सावरकर समग्र
खंड - 4
स्वातंत्र्यवीर
विनायक दामोदर सावरकर
प्रभात प्रकाशन,दिल्ली
आभार • स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक
२५२ स्वातंत्र्यवीर सावरकर मार्ग
शिवाजी उद्यान, दादर, मुंबई-२८
प्रकाशक • प्रभात प्रकाशन
४/१९ आसफ अली रोड
नई दिल्ली-११०००२
संस्करण • २००४
© सौ. हिमानी सावरकर
मूल्य • पाँच सौ रुपए प्रति खंड
पाँच हजार रुपए (दस खंडों का सैट)
मुद्रक • गिर्राज प्रिंटर्स, दिल्ली
SAVARKAR SAMAGRA (Complete Works of Vinayak Damodar
Savarkar)
Published by Prabhat Prakashan, 4/19 Asaf Ali Road, New Delhi-2
Vol. III Rs. 500.00
ISBN 81-7315-323-X Set of Ten Vols. Rs. 5000.00
ISBN 81-7315-331-0
विनायक दामोदर सावरकर : संक्षिप्त जीवन परिचय
श्री विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी तथा अग्रणी
नक्षत्र थे। 'वीर सावरकर' शब्द साहस, वीरता, देशभक्ति का पर्यायवाची बन गया
है। 'वीर सावरकर' शब्द के स्मरण करते ही अनुपम त्याग, अदम्य साहस, महान्
वीरता, एक उत्कट देशभक्ति से ओतप्रोत इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हमारे सामने
साकार होकर खुल पड़ते हैं।
वीर सावरकर न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु वह एक
महान् क्रांतिकारी, चिंतक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा
दूरदर्शी राजनेता भी थे। वह एक ऐसे इतिहासकार भी थे जिन्होंने हिंदू राष्ट्र
की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढंग से लिपिबद्ध किया तो '१८५७ के प्रथम
स्वातंत्र्य समर' का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला
डाला था।
इस महान् क्रांतिपुंज का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के ग्राम भगूर में
चितपावन वशीय ब्राह्मण श्री दामोदर सावरकर के घर २८ मई, १८८३ को हुआ था। गाँव
के स्कूल में ही पाँचवीं तक पढ़ने के बाद विनायक आगे पढ़ने के लिए नासिक चले
गए।
लोकमान्य तिलक द्वारा संचालित 'केसरी' पत्र की उन दिनों भारी धूम थी।
'केसरी' में प्रकाशित लेखों को पढ़कर विनायक के हृदय में राष्ट्रभक्ति की
भावनाएँ हिलोरें लेने लगीं। लेखों, संपादकीयों व कविताओं को पढ़कर उन्होंने
जाना कि भारत को दासता के चंगुल में रखकर अंग्रेज किस प्रकार भारत का शोषण कर
रहे हैं। वीर सावरकर ने कविताएँ तथा लेख लिखने शुरू कर दिए। उनकी रचनाएँ मराठी
पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होने लगीं। 'काल' के संपादक श्री परांजपे
ने अपने पत्र में सावरकर की कुछ रचनाएँ प्रकाशित की, जिन्होंने तहलका मचा
दिया।
सन् १९०५ में सावरकर बी.ए. के छात्र थे। उन्होंने एक लेख में विदेशी वस्तुओं
के बहिष्कार का आह्वान किया। इसके बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर
विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का कार्यक्रम बनाया। लोकमान्य तिलक इस कार्य के
लिए आशीर्वाद देने उपस्थित हुए।
सावरकर की योजना थी कि किसी प्रकार विदेश जाकर बम आदि बनाने सीखे जाएँ तथा
शस्त्रास्त्र प्राप्त किए जाएँ। तभी श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सावरकर को
छात्रवृत्ति देने की घोषणा कर दी। ९ जून, १९०६ को सावरकर इंग्लैंड के रवाना
हो गए। वह लंदन में 'इंडिया हाउस' में ठहरे। उन्होंने वहाँ पहुँचते ही अपनी
विचारधारा के भारतीय युवकों को एकत्रित करना शुरू कर दिया। उन्होंने 'फ्री
इंडिया सोसाइटी' की स्थापना की।
सावरकर इंडिया हाउस' में रहते हुए लेख व कविताएँ लिखते रहे। वह गुप्त रूप से
बम बनाने की विधि का अध्ययन व प्रयोग भी करते रहे। उन्होंने इटली के महान्
देशभक्त मैझिनी का जीवन-चरित्र लिखा। उसका मराठी अनुवाद भारत में छपा तो एक
बार तो तहलका ही मच गया था।
१९०७ में सावरकर ने अंग्रेजों के गढ़ लंदन में १८५७ की अर्द्धशती मनाने का
व्यापक कार्यक्रम बनाया। १० मई, १९०७ को 'इंडिया हाउस' में सन् १८५७ की
क्रांति की स्वर्ण जयंती का आयोजन किया गया। भवन को तोरण-द्वारों से सजाया
गया। मंच पर मंगल पांडे, लक्ष्मीबाई, वीर कुँवरसिंह, तात्या टोपे, बहादुरशाह
जफर, नानाजी पेशवा आदि भारतीय शहीदों के चित्र थे। भारतीय युवक सीने व बाँहों
पर शहीदों के चित्रों के बिल्ले लगाए हुए थे। उनपर अंकित था - '१८५७ के वीर
अमर रहें'। इस समारोह में कई सौ भारतीयों ने भाग लेकर १८५७ के
स्वाधीनता-संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। राष्ट्रीय गान के बाद
वीर सावरकर का ओजस्वी भाषण हुआ, जिसमें उन्होंने सप्रमाण सिद्ध किया कि १८५७
में 'गदर' नहीं अपित भारत की स्वाधीनता का प्रथम महान संग्राम हआ था।
सावरकर ने १९०७ में '१८५७ का प्रथम स्वातंत्र्य समर' ग्रंथ लिखना शुरू किया।
इंडिया हाउस के पुस्तकालय में बैठकर वह विभिन्न दस्तावेजों व ग्रंथों का अध्ययन
करने लगे। उन्होंने लगभग डेढ़ हजार ग्रंथों के गहन अध्ययन के बाद इसे लिखना
शुरू किया।
ग्रंथ की पांडुलिपि किसी प्रकार गुप्त रूप से भारत पहुँचा दी गई। महाराष्ट्र
में इसे प्रकाशित करने की योजना बनाई गई। 'स्वराज्य' पत्र के संपादक ने इसे
प्रकाशित करने का निर्णय लिया; किंतु पुलिस ने प्रेस पर छापा मारकर योजना में
बाधा डाल दी। ग्रंथ की पांडुलिपि गुप्त रूप से पेरिस भेज दी गई। वहाँ इसे
प्रकाशित कराने का प्रयास किया गया; किंतु ब्रिटिश गुप्तचर वहाँ भी पहुंच गए
और ग्रंथ को प्रकाशित न होने दिया गया। ग्रंथ के प्रकाशित होने से पूर्व ही
उसपर प्रतिबंध लगा दिया गया। अंतत: १९०९ में ग्रंथ फ्रांस से प्रकाशित हो, ही
गया।
ब्रिटिश सरकार तीनों सावरकर बंधुओं को 'राजद्रोही' व खतरनाक घोषित कर चुकी
थी। सावरकर इंग्लैंड से पेरिस चले गए। पेरिस में उन्हें अपने साथी याद आते। वह
सोचते कि उनके संकट में रहते उनका यहाँ सुरक्षित रहना उचित नहीं है। अंततः वह
इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए।
१३ मार्च, १९१० को लंदन के रेलवे स्टेशन पर पहुँचते ही सावरकर को बंदी बना
लिया गया और ब्रिक्स्टन जेल में बंद कर दिया गया। उनपर लंदन की अदालत में
मुकदमा शुरू हुआ। न्यायाधीश ने २२ मई को निर्णय दिया कि क्योंकि सावरकर पर
भारत में भी कई मुकदमे हैं, अतः उन्हें भारत ले जाकर वहीं मुकदमा चलाया जाए।
अंततः २९ जून को सावरकर को भारत भेजने का आदेश जारी कर दिया गया।
१ जुलाई, १९०९ को 'मोरिया' जलयान से सावरकर को कड़े पहरे में भारत रवाना
किया गया। ब्रिटिश सरकार को भनक लग गई थी कि सावरकर को रास्ते में छुड़ाने का
प्रयास किया जा सकता है। अतः सुरक्षा प्रबंध बहुत कड़े किए गए। ८ जुलाई को
जलयान मार्सेल बंदरगाह के निकट पहुँचने ही वाला था कि सावरकर शौच जाने के
बहाने पाखाने में जा घुसे। फुरती के साथ उछलकर वह पोर्ट हॉल तक पहुँचे और
समुद्र में कूद पड़े।
अधिकारियों को जैसे ही उनके समुद्र में कूद जाने की भनक लगी कि अंग्रेज अफसरों
के छक्के छूट गए। उन्होंने समुद्र की लहरें चीरकर तैरते हुए सावरकर पर गोलियों
की बौछार शुरू कर दी। सावरकर सागर की छाती चीरते हुए फ्रांस के तट की ओर बढ़ने
लगे। कुछ ही देर में वह तट तक पहुँचने में सफल हो गए किंतु उन्हें पुनः बंदी
बना लिया गया।
१५ सितंबर, १९१० को सावरकर पर मुकदमा शुरू हुआ। सावरकर ने स्पष्ट कहा कि भारत
के न्यायालय से उन्हें न्याय की किंचित् भी आशा नहीं है, अतः वह अपना बयान
देना व्यर्थ समझते हैं।
२३ दिसंबर को अदालत ने उन्हें ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र रचने, बम
बनाने तथा रिवॉल्वर आदि शस्त्रास्त्र भारत भेजने आदि आरोपों में आजन्म कारावास
की सजा सुना दी। उनकी तमाम संपत्ति भी जब्त कर ली गई।
२३ जनवरी, १९११ को उनके विरुद्ध दूसरे मामले की सुनवाई शुरू हुई। ३० जनवरी को
पुनः आजन्म कारावास की सजा सुना दी गई। इस प्रकार सावरकर को दो आजन्म
कारावासों का दंड दे दिया गया। सावरकर को जब अंग्रेज न्यायाधीश ने दो आजन्म
कारावासों का दंड सुनाया तो उन्होंने हँसते हुए कहा, 'मुझे बहुत प्रसन्नता है
कि ईसाई (ब्रिटिश) सरकार ने मुझे दो जीवनों का कारावास दंड देकर पुनर्जन्म के
हिंदू सिद्धांत को मान लिया है।'
कुछ माह बाद महाराजा नामक जलयान से सावरकर को अंदमान भेज दिया गया। अंदमान में
उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी जाती थीं। कोल्हू में बैल की जगह जोतकर तेल पिरवाया
जाता था, मूँज कुटवाई जाती थी। राजनीतिक बंदियों पर वहाँ किस प्रकार अमानवीय
अत्याचार ढाए जाते थे, इसका रोमांचकारी वर्णन सावरकरजी ने अपनी पुस्तक मेरा
आजीवन कारावास में किया है।
सावरकरजी ने अंदमान में कारावास के दौरान अनुभव किया कि मुसलमान वॉर्डर हिंदू
बंदियों को यातनाएँ देकर उनका धर्म-परिवर्तन करने का कुचक्र रचते हैं।
उन्होंने इस अन्यायपूर्ण धर्म-परिवर्तन का डटकर विरोध किया तथा बलात् मुसलिम
बनाए गए अनेक बंदियों को हिंदू धर्म में दीक्षित करने में सफलता प्राप्त की।
उन्होंने अंदमान की कालकोठरी में कविताएँ लिखीं। 'कमला', 'गोमांतक' तथा
'विरहोच्छ्वास' जैसी रचनाएँ उन्होंने जेल की यातनाओं से हुई अनुभूति के
वातावरण में ही लिखी थीं। उन्होंने 'मृत्यु' को संबोधित करते हुए जो कविता
लिखी वह अत्यंत मार्मिक व देशभक्ति से पूर्ण थी।
सावरकरजी ने अंदमान कारागार में होनेवाले अमानवीय अत्याचारों की सूचना किसी
प्रकार भारत के समाचारपत्रों में प्रकाशित कराने में सफलता प्राप्त कर ली।
इससे पूरे देश में इन अत्याचारों के विरोध में प्रबल आवाज उठी। अंत में दस
वर्ष बाद १९२१ में सावरकरजी को बंबई लाकर नजरबंद रखने का निर्णय किया गया।
उन्हें महाराष्ट्र के रत्नागिरी स्थान में नजरबंदी में रखने के आदेश हुए।
'हिंदुत्व', 'हिंदू पदपादशाही', 'उ:श्राप', 'उत्तरक्रिया', 'संन्यस्त खड्ग'
आदि ग्रंथ उन्होंने रत्नागिरी में ही लिखे।
१० मई, १९३७ को सावरकरजी की नजरबंदी रद्द की गई।
नजरबंदी से मुक्त होते ही सावरकरजी का भव्य स्वागत किया गया। अनेक नेताओं ने
उन्हें कांग्रेस में शामिल करने का प्रयास किया; किंतु उन्होंने स्पष्ट कह
दिया, 'कांग्रेस की मुसलिम तुष्टीकरण की नीति पर मेरे तीव्र मतभेद हैं। मैं
हिंदू महासभा का ही नेतृत्व करूँगा।'
३० दिसंबर, १९३७ को अहमदाबाद में आयोजित अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अधिवेशन
में सावरकरजी सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने 'हिंदू' की
सर्वश्रेष्ठ व मान्य परिभाषा की। हिंदू महासभा के मंच से सावरकरजी ने 'राजनीति
का हिंदूकरण और हिंदू सैनिकीकरण' का नारा दिया। उन्होंने हिंदू युवकों को
अधिक-से-अधिक संख्या में सेना में भरती होने की प्रेरणा दी। उन्होंने तर्क
दिया, 'भारतीय सेना के हिंदू सैनिकों पर ही इस देश की रक्षा का भार आएगा, अतः
उन्हें आधुनिकतम सैन्य विज्ञान की शिक्षा दी जानी जरूरी है।'
२६ फरवरी, १९६६ को भारतीय इतिहास के इस अलौकिक महापुरुष ने इस संसार से विदा
ले ली। अपनी अंतिम वसीयत में भी उन्होंने हिंदू संगठन व सैनिकीकरण के महत्त्व,
शुद्धि की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। भारत को पुन: अखंड बनाए जाने की उनकी
आकांक्षा रही।
ऐसे वीर पुरुष का व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी हमारे लिए पथ-प्रदर्शक का काम
करने में सक्षम है।
-शिवकुमार गोयल
सावरकर समग्र
प्रथम खंड
पूर्व पीठिका, भगूर, नाशिक
शत्रु के शिविर में
लंदन से लिखे पत्र
द्वितीय खंड
मेरा आजीवन कारावास
अंदमान की कालकोठरी से
गांधी वध निवेदन
आत्महत्या या आत्मार्पण
अंतिम इच्छा पत्र
तृतीय खंड
काला पानी
मुझे उससे क्या? अर्थात् मोपला कांड
अंधश्रद्धा निर्मूलक कथाएँ
चतुर्थ खंड
उ:शाप
बोधिवृक्ष
संन्यस्त खड्ग
उत्तरक्रिया
प्राचीन अर्वाचीन महिला
गरमागरम चिवड़ा
गांधी गोंधल
पंचम खंड
१८५७ का स्वातंत्र्य समर
रणदुंदुभि
तेजस्वी तारे
षष्टम खंड
छह स्वर्णिम पृष्ठ
हिंदू पदपादशाही
सप्तम खंड
जातिभंजक निबंध
सामाजिक भाषण
विज्ञाननिष्ठ निबंध
अष्टम खंड
मैझिनी चरित्र
विदेश में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
क्षकिरणे
ऐतिहासिक निवेदन
अभिनव भारत संबंधी भाषण
नवम खंड
हिंदुत्व हिंदुत्व का प्राण
नेपाली आंदोलन
लिपि सुधार आंदोलन
हिंदू राष्ट्रदर्शन
दशम खंड
कविताएँ
भाषा-शुद्धि लेख
विविध लेख
अनुवाद :
प्रो. निशिकांत मिरजकर, डॉ. ललिता मिरजकर,
डॉ. हेमा जावडेकर, श्री वामन राव पाठक, श्री काशीनाथ जोशी,
श्री शरद दामोदर महाजन, श्री माधव साठे, सौ. कुसुम तांबे,
सौ. सुनीता कुट्टी, सौ. प्रणोति उपासने
संपादन :
प्रो. निशिकांत मिरजकर, डॉ. श्याम बहादुर वर्मा,
श्री रामेश्वर मिश्र 'पंकज', श्री जगदीश उपासने,
श्री काशीनाथ जोशी, श्री धृतिवर्धन गुप्त, श्री अशोक कौशिक
मार्गदर्शन :
श्री त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी, डॉ. हरींद्र श्रीवास्तव,
श्री शिवकुमार गोयल
अनुक्रम
नाटक
१. संगीत उ:श्राप
२. बोधिवृक्ष
३. संगीत संन्यस्त खड्ग
४. संगीत उत्तरक्रिया
प्राचीन-अर्वाचीन महिलाएँ
१. मनुस्मृति में महिलाएँ
२. प्राचीन यहूदी योषिता
३. रूस में विवाह-विच्छेद स्वतंत्रता का प्रयोग
४. ललना-लावण्य की लाभ-हानि
५. विश्व की वर्तमान महान् महिलाओं में से तीन
गरमागरम चिउड़ा
१. मोहम्मद अली तथा हसन निजामी की लतियाई
२. पत्वाखाली के सत्याग्रह को आठ महीने हो गए
३. शाहाबाद के मुसलमानों की हिंदू होने की धमकी
४. मसजिद के निकट हिंदू बाजा बजाएँ मऊ के मुसलमानों का ढोंग
५. धमकी भरे पत्र
६. नील के पुतले के घोड़े की टाँग तोड़ दी!
७. हाथ लगे चार प्रमाणपत्र
८. मसजिद गिराई-महाराज भरतपुर को गद्दी से उतारो
९. शुद्धि के नाम पर गोमंतक में राजनीतिक आंदोलन-टाइम्स की खोज
१०. तुर्की कन्याओं को अमेरिकी स्कूल में मत भेजो
११. निजाम के समर्थक मुसलमान
१२. 'संपूर्ण राजनीतिक स्वाधीनता' इन शब्दों से संतप्त गांधीजी एवं
अंग्रेज
१३. अंदमान में हुतात्माओं की मृत्यु क्यों नहीं हुई?
१४. राष्ट्रीय सभा से अधिक सर्वपक्षीय सभा महान्
१५. लालाजी पर लाठी प्रहार
१६. काशी में मर्कट महासम्मेलन और ठूँठ महासम्मेलन
१७. बंबई का दंगा-फसाद
१८. नेपाल का प्रस्तर-प्रासाद और सैयद अहमद का काँच-घर
१९. हुतात्मा राजपाल और महात्मा गांधी
२०. शंकराचार्य महाराज तथा जॉन बुल महाराज की सूचना
२१. सर टेगार्ट के डंडे के विरोध में चिटगाँव का प्रतिडंडा
२२. यह प्रतिशोध की बला अथवा हत्या की बला
गांधी आपाधापी
१. स्वतंत्रता का मार्ग
२. गांधीजी और भोले-भाले हिंदू लोग
३. कौन सा धर्म शांतिप्रधान है?
४. ब्रिटिशों के समर्थक
५. वाइसराय के साथ भोजन करता हुआ असहयोग
६. साबरमती का श्रमण
७. स्वतंत्रता का विरोध
८. दे दान छूटे ग्रहण
९. अत्याचार शब्द का अर्थ
१०. स्वतंत्र भारत का सम्राट् कौन है ?
११. घोंघी भगवती
१२. अहिंसात्मक भंडविधान
१३. कथनी और करनी
१४. पर शुद्धि नहीं मरेगी
१५. श्रद्धानंद की हत्या और गांधीजी का निष्पक्ष पक्षपात
नाटक
संगीत उ:श्राप
पात्र परिचय
संत चोखा
किशन
शंकर
कमलिनी
नारंभट
इब्राहिम
देवी सिंह
गंगा
चंपा
परिचय
रत्नागिरि में स्थानबद्ध रहते समाज सुधारक श्री विनायक दामोदर सावरकरजी ने यह
'संगीत उ:श्राप' नाटक सन् १९२७ में लिखा था। इस नाटक में अछूतोद्धार, हिंदुओं
का इसलामीकरण, अछूत हिंदुओं का धर्माभिमान आदि प्रश्न प्रभावशाली ढंग से उठाए
गए हैं।
यह वह समय था जब सावरकरजी पर प्रत्यक्ष राजनीति में भाग लेने पर प्रतिबंध तो
था ही, बिना अनुमति के रत्नागिरि से बाहर जाना भी प्रतिबंधित था। अतः अपने
विचारों का भारत भर में प्रचार करने के उद्देश्य से सावरकरजी ने यह नाटक लिखा।
जो कार्य सैकड़ों भाषण देने से नहीं हो सकता है, वह मात्र एक प्रभावशाली नाटक
द्वारा आसानी से हो सकता है, ऐसा सावरकरजी ने नासिक के एक भाषण में कहा था।
उसीके अनुसार उन्होंने अपने विचारों के प्रचार हेतु 'उ:श्राप', 'संन्यस्त
खड्ग' और 'उत्तरक्रिया' इन तीन नाटकों की रचना की। भगवान् बुद्ध की जीवनी पर
भी उन्होंने एक आधा-अधूरा नाटक लिख रखा था, जिसका नाम था-'बोधिवृक्ष'। उसके
दो-एक अंक उस समय के 'मौज' साप्ताहिक में प्रकाशित हुए थे। संभावना है कि यह
आधा-अधूरा नाटक ही उनका नाट्य लेखन का प्रथम प्रयास हो।
प्रस्तुत नाटक में संत चोखामेला, उसका शिष्य किशन, उसकी बहन कमलिनी और उसका
प्रियतम शंकर प्रमुख पात्र हैं। अछूतों को बार-बार हर जगह अपमानित किया जाना
शंकर के लिए असह्य हो जाता है और वह मुसलमान बन जाता है। मुसलमान बनने से क्या
लाभ हैं, वह किशन को भी समझाने की कोशिश करता है, किंतु किशन उसके सुझाव को
तीव्रतापूर्वक नकारते हुए कहता है कि 'छोटा-मोटा पटेल जैसा पद तो क्या, यदि
दिल्ली की सलतनत भी प्रदान की गई तो मैं हिंदू धर्म नहीं छोड़नेवाला।' उसकी
बहन कमलिनी भी कहती है कि मैंने शंकर को विवाह का वचन दिया था, धर्मांतरित
सिकंदर को नहीं। उसका अपहरण करने का प्रयत्न करनेवाले एक मुसलमान सरदार को वह
प्रेम का नाटक करते हुए आलिंगन देती है तथा छुरा भोंककर उसकी हत्या करती है। उस
समय 'यह है बदले का प्रथक प्रहार' जैसे शब्दों में प्रकट हुआ विचार मननीय तथा
पठनीय है (देखिए अंक-५)।
इस नाटक को मंचन की अनुमति मिलना मुश्किल था, परंतु किसी तरह वह प्राप्त कर
इसका पहला मंचन ९ अप्रैल, १९२७ को 'नाट्य प्रसारक' के संचालक लेले बंधुओं ने
रत्नागिरि में किया था। अनुमति का खेल धूप-छाँव सा होता रहा। जून १९२७ में
सरकार द्वारा यह नाटक प्रतिबंधित किया गया।
आधुनिक मंच पर नाटक की यथावत् प्रस्तुति मुश्किल काम है। आधुनिक दृष्टि से यदि
इसकी पुनः रंगावृत्ति तैयार की गई या कुछ प्रवेश अंकित किए गए तो वे आज भी
प्रभावशाली सिद्ध होंगे।
-बालाराव सावरकर
पहला अंक
: पहला दृश्य :
[सूत्रधार,नटी,परिपार्श्वक खड़े हैं
।]
नांदी : हे प्रभु उ:श्राप, हिंदुओं के आज
अमित हैं अपराध, पर करो तुम माफ!!
पतित पावन नाथ, दो कृपा का दान
कुल-गुरु-तप का, सार्थ कर दो मान!!
पय यशोदा का स्मरण करो, और यमुना गान
स्वकुल की गरिमा रखो, हे शुभंकर प्राण!!
मंगलाचरण
आचरण अद्भुत किया था,
आज तक चरितार्थ जिसने।
नाट्य है अनुपम अनोखा,
आज हम साकार करते।
पात्र हैं सब भिन्न फिर भी,
हैं सभी संतान उसकी।
लेखनी धारक विनायक,
सृजनकर्ता विश्वव्यापी!!
सत्यप्रिय : (परदे के अंदर से) ठहरो, रुको।
सूत्रधार : मंगलाचरण समाप्त होते-न-होते ही हमें रुकने का
आदेश देता हुआ यह कौन इधर आ रहा है ?
नटी : नाथ! विनायक नाम सुनते ही शायद कोई
अफसर नाटक बंद कराने के लिए इधर आ रहा है, मुझे ऐसा डर लग रहा है! यह नाट्य
कृति विनायक की है, यह घोषणा क्यों कर दी आपने? आक्षेपों के प्रबल शापों के
वज्राघात से उनकी लेखनी, देवकी के दीप्तिमान् शिशुओं जैसी करुणास्पद बन गई है।
देवकी के दीप्तिमान् शिशु जैसे जन्म लेते ही मौत के विकराल जबड़े में फेंक दिए
जाते रहे, वैसी ही स्थिति विनायक की लेखनी की भी अभी तक होती आई है। संजोग,
मानो कालपुरुष-सा उन्हें निर्मित होते ही विस्मृति के गर्त में गाड़ता आया है।
सत्यप्रिय : (अंदर से ही) ठहरो! ठहरो !!
परिपार्श्वक : अरे बाप रे! सरकारी अधिकारी ही है !! अब कहाँ
जाऊँ? हे सूत्रधार, बड़े-बड़े ख्यातिलब्ध प्रतिभासंपन्नों को छोड़ इस
नौसिखिए-नाटककार से हमारा गठबंधन करने की आत्मघाती दुर्बुद्धि तुम्हें क्योंकर
आई? भाई सूत्रधारजी, अपने इस नाटक का ही सूत्र नहीं, बल्कि उस नटी का
मंगलसूत्र भी सत्ताधीशों की कैंची में फँस गया सा दिखता है।
सूत्रधार : घबराओ नहीं, मेरा मंगलाचरण
समस्त श्रापों का साक्षात् उ:श्राप है। मुझे विश्वास है कि वह
दयानिधान इस मंगलाचरण के उ:श्राप से संतुष्ट होकर विनायक की कलम पर लगे शाप को
भी अगस्ति मंत्र से हीन-दीन कर दिए गए साँप की भाँति प्रभावहीन कर देगा।
सत्यप्रिय : रुकिए, रुकिए! (मंच पर आकर) आप लोग कौन
हैं? क्या आप ही नाटक खेलनेवाले हैं?
पार्श्वचर : जी मैं नहीं। ये पुरुष और
महिला। मैं मात्र निरीक्षक के रूप में आ गया था।
सत्यप्रिय : निरीक्षक के रूप में ! यदि नाटक खेलना अपराध है
तो उसे रुचि से देखने का अभिप्राय अपराध
को प्रोत्साहन देना ही तो होगा?
पार्श्वचर : सरकार ! मैं पाँव पड़ता हूँ। मैं जाता हूँ।
सरकारी अधिकारियों का सम्मान करने में ही मैं उनके सामने हमेशा बेंत की तरह
काँपता हूँ।
सत्यप्रिय : पर मैं न सरकार हूँ और न सरकारी
अधिकारी। उस लोकोपयुक्त संस्था से मेरा सिद्धांतत: कोई वैर भी नहीं है। अत: आप
मुझसे डरें नहीं।
पार्श्वचर : (खड़े होकर) सरकारी अधिकारी नहीं हो न?
फिर तुम कोई भी हो? प्रत्यक्ष भगवान् क्यों न हो? मैं तुमसे नहीं डरता।
ऐरे-गैरे से डरनेवाला डरपोक मैं नहीं हूँ। समझे! बोलो!! तुमने क्योंकर हमारे
रंग में भंग किया?
सूत्रधार : (पार्श्वचर को डाँटते हुए) देखिए, इसे
छोड़िए। मैं इस नाटक का सूत्रधार हूँ। क्या आप भी मेरे इस नाट्य-प्रयोग का
अवलोकन कर मुझे उपकृत करेंगे? क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ?
सत्यप्रिय : मैं सत्यप्रिय हूँ। पूर्व में संत चोखामेला के
काल में सत्यवान नाम के एक प्रख्यात धर्मप्रवर्तक हो गए हैं, मैं उनके पंथ
का अनुयायी हूँ। हमारे गुरुदेव ने कहा था कि सत्य ही धर्म है। सत्य ही हमारा
वेद है। अतः उस पंथ को सत्यवेदी कहा जाता है, लोग उपहास में हमें सतपागल भी
कहते हैं।
सूत्रधार : वाह ! आज के हमारे नाट्य-प्रयोग को आप जैसा
सत्यप्रिय दर्शक मिलना हमारा अहोभाग्य है। आपके गुरुदेव सत्यवान संत चोखा
महाराज के समकालीन हैं। अत: उनसे जुड़ी इस कथावस्तु में आपको अपने गुरुदेव के
भी दर्शन होंगे।
सत्यप्रिय : कैसी बात करते हो! अजी, जैसे मदिरापान की आदत
विपत्ति या आपत्ति से, जैसे विषयलोलुपता सुंदरता से गृहस्थी के जंजाल में
फँसाने जैसी माया लगती है, वैसे ही असत्य की चाह बढ़ाने का काम यह नाट्य-कला
करती है। मैं उसका निरीक्षण करने नहीं, मैं तो उसका निर्दलन करने आया हूँ।
सूत्रधार : पर यह राजनीतिक या श्रृंगार भरा नाटक नहीं है।
संत से संबंधित नाटक भी वास्तविक जीवन के लिए किस तरह घातक होते हैं- यह तो आप
ही जान सकते हैं।
सत्यप्रिय : नाटक का कथ्य राजनीतिक है या नहीं, उसपर उसकी
घातकता निर्भर नहीं रहती। केवल कथानक ही नहीं, समूची नाट्य-कला ही वेश्या की
भाँति असत्य का भंडार है। अपना मूल रूप छिपाकर दूसरा ही कोई व्यक्तित्व साकार
करना क्या धोखेबाजी नहीं है? और फिर आप केवल रूपांतर ही नहीं करते, लिंगांतर
भी आभासित करते हैं। मात्र आभास ही नहीं करते बल्कि शपथपूर्वक वही व्यक्ति होने
का दावा करते हुए मंच पर आरूढ़ होते हैं, क्योंकि आप लोग मानते हैं कि सबसे
श्रेष्ठ अभिनेता वही है जो खुद को भूलकर अपनी भूमिका से तादात्म्य हो सके।
अपने आपको पूर्णतः भुलाकर जीवित होते हुए भी दस बार इस प्रकार मरना कि दर्शकों
की आँखों से आँसू झरने लगें। दिन में पुरुष तो रात्रि में स्त्री पात्र बनकर
इतना हू-ब-हू अभिनय करना कि दर्शक भी आजीवन उसके यथार्थ को बता न पाएँ। घने
अँधेरे में यह कहना कि कड़ी धूप में मेरे पैर जले जा रहे हैं। मात्र अंगुली
गड़ाने से छेद हो जाए, परदे पर चित्रित इस तरह के किले पर तोपें दागने की
आज्ञा देते हैं। इस अत्यंत निंदनीय झूठ के पुलिंदे पर लोगों को शर्म भी नहीं
महसूस होती। यदि मेरे हाथों में शासन होता तो मैंने सभी अभिनेताओं को कड़ा दंड
दे दिया होता।
पार्श्वचर : (स्वगत) फिर से दंड! मुझे अभी भी यही
लगता है कि हो न हो यह छद्म वेशधारी कोई-न-कोई अधिकारी ही है। अतः दो शब्द
उसके अनुकूल प्रकट करना ही श्रेयस्कर होगा। जरूरत पड़ी तो इन दो शब्दों से
सँकरी गली से बच निकलना आसान होगा। (प्रकट) हे सत्यप्रियजी, आपके
दंड की बात करने के पहले ही मैं बताने लगा था कि आपके कथन में कुछ तथ्य तो
अवश्य है। अब खरडा गाँव की लड़ाई की बात ही लें। उक्त लड़ाई में सदाशिव भाऊ
पेशवा औरंगजेब द्वारा मारा गया, यह इतिहासकारों को ज्ञात है। फिर भी उसकी मौत
के पश्चात् भी स्वयं को 'सदाशिव भाऊ' कहलानेवाला नकलची 'सदाशिव भाऊ' प्रकट
हुआ था न? उस असत्य कथन के अपराध के लिए ऊँट पर उलटा बाँधकर हथियार से उसका
सिर फोड़ा गया था। उस सत्य युग में असत्य के प्रति इतनी तीव्र प्रतिक्रिया
होती थी, पर अब तो घोर कलयुग है, कलयुग!! अब सीने पर हाथ रखकर अपने आपको
सदाशिवराव भाऊ कहलानेवाले नकलची, रंगमंच पर इतमीनान से घूमते दिखते हैं।
'पानीपत का मुकाबला' 'पानीपत की देन' के अंतर्गत तीन लाख सैनिकों की
लड़ाइयाँ छोटे से रंगमंच पर साकार करते रहते हैं लोग। अब सिर फोड़ने की सजा तो
छोड़िए, अब लोग चार-चार रुपए खर्च कर तालियों की ध्वनि से उनका सम्मान करते
हैं। पेशवाशाही समाप्त हो गई, यह ठीक ही हुआ, अन्यथा इन नकली सदाशिव भाऊ में
से एक अत्यंत साहसी अभिनेता गनपति राव जोशी, पेशवा तख्त पर अपना अधिकार जताने
पुणे पर धावा भी बोल देता और ये दर्शक 'हर-हर महादेव' की गर्जना करने उसकी
सेना में अपने हाथ की छड़ियों को तलवार मानकर शामिल हो जाते।
सूत्रधार : सत्यप्रिय, वाचिक सत्य ही श्रेष्ठ सत्य है, यह
तुम्हारी परिभाषा मुझे संदेहास्पद लगती है। समाज को मंगलकारी उपदेश की ओर ले
जानेवाली नाट्य-कला यदि सद्भाव से परिपूर्ण हो तो वह एक उपयुक्त साधन है। ऐसी
मेरी मान्यता है। अतः मैं क्षमा चाहूँगा।
सत्यप्रिय : कैसी क्षमा? अरे सूत्रधार, आपके नाम से ही सब
झूठ का पुलिंदा है। कह रहे हैं अपने को सूत्रधार! अरे, कम-से-कम उतनी देर अपने
हाथ में सूत्र भी पकड़ा करो! मिथ्याचरण थोड़ा-बहुत टल जाएगा, फिर भले ही बल
से आप कुछ भी करें, पर मैं तो आपके नाटक को मंचन की अनुमति न दूंगा।
पार्श्वचर : हमें पहले ही सरकार से अनुमति मिल गई है। अब
हमें तुम्हारे सत्य की अनुमति की परवाह नहीं है, समझे!
नटी :परंतु प्राणनाथ, देखिए, अभिनय करने
हेतु लड़कियाँ सज-धजकर आ रही हैं। मायापुर गाँव की पिछड़ी बस्ती में लगाई
फुलवारी से वे फूल तोड़कर ला रही हैं। अतः अब हमें शीघ्रता से मंच सज्जा करने
में संलग्न हो जाना चाहिए। (जाते हैं)
: दूसरा दृश्य :
[स्थान : मायापुर की पिछड़ी बस्ती,चंपा और सखू बातचीत
करती आती हैं। ]
सखू : चंपा, यह कमलिनी की फुलवारी अब किसी नंदन वन-सी दिखने
लगी है, है न? जब मोगरे या हरसिंगार में बहार आती है तो उसकी सुगंध से यह
गंदी बस्ती महक उठती है। इस बस्ती के बीचोबीच रहनेवाले अपने मुखिया नायक
'जानबा' द्वारा अपने दो बच्चों- किशन एवं कमलिनी-हेतु निर्मित तुलसी वृंदावन
में तो यह सुगंध चरम सीमा पर प्रतीत होती है। वहाँ थोड़ी देर रुकने से भी ऐसा
लगने लगता है मानो हम नवरात्रियों में किसी मंदिर के सामने खड़े हों। मंदिर के
गर्भगृह में ऐसी ही गंधमय पवित्रता होगी-है न?
चंपा : वह मैं कैसे बता सकूँगी? हम तो अछूतों की कन्याएँ
हैं। मंदिर की चारदीवारी तक ही हमारी पहुँच है। फिर भला मैं कैसे बताऊँ
गर्भगृह की पवित्रता के बारे में? हाँ, इतना अवश्य जानती हूँ कि अपने नायक
'जानबा' को संत चोखा महाराज की प्रसाद प्राप्ति के पश्चात् उन्होंने दिन-रात
सफाई करते-करते इस गंदी बस्ती की काया ही पलट दी है। अब यह बस्ती इतनी
साफ-सुथरी, मंगल और पवित्र बन गई है कि उससे गर्भगृह की कल्पना इस तुलसी
वृंदावन के पास खड़े रहकर की जा सकती है। कमलिनी जानबा की इकलौती बेटी, किशन
इकलौता बेटा!! दोनों को ग्रंथ पढ़ना, अभंग गाना उन्होंने ही सिखाया है। उनके
साथ संगत में हम सबने सबकुछ सीख लिया है, है न? कमलिनी तो किसी देवी से कम
नहीं लगती। यह फुलवारी, यह वृंदावन और यहाँ की प्रसन्नता, सब कमलिनी की भक्ति
और शोभा की छायामात्र ही तो हैं।
सखू : पहले-पहले तो मुझे उसकी बातें बड़ी उबाऊ लगती थीं।
हमेशा साफ रहो...नहाओ…धोओ, पेड़-पौधे लगाओ, उसकी पूजा
करो, फिर संस्कृत शब्द रटो, पोथी पढ़ो ... बार-बार यही रटते रहती
थी वह। मैं कहूँ-अरे, हम अछूतों की कन्याएँ, हमें इन सब बामनों की बातों से
क्या लेना-देना? साफ-सुथरा रहने से हमें कोई बामन थोड़े ही मान लेगा?
स्वच्छ-सुंदर रहकर हमें नटनी थोड़े ही बनना है? पर सच तो यह है कि
सुंदर-वुंदर दिखने का सवाल है ही नहीं। प्रश्न यह है हमार रहन-सहन कैसी हो,
हमें क्या करना है। अब मुझे कोई रोके, तो भी मैं सफाई का काम करने के बाद
नहा-धोकर पोथी से चार-पाँच पंक्ति पढ़ ही लेती हूँ। कितना सुकून मिलता है
उससे!
चंपा : जानबाजी ने जब कहा कि हरेक अछूत के घर के सामने एक
तुलसी वृंदावन होना ही चाहिए, तब मैंने स्वयं अपने हाथों से मिट्टी खोदकर
दरवाजे के सामने उसका निर्माण किया था। इस फुलवारी को गोकुल जैसा शोभायमान
बनाने के लिए ही तो मैं कमलिनी का हाथ बँटाने आई हूँ, समझी?
सखू : हाँ, वह तो है ही। उस गोकुल से इस गोकुल की बराबरी
कराने हेतु अब कमलिनी गोपी लीला भी शुरू करने जा रही है, ऐसा सुना है मैंने।
उसमें भी हाथ बँटाना, चंपा देवी। सच, चंपा देवी, एक बात मालूम है तुझे?
चंपा : कौन सी बात?
सखू : अरे, उस कमलिनी और शंकर में कुछ मेल-जोल बढ़ रहा है।
चंपा : मेल-जोल से तात्पर्य?
सखू : निरी भोली हो तुम चंपा। क्या तुम इतना भी नहीं समझती?
जैसा तेरा और कमलिनी के भाई किशन के बीच पक रहा है न, वैसा ही कमलिनी का शंकर
से जम गया है। 'बेंत पड़े धम-धम, सूझ बढ़े छम-छम...'
चंपा : सखी, यदि तुम्हारी जीभ के बेंत ऐसे ही अकारण मुझे
लगते रहे तो तुम्हारे संगत की यह मरकही शाला छोड़कर मुझे भाग जाना पड़ेगा। जा
उधर, मेरे पास खड़ी न रहना, मैं उधर के फूल तोड़ती हूँ।
सखू : मैं भी उधर के ही फूल तोड़ूँगी।
चंपा : फिर मैं इस ओर के तोड़ूँगी।
सखू : अरे, पर मुझपर गुस्सा क्यों हो रही हो? क्या मैंने
तुम्हें किशन के नजदीक भेजा था? तुम्हारे माँ-बाप तो वैसा कुछ सोच रहे हैं और
तुम मुझपर गुस्सा उतार रही हो। उनपर उतारो गुस्सा।
चंपा : सच? क्या कमलिनी के पिताजी उसको शंकर के हाथों सौंपने
जा रहे हैं?
सखू : ये मैं क्या जानूँ। हाँ, मैंने कल इतना जरूर सुना था
कि तुम्हारे होनेवाले 'वो' शंकर को, फुलवारी में कुछ बता रहे थे...शंकर
और किशन बचपन के दोस्त हैं, अब वह दोस्ती इस नए बंधन से अधिक सुदृढ़ न होगी?
और तुम्हारा क्या? कमलाबाई तो अब तुम्हारी ननद होगी।
चंपा : तुम कुछ भी बकती रहो, पर मैं तुम्हें और कमलिनी को
बचपन की सहेली ही मानूँगी।
सखू : लो, वह देखो, कमलिनी आ रही है। जरा सा मजाक करें।
(कमलिनी का प्रवेश) कमला, ये देखो, मैंने बेला के कितने फूल तोड़
लिये हैं ! चंपा की टोकरी बिलकुल खाली रह गई। बस, गप्पें ठोंक रही है तब से
...
चंपा : झूठ बोलती है ये। वह फूल तोड़ रही थी तो मैं इस
मदनमस्त को पानी से सींच रही थी। मैंने इसके खराब पत्ते निकाले, जड़ों की
साफ-सफाई की। फिर मेरी टोकरी कैसे भरेगी? काम के साथ बातें भी होती रहीं। ये
भी बतियाती रही।
कमलिनी : ऐसा ही होता है। जो लगातार पेड़-पौधों की देखभाल
करते हैं, साफ-सफाई रखते हैं, उनकी टोकरियाँ खाली ही रह जाती हैं। दूसरों
द्वारा विकसित पौधों के फूल कोई तीसरा ही तोड़ता है। पौधे की देखभाल करते-करते
चंपा की टोकरी खाली रह गई। इसीलिए तुझे अपनी टोकरी भरी दिख रही है।
सखू : वो तो सच ही है, पर मुझे यह बताओ कि जब चंपा यहाँ
पौधे की देखभाल कर रही थी, तब आप कहाँ गुल खिला रही थीं, कमलिनीजी? आप किसी
उपासना में तल्लीन थीं? आजकल बड़ी एकाग्रता से उपासना हो रही है।
चंपा : कौन से भगवान् को पूज रही हो तुम?
सखू : देवों का देव कौन है?
चंपा : महादेव।
सखू : उसका कोई अन्य नाम भी होगा।
चंपा : शंकर।
सखू : बस, उसी की उपासना चल रही है इसकी।
कमलिनी : (फूलों की माला से मारते हुए) क्या व्यर्थ
की बकवास किए जा रही हो। कौन है ये शंकर?
चंपा : शंकर को नहीं जानती? इतनी बनो मत।
गीत
व्याघ्रांबर धारी, हे अनंग, हे कर्पूर गौरी
तुम रमते हो अल्हड़ जोगी, श्मशानों में करते केली
हे भंगड़, हे भिल्लन प्रेमी, तुमरी लीला सबसे न्यारी।
तो कमलिनीजी, इतने परिश्रम से तुमने यह फुलवारी बनाई,
अब तुम्हारे लिए इसका क्या उपयोग होगा? शंकर के अलावा किसी सीधे-सादे देवता
को पूजना होता तो जूही-चमेली की फूल मालाओं का उपयोग होता, पर शंकर तो विषधर
हैं। अतः अब तुम साँपों की बाड़ी लगवाओ। अब तो तुम्हें नए-नए साँप उसके गले में
पहनाने पड़ेंगे। तब इस फुलवारी का कुछ भी उपयोग नहीं रहेगा।
कमलिनी : मेरी प्रिय भाभीजी, मैं साँप-फुलवारी लगा भी लूँगी
और यह फुलवारी तुम्हें दे दूँगी। जिस देवता की उपासना आप कर रही हैं वो
रँगीला-मिजाजी है न? मेरा कैसा भी क्यों न हो? तेरे रँगीले किशन राजा को
जूही-चमेली की मालाएँ तो रास आएँगी न? पर मालाएँ पक्के धागे की बनाना। गोपियों
की खींच-तान में एकाध कहीं टूट न जाए। सोलह सहस्र नारियाँ उसके पीतांबर को
पकड़ने का प्रयास करती रहती हैं, पर किसीकी भी पकड़ में वह आता नहीं।
सखू : तुम दोनों अब व्याघ्रांबर और पीतांबर की खींच-तान करती
रहो। साँझ हो रही है, मुझे अब जाना चाहिए, चंपाजी। चलो, बाँट लें सब फूल।
कमलिनी : ऐसे थोड़े ही बाँट लेने दूंगी मैं फूल। आज हम लोग
थोड़ा भी खेले नहीं। मैंने सभी सहेलियों को टिपरी नाच खेलने को बुलाया है। आती
ही होंगी सब।
सखू : देखो चंपा, मैंने कहा न था कि अब यहाँ रासलीला शुरू
होगी। उसका रंगाभ्यास करने दो कमल को।
कमलिनी : इस तुलसी वृंदावन के सामने क्या-क्या बकती जा रही
हो तुम?
सखू : बकवास कैसे और क्यों? यह तुलसी कृष्ण के सामने जो कुछ
कहती थी, वही तुम भी कहोगी। इतना ही तो कहा मैंने।
चंपा : वह देखो, सारी सहेलियाँ आ गईं।
गीत
नव पारिजात माला, न है गुलाब प्यारा
न केतकी न चंपा, खुशबू भरा खजाना
प्रभु है तुझे समर्पित, तुलसी सुमेर माला
न रूप है अनोखा, न रंग भी अदेखा
हे पतित हृदय प्रेमी, तुलसी करे विलोला।
[नाचते हुए बाकी लड़कियाँ जाती हैं। चंपा,
सखू और कमलिनी के निकट जाकर आत्मीयता से आलिंगन देती हैं।]
चंपा : सच कहूँ, कमला, तुझसे दूर रहते ही नहीं बनता।
सखू : एक बात पूछूँ मैं। क्या प्राणप्रिय का आलिंगन भी हमारे
स्नेहपूर्ण आलिंगन सा मीठा रहता होगा?
चंपा : मुझे तो लगता है कि हमारा बचपन कभी समाप्त ही न हो।
ऐसा हुआ तो हम लोग हमेशा एक साथ रह सकेंगी।
कमलिनी : ऐसा क्यों पूछती हो सखियो? सच, मुझे भी एक आशंका
व्याकुल करती रहती है। ऐसे प्रेम का अनुभव हमें फिर कभी जीवन भर मिल पाएगा या
नहीं? किंतु ऐसे सुख में जीवन भर साथ रहना संभव हो न हो, पर कहीं भी रहना
पड़ा तो हमारा यह प्यार अमिट रखना तो हमारे हाथों में ही है न? आओ सखियो, जी
भरके गले लग जाओ।
[तीनों एक-दूसरे के आलिंगन में समा जाती हैं।]
चंपा : अब जाएँ हम?
कमलिनी : ठीक है, जाओ। काफी देर हो गई है। घरवाले क्रोधित
होंगे। जाओ अब।
[सखियाँ जाती हैं। शंकर का प्रवेश।]
शंकर : हमने आपकी सखियों की प्रेमलीला देख ली।
कमलिनी : अरे, शंकर! तुम? बड़े ही शरीर हो। मेरे किशन भाई
कहाँ गए ?
शंकर : वो भी बड़ा बदमाश है। हमें एकांत मिले, इसलिए बहाना
बनाकर कहीं चल देता है।
कमलिनी : पर उससे छिपाकर तुमसे बात करने लायक है भी क्या
मेरे पास? सच कहूँ, ऐसा सुयोग्य भाई मुझे अनेक जन्मों में भी नहीं मिल पाएगा।
हम एक-दूसरे से कुछ भी छिपाकर नहीं रखते। तुम्हारी-उसकी अटूट मित्रता के बाद
तुम हमारे यहाँ जब रहने आए और हमारे बीच में जो प्यार प्रस्फुटित हुआ, वह सब
उसे कब का मालूम है। तब से चिढ़ाता है वो मुझे-मैं स्नेह दक्षिणा के रूप में
अपनी प्यारी बहना ही शंकर को अर्पित करनेवाला हूँ, समझी? याद है, एक बार मैं
भाई से मजाक करते हुए इस हरसिंगार के पीछे जा छिपी थी, तो भाई ने मुझे पकड़ने
के लिए तुम्हें भेजा था, तुम छिपते हुए आए थे और मुझे पकड़ लिया था। अचानक हुए
उस स्पर्श ने मुझे रोमांचित कर दिया था।
गीत
नाम है न काम है, कामना कैसे कहूँ
याद क्षण आया कभी, सिहर सी जाती रहूँ।
सच कहती हूँ, उस समय ऐसा लगा था कि जीवन भर तुम्हारे निकट ही रहूँ। उस दिन के
रोमांचित भावों को मैंने माँ से भी छिपाने के प्रयास किए थे, पर भाई से छिपा
न पाई। तब उसने मुझे किसी सखी की भाँति एकांत में उस नवीन भावना का मधुर अर्थ
कहते हुए क्या कहा, क्या बताऊँ?
शंकर : कमल, किशन के विश्वास पर तेरा एकाधिकार नहीं है।
मेरा भी उतना ही अधिकार है। उस दिन उसने मुझसे क्या कहा था, बताऊँ?
गीत
नयनों की लोलुपता तेरी, सखि अद्भुत है ये अठखेली
मन में रख लूँ मैं हे प्यारी, रस की दुनिया से सारी
पुलकित भावों की ये ओरी, सस्वर गुंजित होती रहती।
और मैंने उसी दिन उसे सच कह दिया था। कल किशन ने ईश्वर को साक्षी मानकर तेरा
हाथ मेरे हाथों में देकर जन्म-जन्मांतर का उपकार किया है, जिसे मैं कभी भी
नहीं भूलूँगा। अब तुम्हारे पिता जानबा क्या कहते हैं, इसकी चिंता थोड़ी-बहुत
शेष है। इतना जरूर कहूँगा, प्रिये कि उस उषाकाल में तुम्हारा थामा था हाथ,
प्रेम के हरसिंगार की छाया में जीवन की संध्या तक भी थामूँगा।
कमलिनी : हे मनहर, उस दिन तुम्हारी पकड़ से छूटने के लिए
छटपटानेवाली मैं आज तुम्हारे जीवन से लिपटने की बातें कर रही हूँ।
शंकर : वह मदन मनोहारी कमलाकर हमारे प्रीति-संगम का हमेशा
साक्षी रहे।
कमलिनी : वह मदनगर्वहारी शंकर हमारे प्रेममिलन को मंगलमय बना
दे।
[किशन का प्रवेश।]
किशन : क्यों कमला, अभी-अभी तुम शंकर का नाम ले रही थीं?
प्यारी बहना, अब चाहे जब ऐसे शंकर का नाम लेने की आदत छोड़नी होगी तुम्हें।
अब तुम्हारा संबंध ही बदल गया है। हम हिंदुओं की महिलाएँ जब चाहे पति का नाम
नहीं लेतीं, मालूम है न!
कमलिनी : अच्छा, तो तुम्हारा यह कथन मैं जाकर अपनी होनेवाली
भाभी को बता देती हूँ। विवाह के पहले पति को नाम लेकर चाहे जितनी बार पुकार
लो, पर विवाह के बाद पति का नाम लेना बिलकुल छोड़ देना पड़ता है। यह
स्त्रीधर्म है-यह किशन ने तुझे बताया है, ऐसा चंपा को जाकर कहती हूँ।
किशन : अभी जा रही हो, जाओ; किंतु एक अच्छा समाचार सुनने
से वंचित रह जाओगी।
शंकर : सच? कोई समाचार लाए हो?
किशन : एक छोड़ दो, परम मंगल समाचार मैं तुम्हें कहने लाया
हूँ। पहला यह कि जब मैंने जानबा को यह बताया कि मैंने कमलिनी को शंकर के लिए
प्रस्तावित किया है, तो उन्होंने बड़ी ही खुशी से स्वीकृति दे दी। दूसरा
समाचार है कि अपने बाबा के और हम सब दलितों के सद्गुरु श्रीसंत चोखा महाराज के
दर्शन हेतु हम तीनों को उन्होंने पंढरपुर जाने की आज्ञा की है। बाबा अब कहीं
आ-जा नहीं सकते। अतः तुम्हें उनके दर्शन कराने का जिम्मा उन्होंने मुझपर सौंपा
है! अब मैं रिश्ते से तुम्हारा वचन-निश्चित साला बन गया हूँ। चलो, हमें पहले
बाबा के ही दर्शन करने चाहिए। (जाते हैं।)
: तीसरा दृश्य :
[चोखा महाराज हाथ में झाड़ू लिये पंढरपुर के मंदिर का परिक्रमा-पथ बुहार
रहे हैं।]
चोखा : ओहो हो!! रात बीतकर पौ फटने की यह संधि वेला, यह
उषाकाल कितना शांत है! पाप की मध्य रात्रि बीतकर पश्चात्ताप की उदय वेला में
मंगलोन्मुख मन जैसा निर्मल एवं शांत होता जाता है वैसा ही यह आकाश निर्मल और
शांत दिख रहा है। संतों की अमृत वाणी सुनकर मन को जैसा सुकून मिलता है वैसा ही
आनंद उन नन्हे पक्षियों की किलकारियाँ मेरे मन को दे रही हैं, पर यह तुलना
ठीक नहीं है; क्योंकि-हे मेरे कानो! इस किलकारी का आनंद तुममें ही समाहित हो
रहा है, वह संतों की वाणी जैसा झिरते-झिरते आत्मा को नहीं छू रहा। वह दिखावटी
है। इन पक्षियों का जो गाना मेरी इंद्रियों को सुखकर प्रतीत हो रहा है, वह
स्वयं भी सुखकारी है या नहीं, यह भी एक प्रश्न ही है। हो सकता है कि उस नन्हे
पंछी की नन्ही सी प्रिया अभी तक उससे मिलने नहीं आई हो, इसलिए विरह से अशांत
होकर उसे पुकारते हुए निकली उसकी यह किलकारी कदाचित् उसके व्याकुल हृदय की
संगीतमय छटपटाहट हो। नहीं-नहीं! पूर्णता से, जिस संगीत से हृदय की आकुलता शांत
होती है वह संगीत तो वास्तव में श्रीहरि का नाम स्मरण मात्र है ? हे गोपाल,
हे गोविंदा! मेरे भक्ति के उषाकाल में अब अपने ज्ञानमय प्रकाश का प्रत्यक्ष
उदय होने दो।
गीत
जनक औ' जननी, तू ही है हमारी
दया क्यों न आती, तुझे हे मुरारी?
कैसे ये संसार, तूने है बनाया
पराया सा दूर, हमें क्यों बसाया?
जन्म-जरा-अंत, सुख-दुःख सारे
हमारे अभाग, क्यों अनदेखे?
प्रभु तेरे द्वार, करूँ मैं पुकार
चोखा का उद्धार, कब और कैसे?
[रास्ते से जाता एक व्यक्ति प्रवेश करता है।]
व्यक्ति : अबे, ओ धेड़, तू रास्ता साफ कर रहा है या रोके
रख रहा है? ठहर, ठहर, वह धूल मुझपर उड़ेगी। तुम धेड़ लोग बहुत ही गर्रा गए
हो! काम तो झाड़ू लगाने का करते हो और भजन गाने का दुस्साहस कर रहे हो? क्यों
बे महारठे! जो गा रहा है, उसका अर्थ भी समझता है?
चोखा : महाराज, क्षमा करें।
वेदों का अनुभव कहो या शास्त्रों का अनुवाद
एकमात्र है नाम पर, वह गोविंद महान्
चोखा तो है नासमझ, मूढ़ कहें सब कोय
नाम रटे वह जात है, हे विट्ठल श्रीरंग।
व्यक्ति : हाँ-हाँ, जरा सँभलके। वेदों का नाम लोगे तो कान
काट देंगे तुम्हारे। भगवान् विट्ठल के हाथ कमर से चिपके हैं। वे तेरी
सहायतार्थ कदापि न आएँगे। हमारे हाथ बिलकुल खुले हुए हैं। तेरे थोबड़े का
स्वागत जरूर करेंगे, समझे? धेड़-गँवार कहीं का! चल दूर हट, नहीं तो अपनी
छाया से मुझे अपवित्र कर देगा।
चोखा : भगवान्-
पाँचों की भूतों की छुआछूत?
बने देह उसके बिना कोई कैसी?
सभी गर है छूत ही फिर भेद कैसे?
चोखा तो न समझे दुनिया है कैसी?
[किशन, शंकर और कमला आकर उसके पैर छूते हैं।]
चोखा : अरे-अरे, ये क्या कर रहे हो? मैं तो एक तुच्छ
झाड़ूवाला हूँ। सज्जनो, आप मेरे पैरों को इस तरह छुओ नहीं! आप मुझे कोई और समझ
त्रुटि कर रहे हो।
किशन : नहीं, महाराजजी, कोई त्रुटि नहीं कर रहे हैं हम।
मैं किशन हूँ, यह मेरी बहना कमलिनी और यह है शंकर। हम भाई-बहन मायापुर के
जानबा महाराज की संतान हैं। यह शंकर हमारे मोहल्ले का ही युवक है। हम लोग उसका
कमलिनी से ब्याह रचाने जा रहे हैं। आपको याद है न, जानबा? आपके शिष्य,
उन्होंने ही भेजा है हमें आपके दर्शनों को। वे अब काफी बूढ़े हो गए हैं। आ
नहीं पाए, इसलिए बहुत दुःखी हैं।
चोखा : आओ, इस ओर, सड़क पार के उस पत्थर पर बैठें। जानबा की
मुझे खूब याद है, पर मायापुर से इस लड़की को इतनी दूर तक कैसे लाए? कोई गाड़ी
की है क्या?
किशन : नहीं महाराज। हम दीन-दरिद्र, घर की गाड़ी कहाँ!
किराए की या मुफ्त की माँगें तो महाराज, भाड़े से भी कोई गाड़ी में लेता नहीं
है। फिर मुफ्त कौन बैठाएगा?
चोखा : फिर पैदल चलने का कष्ट तुमने इस लड़की को क्योंकर
दिया? लड़कियों से इस वय में चलने का श्रम नहीं होता। फिर तुम तो भजन का सामान
भी साथ लाए हो। बैठो, बेटा।
कमलिनी : महाराज, आपके चरणों के जो दर्शन हुए, मेरी तो
सारी थकान उड़ गई। मेरी उम्र की मुझसे भी दरिद्र अन्य लड़कियों को मैंने सिर पर
लकड़ी के बोझे लादे पंढरपुर आते देखा है। उनकी वेदनाओं की कल्पना मुझे भी तो
होनी चाहिए। अन्यथा उनके दुःख पर मैं दया नहीं कर सकूँगी। और यदि वे चार पैसों
के लिए पंढरपुर पैदल आती हैं तो जनम-जनम भी न मिले, ऐसा आपके चरणों के दर्शन
का पुण्य प्राप्त करने के लिए मैंने यह यात्रा की तो उसमें विशेष क्या किया?
मैं स्वयं ही पैदल आई हूँ, महाराज।
शंकर : किंतु एक प्रार्थना है, महाराजजी। अभी यहाँ से गए
महोदय से हमने आपका पता पूछा कि चोखा महाराज कहाँ हैं? तो वे गुस्से से
बड़बड़ाते बोले, 'संत चोखा महाराज कौन? वह तेरे बाप को मालूम होगा। हाँ,
हमारे नगर की सड़कें साफ करनेवाले चोखा को जरूर जानते हैं हम। वह यहीं सड़क
साफ कर रहा है।' उसकी यह बदतमीजी मुझे बहुत बुरी लगी। क्या सचमुच आपको झाड़ू
लगाना पड़ता है, महाराज?
चोखा : हाँ, यह सच है। हम धेड़-गँवार जो हैं। अपना धंधा ही
है यह। इसमें अपमान की क्या बात है?
शंकर : क्यों नहीं? जो भगवत् भक्ति में रमा है, जो
निर्वैर, निष्पाप और निर्मल संत है, उसे केवल इसलिए कि वह धेड़ जाति में पैदा
हुआ, इतना घटिया काम करना पड़े, यह अपमानजनक नहीं तो क्या है? ऊँची जाति के
चोर-उचक्के पापी लोगों द्वारा फैलाई हुई गंदगी दूर करना हमारा जातिगत धंधा हो
गया। यह कैसा न्याय? हम लोगों का जन्म गाँव की गंदगी साफ करते-करते ऐसे ही
व्यर्थ बीत जाएगा क्या?
किशन : महाराजजी, लाइए, वह झाड़ू मुझे दीजिए। जिन हाथों में
शंकराचार्य का धर्मदंड या राजदंड शोभित होना चाहिए, उन हाथों में यह झाड़ू
मुझसे देखा नहीं जाता। जब तक हम लोग यहाँ हैं, हम बारी-बारी से झाड़ू लगाया
करेंगे। दीजिए यह झाड़ू। (झाड़ू लेने बढ़ता है।)
चोखा : बेटे, ठहरो, ठहरो! मेरे हाथों का यह दंड वास्तव में
यदि शंकराचार्य के हाथों का धर्मदंड होता या कोई राजदंड होता तो मैं तुम्हारी
बात मान भी लेता, पर यह तो बेटे, मेरी पंगु भक्ति की एकमात्र सहायक लाठी है।
इस नगर के मार्ग, यह परिक्रमा की राह, लोगों के पैरों तले कुचली धूल और लोगों
द्वारा फैलाई हुई गंदगी झाड़ने का, साफ करने का क्षुद्र से क्षुद्रतर भी जो
काम नहीं करेंगे, वह काम मेरे हिस्से आया, इसे मैं अपना सद्भाग्य समझता हूँ।
इसके लिए मैं जनम-जनम महार जाति में ही जन्म पाऊँ, ऐसी ईश्वर से मेरी
प्रार्थना है। हाथी पर बैठने तथा राजदंड ग्रहण करने हेतु तो अनेक लोगों को
उत्सुक देखा जाएगा, किंतु मनुष्य जीवन को साफ-सुथरा, सुखी रखने के लिए जरूरी
इस 'सफाईदंड' को स्वीकारने कोई आगे नहीं बढ़ेगा। अतः ऐसा 'समाज स्वास्थ्य'
का उपयोगी काम करने यदि हम धेड़-अछूत आगे आएँ तो वह काम तुच्छ नहीं बल्कि
सर्वश्रेष्ठ ही है। उससे तो हमारे जन्मों की सार्थकता सिद्ध होती है।
किशन : महाराज, आपका उपदेश कितना महान् है !
शंकर : तो फिर हम महार कुत्ते के पैरों से रौंदी हुई नगर
मार्ग की धूल झाड़ते, लोगों की गंदगी व मिट्टी में लोटें और क्षत्रिय राजदंड
हाथ में लेकर केशर-कस्तूरी का सुगंधि लेपन कर निर्मल और सुंदर बने रहें। जिनके
उपकार से वे वैसा सुंदर रह सकते हैं, उन्हीं महार-भंगी को पापयोनि कह पशु से
भी अपवित्र माना जाए-यह सामाजिक कर्तव्यों का विभाजन क्या आपको उचित लगता है?
चोखा : नहीं। किसी भी जाति को बलात्कार से नीच या पापयोनि
का, हीन मानकर उससे आजीवन गंदे काम कराना निश्चय ही अन्यायपूर्ण है, पर हमें
यह भी ध्यान रखना होगा कि सामाजिक सफाई नहीं की गई तो गंदगी से बीमारी ही
बढ़ेगी। उस सर्वनाश से बचने हेतु किसी-न-किसीको तो यह काम करना ही पड़ेगा। फिर
हम लोगों ने यह काम किया तो क्या हानि है? फलाना काम श्रेष्ठ, ढिकाना काम
नीच, फलाना पवित्र तो अन्य अपवित्र, यह मानसिकता हिंदू समाज जितनी जल्द छोड़
दे उतना ही भला होगा। लोकहित साधक सभी काम पवित्र हैं, ऐसी सोच यदि बढ़े तो
एक-दूसरे से विद्वेष, दूरियाँ नहीं बढ़ेंगी। 'स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः
संसिद्धिं लभतेनर: न।' समाज की मानसिक बुराई को दूर करने हेतु संत श्रम करते
हैं तो दैहिक बुराई दूर करने हेतु हम लोग श्रम करते हैं। कर्तव्य की दृष्टि से
यदि इस साम्य-भाव को देखें तो दोनों काम एक जैसे लगेंगे। हाथी की सवारी में
घूमनेवालों से कहीं अधिक अच्छी स्थिति उसकी है जो दूसरों की गंदगी साफ करने के
लिए झुकता है। उसका अहं विलुप्त हो जाने से वह नारायण से कहीं अधिक एकाकार
होता है।
किशन : महाराज, आपकी यह अमृतवाणी सुनकर सामाजिक कर्तव्य के
बँटवारे में समाज की गंदगी साफ कर सामाजिक आरोग्य रक्षण का यह अति घिनौना,
परंतु उसी कारण उपकारक कर्तव्य हम महारों को प्राप्त हुआ-और उससे परोपकार की
शिक्षा लेने का यह सुवर्ण अवसर का लाभ हमें हुआ-ऐसा मुझे लगने लगा है।
शंकर : और जिस समाज की स्वास्थ्य रक्षा हेतु हम यह गंदगी भरा
काम करते हैं, उस समाज ने उन महार-भंगियों पर उपकार किया, इसलिए कुत्ते से भी
अस्पृश्य और पापयोनि मानने का एक सुवर्ण अवसर उसे भी मिला।
चोखा : भाई शंकर, औरों की पवित्रता एवं स्वच्छता बनी रहे,
इसके लिए धूल-कीचड़ में सने हम धेड़ों के बदन किसी भस्म विलोपित ब्राह्मण से
सम्मान्य समझे जाने चाहिए। यदि उसे कोई नीच-पापी समझता है तो यह उसकी तुच्छ
बुद्धि का दोष माना जाए। दूसरों के चिढ़ाने से यदि कोई धेड़ स्वयं को ही
नीच-पापी मानने लगे और क्रोधित होने लगे तो उसे चिढ़ानेवाला सही है, यही
सिद्ध न होगा क्या कि दूसरे के चिढ़ाने पर जो अपना कर्तव्य या लोक सेवा छोड़ता
है, वह सचमुच पतित होता है। अपने आपको पतित माननेवाले अपने भाइयों की गलती
हमें सुधारनी चाहिए। उसके लिए हम हिंदुओं को एक-दूसरे से राग-द्वेष भुलाना
चाहिए। हम लोगों को भी अपना रहन-सहन एवं आचरण शुद्ध और पवित्र रखना सीखना
होगा। जितना हमारा आचरण-व्यवहार उच्च वर्णीय हिंदू परायण सा होगा, जितनी
उसमें नम्रता एवं स्नेहपूर्णता होगी उतना ही उन्हें हमें नीच-अछूत कहने में
हिचक होगी। हम लोग अमंगल-अपवित्र रहते हैं, यही उनका आक्षेप है। हमें उस
आक्षेप को मिटा देना चाहिए। हम अपने विनीत सेवा भावों से ऊँचे लोगों का दिल
जीत लेंगे, वैसे ही हम अपनी धर्म-परायणता से प्रत्यक्ष परमात्मा को भी जीत
लेंगे।
कमलिनी : भाई, महाराज जो अमृत तुल्य उपदेश दे रहे हैं, वह
सोलह आने सच है।
चोखा : हाँ बेटा, यही वास्तविकता है। मुझे खुशी है कि यह
उपदेश तेरी समझ में आ रहा था। क्या तुम भजन करती हो? क्या तुलसी को पूजती हो?
किशन : महाराज, कभी भी टालती नहीं है। इसी कारण जानबा ने
इसे अपने अच्छे भजन सिखाए हैं।
चोखा : अच्छा! फिर तो हमें भी एकाध भजन सुना दो। अपने इस
होनेवाले पति शंकर का संकोच तो नहीं करती न?
किशन : नहीं जी, हम तीनों बचपन से एक साथ पले हैं। हमारी
बहना ने एक तरह से स्वयंवर ही किया है। फिर संकोच कैसा?
कमल : भाई, कुछ मन की नहीं तो जन की लाज तो रखो। तुम्हारे
इस कथन से मुझे संकोच होने लगा है। महाराज, मेरा गला मधुर नहीं है। मेरा भजन
सुनकर आपको हँसी आएगी।
शंकर : यह इसका विनय है, महाराज। वास्तव में इसका स्वर बहुत
ही मधुर है।
चोखा : भाई, तुम्हें तो ऐसा लगेगा ही। अतः तुम्हारी सिफारिश
हम नहीं स्वीकार सकते। कमलिनी, तुम्हारा स्वर कैसा है-इसकी चिंता नहीं। मन तो
मधुर है न? भजन प्रिय है न तुझे? बस, काफी है वह। भक्त की रुचि ही सभी चीजों
को भावपूर्ण बनाती है। अत: निस्संकोच गाओ।
कमलिनी : भाई, तुम्हीं बताओ ना, क्या गाऊँ मैं?
किशन : वह गोविंदवाला गीत गाओ।
कमल : हरि बिछुड़ गया है, ऐसा मैं नहीं कहूँगी। देखो, वह
शंकर मुसकरा रहा है।
चोखा : नहीं बेटे, कोई नहीं हँसेगा, खुलकर गाओ।
गीत
हरि मोरे कहाँ छिपे हो आज
आकुल मेरे प्राण सखि
कहाँ छिपे हैं प्राण!
ग्रह-ग्रह-तारे खोजे सब रे
पर न मिले नाथ
कहाँ छिपे हो आज।
चोखा : (तल्लीन होकर) बेटी, गोपियों की भाँति तुम
भी यदि परम भक्ति से अपना प्रेम सर्वस्व श्रीकृष्ण को सौंप दो, तो वह गोविंद
तुम्हारे निकट ही तुम्हें प्राप्त होगा। ग्रह-तारों पर ढूँढ़ना नहीं पड़ेगा
उसे। वह तो स्वयं कहता है-'मद्भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।'
[नारंभट एवं देवी सिंह का प्रवेश।]
नारंभट : वाह ! इस सुंदर छोकरी को लेकर कौन रँगीला जवान यहाँ
रासलीला कर रहा है? देवी सिंह, कौन है यह?
देवी सिंह : नारंभट, आपका मन भी ललचा गया? सुंदरियों को साथ
लेकर क्या तुम्हीं लोग बैठ सकते हो?
नारंभट : निश्चय ही ऐसा सुंदर कबूतर मेरे आलिंगन के पिंजरे
में बंद रहना चाहिए। (ठीक से देखते हुए) अरे देवी सिंह, ये तो अपना
चोखा है। धेड़ दिखता है। वहाँ बस्ती पर भजन गाने बैठता है और यहाँ गोपियाँ
इकट्ठा कर क्या स्वयं कृष्ण बनने जा रहा है?
देवी सिंह : अरे चोर चोखा! कृष्ण क्षत्रिय था, यह भी भूल गया
क्या? सुंदर युवतियों को गोपी समझने के कृष्ण-अधिकार के हम ही वास्तव में
वारिस हैं, समझा?
नारंभट : कृष्ण का गुरु ब्राह्मण था। इसलिए क्षत्रिय जिन्हें
गोपी समझें, उन्हें ही अपनी शिष्या मानने का अधिकार हमें है, समझा? (
आगे बढ़कर) अबे, ओ धेड़, अभी तू कुछ संस्कृत शब्द बक रहा था न? अरे
चांडाल, तुझे संस्कृत बोलने का अधिकार नहीं, फिर भी तू-धेड़ों को संस्कृत
सीखने की-धृष्टता कर रहा है। ऊँची जाति के विरुद्ध बगावत करना सिखा रहा है। हम
ब्राह्मण-क्षत्रियों को आते देख खड़ा भी नहीं हुआ। अरे, अब उठता है ! देखो,
वह महार!
चोखा : जोहार माई-बाप, भजन में तल्लीन था, देख न पाया आपको।
नारंभट : तल्लीन था! आज के इस भजन में क्यों न रमण होगा तू!
उस सुंदरी के मस्ती भरे शरीर का सितार संगम करने को हो तो क्यों न तल्लीन होगा
कोई। फिर तो मैं भी आज से 'वारकरी'* बन जाऊँगा।
शंकर : सँभलके बात करो, महाशय। हम धेड़ हैं तो क्या हुआ, हम
इस तरह से अपनी बेटियों का अपमान नहीं सह सकते, समझे न? क्या समझते हो अपने
आपको? ( उनपर हमला करते हुए) दाँत तोड़ डालूँगा
पूरे-के-पूरे, समझे। फिर से कुछ बक-बक की तो ठीक न होगा।
नारंभट : माफ करो, भाई, ये कन्या धेड़वी है, यह मालूम न
था हमें। हम केवल धेड़ों को ही नहीं अपितु सभी सुंदरियों से चुहल करते हैं।
सभी लड़कियों को हम समान मानते हैं। इस बारे में हम छुआछूत नहीं मानते, समझे।
छोड़ दो, गुस्सा थूक दो! (देवी सिंह को पीछे खींचते हुए) जाने दो
भाई, भीख न सही पर कित्ता रोको, कहने की स्थिति आ गई है? छोड़ो, चलो यहाँ
से।
देवी सिंह : मैं क्या करूँ? ये सभी पुरुष होते तो मैंने मजा
चखाया होता इन्हें। पर इनकी सेना में एक स्त्री भी है। इसलिए मैं धर्मयुद्ध
नहीं कर सकता। एक शिखंडी के कारण भीष्माचार्य को भी पांडवों से युद्ध छोड़
देना पड़ा था।
नारंभाट : इतनी ही बात हो तो उसकी तोड़ मेरे पास है। यदि तुम
तीन पुरुषों से जूझ सकते हो तो मैं एक स्त्री से निपट लूँगा, स्त्री से युद्ध
ब्राह्मणों को निषिद्ध नहीं है। द्रोणाचार्य शिखंडी से जूझे ही थे। तू इशारा भर
कर, मैं भुजा ठोंककर तैयार हूँ। द्वंद्वयुद्ध में अभी तक अनगिनत नारियों को
चारों खाने चित्त किया है मैंने।
देवी सिंह : अभी ऐसा कुछ नहीं करना है। इस चोखा की बगावत
समूल नष्ट कर डालेंगे हम। यह धेड़ों को वेदमंत्र सिखाता है। अकेले
ब्राह्मण-क्षत्रियों को सबक सिखाने के लिए उकसाता है। ये हवा पूरे पंढरपुर में
फैला देंगे, फिर देख मजा तू।
नारंभट : चलो तो, उस रसभरे होंठोंवाली का मात्र नाम लेने से
इस धेड़ ने मेरे दाँत ठिकाने लगाने की धमकी दी। अब मैं भीम प्रतिज्ञा करता हूँ
कि इसी लड़की के ये रसभरे होंठ अपने दाँतों के अंगूर से पकड़कर अधरामृत जब तक
नहीं पीऊँगा, तब तक चैन न पाऊँगा। केवल बदले की आग में जलूँगा।
देवी सिंह : अरे, तू तो भीमसेन बना जा रहा है। यदि तूने
अपनी प्रतिज्ञा पूरी की तो तू नाममात्र का ब्राह्मण रह जाएगा, यह मालूम है न
तुझे? यह कन्या धेड़ की है, इतना भर खयाल रखना।
नारंभट : ऐसा है क्या? स्त्री रत्न दुष्कुलादीपि, पर वह
धेड़ हो ही नहीं सकती।
देवी सिंह : कैसे कह सकते हो यह?
नारंभट : जब मुझे उसे छूने की प्रेरणा हो रही है तब वह
अस्पृश्य कैसे हो सकती है, 'सतां हि संदेह पदेशु स्त्रीषु प्रमाणसर्वं करणं
प्रवृत्तयः'।
[जाते हैं। चोखा की पत्नी आती है।]
सोयरा : नाथ, क्या हुआ? मैं परिक्रमा का आधा रास्ता साफ कर
आई, पर आपका पता न चला। यहाँ देखा तो झगड़ा हो रहा था। कौन है यह लड़की?
शंकर : (प्रणाम करके) माता, हमने आपको पहचान लिया।
संत गुरु की पत्नी पद के लिए पूर्णतया योग्य ऐसी आप सोयराबाई हैं। माता, आपके
पूज्य पति का और हमारी महार जाति के परम आदरणीय संत का जो अपमान और धिक्कार
दुष्टों ने किया तो किया ही, साथ-साथ मेरी होनेवाली पत्नी का बिना कारण उपहास
करने में भी उन दुष्टों को शर्म नहीं लगी। इसीलिए मुझे उनपर हमला करना पड़ा।
गुरुजी ने यदि रोका न होता तो मैं क्या कर जाता, कह नहीं सकता। ये अपने आपको
ब्राह्मण, क्षत्रिय कहलाते हैं, पर इन क्षत्रियों जैसे नशेड़ी, दुष्ट और
पाखंडी सारी पृथ्वी पर ढूँढ़ने से भी नहीं मिलेंगे। ये पाप-पुण्यों की भी
परवाह नहीं करते।
चोखा : अरे बेटा, ब्राह्मणों के बारे में ऐसे जहरीले शब्द
कहकर तू क्यों अपनी जीभ को दूषित करता है ? हमारे हिंदू धर्म में महादेव का
तृतीय नेत्र कहा गया है ब्राह्मण को। उन्हीं के कारण तो ब्रह्मज्ञान जीवित बचा
है संसार में। कितनी तपस्या, कितना त्याग है उसके पीछे! त्याग ही जिनका भोग
रहा, पर्णकुटी ही जिनका प्रसाद रही, संन्यास ही जिनका संसार रहा, जिनके बीच
अनगिनत महात्माओं एवं हुतात्माओं ने जन्म लिया, उस ब्राह्मण जाति को भला-बुरा
कहने-सुनने की अपेक्षा मैं उन्हें अनेक बार वंदन करना पसंद करूँगा। कुछ
क्षत्रिय यदि दुष्ट एवं प्रपीड़क हों तो सभी को बुरा कहना कहाँ तक उचित होगा?
यह मत भूलो कि श्रीराम, श्रीकृष्ण क्षत्रिय थे तो उनके महान् गुरु वशिष्ठ और
संदीपनि ब्राह्मण थे।
सोयरा : अब मध्याह्न का समय हो रहा है। अत: मेहमानों को लेकर
हमें घर चलना चाहिए। चलो बेटी।
चोखा : आज हम गरीबों के घर का अतिथि-सत्कार स्वीकार कर हमें
पुण्य पाने दो। चलो, हम भजन गाते-गाते घर जाएँ।
शंकर ,
कमलिनी
और किशन : गुरु का यह आदेश मानो हम पतितों पर किया गया विशेष
अनुग्रह ही है।
[भजन गाते जाते हैं।]
गीत
यह दुनिया, मन्नतमाँगों की
दास प्रभु तुम हो सुखदायी
दुःख-दर्दों के प्रलयंकारी
तुम संहारक औ' अविनाशी।
दूसरा अंक
: पहला दृश्य :
[नारंभट का घर। देवी सिंह एवं नारंभट बातें कर रहे हैं।]
नारंभट : नहीं भाई, मैंने उस अड़ियल राहगीर को वैसा कुछ भी
नहीं कहा। वह बोला, मेरे पास दक्षिणा नहीं है, तो मैंने पूछा कि क्यों बे
मूर्ख, फिर तुझे स्नान का मंत्र क्या तेरा बाप मुफ्त में बताएगा?...ऐसा
तो हम इन पिछड़ों से दिन में सौ बार बोलते रहते हैं, पर आज तो वह मुझपर धावा
बोल गया। बोला, दाँत तोड़ दूंगा। मैंने कहा, भाई मैं ब्राह्मण, पूजा-पाठ हेतु
नहाया-धोया, पवित्र कपड़ों में हूँ, अतः बिना छुए ही दाँत तोड़ना। तो वह वहाँ
से जाते-जाते बोला कि हम लोग पिछड़े और तुम लोग बड़े अगड़े हो? पर तुम जैसे
अगड़ों से तो वह चोखा महाराज भला है, देवी सिंह। मैं बताता हूँ कि इन नीचों
में चोखा का महत्त्व बहुत ही बढ़ता जा रहा है। वह इन्हें फुसलाता है और ये लोग
हमें भला-बुरा कहने लगते हैं। मेरे साथ घटित दुर्व्यवहार इसी का प्रमाण नहीं
है क्या?
देवी सिंह : इसका प्रायश्चित्त सनातन धर्म संरक्षण, क्षत्रिय
कुल भूषण यह देवी सिंह उस चोखा से शीघ्र ही कराएगा, डरो नहीं। मैंने पूरे
पंढरपुर में यत्र-तत्र-सर्वत्र सवर्णों को उसके खिलाफ चेताया है। सभी हिंदुओं
को जगाया है। उस फुलझड़ी को अपने कब्जे में लाने का प्रबंध भी किया है मैंने।
वो इब्राहिम है न! अरे अपने सूबेदार बंगरा खान का साला।
नारंभट : अर्थात् तुम उस मुसलमान को अपने इस शुद्ध हिंदू-कूट
में ले रहे हो क्या? देखो, मैं पापी भले ही हूँ, पर ब्राह्मण हूँ। वह अछूत
कन्या भले ही हो, पर है तो हिंदू। मैं मुसलमानों के हाथों उसे पड़ने नहीं
दूंगा, समझे? मुसलमान तो हिंदू धर्म के दुश्मन हैं, वे उसका धर्मांतरण कर
देंगे।
देवी सिंह : अरे भाई, धर्ममार्तंडजी, डरिए नहीं। अछूतों का
नाम लेते ही तुम्हारी भौंहें चढ़ जाती हैं, पर उस फुलझड़ी का नाम लेते ही
धर्मबंधुता दिखाने लगे हो। वह कन्या मुसलमान के हाथों पहुँची तो उसके नाखून के
भी दर्शन तुझे नहीं होंगे, यही डर सता रहा है न तुझे। डरो नहीं, यह कबूतर मैं
अपने खेमे में ही रखनेवाला हूँ, समझे।
नारंभट : अपने खेमे में यानी कहाँ ?
देवी सिंह : अरे, आज तक हम इन जंगली कबूतरों को पकड़कर जिस
सुंदर पिंजरे में रखते आए हैं उसी गंगाजी के वेश्यागार में रखेंगे-ठीक! अब
मेरा एक काम है। एक नई झंझट आन खड़ी हुई है, उसका निपटारा करना है हमें।
नारंभट : देखो भाई, आज तक जो हुआ सो हुआ। अब मैं किसी झंझट
में तुम्हारा साथ नहीं देनेवाला।
देवी सिंह : यह मामूली झंझट नहीं है। सुनहरी झंझट है। यह
देखो, यहाँ के प्रमुख संभाजीराव पाटिल हैं न, उन्होंने दूसरा विवाह किया है।
नारंभट : अच्छा! फिर?
देवी सिंह : (स्वगत) देखो, कैसे इस ब्राह्मण के
कान खड़े हो गए? ( प्रकट) और उसने अपनी युवा पत्नी मालिनी की
देखभाल हेतु एक वृद्धा मौसी की व्यवस्था की है। इस मौसी के पास अपार धन का
भंडार है। तुम किसी तरह अंतरंग में घुसपैठ कर लो। फिर चाहो तो उस स्वर्णमालिनी
का और चाहो तो मौसी के स्वर्ण का हम दोनों मनचाहा इस्तेमाल करेंगे। यदि हम
किसी तरह उस संभाजीराव को अपने बस में रख सके तो हमारे सारे भले-बुरे कारनामों
में पटेल के संपर्क का ढाल सा उपयोग हो सकेगा। चोखा को मजा चखाने के बाद
संभाजीराव तो हमारा दाहिना हाथ हो जाएगा।
नारंभट : यह तुम्हारी कल्पनाओं का महल तो उत्तम है, पर यह तो
सोचो कि क्या संभाजीराव हमारे बस में रहने योग्य हैं?
देवी सिंह : यदि न होते तो मैं उनका नाम क्यों लेता? अयोग्य,
दुर्गुणी व्यक्तियों की परछाईं से भी मैं दूर रहता हूँ।
नारंभट : कौन से सद्गुण हैं उस पटेल में?
देवी सिंह : पहले तो वे निरे गधे हैं। दूसरे, बड़े
भोले-भाले, भावुक तथा चने के पेड़ पर जितना चढ़ाना चाहो उतना चढ़ाने लायक
हैं।
नारंभट : क्या उन्हें ज्योतिष में रुचि है?
देवी सिंह : रुचि की क्या बात करते हो, यदि ज्योतिषी भी अपने
कथित फलादेश को गलत मान लें तो भी संभाजीराव उसे गलत नहीं मान सकते। वे कहेंगे
कि किसी-न-किसी अंश में फलादेश सही साबित हुआ है।
नारंभट : वाह, फिर तो उन्हें सर्वगुणसंपन्न व्यक्ति मानने
में जरा भी हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। अब एक काम करो, तुम्हारी पहचान है न
उनसे?
देवी सिंह : पहचान? अरे भाई, आज ही उन्होंने अपनी युवा
पत्नी के लिए किसी पूजा-पाठी ब्राह्मण की पूछताछ की थी। तभी तो ये सब बातें
मेरे दिमाग में कौंध गईं।
नारंभट : फिर तो तू पहले वहाँ ही जा। मैं वहाँ एक अज्ञात
ज्योतिषी के रूप में पहुँचता हूँ। मैं जैसे-जैसे उनके भूत एवं वर्तमान का
वर्णन करते जाऊँ, वैसे-वैसे तुम आश्चर्यचकित होकर मेरी प्रशंसा के पुल बाँधते
जाना, समझे।
देवी सिंह : अरे, पर इतना सबकुछ बता सकने लायक ज्योतिष का
अध्ययन तेरे सात पुश्तों ने भी कभी किया हो, इसका मुझे पता नहीं। फिर तू ये
सब नाटक करेगा कैसे? हाँ, कोई खास गुप्त ग्रंथ तेरे पास हो तो बात बन सकती
है।
नारंभट : बिलकुल सही, वैसा ही ग्रंथ है मेरे पास।
देवी सिंह : कौन सा?
नारंभट : कौन सा क्या पूछते हो? मेरा गुप्त ग्रंथ साक्षात्
तुम हो तुम। मुझे उसके नाम-काल की जानकारी दे दो, फिर मैं जब वहाँ आकर उसी
जानकारी को बताने लगूँ तो तुम मेरी दिव्यदृष्टि की तारीफ में पुल बाँधने लगना।
मेरा ज्योतिष का यह गुप्त ग्रंथ है न अद्भुत? अधिकांश ज्योतिषी ऐसे ही ग्रंथ
का उपयोग कर धन ऐंठते रहते हैं।
देवी सिंह : मान लिया भाई तुम्हें!
नारंभट : फिर, वामन का दिमाग है यह। चलो, तुम उस पटेल का
पूरा इतिहास सुनाना शरू करो। बोलो, संतान कितनी, भाई कितने? बाप कितने? चलो,
कहो जल्दी। (निर्गमन)
: दूसरा दृश्य :
[कमलिनी एक पेड़ की छाँव में बैठी है। किशन एवं शंकर उसे हवा करते हुए
जगाने के प्रयास में हैं।]
किशन : नींद लग गई शायद बहना को, कितनी धैर्यवान् है यह !
शंकर : नींद? अरे वह तो धूप-प्यास के कारण सर चकराकर बेहोश
हो गई है। बुखार होते हुए भी वह कल पंढरपुर से घर वापसी यात्रा पर निकली, यही
भूल हुई। प्यास से परेशान होने पर भी वह मुसकराती रही है, कमाल है! नदी पर हुई
दुर्दशा तुमने देखी थी न? फिर भी चोखाजी कहते हैं कि हिंदू लोग जो हमें दूर
रखते हैं, उसकी वजह है हमारा गंदा रहन-सहन। वे कहते हैं कि यदि हम साफ-सुथरे
रहें तो स्पृश्य लोग हमसे घृणा-दूरी नहीं रखेंगे, पर उनकी इस पवित्र कल्पना
और प्रत्यक्ष में कितना अंतर है, यह देखा न? उस कमलिनी जैसी साफ-सुथरी, शुद्ध
एवं सदाचारिणी लड़की तो स्पृश्यों में भी खोजे न मिलेगी; किंतु वह चूँकि अछूत
कन्या है, अतः उसे नदी पर भी पानी पीने से रोका गया। एक तो नदी भी छोटी सी,
उसमें भी जहाँ कहीं उबरे में पानी हो, वहाँ स्पृश्यों को पानी पीने-भरने का
अधिकार। उसके बाद वे वहीं थोड़े आगे चलकर नहाने-धोने का प्रयोग करेंगे, उसके
निचले हिस्से में ढोरों के उपयोग हेतु जगह रखी जाती है। फिर जहाँ नदी सूखी-सूखी
सी हो जाए वहाँ विस्तार का अधिकार अछूतों को रहेगा! उस गंदे, मटमैले पानी के
एक-दो घूँट पीते ही कमलिनी को मिचली आई। वह किसान दूर से तमाशा देखता रहा।
धेड़-अछूत यही पानी तो पीते हैं, फिर इस महारानी को क्या हुआ, ऐसी छींटाकशी
करते चलता बना। इन्हीं लोगों ने पुरखों से लेकर हमें भी ऐसा गंदा पानी पीने
हेतु बाध्य किया और फिर उलाहने देते हैं कि अछूत गंदे, घिने रहते हैं। साफ
रहने, जीने का मौका ही कब दिया इन्होंने? अब संतों के साधुत्व भरे उपदेश
मात्र से हम अछूतों को मनुष्यता प्राप्त नहीं होगी। चित्र में चित्रित तालाब
को देखकर हमारी सदियों की प्यास न बुझ सकेगी। संतों जैसे व्यवहार से हमपर
होनेवाले अन्यायों की मात्रा कम न हो सकेगी। हमें कुछ जालिम, कड़े उपाय ही
खोजने पड़ेंगे।
कमलिनी : भाई, शंकर, मुझे पानी चाहिए।
किशन : देखो, यहाँ से कुछ दूरी पर ही एक गाँव है, जहाँ
मेरे परिचित अछूतों के कुछ मकान हैं। रास्ते में एक सार्वजनिक कुआँ एवं सदा
पानी उड़ाता फव्वारा भी है।
कमलिनी : क्या वहाँ फव्वारा है ? ओह, भाई, यदि उसकी कुछ
बूंदें मात्र भी मेरे होंठों पर गिरें तो इस चातकी की आत्मा शांत हो जाएगी।
पानी! पानी!! चलो-चलो, मैं चलने से नहीं घबराती। चलो, मैं चलती हूँ उस
फव्वारे पर, चलो!
शंकर : ठहरो! तुम्हें थोड़ा बुखार है। फिर ऊपर से धूप भी
काफी है। पानी के लिए तो हम सभी आकुल हैं। उस गाँव तक तुम्हें चलाकर कैसे ले
जाएँ? अरे, वह देखो, एक बैलगाड़ी आ रही है। मैं उससे पूछकर देखता हूँ।
(गाड़ीवान सीटी बजाते हुए प्रवेश करता है।)
अरे भाई, गाड़ीवान, किस ओर जा रहे हो?
गाड़ीवान : मायापुर की ओर जा रहा हूँ।
शंकर : वाह! बहुत बढ़िया। हम तीनों को यदि आप मायापुर तक ले
चलें तो बहुत उपकार होगा। हमारी इस कमली को ज्वर है, चक्कर भी आया था। हम
आपका भाड़ा घर जाते ही चुकता कर देंगे।
गाड़ीवान : तो फिर बैठो गाड़ी में। मुझे सहज ही सवारी मिल
गई, इसमें उपकार की क्या बात? (
किशन के पास आते ही उसे देखकर)
पर ये है कौन? यह मायापुर के जान्या धेड़ का छोकरा तो नहीं? ये धेड़ मेरी
गाड़ी में चलेगा?
शंकर : मैं भी अछूत हूँ।
गाड़ीवान : अछूत होकर मेरी गाड़ी में बैठकर शोभायात्रा
निकलवाना चाह रहे थे क्या मायापुर में? मजाक समझ लिया क्या? कोड़े लगा दूँगा
फिर कभी ऐसा पाजीपना किया तो।
किशन : मजाक नहीं, पर यदि कोई महार हुआ तो उसपर बिलकुल दया
नहीं करना-ऐसा क्या आपका हिंदू धर्म कहता है? पटेलजी, मेरी बहन को प्यास और
धूप के ज्वर से चक्कर आ रहे हैं। इसलिए दया करिए और उस अगले गाँव तक हमें इस
छायादार गाड़ी में ले चलिए। हम पहुँचते ही किराया दे देंगे। ये हमारे वस्त्र
चाहें तो रहन रख लें, पर दया करिए।
शंकर : अभी आपने जिनका नाम लिया था, उन्हीं जानोबा नायक की
बेटी है ये।
गाड़ीवान : (वहाँ से जाते हुए) वाह, जान्या धेड़ का
जानोबा नाम बना दिया? फिर उस बड़े बाप की इस लाड़ली को मुझ गरीब की यह गाड़ी
ठीक नहीं रहेगी। मैं आगे चलकर कोई राजा की पालकी या डोली दिख गई तो भेज दूँगा
सेवा में।
किशन : अरे, तुम्हारी इस गाड़ी में बैल जोते गए हैं और अपना
कुत्ता तुमने जंजीर से बाँध गाड़ी के अंदर बैठा रखा है। धूप से लपलपाती जीभ से
वह तुम्हारा हाथ चाट रहा है। उस बैल से तेरी गाड़ी दूषित नहीं होती, उस
कुत्ते की लार से भी हाथ दूषित नहीं होते। आदमियों जैसे आदमी हम महार, तेरे
हिंदू धर्म के हम हिंदू-हमारे स्पर्श मात्र से क्यों तेरी गाड़ी दूषित होगी?
क्या विपत्ति में भी हम दया के पात्र नहीं हैं ? क्या हम कुत्तों से भी गंदे
हैं?
गाड़ीवान : मेरा कुत्ता तुम महार-भंगियों की तरह गाँववालों
का मैला ढोता नहीं फिरता।
शंकर : वह केवल मल खाता है। रही मैले की टोकरी उठाने की बात,
तो तुम भी तो उसे ढोते हो। पेट में काहे का बोझ लेकर खड़े हो भाई?
गाड़ीवान : भड़वो, लड़ना हो तो भगवान् से लड़ो। मुझसे क्यों
मुँह लड़ाते हो? उस भगवान् से लड़ो जिसने तुम्हें कुत्ते के घर नहीं, धेड़ों
के घर पैदा किया। मैंने जैसे अपने कुत्ते को साँकल से बाँध रखा है वैसे ही
भगवान् ने तुम्हें रूढ़ि की श्रृंखला से गंदे कामों से बाँध रखा है, मैंने
नहीं। मुझे क्यों, भगवान् को कोसते रहो। मैं तो चौहान हूँ। मैं भला धेड़ों को
अपनी गाड़ी में बैठाऊँ? पैरों की जूती सिर पर रखूँ?
शंकर : (मन में) अरे रे! कितनी दुर्गति है हमारी!
हमारी आँखों के सामने हमारी महिलाओं की दुर्दशा हो तो भी हमें वह सहनी पड़ती
है। ऐसा लगता है कि सबसे धिक्कारा हुआ अपना यह काला चेहरा कमलिनी के सामने फिर
से न दिखाऊँ। वह मुझे कायर समझती होगी।
(उसके सम्मान की रक्षा कर सकने योग्य पौरुष इस काली मूँछें रखनेवाले
मुझमें नहीं है
, यह जानकर मेरे प्रति उसका प्रेम घटता होगा।)
कमलिनी : क्या सोच रहे हो, शंकर? किस चिंता में डूबे हो?
तुम्हारा चेहरा क्यों मुरझा गया? मुझे गाड़ी वगैरह की कोई जरूरत नहीं। लो मैं
चलने-फिरने लायक हो गई। गाँव पास ही तो है। हम पैदल चले चलेंगे। वहाँ हमें
पानी मिलेगा।
शंकर : कमली, उस पानी से हमारी प्यास तो बुझ जाएगी, पर
जन्म-जन्मांतर से लगे ये काले धब्बे क्या छूट सकेंगे? हम धेड़ों से लगे ये
छुआछूत के धब्बे धो सके, ऐसा पवित्र जल गंगाघाट पर भी खोजने से नहीं मिलेगा,
फिर ऐरे-गैरे पानी की तो बात ही छोड़ दो। सचमुच इस धेड़-अधेड़ जाति में पैदा
होने के स्थान पर किसी पशु या प्राणी की योनि में पैदा होना गवारा होता हमारे
हिंदू धर्मी लोगों को। हे भगवन्, क्यों पैदा किया तुमने हमें इस जाति में ?
कमलिनी : (मुसकराते हुए) क्या वाकई तुम्हें धेड़
होने का पश्चात्ताप हो रहा है? क्या तुम्हें हमारी जाति में कुछ भी आकर्षक
नहीं लगता? फिर ठीक है, भाई साहब, चलो, हम यहाँ क्यों रुकें? जिसे हमारी
जाति में कोई आकर्षण न लगे, उसके सिर का बोझ बन हम यहाँ क्यों रुकें?
शंकर : कमली, अरे तुझे कब किसने कहा कि तू आकर्षक नहीं?
मेरे कहने का अर्थ ही तू समझ नहीं पाई। हम दोनों को भगवान् ने एक ही जाति में
पैदा किया। तभी तो हम एक-दूसरे से मिल सकते हैं। उसके लिए तो मैं भगवान् का
लाख-लाख बार आभारी हूँ। मैं तो केवल सार्वजनिक आचरण एवं सामाजिक दृष्टिकोण के
बारे में बोल रहा था। अब तो वैसा भी कभी नहीं बोलूँगा। मेरी कमल...चलो,
आगे बढ़ें (आगे बढ़ते हैं,
दूसरे परदे से बाहर आते हैं।)
कमलिनी : अभी कितनी दूर है वह गाँव, शंकर? मुझे न...ओह
माँऽऽ (जमीन पर गिरती है।)
शंकर : अरे, इसे फिर से चक्कर आ गया लगता है? कमली, ओ
कमलीऽऽ!
किशन : (हवा करते हुए) लड़की की क्या दुर्दशा हो रही
है! दीदी, ओ दीदी, मेरी प्यारी बहना, निर्दोष बहना!
शंकर : किशन, वह देख, एक घुड़सवार आ रहा है, कमला को इस
तरह अब चलाते जाना परम निष्ठुरता होगी। इसलिए बेहतर होगा कि हम इसे घोड़े पर
साथ ले चलने के लिए उस घुड़सवार से विनती करें।
किशन : अरे भाई, हम निवेदन लाख बार कर लें, पर उसे कबूल तो
होना चाहिए न। हमारे हिंदुओं की सामाजिक रूढ़ि के अनुसार पालकी में कौन बैठे?
हत्ती पर कौन? घोड़े पर कौन? बैल पर कौन? भैंसे पर कौन? ऊँट पर कौन? किस
वाहन पर कौन सी जाति बैठे, यह निश्चित है। ऐसे ही उच्च जाति से नीची तक
बाँटते-बाँटते सब वाहन समाप्त हो जाने से महार के हिस्से में उसके स्वयं के
पैर का वाहन ही शेष रह गया। ऐसे में महार को घोड़े पर कौन चढ़ाएगा?
शंकर : तो फिर एक जुगत करते हैं, हम अपनी जाति बताएँ ही
नहीं। फिर वह तो किराये पर माल ढोनेवाला खच्चर दिखता है। वह देखो, घुड़सवार इस
ओर ही आ रहा है। (घुड़सवार आता है।)
शंकर : राम-राम, दादा। एक प्रार्थना है, कड़ी धूप में
चक्कर खाकर यह लड़की बेहोश पड़ी है। पानी भी कहीं नहीं है। यदि आप इसे पास के
गाँव तक ले चलें तो बड़ी कृपा होगी।
घुड़सवार : अरे, इतनी सी बात के लिए क्यों इतना गिड़गिड़ाते
हो, भाई। तुम्हारी बच्ची मेरी बच्ची सी है। चलो, उस गाँव के फव्वारे का पानी
पिलाकर पास के बगीचे में आराम कराओ तो तत्काल ठीक हो जाएगी। चलो, बैठाओ उसे।
किशन : भगवान् भला करे तुम्हारा, भाई। कमलिनी दीदी, चलो
उठो, अब घोड़े की सवारी करनी है। अब पानी मिल जाएगा।
कमलिनी : (धीरे से अकेले से) लेकिन भाई, हम अछूत
हैं, क्या यह बता दिया तुमने?
शंकर : अब मेहरबानी भी करो और उसका उच्चारण भी न करो।
कमलिनी : फिर शंकर, मुझे घोड़ा नहीं चाहिए। मैं ऐसे ही चल
लूँगी, पर उस सज्जन को धोखा न दूँगी। और कोई दुष्ट होता तो चला जाता, पर इस
दयालु को धोखा देना उचित नहीं लगता और मैं अछूत कन्या हूँ, यह क्योंकर छुपाया
जाए? मुझे तो उसमें कोई लाज-शर्म नहीं लगती। घोड़े पर बैठने हेतु मैं अपने
माँ-बाप को क्यों नकारूँ?
किशन : हे दयालु सज्जन! आप यह पूछे बिना ही कि हम कौन हैं,
क्या हैं, भूल दया से सहायता देने को प्रवृत्त हुए हैं। अतः आपकी वह दया इतने
उथले निश्चय की नहीं होगी कि हम महार हैं, यह सुनते ही उसका निर्मल प्रवाह
एकाएक सूख जाए।
घुड़सवार : क्या आप महार हैं ?
कमलिनी : जी, हम महार ही हैं और जिस तरह गैर महारों के प्राण
प्यास से व्याकुल होते हैं उसी तरह हम महारों के भी तड़पते हैं। हमारे भी तड़प
रहे हैं।
घुड़सवार : हे विनम्र लड़की, महार तो मनुष्य हैं, पर सभी
जीव-जंतु प्यास से मनुष्य जैसे ही तड़पते हैं। मनुष्य की तरह ही दया के पात्र
रहते हैं। महार को घोड़े पर बैठाकर अपने ही गाँव ले जाऊँगा तो तुम्हें पहचानते
ही लोग मुझपर गोबर मारेंगे, मेरी वृत्ति डूब जाएगी और मेरे पत्नी, बच्चे
भूखों मरेंगे।
कमलिनी : महाराज, आपने जो दया, सहानुभूति जताई उससे मेरी
आधी प्यास बुझ गई। आप बिलकुल संकोच न करें। अच्छा हुआ जो मैंने बता दिया कि हम
महार हैं, यथा मुझपर दया करने से यदि आपके पत्नी-बच्चों की हाय लगती तो आपकी
दया का झरना मेरी इस कपट की गरमी से सूख गया होता और आगे-पीछे कोई सत्पात्र
याचक भी उस झरने पर आकर अपनी प्यास बुझा न पाता। वंचित दया पर-दुःख से फिर से
झरने नहीं लगती-आप जाएँ।
घुड़सवार : उदार बेटी, तुम्हारे संकट काल में मेरी कोई
सहायता संभव नहीं हो पा रही है। इस प्रायश्चित्त का मैं दंड चुका रहा हूँ। ये
बीस रुपए रख लो, तुम्हारी यात्रा में काम आएँगे। (प्रस्थान)
कमलिनी : बीस रुपए! अरे, ये क्या? चला गया वह? कितना
दयालु है बेचारा। चलो शंकर, हम लोग आगे बढ़ें। यह सही है कि चलने में मुझे
काफी कष्ट है, पर अब लगता है कि मैं जाकर पानी पी सकती हूँ।
(जाते हैं।)
: तीसरा दृश्य :
[इब्राहिम का आगमन।]
इब्राहिम : लड़की हो तो ऐसी हो। हिंदुओं की ऐसी कोई जाँबाज
शेरनी मुझे पहले मिलती तो मैं भला क्योंकर मुसलमान बनता? मुसलमान बनकर चार
साल बीत गए, पर कुरान का एक लफ्ज भी मुझे पता हो तो खुदा कसम! वो लोग जैसी
उर्दू बोलते हैं वैसी उर्दू भाषा मुझे थोड़ी ही आती है। मैं पैदाइशी हिंदू,
मेरा दिमाग भी हिंदू सोचवाला, पर जब तक हिंदू था तब तक ब्राह्मण से शूद्रों
तक तो क्या ये महार भी नीच कहकर दूर भगाते रहे। एक-दूसरे को अछूत समझकर झिड़की
देनेवालों में मानो प्रतिस्पर्धा चलती रहती है एक-दूजे को लात मारने की। इसलिए
हिंदू धर्म से चिढ़कर मैंने मुसलमान बनना स्वीकारा। बहन मुझे मिलने-समझाने आई
थी, पर हमारे सूबेदार बंगश खान उसपर आशिक हो गए। फिर उसे भी मुसलमान बना कर हम
सूबेदार के साले बन बैठे। इतना ही नहीं, पाँच-पचास सिपाहियों के नायक बन बैठे
हम। हमारी शान-बान बढ़ गई। काम भी ऐसा मिला कि वाह! जो भी हिंदू सुंदरी मिलती
उसे पकड़कर पहले सूबेदार की खिदमत में पेश करना। बाद में मसजिद में ले जाकर
उसका धर्मांतरण करना। सूबेदार तो पूरा पगला गया है हिंदू लड़कियों को हथियाने
में, पर अब यह कन्या तो मैं ही हथियाऊँगा। बागड़ पर चोरी से उछलकर दूसरों के
फूल चुनने में सारा शरीर काँटों से लहूलुहान हो हमारा और तोड़े हुए फूलों की
मालाओं से गला शोभायमान और शीतल हो हमारे बहनोई साहब का, उस सूबेदार बंगश खान
का। यह लड़की उसकी नजरों से बचानी पड़ेगी। देवी सिंह जैसे कहता है, इसे गंगाजी
के घर पर रख देंगे। फिर उससे जबरन राक्षस विवाह करेंगे। उसपर जोर-जबरदस्ती
करने के बाद वह मुसलमान बनने को तैयार हो ही जाएगी। मसजिद में ही उससे निकाह
कर लेने के बाद साले साहब को खबर करेंगे कि हमें किसी जागीर का तोहफा दिया
जाए।
(देवी सिंह का आगमन) अरे, यह देवी सिंह तो आ ही गया।
देवी सिंह : क्यों, देखा? कैसा शिकार ढूँढ़ा हमने?
इब्राहिम : जाकर पकड़ लूँ क्या अभी?
देवी सिंह : अभी नहीं, धीरे से, जो कुछ हमने सुना, उसके
अनुसार वे फव्वारे पर पानी पीने जाएँगे। वहाँ यदि तुम इन्हें पकड़ोगे तो सारे
हिंदू चिल्लाएँगे कि तुमने हिंदू लड़की भगा ली। फिर तो हम खुलकर साथ न दे
पाएँगे, पर जब वे तीनों धेड़ पानी पीने आएँगे और उन्हें पानी न मिले तो तुम
उनसे मिलकर उन्हें जबरन पानी पीने के लिए बहकाना। तुम सरकारी मुसलमान अधिकारी
हो। उनकी सहायता करोगे, ऐसा विश्वास उनमें जगाओ। जब वे जबरदस्ती पानी पीने
बढ़ेंगे तो हमसब उनपर टूट पड़ेंगे। उस भीड़-भड़क्के में शासकीय अधिकारी के
नाते मैं तुमसे उन्हें गिरफ्तार करने की माँग करूँगा, और तुम उन्हें पकड़
लेना। इस तरह हिंदुओं का विरोध नहीं रहेगा बल्कि सहयोग ही मिलेगा। मुझे और
नारंभट को वे धर्म संरक्षक की संज्ञा देंगे। तो तुम बढ़कर उन्हें फव्वारे से
पानी प्राप्त करने के लिए उकसाओ, चलो। (जाते हैं।)
: चौथा दृश्य :
[किशन,शंकर और कमलिनी का प्रवेश।]
शंकर : आखिर पहुँच गए हम गाँव में।
कमलिनी : अब किसी भी तरह पहले मुझे दो घूँट पानी पीना है। वो
किसका घर है, देखो?
किशन : चौकीदार का है। चलो, वहाँ पानी के लिए पूछते हैं। ये
देखो, उनका लड़का इस तरफ आ रहा है। क्यों बेटे, हम प्यासों को थोड़ा जल
पिलाओगे?
लड़का : हाँ-हाँ, थोड़ा ही क्यों, भरपेट जल पिलाऊँगा। आइए,
घर के अंदर आइए। मटके का ठंडा जल पिलाता हूँ आप सबको।
किशन : हम अंदर नहीं आ सकते, बेटे, क्योंकि हम महार हैं।
लड़का : (पास आते हुए) तो क्या हुआ?
कल ही मैं मामा के यहाँ से बैलगाड़ी में बैठकर घर लौटा, तब मुझे जमके प्यास
लगी थी। फिर तुम लोग तो धूप में चलकर आए हो, तुम्हारे प्राण कितने अकुलाए
होंगे प्यास से। महार हुए तो क्या हुआ?
कमलिनी : (हाथ आगे बढ़ाते हुए) बेटे, भगवान् तेरा
भला करे। ऐसा लगता है कि चेहरे पर हाथ फेरकर प्यार करूँ। कितना दयावान है तू!
गीत
इस बालक से लाड़ करूँ
इस बालक को प्यार करूँ
ऐसा मुझको लगता है
कितना प्यारा लगता है
चेहरे को छू सहला लूँ
दिल में इसको अपना लूँ।
लड़के की माँ: ऐ हरामजादी, कहाँ से यह बला यहाँ आई, पता
नहीं। मेरे पुत्र के पास आने की हिम्मत ही कैसे की तूने? मुँह से बताए जा रही
हो कि महार हैं हम। फिर अपनी छाया क्यों डाली मेरे बेटे पर? कहती है, सहला
लूँ इसे। चल हट यहाँ से, जूतों से पूजना चाहिए तुम लोगों को। चल रे, अंदर
चल।
लड़का : ऐसा मत कहो माँ। बेचारे प्यासे हैं।
(माँ लड़के को खींचकर ले जाती है।)
कमलिनी : कितना दयालु प्यारा लड़का था वो।
शंकर : उसकी माँ भी उसकी आयु में बच्चे जैसी ही दयालु रही
होगी। आज का यह प्यारा बालक कल जब बड़ा हो जाएगा तो उसके जैसा ही कठोर बन
जाएगा, क्योंकि दया-सहानुभूति की अमृत-लता बचपन में जितनी मुलायम दिखती है,
उसे जाति के, अहम् के कीड़े लगते ही वह उतनी ही सूखी हो जाती है। यदि
ब्राह्मण लोग बालकों को बचपन से ही यह सिखाना शुरू कर दें कि महार लोग भी
मनुष्य हैं, हिंदू धर्मी हैं, हम भाई हैं, तो बड़े होने पर उनके मन में
छुआछूत का भाव ही नहीं रहेगा, पर ...
कमलिनी : अब पहले पानी चाहिए। वो फव्वारा दिख ही रहा है।
वहाँ भी हमें किसीने रोका तो?
इब्राहिम : (प्रवेश करके) तो क्या? जबरदस्ती घुसकर
पानी पियो। तुम महार हो, क्या इसलिए पानी पीना भी नहीं मिलेगा तुम्हें?
भगवान् पानी बरसाता है, वो क्या मात्र सवर्ण हिंदुओं के लिए बरसाता है ?
मैंने अभी दूर से तुम्हारे साथ हुआ छल देखा है। मैं भी पहले हिंदू डोम था।
इतना क्षुद्र था कि जैसे ये सवर्ण तुम महारों को झिड़की देते हैं वैसे ही तुम
महार हमें झिड़की देते थे, दूर रखते थे। एक दिन मैं भी प्यास से तड़प रहा था।
इस फव्वारे पर रोकने लगे लोग मुझे। मैं सीधे घुसा और अल्ला हो अकबर चिल्लाया।
उससे उन्होंने मुसलमान मान लिया और फिर पानी पीने का ही नहीं बल्कि नहाने का
भी अधिकार मिल गया। इसलिए तुम लोग आगे बढ़ो। मैं पंढरपुर का कोतवाल हूँ। मैं
मुसलमान राज्यकर्ता हूँ। इसलिए जितना चाहो, पानी पियो। देखता हूँ किसकी
हिम्मत है रोकने की!
किशन : इतनी जोर-जबरदस्ती की क्या बात है। यहाँ नहीं तो आगे
हम महारों के ही चार घर हैं, वहाँ पी लेंगे पानी।
शंकर : उस उबरे जैसे नाले का पानी। छि:, मैं तो इस फव्वारे
की अप्सराओं से गिरता साफ-सुथरा पानी पीऊँगा। इसपर मेरा भी तो अधिकार है।
[फव्वारे का दृश्य।]
कमलिनी : भाई देखो, वह फव्वारा दिख रहा है। कितनी ठंडी
बूँदें उड़ रही हैं! अरे, एकाध बूँद मेरी जिह्वा पर गिरेगी तो कितना मजा आएगा!
किशन : (फव्वारे के पास खड़े लोगों से) हम लोग
राहगीर हैं, क्या आप हमें थोड़ा सा पानी पिला देंगे?
अनेक व्यक्ति : भाई, पिलाने की क्या जरूरत? तुम खुद लेकर पी
लो। नगरसेठ ने सभी के उपयोग के लिए यह बनवाया है। उस तरफ मुसलमानों के लिए
टोंटियाँ लगी हैं, इस ओर हिंदुओं के लिए। तुम लोग उससे जी भरके पानी पी लो।
किशन : पर हम लोग तो महार हैं।
व्यक्ति : फिर इतने नजदीक आकर कैसे खड़े हुए? क्या कहें
तुम्हारी जुर्रत को, आँ? ( जाता है।)
किशन : हे दयालु माई-बाप, हम महारों को कोई पानी पिलाएगा
क्या?
कमलिनी : ओ माई, हमें पानी पिलाओ जी।
गीत
पानी दे दे पानी दे, अम्मा ऽ माई पानी दे …
प्यासे व्याकुल तन-मन हैं, ठंडा-ठंडा पानी दे…
बिनती करती झुककर मैं, ठंडा-ठंडा पानी दे।
शंकर : अरे, व्यर्थ ही गिड़गिड़ा रही हो तुम। इन पाषाण
हृदयी लोगों का दिल नहीं पसीजेगा। मुसलमान यहाँ पानी पी सकते हैं, पर हम
महारों को दूर से भी पानी पिलाना इन्हें मंजूर नहीं होता। हम कहने को तो हिंदू
हैं, पर मूर्तिभंजक मुसलमान हम मूर्तिपूजकों से पवित्र लगता है इन्हें। चल,
मैं पिलाता हूँ तुझे पानी।
देवी सिंह : नारंभट, देखते क्या हो, लगाओ आवाज, चिल्लाओ
जोर से कि महारों ने पानी दूषित किया।
नारंभट : चिल्लाता हूँ, पर इस मुसलमान इब्राहिम को तू यहाँ
क्यों ले आया?
देवी सिंह : वह नहीं तो और कौन उस लड़की को पकड़कर ले जाने
का हुक्म देगा, तुम्हारा बाप! वह कोतवाल है।
नारंभट : पर मुसलमान है?
देवी सिंह : हाँ, पर लड़की भी तो सुंदर है। बोलो, यदि
मुसलमान की सहायता न लेनी हो तो हाथ आया शिकार छोड़ना पड़ेगा। बोलो, हो राजी?
क्या छोड़ दें यह अपना प्रिय खेल?
नारंभट : खेल छोड़ने की जरूरत नहीं, पर उसके साथ इस अरबी
घोड़े की चाल मुझे नहीं जँचती।
देवी सिंह : अरे, पर उस घोड़े की सवारी करना मैं जानता हूँ।
उसके हाथ थोड़े ही लगने दूँगा ये सुंदर कबूतरी। उसकी कमल-सी खिली-खिली आँखें
देख और अपनी धर्मबुद्धि की पिचपिची आँखें मूंद ले।
कमलिनी : (शंकर को रोकते हुए) नहीं, नहीं। मैं उनकी
ईमानदार भावनाओं को जोर-जबरदस्ती से नहीं तोड़ने दूँगी। हमारे दर्द से पीड़ित
होकर जब उनका दिल पसीजेगा तभी मैं वह पानी पीऊँगी। वो देखो, कोई दयावान
ब्राह्मण अपना संध्याकर्म छोड़कर हमें पानी पिलाने आ रहा है।
पुरुषोत्तम
शास्त्री : बाई, लो पानी। अँजुली बढ़ाओ।
सब लोग : शास्त्रीजी, अरे ये क्या? वे महार हैं और आप
उन्हें संध्या जल...?
शास्त्री : मेरे संध्या जल में इन पतितों को पावन करने की
ताकत है। मेरे गायत्री मंत्र का स्वर पाठ कानफोड़ू नहीं है, उसमें अपने स्पर्श
से दया का मधुर संगीत फूटता है। बैठ बेटी, मेरा यह संध्या का पवित्र जल तेरे
मुँह में डालना ही आज के मेरे संध्या कर्म का पहला आचमन होगा।
कमलिनी : भाई शंकर, तुम लोग पहले पीयो।
किशन : पगली कहीं की! पहले तू पी ले। फिर बचेगा सो हम पी
लेंगे।
शास्त्री : बचेगा सो क्यों? सारे लोग पेट भर पानी पियो। मैं
तुम्हें पात्र भर-भरके पानी पिलाऊँगा।
[कमलिनी पानी पीने लगती है।]
सब
चिल्लाते हैं : पुरुषोत्तम शास्त्री पर छाया पड़ी। यह
ब्राह्मण भी अब भ्रष्ट हो गया...महारों के छींटे उड़े।
नारंभट और
देवी सिंह : और यह देखो, वैसे ही फव्वारे पर जाकर वही
महारों के छींटोंवाली और छाया पड़ी लुटिया डुबो रहा है।
सभी
चिल्लाते हैं : पनघट भ्रष्ट हुआ। लुटिया भ्रष्ट हुई। सबकुछ
भ्रष्ट हुआ। (सभी की चिल्लाहट से असमंजस की स्थिति।)
इब्राहिम : (आगे बढ़कर) अरे, क्यों शोर मचा रखा है?
क्या हो गया?
देवी सिंह : कोतवालजी, आप बड़े अच्छे मौके पर आए। हमारी
शिकायत है-ये महार हमारे फव्वारे पर जबरन आए और पानी पीया। हमारा यह फव्वारा
भ्रष्ट हो गया। पकड़ो इन सबको और हमारा धर्मरक्षण करो। आप राजपुरुष जो ठहरे।
इब्राहिम : समझ गया। अब चुप रहो। ऐ धेड़ो, तुम लोग इधर ही
रुको। मैं सब चौकसी करता, क्या? पहले मेरी प्यास बुझाओ।
(अब लोग दौड़ते हैं।)
सब लोग : फौजदार साहब को प्यास लगी? मैं लाता हूँ लोटे में
जल भरके।
मेरा लीजिए, बड़ा साफ, स्वच्छ जल है।
इब्राहिम : फौजदार साहब खुद जाकर पानी पीएँगे।
सब लोग : फौजदार साहब खुद जाकर पानी पीएँगे? रास्ता दो, राह
दो उन्हें। बड़ा न्यायी इनसान है यह। ऐसे न्यायी मुसलमान अफसर हैं, इसीलिए
हमारे धर्म की सुरक्षा हो रही है। ये मुसलमान हिंदुओं की हिफाजत करते हैं।
शंकर : कमलिनी, देखी, हमारे हिंदुओं की दुर्गति। मुझे तो
अब हिंदू कहलाना भी नापसंद होता जा रहा है। ये डोम मुसलमान बनते ही खान साहब
हो गया। अब वह सीधा जाकर पानी पी रहा है, पैर धो रहा है और हमें दो घूँट पानी
दूर से भी पीने की रोक है, क्योंकि हम मुसलमान नहीं हुए। मुझे तो अब लगता है
कि इसके बाद हम हिंदू समाज पर अपनी छाया डालना छोड़ कहीं और दूसरा घर खोजें।
कमलिनी : राम-राम, क्या बात करते हो शंकर! जितना दुःख मुझे
पानी न देनेवाले पवित्रता के पुजारियों के शब्दों से नहीं हुआ, उतना तेरे
वाक् बाणों से हुआ है। हे मेरे प्रिय साथी, हम हिंदू ही हैं। ये हिंदू भी
हमारे ही हैं। यदि यह पूर्वजों द्वारा अर्जित निवास छोड़कर हम और नया घर
खोजेंगे तो वह केवल नरक में ही मिलेगा।
इब्राहिम : हाँ, सब लोग यहाँ आओ। पाँव पोंछने के लिए रूमाल
मिलेगा क्या?
सब लोग : हाँ-हाँ, क्यों नहीं। फौजदार के पैर पोंछने हैं।
ये लीजिए मेरा पवित्र वस्त्र।
(इब्राहिम पवित्र वस्त्र से पैर पोंछता है।)
इब्राहिम : बोलो, देवी सिंह, क्या हुआ?
देवी सिंह : जनाब, इन धेड़ों ने हिंदुओं का पानी भ्रष्ट कर
डाला, हिंदू धर्म को गालियाँ दीं।
इब्राहिम : बस, इतना ही। उसमें क्या हुआ? हिंदू धर्म को हम
भी गाली देता, क्या?
अनेक व्यक्ति : हाँ जी, पर हमारी एक
प्रार्थना है। आप मुसलमान जो हैं, हिंदू धर्म को गालियाँ देना आपका धर्म ही
है, धेड़ों का नहीं।
इब्राहिम : अच्छा, यदि ये तीनों मुसलमान हुए तो भरने दोगे
पानी यहाँ ?
सब लोग : हाँ जी, पीने देंगे, पर जब तक ये हिंदू महार हैं,
हम इन्हें कैसे पानी छूने दें? आप न्यायी हैं। इन्हें पानी छूने मत दें।
इब्राहिम : (खुद से) सचमुच, भगवान् ने हिंदू धर्म
का विनाश करने हेतु ही इन लोगों की बुद्धि भ्रष्ट कर दी है। जब तक महार
हिंदू हैं, हम उसे पानी छूने देना अधर्म मानते हैं, पर वे ही धर्मांतरण करके
सामने आते हैं तो हम उन्हें ससम्मान पानी छूने देने को तैयार हो जाते हैं।
इनके इस व्यवहार से ही हमारे मन की श्रद्धा टूटती जाती है।
(लोगों को देख जोर से बोलता है)
अच्छा, अब इस झगड़े की सुनवाई हम पंढरपुर चौकी पर करेंगे। देवी सिंह, तुम सब
लोग मेरे साथ चौकी पर चलो। हम इस लड़की को भी चौकी पर ले जाएँगे।
शंकर : हम तीनों एक साथ चौकी चलेंगे। हम इस स्त्री को अकेले
तुम्हारे साथ नहीं भेजेंगे।
इब्राहिम : क्या बोलता है, बदमाश?
देवी सिंह : सबसे मुँह लड़ाता है, साला। पाजी कहीं का!
इब्राहिम : देवी सिंह, पकड़ो इस लड़की को। और तुम सब लोग इन
धेड़ों को पकड़कर ले जाओ। पकड़ो सबको, नहीं तो तुमने मेरी आज्ञा नहीं मानी,
यह कहकर घरबार जप्त कराऊँगा, सुना?...पकड़ो सालों को।
[देवी सिंह और साथी'पकड़ो-पकड़ो'चिल्लाते
हैं। कमलिनी को खींचते हैं। शंकर और किशन प्रतिरोध करते हैं,पर
सब मिलकर उन्हें पकड़कर रस्सी से बाँधते हैं। नारंभट कमलिनी को लेकर जाता है।
वह बचाओ-बचाओ चिल्लाती है। इसी हो-हंगामे में इब्राहिम भी वहाँ से जाता है।]
: पाँचवाँ दृश्य :
[संभाजी पटेल बातचीत करते आते हैं।]
संभाजी : मेरे जीवन की ढलती यात्रा में मेरी एकमात्र आधार बनी
मेरी प्रिय पत्नी मालिनी एक क्षण के लिए भी नजरों से ओझल हुई तो बेचैनी होने
लगती है। अभी छोड़ आया हूँ उसे, पर लगता है कि फिर जाऊँ उसके पास।
(दरवाजा खटखटाता है।)
मालिनी : अरे, ये क्या, फिर वापस आ गए?
संभाजी : कुछ देर पहले मेरे पैर दबा दिए थे, अब मैं तुम्हारे
पैर रगड़े देता हूँ।
मालिनी : उफ, ये उलटी बात किसलिए?
संभाजी : अरे पगली, प्रथम पत्नी के पैर नहीं रगड़ना
चाहिए-यह ठीक है, पर तू तो मेरी लाड़ली दूसरी पत्नी है। प्रथम पत्नी पति की
बेटी या नातिनी दिखने योग्य छोटी थोड़े ही रहती है। इसीलिए उसके बारे में
विषय-लालसा जाग्रत हो जाती है। अतः शास्त्रों में वह आज्ञा केवल पहली के लिए
निर्देशित रहती है, पर दूसरी पत्नी चूँकि 'बालिका वधू' सी दिखती है। अत: वर
के मन में उसके प्रति वात्सल्य भाव जाग्रत होता है। तुम्हें देखकर मेरे मन में
स्वामित्व भाव की अपेक्षा सेवाभाव ही जाग्रत हुआ है। छोटी बच्ची सा तेरे
लाड़-प्यार को जी होता है। इसलिए तेरे पैर दबाने की इच्छा हो रही है। तीसरी
शादी के बारे में तो कहते हैं कि चूँकि लड़की नातिनी के वय की होती है। अतः
उसे गोद में लेकर भी घूमा जा सकता है। क्या मैं तुझे गोद में लेकर घूम लूँ?
वात्सल्य रस मेरे दिल में उफन रहा है। करूँ मैं तुझे लाड़?
मालिनी : बस-बस, रहने दीजिए। आपको और लाड़-प्यार करना ही है
तो पति जैसे करिए, बाप जैसे नहीं, समझे ! वात्सल्य भाव के लाड़-प्यार से जी
जब ऊब जाता है तभी लड़कियाँ शादी करती हैं। गाँव के नाममात्र पटेल कहलाने से
क्या फायदा? कुछ पुरुषार्थ कर दिखाइए। तभी मेरा पटेलनी कहलाना सार्थक होगा।
मात्र पैर रगड़कर थोड़े ही कुछ फल मिलेगा। कोई पूजा-पाठ करने के लिए पुजारी
रखूँ तो वह व्यवस्था भी तो नहीं हो पा रही आपसे।
संभाजी : अरे, मैं तो बताना भूल ही गया था कि कल ही मैंने
देवी सिंह को तुम्हारे लिए कोई पुजारी खोज लाने भेजा है।
मालिनी : पुजारी मात्र विद्वान् होने से नहीं चलेगा। मुँह
में तमाखू रखे, नाक पर ऐनक खींचते तुतलाते संस्कृत रटनेवाली पापी सुरत मुझे
नहीं चाहिए। महिलाएँ पापयोनि हैं, रत्न तो पत्थर मात्र हैं, सोना मात्र
मिट्टी है, भोग तो रोग ही हैं, ऐसे शोकगीत गानेवाला पुजारी कितना भी
विद्वान् क्यों न हो, पर वह मुझे नहीं चाहिए। इसके पहले तुम जैसा लाए थे, वैसा
ही पुजारी इस बार भी हुआ तो मैं उसका मुँह भी नहीं देखूँगी, समझे।
संभाजी : भला ऐसा-वैसा क्यों कर लाऊँगा मैं, आँ। बल्कि जिसका
मुखड़ा सुंदर हो, जिसे घंटों निहारते रहने में मुझे अच्छा लगे, ऐसा
काव्य-कथा-संगीत प्रेमी कथावाचक मैं लाने जा रहा हूँ। तुम्हें दिखाकर ही रखूँगा
उसे, समझी बेटी? ( गोद लेना चाहता है।)
मालिनी : बस, हो गया तुम्हारा यह वात्सल्य रस। क्या मैं
तुम्हारे लिए बेटी हूँ? किसी दूसरे को बेटा या बेटी कहने की ललक जाग रही है
मेरे मन में, समझे।
[देवी सिंह का प्रवेश।]
देवी सिंह : राम-राम पटेलजी।
संभाजी : आइए, आइए! आप ही चाहिए थे मुझे। पुजारी-पंडित मिला
क्या?
देवी सिंह : नहीं, अभी तो नहीं मिला, पर एक खबर लगी है कि
कोई ज्योतिषी नगर में आया है जिसकी नगर में काफी चर्चा है, पर मेरा ज्योतिष पर
उतना भरोसा नहीं है। अतः मैंने पूछताछ नहीं की।
संभाजी : वही तो गलती की आपने। ज्योतिषी और पुराणवाचक ऐसा
दोनों कलाओं का ज्ञाता अगर मिलेगा तो वह निश्चय ही मेरी पत्नी का और मेरा
मनोरंजन करेगा। ज्योतिष पर विश्वास नहीं, ऐसा क्यों कहते हो? यदि मैं तुम्हें
यह बताऊँ कि ज्योतिष के अनुमान कितने सही होते हैं, तो तुम विश्वास नहीं
करोगे।
देवी सिंह : सच!
संभाजी : मेरी प्रथम पत्नी का देहांत होने पर मैं दूसरी शादी
करूँगा, यह एक ज्योतिषी ने बताया था, वह पूरा सच निकला। यह भविष्यवाणी कब की
थी, मालूम है? मेरे जन्म के पूर्व। आश्चर्य है न, परंतु महाराज, महा
आश्चर्य तो आगे है। वह मेरे जन्म के पूर्व किसका हाथ देखकर कहा था, ज्ञात
है?-मेरी दादी का।
देवी सिंह : क्या कहते हैं आप? दादी का हाथ देखकर यह बताया
गया कि तुम्हें एक पोता होगा। उसका विवाह होगा, फिर पत्नी मर जाएगी और वह
दूसरा विवाह करेगा?
संभाजी : और वह दूसरी पत्नी उससे प्यार करेगी, यानी मुझसे
प्यार करेगी। यह भविष्य मेरे जन्म के पूर्व बताया था, वह भी मेरी दादी का हाथ
देखकर।
देवी सिंह : फिर तो निश्चय ही आश्चर्य लगता है। और यह
पूरा-का-पूरा सच निकला?
संभाजी : फिर? ज्योतिषी के कथनानुसार मैं पैदा हुआ, शादी
हुई, पत्नी मरी, फिर दूसरा विवाह हुआ और तुम्हारी ये नई पटेलन द्रौपदी ने
धर्मराज को जितना प्यार न किया होगा उतना प्यार मुझसे करती है। ईश्वर चाहे तो
क्या नहीं होता।
नारंभट : (प्रवेश कर) बिलकुल सही कहा आपने। ईश्वर
चाहे तो क्या कुछ नहीं होता? ऐसा भाव रखनेवाले आप जैसे धर्मप्राण व्यक्ति का
ईश्वर कल्याण करे।
संभाजी : आइए-आइए। कौन हैं आप?
नारंभट : मैं एक ब्राह्मण हूँ। बचपन में ज्योतिष का अध्ययन
किया था। आगे चलकर वेद-वेदांग का अध्ययन किया। जो ईश्वर पर विश्वास करते हैं
उन्हीं के यहाँ निवास करने की परिपाटी है मेरी। आपके शब्द सुनकर मैंने प्रवेश
किया। आप सचमुच धर्मात्मा दिखते हैं।
संभाजी : नहीं-नहीं। कौन कहता है कि मैं धर्मात्मा हूँ!
नारंभट : कौन-किसकी बात क्यों कहूँ? ज्योतिष कहता है यह सब।
देखिए, पटेलजी, आप नम्रता से औरों को यह सब कहें, पर ज्योतिषी के सामने तो
आपको हर सच बात स्वीकारनी होगी।
संभाजी : क्या आपको मेरी जानकारी ज्योतिष ज्ञान से हुई? फिर
इसके पहले आप यहाँ क्यों नहीं आए?
नारंभट : आपका मकान खोज रहा था चार-पाँच दिनों से।
देवी सिंह : वाह! नारंभटजी, ज्योतिष की बिजली से आपको
पटेलजी के दिल के चप्पे-चप्पे दिखाई दिए, पर राजमार्ग पर स्थित यह आलीशान कोठी
नहीं दिखाई दी। भूत-भविष्य-वर्तमान दिखानेवाला ज्ञान आपको पटेलजी का मकान
क्यों नहीं दिखा सका?
नारंभट : (स्वगत) कितना गधा है ये! मैंने इसे
छोटी-मोटी शंकाएँ उठाकर मुझे उत्तर देने का अवसर देने को कहा था ताकि पटेल का
विश्वास जीत सकूँ, पर ये गधा मुझसे ऐसे प्रश्न पूछ रहा है जिससे मेरी फजीहत हो
जाए। हमेशा मेरी बात काटने की इसकी पुरानी आदत है। इसे भी मजा चखाना पड़ेगा।
(प्रकट) अरे भाई, जन्म काल के आधार पर चेहरे से या हाथ देखने से
मनुष्य की कुंडली बनती है। उससे उसका इतिहास बता सकते हैं, पर कोई किसी गाँव
या कोठी की कुंडली थोड़े ही बनाता है। हाँ, अन्य किसी तरीके से यह बताया जा
सकता है कि गाँव में गलियाँ कितनी, मकान कितने, नालियाँ कितनी, दुर्जन
(उसकी ओर देखते)
कितने, उनके नाम भी बताए जा सकते हैं। क्या एक-दो नाम गिनाऊँ?
देवी सिंह : नहीं-नहीं। उसका क्या करना? हमारा विश्वास है
आपपर। क्या आप जरा पटेल साहब का हाथ देखेंगे? कृपा करिए। आपको उचित दक्षिणा भी
दी जाएगी।
नारंभट : दक्षिणा! क्या मैं पैसे के लिए ज्ञान बेचूँ? नहीं,
नहीं, जाता हूँ मैं ...
संभाजी : शास्त्रीजी, वो बात नहीं है। क्षमा करिए, केवल
उपकार करके आप कृपया मेरा हाथ देखिए। देखो देवी सिंह, यदि ज्ञानी सच्चा हो तो
वह कितना निस्स्वार्थी होता है।
नारंभट : ठीक है, ठीक है। दिखाइए हाथ।
(हाथ देखते हुए)
आपकी माताएँ दो थीं, पर पिता मात्र एक थे सगे। (देवी सिंह हँसता है)
हँसते क्यों हो? मराठों में पुनर्विवाह की प्रथा है ही, जिससे पुत्रवती माता
दूसरा विवाह रचा बच्चों सहित नया पति करती है। ऐसे बच्चों का सौतेला बाप रहता
है। मुझसे गप्पें नहीं हाँकना। ज्योतिष विद्या इतनी पवित्र है कि जो कुछ सच
है, वही कहा जा सकता है। हम तो मात्र सत्य का कथन करते हैं।
संभाजी : क्यों देवी सिंहजी, अच्छी फजीहत करा ली आपने।
नारंभट : भाई तीन थे, तीनों मरे। मात्र आप बचे हैं। एक
विवाह हुआ, पर उससे कोई संतान नहीं हुई। प्रथम पत्नी के मरणोपरांत आपका दूसरा
विवाह हुआ। यह पत्नी अत्यंत सुंदर, युवा तथा आपसे प्यार करनेवाली, विश्वास
योग्य है।
संभाजी : (गरदन हिलाते हुए) बिलकुल सही कहा आपने,
महाराज।
देवी सिंह : क्या सबकुछ सच कहा है इन्होंने? यदि सच है तब तो
मेरे आज तक के अविश्वास को डिगा दिया है इन्होंने।
संभाजी : शास्त्रीजी, फिर तो आप इनका भी हाथ देखिए।
देवी सिंह : ठीक है, दिखाता हूँ अपना हाथ इन्हें।
नारंभट : देख ही लेता हूँ अब मैं तुम्हें।
(उसका हाथ जोर से पकड़कर)
माँ एक, बाप दो, एक सगा, दूसरा सौतेला।
संभाजी : (हँसते हुए) कहो संभाजी, बोलिए अब, सच
है कि झूठ?
देवी सिंह : क्या सही पकड़ा है इन्होंने। हमारे यहाँ महिलाओं
के पुनर्विवाह होते ही हैं (मन में) कितना पाजी है यह पंडित।
नारंभट : बहनें दस थीं। पाँच मरी, चार जिंदा हैं। एक जिंदा
तो है, पर मरी सी है।
संभाजी : क्या मतलब है इसका, सिंहजी।
देवी सिंह : वह ज्योतिषीजी से ही पूछें। इन लोगों को निश्चित
कुछ बताते नहीं बनता तो गोलमाल भाषा का प्रयोग करते हैं ये लोग।
नारंभट : गोलमाल कहते हैं तो सुनिए, यह रेखा देखिए, बहन
जिंदा है, पर मरी सी। इसका मतलब है वह वेश्या है, समझे ! चौंक क्यों गए?
देवी सिंह : सच है वह; ( मन में)
साले-हरामजादे, यदि मैं इसकी पोल खोलूँ तो पटेल की मालिनी और मौसी की
सुवर्णमालिनी दोनों से हाथ धोना पड़ेगा। इसलिए यह ज्योतिषी बड़ा सच्चा
प्रवक्ता है, यही मुझे जताना पड़ेगा। पटेल का इसपर भरोसा बढ़े, इसलिए सारी
छीछालेदार सहनी पड़ेगी मुझे। (आँखें दिखाता है।)
नारंभट : देखिए, बुरा मत मानिए। एक तो ज्योतिष पूछना नहीं
चाहिए और पूछा तो सच सुनने से चिढ़ना नहीं चाहिए। सुनिए, बाप दिवालिया हो गए
थे। इसलिए आपका बचपन उछल-कूद में बीता और यौवन में उल्लू बने फिरे। बोलो, सच
है ना ये?
देवी सिंह : सच है ये; ( मन में) क्या करूँ
मैं अब! इसने तो मेरी धज्जियाँ उड़ा दीं। चोर कहीं का।
नारंभट : चोर! सही है, तुम्हारे बाबा ने चोरी की थी।
तुम्हारे परदादा सज्जन थे, पर शराब के अति सेवन से मरे।
संभाजी : क्यों देवी सिंहजी?
देवी सिंह : सच तो है सब। हाथ क्या, पूरा भूत पकड़ में आ
गया है इनके। ( मन में) क्या किया जाए। लगता है कि एक लात
लगाकर गिराया जाए इसे। (प्रकट) अच्छा शास्त्रीजी, अब भूतकाल वर्णन
बहुत हो चुका।
संभाजी : अब कुछ वर्तमान और भविष्य बताएँ।
नारंभट : वर्तमान? वह तो भूत से भी भयंकर रहता है कभी-कभी।
अब इन पटेल साहब की ही बात लो। इनके विषय में आप काफी लोभी नजर आ रहे हैं।
संभाजी : बिलकुल सच है ये। ये मेरे बहुत ही विश्वसनीय दोस्त
बनते जा रहे हैं।
नारंभट : आपको गृहसुख थोड़ा कम ही है। आपकी वर्तमान पत्नी के
साथ आपके नौकर की कुछ लेन-देन चल रही है।
संभाजी : क्यों सिंहजी?
देवी सिंह : सच है जी। मैंने पैसे घर में ही देकर रखे हैं।
वही सारी व्यवस्थाएँ देखती हैं। अतः वह पैसे का लेन-देन अवश्य जारी है। हाँ,
अब बहुत हो गया शास्त्रीजी। बहुत कष्ट दिए आपको हमने। ज्योतिष की सचाई के बारे
में हम पूरे आश्वस्त हो गए। (हाथ खींच लेता है।)
नारंभट : अरे, अरे, रुकिए। भूत, वर्तमान की झलक तो देख ली
आपने, पर जरा भविष्य की भी तो देखिए। आपकी पत्नी अभी गर्भवती है।
संभाजी : फिर पुत्र प्राप्ति ही है न?
नारंभट : हाँ, पूरी संभावना है, पर वो इनकी पहचान के एक
पुजारी ...
देवी सिंह : (मन में) ये साला रंडी पुत्र जाने
क्या-क्या बकेगा। इसकी जीभ खींच लूँ और लात मारूँ।
नारंभट : बस, उस पुजारी के चेहरे-मोहरे जैसा ही है।
देवी सिंह : बिलकुल सही बताया आपने। अब मेरे बारे में बस हो
गया। ये दक्षिणा रखिए। अब पटेलजी की पुत्र प्राप्ति के बारे में बोलिए।
(
अपना हाथ खींच लेता है।)
नारंभट : इनकी संतानोत्पत्ति के बारे में तो पत्नी का हाथ
देखने पर ही बता सकूँगा।
देवी सिंह : और मुझे पुत्र प्राप्ति होगी, यह बात मेरा हाथ
देखकर कैसे बताई?
संभाजी : फिर से वही आशंका।
नारंभट : मैं करता हूँ समाधान उसका। शास्त्र का एक नियम है
कि जिस व्यक्ति से उसकी पत्नी प्यार नहीं करती, उसके हाथ पर उसकी संतान की
रेखा स्पष्ट दिखती है। पटेलजी की पत्नी सुंदर है, युवा है, फिर भी वो इनसे
जी-जान से प्यार करती है। इसलिए उसीका हाथ देखकर पुत्र या पुत्री बताना उचित
और सही होगा, पर आप जैसे मनुष्य की पत्नी दुर्भाग्य से आपसे प्यार नहीं करती।
देवी सिंह : सच कह रहे हैं शास्त्रीजी, पटेल साहब। श्रीमतीजी
का हाथ दिखाएँ इन्हें।
संभाजी : ठीक है। आप हमारी श्रीमतीजी का हाथ देख लीजिए। अरे,
कौन है वहाँ? अरे रामसिंह, जाकर पटेलनबाई को बुला लाओ।
रामसिंह : (परदे में से) हुजूर, वे कहती हैं कि
अभी वे बिलकुल नहीं आ सकतीं।
संभाजी : (मन में) अरे रे! कम-से-कम इस समय तो ऐसा
नहीं कहना चाहिए था उसे (खुलेआम पोथी पढ़ रही है।) ईश्वर चिंतन में
लीन होने पर उन्हें किसी बात की सुध-बुध नहीं रहती। रामसिंह, उनसे जाकर कहो
कि एक शास्त्री पंडित आए हैं। अत: पूजा-पाठ होते ही आ जाएँ यहाँ।
रामसिंह : (परदे में से) कहती हैं कि वे आ रही हैं।
नारंभट : (मन में) अच्छा शकुन है।
(अपने कपड़े सँवारने लगता है।)
मालिनी : (प्रवेश करते हुए) क्या आदेश है?
संभाजी : शास्त्रीजी को प्रणाम करो। आज तक मैंने ऐसा
ज्योतिषी नहीं देखा था। हाथ दिखाओ इन्हें अपना।
नारंभट : (पहले अंगुलियाँ पकड़ता है,
फिर कलाई तक की रेखा देखकर) श्रीमतीजी का बीता जन्म किसी ब्राह्मण कुल
में हुआ था। इसी से इन्हें पूजा-पाठ में अधिक दिलचस्पी है। ये पिछले जन्म में
काशी में मरी थीं। इसी से पुराणों के प्रति आसक्त हैं ये। (स्वगत)
ओहो, क्या मांसलता है ! अँधेरी रात में भी ऐसा हाथ पकड़कर आगे क्या होगा, यह
बताया जा सकता है, पर वर्तमान कैसे बताऊँ? पिछला जन्म बता दिया। अबके बारे
में देवी सिंह से पूछना ही भूल गया मैं। (खुली) हथेली देखूँ? ओहो,
क्या चिह्न है! पुत्र प्राप्ति! बड़ा पराक्रमी होगा। महापराक्रमी कैसा हो?
संभाजी : शास्त्रीजी, आपके मुँह में घी-शक्कर। विजयनगर
साम्राज्य के समय से हमारे कुल में वीर पुरुष पैदा होते रहे हैं आज तक, अब
महान् पराक्रमी पैदा होने चाहिए। कैसा होगा महाराज?
नारंभट : बाप से सवाई।
मालिनी : बस, इतना ही शास्त्रीजी। मतलब कुछ भी नहीं। शून्य
का सवा गुना यानी शून्य ही रहेगा।
नारंभट : पर यह रेखा देखिए। वाह, क्या चीज है!
(उसके भुज दंड को पकड़ता है।)
देवी सिंह : शास्त्रीजी, क्या भुजाओं तक रेखाएँ रहती हैं?
नारंभट : हथेली की रेखाएँ देखकर यह कहा जा सकता है कि बेटों
को कलेजे से लगाकर रखा जाएगा या नहीं, पर वह वीर-पराक्रमी होगा, यह तो
भुजाओं से ही ज्ञात हो पाएगा। क्योंकि वीरता तो भुजाओं में रहती है।
(भुजा को सहलाते हुए)
क्या भुजा है! बिलकुल राजयोग दिखाती है। पटेलजी, आपका बेटा राजयोगी होगा।
देवी, तुम धन्य हो। (मन में) आय हाय, हथेली की रेखाओं का उद्गम
खोजते-खोजते मेरा हाथ इसके दर्शनीय सीने के उठाव के पास पहुँच चुका है। हाथ
जैसी रेखाएँ सारे शरीर पर फैली होती तो कितना मजा आता! हाथ की रेखाएँ मोड़
लेती हुई सुंदरता के मानसरोवर तक जा पहुँचती हैं। वहाँ पहुँचने की हिम्मत करता
हूँ मैं अब। (खुलेआम) गले की रेखा देखिए। देवीजी, निश्चय ही आप
राजमाता बनेंगी। संदेह ही नहीं, ओहो हो!!
संभाजी : मैं अत्यंत आभारी हूँ आपका।
मालिनी : पर भविष्य की वीरमाता या राजमाता को अभी से
प्रशिक्षित करने के लिए कोई वसिष्ठ या धौम्य ऋषि या कोई कुलगुरु कहाँ मिलेगा?
संभाजी : उसमें कौन सी बड़ी बात! वो तो यहाँ उपलब्ध है।
शास्त्रीजी, आपको हमारी विनती माननी होगी। आप हमारे आज से गुरु बनें और पत्नी
को कथा पाठ कराया करें। क्यों मालिनी, पसंद हैं न कुलगुरुजी?
मालिनी : पसंद-नापसंद की क्या कहूँ?
संभाजी : अरे भाई, भविष्य में आगमन कर रहे युवराज के हिसाब
से तो योग्य लगते हैं ये कुलगुरु। बस, तय हुआ। जाओ, मौसी से भी कह दो। आज से
ही इनकी पुराण कथा नियमपूर्वक सुननी है। और हाँ, कुलगुरु जैसा सम्मान देकर घर
में सभी को इनसे व्यवहार करना है, समझीं!
मालिनी : प्रणाम करती हूँ गुरुदेव।
नारंभट : पुत्रवती भव।
मालिनी : (स्वगत) ऐसे समर्थ गुरुदेव ने यह आशीर्वाद
मन से दिया हो तो वह तो खरा उतरेगा ही।
नारंभट : ठीक है, हम भी जरा देवदर्शन कर आते हैं।
संभाजी : जैसी इच्छा, महाराज! देवी सिंहजी, आप भी चलिए अब।
[देवी सिंह और नारंभट उठते हैं। सामने का परदा गिराया जाता है।]
देवी सिंह : (नारंभट की ओर बढ़ते हुए) क्यों बे बाम्मन। साला
बड़ा कुलगुरु, ज्योतिषी बना है। अब अच्छी-खासी मरम्मत करता हूँ तेरी। साले,
सारी बत्तीसी तोड़ दूँगा। मेरी पत्नी के बारे में क्या बक रहा था बे तू!
नारंभट : अरे, अरे, ये क्या कह रहे हो? वास्तव में सोचा
हुआ कार्य निर्विघ्न संपन्न हुआ, इसलिए धन्यवाद देना चाहिए था तुम्हें। तेरी
पुरानी पत्नी के बारे में जो कुछ कहा मैंने, वह सब अब इस नई खूबसूरत पत्नी
पाने की खुशी में भूल जा तू दोस्त। और तूने मुझे बीच में आड़े-टेढ़े प्रश्न
पूछकर मेरी फजीहत करने की चेष्टा की थी, उसका क्या?
देवी सिंह : पागलपन था वह मेरा।
नारंभट : इसीलिए तेरी मूर्खता भरी बकवास बंद करने के लिए
मुझे वैसा कहने की समयज्ञता दरसानी पड़ी। अब छोड़ो वो सब बातें। जिसका अंत
ठीक, उसका सबकुछ ठीक है। एक माह में उस मालिनी को तेरे गले की माला बना दूँगा
मैं, फिर तो कोई शिकायत न होगी! पर एक खयाल रखना। कमलिनी जैसी धरोहर कल हम
गंगाजी के मंदिर में रख आए हैं न, वह इब्राहिम की नजरों में नहीं पड़नी
चाहिए। उस हिंदू लड़की पर हिंदू का ही अधिकार रहेगा, समझे!
देवी सिंह : अरे, गंगाजी तेरी ही नहीं, मेरी भी गुरु है।
हमारी आज तक की सभी अमानतें उसने कैसे सँभालकर रखी हैं। अमानत तो सुरक्षित रहती
ही है, पर उसके ब्याज की चुंबानी खैरात भी कैसे दबादब देती है वो!
नारंभट : फिर तो बात बन गई। उस मंदिर के सामने अपनी दुकान
लगाकर बैठनेवाले उस चोख्या को वहाँ से भगाने का काम शेष है। अभी उस धेड़ की
छाया पड़ती है मंदिर में आते-जाते।
देवी सिंह : बदमाश कहीं का। उसको तो वहाँ से बेदखल करना ही
पड़ेगा। मंदिर में आने-जानेवाली महिलाओं पर बुरी नजर रखता है वो। भ्रष्टाचार
मचा दिया है साले ने, पर अब हमारे उकसाने से और उसकी बकबक सुनकर सभी हिंदू लोग
मुखालफत कर रहे हैं। अस्पृश्य को देखकर भी जी मचलने लगता है मेरा।
नारंभट : सच कहूँ? मेरे सामने मुझसे अधिक कोई सद्गुणी
व्यक्ति जब दिखता है न, तभी मेरा जी मचलने लगता है। मैं क्या कम सज्जन हूँ!
क्यों? हाऽ हा (हँसता है) चलो, अब उस चोख्या को मंदिर के सामने से हटाने के
काम में लग जाएँ। (जाते हैं।)
: छठवाँ दृश्य :
[चोखा महाराज मंदिर के सामने सड़क पर बैठे हैं।]
चोखा : हे प्रभु, पांडुरंग! हमारा आज का दिन भी समाप्त होने
को आया। फिर भी हे प्रभु, अब भी तेरे चरणों को तो छोड़ें, मंदिर के दरवाजे के
भी दर्शन हम लोगों को नहीं मिलते। कल के उषाकाल से आज के उस क्षणकाल तक युगों
की घड़ी का घंटा निरंतर गिनते हुए मैं लगातार मंदिर का मार्ग चलता आया हूँ, पर
वह कठिन राह अभी भी पूरी नहीं हो रही है। एक-एक योनि की एक-एक सीढ़ी
चढ़ते-चढ़ते मैंने चौरासी योनियाँ पार कर लीं, पर हमें अभी मंदिर की
चारदीवारी को छूने का भी अधिकार नहीं मिला। हे भगवन्, तुम्हारे मंदिर के
पहुँच-मार्ग का क्या कोई अंत नहीं है? (जो कोई यात्री इस
मार्ग-मंदीर की तरफ जाता है,इस आशा से चलते आया वो थककर सड़क
पर ही चिरनिद्रा में सो गया और आगे कहीं मंदिर है भी या नहीं,
यह बताने नहीं लौटा।) अत: यह मार्ग मंदिर को नहीं जाता, यह लोगों
ने अभी समझा ही नहीं-ऐसा तो नहीं? कुछ भी क्यों न हो, यह कठिन मार्ग चलते,
चढ़ते हमारे तो पैर थक गए। अपने कर्मों की गति के अनुसार तुम्हारे मंदिर तक
पहुँच पाऊँगा। यह श्रद्धा-विश्वास भी अब डिग गया है। इसी राह पर इसी तरह सब
आशा और निराशा तेरे पैरों पर, जो कि मंदिर की चारदीवारी के फलस्वरूप दिखते ही
नहीं, अर्पित करके मैं अब इस पूजा भरे मार्ग पर ही बैठक लगानेवाला हूँ। तेरी
तरफ आनेवाले मेरे कर्मों की गति अब रुकी है। मेरी दुर्बलता पर दया आकर
तुम्हारी करुणा की दयादृष्टि यदि मुझ तक खींच लाई तो ही कुछ संभावना है।
(अभंग गाता है।)
भवसागर से व्याकुल वन-मन, दौड़ो हे करुणाकर
मोह भरे इस दुनिया भर को, दो राहत तीर्थंकर
मन को मेरे दो सहारा कुछ, दौड़ो हे गिरिजाधर।
हे भगवन्, संतों द्वारा वर्णित अपने मनोहर रूप का दर्शन मुझे दे सकोगे क्या?
ये हजारों भक्त तेरे मंदिर में आते-जाते हैं। तुझे फूल चढ़ाते हैं और प्रसाद
प्राप्त कर तेरा साँवला-सलोना रूप आँखों में भरकर लौटते हैं, पर मुझे तेरा
दर्शन कौन करने देगा? मैं तो पतित हूँ, महार हूँ, अछूत हूँ। मुझे कौन करने
देगा दर्शन? तेरे भक्तों ने इस मंदिर के आसपास ऐसी घेराबंदी कर रखी है कि मुझे
दर्शन कैसे हों? पर हे भगवन्, क्या इस घेराबंदी को तोड़कर तुम मुझे दर्शन
देने मंदिर के बाहर नहीं आ सकते? अरे, कोई मुझे भगवान् विट्ठल के दर्शन
कराएगा? विट्ठल दर्शन तो उसकी प्रसन्नता पर निर्भर रहता है। क्या उसकी मूर्ति
का दर्शन कराएगा कोई मुझे?
अभंग
श्रीमुख ये सुंदर पहने है पीतांबर
वैजयंती हार शोभा न्यारी
जीवों का सखा वो प्राण प्रिय भारी
सँभालो ये माया, हे त्रिपुरारी ...
पन्नालाल : (प्रवेश करते) अरे, मंदिर के रास्ते पर
बैठकर ये कौन भिखारी बकबक कर रहा है? भीकू सेठ, कौन है ये?
भीकू सेठ : अरे, तुम्हें नहीं मालूम। यह तो चोखा महार है।
कितना रोका, पर ये रोज अपनी दरिद्रता भरी भक्ति का प्रदर्शन करने रास्ते में
बैठा रहता है। पन्नालालजी, इसे हटवाना ही पड़ेगा यहाँ से।
पन्नालाल : क्या वास्तविक भक्ति से बैठता है ये?
भीकू सेठ : अरे, काहे की भक्ति? घर में खाने को नहीं है,
काम-धंधा करता है नहीं, इसलिए भक्ति का ढोंग रचाकर बैठते हैं यहाँ ये लोग।
औरों से तो कोई तकलीफ नहीं होती, पर यह धेड़ तो आने-जानेवालों से प्रसाद
माँगने इतना आगे बढ़ आता है कि उसकी छाया के कारण छुआछूत फैलती है यहाँ। भजन
इतने जोर-जोर से गाता रहता है कि मूर्ति की प्रदक्षिणा करते समय मंत्रों का
जाप करना भी असंभव हो जाता है। भक्तों के मंत्रोच्चारों पर जब इस धेड़ के
भजनों का स्वर छाता है तो वे मंत्र भी अपवित्र हो जाते हैं। ये देखो, आ गया
ये हमारे पास प्रसाद माँगने।
चोखा : महाराज, पांडुरंग के प्रसाद का कुछ अंश मुझे मिलेगा
क्या?
पन्नालाल : तू खुद ही क्यों नहीं चढ़ाता भोग भगवान् को?
दूसरे के चढ़ाए भोग से कुछ माँगना तो भीख माँगना है। भीख माँगने की ये तेरी
खास तरकीब दिखती है।
चोखा : महाराज, क्या मुझे भोग का थाल अंदर ले जाने देंगे
आप? यदि ऐसा करने देंगे तो जन्म सार्थक हो जाएगा। भगवान् की मूर्ति को मैं
आँखों में समा लूँगा।
भीकू सेठ : अरे, तुझे अछूत हमने बनाया या भगवान् ने? उसी
से माँग भोग का थाल अंदर ले जाने की अनुमति। काहे का भोग चढ़ाएगा तू? मरे
मांस का ही न!
चोखा : शिव, शिव! सेठजी, मरे हुए का तो क्या, किसी भी तरह
के मांस का स्पर्श आज तक इस चोखा ने नहीं किया है।
भीकू सेठ : अरे, तूने नहीं तो तेरे बाप ने किया होगा।
चोखा : हो सकता है, महाराज। हम लोग तो महार, अछूत ठहरे। जो
रीति-रिवाज आप लोगों ने बना दिए हैं उनका पालन करते हैं हम लोग। इसीलिए प्राण
कितने भी व्याकुल क्यों न हों, मैं तो मंदिर के कलश के दर्शन से ही संतोष कर
लेता हूँ। दोपहर को भक्तों द्वारा फेंके गए प्रसाद के जूठे टुकड़ों को ग्रहण
कर मैं धन्य होता हूँ। यही मेरी पूजा होती है।
अभंग
जातिहीन मैं, जानूँ न सेवा
हम नीचों को, झूठन मेवा
प्रभु लेऊँ नाम निस-दिन तेरा
दास कहलाऊँ हरी राम तेरा।
नारंभट : (प्रवेश कर) ओहो, अब तू हमारे दासों का
दास बन बैठा क्या? अरे, कल यही आदमी महारों को ब्राह्मणों जैसा नहा-धोकर
साफ-सुथरा रहना सिखा रहा था और फव्वारे का पानी, बलपूर्वक ही क्यों न हो,
पीने को उकसा रहा था।
पन्नालाल : क्या, यह वही आदमी है? अरे, धेड़ कहीं का!
भीकू सेठ : तुझे ब्राह्मण होना है क्या? क्योंकर डालें तुझे
ब्राह्मण?
चोखा : ऐसी अमर्यादा मैं कैसे करूँगा? हम तो झुककर जोहार
करते हैं सबको।
अभंग
जोहार माई-बाप, जोहार
तेरे दासों का मैं दास जोहार
मैं हूँ भूखा तेरे द्वार आया
तेरे परसाद जूठन को पाया
जोहार माई-बाप, जोहार
नारंभट : परंतु यह जूठन वह सुंदरी खाएगी क्या? अजी, एक दिन
यह एक सुंदर जवान कन्या के गले में हाथ डाले उससे गोपियों के गीत गवा रहा था।
देवी सिंह : पक्का बगलाभगत है यह। यह पाजी इस तरह सड़क पर
इसलिए बैठता है कि हमारी जिन महिलाओं के नाखून भी जन्म भर किसीको देखने नहीं
मिलते, उनके मुखड़े यह देख सके।
भीकू सेठ : अरे चांडाल! इसीलिए बैठता है। वह स्वाभाविक है।
महार वाड़े के कुरूप, कुग्रास से ऊबे हुए इन पतितों की आँखें हम ब्राह्मण,
वैश्य स्त्रियों का तरल सौंदर्य देखते ही ऐसे ललचाती हैं जैसे अकाल में घास
खाकर दिन गिनते कंगाल को अंगूर का लुभावना गुच्छा देखकर लालच छूटता है। चोखा,
जा रहा है यहाँ से या लगाऊँ थप्पड़।
देवी सिंह : छुआछूत हुई तो भी हर्ज नहीं, लगाओ साले को। साला
राह में बैठकर रास्ता अपवित्र करता है। नहाना तो वैसे भी पड़ेगा।
चोखा : अरे भाई, मैंने क्या बिगाड़ा है आपका? पैर पड़ता
हूँ मैं।
भीकू सेठ
और
पन्नालाल : दूर रहो, दूर रहो। साले ने छाया स्पर्श कर ही
डाला। भगाओ साले को। (उसे गालियाँ देते हुए भगाते हैं।)
लड़कियाँ देखता है, छूता है, भ्रष्टाचार करता है, ब्राह्मण होना चाहता है।
(ऐसी बक-झक करते नारंभट, देवी सिंह और सारे अन्य लोग उसे धक्के मार-मारकर भगा
देते हैं।)
: सातवाँ दृश्य :
[भगा दिए जाने के बाद चोखा दूसरी सड़क पर खड़ा है।]
चोखा : हाय, हाय! यह मेरी कैसी दुर्गति है, भगवान् ! मेरी
ही क्यों, हम सभी अछूतों की ऐसी ही दयनीय अवस्था होती है। देवदर्शन नहीं, पर
कलशदर्शन तो होता था सड़क से, चारदीवारी से सटकर बैठता था तो कम-से-कम आरती के
स्वर तो सुनाई देते थे, पर अब वह सुख भी छिन गया। प्रसाद के चार जूठे कण
ग्रहण किए बिना अन्न ग्रहण न करने का मेरा नियम अब कैसे पूरा होगा!
अभंग
हीन जाति मेरी, कैसे करूँ सेवा?
दूर करे हमको, कैसी ये माया?
चाहकर भी तुझको, पाऊँ मैं कैसे?
हे प्रभो मुरारी, देखूँ मैं कैसा?
क्या मैं सचमुच इतना नीच हूँ, जैसा ये सब कहते हैं, वैसा मुझे देवदर्शन का
अधिकार ही नहीं है। मैं धेड़ महार हूँ, इसलिए ये सब मेरा धिक्कार करते हैं।
मैं मनुष्य भी हूँ या नहीं? या धूल में रेंगनेवाला कोई कीड़ा हूँ? क्या मैं
इतना गया-बीता कीड़ा हूँ कि पैर लगाना भी लोगों को गंदा लगे। अभी जिन्होंने
मुझे वहाँ से भगाया, उनके चरण छूने लगा तो भी छुआछूत मानी उन्होंने। यदि उनके
कहने के अनुसार शास्त्रों द्वारा ऐसी ही आज्ञा होगी तो फिर गलती मेरी ही होगी।
मुझे देवदर्शन का अधिकार सचमुच नहीं है क्या? भगवान् की सेवा का, उसके रास्ते
पर बैठने का, उसका जूठा ही सही, प्रसाद पाने का, ऊँची आवाज में भजन करने
का, ये सारे अधिकार क्या सचमुच मुझे नहीं हैं? हमारे लिए भगवान् है भी या
नहीं? हाय, हाय! फिर हम अछूतों के जन्म का उद्देश्य ही क्या है!
अभंग
कितनी दौड़-धूप करूँ मैं अनाड़ी
अर्थहीन सारी जीवन कहानी
ज्यों-ज्यों करूँ भक्ति त्यों-त्यों कष्ट भारी
कैसे मैं अभागा करूँगा आरती?
अरे, ये कौन आ रहे हैं? ये तो सारे पंढरपुर में प्रसिद्ध शास्त्रीजी हैं,
उन्हीं से पूछता हूँ, पर उनके हाथों में तो प्रसाद का थाल है। मुँह से कुछ
पाठ भी चल रहा है। कैसे पुकारूँ उन्हें? मेरे पुकारने से स्वरों की छुआछूत तो
न लग जाएगी? क्या इशारा करके देखूँ? (वे जैसे ही पास आते हैं,
चोखा जोहार करके कुछ बुदबुदाता है।)
महाराजजी, एक शंका पूछनी थी।
शब्दशास्त्री : मैंने कितनी बार इशारे से तुझे मेरे मार्ग से
दूर हटने को कहा, चोखा? पर अपने इस म्लेच्छ राज्य में अनाचार फैल चुका है न।
जहाँ हिंदू धर्म का शुद्ध रूप विराजमान है, उस स्थान पर तो कम-से-कम अभी भी
वैदिक ब्राह्मण अछूतों का छाया स्पर्श भी पाप मानते हैं। तुम महार, धेड़ केवल
अस्पृश्य ही नहीं, अदृश्य (अदर्शनीय) भी हो। तुम्हारी नजर की छाया से
अपवित्र हुआ यह प्रसाद का थाल अब मुझे फेंक देना पड़ेगा। चोखा, ऐसे भावाकुल
होकर मत देख। माना कि तू सुशील है, देवभक्त है, पर तू महार-अछूत भी तो है।
मुझे दया आती है तुझपर, शास्त्र वचन तो नहीं लाँघ सकता। कम-से-कम कल से तू
रास्ते में ऐसे मत खड़ा रहना। आज तो छुआछूत हो ही गई है। पूछो, क्या पूछना
चाहते हो?
चोखा : महाराजजी, मैं अभी जो पूछने जा रहा हूँ, उसका सही
उत्तर मिलने पर मैं कल से इस रास्ते पर ही नहीं बल्कि जीवन मार्ग से भी हट
जाऊँगा। मुझे अभी-अभी मंदिर के रास्ते से धक्के मारकर भगाया गया है। भगवान्
कसम, उस अपमान से अपमानित नहीं हुआ मैं, क्योंकि वे गालियाँ मेरे मन के
अहंकार रूपी मैल को धोकर मेरा हृदय-गृह साफ-सुथरा रखने में सहायक होती हैं, पर
आज की इस घटना ने मेरे परमप्रिय के दर्शन का छोटा सा झरोखा भी बंद कर दिया
जिससे मैं व्याकुल हो उठा हूँ। भगवान् के मंदिर जाने के ज्ञान-दान-तप आदि जो
राजमार्ग हैं उनपर अछूतों को नहीं रुकना चाहिए, यह मुझे ज्ञात है, अतः आप
संक्षेप में मुझे बताएँ कि नामसंकीर्तन मार्ग की जो पगडंडी है, उसपर
चलने-दौड़ने का अधिकार भी क्या अछूतों को नहीं है? भगवान् भी हमारे स्पर्श से
अपवित्र हो जाता है, ऐसा पुजारी कहते हैं। क्या यह सब सच है, शास्त्रीजी?
हमारी नजरों से प्रसाद का थाल भी अपवित्र हो जाता है, क्या यह सच है,
शास्त्रीजी? क्या धर्मशास्त्र हम अछूतों को प्रसाद के चार जूठे कण भी ग्रहण
करने का अधिकार नहीं देते? महाराज, इस जन्म में हमें अपने उद्धार का अधिकार
नहीं, क्या यह सच है ?
शब्दशास्त्री : चोखा, जहाँ तक शास्त्रों की बात है, यह सब
सच है। अस्पृश्यों को नामसंकीर्तन का भी अधिकार नहीं है। अस्पृश्य मात्र
अस्पृश्य ही नहीं, अदृश्य (अदर्शनीय) भी है। इस जन्म में तो उनका
उद्धार नहीं।
चोखा : पर महाराजजी, अजामिल पापी भी तो गया परमधाम, रोहीदास
चचार था, वो भी गया स्वर्गधाम।
शब्दशास्त्री : तूने कहा था न कि तू विवाद नहीं करेगा!
शास्त्र क्या है, केवल यही तू पूछना चाहता था न! मैंने जो समझा, वही बताया
है। चोखा, मुझे तेरे सद्गुणों को देख दया आती है, पर क्या करूँ, शास्त्र कठोर
हैं। तेरे सद्गुण तुझे जब किसी योगेश्वर के यहाँ अगले जन्म में पैदा करेंगे
तभी इस जन्म में तेरे लिए बंद ये द्वार खुलेंगे। अच्छा, मैं जाता हूँ।
चोखा : एक क्षण मात्र रुकिए, महाराजजी। आपने जो शास्त्रार्थ
बताया, क्या उसे सभी की मान्यता है ? व्याघ्र ने गीता उपदेश किया था,
ज्ञानेश्वर ने तो भैंस से वेदोच्चारण कराया था।
शब्दशास्त्री : चोखा, फिर तूने तर्क करना शुरू कर दिया।
जैसा मैंने बताया, शास्त्रार्थ सर्वमान्यता प्राप्त तो है ही, पर नियम के भी
कुछ अपवाद होते ही हैं।
चोखा : आखिरी प्रश्न, महाराजजी, शास्त्र-शास्त्र में
भिन्नता दिखने पर एक सर्वमान्य निर्णय करने का अधिकार किसे है? शास्त्रों पर
भी क्या किसीका अधिकार चलता है?
शब्दशास्त्री : हाँ, पर वह किसी मनुष्य का नहीं, केवल
परमात्मा का ही रहता है। परमात्मा का निर्णय शास्त्रों को भी शिरोधार्य रहता
है।
चोखा : ऐसा है न, महाराज! ठीक है, अब आप जा सकते हैं। आपने
मुझे सही मार्ग दिखाया है। आप ही मेरे सद्गुरु हैं। अब मैं अपनी बुद्धि से या
लोक बुद्धि से उचित-अनुचित, सत्य-असत्य का निर्णय नहीं करूँगा। अब शास्त्रों
के कर्ता-धर्ता परमात्मा से ही मैं सारे प्रश्न पूछूँगा। मेरे अकेले के ही
नहीं, बल्कि समूचे अस्पृश्यों के जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या होगा? हमारे लिए
देवता है या नहीं? इस जन्म में हमें अपनी आँखों से भगवान् की मूर्ति का दर्शन
करने को मिलेगा या नहीं-यह सब अब मैं सीधे परमात्मा से ही पूछूँगा।
शब्दशास्त्री : पागल जैसी बातें मत करो, चोखा।
चोखा : पागल जैसी बातें? नहीं महाराजजी। बिना प्रसाद ग्रहण
किए अन्न ग्रहण न करने का व्रत है मेरा। आज से वो पूरा नहीं हो पाएगा। अत:
मुझे अब उपवास पर रहना पड़ेगा। मैं भी यह जिद करूँगा कि जब तक प्रत्यक्ष
पांडुरंग भगवान् आकर मुझे नहीं खिलाते तब तक मैं कुछ नहीं खाऊँगा।
शब्दशास्त्री : इस जिद से व्यर्थ आत्महत्या करनी पड़ेगी,
समझे।
चोखा : तो क्या हुआ? करोड़ों अछूतों को इस जन्म में अपने
उद्धार का अधिकार है या नहीं, इस महान् प्रश्न का उत्तर पाने के लिए और
करोड़ों अछूतों को मनुष्यता के अधिकार दिलाने के लिए यदि एक की बलि चढ़ गई तो
कोई परवाह नहीं। वह आत्महत्या नहीं, यज्ञ की आहुति मात्र होगी।
शब्दशास्त्री : देखो भाई, तुम जानो-समझो सारी बातें। मैं
जाता हूँ, आज समूचा प्रसाद तूने अपवित्र कर ही डाला है तो तू ही इसे पा ले।
चोखा : आभारी हूँ मैं आपका, पर अब मैं मनुष्य के हाथों का
प्रसाद ग्रहण नहीं करूँगा; क्योंकि यदि वह शास्त्रसम्मत न होगा तो अकारण ही
मैं पाप का भागीदार बन जाऊँगा। अब मनुष्य के हाथों प्रसाद नहीं पाना मुझे,
वैसे ही शास्त्र-वचन भी नहीं सुनना। अब जो कुछ पाना है वह परमात्मा से ही पाना
है, जोहर माई-बाप।
शब्दशास्त्री : (जाते-जाते) कुछ भी कहो, इस सदाचारी,
सच्चरित्र चोखा को देखकर उसे प्रणाम करने को जी चाहता है, पर क्या करूँ?
शास्त्रों और रूढ़ियों को पार नहीं कर सकता। (जाता है।)
चोखा : ठीक है। सारे लोग चले गए। अब मैं और मेरा पांडुरंग,
भगवान् और भक्त आमने-सामने होंगे। अब उधारी की बात नहीं। अब मैं सीधे भगवान्
से इस प्रश्न का उत्तर पाऊँगा कि अछूतों को इस जन्म में मानवोचित अधिकार
मिलेंगे या नहीं?
तीसरा अंक
: पहला दृश्य :
सत्यवान :
(सत्यागार में बैठा है। शिष्य-शिष्या उसका उपदेश सुन रहे हैं।)
इसीलिए कहता हूँ, सत्य ही वेद है। 'नहि सत्यात्परोधर्मः, नानृतात्पातकं
परं', यही वेदों का प्रारंभिक एवं अंतिम वाक्य है। बाकी जो है वे किस्से व
गप्पें हैं।
पहला शिष्य : अब यह बताइए कि हमारे इस सत्यवेद के अनुसार
सत्य की व्यवस्था क्या है? क्या उसमें भी कुछ अपवाद हैं?
सत्यवान : शिव-शिव, क्या पूछ रहे हो? उसमें अपवाद का अर्थ
मात्र असत्य होगा। कभी-कभी उसकी भी आवश्यकता पड़ती है। इसलिए सवाल उठता है कि
क्या कभी असत्य को अपनाना उचित है? उत्तर है कि जो मन में है वही मुँह में
आए, वैसा ही आचरण रहे। यह निरपवाद आचरण ही धर्म है, यही सत्यधर्म है। कुछ लोग
सत्यधर्म की मर्यादा न छूटे, इसलिए चुप रहने को सत्यधर्म के विरुद्ध नहीं
मानते, पर यदि कोई हमसे प्रश्न पूछे और हम वहाँ सत्य कथन न करके चुप बैठें तो
उसका अर्थ यही होगा कि आप उससे सच छिपा रहे हैं। वहाँ हमारा चुप बैठना असत्य
को सत्य की मान्यता दिलाना होता है। इसका अर्थ हुआ कि न बोलकर असत्य को ही
ध्वनित करते हैं। यह एक तरह से धोखाधड़ी नहीं है क्या? इसीलिए वास्तविक
सत्यवेद में चुप बैठने का कोई स्थान नहीं रहेगा। 'सत्यं वद' यह वेदों की आज्ञा
है, सत्य का आलाप करो। मौन रहकर असत्य का फैलाव करने की छूट नहीं। इसलिए हे
शिष्यो, इस सत्यगृह में सत्य ही बोलो, केवल सत्य ही बोलो। प्रश्न का उत्तर
भी सत्य ही रहे।
दूसरा शिष्य : आचार्य, रघुवंश में सत्य के बारे में
...
सत्यवान : क्या करूँ, मुझे बार-बार आपको टोकना पड़ता है।
रघुवंश तो काव्य है और काव्य का अर्थ है कल्पना, असत्य। इसलिए इस आश्रम में
काव्य का उच्चार भी अवांछनीय निरूपित किया गया है। थोड़ा सा सूक्ष्म विचार
करिए, काव्य की मुख्य शोभा है अलंकार शास्त्र। अलंकार शास्त्र की आत्मा है
उपमा, पर उपमा माने असत्य ही तो है। अब रघुवंश की ही बात करें-प्रारंभ में ही
कालिदास कहते हैं कि मैं विशालतम समुद्र को छोटी सी नौका में बैठकर पार करना
चाहता हूँ। अब यहीं देखिए कि कितना झूठ बोला गया है। उस समय कालिदास के पास
कदाचित् स्याही, कागज, लेखनी आदि लेखन सामग्री होगी और रघुवंश लिखने का उसका
हेतु था, पर सामने समुद्र था, वह भी विशालतम तो था नहीं। न ही वहाँ नौका थी।
और नौका में बैठकर समुद्र पार करने की इच्छा भी नहीं थी। फिर भी उसने यह झूठा
कथन केवल अलंकार का प्रयोग करने के लिए कर डाला कि वह छोटी सी नौका से महासागर
पार करना चाहता है। सुंदर स्त्री का मुँह हमेशा चंद्र माना जाता है। अब चंद्र
को तो कुछ खिलाया जाता नहीं। इसलिए सुंदरी को भी कुछ न खिलाया तो वह मर जाएगी।
उसकी मौत की जिम्मेदारी ऐसे में मम्मट जैसे अलंकारशास्त्री और कालिदास जैसे
गप्पियों पर ही डाली जाएगी। मुख क्या धड़ से अलग होकर आसमान में संचार करता
है? क्या चंद्र के मुख में दाँत होते हैं? यदि सुंदरी का मुँह सूखे समुद्र-सा
महान् खड्डों से युक्त होगा और वह इतना बड़ा होगा कि मनुष्य को कभी उसपर चढ़कर
उसे प्रत्यक्ष देखने में करोड़ों वर्ष लग जाएँगे, तो शायद ही कोई उस सुंदरी
को देखने को लालायित होगा। तब लोग दूर भागेंगे उससे। ये इनका अलंकार है। अजी,
ठीक ढंग से झूठ कैसे बोला जाए और वह कितने तरीके से बोला जाए, यह सिखाने का
शास्त्र ही अलंकारशास्त्र है और उसी विवेक में लिखे गए ये पंचमहाकाव्य
पंचमहापातक ही हैं। ऐसे महापातकों को हम बच्चों को बचपन में ही सिखाते हैं। फिर
क्या आश्चर्य है कि असत्य बोलना मनुष्य का स्वभाव ही हो गया है। इसलिए मैंने
अपने इस आश्रम में पहले ही दिन से समस्त काव्य ग्रंथ, अलंकारशास्त्र,
नाटकों-उपन्यासों की होली कर डाली थी। उस असत्य की राख पर इस सत्याश्रम की
नींव रखी गई है।
तीसरा शिष्य : फिर उस हिसाब से पंचतंत्र, हितोपदेश आदि तो
त्यागने योग्य ही हैं।
सत्यवान : बिलकुल सही है। अरे, ये कैसे नीतिग्रंथ? ये तो
अनीति ग्रंथ ही हैं। कहते हैं, घोड़ा बोला, ऊँट हँसा, चूहे ने कहा। धिक्कार
है उनको! उनका नाम भी लें तो बदन लाई जैसा जलने लगता है।
दूसरा शिष्य : पर यह 'लाई' भी तो उपमा है।
सत्यवान : क्षमा करें, तुमने बिलकुल सही कहा। क्रोध से बदन
जल उठता है। मेरे आश्रम में एक बार शराब पीना क्षम्य होगा, क्योंकि वह सत्य
होता है, पर काव्य पाठ नहीं चलता। (एक स्त्री का प्रवेश) अरे, अरे
महिला, आप यहाँ क्यों आईं?
महिला : मेरे बालक को सिरदर्द है।
सत्यवान : चार दिन आप सच बोलिए। फिर देखिए, आपके बेटे का
सिरदर्द चला जाएगा। आपको भरोसा नहीं होता न! अजी, आप सत्य बोलेंगी तो प्रसन्न
रहेंगी। मन प्रसन्न हो तो सात्त्विक भाव उदित होते हैं। उसके कारण आपके आसपास
वे ही भाव उत्पन्न होते हैं जिसके कारण लड़के का सिरदर्द अर्थात् अप्रसन्नता
दूर हो जाती है। इस तरह सत्य से सभी रोग दूर होते हैं।
तीसरा शिष्य : मुझे एक बात पूछनी है, पर वह एकांत में पूछनी
है।
सत्यवान : सत्यागार में और वह भी एकांत में! लगता है तुम्हें
सत्यधर्म की वास्तव में पहचान नहीं। एकांत का अर्थ हुआ दूसरे से कुछ छिपाने की
इच्छा। छिपाना अर्थात् असत्य है। इसलिए सत्यधर्म के अनुयायियों को एकांत में
कुछ भी करना प्रतिबंधित है। हम अपने शिष्यों को स्पष्ट निर्देश दे रहे हैं कि
यदि आपको सत्यवक्ता संतति चाहिए तो प्रजनन भी किसी पापकृत्य जैसे अंधकार के
परदे में मत करो-उस गृहस्थ धर्म का पालन भी साफ, खुले और सत्यप्रकाश की सूर्य
किरणों में अपने गृहस्थ धर्म का पालन करो जिससे संतति गर्भ धारण से ही
सत्यवचनी एवं निरोगी बनेगी। अभी तो गर्भधारण भी असत्य संस्कार के बीज पर किए
जाते हैं; क्योंकि यह कार्य हमें एकांत में चोरी-छिपे करने की आदत पड़ गई है।
पशुओं को देखिए, लज्जा यानी असत्य छुपाना भी असत्य। एकांत भी असत्य ही है। इन
तीनों असत्यों की पशुओं के प्रजनन कार्य पर बिलकुल भी छाया नहीं पड़ती। इसलिए
पशु कभी भी असत्य नहीं बोलते। यदि गर्भाधान जैसे सुमंगल एवं गंभीर धर्म-कार्य
को भी एकांत अपनी छाया मात्र से पापी बना डालता है तो फिर अन्य समय वह कितना
अहितकारी रहेगा, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
पहला शिष्य : ठीक है, खुलेआम बताता हूँ। कल सुबह सूर्योदय
होते ही ...
सत्यवान : असत्य, सूरज कभी उगता नहीं है। पृथ्वी के
घूमते-घूमते सूरज दिखने लगता है।
(इसी समय परदे के पीछे कुछ छात्रों की आवाजें आती हैं।)
क्यों रे कृष्णा, अंधे बच्चो, क्या हल्ला-गुल्ला है। (
लड़के डरते हुए आते हैं।)
कृष्णा : कुछ नहीं जी, हम लोग खेल रहे थे।
सत्यवान : अरे भाई, कहते हो, खेल रहे थे और 'कुछ नहीं' भी
कहते हो, यह कैसे? हम सभी को ऐसे झूठ बोलने की आदत पड़ गई है। यदि आश्रम के
छात्र ही ऐसे झूठ बोलेंगे तो औरों को हम क्या कहेंगे। परसों उस चोखा को रास्ते
से जाते देखा होगा। उसे धक्के मारकर भगा रहे थे लोग। चिल्ला रहे थे कि मंदिर
के रास्ते में फिर से देखा तो हड्डियाँ तोड़ डालेंगे। मैंने पूछा, क्यों रे
चोखा, क्या बात है, क्या हुआ? तो वह भी बोला, कुछ नहीं, लोग जरा गुस्सा हैं
मुझसे। अब इसे पराशांति कहें या असत्य की पराकाष्ठा? इतनी मार खा रहा था, पर
कह रहा था- कुछ नहीं जी।
पहला शिष्य : फिर आचार्य ने दया दिखाई होगी।
सत्यवान : बिलकुल नहीं। वह पूरा गप्पी है, असत्यवादी है। उस
दिन भजन करते-करते भगवान् से बोला कि तुम मेरे प्रियतम हो और मैं तुम्हारी
राधा। अब ऐसी मूँछोंवाली राधा है। इसलिए वह ईश्वर उसे मिलना छोड़ कोस-कोस दूर
भाग रहा है। इन संतों ने कमाल कर डाला है। इन्हें स्वयं को 'पत्नी' कहलाने
में भी शर्म नहीं आती। कुछ तो भगवान् को ही महिला बनाने में नहीं हिचकते,
'मेरी विठाई माई' ऐसा इन संतों को चिल्लाते देख इतना गुस्सा आता है कि इस चोखा
सहित सभी को मार लगाने की इच्छा होती है। अरे, तुम्हारे-मेरे भक्तों ने या
पुत्रों ने कल तुम्हें या मुझे साड़ी, चोली, चूड़ियाँ पहना स्त्री नाम से
पुकारना चालू किया तो कितना गुस्सा आएगा? वैसे ही भगवान् को माई कहकर पुकारने
से चिढ़ आती होगी। (बच्चों से) क्या खेल रहे थे तुम लोग?
लड़के : लुका-छिपी।
सत्यवान : (हताश स्वर में) हाय-हाय! इस दुनिया को
असत्य के रोग से कैसे मुक्त किया जाए? इस सत्याश्रम में लुका-छिपी!
लुकना-छिपना यानी 'हम वहाँ होकर भी नहीं हैं' का आभास निर्माण करना। मूर्ति
यानी असत्य का अभ्यास। बच्चो, इस आश्रम में झूठ का बुद्धिवाद रखनेवाले खेल
खेलना प्रतिबंधित है। लड़कियों के लिए भी घरौंदे जैसे खेल प्रतिबंधित हैं।
ठंडे चूल्हे फूँकते, मैं सास रसोई बनाऊँ तू बहू यह भात परोस, ऐसा ढोंग करना
गुड्डी का खेल नहीं है, यह कुलघाती खेल है। लड़कियों के हाथ में 'गुड्डी'
देना तो उसे झूठ बोलने का प्रथम पाठ सिखाना होगा। वह लड़की गुड्डी को असली
गुड्डी जैसी देखने लगती है। इस तरह झूठ के धरातल पर विकसित ये बच्चियाँ भविष्य
में पतियों को भी झाँसा देकर सुलाने में माहिर हो जाती हैं। इस तरह असत्य से
ग्रस्त सारे संसार में सत्य की स्थापना कैसे करूँ? शिष्यो, अभी हम विश्राम
करेंगे। अपने अन्य प्रश्न कल पूछें।
: दूसरा दृश्य :
जाफर अली : हमारे यहाँ सूबेदारजी ने जब से हिंदुओं को
मुसलमान बनाने के अधिकार हम मौलवियों को दिए हैं तब से इस जाफर अली ने सबसे
अधिक काफिरों को दीक्षा दी है। इसलिए अल्लाताला मुझे इसलाम की सबसे सुंदर परी
भेंट करेगा, पर इस लोक में भी वह हमें किसी बात की कमी नहीं रखता। अब हिंदू को
मुसलमान बनाया कि सूबेदार से सौ सिक्के गिना लेते हैं हम। अकबर बादशाह से भी
अधिक लोगों का धर्म परिवर्तन किया है मैंने। अकबर की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म
निरीक्षण कर मैंने हिंदुओं की दलदल के कच्चे धागे चुन लिये थे। यदि हम श्रमणों
का धर्म परिवर्तन कराने जाते हैं तो वे पूछते हैं कि तुम्हारे पास कौन सा
नगीना तत्त्व है? अब यदि कोई तत्त्व-वत्त्व की बात करने लगता है तो अपना तो
सिर चकराने लगता है। क्षत्रिय से बात करो तो वह माँगता है जागीर या बादशाह की
बेटी। वैश्य, शूद्रों से बात करें तो वे लाभ की बात चलाते हैं। जो काम यहाँ
करते हैं वही वहाँ भी करना है तो परिवर्तन के बटेर कुल कलंकित क्यों करें? इस
तरह चार वर्णों के लोगों का परिवर्तन कराना बड़ा कठिन काम हो जाता है, जो कि
अकबर की पूरी सत्ता भी करने में असमर्थ रही, पर इस मौलवी जाफर की करामात
देखिए, इस पट्ठे ने सीधे महारों की बस्ती को लक्ष्य बनाया। चार वर्णों का धर्म
परिवर्तन कराने के लिए केवल लाठी का सहारा पर्याप्त होता है, पर अछूतों के
लिए तो उसकी भी आवश्यकता नहीं पड़ी। एक बार उनका हाथ पकड़ा और कान में कहा कि
देख, तेरे हिंदू कुत्ते को छूते हैं, कुत्ते को घर में रखते हैं, उसे पंचवटी
के राम मंदिर में, पंढरपुर के विठोबा के मंदिर में या काशी के मंदिर में
घुसकर परिक्रमा करने देते हैं, पर तुझे (तुम महारों) को यह सब करने नहीं
देते। बस, यह दोहरा भर देने से उसका हिंदू होने का मोह भंग हो जाता है। दूसरे
के कान में मात्र यह कह दो कि तुम अभी मुसलमान हो जाओ तो यही हिंदू तुम्हें
छूने को तैयार हो जाएँगे, घर में घुसने देंगे, घोड़े पर बैठने देंगे, इतना
ही नहीं, तुम्हारे सामने झुककर सलाम करेंगे। इतनी सी बात से वह फौरन मुसलमान
बनने को तत्पर हो जाता है। इस तरह अछूत को छूकर उसे मुसलमान बनाकर पुरस्कार
स्वरूप सौ सिक्के खनखनाखन गिनने में बड़ा मजा आता है। है ना इस मौलवी जाफर अली
का कमाल! इसके लिए हिंदू धर्म को ही हमें धन्यवाद देना चाहिए। अस्पृश्यता की
प्रथा जीती-जागती रखकर तथा उसका अनुशीलन कर हम मुल्ला-मौलिवयों को हिंदू धर्म
खत्म करने में सहायता की है। कभी न डूबनेवाले हिंदू धर्म की लुटिया हम निश्चित
ही डुबो सकें। पहले इन अछूतों का धर्म परिवर्तन कर बाद में संख्या बल से प्रबल
हुए इसलाम के सिद्धांत की बात ब्राह्मण करे तो तलवार की नोंक पर इन
सिद्धांतवादी ब्राह्मणों को मुसलमान बनाना ही नीति-यही कार्यक्रम है। ये देखो,
मेरी वही शिकार मेरे चंगुल में फँसने चली आ रही है।
शंकर : (प्रवेश कर) मौलवीजी, कमलिनी के मुसलमान
बनने की खबर सच है न!
मौलवी : खुदा कसम, इब्राहिम खान ने पहले मुझे सारी जानकारी
दी। हिंदुओं ने फव्वारे पर तुम लोगों को जो यातनाएँ दीं उसे सुनकर तो मेरा
हृदय बेचैन हो गया। तुम्हें और किशन को पकड़कर ला रहे थे तब मैंने ही बीच-बचाव
कर तुम्हें छुड़वा लिया। कमलिनी मुसलमान हो चुकी है तथा तुम्हारी प्रतीक्षा कर
रही है-यह खबर मैंने ही तुम्हें सुनाई। इब्राहिम यह भी बोला कि यदि शंकर
मुसलमान बनता है तो सूबेदार खुद कमलिनी का विवाह उससे कर देंगे, साथ ही एक
जागीर भी उसे भेंट करनेवाले हैं। इसमें एक भी अक्षर झूठ नहीं है।
(मन में)
एक अक्षर तो क्या, दस-पाँच अक्षर झूठे नहीं हैं। बाकी सब झूठ-ही-झूठ है, पर
वे झूठ नहीं, ऐसा मैंने कब दावा किया? एक अक्षर भी झूठ नहीं, यह कहा है
मैंने और वो सच है ही।
शंकर : मौलवीजी, क्या मेरे सामने मेरे दोस्त किशन से मिलकर
उसको समझाने का प्रयास करेंगे आप? देखो, मैंने मुसलमान बनने का निश्चय कोई
कमलिनी को प्राप्त करने के लिए नहीं किया है।
मौलवी : क्षमा करना, बीच में बोल रहा हूँ। तू जो कुछ कह रहा
है वह यथार्थ ही है। तुझे हिंदू रहते यदि धर्मच्युत कमलिनी मिली भी तो क्या?
फिर से तुम्हें अछूतों के मोहल्लों में ही बसना पड़ेगा। तुम्हारे साथ वैसा ही
अन्यायपूर्ण व्यवहार किया जाएगा। कमलिनी की दुर्दशा वे स्पृश्य हिंदू तुम्हारी
आँखों के सामने करते रहेंगे। इसलिए कमलिनी की मुक्ति एक दिन के लिए भी घट जाए
तो उपयोग क्या? इससे अच्छा है कि तू मुसलमान हो जा, कमलिनी तेरी पत्नी बन
जीवन भर ब्राह्मणी से भी अधिक सुख और विलास से रहेगी। वह जन्म भर के लिए मुक्त
हो जाएगी।
शंकर : आपकी बात सच है।
मौलवी : देख शंकर, तुम लोगों के कष्टों का मूल कारण
अस्पृश्यता नहीं है क्या?
शंकर : इसमें क्या संदेह?
मौलवी : भई शंकर, जब तक तुम हिंदू हो तब तक यह अस्पृश्यता
दूर होने की संभावना है क्या?
शंकर : अब ही क्या, अनगिनत पीढ़ियों के बाद भी इसमें
परिवर्तन संभव नहीं दिखता।
मौलवी : फिर तो हिंदू शब्द से चिपके रहकर सारे कष्ट सहना
आत्मघाती भोलेपन का परिचय नहीं है क्या?
शंकर : है न ...
मौलवी : फिर पगले, पोंछ डाल वह शब्द मन से, मुँह की भाप तक
इन दो अक्षरों से चिपके रहकर महाकष्ट क्यों सहते हो? तोड़ दो नाता उस हिंदू
शब्द से, कह दो कि मैं हिंदू नहीं, इस वाक्य के साथ ही तुम महार बस्ती से
मंदिर में आ जाओगे, पशु से मनुष्य बन जाओगे, प्यादे से फर्जी बन जाओगे। इतना
ही नहीं, तेरे सारे भाईबंद तेरे साथ मुसलमान बनकर संपन्न्ता का उपभोग करेंगे।
तू अपनी जाति का उद्धारकर्ता बन जाएगा। कहो, मैं हिंदू नहीं हूँ।
शंकर : नहीं, अब मैं हिंदू नहीं, पक्का निश्चय हो गया।
मैंने यह शब्द अपने मस्तिष्क से मिटा डाला, जन्म से मेरे मस्तिष्क पर अंकित इस
छाप ने मुझे केवल काँटे की चुभन दी है। देखो, यह काँटा मैंने हमेशा के लिए
निकाल डाला और पैरों तले रौंद दिया। बोलो, मुसलमान होने के लिए कौन सा दिन
विधान करना होगा मुझे?
मौलवी : कुछ भी नहीं। हिंदू धर्म का तीव्रता से धिक्कार
करना-यही मुसलमान बनने का प्रथम चरण है, वो तूने कर डाला है। ये चार शब्द
दोहरा डालो-ला इलाही इल्लिल्लाह मोहम्मद रसूलल्लाह।
शंकर : (दोहराता है) पर मुझे इसका अर्थ नहीं मालूम।
मौलवी : चिंता नहीं, तुझे हिंदू धर्म में रहने का अनर्थ
समझना है न! फिर मुसलमान धर्म का अर्थ नहीं समझता तो कोई चिंता नहीं। परसों
तुम मसजिद में आ जाओ, मैं सूबेदारजी से मिलवा दूँगा। अब तुम किशन की चिंता
छोड़ो, हिंदू से मुसलमान बनते ही तेरी स्थिति में काफी बदलाव आया है। तेरी
तरक्की देखकर वह भी बिना बोले मुसलमान बन गए, परसों ही सूबेदार की अनुमति से
तुम्हारी भेंट कमलिनी से कराने की व्यवस्था करूँगा। मसजिद में मिलना, अब तू
जा। अब तू मुसलमान हो गया है, मनुष्य बन गया है। शंकर से सिकंदर खान बन गया
है तू, जा।
शंकर : (मन में) इसके ये शब्द मुझे कष्ट दे रहे
हैं, पर हिंदुओं के बार-बार कहे गए धेड़ शब्द की पीड़ा से कम कष्टदायक हैं। अब
मैं अस्पृश्यता की जन्मजात हीनता से मुक्त हो गया। (जाता है।)
मौलवी : अल्लाह, और सौ रुपए मेरी झोली में गिरे। सच यह है
कि कमलिनी अभी मुसलमान नहीं हुई है। कहाँ है वो, यह भी मुझे नहीं पता, पर
मेरी बताई बातें सब झूठ हैं, यह भी कहाँ पता है उसे। मुमकिन है, कभी पता ही न
लगने दें हम और यदि पता लगा भी तो क्या, मेरे सौ रुपए तो डूबनेवाले नहीं। जैसे
हिंदू धर्म ने मुझे सौ रुपए दिलाने में मेरी सहायता की है वैसे ही इन्हें
मुझसे कोई छीन न सके, इसमें भी हिंदू धर्म ही मेरा सहायक बननेवाला है। हिंदू
धर्म में छुआछूत की प्रवंचना ने शंकर को मेरे आँगन में ला पटका है। आगे यदि
उसे पछतावा हुआ या सच का पता चला और वह मुसलमान से फिर हिंदू बनना चाहे तो भी
उसकी वापसी अस्वीकार्य होगी। हिंदू ही हिंदुओं को मुसलमान बने रहने में मदद
करेंगे। हम मौलवी लोगों का काम कलमा पढ़ाना मात्र है। बाकी काम हिंदू लोग
स्वयं कर डालेंगे। गर्भ से निकलकर बालक फिर से गर्भ में वापस नहीं लौट सकता,
उसी तरह हिंदू से मुसलमान बना व्यक्ति फिर से उस समाज में प्रवेश नहीं कर
सकता। अस्पृश्यता उसे हिंदू धर्म से खदेड़ती है। अनेक बार, पतिता को हमेशा के
लिए पतिता बनाकर वही हिंदू धर्म उसकी वापसी असंभव बना डालता है। हिंदू धर्म के
दरवाजे से निकासी संभव है। हे खुदा, याअल्ला, इन हिंदुओं को ये दो बातें
त्यागने की बुद्धि तुम कभी भी न देना। जब तक हिंदू अस्पृश्यता निवारण और
शुद्धि कार्य नहीं अपनाते तब तक मुसलमान और उनकी सत्ता फैलती ही रहेगी।
: तीसरा दृश्य :
नृत्य गीत
वारांगना : भोग ले रति रंग प्यारे, करके संग न्यारे।
है अनंग के खेल सुनहरे, खेले निश-दिन प्यारे।
रोज-रोज के सुखदायी क्षण, कभी न जी को उबाते।
होकर मदहोश हमें वे, सदा रिझाते, सदा रिझाते।
गंगा : कमली, ओ कमली! क्या कहूँ इसे, सो गई ये तो। इस
काममंदिर की रुनझुन सुनकर समाधि लगा रोगी भी हड़बड़ाकर जाग उठता है, और यहाँ
इसे तो गहरी नींद लग गई दिखती है। अभी तक मैंने इसे रिझाने-मनाने की खूब कोशिश
की, पर यह समूचे भोग- विलास के प्रति अनासक्त है, पर स्वभाव से बड़ी ही
भावुक-मीठी है ये। मैं तो वेश्या ठहरी, देह की सुंदरता से मैंने अनेक लोगों के
दिल जीत लिये, पर इसकी आत्मा की सुंदरता ने मेरा मन मोहित कर लिया है। कौन
कहेगा इसे अछूत कन्या? मेरे इस कथन में मेरी यह मान्यता झलकती है कि इतनी
सुंदर-सुशील कन्या अछूतों में नहीं हो सकती। मानो ऐसे लोग पैदा होने का ठेका
केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय वर्णों ने ही ले रखा हो। मैं स्वयं मराठा कन्या हूँ,
पर बाल-विधवापन की गर्त से निकलने के लिए मैंने वेश्या का सहारा लेना भी गलत
नहीं माना। अछूतों के यहाँ इतनी सुशील कन्या पैदा हुई, यह कोई आश्चर्य नहीं।
मराठों के कुल में मुझ जैसी वेश्या पैदा होना ही आश्चर्य है। वास्तव में मेरे
इस वेश्या मंदिर में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, महार, माँग, हिंदू
या मुसलमान जो कोई भी आए, उससे जाति-धर्म पूछे बिना मनुष्य के नाते केवल उसको
स्वीकारा जाता है। जाति-पाँति के कपड़े उतारकर ही आदमी यहाँ उसके असली रूप में
स्वीकारा जाता है। हजारों बार वह वैसा प्रकट भी हुआ। बचपन के संस्कारों की छाप
अमिट रहती है, यही सच है। कमली, उठ बेटी, थोड़ा सा खा ले।
(कमल उठती है।)
बेटी, ये सच है कि हम वेश्याओं को प्रेम का नाटक करने की आदत रहती है, पर
भगवान् की सौगंध, मैं तुझसे अपनी बच्ची जैसा प्यार कर रही हूँ।
कमलिनी : (मन में) क्या करूँ मैं ! वास्तव में इस
वेश्या के इस तरह के स्पर्श से मुझे घिन आ रही है, पर इसके मुलायम स्वरों के
प्रेमजाल में मेरा दिल घिर सा गया है। (प्रकट) पानी चाहिए था मुझे
थोड़ा सा।
गंगा : अभी ला देती हूँ, बेटी। इस तरह तू मुझसे माँगती है
तो बड़ा अच्छा लगता है मेरे मन को।
(उसके मुँह को सहलाती है और पानी लाने जाती है।)
कमलिनी : हे भगवान्, कहाँ आ पड़ी मैं!
गीत
हे प्रभो, तूने मुझे किस द्वार पर डाला?
फुलवारी में खिला जो, नर्क में क्योंकर गिराया।
उन दरिंदों ने मुझे फव्वारे से भगाकर यहाँ छिपा रखा है। कहाँ होगा मेरा किशन?
कहाँ होगा मेरा शंकर? कहाँ खोजते फिर रहे होंगे वे मुझे? प्रियतम की याद आते
ही मेरा दिल दो फाँक हो जाता है। किसीके गले लगकर जी भरकर रोने की इच्छा होती
है।
गंगा : (प्रवेश कर) ये क्या बेटी, तुम्हारी आँखों
में आँसू ! पानी लो, रोओ नहीं। प्रियतम की याद सता रही है क्या? किसी प्रिय
को अपना दुखड़ा बताना चाहती हो न, कमला ! हम वेश्याओं को दूसरों के मन के भाव
उसकी मुद्रा से पहचानने की बार-बार आवश्यकता पड़ती है, इससे दूसरों की
भाव-भावना से समरस होने की हमारी सहानुभूति की शक्ति सहज ही बहुत विकसित हो
जाती है। अपनी वह सहानुभूति हम छिपा सकती हैं, रोक सकती हैं, पर मार नहीं
सकतीं। इसीलिए तुझे देखते ही मैं सबकुछ समझ गई कि तुझे प्रिय से बातें करनी
हैं। तेरे काँपते होंठ, थर्राते गाल यही बताते हैं कि तुझे किसीके गले से
लगकर रोने की इच्छा हो रही है। आ मेरे पास।
(कमलिनी उससे लिपटकर रोने लगती है।)
देख, मैं यह नहीं कहती कि तू मुझे अपनी माँ समझ ले, पर मैंने तुझे अपनी बेटी
मान लिया है। इसलिए मेरे प्यार को सच मानकर निश्चिंत रह।
कमलिनी : गंगाजी, आपके ये आत्मीय शब्द अमृत-बूँद जैसे मेरे
प्रिय वियोग में तृषित और तप्त हुए मन को मधुर लग रहे हैं। मैं तो आज पूर्ण
रूप से आपके अधीन हूँ। बेटी न मानकर यदि आप नौकरानी जैसा भी रखें तो मैं कुछ
भी प्रतिकार नहीं कर सकती। फिर भी आपने मुझे माँ सा लाड़-प्यार दिखाया है, उससे
मेरे मन में उपजी सारी आशंकाएँ समाप्त हो गईं। अब मेरा नजदीकी आत्मीय यहाँ कोई
है भी तो नहीं। जो कुछ है, आप ही हैं। सच कहूँ, मुझे आपके मंदिर की, निवास
की, व्यवहार की, यहाँ आते आदमियों की, गंध की, विलास की, रूप की, हर
वस्तु की घिन आ रही है-क्षमा करें मुझे, परंतु ...
गंगा : तुझे क्षमा करने के स्थान पर मैं ही तुझसे क्षमा
माँगना चाहूँगी। तू जो कुछ कह रही है वे सारे शब्द मुझे पहली बार सुनने को
नहीं मिल रहे। यह देख, मेरे हृदय के जिस मंदिर में मैं रहती हुई तुम्हें दिख
रही हूँ, उस काम मंदिर से घृणा होना स्वाभाविक है, पर इससे भी अलग मेरे हृदय
भवन में एक और मंदिर है। उस भाव मंदिर में एक अत्यंत प्रभावशाली देवता रहते
हैं। मेरे हृदय भवन का वही देवघर है। उसके प्रभापुंज से मेरे ये चर्मचक्षु
चौंधिया जाते हैं। इसलिए मैं उस मंदिर में न जाकर इस काम मंदिर में ही काँच के
झूमते झलकनेवाले परिमित प्रकाश को देखती रहती हूँ। फिर भी मेरे हृदय मंदिर में
बसे देवघर के देवता के शब्द मुझे वहाँ भी बीच-बीच में सुनाई देते रहते हैं। तू
जो भाषा बोल रही है न, उसी भाषा का प्रयोग करते हैं वे। विगत अनेक दिनों से
अन्न-जल-भोग त्यागकर अपना हिंदू धर्म कैसे बचाया जाए, इस चिंता में मग्न तुझे
जब मैं देखती हूँ तो तेरे ऊपर गुस्सा न आकर गर्व ही होता है तेरी इस धर्मभक्ति
पर।
गीत
हे देवी तुम मातृ रूपिणी शक्ति हो
मेरे मन मंदिर की श्रद्धामयी देवी हो।
कमलिनी : गंगाजी, इसका मतलब कि अब भविष्य में आप मेरे इस
निश्चय को भंग करने का प्रयास नहीं करेंगी, है न! मुझे धन-दौलत, मान-सम्मान
नहीं चाहिए। मेरे प्रियतम से मेरी भेंट पुनः नहीं कराई तो भी कोई बात नहीं।
मेरी लज्जा भी बलि चढ़ गई तो भी चलेगा, पर किसी भी कीमत पर इब्राहिम खान या
किसी भी अन्य मुसलमान के द्वारा मेरे कौमार्य से खिलवाड़ न करने दिया जाए,
इतनी भर मेहरबानी आप मुझपर अवश्य करें। उस दिन जो ब्राह्मण मुझे यहाँ भगाकर
लाया...।
गंगा : उस नीच नारंभट का तो तुम नाम भी न लो।
कमलिनी : वह नारंभट तो है ही, पर फिर भी उसने अधर्म नहीं
किया, यही मैं आपसे कह रही थी। जब उस दिन वह इब्राहिम खान मुझसे छेड़छाड़ करने
लगा तब उसने उसे साफ सुनाया कि यदि तूने इस लड़की को जबरन मुसलमान बनाने का
प्रयास किया तो मैं अविलंब यह बात सूबेदार बंगश खान को जा बताऊँगा और इसे आजाद
करा ले जाऊँगा। इब्राहिम की मंशा सूबेदार को बिना बताए मुझे अपने पास रख लेने
की है। उसे पता है कि यदि मैं सबेदार की नजरों में पड़ गई तो वह मुझे अपने
भोग-विलास के लिए रख लेगा। इसलिए वह डरकर जरा सा पीछे हटा। उस ब्राह्मण को
आपने नराधम कहा जिसने मेरे साथ थोड़ी छेड़खानी अवश्य की, पर उस नीच ने भी
मुसलमान को मुझसे छेड़खानी नहीं करने दी। जिस तरह आप उस ब्राह्मण को नीच,
नराधम कह रही हैं, उससे आप किसी मुसलमान की हवा भी मुझे लगने न देंगी, ऐसा
मैं विश्वास करती हूँ। बचपन में मेरी माँ कहती थी कि विजयनगर राज्य में किसी
सुनार की लड़की ने हिंदू राजा को छोड़ जब मुसलमान को चुना था तो उसकी बहुत
भर्त्सना हुई थी। तब से उसके मन में यही दृढ़ संकल्प रहा कि किसी मुसलमान
बादशाह की अपेक्षा मैं किसी हिंदू भंगी से भी विवाह करना पसंद करूँगी, पर उस
अहिंदू राजा से समझौता नहीं करूँगी। मैं उसी माँ की बेटी हूँ, मेरा यह
कुलव्रत, मेरा धर्म अब आप बचाइए, क्योंकि आप भी हिंदू ही हैं।
गंगा : इसमें क्या संदेह! तेरे साफ-सुथरे व्रत की सिद्धि
हेतु जहाँ तक बनेगा, मैं प्रयास करूँगी। तेरे शब्दों से मुझे भूली-बिसरी बातें
स्मरण आने लगी हैं। बेटी, हम हिंदू कन्याएँ हैं। इसी रिश्ते से, कर्तव्य
भावना से मैं तेरी पवित्रता की रक्षा करूँगी। चाहे वह कोतवाल इब्राहिम हो या
सूबेदार बंगश खान हो। मैं अपनी चालों से उसके सारे दाँव-पेच समाप्त कर डालूँगी।
उसकी गजांत लक्ष्मी तुझे अब लुभा नहीं पाएगी। हे हिंदू लड़की, मेरा-एक हिंदू
वेश्या का हृदय तुझे अपना थमा रहा है। यह हाथ अनेक पापों से मैला हुआ है, पर
उसे पकड़ने में संकोच न करना। वह मैला केवल चमड़ी को लगा है। अंदर का रक्त,
मांस, मज्जा और प्राण अभी भी निर्मल हैं। हिंदू थे, हिंदू ही हैं। अतः मैं
सबकुछ लुटाकर तेरे हिंदुत्व की रक्षा करूँगी।
कमलिनी : माँजी, तेरे अनंत उपकार होंगे।
गंगा : पगली, उपकार अभी मत मान, हम वेश्याएँ हैं। हमारे
बोलने का अर्थ हमारे आचरण के बाद ही निकाला जाता है। जब काम पूरा हो जाए तभी
आभार प्रकट करना। आ, मेरे पास आ। गले लग जा। बहुत दिनों बाद सच्चे प्रेम की
भेंट मुझे मिलने दे और क्रोध न कर।
गीत
बेटी तुझे चूमने को जी चाहता है।
तरे निष्पाप बदन को छूने को जी चाहता है।
तेरे मुख-चंद्र को सहलाने को जी चाहता है।
ओह, कितना सुकून मिल रहा है तुझे छूने से। आज तक सवर्णों को छूकर भी मुझे
जितनी राहत नहीं मिली, उतनी, अहा हा! एक महार बाला! आज तक लिये आलिंगन के
पापस्पर्शों से बधिर, कपटपूर्ण और निर्दय हुआ मेरा हृदय-ऐ महार बाला, तेरे
इस अछूत स्पर्श से-पुण्य स्पर्श का सुख कितना दिव्य होता है, आज पहली बार यह
अनुभव कर रहा है। मेरे हदय को आज निस्स्वार्थ दया ने स्पर्श किया। अब तुम
मुझे प्यार भरे- नाम से बुलाया करो। ऐसा लगने लगा है, तुम मुझे 'ताई' (दीदी)
कहोगी।
कमलिनी : हाँ, आज से तू मेरी ताई।
: चौथा दृश्य :
[ स्थान : पटेल निवास। नारंभट पोथी लेकर आ रहे हैं।]
नारंभट : अभी तक क्यों नहीं आ रही यह मालिनी, पुराण सुनने !
इस पटेल के घर जब मेरी कुलगुरु पद पर-इस युवा पटेलन मालिनी को पुराण सुनाने के
काम पर-नियुक्ति हुई, एक ही डर सताता रहता था कि कहीं पटेल भी पत्नी के साथ
पुराण श्रवण करने न बैठे, पर पटेल ने स्वयं ही उस संकट का परिहार कर डाला। अब
रही वह बूढ़ी मौसी, उसे किसी तरह टालना चाहिए, नहीं तो मेरे पुराण कथा का
प्रतिफल मिला ही समझो। मेरे मन की बात मालिनी के दिल से मेल खाती है ही। बस,
अब केवल एकांत भर मिलना चाहिए कि सबकुछ मेरे हाथों में होगा। आज उसने कहा ही
था कि मौसी को टालकर आती हूँ, पर अभी तक क्यों नहीं आई? अरे, राम-राम! उसके
साथ वह बढ़िया आ रही है। यह तो अच्छा है कि बुढ़िया भोली है, उसे हमारे बीच
पनप रहे रहस्य की जरा सी भी भनक नहीं है।
बुढ़िया : क्यों पुराणिकाजी, आज हमें नए काव्य का आरंभ करना
है न!
नारंभट : (उसकी उपेक्षा करते हुए मालिनी से) क्यों,
ठीक है न! मुहूर्त मिला क्या?
मालिनी : हाँ, यही पूछने आ रही थी कि पुराण का समय हुआ या
नहीं।
नारंभट : बिलकुल। हम तो आपके मुखचंद्र के उदित होने की राह
देख रहे थे। कामिनी के शीतल मुखचंद्र का उदित होना-यही मुहूर्त आज हम पढ़ने जा
रहे हैं, यही रूपावलि काव्य में बताया गया है। कौन सा काव्य निकालें? पंच
महाकाव्य में अग्रणी समझा जानेवाला रूपावलि या समासचक्र।
मालिनी : फिर वही रूपावलि काव्य ही पढ़ें।
नारंभट : ठीक है। ॐ श्रीगणेशाय नमः।
(पोथी के पन्ने पलटते हुए)
अब हम रूपावलि का पठन आरंभ कर रहे हैं। हे कामिनी, तुम मेरी तरफ एकाग्रता से
ध्यान दो। मौसीजी, आप थोड़ा पीछे हटकर बैठिए। ध्यान रहे, पोथी बीच में है।
हाँ, रूपावलि नाम की एक गोपी अपने पूर्वजन्म में किसी क्षत्रिय की पत्नी थी।
सुन रही हैं न! उसने दुर्भाग्य से एक ब्राह्मण का मन दुःखा दिया। ब्राह्मण ने
उसे भयंकर श्राप दिया।
मालिनी : ये तो गद्य निरूपण है। पद्य नहीं है क्या? मुझे
बचपन से संस्कृत श्लोक सुनने का बड़ा मन रहा। यदि उस काव्य में कोई संस्कृत
श्लोक हो तो एकाध तो पढ़िए। मेरे पिताजी, जो संस्कृत के ज्ञाता थे, भी कहते
थे कि रूपावलि काव्य और उसके श्लोक बहुत ही सुमधुर हैं।
नारंभट : अच्छा, तुम्हारे पिताजी भी, रूपावलि काव्य है,
ऐसा कहते थे। तब तो वे मेरे जैसे ही विद्वान् पंडित रहे होंगे। हे सुंदरी,
संस्कृत का एकाध ही क्यों, मुझे हजारों श्लोक मुखोद्गत हैं, पर उनमें से
कुछ महिलाओं एवं क्षुद्रों के सामने कहना प्रतिबंधित हैं। (मन में)
क्या करूँ, मुझे तो एक भी श्लोक स्मरण नहीं आ रहा। (खुले में) अरी
सुलोचना, इस रूपावलि काव्य में वेदांत से संबंधित श्लोक बहुत हैं। उन्हें
महिलाओं के सामने कैसे पढ़ूँ ? ( स्वगत) हाँ, स्मरण हो आया
एक श्लोक। (खुले में) हाँ, उसमें से एक शास्त्रीय चर्चा न
करनेवाला, मैं सुनाता हूँ। तुम लोग जरा आगे आओ, यानी ठीक से सुनाई देगा।
(दोनों आगे सरकती हैं। बुड्ढी को रोकते हुए।) हाँ, हाँ, इतना आगे नहीं।
सामने पोथी जो है। अब रूपावलि काव्य पठन आरंभ करता हूँ-
सुमुखश्चैकदंतस्य कपिलो गजकर्णकः।
लंबोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः॥
मालिनी : अरे, ये कौन सा उल्लेखनीय श्लोक है? ये तो
ब्राह्मणों के छोटे से बच्चे रटा करते थे हमारे घर के सामने।
नारंभट : कहते हैं न, उसमें कौन सी बड़ी बात है ! तोते क्या
'रामचंद्रजी' नहीं रटते? खरा महत्त्व, खरी सुंदरता, हे सुंदरी, अर्थ में
है। बच्चों को अर्थ या भाव थोड़े ही समझ में आता था। इस एक श्लोक के कुल तेरह
अर्थ बताए गए हैं। उनमें से एक अर्थ सुना है लावण्य लतिका।
मालिनी : छिः, इस तरह बार-बार मेरी लावण्य लता पर चढ़ने का
प्रयास करना उचित नहीं। एकाध बार पैर फिसलकर गिरने का और दाँत टूटने का डर भी
रहता है उसमें।
नारंभट : कोई हर्ज नहीं। कामशास्त्र में कहा ही
है-'दंतच्छेदी हि नागांना श्लाघ्यो गिरिविदारण।' अर्थ बताऊँ इसका?
मालिनी : आप तो पहलेवाले का अर्थ बताएँ। कामशास्त्र के
श्लोक का अर्थ तो अपने आप धीरे-धीरे मेरी समझ में आने लगा है।
नारंभट : सुमुखश्चैकदंतस्य कपिलो गजकर्णकः। एक बार क्या
हुआ, कपिल नाम के ऋषि को शंकरजी ने श्राप दिया कि तू रोगाक्रांत होगा। समझीं।
मालिनी : शब्दों को जरा और स्पष्ट कीजिए।
नारंभट : हे सुमुखी, सुनो। तस्य कपिलो गजकर्णकः का अर्थ है,
एक कपिल ऋषि को 'लंबोदरस्य विकटो' यानी उसकी तोंद के ठीक नीचे 'कटि' यानी
कमर पर 'गजकर्णकः' यानी भयंकर खुजली रोग हुआ। उसकी पीड़ा की कल्पना भी नहीं
की जा सकती, इतना कष्ट था उसे। जलन-ही-जलन हो रही थी। सारा बदन जल रहा था।
कपिलो गजकर्णकः (बुढ़िया से) हाँ, हाँ, जरा दूर सरक के बैठने को
कहा है, कितना आगे सरक जाती हैं आप। आगे रखी पोथी का तो खयाल करिए। मैं जैसे
आसन लगाकर बैठा हूँ वैसे स्थिरासन में बैठिए आप।
(परदे से कोई पुकारता है।)
मौसीजी, शायद पटेल साहब बुला रहे हैं आपको।
मौसी : जाके आऊँ थोड़ी?
नारंभट : थोड़ी सी क्यों, आप पूरी-की-पूरी जाएँ। पटेल साहब
बुला रहे हैं तो जाना ही पड़ेगा। सारा शहर जिनके शब्दों पर चलता है उनकी पुकार
तो सुननी ही है। (मालिनी भी उठने लगती है।) अरे-अरे, कथा श्रवण करते
समय बीच में क्या कोई युवा लड़की उठती है? अब मैं जो अध्याय पढ़ने जा रहा हूँ
वह मौसी ने अपने जीवन में पहले ही पढ़-सुन लिया है। इसलिए मौसी जा सकती हैं।
मौसी : बैठ बेटी, तू बैठ। मैं देखती हूँ।
(जाती है।)
नारंभट : (मन में) यही समय है। शापादपि
शरादपि-ब्राह्मण के बच्चे नारंभट बढ़ आगे। (मौसी को जाते देख।) गईं
क्या मौसी? होंगी यहीं-कहीं।
मालिनी : होगीं, आप तो स्थिर आसन पर बैठकर पुराण सुनाएँ। वह
तो गईं।
नारंभट : वह रूपावलि नाम की गोपी अत्यधिक सुंदर थी। क्या
वर्णन करूँ मैं उसकी सुंदरता। उसकी ठोड़ी को मानो...(उसकी ठोड़ी
छूने का प्रयास करता है।)
मालिनी : हाँ-हाँ, जरा पीछे ही रहिए। पोथी है सामने। (पीछे
सरकती है।)
नारंभट : (पोथी हटाकर खड़ा होता है।) मालिनी, हे
लावण्यशालिनी! देख, ये पोथी मौसी जैसी ही दूर हटा दी मैंने। तेरे-मेरे बीच में
अब कोई रोक नहीं। फिर अब पास आने में क्या हिचक है?
मालिनी : ऐसा क्यों करते हैं आप? शरीर को छूना क्या उचित
है? आप ब्राह्मण, मैं क्षत्रिय!
नारंभट : इसलिए तो हमारे प्रेम-संगम में शास्त्रों का भी कोई
प्रतिबंध नहीं। इसे अनुलोम और प्रतिलोम पद्धति कहा गया है।
मालिनी : माने?
नारंभट : अरे पगली, अनुलोम यानी यदि किसी ब्राह्मण का प्रेम
किसी क्षत्रिय पर आया और उसका भी प्रेम ब्राह्मण पर हो गया (स्वगत)
आय हाय, क्या शरमा रही है, यह क्या लटके-झटके दिखा रही है। (प्रकट)
यदि वह क्षत्रिय कन्या संकोच से ब्राह्मण को अकेला देख थोड़े से पीछे मुड़कर
खड़ी रहे तो ब्राह्मण को उससे अनुलोम विवाह करना चाहिए। लोम यानी केश, अनु
यानी पीछे से। अर्थात् इस तरह लज्जा विमुख उसे पीछे से आगे मोड़कर उसके मुख
का…लेना चाहिए। और उसे भी ऐसा ही देना चाहिए।
मालिनी : अर्थ बताना ये वैसे ही आचरण कर दिखाना नहीं होता।
बिना लिये-किए भी मैं समझ सकती हूँ। इसलिए दूर से ही समझाइए आप, प्रतिलोम क्या
होता है?
नारंभट : बताता हूँ। अनुलोम एवं प्रतिलोम दोनों विवाह
पद्धतियाँ बताता हूँ। फिर जो उचित लगे, उस तरीके से स्वीकार करना मुझे।
अनुलोम में केश के पीछे से आकर यानी पीठ पीछे से आकर पाणिग्रहण करते हैं, पर
यदि वह क्षत्रिय कन्या अपने प्रियतम ब्राह्मण को मन दिखावे के लिए-दूर हटकर बात
करिए-कहती है, दूर जाने का नाटक करती है तो प्रतिलोम विवाह करना चाहिए। प्रति
यानी 'उससे' लोम यानी 'लटककर' अर्थात् ऐसे गले में गलबाँहें डालकर विवाह
करना। अनुलोम में पीछे से तो प्रतिलोम में ताल ठोंककर सामने से कामिनी को
बाजुओं में लेना मात्र रहता है। ऐसे प्रतिलोम विवाह से जो खुश न हो सके, ऐसी
क्षत्रिय बाला शायद ही कोई होती है। असली क्षत्रिय कन्या कभी भी प्रतिलोम विवाह
से दूर नहीं भागती-वह वश में हो जाती है।
(उसके गले में हाथ डालने की चेष्टा। मौसी आती है।)
मौसी : अरे, ये क्या कर रहे हैं, पुराणिकजी? मुझे बताए
स्थिरासन को छोड़ आप यहाँ कैसे पहुँच गए? पुराण समाप्त हुआ क्या?
नारंभट : समाप्त कैसे होगा? मैं कथा शुरू ही कर रहा था।
इतने में एक बिच्छू निकला पास से। मालिनीजी को काट लेता, इस डर से
...
मालिनी : बिलकुल काटनेवाला था वह मुझे। यहीं...हाँ,
पास से ही निकला था।
मौसी : (घबड़ाकर दूर होते हुए) अरे बाप रे, फिर
किसीको आवाज दे देनी थी। सुरेरामजी दौड़ो। (परदा गिरता है।)
: पाँचवाँ दृश्य :
[ स्थान : पटेल के घर के सामनेवाला रास्ता।]
शंकर : (स्वगत) वह किशन आते दिख रहा है। मुसलमान
होते ही इसने मेरा मुँह न देखने की प्रतिज्ञा की है, परंतु मेरा उसके प्रति
लगाव अभी भी कम नहीं हुआ। ये तो मेरा बचपन का साथी है जिसको पाने की लालसा में
मैंने मुसलमानियत स्वीकारी-हाँ, मुसलमानियत ही मुसलिम धर्म नहीं, क्योंकि
मुझे उस धर्म की कुछ भी जानकारी नहीं। जो कुछ है, उससे यह निश्चित पता लगता है
कि हमारे संत चोखा महाराज जो शिक्षा देते हैं, वैसी कोई ऊँची पवित्रता वहाँ
नहीं है। इसलिए मैं मानता हूँ कि मैंने वह धर्म नहीं स्वीकारा है। मैंने
छुआछूत के भेदभाव से पीड़ित होकर केवल रक्षात्मक दृष्टि से मुसलमानियत
स्वीकारी है। जिसको पाने के लिए मैंने यह सबकुछ किया है। उस लाड़ली कमलिनी के
भाई किशन से मेरा लगाव अभी कम नहीं हुआ। इसे भी मुसलमानियत स्वीकारने को कहकर
इस अस्पृश्यता के कलंक से मुक्त कराने की मेरी मन से इच्छा है। वह पूरी करने
का फिर से एक बार प्रयास करके देखूँ। पंढरपुर के संभाजी पटेल की बहन कोला की
खोज में सहायता प्राप्त करने आज यहाँ आ रहा है। यहाँ-वहाँ उससे 'हिंदू अछूत'
के नाते कैसा व्यवहार किया जाता है और मुसलमान बने मुझसे कैसे बरताव किया जाता
है, इसका अंतर प्रत्यक्ष देखने को मिल जाएगा। उसे देखकर ही हिंदू समाज में
रहने की उसकी इच्छा समाप्त हो जाएगी। अभी भी यदि चेतता है तो अच्छा होगा। चलो,
पटेल के घर चलें। (जाता है।)
: छठवाँ दृश्य :
[अंदर का परदा उठता है। घर के सायबान पर पटेलजी और अन्य कर्मचारी बैठे
हैं।]
संभाजी : क्यों भाई, उस चोखा के बारे में मेरे पास काफी
शिकायतें आ रही है। मैंने उसके बारे में नारंभट से पूछा। उसे पंढरपुर के मंदिर
से लोगों ने भगा दिया। ऐसा भीकू सेठ भी कह रहे थे।
कर्मचारी : क्या कह रहे थे? स्वयं उन्हें भी उसे धक्के
मारकर भगाए बिना रहा नहीं गया। इन धेड़ों ने तो सारा भ्रष्टाचार मचा रखा है।
उस चोखा पर तो पागलपन सवार हो जाता है। वह सबसे कहता फिर रहा है कि अब तो
प्रत्यक्ष भगवान् आकर उसे प्रसाद खिलानेवाले हैं।
पटेल : सच है क्या? हम क्षत्रियों के मकान छोड़ इस धेड़ के
यहाँ भगवान् जाएँगे! पाजी कहीं का। कुछ भी गप्प हाँकता रहता है। इसकी जीभ खींच
लेनी चाहिए। ऐसी बातें कहकर वह धेड़ों को हम उच्च वर्णियों का विरोध करने के
लिए उकसा रहा है।
किशन : (प्रवेश कर) जोहार माई-बाप!
पटेल : कौन है रे तू?
किशन : मायापुर का महार अछूत हूँ मैं।
पटेल : और इतने आगे बढ़कर खड़े हुए हो। शर्म नहीं आती।
मायापुर के रहो या ब्रह्मपुर के, धेड़ तो धेड़ ही रहेंगे। हट, पीछे हट।
किशन : हटता हूँ, हुजूर, पर मेरी एक फरियाद तो सुनिए। मेरे
शब्द आपको सुनाई दे सकें, इतनी दूरी पर तो खड़ा होने दें मुझे। देखिए जी, मेरी
बहन को मार-पीटकर कुछ लोग भगा ले गए हैं।
शंकर : (एकाएक आगे आकर) पटेल साहब ...
कर्मचारी : अरे हट, पीछे हो, तू भी अछूत ही है न! अभी तक
उसके पीछे जो खड़ा था।
शंकर : हाँ, मैं भी महार-अछूत हूँ।
पटेल : पीठ पर कोड़े लगाओ सालों के, जबरदस्ती आगे घुसपैठ कर
रहे हैं। दाँत तोडे जाएँगे।
शंकर : हाँ-हाँ, इसलिए आप अपना मुँह बंद रखें। मैंने अछूतों
में जो शर्मनाक था, वह छोड़ दिया है। परसों तक इस किशन की भाँति मैं हिंदू
अछूत था, पर लज्जास्पद हिंदुत्व छोड़कर मैंने मुसलमानियत स्वीकार की है। इस
शुभ कार्य पर खुश होकर सूबेदारजी ने मुझे सिपाही से दुपारी नाइक का दर्जा दिया
है। उन्हीं का संदेश बताने आया हूँ मैं। मैं अब हिंदू महार नहीं रहा। अब मेरी
छाया पड़ने से आप अपवित्र होते हैं या नहीं, यह साफ बता दें।
पटेल : मुसलमान हो गए हो तुम?
शंकर : सूबेदार बंगश खान के सामने हुआ हूँ मैं।
कर्मचारी : फिर आपकी छाया स्पर्श का कोई बखेड़ा नहीं।
पटेल : ठीक तो है। मुसलमान बनने पर काहे की छुआछूत। आइयो नाई
काजी, ऐसे बैठक पर बैठिए।
शंकर : पर मैं हिंदू महार से मुसलमान हुआ हूँ।
पटेल : हुआ होगा। मुसलमानों को छूने या उनके साथ बिलकुल
नजदीक बैठने में हम छूत नहीं मानते। आओ, बैठो यहाँ। जो छड़े अछूत हैं उनका
बीज-रक्त सभी पूर्वार्जित कुसंस्कारों के कारण दूषित रहता है।
शंकर : पर वही रक्त, वही बीज, वहीं मांस अभी भी मेरे शरीर
में है। अणु मात्र भी बदला नहीं है।
कर्मचारी : उसके अलावा ये अछूत लोग बहुत ही गंदे रहते हैं।
खाना-पीना सब गंदा रहता है।
शंकर : पर ये किशन जिस बस्ती में रहता है, वहाँ के अधिकतर
लोगों ने 'वारकरी' धर्म की माला ग्रहण की है (वारकरी=व्रती)। इस
किशन का परिवार तो लहसुन भी नहीं खाता। मांस-मछली की तो बात ही नहीं। वे रोज
नहाते हैं, भजन करते हैं। रही अछूतपन के मैले की बात, तो कल मुसलमान बनते ही
छूट थोड़े ही गया है। मुसलमान बनने के बाद मैंने स्नान भी नहीं किया है।
पटेल : उसपर भी एक और बात है। ये छड़े मृत मांस ही नहीं, मृत
गोमांस भी खाते हैं।
शंकर : पर मैंने आपसे पहले ही कहा था कि इसी तरह लहसुन-प्याज
न खानेवाले हिंदू महार भी होते हैं। उन्हीं में से एक मैं था। तब तक तो
कभी-कभी ही मैं मृत मांस खाते औरों को देखता था, पर अब मुसलमान बनने के बाद
से तो मैं खुद जीता गोमांस खाने लगा हूँ।
पटेल : क्यों मजाक उड़ा रहे हैं, नाइक साहब? अजी, जीता
गोमांस खाना तो मुसलमानों का धर्म ही है। आइए, बैठिए यहाँ।
शंकर : कुछ जातियाँ चोरी करना अपना धर्म मानती हैं। क्या
उन्हें चोर होने के नाते तुम लोग धिक्कारोगे नहीं? चोरी को धर्म मानने से वह
व्यक्ति बड़ा धार्मिक प्रतिष्ठित तो नहीं हो जाता। मृत गोमांस की जितनी
दुर्गंध मेरे बदन से पहले आ रही थी उतनी ही आज भी आ रही है। फिर मात्र मुसलमान
बनते ही आप मुझे पास बैठाने को तैयार हो गए। वैसे, इस हिंदू महार को हिंदू बने
रहकर भी तुम्हारे पास बैठने-बनाने लायक कोई प्रायश्चित्त शास्त्रों में नहीं
है क्या?
कर्मचारी : अछूतों को काहे का प्रायश्चित्त होगा, नाइक?
संभव है कि इस जन्म में सत्कार्य करने के कारण वे अगले जन्म में ऊँची जाति
में पैदा हों, लेकिन इन्हें इस जन्म में कोई छूट नहीं।
शंकर : पर मेरा पुनर्जन्म तो हुआ नहीं है। एक ही दिन में मैं
स्पृश्य कैसे बन गया? मैंने कौन सा प्रायश्चित्त किया है!
कर्मचारी : मुसलमान हो गए न आप! यही प्रायश्चित्त है। हिंदू
रहकर धेड़ों को स्पृश्य बनते नहीं बनता, मुसलमान बनने पर वह हिंदू ही नहीं
रहता तो अछूत कैसे रहेगा? अपने आप उसकी शुद्धि हो जाती है।
शंकर : इसका मतलब यह कि इस किशन को मुसलमान बनते ही आप इसे
अपने पास बैठने देंगे।
पटेल : बड़ी खुशी से। धर्म जो है, रूढ़ियाँ भी हैं। हम
हिंदू लोग अपनी धर्म-प्रथाएँ प्राण गए तक भी नहीं छोड़ सकते। महार जब तक हिंदू
है तब तक प्राण जाए तो भी हम उन्हें नहीं छू सकते, पर वही मुसलमान बन जाएगा
तो प्राण गँवाने पड़े तो भी छूना नहीं छोड़ेंगे। अरे नाइकजी, छोड़िए यह
व्यर्थ की चर्चा। आइए, विराजिए यहाँ (हाथ पकड़कर बैठाता है।)
शंकर : (हाथ को झिड़ककर) कल मेरे हिंदू महार रहते
यदि आपने मेरा हाथ थामा होता तो मेरा मन कृतज्ञता से मक्खन की तरह पिघल गया
होता। आपकी उदारता से मैं इतना प्रभावित हुआ होता कि भगवान् मानकर आपके पैर की
धूल सिर-माथे धारण की होती, पर तब आप मेरी छाया को भी छूना नहीं चाहते थे और
अब मेरे हिंदू धर्म त्यागते ही जबकि तुम्हारे देवताओं की मूर्ति पूजना भी मेरे
लिए पाप हो गया, तब आप मुझे हाथ पकड़कर पास बैठाने को तैयार हैं। आपकी इस
चाटुकारिता को मैं धिक्कारता हूँ। चल किशन, अस्पृश्यता का काला दाग छुड़ाने
के लिए और महार से 'मनुष्य' बनने के लिए मेरे साथ चल। मात्र 'मैं हिंदू
नहीं' इतना भर कह दो। एक 'हिंदू' शब्द अपने दिमाग से निकाल डालो और चौबीस
घंटे के भीतर इनके पास सटकर बैठो। इनके नायक बन जाओगे तुम एक रात में। हिंदू
रहकर पूरे जगत में तुम्हारी शुद्धि नहीं होगी। वह हिंदू शब्द मिटा दो और इसी
क्षण से 'तू राही कहलाएगा' ऐसा हिंदू धर्म ही बताता है।
किशन : इन लोगों का हिंदू धर्म भले ही ऐसा कहता हो, पर मेरा
हिंदू धर्म ऐसा नहीं कहता। वैसा हिंदू रहकर मैं एक जन्म के बाद सत्कार्य करके
शुद्ध और स्पृश्य बन जाऊँगा, यह तनिक सी आस भी मेरे लिए इस जन्म में पर्याप्त
रहेगी। यदि मुसलमान हो जाऊँगा या अन्य कोई भी अहिंदू धर्म अपनाऊँगा तो किसी
जन्म में भी शुद्ध होने की आशा न रहेगी, स्वधर्मत्याग का पाप धोया नहीं
जाएगा, मेरे भाई।
शंकर : छि:, उस धर्म के नाम का पत्थर मेरे गले में बाँध
मुझे नरक में फिर से मत धकेलो, भाई। मैं अब शंकर नहीं, सिकंदर खान हूँ।
किशन : ठीक है, सिकंदरजी, हिंदू धर्म का त्याग करने से
मुझे कितना लाभ होगा, यह समझाने की तुमने निरंतर चेष्टा की है। हिंदुओं द्वारा
अछूतों को पीड़ित किया जाता है, यह तू सिद्ध कर रहा था। अब अछूत भी हिंदू है।
तो क्या तुम यह ध्वनित नहीं कर रहे कि हिंदू महार ही अछूतों का उत्पीड़न करते
हैं। यही तात्पर्य निकलता है तुम्हारे कथन का। हिंदू समाज का एक हिस्सा अज्ञान
और अहम् के कारण उसी समाज के अस्पृश्य माने गए लोगों का उत्पीड़न करता है, यह
तो सच है ही, पर एक हिस्से की गलती के लिए हिंदू समाज छोड़ने का विचार करना
अपने आपको छोड़ जाने जैसा पागलपन मात्र है। हिंदुत्व छोड़कर तुझे कितना
महत्त्व प्राप्त हुआ है, इसका प्रदर्शन मुझे धर्म परिवर्तन को उकसाने हेतु
तुम कर रहे थे। ऐसा ही प्रयास पूँछ कटवानेवाले सियार ने किया था। उसकी भाँति
तेरा प्रयास मुझे हास्यास्पद लगता है। इस पटेल से सटकर बैठने मात्र को
साधनास्वरूप मैं हिंदू धर्म को नहीं मानता। इन कर्मचारियों की बराबरी करने की
योग्यता प्राप्त करने मात्र में हिंदू धर्म नहीं जन्मा। अनेक जन्मों में पुण्य
संचय करते-करते मैं हिंदू धर्म में इसलिए जन्मा कि साक्षात् भगवान् मेरा हाथ
किसी दिन अपने हाथों में थाम ले। तेरी दस रुपयों की सिकंदरखानी तो कम, पर
संपन्नता के रत्नजड़ित हौदे पर बैठाया गया तो भी और उसपर लगा हिंदू धर्म का
भगवा झंडा निकालकर वहाँ चाँद जड़ा हरा झंडा या क्रॉस जड़ित झंडा लहराने का
प्रयास किसी ने किया तो मैं उस संपन्नता के प्रतीक हौदे पर थूककर सीधे उस धूल
में छलाँग लगाना पसंद करूँगा जिसमें हिंदुओं द्वारा दलितों को छला जाता है,
हिंदू धर्म की यह नीच मानी गई धूल भी मेरे लिए उस हाथी की वैभवसंपन्न सवारी से
श्रेष्ठ है; क्योंकि उस धूल में वशिष्ठ के, श्रीकृष्ण भगवान् के, प्रभु
श्रीराम के, वाल्मीकि के पद-रज मिली हुई है। विक्रम और शालीवाहन, ज्ञानेश्वर
और एकनाथ, रोहिदास और चोखामेला, इन्होंने इसी हिंदू धर्म के मंदिर के सामने
की धूल पवित्र भभूत के रूप में सिर-माथे लगाई थी। उससे वे मुक्त हो गए। उन
हिंदू योगियों की धूल में पावन होकर मिलनेवाला सुख उस कुरान प्रदत्त
सुख-सुविधाओं से कहीं श्रेष्ठ लगता है, वह निरंतर आनंददायी है। यहाँ पटेल के
नजदीक बराबरी से बैठने की बात तो क्या, वहाँ दिल्ली में मयूरासन पर बैठने की
बात यदि चलाई गई तो भी मैं हिंदुत्व नहीं छोड़नेवाला। मैं हिंदुत्व का त्याग
नहीं करूँगा। भले ही मैं अस्पृश्यता की पीड़ा सह लूँगा, मैं हिंदू भाइयों के
दरवाजे पर प्यास से तड़पते पड़ा रहना पसंद करूँगा, पर मरते दम तक हिंदू कहलाना
ही पसंद करूँगा। जब कभी मेरे हिंदू बंधु भाईचारे की सद्भावना से मुझे आधार
देने का प्रयास करेंगे तभी मैं इस अस्पृश्यता के गर्त से ऊपर उठना पसंद
करूँगा; पर किसी भी कीमत पर पराए लोग और पराए धर्म का आधार लेकर मैं अपने
बाप-दादाओं से बेईमान नहीं होऊँगा। अपने और तुम्हारे बाप जैसा ही हिंदू कहलाते
हुए जिऊँगा और हिंदू कहलाते ही मरूँगा। यदि पुनः जन्म लेना पड़ा तो वह भी
हिंदू धर्म में ही चाहूँगा। तुझे प्राप्त धन-दौलत, मान-सम्मान तुझे ही लखलाभ
रहे। मुझे उससे कोई लगाव नहीं। (जाता है।)
शंकर : अरे, इसका हमेशा का शांत स्वभाव आज एकाएक इतना
विस्फोटक कैसे बन गया! उसके ज्वालाग्राही शब्दों ने तो मुझे भून डाला है। अरे
किशन, रुको तो जरा। (जाता है।)
: सातवाँ दृश्य :
[ स्थान : गंगा का मकान। नारंभट और देवी सिंह आते हैं।]
नारंभट : इस गंगा ने तो कमाल कर दिया, इसने कमलिनी को हमसे
ऐसा छिपाया है कि अभी तक नख भी दिखाई नहीं दिया। पिछली उधारी देने की बातें कर
रही है। उस बुढ़िया मौसी की गठरी हाथ लगे तो उधारी-विधारी चुकाई जा सकती है।
देवी सिंह, वह गठरी तो मैं हथिया लूँगा, पर मेरी उधारी का क्या कर रहा हो।
मैं तुझे तुम्हारी उधारी चुकाने दे सकूँ, इतनी बड़ी वह गठरी नहीं है। इस
गंगाघाट पर हमने आज तक जो मौज-मस्ती की है उसकी बकाया रकम लौटाते-लौटाते तो
मेरा दम टूट जाएगा। इसलिए देवी सिंहजी, आप अपनी व्यवस्था स्वयं करें, यही
उचित होगा।
देवी सिंह : बिलकुल तैयार हूँ मैं, तेरी उधारी चुकाने हेतु
भगवान् की दया से एक हांडी मुझे भी हाथं लग गई है। वह सत्यवान है न! उसका भरोसा
पा लिया है मैंने। उसको सेंध लगाता हूँ मैं। पटेल को तो अपनी मुट्ठी में कस
लिया है न तुमने।
नारंभट : पूरा कस लिया है उसे मैंने। अब चोखा का नाम लेते ही
'पाजी, उल्लू' आदि गालियों की बौछार करने लगता है। तेरा जब भी उल्लेख करता
हूँ तब 'बड़ा ही सज्जन है' ऐसा कहते नहीं अघाता। यदि हमपर कोई आपत्ति आती है
तो वह हमारी पूरी सहायता अवश्य करेगा।
देवी सिंह : ठीक है, तो पटेल के यहाँ जो घुसपैठ की है, उससे
दो काम तो तूने कर ही लिये। पटेल का विश्वास और बुढ़िया की गठरी तो अब लगभग
तेरी मुट्ठी में है, पर अभी तक वह पटेलन, वह मालिनी, उनकी-हमारी एक भेंट भी
नहीं करवाई तुमने, हरामी ! स्वयं ही हाथ मार रहे हो क्या?
नारंभट : (मन में) इस गधे को उस लूट का पता भी न
चलना चाहिए। ( प्रकट) अरे काहे का हाथ मारना, यार! एक बार
प्रयास किया तो फजीहत हो गई। वह मालिनी तो बिलकुल पतिव्रता है। अरे, पुराण
सुनने कभी अकेले आती नहीं, हमेशा पति को साथ रखती है वह। अतः अपनी बात छोड़कर
बोलो तुम। चलो, अब गंगा के कोठे पर चलें। मैंने तुम्हें पहले ही बता दिया है
कि उस बुढ़िया ने धन की गठरी कहाँ छिपा रखी है, यह मैंने उसके नौकर से शराब
के नशे में उगलवा लिया है। आज फिर उसे खूब पिलाई है। नशे में उससे निश्चित
स्थान पता लगाकर वह गठरी हथियाता हूँ। एक बार माल हाथ आ जाए कि बाकी की सारी
देनदारियाँ पूरी कर मैं कमली का हाथ थामता हूँ। गंगा ने वचन दिया है मुझे।
देवी सिंह : यदि तेरी देनदारियाँ चुकाकर कुछ शेष बचा तो उससे
मेरी उधारी चुकाना न भूलना। उस सत्यवान से उगाही कर मैं तेरे पैसे चुका दूँगा।
फिर कमली का दूसरा हाथ थामने का मौका मुझे मिल जाएगा। गंगा ने मुझे भी वचन
दिया है। वो देख, ऊपर चिल्ला रहे हैं। सारे नशेड़ियों को चढ़ी लगती है। चलो,
ऊपर कोठे पर चलें।
नारंभट : पर एक खयाल रखना, मैं शराब छूऊँगा भी नहीं।
ब्राह्मण धर्म जो है न!
देवी सिंह : तुझे कहता कौन है छूने के लिए। यदि सभी ब्राह्मण
शराब पीने लगें तो हम क्षत्रियों के लिए एक बूँद भी न बचेगी।
[कोठे का दृश्य- नशेड़ी नशे में झूम रहे हैं।]
देवी सिंह : कौन से आदमी की बात कर रहे हो?
नारंभट : वह, मौसी का दूर का रिश्तेदार है। बदहवाश हो चुका
है कि नहीं, जरा देख लो। कहीं पहचान लिया मुझे तो सारी रंगत ही उड़ जाएगी।
उससे बेहतर है कि तू ही आगे बढ़कर देख कि सब लोग नशे में चूर हैं या नहीं।
[एक नशेड़ी अपने सिर पर हाथ रखे रोता-बिलखता आता है।]
देवी सिंह : अरे, क्या हुआ तुझे?
पहला : मेरा मुँह गुम गया है। अभी तो था यहीं पर।
देवी सिंह : (दूसरे से) और तुम क्या खोज रहे हो?
क्या खो गया तुम्हारा इस कोठे पर?
दूसरा : इसका थोबड़ा यदि इसके धड़ पर नहीं है तो यहीं-कहीं
गिरा होगा। हाय-हाय, यदि तेरा मुँह वापस नहीं मिला तो तू शराब कैसे पिएगा?
( पहले के गले में गला डालकर रोता है।)
पहला : मत रो बे। गरदन सहित भी मुँह गिर गया तो क्या हुआ।
मैं कंधे के मुँह से उतार लूँगा दारू।
तीसरा : अरे, शराब को कौन कंधा दे रहा है ? शराब क्या मर
गई है?
चौथा : मूर्खों, क्या बकते हो, शराबी हो तुम लोग।
पहला : कौन कहता है बे हमें शराबी? आँ? मेरा मुँह गुम गया
है, नहीं तो देख लेता तुझे।
चौथा : सज्जनो, गुस्सा न करें। मैं आपको शराबी नहीं कह रहा।
मैं तो आपके दादा-परदादा को शराबी कह रहा था।
बाकी के
शराबी : हाँ, फिर ठीक है। हमने अपने पुरखों की परंपरा नहीं
तोड़ी, है न!
देवी सिंह : (एक से) क्यों भाई, पहचाना मुझे?
वह व्यक्ति : लो, न पहचानने की क्या बात
है? दारू पी, इसका मतलब यह थोड़े है कि स्मृति खो दी मैंने। और लोग तो अपनी
माँ-बहनों को भूल जाते हैं। ऐसे लोगों को दारू को छूना भी नहीं चाहिए, पर मैं
अपनी माँ को कैसे भूलूँ? मेरी अम्मा!
(देवी सिंह के गले में हाथ डालता है।)
देवी सिंह : अरे गुरुजी, तुम्हारा काम तो और आसान बन गया,
ये तो बिलकुल होश गँवा बैठा है। बच ही गए आप।
वह व्यक्ति : क्या, बेटा कहा। माँ, मैं
तुम्हारा ही बेटा हूँ। बच गई तू। मेरे बचपन में ही तू चल बसी थी, ऐसा कहते थे
कुछ लोग, पर अब तू ही कह रही है कि बच गई तू। इसका मतलब कि तू जिंदा है अभी,
मैं तुझे कैसे भूलूँ? दारू पी ली है तो क्या हुआ?
नारंभट : देखिए, शराब पीने में कोई बुराई नहीं हैं। केवल एक
बात का खयाल रखना चाहिए। कोई गुप्त बात नशे में उजागर नहीं करनी चाहिए। वह दोष
यदि तुझमें न हो तो बाकी कोई दोष नहीं है।
शराबी : अजी, दारू पीकर आज तक मैंने कोई भी गुप्त बात किसी
से नहीं कही है। पीने के पहले जो कुछ मुँह से निकल गया सो ही।
देवी सिंह : दारू पीकर भी कोई गुप्त बात तुम किसी से नहीं
कहते, ये कोई उदाहरण देकर बता सकते हो क्या?
शराबी : क्यों नहीं? मेरी माँ है वह ! उसके जिस घर में मैं
रहता हूँ, उसी के बाग में हमारी मालकिन ने धन गाड़के रखा है, पर शराब के नशे
में आज तक कभी यह बात नहीं कही मैंने।
नारंभट : यदि यह सच है तो तू शराबी नहीं है। किसी से भी नहीं
कही है यह बात? उस बगीचे में इमली के पेड़ के नीचे गड़ा है धन, वह मुझे मालूम
है।
शराबी : गलत बता रहे हैं। कुछ भी बकते हैं आप। इमली तो खट्टी
रहती है। वहाँ कौन रखेगा अपना धन! उसके पास यदि कोई सोना रखेगा तो वह खट्टा न
हो जाएगा? आम मीठा रहता है। धन भी मीठा रहता है, क्योंकि सोने से मिठाई खरीद
सकते हैं हम। इसीलिए हमारी मालकिन ने आम के पेड़ तले उसे गाड़ा है, पर यह
गुप्त बात क्या मैंने शराब के नशे में कभी कही है? माँ, तुझे भी यह बात
मालूम नहीं, फिर इस बाप को कैसे पता रहेगी?
देवी सिंह : नहीं है पता। यह तो लतखोर नशेड़ी नहीं दिखता।
शराबी हो तो तुम्हारे जैसा। एक प्याला और पी लो, पर गुप्त बात किसी से मत
कहना। फिर चाहे जितनी पियो। (और पिलाता है।) क्यों गुरुजी, मैं भी पी
लूँ एक प्याला?
नारंभट : पी लो, पर अपना बोझा मुझपर न डालना। मुझे पीने का
आग्रह भी मत करना, मैं पीऊँगा नहीं।
पहला शराबी : कौन नहीं पिएगा दारू, ऐं?
तुम पीयोगे, वह पीएगा, मैं पीऊँगा, सब पीएँगे।
(नारंभट को पकड़ने दौडता है।)
नारंभट : अरे-अरे, ऐसा पाप मत करो। मैं ब्राह्मण जो हूँ।
सभी शराबी : और हम कौन हैं? अबे भड़वे,
अबे नारंभट, हमने पहचाना तुझे। गधे, शुक्राचार्य जैसा ब्राह्मण भी दारू पीता
ही था न!
नारंभट : अरे भाई, पर बुढ़ापे में उसने यह नियम लगा दिया कि
कोई भी ब्राह्मण दारू न पिए।
सब शराबी : फिर हम भी बुढ़ापे में वही नियम
चलानेवाले हैं। तू भी अभी दारू पी ले और बुढ़ापे में दारू न पीने पर बंधन लगा
देना, पर नारंभट, आज दारू को मना मत करो।
पहला शराबी : अरे रे, कितना घोर पतन है यह
ब्राह्मण जाति का! यज्ञ में सोमपान करके बेहोश होनेवाले ब्राह्मणों के ही वंशज
हैं न हम सब। पर क्या पाखंड मचाया है इन्होंने। शराब पीने से डरते हैं साले।
(रोने लगता है।)
नारंभट : रोओ नहीं, दीक्षितजी। यज्ञ में दारू या सोमरस पीने
में मुझे कोई आपत्ति नहीं।
सब शराबी : चलो, हम सब पहले यज्ञ ही कर लें।
देवी सिंह : पर कुंड कहाँ से लाएँगे?
पहला शराबी : ये लो, मेरे खीसे में है।
(चिलम निकालता है।)
दूसरा शराबी : हाँ-हाँ, जरा रुको।
शास्त्रीय दृष्टि से यह सही है या नहीं, यह तय करना होगा पहले।
तीसरा शराबी : शास्त्रानुसार शुद्ध है यह
कुंड। समय के अनुसार स्मृति बदलती है। स्मृति के अनुसार यज्ञ बदलते हैं। यज्ञ
के अनुसार कुंड बदलते हैं। सत्युग में 'यज्ञकुंड', त्रेता में 'होमकुंड',
द्वापर में 'हवनकुंड' और कलयुग में यह 'मृत्तिका कुंड' ही सही है। इसे हम
'चिलमकुंड' कह सकते हैं।
पहला शराबी : ठीक है, ठीक है। अब उपनिषदों
की भाषा में मैं 'उद्गाता' बनकर मंत्र कहता हूँ। 'चिलम ही अग्निकुंड है।
चकमक ही अरणी है। चिनगारी ही आकंमणीय अग्नि है। तमाकू ही है हवन, द्रव्य-मुख
है धमनी, दीवार है यूप और उससे टिककर खड़ा मैं बलि का बकरा हूँ। बस, सिद्ध हो
गया अग्नि।
नारंभट : (चिलम का एक कश खींचकर) बिलकुल प्रज्वलित
हो गया है हुताशन।
पहला शराबी : फिर हताशा छोड़कर खड़े हो
जाएँ सब। हम सब ऋषि हैं। दारू ही सोम है। बोतल ही चषका है। पीना ही पान है। अब
किसी भी ब्राह्मण को इस यज्ञ में दारू पीने में हिचक नहीं होनी चाहिए। तो
पीयो, मनचाहा पीओ। (सब पीते हैं।)
देवी सिंह : ब्राह्मणों को यदि प्रतिबंध नहीं है तो क्या
क्षत्रिय को पीने की मनाही है इस यज्ञ में?
पहला शराबी : बिलकुल है। क्षत्रियों को
वेदोक्त कर्मों का अधिकार नहीं है।
देवी सिंह : मुँह फोड़ दूँगा, साले।
नारंभट : आपने अभी जो 'मुँह फोड़ दूँगा' कहा ना, वही
शास्त्र वचन मानकर क्षत्रियों को कर्म का अधिकार माना जा सकता है। अछूतों को
छोड़ सभी को और विशेषकर द्विजों को वेदोक्त कर्म का अधिकार प्राप्त है।
सभी : सही है आपका कहना। मात्र अछूतों को दारू पीने का
अधिकार नहीं, क्योंकि उनके कारण वह भी अस्पृश्य हो जाएगी। फिर द्विज उसे कैसे
छू सकेंगे? ( गंगाजी आती हैं।)
गंगा : सबके सब साले नशे में धुत हैं। देवी सिंह, नारंभट,
सेठजी, क्या हाल बना लिया आपने? (
सब एक-एक कर खड़े होते हैं। हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं।)
तुमने तो इस स्थान को मद्यशाला का रूप दे डाला।
पहला शराबी : आहा, मूर्तिमान भगवती प्रगट हुई हैं यहाँ हम
शास्त्रियों की भक्ति देखकर। हे देवी, तुझे नमस्कार करते हैं हम, क्षमा करो
हमें। ( घुटने टेककर बैठता है।)
दूसरा शराबी : देवी नहीं, साक्षात् दारू ही प्रकट हुई है
यहाँ हम भक्तों की भक्ति देखकर। दारूणी, तुझे नमस्कार है। क्षमा करो।
(घुटने टेकता है।)
तीसरा शराबी : ना, ना, ये दारू नहीं, साक्षात् बोतल ही
प्रकट हुई है। यदि यह दारू होती तो हमारे मुँह में होती। जिस तरह से इसके अंदर
अंगूरासव भरा रहता है, उसी तरह से इसमें कामासव भरा है। बोतल को मुँह से लगाते
ही जैसे मनुष्य उन्मुक्त हो जाता है उसी तरह हे बोतल, तेरे होंठों को छूते
ही…
गंगा : (उसे थप्पड़ जड़ते हुए) ऐसे थोबड़े पर चपत
जड़ी जाती है।
नारंभट : अरे, उफनती मदिरा की बोतल का ढक्कन तड़ाक से कहाँ
उड़ गया?
गंगा : (उसके गाल पर प्रहार कर) यहाँ पर, समझ गए।
अब भागते हो यहाँ से कि दरबान को बुलाऊँ। मरजादो, अब यहाँ से निकलते हो या
बुलाऊँ चौकीदार को। एक-एक की अच्छी खासी धुनाई होगी। चलो भागो यहाँ से। वह
धक्के मार-मारकर भगाएगा तुम सबको।
[सारे लड़खड़ाते, एक-दूसरे पर गिरते जाते हैं।]
: आठवा दृश्य :
[चोखा महाराज भजन गाते हुए धरना दिए बैठे हैं।]
चोखा : हे भगवान्, अब भी दया नहीं आती तुम्हें! मेरे
प्रश्नों का उत्तर दो। यदि अस्पृश्यों को तेरे रूप का अवलोकन करना, तेरे
प्रसाद को चखना, तेरे स्पर्श से रोमांचित होना, तेरे नामसंकीर्तन में तल्लीन
होना निषिद्ध है तो फिर तूने उसकी लालसा हमारे मन में क्यों उत्पन्न की?
प्यासा और पानी, क्षुधा एवं अन्न ये सब निर्माण करने का सामर्थ्य रखनेवाले,
हे अनंत, हे भगवंत, अस्पृश्यों में अपनी भक्ति की प्यास उत्पन्न कर उसे
प्राप्त करना क्यों प्रतिबंधित किया तूने? प्यासी आत्मा तड़पती रहती है
हमारी।
अभंग
हे दयालु, हे कृपालु, क्यों हुए तुम क्रुद्ध निष्ठुर?
हे कृपालु, हे दयालु, चाहते हैं स्पष्ट उत्तर!!
क्या उन शास्त्रों का तुझे भी भय लगता है? तूने इन शास्त्रों का निर्माण किया
है या शास्त्रों ने तुझे बनाया है। बोलो, हे भगवान्, कुछ तो बोलो।
जातिहीन हैं हम, क्या है अधिकार,
सुस्पष्ट जवाब दे दे हमको…
नर देह मेरी, जातिहीन होते
संदेह के घेरे, तोड़ूँ कैसे?
आँसुओं की धारा, चरणों पे छोड़ूँ
क्यों न हमें सेवा करने देते?
[स्तब्ध ध्यानमग्न बैठता है।]
सोयरा : (प्रवेश कर) ओ मेरी माँ, भजन करते-करते
मेरे पतिदेव को मूर्च्छा आ गई। दिन के बाद दिन बीत रहे हैं, पर अन्न का कण
भी पेट में नहीं ले रहे। कितनी दुबली हो गई है काया! पर चेहरा देखो कैसा
प्रकाशमान होता जा रहा है! कमजोरी से मूर्च्छा आ रही है माँ, ध्यानमग्न हुए
हैं? नाथ, नाथ, क्षमा करें मुझे। मेरी एक बात पूरी करिए।
चोखा : कौन? तुम? बोलो क्या कहना है।
सोयरा : नाथ, आपके ईश्वर भक्ति के मार्ग में आज तक क्या
मैं कभी बाधा बनी हूँ? संसार के इस मायास्तंभ से बाँधे रखने का क्या कभी
मैंने प्रयास किया है?
चोखा : हे साध्वी, वैसा काम तूने कभी किया तो नहीं है। अधिक
क्या कहूँ, अग्नि के साथ जैसे दीप्ति, विवेक के साथ जैसे मति, मोक्ष के साथ
जैसे भक्ति रहती है वैसे ही मेरे परमार्थ साधना के कार्य में तू मूर्तिमान
प्रेरणा सिद्ध हुई है।
सोयरा : फिर मैं जो कुछ कहने जा रही हूँ, उसको कृपया अन्यथा
न लें। अन्न सेवन के बिना आपकी काया इतनी दुबली हो गई है कि मुझे तो आपके
प्राणों की चिंता खाए जा रही है। थोड़ा सा ध्यानमग्न होते ही आपको मूर्च्छा आ
गई, ऐसा सोचकर मैं तो घबरा गई थी। इसलिए थोड़ा सा तो अन्न ग्रहण करिए। केवल
अपनी इस दैहिक ममता से यह कह रही हूँ, ऐसा मत समझिए। एक और भी महत्त्वपूर्ण
कारण है इसके पीछे। यदि भगवान् खुद आकर मुझे खिलाएगा तो ही मैं अन्न ग्रहण
करूँगा, ऐसा आग्रह करना एक तरह से हठ ही नहीं है क्या! भगवत् गीता में कहा गया
है कि शरीर को कष्ट देनेवाली तपस्या जो करते हैं वे मुझे यानी आत्मा को ही
कष्ट देते हैं। फिर आपकी तपस्या से पुण्य प्राप्ति तो दूर, पाप की ही आशंका
बढ़ जाती है।
चोखा : वही तो मुख्य प्रश्न है। पुण्य और पाप क्या है, इस
बारे में तो शास्त्र, शिष्ट और संतों में कहीं भी मेल नहीं है। बुद्धि तो आज
जिसे पुण्य मानकर आचरण योग्य मानने लगती है उसी को कल पापाचरण मानने लगती है।
इसलिए अब जो पाप-पुण्यों का निर्माता है, उस भगवान् से ही निर्णय लेने की
ठानी है। अब जहाँ तक आत्मा के कष्टों की बात है, तो वह सही नहीं-पेट भर
सब्जी-रोटी खाकर होनेवाला सुख मैंने अनेक बार पाया है, पर अन्न त्यागकर
परमेश्वर को पाने का सुख-चैन मेरी आत्मा को जो मिल रहा है, उतना वह कभी भी
प्राप्त नहीं हुआ था। अछूतों को मंदिर में जाने का अधिकार वैध है या नहीं,
उनके लिए इसी जन्म में कोई उद्धार का मार्ग है या नहीं, वे मनुष्य भी हैं या
नहीं, या कितना भी पवित्र और पावन कार्य करने पर भी उन्हें मात्र नीच जाति में
पैदा होने से इस जन्म में कोई उद्धार का मार्ग क्यों नहीं है, इन प्रश्नों का
उत्तर मिले बगैर हमारे लिए पुण्यप्तय कार्य कौन सा है, इसका निर्णय कैसे किया
जा सकता है? पहले यही तय करा लूँगा मैं। पाप-पुण्य का निर्णय करने का भार
मैंने अपने कमजोर कंधों से उतारकर भगवत् चरणों पर रख दिया है। मेरा दायित्व
समाप्त हुआ। अब मैं निर्भयता से निश्चित होकर विश्राम कर रहा हूँ। अब भगवान्
पांडुरंग जब यह स्पष्ट करेंगे कि फलाना आचरण तेरे लिए पुण्यमय है, तभी मैं
फिर से कर्मारंभ करूँगा, अन्यथा पूर्व कर्म और आज का कर्म संन्यास, दोनों
पांडुरंग के चरणों में समर्पित कर प्राण विसर्जन करने के अलावा कोई तीसरा
रास्ता नहीं है।
सोयरा : पर नाथ, इस तरह से भगवान् को संकट में डालना ही तो
होगा, है न! ऐसे धरना देने से हरेक को भगवान् प्रत्यक्ष साक्षात्कार देंगे ही,
ऐसा तो है नहीं। मात्र कुछ महात्माओं को ही आज तक उन्होंने दर्शन दिए हैं।
सैकड़ों ने अन्न-जल त्यागकर भगवान् को बुलाने के प्रयास किए, उनकी इस प्रकार
मृत्यु भी हो गई, पर भगवान् उनके हठ से ऊबकर मुँह मोड़ बैठे रहे। उधर भक्त मर
गए-ये भी ध्यान में रखें।
चोखा : हे साध्वी, भगवान् दौड़कर आएँ, यदि इस इच्छा मात्र
से हमने तपस्या चलाई होती तो वह कदाचित् हठ होता, पर उसका आना-न आना, हमारे
प्रश्नों के उत्तर देना-न देना, यह सब हमने उसपर ही छोड़ दिया है। हमने अन्न
को त्यागा नहीं है, अन्न अपने आप छूट गया है। प्रियतम के दर्शन बिना मैं
दिन-प्रतिदिन छीजता जा रहा हूँ। समयानुकूल वसंत का स्पर्श नहीं होने से लता
जैसे सूख जाती है, वह उसे संकट में डालने के लिए नहीं। वसंत के
श्वास-उच्छ्वास बिना उसे फलते-फूलते नहीं बनता, इसलिए वह सूखती है। माँ के
बिना नन्हा जो बिलखता है वह उसे संकट में डालने के लिए नहीं; वह नन्हा माँ के
बिना रह नहीं पाता, इसलिए रोता है। वही अवस्था हमारी हुई है। उस जगजीवन के
बिना हमारा जीना कठिन है, इसीलिए शरीर सूखता जा रहा है। भगवान् हमे दर्शन दें
मात्र इसलिए नहीं। क्योंकि यह तो उसे सोचना है। पर यह भी सही है कि हमें उसके
दर्शन के बिना जीते नहीं बनता, इसलिए हम मृत्यु के द्वार पर बैठे हैं। एक
श्रीहरि के बिना हमें कुछ नहीं चाहिए, उसको मिलना चाहिए, यही हमारी इच्छा है,
प्रार्थना है। इसे ही हम धरना कहते हैं, संकट में डालना नहीं। मैं भी भला और
क्या करूँ?
...घबराया मन करे दौड़-धूप, यातनाएँ खूब,
मुक्त करो देवा,
तू ही माई-बाप, तू ही आदि नाथ, तू ही सर्वशक्तिमान,
मुक्त करो देवा...
[गोविंद, गोविंद कहते बेहोश होकर गिरता है।]
सोयरा : हाय राम, ये क्या हुआ! नाथ, श्रीमान, ये तो
मूर्च्छित हो गए से लगते हैं। अब किसे बुलाऊँ मैं? हे प्रभो, क्यों तुम मेरे
इस भोले नाथ की परीक्षा ले रहे हो? जिसने जिंदगी में कभी किसीको भी कष्ट नहीं
दिया, किसीका अहित नहीं सोचा, यह मेरा निरुपद्रवी, परोपकारी साधु स्वभाव का
पति यहाँ तुम्हारे लिए अन्न त्याग के कठोर व्रत में बेहोश होकर गिर पड़ा है,
फिर भी तुम्हें दया नहीं आती, भगवान्!
बड़ी विपदा में पड़ी भक्त नारी, कौन होगा तारणहारी, बताओ हे श्रीनाथ, बताओ
हे आदिनाथ!!
दया करो प्रभु, अब तुम्हारी है बारी, बताओ हे हरि, बताओ श्रीनाथ!!
नाथ, जागिए, हाय राम-इनकी मूर्छा तो काफी गहरी दिखती है।
[इसी समय आकाशवाणी होती है-हे साध्वी, तेरा पति मूर्च्छित नहीं, समाधि में
लीन हुआ है।]
सोयरा : अरे क्या, कौन ऊपर से बोल रहा है? क्या मेरे
पतिदेव को समाधि लगी है? ये तो उनकी भक्ति की परमावधि होगी। अरे, पर मैं ये
क्या देख रही हूँ? मेरी आँखों को चकाचौंध कर देनेवाला यह प्रकाश कहाँ से दिख
रहा है? आकाश तो साफ है, बिजली भी नहीं चमकी, फिर यह क्या है? कहाँ से आ
रही है धीमी सुगंध? क्या मेरे हृदय को भी स्वर्गीय आत्मा की अनुभूति हो रही
है?।
चोखा : (एकदम उठते हुए) हे साध्वी, अभी यहाँ कौन
आया था? अभी यहाँ पर सूरज-सी तेजवान, पर चाँद-सी शीतल कोई मूर्ति खड़ी थी।
कहाँ गई वह दिव्य आकृति!
सोयरा : नाथ, कोई तो नहीं था यहाँ।
चोखा : साध्वी, थी। यहीं पर थी वह मनमोहक मूर्ति।
(फिर से बेहोश होता है।)
सोयरा : हरे राम, देखते-ही-देखते फिर से ध्यानमग्न हो गए
ये। इसे समाधि मानूँ या भूख से आई मूर्च्छा? मैं तो बहुत घबराई हुई हूँ। कुछ
हवा का झटका तो नहीं लग गया इन्हें!
चोखा : (एकाएक) हे नंदकिशोर, हे गोवर्धनधारी, हे
साँवले श्याम, तनिक रुको तो सही।
सोयरा : नाथ, ऐसे क्यों कर रहे हैं आप? कहाँ है मुरलीधारी
श्रीकृष्ण! वह गोपीवल्लभ हम अछूतों का वल्लभ थोड़े ही है। वह गोपियों के लिए
दौड़ सकता है, हम अछूतों के लिए नहीं।
चोखा : वह पीतांबरधारी, गिरधारी कहाँ चला गया! अभी-अभी तो
था यहाँ...
सोयरा : महाराज, लगातार आप एक ही विचार में डूबे रहे हैं।
इसी से ऐसे आभारत हो रहे हैं, भूख से आपके मज्जा-तंतु भी क्षीण हुए होंगे।
इसलिए तरह-तरह के आभास हो रहे हैं आपको।
चोखा : हो सकता है कि आभास ही हों। यदि तुम हवा की बात करती
हो तो हमारे प्राण भी तो हवा ही हैं। यह पत्थरों से बना विट्ठल मंदिर भी तो
मज्जा-तंतुओं का आभास चित्र है। यह आकाश, मैं, तुम यह भी आभास ही तो है,
क्योंकि जो-जो नाशवान है वह सब आभास ही तो है। फिर भी इस नाशवान आभास की
वास्तविकता में सापेक्षतः मैं-तुम-ये आकाश जितने वास्तविक दिखते हैं, उतना ही
वह साँवला-सलोना मुझे सच में दिखाई दे रहा है। देखो, वहाँ खड़ा है मेरा देव।
(श्रीकृष्ण प्रकट होते हैं।)
सोयरा : अरे, ये तो वास्तव में अद्भुत आश्चर्य है। (दोनों
भगवान् को दंडवत् नमन करते हैं।)
आज आनंद की परिसीमा है, हमने उसको देखा है,
आज खुशी ने परिसीमा लाँघी है,
हमने जो उसको पाया है...
हमने सबकुछ पाया है।
हे भगवन्, आपकी इस दिव्यता से, अपूर्व प्रभापुंज से हमारी आँखें चकरा गई
हैं।
श्रीकृष्ण : उठो, उठो, जागो हे संत!
मैं हूँ आज कृपावंत
भक्ति से प्रसन्न, रखता हूँ वरदहस्त
देता हूँ खुशियाँ अनंत।
चोखा : पर हे दयानिधि, हे कृपावंत
हम तो हैं अछूत, हमें कहाँ अधिकार
भक्ति को अपाम हम तेरे?
श्रीकृष्ण : इसीलिए मैं दौड़ा-दौड़ा आया
तुम्हें बचाने, तुम्हें सिखाने
दौड़ा-दौड़ा आया
पतित पावन कहते मुझको
प्रिय है संबोधन मुझको
यही कार्य मुझको है प्रिय
इसीलिए मैं आया।
भक्तवर, मैं दौड़ा-दौड़ा आया।
[श्रीकृष्ण वरदहस्त रखते हैं।]
चोखा : हे प्रभुवर, तुमने स्वीकार कर
मेरा भार उतार दिया है
अजामिल पापराशि जो
उसे लगाया गले तुम्हीं ने
गणिका को भी अपनाकर
तुमने भवसागर पार कराया है।
श्रीकृष्ण : हे भक्त, मुझे लगी भूख,
मिटाओ वह सारी
कराओ कलेवा, प्यार भरा भोग
मेरे साथ करो पंगत न्यारी!
चोखा : हे अविनाशी, हे अनंत, हे भक्तवत्सल! मेरे इस छोटे
से झोंपड़े में तुम कैसे
समाओगे?
श्रीकृष्ण : ग्वालों के बीच, गोपियों में जैसे समाया था, बस
वैसे ही समा जाऊँगा मैं तुममें। चोखा : जैसी प्रभु की इच्छा।
कितना अहोभाग्य है हमारा!
[भगवान् के चरणों पर गिरते हैं। भगवान् वरदहस्त रखते हैं। परदा गिरता है।]
चौथा अंक
: पहला दृश्य :
[ स्थान : सत्यगृह, पात्र : सत्यवान एवं
शिष्य।]
सत्यवान : प्रिय शिष्यो, कलयुग का अंत होकर जब सत्युग उदित
होता है तब उसके पूर्व महाप्रलय होता है। उस प्रलय में सत्युग का एक बीज
वटवृक्ष के पत्ते पर अधिष्ठित रहता है। यह सत्यगृह या हम जिस नए सत्युग को
स्थापित करने जा रहे हैं, उसका बीज धारण करनेवाला वटपत्र ही है। आप सत्य
बोलिए, उसी से आपकी इच्छाएँ पूरी होंगी। कलयुग का विनाश होगा। भगवान् ने भी
कभी असत्य बोला था, इसलिए पहले का सत्युग समाप्त हो गया। अब मनुष्य तो क्या,
हम पशुओं को भी सच्चरित्र बनाएँगे। हमारे आश्रम में जो कुत्ते हैं, उन्हें
भी हम छिपकर उछल-कूद करने की आदत छोड़ देने का उपदेश करते रहते हैं। उनकी आदतें
बदलने का प्रयास करते हैं।
पहला शिष्य : मेरा घोड़ा खो गया है। मिल नहीं रहा वह।
सत्यवान : क्या तुम कभी अपने बच्चे के साथ घोड़ा-घोड़ा खेले
हो?
पहला शिष्य : हाँ, जी...
सत्यवान : इसीलिए चोरी गया तुम्हारा घोड़ा। जब हम बच्चे को
यह कहते हैं कि बेटे, मैं तुम्हारा घोड़ा बनता हूँ, तो क्या हम उसके कोमल मन
पर झूठ के संस्कार नहीं डालते? सत्यंवद, धर्मंचर, ऐसा उपदेश जिसमें देते
हैं, उस उपनयन संस्कार में हम नवदीक्षित ब्राह्मण को पास-पड़ोस में भिक्षा
माँगने भेजते समय यह कहलवाते हैं कि वह काशी यात्रा कर आया है। छि:-छिः। हर
जगह हम झूठ-ही-झूठ फैलाते हैं। अरे मेरे प्यारे शिष्य, तू चार-पाँच दिन सच
बोलने का प्रयास कर, घोड़ा अपने आप तेरे द्वार आ जाएगा।
पांडुरंग : आचार्य, मैं भी आपके इस पवित्र आश्रम का सदस्य
बनना चाहता हूँ। क्या मुझे प्रवेश मिलेगा?
सत्यवान : क्या नाम है तुम्हारा?
पांडुरंग : पांडुरंग।
सत्यवान : अरे, तू तो पूर्णरूपेण काला है। फिर किस बदमाश ने
तेरा नाम पांडु ( सफेद) रंग रख दिया! तेरे नाम में ही असत्य
है। यदि तू अपना नाम कृष्ण रखने को तैयार है तो बैठ यहाँ, अन्यथा चला जा। क्या
जमाना है! बच्चे को पालने में डालते ही असत्य के पाठ थोपे जाते हैं उसपर।
पालना-गीत को ही लें। हम गाते हैं कि 'पलने पर मोर जड़े, हाथी दे झूलारे..'
अब यह सब वास्तव में कहाँ होते हैं? अब नामकरण को ही लीजिए। नाम रखा 'महावीर'
और ये महावीर चूहे को देख घबराकर भागने लगता है। नाम रखा 'सोनाबाई' पर हाथ
में पीतल-काँसा-काठी! नाम रखा 'काशी' और रहता है 'नासिक'। इस तरह सब जगह
झूठ-ही-झूठ। वास्तव में नाम गुण-कर्म के अनुसार रखने चाहिए। हम एक उदाहरण देते
हैं। ये सामने जो बाई है न, उनका नाम यमुना था, पर वे थीं ठिगने कद की। इसलिए
हमने उन्हें 'ठिगनी बाई' पुकारना शुरू कर दिया। उन्होंने अपने लड़के का नाम
'ठिगना' रख लिया। दूसरी एक शिष्या है 'नकटी बाई।' उन्होंने बेटे का नाम
'नकटेश्वर' कर लिया। ऊँचे कद की स्त्री ने अपना नाम 'लंबिनी' रख लिया तो
लँगड़ी स्त्री ने 'लँगड़ी' रख लिया है। इन सब नामों से हमें सत्यमूर्ति दिख
जाती है। वास्तव में माँ के अनुसार नामकरण करना अधिक सही होगा। जैसे राधा से
बना राधेय। कौन किसकी जन्मदात्री है, इससे यह पता चल जाता है। पिता की
अपेक्षा यह ज्यादा सचाईपरक रहेगा। सत्यकाम, जाबालि आदि नाम भी ऐसे ही हैं। ये
देखो, दुबले-पतले शिष्य जो आ रहे हैं।
(देवी सिंह आकर प्रणाम करता है।)
प्रिय शिष्यो, ये नवीन शिष्य बड़े ही सत्यवादी हैं। सच बोलने की शपथ ली है
इन्होंने। इन्होंने जब अपना नाम 'माधव' बताया तो मैंने कहा कि झूठ नाम त्याग
दें। इन्होंने त्याग दिया। मैंने पूछा कि तुम्हारी माताजी कैसी हैं? वे बोले,
हैं दुबली सी, तो मैंने इनका नाम 'दुबले' रख दिया। सभी कागजात में भी यही
नाम लिखा गया है। कहिए दुबलेजी, ठीक तो है न सबकुछ, आइए, बैठिए।
मोहिनी : एक प्रार्थना है। एकांत में कुछ कहना है।
सत्यवान : अरे भाई, प्रत्यक्ष पत्नी के साथ भी एकांत में
कुछ कहना-करना निषिद्ध है सत्य पथ में। फिर अपरिचित स्त्री से एकांत कैसे
संभव! इसलिए जो कुछ भी हो, यहीं साफ-साफ कह डालो।
मोहिनी : मैं फड़के की पुत्री मोहिनी हूँ।
सत्यवान : 'फड़के' का मतलब है कपड़ा। कपड़े से गुड्डी बनाई
जा सकती है, पर जीती-जागती स्त्री कैसे बनाई जा सकेगी? ये तो खुल्लम खुल्ला
असत्य है। फिर तुम्हारे जैसी असुंदर स्त्री 'मोहिनी' कैसे हो सकती है? क्या
तुझे अपने रूप का ज्ञान नहीं है?
मोहिनी : सच बताऊँ क्या? हाय राम, शर्म लगती है मुझे।
सत्यवान : शर्म! शर्म माने असत्याचरण की इच्छा। असत्य तो
त्याज्य है। सत्यगृह में हरेक को 'निर्लज्ज', 'बेशरम' होना चाहिए। शरीर पर
कपड़े धारण करना भी छलावा है, झूठ है। बोलो, सच बताओ, क्या तुम बदसूरत नहीं
हो?
मोहिनी : मैं जब दर्पण के सामने होती हूँ तो स्वयं को रति
सदृश दिखती हूँ, पर जब औरों के साथ होती हूँ तो मुझे अपनी धारणा छोड़नी पड़ती
है।
सत्यवान : फिर ठीक है, क्योंकि तुझे यदि अपना रूप मोहक लगता
है तो मोहिनी नाम सही होगा। हाँ तो मोहिनीजी, क्या कह रही थीं आप?
मोहिनी : दस हजार की अमानत रखनी थी। आप सा सत्यवान व्यक्ति
किसी की कौड़ी भी डुबा नहीं सकता। आप महिलाओं की ऐसी अमानत रखकर उनके धन की
सुरक्षा करते हैं-ऐसी ख्याति है आपकी। मेरे बेटों की यह रकम ही अंतिम सहारा
है।
सत्यवान : ठीक है, लाइए। अरे ओ दुबले, तुम्हारी कल की
प्रार्थना मानकर मैं तुम्हें इस सत्यगृह का रक्षक नियुक्त करता हूँ। ये लो
चाबियाँ और इस रकम को उठाओ। चलो, मैं सब भांडारण स्थान दिखाता हूँ तुम्हें।
ठीक से पहरा रखना उनपर।
देवी सिंह : आचार्यश्री के धन की रक्षा में यह दुबली काया
प्राण भी निछावर करने में नहीं चूकेगी। सत्य ही पर-ब्रह्म है, सत्य ही सच्चा
धर्म है। मेरे रोम-रोम में सत्यप्रेम ठसाठस भरा हुआ है। चलिए, गुरुजी।
अन्य शिष्य : (उन्हें उठते देख) हमें भी आज्ञा दें
आप-अभी आते हैं हम।
सत्यवान : अरे, फिर से झूठ। अरे, तुम लोग जा रहे हो और
कहते हो 'आते हैं हम।' सारा उपदेश व्यर्थ हो गया। अरे राम, राम, इस दुनिया
को असत्य के रोग से कैसे बचाऊँ मैं।
देवी सिंह : मूर्खों, सच क्यों नहीं कहते? सच बोलने से
अपनी आत्मा को संतोष मिलता है, समाज में एक दूसरे के प्रति विश्वास बढ़ता है,
इस लोक में तथा परलोक में भी कल्याण होता है। फिर सत्य क्यों नहीं बोलते आप?
सत्यवान : दुबले, तुम जैसे सत्यप्रेमी को देखकर भविष्य की
आशा कुछ बँधती है, अन्यथा निराशा से पागल ही होना पड़ता मुझे।
देवी सिंह : फिर भी वह पागलपन सत्य का पागलपन होता। सत्य का
पागल कहलाना मैं एक तरह से सम्मान ही समझता। ठीक है, जाइए आप लोग। आचार्यजी,
हम भी चलें। आप सुरक्षा का भार मुझपर सौंप दीजिए। (जाते हैं।)
: दूसरा दृश्य :
[ स्थान : गंगाजी का कोठा। पात्र : नारंभट,
गंगाजी।]
नारंभट : (स्वगत) उस शराबी ने मौसी का गाड़ा हुआ धन
जहाँ बताया था वहीं प्राप्त हुआ। क्या गहने हैं! गंगाजी की पिछली सारी उधारी
चुकाकर यह पट्ठा नए उपभोग की उधारी माँगेगा, उधर वह मौसी चिल्ला रही होगी।
नौकर पर ही संदेह करेगी। मेरा प्रश्न ही नहीं उठता। लो, आ गई गंगाजी। अब इस
कुरसी पर बैठूँ या उसके गद्दे पर ही बैठूँ।
गंगा : (प्रवेशकर) नारंभट, मेरा बकाया?
नारंभट : गंगा, बात सँभालकर करना। आज यह पट्ठा खाली हाथ
नहीं आया, समझी। ये रख पिछला बकाया। क्यों, खुश हो न अब? देखो, कैसे मुसकरा
रही है, साली। अब नया खाता खोलने दो। बस एक, एक ही!
(चुंबन लेता है।)
गंगा : उतने पर ही अधिकार है आज तुम्हारा, अब भागो यहाँ से।
चार दिन बिलकुल फुरसत नहीं है मुझे। फिर आना।
नारंभट : देखो, मैं जाता हूँ, पर जबकि मैंने पिछली उधारी
चुका दी है और ऊपर से तीन-चार हजार की गठरी अपनी वकालत कराने तुम्हारे
न्यायालय में चढ़ाई है, तो कम-से-कम एक बार कमलिनी से भेंट करा दोगी न!
गंगा : थोड़ा रुकिए। सहमा हुआ पंछी कहीं बंदूक की आवाज सुनकर
पास आएगा क्या? मैंने उसे पुचकारकर अपने वश में कर लिया है। एक दिन वह स्वयं
इस खिड़की में खड़ी होकर मुझसे पूछेगी कि नारायण भट कब आएँगे यहाँ?
नारंभट : (पगलाता हुआ) क्या मीठा सपना सजा रही हो
प्यारी। आज उसका दर्शन तो करा दो। कितनी सुंदर हैं उसकी आँखें!
गंगा : देखने मात्र से क्या मिलेगा, गुरुजी? कल वह मुझसे
कह रही थी कि मौसी, तुम कहो तो अपने पैरों के नाखून चूमने दे सकती हूँ मैं
उन्हें।
नारंभट : फिर तुमने 'हाँ' क्यों नहीं कह दिया?
गंगा : वह महार है, आप तो अस्पृश्यों को छूते नहीं।
नारंभट : पगली हो तुम गंगा। अस्पृश्यता का वास्तविक अर्थ है
कि वे हमें नहीं छुए। यदि हमारा मन चाहे तो भी हम नहीं छुए, ऐसा नहीं है। जाओ,
ले आओ उसे यहाँ।
गंगा : पर पैर के नख का चुंबन?
नारंभट : अरी, उसे तो सब चुंबनों में कुशल प्रणय चिह्न समझा
जाता है रतिशास्त्र में, क्योंकि मुँह चूमकर फिर धड़धड़ाते मानिनी के पैरों
पड़ जाने की अपेक्षा पहले पैर का चुंबन लेकर फिर ऊपर मन-मुख तक चढ़ते जाना ही
प्रणय में अपना साध्य अचूक, तुरंत और सलीलता से प्राप्त करा देता है। ला उसे
जल्दी ला।
गंगा : आज नहीं। चार दिन बाद। नाखूनों का चुंबन तो अवश्य ही
दिलाऊँगी। अभी तो जाइए आप।
नारंभट : जाता हूँ, पर एक शर्त है। इब्राहिम या देवी सिंह
इनमें से किसीको भी उसके नाखून तक का दर्शन नहीं होना चाहिए। मैंने पैसे दिए
हैं, अतः अब कमलिनी मेरी हो गई है।
गंगा : उसकी चिंता न करें आप। उन मुओं को यहाँ खड़ा भी न
होने दूँगी। अब आप जाएँ। अरे, फिर से ये क्या? बड़े बेशरम हैं आप। चलिए,
भागिए अब...
[नारंभट जाता है। दूसरा दृश्य। परदा खुलता है।]
गंगा : (स्वगत) कितने निर्लज्ज हैं ये। मुझ जैसी के
चरणों पर गिरेंगे। मैंने मजाक में क्या कह दिया कि नख-चुंबन दिलाऊँगी तो लार
टपकाने लगा साला और चोरी-चोरी यह नीच काम करनेवाले ये लोग उस चोखामेला को
महार-महार कहते हैं और वह लड़कियों पर पापदृष्टि रखता है, यह आरोप लगाकर उसे
धक्के मारकर भगाते समय कैसे धर्मवीर बनते हैं। (देवी सिंह को आता देख) अब ये
दूसरे धर्माचार्य पधार रहे हैं। हाँ-हाँ, अंदर कदम मत रखिए। उलटे कदमों से लौट
जाइए। पिछला बकाया डुबोनेवालों का मुँह भी नहीं देखती मैं। जाइए, जाइए, काम
में व्यस्त हूँ मैं आज।
देवी सिंह : बहुत अच्छे! 'काम' में है न तू आज! फिर तो यहाँ
से जाना उचित न होगा। जब तू निष्काम रहती है, उस समय तुझसे श्रृंगार क्रीडा
करने को यह देवी सिंह दुष्ट या पागल नहीं है। तू 'काम' में है और मुझमें भी
अब उसका संचार हो रहा है। फिर दूरी कैसी? आओ, मेरी बाँहों में समा जाओ।
(थैली आगे बढ़ाता है)
लो, उतार दी न सारी उधारी! जब तक उस सत्यवान जैसे पागल लोग दुनिया में हैं तब
तक तेरी उधारियाँ चुकाने में हमें क्या तकलीफ होगी! उसने स्वयं मुझे पहरेदार
बनाया है। चोर के हाथों खजाने की चाबियाँ दी हैं।
गंगा : दुष्ट, तूने क्या उन चाबियों से...
देवी सिंह : ईमानदारी से लौटा दी उसे। केवल तिजोरी का सोना
उठाकर इस धर्मकार्य में इस गंगाघाट पर समर्पित कर दिया है। किसी मोहिनी ने यह
राशि उसी दिन लाकर दी थी।
गंगा : अरे देवी सिंह, पर जिस बेचारी ने अपनी सारी पूँजी
सँभालने को दी थी, उसे और उसके बच्चों को ही तूने निर्धन कर डाला। उसका करुण
क्रंदन तुझे सुनाई नहीं देता? दुःख नहीं होता तुझे?
देवी सिंह : दु:ख तो क्या, रोना भी आता है मुझे, पर आँसुओं
को इस तरह निरर्थक बहाना मुझे उचित नहीं लगता। जब तक सत्यवान जैसे मूर्ख भोंदू
साधुओं के पीछे पड़ने का लोगों का रोग दूर नहीं होता तब तक मैं अपने सभी
व्यक्तिगत दुःखों को दबा दे रहा हूँ। जब दुनिया से भोलापन नष्ट होकर
लुच्चे-लफंगों को भोली महिलाओं को धोखा देना असंभव हो जाएगा तब मैं पूर्व में
फँसे लोगों के लिए एकमुश्त आँसू बहा लूँगा। कोई सयाना जैसे एक ही मंडप तले दस
बार विवाह निपटाकर बचत कर लेता है, वैसे ही मैं एकतार्थ आँसू खर्च कर दूँगा।
छोड़ो ये बातें, मैंने सारी उधारी चुकाई है। फिर अब कमलिनी...?
गंगा : आठ दिनों के बाद, आजकल तुम्हारा नाम लेते ही
मुसकराने लगी है थोड़ी सी, पर थोड़ा ठहरो।
देवी सिंह : चिंता नहीं, पर इस बीच उस बम्मन को या इब्राहिम
को उसके नख भी दिखने नहीं देना, हाँ।
गंगा : आप उसकी चिंता न करें। उन मुओं को घुसने भी नहीं
दूँगी यहाँ। जाएँ अब! बराबर आठवें दिन आइएगा। कमलिनी आपकी है। हाँ, अब जाइए।
(उसके जाने पर) क्या मरा भंगड़ है वह सत्यवान? ऐसे पक्के चोर के
हाथों में खजाने की चाबियाँ देता है। श्रद्धावान महिलाओं का धन इन चोरों के
सुपुर्द करनेवाला साधुत्व किस काम का? आग लगे ऐसे सत्य को! कितने लोग उस
सत्यवान को गालियाँ देते हैं। दाने-दाने को तरसेंगे, कहा नहीं जा सकता। अब ये
तीसरे उल्लू पधार रहे हैं। (इब्राहिम आता है।) आइए, खान साहब, बड़ी
ही फड़कती खबर है आपके लिए, सुनना चाहेंगे?
इब्राहिम : कमलिनी मुझे चाहने लगी, यही वह फड़कती खबर है न!
गंगा : ठीक जाना! आठ दिनों में इस पलंग पर पहले और बाद में
आपके शयन मंदिर में कमलिनी आपके दुर्लभ प्रेम के सपने पूरे करेगी, परंतु हाय
राम!
इब्राहिम : अरे, ये लो, तेरा...परंतु, सारी बाकी चुकती कर
दी। इन आठ दिनों में मुझे कमलिनी मिलनी चाहिए। देखा गंगाजी, मेरा हाथ नारंभट
और देवी सिंह इन दो पत्थरों के नीचे दबा है। मैं उनसे खुलकर झगड़ूँ तो वे
कमलिनी की बात सूबेदार तक पहुँचा देंगे। सूबेदार को पता चला तो वह कमलिनी को
अपने शयनागार में खींच ले जाएँगे। और फिर इब्राहिम को मात्र तुम्हारे दरवाजे पर
से सीटियाँ फूँकते रखवाली करने के सिवाय कुछ काम न रहेगा। गंगा, इसलिए अब तू
ही मेरी सास हो, माता हो, पिता हो।
गंगा : (चिढ़कर) अपनी यह बकवास बंद करो, अब संक्षेप
में सुनो। देवी सिंह नारंभट को धोखा देकर कमलिनी को मुसलमान होने के लिए राजी
कर तुमसे विवाह करा दें। इतना काम ही करना है न मुझे! अब जाइए, मैं सब समझ
गई। निश्चिंत रहिए।
इब्राहिम : बिलकुल ठीक समझा है तुमने। एक बार मेरा विवाह भर
हो जाए फिर सूबेदार तो क्या, कोई भी उसे ले नहीं सकता। सारे मुसलमान मेरा साथ
देंगे। और यदि एकाध दिन चोरी-छिपे वह ले भी गया, तो साला ही है मेरा वह।
गंगा : फिर शुरू हो गए। अब मैं अंदर जाती हूँ। निकलो यहाँ
से। आठ दिन में सब ठीक करती हूँ मैं। (उसके जाने के बाद) अब सबकुछ आठ
दिनों में निपटाती हूँ। आज प्राप्त सारी रोकड़ कमलिनी के आकर्षण का कमाल है।
नहीं तो मेरे डुबोनेवाले मुझे थोड़े ही सोना चढ़ानेवाले थे। यह सब उसकी आरती
की कमाई मैं उसे ही मुँहबोली माँ का स्त्रीधन समझ दे डालूँगी। और फिर चार-पाँच
दिन में सारी संपत्ति लेकर अपनी लाड़ली बेटी के साथ काशीयात्रा पर निकल
जाऊँगी। इन तीनों बदमाशों में आपस में भिड़त होने के पहले ही मुझे अपना काम साध
लेना है। यदि इन भेड़ों की टक्कर हुई तो मामला सूबेदार तक पहुँचेगा और फिर
कमलिनी को बचाना मुश्किल हो जाएगा। आज तक सारे दाँव ठीक पड़े हैं। अब कल जो
बात सुनी, वह क्या गुल खिलाएगी, यह कहा नहीं जा सकता। कमलिनी का प्रियतम, वह
शंकर मुसलमान हो गया हो, सच नहीं लगता मुझे। यह बात उसे बताई जाए या बिना बताए
उसे यहाँ से हटाया जाए, यह समझ में नहीं आता।
कमलिनी : (जल्दी से प्रवेश कर) जीजी, वह दरवाजे से
गुजरता युवक! वह सुंदर युवक! जीजी, वह मेरा शंकर है। मुसलमान जैसे वेश में
शायद मुझे चुपके से खोज रहा होगा। मैं उसे बड़ी दूर से निहार रही थी। वह शंकर
ही है, बुला लाओ उसे।
गंगा : (परदे की तरफ जाते हुए) बेटी, भेजती हूँ
बुलावा। आएगा ही, पर यदि वह मुसलमानी भेष में है तो थोड़े धैर्य से काम लो।
एक जैसे और भी लोग नहीं होते, ऐसा नहीं है। इसलिए अनजान को यहाँ बुलाकर
तुम्हारा भेद खोलना उचित न होगा, अन्यथा कल सुबह तक वह सूबेदार तुझे अपने
शयनागार में खींच ले जा सकता है।
कमलिनी : थूकती हूँ उसके नाम पर; पर जीजी, वह शंकर ही है।
अब मुझसे रहा नहीं जाता। भगवान् की लीला देखो, मेरे प्रियतम से भेंट करा रहा
है।
[कमलिनी गुनगुनाती है। तभी शंकर का प्रवेश।]
' गंगा : लो, आ गया वह। धैर्य रखो बेटी,
तेरे मन की स्थिरता की जो मैंने बार-बार प्रशंसा की है, वह झूठी न पड़े, ऐसे
चित्तवृत्ति निरोध से जब तक मैं तुम्हें ना बुलाऊँ तब तक तुम अंदर खड़ी रहना।
पद
आज मुझे प्रियतम मेरा री देखो।
मिलेगा। जीजी।
ले आओ उसे...
[कमलिनी वैसा ही करती है। दरबान शंकर को अंदर छोड़ जाता है।]
आइए, बैठिए। अजनबी व्यक्ति ने पुकारा, इसपर नाराज तो नहीं हैं।
शंकर : बिलकुल नाराज नहीं हूँ, क्योंकि मैं तो अपने प्रिय
की खोज में चाहे जहाँ भी जा सकता हूँ। आपने बुलवाया तो दिल में एकाएक आशा जगी।
ऐसा लगा कि मैं जिसे खोज रहा हूँ उसी अपनी कमलिनी ने तो नहीं बुलाया मुझे।
कमलिनी : (स्वगत) दैया री! यह तो शंकर ही है। घुस
पड़ूँ क्या मैं वहाँ। पड़ जाऊँ उसके गले में। पर वह मरा मुसलमानी भेष? हे मेरे
हाथो, थाम लो मेरे धड़कते-उछलते हृदय को, नहीं तो मेरी जीजी मुझे उतावली
कहेगी। धिक्कारेगी।
गंगा : क्या मैं आपका नाम जान सकती हूँ? कदाचित् मेरे हाथ से
आपकी कुछ सहायता हो जाए।
शंकर : मेरा नाम है सिकंदर खान।
गंगा : और जिसको आप निरंतर तीनों लोक में खोज रहे हैं उसका
नाम-कमलिनी? यह तो हिंदू नाम है।
शंकर : मेरा भी नाम पहले शंकर, हिंदू ही था।
गंगा : अच्छा, शंकर था नाम! इतना सुंदर नाम क्यों छोड़
दिया?
शंकर : सुंदर नाम क्यों छोड़ा? क्योंकि वह नाम और उसमें
निहित हिंदुत्व जब तक मेरे शरीर से रक्त चूसती जोंक की तरह चिपका हुआ था तब
तक वह मेरे शरीर से रक्त ही नहीं, मेरे जीवन का सुख, मान और मेरी आत्मा से
आनंद सोखकर पी रहा था, पर जैसे ही मैंने अपने मन में जहरीले साँप की कल्पना
बाँबी से खींचकर, दौंचकर दूर फेंक दी, मैं मनुष्य बन गया। मैंने सुना था कि
कमलिनी ने भी अपने आत्मघाती नाम का त्याग कर मेरे जैसा ही मुसलमानी धर्म
स्वीकार कर लिया है।
कमलिनी : (स्वगत) जिस चांडाल ने कमलिनी के
धर्मांतरण की खबर फैलाई, उसकी जिह्वा जल क्यों न गई! और शंकर के धर्म बदलने की
बात जो जिह्वा कर रही है, वह भी झड़ क्यों नहीं जाती! पर कमलिनी, ये तो तेरा
प्रियतम शंकर है। यदि तू ही उसके लिए ऐसा भला-बुरा कहेगी तो वह इसे सह पाएगा?
कुछ भी हो, है तो तेरा प्रियतम ही।
गंगा : पर सिकंदर खान, यदि तुम्हारा दिया हुआ समाचार झूठ
निकला तो?
शंकर : तो क्या हुआ? भगवान् को साक्षी रखकर मैंने उससे
विवाह करने का वचन दिया है। उसे निभाऊँगा मैं।
कमलिनी : (स्वगत) हाय राम, ये अब भी भगवान् को मान
रहा है! मैंने व्यर्थ ही अपशब्द कहे उसके बारे में। यह मुसलमानी नाम मुझे
खोजने के लिए, पाने के लिए झूठमूठ स्वीकारा होगा उसने। मेरा शंकर तो हिंदू ही
है।
शंकर : अपनी कमला से तो मैं विवाहित हुआ ही। मैं अपनी भाँति
उसे भी मुसलमान बना लूँगा और अछूतों की गंदी बस्ती से उसे राजमहल की सी ऊँचाई
पर ले जाऊँगा।
कमलिनी : (स्वगत) नहीं, ये राक्षस मेरा शंकर नहीं।
यह कोई सिंकदर ही होगा। मेरी आँखें धोखा दे गईं, चर्मचक्षुओं को यह शंकर
दिखा, पर मन के चक्षुओं ने सही पहचान लिया। ऐ मेरे दिल, अब तू इसके लिए पागल
मत बन।
शंकर : बोलिए, जिसके लिए मैं पागल बन गया हूँ, जो मेरे
बचपन की सहेली थी, जो मेरे किशोर वय की सखी थी, जो मेरी गृहिणी होनेवाली थी,
वह मेरी कमलिनी कहाँ है? क्या आप उसका पता दे सकती हैं? (
गाता है।)
कहाँ गई मेरी प्राणप्रिय, तड़पे ये निश-दिन मेरा जिया
कहाँ गई मेरी दिल की लता, लिपटे रहती थी।
मन में प्राणप्रिया, कहाँ ढूँढूँ मैं अपनी प्राणप्रिया।
कमलिनी : (स्वगत) कोई संदेह नहीं अब। शंकर ही है ये
और मेरा मन उछल रहा है उसकी बाँहों में समाने को, पर हे मन, जरा रुको, ठीक
से देखो, सिकंदर तो नहीं है वो?
गंगा : कमल...
कमल : कहिए, दीदी...
शंकर : अरे, यही है मेरी कमलिनी। हाँ, यही है वह। कितनी
खुशी की बात है! प्रिय कमलिनी, चलो तू ही है मेरी।
कमलिनी : हाय राम, मैं तुम्हें शंकर नहीं मानती।
शंकर : अरे, ऐसे डरती क्यों हो? मैं ही तुम्हारा पहले का
शंकर हूँ। मैं अब सिकंदर बन गया हूँ, कमलिनी। तुम्हारी खोजबीन में कितने कष्ट
उठाए मैंने। तेरे मिलन को तड़पता रहा यह शंकर। अब एक पल की विरह सह नहीं सकता।
चलो।
कमलिनी : ये लो प्रिय, मैं तैयार हूँ तुम्हारी बाँहों में
सिमटने को।
(आगे बढ़ते-बढ़ते रुक जाती है। फिर कठोर स्वर में कहती है।)
नहीं, ये नहीं हो सकता। पहले बताओ, तुम शंकर हो या सिकंदर? दोनों एक स्थान
पर नहीं रह सकते। दोनों मेरे प्रियतम कैसे हो सकते हैं? हे मेरे पैर, आगे
बढ़ने से रुको, नहीं तो स्वर्ग के शिखर पर विराजने जो कदम बढ़ रहे हों वह
कदाचित् फिसलकर नरक के गहरे गड्ढे में जा गिरें।
शंकर : प्राणप्रिय, अब मेरा धीरज मत तोड़ो। ऐसे डरती क्यों
हो?
कमलिनी : तुम्हारी इस वेशभूषा से नफरत है मुझे। उस पतित
अहिंदू वेशभूषा से डर लगता है मुझे।
शंकर : क्या तुम अभी भी हिंदू ही हो?
कमलिनी : और क्या तुम हिंदू नहीं हो अब? बताओ, साफ और
सच-सच बताओ। तुम्हारे एक कथन पर मेरे जीवन का सोना बनना या मिट्टी होना निर्भर
है। बोलो, दूर से ही बताओ। तेरे इन दुष्ट वस्त्रों की और हिंदू विरोधी
प्रलापों की छाया भी मुझपर न पड़े, इतनी दूरी रखकर बोलो।
शंकर : नहीं, अब मैं हिंदू नहीं रहा। तू और मैं जब हिंदू थे
तब जो नीचत्व की छाप हमपर लगी थी वह इस वेश को अपनाते ही गल गई। कमली, इस वेश
से नया भय उत्पन्न नहीं होता बल्कि पुराने सारे डर दूर हो जाते हैं। कमली, तुम
भी ये वेश धारण कर लो, इन विचारों का मर्म स्वीकार कर लो और मेरे साथ-साथ उसी
फव्वारे पर चलो। तुम पाओगी कि जो तुम्हें घोड़े पर नहीं बैठा रहे थे, जो
तुम्हें पानी पीने नहीं दे रहे थे, वे ही अब तेरे आगे-पीछे मँडराएँगे। उनकी
क्षत्रियता अब घुटने टेक वह सब करने देगी जिसको वे पहले दूर रखते थे, क्योंकि
मैं अब सिकंदर बन गया हूँ। मैं सिपहसालार बन गया हूँ। और तुम तो मेरी
स्वयंवरिता पत्नी बन रही हो।
कमलिनी : सिकंदर, ये पापी शब्द फिर से मत बोलो। स्वयंवरित
मैं शंकर की पत्नी हो सकती हूँ। शंकर मेरा प्रियतम है।
(एकाएक कठोर स्वर में)
पर सिकंदर नीच की... (फिर से मुलायम स्वर में) अरे, कितनी दुष्टता
दिखा रही हूँ मैं। मेरा रत्नों जैसा ये प्राणसखा मुझे फिर से मिला है और मैं
कुछ भी बके जा रही हूँ। शंकर... (आगे बढ़ने लगती है।)
शंकर : कमली, रुको नहीं, यदि यह मेरा वेश तुझे भयंकर पाप
लग रहा हो तो इतना भर समझो कि वह तुम्हारे प्यार की ही छाया है। तेरे मुसलमान
बनने की बात सुनकर ही तुझे विरह व्यथा से बचाने मैंने मुसलमान होना स्वीकारा
है।
कमलिनी : फिर तो मैं अधिक ही घृणा करती हूँ तुमसे। हिंदुत्व
का मूल्य जिसने मुझ जैसी हाड़-मांस की एक लड़की के प्रेम से अधिक न समझ पाया,
वह अधम ही होगा। यदि कोई दर्शन या विचारों से प्रभावित होकर धर्मांतरण करता तो
मैं उसको मतिमंद मान सकती थी, उसका धिक्कार मैं न करती, पर जो दुःखों से
डरकर नरक के किसी सुवर्ण पात्र के लोभ में और व्यक्तिगत अपमानों से डरकर धर्म
बदलता है वह मेरी दृष्टि में नीचोत्तम ही है। मैं उसकी छाया से भी बचना चाहती
हूँ। जीजी, मुझे पकड़ो। मेरे अवयव और मन में द्वंद्व हो रहा है। शरीर इस शंकर
के आलिंगन के अमृतपान के लिए उतावला होकर पतंगे की तरह उसपर झपटना चाहता है,
जबकि मेरी आत्मा सिकंदर के राक्षस से बचने को कह रही है, क्योंकि यह हिंदू
धर्म से अलग हुआ सिकंदर खान है।
शंकर : हिंदू धर्म से पतित मत कहो। हिंदू धर्म में जो पतित
था वही आज पावन बनकर नहीं बल्कि पावक (अग्नि) बनकर तुम्हारे सामने
खड़ा है। जब वह शंकर था तब उसके छूने से घोड़े को भी छूत लगती थी, आज उसी
शंकर के घुड़सवार बनते ही कल तक हल्ला मचानेवाले वे ही क्षत्रिय-वैश्य उसके
घोड़े की मालिश करने में जुटे देखे जा सकते हैं। तुम्हीं बताओ, ये मेरा पतन
है या उत्थान!
कमलिनी : घोड़े पर बैठना यदि उद्धार होगा तो मक्खियों को भी
राजा से अधिक भाग्यवान मानना चाहिए, क्योंकि मक्खियाँ भी घोड़े की सवारी करती
हैं। शंकर यदि हिंदू महार के रूप में घुड़सवारी करता, सभी लोग तुझसे मनुष्यता
के नाते समानतापूर्वक व्यवहार करते तो उसे तुम्हारी वास्तविक उन्नति माना होता
मैंने। पर ये हिंदू तेरे घोड़े को खरारा कर रहे हैं, तू उनका अछूत बंधु है
इसलिए नहीं बल्कि तुम मुसलमान हो, इसलिए कर रहे हैं। इस स्थिति के अंतर से
मेरे हिंदू बांधवों की आत्मघाती कापुरुषता जितनी व्यक्त हो रही है उससे कहीं
अधिक स्वजाति की अवनति से संतुष्ट होनेवाली तेरी स्वधर्म द्रोही नीचता अधिक
उजागर हो रही है। मेरा शंकर हिंदू था, तू तो मुसलमान है।
शंकर : तेरा हिंदू शंकर तो अब इस दुनिया में नहीं है। जो कुछ
है वह यही सिकंदर है।
कमलिनी : दुष्ट, तुम्हारे अभद्र शब्द नष्ट हों। मेरा शंकर
है, वह हिंदू ही है और इसी दुनिया में है। कमलिनी की साँस जब तक चलेगी तब तक
वह उसके मन में अमर है। जीजी, मेरा शंकर है, कसम तुम्हारी, वह उस हरसिंगार
के नीचे खड़ा है। जीजी, जानती हो? हम इस पेड़ के साये में लुका-छिपी खेला
करते थे। उस समय उसने मुझे खेलते-खेलते ऐसे पकड़ लिया था।
(उसकी ओर बढ़ती है। तभी मल्हार गायकवाड़ आता है।)
मल्हार : सलाम, सिकंदर खान साहब।
शंकर : कमली, ये देखो, सूबेदार का दिया हुआ मेरी अधीनस्थ
सेना का क्षत्रियकुल उत्पन्न वीर मराठा। देखो, यह कैसे मुझे झुककर सलाम कर
रहा है। कहो गायकवाड़, घोड़ा ले आए हमारा? बोलो।
मल्हार : जी खान साहब, सूबेदार ने आपको अविलंब बुलाया भी
है। यही कहने आया हूँ मैं।
शंकर : ठीक है। ये देखो, ये मेरी स्वामिनी है। इन्हें भी
तुम झुककर सलाम करो। फिर यहाँ से जाना।
[मल्हार मुजरा करने बढ़ता है।]
कमलिनी : (पीछे हटते हुए) अरे-अरे, ये क्या पटेल
साहब! मैं एक अछूत कन्या हूँ। यदि आप मुझे एक धर्मभगिनी के नाते मुजरा करोगे
तो मैं स्वीकार कर सकती हूँ, पर तुम्हें धोखे में रखकर मैं सलाम नहीं ले
सकती।
शंकर : गायकवाड़, मुजरा करते हो या नहीं?
मल्हार : हम तो उच्चवर्णी मराठा हैं। हम इस अछूत कन्या को
कैसे मुजरा करें?
शंकर : मुझे कैसे किया?
मल्हार : क्योंकि अब आपने हिंदू धर्म त्याग दिया है। यदि ये
हिंदू धर्म तजकर मुसलमान हो जाएँ तो हम मुजरा करेंगे। मुसलमानों के सामने हम
दस बार झुककर सलाम कर लेंगे, पर अछूतों को, जब तक वे हिंदू हैं तब तक तो
बिलकुल भी न करेंगे। हिंदू रूढ़ि को हम त्याग थोड़े ही सकते हैं।
कमलिनी : पटेलजी, आपकी आज की रूढ़ि के अनुसार मैं अछूत
कन्या आपको दूर से ही जोहार करती हूँ।
शंकर : (स्वगत) बचपन के संस्कारों ने इसे पूरी तरह
ग्रस लिया है। जैसेकि भुतिया को किसी दुर्घटना से जबरदस्ती करते हुए भी बचाना
पड़ता है, वैसे ही मैं कमलिनी को पिछड़ी बस्ती से बलपूर्वक उठाकर महलों में ले
जाऊँगा और उसे मुसलमान बनाऊँगा। (प्रकट) आज तो मैं जा रहा हूँ। कुछ
दिन बाद लौटूँगा। तब तक सोच लेना। जाऊँ मैं? इतने दिनों बाद मिलने पर भी मुझे
ऐसे ही लौटा रही हो। हाथ में हाथ भी नहीं लेने दिया।
कमलिनी : मेरा दिल पानी-पानी हुआ जा रहा है। शंकर, मत जाओ न,
सचमुच मत जाओ। तुम्हारे जाने की बात सुनते ही आँखों में आँसू आ जाते हैं।
(गीत गाती है।)
तेरे बिना, जीना ना, प्राणप्रिय, जीना ना...
हे मेरे शंकर (धिक्कार से) सिकंदर,
तुम यहाँ से चले जाओ।
शंकर : नहीं जाऊँगा। तुझे गले लगाए बिना जाऊँगा तो पगला
जाऊँगा मैं।
(जबरन उसे पास खींचता है।)
गंगा : हाँ-हाँ, सावधान सिकंदर खान! जोर-जबरदस्ती से तुम
मेरी इस हिंदू कन्या को छू नहीं सकते अन्यथा द्वार रक्षकों को बुलाकर निकालना
पड़ेगा तुम्हें यहाँ से। जाओ, चलते बनो यहाँ से।
शंकर : (स्वगत) गलती कर रहा हूँ मैं। अभी यहाँ बिफर
गई तो यह हिरनी हाथ से छूट जाएगी। सूबेदार की अनुमति से इस घर पर छापा मारकर
ही इन्हें पकड़ना उचित होगा। अब तो मैं हिंदू रहा नहीं। इसलिए किसीको भी जबरन
धर्म बदलवाना अनुचित न होगा। अब तो मैं मुसलमान बन चुका हूँ। अब तो सबको,
विशेषतः अछूतों को, सारे हिंदुओं को तलवार की नोंक पर काफिर से काजी बनवाना
यह मेरा धर्म और कर्तव्य बन गया है। (प्रकट) क्षमा करो बाई, जो कुछ
हुआ, बेहतर है उसको भुला दें। मैं आपको फिर से कोई कष्ट न दूँगा। शंकर के हाथ
में मात्र एक कमल था, पर इस सिकंदर के गले में गलबाहें डालने के लिए अनेकों
की कतार खड़ी है। आप निश्चिंत रहिए। (जाता है।)
: तीसरा दृश्य :
[ स्थान : बंगश खान की कचहरी।]
बंगश : हिंदुओं के बगीचे के अनेक कोमल फूल इस सूबेदार बंगश
खान ने आज तक तोड़े। इसलिए सब फूल बासी हो गए हैं। इसलिए उन सभी फूलों की रानी
जो कमलिनी है, वही मेरे चरणों पर अब अर्पित होगी। मुझे पता चला था कि इब्राहिम
ने कुछ लोगों की सहायता से एक हिंदू सुंदरी को कहीं सुरक्षित छिपा रखा है, पर
उस उल्लू सिकंदर ने, उस धेड़ शंकर ने स्वयं आकर उसका पता बताया है मुझे। अब
मैं इब्राहिम को या और किसीको भी पता लगने के पहले छापा डालकर उसे पकड़वा
लूँगा। मेरे छापे की ओर उसका बिलकुल भी ध्यान न जाए, इसलिए मैं उस इब्राहिम
को चोखा के विरुद्ध आई शिकायतों पर लगा देता हूँ। वह कोई सजा सुनकर हलचल पैदा
करे, उसी बीच मैं चुपचाप छापा मारकर कमलिनी पर कब्जा कर लूँगा। हिंदुओं की
जितनी कन्याओं को लूटकर मैं जनानखाने में शामिल कर लेता हूँ उतनी ही मेरी
इज्जत मुसलमानों में बढ़ती जाती है। ऐहिक सुखों का जितना उपभोग किया जाए उतना
ही पारलौकिक कल्याण का मार्ग खुला होता है, जिसका साधन उस मौलवी जाफर अली ने
मुझे दिखा दिया। मैंने अभी तक इतनी हिंदू लड़कियाँ भ्रष्ट कर उन्हें अपनी रखैल
बनाया है कि सैकड़ों मुसलमान मुझे इसलाम का सच्चा प्रेषक एवं मुसलिम संतान
संवर्धना के नाते धर्म प्रसारक ही मानने लगे हैं। ऐयाशी करना तो धर्म के
विरुद्ध मानी जाती है, पर जाफर अली के मंत्र ने तो कामोपभोग के जरिए धर्मसंचय
करने का मार्ग बताया है। काम की पूर्ति से धर्म और धर्म की पूर्ति हेतु
कामोपभोग, यह बड़ा ही लाभकारी तंत्र दिया है हम लोगों को। कुरान में क्या कहा
है, उससे हमें क्या लेना? काफिरों की कन्याएँ भोगो, उन्हें भ्रष्ट करो, यह
जाफर अली का मंत्र ही मेरी कुरान है। वह देखो, मौलवी साहब आ ही रहे हैं।
(जाफर अली एवं मुल्लाजी का प्रवेश।)
आइए मुल्लाजी, तशरीफ लाइए। उस चोखामार के बारे में क्या फैसला हुआ, संक्षेप
में बताइए, जरा जल्दी में हूँ।
जाफर अली : हिंदुओं की धर्म-प्रथाओं में हम शासकों को दखल
नहीं देना चाहिए, यह मानना गलत है। हम हिंदुओं के सिंहासन तोड़कर राज्यकर्ता
बने हैं। हमने उन क्षत्रियों को दास बनाकर उनकी प्रथाओं को चूर-चूर कर दिया
है। मोहम्मद गजनवी, मोहम्मद गोरी, हिंदू देवस्थानों को तोड़कर मूर्तियों को
मसजिद की सीढ़ियों पर गाड़ा है। लाखों हिंदुओं को हमने तलवार के जोर से
मुसलमान बनाया है। उनकी कन्याओं को अपनी दासी बनाया है। तभी तो इसलाम के
प्रसार-प्रचार हेतु हिंदू धर्म की रूढ़ियाँ-प्रथाएँ तथा जन-धन मन को नष्ट करना
हमारा कर्तव्य है। जहाँ ऐसा करना संभव हो, वहाँ उनकी आत्मघाती रूढ़ियों को
प्रोत्साहित कर अपनी संख्या बढ़ाना तर्कसंगत होता है। चोखा हमारे मार्ग की
बाधा है, क्योंकि उसने पांडुरंग को आसान तरीके से भक्ति करने का तरीका सिखाकर
और अपने आचरण द्वारा हिंदू धर्म की अच्छाइयाँ बताकर अछूतों में कट्टर
हिंदुत्वता भर दी है। रोहिदास, चोखा जैसे संत यदि इन धेड़ों में न पैदा होते
तो सारे-के-सारे अछूत कब के मुसलमान बन गए होते।
सूबेदार : फिर उस चोखा को धर्मघातकी कहकर क्यों न खत्म कर
दें हम?
जाफर अली : नहीं, ऐसा करने से हमारे सारे हिंदू उसके लिए
सम्मान एवं श्रद्धा दिखाने लगेंगे। अस्पृश्य भी उसे धर्मवीर मानने लगेंगे, पर
हम यदि स्पृश्यों का पक्ष लेकर चोखा को मारते हैं तो स्पृश्य हमारे राज्य के
हितचिंतक बन जाएँगे और उससे अछूतों के बस्ती की ओर बढ़ रहे इसलाम के चरणों की
चोखा जैसी बड़ी बाधा अपने आप दूर हो जाएगी।
मुल्लाजी : क्या ऐसा करने से अछुत लोग हमसे बिफर नहीं
जाएँगे?
जाफर अली : मैं जब तक जिंदा हूँ तब तक उसका डर नहीं। उन सब
यातनाओं का दोष स्पृश्य हिंदुओं के माथे पर मढ़कर कहूँगा कि देखो भाई, हमें
तुम्हारे महार संत पर खूब दया आई, पर राज्यकर्ता के नाते हमने तुम हिंदुओं की
प्रथाओं का पालन न कराया होता तो तुम्हीं लोग हमारे विरोध में चिल्लाते।
मुसलमान अछूतों को कितने प्रेम से गले लगाते हैं, ये देखना हो तो हिंदुत्व
छोड़ दो। उनके द्वारा दी जा रही यातनाओं का चक्कर कभी समाप्त होनेवाला नहीं।
तुम सारे अछूत मुसलमान बन जाओ, और फिर देखो कौन तुम्हें नहीं छूता? मेरे इस
प्रचार से प्रभावित हुए अछूत मुसलमान बनकर ही चैन लेंगे। अपने अनुभवों की बात
कह रहा हूँ मैं।
सूबेदार : बिलकुल ठीक है आपकी बात। क्यों मौलवीजी, आपकी क्या
राय है?
मुल्लाजी : गुनाह माफ है, लेकिन मैं तो सीधा-सादा अल्लाह का
बंदा हूँ। मुझे मौलवी की कूटनीति पसंद नहीं है। इसलाम का प्रचार इस तरह से
करना कुरान शरीफ को कलंकित करना होगा। हिंदुओं में भी ऊँचे किस्म का
ब्रह्मज्ञान है, उनमें भी नामी साधु-महात्मा पैदा होते आए हैं। मेरा कुरान तो
मुझे उदारता सिखाता है। उसका प्रसार प्यार और भाईचारे से करना सिखाता है, पर
कूटनीति या तलवार की नोक पर या कन्याओं पर बलात्कार आदि तरीकों से जिस धर्म का
प्रचार किया जाता है वह दैवी धर्म न होकर दानवी धर्म है-ऐसा...
सूबेदार : चुप रहो, मुल्लाजी, मैं आपको बोलने दे रहा हूँ,
इसलिए आप जो चाहे मत बको। हजारों मौलवियों और धर्मवीरों के बताए मार्ग से ही
हम आ रहे हैं। अच्छा मौलवीजी, इब्राहिम को कहो कि वह पकड़े गए चोखा सहित सभी
हिंदू नेताओं को मेरे सामने लाए। मुझे और भी काम निपटाने हैं। ये काम निपटाकर
मैं आगे बढूँगा।
[मौलवी जाकर इब्राहिम और चोखा को घसीटते ला रहे सैनिक सहित देवी
सिंह,पटेल,नारंभट आदि को लाता है।]
हिंदू नेता : सूबेदार की जय हो। मुसलमानी सलतनत की जय हो।
सूबेदार : हाँ-हाँ, बकवास बंद करो। तुम लोगों की फरियाद
क्या है, वह बताओ। बोलो पटेल, तुम्हीं बताओ।
पटेल : (चोखा के सिर पर घूसा मारकर) बोल, अब तू ही
बता सारा किस्सा। भगवान् तेरे घर आकर भोजन करते हैं क्या? हम क्षत्रियों के
घर में उन्हें भोजन नहीं मिलता, इसलिए तुझ जैसे धेड़ के यहाँ भीख माँगने आते
हैं क्या?
भीकू सेठ : (पीठ पर धौल जमाते हुए) अबे बोल न अब!
भगवान् तुझे हाथ पकड़कर मंदिर में ले जाते हैं, क्यों? सोने के गहनों से लदा
हम वैश्यों का हाथ छोड़कर घूरे के गोबर-गड्ढे में सना तेरा हाथ प्रत्यक्ष आकर
पकड़ते हैं, क्यों?
अन्य लोग : अबे बोल ना! अब क्यों बोलती बंद हो गई तेरी? तूने
मंदिर में घुसकर उसे अपवित्र किया है या नहीं? ये भगवान् के गले का हार तेरे
गले में कहाँ से आया? मंदिर में घुसते हो, भगवान् को भ्रष्ट करते हो।
चोखा : सज्जनो, मुझ गरीब को क्यों कष्ट दे रहे हो। मनुष्य
को छूने से वह अपवित्र हो जाएगा, यह बात मान तो ली, परंतु भगवान् को छूने से
वह अपवित्र हो जाएगा, ये कैसे माना जा सकता है। यदि अस्पृश्यों के स्पर्श से
वह मैला हो जाता है तो जिस दिन उसने अछूतों को जन्म दिया, उसी दिन उसे मैला,
अछूत हो जाना चाहिए। जरा सोचिए। (अभंग गाता है।)
…छूत है जी कौन? अछूत है कौन?
छुआछूत भाव, देह धारी…
चोखा कहे देव, सभी से अलिप्त
वही निराकार, देखा मैंने…
भगवान् मेरे घर आते हैं। मेरे रोकने के बाद भी एक थाल में भोजन करते हैं, यह
पूर्णतः सत्य है। उससे मुझ पतित का घर पावन हुआ, देव मैला नहीं हुआ। मेरे लाख
कहने पर कि मैं अछूत हूँ, भगवान् पांडुरंग मुझे मंदिर में ले गए, पर उससे न
मंदिर मैला हुआ, न भगवान्। बल्कि मैं पतित पावन बन गया। प्रकाश के छूने से
अँधेरा कजरा नहीं जाता बल्कि अँधेरा ही प्रकाशमय हो जाता है।
सूबेदार : ठीक है, चोखा। तुमने माना है कि तुम मंदिर में गए
थे और तुमने भगवान् के साथ खाना भी खाया। अच्छा, ये बताओ कि तुम हिंदू हो न!
चोखा : जी, मैं हिंदू ही हूँ। हिंदू समाज के पैरों का
पायंदाज हूँ मैं। भगवान् पांडुरंग के मंदिर की साफ-सफाई करनेवाला झाड़ू
लगानेवाला हूँ मैं जी।
सूबेदार : जब तुम हिंदू हो तो तुम्हें यह तो मालूम होगा ही
कि अछूतों को मंदिर में नहीं घुसना चाहिए, औरों को छूना नहीं चाहिए। हिंदू
शास्त्रों की ये बातें तुझे तो मालूम ही होंगी। फिर तुमने देव और देवालय को
भ्रष्ट क्यों किया?
चोखा : शास्त्रों का सही अर्थ मैं अपढ़ किसी भी तरह जान न
पाया। इसलिए संपूर्ण ज्ञान की गंगा जिसके चरणों से निकली, उन चरणों की शरण
में गया मैं। अस्पृश्य भक्ति कैसे करें, यही प्रश्न मैंने उनसे पूछा। मैं
मंदिर में जा नहीं सकता था। इसलिए वे ही मेरे यहाँ आए और बोले
'ऊँच-नीच जाति होना, लिंग-भेद कभी भी कहीं भी मुझे नापसंद
हैं!'
जैसे अग्नि को आहुति मैला नहीं कर सकती, शराबी जैसा पतित स्पर्श भी भगवान् को
मैला नहीं कर सकता। चोर-उचक्के, वेश्यागामी स्पृश्यों के आने से मंदिर
अपवित्र नहीं बनता, पर अछूत के, वह भी पवित्र और साफ होकर आए अछूत के स्पर्श
से, चूँकि वह अछूत कुल में पैदा हुआ इसलिए वह अपवित्र और मैला हो जाएगा, यह
तो घोर पाखंड है। प्रत्यक्ष भगवान् ने समझाया यह मुझे।
नारंभट : (उसकी पीठ पर मारके) बदमाश, लुच्चे,
ब्राह्मणों को शराबी कहता है।
देवी सिंह : लफंगे, पाजी, क्षत्रियों को चोर कहता है।
(उसके सिर पर मारता है।)
भीकू सेठ : साले कमीने, वैश्यों को वेश्या कहता है।
(मुँह पर मारता है।)
चोखा : हे भगवान्, मुझपर हो रहे अत्याचार अब तुम ही देखो और
झेलो। भक्त को पीड़ित किया जा रहा है और तुम आराम से मंदिर में बैठे हो।
[इतने में एक व्यक्ति दौड़ता आता है।]
वह व्यक्ति : अरे भाई, बड़ा आश्चर्य हो रहा है। मंदिर में
भगवान् पांडुरंग की मूर्ति पर आघात हो रहे हैं। उनके सिर और गाल पर सूजन आ गई।
मार के निशान सारे बदन पर उभर आए हैं। (आकाशवाणी होती है।) 'मेरे
भक्त पर होनेवाले आघात मेरी मूर्ति पर हो रहे हैं।'
दूसरा व्यक्ति : (दौड़ते-हाँफते आता है।)
दौड़ो-दौड़ो, भगवान् मंदिर से एकाएक गायब हो गए हैं। किसी ने भयंकर जादू-टोना
किया सा लगता है।
पटेल : (घबराकर और चिढ़कर) अरे, किसी ने क्या, इस
साले धेड़ ने ही कुछ टोटका किया होगा। सूबेदारजी, यदि आप इसे खत्म नहीं करेंगे
तो प्रलय काल आ जाएगा। हम हिंदू इसे मारते हैं तो वह भगवान् को ही जा लगता है,
पर आप मुसलमान हैं। यदि आप इसे मारेंगे तो भगवान् क्रोधित नहीं होंगे। इसलिए
मारिए इसे।
भीकू सेठ : बिलकुल सही कहा आपने, पटेल। विजयनगर के
साम्राज्य में नरसिंह का भव्य मंदिर मुसलमानों ने तोड़ा, पर भगवान् उनपर जरा
भी कुपित नहीं हुए, बल्कि उन्हें सारा राज्य सौंप दिया। यदि किसी हिंदू ने
उनके सामने नारियल न फोड़ा होता तो वही नरसिंह उसके सिर पर सवार हो जाते।
सूबेदार : ठीक है। इब्राहिम, इन सब हिंदुओं को मैदान में ले
जाओ। इस चोखा को मंदिर मैला करने की सजा में बैल से बाँध दो और बैलों को कोड़े
मार दौड़ा दो। पत्थरों पर, सड़क पर घिस-पिटकर जब तक इसके टुकड़े-टुकड़े नहीं
हो जाते तब तक बैलों को दौड़ाते रहो। चलो जाओ।
(सब हिंदू सूबेदार की जय
,मुसलिम सलतनत की जय,चिल्लाते वहाँ से जाते हैं,
चोखा को घसीटकर ले जाते हैं।)
: चौथा दृश्य :
शंकर : धिक्कार है मुझे! भारी पापों के गर्त में धंसता जा
रहा हूँ मैं। छि:, करना कुछ था और कर बैठा कुछ और ही। मेरी लाड़ली कमलिनी का
अस्पृश्यता का कलंक मिटाकर मैं उसे सुखों के सिंहासन पर बैठाना चाहता था।
स्वेच्छा से यदि वह इसके लिए तैयार न हो तो बलपूर्वक उसे इसके लिए तैयार किया
जाए, इसलिए मैंने सूबेदार बंगश खान को उसका समाचार स्वयं जाकर दिया; परंतु
उसके ऊपर हुए अत्याचारों और उसकी सुंदरता के बारे में सुनते ही वह मुझपर कुत्ते
जैसा झपट पड़ा। बोला कि ये ऐसी सुंदर लड़की तुझ जैसे धेड़ को, बिन पेंदी के
लोटे को सौंपने में मैं तेरी सहायता करूँ? सूबेदार बंगश मर गया क्या! वह जब तक
जिंदा है तब तक सुंदर कन्याएँ धेड़ों के हाथ लगना संभव नहीं है। ऐसा अन्याय
कैसे होने देंगे हम! ऐसा कहकर उस काम लंपट ने कमलिनी को खुद उपभोग हेतु पकड़
लाने की घोषणा कर दी। अरे रे, वे राक्षस उसे पकड़ने निकल भी पड़े होंगे। मैंने
स्वयं ही उसका ठिकाना बताया, कितनी नीचता कर डाली मैंने! अब करूँ तो क्या
करूँ मैं? हाय, हा, अस्पृश्यता के कलंक से ऊबकर मैंने हिंदू धर्म से विद्रोह
किया, धिक्कार है मुझे! अस्पृश्यता हिंदू धर्म नहीं है, किशन और कमलिनी के ये
उद्गार अब याद आते हैं तो उनकी यथार्थता ज्ञात होती है। उस समय यह समझा नहीं
था। हिंदू तो हिंदू, अब मुसलमान बंगश भी 'बिन पेंदी' का कहकर धिक्कार रहा
है। मेरी प्रिय कमलिनी, मेरे सिकंदर नाम से तुझे घिन है, पर अंदर का शंकर तो
अभी भी प्रिय है न! उस पापी सिकंदर की छाया से मुक्त होकर फिर से शंकर के रूप
में शुद्ध करने का कोई उपाय होगा क्या? मैं हिंदु धर्म के लिए जीऊँगा, उसी के
हित में मरूँगा--यह किशन की कृतिशील गर्जना मेरे दिल में तोपों की
गड़गड़ाहट-सी गूंज रही है। नीच सिकंदर, तेरे पापी प्रवेश के साथ-साथ मेरी
कमलिनी, मेरा आश्रय, मेरा हिंदुत्व, मेरा मैं भी पराया हो गया। अब मैं इस
पापी सिकंदर के कब्जे से शंकर को कैसे छुड़ाऊँ? या उस सिकंदर का गला दबाकर
खत्म कर दूँ उसे? ( गला दबाने लगता है।) पर नहीं, इसके
अलावा दूसरा तरीका भी है। अपने धर्म शत्रुओं को काटकर फिर अपने को काट डालूँगा।
यही उचिंत होगा। मरना ही है तो वह अपने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए, मुझपर
छाए राक्षस सिकंदर को खत्म करते हुए मरना ही श्रेयस्कर होगा, पर बाद में क्या
होगा? मौत के बाद क्या होगा? अरे, एकाएक मुझे ऐसा भय क्यों लगने लगा? मरने
के बाद तो परलोक है। जो दुष्ट हिंदू लोग स्वधर्म छोड़कर अन्य धर्म में जाते
हैं, वे स्वयं को नहीं बल्कि सात पुरखों को नरक में ढकेलते हैं। यदि यह सत्य
है तो... (अँधेरा होता है।)
पहला भूत : (प्रवेश कर) यह वास्तव में सच है।
अक्षर-अक्षर सच है। शंकर, तेरे हिंदू धर्म का त्याग करते ही देखो मुझे यमदूत
खींच ले जाने लगे हैं।
शंकर : कौन हो तुम? मैं नींद में तो नहीं देख रहा तुम्हें!
बोलो, कौन हो तुम?
पहला भूत : मैं तुम्हारी माँ हूँ, शंकर। ये देखो, मेरे बदन
में जो रक्त है, वह हिंदू रक्त है। उसी रक्त से बना मेरे स्तन का दूध वह हिंदू
दूध है। शंकर, यह हिंदू रक्त और हिंदू दूध पीकर ही तू बड़ा हुआ। तेरे शरीर का
कण-कण, हाड़-मांस-मज्जा सबकुछ हिंदू बीज का ही है। मेरे पेट से पैदा होकर
मुझे नरक में मत ढकेलो!
शंकर : क्षमा करो, माँ!
दूसरा भूत : कदापि नहीं। दुष्ट मेरे कुल को कलंकित कर डाला
है तुमने। जरा गौर से देख, कौन हूँ मैं?
शंकर : पिताजी! बाबा! हे धरती, तू दो फाँक हो जा और मुझे
मेरा कजराया चेहरा छुपाने को जगह दे।
दूसरा भूत : अब तो पाताल में भी तुझे छिपते नहीं बनेगा,
समझे! अपने महान् हिंदू धर्म का त्याग करने के कारण यमदूत वहाँ भी तेरा पीछा
करेंगे। मैं तेरा पिता हूँ। अभी तूने मुझे 'बाबा' कहकर पुकारा था, पर मैं तो
महार, अछूत था। मुझ जैसे महार का बेटा कहलाने से शरमाकर तूने मुसलमान बाप
अपनाया है न! फिर मुझे नहीं, उसे ही 'बाबा' कहकर पुकार और मुझे नरक में ढकेल
दे।
शंकर : बाबा, शंकर के लिए आप आज भी बाबा हो। जिस नीच ने
मुसलमान बाप अपनाया, उस सिकंदर को मैं शीघ्र ही दंड दूँगा, बाबा। आपका शंकर
शीघ्र ही चोरी-छिपे घुसपैठ करनेवाले सिकंदर को मौत के घाट उतारनेवाला है। आप
निश्चिंत रहें।
तीसरा भूत : शंकर, मैं तेरा परदादा हूँ।
शंकर : अब तो मेरा दिल भय, आश्चर्य और पश्चात्ताप से फटा जा
रहा है। बाप रेऽ!
सभी भूत
एक साथ : मुसलमान बाप कहो, ईसाई बाप कहो। हम तो हिंदू हैं,
हिंदू महार! शर्म आती है न हमपर? दुष्ट, कुलकलंक! हमारे हिंदू धर्म में पैदा
होकर भी तूने हमें नरक में ढकेल दिया है। अब भी हमें बचा ले इन यमदूतों से, अब
भी समय है।
शंकर : हे मेरी सारी शक्तियो, जागो। हे जिह्वा, लड़खड़ा
नहीं। हे मेरे पूर्वजो, हिंदू धर्म त्यागकर इस भयंकर पाप से मैं कैसे छुटकारा
पा सकता हूँ? क्या करूँ मैं?
सभी भूत
एक साथ : पश्चात्ताप!
शंकर : पश्चात्ताप से पतित हुआ व्यक्ति हिंदू धर्म में वापस
प्रवेश नहीं कर सकता, ऐसा नियम है न!
सब भूत : वह गलत है, झूठ है। जनसामान्य ने भले ही
धर्मांतरित की शुद्धि नहीं, ऐसा कहा हो, पर कठोर-से-कठोर यमधर्म भी
पश्चात्ताप के बाद सुष्ट हो सकता है और हिंदू धर्म में लौट सकता है। ऐसा मानना
है-इसलिए पश्चात्ताप करो और...
शंकर : बोलिए-बोलिए, और क्या संस्कार करूँ मैं, यदि पर्वत
शिखर से छलाँग लगाने को कहोगे तो वह भी मैं कर लूँगा, पर मुझे फिर से हिंदू
धर्म में ले लीजिए।
सब भूत : पश्चात्ताप से तू अब हिंदू बन ही गया है, पर विशेष
कर्तव्य का बोध कराना हम आवश्यक मानते हैं। तेरी मूर्खता और लंपटता के
फलस्वरूप वहाँ सती कमलिनी को जो कष्ट भुगतना पड़ रहा है, उसे मुक्त कराने
तत्काल वहाँ पहुँचो। मुसलमानों की प्रताड़ना में फँसी उस हिंदू कन्या की ढाल
बनकर रक्षा करो। उसपर बलात्कार की कामना करनेवाले दुष्टों में से कम-से-कम
किसी एक की हत्या कर उसके रुधिर से कमलिनी के पैर धो डालो। यही तेरा
प्रायश्चित्त विधान है। जाओ।
शंकर : ठीक है, जाता हूँ। (सब भूतों का निर्गमन।)
मैं शंकर हूँ, मैं हिंदू हूँ। हे मुझमें घुसपैठ किए हुए मुसलमान सिकंदर खान,
अब रणभूमि में उतर पड़। मैं कमल के सामने तुझे समाप्त करूँगा। सिकंदर खान,
मैं कमलिनी के सामने तेरा ही वध करनेवाला हूँ। कहाँ भागेगा अब? (
जाता है।)
: पाँचवाँ दृश्य :
[ स्थान : गंगा की कोठी। पात्र : गंगा और
कमलिनी।]
गंगा : बेटी कमलिनी, संकट जब आते हैं तो चारों ओर से आते
हैं। वही हमारे साथ हो रहा है। तुझे पाने के लिए ललचाए इब्राहिम की चांडाल
चौकड़ी को तो मैंने किसी तरह से भगा दिया, पर वह तेरा शंकर! उस धर्मभ्रष्ट
सिकंदर शैतान ने तेरा पता बंगश खान को दिया और सूबेदार की पापी दृष्टि तुझपर
पड़ी। अब वह तुझे पकड़कर ले जाने कभी भी, किसी भी समय आ सकता है। बेटी, जो
कुछ साहस हमें करना है, वह अभी इसी क्षण करना होगा। तेरा निश्चय तो पक्का है
न!
कमलिनी : दीदी, बिलकुल पक्का है। किसी भी अहिंदू को मैं
स्वयं होकर नहीं छुऊँगी, बलात्कार से किसी अहिंदू ने मेरी दुर्दशा की तो मैं
उसका बदला लिये बिना नहीं रहूँगी। दीदी, मैं चोखाजी की शिष्या हूँ, जानू
महार की बेटी हूँ। हिंदू धर्म की चारदीवारी की रक्षा का दायित्व हमें सौंपा गया
है। मैं उसी तट रक्षक की कन्या हूँ। मैं हिंदुत्व के तट की रक्षा करते-करते मर
जाऊँगी, पर धर्म शत्रुओं को अंदर प्रविष्ट न होने दूँगी। लेकिन जीजी, तेरे
सुख को मैंने मिट्टी में मिला दिया।
गंगा : कमली, तुझ जैसी देवी के स्पर्श से पावन हुई मैं तेरी
प्रतिज्ञापूर्ति के लिए, तेरे इस महान् कार्य में साथ देने को तैयार हूँ।
कमला, देख यह दृढ़ निश्चय कुछ देर मुझे कंपित कर अब लोहे जैसा कठोर हो उग्र
रूप धारण कर रहा है। अब मेरे प्राणों का कुछ भी हो। मैंने पहले ही अपना सारा
धन भरोसे की एक नौकरानी के साथ अपनी मौसी के यहाँ भेज दिया है। वह तेरे जीवन
भर के लिए काफी है। तू अब यहाँ से निकल जा। चोखाजी के पास मत जाना, क्योंकि
उन्हें भी तरह-तरह से फँसाया जा रहा है। मैंने नदी के पास जो झोंपड़ी बताई है,
वहाँ जाकर तू छुप जा। मैं यहीं रहती हूँ कुछ देर। यदि वे अभी यहाँ आएँगे भी तो
मैं उन्हें बातों में उलझा रखूँगी, भले मेरा कुछ भी क्यों न हो। यदि मैं
सकुशल रही तो झोंपड़ी में आकर तुमसे मिलूँगी। वहाँ से हम अपनी मौसी के गाँव
चले जाएँगे।
कमलिनी : क्या मैं अकेली जाऊँ, जीजी?
गंगा : ठहर, मैं तुझे संगिनी देती हूँ।
(छुरी देते हुए)
ये ले, ये संकट के समय की संगिनी।
कमलिनी : ठीक है, जीजी। इस संगिनी को देख मेरी काफी हिम्मत
बढ़ गई। बड़ी तेज है ये मेरी सहेली। बिलकुल चंपा जैसी।
[परदे के पीछे से कुछ आवाज आ रही है।]
गंगा : कमला, मुझे लगता है कि वे लोग आ ही रहे हैं। जा
बेटी, पिछले दरवाजे से भाग जा। भगवान् तेरी रक्षा करें।
कमलिनी : घबराओ नहीं दीदी, लो, मैं निकलती हूँ। कितना कष्ट
दिया मैंने तुम्हें! एक बार मुझे प्यार से चूम तो लो, जीजी।
गंगा : (उसे पास लेकर चूमती है।) देख बेटी, यह
भावनाओं के प्रवाह में बहने का समय नहीं है। तू तो मेरे दिल का कमल है।
कमलिनी : पर अब वज्र से भी कठोर हूँ मैं। मेरी आँखों में
जितने आँसू थे वे सब मैंने तेरे ऊपर उड़ेल दिए। अब मुझे मेरा मार्ग दिख रहा
है। सारे आँसू सूख चुके हैं। अब निकलेगा तो खून ही निकलेगा उनसे। जाती हूँ
मैं। (जाती है।)
गंगा : जा बेटी, सुरक्षित जा।
(परदे के पीछे से फिर आवाजें आ रही हैं)
दरवाजा लगा लेती हूँ मैं। हे भगवान्, मेरे निश्चय के दरवाजे का तू ही अवरोधक
बनना!
...हे करुणाकर, हे प्रलयंकर, रक्षा करना मेरी
पतितों के उद्धारक स्वामी, रक्षा करना मेरी।
पाँचवाँ अंक
: पहला दृश्य :
[ स्थान : सत्यगृह के सामने का मार्ग।]
कमलिनी : हाय राम, लगता है जीजी के घर से छिपकर भागते हुए
उन्होंने मुझे निश्चित ही दूर से देख लिया है। कहाँ जाऊँ, क्या करूँ? इस
रास्ते के आगे-पीछे लोगों की बातें और दौड़-धूप की आवाज आ रही है। अब किसीके घर
में घुसकर आसरा लूँ तो ही बच सकती हूँ, अन्यथा इन शिकारियों की टोली का वृत्त
सँकरा होता हुआ मुझसे आकर भिड़ जाएगा, पर मुझ अछूत कन्या के लिए कौन अपना
दरवाजा खोलेगा! उलटे मेरी जाति-पाँति का पता लग जाए तो हिंदू लोग ही
चिल्ला-चिल्लाकर मेरा घात करेंगे। ये आगे सत्यगृह अवश्य है। सुना था कि यहाँ
का सत्यभीरु अस्पृश्यता नहीं मानता। तो वहीं शरण लेना उचित होगा। वह कुछ समय
मुझे यदि छिपने दे तो मेरा पीछा करनेवाले अन्यत्र निकल जाएँगे। अब चाहे
सत्यवान मुझे बचाए या मरवाए, मैं दरवाजा खटखटाती ही हूँ।
(वैसा करती है।)
कमलिनी : महाराज¨¨
सत्यवान : झूठ बोलती हो! मैं राजा नहीं, मुझे आचार्य कहो,
क्या नाम है तेरा?
कमलिनी : कमलिनी।
सत्यवान : फिर झूठ बोली। मनुष्य हो और कमलिनी माने एक पौधा
बताकर मुझे झाँसा दे रही हो।
कमलिनी : मुझे मनुष्य कहिए चाहे कुछ भी कह लीजिए, पर अभी
मेरे प्राणों की रक्षा करें। मैं एक हिंदू महार की बेटी हूँ। मुझे जबरदस्ती
पकड़कर भगा ले जाने हेतु कुछ मुसलमान गुंडे मेरे पीछे पड़े हैं। आप हिंदू हैं,
मैं और कुछ नहीं चाहती आपसे। ये गुंडे निकल जाने तक आसरा दें आप मुझे। सत्यगृह
में रहने दें मुझे।
सत्यवान : इस भवन में सच बोलनेवाला ही रह सकता है।
कमलिनी : मैं तो सत्य के लिए आपत्ति में फँसी हूँ। वह बात भी
बताऊँगी।
सत्यवान : ऐसा है तो अंदर आओ, पर अभी तूने बताया था कि तुम
महार की बेटी हो। महार स्त्रियों से अन्य जाति के पुरुषों और अन्य जाति की
स्त्रियों से महार पुरुषों के गुप्त गंधर्व संबंध अनेक बार होते हैं, पर जहाँ
अनुलोम और प्रतिलोम संबंध रूढ़ हैं वहाँ कौन क्या है यह कहना मुश्किल हो जाता
है। इसलिए तू महार है, ऐसा कहना झूठ हो सकता है। मैं केवल एक लड़की हूँ, तू
इतना कह तो मैं अंदर बुलाता हूँ। वैसा कह दे तू।
कमलिनी : मैं एक लड़की हूँ, जी।
सत्यवान : आओ, अंदर आओ। (जोर से) अरे बौने, क्या
कर रहे हो तुम?
बौना : (प्रवेश कर) पूजा के पात्र साफ कर रहा था।
सत्यवान : झूठ बोलते हो तुम। पात्र को क्या खाक साफ करोगे
तुम। अपनी गलती सुधारो और फिर इस लड़की को आराम करने ले जाओ। थकी-हारी है
बेचारी। सत्य के लिए जूझ रही है यह।
[वे ले जाते हैं।]
: दूसरा दृश्य :
[बंगश खान सिपाहियों सहित सत्यगृह पर आता है।]
बंगश : क्या उल्लू हो तुम लोग! अभी वह परी रास्ते से निकल
गई। फिर पकड़ी कैसे नहीं गई?
पहला सिपाही:क्षमा कीजिए हुजूर, पर वह इस आड़ी गली से अगले
रास्ते पर निकल भागी, पर भागकर जाएगी कहाँ! उस रास्ते पर भी अपने लोग खड़े हैं
जी।
बंगश : पर बीच में किसी ने उसे घर में तो नहीं छिपा लिया? हो
सकता है, किसी हिंदू ने उसे हिंदू मानकर घर में छिपाकर उसकी रक्षा करने का
प्रयास किया हो।
दूसरा सिपाही : सूबेदारजी, वह अछूत कन्या है। उसे हिंदू
मानकर घर में लेने लायक हिंदू लोग अपने जाति-धर्म के अभिमानी जिस दिन हो
जाएँगे उस दिन से हिंदुस्तान में इसलाम के प्रचार की आशा नहीं रहेगी।
जिन्होंने चोखा महार को 'मंदिर अपवित्र करता है' कहकर सजा दिलाने उसे
मुसलमानों के हाथों सौंपा, वे हिंदू लोग एक महार लड़की को मुसलमानों से बचाने
के लिए घर में लेंगे? वे उसे मुसलमानों के घर में ढकेलेंगे, पर अपने घर में
कदापि प्रवेश नहीं देंगे।
पहला सिपाही:सूबेदारजी, पर वह सत्यगृह का पगला अस्पृश्यता
नहीं मानता। हो सकता है कि उसे अंदर ले लिया हो। अभी इधर ही थी।
बंगश : फिर देखते क्या हो! घुसो अंदर और मारो बदमाश को।
पहला सिपाही:नहीं साहब, घुसने-मारने की क्या जरूरत! वह पगला
गँवार है। वह खुद ही सब बता देगा, क्योंकि वह जितना सत्यवादी है उतना ही डरपोक
भी। उसके शिष्य भी उसी के नमूने है। (सिपाही दरवाजा खटखटाते हैं,
सत्यागार से बौना बाहर आता है।)
पहला सिपाही:क्यों बे शिष्य, तेरे आश्रम में अभी जो लड़की
आई है, उसको बाहर लाओ। उसका भाई मिलने आया है। सूबेदार का हुक्म है। बुलाओ
उसको।
बौना : जो अंदर है ही नहीं, उसे सूबेदार तो क्या भगवान् का
भी आदेश बाहर बुलवा सकता है? कोई लड़की-वड़की नहीं आई अंदर। हम सत्यवान के
शिष्य कभी झूठ नहीं बोलते। हाँ, केवल इतना बता सकता हूँ कि बड़ी आँखों और घने
बालोंवाली एक लड़की अभी घबराई सी...
बंगश : हाँ-हाँ, वही मेरी प्यारी किधर है, बताओ?
बौना : अभी-अभी कुछ समय पहले यहाँ से भागकर अगली गली में
घुसते दिखी थी। जो कुछ सच है, वही आगे बढ़कर कहना चाहिए, ऐसा मेरे गुरु का
उपदेश है।
बंगश : ठीक है, बेटा, तेरा और तेरे गुरु का भगवान् भला
करे। इस गली के सामने दो सिपाही तैनात कर बाकी सब बताई दिशा में चलो। सारे
रास्तों पर चुपचाप निगरानी रखो। (सब जाते हैं। सत्यवान का प्रवेश।)
सत्यवान : बौने, क्या गड़बड चल रही है? किससे बातें कर रहा
था?
बौना : कमलिनी ने अभी हमें जिन नीचों
की जानकारी दी थी, वे यानी सूबेदार बंगश खान यहाँ आए थे। मुझसे पूछने लगे कि
कमलिनी यहाँ है क्या? मैंने कहा, भाग गई। तब वे सारे आगे निकल गए। अब कुछ
समय बाद जब सब शांत हो जाएगा तो कमलिनी को चुपचाप निकाल देंगे।
सत्यवान : चुपचाप! अरे मूर्ख, इस भवन में चुपचाप! इस भवन
में हमने उसे छिपाए रखा और चुपचाप भगा दिया, यह बात पता लगी तो मेरे शरीर के
टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएँगे। जाओ, जाकर बताओ कि वह लड़की यहीं है। हमने
अनजाने में उसे अंदर बुला लिया था। सत्यगृह में 'चुपचाप' कुछ नहीं होता। जाओ,
सच बोलो।
बौना : मैंने सच ही बोला है। कमलिनी यहाँ पर है, ऐसा कहा
होता तो वह इस परिस्थिति में असत्य होता।
सत्यवान : गधा कहीं का! गुरु को सिखाता है। कैसी
परिस्थिति¨¨!
बौना : महाभारतकारों द्वारा बताई परिस्थिति की मर्यादा¨¨
सत्यवान : फिर महाभारत! जिस महाभारत में श्रीकृष्ण को पुरुष
पुंगव यानी पुरुषों में बैल कहा गया, जो झूठ के पुलिदों से भरा पड़ा है, उस
महाभारत की बात करते हो। जाओ और बताकर आओ कि वह लड़की अंदर ही है।
बौना : मैं नहीं जाऊँगा। आज तक सब सुनता रहा आपकी। एक
निष्पाप हिंदू कुमारी प्राणों के भय एवं हिंदुत्व की रक्षा हेतु हमारी
प्रार्थना कर रही हो और उसका धर्म-भाई उसे पाप के गर्त में ढकेले, यह
असत्याचरण मुझसे कदापि नहीं होगा। निरीह गऊ को कसाइयों के हाथों कैसे सौंप दूं?
यह दुष्टता मैं नहीं करूँगा।
सत्यवान : मेरे शिष्य द्वारा बगावत!
बौना : चिल्लाइए नहीं। आप ही हिंदू धर्म के प्रति विद्रोह कर
रहे हैं।
सत्यवान : हाँ, हिंदू धर्म! कैसा धर्म? सत्य ही एकमात्र
धर्म है और मैं मात्र सत्य ही बोलूँगा। ओ सिपाही, ओ सूबेदारजी, वह लड़की यहाँ
छिपी है। (चिल्लाता है। कमलिनी आती है।)
कमलिनी : आचार्य, हाथ जोड़ती हूँ। अब मुझे और कष्ट न दें।
मैं अबला निरपराध बाला, पहले ही अस्पृश्यता की आग में झुलस चुकी हूँ। अब
कम-से-कम सचाई की आग में जलाकर तो मत मारिए मुझे! धर्म के नाम पर आप सज्जनों
ने अभी तक काफी छला है मुझे, अब सत्य के नाम पर तो मेरा वध न करिए। यह आँधी
गुजर जाने के बाद मैं यहाँ से चली जाऊँगी। तब तक तो मुझे छिपे रहने दें यहाँ।
सत्यवान : छिपने दूँ! यानी असत्य को प्रश्रय दूँ? तेरी दो
कौड़ी की इज्जत के लिए मैं अपना सत्य का प्रण त्यागूँ?
कमलिनी : प्राणों का भय तो है ही। जिसने जीवन के सुखों का
अभी जरा भी अनुभव नहीं लिया उसे प्राणों का लालच तो है ही, पर मैं मात्र उसके
लिए नहीं गिड़गिड़ा रही। मेरे प्राणों से भी प्रिय तुम्हारे अपने हिंदू धर्म
की रक्षा हेतु मैं सहायता माँग रही हूँ। मेरी परीक्षा लेना चाहते हो तो ये
छुरी लो और भोंक दो मेरे दिल में। पर आचार्य, उन म्लेच्छों के आगे मत परोसो
मुझे। उन्हें बुलाकर उनसे बच निकली इस गाय को हलाल होने के लिए मत पेश करो।
दया करो, दया धर्म का मूल है, इसका स्मरण रखो।
सत्यवान : क्या बकती हो-दया, धर्म?
'न हि सत्यात्परो धर्मः, नानृतातपातकं परम्'। सिपाहियो, दौड़ो¨
बौना : हे निर्दय पुरुष, विजयनगर के हिंदू साम्राज्य के भेद
शत्रुओं को देनेवाले भी सत्य ही बोलते थे। तेरी सत्य की व्याख्या मान लें तो
जितने देशद्रोही हो चुके, उन सबको नरक से स्वर्ग में भेजना पड़ेगा। देखिए, भले
ही आप असत्य न बोलो, पर कम-से-कम चिल्लाओ तो नहीं। झूठ बोलने के कारण मैं नरक
में जाऊँगा, पर उससे इस निरपराध बालिका की जान तो बच जाएगी, धर्म का पक्ष तो
सुरक्षित रहेगा। अन्याय का प्रयास विफल होगा। जिस कार्य से अपने धर्म की रक्षा
होगी, उसके लिए मैं अकेला नरक जाने को खुशी से तैयार हूँ। आप केवल चुप रहें
जिससे वे लौटकर न आएँ। भय का कोई कारण नहीं रहेगा।
सत्यवान : क्या मैं डर के मारे ऐसा कह रहा हूँ?
बौना : और नहीं तो क्या? ढोंगी पुरुष, तेरे मन में पैदा
राज-कोप का भय अभी कुछ समय पूर्व तेरे मुँह से निकल चुका है। कमलिनी को छिपाने
की वजह से तेरे शरीर के टुकड़े किए जाने की आशंका को भाँपकर तू सत्य का यह
आडंबर रच रहा है।
सत्यवान : गुरु का अपमान कर रहे हो। (चिल्लाकर) अरे
सिपाहीजी, दौड़ो, वह लड़की यहीं छिपी है।
कमलिनी : हे साधो, हे देव, हे पुरुषोत्तम! जिन हाथों ने आज
तक कोई पाप नहीं किया, इस कुमारी के वे हाथ तुम्हारे पैरों को पकड़ रहे हैं।
मेरे साथ विश्वासघात मत करो। थोड़ा चुप रहकर मेरी रक्षा करो।
सत्यवान : (उसे ढकेलकर) चुप रहना यानी सत्य को
छिपाना यानी असत्य का साथ देना होगा। अजी सूबेदारजी...
(बौना आगे बढ़कर उसका मुँह हाथ से दबाता है। वह चीखता-पुकारता है। इतने
में सिपाही आते हैं।)
सिपाही : क्या गड़बड़ मचा रखी है?
सत्यवान : सिपाहीजी, ये देखो, वह लड़की जिसे तुम लोग खोज
रहे हो। ये मेरे मना करने पर भी आश्रम में आ घुसी। मेरे इस शिष्य ने जान-बूझकर
झूठ बोला आपसे। सूबेदारजी को बुलाइए। मैंने मात्र सत्य ही कहा है।
(सिपाही-सूबेदार का प्रवेश।)
सिपाही : सूबेदारजी, ये देखो वह लड़की मिल गई। वह कोने में
खड़ी है गुलपरी! सत्यवान ने खुद होकर खबर दी हमें। यह बौना तो झूठ बोला था।
सूबेदार : अच्छा तो फिर पहले इस बौने को ही पकड़ो। सत्यवान
को अवश्य कुछ पुरस्कार देना होगा।
पहला सिपाही:नहीं साहब, उस काफिर को भी बख्शा न जाए। मारो
उसको भी।
बंगश : गलत बक रहे हो। सत्य के नाम पर विश्वासघात, अहिंसा के
नाम पर वीरता का घात और भूतदया के नाम पर आत्मघात करनेवाले हिंदू जिंदा हैं,
तभी तो हम इस देश पर शासन कर रहे हैं। सत्यवान तो क्या, उसके नाम से चलनेवाले
इस पंथ की पूरी सहायता करनी चाहिए हमें।
सत्यवान : वाह, वाह! सत्य के प्रति इतना लगाव देखकर मुझे
अत्यधिक खुशी होती है। मेरी प्रार्थना है कि इस बेचारी पर आप कोई अत्याचार न
करें। इसके साथ कोई बलात्कार न करें।
सूबेदार : (क्रोधित होकर) साला फूल गया इतने में।
किसपर बलात्कार किया जाए और किसको छोड़ दिया जाए, ये तू बताएगा मुझे। फिर से
बीच में बोला तो जीभ काट डालूँगा तेरी।
सत्यवान : नहीं-नहीं, सत्य बोलने के लिए कम-से-कम उसे रहने
दें।
सिपाही : चुप बैठ बे।
(उससे धक्का खाते ही सत्यवान एक कोने में जा गिरता है। दूसरा सिपाही
सँभालता है।)
बंगश : हे सुंदरी, अब तुम मुझे यह बताओ कि किसी हिरनी की
भाँति तुम क्यों कँपकँपाती खड़ी हो? मैं तुम्हारा शिकार करने या तुझे बाण
मारने के लिए नहीं खड़ा हूँ। मैं तो तुम्हारी नजरों के तीरों से घायल हुआ खड़ा
हूँ यहाँ। हे हिरनी, तूने इस शिकारी का ही शिकार कर डाला है।
कमलिनी : सूबेदारजी, जब तक आप दूर खड़े रहेंगे तब तक मेरे
नयनबाण तो सहने ही पड़ेंगे। यदि वे सहन न हो रहे हों तो पास आकर इस हिरनी के
ऊपर अपने अभय का हाथ फेरें, जिससे यह डरी हुई हिरनी भी प्यार से वह हाथ चाटने
लगे।
बंगश : (उसके पास जाते हुए) अभी आता हूँ तेरे पास,
प्यारी। इन हिंदुओं ने काफी अत्याचार किए हैं न तुमपर! उन पीड़ाओं से बचाने के
लिए ही आया है यह बंगश। ये मेरी शक्तिशाली भुजाएँ तुझे अपने आगोश में लेने
हेतु मचल रही हैं। आओ, मेरी प्यारी, पास आओ¨¨
बौना : (स्वगत) क्या अचरज की बात है। धर्म के लिए
प्राण देने की बात करनेवाली यह लड़की अब सूबेदार पर लटू कैसे हो रही है।
कैसे-कैसे इशारे और शब्दों का प्रयोग कर रही है। आखिरकार यह अछूत लड़की अपनी
जाति पर ही गई। धिक्कार है ऐसे काम लंपट स्त्रियों की चंचलता¨¨
कमलिनी : (विस्मित सी) मेरे आलिंगन के लिए आतुर
सूबेदार के बाहुओं को उनके पैर पीछे खींच रहे हैं क्या?
बंगश : हे सुंदर पुष्प, तेरी खुशबू पाने के लिए खुदा के पैर
भी नहीं लड़खड़ाएँगे। आओ, मेरे बाहुओं में समा जाओ।
(उसको आलिंगन देने जाता है। उतने में कमलिनी उसके पेट में छुरी भोंक देती
है और चिल्लाती है।)
कमलिनी : और ये ले आलिंगन का फल!
बौना : हर-हर महादेव! इस अछूत कन्या ने तो धर्मवीरता में
चित्तौड़ की राजकन्याओं को भी मात दे दी। हर-हर महादेव!
बंगश : या अल्लाह! मार डाला इस लड़की ने।
(नीचे गिरता है)
मेरा खून किया।
कमलिनी : (खून से भरी छुरी चमकाते हुए) ये देखा,
हिंदू युवती के फूल का काँटा! हे हिंदू कन्याओ, इस रक्तरंजिता छुरी को देखो,
पवित्रता और धर्म की रक्षा जब हमारे पुरुष और देवों से भी नहीं बनती तब वह या
तो चित्तौड़ की चिता कर सकती है या फिर प्रतिशोध की यह छुरी। इन दोनों में एक
महत्त्वपूर्ण अंतर है। चित्तौड़ की चिता दुष्टों के लिए सज्जनों की बलि लेती
है। चोर को छोड़ संन्यासी को फाँसी देती है। बलात्कार की आशंका न रहे, इसलिए
अबलाओं का ही संहार कर डालती है। आग लगानेवाले को अपना घर जलाने का मौका न
मिले, इसलिए स्वयं ही अपने घर को आग लगा लेती है। चित्तौड़ की चिता दुष्टों
को निराश कर सकती है, पर उनका विनाश नहीं कर सकती। प्रतिशोध की भावनाओं से
चली यह छुरी दोनों कार्य कर सकती है। अपने ऊपर अत्याचार करने को उद्यत किसीको
भी किसी भी स्थान पर उसके पापों के लिए प्राणदंड दे सकती है। चित्तौड़ के
अग्निकुंड की अपेक्षा इस छुरी से बलात्कारी भी घबराता है। संभव है कि यह छुरी
किसीकी शुद्धता न बचा पाए, पर भ्रष्टाचारी को सबक अवश्य सिखा सकती है। किसीको
भी अपने जनानखाने में खींच ले जानेवाला आतंकी भी ऐसे सबक से घबराएगा। हिरनी
कहकर मेरी मृगया कहना चाहता था, पर ये देख, हम हिंदू कन्याओं की आँखें कमल
जैसी भले हों, पर हमारे नाखून सिंहनी जैसे तेज रहते हैं। इससे भी अधिक
बर्बरतापूर्वक जितनी कुमारिकाओं को आज तक इस अधम ने भ्रष्ट किया होगा, उन
सबका प्रतिशोध आज मैंने ले लिया। अब अन्य कोई भी सूबेदार हिंदुओं की सुंदरता के
फूल तोड़ने हिंदू उद्यान में इतने निर्भय और निर्लज्ज साहस से नहीं घूमेगा,
क्योंकि उस उद्यान में यह छुरी नागिन की तरह फिरती रहेगी और कभी-कभी काट लेगी,
यह उसने देख लिया है। नहीं देखा हो तो फिर से देखो इसका विष!
(फिर से बंगश पर छुरी चलाती है।)
पहला सिपाही:देखते क्या हो? हमारे सामने सूबेदार मारा गया।
पकड़ो साली को।
सभी सिपाही : पकड़ो, मारो।
सत्यवान : बिलकुल धर दबोचिए इस पापिन को। प्यार भरी बातों
में उलझाकर मार डाला सूबेदार को। असत्याचारणी, राक्षसी, चुडैल इस लड़की ने
सत्य बोलनेवाले सूबेदार की हत्या कर डाली। छोड़िए मुझे और पकड़ लीजिए इसे।
(सिपाही कमलिनी की ओर बढ़ते हैं। इतने में गंगा का प्रवेश।)
गंगा : (सारा दृश्य देखकर) धन्य है, मेरी बेटी,
तूने सही-सही प्रतिशोध लिया है आज। अब मैं देखती हूँ इन सबको। छोड़ो उसे
(कहकर एक सिपाही को आहत करती है। कमलिनी छूटती है
, पर गंगा आहत होकर गिरती है।)
कमलिनी : (गंगा के सीने पर झुककर) जीजी, मेरी जीजी।
बचा हुआ
सिपाही : अरे राक्षसी, अभी क्यों रोती है? पहले थोड़ा हँसो,
फिर रो लेना। ये तो एक रंडी मरी है। अब उसकी गद्दी चलाना तुम। अब देखता हूँ
कौन आता है तुझे बचाने!
[चिल्लाते हुए उसकी छुरी छीनने का प्रयास करता है। इतने में शंकर
तलवार लेकर आता है।]
शंकर : देख, उसे बचाने तेरा महाकाल तेरे सामने आया है।
(वह उस सिपाही पर वार करता है। सिपाही आहत होकर गिरता है। कमलिनी भी आहत
होकर गिर जाती है। घुटने के बल बैठते हुए।)
कमल! कमलिनी! हे देवी!!
कमलिनी : (उचककर) सिकंदर, यदि थोड़ी भी मानवता
तुममें शेष है तो मेरी अंतिम साँसों को मत अपवित्र करो।
शंकर : (हताश स्वर में) कमल, मैं तुम्हारा शंकर ही
हूँ, सिकंदर नहीं।
कमलिनी : (स्वगत) अरे रे, मेरा दिल फिर इसे देखकर
पिघलने लगा है। अब मरते-मरते दे दूँ इसे इसका चिरवांछित आलिंगन।
(पर कठोर स्वर में)
परंतु कमला इसे माने कैसे? सिकंदर को? नहीं-नहीं। (प्रकट) हे सुखकारी
शत्रु, रे पापी प्रियकर, हे सुंदर सर्प! सुन, कान खोलकर सुन। कभी प्यार था
तुझसे मुझे। उस प्यार की शपथ लेकर प्रार्थना करती हूँ कि मरते समय मेरे शरीर
को अपने मैले हाथ मत लगा।
शंकर : उसी प्यार की सौगंध। तुझे याद है, हमने कभी साथ
जीने-मरने की शपथ ली थी। अब वह सौगंध तो पूरी करने दे। बाँहों में बाँहें डालकर
मर जाएँ हम। सुख से प्राणत्याग करेंगे।
कमलिनी : झूठ बोलते हो तुम, मैंने तुझे अपना कहने की शपथ
नहीं ली थी। मैंने शपथ ली थी शंकर के बाहुओं में मरने की।
शंकर : कमल, मैं वही तुम्हारा प्रियतम शंकर हूँ। तुम्हें
भरोसा नहीं है न! ये देखो, मैं अपने पर हावी सिकंदर की हत्या कर देता हूँ।
(स्वयं पर वार कर लेता है। कराहते-कराहते कहता है।) शंकर हिंदू था,
मैं भी हिंदू हूँ। शंकर महार था, मैं अब वही हूँ। खून का कतरा-कतरा हिंदू है।
हे देवी, पश्चात्ताप के खून से मैं तेरे चरणों का सिंचन करता हूँ। मुझे शुद्ध
कर लो। प्राण जाने के पहले तो¨¨
कमलिनी : फिर आओ मेरे पास, हे प्राणप्रिय, तुम अकेले नहीं
जाओगे। मैं अपनी सौगंध पूरी करूँगी। तुम्हारे साथ-साथ ही स्वर्ग सिधारूँगी। मौत
के आगमन पर आलिंगन की छाया में मैं अपनी माँग भर रही हूँ। हे देवी, हमें
आशीर्वाद दो। (दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में पड़े रहते हैं।)
शंकर : हे दयालु परमात्मा, यह आत्मोत्सर्ग का क्षण मुझे
बड़ा ही सुखदायी लगता है।
कमलिनी : जीवन भर मैंने इतना विशुद्ध आनंददायक क्षण नहीं
पाया था। एक बार हरसिंगार के नीचे, तो अब यह दूसरा, जीवन के गर्भगृह में हुआ
हमारा मिलन अत्यंत सुखदायी लग रहा है।
शंकर : (उसे चूमता है) हे प्रभो, जिस सृष्टि के
उत्पादक ने हमें ये साँसें दी थीं, वे साँसें हम एकत्र रूप में विसर्जित करते
हैं। गोविंद¨¨गोविंद¨¨गोविंद¨¨
[दोनों नाम लेते-लेते मरते हैं।]
: तीसरा दृश्य :
[जंगल से जाफर अली चोखा को पकड़कर लाता है।]
जाफर अली : चोखा, मुझे जो बताना था, सो मैंने बता दिया। अब
जो कुछ तुझे कहना है, संक्षेप में कह दे। थोड़ा समय शेष है। यदि इस भयानक
मृत्युदंड से बचना हो तो मुसलमान बन जाओ। पगले, वह पत्थर की मूर्ति भगवान्
विट्ठला है, ये कैसे मानता है तू?
चोखा : पत्थर की मूरत! अरे, वह तो सर्वव्यापी है।
सर्वव्यापी देव, सृष्टि का है स्वामी,
चारों वर्ण उसके, विश्वंभर।
प्राणों का है प्राण, पीड़ितों का त्राण
आकृति विस्तार, निरंकारी।
आनंद की खान, करूँ क्या बखान
चोखा का है देव, विट्ठला माई।
जाफर अली : अब अपनी यह सैद्धांतिक बकबक बंद कर। तेरी मृत्यु
जिस अस्पृश्यता के कलंक से कदम-दर-कदम पास आ रही है, वह अस्पृश्यता का कलंक
तू मुसलमान बनकर धो सकता है। मुसलमान सभी इनसानों को एक समान मानते हैं। सभी
लोग एक ही स्थान पर, एक साथ प्रार्थना करते हैं।
चोखा : ऐसा है क्या? फिर मैं भी मनुष्य ही तो हूँ और
परमात्मा की प्रार्थना भी मराठी में करता हूँ। फिर मुसलमान होने पर और अरबी
प्रार्थना से क्या विशेष फर्क पड़ता है। भगवान् को मात्र अरबी आती हो और मराठी
नहीं, ऐसा तो है नहीं!
जाफर अली : विशेष क्या है? चोखा, जब तक कोई व्यक्ति
मुसलमान नहीं बन जाता तब तक वह काफिर माना जाता है। काफिर को न तो कोई लड़की
ब्याहता है और न समाज में उसकी कोई स्थिति रहती है, न स्वर्ग में स्थान मिलता
है। नीच-से-नीच मुसलमान भी पाक-से-पाक काफिर की अपेक्षा खुदा का अधिक प्यारा
होता है। काफिर को मुक्ति दो, ऐसा कहना भी पाप है।
चोखा : बस हो गया। आपने अभी संक्षेप में जो कहा, उसका मतलब
मेरी समझ में आ गया। आपकी समानता का मतलब केवल यह है कि मुसलमान कितना भी नीच
क्यों न हो, वह खुदा को प्यारा होगा और काफिर कितना भी साफ-पवित्र रहा तो भी
नरक का अधिकारी होगा। क्या यही है आपकी समता की भावना? इससे तो नारंभट की
व्याख्या अधिक अच्छी है। नारंभट की अस्पृश्यता केवल मनुष्यों तक ही सीमित है,
पर तुम्हारी काफिर की अस्पृश्यता तो भगवान् भी मानता है, क्योंकि मरणोपरांत
वह न तो उसे छूता है और न उसका उद्धार करता है। नारंभट की अस्पृश्यता हमारे
शरीर को नहीं छूती, पर तुम मुसलमानों की अस्पृश्यता काफिर की आत्माओं को छूने
से भी रोकती है। कुछ चुनिंदा मुसलमान या ईसाई छोड़कर बाकी सबकी सब मानव जाति
नरक में डूबी रहेगी। तुम्हारा देवदूत उसे नरक में ढकेल देगा, ऐसा माननेवाला
तुम्हारा बर्बर धर्म इस जन्म की सीमित अस्पृश्यता माननेवाला हिंदू धर्म से
कैसे अच्छा हो सकता है; क्योंकि हमारे धर्म में तो इस जन्म में सत्कार्य करने
पर अगले जन्म में मुक्ति मिलने की संभावना रहती है, पर आप जैसे बता रहे हैं,
वैसे में तो काफिर को ना पुनर्जन्म है और न मुक्ति! यह सारी तुलना में नारंभट
की अस्पृश्यता से कर रहा हूँ, क्योंकि हिंदू धर्म अस्पृश्यता मानता ही नहीं
है। हिंदुओं का देव तो अस्पृश्यों के घर जाकर उनके साथ भोजन भी कर लेता है,
क्योंकि मैंने पहले ही यह अनुभव किया है-
¨¨इसी जनम में मैंने देखा, मेरा पांडुरंग
इसी आँख से मंदिर देखा, पंढरपुर श्रीरंग!
छुआछूत का नाम नहीं था और नहीं था कुसंग
चोखा तो सबकुछ पाया, प्यार भरा सत्संग!!
जाफर अली : अरे भाई, भयंकर मौत से डरकर तो तू मुसलमान बन
जा।
चोखा : मौलवीजी, आपके पैगंबर अभी कहाँ होंगे?
जाफर अली : (स्वगत) इसे पैगंबर के बारे में
उत्सुकता होने लगी है। शायद कुछ मुलायम पड़ा दिखता है। (खुले में)
अरे पगले, हमारे पैगंबर के बारे में देखा, कितना अज्ञान है तेरा! इसलिए तुझे
पत्थर का देव सच लगता है। सुन, हमारे पैगंबर तो सैकड़ों वर्ष पूर्व अपने
अनुयायियों के साथ मदीना में धराशायी हो गए।
चोखा : ऐसा है न! जो मुसलमान धर्म प्रत्यक्ष पैगंबर की मौत
नहीं रोक सका, वह मुझ जैसे नवागत पतित की रक्षा कैसे कर सकेगा?
जाफर अली : मरो फिर। हलाल होकर मरो अब।
(परदा गिरता है)
इब्राहिम, सिपाहियो, लो, इस चोखा को सँभालो। साले को बैल जोड़ियों के साथ
बाँधकर दौड़ा दो ताकि घिसट-घिसटकर मर जाए साला।
(सब लोग चोखा को खींचकर लाते हैं और बैल जोड़ी के डंडे से बाँधने लगते
हैं।)
सोयरा : (प्रवेश कर) हाय राम, अजी पैर पड़ती हूँ
मैं आपके। मेरे इस भोले बाबा को कृपया तंकलीफ मत दो।
अभंग
दौड़-दौड़ भगवान् मेरे, चलो नहीं मंद
मारते हैं सारे मुझको, लगाओ पाबंद!
भ्रष्ट किया तुमने कहते, करे लाम बंद
दौड़ चक्रपाणी अब तू, कर दे साथ संग!!
जाफर अली : चोखा, देखा, अभी भी समय है। मेरा कहना अब भी
मान ले।
चोखा : भजन गाता है-
¨ॱमैंने अपना भाव तुझे है बताया
यदि तुझे भाया, दौड़ हे मुरारी
ना है भय, चिंता, ना है फिक्र कोई
गोद में ले लो जी, विनती है मेरी!!
जाफर अली : भगाओ बैलों को अब।
सब लोग : मारो चाबुक से उन्हें। (चाबुक चलाता है।)
जाफर अली : अरे, अभी ये बैल टस-से-मस नहीं हुए। जोर से मारो
सालों को। अरे, पर ये क्या हो रहा है। मुझे क्यों कँपकँपी छूट रही है?
नारंभट : अरे बाप रे, यह धरती भूचाल सी क्यों काँपने लगी!
[आकाशवाणी होती है।]
मूर्खों, ठीक से सुनो, संतों की रक्षा के लिए भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं बैलों
को रोके खड़े हैं। कोई भी हिला नहीं पाएगा उन्हें। मूर्खों, कम-से-कम अब तो
होश में आओ, अन्यथा भयानक संकट आनेवाला है।
जाफर अली : क्या बकवास सुनते हो। लाओ, वह चाबुक मुझे सौंप
दो। बैलों को तो छोड़ो, अब मैं इस चोखा की ही खाल उतारता हूँ। देखू, कहाँ है
वह काफिरों का भगवान्?
किशन :
(एकदम पीछे से आकर जाफर अली को खंजर मारकर गिराता है।)
ये देखो हिंदुओं का भगवान्।
[श्रीकृष्ण प्रकट होते हैं।]
सब लोग : अरे भागो, भागो, प्रलय होने जा रहा है।
श्रीकृष्ण : खबरदार, यदि कोई यहाँ से भागा तो। मेरे प्रिय
भक्त को, इस अत्यज को पीड़ा पहुँचाई है तुमने। उसका फल भोगे बिना आगे बढ़ न
सकोगे। तुम लोग औरों को अछूत मानकर उन्हें कष्ट देते आए हो। इसका परिणाम जानते
हो? यह रक्तपिपासु दुनिया भी सभी जगह से खदेड़ेगी। यदि तुम औरों को
महार-धेड़-अछूत कहकर धिक्कारते हो तो दुनिया भी तुमसे ऐसा ही बरताव करेगी।
इसलिए चेतो, जागो, सतर्क हो जाओ।
सब लोग : हे प्रभु, अनंत अपराध हैं हमारे। हमें क्षमा करें।
आप जैसी आज्ञा देंगे वैसा हम करेंगे।
श्रीकृष्ण : तो सुनो मेरी आज्ञा-इस कलयुग में सभी समान हैं,
इसके विरुद्ध जो भी होगा वह शास्त्र झूठा होगा। मेरा शब्द ही शास्त्र मानकर
चलो। मंदिरों के, दिलों के दरवाजे खोल दिए हैं मैंने सबके लिए। मैं इन्हें अब
स्पृश्यों के जैसे अधिकार दे रहा हूँ। मैंने इन्हें उ:श्राप देकर समान अधिकार
प्रदान कर दिया है। आप इसे मानें, इसी में हिंदू जाति का हित है।
सब लोग : आपकी आज्ञा सिर आँखों पर, भगवन्। आज से हम किसीको
अछूत न मानेंगे। हम सब हिंदू एक हैं, यही भाव रहेगा भगवन्!!
[परदा गिरता है। भगवान् अंतर्धान होते हैं।]
बोधिवृक्ष
पात्र परिचय
मधुरा
यशोधरा
मंजुला
सिद्धार्थ
छंद
व्याध
चित्रगुप्त
यमराज
वासना
बुद्ध
राहुल
परिचय
अपनी स्थानबद्ध स्थिति में वीर सावरकर ने 'बोधिवृक्ष' नामक की रचना की थी। यह
रचना अपूर्ण होने के कारण अप्रकाशित भी रही। इस नाटक के जो अंक एवं दृश्य
उपलब्ध हैं उनको 'समग्र सावरकर वाङ्मय' में सम्मिलित करना इसलिए आवश्यक लगा
क्योंकि राजपुत्र सिद्धार्थ के राजत्याग की, पत्नी-पुत्र त्याग की भूमिका
इसमें स्पष्ट हुई है। हाँ, इसके मूल पाठ में व्याकरण की दृष्टि से कुछ
परिवर्तन किए गए हैं।
दूसरी बात यह कि यह अपूर्ण होते हुए भी विचार प्रधान है। भगवान् श्रीकृष्ण और
भगवान् बुद्ध की विचारधाराएँ अलग हैं, पर ध्येय एक ही है। यश, श्री, कीर्ति,
ज्ञान-विज्ञान और वैराग्य जिसे प्राप्त है, वे भगवान हैं-ऐसी भगवान् शब्द की
व्याख्या है। (इस व्याख्या के अनुसार लेखक, कवि, वक्ता और इस बोधिवृक्ष नाटक
के दूसरे अंक में जैसे सिद्धार्थ ने वासना को मात दी, वैसे ही काले पानी के
कठोर दंड और प्रलोभन को मात देनेवाले नाटककार स्वयं भी भगवान् हैं, यह प्रा.
शिवाजी राव भोंसले, योगी श्री यः स. भट की तरह ही मेरा भी अभिप्राय है।) दोनों
ने ही दीन-दुःखियों को सुखी करने के लिए त्याग किया। कष्ट सहन किए। अंतर इतना
ही है कि राज त्याग कर संन्यास लेकर, तृष्णा त्याग सुख का मार्ग है, ऐसा
उपदेश सिद्धार्थ देते थे तो बैरिस्टर सावरकर कहते हैं कि स्वतृष्ण पूरी करने
के लिए दूसरों को पीड़ित करनेवाले स्वार्थी और दुष्ट प्रवृत्ति के दुर्जनों का
नाश करो। उसके लिए स्वतृष्णा मारकर भी वैराग्य और वीर वृत्ति धारण करो।
भगवान् बुद्ध ने राजत्याग करके संन्यास लेकर जागृति की तो भगवान् सावरकर ने
संन्यासी वृत्ति से राजनीति की और अंत में देह जब पूर्ण कार्यक्षम न रही तब
उसे भी छोड़ने में आत्मार्पण भी किया। 'संन्यस्त खड्ग' के अंत में उन्होंने
'तयोस्तु कर्म संन्यासांत् कर्मयोगी विशिष्यते' ऐसा वचन दिया है। ऐसा मतभेद
होते हुए भी सावरकर ने इस नाटक में और 'संन्यस्त खड्ग' में भी भगवान् बुद्ध
द्वारा पत्नी, पुत्र, पिता, माता और राज्य त्याग करने के पीछे उनकी जो भी
भूमिका रही होगी वह मानो उन्हें (सावरकर को) स्वयं को स्वीकार्य थी, इतनी
अच्छी विधि से प्रतिपादित की है। उसी तरह उनकी प्रिय पत्नी यशोधरा के भी विचार
देशभक्तों और सैनिकों की पत्नियों द्वारा मनन कर अपनाए जाने चाहिए, ऐसे
अनुकरणीय हैं।
-बाल सावरकर
पहला अंक
: पहला दृश्य :
[यशोधरा नवजात शिशु के साथ पलंग पर बैठी है। उसकी बहनें और सखियाँ
उससे बातें कर रही हैं और सारंगी के साथ गा रही हैं।]
मधुरा : राज्ञी यशोधराजी, आपके इस शिशु राजपुत्र के नयन
कमलों की पंखुड़ियाँ अभी पूरी तरह खुली भी नहीं हैं। फिर भी वह सारंगी के कोमल
सुरों पर मुसकरा रहा है। देखो, कैसा यह मृगछौने जैसा सुंदर लग रहा है! इसकी
मुसकान तो देखो, जैसे कमल पर चाँदनी खिली हो। मंजुल, गा तो कोई मधुर गीत फिर
से।
यशोधरा : वह तेरा उर्मिला गीत है न, उसे ही गाओ, उसे ही
सुनने को मेरा जी आजकल बहुत करता है।
मधुरा : नहीं, वह नहीं। वैराग्य बोझ से भारी-वयस्कों का वह
गीत नहीं, हमारे इस छौने को तो कोई चिड़ा-चिड़ी (कोका-चीडी) का हलका-फुलका
बालगीत चाहिए।
यशोधरा : वह क्यों? मेरे लाड़ले की तो पसंद और हमारी नहीं,
क्यों? मेरा लाड़ला अभी राजपुत्र है, राजा नहीं हुआ है। मेरे श्वसुर
शुद्धोधन का राज चल रहा है। जन्मते ही इतना चक्रवर्तित्व, मुझे नहीं चाहिए
मेरा लाड़ला। मेरे लाडले की रानी जब आएगी तब उसपर चलाए राजाज्ञा, मुझपर नहीं।
मधुरा : लल्ला, मेरे लाडले, देख ले, ये तेरी माँ ही को
तुझसे जलन कर रही है। और मैं तेरी मुँह बोली मौसी पाप ले रही हूँ। दे तो एक
मीठी पप्पी। दे दे। अच्छा जी, आपकी ही चलने दो राजाज्ञा। मंजुलाजी, गाओ। वही
गीत-ताई कह रही हैं वह। (मंजुला उर्मिला का गीत गाती है।)
यशोधरा : गहरी साँस लेकर। मंजुला, सच में आजकल यह गीत सुनने
को मेरा जी बहुत करता है और उसे सुनने के बाद कुछ डर सा भी लगता है। परसों यह
गीत सुनते-सुनते मुझे झपकी लगी और एक सपना आया कि जैसे ये मेरे पति राजपुत्र
सिद्धार्थ का सुंदर विलास मंदिर और तुम सब मेरी प्यारी बहनें यह अपना राजनगर,
यह सारा दृश्य अकस्मात् विलीन होकर मैं अयोध्या के एक निर्मनुष्य दालान में
अकेली एक कोने में आँसू पोंछती पड़ी हुई हूँ और लोग दूर से मुझे देखकर कह रहे
हैं, वह देखो, दूसरी उर्मिला और मेरे पति राजपुत्र सिद्धार्थ मेरे पास होते
हुए भी मुझे दिख नहीं रहे हैं।
मधुरा : पागल हो गईं क्या यशोधरा तुम! राम-लक्ष्मण के पिता
जैसे कैकेयी के पंजे में फँसे हुए थे वैसे तेरे श्वसुर शुद्धोधन महाराज कहीं
किसी युवती के पंजे में जकड़े हुए नहीं हैं। तेरे पति राजपुत्र सिद्धार्थ को
वन में भेजकर तुझे सीता, उर्मिला जैसा दुःख क्यों देंगे!
यशोधरा : मधुरा, सीता के दुःख से भी मैं इतना नहीं डरती
जितना उर्मिला के दुःख से डरती हूँ। सीता के वनवास में प्रिय का दर्शन होता
था। रामचंद्र की ईश्वरीय संगत का सुख मिलता था, पर बेचारी उर्मिला, उसे तो
पति के साथ वनवास का दुःख भोगने का सुख भी किसी ने नहीं दिया। उसे अकेली छोड़
लक्ष्मण निकल गए, क्योंकि उन्हें ब्रह्मचारी बने रहने की इच्छा हुई, पर मैं
कहूँ, जिन्हें ब्रह्मचारी बने रहने की इच्छा हो वे अपना वैसा निश्चय विवाह
पूर्व करें। विवाह बाद ब्रह्मचर्य व्रत का निश्चय उनके अकेले की इच्छा से करने
का अधिकार उन्हें नहीं है। दोनों के सहयोग से बने प्रासाद को जिस तरह अकेला
नहीं भंग कर सकता, वैसे ही दांपत्य जीवन का लताकुंज कोई अकेला तोड़-ताड़ नहीं
सकता। पर बेचारी उर्मिला, अबला पति को झक आते ही विरह के वीरान दुःख के तट
पर, जैसे जल से निकली मछली फेंककर उसकी आत्मा को तड़पाया जाता है, वैसी फेंक
दी गई। कौन कह सकता है, मेरे प्रिय पतिदेव सिद्धार्थ को भी ब्रह्मचर्य की और
श्रमण संन्यासी का जीवन जीने की ऐसी इच्छा आगे-पीछे न हो जाए? वैसे देखो,
आजकल बार-बार कहते रहते हैं कि यह संसार कितना क्लेशकारी है। परसों कोई श्रमण
मिला, तब से तो इनका चित्त बहुत उदास सा दिखता है; कहते हैं, उस श्रमण जैसा
यति होना कितना सुखकारी है! क्या होगा, कौन जाने, सखी?
मधुरा : जीजी, क्या होगा यही विचार निरंतर कोई करे तो
अच्छा-भला भी पागल हो जाए! तुम्हारी सीता जैसी स्थिति होगी या उर्मिला जैसी या
दोनों जैसी भी नहीं या दोनों जैसी बारी-बारी से आती हैं, उसकी चिंता आज क्यों
करनी? देख, स्त्री को छोड़ पाना, कहने भर की बात नहीं होती? रामजी भी सीता न
दिखने पर विलख विलखकर रोए थे, लता-बेलों को भी सीता-सीता कहकर गले लगाते रहे
थे। तुम भी सीता जैसी ही सिद्धार्थ की प्रिय रानी हो। उर्मिला जैसी, राम ने
बड़ी बहन से विवाह किया, इसलिए लक्ष्मण से विवाह करने का आदेश पिता ने दिया,
ऐसी किसी भी दूसरे से बाँधी गाँठ कि नहीं।
मंजुला : हाँ जी। मधुरा, अपनी जीजी यशोधरा के स्वयंवर की
पूरी कथा मुझे सुनाओ न! मैं बच्ची थी तब।
मधुरा : तू बच्ची थी, यह जानकर कहने का तेरा भाव यह तो नहीं
कि उस समय स्वयंवर में भाग ले सकती, इतनी सयानी होती तो यशोधरा को उस स्वयंवर
में यश मिलने का अवसर पाना कठिन ही होता!
यशोधरा : (मुसकराते हुए) हाँ, यही है मंजुला।
मंजुला : नहीं मधुरा, बेकार के झगड़े खड़े करने की तुम्हारी
यह बुरी आदत ठीक नहीं।
यशोधरा : अरे, परंतु इसमें बिगड़ा ही क्या है? स्वयंवर तू
जीत लेती तो वह भी मेरा भूषण ही होता।
मंजुला : पर मुझे तो उस स्वयंवर की बात बता। मुझे इतना ही
स्मरण है कि राजकुमार सिद्धार्थ के मंदिर में शाक्य कुल की सुंदर-से-सुंदर
कन्याओं का सम्मेलन हुआ है और मैं माँ का आँचल पकड़कर वहाँ खड़ी थी। आगे क्या
हुआ?
मधुरा : आगे यह हुआ कि उन कन्याओं के झुंड नाच-गाकर थक जाने
पर राजकुमार की ओर से उनको पुरस्कार दिए गए। एक से बढ़कर एक सुंदर कन्या
राजकुमार के सामने जाती। पुरस्कारस्वरूप वस्त्र, भूषण, अलंकार जो मिले, वह
लेती, कोई कलिका जैसी लज्जा से काँप उठती, कोई दचकी मृगी जैसी चारों ओर
निहारती, कोई चित्र जैसी स्तब्ध हुई देखती, पर सिद्धार्थ की मुद्रा रत्ती भर
भी विचलित नहीं हुई, मानो उसका ध्यान जैसे उधर था ही नहीं। अंत में जब अपने
सुप्रबुद्ध की चाँदनी जैसी कन्या विदा लेने आई तब राजकुमार चौंके, तुरंत उसने
अपने गले का रत्नहार इस चटक चाँदनी के गले में पहनाया और उसने भी कामदेव के
पुष्प धनुष जैसे अपने बाहुपाश सिद्धार्थ के कंठ में डाल अपना प्रेम-विह्वल
मस्तक उसके विशाल वक्षःस्थल पर टिका दिया।
यशोधरा : (मधुरा को रोककर) ऐ वाहियात, ऐसा नहीं। बस
कहने लगी ऊटपटाँग। राजकुमार ने मेरे गले में हार पहनाया और मैं तुरंत अपनी
सखियों के साथ आगे हो गई-समझी मंजुला।
मंजुला : फिर वे शतरंज का खेल और शस्त्र विद्या की
प्रतियोगिताएँ कब हुईं? सच-सच कहना मधुरा।
मधुरा : अब मैं सच ही कहूँगी। यशोधरा के लिए प्रस्ताव करते
ही हमारे पिताश्री सुप्रबुद्ध ने कहा कि क्षात्र रीति से शस्त्र विद्या में जो
श्रेष्ठ होगा उसे ही कन्या देना उचित है, अतः शस्त्र प्रतियोगिता हुई। अरी,
दो जुड़वाँ युवा सिद्धार्थ ने अपने तेज खड्ग के एक ही प्रहार से ऐसे साफ काटे
कि वे कुछ देर खड़े-के-खड़े रहे। प्रतिस्पर्धी को लगा कि प्रहार खाली गया और
वे हँसने लगे। उतने में हवा चली तो वे युवा लड़खड़ाकर गिर गए और सिद्धार्थ की
जय जयकार हुई। वैसे ही धनुर्विद्या में, पर सबसे विकट स्थिति अश्वविद्या के
प्रयोग में थी। अरी, पूरे शाक्य कुल में जिसपर कोई सवारी नहीं कर सकता था, ऐसा
एक काला-कलूटा, उजड्ड घोड़ा अपनी लाल-लाल आँखों से गुस्से से साँसें भरता आगे
आया। जो उसपर चढ़ता वह उसे फटाक से नीचे फेंक देता। अगली टापों से भूमि गोड़ता
पिछली टाँगों पर खड़ा हो जाता, फिर चक्रवाती सागर जैसा मुँह से फेन निकालकर
फड़फड़ाने लगता और काटने दौड़ता।
मंजुला : ओ दैया! मुझे कँपकँपी छूट रही है। बताओ जल्दी कि
सिद्धार्थ का क्या हुआ?
मधुरा : उन्होंने तो उसकी अयाल के बाल पकड़े और वैसे ही उसकी
नंगी पीठ पर चढ़ गए। घोड़ा ढीला पड़ गया। फिर सिद्धार्थ ने उसे जोर से दौड़ाकर
दस चक्कर लगाए। पूरे शाक्य मंडल ने बड़ा जयघोष किया और यशोधरा का विवाह
सिद्धार्थ से हुआ।
मंजुला : राजकुमार सिद्धार्थ को बचपन से ही श्रमण होकर वन
में जाने की उमंग हो उठती थी। उन उदास विचारों से उनको हमेशा के लिए ही
परावृत्त करने उनपर यह सुंदरता का मोहन मंत्र राजमंत्री की ओर से डाला गया था।
उस दिन सर्वोत्तम मोगरे के फूलों की माला राजकुमार को यशोधरा ने पहनाई और वन
प्रांतर में भटकनेवाले उस दिग्गज को उस मोगरे की माला से जो बाँधा, वह आज तक
उससे बँधे हैं।
यशोधरा : सखी मधुरा, पर इस आज के कल का क्या? उस फूलमाला
की बेड़ियाँ उस दिग्गज को बाँध सकीं, इसका कारण वह माला नहीं थी, वह तो उस
दिग्गज की ही स्वयं की इच्छा थी कि वह उससे बँधा रहा। राजकुमार को बचपन से ही
संसार विषय में जो उदासीनता आती थी वह संसार के दु:ख का तिनका दिखते ही फिर से
जाग जाने की संभावना भी न रहे, इसलिए मेरे श्वसुर महाराज शुद्धोधन ने
कपिलवस्तु नगर के बाहर स्वर्ग तुल्य यह विलास भवन बनवाया। उसी में राजकुमार
रहें और रमे रहें, इसलिए यह खासी व्यवस्था की, पर यहाँ भी लता-वृक्षों के
नीचे बिछे फूलों को तुरंत ही उठाना पड़ता है, क्योंकि यदि वे बिछे फूल सूखे
हुए दिख जाएँ तो सिद्धार्थ के मुख का हास्य भी तुरंत कुम्हला जाता है। वे
तुरंत कहने लगते हैं-अरे, सारी सुंदरता ऐसी क्षणिक है। हाय, हाय! जो प्रातः
खिलेगा वह संध्या को कुम्हलाएगा, पर सखी, खिले फूलों में एक भी कुम्हलाया
वहाँ दिखे नहीं, इतनी सावधानी से सजाया जानेवाला प्रीति का जो मनोहर उपवन है
वह केवल भासमान स्वप्न सा है। उसमें भी सिद्धार्थ को दुःख के दुःस्वप्न दिखते
ही हैं, उनका क्या करें? ऐसी स्थिति में फूलमाला की श्रृंखला तोड़कर वह
दिग्गज कब भाग जाएगा इसका कोई ठीक नहीं।
मधुरा : ठीक है, सखी यशोधरा! तेरे इस अल्हड़ मुन्ने का, इस
अपने नवजात मुन्ने को पहली बार देखने सिद्धार्थ आ रहे हैं ना! फिर देख लेना
मजा, मैं कह रही हूँ। अरी, अपने इस मनोहर, छुटके तनय के सुंदर स्मित के
किरणों की यह वात्सल्य माला राजकुमार सिद्धार्थ के हृदय को तेरी वरमाला से भी
अधिक कसकर बाँध देगी।
मंजुला : राजकुमार के आते ही इस नन्हे की लखभेंट उनके हाथों
सौंपने का पहला अधिकार मेरा है, अच्छा! मौसी हूँ ना मैं इसकी।
मधुरा : अरे, लो आ गए सिद्धार्थ। नहीं, तुम नहीं उठना इस
तरह, हम कहेंगे कुमार को कि अभी व्यवहार करने नहीं निकली है हमारी राजप्रसूता।
देखो लड़कियो, सुख क्षणिक होता है, इसलिए दुःख की तरह ही त्याज्य है, श्रमण
संन्यासियों के इस आदर्श के सटीक उत्तर में लिखा वह मधुर गीत गाओ। एकदम
सुरांगनाओं जैसा गाओ, नदी के प्रवाह की तरह गाओ, सलीलना थक जाओ तब भी
उच्छ्वास नहीं लेना। हाँ, न जाने उस उच्छ्वास की हवा से भी राजकुमार के कोमल
मन को दुःख का धक्का लग जाए।
[राजकुमार सिद्धार्थ के आते ही लड़कियाँ नाचने-गाने लगती हैं, सिद्धार्थ
यशोधरा के पास बैठते हैं।]
सिद्धार्थ : (गाना समाप्त होते ही रोककर) यशोधरा!
एक गुलाब फूल सूखे तो दूसरा फूल खिलता है। इससे माली को निरंतर फूल मिलते
रहेंगे। यह इस गीत का भाव है तो भी स्वयं माली की फूल का उपभोग करने की
इंद्रिय शक्ति ही कभी-न-कभी विफल होगी ही, तिसपर इंद्रिय सुख हमेशा ही
रहनेवाला नहीं है, इस दु:खद आशंका का यह गीत क्या समाधान करता है!
मधुरा : राजकुमार, ऐसी निर्मूल आशंकाओं का समाधान करते रहने
के लिए मेरी यशोधरा क्या कोई भंगड़ साधु वैरागी है! आज युगों-युगों से हजारों
वर्षों से बड़े-बड़े जपी-तपी श्रमण, संन्यासी, अवतार, अवधूत आपके जैसा ही
पूछते आए, पर उनका उत्तर किसी ने भी दिया क्या? जब कोई वह उत्तर देगा तब हम
भी फूलों के गीत गाना छोड़कर श्रमणों की कथाएँ गाएँगे, पर आज हम अपने नन्हे
राजा के लिए मधुर लोरी और झूला गीत के सिवाय दूसरा कुछ भी न गाएँगी, न
सुनेंगी; क्योंकि आज आप हमारे महाराज नहीं हैं, हमारे इस छोटे राजा के राज
पिता हैं। मंजुला, ले, आ इधर अपना का नन्हा राजा, देखिए महाराज शुद्धोधन का
पौत्र, राजपुत्र सिद्धार्थ और राजकन्या देवी यशोधरा का तनय, पूरे शाक्य
राष्ट्र का चहेता छोटा राजा।
मंजुला : अरे, इतने शब्द आभूषण छोड़ केवल इतना कहती कि
मंजुला का सुंदर भांजा है यह, तो सबकुछ महत्त्वपूर्ण उसमें आ जाता। लीजिए
महाराज, अपने नन्हे राजा को अब। संपूर्ण शाक्य कुल को आपके बेटे के जन्म से
खुशी हो रही है।
[सिद्धार्थ बच्चे को किंचित् सहलाकर उच्छ्वास लेता है।]
यशोधरा : मंजुला, मधुरा! पूरे शाक्य राष्ट्र के घर-घर में
जिस कारण से खुशियाँ-ही-खुशियाँ हो रही हैं ऐसा तुम कह रही हो, उस कारण
सिद्धार्थ को दुःख के उच्छ्वास छोड़ने पड़ रहे हैं। लाओ, नन्हे राजा को।
तुम्हें प्रेम है तो सबको ही लगना चाहिए, ऐसा नहीं है।
सिद्धार्थ : देवी, मेरी प्रिया, जात भार्या, स्वयं के
नवजात शिशु को देखकर शेरनी के स्तन भी दूध से भर जाते हैं, क्रूर-से-क्रूर
सिंह भी उसे गाय जैसा निरापद लगता है। चतुष्पादों को भी स्नेहसिक्त करनेवाला यह
अपत्य प्रेम मुझे मोहित नहीं करता, ऐसा कैसे होगा? तुममें से किसीको भी इस
शिशु को देखकर जितनी प्रीति उमड़ी हो उतनी ही मेरी भी उमड़ी है। इसका प्रत्यंतर
है यह मेरे दुःख से भरे निःश्वास। तुम्हें आश्चर्य होता है? मधुरा, मानो कोई
सुंदर वन पंछी राजद्वार के ऊपरी पिंजरे में बंद रखा हो और दास-दासी, राजा-रानी
उस सुंदर पंछी को अपने पिंजरे में फँसा देखकर आनंद से भर गए हों, पर राजा का
एक कुमार दुःखी होकर सोचने लगे कि उस पंछी को उस सँकरे पिंजरे में परतंत्रता
की कोमल पीड़ा हो रही होगी। इसको यहाँ से स्वतंत्र करने की युक्ति मुझे सूझे
तो कितना अच्छा हो। अब मधुरा, तू ही बता, उस पंछी पर खरा प्रेम किसका? राजा
के दास-दासियों का या राजकुमार का?
मधुरा : मैं कुछ नहीं कहती। मुझे ज्ञात है कि मेरे ही मुँह
से निकलवाना है कुछ उलटा-सीधा।
मंजुला : अच्छा, मैं कहती हूँ, उस पंछी को पिंजरे में
देखकर दुःखी होते राजकुमार का प्रेम उसके प्रति अधिक है।
सिद्धार्थ : उसी तरह, प्रिय यशोधरा, इस बच्चे का लाभ
तुम्हें हुआ, इसलिए तुम्हें आनंद हो रहा है, पर तुम्हारे इस लाभ में उसकी
क्या हानि हो रही है, इधर तुम्हारा ध्यान ही नहीं है। इसलिए तुम्हारा प्रेम
स्वार्थी है, पर मुझे यह नन्हा निरपराध जीव इस दुःखपूर्ण संस्कृति के पिंजरे
में फँस गया है, इसलिए दुःख होता है। इसे उस पीड़ादायक परतंत्रता से कैसे
मुक्त करूँ, इस चिंता से छोड़े गए नि:श्वास उसके प्रति निस्स्वार्थ प्रेम के
आनंद से पूरित तुम्हारे उत्साह को देखकर अधिक भर गया है।
यशोधरा : किसी भिखारी को रास्ते में भीख माँगते चलते-चलते जो
बच्चा पैदा हो जाता है, उसके विकलांग बाप को ऐसा शोक करना ठीक लगता है,
क्योंकि कंगाली, दीनता के पिंजरे में उसके माता-पिता ने उसे बंद कर दिया है,
ऐसा कहा जा सकता था, पर मेरा यह राजविंडा पुत्र शुद्धोधन महाराज का मन्नतों
से प्राप्त पौत्र है। वह शाक्यों के राजा का गर्भश्रीमंत वारिस है।
सिद्धार्थ : हाय! हाय! यशोधरा, भीख के रास्ते में लगनेवाले
पेड़ की छाया को छोड़कर जिसके प्रसूती को छाया का स्थान मिलता नहीं और जिन्हें
स्वयं को ही खाने को न मिलने के कारण बच्चे को भरपेट पिलाए, इतना दूध कभी न
मिलता हो, ऐसी सैकड़ों भिखारिन माताएँ इस दुनिया में हैं तो! और उनको पैदा
होते जन्मते ही मरने के मार्ग पर हतभागी बालक जन्म लेते हैं तो, तो फिर
राजविलास में जन्मे एक गर्भश्रीमंत बाल वारिस के जन्म पर मैं कितना खुश हो
जाऊँ और उन असंख्य निरपराध जीवों को जिन्हें जन्म लेते ही कष्टों में छटपटाना
पड़ता है, उनके लिए दुःख के कितने नि:श्वास लूँ-यह तुम्हीं मुझे बताओ। यशोधरा,
यह केवल राज्य का वारिस है, इसलिए अपना शिशु सुख में ही रहेगा, यह तुम्हारा
सोचना कितना भ्रमपूर्ण है? यदि इसे ज्वर हो आया तो राज्य में कोई भी एक उसे
बाँट सकेगा? इसपर छोटी माता, बड़ी माता का प्रकोप हुआ तो ये सारी दास-दासियाँ
उसकी पीड़ा को स्वयं भोग सकेंगी क्या? पगली, राजा का पुत्र हुआ तो भी वह
जन्मते ही बोलने नहीं लगता। बचपन जैसा सुख नहीं, ऐसा कहनेवाले कहते रहें, पर
बचपन जैसा दुःख भी नहीं। एक दिन कभी कोई स्नेही पास न हो तो जीना कठिन। उसे
क्या कष्ट है वह कह नहीं सकता। क्या कहना है समझ में नहीं आता। पेट दुखता है
और प्यारी माँ उसे न समझ उसके सिर में ओषधि लगाती है। प्रकाश में दिये से हाथ
जलता है और अँधेरे में माँ-बाप का ही पैर पड़कर किसी अंगूर के फूल की तरह पिचक
जाता है। अजी अपने ही मलमूत्र में पड़े रहने से वह शरीर पर लिपट जाता है और
वही अंगुलियाँ मुख में जाने पर चूसी जाती हैं। ऐसा मलिन, असहाय और परतंत्रता
की हीन स्थिति में बचपन रहता है। ऐसे सुख में इस अपने लाड़ले बेटे को ढकेलने की
क्रूरता हम माँ-बाप करते हैं। नहीं-नहीं, इस क्रूरता का मुझे प्रायश्चित्त
लेना चाहिए। और वह यही कि जन्म के कारागृह में पड़े इस शोकग्रस्त संसार से उसे
मुक्त करने का कोई उपाय निकालना पड़ेगा।
प्रिये यशोधरा, मधुरा, मंजुला, अब रात्रि अधिक हो गई है। जाओ, सो जाओ। हम
कुछ देर चाँदनी में उद्यान में बैठना चाहेंगे। (
जाने लगता है।)
मधुरा : परंतु राजकुमार, थोड़ा रुकें। इस पुत्र का जन्म
आनंदोत्सव...यशोधरा...
यशोधरा : मधुरा, जाने दे। कुमार ने कहा ही है कि उन्हें
पुत्र जन्म की यह बात अति दुःख की लगती है। क्यों रोकती हो इस दु:खद स्थान पर
उन्हें-यह क्या सच में ही चले गए! मंजुला, अरी, तुमने सच में ही उन्हें जाने
कैसे दिया? ( मंजुला के गले पड़ते हुए) मेरी बहना, मेरी
सखी, राजकुमार सिद्धार्थ विश्व के दुःख का नाश करने का रास्ता खोज रहे हैं?
विश्व में अपनी गिनती कहाँ है? अपना दुःख माने राजा का फन्ना। हमारे दुःख से
वे यथासंभव दूर रहें। उतना ही हमारा दुःख दूर करने का उत्तम उपाय? मधुरा, वह
स्नेह की पुरानी श्रृंखला कम पड़ेगी, इसलिए तू वात्सल्य की श्रृंखला उस दिग्गज
के चरणों में डालना चाहती थी तो उससे वे अधिक ही घबराकर भाग गए।
मधुरा : शांत! सखी, शांत! यह लहर भी जैसे उठी है वैसे ही
बैठ जाएगी। अब तू थोड़ी देर शांत होकर सो जा। तुम्हें जाग सहन न होगी।
लड़कियो, कोई मधुर गीत सुनाओ। उसे सुनते-सुनते देवी को झपकी आ जाए तो तुम सब
सो जाना। (परदा गिरता है।)
: दूसरा दृश्य :
छंद : राजकुमार सिद्धार्थ का मन बचपन से ही वैराग्य की ओर
था। उनका मन नित्य उदास रहता है। इसलिए उन्हें गृहस्थी में बाँधने के लिए यह
विलास भवन बनवाया। मैं उनका प्रिय सारथी हूँ, इसलिए इस विलास भवन में रहकर और
सिद्धार्थ का मन हमेशा सुखकारक विषयों की ओर लाकर उनका मन प्रसन्न रखने का काम
शुद्धोधन महाराज ने मुझे सौंपा, पर आजकल यहाँ भी सिद्धार्थ बहुत उदास रहते
हैं। उनकी संगति में तो मुझे भी उदास होना पड़ता है। तथापि अपना कर्तव्य इस
तरह छोड़ नहीं देना चाहिए। अभी वे वहाँ चाँदनी में आनेवाले हैं। लो, आ ही गए!
छंदा! कुछ भी हो जाए पर मुँह पर उदासी नहीं छानी चाहिए। हमेशा हँसमुख रहो और
विश्व दुःखमय लगे तो भी नहीं और वह सुखमय न भी लगे तो भी वह सुखमय है, ऐसा ही
कहते रहो।
सिद्धार्थ : (प्रवेश कर) छंद, ऐसे उदास क्यों खड़े
हो?
छंद : उदास नहीं हूँ, महाराज। इस उद्यान की चाँदनी की
अपूर्व शोभा देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया था। आपकी राह ही देख रहा था। यह
चैत्र पूर्णिमा है। इस सुंदर सरोवर में देखिए, आकाश कैसा प्रतिबिंबित हो रहा
है और इसमें दिखता चंद्रमा तो इतना स्पष्ट दिख रहा है कि किसी बालक को वह
अचानक दिखाया जाए तो उसे लगेगा कि इस सरोवर के नीचे सच में ही एक दूसरा आकाश
है और उसमें दिखनेवाले दूसरे चंद्र की खोज मैंने की है।
सिद्धार्थ : फिर क्या उस बालक की वह समझ खोटी होगी? इस
जलाशय में बिंबित हुए इस सुरम्य आकाश को यदि तुम खोटा कहोगे तो फिर यह वायु के
परिसर में प्रतिबिंबित हुआ आकाश भी खरा है, यह किस आधार पर मानें? दोनों ही
दृग प्रत्यय! दृष्टि बंध के खेल।
छंद : परंतु यह जलाशय के नीचे दिखनेवाला आकाश क्षणिक है।
दिखता है, पर टिकता नहीं है।
सिद्धार्थ : और यह ऊपर का आकाश? छंद, वह भी उतना ही क्षणिक
दिखनेवाला है, पर टिकनेवाला नहीं है। वह तारा देखो। ये तीन शब्द मैं तुमसे
कहूँ तब तक वह तारा जहाँ था वहाँ से कई लाख योजन दूर निकल गया। उस अनुपात में
तारागणों के परस्पर आकर्षण में विलक्षण अंतर हो गया। इस परिवर्तन के अनुपात
में इन सब तारों की, आकाश की, तुम्हारी, मेरी, हवा की गति की परिस्थिति और
परिणाम और प्रमाण भी बदल गए। एक तारे के वेग के कारण इतना परिवर्तन होता है तो
अनंत अणु रेणु के परस्पर आकर्षण उत्सारण करनेवाले ब्रह्मांड के महान् स्तंभन
के अखंड वेग के प्रभाव को क्या कहा जाए? गत विपल में देखा हुआ आकाश इस विपल
में वहीं रहा हुआ नहीं है। न वायु, न चंद्र, न तू और न मैं। इस जलाशय के
चंद्रबिंब की तरह यह सारा वस्तुजगत् निरंतर परिवर्तनशील, अनित्य, दिखनेवाला,
पर टिकनेवाला सारांश समान खोटे हैं या खरे हैं। कहो, ठीक है न!
छंद : हाँ, कुमारजी! (स्वगत)अरे रे यहाँ 'हाँ'
कहना नहीं था। (प्रकट) परंतु महाराज, वह कुछ भी हो, पर शांत, सुखद
और सुंदर रातें देखने पर मन को जो आनंद होता है वह तो अनुभवसिद्ध है न! यह
देखिए, इस आम्रवृक्ष पर जो पंछी रहते हैं, आज शाम को उनके जोड़े चाँदनी
दिखने तक अपने-अपने घरौंदे के सज्जों पर बैठे मधुर-मधुर गीत गा रहे थे। इतने
मधुर कि गाते-गाते उनको नींद ही आने लगी। अब नींद में उन्हें इस प्रसन्न
जलाशय, इस चाँदनी के, इन फूलों की सुगंध के सुखद स्वप्न दीख रहे होंगे।
सिद्धार्थ : उन पंछियों को नींद में स्वप्न आ रहे हों या
नहीं, परंतु छंद, तुझे तो जागते हुए ही स्वप्न दीख रहे हैं। यह बात सच है कि
यह ज्योतिमयी, शांत, सुखद रात देखो, यह तू कह रहा है, परंतु उस पार के उस
वन से जाकर पूछो तो सही। वह शांत है या अशांत है। वह सिंह, वह बाघ, वे
लोमड़ियाँ अपनी गुफा से अभी भूख से बिलबिलाते बाहर निकल रहे होंगे अपने दाँत
निपोरते हुए और उनके क्रूर गर्जन और दहाड़ें सुन अपने-अपने प्राण कैसे बचाएँ,
इस चिंता-भय से मृग, महिस, गोरू, सौरू थरथर काँप रहे होंगे। इधर-उधर
रक्तरंजित संघर्ष प्रारंभ होकर सैकड़ों गले कटेंगे। कहीं राह जनिकों ने
यात्रियों की मुंडियाँ दबाकर रखी होंगी और उन धनिकों के बाल-बच्चे थरथर काँपते
हुए 'दया करो', 'उन्हें छोड़ो', कहते-कहते उन्हें भी घर में मार डाला जा रहा
होगा। वह देखो, दावाग्नि, पूरा वन जल रहा है और चंद्र को लोरी गाते सोए हुए
जैसा तुमने अभी कहा, वे पंछी अकस्मात् जलते-भुनते ची-चीं करते आग में टपाटप
गिर रहे होंगे या तू कहता है वे शांत रातें, यह सुख का नाटक तू देख रहा है
तभी इस जग में किसीको मृत्यु का अंतिम क्षण बुला रहा है, कोई प्रसूति वेदनाओं
से तड़फड़ा रही होगी, कोई ज्वर से जल रहा होगा, कहीं श्मशान में शव जल रहे
होंगे, स्वजन-परिजन रो रहे होंगे, यह सब खोटा है क्या?
छंद : नहीं महाराज। (स्वगत)अरे यहाँ 'नहीं' कहना
था। पहले जल्दी में हाँ निकल गया और अब नहीं निकल गया। (प्रकट) पर
कुमार, वहाँ कुछ भी होता रहा हो, यहाँ कम-से-कम आपको और मुझे इस विलास भवन
के इस निर्भय उपवन में यह सुंदर चाँदनी से भरी रात शांति और आनंद तो दे ही रही
है।
सिद्धार्थ : छंद, सच तो यह है कि इस जग में जब तक सैकड़ों
आदमी दुःख से पीड़ित हैं तब तक मुझे कुछ भी आनंद नहीं है। पर अपना ही केवल
देखें तो इस समय और यही तीन भयंकर भूत तेरे तीनों ओर से अकस्मात् आकर तुझे
खाने लगें, तो तुझे यह चाँदनी, यह उपवन इस समय भी शांत, सुखद और निर्भय लगेगा
क्या?
छंद : बिलकुल नहीं! पर¨¨पर¨¨परंतु कुमार, ऐसी रात में भयंकर
भूत आदि के नाम नहीं लेने चाहिए।
सिद्धार्थ : नाम कौन से? ये देखो, भूतों के प्रत्यक्ष रूप
ही यहाँ खड़े हैं। वह कौन है, पहचाना? यह रोग का भूत है। उसके हाथ-पैरों से
सड़ा मांस और रक्त टपक रहा है। उसका मुँह टेढ़ा-मेढ़ा होकर मुँह से मवाद बह
रहा है। उसका शरीर पीड़ा क्लांत है। पेट में भी बहुत मरोड़ उठ रही है। वह
देखो, कितना व्याकुल होकर चीख रहा है। कितनी दयनीय कराह है। छंद, यह रोग का
भूत तुझे-मुझे कब पछाड़ेगा, इसका कोई नियम है क्या? आँखों की सूजन, नाक का
दुखना, कान दर्द, शरीर पर जितने रोम हैं उतनी संख्या में रोग हैं, क्योंकि
हर बाल के पीछे एक बलतोड़ तो होता ही है-कराह, टीस, कसक, जलन, वेदना, शोथ,
दाह, यातना।
अरे रे! भयंकर रोगों की इन अनंत यातनाओं की तलवार मानव मात्र के सिर पर निरंतर
टँगी हुई है। वह देखो, वहाँ वह दूसरा भयंकर भूत-वह बुढ़ापा, वह जरा! दांत
गिरे हुए, आँखें चिपड़ी हुईं, नाक बहती हुई, लार टपकती हुई, पैर लटपटा रहे
हैं। गंदा, अभद्र, दलिदर, घृणास्पद-यह बुढ़ापा तेरी और मेरी एक दिन ऐसी ही
गत बनाएगा। बिस्तर पर अपने ही मल-मूत्र में पड़े हमें देखकर हमारे सगे ही दूर
भागेंगे। ममता के बाल-बच्चे भी दुःखी होकर कहेंगे-रामजी, इनकी मिट्टी अब उठाओ।
और अब ये तीसरा भयानक भूत। देखो, वह तुझपर और मुझपर हमला करने के लिए कैसा
आतुर हो रहा है। कोयले जैसा काला-कलूटा चेहरा। आँखें सफेद झक्क, गुस्सैल, जीभ
टूटकर बाहर लटकती हुई। यह मृत्यु का भूत मरण। छंद, परसों राजधानी में तूने ही
मुझसे कहा था न कि आज या कल हम सब मृत्यु की अरथी पर बाँधे जानेवाले हैं। हाय,
हाय! जन्म, जरा, व्याधि, मरण। उद्यान के ये उग्र चौपाए। मनुष्य जाति के
पीछे हमेशा होते हुए छंद, कैसा विलास भवन, कैसी चाँदनी, कैसी शांति, कैसा
सुख? अपने इस दुःखमय विश्व के दुःखों से मुक्त होने का मार्ग मुझे कोई
दिखाएगा क्या? वैसा कोई मार्ग क्या है भी? इसका हल एक बार मुझे ढूँढ़ना ही
पड़ेगा। महा दुःख से विश्व को मुक्त करने के लिए वह रास्ता खोजने के लिए मैं
अपना यौवन, अपना राज्य, अपने पिता, अपनी माता, अपनी पत्नी, अपना सबकुछ,
अपने प्राण भी अर्पण कर दूँगा। आज मैं दुनिया को राम-राम कह गुप्त रूप से चला
जाऊँगा। नहीं तो कल महाराज शुद्धोधन मेरा फिर से रास्ता रोकेंगे। छंद, जाओ।
तुम मेरा घोड़ा सज्जित करके ले आना। जाओ, इस विलास भवन को छोड़कर मैं भाग न
जाऊँ, इस हेतु से मेरे पिता के रखे हुए पहरेदार भाग्य से सोए हुए हैं, मुझे
निकल जाना चाहिए।
छंद : परंतु राजकुमार...
सिद्धार्थ : अब किंतु न परंतु, छंद दुःखाग्नि से दावाग्नि
वड़वा की तरह जल रहे इस संसार में अब मैं क्षण भर भी नहीं रहूँगा। जन्म,
व्याधि, मरण, कभी भी, किसी से भी टाले न जानेवाले सांसारिक महादुःखों से
कौन सयाना उद्विग्न न होगा! और छंद, तू तो सयाना है न!
छंद : हाँ, महाराज।
सिद्धार्थ : तो जाओ और घोड़ा लेकर आओ। मैं एक बार यशोधरा को
स्वयं अंतिम विदाई देकर यहीं आता हूँ। जा, घोड़ा लेकर आना। मैं आया।
: तीसरा दृश्य :
[यशोधरा का अंत:पुर। पलंग पर यशोधरा,मंजुला आदि
सोई हुई हैं।]
सिद्धार्थ : (प्रवेश करते हुए) अहा हा! इन भौतिक
चर्मचक्षुओं को यह सुंदरता का अनुपम दृश्य कितना मोहित कर रहा है! बचपन से ही
मुझे गृहस्थी बुरी लगती थी और मैं श्रमण संन्यासियों के पीछे-पीछे जाता था-यह
देखकर घबराए हुए मेरे पिता ने मुझे संसार में ही बाँधे रखने का जो सुनहला, परम
आकर्षक, मोहन मंत्र से भरा इंद्रजाल तैयार किया, वह यही है। शाक्य कुल की ही
नहीं, दूर-दूर से कई सुंदर ललनाओं को लाकर मेरे मन को बहलाने इस विलास भवन में
रखा। सुंदरता के ये कितने सुंदर नमूने! विविध सुंदरता, यह गोरी कितनी सुवर्ण
जैसी! हेम गौर अंगलता। नींद में आँचल कमर के नीचे चला गया है। हाथ पर रखा वदन
जैसे नाल पर छिपा कमल। यह सुधा, इसका वह श्यामल मुखमंडल। कितनी मोहमयी अवस्था
है यह! और कितनी सफेद झक, सुंदरता का मुँह लज्जित हो जाए। सारंगी बजाते-बजाते
यह वैसी ही मंच पर लुढ़ककर सो गई। सारंगी को भी नींद लग जाए, ऐसी शांति से वह
उससे चिपकी हुई है। सुधा के स्वप्न के गाने को सारंगी के स्वप्न के सुर साथ दे
रहे हों, ऐसी दोनों की नींद एकतान हो गई दिख रही है। यह चित्रा, करवट पर ढंग
से सोई होने के कारण उसकी उत्साही अंगलता सच में ही किसी मनोहारी चित्र जैसी
कमनीय दिख रही है। ये मोहना और मधुरा आपस में एक होकर सोई हैं, पर उनके उस एक
शरीर पर वह उनके दो मुखमंडल अवश्य अड़ोस-पड़ोस में भिन्नता से शोभा दे रहे
हैं। जैसे एक नाल में उगे दो जुड़वाँ कमल फूल। और यह मेरी पटरानी, मेरी
प्रियतमा, मेरी यशोधरा, लगता है, गहरी नींद में है। मंद-मंद कालबद्ध साँस
लेते-छोड़ते किंचित् ऊपर-नीचे होनेवाले वक्षस्थल के ये हार! यह उसकी ढीली हुई
वेणी, उस वेणी के ढीलेपन से कुल चार कुंतल निकलकर उसके चेहरे पर लुब्धता से
उड़ रहे हैं। और उन सारी ललनाओं के एकत्र हो जाने से इस समग्र दृश्य की रत्न
माणिक की कोई माला टूटकर बिखर जाए या दो प्रेमी किशोरियों की आपस में
ऊधम-मस्ती में कोई रंग-बिरंगा गुलाब फूलों से गुथा बड़ा हार नीचे गिरा हो और
उसकी पंखुड़ियाँ इधर-उधर बिखर जाएँ, वैसे फूलों की बिखरी पंखुड़ियों जैसी
पसरी हुई इन सुंदरियों से यह स्थल अति आकर्षक लग रहा है। इन सबने मुझसे कितना
प्रेम किया! मैंने भी इनसे कितना प्रेम किया। इनके साथ मैंने कितना विलास,
विहार किया। मन की प्यालियाँ भर-भरकर मैंने इस सुंदरता के बगीचे के हर फूल का
मधुर मधु का आकंठ पान किया, पर आज मैं इन सबको छोड़े जा रहा हूँ। ये
कामिनियाँ, यह कामासव, यह कामी काया, इन सब कमनीय वस्तुओं को विषवत् मानकर
उनका परित्याग करने यह सिद्धार्थ सिद्ध हो गया है। यह बात मेरे मन को स्पष्टता
से ज्ञात हो, इसलिए मैं (सोच-समझकर) हेतुतः यहाँ आया हूँ। रे मन,
तेरी खरी परीक्षा है यह। इन अत्यंत मोहमयी कामिनियों के लाँघे न जाते आकर्षण
के बीच में ऐसे खड़े रहकर फिर तुम उसे लाँघकर जा सको तब ही तेरा वैराग्य बल
सच्चा साबित होगा। भौतिक नेत्रों को सुरम्य रमणियों का यह शयन मंदिर कितना
आकर्षक लग रहा है! रे मन, वह मैंने तुझे अभी बताया ही है, पर अब आत्मिक
उपनेत्र मेरे पास हैं, उन्हें लगाकर फिर यही दृश्य देखो। उस दिन जो एक श्रमण
परिव्राजक साधु मुझे अचानक मिला, उसने मानव का यह वास्तविक स्वरूप दिखानेवाले
तात्त्विक उपनेत्र मुझे गुप्त रूप से दिए हैं। उसे नर-कपाल कहते हैं। यह
मनुष्य के मुँह का हड़ियों का ढाँचा है। दिखावटी गुड़िया के अंदर की यह
चिंदियों की एक गाँठ है। ओहो, यह कितना आश्चर्य! ये तात्त्विक उपनेत्र मन की
आँखों पर लगाकर देखते ही यह विलास भवन अकस्मात् ही एक भयानक श्मशान में बदल जो
गया। क्या इन सब रमणीक मुखमंडलों की अंत में इस नर कपाल जैसी स्थिति होगी?
उसका मूल रूप यही है और इस बीभत्स हड्डी के ढाँचे पर चढ़ाई हुई सुंदरता एक
स्वाँग है। नाक ऊँची, एक शान जताते हुए नाक का यही मूल रह जाता है न! एक-न-एक
दिन देखते-देखते ऐसा थोबड़ा होगा ही। देखनेवाली गैर आँखों के अंधे गड्ढे गदराए
गाल के अधूरे भयानक सुरंग! अरे यह स्त्री देह, अरे नरदेह, रोगों से जर्जर,
गंदगी से भरे हुए, दुर्गंध से परिपूर्ण, मुझे इससे असह्य घृणा हो रही है। यह
देखो, नींद में ही दाँत किटकिटा रही है। टपकते लार से भरी हुई है। वह देखो,
मुँह खोले खर्राटे भर रही है। अरे रे! और इसकी यह कैसी दुर्गंध कितनी गंदी।
हाय-हाय, जिन ललनाओं को ऐसी अस्त-व्यस्त सोई पड़ी देखकर उनके दर्शन से मुझे
काम-ज्वर चढ़ मैं मोहित हो जाता था, वही ये स्त्रियाँ? यह वैराग्य का
मंत्रमणि, यह तत्त्वज्ञान का ताबीज, ये विवेक के उपनेत्र लगाकर देखते ही मेरी
विषय भावना नष्ट होकर मुझे यह विलास भवन-प्रत्यक्ष नरक भवन समान बीभत्स लग रहा
है। कामोन्माद में जब इन ललनाओं के आलिंगन को कोई स्वर्गवास कहता है तो वह
लाक्षणिक अर्थ से सत्य ही होता है, पर जब मैं इन बीभत्स, अंदर-बाहर गंदगी और
पसीने से घिन बनी देह को आलिंगन देने को नरकवास कहता हूँ तब वह शत-प्रतिशत
सत्य होता है। अब यहाँ क्षण भर भी मेरा मन रम नहीं सकता। इन अभागी स्त्रियों
या यशोधरा पर मेरी प्रीति कम हुई है, इसलिए नहीं; तुम लोगों पर वास्तविक
प्रीति आज से ही मैं करने लगा हूँ इसलिए। इसीलिए मैं तुम्हें छोड़कर जा रहा
हूँ, क्योंकि यशोधरा, आज तक तेरा यौवन-सम्मोहन मेरी तरुणाई को खींचता था,
इसलिए मैं तुमपर प्रेम करता था, पर 'जरा' तेरे-मेरे यौवन को गोंच जैसी चूस
रही है। जब ये आँखें पिचकी और चिपड़ी हो जाएंगी, यह मुँह पोपला हो जाएगा, कमर
झुककर कूबड़ निकल आएगा, शरीर और मुँह पर झुर्रियों का जाल फैल जाएगा तब मेरा
यह विषयासक्त प्रेम नष्ट होगा। नई-नई नवयौवना स्त्रियाँ सेवा में आती रहीं तो
भी जब बुढ़ापा मेरी कामेच्छ ही छीन ले जाएगा तब क्या? तुम्हारी कमनीयता और
मेरी कामेच्छा दोनों के नष्ट होते ही, यौन प्रेम का आकर्षण समाप्त होते ही,
चूसे गए छिलके जैसे हम एक-दूसरे से दूर फेंक दिए जाएँगे। यौन प्रेम से वियोग
ही नहीं तो विरस भी होगा, परंतु इन दुर्गति के विचारों से आज मुझे जो
तुम्हारे, मेरे और सारे जग पर दया आ रही है और मुझे, तुम्हें और सारे
प्राणियों को इस जन्म, व्याधि, जरा, मृत्यु के भयानक संकट से छुड़ाने के लिए
जो महत्तम प्रयास करने का संकल्प कर रहा हूँ वही मेरा तुम पर प्रकट होता
वास्तविक प्रेम है, वही मेरा-तुम्हारा खरा स्नेह है, देवी यशोधरा चलता हूँ।
आज तक के प्रेम की यह पावती ले लो। (चुंबन लेने जाता है) नहीं, वह जाग
जाएगी और मेरे वन प्रस्थान में बाधा बन जाएगी, पर मुन्ना, तुझे मुझसे पिता का
सुख नहीं मिलेगा। मेरा यहाँ आना दैवी खेल था। फिर भी पिता के चुंबन पर जो औरस
अधिकार तुझे प्राप्त है उसे मैं पूरा नहीं डुबोता। यह प्रथम और अंतिम चुंबन
लेता हूँ। (पुत्र को चूमता है।) और अंत में प्रीति देवता, यशोधरा,
जिस तेरे इस रति शय्या को मेरा स्पर्श फिर से कभी भी होनेवाला नहीं है, उसे
यह मैं अंतिम स्पर्श करके और देवस्थान जैसी प्रदक्षिणा कर अब चलता हूँ। मेरे
महाभिनिष्क्रमण का शुभ क्षण पास आ गया है। मैं अभी तुरंत घोड़े पर सवार होकर वन
में निकल जाऊँगा।
: चौथा दृश्य :
[छंद और सिद्धार्थ अश्व कंटक को थपकिया रहे हैं।]
छंद : राजकुमार, सारी रात लगातार घोड़े पर यात्रा करते-करते
आपको अब काफी थकान हो गई होगी। अब हम शाक्य राजा की सीमा पारकर मगध राजा
बिंबिसार के राज्य में प्रवेश कर चुके हैं। अब राजा शुद्धोधन के दूत हमें
लौटाकर ले जाने के लिए आएँगे, इसका डर नहीं है। अतः सिद्धार्थ, आप कुछ देर इस
शिला पर विश्राम करें।
सिद्धार्थ : मैं तो थक ही गया, पर मेरे दौड़ते घोड़े के
पीछे दौड़ते हुए छंद, तू भी कितना थक गया है! उसी तरह यह मेरा प्रिय अश्व कंटक
भी कितना थका हुआ दिख रहा है। छंद, मेरे प्रति तुम्हारी एकनिष्ठ और इस अपूर्व
सहायता का यह छोटा सा पुरस्कार लो (उसे रत्नकंकण देता है।)
छंद : नहीं महाराज, सच में ही नहीं। आपने मेरी निष्ठा का
उल्लेख किया। अब तो मुझे यह पुरस्कार लेने में अधिक ही संकोच हो रहा है;
क्योंकि आपके राजत्याग पर और वनगमन पर मेरी निष्ठा थी, इसलिए मैं आया, ऐसा
बिलकुल भी नहीं है। आपके इस साहस, औचित्य के प्रति मेरी निष्ठा पूरी तरह अस्त
हो जाने पर भी मैं पीछे रह नहीं सकता था। इसलिए मैं साथ में आया। मार्ग में
वापस जाने का निश्चय मैं बार-बार कर रहा था। फिर भी आगे ही दौड़ रहा था। ऐसी
बात नहीं कि दौड़ने की इच्छा मन में होने से मैं रुका नहीं, वस्तुतः मैं रुकना
चाहता था। फिर भी मैं दौड़ता रहा, दौड़ता रहा। आपके चरणों का और वचनों का
आकर्षण ही ऐसा कुछ विलक्षण है। अब यही देखिए कि आपके ये रत्नकंकण मुझे लेने की
बिलकुल इच्छा नहीं हो रही है, परंतु महाराज, आपके 'लो' कहते ही मेरे हाथ
आगे पसर जाते हैं। नहीं महाराज, मुझे ये बिलकुल नहीं चाहिए।
(रत्नकंकण ले लेता है।)
सिद्धार्थ : छंद, अब इस घोर वन में मैं अकेला ही प्रवेश
करूँगा, अतः तुम राजधानी लौट जाओ। शुद्धोधन महाराज और मेरी प्रिया यशोधरा, इन
दोनों के लिए तुम मेरा एक संदेश ले जाकर उन्हें दे देना जिससे तुमने मुझे वन
जाने में सहयोग दिया, इस कारण तुमपर होनेवाला उनका क्रोध शांत हो जाएगा।
उन्हें कहना कि 'जिस दिन आपका-हमारा संयोग हुआ उसी दिन वियोग के बीज भी पड़ गए
थे। मैं आपको छोड़कर न भी जाता तो भी मैं और आप हमेशा इकट्ठा ही रहते, ऐसा
नहीं है। कभी तो हमको एक-दूसरे से विदा लेनी ही पड़ती। मृत्यु के परदे के पीछे
मैं पहले जाता तो भी आपको मेरी अंतिम विदाई सहनी ही पड़ती। वैसे ही मृत्यु के
परदे के पीछे आप पहले जाते तो भी मुझे आपकी अंतिम विदाई लेनी ही पड़ती। अतः इस
अवश्यंभावी बात का शोक न करें। मेरे जन्मते ही मैं दिग्विजयी होऊँगा ऐसा
ज्योतिषी ने कहा था। क्षात्र रीति के अनुसार मैं लाख सेना के साथ दिग्विजय के
लिए निकलता तो आप मुझे बड़े गौरव और आनंद के साथ विदा देते। वैसी ही विदा आज
भी आप मुझे दें, क्योंकि आज मैं उस सहस्राधिक मनुष्यों के रक्तपात से रँगे
हुए दुष्ट शस्त्र दिग्विजय की अपेक्षा अति श्लाघ्य और शुभकारी ऐसे एक महान्
शांतिपूर्ण दिग्विजय पर निकला हूँ। मैं दुःख का मूल खोजकर पूरे मानव समाज को
क्लेश मुक्त करने के लिए मृत्यु को ही जीतने निकल रहा हूँ। अत: आप मेरे इस
कार्य के लिए शुभ ही सोचें।'
छंद : महाराज, यह अति उदार संदेश शुद्धोधन महाराज जैसे
विवेकी क्षत्रिय वृद्ध को कदाचित् संतोष कर देगा, पर देवी यशोधरा को संतोष
इससे कैसे होगा? उसके भरे यौवन में आज बिलकुल खालीपन होने वाला है।
सिद्धार्थ : हाय, हाय! सच में आज अभी उधर देवी यशोधरा पलंग
से उठते ही दैनिक स्वभाव के अनुसार, उसके निकट मैं सोया हूँ, ऐसा जानकर
मुझपर अपना हाथ रखने का प्रयास करेगी और वह हाथ नीचे गिर जाएगा। तब मैं नहीं
हूँ, यह जानकर उसके हृदय को जो ठेस लगेगी उसकी वेदना मुझे अभी यहाँ भी हो रही
है। लोक कल्याण के लिए मेरे किए किसी भी त्याग से यह प्रीति त्याग ही अति कठिन
है, इसलिए महान् त्याग है, परंतु यशोधरा, मैं वन में न जाकर तेरे मंदिर में
तुझे प्रेम का पक्का आलिंगन दिए रहूँ। फिर भी तेरे यौवन और सौंदर्य का यह
सुनहला नग, मेरे आलिंगन के कंजूस मूठ से काल चोर छीनकर ले ही जाएगा। यशोधरा,
तेरा यौवन फूटे पात्र की तरह निरंतर झर रहा है। इसलिए तेरे-मेरे और विश्व के
इस दुःख से हमेशा के लिए विदा लेने के लिए अर्थात् तेरे ही चिरंतन कल्याण के
लिए मैं आज तुझे छोड़ रहा हूँ।
छंद, यह मेरा संदेश लो और लौट जाओ। (अपना मुकुट निकालते हुए) और रे
मुकुट, तू भी जा। तेरा भार इस मेरे मस्तक पर से दूर किए बिना विश्व कल्याण का
भार उठाने के लिए वहाँ स्थान कैसे मिलेगा? बचपन से जब-जब मैं कंगाल और श्रमिक
किसान को पसीने से नहाया हुआ देखता था और राज्य के लिए युद्ध में घायल हुए
सैनिक भी देखता था तब-तब मुझे इस राजमुकुट से घृणा होती थी। लगता था कि इस
राजमुकुट में लगे हर निष्क्रिय रत्न में जो तेज चमक रहा है वह उसका न होकर उस
श्रमिक किसान का है। और घायल सैनिक के पसीने और रक्त की बूँद-बूँद के वे भयानक
प्रतिबिंब हैं। राजा की तृष्णा राक्षस जैसी इन मेहनती श्रमिकों के रक्त का
प्राशन करती है और यह मुकुट उस रक्त पीनेवाले राज पिपासा के हाथ का रक्त पीने
का पात्र है। रे मुकुट, तेरे रत्नों की संख्या जितना ही निर्मल पानी की बूँदों
से भरा यह कमंडल और अनाज के दानों से भरी यह अंजुली तुझसे अधिक उपयुक्त है,
क्योंकि उसे हीन-दीन प्यासे पी सकेंगे, भूखे खा सकेंगे, पर मानव की भूख-प्यास
पूरी करने में अक्षम इन चमकदार पत्थरों को रत्न मानकर तुम्हें जिन मूर्ख
आदमियों ने घूरे पर से उठाकर बड़ा बनाया उस घूरे पर ही जाकर गिरो। जाओ
(फेंक देता है।)
और जरदारी कपड़ो, तुम भी जाओ (कपड़े फेंकता है।)
छंद, अब मुझे इतना हलका लग रहा है। निर्धन बेचारों को देखकर आज तक मुझे जो दया
आती थी वह लबार थी, क्योंकि भूखे का, नंगे का दुःख वही जान सकता है जो स्वयं
नंगा है, भूखा है। दुःखियों के दुःख आज मेरे स्वयं पर ओट लेने से, भिखारी से
भी भिखारी हो जाने से उनके दुःखों पर दया करने की वास्तविक पात्रता मुझमें आ गई
और कितना आश्चर्य है कि उस विलासी सुख का त्याग करते ही त्याग का विलासी सुख
मुझे मिला। एक घूँट जल, एक कौर अन्न और अनंत आनंद। (परदे में देखकर)
कौन जा रहा है वह भगवा कपड़ा पहने? क्या वह अपने वस्त्र मुझे देगा?
छंद : अभी, ओ भले आदमी
(व्याध प्रवेश करता है। छंद उसे रोककर कहता है।)
हम आप ही को बुला रहे हैं।
व्याध : फिर आप चूक कर रहे हैं, क्योंकि मैं सभ्य नहीं,
वनवासी हूँ।
सिद्धार्थ : अजी सज्जन!
व्याध : आप भी चूक कर रहे हैं, क्योंकि मैं सज्जन नहीं,
दुर्जन हूँ। छोड़िए सब, मैं व्याध हूँ महाराज।
सिद्धार्थ : पर मैं भी अब महाराज नहीं रहा। इसलिए निवेदन
करता हूँ कि ये अपने भगवे वस्त्र मुझे दे दो।
व्याध : बिलकुल नहीं दूँगा। इन वस्त्रों के कारण ही तो मैं
छिपा रहकर असावधान मृग को मार सकता हूँ और आपके ये कपड़े पहनकर, व्याध का धंधा
करनेवाले ये वस्त्र आपको देकर अपना एक और प्रतियोगी पैदा नहीं करना चाहता।
सिद्धार्थ : उसके लिए तुम डरो नहीं, क्योंकि यद्यपि मैं भी
एक तरह से व्याध का धंधा करनेवाला हूँ, पर फिर भी उसका तुम्हारे धंधे से संबंध
नहीं है। तुम्हारा धंधा मृगया का। मैं तो मृत्यु को ही मारने का धंधा करनेवाला
हूँ। ये भगवा वस्त्र व्याध और विरक्त दोनों को ही एक जैसे उपयोगी हैं, क्योंकि
उसे पहनने से मृग जैसा ही मरण (मृत्यु) भी असावधानी में व्याध के फंदे में
आएगा। दे दो मुझे ये वस्त्र और उसके मूल्य में ये लो राज विलासी जरतारी
वस्त्र! और ये अलंकार भी लो।
व्याध : (लालची,
परंतु आशंकित दृष्टि से देखते हुए। स्वगत)
चुराकर तो नहीं लाया किसीका यह सारा। अन्यथा श्मशान के ये मेरे वस्त्रों के
बदले जरतारी वस्त्र कौन गधा देगा!
छंद : पगले व्याध, डरो मत। ये एक बहुत बड़े धनवान व्यक्ति
होते हुए भी प्रबुद्ध होने लिए संन्यास लेना चाह रहे हैं। इसलिए तुम्हें यह
अमूल्य अवसर मिला है। व्याध का और प्रबुद्ध का यह ऐसा सौदा हजारों वर्षों में
कभी ही होता होगा।
व्याध : (स्वगत)मैं समझता था कि शाक्य राज पुत्र ही
अकेला ऐसा उल्लू है, पर अब ऐसा दिखता है कि ऐसे सिरफिरों की एक जाति ही होगी
इस विश्व में। (प्रकट) अच्छा, दीजिए ये वस्त्र-अलंकार और चलिए चार
कदम आगे। उस घूरे पर और कुछ चिंदियाँ हैं इसी रंग की। वे या ये या सारी ही ले
लो, जितनी ले सको।
(सिद्धार्थ और व्याध अंदर जाकर कपड़े बदल आते हैं। छंद देखता ही रह जाता
है।)
छंद : पर जरतारी वस्त्रों से अब मृग फँसेगा नहीं।
व्याध : ऐसे वस्त्र और अलंकार मिल जाने के बाद मृगों के पीछे
क्यों भागूँगा! अजी पाँच सौ वनसूअर के बराबर है यह एक रत्न। वह मिल जाए तो फिर
वनसूअर के पीछे दौड़ते फिरने के लिए क्या मैं कोई निर्बुद्ध वनसूअर हूँ।
अच्छा, चलूँ अब (लौटता है और कहता है।) अब यह देखो, ये सब बेच लेने
के दस पंद्रह वर्ष बाद मैं फिर से यहाँ आऊँगा। व्याध का धंधा चालू करूँगा। तब
आप भी नए राजवस्त्र और अलंकार पहन फिर से यहाँ आएँ, पहचान रखें और ऐसा वस्त्र
विनिमय बार-बार करते रहें हमसे! (व्याध निकल जाता है।)
सिद्धार्थ : लो हो गया। मैंने अपने पास की स्वार्थ की
चिंदी-चिंदी फेंक दी है। सकल दु:खों का मूल खोजकर उसका उच्छेद कर समस्त प्राणी
जगत् को दुःख मुक्त करने के लिए आज जो मैं यह कदम दुर्गम वन में रख रहा हूँ,
वह सफल होने तक मैं पीछे कदम नहीं लूँगा। कम-से-कम इस कार्य में पराकाष्ठा के
मानवी प्रयास करने से मैं नहीं चूकूँगा। हे देवो! आपके समक्ष ऐसी प्रतिज्ञा कर
यह सिद्धार्थ अपना अर्थ सिद्ध करने के लिए यह महाभिनिष्क्रमण कर रहा है।
[वन में जाता है,परदा गिरता है।]
: पाँचवाँ दृश्य :
[यशोधरा का शयन कक्ष।]
मधुरा : सखी, सिद्धार्थ कपिलवस्तु में न लौटकर परिव्राजक
होकर चले गए। छंद के संदेश के बाद शोकाकुल हुए शुद्धोधन महाराज ने प्रधानजी को
भार्गव आश्रम में सिद्धार्थ को बुलाने भेजा था, पर वे विफल होकर लौट आए। अब
सारी आशाएँ लुप्त हो गई हैं।
यशोधरा : (रोते हुए) मधुरा, सारी आशाएँ लुप्त हो गईं। अपने
यौवन के अंक का प्रारंभ उस स्वयंवर में होकर उसका अंत ऐसे स्वयं त्याग में
हुआ। मेरी प्राप्ति के लिए प्रेम के प्रथम जोश में सिद्धार्थ ने उस शस्त्र
स्पर्धा में स्वयं का प्राण धोखे में डालकर मेरा वरण जितनी उत्कटता से किया
उतनी ही उत्कटता से आज वह प्रेम अस्त होते ही उन्होंने मेरा त्याग करके मेरे
प्राण धोखे में डाल दिए हैं। काममुग्ध युवतियो, जिसे तुम प्रेम-प्रेम कहती हो,
वह ऐसा चंचल होता है। यह ध्यान में रखकर ही उसे अपनाओ तो फिर धोखा नहीं होगा।
अच्छा चलो, लड़कियो, इस जीवन नाटक में यशोधरा का प्रवेश समाप्त हुआ। अब वह
रंगमंच पर रानी के रूप में नहीं आएगी। इसलिए यह मेरे बीते प्रवेश के शय्या
मंदिर का दृश्य, प्रकृति चित्र बदलो। उन तार वाद्यों को, सारंगियों को, जल
तरंग को कहो कि यशोधरा के जीवन का प्रेम संगीत समाप्त हुआ। उसका सुर मौन हो
गया। गीतों के राग भी कुपित होकर वैरागी हो गए।
मधुरा : सखी, इतनी हताश क्यों हो? सिद्धार्थ की तरह पहले
भी बड़े-बड़े राजा विरक्त होकर वन में चले गए थे, उन्होंने साधना समाप्त होते
ही फिर लौटकर अपनी प्रिया के साथ सुखी गृहस्थी बसाई। सिद्धार्थ भी वैसे ही लौट
नहीं आएँगे, यह कैसे मानें?
यशोधरा : मधुरा, तुमने सिद्धार्थ का स्वभाव अभी पहचाना नहीं
और इस यशोधरा का भी नहीं। नाटक में जैसे एक प्रवेश फिर से नहीं होता, भंग हुई
वीणा जैसे फिर से बजती नहीं, वैसे ही हताशा में रति मंदिर से बाहर जानेवाली
यशोधरा फिर से उसमें प्रवेश नहीं करेगी। वह अब व्रतस्थ होकर राजभवन के देव
मंदिर में प्रवेश करेगी और सिद्धार्थ लौट आएँ तो भी उनसे उसी देव मंदिर में
मिलेगी। उनके द्वारा तिरस्कृत इस रति मंदिर में नहीं। इसलिए कहती हूँ-सखी,
उठाओ उन तकियों को, वह रति शय्या समेटो, उस पलंग को खड़ा करो। मेरे पहने हुए
श्वेत परिधान के सिवाय अब मुझे दूसरे किसी भी वस्त्र की आवश्यकता नहीं है।
इसलिए उन मूल्यवान साड़ियों आदि को तुम ले जाओ। जिनके प्रियकर उनसे ऊबकर अभी
दूर नहीं गए हैं, उन्हें दे देना और यशोधरा का संदेश भी कहना कि तुम्हारे
प्रियकर का स्नेहालिंगन जब तक प्रेममुग्ध है तब तक मन की मौज कर लो, क्योंकि
सखियो, प्रेम से बाँधे पुरुषों के हाथ दु:खने लगकर कब वह तुमसे ऊब जाएगा, इसका
कोई नियम नहीं है। ऐसा यशोधरा का अनुभव है।
सभी : देवी, स्वामिनी, सखी, यह विलास भवन?
यशोधरा : नहीं-नहीं, इस विलास भवन की सारी व्यवस्था चलाती
रहो। यह मेरा अकेले का शय्या मंदिर ही बंद करो, पर यहाँ मेरे अकेले की गृहस्थी
नहीं थी। वृक्ष, लता, फूल, पंछी, मदन और रति का यहाँ राज्य था। मुझ अकेली के
रस का विरस हो गया, इसलिए उनका विरस न होने देना। विश्व की मनोरमता में मेरे
जैसा एक दुःखी प्राणी यदि इतनी उजाड़ अव्यवस्था फैला देता है तो अनेक के संसार
उच्छिन्न होने पर सिद्धार्थ जैसे कहते हैं वैसे यह जग वास्तव में केवल दुःखमय
हो जाएगा। इसलिए सखियो, बहुत जतन करो, वृक्षों को पानी दो, वे मोर इस संगम
स्वर चबूतरे पर पंख फैलाए जब विश्राम करते हैं या जब अपनी प्रिया के सामने पंख
फैलाकर नाचने लगते हैं तब उनको विरस न होने देना, नहीं तो वे विरक्त हो
जाएँगे। मैना, बुलबुल, हंस को अनारदाना समय पर खिलाया करना। मेरे भूखे मन के
सामने से जैसे सुख की थाली खींच ली गई वैसे उनके सामने से नहीं खींचना। अच्छा,
अब मुझे विदा करो। जिस रति मंदिर का राजा चला गया उसकी रानी भी जानी ही चाहिए।
उठाओ वह सामान, गिराओ रानी यशोधरा के रति मंदिर पर अंतिम परदा, गिराओ।
दूसरा अंक
: पहला दृश्य :
चित्रगुप्त : हे स्वामिन, यमराजजी!
यमराज : चित्रगुप्त, ऐसा कौन सा महत्त्वपूर्ण समाचार लाए हो
कि इतनी आतुरता और वेग से यहाँ दौड़े आए?
चित्रगुप्त : गयाश्रम में बोधि वृक्ष के नीचे राजपुत्र
सिद्धार्थ गौतम अपनी चरम साधना के लिये बैठे हैं। उस साधना का परिपाक उस समाधि
में होनेवाला है जिसमें प्रकट होनेवाले महान् धर्मसत्य का प्रभाव पूरी मनुष्य
जाति पर स्थापित होने की संभावना प्रबल है। मनुष्य जाति का कल्याण साधनेवाले
इस महान् क्षण का परिणाम युगों-युगों की कायापलट करनेवाला है। इसीलिए अध:पतन
की सारी शक्तियों का स्वामी देवरिपु 'मार' वासना, तृष्णा, मोह, मत्सर आदि
अपने सारे साथियों सहित उस महान् क्षण में विघ्न उत्पन्न करने के लिए
सिद्धार्थ पर हमला करने जा रहा है। पहले साम-दाम-दंड-भेद में सिद्धार्थ न अटका
तो अंत में दंडशक्ति की सहायता से वह देवरिपु 'मार' सिद्धार्थ का नाश करना
चाहता है। आप धर्मराज हैं। इस धर्मशत्रु, कलिपुरुष 'मार' के इस पापी प्रयास
को आप विफल करें।
यमराज : समय पर सूचित किया। जब तक वह देवरिपु मार केवल
साम-दाम-दंड-भेद के लालच से सिद्धार्थ को भटकाना चाहता है तब तक मैं बीच में
नहीं बोलूँगा, क्योंकि उससे राजपुत्र सिद्धार्थ के दृढ़ व्रत की परीक्षा ही
होगी, पर यदि यह पापाचारी 'मार' सिद्धार्थ की चरम समाधि बल से भंग करना
चाहेगा या उसका नाश करने का प्रयास करेगा तो मैं स्वयं उसे दंडित कर सिद्धार्थ
का संरक्षण करूँगा।
: दूसरा दृश्य :
[बोधि वृक्ष के नीचे एक उच्च शिला पर सिद्धार्थ ध्यानस्थ बैठे हैं,उनके
चारों ओर झीना श्वेत एवं दिव्य परदा लटक रहा है। देवरिपु मार और उसकी सहयोगिनी
वासना उस पटल को दूर करके उस परदे के अंदर जाने का प्रयास कर रहे हैं।]
मार : क्या आश्चर्य है! राजपुत्र सिद्धार्थ के आगे जो उनकी
पवित्रता का श्वेत परदा है उसे दूर कर मैं अंदर जा नहीं पा रहा हूँ। किसी भी
तरह उसे एक ओर करके मैं सीमा का उल्लंघन नहीं कर पा रहा हूँ। इस मर्यादा के
निकट जाना संभव नहीं। यहीं से उसे कुछ सुनाया जा सके तो सुनाना चाहिए।
(जोर से चिल्लाकर)
राजपुत्र सिद्धार्थ, राजकुलोत्पन्न क्षत्रिय हो। मैं विनाशक शक्तियों का
स्वामी हूँ। मुझसे देव भी हार चुके हैं। तेरी तपस्या से मैं प्रसन्न हो गया
हूँ। मैं तेरी सहायता करता हूँ। चलो, उठो। किसी भी चक्रवर्ती ने जो आज तक
किया नहीं, ऐसी दिग्विजय करो। वह सागर और सागर के पार स्थित वे पुरातन द्वीप
मनुष्यों को अभी अज्ञात हैं। ऐसे नूतन द्वीपांतर खंड विश्व इन सबके सम्राट् पद
का राजमुकुट मैं तुम्हें प्रदान कर देता हूँ। चलो, ऐसा केवल बैठे रहकर तू
बहुत हुआ तो एक वैरागी हो पाएगा, पर केवल उतने के लिए तुमने जन्म नहीं लिया
है। तुम्हारे जन्मते ही राज ज्योतिषी ने भविष्य कथन किया था कि तुम चक्रवर्ती
राजा होगे। लो, फिर अशेष द्वीपों के राजमुकुटों को ढालकर निर्मित यह महान्
चक्रवर्तित्व का राजमुकुट मैं तुम्हें दे रहा हूँ। लो, सिद्धार्थ¨¨
सिद्धार्थ :
(ध्यानावस्था में आँखें कुछ मिचमिचा कर)
मेरी समाधि को कौन भंग करने की चेष्टा कर रहा है। मैं तुझे पहचानता हूँ मार!
तेरे उस राजमुकुट का हर माणिक, हीरा, रत्न तृष्णा की असह्य, अशमनीय अग्नि से
भरा हुआ है। जीवित अवस्था में यह ऐसी सुलगती चिता सिर पर लेकर तुम ही घूमा
करो। आकाश में नया आनंददायी चंद्र उग आने पर जैसे सारा तप्त त्रिभुवन उस
सुधाकर की कौमुदी में नहाकर शीतल हो जाता है। वैसे ही मेरे चिद् आकाश में इस
प्रसादमय विवेक का उदय होते ही मेरी अंतरात्मा संतृप्त, शीतल एवं शांत हो गई
है। एक जीव को भी मैं दुःख से, अशेष दुःख से मुक्त कर ऐसा परमानंद दे सका तो
मैं अपने इस जन्म का और इस साधना का जितना सार्थक हुआ मानूँगा उतना लाखों
लोगों को पीड़ा देकर प्राप्त किए हुए इस पूरे पृथ्वी के चक्रवर्तित्व की
प्राप्ति से भी नहीं मानूँगा। मार, तू दूर जा, चला जा।
[तभी मार धक्का लगने जैसा होकर लड़खड़ाता पीछे आता है। वासना उसको
सँभालती है और स्वयं आगे जाकर श्वेत परदे से लगकर सिद्धार्थ को कहती है।]
वासना : राजपुत्र, आपने 'मार' को जो मार दिया वह यथार्थ ही
था। भीति संकुल और प्रपीड़क राज्य तृष्णा में सुख कैसे संभव है, परंतु
नयनानंददायी चंद्र उदय होते ही उसकी कौमुदी में नहाते हुए जो सुख होता है ऐसा
जो आपने अभी कहा, वह सुख भी उतना आह्लादकारी नहीं है। उस कौमुदी में नहाते
हुए एकांत में, कमल कोमल कामिनी के कामलोलुप आलिंगन में जो सुख होता है वही
सारे सुखों में सबसे आह्लादकारी होता है। आओ सिद्धार्थ, मेरे आलिंगन में वह
सुख भोग लो, आओ! मैं त्रैलोक्य सुंदरी हूँ, तुम त्रैलोक्य वीर हो। मैं
तुम्हारा वरण करना चाहती हूँ, मेरे आलिंगन में वह आह्लादकारी सुख चिरंतन तुम
भोगो। आओ!
सिद्धार्थ : चिरंतन? आज तुम यौवन से भरी हो, पर तेरी यह
लावण्यमयी काया जब बुढ़ापे से कुबड़ी, अंधी, घिनौनी, घृणास्पद¨¨!
वासना : उस डर की चिंता न करो। मेरा यौवन चिरंतन रहेगा, ऐसा
मुझे वरदान प्राप्त है।
सिद्धार्थ : फिर भी क्या? तुम्हें वैसा वरदान मिला है तो भी
तुम मेरा वरण करना चाहती हो, जिसको ऐसा वरदान मिला हुआ नहीं है। मैं कभी तो
बूढ़ा होऊँगा ही, रोगी होऊँगा ही, मेरे सारे अंग, उपांग जीर्ण-शीर्ण, शिथिल
होंगे ही। तब मेरी कामेच्छा बुझी हुई अग्नि जैसी राख की तरह हो जाएगी। तू मेरे
लिए निर्माल्यवत् हो जाएगी।
वासना : परंतु¨¨
सिद्धार्थ : चुप, एक अक्षर भी अधिक मत बोलो। जिसे स्वयं के
शरीर से घृणा हो जाती है, ऐसे दो घृणास्पद देह के घिनौने आलिंगन का लालच मुझे
दिखानेवाली यह दूसरी-तीसरी और कोई न होकर, हाँ, पहचाना मैंने उसे, यह वासना
ही होगी। वासना, तुम चली जाओ।
[वैसे ही धक्का लगकर वासना थरथर काँपती लुढ़कती मार से जाकर सट
जाती है।]
वासना : हाय, हाय! पहचान लिया इसने। मार, मेरी रक्षा करो।
यह मुझे जलाकर नष्ट कर देगा।
मार : कौन किसको भस्म करता है, वह अभी दिख जाता है। कांचन,
कामिनी-मेरे इन दो अमोघ शस्त्रों की धार अवश्य इसके सामने भोथरी हो गई।
साम-दाम से यह वश में नहीं आ रहा। फिर भी क्या है? उठो, विश्व की विनाशक
शक्तियो, उठो। बादलो, आँधियो, फुफकारते, आग उगलते उठो। बिजली के चाबुक से
प्रकृति की पीठ छीलते हुए उठो। यदि इसकी साधना आज भंग न हुई तो इसे मेरे नाश
का उपाय मिल जाएगा और ये मुझे भस्म कर देगा। उसके पहले ही प्रलय में जलाकर
भस्म कर दिया जाए इस भंगड़ को। फू-फू! फू-फू!!
[वैसे ही अकस्मात् दृश्यांतर होकर बादल,बिजली,गड़गड़ाहट
का शोर मच जाता है। वन में आग लग जाती है और कड़कड़ाहट के साथ पेड़ गिरने लगते
हैं। उस समय यमराज प्रकट होकर अपने दूतों से'मार'और'वासना'को
धकेलते-धकेलते पीछे ले जाते हैं।]
सिद्धार्थ : गर्जन, भर्जन, देवरिपु मार चिल्लाकर मेरी
साधना के इस दृढ़ासन को हिलाना चाहता है, पर प्रलय हो या प्रभव हो, यह आसन
अडिग ही रहेगा। जब तक मेरी साधना का यह आसन जगत् कल्याण के रहस्य का परम मंगल
ज्ञानपीठ नहीं हो जाता, अपनी साधना सफल होने तक मैं अटल रहूँगा।
इहासने शुष्यतु मे शरीरम्।
त्यगस्थिमांसं प्रलयं च यातु॥
अप्राप्य बोधिं बहुजन्मदुर्लभाम्।
नैहासनात् कायमितः चलिप्यति॥
ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः।
ॐ सर्वदिकं शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः॥
[सिद्धार्थ समाधिस्थ हो जाते हैं। आँधी शांत हो जाती है। ज्वाला पीछे हटकर
सिद्धार्थ के चारों ओर इंद्रधनुष जैसी नम और शीतल प्रभा पकड़कर तैरने लगती
है। सारा वन प्रफुल्ल एवं प्रसन्न दिखने लगा। किंचित् कालानंतर अंतरिक्ष
से पुष्प वृष्टि होने लगी और मधुर गीत बजने लगा-
'सिद्धार्थ! तुम धन्य हो गए! तुम बुद्ध हो गए! ॐ नमो भगवते
बुद्धाय। ॐ नमो भगवते शुद्धाय! ॐ नमो भगवते प्रबुद्धाय! नमो नमः।]
सिद्धार्थ : (किंचित् आँखें खोलकर,
तर्जनी पर तर्जनी रखकर)
मिल गया! सुख-दुःख के द्वंद्व से मुक्त होने का मार्ग मिला। छूटा, अनादि
जन्म-मरण के भवचक्र से मैं छूट गया! वह समाप्त होते ही, वह स्नेहमय होते ही
दीपक जैसे अपने में ही बुझ जाता है, वैसे ही वासना क्षय होते ही, क्लेश क्षय
होते ही यह मेरा अहंकार मुझमें ही अपने आप बुझ गया। सविकल्प नहीं, निर्विकल्प
नहीं, केवल निर्वाण! केवल शून्य!
गृहकारक दिट्ठोसि पुनर्गेहं न काहसि।
सर्वास्ते फासुका भन्ना गृहकूटं च नश्यति॥
[उस उच्च शिला के आसन से उठकर सिद्धार्थ नीचे उतरते हैं। प्रसन्न वदन से
किंचित् काल इधर-उधर देखते हैं और विचार करते-करते बीच में ही खड़े रहते
स्वगत बोलते हैं।]
नमक पानी में घुल जाता है, वैसे अब इस दिव्य, अमृतशील, आनंदमय समाधि में ही
मुझे यह देह गल जाने तक पिघल जाने का मन होता है; परंतु जन्म, व्याधि, जरा,
मृत्यु के महा दुःख से जकड़े इस जगत् को देखकर हृदय दया से द्रवित हो जाता है,
करुणा से घबरा जाता है। इसलिए इस अशेष दुःख से इस प्राणिजगत् को मुक्त करने के
लिए मैं अपने इस निरुपायाधिक कैवल्यानंद को भी लोक कल्याण की उपाधि यह देह है,
तब तक रहने ही दूँगा। सुनो, सकल प्राणीजनो, इस अशेष दुःख से मुक्त होने का
उपाय है। और वह भी स्वयं को स्वयं से ही मिल जाने जितना सुलभ! इस अशेष दुःख का
मूल है-तृष्णा! उस मूल कारण का क्षय, वह तृष्णा क्षय, माने अशेष दु:खों का
आत्यंतिक नाश, उसका उपाय है-त्याग!
न कर्मणा न प्रजया धनेन।
त्यागेनैकेन अमृतत्यमानशुः॥
त्याग, संन्यास, संसृति का संन्यास, स्वर्ग संन्यास, स्वत्व का भी
संन्यास! अब ईश्वर की बाधा न हो, यज्ञ का बखेड़ा न हो, मानव का डर न हो,
दानवों का भी डर न हो-बहुत क्या, ईश्वर का भी डर न हो। आज मनुष्य ईश्वर की
दासता से भी मुक्त हो गया। यह अभयदान पूरी मानव जाति को देने के लिए और इन
बुद्ध सिद्धांतों का प्रचार सारे जगत् में करने के लिए मैं प्रतिज्ञा करता हूँ
कि-
चरिष्यामि चारिकं बहुजनहिताय
बहुजन सुखाय लोकानुग्रहाय च।
[सिद्धार्थ जाने लगते हैं। आकाश से फिर पुष्प वृष्टि होती है। अंतरिक्ष से
मंजुल संगीत झरने लगता है। 'शुभास्ते पन्थान: सन्तु। सन्तु शिवाः ॐ नमो भगवते
बुद्धाय, नमो भगवते शुद्धाय, नमो प्रबुद्धाय। नमो नमः॥']
[परदा गिरता है।]
तीसरा अंक
: पहला दृश्य :
[यशोधरा,मंजुला और मधुरा।]
यशोधरा : सखी मधुरा, लल्ला राहुल कहाँ खेल रहा है? उसे
यहाँ बुलाओ।
मधुरा : यशोधरा, तुम्हें तो बहुत ही चिंता लग गई है अपने इस
बच्चे की, राजकुमार राहुल की। अब वह आठ वर्ष का हो गया है। अब तो वह साथियों
के साथ मस्त होकर ऐसे ही देर तक खेलेगा। इकलौते बच्चे को क्या माताएँ अपने
पैरों से बाँधकर रखती हैं!
यशोधरा : मधुरा, दूसरी माताओं के जीवन साथी मुझ जैसी को
छोड़कर गए नहीं होते। वे भाग्यवान महिलाएँ अपने पति से एकांत में निर्भयता से
हँसने-बोलने के लिए अपने बच्चों को स्वयं दूर भेज देती हैं। जाओ 'साथियों के
साथ थोड़ी देर तक' ऐसा कहकर, पर मधुरा, मेरा साथी, मेरा सिद्धार्थ¨¨न करूँ
मैं वह स्मृति, न करूँ मैं आशा।
मधुरा : नहीं रानीजी, अब उन्हें केवल सिद्धार्थ के संबोधन
से न पुकारें। अब लोग कहते हैं कि वे देवत्व पद को पाकर बुद्धत्व पा गए हैं।
यज्ञ की अग्नि में भुनते पशुओं को झुलसता देखकर वे यज्ञ संस्था का निषेध कर
रहे हैं, परंतु यशोधरा, जीव यज्ञ की अग्नि में ही केवल झुलसता है, ऐसा तो
नहीं है। वियोग की अग्नि भी उसी तरह ही आदमी को जलाकर राख कर देती है। इसलिए
वियोग की आग में धर्मपत्नी को, वृद्ध पिता को व नवजात पुत्र को और हम सब सगों
को झुलसता छोड़कर उनकी यातना की सीढ़ी पर ही जो बुद्धत्व संपादन किया जा सकता
है वह भी उतना ही निषेध योग्य क्यों है? मेरे हृदय में उस परमपूज्य पुरुष के
लिए बहुत आदर है, पर असह्य दु:ख के कारण ऐसे क्रोध के विचार कभी-कभी चित्त में
आए बिना नहीं रहते।
यशोधरा : मैं भी जब वियोग के दुःख में ऐसी ही व्याकुल हो
जाती हूँ तब मन में यह कहती हूँ कि सिद्धार्थ पर तुम्हारा प्रेम है न! फिर
सिद्धार्थ को, तेरे भगवान् के जी को जिस तरह से सुख हो, उसी में तू भी सुख
मानती रह। लल्ला राहुल उसी की मूर्त स्मृति है। वह आया और उन्होंने संसार
त्याग किया। सिद्धार्थ के वियोग के दिन गिनने की राहुल एक मणिमाला, रत्नमाला
ही तो है। वह स्मरण