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कविता

कविताएँ
नीलेश रघुवंशी


अखबार में फोटो

पीले पड़ चुके अखबार के पन्नों में छपे...

पहले फोटो में
श्रीनगर के हरीसिंह स्ट्रीट मार्केट में

हरी-भरी सब्जियाँ, कर्फ्यू में ढील, उतावले जरूरतमंद लोग
चमकदार ताजी सब्जियों पर चमकती दहशत।

दूसरे में अयोध्या में ग्राहक न आने की वजह से
चाँदी की दुकान में
मंदिर-मस्जिद से परे गहरी नींद में दुकानदार
बेफिक्री ऐसी कि लूट का डर नहीं और जमाने की परवाह नहीं।

तीसरे में हैदराबाद में तेज बारिश के बाद
सड़क पर भर आए पानी से जूझते हुए लोग।

चौथे में बाढ़ के पानी में डूबता यमुना मंदिर
एक भी फकीर नहीं आस-पास
पानी में डूबती-तिरती फकीरी नहीं, भव्यता की परछाई है।

पाँचवें में वृंदावन के बाढ़ग्रस्त इलाके में
तोते को पिंजरे में लिए घुटनों तक डूबी महिला
फोकस करता एक फोटोग्राफर
जिसने तोते की फड़फड़ाहट को भी स्टिल कर दिया है।

छठवें फोटो में
उफनती नदी से तबाह हुए घर को देखते किसान परिवार की तीन पीढ़ियाँ हैं
जिसमें बच्चे टीले पर चढ़े हुए
जवान नदी को ऐसे घूर रहे हैं, जैसे वे उसे लील जाएँगे
और वयोवृद्ध हाथ जोड़ते हुए।

कविता के लिए कितने सटीक विषय हैं ये
लेकिन इन पर कविता लिखना कितना मुश्किल...?

 

चप्पल

जाने क्यों महँगी चप्पलें
गिरतीं नहीं कभी सड़क पर
वे छूटती भी नहीं हैं
और किसी दूसरे के पाँव में आती भी नहीं आसानी से
सस्ती चप्पलें सस्तेपन को साथ लिए
यहाँ-वहाँ छूटती हैं और उनका मिलना अशुभ भी नहीं होता ।

 

चोरी

जब भी बहनें आतीं ससुराल से
वे दो चार दिनों तक सोती रहतीं
उलाँकते हुए उनके कान में जोर की कूँक मारते
एक बार तो लँगड़ी भी खेली हमने उन पर
वे हमें मारने दौड़ीं
हम भागकर पिता से चिपक गए
नींद से भरी वे फिर सो गईं वहीं पिता के पास...!

पिता के न होने पर
नहीं सोईं एक भी भरी दोपहरी में
क्या उनकी नींद जाग गई पिता के सोते ही...?
सब घेरकर बैठी रहीं उसी जगह को
जहाँ अक्सर बैठते थे पिता और लेटे थे अपने अंतिम दिनों में...!
पिता का तकिया जिस पर सर रखने को लेकर
पूरे तेरह दिन रुआँसे हुए हम सब कई बार
बाँटते भी कैसे
एक दो तीन नहीं हम तो पूरे नौ हैं...!
इसी बीच सबकी आँख बचाकर
मैंने पिता की छड़ी पार कर दी
उन्होंने देख लिया शायद मुझे
मारे डर के वैसे ही लिपटी छड़ी से
लिपटी थी जैसे पहली बार
पिता की सुपारी चुराने पर पिता से...!

 

पेड़ों का शहर

कल रात स्वप्न में
एक पेड़ से लिपटकर बहुत रोई
हिचकियाँ लेते रुँधे गले से बोली
मैं जीना चाहती हूँ और जीवन बहुत दूर है मुझसे
पेड़ ने कहा
मेरे साथ चलो तुम मेरे शहर
रोते हुए आँखें चमक गईं मेरी
पेड़ों का शहर...?
चमकती हुई रात में
अचानक हम ट्रेफिक में घिर गए
बीच चौराहे पर एक हरा भरा पेड़
सब ओर खुशी की बूँदें छा गईं
पेड़ के होने से
चौराहे की खूबसूरती में चार चाँद लग गए...!

स्वप्न ने करवट बदली
भयानक शोर भारी भरकम क्रेन
पेड़ शिफ्टिंग करने वालों का काफिला
सबसे ऊँची टहनी पर बैठी मैं
पेड़ के संग हवा में लहराने लगी
क्रेन हमारे पास बहुत पास आ रही थी
चौराहे पर लोगों का जबरदस्त हुजूम
भय और आश्चर्य से भरी आवाजें
इसी अफरा-तफरी और हो-हल्ले में
पेड़ अपने शहर का रास्ता भूल गया
पेड़ों का शहर...
एक लंबी सिसकारी भरी मैंने नींद में !

 

दो हिस्से

आत्मकथ्य

मेरे प्राण मेरी कमीज के बाहर
आधी उधड़ चुकी जेब में लटके हैं
मेरी जेब में उसका फोटो है
रोपा जा रहा है जिसके दिल में
फूल विस्मरण का...!
झूठ फरेबी चार सौ बीसी
जाने कितने मामले दर्ज हैं मेरे ऊपर
इस भ्रष्ट और अंधे तंत्र से
लड़ने का कारगर हथियार नहीं मेरे पास
घृणा आततायी को जन्म देती है
आततायी निरंकुशता को
प्रेम किसको जन्म देता है...?
अपना सूखा कंठ लिए रोता हूँ फूट फूटकर
मेरी जेब में तुम्हारा फोटो है
कर गए चस्पाँ उसी पर
नोटिस गुमशुदा की तलाश का...!

एक बूढ़ी औरत का बयान

मथुरा की परकम्मा करने गए थे हम
वहीं रेलवे स्टेशन पे भैया...
(रोओ मत! पहले बात पूरी करो फिर रोना जी भर के)
साब भीड़ में हाथ छूट गए हमारे
पूरे दो दिन स्टेशन पर बैठी रही मनो वे नहीं मिले
ढूँढ़त ढूँढ़त आँखें पथरा गईं भैया मेरी
अब आप ही कुछ दया करम करो बाबूजी
(दो चार दिन और इंतजार करो बाई आ जाएँगे खुद ब खुद!)
नहीं आ पाएँगे बेटा वे पूरो एक महीना और पंद्रह दिन हो गए
वे सुन नहीं पाते और दिखता भी नहीं उन्हें अच्छे से!
(बुढ़ापे में चैन से बैठते नहीं बनता घर में! जाओ और करो परकम्मा...
कहाँ की रहने वाली हो?)
अशोक नगर के!
(घर में और कोई नहीं है क्या?)
हैं! नाती पोता सब हैं भैया!
(फिर तुम अकेली क्यों आती हो?
लड़कों को भेजना चाहिए था न रिपोर्ट लिखाने...)
वे नहीं आ रहे न वे ढूँढ़ रहे
कहते हैं...
तुम्हीं गुमा के आई हो सो तुम्हीं ढूँढ़ो!
लाल सुर्ख साड़ी में एकदम जवान
दद्दा के साथ कितनी खूबसूरत बूढ़ी औरत
इसी फोटो पर चस्पाँ
नोटिस गुमशुदा की तलाश का...!

 

एक बार फिर अकाल

दौड़ो दौड़ो दौड़ो
तुम्हारा जन्म ही दौड़ने के लिए हुआ
मत देखना कभी पीछे मुड़कर
कहीं तुम्हारे अपने तुम्हें आवाज न दे दें
अकाल अकाल अकाल प्रेम का अकाल!
महानगर बनने के कगार पर इसी शहर की
एक पॉश कॉलोनी में
संभव को असंभव और असंभव को संभव बनाती
ये बात कि
एक भले मानुस के विदेश में बसे
बड़े बेटे ने सारी संपत्ति
छोटे भाई को देने की गुहार की पिता से
संपत्ति के संग पिता को भी किया भाई के हिस्से!
जीवन अपनी गति से चल रहा था कि
कुएँ बावड़ी नदी पोखर सब सूखने लगे
पशुओं ने चरना और पक्षियों ने उड़ना किया बंद
बहुत बुरा हाल लोगों का
वे न जी पा रहे न मर पा रहे!
बुजुर्ग अपने ही घर में पराए हो गए
हुआ ये कि एक दिन
शाम की सैर से लौटे तो देखा
उनका कमरा अब उनका नहीं रहा
गेस्ट हाउस के छोटे से कमरे में
शिफ्ट कर दिया गया तिस पर
बढ़ती महँगाई के नाम पर सारी कटौती उनके हिस्से!

होनी को अनहोनी और अनहोनी को होनी बनाते
बुजुर्ग सज्जन ने अपना सब कुछ बेच दिया
दिन तो क्या कई महीने गुजर गए
विश्व भ्रमण से
सुखी परिवार जब वापस आया तो
अपने ही घर में किसी अजनबी को देख हकबका गया
प्रेम के अकाल को बगल में दबाए बुजुर्ग
कुछ भी कह सुन लिखकर नहीं गए
प्रेम के अकाल को
संपत्ति और बैंक बैलेंस के अकाल में बदलते
वे चले गए...!

 

एफ.आई.आर.

खुद को चोर होने से रोक सकती हूँ
मेरे घर में चोरी न हो
यह भला कैसे रोक सकती हूँ!
खुद को चोर होने से रोका
कोई बड़ी बात नहीं
चोर को चोर होने से रोक सकती
तो कुछ बात बनती
घर में ताला लगाकर चाभी चोर के यहाँ रखती
इस तरह
किसी और युग में न जाकर
किसी और ग्रह को न ताककर
चोर के संग
एफ.आई.आर. के रजिस्टर के पुरजे पुरजे कर
यहीं धरती पर पानी की नाव बनाती...!

 

घनघोर आत्मीय क्षण

जब जब हारी खुद से आई तुम्हारे पास
मेरे जीवन का चौराहा तुम
रास्ते निकले जिससे कई कई!
वो कौन सी फाँस है चुभती है जो जब तब
डरती हूँ अब तुमसे मिलने और बतियाने से
मिलेंगे जब हम करेंगे बहुत सारी बातें
धीरे धीरे जब हम
घनघोर आत्मीय क्षणों में प्रवेश कर जाएँगे
तब सकुचाते हुए पश्चात्ताप करते हुए
तुम सच बोलोगे
छल हँसेगा तब कितना
कपट नाचेगा ईर्ष्या करेगी सोलह श्रृंगार
मैं तुम्हें प्यार करती हूँ तुम मुझे छलते हो
भोले प्यारे कपटी इंसान
प्यार और छल रह नहीं सकते एक साथ
क्यों छला तुमने मुझे इतना
कि
तुम्हारा ही कलेजा छलनी हो गया!

 

जल की अपराधी

पानी बहुत कम है अब जीवन में!
तिस पर
हर दिन जल को पाँव से छूती हूँ
हर दिन पानी से अपनी प्यास बुझाती हूँ
हर दिन पानी को बिकते देखती हूँ
हर दिन पानी को फिंकते देखती हूँ
मैं देख देखकर अपराध करती हूँ
जल के बिना कल की सोच
सिहर जाती हूँ और
चार बाल्टी पानी से स्नान करती हूँ!
मैं जल की अपराधी हूँ
जिसकी कोई सजा नहीं
कानून की किसी धारा में
कचहरी और अदालतों के नलों में भी
नहीं है पानी...
जितना ज्यादा झुकाती हूँ नल को
कम होती जाती है उतनी ही उसकी धार
क्षमा करना औेर प्रायश्चित करना
स्वभाव में नहीं मेरे
इसीलिए
पानी दूर बहुत दूर होता जा रहा है मुझसे...

 

खिड़की खुलने के बाद

मुँड़ेर पर अनगिन चिड़िया
दूर कहीं
झुंड में उड़ते सफेद बगुले
पेड़ की डाल पर नीलकंठ
कूकती कोयल हरे भरे झूमते पेड़
ताजगी से भरी सुबह
प्रकृति प्रेम हिलोरें मारता है मेरे भीतर
खोलती हूँ जैसे ही खिड़की
दिखते हैं
सड़क पर शौच करते लोग
कीचड़ में भैंसों के संग धँसते बच्चे
बिना टोंटी वाले सूखे सरकारी नल पर
टूटे फूटे तपेले में अपना मुँह गड़ाए
एक दूसरे पर गुर्राते कुत्ते
दिखता है
कूड़े और नालियों पर बसर करता
सड़ांध मारता जीवन
देखना कुछ चाहती हूँ
दिख कुछ और जाता है
खिड़की खुलने के बाद...

 

मुहावरा

पैसे की तरह पानी मत बहाओ

पोस्टर और मुहावरों से सजा
सड़क पर पानी गिराता जाता ये टैंकर
जा रहा है उन भूखी सूखी बस्तियों की ओर
जिनके पास चुल्लू भर पानी भी नहीं
डूब मरे जिसमें ये मुहावरा...!

किसने मारी ठोकर जल से भरे लोटे को
किसने बेदखल किया मुहावरे को अपनी जगह से
किसने निचोड़ लिया पानी मुहावरे का...?

पानी की तरह पैसे मत बहाओ
पैसे की तरह पानी मत बहाओ
धन बल और जल के अपराधियों की
छपनी चाहिए तस्वीर
गिरते जल स्तर को दर्शाती सूचनाओं में!
मत बहाओ पानी
पैसे को भी मत बहाओ...!

 

रंज

अगर मैं
किसी दुख से दुखी न होऊँ
किसी सुख की चाह न करूँ
रोग भय और क्रोध से पा जाऊँ छुटकारा
तो क्या और कैसा होग?
जीवन कितना उबाऊ और नीरस होगा !

जिया नहीं जिसने जीवन को
पिया नहीं उसने मृत्यु को...!

मृत्यु से छुटकारा और जीवन से राग
सुख को देहरी का जलता दिया बनाया
दुख को जलाया खेत में कूड़े के संग
सुख को पकड़ा दुख को छोड़ा
ईमान छोड़ा अपनों को छोड़ा खुद को न छोड़ा
बीत गया आधा जीवन कोई न पहचाना
ये रंज मेरे भीतर तक पैठ गया है !

 

चक्र : ग्यारह कविताएँ

भूख का चक्र

सबके हिस्से मजदूरी भी नहीं अब
शरीर में ताकत नहीं तो मजदूरी कैसे?
छोटे नोट और सिक्के हैं चलन से बाहर
पाँच सौ के नोट पर छपी
पोपले मुँह वाली तस्वीर भी
कई दिन से भूखी है!

 

प्यार का चक्र

उछालती जब उसे बाँहों में
दिल काँपता था मेरा
उसकी दूध की उल्टी से
सूखता था मेरे भीतर का पानी
एक वृक्ष की तरह
उसकी जड़ें भीतर फैलती चली गईं!
सोचती
जब अठारह का हो जाएगा
छोड़ दूँगी घने जंगल में
बर्फीले पहाड़ों के ऊपर होगा उसका मचान
अंतहीन आकाश में उड़ते देख
पीठ फेर लूँगी!

बदलती दुनिया जोखिम रोमांच से प्यार
बड़ी लंबी उछाल है उसकी
जाने क्या होता है अब मेरे भीतर
फड़फड़ाती हूँ उसे उड़ते देख
अपने हाथों को ढाल बना
उड़ना चाहती हूँ उसके संग
प्यार का ये चक्र
घूमकर आ ठहरता है उसी जगह
जहाँ... मैं सोचती हूँ बस एक बरस और...!

 

फैशन का चक्र

कितना दूर रहती हूँ
दूर और पास को देख चलती नहीं
अगर चलती तो
फैशन नाम क्यों होता फिर !
हर घर का दरवाजा खटखटाना
गिड़गिड़ाहट को विनम्रता की तरह बापरना
क्रोध भय और स्वाभिमान को गिरवी रख
उत्पाद को न चाहते हुए भी बेचना
बदलते फैशन का मिजाज
भाँप सको तो
सेल्समैन और सेल्सगर्ल के चेहरे पर भाँपो...!

 

झूठ का चक्र

एक झूठ बोला
बचते बचाते दो चार झूठ और बोले
एक नहीं सौ नहीं हजारों हजार झूठ बोले
आखिर में लड़खड़ाती जुबान में
थक हारकर सच बोला...!
सच धैर्य नहीं खोता
झूठ की मृत्यु की प्रतीक्षा भी नहीं करता
झूठ करता है वो सब कुछ
जिसे करने की सच सोचता भी नहीं
तर्क में नहीं कुतर्क में घुटता है दम झूठ का...!

 

मौसम का चक्र

थोड़ा थोड़ा सब कुछ लेने के फेर में
नहीं मिलता कुछ भी
मौसम बदलता है तो बदलती है सोच
अपने चरम पर पहुँचता
हर चार माह में बदलता
मौसम भी बनाता है हमें निकम्मा !

 

रोने का चक्र

तुमने जन्म लिया तो रोए
भूख लगी तो रोए
मन की कोई चीज न मिली तो रोए
अपनों से बिछुड़ने पर रोए खूब रोए!
खुशी में फूट फूटकर नहीं रोए कभी
आँखें गीली हुईं और तुमने कहा
ये आँसू खुशी के आँसू हैं...!
फिर
तुमसे कहा गया
बात बात पर रोना अच्छी बात नहीं
रोने से नहीं मिलता कुछ भी
तुमने
अपने भीतर आँसुओं का कुआँ बना लिया
जो मारे ठंडक के जम गया
बहुत दिन से नहीं रोए सोचकर
अचानक तुम रोए खूब रोए...!
जीवन में रोने से नफरत करना भी
एक रोना है...!

 

हँसने का चक्र

हँसने हँसाने का दूसरा नाम है जीवन!
लेकिन जाने कब कैसे और क्यों
हँसना छोड़ दिया हमने
हँसी को छोड़ दौड़ के पीछे लग गए
धीरे धीरे हँसी सेल्समैन सेल्सगर्ल
क्रेडिट कार्ड बेचने वालों की हो गई
हँसी को शिष्टाचार के संग रोजगार बनाया उन्होंने
ठगे जाने के भय से न हँसे न मुस्कुराए
रो भी न सके हम!
हँसना जरूरी है निरोगी काया के लिए
हँसी क्लब में प्रवेश के लिए मोटी फीस भरी
हँसने के नाम पर
कैसी डरावनी आवाजें निकालने लगे हम
हमेशा बुरा माना जाता है बिना वजह दाँत दिखाना!
नदी किनारे मिलती है सच्ची हँसी
नदियों को हमने जाने कब का बेच दिया
हँसने का कोई चक्र नहीं
बिकने की कोई उम्र नहीं...!

 

सोचने का चक्र

जब
महानगरों को देखा|
चकाचौंध में उनकी घिग्घी बँध गई मेरी
भाषा ने साथ छोड़ दिया
खुद की भाषा को छोड़
लपलपाने लगी दूसरे की भाषा में
स्वचालित सीढ़ियों से डरते
पानी को बिकते खुद को फिंकते देख
अपनी जगह लौट आई
लौटकर
गाँवों नगरों को महानगर में बसाने का सोचने लगी
नगर उपनगर गाँव देहात कस्बे महानगर
चकाचौंध घिग्घी लपलपाहट सनसनाहट
नींद ने मेरा साथ छोड़ दिया
नींद को बुलाने के लिए
एक से हजार तक गिनती गिनने लगी
गिनते हुए गिनती के बारे में सोचने लगी...!

 

यात्रा का चक्र

बंजर जिंदगी को पीछे छोड़ देना
बारिश को छूना चाँद बादलों से यारी
नंगे पाँव घास पर चलकर ओस से भींग जाना
खाना-बदोश और बंजारों के छोड़े गए घरों को देखना
खुद को तलाशना उन जैसा हो जाना
न होने पर ईर्ष्या का उपजना...
प्राचीन इमारतों के पीछे भागना
स्थापत्य मूर्तियों को निहारना
एक पल में कई बरस का जीवन जी लेना
ट्रेन का छूट जाना जेब का कट जाना
किसी के छूटे सामान को देखकर
बम आर.डी.एक्स. की आशंका से सिहर जाना
घर पहुँचना और पहुँचकर घर को गले लगा लेना
यात्रा का पहला नाम डर दूसरा फकीरी!
बहुत दिनों से जाना चाहती हूँ यात्रा पर
लेकिन जा नहीं पा रही हूँ
एक हरे भरे मैदान में
तेज बहुत तेज गोल चक्कर काट रही हूँ
यात्रा के चक्र को पूरा करते
खुद को अधूरा छोड़ रही हूँ...

 

नींद और स्वप्न का चक्र

नींद के गुण दोष स्वप्न के गुण दोष हैं!
अनिद्रा की शिकार नहीं
फिर भी
नींद नहीं मेरे पास!
कहती है नींद
खुद के लिए जियो
स्वप्न कहते हैं
औरों के लिए जियो!
न जागती हूँ न रोती हूँ
नींद से भरी
स्वप्न की पगडंडी पर चलती हूँ...!

 

जीवन का चक्र

एकदम घुप्प अँधेरे में
चाक को चलते देखा
अँधेरा इतना ज्यादा
न कुम्हार दिखता न दिखता था आकार!

दुख ही सुख है
यही चक्र है जीवन का...!

 

तीसरा एस.एम.एस.

''राम मंदिर के अधिकार के लिए प्रार्थना करो
चौबीस सितंबर को कोर्ट का फैसला है
सभी हिंदू भाई से प्रार्थना की उम्मीद है...
इस मैसेज को आग की तरह फैला दो
जो हिंदू राम का नहीं वो किसी काम का नहीं
'जय श्री राम'...।''

''मुसलमानो सब्र करो
वह वक्त अब करीब है
जब बाबरी मस्जिद में
राम भी नमाज पढ़ेगा।
इस मैसेज को आगे के
मुसलमानों को फारवर्ड करो
अल्लाह उसका अजर तुम्हें देगा
अल्लाह हो अकबर... खुदा हाफिज।''

'' - ओ दीदी प्याज दो न
रोटी लेके आए हैं, सब्जी नईं हैं हमारे पास
यहीं पीछे वाली बिल्डिंग में काम कर रहे हैं
दो न, एक प्याज दो न।''
तीसरा एस.एम.एस. बनकर ठिठकी खड़ी है वो
क्या करूँ पहले इसे दूँ प्याज या
तीसरा एस.एम.एस. बनाकर कर दूँ फारवर्ड।

 

सड़क

आकाश के लिए नहीं है
नहीं है दीवारों के लिए
खिड़की से दिखती जरूर है लेकिन
खिड़की के लिए भी नहीं है सड़क!
पाँव से डामर को छुड़ाते
सोचते नहीं हम
सड़क पर चुभे अपने निशानों के बारे में
क्या सड़कें भी दर्द से कराहती हैं
जब सड़क पर अर्थी लिए चलते हैं लोग
झूमते बारातियों के संग
क्या झूमती हैं सड़कें भी
आदमी की हर यात्रा शुरू होती है सड़क से
गोल घुमावदार रास्ते
सावधान आगे अंधा मोड़ है
अंधा मोड़... मायने क्या उनसे पूछो
दर्ज हैं
जिन रास्तों और गाँवों के नाम रजिस्टर पर
सड़कें नहीं जातीं उन तक
जाते हैं सिर्फ धुआँ और कालिख
बदल जाते हैं जो आँकड़ों में
नक्शे में दौड़ती ये सड़कें कहीं नहीं पहुँचातीं
जन्मजात दुश्मनी है डामर और पानी में
सड़क सोने की खान है ठेकेदार के लिए

 

उलटबाँसी

तुम मेरा प्रथम प्रेम तो नहीं
लेकिन तुम्हारे प्रेम की व्याकुलता
प्रथम प्रेम की व्याकुलता सी है!
हर शाम तुम्हारी याद आती है
तुम्हारी याद को शाम
करेला और नीम चढ़ा बना देती है!
अगर पेड़ न होते तो जाने क्या होता
दगा तो सूर्य और चंद्रमा करते हैं
सूर्य अपनी लालिमा बिखेरकर
तुम्हारी याद में तपा देता है !
चाँद बजाय शीतलता देने के
ऐसे छिपता है जैसे छोटे शहरों के
प्रेमी युगल अपने प्रेम को छिपाते फिरते
मारे डर के एक दूसरे को राखी बाँध देते हैं!
यही उलटबाँसी चाँद की हर दिन चलती है
सबसे ज्यादा तब -
जब मुझे तम्हारी घनघोर याद आती है!

 

चिड़िया की आँख से

मैंने अपनी सारी जड़ें
धरती के भीतर से खींच लीं और
चिड़िया की तरह उड़ने लगी
मैं इस दुनिया को
चिड़िया की आँख से देखना चाहती हूँ...
कल रात चमकीली सुबह में
एक आतंकवादी मेरे सपने में आया
थोड़ा सा
गोला बारूद बचा हुआ था उसके पास
जिसे उसने एक कोने में रख दिया
अखबार और टी.वी. पर बम विस्फोट की
ह्दय विदारक तस्वीरें थीं
बाद भी इसके
उसके चेहरे पर ऐसा कोई भाव नहीं था
जो दहशत को जन्म देता
कॉफी का एक लंबा सा घूँट भरते बोला
अम्मी इस्लामाबाद में मेरा इंतजार कर रहीं होंगी
डरता हूँ कहीं उन्हें कुछ हो न जाए
या यह अखबार जिसमें मेरी फोटो छपी है
ए.के. 47 के संग
मेरी अम्मी के हाथ न लग जाए...!
आतंकवादी और उसकी माँ इस्लामाबाद में मिले
दिल्ली कलकत्ता मुंबई मद्रास या
किसी और शहर में क्यों नहीं
देखना चाहती हूँ
धरती पर छायी भितरघात
चिड़िया की आँख से...
बर्फीली तीखी हवा चारों ओर सरसराहट
धरती की हर एक चीज
कानून और व्यवस्था की प्रतीक इमारतें
अपनी जगह से सरकने लगीं
कब्रिस्तान की कब्रें अपनी जगह से उठ
घेरने लगीं इमारतों को न्याय की गुहार में
श्मशान घाट की राख ने
आकाश को
एक धूल भरे जुलूस में बदल दिया
आकाश में बस जाना चाहती थी धरती
चाँद तारे आकाश और पक्षी
इसके लिए राजी न हुए
समूची धरती हवा में
कटी पतंग की तरह बल खाने लगी
ताबड़-तोड़ पानी
भारी भरकम बूटों की आवाज
पुलिस ने आतंकवादी को नहीं
मुझे भी नहीं
मेरे सपने को गिरफ्तार कर लिया
मैं इस दुनिया को
चिड़िया की आँख से देखना चाहती हूँ...

 


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