्ष्‍याभक्ष्‍यादिदोषत :

उनके हाथों अरि पाप कराते,

उसके खातिर आपद्धर्म प्रयुक्‍त

प्रायश्चित के लिए वे नाममात्र ही

पात्र हों-होना ही है यदि । यदि

डबलरोटी दूषित करती कुएँ को, तो

जलचर-मल-मूत्र से तीर्थ दूषित है !

तीर्थमृत सड़े हुए दर्दूर-मूषकों -

से पूति पर्युषित डबलरोटी ना !

भोग चढ़ाते है मंदिर में जभी-जभी

मक्खियाँ उस पर बैठत हैं, तभी-तभी

अनुदित सद्य:शौच मान्‍य कर लेते है जी,

ऐसे हम लोग म्‍लेच्‍छ बलात्‍कारित हमरे

बेचारे हीन बंधुओं के प्रति ही

'सद्य: शौच' नियम लागू क्‍यों ना करते ?

अल्‍पदोष-परिहारार्थ रूढ़ि‍ जो

प्रायश्चित्‍तों को बताती है, वे कर लो ।

मृदुना वा दारुणेन कर्मणा खलु

आत्‍मानं राष्‍ट्रविपद्युद्धरेदिति

आपद्धर्मीय स्‍मृति-शास्‍त्र सम्‍मति :

बहुत हिंदू बांधव जो आज पुनरपि

हिंदुओं के पितृगेह लौटने सिद्ध हैं

वे ऐसे ही असुर बलात्‍कारित-पतित

वर्ग में समाहित हैं : पर ऐसे भी

जन होते है, जो कभी लोभ से,

पागलपन से, या क्षणिक बुद्धि से

वही धर्म सत्‍य मानकर चले गए

रिपुदल में केवल अपनी मरजी से

उन पर तो हैं बहिष्‍कार उचित ही :

-पर तब तक : जब तक उनको

कृतकर्मों का पश्‍चाताप न हो जाए

जिस क्षण उनकी नसों में हिंदू दूध

उछलकर हृदयों का द्वार खटखटा

व्‍याकुल होकर कहेगा पुन:-पुन:

चलो घर, माँ के घर अब चलें, चलो !'

तब वे पश्‍चाताप से आधे शुद्ध ही ।

यदि द्वार खड़े होकर भीख माँगते हैं,

'तुम पुनरपि स्‍वीकारो ! जाति जननि, इन

भूले-भटके बच्‍चों को अपना लो !!

तो उनको स्‍वीकृत करना ही धर्म्‍य है :

किंतु शुद्ध करके शुद्धिदंड लगा दें

तत्‍कृत निज जातिविरोध के अपराध में

अनुरूप ही प्रखर अथवा मृदु हो ।

धर्म का रूप युक्तिश: स्‍पष्‍ट कर

यह जो सुव्‍यवस्थित निश्चित कर दी

उसके ऐतिह्यादिक अन्‍य भी उपांग

शास्‍त्र के, पोषक ही हैं सुनिश्चित,

वास्‍तवत: जो अपूर्व आपत्तियाँ हैं

उनके परिहारार्थ ऐतिह्य वचन या

पूर्वसदाचारों में मार्ग नहीं है

जब तक इस तेजस्‍वी भारत की ओर

वक्र-दृष्टिपात करने की हिम्‍मत ना थी

एक भी शत्रु की पूरे विश्‍व में

तब तक म्‍लेच्‍छ बलात्‍कारपातितों -

की शुद्धि की न थी कोई भी समस्‍या

संभव ही था न कभी बलवान् समाज में !

दुर्बलों के बीच ही संभव है यह

न शक्ति-भूति-शाली पूवज-समय में !!

तदनंतर जिस क्षण में भारत-भू पर

दुर्बलता हावी हुई, जिस क्षण रिपु भी

शक-बर्बर-हूणादि प्रबल हो गए,

उसी क्षण विधर्म-हस्‍तपति-शुद्धि का

प्रश्‍न उठा, प्रथम ही : तब 'सा विधीयते

शुद्धिरिति' स्‍मार्त देवलोक्तिबल से

पतित पूत कर डाले, इतना ही नहीं

भागवत में, ऐतिह्य में यही कहा है

यवन-पुलिंदादि म्‍लेच्‍छों को भी

यदि वे शरणभक्ति करते विष्‍णु की

संग्रहार्ह विष्‍णुभक्‍त मान लिया है

और यही उचित है : यदि कोई परकीय

आत्‍मा को हिंदूधर्म ही सच्‍चा लगे

तो उसको जो कोई अवरोध करेगा

वही सत्‍य की भी हानि ही करेगा !

हिंदुओ, जगद्-धर्म की दैवी संपत्

सत्‍य सनातन जो है तुम्‍हारे पास

वह मानवजाति हितार्थ है - न स्‍वजाति के

स्‍वार्थ तथा कृपणता, विवाद के लिए

अस्‍मत्‍कर्तव्‍य है वेदविधि का

सप्रचार, ना केवल निज आचरण,

सत्‍यरक्षण के साथ ही सत्‍यदान भी !

ज्ञानित सभ्‍य । श्रीमान् हे राजमुख्‍य जी ।

यह निश्चित मत, सदुक्‍त यह व्‍यवस्थिति

की है प्रतिवेदित संक्षेप में यहाँ

भवन्नियुक्‍त शास्‍त्रविद् विचार मंच ने

कोई भी, स्‍वेच्‍छा से, हिंदू जाति के

चरणों में शरणागत, दिव्‍य अन्‍न की

याचना करेगा यदि आत्‍मा की भूख

मिटाने के खातिर, तो शरणागत को

-यदि प्रत्‍यागत ही; नवागत अहिंदू वा-

तो उसको अपना मानकर अपने

दिव्‍यनिधि का अंश मान नीजिए ।

यदि होगा प्रत्‍यागत वह, तो उसे स्थिति

शुद्धोत्‍तर देया है पूर्वजाति की ।

जब शिवाजी ने भी तो बजाजि को

पुनहिंदुसंस्‍करण से पूत किया था

तब पूर्व ज्ञाति के ही अंतर्भूत करके

अपनी पुत्री का उससे ब्‍याह रचाया

राजपूतों में कितना अभिमान जाति का !

मगर सुंदर इंद्रकुमारी को जब

म्‍लेच्‍छ-भुक्‍त-शय्या से भी वापिस

लाकर जोधपुर में हिंदुकरण किया

राजपूतों में ही उस राजपूती की

हिंदू समाज द्वारा स्‍थापना पुन: ।

होगा यदि कोइ नवागत हिंदू में

जाति नई संगठित करनी है फिर से,

देगा ईश्‍वर तुमको धैर्य इसी में

पूर्ण करने हेतु पुण्‍य कार्य यह

भार्गवीय वनस्थित उस सरोवर में,

पूज्‍य पूर्वजों ने साध्‍य किया धैर्य से !

इस वन में घूम रहे थे शार्दूल-से

पुर्तुगीज लेकर हिंदू बाल-बालिका

हाय हजारों को तब भ्रष्‍ट कर रहे

तब हिंदवि-दौर्बल्‍योद्भूत तामसी

दक्षिणायन में भी उस, विप्र विगतभी

निजधैर्य का ही सुमुहूर्त बनाकर

-इस सरोवर में ही जबरन पातितों -

को फिर से हिंदू संस्‍करण-पूत बनाकर

आनेवालों को लिया हिंदू समाज में !

धैर्य के लिए दिया प्राणदंड भी

कतिपय रिपुओं को : पर कार्य अखंडित

दक्षिणायनीय तिमिर में धैर्य से

संपन्‍न किया भार्गव में ही चुपके से

आज उसे करना ना कठिन निश्‍चय

इस स्‍वराज्‍य-सूरज के उत्‍तरायण में :

सुप्रकाश : उन सीनों पर अरियों के !

बाह्य शत्रुओं का उच्‍चाटन करने को

ईश्‍वर ने भारत को धैर्य दिलाया

उसी तरह अंत:कुविकार-शत्रु को

देखने के वास्‍ते भी धैर्य ही दिया !!-

ऐसे कहते-कहते ब्राह्मण बैठ गया ।

'साधु ! साधु !' ध्‍वनि गूँजी एक साथ ही

उस सहस्रजनमंडित सभागृह में !

महामान्‍य राजमुख्‍य फिर से उठ गए

'हिंदुजनो ! भाइयो !! आज नहीं है

मेरे हर्ष की सीमा, सुनकर ऐसी

शास्‍त्रनिश्चिती तथा लोकसम्‍मति

यह इतना पतितपरावर्तन भी यदि

हमने वैध ठहराया तो अब आगे

मान लो कि म्‍लच्‍छों के धर्मच्‍छल की

आज की तेग बनी कुंद सदा की !

बातें हो गईं काफी-अब कृति करें !

परसों ही सारे इस शुद्धि कार्य को

संपन्‍न करेंगे ! सारे पतित यहाँ के

आमंत्रित बंधु महायात्रा में आए-

सारे वे यज्ञाग्नि की साक्ष में यहाँ

पुनरपि प्रवेश करें हिंदू धर्म के

देवालय में देवादृत सनातन !!'

उसी सनातन शब्‍द को उठाकर सभा

प्रचंड जयध्‍वनि करती मदहोश हो गई;

धर्म सनातन की जय ! जय सनातनी

धर्म की धन्‍य !! हजरों कंठों में

ध्‍वनि हो गई शतगुणित, मंडप से

आई प्रांगण में, प्रांगण में खडी

आमंत्रित पतितों की भीड़ जो भरी

उसने उन शब्‍दों को उठा लिया तुरंत

गर्जना गूँज उठी जय हिंदूधर्म की !

धर्म सनातन की जय ! जय पुराण की !!

जयध्‍वनि की गूँज में ही हुई विसर्जित

जनिक सभा उत्‍कंठित प्रतीक्षा करती

शुद्धि-समारोह की सुनिश्चित ति‍थि

दिन परसों का कब उग आएगा भला !

उधर, उसी समय, जो पथ पुणे से

उस ग्राम आता है, उसी मार्ग पर

एकाकी घुड़सवार धीर-वीर-सा

तेज दौड़ आ रहा भार्गव की ओर

वेग शिथिल तुरग का न करता बिलकुल

बैठक थी स्थिर उसकी, लगातार ही

रात भर वैसे ही मार्ग काटता

युवा-भव्‍य घुड़सवार भार्गव पहुँचा

प्रभात-काल भी तब ना हो गया था ।

सीधे वैसे ही तेज दौड़ता हुआ

पहुँच गया राजमुख्‍य ठहरे थे जहाँ ।

मुलाकात होते ही राजमुख्‍य से

हाथ में थमा दी मुद्रांकित चिट्ठी

जो कुछ भी खबर होगी उसमें,

पढ़ते ही राजमुख्‍य हृष्‍ट हो गए

औ' तुरंत उत्‍तेजित मन से उन्‍होंने

दुर्गप को बुला लिया, कहा उससे

तोपों को दागकर झड़ी लगा दो

राष्‍ट्रध्‍वज की कर दो जनिक घोषणा !

दहाड़ती तोपों की धड़ड़ ! धड़ड़-सी

आवाजें एक के बाद एक चलीं !!

घर-घर में अचरज से चौंककर सभी

लोग एक-दूजे से पूछने लगे

तभी सैनिक-जयध्‍वनि के साथ गूँजता

मांगलिक वाद्यध्‍वनि भी आ गया

हर्षद ही है वृत्‍त ! क्‍या है लेकिन ?

एक कहत अर्काट लिया; दूजा कहता

नहीं जी, यह दिल्‍ली का वृत्‍त ही होगा

या निजाम को पूरा नष्‍ट कर दिया ?

तर्क सैकड़ों करते यात्रा में समाहित

सहस्र जन आखिर में साथ चल पड़े

राजमुख्‍य की छावनी की दिशा में

तभी बात फैल गई, उत्‍तर की ओर

दादाजी ने विजय प्राप्‍त कर ली ।

भालदार-चोपदारों ने लोगों को

ठीक से बिठाकर बना दी विशिष्‍ट-सी

लोकसभा : तभी क्रमश: आने भी लगे

मान्‍यवर पंडित, सरदार भी सभी

अंत में भव्‍य युवा अतिथि के संग

राजमुख्‍य भी वहाँ उपस्थित हो गए

सिंधु मुख्‍य भी आए; उत्‍कंठित सारे ।

उठे राजमुख्‍य, कहे 'सिंधुमुख्‍य जी;

मान्‍यवर सरदार और ज्ञातिसभ्‍य जी :

अखिल मराठो : है अखिल हिंदुओ :

आज सुप्रभात को आए राजदूत-

ये महान् विद्वान् कवि है और सुकृती,

स्‍नेही श्रीमंत के स्‍वयं ! उन्‍होंने -

दूतकर्म करने को स्‍वीकार कर लिया

जिस महान् वृत्‍त के लिए, बताने

श्रीमंत-प्रहित-पत्रिका के अनुसार

सुनो महाराष्‍ट्र, उसी वृत्‍त को सुनो

आज महराष्‍ट्रध्‍वज फहराया है

अटक पर वीरों ने हमारे फिर से !!'

यह सुनकर लोकसिंधु सिंधु के समान

लहराता झंझाहर्ष में गरजा

हर हर हर महादेव ! जय भवानी की !

सींग, रणढोल, कोई ऊँची तूती,

बजा रहे तालियाँ, सीटियाँ बजाते,

धड़ड़ धड़ड़ तोपों के धमाके तभी

हो रहे थे रुक-रुककर पुन:-पुन:,

जिसे जैसा सूझ रहा था उस प्रकार

लोग प्रदर्शित करतेथे खुशी अपनी

बुजुर्गों के भी थे नैन सजल-से

गंभीर लोग भी हुए थे गद्गद सारे

राजमुख्‍य का गला भर आया था

जनिक भावक्षोभ देख, शब्‍द भी पूरे

बोल ना सके, केवल इतना ही कह दिया,

'राजदूत ही आगे उचित ढंग से

आपको बताएँगे! प्रेय जो कुछ है

और श्रेय क्‍या है ! या मूक भावना

राष्‍ट्र की उत्‍तेजित करेगी प्रतिभा को !!'

तब वह युवा भव्‍य पुरुषवर्य भी

खड़ा हुआ रोब से : क्षण खड़े-खड़े

देखा लोगों की तरफ : और लोग भी

देख रहे थे उसकी तनु बलान्विता;

किसी राष्‍ट्र की चिंता को धारण करने-

हेतु निर्मित उसका प्रतिभोज्‍ज्‍वल भाल;

और धी मुद्रा उसकी प्रभावशाली

फिर अवनतशीर्ष,सभा का वंदन ही

करके उसने कहा- 'अपात्र मुझको

मुख्‍याज्ञा का पालन शिरोधार्थ है :

किंतु उत्‍तर से अभी इस अद्भुत जय का

विस्‍तृत वृत्‍तांत पुणे भी न पहुँचा है

इसलिए ज्‍यादा कुछ कह न सकूँगा ।

जिज्ञासा पूर्णरूप से न तृप्‍त करूँगा ।

तब भावोत्‍कट विचारप्‍लुत गीत एक

हर्षलुप्‍त चित्‍तज‍लधि में तैरा था,

उसे सुनो सभ्‍य लोग : अर्पण करता हूँ

वन्‍य पुरुष राष्‍ट्रदेव के पदों में,

इस महान् उत्‍सव में, हीन पतित मैं !!

लव स्‍तब्‍ध हुए सभी । फिर ऊँचे-से

शास्‍त्रसंयत स्‍वर में अलाप लेकर,

उचित वाद्य-रव-समृद्ध वीर भाट ने

वीरों को स्‍फूर्तिप्रद यह स्‍वरचित नया

गाया राष्‍ट्रपुरुष का गीत जोशीला ।

महाराष्‍ट्र-भाट का विजयगीत !

: १ :

सुनो-सुनो, सब हिंदुजनो ! ये खबरें आई जीत की ।

पूर्ण सात सदियों का बदला लिया, हार है जेता की ।।१।।

वीर दाहिर हिंस्र हार ने दग्‍ध किया था तब तुमको ।

सह्य-अद्रि के दावानल ने भस्‍म कर दिया अब उसको !!२।।

भाग गई थी विजय हाथ से तब, जयपाल, तुम्‍हारे भी,

आज फिर से लौडी तुम्‍हरे घर, प्रणाम करती वह भी ।।३।।

व्‍यास ने भारत-वीणा पर थे गीत गाए शोक भरे ।

भाई-भाई के शोणित में रंग रँगकर लोग मरे ।।४।।

हाय ! हाय ! शत वार हाय हा ! काव्‍य रचाए वरदाई १०

व्‍यास-सदृश, किंतु वह भी भारत-रिपुओं के विजयी ।।५।।

हर कवि के ही लिखा भाग में कर्तव्‍य यही दुर्भाग्‍यों ने

हतवीरों के हताशा भरे गीत गाए रासों ने ।।६।।

पूर्वकवियो, आँसू तुम्‍हरे हिंदवि अवनति-कालों के

वही गा रहे गीत आज यह हिंदवि उन्‍नति-कालों के ।।७।।

धन्‍य भाग्‍य मम !आज न मुझको गाना है कटु हारों को ।

अहिंदू हाथों होने वाले अथवा हिंदू संहारों को ।।८।।

देव-शत्रु के, देश-शत्रु के नि:पातों को गाकर आज ।

धन्‍य भाग्‍य मैं आदि-कवि ११ के जैसा बन जाऊँ सरताज ।।९।।

धन्‍य भाग्‍य गानेवालों का, धन्‍य भाग्‍य श्रोताओं का ।

जयार्थ मृत योद्धओं का, विजय देखने वालों का ।।१०।।

जय-जय ध्‍वनि से भर दो अंबर, करो गृहों में महोत्‍सव ।

परम मांगलिक, हिंदुजनो, अब वार्त्‍ता आई है अभिनव ।।११।।

हिंदू-सैनिकों की आकांक्षापूर्ति कराई श्री प्रभु ने ।

आज हिंदवी ध्‍वजा अटक में पहुँचाई है १२ दादा ने ।।१२।।

: २ :

हुआ इसलिए हुआ, न कोई साधारण यह बात है

शंकाव्‍याकुल अचरज से मन सुख व्‍याप्‍त कँपाता है ।।१३।।

स्‍वयंपूत वे वेदर्षी निज शरीर पर जिस पानी को ।

प्रोक्षण-मार्जन-सिंचन करने लेते थे कुश-अंकुर को ।।१४।।

पवित्र-पावन उसी सिंधु-जल को चरणों से स्‍पर्श किया ।

कलियुग में अपवित्र सिकंदर नृप ने उसको तभी किया ।।१५।।

वीर १३ भारतीय तीर्थरक्षा करने दौड़ा मगध प्रांत से ।

घुसे, उसी से शीघ्र भगाए, आघात किया जोरों से ।।१६।।

अन्‍य किसी का होगा, लेकिन भारत का न सिकंदर था ।

आँगन भी ना उसने देखा, नहीं किसी ने जाना था ।।१७।।

राजदुकूलांचल को किंचित् करस्‍पर्श ज्‍यों नहीं किया ।

भारत भू की क्रुद्ध दृष्टि ने रिपु को भस्‍मीभूत किया ।।१८।।

तिस पर भी ये सेनाएँ फिर, केवल आँगप में ही नहीं ।

बल्कि राजमंदिर के अंदर मार-काट कर घुस आईं ।।१९।।

घुस आईं, पर आगे उसके एक कदम ना रख पाईं ।

आई औ' फिर वापस जिंदा जा न सकीं उनमें कोई ।।२०।।

मुख फैलाए तिमिंगल जभी मत्‍स्‍य निगल जाता है ।

उनमें से क्‍या कोई जिंदा वापस घर जा सकता है ? २१।।

यवनों का तब पुष्‍यमित्र ने औ' विक्रम ने शक-सेना का ।

मर्दन किया रावणमर्दन-सा, यशोधर्म ने हूणों का ।।२२।।

जो भी पीछे आया राक्षस अपनी ताकत को लेकर ।

भारतीय यज्ञाश्‍व नचाया उसके उसके सीने पर ।।२३।।

कहाँ आज हैं वे शक ? बर्बर ? बाल्हिक भी ? या हूण कहाँ ?

भारत की जठराग्नि सभी को भस्‍म बनाकर तृप्‍त यहाँ ।।२४।।

उनके अभिमानों को भारत के शस्‍त्रों ने सरल किया ।

उनकी बर्बरता को भारत-यज्ञाग्नि १४ ने जला दिया ।।२५।।

आसुर सेनाओं ने न कभी गंगा को भी पार किया ।

विंध्‍य-अद्रि को लाँघ सकेगा ऐसा कोइ न बच पाया ।।२६।।

हंत-हंत पर पहले न कभी घटित हुआ जो, अभी हुआ ।

हंत हमारी तेग बन गई कुंद, खड्ग नाकाम हुआ ।।२७।।

संचित अपने पापों की है मूर्तिमती यह प्रतिक्रिया ।

महम्‍मद द्वारा भग्‍न मूर्तियाँ, भ्रष्‍ट हो गई सती स्त्रियाँ ।।२८।।

राजमंदिर की पहली चौकी न केवल, बल्कि अहा !

सीधे सिंहासन पर नंगा नाचत है यह शत्रु महा ।।२९।।

सिंधु नदी से सिंधु तक अहा ! हिंद भूमि में फहराया ।

परकीय ध्‍वज, प्रथम बार अप्रतिहत ! अघटित हो पाया ।।३०।।

यदि होता ध्‍वज केवल, इतना कठिन समय नहीं तो भी ।

तिनके के ध्‍वज टूट जात हैं तिनके जैसे कभी-कभी ।।३१।।

परंतु इसलामी खंजर यह इतना तेज घुसा हृद में ।

कि जाति की आत्‍मा को उसने काट दिया दो टुकडों में ।।३२।।

उसी घाव से घायल होकर हिंदूभूमि हुई नित्राण ।

पूरे सात दशक दिल में यह सालता रहा शल्‍य का बाण ।।३३।।

किंतु आज यह शल्‍य उखाड़ा, आज वह ध्‍वज तोड़ा है ।

आज जंग को जीत लिया है, महम्‍मद का मद उतरा है ।।३४।।

चंद्रगुप्‍त ने, पुष्‍यमित्र ने, विक्रम ने जो दूर किया ।

शतगुना था दुर्घट संकट, उसको आज निरस्‍त किया ।।३५।।

समर्थ ने देखा था जिसका केवल सपना १५ रजनी में ।

अवसर हिंदू पदपादशाही का प्रकट हुआ है वास्‍तव में ।।३६।।

सिंधु नदी से सेतुबंध तक पानी जिसको मुशकिल था ।

उसे स्‍नानसंध्‍या करने को अब काफी मिल पाया था ।।३७।।

हुआ, इसलिए यह मत समझो साधारण था आसान ।

होने पर भी हृदय कुशंका-व्‍याकुल सुख से बेचैन ।।३८।।

जय-जय ध्‍वनि से भर दो अंबर घर-घर कर लो महोत्‍सव !

परम मांगलिक, हिंदुजनो, अब वार्त्‍ता आई है अभिनव ।।३९।।

हिंदू-सैनिकों की आकांक्षामूर्ति कराई श्रीप्रभु ने ।

आज हिंदवी ध्‍वजा अटक में पहुँचाई है दादा ने ।।४०।।

: ३ :

साधारण ना, इतना हि नहीं, पर विजय नहीं यह आई है ।

भाग्‍य, नियति या शुभ ग्रहस्थिति के प्रभाव से, यह निश्चित है ।।४१।।

आकस्मिक ना जय यह ! किंचित् बलिदानों को याद करो ।

भावोत्‍कट कुछ कुछ गद्गद होकर गर्वोन्‍नत महसूस करो ।।४२।।

सिंधु नदी से सेतुबंध तक हिंदभूमि जब हुई कभी ।

निर्वीरा, निर्देवा, निर्द्धिज, नि:सिंहसान हाय ! तभी ।।४३।।

सह्याद्री के कोने में इक गठरी लेकर घास की ।

जवान कुछ चढ़ते थे प्रतिदिन किसी किले पर बेतुकी ।।४४।।

गोसावी ने किसी मार दी एक फूँक तब दूर कहीं ।

फूँक जादुई, भभक उठी थी सह्याद्री की घाटी, खाई ।।४५।।

उसी घास के तिनकों से फिर, जैसे निकलीं मियान से ।

तलवारें चमकने लगी थीं जवान हाथों में फिर से ।।४६।।

लेकर गठरी घासफूस की आते थे जो युवक कभी ।

ऊपर चढ़ने वाले राजे बने यत्‍न से आज सभी ।।४७।।

सह्याद्री के कोने में इक, स्‍वतंत्रता की ध्‍वजा लिए ।

शूर शिवाजी के वीरों ने करिश्‍मे बड़े खड़े किए ।।४८।।

उस दिन से इस पवित्र भू की तस्‍सू-तस्‍सू लड़वाई ।

स्‍वतंत्रता की ध्‍वजा जूझते हुए किलों पर फहराई ।।४९।।

याद करो, बलि प्रतापगढ़ की माँ को कैसा १६ चढ़ा दिया ।

बत्तिस दाँतों वाले बकरे को वेदी पर कत्‍ल किया ।।५०।।

चार हजारों से भी ज्‍यादा रिपु के घोड़े तभी मिले ।

याद करो कैसे लड़वाए विशालगढ़, रांगणा किले ।।५१।।

१७बाजी गिरा, गिरा था वीर वीरों को लेकर कैसा ।

बाजी गिरा, पर गिरी नहीं वीरों के दिल की आकांक्षा ।।५२।।

१८चाकण में तो मेरुदंड ही रिपु की उमंग का टूटा ।

नरसाळे की गढ़ी गिर गई नरसिंहों का दल झपटा ।।५३।।

कितने वर्षों से सिद्दी की तलवार-तेग इस कोंकण में ।

गाय-गरीबों को काटत थी, कुंद बनी राजापुर में ।।५४।।

१९शास्‍ताखाँ के निवास पर जो हुल्‍लड़ हुई अँधेरे में ।

और फिर स्‍वागत अनोखा सिंहगढ़ पर उजाले में ।।५५।।

वीजापुर में छह हजार से ज्‍यादा सारे जमीन पर ।

रण में लगभग उतने ही औ' कोंकण में जल के भीतर ।।५६।।

याद करो, और फिर यह भी कि मुहकम सिंह ने कैसे ।

धर्मद्रोह कर दिया जोड़कर अपने को 'औरंग्‍या' से ।।५७।।

म्‍लेच्‍छ मित्रता का फल पाया रण में जान गँवाकर कैसे ।

प्रताप ने लाए रिपु के औ' दस हजार घोड़े भी कैसे ।।५८।।

पुरंदर किले पर मुरार ने रण में जो बलिदान किया ।

तानाजी ने सिंहगढ़ पर उसी जोड़ का तोड़ किया ।।५९।।

तीन हजारों से ऊपर जब मोगल तेगें टूट गई ।

दाउदखाँ तब सरपट भागा, चाँदवड़ में जीत हुई ।।६०।।

सालियर के रण में दिल्‍लीश्‍वर की बड़ी फजीहत की ।

हिंदू-गदा का प्रहार तीखा, दस हजार लाशें रिपु की ।।६१।।

जेसूरी के जिस स्‍थल पर था बदला लेना उंबराणि का ।

२०प्रताप के शौर्य से बन गया वही खेत अब क्षेत्र राष्‍ट्र का ।।६२।।

सावनूर की मार याद कर निजाम कह रहा आज भी ।

'मुलाकात इन वीर मराठों से भविष्‍य में न हो कभी' ।।६३।।

संगमनेर की लड़ाई में रिपु को पूरा ही कुचलाया ।

दसों दिशाओं में हिंदू स्‍वातंत्र्य ध्‍येय ऐलान किया ।।६४।।

शूर शिवाजी औ' दस साथी उसके गुप्‍त शुरू में थे ।

राष्‍ट्रमंडल प्रबल रूप में आगे चलकर दीप्तिमान थे ।।६५।।

पठान, मोंगल, तुर्क, इरानी-दाढ़ी थी सब सामने ।

पुर्तुगीज, डच और फिरंगी-टोपी पीछे धमकाने ।।६६।।

पर इन सबसे वीर मराठा जूझ दोहरा करता है ।

एक हाथ से दाढ़ी खीचें टोपि दुजै खिसकाता है ।।६७।।

मुख्‍य वीर येसाजी घायल हुए, हाय ! तो भी उसने ।

पुर्तुगीजों के सर टक्‍कर में फोड़े २१ पर तोड़े कितने ।।६८।।

मरते-मरते मार-काट इतनी वाई में हंबीर २२

कर गए कि गुरु समर्थ की उक्ति हो गई साकार ।।६९।।

वीर हुतात्‍मा संभाजी २३ तुम धर्म के लिए शहीद हुए ।

न सिर्फ तुम्‍हरे, बल्कि राष्‍ट्र के पातक सारे धुले गए ।।७०।।

भालेराई, राव धनाजी, औ' संताजी शौर्यद्युति ।

एक-एक के साथ जुड़ी है एक-एक युद्ध की स्‍मृति ।।७१।।

एक-एक युद्ध के साथ जो गर्भित सैनिक शतावधि ।

उत्‍सुक दौड़त तुमुल जूझने, वर्णन करते दंग मति ।।७२।।

रिपु के हाथ न लागत, शोलों में ही जली सात सौ स्त्रियाँ ।

विशाळगढ़ पर ध्‍वजा प्रज्‍वलित दूजा चितौड़ ज्‍वलंत किया ।।७३।।

कासम मरा साँस रुँधकर दुंडेरि के रणांगण में ।

हिम्‍मत खाँ का वध किया मराठों ने बसवपट्टण में ।।७४।।

एक-एक सेना गनीम की, पास जिंजि के खत्‍म कर दी ।

भरमाकर जुल्फिकार खाँ को हार की धूल चटवा दी ।।७५।।

नारोपंत प्रमुख वीर थे, रिपु के हाथों कत्‍ल हुए ।

पर म्‍लेच्‍छों के मनोरथ इसी कुर्बानी से खत्‍म हुए ।।७६।।

कुर्बानी से उसकी, उसकी लेकर तेग लड़ा जो भी ।

गिरा जूझते रण में राष्‍ट्र-स्‍वतंत्रता के लिए तभी ।।७७।।

पाइक हो या नाइक हो, हो स्‍मृत या विस्‍तृत सैनिक ही ।

उसकी कुर्बानी को वंदन मेरा शत-शत बार सही ।।७८।।

प्रयागजी की पराजय मुझे वंदनीय है अपरंपार ।

ऐसी पराजयों की गरिमा कितनी विजयों से बढ़कर ।।७९।।

लेकर गठरी घास-फूस की जीत लिया था किला कभी ।

उनकी सेनाएँ जा पहुँची दिल्‍ली तक जो अभी-अभी ।।८०।।

पंद्रह सौ वीरों को तुमने काट दिया, है सच, फिर भी ।

दिवाण-खास में घुसा मराठा, वापस जाएगा न कभी ।।८१।।

लेकिन हिंदद्धेष्‍टा लोगों, सावधान अब निरंतर ।

प्रधान अब २४बाजी बने हैं महाराष्‍ट्र-मंडल के भीतर ।।८२।।

बात हिंदू पदपादशाही के बिना न दूजी कहते है ।

हिंदूध्‍वज किन्‍नर द्वीप में फहराने की उमंग है ।।८३।।

पालखेड में निजाम हारा, अल्‍ली परास्‍त बंगाल में ।

अर्काट में नबाव पराजित, परास्‍त सिद्दी भू-जल में ।।८४।।

विजयगढ़ पर औ' चिपळूण में उसको पीटा भू पर जैसे ।

जल में भी जब गनीम आया कभी सामने, पीटा वैसे ।।८५।।

श्रीगाँव में परास्‍त सेना दस हजार से भी ज्‍यादा ।

शिरच्‍छेद ही हुआ सिद्दि का श्रीचिमणाजी २५ के द्वार ।।८६।।

हिंदूपीड़ा के पातक का उचित फल मिला हबशी को ।

पाप-प्रायश्चित-गदा से कुचला पुर्तुगीजों को ।।८७।।

ठाणे, माहिम, तारापुर के जंग बताऊँ कितने भी !

वसई की तो शौर्यगाथा को सराहता जगत् सभी ।।८८।।

पेटलाद में, औ' सारंग में, तिरल में जो शत्रु लड़ा ।

मर गया वह माळवा में म्‍लेच्‍छभृत्‍य कितना बड़ा ।।८९।।

बादशाही सल्‍तनत की दाढ़ी जला दी दिल्‍ली में ।

'था कभी, या था नहीं'-सा निजाम हुआ भोपाल में ।।९०।।

बुंदेलों के जैतपुर में बंगष को भी है पीटा ।

हिंदुओं का पक्ष लेकर अहिंदू को मारा-पीटा ।।९१।।

म्‍लेच्‍छमोचन हेतु आया दुष्‍ट नादिर ईरान से ।

किंतु सहसा छोड़ रण वह भागा बचने जान से ।।९२।।

तभी हुआ देहांत बाजि का, हाय ! दिवंगत महाबली ।

किंतु काबिल पुत्र ने ही महाराष्‍ट्र की डोर सम्‍हाली ।।९३।।

दशरथ ने अपनी राज्‍यश्री रामलक्ष्‍मणों को सौंपी ।

प्रभात तारे ने सूरज को अपनी आभा ज्‍यों सौंपी ।।९४।।

बाजिराव ने वैसे ही नरवीर नाना-भाऊ के ।

करकमलों में सौंपा ध्‍वज को हिंदू स्‍वतंत्रता देवी के ।।९५।।

खड़ा किया हिंदूध्‍वज शिवबा की पीढ़ी ने रायगढ़ में ।

बाजी की पीढ़ी ने उसको फहराया चंबळेश्‍वर में ।।९६।।

नरसिंह नाना के सिपाही महाराष्‍ट्र के वीर सही ।

खड़ा किया हिंदू स्‍वतंत्रताध्‍वज रिपुओं के सीने पर ही ।।९७।।

पठान, मोंगल, तुर्क, ईरानी, हबशी, सिद्दी ये सारे ।

पुर्तुगीज, वलंदाज, फिरंगी अंग्रेजादी सब गोरे ।।९८।।

ईरान से योरप तक के शत्रुओं का आक्रमण ।

सिंधु नदी से सेतुबंध तक भूमि बन गई रणांगण ।।९९।।

तीन द्वीपों के गुंडों की सेना को, पर, डुबो दिया ।

सिधु नदी से सेतुबंध तक रणक्षेत्र को लड़वाया ।।१००।।

याद दिलाना तुम्‍हें इसी की वाजिब लगता नहीं अभी ।

प्रत्‍यक्ष रूप में देखो होगी बहुतों ने वह जीत तभी ।।१०१।।

तुममें होंगे बहुत वीर जो जूझे थे उन जंगों में ।

नाइक ऐसे, पाइक ऐसे, वीर तेग चलाने में ।।१०२।।

वे ही कह दें क्‍या यह जीत अचानक हमें प्राप्‍त हुई ?

क्‍या विजयश्री भूली-भटकी घर हमारे थी आई ?१०३।।

अचानक नहीं जी, इस भू की तस्‍सू-तस्‍सू लड़वाई !

हिंदू स्‍वातंत्र्यार्थ रणों में राशि शिरों की लगवाई ।।१०४।।

संतत शोणित-तर्पण-धारा करती आई हर पीढ़ी।

रणकुंडस्थित हविर्भुज की अग्नि कभी ना बुझने दी ।।१०५।।

समर्थसम जो योगी करते महातपस्‍या तपोबली ।

अमात्‍य, मंत्री, प्रधान करते सूक्ष्‍म यंत्रणा मंत्रबली ।।१०६

हणमंते, प्रल्‍हाद निराजी पंत और भी कितने थे ।

छोटे-बड़े सैकड़ों वीर जो मुक्ति समर के कर्ता थे ।।१०७।।

उनके तप से, उनके जप से, उपदेशों से ज्‍वलित हुई ।

मंत्रयुक्ति से तेज बन गई, शस्‍त्रशक्ति से भभक गई ।।१०८।।

-वही आज यह हिंदू शक्ति जो नए जनम को पाई है ।

जन्‍म उसे देने के पीछे महाराष्‍ट्र के प्रयास हैं ।।१०९।।

जय-जय ध्‍वनि से भर लो अंबर घर-घर कर लो महोत्‍सव ।

परम मांगलिक, हिंदुजनो, अब वार्त्‍ता आई है अभिनव ।।११०।।

हिंदू-सैनिकों की आकांक्षापूर्ति कराई श्रीप्रभु ने ।

आज हिंदवी ध्‍वजा अटक में पहुँचाई है दादा ने ।।१११।।

: ४ :

करो महोत्‍सव हिंदुजनो तुम ! कुर्बानी से आई है ।

विजय तुम्‍हारी, तभी महोत्‍सव करने का यह अवसर है ।।११२।।

परंतु विजयी होकर आए हो जितने भी तुम वीर ।

सभी न भूलो जय से निकले कर्तव्‍यों का नव भार ।।११३।।

चंद्रगुप्‍त ने, पुष्‍पमित्र ने तथा गौतमी के सुत ने ।

किया राष्‍ट्रसंकट को पहले निरस्‍त, उससे भी तुमने ।।११४।।

सौ गुना दुर्घट संकट को अपने बल से भगा दिया ।

वीर शिवाजी के वंशज तुम, कालोचित कर्तव्‍य किया ।।११५।।

अथापि न अभी कार्य हुआ संपन्‍न, अभी तो तट पहुँचे ।

ले‍किन अब भी दुर्ग पार कर घर तक तो हम ना पहुँचे ।।११६।।

आज हिंदू पदपादशाही का सुयोग सचमुच आ ही गया ।

अथापि न अभी समारोह वह कतई तो संपन्‍न हुआ ।।११७।।

वीर शिवाजी के सम हमने धन्‍य विजय को पाया है ।

वीर शिवाजी के सम अब इसकी रक्षा भी तो करनी है ।।११८।।

शल्‍य उखाड़ा, पर न अभी वह घाव हमारा भरा है ।

'कहाँ हूण हैं ?'- इस तरह की स्थिति अब हमको लानी है ।।११९।।

तुम दैत्‍यों के चक्रव्‍यूह का यद्यपि भेद कर गए ही ।

फिर भी वापस भी आना है विजय प्राप्‍त करके ही ।।१२०।।

अमंगल न हो पूर्वस्‍खलन से, सावधान हो जाओ अब ।

२६सारथि वह निर्भर करता है सहायता चाहोगे तब ।।१२१।।

और जिन्‍होंने दैत्‍यों के इस चक्रव्‍यूह का भेद किया ।

विजयी होकर वापस आएँ वे, वसुधा को मुक्‍त किया ।।१२२।।

सशस्‍त्र समाराभिषेक जैसे हिंदुश्री का यही हुआ ।

सशास्‍त्र सिंहासनाभिषेक भी करने का मौका आया ।।१२३।।

सबल किया तुमने जैसे इस राष्‍ट्र को तब जय पाने ।

प्रभो, महाबल दे दो अब भी कर्तव्‍यों को निपटाने ।।१२४।।

इस पर भी जो हो ईशेच्‍छा वही घटित होगा आगे ।

परंतु जो कर्तृता देखकर आज दूर है रिपु भागे ।।१२५।।

व्‍यर्थ न जाएगा यह दिन भी हिंदूराष्‍ट्र का दिल बहल ।

अमित शक्ति का, अमित स्‍फूर्ति का स्रोत बन गया चिरकाल ।।१२६।।

आज सात सदियों से विजयी, गहनों से मालामाल ।

हिंदू विजय का घोड़ा पुनरपि प्राशन करता सिंधु-जल ।।१२७।।

सागर के संग आओ गंगे, आओ कावेरी-नीर ।

सिंधु, शतद्रु, त्रिवेणी, यमुने, गोदे, कृष्‍णे, अनिवार ।।१२८।।

हे तीर्थों, हे क्षेत्रो, सारी भारत-भू में जो स्थित हैं ।

हरद्विार, कैलाश, काशिके, पुरी, द्वारके-जो भी हैं ।।१२९।।

सुनो-सुनो, यह हर्षोल्‍लासित वर्त्‍ता आई जीत की ।

पूर्ण सात सदियों का बदला लिया, हार है जेता की ।।१३०।।

हिंदू-सैनिकों की आकांक्षापूर्ति कराई श्रीप्रभु ने ।

आज हिंदवी ध्‍वजा अटक में पहुँचाई है दादा ने ।।१३१।।

* * *

गोमांतक (उत्‍तरार्ध-२)

चढ़ते-चढ़ते गिरि शिखर पर अचानक

पथ समाप्‍त होते ही, मन विस्मित जैसा

कृतकृत्‍याश्‍चर्य क्षण विश्राम करत है

विस्‍तृत सर्वत्र वनश्री का परिचय

कर लेते-लेते ही मग्‍न-स्‍तब्‍ध-सा

वैसे ही वीर-भाट का यह गाना

सुनकर वीरों के मन मग्‍न हो गए ।

हो गया समाप्‍त गीत, फिर भी वैसे ही

कृतकृत्‍याश्‍चर्य मुग्‍ध बैठे ही रहे

मानो अभिमंत्रित-सी सब हुई सभा ।

कोई भी चाहे ना शांति-भंग को

जब तक सिंधु मुख्‍य खड़े होकर बोले :

'उत्‍तरदिग्विजयोत्‍सव यह आज ठाठ से

महाराष्‍ट्र को पूरे नहला ही देगा

आनंदाश्रु में सत्‍य । तिस पर भी और

पुण्‍यपुरी के संचित पुण्‍य की कहीं

नहीं बराबरी,- अथवा विक्रम की भी !

किंतु हमें परशुधरक्षेत्रनिवासियों

जानपदों को भी धन्‍यता प्रतीत हो

यह भी तो स्‍वाभाविक ही है, जी !

इस विजयश्री का सेनापति महान्

है अपने कोंकण से, इसी इलाके-

के वन का इक गरुड-भरारी

जिस कुल में अखिल महाराष्‍ट्रशक्ति-ना

अखिल हिंदू साम्राज्‍योत्‍कर्ष आज है

केंद्रित : वह धन्‍य, महा, कुल सुधन्‍य है

गोद में इसी कोंकण भूमि की पला !

परशुधर क्षेत्र में प्रति परशुराम-से

वीर जनम लेते हैं आज भी । कलि में

स्‍थापना करने हेतु धर्मराज्‍य की !

वीर शिवाजी के सम विजय प्राप्‍त की

सत्‍य आज लेकिन तुमने ही सुन लिया

कविवर की उक्ति के उत्‍तरार्ध को

कि विजय जो आज प्राप्‍त हुई है हमें

उसकी रक्षा भी हमको अब करनी है !

इस कर्तव्‍य की पूर्ति करने हेतु

कार्यधुरंधर शिंदे-होळकरादि

श्रीमंत यशस्‍वी नाना और भाऊ के

नेतृत्‍व में सतत कार्यमग्‍न हैं सभी

उत्‍तर में, पूरब में औ' दक्षिण में;

पर पश्चिम सागर पर हिंदू विजय का

ध्‍वज है निजदोदंड पर निभाना

कार्य यह विशिष्‍ट, पृथक्‍भार यह महान्-

परशुधरक्षेत्र का दायित्‍व है यही !

उत्‍तर-सीमा पर जैसे तुर्क ही

वैसे ही पश्चिम-सागर-सीमा पर

द्वार पर सदा सतर्क दुष्‍ट ये सभी

फिरंगी, हबशी सारे अपनी हवस को

लेकर देखा करते हैं कब, कैसे

छेद पड़ता है हमरे धैर्य-बुर्ज को ।

आज तक कभी इन मार्गस्‍थ कंटकों-

को उखाड़ देने को समय ना मिला

कालसर्प जो महाभयंकर विषैला

इस स्‍वराज्‍य मार्ग को रोक रहा था,

मातृभूमि को कसकर अपनी लपेट में

विद्ध कर रहा था जो तुर्क-सर्प ही,

उससे ही लड़ने में, और पचाने-

में उसका विष दुर्धर, हमरी ताकत का-

व्‍यय करना अद्यावधि अनिवार्य हुआ था ।

विश्‍वरूप नाटक में अगले ही अंक का

दृश्‍य कौन सा होगा, उसे न कोई-

भी बता सकता है निश्चित रूप में !

किंतु अभी भी स्थिति में तो इन तीनों

हबशी, अंग्रेज, पुर्तुगीज बलों की

औकात न मार्ग स्थिति काँटों से अधिक !

यदि उनको ही उखाड़ देने में हम

उत्‍तर के अखिल-हिंदू-साम्राज्‍य-स्‍थापना

के महान् कार्य को छोड़, लग जाते

तो निष्‍फल, हास्‍यास्‍पद और भयानक

कृत्‍य वही बन जाता, जैसे कि राह पर

कृष्‍ण-सर्प के डसने पर भी कोई

काँटों को चुन-चुनकर निकालता रहे !

इतने पर यदि अगली पीढ़ी ने भी

२७यादवों की भाँति इन काँटों को ही

निजघातार्थ प्रयुक्‍त कर लिया कभी

तो वह पागलपन उस पीढ़ी का ही !

उत्‍तर-दिग्विजय वाले कार्य को किंतु

बस में लाया है अब इस विजयश्री ने

अब तो इन काँटों को उखाड़ फेंक दें

राह को करेंगे अब निष्‍कंटक ही

क्‍योंकि तृण ने क्षुद्र यादव-कलह में

कुलनाशक मुसल का रूप लिया था

कौन कहे ! अब नूतन यादवी दरम्‍यान

काँटे ये बन जाएँ प्राणघातक

बाणों का रूप भयंकर लें ये तब !

चिंता यह भारत में न है किसी को

श्रीमत् नाना केवल अनुभव करते हैं ।

इसीलिए बहुश: अति कटु, फिर भी

ज्ञातिकलह करना भी पड़ा उनको

वीर तुळाजी के संग ! हाय ! यदि होता

वह कम मदांध-या होता अधिक प्रबल ही !

व्‍यर्थ न हो जाती वीरता उसकी !

बलमत्‍त न होता : तो राष्‍ट्रहितार्थम्

आज्ञाकारी बनता राष्‍ट्र प्रमुख का ।

प्रबल अधिक होता यदि : तो भारत की

राष्‍ट्रधुरा ले लेता स्‍कंधों पर अपने

किंतु अखिल हिंदूराष्‍ट्र की धुरा को

लेने की हिम्‍मत औ' पात्रता, स्थिति

एक भी न होते अनुकूल, हट गया

एतद्गुणगणभूषित जो स्‍वयं, स्‍वयं

राष्‍ट्र का कुशल केंद्र प्रत्‍यक्ष ही जो,

ऐसे प्रधान पंत का न द्वेष केवल,

बल्कि रण में विरोध करने सरसाया !

कोंकण के, भारत के मंगल हेतु

मुख्‍य रूप से जो जरूर पश्चिमी

सिंधु स्‍वातंत्र्य, वही साध्‍य न ऐसे

एक मुखाभाव से, यही देखकर

२८श्रीमंत को करना पड़ा उसका विनाश ही

अभिमान तुळाजी का था राष्‍ट्रघात की

फिर भी यदि देरी से ही न सही, पर

धीर दमाजी अथवा वीर रघूजी

की तरह समाप्‍त भी कर लेता खुद का

राष्‍ट्रघात करने वाला हठ तुळाजी,

तो श्रीमंत् नागा भी बचाते उसे ।

पर घमंड से ब्राह्मण और प्रजा को

कष्‍ट दिए; दुष्‍ट कृत्‍य बर्बर सम ही

कापुरुषत्‍व उसी का था जबकि

श्रीमंत द्वारा भेजे पूजनीय-से

राजदूतपुरुषों की नाकों को ही

काट दिया, भेजा वापिस उसी दुष्‍ट ने,

छत्रपति राजा को भी असह्य था,

-राष्‍ट्र रहा दूर ! किंतु निज भाई से

मानाजीराव सम सौम्‍य सुज्ञ भी

भाई से सतत बैर करना हकनाक,

-यह घमंड-दर्प ही नाश कर गया ।

नवदुर्योधनसम,'सूच्‍यग्रमृत्तिका-

के खातिर' बस पूरा राज्‍य डुबो दिया !

फिर भी यह वीर अब नष्‍ट हो गया

दु:खद ही, अनुशोच्‍य ही बात हो गई ।

श्रीमंत हमारे और तुळोजी हमारा,

पर हिंदूश्रीमत्‍साम्राज्‍य दृष्टि से

मान लिया; और यदि वीर तुळाजी

नाना के स्‍थान, और वे भी उसके

होते : तो भी नाना के विनाश में

कहता मैं यही ! शोकविद्ध चित्‍त से !!

किंतु इस अप्रिय गृहकलह से भी-

अप्रिय, अनुशोच्‍य भी महसूस हुआ था

स्‍वयं श्रीमंत को, और जिसी का

आश्रय कर लिया था निरुपाय रूप में

फिर भी यह कृत्‍य हुआ था उनसे भी

परकीयों की मदद गृहकलह में ले ली !

दुर्भाग्‍य से हिंदुओं की यह आदत

आत्‍मघात इतना होने पर भी

पूर्णत: न छूट गई आत्‍मघातका

अक्षम्‍य है दोष यही : किंतु यह दोष

है अखिल राष्‍ट्र का ! न किसी एक व्‍यक्ति का !

जब तक सब अन्‍य लोग गृहकलह में

परकीयों की सहायता लेते हैं

तब तक किसी एक ने निरुपाय से कभी

निंदनीय कार्य यही स्‍वयं कर लिया

और फिर विशेष रूप से अंतिमत:

कार्य होने पर उस निंद्य साधन को

दीर्ण, चूर्ण पूर्णरूप स्‍वयं कर दिया

तो वह दोष हुआ परिस्थिति का ही

जब व्‍यंकोजी ने विजापुर वालों की

सहायता माँगी, तब श्रीशिवाजी ने-

भी कुत्‍बशाही को मित्र बनाया

और बाद में सारी सल्‍तनतों का

परधर्मी, पूर्ण नाश कर दिया था

भू पर हिंदू साम्राज्‍य की स्‍थापना हेतु !

नित्‍य बैर रखते जो हिंदू धर्म से

ऐसे मुगलों से भी नजदीकी का

अपराध न महसूस हुआ ताराऊ को

जहाँ सहायता परकीयों से लेकर

ताराऊ सहित स्‍वयं वीर तुळाजी

पेशवा-विनाश के लिए लड़ पड़ा :

आंग्रे के ही कुल में एक बंधु ही

बंधु के विनाश हेतु अंग्रेजों को

लाया था सहायतार्थ, और भी जहाँ

हिंदू-शत्रु दैत्‍य शिद्दि आ गया जभी

मानाजीराव से युद्ध के लिए

तब तुळाजी ने न दी माँगने पर भी

सहायता, तब ऐसे तुळाजी को ही

दंड देने खातिर 'कंटकेन हि

कंटकं' नीति को मानना पड़ा !

और यदि नाना भी अंग्रेजों से

संधि न करते बहुत चतुराई से

तो आगे चलकर प्रत्‍यक्ष समर में

नाना के शत्रु तुळाजी सहित ही

अंग्रेजों को भी अपने साथ ही लिये

नाना के विनाश का षड्यंत्र रचाते-

कौन दे इसका भरोसा ? कौन क्‍या कहे ?

अंग्रेजों के बिन नहीं नाश तुळाजी का;

जितना जब तक वह; तब तक नौबल

एककेंद्र सत्‍ता को पा न सकेगा;

नौ साधन ना प्रबल तो स्‍वसिंधु की कभी

स्‍वतंत्रता कायम रखना न संभव;

इसीलिए आंग्‍लादिक परकीय शत्रु के

नाश के लिए ही लिया अंग्रेज-मदद को

औ' वह भी रद्दी को मात्र एक ही

बाणकोट को टुकड़ा फेंक सामने

तुळाजी के बिन और किसी को अंग्रेजों-

को हराना मुशकिल है, न बात यह !

यदि ऐसा होता तो पाप था जरूर

नाश तुळाजी का, अक्षम्‍य था तभी

जा रहा तुळाजी तब कोई न जा रही

वीरता महाराष्‍ट्र देश की तभी !

जा रहा तुळाजी, पर उस जंग से सभी

कोंकण का भूबल औ' सिंधुबल अभी

हो रहा एककेंद्र, एकाधीन ! मराठी

शिवपूर्व त्रस्‍त, वृकग्रस्‍त वह कहाँ

और कहाँ कोंकण स्‍वतंत्र आज का !

त्रस्‍त आज वे ही वृक हिंस्र ! इसलिए

तीन बिलों के बाहर एक भी कदम

बढ़ा न सकते हैं ! अंदर भी भय !

किंतु अभी उन तीनों बिलों को ही बस

मुंबई-गोवा-और जंजीरा नाम के

उखाड़; परलोभ-वृक नृशंस-सा

नामशेष करके, और सिंधु पूर्ण यह

निवैंर, स्‍वांकित, निरुपद्रवी करें

शीघ्र, बद्धपरिकर बन चलो, उठो

कोंकण की भू स्‍वतंत्र बन गई जैसे

वैसे कोंकण की सिंधु-स्‍वतंत्रता

हासिल करने खातिर उठो, सुवीरों !

और वह स्‍वतंत्रता जिसके बिन कभी

सुरक्षित न हो सकेगी यह सुनिश्चित है

ऐसे नौसाधन को विधर्मि दुष्‍टता-

के प्रति दुर्जय बना लो अब तुम भी !

हे रत्‍नागिरि ! अंजनवेल ! यहाँ के

सारे ही सिंधु-पुरों ! खनखनाहट करके

भर दो तुम सारा नभ रणनौकाओं से

घणित, रणावित, अहर्निश, सहस्रश: !

तरह-तरह की विभिन्‍न नौकाएँ सारी

चीन और विलायत तक जानेवाली

व्‍यापारी, जूझारू, मजबूत पाल की !!

नौशिल्‍पी कौन हमारे समान है,

नौ रण में कौन हमें हरा सके आज,

कोंकण के नौशिल्‍पाभिज्ञ लोग हम !

कोंकण के नौ-रण-शूर लोग हम !

यह विनति, उपदेश भी, न मेरा केवल

अकेले का; पर है आज्ञा ही मान लो

पंत श्रीमंत प्रभु पेशवा स्‍वयं

करते हैं आज जयोत्‍सव प्रसंग में

मेरे द्वारा ही सब मराठों को !

एककेंद्र नौसाधन; अग्रणी स्‍वयं

श्रीमंत हैं; जनक है वीर शिवाजी;

ये सावंत; और ये मानाजीराव

सरदार हैं प्रमुख जहाँ; और जूझकर

जिसने हबसाण-फिरंगणा-नौबल को

जीत लिया युद्ध में : सिंधुदल भी वह

महाराष्‍ट्र का, शीघ्र ही हिंदू सिंधु के

नक्रों को जान से मार ही देगा !!

या पश्चिम सिंधु-स्‍वातंत्र्य समर में

चारों ओर कर परिधि; एक बनाकर

रणनौकाओं का बेड़ा; उस पर से

बाँध मोरचा मारक रणकौशल से;

तोपों की मार करेगा भयानक

नौबल यह : और मराठी भू सेना

धकेल देगी यहाँ से समुद्र में

कोलकाता-कर्नाटक-मुंबई के प्रति

ताम्रों को पूरे ही : तब कहीं स्‍वयं

पश्चिम सिंधु स्‍वातंत्र्य जीतकर

हिंदू-सिंधु भी स्‍वतंत्र होंगे ही स्‍वयं !

तो भारत वीरो ! अब भूमि के संग ही

भारतीय सिंधु की स्‍वतंत्रता अभी

जीत लेने को नौसाधन बना लो !!

नौसाधन वह, वह नौसेना ही

उदित हिंदू राष्‍ट्र की जिस दिन कभी

सिंधु की लहरों पर होकर सवार ही

तोपों की दूरबीन से ही पहरा

देगी अनिमष प्रबल मातृभूमि के

दूरस्‍थ भविष्‍य पर, विचरण करते जल में,

उसी दिवस ले लेगी लब्‍ध आज जो

हिंदू स्‍वातंत्र्य चिरस्‍थायिता सत्‍य !!

ऐसा हितकारक, उत्‍तेजक भाषण

करके जब सिंधु मुख्‍य बैठ ही गए

तब पुनरपि राजमुख्‍य उठ खड़े हुए

'सत्‍य और हितकारी सिंधुमुख्‍य ने

आज्ञा जो प्रभु की औ' स्‍वयं अपनी भी

अभी-अभी स्‍वमुख से हमें बता दी

शिरसा वंदनीय है : समयोचित है :

क्‍योंकि महोत्‍सव में अब मशगुल होकर

भावी कार्य को हम सब भूल न जाएँ !

अंग्रेजों को हमने पूर्ण समझ लिया !

उत्‍तर की विजय महान् आज मिल गई

अब मौका पाकर उन्‍हें भी देखेंगे !

२९सिंधुविजय का उत्‍सव आज जिस तरह

करते हैं, आशा है शीघ्र ही वैसे

३०सिंधुविजय का उत्‍सव वह मनाएँगे

जेतृत्‍वप्रमद भला म्‍लेच्‍छ शत्रु का

आज है निहत; भला उन म्‍लेच्‍छों की

अकड़ का शल्‍य आज उखाड़ दिया है;

फिर भी है हिंदुजनो, भूल न जाओ

कि मातृभूमि का भयद घाव अभी ना

भर गया है ! जैसे कवि ने कहा है

वैसे 'वे हूण कहाँ हैं ? ऐसी पृच्‍छा

करने की क्षमता न अभी प्राप्‍त हमें है !

एतदर्थ ऐसे विजयोत्‍सव में भी

उचित अगर कोई हम कार्य करेंगे

तो यही कि अपदहृत जातिबंधुओं-

को रिपु कर से धर्ममुक्‍त कराके

जातिहृदय के उन गहरे घावों को

ओजस्‍वी औषधि प्रदान कर देंगे !

तो फिर पहले से निश्चित जो किया

शुद्धियज्ञ हमने हैं कल के लिए

वही होगा विजयोत्‍सव उचित-सा भला

तिस पर भी राजदूत ने अभी कहा

जिस कविवर ने गाया मधुर गीत अब

-वह इसी शुद्धियज्ञपावक के प्रति

बनने वाला है पावनीय कल !

आश्‍चर्य से चकित दृष्टि आप सभी की

पूछ रही है, कल ? कैसे ? हाँ जी

गीत के प्रारंभ में कविवर ने स्‍वयं

'पतित' शब्‍द से परिचय अपना कराया :

वह न केवल यूँ ही ! पर सत्‍य शब्‍दश: !!

श्रीमंत ने इस खत में त्रुटित रूप में

वृत्‍त लिखा है मुझको-और फिर कल

होगा सब साग्र विदित यहीं सबको भी !

कहकर ऐसे, फिर राजमुख्‍य ने

सभा समाप्‍त भी कर दी आश्‍चर्य-सिंधु में ।

जन जत्‍थे-जत्‍थे में जाते-जाते

बात यही करते थे तर्क-वितर्क से

राजदूत कौन ? पतित कैसे ? सोच ले

कोई; कोई मन में देख रहा था अटक छावनी !

उस विजय में बेटा, बाप या कोई

स्‍वकीय कैसे वीरता दिखा गया होगा ?

कौन सी उपाधि ले आएगा वहाँ से ?

या कोई उपहार शौर्यगौरव का ?

या कोई डर भी रहा था मन में

क्‍या अपने स्‍वकीय को देख पाएँगे ?

'फिर भी वह वीरगति !' सांत्‍वना मिले,

'श्रीमंत ही हमसे मिलेंगे वहाँ :'

कोई सवाल पूछे, 'क्‍या अटक नदी के

भी आगे जाएगी सेना हमारी ?'

कोई निंदा करे, 'हिंदू क्‍या करें !'

'क्‍यों नहीं जी ? वह भी कर दिखाएँ !'

आशाओं को घटित मानकर कहीं

उच्‍छृंखल जयनिनाद गरजता रहे :

भावी संकट को कहीं देत बढ़ावा

दुर्भविष्‍यवादी मायूस चल पड़े :

और उधर तोपों के धमाके सही

हो रहे थे रुक-रुककर लगातार :

उधर उन राष्‍ट्रीया प्रीति-भक्ति-भी-

आशा - अपशंका - उत्‍साह - भावना-

भावों की मानसयज्ञाग्निहुतों की

अग्निज्‍वाला जैसी दीप्‍त वह ध्‍वजा :

-वह भगवा झंडा भी सतत आसमाँ-

में फहराता था सबसे भी ऊपर !!

उसी ग्राम के अहाते में इक था

रम्‍य पुष्‍पलता पादप-संकीर्ण तपोवन

पुराणप्रथित एक सिंधु किनारे ।

वेलावलिशोभित पुन्‍नाग सुगंधित

कोकिलादि-खग-कूजित मृगमनोज्ञ-से

तपोवन के भीतर इक तीर्थ मनोहर

विमल-सलिल सलिलज-परिवेष्‍टन के बीच

नारियल, आम, कटहल, पूग, कर्दली-

तरुलता स्‍वभक्तिवश गूँथती चली

शाखाएँ उत्‍फुल्‍लक पल-फूलों में

रचाते रमणीय-सा वितान नभ में

तीर्थ के रविकिरणोज्‍ज्‍वल जल पर ही ।

दिन दूजा उगते ही, पुण्‍य उषा के

स्‍तोत्रों को गाते द्विज स्‍नात पवित्र

शतश: सत्‍त्वचरण दीखने लगे

जाते हुए कानन में उस पावन-से ।

तीर्थ के ही इर्दगिर्द जो समतल-भू

थी, वह भर गई पूर्ण रूप से

समिधाओं, दर्भों, घृततिलादि सभी से,

यज्ञ के साहित्‍य से पुण्‍य पावन

शीघ्र वन घोषित औ' दीप्‍त बन गया

स्‍वर-विशुद्ध समुदीरित वेदपदों से

तथा हविर्लुब्‍ध हुताशार्चितजन से ।

स्निग्‍ध सुगंधित शोभन हवन धूम भी

लोलुप से दूर नहीं जा रहे तभी

इर्दगिर्द नभ में ही विमल रौप्‍यक

जालों में लोभों के अपने हृद को

गूँथते रहे आशिक जत्‍थों में वे

जैसे कि देवता विमान में रहे !

तब जन भी देखने अपूर्व-से उसी

शुद्धि समारोह को, कानन में सभी

सोत्‍सव स्‍वधर्मनिरत पधारने लगे ।

पौर-वृद्ध आगे औ' समाज सारा

यज्ञशरण सीमा पर वेषभूषण में

दूर तक फैल गया जैसे कि दूजा

वेलावन सिंधु किनारे खिल गया था

तभी सादर भीड़ से ध्‍वनि आ गई

'मार्ग ! हटो ! बंधु को मार्ग दो, हटो !'

और उसी राजदूत वृद्धयुवा के

नेतृत्‍व में समूह शत पतित जनों का

आ पहुँचा उस पावन तीर्थ के प्रति,

फिर सचैल सारे ही पतित तीर्थ में

स्‍नान करके आए । और वस्‍त्र वे

जीर्ण, शीर्ण, पुरातन पाप-से सुदूर

फेंककर सभी ने पहने शुभ-से

नवीन शुद्ध कटिवस्‍त्र मंत्रपूत औ'

श्‍मश्रू का विधि समाप्‍त होते ही फिर

हर सिर पर विराजमान शास्‍त्रशिखा जो

हिंदुओं की अस्मिता और हृदय में

फिर सबको अभ्‍यंग स्‍नान कराने

विप्रवर्य आवाहन करने लगे सभी

हे गंगे, हे यमुने, हे सरस्‍वती

सिंधु, नर्मदे, गोदे पतितपावने

हे कृष्‍णे, कावेरी आओ उदक में ।

अखिल भारतीय जीव नैकतास्‍मृति-

संस्‍कारोजग्रत् स्‍वजातिभावना-

प्रीत, पतित सरोवर में शरीर धोकर

हृदयांत:करण सहित विमल बन गए ।

विश्‍वचक्षुसम भास्‍वान् भास्‍कर के प्रति

बद्धांजलि अर्घ्‍यदान किया सभी ने,

तट पर स्थित जो सवत्‍स धेनु मंगला

उसे स्‍पर्श करके औ' पतितपावन

यज्ञपावक के शुभ दर्शन करके,

सालंकृत सपरिधान महोत्‍सव करके,

जयध्‍वनि की पुनरपि हो गई गर्जना

धर्म सनातन की जय ! जय पुराण की !

अखिल जनों का उसको साथ भी मिला

कानन ही आनन बन गया समूर्त-सा

लोकांतर्गत राष्‍ट्रोत्‍साह भक्ति का !

तभी हुई ध्‍वनि प्रतिध्‍वनित 'धर्म की

हिंदू धर्म की जय ! जय रामचंद्र की !!'

प्रेम से जन पुनरागत लोगों का

आलिंगन कर रहे चिरमिलित बंधु-सा

मदहोश हो गए सारे जयघोषों से !

राम नाम प्राशन कर, राम बन गए

सारे के सारे ही ! उत्‍कट प्रेम से

आलिंगन कर रहे हिंदू हिंदू का !

न कोई बुजुर्ग था न कोई बच्‍चा

ब्राह्मण या अंत्‍यज ! जाति जीवन में ही

जीवभाव विद्रुत हो गया नदियाँ

घुलमिल गईं सिंधु में हिंदुता की !

जय माधव ! गोविंद ! जयध्‍वनि के साथ !!

चिरविरही भगिनी को बंधु और वे

जननी को सुत लगा लेते गले अब

याद करके म्‍लेच्‍छों की ज्‍यादतियों को !

बहु रोए मुक्‍त कंठ कर अपना ।

लेकिन इन सबसे ही जातिमिलन वह

हँसाए औ' रुलाए बहु, अधिक किसी के

हृदय को, तो फिर उस कविवर्य

राजदूत युवक के ! वह गंभीर-सी

प्रेक्षणीय-सी मुद्रा भालविशाला

अनुवेदन रहित हो गई चंचला

मानो सुख-दु:खों को, लोकभाव को

दरशाता है कोई विमल आईना !

जातिमिलन सुख की वह पहली बाढ़

कम होने पर, उठकर वह राजदूत

सब लोगों को अभिवादन करके

बोला, 'हे बंधुओ ! शुद्धि के उपरांत

हम संस्‍कारहीन पुनरपि स्‍वयं

विप्रों ने बना दिया संस्‍कारशील ही-

ऐसे हमको सब देवताओं में

प्रथम दर्शनीय दो प्रमुख देवता

गर्व है शुद्धि पर जिनके हृद में

धर्म का दंड है, शक्ति-शिखा जो

वह भगवा झंडा इक; और दूसरी

वह जो दूर दिख रही है यहाँ से

भग्‍न, पुरानी, सूनी, वही समाधि !

पुनर्हिंदुकरण रूप जनिक विधि सारे

हो गए संपन्‍न और उसके उपरांत

व्रात्‍यस्‍तोमादि अन्‍य ऐच्छिक व्रत भी

हो जाएँगे यथाक्रम उचित रूप में

पर जो मुख्‍य एक व्रत करता है

रकत-प्राण हिंदू, वह दर्शन समाधि के !

क्‍योंकि है यह समाधि जीर्ण उसी की

जिसका ना शेष आज नाम भी कहीं

जो चला गया अपना कर्तव्‍य निभा के !!

इसी तपोवन में तब इसी भूमि के

धर्मभक्‍त तेजस्‍वी विप्र हुए थे

पुर्तुगीजों के पीड़द शासन के बीच

शुद्ध करा लेते थे पतित जनों को

गुप्‍त रूप से अनुवत्‍सर पर कभी

अचानक ही रिपु को जब पता चला

पुर्तुगीज सेना तब वहाँ आ गई !

और घेर के उन सब पतित जनों को

पावक उन विप्रों के सहित सर्वत:

कत्‍लेआम शुरू किया उन्‍होंने !!

उस वक्‍त भाग-दौड़ के समय भी

वीर एक गोसावी डट खड़ा रहा !

और दे चुनौती संगीन के प्रति,

खड्ग के प्रति, खंजर के प्रति तभी

गरज उठा : 'मुझे जबर्दस्‍ती पहले

हे विधर्म दुष्‍ट ! तुमने अपहृत किया था ।

भ्रष्‍ट किया तनु को, पर हृदय हमारा

हिंदू का हिंदू ही रह गया तब से ।

आ पहुँचा शास्‍त्राग्निस्‍पर्शविधिवशात्

पावन होने मैं यहाँ, परंतु

आपको न है पसंद तो यही सही

शस्‍त्राग्निस्‍पर्श शुद्धिकार्य करेगा !

आओ, चीरो इस हृद को ! बिंदु भी

उसका अभ्रष्‍टशक्ति आओ देखो

परमाणु सीमा तक हिंदू है सभी !!'

क्‍या वह सच है ? मानो देखने यही

पुर्तुगीज संगिन उस हृदय में घुसी

आई तब शोणित की बाढ़ उछलकर

प्राण चले गए, फिर भी उसके मुँह से

'हिंदू मैं ! हिंदू मैं ! हुई गर्जना !

दैत्‍य भी स्तिमित हुए आश्‍चर्य देखकर !!

उसी हुतात्‍मा की यह जीर्ण समाधि :

वह खड़ा वहीं मुझको अभी दिखता है :

तेजी से शोणित की बाढ़ निकलती

हिंदू मैं ! हिंदू मैं ! गरज रही है !!

नाम भी न शेष रहा है अब जिसका

नाम चिरंतन बना सत्‍य उसी का !

नाम रूप निज हुत तब किया उसी ने

इसीलिए नामरूप राष्‍ट्र को मिला-

धर्मवीरता को जिसने प्राप्‍त है किया !

दे दें वह धैर्य हमें भक्तियुक्‍त ही

और दे भगवा ध्‍वज बाहुशक्ति को !!

कुरेदकर इसे सभी हिंदू जाति के

हृदय पर सत्‍य यही नित्‍य विश्‍व में

धर्म के बिना बल पाशव है, वैसे

धर्म भी अपाहिज है शक्ति के बिना !!'

कहते हुए ऐसे उस राष्‍ट्रभक्‍त ने

दंडवत् प्रणाम किया उस समाधि को !

दंडवत् प्रणाम तभी सब लोगों ने

किया उस साधु के समाधि को तुरंत

और उस भगवे झंडे को भी

साधु तथा साधु परित्राण-सुव्रती

शक्तियाँ उभय लोक सिद्ध करत हैं !!

करके फिर फलाहार यथोचित सभी

वनभोजन का मजा लेत प्‍यार से

तब धिमि-धिमि पखवाज भी बजने लगे

ताल-मृदंगों का भी गजर हो गया ।

वह समाज सारा फहराते झंडे

बना-बना के सुरचित व्‍यूह-पंक्तियाँ

बना रहा संघ भजन गाने वालों के ।

निकाला औ' जुलूस हरिनाममंगल ।

भाल पर बुक्‍के का टीका, और प्‍यार से

डालकर / माला फूलों की गले में

ताल हाथ में औ' मुँह में नाम हरि का

लेते गाते नृत्‍य करते सारे

नवमीलित भाई भी घुल-मिल गए :

पुनरपि ना होंगे अब फिर कभी जुदा !

धिमि-धिमि-धिमि बज रहे पखवाज पूत वे ।

एकसाथ, एकहृदय, एकस्‍वर में

हिंदूमात्र गरज रहा तल्‍लीन भक्ति में

गोविंद ! गोपल ! विट्ठल ! प्रभो !

'नेति' का प्रीतिकृत सगुण गान वह

गाते हुए जुलूस भार्गव पहुँचा

फिर चबूतरे वाले प्रांगण में सब

मृदु विचित्र आस्‍तीर्ण आसनों पर

लोगों ने विश्राम किया सुख-शांति में

हार और गुलदस्‍ते बाँटे सबको

नव गुलाब जल का सिंचन भी किया

बहुमूल्‍य इत्र लगाया सबको

और समारोह संपन्‍न हुआ ऐसा भी

कह दिया मुख्‍य ने : फिर भी लोग

जाने को न उठ रहे । पर पुन:- पुन:

प्रार्थना कर रहे थे कि कल जो कहा

उसके अनुसार वृत्‍त कथन करो अब !

मुख्‍य ने इच्‍छा लोगों की समझ ली

और आग्रह के साथ स्‍वयं अतिथि से

कहा, 'कह दो जी अब ! प्रभु ने भी

पत्र में लिख है कि श्रवणीय वृत्‍त है

म्‍लेच्‍छ देश देख विविध रस्‍म-रीति को

अवलोकन बहुत किया; संकटों का भी

सामना किया, हराया, जिसी शख्‍स ने;

जिसने रण में अद्भुत शौर्य दिखाकर

श्रीभाऊ की प्रीति को प्राप्‍त भी किया :

क्रूर कडाप्‍पा के रण में स्‍वयं अपने

हाथ से नबाव को काट ही दिया

जिसकी तलवार विजय खींच लाई :

ऐसे तुम राजदूत ! वृत्‍त तुम्‍हारा

सुनने ललचाए हैं सभी ! वीर की

कहानियाँ अन्‍य कवि भी गाते हैं :

पर तुम से कौन यहाँ कवि भी स्थित है ?

वीरमणि हो तुम, कविमणि भी हो,

एक व्‍यक्ति ने दोनों मणियों की शोभा

हड़प ली !- अब लालच को हम दंड

देंगे कि स्‍वमुख से कथन करो जी

जो है कि कृत्‍य बहुत हितकारी तुम्‍हरा ।

लोगों की इच्छा का आदर करना

सुख-दु:खों को अपने सच्‍चे मित्रों -

को बतलाने की इच्‍छा किसकी न रहती ?

विनय, बुद्धि ने बँधारा बँधा था उस पर

स्‍नेहाग्रह तीव्र तभी वह गंभीर रूप में

युवा राजदूत जैसे दर्शनीय गज;

नजर थी अंतर्मुख वैसी कि वैसी

दिखती थी जैसी थी पहले से ही

इतने भी जात्‍युत्‍सव-भाव-भावनाओं-

में उस युवक के चेहरे पर ही

चंचलता के बीच आंतरिक पीड़ा

पृष्‍ठभूमि चित्र में जैसी दिखती ।

ईषस्मित मुख पर किंचित झलका, पर

क्‍या था वह सुख का ? या दु:ख का ही ?

'क्‍या कहूँ ? कहाँ से ? फिर भी आपकी

आज्ञा है तो मुझको कहना ही पड़ेगा

बंधुओ ! है मेरा मित्र एक जो

न केवल प्रिय मित्र, जान ही मेरी

उसकी स्‍मृति भी प्रिय है बहु मुझको

वृत्‍त उसी का मन को लुभानेवाला

श्रवणार्ह है प्रथम, मेरी राय है,

आनुषंगिक क्रम से मेरी कहानी

होगी प्रकट उसी की कहानी में ।

वह मेरा मित्र एक दिन शैशव में

माँ का पल्‍लो पकड़े 'चलो न तुम अभी !

घर चलो !' ऐसे तुतले बोलों से

कहता हुआ खींच रहा था तभी किसी

ने उसका हाथ खींच दूर धकेला

और उसी क्षण शोले भड़क उठे थे

सारा परिसर तुरंत जलने लगा था !

बच्‍चा था ! पिया नहीं दूध अभी तो

उसकी माँ और पिता दोनों चल बसे !!

उम्र चौदह की होगी शुरू अभी-अभी :

तब वह इक दिन समुद्र के तट पर ही,

गोवा के निकट, उसे बीच-बीच में

मिलने आनेवाली अच्‍छी-सी इक

प्रौढ़ा महिला से तब कहने लगा था

'चाचीजी ! ये सारे लोग मुझे जो

लुई नाम से पुकारते हैं वह तो

मुझे कतई अच्‍छा ना लगता है !' तब

महिला ने मुसकराकर पूछा उससे,

'बेटे ! फिर नाम कौन-सा पसंद है तुम्‍हें ?

शंकर कहूँगी तुमको, क्‍या पसंद है ?

सुनते ही यह नाम जाग्रत पूर्व स्‍मृतियाँ

हुईं, नैनों में आँसू आ गए

बच्‍चे के, तिस पर 'हाय रे पगले !

इतना क्‍या उसमें हैं ! अब से आगे

शंकर ही कहूँगी मै' कहकर ऐसे

साध्‍वी ने उस बेचारे बालक को तब

प्‍यार से लिया बाँहों में, 'लेकिन शंकर !

अंतुनी के सामने यह अपना नाम

मत कहना, हाँ !' 'क्‍यों न कहूँ, जी ?'

जिज्ञासा से पूछा, 'हा, पगले ! तुमको

कह ही देती हूँ रहस्‍य जो मन में

आज तक मैंने सम्‍हाल रखा था

बेटे, तुम जो पहली स्‍मृति बता रहे

थे मुझको, उसमें जो क्रूर हाथ था

तुम को अपनी माता से दूर

खींचने वाला और जलाने वाला

आग के शोलों को, दुष्‍ट हाथ वह

था इसी अंतुनी को रे मेरे बेटे !!

इसी ने भ्रष्‍ट किया तुम्‍हारी माता को

भ्रष्‍ट किया तुमको भी धर्म डुबोकर

हिंदू तुम्‍हारी माता औ' हिंदू ही पिता

तिस पर भी ब्रह्मबीज ! पर पिता ने

आग की लपटों में वहीं कूद लिया

और तुम्‍हारी माता ने आग से जले

शरीर को बुझाने हेतु सिंधु में कूदा !

सौंप दिया मुझको यह तुम्‍हें बताना

उचित समय आने पर, रहस्‍य कुल का ।

तिस पर भी अंतुनी ने ईसाई विधि से

जलसिंचन करके तुम्‍हें लुई नाम दिया

और दास बनाके रखा तुम्‍हें घर में

जलसिंचन करने पर बीज बढ़ता है

जलसिंचन यह करने से जलता है

इसीलिए अमंगल संस्‍कार मिटाकर

मैं मंगल संस्‍कारों को तुम पर करती

आई हूँ बचपन से, बता-बताकर

तुम्‍हें कहानियाँ मधुर देवकुलों की

राम की, सीता की तथा कृष्‍ण की

नंदनंदन श्री कृष्‍ण-हरि की

बेटे ! उस देववंश में जन्‍म तेरा !

बेटे ! वह कुल तुम्‍हारा, वह धर्म तुम्‍हारा !!

धर्म अन्‍य जलसिंचन करते है, लेकिन

धर्म तुम्‍हारा करता अमृतसिंचन !!

पर बेटे, यह सारा सारा वृत्‍त गुप्‍त ही

रखना हाँ, राख रखे जैसे अग्नि को

अनुकूल न आवे जब तक काल हमें

असमय यदि सत्‍कृति कोई भी करे

तो असमय बीजसदृश अपव्‍यय उसका ।

उचित देख मौका हम शीघ्र ही स्‍वयं

दोनों भी दास्‍यमुक्‍त हो सकेंगे ।'

सुनकर यह वृत्‍त उत्‍क्षोभक गुप्‍त ही

बच्‍चे के मन में प्रतिशब्‍द प्रश्‍न ही

किंतु अंतिमत: उसने पूछ ही लिया

'चाचीजी, तो तुम भी हो दास्‍य में यहाँ

मुझ जैसी हो ? कैसे ? कब से ?

माँ मेरी कब मिली ? बताइये जी'

'सुन बेटे ! वृद्ध पीढ़ी निज अपूर्ण-सी

आशाओं को पूरी करने हेतु

नई पीढ़ी के बिना किससे कहेगी

दु:ख जो भोगा था कभी उन्‍होंने !

सुनो तो ! हिंदू तुम हो, दु:ख हिंदू का !

साष्‍टी से सटकर ही गाँव हमारा ।

वंश मराठी; शादी में मुझे दिया

देशमुख कुल में, जब मै बारह की थी

नवयौवन जब मैने प्राप्‍त कर लिया

रूप बहुत आकर्षक तभी पा लिया

गौरी के त्‍योहारों मे इक दिन को

हलदीकुंकुम-समारोह के लिए

मैं औ' मेरी जेठानी सुंदर

दोनों जा रही थीं जब सहेली के घर

तभी अचानक पुर्तुगीज भेड़ि‍ए

हिरनियों के जत्‍थे पर हमारे

टूट पड़े औ' पकड़ा आठ-दस कहीं

लड़कियों को, मुझको, जेठानी को।

उसी रात दैववशात् हम दोनों को

किसी एक के लिए नियुक्‍त कर दिया

उस कामातुर से जेठानी ने कहा,

'तुम सुगौर ! मैं लुब्‍धा; तुमसे भी ज्‍यादा !

किंतु आज दिन रजांत, अत: नहाकर

सुरत क्रीड़ा कर लें; यह देखो कुआँ

पानी ला दो मुझको, कामलुब्‍ध वह

जब कुएँ पर पानी खींचने गया

तब धैर्य जुटाकर मेरी जेठानी ने

दैत्‍य को धकेल दिया धड़ाम से तभी

कुएँ में उस ! और हाथ मेरा पकड़े

जंगल में भाग पड़ी मुझको लेकर

रात भर छिपे रहे, भोर के समय

मेरी जेठानी बहु धीरजवाली

लेकर मुझको लौटी गाँव हमारे

हर्ष से ही हम दोनों सोच रही थीं

अभिनंदन कैसा सब करेंगे अभी

शौर्य जो दिखाया था हम दोनों ने

ग्रामवृद्ध, सास-ससुर, सहेलियाँ सभी

हर्ष भरी कल्‍पनाएँ करते-करते

घर आकर दोनों ही जब खड़ी रहीं

देख हमें गायें भी रँभाने लगीं

प्रतिपालित बछड़े भी चाटने लगे

फिर उठकर लोग हमारे घरवाले

जब बाहर निकल पड़े तब हम दोनों ने

प्रियकर की बाँहों में रोना चाहा

अश्रुपूर्ण नैनों से प्रणाम भी किया,

तभी सहसा 'दूर ! दूर !' गर्जना हुई;

सुखदु:खावेग हमारा ठहर गया !

क्रूर किसी श्‍वापद को देखकर जैसे

चिल्‍ला-चिल्‍लाकर ही भगा देते हैं

उसी तरह, बेटे, प्रिय लोगों ने ही

हाय ! हमें उसी वक्‍त भगा ही दिया !

सौगंध के साथ ही बताया मैंने

'हम दोनों हैं शुद्ध ! भ्रष्‍ट नहीं है !'

किंतु एक ही निर्दय उठी गर्जना

'गाँव से निकल जाओ ! मुँह काला कर दो !'

लौटे हम जंगल फिर, तब फिर से ही

गायें रँभाई थीं बहुत प्‍यार से,

बछड़े भी चाटने हेतु रुक गए,

-पर चरवाहे ने हमसे कुछ नहीं कहा !!

लौटीं फिर जंगल हम बेसहारा

रात भर रोती रहीं इक-दूजे के संग ।

तेजस्‍वी जेठानी ने कहा मुझसे

'हम क्‍यों रोती रहें ? बस अभी करो ।

लंबी मूँछोंवाले उन पुरुषों को अगर

शर्म न कोई होती है यदि इसमें

तो फिर हम ही क्‍यों शर्म अब करें !

जाएँगे अब गोवा ! देवस्त्रियों से

भी ज्‍यादा सुंदर हैं हम दोनों ही :

प्रबल पुर्तुगीज हमें चाह रहे हैं

वे ही कर लेंगे कद्र उचित हमारी

इधर इन क्‍लीबों के पाक घरों में

रोते-रोते क्‍यों सड़ जाएँ हम ?'

'छी ! छी !' सहलाते उसको कहा मैंने,

'जेठानी जी ! यह क्‍या ? यदि वे म्‍लेच्‍छ

बलात्‍कार हमसे कर चुके हैं या नहीं

इसके बारे में समाज को कभी

विश्‍वास भी होगा, बस, हमारे कथन से ?

वंशहितार्थ भ्रष्‍ट स्‍त्री त्‍याज्‍य सर्वदा'

गुस्‍से से उबल पड़ी सुंदरी इस पर

क्रोध से कहा उसने, 'भ्रष्‍ट कौन है ?

जानो तुम शय्या अस्‍पृष्‍ट हमारी !

किंतु यद्यपि होती स्‍पृष्‍ट वह जबरन

तो भी क्‍या भ्रष्‍ट हमें कहना उचित है ?

देवरानि, जिन औरों को कल ले गए

उनके साथ बलात्‍कार किया है !

तो भी क्‍या भ्रष्‍ट उन्‍हें मान लोगी तुम ?

जिस भी स्‍त्री को अविंध जबरन ले जा

बलात्‍कार करता है, भ्रष्‍ट न वह स्‍त्री

किंतु भ्रष्‍ट पति उसका, रक्षा न कर सका !!

सिंह की पत्‍नी को श्रृगाल न भोगता है

ये मुए श्रृगाल से कायर हैं, जो

अनुरक्‍ता भार्या की रक्षा न कर सकें !!

तो फिर महिलाओं के बदले अपने ही

हाथों में चूड़ि‍याँ क्‍यों न भरवाते ?

फिर हम ले लेते खड्ग हाथ में

श्रृगाल रोब जमा रहे किंतु सिंह-सा !

कहते हैं, दूषित कुल-गेह हुआ हैं !

अर्धांगिनी अपनी नजरों के सामने

ले गए रिपु औ' ये लौट गए घर

तब गृह ना दूषित, ना समाज भी हुआ !

किंतु पुरुष भी जिन्‍हें मार ना सके

ऐसे रिपु का वध करके स्‍वयं को

अस्‍पृष्‍टा वापस जो घर ले आई

ऐसी सती भ्रष्‍ट करती है समाज को !!

अर्धांगिनी अपनी परबलाकृता

शय्या पर लेने से लगत है घृणा :

और यदि वह वैसे ही रिपु के ही

बिस्‍तर पर लेटी रहे, तो न कलंक !!

थूकती हूँ मैं ऐसे शास्‍त्र वचन पर'

निष्‍पाप क्रोधाग्नि को सांत्‍वना करके

कहा मैंने सहला के 'सत्‍य है, लेकिन

राक्षस जो दुर्बलों निरुपद्रवशीलों को

अपनी बर्बरता से परेशान करके

ले जाते है उनकी सुंदर स्त्रियों को

धर्म मानकर अपना, ऐसे लोगों की

आसुरता से भी वह बहिष्‍कार-रीति

हिंदुओं की है अक्षम्‍य अमानुष ।

अति सहनशीलता है निंदनीय ही :

क्‍या उपद्रवकारिता वांच्‍छनीय है ?

फिर उन मुस्‍टंडों नराधमों को

रिपु हैं जो धर्म के, ज्ञाति-कुलों के,

उनको स्‍वीकृत करना क्‍या उचित है ?

निजजाति प्रियतम होती हैं सबको

निजजननी भोली-भाली भी जैसी !

त्‍याग है कितना ! पर यदि स्‍वजन ने

अपराध के बिना अपना वध भी किया

तो म‍रते-मरते उसके मंगल की

प्रार्थना करके ही देह त्‍यागना ।

सो खाकर कंद-मूल जो भी मिल जाए

गुजारेंगे दिन अपने जंगल में ही,

आँसुओं को बहाते टप-टप-टप

जेठानी ने मुझको चूम लिया तब

थोड़े ही दिन बाद पर 'सद्धर्म' वहाँ भी

हाय ! पहुँचा नरमृगया करते !

ईसा के उपदेशक शस्‍त्र पकड़कर

संगीन की नोक से बाइबल को

कुरेदने हृदयों पर 'हीदनों' ३१ के -

जो पलटन पावन बना दी थी, वही !

चीखों को सुनते ही भय के मारे,

दोनों भी गाँव की ओर भागीं हम

ग्रामद्वार न पर कोई खोले !

फिर हमको मारपीट करते-करते

सख्‍ती से बाँधकर अन्‍यों के संग

रास्‍ते में ही अपनी कामाग्नि में तभी

बलि चढ़ाई हमरी उन 'संतों' ने

फिर गोवा का जो प्रमुख हाट था

वहाँ ले गए हमको अलग बाँधकर

गराँव से जैसे पशु बाँधा जाए !

लोग हाट में जैसी सब्‍जी, तोरियाँ

वैसे हमको वहाँ बेचने लगे ।

बच्‍चे को कोइ खरीद ले, कोइ माँ को

भाई को कोइ अलग, पति को, उसको भी

गराँव से खींचत है, कोई करुणा

ईसा के संतों को कतई नहीं थी !

सत्‍य धर्मविहित कर्म यह था उनका !

ले गया एक मुझे तीस रुपयों में

जेठानी को कोई और! हाय रे-

जेठानी के जाने से मेरे प्राण

निकलने लगे-उसके विरह से !

किंतु देर तक वह साक्षात आग ना छिपी

दु:ख के ईंधन में उसके हृदय में

भड़क उठी, जो उसको ले गया था

एक पादरी गुलाम बनाकर घर में

उसको उसने मारा छुरी घोंपकर !

बाँधकर फिर उसको चलती गाड़ी को

गोवा के रास्‍तों में खीच ले गए

तब ईसा भक्‍तों की उस स्थिति में भी

निंदा उसने कर ली क्रोध से बहु ।

तब उस घायल लहूलुहान युवति को

उसी अवस्‍था में जबरन फेंक ही दिया

'सांत काज' के उस भयानक सुरंग में

लेश वायु या प्रकाश नव न छोड़कर

सांत काज वाले उस 'पवित्र गृह' के

भीतर जो अन्‍य हिंदू बंदी थे उनको

आज जैसे क्‍वचित वैसे तब नित्‍य

पत्‍थरों पर पटकाकर कपड़ों जैसे,

अंत में लाते थे वधशिला समीप,

वैसे उसको भी लाए उनके ही बीच ।

फिर जिस भी क्लिष्‍ट जीव ने पी लिया

ईसा-जल, वह छूटा-पर वह न थी उनमें !-

वह थी जो धर्मवीर शेष रहे उनमें !!

फिर उसे गिराकर, पादरी बैठ गया

सीने पर घुटना दबाकर उस पर

आघात किया और उसी के सीने पर

चिल्‍लाया 'जेंतीव ! कौन भूत है तू ?

कौन सा दुष्‍ट मार्ग धर्म है तेरा ?'

कच्‍चा वह वक्षस्‍थल ! बोझ न सहने

सीखा था अभी तक दुधमुँहे बच्‍चे का !

उस पर वह भैंसा पादरी वैसे

चढ़कर कहता था, 'बोल जेंतीव रे !

कौन सा दुष्‍ट मार्ग धर्म है तेरा ?'

'गोविंद ! गोपाल !! हे दया सागर रे !

कृष्‍ण कन्‍हैया प्रभु रे, कृष्‍ण कन्‍हैया !'

नाद मुँह से आया मधु सुंदरी के !!

तब हाथों को उसके काट जलाया

जोडों की अस्थियाँ-घुटने की, टखने की -

घन के नीचे कुचलीं मान-मारकर

अंत में कंठनाल जोर से दबाया

तब साँस घुटकर ही प्राण चले गए !!

उसने तो एक पुर्तुगीज मारा था

किंतु जिन्‍होंने इक पिस्‍सू भी न मारा

पुर्तुगीजों की, प्रत्‍याघात करके ही

जो केवल हिंदू धर्म छोड़ ना सके

ऐसे दो लोगों को भी यही किया !

बिलकुल पीड़ाएँ ऐसी ही थी उनकी !!

सांतकाज के आए संत इस तरह

अर्पित शोणित में धो के ईसा के पैर

नरमांस का उसको भोग चढ़ाया !

मेरी गति भिन्‍न हुई खरीदा मुझको,

जिसने दासी बनाने हेतु वह

पुर्तुगीज खुद ही पर दास बन गया

मेरी इस जालिम सुंदर तनु का

अत: मुझसे कोई भी प्रश्‍न ना किया

'तुम ईसाई हो या हिंदू' इस तरह

तभी अद्भुत वीरता जेठानी की

सुन ली मैंने हाट में, शीघ्र ही तभी

मन में मेरे भी प्रेरणा उदित हुई

अपने भी प्राणों की बलि चढ़ाने की !

तब मेरी सेवा में एक वृद्ध-सी

स्‍त्री नियुक्‍त थी, उसने कहा मुझसे,

'सुन बेटी ! मैं हिंदू, देह भ्रष्‍ट है,

पर जो मरते है उनकी देह भ्रष्‍ट ही

करते हैं रिपु पहले ! और हृदय तो

भ्रष्‍ट कोइ कर न सकत है । हृदय है

जो मर गए उनकी भाँति हिंदू ही-

फिर मरते हो क्‍यों सारे ही हिंदू ?

बेटी, खलयुद्ध मे छल साधन है !

जो मेरे, वे धन्‍य ही हैं ! धर्म का ॠण

तुरंत चुकाया उन्‍होंने गिन-गिनकर

किंतु जो बचे जिंदा वे भी न अधन्‍य

-यदि पूजा करते हैं धर्म की दिल में

और धर्म की जय के लिए इन्‍होंने

जीवन पूरा अपना अर्पण ही किया

तो वे भी धर्मॠण तुरंत ना सही

पर चुका देते हैं पूर्ण रूप से !

प्रत्‍याघात के लिए न शक्‍त जो

मृत्‍यु से कर देता अन्‍याय को निरर्थ

प्रत्‍याघात के लिए शक्‍त बनने हेतु

जो जिंदा रहता है वह अन्‍याय को मारे

जेठानी ने तेरी, रिपु को मारकर

व्‍यक्तिप्रतिकार धर्म को निभा लिया ।

और व्‍यक्ति प्रतिकारों की वीरता यदि

पुन:- पुन: दिखाई दे, तो हिंदुजनों की

स्थिति न बनेगी ज्‍यादा बुरी और भी

लोग साँप से डरते हैं, न शशक से ।

यदि राष्‍ट्र-प्रतिकार ही पूर्ण रूप से

निपात कर पाएगा राक्षसों का

तो तू इस राष्‍ट्र प्रतिकार धर्म को

मृत्‍यु से न डरकर, पर सफल करा दे

आचरण करनेवाली हो यदि ऐसा

पीड़ाएँ सांताकाज की सह लेंगे

सहनीय न सिर्फ बल्कि लाभ देत सर्वदा:

खल जो देते पीड़ा उससे भी उन

पीड़कों को पीड़ा भुतनी पड़े

ऐसा ही धर्म सत्‍य नित्‍य यशस्‍वी,

मुझको तो शब्‍द-शब्‍द वेद वाक्‍य-सा

लगा उसका, शपथबद्ध मैं बन गई

धर्मजय करवाने उसके ही मार्ग से ।

उसने कहा, 'सुनो : क्‍या देह भ्रष्‍ट है ?

तब तू निज हृदय के मंदिर में ही

श्रीरामस्‍मृति की मूर्ति बिठा ले :

जैसी श्रीशांतादेवि की मूर्ति

बिठा ली थी गह्वर में विप्रों ने तब

जब अविंध ने क्षेत्रों को भग्‍न किया था !

और जबर्दस्‍ती जो ईसाई विधि

करने पड़े कर ले, जा प्रार्थना करने

गिरिजाघर में : सत्‍य सनातन होगा जो

तत्‍व वैदिक ही है; उसे सुन श्रद्धा से ही

जो धार्मिक ढोंग तथा खूनी औ' जालिम

सैनात ध्‍वनि जो सुर में ईश्‍वर के-

उसे तू मत सुन, जा भूल उसी क्षण !

और तुझे युवा पुत्र जो मिल पाएँ

भ्रष्‍ट हिंदू पितरों के, मिल जा उनसे

कहती जा उनसे है कौन कहाँ का

कहती जा सिखा रहे हैं पाखंड तुम्‍हें

कहती जा राष्‍ट्रधर्म क्‍या है अपना

कहती जा रावण कैसे भटका था

कहती जा राम ने कैसा वध किया !

जो बनते भय से ही भ्रष्‍ट वे नहीं

शत्रुता हिंदू धर्म की करते हैं

दूसरी पीढ़ी करती है शत्रुता

उसी पर निर्भर रहते हैं विधर्मीय

उन्‍हीं को फुसलाकर, शठं प्रति शाठयम्

हम कर लें, यत्‍न यही बहुत लाभ दे

मैंने ही भ्रष्‍ट कुलोत्‍पन्‍न दस युवक

पाखंडी शिक्षा की पोल खोलकर

और स्‍वधर्मभक्‍त बनाकर फिर से

प्रेषित कर दिए थे सावंत के प्रति

हिंदुत्‍व के लिए समर में लड़ने वाले !

बेटी, इस षड्यंत्र के प्रमुख हैं

सावंतजी, घोरपडे, पेशवा वहाँ'

उस दिन से, बस केवल इसी मार्ग से

आई हूँ यत्‍न करती यथाशक्ति मैं

तभी महाराष्‍ट्र धर्मवीर दिग्‍जयी

आए बाजीराव स्‍वातंत्र्य-समर में

कोंकण-भू सिंधु समेत जूझने खड़े ।

उस युद्ध में षड्यंत्र-प्रमुख हमारे

शत्रु के शिविर का वृत्‍त्‍ बताकर

जनता को स्‍फुरित कर और भेजकर

हिंदुओं की सेना में युवा सैनिक

गुप्‍त रूप से जिको किया प्रशिक्षित

-कर रहे थे सेवा छत्रपति की :

उसी समय माता ने, बेटे, तेरी

म्‍लेच्‍छों की पीड़ाएँ असह्य पाकर

अर्पण कर दिया तुझे मुझको औ' कहा,

'मर रही हूँ मैं अब, देवासुर-समर में

यही लो हमारे वंश का योगदान !'

उस रण में अखिल सिंधु तट अहिंदू के

हाथों से मुक्‍त किया हिंदू वीरों ने

पुर्तुगीजों के कब्‍जे में था हिंदू तीर

पाँच सौ कोसों से अधिक, आज पर

कोस पाँच भी न बचे उन हाथों में !

पाखंडी पीठों में मंत्र पढ़ाए ।

भग्‍न क्षेत्रों पर फिर कलश चढ़ाए ।

और पाँच कोस भी ये रिपु के कर में

रह न जाते गोवा के यदि बहुत

मुशकिल न बन जाती उत्‍तर में स्थितियाँ !

घाव इस तरह यद्यपि भरता जा रहा

देह का, फिर भी वह घाव हाय रे

आत्‍मा का अभी भी है रक्‍तलांच्छित !

उसे अब भरना है : जो भ्रष्‍ट हो गए

उनको शुद्ध करा के, औ' फिर पिला के

अमृत इस सनातन धर्म का मधुर'

जैसे कोई पौराणिक कथाकथन हो

वैसे उस साध्‍वी का कथन अद्भुत

चित्‍त एकाग्ररूप किशोर ने सुना

और उत्‍सुकतावश पूछा, 'फिर मुझको

गुप्‍त रूप में छत्रपति की छावनी में

क्‍यों न भेज रही तुम ? बंदूक का मेरा

निशाना न कभी मृगया में चूक गया था

अथवा घोड़े पर से न कभी गिरा ।'

धैर्ययुक्‍त उत्‍सुकता सतेज वदन पर

वीर बालक के, देख प्‍यार से सहलाकर

उसका वदन, फिर उस नारी ने कहा,

'बब्‍बर शेर की छावनी में जरूर ही

बच्‍चे ! तुम भेजूँगी सचिंत मन बनो-

शीघ्र ही अब गोवा पर अंतिम बार

करने हमला निकल पडेंगे पेशवा ।

किंतु अभी योजना न पूर्ण हुई है

उत्‍तर-कर्नाटक फिक्र बहुत बढ़ी है

तब तक अनुसंधान रहेगा उसी का

किंतु एक अन्‍य कार्य अब करना है

जानो तुम कितना मेरा मालिक अच्‍छा

पुर्तुगीज होने पर भी हिंदुजनों की

पीड़ाएँ देख बहुत दु:खी होता है

मेरी हर बात वह हमेशा मानता

मुझे या तुझे भी दास न मानता है ।

उसी के आधार पर शस्‍त्रकला की

शिक्षा तुम लोगों को दी थी मैंने

यद्यपि गुप्‍त उद्देश्‍य न ज्ञात है उसे ।

वह अब वापस अपनी मातृभूमि के

दर्शनार्थ योरप जाने वाला है

और आग्रह कर रहा कि मैं भी उसके

साथ जाऊँ वहाँ; मुझको भी मन में

लगता है, योरप-यात्रा है लाभकारी ही

वांच्‍छनीय है कि मैं प्रत्‍यक्ष रूप में

देख वापस आ जाऊँ मातृभूमि को

कि पुर्तुगीजादि योरोपीय बल कैसा :

सद्गुण औ' दुर्गुण हैं कौन से कितने

पाताल में इन पुर्तुगीज लोगों के

राज्‍य हैं कोलंबियादि क्‍या यह सत्‍य है

गुप्‍त गृहच्‍छेद और कौन से कैसे ?

चल तू भी संग मेरे । शत्रु के ही अब

अखाड़े में सीख ले दाँव सभी तू

अज्ञात जो हैं यहाँ और फिर उन्‍हें

सिखा दे वापिस आकर अपने लोगों को

जैसे कि किया था कचने देवासुर-रण में,

बेटे, इस योरप के साथ ही आखिर

मल्‍लयुद्ध हिंदुओं को करना है

चल तू फिर मेरे संग, प्रिय तेरे मुख को

देख अनुभव करूँ गृहसुख मैं वहाँ,

शीघ्र ही अंतुनी के हाथ से मैं भी

मेरे मालिक से तुझे खरीदवा लूँगी

हाँ, लेकिन तब तक एक शब्‍द भी कभी

होंठों पर मत लाना शंकर, तू भी !'

अल्‍पावधि में ही फिर समुद्र सफर पर

शंकर उस साध्‍वी के साथ चल पड़ा

अर्णव वह ! अंबर वह ! विश्‍वशक्तियाँ !

प्रत्‍यक्ष उन्‍हीं के बीच वह खड़ा हो गया

प्रथम ही इक अणु बिंदु-सा किशोर वह !

रोज सुबह प्रात:संध्‍या करता था

अत्‍युदार - संस्‍कार - स्तिमित - वंदना

'हे अनंत उच्‍च विरलनी आसमाँ

हे अनंत गूढ-गभीर नील समुद्र !

यह अणु प्रणाम है तुम महान को !'

नाना रमणीय कहानियाँ सफर में

अंबु-राशि-मंथन की, सिंधु सेतु की

प्रभव की, प्रलय की, सुन लीं उसने

विविध आकाश वायु जल गति-स्थिति

द्वीपपुंज, रिवाज-रस्‍म और विभाषा

अवलोकन कर लीं, अनुभव कर लीं

जहाज जिस ३२ सिंधुद्वार में जाता था

वहाँ का मूलवृत्‍त ढूँढ़-ढूँढ़कर

हिंदू उपनिवेश कहानियाँ पुरानी

हिंदू नौकाओं के हिंदू नाविकों-

से बहुत हर्षचित्‍त सुन ले लीं ।

सुन लिया पुर्तुगीज सिंधु-शौर्य को

सुन लिया कैसे हिंदभूमि का ही

मार्ग दिखा दिया था हिंदू ३३तिमय्या ने

अंत किया इसलामी क्रौर्य का जभी

द्वीप-द्वीप पुर्तुगीज-भय से अंकित

यह भी सब देख लिया, और यह कैसे

योरोपीय प्रतियोगिता भी चलती है

पुर्तुगीजों की सत्‍ता नष्‍ट हो रही

और किस तरह पूर्वी अधिष्‍ठान ही

शिथिल हुआ महाराष्‍ट्र के साथ ही;

वसई के अप्‍पा का नाम सुनकर

आफ्रिका के आगे के लोगों से भी

वह किशोर गर्व से खिल गया मन में

हिंदुओं का नौ-बल कब होगा ऐसे

दिग्विजय करनेवाला यही सोचकर ।

पार कर लिया अफ्रीका का द्वीप

और अतलांत में प्रविष्‍ट हा गया

जाते-जाते इक दिन शाम के समय

किसी खेत की तरह लंबा-चौड़ा

एक भयंकर तिमि उछलकर आया

उसका पीछा करते उसके तुरंत बाद

पानी को उछालते आसमान तक

शिखर सम तिमिंगल इक प्रविष्‍ट हो गया !

चंड जलचर भी डर के भागे

कोस-कोस, देख जूझ वह भयंकर ।

सिंधुयान भी भीषण दृश्‍य देखकर

क्षण भर स्थिर हुआ । तभी किशोर ने कहा,

'चाचीजी, ये बड़ी मछलियाँ अपना

जीवन कैसे गुजार लेती हैं यहाँ

हिंसा प्रतिहिंसामय सागर में ही'

मुसकराई वह उदास, 'हाँ रे, पगले !

जैसे मानव भू पर जीता ही है !

जाति-जाति के बीच भी जीवनार्थ या

बलशक्तित्‍वार्थ कलह यही होत है !'

तभी अचानक बिगुल भयसूचक-सा

बजाते हुए सतर्क होकर नौका पर

पुर्तुगीज जहाज पर आंग्‍ल लुटेरे

डाकुओं का जहाज आक्रमण करता

चीखें, कराहना, रकतस्राव, कत्‍ल

तिमि को छोढ़ तिमिंगल भाग ही गया !

किंतु कुछ घंटों तक जूझ भयानक

प्राणघातक हुई, पुर्तुगीज तिमि को

आंग्‍ल तिमिंगल ने निगल ही लिया

और ले गया सबको दास बनाकर !

जब सुबह होने पर लूट देख ली

बूढ़ी कहकर उसे मार ही दिया

और लुटेरों में इक मूर सिपाही-

को दे दिया उस बच्‍चे को भी ।

भाग्‍यहीन बच्‍चा ! अब अनाथ बन गया !

पुर्तुगीजों की थी प्रखर गुलामी;-

आशैशव हो गई थी आदत उसकी

किंतु मोरक्‍को में अब क्रूर अमानुष

गुलामगीरी में आ पड़ा बच्‍चा

जैसे कि उबलते तेल से आग में ।

इसलामी बर्बरता पुर्तुगीजों की भी

तुलना में अच्‍छी थी ! तिस पर अब ना

रही वह चाची भी आधार के लिए ।

उस उदार साध्‍वी को याद कर-करके

बच्‍चा अब रोता था एकांत में कभी :

मेरे प्रति कितनी आशा थी उनको

और क्‍या हुआ । ऐसा शोक मग्‍न था ।

मोरक्‍को में उस राक्षसीय घर में

कुत्‍तों की थाली में खाना मिलता

दिन में पशु के संग पशु के समान ही

र‍हकर फिर गोठ में रात गुजारता ।

गुस्‍से में मूर की बीवी ने इक बार

फेंक दिया उसका ठीक नरक में

शाप, गालियाँ डंडे रोज मिलते ।

फिर भी वह सज्‍ज न खुदकुशी करने

बल्कि आशाएँ चाची की पूरी करने !

एक बार खेतों से लौटते समय

एक गवाक्ष में देखी इक सुलक्षणा

हेमगौर पुर्तुगीजी सम एक वधू

नीम की तरह उसीक कांति थी नई

मुद्रा थी मोहक, तनु सुंदर, उसको

लगा एक क्षण कि मैं गोवा में हूँ

तभी शुद्ध मंजुल मराठी में पूछा

उसने सस्मित उसको : कमनीय कुमार !

क्‍या तुम्‍हरा नाम, बता दो मुझको, जी !

माँ की आवाज भी न इतनी हृद को

उतना मातृभाषा की ध्‍वनि करती है

घोर विवासन में मन प्रमुदित हो गया ।

'शंकर' उसने कहा,'वाह ! मधुर है बहुत

नाम : अब क्‍या कहूँ ! आओ जी कल

सौगंध तुम्‍हें : आओ जी !' जल्दी-जल्‍दी

अंदर जाते-जाते बतलाया उसने

शापों, गालियों में जिसका दिन गुजरता

था हर रोज बहुत हड़बड़ी में

ऐसे बेचारे बच्‍चे को कोइ मिल गया

जिसको उसका भी मधुर नाम है

एक व्‍यक्ति ऐसा भी है दुनिया में

देख बेचारे बच्‍चे के नैनों में तब

आँसू आए खुशी के अनगिनत !

उसके हृद के अंधकार के भीतर ही

मूर्ति उस युवती की बिजली-सी ही

चमक-दमक करने लगी बार-बार

अनदित फिर उसी मार्ग से वह बच्‍चा

जाने लगा कभी-कभी बात हो रही

दोनों के परिचय से प्रेम बढ़ गया ।

फिर एक दिन शाम को इशारा करके

पत्र ऊपर से फेंका राह पर उसने

उठा लिया झट उसने और उचित वक्‍त-

पर पढ़ लिया उत्‍सुक विवश हृदय से ।

क्‍या ? तो वह दासी थी ! ब्राह्मण उसकी

माता परलोकगता औ' पिता उसका

पुर्तुगीज एक पुरुष राजवंश का

चुरा लिया था उसको स्‍पेन सिंधुद्वार-

में, डच नौका ले गई गुलाम-कर

और मूरों के इस नेता को उन्‍होंने

बेच दिया था उसको लाख रुपयों में !

मछली को मछलियाँ, मनुष्‍य को मनुज

ईसाई को ईसाई निगल लेत है !

विश्‍व में करत बलवान् धर्म को गुलाम !

ब्राह्मण स्‍त्री को जिसने गुलाम बनाया

उसकी पुत्री को दासी बनाया दूजे ने ।

मूर के घर से, पर, छूटकर अब वह

जाना चाहती है । आज तैयारी

हो गई है सारी कुशल रूप से

यह किशोर आएगा यदि उसके संग

तो भाग जाएगी नियत समय पर !

सुना मैने कि गोवा से गुलाम इक

ले आया है यहाँ एक सिपाही

ढूँढ़ रही थी मै जब उस गुलाम को

तो तुम दिख पड़े ! तुम्‍हें देखने

मैं दिन भर तरसती हूँ, प्रिय किशोर

आओगे तुम तो तुम जाएँ भागकर

पर आओगे न, अन्‍यथा तुम बिन

मुक्‍तता न चाहूँगी, यहीं रहूँगी ।

रहकर यहीं दूखूँगी रोज तुम्‍हें मैं

जाओगे जब इस राह से कभी

मेरे मधु प्रेम का बिंब तुम्‍हारे

नैनों में देख मुझे सुख होता है !

शब्‍द-मेघ बरसे जब पत्रस्थित ऐसे

स्‍वाती के अर्थ-बिंदु टपके उनसे

हृदय की सीप में लिया उनको

और लिखा उसको, 'हे शुचिव्र‍ते !

आऊँगा तुम्‍हरे संग जहाँ कहोगी

जीवनीय अंधकार में मेरे भी

जिस तुम्‍हरे स्निग्‍ध शीत मुसकराहट के

मंजु उजाले में मैं देखने लगा

ऐसे तुम्‍हरी मुक्‍त साथ में जो कोई

दिन बीतेगा वह जीवन सफल करेगा

और मृत्‍यु के लिए सिद्ध रहूँगा !'

एक दिन अचानक सब गाँव डर गया

दास और दासी दो भाग ही गए !

ढूँढ़ने पर न मिले । तो कहा किसी ने

दोनों को भी देखो शेर खा गया

मैंने खुद देखा जी; औ' मैंने भी

अन्‍य ग्रामस्‍थ ने हाँ मिला दी !

और इधर वह कुमार तथा कुमारी

अफ्रीका के किसी घने जंगल में

निभृत कुटीर में जाकर रह रहे थे

मूर स्‍त्री के संग इक जो उन दोनों-

को मूरों का लिबास पहनाती थी

वह मूरा हेमगौर कन्‍या की थी

पितृगेह की पहले से परिचिता

पहले भी पहुँचाकर किसी गौर को

अपने घर स्‍पेन में, धन कमाया था ।

हालाँकि उसी मूरा ने उस युवती को भी

ढूँढ़कर रचाया था यह सारा खेल

प्रचुरधनाशा से नव । उसी कुटीर में

लिली और शंकर दोनों जब रहे

घना जंगल भी गुरुकुल एक बन गया

प्रीति का, भय का भी और नीति का ।

सत्‍य ये प्रतिष्ठित हैं सृष्टि के

जो न पौर जीवन में बुद्धि को कभी

होते हैं पूर्ण गम्‍य । जो पुरातना

कांतारांतर्गत, अस्‍पृष्‍टजनपदा

निबिडता में ही प्रत्‍यक्ष प्रकट हैं ।

जीवसृष्टि के मूलस्‍थान में सभी

जीवसृष्टि की स्‍वभावनग्‍नता रहे ।

सुखद कल्‍पनाएँ वितता हिरण्‍मया सभी

परदों में नागरिकों मानवों के

सत्‍य का उग्र रूप पिहित है सदा ।

अफ्रिकीय घोर अरण्‍य में सृष्टि भी

नग्‍नरूप घूमती, जैसे पहले

राम के समय ही भारत में भी

दंडकारण्‍यादिक महाअरण्‍य में थी :

भेड़ों को पैरों में सख्‍त पकड़कर

नभ में उड्डाण करत खाते-खाते

मांसाशन घोर गरुड चील गिद्ध भी

विहगों को खाके जीते विहग हैं ।

नक्र और घड़ि‍यालें जबड़े मे

निगलते बछड़ों को जल पीते :

अजगर जो बाँहों में दो इनसानों की

न समाएँ ऐसे मोटे औ' लंबे,

सीत्‍कार के साथ दूर से ही मुर्गियाँ

और कोइ तो कुत्‍तों-बछड़ों को भी

खींचकर श्‍वास से, रज्‍जु की तरह

निगलते है बैठे-बैठे जगह पर :

विषधर जो डसते ही महान् वृक्ष भी

कडकड कर-कर करते जल जाते है :

पन्‍नग उड़नेवाले भक्ष्‍य के पीछे

सहज रूप उड़ते-उड़ते जाते हैं

जब तक पन्‍नगारि उन्‍हें पकड़ नभ में

फेक देता है बहुत जोर से

भूमि पर हड्डियाँ चूर्ण कराके ।

मत्‍त महिष लाल-लाल नेत्र हैं जिनके

धक्‍का देकर वृक्ष गिरा देत हैं

व्‍याघ्र पुच्‍छ पटकाने वाले जिनको

देखकर महिष-वृषभ डर जाते हैं !

ॠक्ष तथा चीते रक्‍तार्द्रमुख सदा !

कपि भी दो पुरुषों के जितने लंबे

पुच्‍छहीन हनुमान प्रबल, देखकर

जिनको ऐसा लगे कि आदमी ही है

वानर या वननर जिनका नाम उचित है

तिस पर भी अफ्रिकीय गोरिला कपि

पूर्वपुरुष नि:संशय उसी भूमि के

बार्बरीय मनुजों के लगते पक्‍के ।

ऊँची औ' लंबी छलाँगें लगाकर,

ये प्रचंड देहधारि कपि भयंकर

शाखाओं शिलाखंडों को फेंककर

जूझते हैं जैसे मनुज जूझते

उन्‍हें देख रामायण वर्णन स्थित ही

कपि वानरवीरों की रम्‍य कथाएँ

लगती न पूर्णत: निराधार काव्‍य-सी

झुंड भेड़ि‍यों के,मिट्टी में छिपकर

कुछ रहते औ' अन्‍य दूर से

हिरनों के झुंड को बहला ले जाते

अचानक झटकर उन पर पड़ते

छिपे हुए भेड़ि‍ए, मार डालते

फिर मिलकर सारे चीर-फाड़ उसकी

करते हैं, रक्‍त-मांस-वसा चटकते !

मत्‍त मतंगज ऐसे चल‍ते हैं जैसे

पर्वत हैं ! अगर एक पैर के तले

कुचला न को तो कुचला जाएगा ।

और ऐसे उन्‍मत्‍त गज भी डरते

जिनसे ऐसे क्रकच क्रूराग्र नखींद्र

शेर बब्‍बर, शरभ खून के प्‍यासे !!

क्रूर इस तरह के वन में रहते

एक दिन प्रेमियों का युगल वह

लिली और शंकर एक साथ सवेरे

आए मृगया करते हुए पहाड़ पर ।

वृक्ष एक अतिप्रचंड सामने खड़ा

दिखाकर उससे शंकर ने कहा,

'लिली ! देख पेड़ के गहरे कोटर में

है छत्‍ता जहरीली मक्खियों का ।

एक भी यदि कसकर डस जाए तो

मर जाते हैं हिंस्र पशु भी खूँखार

फिर क्‍या होगा भी किसी मनुज का ?

यदि किसी एक ने छेड़ा उनको तो

मक्खियों की सेना पीछा करती है

डरे हुए उस नर के गाँव तक भी

और बदला लेती है न काटकर उसे

बल्कि गाँव को पूरे तीव्र डंख से !

'हाय दय्या !' रोंगटे खड़े हो गए

सुकुमारी भयभीता उससे चिपक गई

'एक तरह से दुनिया में मनुष्‍य ही

कितना दुर्बल क्षुद्र जीव-जंतु है !

यद्यपि उसकी भी देह प्राकृतिक

फिर जीवो यत्र जीवनस्‍य जीवनं

ऐसे अति निर्दय घने अरण्‍य में

क्षण भर भी जी न सके ! ये मक्खियाँ

भी दैहिक द्वंद्वों में मारेंगी उसको !

सिंह, व्‍याघ्र, हाथी तो दूर ही रहें

किंतु गाय के भी सामने मनुष्‍य ही

गाय से भी बनेगा गाय ! द्वंद्व में

सींगों के साथ उसी के लड़ पाए

ऐसे कोई न अंग मनुष्‍य देह में !

मूलत: जब वन में वन्‍य पशुओं में

पशु जैसा रहता था तब भी उसने

देह के न बल से अपितु आत्‍मबल से

अपना अधिकार सभी पर जमा लिया ।'

'लिलि ! लेकिन वह जीया आत्‍मबल से

इसका क्‍या मतलब है ? क्‍या उसने कभी

भेड़ि‍यों को बोध किया था वेदों का ?

अथवा शेरों को सिखाई थी शांति-समाधि ?

या गीता गिद्धों को ? सांख्‍य नक्र को ?

कैसे वश में लाया आत्‍मबल से ही ?

आत्‍मबल का मतलब बुद्धिबल ही है

बुद्धिबल का मतलब यंत्रबल है

और यंत्रबल ही तो देहबल ही है ।

क्‍योंकि एक-एक यंत्र इंद्रिय ही है

वृद्धिंगत-शक्तिक्षम पूर्ण हमारी

खाते हैं पशुपक्षी जो उसे त्‍वरित

जठरवन्हि पचाती है; किंतु मनुज तो

अपचनीय को भी पचाने हेतु

ओखली को दाढ़ मुसल दाँत बनाए

और चुल्‍हा ही बनता है जी उसके

जठर की अग्नि के सम पाचक-सा ।

युद्ध में न टिक पाएँ शेर जूझते

अत: बाहु दंड का रूप लेत हैं :

दहाड़ हो गई परिणत दुंदुभि-रूप में

चर्म कठिनतम बनकर वर्त्‍म बन गया

मांसपेशि तुर्य बनत कंठनालि का

श्रृंगास्थि बालों में वृद्धि लेत है ।

मुष्टि शिलाखंडों में प्रक्षेप्‍य बनी और

तीरों में, बंदूक की गोलियों में

अतिमारक रूपांतर प्राप्‍त कर गई ।

शेरों के जैसे नाखून नहीं है

अत: खड्ग, तलवारें, खंजीर औ ' छुरे

वृद्धिंगत है ये नाखून हमारे।

नखरों की तीक्ष्‍णता आत्‍मबल से ही

रूपांतरित होती है, तभी विश्‍व में

घोर कलह में आरण्‍यक पुरातन

टिक पाया मनुज दीर्घ । अन्‍यथा उसे

दुर्बल को कोई भी कीटक क्षण में

डंख करके ही खत्‍म कराता

एतदर्थ ही जब भरतभूमि में

आरण्‍यक काल में वन में भीषण

हिंसा के जबड़े में आर्य रह रहे

उनको भी राजधर्म-यज्ञविधि-समान

मृगया भी धर्म मुख्‍य अंग ही रहा,

शरधनुष्‍य लेकर ॠषिवर्य भी घूमे

वेद के समान धनुर्वेद पढ़ाए

किंतु आगे हिंस्र जंतु नष्‍ट हो गए

निष्‍कंटक देश बना कृषिप्रधान ही

पनघट के सुंदर घाट बन गए

पानी लाने गई लड़की को ही

शेर उठा ले जाना बंद हो गया

और नरमांसाशन राक्षसों द्वारा

कच्‍ची ककड़ी जैसे बच्‍चों को ही

खाए जाने का भय खत्‍म हो गया

तभी जनसंकुल निर्विघ्‍न निर्वन

शांति सुखासीन नगर जानपद सारे

मृगया के उपकारों को भूल गए ।

और नगरकूपस्थित जीवनों में

बिंबित रूपों को प्रतिबिंब सृष्टि का

लोग गलती से अब मानने लगे !

रामायण के काल तक भारत में

यज्ञ तथा मृगया को विहित माना

और अहिंसा का अतिरेक बाद में

बुद्ध के समय क्‍यों उदित हो गया

यह सब इस अस्‍पृष्‍ट जनपद

घोर अरण्‍य के बीच स्‍पष्‍ट हो गया -

जीव किस तरह जीव का जीवन है

सृष्टि का मूल रूप औ' मानवीय

इतिहास का पहला पन्‍ना है यहाँ

इस मूल को समझकर अरण्‍य में

निर्लिखित पत्रों पर भूर्जवृक्ष के

पढ़ने को मिलता है : न उपवन में !

नगर जीवन में बुनकर कल्‍पनाओं के

जालों को मज्‍जास्थित कीट नरों के

मान लेते हैं उनकी सृष्टि-प्राचीर

ऐसे प्राचीरों को सृष्टिमुखोद्भूत

आरण्‍यक वायु का यहाँ के ऐसा

फूत्‍कार भी उखाड़कर दूर फेंक दे

तभी सन्‍मुख एक म‍हिष मत्‍त रूप में

महिषों के अपने झुंड में दूजे

एक कमजोर म‍हिष पर हमला कर

टकरा गया सींग से चीरता हुआ

तभी उसकी दहाड़ से भयंकर

दहाड़ दूसरी आई, सुनकर उसको

महिष मत्‍त वह सहसा धैर्य छोड़कर

भयविह्वल गिर गया : छलाँग उस पर

व्‍याघ्र ने ली, उसका गला पकड़ा

एक झटके से कंठनाल तोड़ा

उठा ले प्‍याले को वैसे उठाकर

और जरा आकुंचित कर तनु अपनी

गट गट गट शोणित को बाघन ने पिया

उष्‍ण कंठनाल से, जैसे कि दूध ही

प्‍याले से पी जाए पेट भर कोई ।

फिर धीरे से गुर्राते खुशी से

पंजों से भक्ष्‍य का मांस फाड़कर

लिया मुँह में भर-भर के और बाद में

लंबे-लंबे डग भरते पहुँच वह गई

राह देखते थे बच्‍चे उसके जहाँ ।

तभी बच्‍चों ने उसको घेर ही लिया ।

देखकर अपने भूखे बच्‍चों को तब

दूध भर आया उसके थनों में

और शिथिल तनु करके प्‍यार भरी वह

एक करवट पर वहाँ लेट ही गई

प्‍यार से पूँछ को पटकते धीरे से ।

चाटती खून भरी जीभ से उन्‍हें

और उन्‍हीं उग्र नखों से ही मृदु-मृदु

सहलाते अंगों को अपने बच्‍चों के ।

नवरक्‍त से लथपथ मांसखंड जो

महिष के लायी थी मुँह में पकड़ के

उन्‍हें वहीं बिखेर दिया सिखाने हेतु

खाने को बच्‍चों को अपने । स्‍वयं

चाट रही थी उनको सूँघ-सूँघकर

इस करनी को नीरव साश्‍चर्य दिखाकर

शंकर ने कहा, ' देख लिया ना लिली

सृष्टि का साग्र गौप्‍य ? देख वहाँ पर

करुणा ही क्रूरता को पिला रही ।

दूध पिलाती बच्‍चों को, मारती मृग को ।

करुणा के पत्‍थर पर तेज बनत है

क्रौर्य किसी दीप्तिमान् खड्ग की तरह !

यह बाघन हिंस्र नखरदंत-भीषणा

और दया-दुग्‍ध-स्रववत्‍सल-स्‍तना-

प्रकृति की प्रतिमा है : एक चित्र है !

केवल ना हिंस्र अहिंस्र भी न सिर्फ '

करुणामय अथवा यह क्रौयमना है,

उभयविधा प्रकृति है और उभय भी

वृत्तियों का विकास है जगत् यही,

व्‍यक्ति हो, झुंड हो या राष्‍ट्र हो

इन दोनों वृत्तियों के मिश्रण से

जीवन गुजारता है दुनिया में ।

क्षात्र-तेज और ब्राह्म-तेज उभय ही

के मिलाप से लोकोद्धार होत है :

जैसे दोनों पंखों से विहग उड़ सके,

इतने में वह मूरा चुपके से आई

और कहा उसने, 'हाँ, छिप जाओ जल्‍दी !

ये जो आ रहे दूर से नग्‍न वनचर

वे न हैं मनुष्‍य, पर तुम जैसे ही

कच्‍चे मनुजों को खा जाते हैं चाव से

ऐसे हैं नररक्‍तप्राशक नृशंस ही !'

फिर भर के बंदूक औ' लेकर लिली को,

घात लगा के बैठा, वह युवक वहीं पर

जब तक वे बर्बर न दूर चल पड़े :

और फिर उनको बह मूरा शीघ्र ही

संकटों से बचा के इसी तरह

ले गई पुर्तुगाल सुरक्षित रूप में ।

देख कन्‍यका को अपनी बहुत लाडली

जनक को उसके जो हर्ष हो गया

उसके कारण उसने शंकर को भी

अपना ही मान रख लिया स्‍वगृह में ।

लिली का अद्भुत वृत्‍तांत जानकर

राजगृह में भी उसको बुला लिया

मूरों की पकड़ से निज कन्‍या आई

इसलिए पुर्तुगाल मुदित हो गया

किंतु यदि लिली हिंदू होती ? यदि उसको

मूर ले जाते ? उनसे भी छूटकर

आती वह यदि पीहर ? हाय ! हाय ! तो

हिंदू ही दुत्‍कार उसे भगा ही देते

उसी मुसलमान के घर रहने हेतु !

थोड़े ही सालों में पिता गुजर गया

लिलि का, उसने अपनी दौलत के सहित

पाणिदान किया उस युवक को तभी ।

पाताल में, योरप में, भिन्‍न जनपदों-

को देखा दोनों ने, विभिन्‍न धर्म भी

देख लिए, राष्‍ट्र और राज्‍यबलों को

प्रस्‍तुत के भिन्‍न-भिन्‍न तोला भी मन में

पृथ्‍वी का पर्यटन पूर्ण कर लिया

और फिर उस ज्ञान को हिंदू जाति के

चरणों में अर्पण करने हेतु;

अनुभव की घंटी को राष्‍ट्रदेवि के

देवालय में अर्पण करने हेतु;

और हिंदू स्‍वातंत्र्य चरणों में अपने

जीवन का बलिदान ही करने हेतु;

लिली और शंकर भी छोड़ विदेश को

भारत को आने चढ़ गए जहाज में

आंग्‍लों के किसी, जहाज पर पता चला

कि आंग्‍ल सिंधु दस्‍यु थे जिन्‍होंने कभी

लूटी थी वह मराठी नौका ही !

हिंदू महासागर में जब प्रवेश किया

पकड़ लिया उसको इक महाराष्‍ट्र नौका ने

और जूझ आंग्‍लों-मराठों में शुरू हुआ ।

तब आंग्‍ल नौका पर होते हुए भी

शंकर ने पक्ष लिया महाराष्‍ट्र का

कप्‍तान ने तब उसको खंभे से बाँधा

और तोप के मुँह पर खड़ा किया

तभी आंग्‍ल जहाज ने आग पकड़ ली !

किंतु स्‍तंभबद्ध बंदी की दिशा में

हाय ! कौर फिर भी दौड़ पड़ी सुंदरी ?

आलिंगन शोलों के बीच कर रही

'लिली ? हाँ, दूर हो जा लिलि ! कोमले !

सत्‍य-सत्‍य रति में जो कमल कोमला

पर जब ज्‍वालाओं के रथ पर चढ़ पड़ी

स्‍वाहा तब रणरंग में कठोरा !'

झोंक दिया बाँहों में बंदि के उसने

अखिल मराठा तटस्‍थ विपल हो गया ।

क्रूर हाथापाई फिर शुरू हो गई

जोड़ लगाकर घेरा वीर मराठों ने

अंग्रेजी नौकाएँ तरह-तरह की

निर्भय नि:शंक जहाजों में भिड़कर

रोककर उन्‍हें मराठे चढ़ आए ।

तब हवा तूफानी । मेघ चिढ़ गए

गड़गड़ाहट तोपों से बढ़कर हुई;

तेज हवा का चाबुक लगते ही सागर

आपे से बाहर हो गया क्रोध से !

बिजली जब चमक उठी तब उसने देखा

क्षुब्‍ध महासागर के उस प्रचंड-सी

लहरों पर कए दीर्घ खंभे को ही

लिली और शंकर दोनों चिपके हैं

जैसे कि हाथी ने मत्‍त शीर्ष पर

सूँड़ से पुष्‍पयुगल उड़ा दिया है !

उन दोनों को मीलित देखा जिसने

ऐसी वह बिजली ही अंतिम-सी थी !

उस पर घने अँधेरे का परदा गिरा

उसमें जो लिलि सहसा निभूत हो गई

वह वैसी ही आज भी ! और कथा भी

उनकी हो गई वहीं निभृत ! एक ही

बात रही इतनी कि - 'और हेतुत:

राजदूत मुड़कर जहाँ शुक्र स्थित था

उधर देख, उसको संबोधित करके

प्रस्‍फुट शब्‍दों में बोला, 'एक रह गया

कहना था कि था उस शंकर के ही

जननी का नाम रमा, नाम पिता का

माधव था और नाम मूल गाँव का

भार्गव ही ! भार्गव में अंतुनी ले गया

जननी के साथ उसे दास बनाकर ।'

भाषण उसका जब हो रहा था

संशय की शराब वहाँ सब लोगों के

मन में जो जम रही, उस पर अंतिम ये

शब्द पड़े चिनगारी के समान ही ।

ग्रामजन चौंककर पूछने लगे

कोई कहे शुक्राचार्य ही सत्‍य हैं

'राजदूत झूठ है ? गरजे दूजा

श्रीनिनामि बावा की लेकर सौगंध

शुक्र ने कहा हम दोनों सत्‍य है !

था यदि पहले वह चौंक ही गया

पर सत्‍वर सम्‍हाल लिया संतुलन उसने

नि:शंक मुद्रा से 'सत्‍य हैं दोनों

कहानियाँ । कोई दूसरा गाँव भी

भार्गव नामक है । वहाँ का कोई

होगा यह मित्र, राजदूत ! आपका

शंकर नाम से, जो सिंधु में डूबा ।'

'दुर्भाग्‍य से वह न डूबा है' दूत ने कहा ।

तब ऊपर से क्रुद्ध और मन में भयभीत

होकर अंतिम इक दाँव लगाने

गरजकर पूछा शुक्र ने, 'कहाँ

है वह ? ले आओ ! साफ कहानी !

संत निनामी बावा की सौगंध है तुम्‍हें !'

किंचित् मुसकराता तब उपेक्षा भरे

स्‍वर में राजदूत ने कहा, 'कहाँ है ?

सुन लो फिर ! शंकर अब यहीं खड़ा है !

यहाँ मेरे भीतर ! दोस्‍त जानी

मेरा तो मैं ही हूँ ! तनय रमा का !'

शोर मच गया सभा में ! कोलाहल

लोगों के बीच शुरू हुआ, परंतु

शुक्र तो गरज पड़ा, 'नहीं ! यह छल है !

सैकड़ों लोगों ने देख लिया था,

व्‍यास ने भविष्‍य में वर्णन किया था,

क्षेत्र की महिमा ॠषियों ने कही थी

और प्रत्‍यक्ष श्रीसंत निनामी

बाबा की सत्‍य-सत्‍य है चमत्‍कृति !'

गरजत इस तरह वह पता नहीं कब

खिसक गया शुक्र विप्र उस सभा से -

और उस गाँव से ! क्‍योंकि दूसरे

दिन राजमुख्‍य ने भेजा किसी को

तो राम के मंदिर में कोई नहीं था !

शुक्र चला गया ! वे लोग भी यथाकाल

भूल गए वह वृत्‍त : परंतु

मंदिर वह, वह समाधि, और अंत में

अद्यापि मौजूद है किंवदंती !-

धर्मकथा के नाम !! औ' पुराण में

बच्‍चे के साथ बैठ विमान में सदेह

स्‍वर्गारोहण किया निनामि संत ने

उसका भी गीत है ! इस दुनिया में

पक्‍का अतिधूर्त है यद्यपि झूठ

सत्‍य से अधिक चिरंजीव है सदा !

टिप्‍पणियाँ : १. संत तुकाराम का जीवित-कार्य समाप्‍त होने पर प्रभु ने उनके लिए बैकुंठ से दिव्‍य विमान भेजा और उनमें बैठकर संत तुकाराम ने सदेह बैकुंठगमन किया- ऐसी जनधारणा है ।

२. नौ-सेना के सरदार ।

३. मराठों का ध्‍वज ।

४. तिमिंगल = क्रूर महाकाय शार्क मछली ।

५. महा-पिले = मापले/मोपले, इन्‍होंने ही केरल में मोपलास्‍तान की माँग की थी ।

इन्‍होंने ही १९२० के खिलाफत आंदोलन में हिंदुओं को लूटा, उनके साथ बलात्‍कार किया, उन्‍हें भ्रष्‍ट किया । इसी पर सावरकरजी ने उपन्‍यास लिखा : 'मुझे उससे क्‍या ?' मोपले = बहुत सम्‍मान करने लायक बच्‍चे, यह इस शब्‍द का मूलार्थ है ।

६. शिवाजी के एक प्रबल सरदार बजाजी निंबालकर को मुगलों ने जबर्दस्‍ती भ्रष्‍ट करके मुसलमान बनाया था । शिवाजी ने न केवल उसे शुद्धि करके पुन: हिंदू बनाया, बल्कि अपनी पुत्री का उसके साथ विवाह रचाया, ताकि शुद्धीकरण के पश्‍चात् उसे उचित प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त हो जाए ।

७. सिंधु-मुख्‍य = नौसेना के प्रमुख ।

८. दाहिर = सिंधु का शूर राजा । मुसलमानों के पहले विजयी हमले में लड़ते-लड़ते रण में शहीद हो गया ।

९. पंजाब के प्रसिद्ध जयपाल ने मुसलमानों के विरोध में लड़ते हुए पराजय पाने पर अग्नि प्रवेश किया था ।

१०. चंदवरदाई । पृथ्‍वीराज चौहान का भाट ।

११. महर्षि वाल्‍मीकि, रामायण के रचनाकर ।

१२. दादा = रघुनाथ राव पेशवा अर्थात् राघो भरारी, जिसने उत्‍तरी भारत में अटक तक मराठों का विजयध्‍वज फहराया ।

१३. सम्राट् चंद्रगुप्‍त मौर्य ।

१४. युद्ध में पराजय करने पर भी जिन्‍हें देश के बाहर भगाया नहीं जा सका, ऐसी अनेक परकीय जातियाँ 'भारतयज्ञाग्नि में' अर्थात् शुद्धि यज्ञ में शुद्ध करके हिंदू धर्म के तथा हिंदू राष्‍ट्र के भीतर समा ली गईं ।

१५. समर्थ रामदास (शिवाजी ने जिन्‍हें गुरु के रूप में स्‍वीकारा था) ने अपने काव्‍य 'आनंद-वनभुवन' में हिंदू-साम्राज्‍य का आनंद भरा स्‍वप्‍नमय वर्णन किया है ।

१६. बहुत बड़ी फौज लेकर शिवाजी का पारिपत्‍य करने हेतु आए हुए विजापुर के भीमकाय सरदार अफजलखाँ को शिवाजी ने प्रतापगढ़ के तले जान से मारा । इसका वर्णन करते हुए इतिहासकारों ने कहा है कि प्रतापगढ़ की भवानी माँ को शिवाजी ने बत्‍तीस दाँतों वाले बकरे की बलि चढ़ाई ।

१७. शिवाजी के सरदार बाजीप्रभु देशपांडे । दुश्‍मन का घेरा तोड़कर चंद सैनिकों के साथ शिवाजी विशाळगढ़ की ओर दौड़ रहे थे । दुश्‍मन पीछा करते निकट आ पहुँचा, यह देखकर बाजी प्रभु कुछ सैनिकों के साथ घाटी में डटकर खड़े रहे और दुश्‍मन को तब तक रोके रखा जब तक शिवाजी सु‍रक्षित रूप में विशाळगढ़ न पहुँच पाए । बाजी प्रभु के शरीर पर अनेक घाव लगे थे, फिर भी वे जान की बाजी लगाकर जूझते रहे । शिवाजी के सुरक्षित पहुँच जाने का ऐलान करते हुए तोपों के धमाके सुनने पर ही बाजी ने प्राण त्‍याग दिए ।

१८. चाकण का किला, जिसे शिवाजी के सरदार फिरंगोजी नरसाळे ने बहुत शौर्य दिखाकर कब्‍जे में कर लिया ।

१९. औरंगजेब ने अपने मामा शास्‍ताखाँ को बड़ी सेना के साथ शिवाजी के पारिपत्‍य के लिए भेजा था । शिवाजी उस समय पुणे में नहीं थे । शास्‍ताखाँ ने पुणे में शिवाजी की हवेली (लालमहल) पर कब्‍जा कर लिया और पुणे की नाकाबंदी कर दी । शिवाजी केवल पचास वीरों को लेकर गुप्‍त वेष में किसी शादी की बारात में शामिल होकर पुणे में प्रविष्‍ट हुए और मध्‍याह्न रात को लालमहल में घुस गए । हाथापाई में शास्‍ताखाँ का बेटा मारा गया । शास्‍ताखाँ खिड़की से कूदकर भाग रहा था तब शिवाजी ने अपनी तलवार का वार किया, जिसके कारण शास्‍ताखाँ के हाथ की चारों उँगलियाँ कट गईं । शिवाजी अपने वीरों के साथ सिंहगढ़ गए । शास्‍ताखाँ की सेना ने उनका पीछा किया, परंतु किल से तोपों की भारी मार करके शिवाजी ने उसे तितर-बितर कर दिया ।

२०. प्रतापराव गूजर, शिवाजी के सेनापति । उंबराणी की लड़ाई में प्रतापराव गूजर के हाथों बहलोल खाँ की पराजय हो रही थी, तभी बहलोलखाँ ने दया की भीख माँगी और प्रतापराव ने उदारता दिखाकर उसे छोड़ दिया । इस बात पर शिवाजी प्रतापराव से नाराज हो गए, क्‍योंकि बाद में बहलोल खाँ ने शिवाजी का मुल्‍क लूट लिया । जेसूरी में एक दिन प्रतापराव केवल छह सैनिकों के साथ रपट कर रहे थे, तभी सामने बहलोल खाँ सेना के साथ आ पहुँचा । पूर्व अपमान से विह्वल प्रतापराव और उनके साथी (केवल सात घुड़सवार) शत्रु की सेना पर आक्रमण करते हुए घुस गए । सातों वीर मारे गए, परंतु मरने से पहले असीम शौर्य दिखाकर उन्‍होंने अनेक शत्रु सैनिकों को कंठस्‍नान कराया ।

२१. फोंडा = स्‍थान का नाम, जहाँ पोर्तुगीजों का बुलंद किला था ।

२२. हंबीरराव मोहिते, मराठों के सेनापति ।

२३. शिवाजी के पुत्र संभाजी अपनी युवावस्‍था के प्रारंभ में मदिरा तथा मदिराक्षी के मोह के शिकार हुए थे । किंतु आगे चलकर शिवाजी के पश्‍चात् छत्रपति बनने पर उन्‍होंने अतुल शौर्य दिखाया । छल-कपट से कैद करने के बाद औरंगजेब ने उन्‍हें प्रलोभन दिखाया कि यदि वे मुसलमान बन जाएँगे तो उन्‍हें दक्षिण भारत का राजा बना दिया जाएगा । परंतु संभाजी ने इसे ठुकरा दिया और स्‍वधर्म के लिए शहीद होना पसंद किया । औरंगजेब ने चरम शारीरिक पीड़ाओं के सा‍थ उनकी हत्‍या करवाई ।

२४. बाजीराव पेशवा ।

२५. चिमणजी अथवा चिमाजी अप्‍पा, बाजीराव पेशवा के छोटे भाई ।

२६. पार्थसारथी भगवान् श्रीकृष्‍ण ।

२७. यादवों के आपसी संघर्ष में एक विशिष्‍ट लोह सदृश तृण का ही प्रयोग एक-दूसरे को मारने के लिए किया गया था ।

२८. पेशवा की उपाधि ।

२९. सिंधु विजय = सिंधु नदी की विजय ।

३०. सिंधु विजय = सागर की विजय ।

३१. हीदन =Heathen - यह विशेषण विधर्मियों तथा विजातियों के बारे में निंदा के लिए ईसाई प्रयुक्‍त करते थे, जैसे मुसलमान हिंदुओं को 'काफर' कहा करते थे ।

३२. सिंधद्वार = बंदरगाह ।

३३. तिमय्या एक विख्‍यात हिंदू नेता थे । वे पश्चिमी सागर से अफ्रीका के सिंधु तट तक नौका में व्‍यापार किया करते थे । कुछ लोग कहते हैं कि तिमय्या ने ही पुर्तगालियों को 'केप ऑफ गुड होप' का चक्‍कर लगाकर हिंदुस्‍थान का मार्ग दिखाया । इतना तो कम-से-कम सर्वमान्‍य है कि मुसलमानों के हाथों गोवा के हिंदुओं पर जो अत्‍याचार हो रहे थे उनका प्रतिशोध लेकर मुसलमानों की सत्‍ता को उखाड़ देने हेतु इन्‍होंने पुर्तगालियों के साथ इकरार किया कि वे हिंदुओं की सहायता करें और इसके फलस्‍वरूप पुर्तगालियों ने गोवा में अपनी सेना उतार दी ।

सावरकरजी की अप्रसिद्ध कविताएँ

(परिचय : युवक कवि सावरकरजी ने अपनी आयु के चौदह से बीस के कालखंड में लिखी कविताएँ, जो उनकी मृत्‍यु के बाद डॉ. स.गं. मालशेजी ने संपादित करके इसी शीर्षक के साथ प्रकाशित करवाईं ।)

: १ :

नासिक के सन् १८९७ के गणेशोत्‍सव पर कुछ आर्याएँ

वंदन कर भवानी का, वर्णन करता मैं गणेश-उत्‍सव को ।

बांधव हिंदू हमारे मानेंगे कामधेनु ही इस को ।।१।।

यद्यपि पुणे समान हि ठाठ न था, फिर भी असामान्‍य ।

बना वही बहुत ही लघु सौभद्र की तरह रसिक-मान्‍य ।।२।।

जब आ गई चतुर्थी उत्‍कट आनंदभरित हो गए लोग ।

सब ने उत्‍कट भावों से याद किया शिवसुत रक्‍तांग ।।३।।

थे तैयार हि मेले यद्यपि चार, थे बहु सुंदर ।

गणराजकीर्तिथी बहु शोभत उनके प्रयोग के भीतर ।।४।।

उस रात भीड़ भारी गणपति का स्‍तुति-गायन करने को ।

कोशिश बहुत से करते लोग उन्‍हें सभाग्‍य सुनने को ।।५।।

राहों-राहों पर था गणपति का स्‍तवन आर्य-रक्षार्थ ।।

प्रभुजी, असह्य हर हर ! काट रहे ये गायों को भक्ष्‍यार्थ ।।६।।

जिन आर्यों का पदमलतेजशमन करने हर साक्षात् ।

यत्‍न करे, ऐसे ये ब्राह्मण, पर अब गलित म्‍लेच्‍छभयात् ।।७।।

जो रामकृष्‍णनिवास कृत ऐसे सत्‍क्षेत्र अतीव महान् ।

हर हर उनमें भी अब ब्राह्मण वर्ग भुगत कष्‍ट महान् ।।८।।

जिन शून पूर्वजों ने जरिपटका अटक के बीच फहराया ।

उनके ही वंशज हम, कायरता को कैसे अपनाया ।।९।।

आज विजापुर तो कल दिल्‍ली, फिर चले पन्‍हाळगड़ ।

राव भरारी थे औ' हम तो केवल पत्‍थर है सुघड़ ।।१०।।

राजा परकीय, शिक्षा परकीय, हो गई लक्ष्‍मी जी भी पराई ।

अब हे प्रभो दयानिधि, तुम बिन आधार ही नहीं कोई ।।११।।

सो गणराय, अब तुम हरण करो जी सभी आपदाएँ ।

अपराधों की कर दो क्षमा, तुम्‍हारे नम्र दास हम हैं ।।१२।।

नर वर विघ्‍नहर प्रभु सुखकर भयहर स्‍मरारिप्रिय अमर ।

अजरा विश्‍वाधार हि भक्‍तवर तुम्‍हें नमोऽस्‍तु शिवकुमर ।।१३।।

टिप्‍पणियाँ : १. 'लघुसौभद्र' - अण्‍णा साहेब किर्लोस्‍कर का नाटक 'सौभद्र' (सन १८८२) संगीत मराठी रंगमच का कोहिनूर माना जाता है । इस नाटक में अनेकानेक पद है, अत: पूरे नाटक का मंचन रात भर चलता है । बदलते समय के अनुसार नाटक के पदों से अनेक पद हटाकर इसका संक्षिप्‍त रूप बनाया गया, जिसे 'लघुसौभद्र' कहा गया । चूँकि लगभग सारे विशेष लोकप्रिय पद 'लघुसौभद्र' में भी यथावत् रखे गए, वह भी लोगों को बहुत पसंद आया । उसी प्रकार सावरकरजी का इशारा है कि नासिक का गणेशोत्‍सव पुणे के गणेशोत्सव की तुलना में छोटा सही, परंतु उतना ही लोगों को अच्‍छा लगा ।

२. मेला-गणेशोत्‍सव के दौरान गीत, नृत्‍य, संवाद, प्रहसन आदि के द्वारा मनोरंजन का कार्यक्रम पेश करनेवाले कलाकारों का संघ ।

३. जरिपटका - मराठी साम्राज्‍य का अधिकृत ध्‍वज ।

४. राव भरारी - पेशवा रघुनाथराव, जो द्रुत गति से सर्वत्र जियी संचार किया करते थे ।

: २ :

(परिचय : निम्‍न आर्यावृत्‍त में रचित पंक्तियाँ तब रची गई थीं जब लोकमान्‍य तिलकजी के जेल से रिहा हो जाने के उपलक्ष्‍य में छुट्टी मिल गई थी । उस समय सावरकरजी की आयु पंद्रह वर्ष की थी (सन् १८९८) । ये पंक्तियाँ 'जगद्धितेच्‍छु, पुणे' समाचार में प्रकाशित हुई थीं ।)

।। श्री योगेश्‍वरी प्रसन्‍न ।।

श्रीमान् जगद्धितेच्‍छुकर्ता महोदय,

सप्रेम नमस्‍कार विनति विशेष ।

आशा है, आप कृपा करके अपने जगन्‍मान्‍य पत्र में निम्‍न मजमून छापेंगे ।

श्रीतिलक-आर्यभू मिलन

आओ, बेटे, आओ ! क्षेम रहे ! तुम शतायु कुलतिलक ।

गद्गद होती हूँ मैं ! स्‍वस्‍थ रहो तुम गुणानुकूल तिलक ।।१।।

आओ मेरी बाँहों में, चुंबन करने दो अब मुझको ।

वे दिन टले तुम्‍हारे, 'बाल', बहु कष्‍ट दिए तनु को ।।२।।

गिनती करके मैंने अब्‍द भर सही दूरता तुम्‍हारी ।

अब धीरज टूटा था तभी भाग्‍य से देखी तव मुखश्री ।।३।।

क्‍यों अब वहीं खड़े हो ? क्‍या सोचा यह अपनी माँ नहीं हैं ।

यदि शोक से कृशा हूँ स्‍तनपान कराने की चाहत है ।।४।।

क्‍या विस्मित होते हो देख मुझे स्‍पर्श के लिए आतुर ।

हे 'बाल', प्रेम की ही बहुत हृदय में उछलती है लहर ।।५।।

क्‍यों गुस्‍सा करते हो ? क्‍यों न मैं आरती उतारूँ जी ?

क्‍यों देर यह मिलन में ? सुनो, न जाओ ऐसे ही घर में जी ।।६।।

'श्री बाल' प्रेम से बहु दौड़ा तब आर्य जनति से मिलने ।

सप्‍तमि के सवेरे भीड़ बहुत हो गई उन्‍हें मिलने ।।७।।

दोषस्‍थलों की माफी चाहता हूँ ।

नासिक, दिनांक ७ सितंबर, १८९८

आपका

कोई 'क्ष'

: ३ :

अन्‍य स्‍फुट कविताएँ

विभाग - १

उचित वर स्‍तुतिकन्‍या ने माना बाळ को सुनिश्‍चत से ।

पर सौतन के भय से उसने उसको रखा दूर अपने से ।।

फिर गूँथा उसने भी उसे गुणों से लिया औ' गले में ।

दृढ़ कसकर ही उसको गुजारती है दिन स्‍वांत सुख में ।।१।।

सुना दूर से बहुत, और गुणलुब्‍धा होकर मन में ।

कीर्ति मृगाक्षी आई करने वरण तिलक का जन में ।।

परंतु वे तो रहे जेल में, देख नहीं हैं घर में ।

उन्‍हें ढूँढ़ती घूम रही है बेचारी त्रिभुवन में ।।२।।

(ये दो श्‍लोक (भोजन के समय) तब रचे गए थे, जब लोकमान्‍य तिलक कारागृह में थे, सन् १८९८ ।)

प्‍लेग पर दो श्‍लोक

देख बहुत रमणीय स्‍थान जो उतरा मुंणापुरि में ।

जिस से लोग बहुत डरते हैं, छिपते हैं बीहड़ में ।।

जिज्ञासा के कारण हर घर पूछताछ करता है ।

तीर्थक्षेत्रों में, नगरों में, सैर खुशी से करता है ।।१।।

एवंगुण यह प्‍लेग-नृप संचार करे दुनिया में ।

जो भी उससे मिला वह हुआ दंडित अनजाने में ।।

करता हे ऐलान मूषकों के द्वारा मै आऊँ ।

हटो, मार्ग दो, ना तो तुमको सबको ही खा जाऊँ ।।२।।

काल पर

काल को प्रणाम नित्‍य जो सदैव तृप्‍त है ।

वायुपुत्र को सम्‍हाल चिरंजीव होत है ।।

जो कभी न मुड़ता है, जो कभी न रुकता है ।

भूमिकंप से न कभी रत्‍ती भर हिलता है ।।१।।

राह पर चलते ही कई काम करता है ।

जिनसे सुख सज्‍जन को, दुष्‍ट-दंड मिलता है ।।

ज्ञात इतिहासविषय में सुख बहु पाता है ।

गतवर्षों के वृत्‍तों को फिर से छूता है ।।२।।

हिंदुस्‍थान की सद्य: स्थिति पर शुकान्‍योक्ति

वन-उपवन में जिनमें आश्रय किया रम्‍य वृक्षों को ।

सुफल; स्‍नान के लिए सरस औ' नित बहते पानी का ।।

उड़ते गिरते बैठक करते जो मनचाहे विचारा ।

हाय ! वही अब शुक पंजर में रहता है बेचारा ।।१।।

कोयल-अन्‍योक्ति

हिलते-डुलते तरुवर की चोटी पर जाकर बैठें

हवा बहे तब झूम-झूमकर मधु-गीतों को गावें ।।

इर्दगिर्द सब सुंदरियों का मेला लगता सुनने ।

कोयल, तुम्‍हारी तन को कोचा आज किसी कोए ने ।।१।।

कमलान्‍योक्ति

सुरतनु-धवलांगी-जाह्नवी-जनित है जो ।

स्‍वकर-कष्‍ट-वर्धित प्रिय-सखी-हर्ष है जो ।।

सकर देवताओं का शिरारूढ़ है जो ।

कमल शुष्‍क-जीवन विपिन में व्‍यर्थ समझो ।।१।।

स्‍वातंत्र्य देवी के प्रति

जिसके धन्‍य परादविंदमकरंदास्‍वादहेतु स्‍वयम् ।

श्रीमत्-त्र्यंबक-अंबरेश अलि-से करते सु-गुंजारव ।।

वंद्या जो अदिती-रमा-हितसुता चिच्‍छाक्तियों को परम् ।

वन्‍दे श्रीस्‍वातंत्र्यदेवि तुभ्‍यं मांगल्‍यदा मां भव ।।१।।

संक्रांति का तिळगुळ

सप्रेम-युक्‍त तिल सुंदर शुभ्र-राग ।

आनंद-संग-स्‍मृति का सुचारु पाग ।।

मित्रत्‍व-अंकुर उसे तब प्राप्‍त होवे ।

सौजन्‍य-केसर कभी शोभा बढ़ावे ।।१।।

संक्रांति-क्रांति-समय त्‍योहार रम्‍य ।

स्‍वर्गीय हर्ष-उत्‍सव मन में अगम्‍य ।।

यह पत्र पात्र करके कविता-वधू से ।

मैंने कहा कि 'तिळगुळ दे दो यहीं से' ।।२।।

स्‍वीकार आप कर लो, दोस्‍ती बढ़ाओ ।

इसका सशास्‍त्र गुण है मन में जताओ ।

श्रीराजश्रेष्‍ठ शिवकीर्ति-रसपान कर लो ।

आस्‍वाद अद्भुत उपायन का अजी लो ।।३।।

टिप्‍पणियाँ : १. ये श्‍लोक मकर-संक्रांति के उपलक्ष्‍य में किसी मित्र को भेजे थे । दिनांक ३० जनवरी, १८९९ ।

२. महाराष्‍ट्र में 'संक्रांति' का त्‍योहार १४ जनवरी को मकर-संक्रमण के पर्व पर मनाया जाता है ।

३. तिळगुळ-एक विशिष्‍ट व्‍यंजन । सफेट तिलों को चीनी की चाशनी में डालकर उन्‍हें हल्‍के हाथों से विशिष्‍ट रूप में तब तक मसला जाता है जब तक उन तिलों पर चीनी का अवगुंठन बनकर उसमें मनोरम अंकुर निकल आते है । इन पर केसर छिड़की जाती है । ये 'तिळगुळ' संक्रांति के त्‍योहार में लोग एक-दूसरे को बाँटते हैं और कहते हैं, 'तिळगुळ ध्‍या, गोड बोला' (अर्थात् तिळगुळ स्‍वीकार करो और मीठी बात करो ।)

४. शिवकीर्ति-रसपान-छत्रपति शिवाजी के कीर्तिमान चरित्र का पान ।

: ५ :

मातृशोक-अलाप-अष्‍टक

आर्या

माते, छोड़ गई तू, उसको छह वर्ष आज को गए ।

सुंदर नाम तुम्‍हारा दु:खाग्नि में मेघ-सा बरस जाए ।।१।।

गई हो पहले ही, यदि जाती तुम अभी, सुनो, माते !

मैं छोड़ता नहीं जी, यद्यपि शतगुण तप्‍त अंग मम होते ।।२।।

ऊब गई होगी तुम नित्‍य सुखों से वहाँ, लगे मुझको ।

ग्रंथश्रवणोत्‍पादक स्‍वर्ग की उमंग थी न तुमको ।।३।।

'बदल करूँ मैं थोड़ा पुत्रालिंगन-सुख से', यदि माँ जी ।

तुम इच्‍छा करती हो, तो वह आज ना उचित है, जी ।।४।।

क्षण रुक जाओ, सोचो सत्‍पथ, साधु, श्रुतित्रयों को ।

दुल्‍हन कीर्ति बनेगी, सुजन जभी मान्‍य करें मुझको ।।५।।

उस त्रयगामिनि को, फिर पूरी कर देने की इच्‍छा ।

भेजूँगा स्‍वर्ग में मै, तब होगा तोष तुम्‍हें ही सच्‍चा ।।६।।

मच्‍छया मपन उसे, मेरे बदले उससे ही मिल लो ।

हो जाओगी गद्गद, भूलोगी सब कुछ, माँ, सुन लो ।

वंदन तव चरणों में तव सुत करता हूँ आर्याओं में ।

मंद न धी हो मेरा, चंदन सा घिस जाऊँ सेवा में ।।८।।

'आर्यावृत्‍त्‍' में रचित इन पंक्तियों को अत्‍यंत नम्रता के साथ मेरी परलोक वासिनी माता के प्रति अर्पण कर रहा हूँ ।

(३१ जनवरी, १८९९

आयु १६)

: ६ :

खुल गई प्रभात, वायु शीतल बहने लगा ।

जहाँ तहाँ मुदित बहुत जन अब होने लगा ।