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रचनावली

हरिऔध् ग्रंथावली
खंड : 6
भाषा की परिभाषा

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध
संपादन - तरुण कुमार

अनुक्रम तृतीय खंड पीछे     आगे

गद्य-मीमांसा                

आदि-काल

विकास-काल                

विस्तार-काल                      

प्रचार-काल                      

वर्तमान-काल  

 

प्रथम-प्रकरण

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गद्य-मीमांसा

संस्कृत का एक वाक्य है-'गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति'। इसका अर्थ यह है कि गद्य ही, विद्वानों की सम्मति में, कवियों की कसौटी है। प्रकट रूप में यह वाक्य कुछ विचित्रा जान पड़ता है। परन्तु वास्तव में उसके भीतर एक गहरा मर्म है। साधाारणतया अपने भावों और विचारों को कवि पद्य-बध्द भाषा में व्यक्त करता है, पद्य में उसकी निरंकुशता के लिए यथेष्ट अवकाश है, तुक, छन्द आदि बंधानों में बँधो हुए होने के कारण उसे अनेक असुविधााओं का सामना करना पड़ता है और विचारों तथा भावों की अभिव्यक्ति में उसकी कठिनाइयों पर दृष्टिपात करके पाठक उसकी अनेक त्राुटियों को क्षमा कर सकता है। परन्तु गद्य में अपनी योग्यता और प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए लेखक को इतना चौड़ा मैदान मिलता है कि उसको कोई अवसर अपनी असमर्थता के निराकरण का नहीं रह जाता। न यहाँ छंद की व्यवस्था उसकी वाक्यावली के पाँवों को जकड़ती है न तुक का बखेड़ा उसकी प्रगति में बाधाा डालता है। जी चाहे बड़े वाक्य लिखिये, जी चाहे छोटे, न कल्पना की उड़ान में आपको कोई रुकावट रहेगी और न अलंकारों की संयोजना में किसी प्रकार की बाधाा। अतएव यह स्पष्ट है कि संस्कृत का उक्त कथन सत्यता मूलक है।

मनुष्य उस आनंद को प्राय: छन्द, लय, संगीत, आदि से अलंकृत वाक्यावली ही में व्यक्त करता है जो संसार में चारों ओर दिखायी पड़ने वाले सौन्दर्य के कारण उसके हृदय में उत्पन्न होता रहता है। दैनिक जीवन में आठों पहर प्रत्येक विचार को पद्य-बध्द भाषा में व्यक्त करना उसके लिए संभव नहीं। साधाारण बातचीत के लिए समाज में कामकाज के लिए पद्य का उपयोग नहीं किया जा सकता। प्रत्येक जाति के जीवन के प्रारंभिक-काल में, निस्संदेह पद्य की ही ओर विशेष प्रवृत्तिा देखी जाती है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि उस समय गद्य का व्यवहार ही नहीं होता था। वास्तव में अपने शैशव-काल में प्रत्येक जाति उन साधानों और सुविधााओं से रहित होती है जो एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ मिलन अधिाक मात्राा में संभव बना सकती है, और न समाज में दैनिक जीवन की कार्यावली ही में इतनी जटिलता का समावेश हुआ रहता है कि अपनी सिध्दि के लिए वह अधिाक-संख्यक मनुष्यों के सहयोग की अपेक्षा करे। ऐसी अवस्था में न तो एक मनुष्य के विचारों का दूसरे मनुष्य के विचारों के साथ संघर्ष होता है और न वह आघात प्रतिघात होता है जो सामूहिक जीवन के अन्योन्याश्रित होने का एक स्वाभाविक परिणाम है। इसी कारण्ा प्रत्येक जाति के साहित्य में सबसे पहले पद्य का और बाद को क्रमश: गद्य का विकास हुआ है।

मनुष्य को अन्य पशुओं की भाँति, सबसे पहले अपने लिए आवश्यक भोजन की चिन्ता करनी पड़ती है। किन्तु उसकी इस चिन्ता में एक विशेषता है। एक असाधाारण बुध्दि उसे अन्य पशुओं से पृथक् करती है। इसी बुध्दि के परिण्ाामस्वरूप वह वर्तमान ही की चिन्ता से मुक्त होकर संतुष्ट नहीं हो सकता, भविष्य के लिए भी प्रयत्न करता रहता है। उसके स्वभाव की यह विशेषता उसे चिरकाल तक अव्यवस्थित जीवन नहीं व्यतीत करने देती। क्रमश: स्त्राी-पुत्रा आदि से संयुक्त होकर एक समुचित स्थान में गृहस्थ जीवन व्यतीत करने में वह अपने जीवन की सफलता का अनुभव करता है। उसी के ऐसे अनेक परिवारों के एकत्रा हो जाने से अथवा एक ही परिवार के कालान्तर में विकसित हो जाने से एक ग्राम उत्पन्न हो जाता है। शत्राु से अपनी रक्षा करने के लिए इस प्रकार के समस्त ग्राम अपना संगठन व्यक्तियों और परिवारों के पारस्परिक सहयोग पर अवलम्बित रखते हैं। इस सहयोग का क्षेत्रा जितना ही व्यापक होता जाता है, मानव-प्रकृति की विभिन्नताओं के कारण पारस्परिक सामंजस्य के मार्ग में उतनी ही पेचीदगी बढ़ती जाती है। फलत: इस सामंजस्य की सिध्दि के लिए मानव मस्तिष्क तरह-तरह के व्याख्यानों में प्रवृत्ता होता है। ये व्याख्यान जीवन के व्यावसायिक अंग से इतना अधिाक सम्पर्क रखते हैं कि वे काव्य के विषय हो ही नहीं सकते। वे सफलतापूर्वक जब चलेंगे तब उसी ढंग से जिस ढंग से वे बातचीत में व्यक्त होते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि बातचीत में वे गद्य रूप ही में प्रकट होते हैं और इस कारण गद्य ही में उनकी अभिव्यक्ति का एक विशेष संस्कार हो जाता है, जिससे पाठक को अपने विचार हृदयंगम कराने में लेखक को सुविधाा होती है। उक्त व्याख्यान, राजनीति शास्त्रा, अर्थशास्त्रा, समाजशास्त्रा आदि विषयों से सम्बन्धा रखते हैं। काल पाकर व्यक्तियों, परिवारों, जातियों का इतिहास लिखा जाता है, जिसमें उन बातों की चर्चा की जाती है जो याद रहकर भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को किसी भ्रम, प्रमाद आदि से बचा सकती है। क्रमश: इतिहास, भूगोल, ज्योतिष, गणित, यात्राा आदि विषयों की ओर भी धयान जाता है और गद्य ही में इनके लिखे जाने की विशेष उपयुक्तता होने के कारण क्रमश: गद्य का विकास हो जाता है।

मानव समाज के विकास की प्रारम्भिक अवस्था में कहानियाँ पद्य ही में लिखी जाती हैं। ये कहानियाँ प्राय: वही होती हैं,जो बच्चों की कल्पना पर प्रभाव डालती हैं। किंतु ज्यों-ज्यों समाज विकसित होता है त्यों-त्यों बच्चों की भी प्रवृत्तिा सरल बोलचाल की भाषा में कहानी सुनने और पढ़ने की हो जाती है। विकसित समाज में व्यक्तियों को अधिाकार औरर् कत्ताव्य का,दैनिक जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं के क्षेत्रा में सामंजस्य करने की इतनी प्रबल आवश्यकता खड़ी हो जाती है कि कहानी का सहारा लिये बिना काम चलना कठिन हो जाता है। यह कहानी भी पद्य में किसी भाँति लिखी ही नहीं जा सकती, उसका रूप और प्रकार ही कुछ ऐसा विभिन्न होता है कि पद्य के ढाँचे को वह स्वीकार ही नहीं कर सकती।

समाज का एवं व्यक्ति का जीवन किस आदर्श के साँचें में ढाला जाय-इस प्रश्न की आकर्षकता भी कभी घट नहीं सकती। मृत्यु क्या है! मनुष्य उससे क्यों डरता है? उसका इस भय से किस प्रकार छुटकारा हो सकता है? किस प्रकार का जीवन स्वीकार करने से मनुष्य को अधिाक से अधिाक आनन्द मिल सकता है-इन समस्याओं की व्याख्या जितनी उत्तामता से गद्य में हो सकती है उतनी पद्य में नहीं। आयुर्वेद, विज्ञान, व्याकरण आदि विषयों के सम्बन्धा में भी यही बात कही जा सकतीहै।

हिन्दी-साहित्य में गद्य का विकास बहुत विलम्ब से हुआ। इसका प्रधाान कारण यह है कि शासकों की ओर से हिन्दी गद्य के विकसित होने के लिए सुविधााएँ नहीं प्रस्तुत की गईं। हिन्दू राजाओं ने अपने दरबार में हिन्दी कवियों को तो आश्रय दिया, किन्तु कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे हिन्दी गद्य को उभरने का अवसर मिलता। इसका एक कारण यह हो सकता है कि हिन्दू समाज का जीवन इतनी संकुचित परिधिा के भीतर व्यतीत हो रहा था कि अधिाकांश में उसका धयान ही उन दिशाओं में आकर्षित नहीं हो सकता था जिनमें गद्य की प्रगति होती है। हिन्दी गद्य का विकास, संभव है, मुगल राजत्वकाल में कुछ अग्रसर होता, किन्तु टोडरमल ने अदालतों से हिन्दी का बहिष्कार करके उसे जनता की दृष्टि में प्राय: सर्वथा अनुपयोगी सिध्द कर दिया। ऐसे समाज में जिसमें संस्कृत की तुलना में हिन्दी यों ही निरादृत थी, जिसमें केशव, तुलसी आदि समर्थ कवियों ने भी विद्वानों के विरोधा की अवहेलना सकुचाते हुए ही किया और जिसमें अब तक अधिाकांश में उतना ही गद्य साहित्य प्रस्तुत हो सका था जितना भक्तों और धाार्मिक नेताओं ने अपने श्रध्दालु, किन्तु साधाारण विद्या-बुध्दि के श्रोताओं और पाठकों के लिए टीका-टिप्पणी अथवा कथा वात्तर्ाा के रूप में प्रस्तुत किया, कचहरियों से हिन्दी का बहिष्कार बहुत ही हानिकारक मनोवृत्तिा को उत्पन्न करने वाला सिध्द हुआ। यदि हिन्दी को राजाश्रय प्राप्त रहता तो सम्भवत: हिन्दू-समाज में हिन्दी का सम्मान थोड़ा-बहुत बढ़ता और उससे संस्कृत के धाुरंधार विद्वानों को भी हिन्दी में शास्त्राीय विवेचना आदि में प्रवृत्ता होने का प्रलोभन प्राप्त होता। प्रतिभाशाली हिन्दू लेखकों ने जिस प्रकार उर्दू के विकास में सहायता पहुँचाई, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि समाज में हिन्दी की तिरस्कृत अवस्था भी हिन्दी-गद्य की प्रगति में अत्यन्त बाधाक सिध्द हुई।

प्रस्तुत साहित्य के पठन-पाठन एवं आलोचना-प्रत्यालोचना से भी गद्य-साहित्य का निर्माण होता है। हिन्दी भाषाभाषी प्रदेश के शासकों ने अपनी प्रजा के कल्याणार्थ हिन्दी के विद्यालय स्थापित करने की ओर भी कभी धयान नहीं दिया। सभी साहित्यों में कहानी और उपन्यास सहज ही बहुत अधिाक लोकप्रियता प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु जब तक इनके प्रचार के साधान उपलब्धा न हों तब तक इनका पूरा प्रभाव पड़ना कठिन हो जाता है। प्रचार की कठिनाइयों के कारण यह स्पष्ट था कि कहानियों और उपन्यासों के लेखकों को जनता से कोई सहायता नहीं मिल सकती थी। रहे राजे-महाराजे और कोई-कोई हिन्दी कवियों के संरक्षक मुसलमान राजकुमार और नवाबगण सो उन्हें शृंगारिक अथवा अन्य कविताओं से ही इतना अवकाश नहीं था कि वे कहानी और उपन्यास-रचना को प्रोत्साहन देकर उसकी ओर समाज की रुचि को बढ़ाते। कहानी और उपन्यास का विकास न होने का एक अन्य कारण भी है और वह यह कि ऍंगरेजी साहित्य के साथ सम्पर्क होने के पहले हिन्दी लेखकों के सम्मुख कहानी और उपन्यास-रचना का वह आदर्श उपस्थित नहीं था जो समाज की दैनिक समस्याओं को हल करने की ओर विशेष धयान देता है, जो कुप्रथाओं पर प्रहार करके नवीन संस्थाओं और नवीन विचार-शैलियों को रचनात्मक दिशा में अग्रसर करता है। संस्कृत के 'कादम्बरी' और 'दशकुमार चरित्रा' नामक उपन्यासों से यथेष्ट उपयोगी आधाार नहीं मिल सकता था और न'हितोपदेश' और 'पंचतंत्रा' की कहानियाँ विशेष रूप से मार्ग-प्रदर्शक हो सकती थीं। ऐसी अवस्था में हिन्दी गद्य के विकास में विलम्ब होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं।


 

 

 

 

द्वितीय प्रकरण

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आदि-काल

जैसे राजपूत नरेशों के दरबार में हिन्दी पद्य का आदिम विकास हुआ वैसे ही गद्य का उद्भव भी हुआ। बारहवीं ई. शताब्दी के बहुत पहले ही हिन्दी में पुस्तकों की रचना होने लगी थी। किन्तु ये पुस्तकें पद्य ही में लिखी जाती थीं। हिन्दी बोलचाल की भाषा थी, किन्तु बोलचाल का ऐसे गम्भीर अथवा उपयोगी विषयों से सम्बन्धा नहीं था कि वह लिपिबध्द कर ली जावे। धाार्मिक आन्दोलनों का भी सम्बन्धा अधिाकतर जनता से नहीं रहता था। हिन्दू आचार्यों ने भी उस समय इस बात का प्रयत्न नहीं किया कि जन-साधाारण के लिए धाार्मिक सिध्दांत सुलभ हो जायँं। राजनीतिक हलचल होने पर भी समाचारों के प्रचार का कोई साधान न होने के कारण इस दिशा में भी गद्य की प्रगति असम्भव थी। शासन-पध्दति एकाधिापत्यमूलक होने के कारण जहाँ कहीं हिन्दी-भाषी नरेशों के राज्य थे वहाँ भी अनेक व्यक्तियों अथवा व्यक्ति समूहों के वाद-विवाद का कोई अवसर नहीं था। ऐसी परिस्थिति में हमें हिन्दी गद्य का आदिम स्वरूप यदि उन थोड़े से परवानों के रूप में मिलता है जो हिन्दी नरेशों ने अपने कृपा-पात्राों के लिए जारी किये तो आश्चर्य ही क्या? रावल समरसिंह और महाराज पृथ्वीराज के ऐसे नौ दान-पत्रा अब तक उपलब्धा हो सके हैं। उनमें से दो को मैं नीचे लिखता हूँ। आप उनकी भाषा पर दृष्टिपात करें-

1. ''स्वस्ति श्री श्री चीत्राकोट महाराजाधिाराज तपेराज श्री श्री रावल जी श्री समरसी जी बचनातु दा अमा आचारज ठाकर रुसीकेष कस्य थाने दलीसु डायजे लाया अणी राज में ओषद थारी लेवेगा, ओषद ऊपरे माल की थाकी है ओजनाना में थारा बंसरा टाल ओ दुजी जावेगा नहीं और थारी बैठक दली में ही जी प्रमाणे परधाान बरोबर कारण देवेगा और थारा वंस क सपूत कपूत वेगा जी ने गाय गोणों अणी राज में खाप्या पाप्या जायेगा और थारा चाकर घोड़ा को नामी कठोर सूं चल जायेगा ओर थूं जमाखातरी रीजो मोई में राज थान बाद जो अणी परवाना री कोई उलंगण करेगा जी ने श्री एक लींग जी की आण है दुवे पंचोली जानकी दास सं. 1139 काती बदी3।''

2. ''श्री श्री दलीन महाराजँ धाीराजंनं हिन्दुस्थानं राजंधाानं संभरी नरेस पुरबदली तषत श्री श्री माहानं राजंधाीराजंनं श्री पृथीराजी सु साथंनं आचारज रुषीकेस धानंत्रिा अप्तन तमने का का जीनं के दुवा की आरामं चओजीन के रीजं में रोकड़ रुपीआ5000'' तुमरे आहाती गोड़े का षरचा सीवाअ आवेंगे। खजानं से इनको कोई माफ करेंगे जीन को नेर को के अंधाकारी होंवेंगे सई दूबे हुकुम के हउमंत राअ संमत 1145 वर्षे आसाढ़ सुदी 13।''

इस प्रकार के परवाने हिन्दू राज दरबारों में राज्य की ओर से निकला करते थे। इनकी भाषा तो राजस्थानी है ही, किंतु उसमें एक बात उल्लेखनीय है। उसमें 'लेवेगा', 'जायगा', 'करेगा', 'लाया' आदि खड़ी बोली की क्रियाओं का व्यवहार किया गया है। ये लेख आनंद संवत् के अनुसार क्रमश: सं. 1939 और सं. 1945 में लिखे गये। इनमें 90 जोड़ देने से विक्रमी सं क्रमश:1229 और 1235 हुआ। अतएव स्पष्ट है कि ईस्वी सन् के अनुसार ये बारहवीं शताब्दी में पड़ते हैं। इस समय के पूर्व भारतवर्ष में मुसलमानों और हिन्दुओं का सम्पर्क हो चुका था, विशेषकर मुसलमानों और राजपूतों का सम्बन्धा युध्द के कारण प्राय: होता ही रहता था। खड़ी बोली की जिन क्रियाओं की चर्चा ऊपर की गई है वे इसी सम्पर्क का फल जान पड़ती हैं।

राजस्थानी बोली के इस गद्य को अधिाक विकसित होने का कोई अवसर नहीं मिला। कारण वही क्षेत्रा-विस्तार का अभाव। इस ओर से निराश होकर हिन्दी गद्य को किसी अन्य दिशा में पनपने की प्रतीक्षा करनी पड़ी। चौदहवीं शताब्दी में ऐसा समय भी आ गया, सातवीं शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक बौध्दों के असंयत जीवन के कलुषित आदर्श से हिन्दू समाज म्लान हो रहा था। स्वामी शंकराचार्य ने बौध्दमत के पाँव तो उखाड़ दिये थे, किन्तु उसके मूल सिध्दान्तों, उपदेशों आदि को भूलकर उच्छृंखल जीवन व्यतीत करने वाले सिध्दों तथा अन्य साधाुओं पर से समाज की श्रध्दा का सर्वथा लोप करा देने का अवकाश और अवसर उन्हें प्राप्त नहीं हो सका था। यह काम सन् 1350 ई. के लगभग महात्मा गोरखनाथ ने किया। उन्होंने सदाचार और धार्म के तत्तव की ओर समाज का धयान आकर्षित किया और इसी सूत्रा से हिन्दी के गद्य-साहित्य की सृष्टि कर प्रथम हिन्दी-गद्य-लेखक के रूप में वे कार्य-क्षेत्रा में अवतीर्ण हुए।

गुरु गोरखनाथ की पद्य की भाषा से गद्य की भाषा में कुछ विशेषता है। पद्य की भाषा में उन्होंने अनेक प्रान्तों के शब्दों का प्रयोग किया है। किन्तु गद्य की भाषा में यह बात नहीं है, वह कहीं-कहीं राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा में है। उसमें संस्कृत तत्सम शब्दों का अधिाक प्रयोग अवश्य मिलता है। यह बात आप नीचे के अवतरण को देखकर सहज में ही समझ सकेंगे-

''सो वह पुरुष संपूर्ण तीर्थ अस्नान करि चुकौ, अरु संपूर्ण पृथ्वी ब्राह्मननि कौ दै चुकौ, अरु सहò जग करि चुकौ, अरु देवता सर्व पूजि चुकौ, अरु पितरनि को संतुष्ट करि चुकौ, स्वर्गलोक प्राप्त करि चुकौ, जा मनुष्य के मन छन मात्रा ब्रह्म के विचार बैठो।''

''श्री गुरु परमानन्द तिनको दण्डवत है। हैं कैसे परमानन्द आनन्द स्वरूप है सरीर जिन्हि कौ। जिन्हीं के नित्य गायै ते सरीर चेतन्नि अरु आनन्दमय होतु है। मैं जु हौं गोरष सो मछन्दरनाथ को दण्डवत करत हौं। हैं कैसे वै मछन्दरनाथ। आत्मा जोति निश्चल है, अन्तहकरन जिन्हकौ अरु मूल द्वार तैं छह चक्र जिन्हिं नीकी तरह जानैं। अरु जुग कालकल्प इनि की रचना तत्तव जिनि गायो। सुगन्धा को समुद्र तिन्हि कौ मेरी दण्डवत। स्वामी तुम्हें सतगुरु अम्है तौ सिष सबदएक पुछिबा दया करि कहिबा मनि न करिबा रोस।''

उक्त अवतरणों में 'सम्पूर्ण', 'प्राप्त', 'मनुष्य', 'कल्प', 'स्वरूप', 'नित्य', 'सन्तुष्ट', 'स्वर्ग', 'ब्रह्म', 'निश्चल', 'समुद्र', 'रचना', 'तत्तव' आदि शब्द संस्कृत के हैं। 'पुछिबा', 'कहिबा', 'अम्है' आदि शब्द राजस्थानी बोली के हैं। अवतरण का शेष भाग प्राय: पूरा का पूरा शुध्द ब्रजभाषा में लिखा गया है।


 

 

 

 

तृतीय प्रकरण

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विकास-काल

गोरखनाथ के बाद लगभग दो शताब्दियाँ गद्य-रूपी नवजात पौधो के लिए मरुभूमि सी सिध्द होकर बीत गयीं। सोलहवीं शताब्दी में महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य ने राधाा-कृष्ण विषयक भक्ति का एक प्रबल òोत उत्तारी भारत में प्रवाहित किया। इस अपूर्व प्रवाह ने हिन्दू-समाज के हृदय को इतना अधिाक आकर्षित किया कि थोड़े ही काल में कृष्णावत सम्प्रदाय की विशाल मण्डली उत्तारीय भारत में अतुल प्रभाव विस्तार करती जनसमुदाय को दृष्टिगत र्हुई। उसी समय महाप्रभु के पुत्रा गोस्वामी बिट्ठलनाथ ने'राधााकृष्ण विहार' नाम की एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक की भाषा ब्रजभाषा है, किंतु कहीं-कहीं उसमें अन्य प्रान्तीय शब्दों का भी समावेश कर लिया गया है। निम्नलिखित अवतरण देखिए-

''जम के सिषर पर शब्दायमान करत है, विविधा वायु बहत है, हे निसर्ग स्नेहार्द्र सषी कूं संबोधान प्रिया जू नेत्रा कमल कूं कछुक मुद्रित दृष्टि होय कै बारंबार कछु सखी कहत भई यह मेरो मन सहचरी एक क्षण ठाकुर को त्यजत भई।'' इस छोटे से अवतरण में 'शब्दायमान', 'त्रिाविधा', 'निसर्ग', 'स्नेहार्द्र', 'नेत्रा', 'मुद्रित', 'दृष्टि', 'क्षण' आदि संस्कृत शब्दों का प्रयोग स्वतंत्राता के साथ किया गया है। श्रीमद्भागवत का प्रचार और राधाा-कृष्ण्ा-लीला का साहित्य क्षेत्रा में विषय के रूप में प्रवेश करना ही इस संस्कृत-शब्दावली की लोकप्रियता तथा उसके फलस्वरूप हिंदी गद्य में उसके स्थान पाने का कारण जान पड़ता है। प्रान्तीय भाषाओं के प्रभाव भी उक्त अवतरण में दिखायी पड़ते हैं। 'पै' के स्थान में 'पर' और 'को', 'कौ', अथवा 'कौ' के स्थान पर 'कू'का प्रयोग ऐसे ही प्रभावों का परिणाम है। गोस्वामी विट्ठलनाथ के पुत्रा गोस्वामी गोकुलनाथ ने भी 252 एवं 84 वैष्णवों की वात्तर्ाा नामक दो ग्रन्थ बनाये जिनमें उन्होंने बहुत मधाुर भाषा में उक्त वैष्णवों के सम्बन्धा में कुछ ज्ञातव्य बातें लिखीं। गोस्वामीजी की भाषा के दो नमूने दिये जाते हैं-

1. ''ऐसो पद श्री आचार्य जी महाप्रभून के आगे सूरदास जी ने गायौ से सुनि के श्री आचार्य जी महाप्रभून ने कह्यौ जो सूर ह्नै के ऐसो घिघियात काहै को है कछू भगवल्लीला वर्णन करि। तब सूरदास ने कह्यौ जो महाराज हौं तो समझत नाहीं। तब श्री आचार्यजी महाप्रभून ने कह्यो जो जा स्नान करि आउ हम तोकों समझावेंगे तब सूरदास जी स्नान करि आये तब श्री महाप्रभूजी ने प्रथम सूरदास जी को नाम सुनायौ पाछें समर्पण करवायौ और फिर दशम स्कंधा की अनुक्रमणिका कही सो ताते सब दोष दूर भये। ताते सूरदासजी कौ नवधाा भक्ति सिध्द भई। तब सूरदास जी ने भगवल्लीला वर्णन करी।''

2. ''सो श्री नन्दग्राम में रहतो हतो। सो खंडन ब्राह्मण शास्त्रा पठयो हतो। सो जितने पृथ्वी पर मत हैं सबको खण्डनकरतो ऐसो वाको नेम हतो। याही ते सब लोगन वाको नाम खंडन पारयो हतो। सो एक दिन श्री महाप्रभू जी के सेवक वैष्णवन की मण्डली में आयो। सो खंडन करन लाग्यो। वैष्णवन ने कही जो तेरो शास्त्राार्थ करने होवै तो पंडितन के पास जा हमारी मण्डली में तेरे आयबे को काम नाहीं। इहाँ खंडन मण्डन नहीं है।''

3. ''नन्ददास जी तुलसीदास के छोटे भाई हते। सो बिनकूं नाच तमासा देखबे को तथा गान सुनबे को शोक बहुत हतो।''

गोस्वामी गोकुलनाथ की भाषा में प+ारसी के शब्द भी आये हैं-यह बात ऊपर दिये गये तृतीय अवतरण के 'तमासा' और'शोक' आदि शब्दों को देखने से प्रमाणित होती है। उसमें गोस्वामी विट्ठलनाथ की अपेक्षा अधिाक विशुध्द ब्रजभाषा लिखने का प्रयत्न भी किया गया है। यह बात गोस्वामी विट्ठलनाथ जी और गोकुलनाथ जी के कुछ क्रियापदों की तुलना करने से स्पष्ट हो जायगी। जहाँ गोस्वामी विट्ठलनाथ ने 'त्यजत भई' और 'कहत भई' आदि लिखा है वहाँ गोकुलनाथ ने 'लगनो', धाातु के भूतकाल के रूप में 'लगत भई' न लिखकर 'लाग्यौ' ही लिखा है। फिर भी दोनों में एक समानता अवश्य है और वह है खड़ी बोली के शब्दों की ओर कम या अधिाक मात्राा में प्रवृत्तिा। उनकी नीचे की पंक्तियों के क्रियापदों को भी देखिए। चिद्दित शब्द स्पष्ट रूप से खड़ी बोली के हैं।

''सो एक दिन नन्ददास जी के मन में ऐसी आई। जो जैसे तुलसी दास जी ने रामायण भाषा करी है। सो हमहूँ श्री मदभागवत भाषा करें। ये बात ब्राह्मण लोगन ने सुनी तब सब ब्राह्मण मिलकें श्री गुसाईंजी के पास गये। सों ब्राह्मणों ने बिनती करी। जो श्री मदभागवत भाषा होयगी तो हमारी आजीविका जाती रहेगीA

गोस्वामी गोकुलनाथ ने भी 'जितने', 'होवे', 'नहीं' आदि शब्दों का समावेश करके उनके प्रति अपनी अनुकूलता प्रकट की है।

खड़ी बोली की ओर इस प्रवृत्तिा के बढ़ने के कारण थे। मुसलमान शासकों ने हिन्दू जनता के भावों से परिचय प्राप्त करने के लिए न केवल हिन्दी बोलने की ओर धयान दिया था बल्कि उसमें रचनाएँ करना भी प्रारम्भ किया था। उन्हें किसी विशेष प्रान्तीय भाषा से द्वेष न था न असाधाारण अनुराग किन्तु सबसे पहले उनका सम्पर्क ऐसे प्रान्तों से हुआ जिनमें खड़ी बोली का विशेष प्रचार था। इसमें सन्देह नहीं कि अमीर खुसरो ने खड़ी बोली और ब्रजभाषा दोनों में कविता की, किन्तु ब्रजभाषा के काव्य-विषयक संस्कार के कारण ही कभी-कभी वे उसकी ओर झुक जाते थे। जहाँ कहीं पहेलियों, मुकरियों आदि पर उनकी लेखनी चली है वहाँ खड़ी बोली का अधिाक मात्राा में शुध्द और सरस रूप ही दीख पड़ता है। मुसलमानों की खड़ी बोली के प्रति इस अनुकूल प्रवृत्तिा ने हिन्दी भाषी प्रान्तों की जनता में इस बोली के अनेक शब्दों को क्रमश: लोकप्रिय बना दिया, और जनता में आदृत होकर धीरे-धीरे कथावाचकों, महात्माओं और अन्त में लेखकों की रचनाओं में भी वे शब्द पहुँचे। नीचे सन् 1572 के लगभग 'चन्द छन्द बरनन की महिमा' नामक पुस्तक लिखने वाले गंगाभाट की भाषा के दो नमूने देखिए। उनमें आपको गोकुलनाथ जी की भाषा की अपेक्षा अधिाक खड़ी बोली के शब्दों का व्यवहार मिलेगा-

1. ''तब दामोदर दास हरसानी ने बिनती कीनी जो महाराज आप याकों अंगीकार कब करोगे तब श्री आचार्य जी महाप्रभून ने दामोदरदास सों कह्यो जो यासों अब वैष्णव को अपराधा पड़ैगो तौ हम याकों लक्ष जन्म पाछें अंगीकार करेंगे।''

2. सिध्दि श्री 108 श्री श्री पातसाहि जी श्री दलपति जी अकबर साह जी आम खास में तषत ऊपर विराजमान हो रहे और आम खास भरने लगा है जिसमें तमाम उमराव आय आय कुर्निश बजाय जुहार कर के अपनी अपनी बैठक पर बैठ जाया करे अपनी-अपनी मिसिल से।''

उक्त अवतरणों में 'करोगे', 'कहैंगे', 'ऊपर' हो रहे, 'भरने लगा है', 'जिसमें, जुहार करके','अपनी' आदि शब्दों पर धयान देने से यह बात स्पष्ट हो जायगी। 'आम' 'खास', 'तमाम', 'उमराव', 'कुर्निश', 'मिसिल' आदि शब्दों के समावेश से हिन्दी लेखन-शैली पर राजदरबार के प+ारसी भाषा विषयक प्रभाव की सूचना मिलती है।

सत्राहवीं शताब्दी के आरम्भ में भक्तवर नाभादास ने गोस्वामी बिट्ठल नाथ की भाषा से मिलती जुलती भाषा लिखी। उनकी निम्नलिखित पंक्तियों के रेखांकित शब्दों की ओर आप धयान दें।

तब श्री महाराज कुमार प्रथम वशिष्ट महाराज के चरन छुई प्रणाम कर भये। फिर अपर वृध्द समाज तिनको प्रनाम करत भये। फिर श्री राजाधिाराज जू को जोहार करि कै श्री महेन्द्र नाथ दशरथ जू के निकट बैठत भयेA

इसी शताब्दी के प्रथम चरण में महात्मा तुलसीदास द्वारा लिखित एक पंचनामा मिलता है जिसमें उन्होंने यत्रा-तत्रा फारसी भाषा के शब्दों का भी व्यवहार किया है। उसकी कतिपय पंक्तियों को देखिए-

सं. 1669 समये कुआर सुदी तेरसी बार शुभ दिने लिखीत पत्रा अनन्दराम तथा कन्हई के अंश विभाग पूर्व मु आगे जे आग्य दुनहु जने माँगा जे आग्य भै शे प्रमान माना दुनहु जने विदित तप+सील अंश टोडरमलु के माह जे विभाग पदु होत रा।...मौजे भदेनीमह अंश पाँच तेहिमँह अंशदुइ आनन्दराम तथा लहरतारा सगरेउ तथा छितुपुरा अंश टोडरमलुक तथा तमपुरा अंश टोडरमल की हील हुज्जती नाश्ती।

'तप+सीलु', 'हुज्जती', आदि शब्द प+ारसी के हैं और तुलसीदास जी द्वारा उनका ग्रहण उनकी उस प्रवृत्तिा का सूचक है जिसका अनुसरण उन्होंने यत्रा-तत्रा अपनी पद्यात्मक रचनाओं में भी किया है।

महाकवि देव का काव्य-रचना काल सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों तक रहा है। इन्होंने गद्य में भी कुछ लिखा है। इनकी गद्य की भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की बहुलता दर्शनीय है। निम्नलिखित पंक्तियों को देखिए-

''महाराज राजाधिाराज ब्रजजन समाज विराजमान चतुर्दश भुवन विराज वेदविधिा विद्या सामग्री सम्राज श्री कृष्णदेव देवाधिा देव देवकी नंदन जदुदेव यशोदानन्द हृदयानंद कंसादि निकंदन वंसावतंस अंसावतार सिरोमणि विष्ठपत्राय निविष्ट गरिष्ट पद त्रिाविक्रमण जगत्कारण भ्रम निवारण मायामय विभ्रमण सुररिषिसंगमन राधिाका रमण सेवक वरदायक गोपी गोप कुल सुखदायक गोपाल बाल मंडली-नायक अघघायक गोवर्धान धाारण महेन्द्र मोहापहरण दीन जन सज्जन सरण ब्रह्मविस्मय विस्तरण परब्रह्म जगज्जन्म मरण दु:ष संहरण अधामोध्दरण विश्वभरण बिमल जस: कलिमल बिनासन गरुड़ासन कमल नयन चरण कमल जल त्रिालोकी पावन श्री वृन्दाबन विहरण जय जय।

देव महाकवि थे और साधाारण सी बात को भी अत्यन्त अलंकृत शैली में लिखने की उनकी प्रवृत्तिा सर्वथा स्वाभाविक थी।

सत्राहवीं शताब्दी के अन्य लेखक, जिनके गद्य का कुछ परिचय हमें मिलता है, बनारसीदास और जटमल हैं। बनारसीदास की भाषा में तो खड़ी बोली की कुछ क्रियाओं का असंदिग्धा प्रयोग भी मिलता है। वे लिखते हैं-

''सम्यग् दृष्टि कहा का सुनो। संशय, विमोह, विभ्रम तीन भाव जामैं नाहीं सो सम्यग् दृष्टी। संशय, विमोह, विभ्रम कहा ताको स्वरूप दृष्टान्त करि दिखाइयतु है सो सुनो।''

इस वाक्य के भीतर 'सम्यग्', 'दृष्टि', 'संशय', 'विमोह', 'विभ्रम', 'स्वरूप', 'दृष्टान्त' आदि संस्कृत के तत्सम शब्दों के प्रयोग के साथ-साथ 'कहा', 'सुनो' आदि क्रियाओं का प्रयोग धयान देने योग्य है। गोरा बादल की कथा लिखने वाले जटमल की रचना में भी यही बात पाई जाती है। उनकी भाषा के दो नमूने देखिए-

1. ''हे बात की चीतौडगड़ को गोरा बादल हुआ है, जिनकी वार्ता की किताब हिंदवी में बनाकर तय्यार करी हैं गोरे का भव रत आवे का बचन सुनकर आपने पाबन्द की पगड़ी हाथ में लेकर बाहा सती हुई सो सिवपुर में जाके बाहा दोनों मेले हुबे।''

''उस जग आलीषान बाबा राज करता है। मसीह का लड़का है सो सब पठानों में सरदार है, जयसे तारों में चन्द्रमा सरदार है ओयसा वो है।''

2. ''ये कथा सोल: सै असी के साल में फागुन सुदी पूनम के रोज बनाई। ये कथा में दो रस हैं-वीर रस व सिंगार रस है,सो कथा मोरछड़ो नाँव गाँव का रहने वाला कवेसर। उस गाँव के लोग भोहोत सुखी हैं। घर घर में आनन्द होता है कोई घर में प+कीर दीखता नहीं।''

उक्त अवतरण में 'हुआ है', 'सुनकर', 'लेकर', 'हुई', 'जाके', 'हुवे', 'करता है', 'बनाई', 'रहने वाला', 'होता है', 'दीखता नहीं'आदि खड़ी बोली के क्रिया पदों और संज्ञा-शब्दों का व्यवहार हुआ है। साथ ही 'किताब', 'षाबन्द', 'सरदार' आदि प+ारसी शब्दों का समावेश इसमें भी किया गया है। 'जयसा' और 'ओयसा' 'जैसा' और 'वैसा' के बहुत निकट है, यह स्पष्ट है। यदि थोड़े से राजस्थानी प्रयोगों की ओर धयान न दिया जाय तो यह अवतरण खड़ी बोली का गद्य कहा जा सकता है।

सोलहवीं शताब्दी में धाार्मिक आन्दोलनों के कारण जनता और महात्माओं का जो सम्पर्क बढ़ा था, वह सत्राहवीं शताब्दी में आकर शिथिल पड़ गया। इस शिथिलता के कारण तथा अन्य किसी विचार-प्रवाह के अभाव में गद्य के सामने फिर एक रुकावट खड़ी हो गई। किन्तु वह ठहर न सकी, कारण यह हुआ कि हिन्दी के कुछ महाकवियों की रचनाओं का बहुत प्रचार हो जाने के कारण जनता की उनके प्रति कुछ जिज्ञासा बढ़ी, कुछ इस कारण से कुछ धाार्मिक संस्कारों से प्रेरित होकर कुछ काव्य-कौशल के सम्बन्धा में अधिाक परिचय प्राप्त करने की इच्छा से 'रामचरित-मानस', 'कवि-प्रिया' आदि माननीय ग्रंथों पर टीेकाओं की माँग हुई। इन टीकाओं के रचयिताओं ने यद्यपि गद्य की भाषा का परिष्कार करने में कोई सफलता लाभ नहीं की,तथापि अन्धाकारमयी रात्रिा में नक्षत्राों की भाँति उजाला फैलाने का उद्योग जारी रखा।

सत्राहवीं शताब्दी में केशवदास कृत कवि-प्रिया की टीका सुरतिमिश्र ने सन् 1710 के लगभग लिखी। उनकी भाषा के नमूने देखिए-

1. ''सीसफूल सुहाग अरु बेंदा भाग ये दोऊ आये पाँवड़े सोहे साने के कुसुम तिन पर पैर धारि आये हैं।''

2. ''कमल नयन कमल से हैं नयन जिनके कमलद वरन कमलद कहिये मेघ को वरण है स्याम स्वरूप है कमल नाभि श्रीकृष्ण को नाम ही है कमल जिनकी नाभि ते उपज्यो है कमलाप कमला लक्ष्मी ताके पति हैं तिनके चरण कमल समेतु गुन को जाप क्यों मेरे मन में रहो।''

अठारहवीं शताब्दी में भिखारीदास ने काव्य-रचना के अतिरिक्त जो थोड़ा-बहुत गद्य लिखा उसका नमूना नीचे दिया जाता है-

''धान पाये ते मूर्ख हूँ बुध्दिवन्त ह्नै जातु है और युवावस्था पायेते नारी चतुर ह्नै जाति है यह व्यंग्य है। उपदेश शब्द लक्षण सो मालूम होता है और वाच्य हूँ मैं प्रगट है।''

इसी शताब्दी में किशोरदास ने 'शृंगार-शतक' की टीका लिखी। इनका कुछ विशेष परिचय नहीं प्राप्त है। इन्हें कुछ लोग सत्राहवीं शताब्दी में उत्पन्न बतलाते हैं। इनकी भाषा का नमूना देखिए-

''तब इतने बीच कस्यप की स्त्राी दिति कस्यप के आगे ठाढ़ी भई ठाढ़े ह्नै करि कहनि लगी कि अहो प्राणेश्वर कस्यप देषतु अदितिहिं आदि दै जितीक मेरी सब सपत्नी हैं सु तिन सपत्नीन के पुत्रान कौ मुषु देषतु मेरे परमु संताप होतु है तब यह सुनि कस्यप यह विचारी कि स्त्राी की संगति अर्थु, धार्मु, काम मोछ होतु है। अरु स्त्राी की संगति ग्रहस्थु और तिनिहुँ आश्रमनि की पालना करतु है। अरु अपुन संसार समुद्र के पार होतु है।''


 

 

 

 

चतुर्थ प्रकरण

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विस्तार-काल

उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य को सबल बनाने के लिए खूब उद्योग किया गया। इसके पूर्वार्ध्द में उसे विभिन्न मार्गों से विस्तार प्राप्त हुआ और उत्तारार्ध्द में वह समुन्नति की ओर अग्रसर हुआ। इसी से हमने पूर्वार्ध्द को विस्तारकाल माना है और उत्तारार्ध्द को उन्नतिकाल।

मैं यह कह चुका हूँ कि सत्राहवीं और अठारहवीं शताब्दी में टीकाकारों ने हिन्दी गद्य के मैदान को उत्सन्न हो जाने से बहुत कुछ बचाया। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में भी उनकी एक श्रेणी कार्य करती दृष्टिगोचर होती है। इन टीकाकारों में जानकीप्रसाद और सरदार कवि मुख्य थे। जानकीप्रसाद की भाषा का एक नमूना देखिए-

1. बालक जैसे पग से दावि प( कहे कीच को पेलि के पाताल को पठावत है तैसे ये (गनेश जी) कलुष जे पाप हैंतिनका पठावत हैं। इहाँ गजराज को त्याग करि बालक सम यासों कह्यो, पिर्निंी पत्राादि तोरन मेें बालक का उत्साह रहत है तैसे गणेश जू को विपत्यादि विदारण में बड़ो उत्साह रहत है कौतुक ही विदारत हैं।

स्वभावत: हिन्दी के इन टीकाकारों ने संस्कृत के टीकाकारों का पदानुसरण किया, क्योंकि उनके सामने संस्कृत ही की टीकाओं का आदर्श उपस्थित था। हिन्दी की इन टीकाओं की भाषा जो विशेष जटिल हो गयी है उसका कारण बहुत कुछ इस संस्कृत शैली का अनुसरण है। मैं यह कह आया हूँ कि ब्रजभाषा गद्य सबल आन्दोलनों और महापुरुषों के विचार प्रकट करने का साधान होने के अभाव में परिष्कार से वंचित रहा। यहाँ यह भी कह देना चाहता हूँ कि क्रमश: समय का प्रवाह भी उसे ऐसे अवसर देने के प्रतिकूल हो गया था। इसका कारण है क्रमश: खड़ी बोली की क्रियाओं और संज्ञा-शब्दों का उर्दू के सहयोग से बहुत अधिाक लोकप्रियता प्राप्त कर लेना। सरकार की कृपा से उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में उर्दू का प्रवेश कचहरियों में हो गया था, सर्वसाधाारण का सम्बन्धा कचहरी से होता ही है, ऐसी अवस्था में उर्दू से उनका प्रभावित होना स्वाभाविक था। मुसलमान लेखक अपना रंग अलग जमा रहे थे। प्रोफेसर मुहम्मद हुसेन आजाद के निम्नलिखित अवतरण को देखिए। उसमें पूर्वकालिक हिन्दी गद्य का कायापलट मूर्तिमन्त होकर विराजमान है।

फूलों के गुच्छे पड़े झूम रहे हैं, मेबेदाने जमीन को चूम रहे हैं। नीम के पत्ताों की सब्जी और फूलों की सफेदी बहारपर है। आम के मौर में फूलों की महक आती है। भीनी-भीनी बू जी को भाती है। जब दरख्तों की टहनियाँ हिलती हैं, मौलसिरी के फूलों का मेंह बरसता है, फल फलारी की बौछाड़ हो जाती है। धाीमी-धाीमी हवा उनकी बू बास में लसी हुई रविशों पर चलती है। टहनियाँ ऐसी हिलती हैं, जैसे कोई जोबन की मतवाली अठखेलियाँ करती चली जाती है। किसी टहनी में भौरें की आवाज किसी में मक्खियों की भनभनाहट, अलग ही समाँ बाँधा रही है। परिन्द दरख्तों पर बोल रहे हैं और कलोल कर रहे हैं।''मुसलमान लेखकों ने फारसी और अरबी के शब्दों का सम्मिश्रण करके खड़ी बोली को खूब माँजा, राजाश्रय भी उसको प्राप्त हो ही गया था, ऐसी दशा में ब्रजभाषा गद्य को उससे सफलतापूर्वक भिड़ सकने का अवसर ही नहीं रह गया। खड़ी बोली के विशेष बलशाली हो जाने का एक कारण यह भी था कि उसका प्रचार किसी प्रान्त विशेष तक परिमित नहीं था। मुसलमानों का शासन,शासन नहीं तो प्रभाव अनेक शताब्दियों तक भारतवर्ष के प्राय: समस्त भागों पर पड़ा। इसलिए मुसलमानों द्वारा प्रभावित खड़ी बोली को, जिसका नाम कालान्तर में उर्दू पड़ गया, प्राय: समस्त प्रान्तों में वह अनुकूलता प्राप्त हुई जो ब्रजभाषा-गद्य को अपने सर्वोच्च गौरव के दिनों में भी नहीं मिल सकी। धीरे-धीरे अनेक हिन्दू लेखकों ने भी मुसलमान लेखकों द्वारा प्रस्तुत भाषा में रचना आरंभ की। मुंशी सदासुख लाल 'नियाज', जो अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम दशम में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नौकरी में थे और चुनार में काम करते थे, उन हिन्दू लेखकों में से एक थे, जिन्होंने उर्दू और फारसी में रचनाएँ कीं। मुन्शी जी भगवद्भक्त थे, जहाँ उन्होंने अधिाकांश परिश्रम उर्दू और फारसी ही में किया, वहाँ भगवद्भजन के उद्देश्य से श्री मद्भागवत का अनुवाद हिन्दी में भी किया। उनका यह अनुवाद 'सुख सागर' के नाम से प्रसिध्द है। सुखसागर की भाषा का एक नमूना देखिए-

''यद्यपि ऐसे विचार से हमें लोग नास्तिक कहेंगे, हमें इस बात का डर नहीं। जो बात सत्य होय उसे कहा चाहिए कोई बुरा माने कि भला माने विद्या इसी हेतु पढ़ते हैं कि तात्पर्य इसका (जो) सतोवृत्तिा है वह प्राप्त हो और उससे निज स्वरूप में लय हूजिए। इस हेतु नहीं पढ़ते हैं कि चतुराई की बातें कह के लोगों को बहकाइये और फुसलाइये और सत्य छिपाइयेव्यभिचार कीजिये और सुरापान कीजिये, और धान द्रव्य इकठौर कीजिये और मन को जो तमोवृत्तिा से भर रहा है, निर्मल न कीजिये। तोता है सो नारायण का नाम लेता है, परन्तु उसे ज्ञान तो नहीं है।''

उर्दू लिखने में मँजी हुई लेखनी से लिखा हुआ होने पर भी फारसी का एक शब्द इस अवतरण में नहीं दिखायी पड़ता। इसका कारण धाार्मिक संस्कार था जो फारसी शब्दों का समावेश करने के अनुकूल नहीं था। मुन्शी सदासुख लाल ने एक ओर तो कथा-वार्ता की पूर्व शैली के अनुसार कुछ प्रचलित शब्दों और वाक्यों को ग्रहण किया, दूसरी ओर खड़ी बोली की क्रियाओं,सर्वनामों और संज्ञा शब्दों को। इस संयोग ने सोने में सुहागे का काम किया।

सैयद इन्शा अल्ला खाँ के पूर्वज समरकंद से भारत में आये थे। वे पहले तो मुगल दरबार के आश्रित होकर रहे किंतु जब मुग़ल साम्राज्य का अन्त हो गया तब इन्शा के पिता दिल्ली से मुर्शिदाबाद चले गये। इन्शा की शिक्षा बहुत अच्छी हुई। अल्प वय में वे फारसी और उर्दू में अच्छी कविता करने लगे थे। इनकी विलक्षण प्रतिभा ने हिन्दी गद्य में भी अपनी विलक्षणता दिखलायी। ब्रजभाषा के गद्य में कथा-वार्ता का एकदेशीय विकास हुआ था। अब यदि खड़ी बोली में मुन्शी सदासुख लाल ने धाार्मिक कथा का वर्णन किया तो इन्शा अल्ला खाँ ने बहुत ही रोचक और सरल तथा मुहावरेदार ठेठ भाषा में प्रेम-कहानी लिखी, जिसकी लोकप्रियता का क्षेत्रा स्वभावत: बहुत चौड़ा होता है, और जो अधिाकाधिाक प्रचलित होकर गद्य के स्वरूप को निखारने में बहुत बड़ा काम करती है। इन्शा की भाषा के दो नमूने देखिए-

1. 'एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने धयान में चढ़ी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिन्दवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो...एक कोई बडे पढ़े-लिखे पुराने धुराने, डाँग, बूढ़े घाग यह खटराग लाये...और लगे कहने, यह बात होती दिखायी नहीं देती। हिन्दीपन भी न निकले और भाषापन भी न हो। बस जैसे भले लोग-अच्छों से अच्छे-आपस में बोलते-चालते हैं ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँव किसी की न पड़े, यह नहीं होने का।'

2. ''जब दोनों महाराजों में लड़ाई होने लगी, रानी केतकी सावन-भादों के रूप में रोने लगी।''

3. ''इस सिर झुकाने के साथ ही दिन-रात जपता हूँ उस अपने दाता के भेजे हुए प्यारे को।''

4. ''सिर झुका कर नाक रगड़ता हूँ, उस अपने बनाने वाले के सामने जिसने हम सबको बनाया है और बात की बात में वह कर दिखाया कि जिसका भेद किसी ने न पाया।''

इन्शा अल्ला की भाषा में जहाँ सरलता है, जनता की दैनिक बोलचाल की भाषा से शब्दावली चुनने की प्रवृत्तिा है, वहाँ उनकी शैली पर फारसी का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। तीसरे अवतरण में आप देखेंगे कि वाक्य की वर्तमानकालिक सकर्मक क्रिया जपता हूँ पहले लिखी गई है और उस क्रिया का कर्म 'उस अपने दाता के भेजे हुए प्यारे को' बाद को। भारतीय शैली में कर्म पहले लिखा जाता है और उसकी क्रिया बाद को। चौथे अवतरण्ा में 'नाक रगड़ता हूँ' पहले लिखकर 'उस अपने बनाने वाले के सामने जिसने हम सबको बनाया' लिखना भी प्राय: उक्त शैली का ही अनुसरण है।

इंशा की भाषा में जीवन है, चंचलता है-वह जीवन और चंचलता जो प्रेम-कथा को अत्यन्त सरस और आकर्षक बना देती है। कपितय आलोचकों ने इंशा की भाषा में गूढ़ विषयों के प्रतिपादन की क्षमता का अभाव बतलाया है। यह बात सच है। उनकी भाषा अपने ही आनन्द के उन्माद से नृत्य करती-सी चलती है। शब्द-विन्यास अनुप्रास से अलंकृत हैं, जिससे वाक्यों के शरीर में एक अपूर्व सौष्ठव दृष्टिगोचर होता है। पुराने-धाुराने, डाँग, घाग, खटराग, 'पुट न मिले', 'कली के रूप में खिले', 'हिन्दवी छुट और किसी बोली का पुट' आदि प्रथम अवतरण के रेखांकित शब्दों को देखकर आपको मेरे इस कथन की सत्यता ज्ञात हो जायगी। इन सब बातों के अतिरिक्त इंशा ने जिस बहुत बड़ी विशेषता का हिन्दी गद्य में समावेश किया, वह है मुहावरों और कहावतों का प्रयोग, निम्नलिखित वाक्यों के चिद्दित शब्दों और पदों को देखिए-

1. 'जिसका जी हाथ में न हो, उसे ऐसी लाखों सूझती हैं।'

2. 'चूल्हे और भाड़ में जाय यह चाहत...'

3. 'अब मैं निगोड़ी लाज से कुट करती हूँ।'

4. 'मैं कुछ ऐसा बड़बोला नहीं जो राई को पर्वत कर दिखाऊँ और झूठ-सच बोल कर उँगलियाँ नचाऊँ और बेसिर बेठिकाने की उलझी-सुलझी बातें पचाऊँ।'

5. 'दहना हाथ मुँह पर फेर कर आपको जताता हूँ, जो मेरे दाता ने चाहा तो वह ताव भाव और कूद-फाँद और लपक-झपक दिखाऊँ जो देखते ही आपके धयान का घोड़ा, जो बिजली से भी बहुत चंचल चपलाहट में है, अपनी चौकड़ी भूल जाय।'

6. अब कान लगा के, ऑंखें मिला के, सन्मुख हो के टुक इधार देखिए, किस ढब से बढ़ चलता हूँ और अपने फूल की पंखड़ी जैसे होठों से किस रूप के फूल उगलता हूँA

संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग सर्वथा त्याग कर, अरबी फारसी के शब्दों से मुँह मोड़ कर, केवल तद्भव शब्द विशिष्ट ठेठ भाषा में कहावतों आदि का आश्रय लेकर इंशा ने जिस चमत्कार की सृष्टि की, वह उस समय के हिन्दी गद्य के लिए एक अपूर्व बात थी। उनकी भाषा ने आगे के लेखकों के लिए सरल और मुहावरेदारभाषा का एक सुंदर आदर्श उपस्थित किया। किन्तु उसका अनुसरण नहीं हो सका, कारण इसका यह है कि वह गढ़ी भाषा है और उसमें चलतापन अथवा प्रवाह भी नहीं पाया जाता। वह बोलचाल की भाषा भी नहीं है, और न उसमें जैसी चाहिए वैसी लचक है। परन्तु पहले पहल खड़ी बोली का एक उल्लेख-योग्य आदर्श उपस्थित कर के इंशा अल्लाह खाँ ने अपनी उद्भाविनी प्रतिभा का पूर्ण परिचय दिया है।

हिन्दी गद्य के विस्तार का तीसरा द्वार एक अन्य दिशा से खुला। जिस प्रेरणा से अमीर खुसरो जैसे लेखक हिन्दी-साहित्य-विकास के प्रारम्भिक काल में हिन्दी की ओर प्रवृत्ता हुए थे, ठीक उसी प्रकार की प्रेरणा से हिन्दी-पद्य के विकास का यह नया अवसर प्राप्त हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने कर्मचारियों को देशी भाषाओं का ज्ञान कराना भी आवश्यक समझ पड़ा। इस उद्देश्य से उसने कलकत्तो में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की, जिसमें लल्लूलाल और सदल मिश्र हिन्दी के अधयापक नियत हुए। इस कालेज के प्रधाानाधयापक जान गिलक्रिस्ट ने सन् 1803 में इन दोनों सज्जनों को हिन्दी-पाठय-पुस्तकें तैयार करने का काम सौंपा। इस समय भी शासकों का धयान खड़ी बोली ही की ओर गया। शिक्षित कर्मचारियों तथा समाज के सरकारी प्रतिष्ठा-प्राप्त व्यक्तियों के सम्पर्क के कारण वे कम से कम खड़ी बोली के ढाँचे से परिचित थे। परन्तु अरबी और प+ारसी के तत्सम शब्दों से लदी हुई भाषा की आवश्यकता उन्हें नहीं थी। उनको उर्दू का ज्ञान भी था परंतु वे देश की प्रधाान जनता के भावों का परिचय कराने वाली भाषा की टोह में थे। वे ऐसी भाषा के लिए उत्सुक थे जो खड़ी बोली का ढाँचा स्वीकार करती हुई, उस शब्दावली को ग्रहण्ा करे जिसके प्रति अधिाकांश हिन्दू समाज के हृदय में एक विशेष संस्कार चिरकाल से चला आता था। संयोग से खड़ी बोली के गद्य ने बीज से अंकुर रूप धाारण कर लिया था, और मुंशी सदासुख लाल तथा सैयद इंशा अल्ला अपना-अपना हिन्दी गद्य का आदर्श उपस्थित कर चुके थे, कि लल्लू लाल जी और सदल मिश्र इस क्षेत्रा में उतरे। लल्लू लाल जी ने प्रेमसागर की रचना की। इस ग्रंथ की भाषा देखिए-

1. ''राजा परीक्षित बोले कि महाराज राजसूय यज्ञ होने से सब कोई प्रसन्न हुए। एक दुर्योधान अप्रसन्न हुआ। इसका कारण क्या है तुम मुझे समुझाय के कहो जो मेरे मन का भ्रम जाय। श्री शुकदेव जी बोले, राजा तुम्हारे पितामह ज्ञानी थे। उन्होंने यज्ञ में जिसे जैसा देखा तैसा काम किया।''

2. ''इतना कह महादेव जी गिरिजा को साथ ले गंगा तीर पर जाय, नीर में न्हाय, न्हिलाय, अति लाड़ प्यार से लगे पार्वती जी को वस्त्रा-'आभूषण पहिराने।''

3. ''तिस समय धान जो गरजता था सोई तो धाौंसा बजता था और वर्ण वर्ण की घटा जो घिर आती थी, सोई शूरवीर रावत थे, तिनके बीच बिजली की दमक शस्त्रा की सी चमकती थी, बगपाँत ठौर ठौर धवजासी फहराय रही थी, दादुर मोर कड़खैतों की भाँति यश बखानते थे और बड़ी-बड़ी बूँदों की झड़ी बाणों की-सी झड़ी लगी थी।''

4. ''बालों की श्यामता के आगे अमावस्या की ऍंधोरी फीकी लगने लगी। उसकी चोटी सटकाई लखनागिन अपनी केंचुली छोड़सटक गयी। भौंह की बँकाई निरख धानुष धाकधाकाने लगा। ऑंखों की बड़ाई चंचलाई पेख मृग मीन खंजन खिसायरहे।''

लल्लू लाल को कहानी कहनी थी। ऐसी अवस्था में भाषा की रोचकता और सरसता विषय के सर्वथा उपयुक्त है। फिर भी सैयद इंशा अल्ला खाँ की भाषा से उनकी भाषा की तुलना करने पर दोनों का वास्तविक अंतर प्रकट हुए बिना नहीं रहेगा। लल्लू लाल जी की भाषा में विशेष धयान देने योग्य बात यह है कि उन्होंने प्रेम सागर में प+ारसी शब्दों का प्रयोग बिलकुल ही नहीं किया है, यद्यपि उनके 'सिंहासन बत्ताीसी' नामक ग्रंथ में यह प्रवृत्तिा नहीं पायी जाती। लल्लू लाल जी आगरे के रहने वाले थे, इसलिए उनकी रचना में ब्रजभाषा के शब्दों की भरमार होना स्वाभाविक था। उस समय भाषा का कोई सर्वमान्य आदर्श उनके सामने नहीं था, जिस प्रकार सदा सुख लाल और इंशा अल्लाह खाँ ने अपने-अपने अनुमित विचार के अनुसार अपने-अपने ग्रंथों की हिन्दी भाषा रखी, उसी प्रकार लल्लूलाल जी ने भी प्रेम सागर को अपनी अनुमानी हिन्दी में बनाई। उन दोनों के सामने उर्दू का आदर्श था, इसलिए उनकी भाषा विशेष परिमार्जित और खड़ी बोली के रंग में ढली हुई है, परन्तु ये उर्दू के आदर्श को त्याग कर चले, इसलिए वास्तविक खड़ी बोली न लिख सके। उर्दू शब्दों को भी बचाया, इसलिए आवश्यकता से अधिाक ब्रजभाषा के शब्द उनकी रचना में घुस गये। अवतरणों के उन शब्दों को देखिए जो चिन्हित हैं। आज का सा समय होता तो सम्भव था कि इन तीनों को एक-दूसरे की पुस्तक देखने के लिये मिल गई होती और इस प्रकार एक-दूसरे की प्रणाली से वे कुछ सहायता प्राप्त कर सकते। परन्तु उस समय तो यह भी सम्भव नहीं था, अपने जीवन में वे एक दूसरे का नाम भी न सुन सके होंगे। जिस समय प्रेम सागर लिखा गया, उस समय वहीं बाग-बहार नामक उर्दू ग्रन्थ भी लिखा गया, उसमें भी अनुप्रासों की अधिाकता है। उर्दू में यह प्रणाली प+ारसी से आई है, प+ारसी में अरबी से। मैं समझता हूँ प्रेम सागर पर अनुप्रास के विषय में 'बाग़ो-बहार' का प्रभाव पड़ा है, वह भी गद्य-ग्रन्थ ही है। या यह कहें कि उक्त ग्रन्थ की स्पध्र्दा से ही प्रेम-सागर की भाषा सानुप्रास है। विशुध्द संस्कृत और ब्रजभाषा शब्दों के आधार पर प्रेम-सागर का निर्माण खड़ी बोली में करके लल्लू लाल ने उस प्रवाह में परिवर्तन उपस्थित करने का प्रयत्न किया जो अब तक प+ारसी शब्दों के व्यवहार के प्रतिकूल नहीं था। मुंशी सदा सुखलाल की भाषा कुछ पंडिताऊ तथा कुछ अस्त-व्यस्त। इंशा अल्लाह खाँ की भाषा का ढाँचा उर्दू है। लल्लूलाल का ढंग इन दोनों से भिन्न है, उनकी भाषा चलती और हिन्दी के ढंग में ढली हुई है, और यही उनकी प्रणाली की विशेषताएँ हैं।

सदल मिश्र कलकत्तो के फोर्ट-विलियम कॉलेज में लल्लू लाल के साथ अधयापक थे। जान गिलक्रिस्ट महाशय के आज्ञानुसार उन्होंने 'नासिकेतोपाख्यान' नामक पुस्तक तैयार की। उनकी भाषा देखिए-

1. तब नृप ने पंडितों को बोला दिन विचार बड़ी प्रसन्नता से सब राजा वो ऋषियों को नेवत बुलाया। लगन के समय सबों को साथ ले मंडप में जहाँ सोनन्ह के थम्भ पर मानिक दीप बलते थे, जा पहुँचे।

2. इतने में जहाँ से सखी सहेली और जात भाइयों की स्त्राी सब दौड़ी हुई आईं, समाचार सुनि जुड़ाईं, मगन हो हो नाचने गाने बजाने लगीं वो अपने-अपने देह से गहना उतार-उतार सेवकों को देने लगी और अगणित रुपया अन्न वस्त्रा राजा रानी ने ब्राह्मणों को बोला-बोला दान दिया। आनन्द बधाावा बाजने लगा।

3. राजा रघु ऐसे कहते हुए वहाँ से तुरन्त हर्षित हो उठे। वो भीतर जा मुनि ने जो आश्चर्य बात कही थी सो पहिले रानी को सब सुनाई। वह भी मोह से व्याकुल हो पुकार रोने लगी वो गिड़गिड़ा कहने कि महाराज, जो यह सत्य है तो अब भी लोग भेज लड़के समेत झट उसको बुला ही लीजिए क्योंकि अब मारेशोक के मेरी छाती फटती है। कब मैं सुन्दर बालक सहित चंद्रावती के मुँह को जो बन के रहने से भोर के चन्द्रमा सा मलीन हुआ होगा देखोंगी।''

उक्त अवतरणों के चिद्दित शब्दों को देखने पर आपको यह स्पष्ट हो जायगा कि सदल मिश्र की भाषा न तो लल्लू लाल की भाषा की तरह ब्रजभाषा शब्दों से भरी है, न शुध्द खड़ी बोली है, वह दोनों के बीच की है। ऐसा होना परिवर्तन काल की भाषा के लिए स्वाभाविक था। सदल मिश्र कहीं 'ब्राह्मण' का बहुवचन 'ब्राह्मणों' लिखते हैं और कहीं 'सोन' का बहुवचन 'सोनन्ह'।'आश्चर्य बात' 'वो' आदि शब्दों का प्रयोग भी वे करते हैं। संस्कृत के तत्सम शब्द भी उनकी रचना में आये हैं, 'नृप', 'स्त्राी', 'अगणित', 'शोक', 'चन्द्रमा' आदि शब्द इसके प्रमाण हैं। 'सखी-सहेली', 'जात-भाइयों' आदि दोहरे पदों का प्रयोग भी उन्होंने किया है।

इसी समय हिन्दी गद्य के विस्तार का एक मार्ग और खुला। सन् 1809 ई. में विलियम केटे नाम के एक पादरी ने इंजील का अनुवाद हिन्दी में 'नये धार्म नियम' नाम से प्रकाशित किया। इस अनुवाद तथा ऐसी ही अन्य पुस्तकों के प्रकाशन का उद्देश्य यह था कि हिन्दी भाषा-भाषी जनता ईसाई धार्म के सिध्दान्तों से परिचय प्राप्त करें। सदा सुखलाल और लल्लू लाल ने क्रमश: 'सुख-सागर' और 'प्रेम-सागर' की रचना करके धाार्मिक जनता के सामने लोक-प्रिय कथाओं को सरल भाषा में उपस्थित किया था, इसलिए कि जिसमें वे इधार आकर्षित हों। उनका उद्देश्य सफल भी हुआ। लल्लू लाल का प्रेम-सागर जितना ही पाठय पुस्तक के रूप में आदृत था, उतनी ही धाार्मिक जनता में भी उसकी प्रतिष्ठा थी। इन दोनों ग्रन्थों की भाषा में फारसी भाषा के शब्दों का समावेश प्राय: नहीं के बराबर है। अतएव ईसाई धार्म-प्रचार के इच्छुकों ने भी उन्हीं की शैली का अनुसरण किया। फिर भी ईसाई पुस्तकों की भाषा में एक विशेषता देखने में आती है जो उसे पूर्व आदर्शों से कुछ पृथक करती है। वह है कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग, जो उसे एक ओर तो सैयद इंशा अल्लाह खाँ की भाषा से अलग करती है और दूसरी ओर मुंशी सदा सुखलाल और लल्लू लाल की भाषा से। ये शब्द ठेठ भाषा से लिये गये ज्ञात होते हैं। नीचे के अवतरणों को देखकर आप लोगों को मेरे कथन की सत्यता विदित होगी-

1. यीशू ने उसको उत्तार दिया कि जो कोई यह जल पीयेगा वह फिर पियासा होगा। स्त्राी ने उससे कहा मैं जानती हूँ कि मसीह जो ख्रीष्ट कहलाता है, आने वाला है।

यीशू ने उनसे कहा, मेरा भोजन यह है कि अपने भेजने वाले की इच्छा पर चलूँ और उसका काम पूरा करूँ। क्या तुम नहीं कहते कि वे कटनी के लिए पक चुके हैं और काटने वाला मजदूरी पाता और अनन्त जीवन के लिए फल बटोरता है किबोने वाला और काटने वाला दोनों मिलकर आनन्द करें।

2. बियारी से उठकर अपने कपड़े उतार दिये और ऍंगोछा लेकर अपनी कमर बाँधाी।

3. तब उन्होंने उसके पिता से सैन किया कि तू उसका नाम क्या रखना चाहती है।

4. अर्थात् वह किरिया जो उसने हमारे पिता इब्राहीम से खायी थी।

5. यह हमारे परमेश्वर की उसी बड़ी करुणा से होगा जिसके कारण ऊपर से हम पर भोर का प्रकाश उदय होगा।

6. तब महायाजक और प्रजा के पुरनिए काइप+ा नामक महायाजक के ऑंगन में इकट्ठे हुए।

7. यह देखकर उसके चेले रिसियाये और कहने लगे इसका क्यों सत्यानाश किया गया।

उक्त अवतरणों के रेखांकित शब्द ठेठ हिन्दी भाषा के हैं। 'उत्तार', 'स्त्राी', 'इच्छा', 'अनन्त', 'जीवन', 'आनंद', 'पिता', 'परमेश्वर', 'करुणा', 'कारण', 'प्रकाश', 'उदय', 'महायाजक', 'प्रजा' आदि संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग भी इनमें किया गया है। एक जगह प+ारसी से गढ़ा हुआ 'मजदूरी' शब्द भी आया है-परन्तु यह स्वीकार करना पड़ेगा कि पादरी साहब की भाषा अपने पूर्ववर्ती लोगों से अधिाक प्रांजल है, और उसमें खड़ी बोली का अधिाकतर विशुध्द रूप पाया जाता है। वह हरिश्चन्द्र कालिक हिन्दी के सन्निकट है। उसको देखकर यह विश्वास नहीं होता, कि उस समय किसी पादरी की लेखनी से ऐसी भाषा लिखी जा सकती है। मुझको इसमें किसी योग्यतम हिन्दू के हाथ की कला दृष्टिगत होती है।

उन्नति-काल

विस्तार-काल के लेखकों ने हिन्दी-गद्य का क्षेत्रा विस्तृत तो किया, किन्तु भाषा के सम्बन्धा में वे कोई निश्चित आदर्श उपस्थित न कर सके। मुंशी सदासुख लाल, लल्लू जी लाल, पं. सदल मिश्र, सैय्यद इंशा अल्ला खाँ आदि लेखकों ने भिन्न-भिन्न प्रकार की भाषा लिखी। प्रथम तीनों की भाषा में ब्रजभाषा का यथेष्ट पुट था। अतएव वह खड़ी बोली के प्रारम्भिक काल की सूचक ही होकर रह गयी। रही इंशा अल्ला खाँ की भाषा, वह उनकी व्यक्तिगत रुचि से बहुत अधिाक प्रभावित है। उनकी प्रकृति के अनुरूप उसमें विलासविभ्रममयी कामिनी के समान चटक मटक अधिाक है, वह अधिाकतर ऐसी है कि कहानी किस्सों ही में काम दे सकती है, अन्य विषयों में नहीं। पादरी साहब की भाषा का प्रचार परिमित क्षेत्रा में ही था। अतएव यह स्पष्ट है कि गद्यपरिधिा के विस्तार ने भाषा का स्वरूप निश्चित करके उसे सर्वोपयोगी तथा सब प्रकार के विचारों को प्रकट के योग्य बनाने की समस्या उन्नति काल के लेखकों के सामने उपस्थित की।

अनेक श्रेणियों के लेखकों की प्रतिभा के संघर्ष से यह समस्या इसी काल में हल हुई। निबन्धा, नाटक-उपन्यास और समालोचना आदि के क्षेत्राों में प्रचुर व्यवहृत होने से इसी समय गद्य की एक सुन्दर शैली का विकास में आकर समुन्नत होना स्वाभाविक था। उन्नति क्रम क्या था, मैं अब यह दिखलाऊँगा।

राजा शिवप्रसाद उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध्द्र में हुए। उन्हीं के समय से हमने हिन्दी-गद्य का उन्नति-काल माना है। सन्1884 में सर चार्ल्स उड ने देशी भाषाओं में ग्रामवासियों के शिक्षा देने की जो योजना बनाकर भेजी थी, उसमें हिन्दी को स्थान ही न मिलता, यदि राजा साहब ने अपार परिश्रम करके हिन्दी में कुछ पाठय पुस्तकें तैयार न की होतीं। यदि शिक्षा योजना में हिन्दी को स्थान न मिलता, तो उस समय न तो उसका उन्नति-पथ प्रशस्त होता, और न वह जैसा चाहिए वैसा अपना पाँव आगे बढ़ा सकती, इसलिए उसकी उस काल की उन्नति में राजा साहब का हाथ होना स्पष्ट है। सन् 1845 में उन्होंने 'बनारस अख़बार' नामक जो समाचार पत्रा निकाला था, उसकी भाषा यद्यपि प+ारसी के तत्सम शब्दों से लदी हुई होती थी, परन्तु उसको वे देवनागरी अक्षरों में ही प्रकाशित करते थे और उसे हिन्दी का समाचार-पत्रा ही कहते थे। इन बातों से उनका हिन्दी-प्रेम प्रकट होता है, परन्तु हिन्दी की भाषा के विषय में उनका कोई निश्चित सिध्दान्त नहीं था, कभी वे उसे प+ारसी शब्दों से मिश्रित लिखते थे और कभी संस्कृत शब्दों से गर्भित। कभी-कभी उन्होंने बड़ी सरल हिन्दी लिखी है परन्तु बोलचाल पर दृष्टि रखकर उसमें भी प+ारसी और अरबी के ऐसे शब्दों का त्याग नहीं किया, जिनको सर्वसाधाारण बोलते और समझ लेते हैं।

सन् 1835 में ऍंग्रेजी और प+ारसी लिपि में लिखी जाने वाली तथा प+ारसी और अरबी के शब्दों तथा खड़ी बोली की क्रियाओं के सहयोग से उत्पन्न उर्दू भाषा सरकारी कचहरी की भाषा बन गयी। यह उर्दू का सौभाग्य सूर्योदय था। इस घटना से हिन्दी-गद्य के विस्तार कार्य को बहुत धाक्का लगा। उर्दू का यों भी बोलचाल में प्रचार था। किन्तु इस घटना से उसे इतना अधिाक प्रश्रय मिला कि वह सहज ही हिन्दी को पछाड़ देने में सफल हुई। कारण्ा यह कि स्वयं हिन्दू प्रतिभा और साहित्य-सृजनकारिणी शक्ति ऐसी भाषा के विकास में योग देने के विरुध्द हो गयी, जिसका आदर शिक्षित वर्ग में नहीं रह गया था। ऐसी दशा में मुन्शी सदासुख लाल और लल्लू लाल द्वारा प्रचारित गद्य-शैली का कुछ समय के लिए दब जाना स्वाभाविक था।

राजा शिव प्रसाद का हिन्दी-रचना काल इसी समय प्रारम्भ होता है। लल्लू लाल की तरह शुध्द गद्य लिखने के पक्ष में वे इस कारण नहीं हुए कि उनकी समझ में वैसा गद्य उस समय प्रचलित करना उचित नहीं था। उस समय की परिस्थिति पर दृष्टि रखकर एक जगह वे यह लिखते हैं-

''शुध्द हिन्दी चाहने वाले को हम यह यकीन दिला सकते हैं कि जब तक कचहरी में प+ारसी हरप+ जारी हैं, इस देश में संस्कृत शब्दों को जारी करने की कोशिश बेप+ायदा होगी।'' राजा शिवप्रसाद क्यों प+ारसी अरबी शब्दों से मिश्रित हिन्दी लिखने के पक्षपाती थे, यह बात आशा है, अब आप लोगों की समझ में आ गयी होगी, उनके गद्य का निम्नलिखित नमूना देखने से यह विषय और स्पष्ट हो जावेगा।

''हम लोगों की जबान का व्याकरण (चाहे आप उसको उर्दू कहें चाहे हिन्दी) किसी कदर कायम हो गया है। जो बाकी है जिस कदर जल्द कायम हो जावे बेहतरA इस जबान का दरवाजा हमेशा खुला रहा है और अब भी खुला रहेगा। उसमें शब्दबेशक आये और बराबर चले आते हैं, क्या भूमियों की बोली, क्या संस्कृत, क्या यूनानी (यहाँ तक कि यूनानी लफ्ज 'दीनार'पुरानी संस्कृत पोथियों में भी पाया जाता है और नानक भी यूनानी से निकला है) क्या रूमी, क्या प+ारसी, क्या अरबी, क्या तुर्की, क्या ऍंग्रेजी क्या किसी मुल्क के शब्द जो कभी इस दुनिया के पर्दे पर बसे हैं या बसते हैं, सबके वास्ते इसका दरवाजाखुला रहा है और अब भी खुला रहेगा। अब इसे बन्द करने की कोशिश करना सिवाय इसके कि किस कदर मूजिब हमारे हानि और नुकसान का है और कैसा असम्भव है, यह सोचना चाहिए। रोक-टोक बेशक मुनासिब है और यही हो सकती है। वह कौन मनुष्य है कि अपने ताल में जिससे तमाम गाँव सिंचता है पानी आने की नालियाँ बन्द करे। गंगा की धाारा का बहना तो आप बन्द नहीं कर सकते। लेकिन यह अवश्य कर सकते हैं कि बाँधा और पुश्ते बनाकर उन्हीं के दर्मियान उसको रखें।''

उक्त अवतरण में 'व+दर', 'व+ायम', 'बाव+ी', 'बेहतर', 'ज़बान', 'दरवाजा', 'बेशक', 'लफ्ज़', 'मुल्क', 'दुनिया', 'कोशिश', 'व+दर', 'मुजिब', 'नुव+सान', 'मुनासिब', 'दर्मियान' आदि शब्द प+ारसी से लिये गये हैं। 'व्याकरण', 'शब्द', 'हानि', 'अवश्य'आदि बहुत थोड़े से ही शब्द इसमें संस्कृत के हैं। राजा शिवप्रसाद की भाषा सम्बन्धाी यह नीति सफल होने वाली नहीं थी। हिन्दी-गद्य के पुराने संस्कार वास्तव में सदा के लिए मिट नहीं गये थे, केवल प्रतिकूल परिस्थिति के कारण वे दबे पड़े थे। राजा लक्ष्मण सिंह की सरस लेखीन का अवलम्बन पाकर वे फिर सामने आ गये उन्होंने अपनी भाषा-विषयक नीति निम्नलिखित शब्दों में स्पष्ट रूप से व्यक्त कर दी-

''हिन्दी और उर्दू दो बोली न्यारी-न्यारी हैं। हिन्दी इस देश के हिन्दू और उर्दू यहाँ के मुसलमानों और प+ारसी पढ़े हुए हिन्दुओं की बोलचाल है। हिन्दी में संस्कृत के शब्द बहुत आते हैं और उर्दू में अरबी और प+ारसी के। किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि अरबी प+ारसी शब्दों के बिना उर्दू न बोली जाय और न हम उस भाषा को हिन्दी कहते हैं जिसमें अरबी प+ारसी के शब्द भरे हों।''

अपनी इस मनोवृत्तिा के साथ कार्य-क्षेत्रा में अग्रसर होकर राजा लक्ष्मण सिंह ने हिन्दी का असीम उपकार किया। वास्तव में यदि राजा शिवप्रसाद ने हिन्दी गद्य के अस्थिपंजरावशिष्ट शरीर में श्वास का आना-जाना सुरक्षित रखा तो राजा लक्ष्मण सिंह ने उसके शरीर में अल्पाधिाक मात्राा में स्वास्थ्य का संचार किया और उसे नवजीवन दिया। इनकी भाषा के दो नमूने आप देखें-

1. ''रास छोड़ते ही घोड़े सिमटकर कैसे झपटे कि खुरों की धाूल भी साथ न लगी। केश खड़े करके और कनौती उठाकर घोड़े दौड़े क्या हैं, उड़ आये हैं। जो वस्तु पहले दूर होने के कारण छोटी दिखाई देती थी सो अब बड़ी जान पड़ती है।''

2. तुम्हारे मधाुर वचनों के विश्वास में आकर मेरा जी यह पूछने को चाहता है कि तुम किस राजवंश के भूषण हो और किस देश की प्रजा को विरह में व्याकुल छोड़कर पधाारे हो। क्या कारण है कि जिससे तुमने अपने कोमल गात को कठिन तपोवन में आकर पीड़ित किया है।

इन अवतरणों की भाषा से राजा शिवप्रसाद जी की भाषा से तुलना कीजिए। यदि एक में आपको उर्दू का स्पष्ट स्वरूप दिखाई पड़ेगा तो दूसरी में हिन्दी प्रकृतस्वरूप को ग्रहण करने की चेष्टा प्रकट रूप से दिखाई पड़ती है। राजा लक्ष्मण सिंह के उक्त अवतरणों में एक भी प+ारसी शब्द का व्यवहार नहीं मिलता। संस्कृत के शब्दों की भी ठूँस-ठाँस नहीं दिखाई पड़ती, उतने ही संस्कृत शब्द उसमें आये हैं जितने भाषा को मनोहर बनाकर भाव को सुन्दरता के साथ व्यक्त करने के लिए आवश्यक हैं।

परन्तु यह मानना पडेग़ा कि जहाँ राजा शिवप्रसाद एक ऐसी भाषा को प्रचलित करना चाहते थे जो हिन्दू-समाज के संस्कारों के बिलकुल ही प्रतिकूल थी, वहाँ राजा लक्ष्मण सिंह ने इस तथ्य बात की ओर धयान नहीं दिया कि जीवित भाषा का लक्षण ही यह है कि अन्य भाषाओं के सम्पर्क में आकर वह आदान-प्रदान से विरत न हो। फिर भी यह कहा जा सकता है कि राजा लक्ष्मण सिंह हिन्दी-गद्य-साहित्य में उस प्रतिक्रिया के प्रतिनिधिा हैं जो राजा शिवप्रसाद सितारे-हिन्द की प+ारसी के रंग में रँगी हुई हिन्दी के विरुध्द हिन्दू समाज में इस समय उत्पन्न हो रही थी।

यहाँ हिन्दी और उर्दू के पारस्परिक विभेद सम्बन्धा में दो शब्द कह देना आवश्यक जान पड़ता है। राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द की यह बहुत बड़ी शिकायत थी कि उन दिनों शिक्षित समाज में प्रचलित प+ारसी शब्दावली से प्रभावित हिन्दी को न स्वीकार करके संस्कृत-गर्भित हिन्दी लिखने और इस प्रकार एक नई भाषा के निर्माण करने का प्रयत्न किया जा रहा था। निस्सन्देह हिन्दी और उर्दू की क्रियाओं में अभिन्नता है और दोनों का व्याकरण्ा प्राय: एक ही है। परन्तु इतनी एकता होने पर भी धाार्मिक और जातीय संस्कार ने दोनों बोलियों के बीच में एक गहरी खाई उपस्थित कर दी है। जिस इस्लाम की उपासना भारत वर्ष के मुसलमान करते हैं वह किसी देश की सीमाओं से प्रभावित नहीं होता, उसके आदेश के अनुसार भारतवर्ष और पैलेस्टाइन के मुसलमान जितने निकट समझे जा सकते हैं, उतने भारतवर्ष के मुसलमान और हिन्दू नहीं। इस्लाम के इसी स्वरूप से प्रभावित होकर मुसलमान कवि भारतवर्ष में रहकर भी प+ारसी-काव्य-परम्परा को ही अधिाक पसन्द करता है। जैसे मुसलमान अपने संस्कारों को नहीं छोड़ते उसी प्रकार यह भी असम्भव है कि हिन्दू-जाति की धाार्मिक संस्कृति संस्कृत शब्दों का मोह त्याग दे। ऐसी दशा में हिन्दी और उर्दू की एकता के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि हिन्दू और मुसलमान जातियों के दैनिक सम्पर्क और सहयोग के लिए किसी जीवित सम्बन्धा की स्थापना की जाय और दोनों के व्यक्तिगत संस्कारों को एक- दूसरे के साथ मिलकर सामंजस्य कर लेने का अवसर दिया जाय। जब यह सम्भव होगा तो इसे व्यक्त करने वाली भाषा केवल मुस्लिम समाज अथवा हिन्दू-समाज की नहीं होगी, बल्कि भारतीय समाज की होगी, तभी हिन्दी और उर्दू का झगड़ा मिट जायेगा। यह परिस्थिति जिस प्रकार सम्भव हो सके उसके लिए उद्योगशील न होकर जो लोग प्रति सौ प+ारसी अरबी शब्दों के साथ पाँच प+ारसी अरबी के सार्वजनिक प्रयोग जात किन्तु संस्कार शून्य शब्दों का केवल इसलिए व्यवहार करते हैं, कि इससे उनकी एकताहितैषिणा की घोषणा हो, वे समस्या के मूल पर कुठाराघात न करके केवल डालियों और पत्ताों पर प्रहार करके पेड़ को भूमिशायी बनाना चाहते हैं। अतएव, जब तक मुसलमान लेखक अपने साहित्य-परम्परा-विषयक संस्कारों पर भारतीय रंग न चढ़ने देंगे अथवा हिन्दू लेखक अपनी साहित्य-परम्परागत विशेषताओं के साथ मुसलमानों की शैली के साथ समझौता होना सम्भव नह बनाएँगे तब तक हिन्दी और उर्दू का विभेद बना ही रहेगा और वे राजा लक्ष्मण सिंह के शब्दों में दो न्यारी बोली बनी ही रहेंगी।

राजा शिवप्रसाद और राजा लक्ष्मण सिंह जिस समय हिन्दी गद्य की शैली को एक स्थिर स्वरूप देने का प्रयत्न कर रहे थे,उस समय गुजरात से सूर्य की तरह उदित होने वाले स्वामी दयानन्द सरस्वती ने हिन्दू जाति की रक्षा के लिए एक बड़े प्रबल आन्दोलन को जन्म दिया। ईसाइयों के स्वधार्म प्रचार के प्रयत्न की चर्चा की जा चुकी है। इस प्रयत्न का स्वरूप केवल अनुवादित पुस्तकें जनता में बाँटना ही नहीं था, उसने इससे अधिाक गम्भीर रूप पकड़ कर हमारे दैनिक जीवन के प्रभावशाली अंगों शिक्षा और चिकित्सा आदि से भी अपना सम्पर्क बढ़ाने की कोशिश की। इसका परिणाम यह हुआ कि विभिन्न प्रान्तों के बहुसंख्यक हिन्दू ईसाई धार्म को स्वीकार करने लगे। इसके अतिरिक्त हिन्दू-समाज के अनेक दुर्बल अंगों पर आक्रमण करके मुसलमान लोग भी हिन्दुओं को हिन्दू धार्म की गोद में से निकालने की चिन्ता में लगे थे। स्वामी दयानन्द सरस्वती के आविर्भाव के पहले हिन्दू-समाज, विशेषकर संयुक्त प्रान्त और पंजाब का हिन्दू समाज इस अन्धाकार में अपना समुचित पथ ढूँढ़ निकालने में असमर्थ था। स्वामी दयानन्द ने देश और जाति की आवश्यकताओं को समझा और जो कुछ उचित समझा उसे अपने देश-बन्धाुओं को समझाने का प्रबल प्रयत्न किया। इससे स्वभावत: हिन्दी गद्य को सहारा मिला, क्योंकि उनके और उनके अनुयायियों ने अपना आन्दोलन और प्रचार-कार्य हिन्दी ही में प्रारंभ किया। राजा शिव प्रसाद की भाषा सम्बन्धाी नीति को स्वामी दयानन्द के आन्दोलन से भी पनपने का अवसर नहीं मिला। क्योंकि तत्कालीन सामाजिक और धाार्मिक प्रश्नों की मीमांसा हिन्दी ही में होने के कारण अधिाकांश विचारशील हिन्दुओं को भी संस्कृत के अनेक तत्सम शब्दों की ओर झुकना पड़ा जिसका परिणाम कालान्तर में पंजाब जैसे उर्दू-प्रधाान प्रान्त में इस रूप में दिखाई पड़ा कि भाषा तो हुई संस्कृत शब्दों से भरी किन्तु लिपि हुई प+ारसी-राजा शिवप्रसाद की शैली का ठीक उलटा। स्वामी दयानन्द सरस्वती की भाषा का एक नमूना देखिए-

1. 'तत्पश्चात् मैं कुछ दिन तक स्थान टेहरी में ही रहा और इन्हीं पंडित साहब से मैंने कुछ पुस्तकों और ग्रन्थों का हाल जो मैं देखना चाहता था दरयाफ्त किया और यह भी पूछा कि ये ग्रंथ इस शहर में कहाँ-कहाँ मिल सकते हैं। उनके खोलते ही मेरी निगाह एक ऐसे विषय पर पड़ी कि जिसमें बिलकुल झूठी बातें, झूठे तरजुमे, और झूठे अर्थ थे।'

2. राजा भोज के राज्य में और समीप ऐसे शिल्पी लोग थे कि जिन्होंने घोड़े के आकार का एक मान यन्त्रा कलायुक्तबनाया था कि जो एक कच्ची घड़ी में ग्यारह कोस और एक घण्टे में सत्तााईस कोस जाता था वह भूमि और अन्तरिक्ष में भी चलता था और दूसरा पंखा ऐसा बनाया था कि बिना मनुष्य के चलाये कला-यन्त्रा के बल से नित्य चला करता और पुष्कल वायु देता था जो ये दोनों पदार्थ आज तक बने रहते तो योरोपियन इतने अभिमान में न चढ़ जाते।

इन अवतरणों की भाषा पर धयान दीजिए, द्वितीय अवतरण में प+ारसी या अरबी का एक भी शब्द नहीं है, संस्कृत के तत्सम शब्दों ही की उसमें प्रधाानता देख पड़ती है। पहले अवतरण में 'साहब' 'दरयाफ्त' 'निगाह', 'तरजुमे' आदि शब्द प+ारसी के हैं। राजा लक्ष्मणसिंह की भाषा में जो सरलता और मधाुरता है, उसका स्वामी जी की भाषा में सर्वथा अभाव है। कारण इसका यह है कि स्वामी जी को एक नवीन दिशा में हिन्दी का उपयोग करना पड़ा। जिस प्रकार का शास्त्राार्थ उन्होंने प्रचलित किया वैसा तब तक अज्ञात था। मौलवियों, पादरियों और पंडितों के साथ विवाद में पड़ कर हिन्दी भाषा से उन्हें ऐसा काम लेना पड़ा जो कभी लिया न गया था। दूसरी बात वह कि उनके विषय शास्त्राीय थे, यह भी वादग्रस्त, साहित्यिक नहीं थे, अतएव उनकी भाषा में कर्कशता और रूखापन मिलना आश्चर्यजनक नहीं।

राजा शिवप्रसाद, राजा लक्ष्मणसिंह और स्वामी दयानन्द सरस्वती सम सामयिक थे। इन तीनों लेखकों ने हिन्दी गद्य में तीन प्रकार की शैलियाँ उपस्थित कीं, यह आप लोगों ने देख लिया। अब मैं आपको हिन्दी गद्य-साहित्य के एक ऐसे उज्ज्वल नक्षत्रा की निर्मल प्रभा से परिचित करना चाहता हूँ जिसने शैली-विकास-विषयक प्रयत्न को प्राय: पूर्णता का रूप प्रदान करके स्थिरता संचार करने में सफलता प्राप्त की, यह उज्ज्वल नक्षत्रा भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र हैं। भारतेन्दु बाबू ने जैसे सामयिक हिन्दी पद्य के विकास में पथ-प्रदर्शक का काम किया, वैसे ही गद्य के विकास में भी उनका सहयोग बहुत महत्तवपूर्ण है। बात यह है कि साहित्य-शैलियों के विकास में लेखक की अपेक्षा जनता का सहयोग कम प्रभावशाली नहीं होता। हम जो कुछ लिखते हैं उसका यही उद्देश्य है कि उसे लोग पढ़ें और उचित मात्राा में उसमें प्रभावित हों। जब हम शैली-विशेष की उपयोगिता और ग्राम्यता पर विशेष बल देते हैं, तब हमारा तात्पर्य इससे भिन्न अन्य कुछ नहीं हो सकता कि उससे लेखक और पाठक का मानसिक-सम्बन्धा-स्थापन होने में बहुत अधिाक सरलता और सुगमता की सम्भावना है। राजा शिवप्रसाद ने प+ारसी शब्दों से लदी हुई 'आम प+हम' और 'ख़ास पसंद' भाषा के लिए जब 'ज़ोरदार', 'वकालत' की थी तब इसी व्यापक सिध्दान्त का आश्रय उन्हें लेना पड़ा था। उनका धयान विशेष रूप से उन शिक्षित हिन्दू पाठकों की ओर था जिनके हिन्दी-प्रेम की अधिाक से अधिाक सीमा यह थी कि वे देवनागरी अक्षरों में उर्दू भाषा को पढ़ और समझ लें। किन्तु जब इसी पाठक-मण्डली के धाार्मिक संस्कारों की सहानुभूति की आवश्यकता लेखक को प्रतीत हुई तब संस्कृत के तत्सम शब्दों ही की ओर उसे झुकना पड़ा। मैं इस स्थान पर यह कथन करता हुआ इस बात को भी नहीं भूल रहा हूँ, कि धाार्मिक विषयों के स्पष्टीकरण, तथा तत्सम्बन्धाी तर्क-वितर्क में संस्कृत शब्दों की यथेष्ट मात्राा में आवश्यकता होती है। किन्तु साथ ही यह भी मेरा मत है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती के लेखों में संस्कृत के तत्सम शब्दों का जो बहुत अधिाकता से प्रयोग हुआ है, उसका एकमात्रा कारण यह अनिवार्य आवश्यकता ही नहीं थी, बल्कि जनता की वह रुचि भी थी, जो संस्कृत के तत्सम शब्दों के प्रयोग में एक विशेष धाार्मिक संस्कार का अनुभव करती थी। अतएव लेखक और पाठक मण्डली दोनों के सहयोग से हिन्दी भाषा का बहुत कुछ परिष्कार और परिमार्जन हो चला जिसका स्पष्ट परिचय भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र की भाषा में दिखायी पड़ा। जनता की रुचि किस भाषा की ओर थी, यह भारतेन्दु द्वारा संचालित 'कविवचनसुधाा' नामक मासिक पत्रा के प्रति उसके विशेष अनुराग से लक्षित हो गया। भारतेन्दु ने भाषा के सम्बन्धा में एक ऐसी नीति ग्रहण की जो किसी विशेष पक्ष की ओर झुकी नहीं थी बल्कि समस्त पक्षों का समुचित समन्वय उपस्थित करती थी। यदि वे राजा शिवप्रसाद की-सी प+ारसी के भार से दबी हुई हिन्दी नहीं लिखते तो राजा लक्ष्मणसिंह अथवा 'प्रेमसागर' रचयिता लल्लूलाल की तरह उन प+ारसी शब्दों से भी नहीं बचते थे जो हिन्दी की बोलचाल में आ गये हैं। नीचे भारतेन्दुजी की भाषा के दो नमूने मैं उपस्थित करता हूँ। इन्हें देखकर आप यह समझ सकेंगे कि भारतेन्दु जी की भाषा सम्बन्धाी नीति किस प्रकार उस समय के एक महत्तवपूर्ण प्रश्न को हल करती थी-

1. ''नाम बिके, लोग झूठा कहें, अपने मारे मारे फिरें, पर बाहरे शुध्द 'बेहयाई'-पूरी निर्ल्लज्जता! लाज को जूतों मार के,पीट-पीट के निकाल दिया है। जिस मुहल्ले में आप रहते हैं, लाज की हवा भी वहाँ नहीं जाती। हाय, एक बार भी मुँह दिखा दिया होता तो मत-वाले मतवाले बनें क्यों लड़-लड़कर सिर फोड़ते? काहे को ऐसे बेशरम मिलेंगे?''

2. ''जब मुझे ऍंग्रेजी रमणी लोग मेदसिंचित केशराशि, कृत्रिाम कुंतल जूट, मिथ्या रत्नाभरण, विविधा वर्ण वसन से भूषित,क्षीण कटि देश कसे, निज निज पतिगण के साथ प्रसन्न बदन इधार से उधार फर फर कल की पुतली की भाँति फिरती हुई दिखलाई पड़ती हैं, तब इस देश की सीधाी7सादी स्त्रिायों की हीन अवस्था मुझको स्मरण आती है और यही बात मेरे दुख का कारण होती है।''

अवतरण नम्बर एक को देखिए। उसमें 'बेहयाई', 'बेशरम' जैसे शब्दों का प्रयोग निस्संकोच भाव से किया गया है और यह भी स्वीकार करना पड़ता है कि इन शब्दों ने उक्त अवतरण की सरसता बढ़ाने में बहुत कुछ योग दिया है। संस्कृत के'निर्ल्लज्ज' और 'निर्लज्जता' शब्दों का प्रयोग यहाँ किया जा सकता था, किन्तु 'बेहयाई' और 'बेशरमी' का बोलचाल में इतना अधिाक अधिाकार हो गया है कि उनकी 'उपेक्षा' लेखक अपनी भाषा की स्वाभाविकता अैर सहज ही सम्पादित हो सकने वाली सरसता को संकट में डालकर ही कर सकता था। दूसरे अवतरण में भारतेन्दु संस्कृत के तत्सम शब्दों ही के प्रयोग की ओर अधिाक प्रवृत्ता पाये जाते हैं। इसका कारण यह है कि यहाँ वे अपने उद्गार को व्यक्त करने के लिए कुछ ऐसे वाक्य लिखना चाहते थे जो साधाारण बोलचाल में नहीं आते। ऐसी परिस्थिति में अपनी शब्दावली चुनने के लिए उनके सामने दो मार्ग थे,या तो वे संस्कृत के अपरिचित, किन्तु पाठकों के अनुकूल संस्कारों के कारण सहज ही परिचित होने की क्षमता रखने वाले शब्दों को चुनें अथवा प+ारसी या अरबी के अप्रचलित और विदेशी शब्दों को। भारतेन्दु जी ने जैसी शब्दावली चुनी, उस परिस्थिति में प्रत्येक विचारशील लेखक वैसी ही शब्दावली ग्रहण्ा करने की ओर प्रवृत्ता होगा। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि भारतेन्दु ने हिन्दी गद्य के विकास का एक स्वाभाविक पथ तैयार करके उसे कार्य-क्षेत्रा की ओर अग्रसर किया।

हिन्दी गद्य का कार्य क्षेत्रा भी बदलता जा रहा था और उसकी समस्त शक्तियों को प्रस्फुटित करने वाले अवसर प्रस्तुत हो रहे थे। पाश्चात्य सभ्यता के सम्पर्क से जो हिन्दू समाज नितान्त विचलित और सम्मोहित हो गया था, वह बंगाल में राजा राममोहन राय और उत्तारी भारत में स्वमी दयानन्द सरस्वती के प्रभाव से नव-जीवन लाभ कर रहा था। राजा राममोहन राय ने उपनिषदों के महत्तव की ओर शिक्षित समाज का धयान खींचा, स्वामी दयानन्द ने वेदों की ओर। इस उद्योग का परिणाम यह हुआ कि शिक्षित जनता में यह आत्मविश्वास फिर उत्पन्न होने लगा जो उसके पहले लुप्तप्राय था। प्राय: इसी समय समाचार-पत्राों का भी उदय हुआ। आत्माभिमान के जागरित होते ही देशानुराग के भाव का विकास भी हुआ। राजा शिवप्रसाद और राजा लक्ष्मण सिंह ने तो इस ओर धयान नहीं दिया किन्तु बाबू हरिश्चन्द्र और उनके सहयोगियों ने देश और समाज के कष्टों को गहराई के साथ अनुभव करके भिन्न-भिन्न रूपों में उन्हें व्यक्त किया। यदि कहीं उन्होंने मर्मभेदी बातें कहीं, कहीं पाठक के हृदय को करुणा और अनुताप के भावों से पूरित किया तो सामाजिक त्राुटियों को लक्ष्य करके कहीं ऐसा व्यंग्यपूर्ण प्रहार और आक्षेप भी किया कि कुछ असहनशील पाठक की आन्तरिक सहानुभूति का उनसे चिरविच्छेद हो गया। उनका पहला नाटक'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' ऐसा ही था। उसमें उन्होंने समाज में प्रचलित बहुत-सी दूषित बातों की ओर पाठकों और दर्शकों का धयान आकर्षित किया है। वास्तव में भारतेन्दु की देशानुराग परायण बुध्दि ने उन सूक्ष्म जीवन-संचारक तत्तवों को अच्छी तरह समझ लिया था जो हिन्दू समाज के पुनरुज्जीवन के लिए आवश्यक थे। उन्होंने 'कर्पूर-मंजरी', 'सत्य हरिश्चन्द्र', 'चन्द्रावली-नाटिका', 'भारत-दुर्दशा', 'अन्धोर-नगरी', 'नीलदेवी' आदि नाटकों की रचना इसी उद्देश्य से की कि हिन्दू समाज के आरोग्य लाभ के लिए उन्हीं तत्तवों को उपस्थित करें। इसमें तो वे सफल हुए ही, साथ ही नाटक-रचना के कार्य में अग्रणी होने के कारण हिन्दी का प्रथम नाटककार होने का गौरव भी उन्हें प्राप्त हुआ।

भारतेन्दु की भाषा के जो दो नमूने ऊपर दिये गये हैं, उनमें से नम्बर 1 को देखने से आपको यह भी ज्ञात हो जायगा कि भारतेन्दु जी ने मुहावरेदार भाषा लिखने का उद्योग भी किया था। 'नाम बिकना', 'मारे-मारे फिरना' आदि मुहावरे हैं जिनके व्यवहार ने भाषा की सरसता को बढ़ा दिया है। अवतरण नम्बर 2 में इस प्रकार के मुहावरों का अभाव है। इसका कारण भी स्पष्ट है। संस्कृत के तत्सम शब्दों के बहु-संख्यक प्रयोगों ने मुहावरों के प्रवेश में रुकावट डाल दी है, प्राय: मुहावरों की छटा बोलचाल की भाषा में ही दृष्टिगत होती है।

समय के प्रभाव से उस समय बाबू हरिश्चन्द्र को अनेक सहयोगी भी प्राप्त हुए, उनमें से कुछ प्रमुख का वर्णन नीचे किया जाता है।

कानपुर के पं. प्रतापनारायण मिश्र विलक्षण प्रतिभा के मनुष्य थे, देश-प्रेम उनमें कूट-कूट कर भरा था, वे खरे थे, इसलिए खरी बातें भी कहते थे। स्वतन्त्रा प्रकृति के थे, इसलिए उनकी सभी बातों में स्वतंत्राता दिखायी पड़ती है। उनकी भाषा में भी स्वतंत्राता का रंग अधिाक है। वे लिखते हैं, सामयिक हिन्दी, परन्तु उसमें मनमानापन भी मौजूद है। वे प+ारसी, संस्कृत और उर्दू के अच्छे जानकार थे। फिर भी ग्रामीण बातों और कहावतों से उन्हें प्रेम है। उनकी रचना की प्रधाान विशेषता यह है कि वे मुहावरों आदि का व्यवहार अपनी भाषा में सफलता के साथ करते हैं। देश-ममता उनमें इतनी थी, कि अपने यहाँ की छोटी-छोटी बातों को भी महत्तव देते थे, और उनका प्रतिपादन इस ढंग से करते थे, कि उनकी इस प्रकार की लेख माला पढ़कर चित्ता प्रफुल्ल हो उठता है। किन्तु उनका भाग्य कभी नहीं चमका। अपने ब्राह्मण, नामक मासिक पत्रा को भी वे थोड़े ही समय तक चला सके। दैनिक 'हिन्दुस्तान' के सम्पादक होकर कालाकाँकर गये, परन्तु कुछ दिन वहाँ भी ठहर नहीं सके। उनके गद्य के कुछ नमूने देखिए-

1. ''घर की मेहरिया कहा नहीं मानती, चले हैं दुनिया भर को उपदेश देने। घर में एक गाय बाँधाी नहीं जाती, गोरक्षिणी सभास्थापित करेंगे। तन पर एक सूत देशी कपड़े का नहीं है, बने हैं देशहितैषी। साढ़े तीन हाथ का अपना शरीर है, उसकी उन्नति तो कर नहीं सकते, देशोन्नति पर मरे जाते हैं। कहाँ तक कहिये हमारे नौसिखिया भाइयों को माली खुलिया का आजार हो गया है, करते-धारते कुछ नहीं हैं, बक बक बाँधो हैं।''

सच है 'सब ते भले हैं मूढ़ जिन्हें न व्यापै जगत गति, मजे से पराई जमा गपक बैठना, खुशामदियों से गप मारा करना'जो कोई तिथ त्योहार आ पड़ा, तो गúा में बदन धाो आना, गúापुत्रा को चार पैसे देकर सेंत-मेत में, धारम मूरत धारमा औतार का ख़िताब पाना, संसार परमार्थ तो दोनों बन गये, अब काहे को है है, काहे को खै खै। मुँह पर तो कोई कहने ही नहीं आता, कि राजा साहब कैसे हैं, पीठ पीछे तो लोग नवाब को भी गालियाँ देते हैं, इससे क्या होता है। आप रूप तो आप हैं ही, 'दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरे' उनको कभी दुख काहे को होता होगा। कोई घर में मरा-मराया तो रो डाला। बस आहार, निद्रा, भय,मैथुन के सिवा पाँचवीं बात ही क्या है, जिसको झीखैं। आप+त तो बेचारे ज़िन्दादिलों की है, जिन्हें न यों कल न वों कल। जब स्वदेशी भाषा का पूर्ण प्रचार था, तब के विद्वान् कहते थे, 'गीर्वाणवाणीषु' विशाल बुध्दिस्तथान्यभाषा रस लोलुपोहं, अब आज अन्य भाषा वरंच अन्य भाषाओं का करकट (उर्दू) छाती का पीपल हो रही है, तब वह चिन्ता खाये लेती है, कि कैसे इस चुड़ैल से पीछा छूटे। एक बार उद्योग किया गया तो एक साहब के पेट में समा गया, फिर भी चिन्ता पिशाची गला दबाये है। प्रयाग हिन्दू समाज पि+कर के मारे 'कशीदम' नालको बेहोश गश्तम, का अनुभव कर रहा है।''

3. ''अरे भाई, पहले अपना घर तो बाँधाो लाला मसजिद पिरशाद सिड़ी वासितम को समझाओ कि तुम्हारे बुजुर्गों की बोली उर्दू नहीं है, लाला लखमीदास मारवाड़ी से कहो कि तुम हिन्दू हो, लाला नीचीमल खन्ना से पूछो, तुम लोग संकल्प पढ़ते समय अपने को वर्मा कहते हो कि शेख? पण्डित यूसुप+ नारायण कश्मीरी से दरयाफ्त करो कि तुम्हारे दसो संस्कार (मुंडनादिक) वेद की रिचाओं से हुए थे हापि+ज के दीवान से इसके पीछे जो सर्कार हिन्दी न कर दे तो ब्राह्मण के एडीटर को होली का गुण्डा बनाना।''

अहा! भाषा हो तो ऐसी हो, क्या प्रवाह है! क्या लोच है! कैसी फड़कती और चलती भाषा है! दुख है, यह भाषा पं. जी के साथ ही चली गई, फिर ऐसी भाषा लिखने वाला कोई उत्पन्न नहीं हुआ। मुहावरेदार भाषा लिखने में जैसा भाव-विकास होता है,वैसा अन्य भाषा लिखने में नहीं। यदि होता भी है, तो उतना प्रभावजनक नहीं होता। पं. जी की भाषा में अनेक शब्द शुध्द रूप में नहीं लिखे गये हैं, कारण इसका यह है, कि उनको उस रूप में उन्होंने लिखा है, जैसा वे बोलचाल में हैं। उनको यह प्रणाली गृहीत नहीं हुई। कारण इसका यह है कि एक तो बोलचाल पर इतनी दृष्टि कौन डाले, दूसरी बात यह है कि जब कुछ विशेष कारणों से शब्द को तत्सम रूप में लिखा जाना ही अच्छा समझा जाने लगा, तो व्यर्थ सर कौन मारे। चाहे जो हो, परंतु ऐसी भाषा लिखना टेढ़ी खीर है, सब ऐसी भाषा नहीं लिख सकते। यह गौरव पं. प्रतापनारायण मिश्र को हिन्दी लिखने वालों में और पं. रत्ननाथ को उर्दू लिखने वालों में प्राप्त हुआ, अन्य को नहीं। आश्चर्य नहीं कि कोई दिन ऐसा आवे जिस दिन यह भाषा ही आदर्श मानी जावे।

पण्डित प्रतापनारायण मिश्र के उपरान्त हमारी दृष्टि दो नारायणों पर पड़ती है, एक हैं पण्डित गोविन्द नारायण मिश्र और दूसरे हैं, पण्डित बदरीनारायण चौधारी। परन्तु इनका पथ भिम्न है, यदि वे बोलचाल की हिन्दी लिखने में सिध्दहस्त थे, तो ये दोनों सज्जन साहित्यिक हिन्दी लिखने में प्रसिध्द थेA

पं. गोविन्द नारायण मिश्र ने ऐसे वंश में जन्म लिया था जहाँ संस्कृत का विशेष प्रचार था। वे स्वयं भी संस्कृत के विद्वान थे। अतएव यह स्वाभाविक था कि वे हिन्दी गद्य-रचना करते समय संस्कृतगर्भित वाक्य-विन्यास की ओर झुकें! उनकी भाषा का एक नमूना दिया जाता है-

1. जिस सुजन समाज में सहòों का समागम बन जाता है, जहाँ पठित, कोविद, कूर, सुरसिक, अरसिक सब श्रेणी के मनुष्यमात्रा का समावेश है, वहाँ जिस समय सुकवि सुपंडितों के मस्तिष्क सुमेरु के सोते के अदृश्य प्रवाह समान प्रगल्भ प्रतिभाòोत से, समुत्पन्न शब्द कल्पना कलित, अभिनव भाव-माधाुरी भरी, छलकती, अति मधाुर रसीली òोतस्वती उस हंस वाहिनी हिन्दी सरस्वती की कवि सुवर्ण विन्यास समुत्सुक सरस रसना रूपी सुचमत्कारी उत्स (झरने से) कलरव कल कलित अति सुललित प्रबल प्रवाह सा उमड़ चला आता, मर्मज्ञ रसिकों के श्रवण पुट रन्धा्र की राह, मन तक पहुँच सुधाा से सरस अनुपम काव्य रस चखाता है; उस समय उपस्थित श्रोता मात्राा यद्यपि छन्द वन्द से स्वच्छन्द समुच्चारित शब्द लहरी प्रवाह पुंज को समभाव से श्रवण करते हैं; परन्तु उसका चमत्कार, आनन्द, रसास्वादन, सबको समतुल्य नहीं होता।

एक अवतरण और देखिए-

2. ''सरद पूनों के समुदित पूरनचन्द की छिटकी जुन्हाई, सकल मनभाई के भी मुँह मसिमल, पूजनीय अलौकिक पद नख चन्द्रिका की चमक के आगे तेजहीन, मलीन, और कलंकित दरसाती, लजाती, सरस सुधाा धाौली अलौकिक सुप्रभा फैलाती,अशेष मोह जड़ता प्रगाढं तमतोम सटकाती मुकाती निज भक्त जनमन वांछित वराभय भुक्ति मुक्ति सुचारु चारों मुक्त हाथों से मुक्ति लुटाती, सकल कला आलाप कलकलित सुललित सुरीली मीड़ गमक झनकार सुतार-तार सुरग्राम अभिराम लसित बीन प्रवीन पुस्तकाकलित मखमल से समधिाक सुकोमल अति सुन्दर सुविमल लाल प्रवाल से लाल लाल कर पल्लव सुहाती, विविधा विद्या-विज्ञान सुभसौरभ सरसाते विकसे फूले सुमन प्रकाश हास बास बसे, अनायास सुगन्धिातसित बसन लसन सोही सुप्रभा विकसाती, सुविमल मानस बिहारी, मुक्ताहारी नीर-क्षीर विचार सुचतुर कवि कोविद राज राज हियसिंहासन निवासिनी मन्दहासिनी त्रिालोक प्रकासिनी सरस्वती माता के अति दुलारे प्राणों से प्यारे पुत्राों की अनुपम अनोखी अतुल बलशाली परम प्रभावशाली सुजन मन मोहिनी नव रस भरी सरस सुखद विचित्रा वचन रचना का नाम ही साहित्य है।

पंडित गोविन्द नारायण मिश्र ने इस प्रकार का गद्य लिखकर हिन्दी भाषा में कविवर बाण विरचित कादम्बरी की शब्दच्छटा दिखलाने की चेष्टा की है, वैसा ही माधाुर्य भी उत्पन्न करना चाहा है। परन्तु वह बात तो प्राप्त हुई नहीं, भाषा अवश्य दुर्बोधा हो गई। अधिाकतर उन्होंने ऐसी ही हिन्दी लिखी है, जब लेखनी उठाते थे, धााराप्रवाह रूप में ऐसी हिन्दी लिखते चले जाते थे। उनको इस प्रकार की हिन्दी लिखने में आनन्द भी बड़ा आता था, क्योंकि दण्डी के ढंग की समस्त पदावली उनको बहुत प्यारी थी। इन अवतरणों को देखकर उनके भाषाधिाकार की प्रशंसा करनी पड़ती है। इनमें जो कवि कर्म्म है, वह भी साधाारण नहीं, परन्तु उनकी दुरूहता और जटिलता, उसका आनन्द उपभोग करने नहीं देती। जिस गद्य में छोटे-छोटे वाक्य न हों, जो उद्वेलित समुद्र समान अपने प्रचुर समस्त पद प्रयोग उत्तााल तरंगों से आप ही विक्षुब्धा हो, वह औरों को क्या विमुग्धा कर सकेगा। किन्तु इन अवतरण्ाों को देखकर यह न समझना चाहिए कि उनकी समस्त गद्य रचनाएँ ऐसी ही हैं। ये रचनाएँ जो पं. जी की विशेषता दिखलाने के लिए ही यहाँ उध्दाृत की गई हैं। उनका साधाारण गद्य सुन्दर है और उसमें उसकी विशेषताएँ पाई जाती हैं। एक अवतरण ऐसे गद्य का भी देखिए-

''परंतु स्वच्छ दर्पण पर ही अनुरूप यथार्थ सुस्पष्ट प्रतिबिम्ब प्रतिफलित होता है। उससे सामना होते ही, अपनी ही प्रतिबिम्बित प्रतिकृति, मानो समता की स्पध्र्दा में आ, उसी समय सामना करने आमने-सामने आ खड़ी होती है। भला कहीं ऍंधोरी कोठरी की मिट्टी की, अति मलिन पुरानी भीत में भी किसी का मुँह दिखाई दिया है? अथवा उस पर कभी क्या किसी बिम्ब का प्रतिबिम्ब पड़ सकता है?'' 'आत्माराम की टें टें' शीर्षक लेख-माला में उनका गद्य और अधिाक सरल एवं स्पष्ट है। उन्होंने विभक्तियों को संज्ञापदों से मिलाकर लिखने की परिपाटी चलाई और 'विभक्ति-विचार, शीर्षक एक लेख लिखकर उसका समर्थन किया। हिन्दी के कुछ लेखकों ने इस परिपाटी का अनुसरण्ा भी किया किन्तु वह सर्वसम्मत नहीं हो सकी। पं. जी अपने समय के प्रभावशाली वक्ता और लेखक थे, उनका हिन्दी भाषा-प्रेमियों पर अधिाकार भी बड़ा था, इन्हीं गुणों के कारण अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का सभापतित्व पद भी उन्हें प्राप्त हुआ था।'

पं. बदरीनारायण चौधारी 'प्रेमघन' ने भी अधिाकतर साहित्यिक गद्य ही लिखने की चेष्टा की। वरन् यह कहना चाहिए कि उन्हें साहित्यिक गद्य लिखना ही प्रिय था। यहाँ तक कि साधाारण समाचार तक साहित्यिक अलंकारों द्वारा अलंकृत होकर ही उनकी 'आनन्द कादम्बिनी' नामक मासिक पत्रिाका में स्थान पाते थे। उनके गद्य में एक अद्भुत सजीवता और सुन्दरता आरंभ से अंत तक दिखलायी पड़ती, जिसे पढ़ते ही पाठकों का हृदय प्रसून समान उत्फुल्ल हो उठता। उनकी भाषा के दो नमूने देखिए-

1. ''जैसे किसी देशाधाीश के प्राप्त होने से देश का रंग ढंग बदल जाता है, तदू्रप पावस के आगमन से, इस सारे संसार ने भी नया रंग रूप पकड़ा, भूमि हरी भरी होकर नाना प्रकार की घासों से सुशोभित भई, मानो मारे मोद के रोमांच की अवस्था को प्राप्त भई। सुन्दर हरित पत्राावलियों से भरित तरुगनों की सुहावनी लताएँ, लिपट लिपट मानो मुग्धाा मयंक मुखियों को अपने प्रियतम के अनुरागालिंगन की विधिा बतलातीं।''

2. ''दिव्य देवी श्री महाराणी बड़हर लाख झंझट झेल, और चिरकाल पर्यंत बड़े बड़े उद्योग और मेल से, दुख के दिनसकेल, अचल 'कोर्ट का पहाड़ ढकेल' फिर गद्दी पर बैठ गईं।''

ईश्वर का भी क्या खेल है कि कभी तो मनुष्य पर दुख की रेल पेल है और कभी उस पर सुख की कुलेलA

साहित्यिक गद्य मिश्र जी और चौधारी जी दोनों का है, परन्तु अन्तर यह है कि मिश्र जी का गद्य उद्विग्नकर है, और चौधारी जी का मनोहर। मिश्र जी का वाक्य दूर तक चलता है, परन्तु चौधारी जी का वाक्य छोटा-छोटा होता है, इसलिए उसमें हृदयग्राहिता अधिाक है। मिश्र जी का जीवन सादा था, और वे पण्डित प्रकृति के थे इसलिए उनकी रचना में न तो चटक मटक है, न लचकीलापन। चौधारी जी अमीराना ठाट के आदमी थे, रसिक तो थे ही, मनचले और बाँके तिरछे भी, इसलिए उनकी भाषा भी कहीं चटकीली है, कहीं अलंकृत है, कहीं रसीली। कहीं ऐंठती चलती है, कहीं मचलती। कहीं अलंकारों के भार से दब जाती है, कहीं बड़े ठाट से तनी फिरती है। इसलिए अन्तर होना स्वाभाविक है। चौधारी जी समालोचक भी थे, वरन् सच पूछिए तो हिन्दी साहित्य में समालोचना प्रणाली का आरंभ उन्हीं से हुआ।

एक ओर तो पं. गोविंद नारायण मिश्र और पं. बदरीनारायण चौधारी संस्कृत के तत्सम शब्दों के प्रयोग की ओर विशेष दत्ताचित्ता होकर हिन्दी गद्य में एक विचित्रा सरसता भर रहे थे, दूसरी ओर बालकृष्ण भट्ट शैली में उक्त दोनों महोदयों से बहुत कुछ भिन्नता रखते हुए वही कार्य करने में संलग्न थे। पं. गोविन्द नारायण मिश्र और पं. बदरी नारायण चौधारी को प+ारसी अरबी के शब्दों के प्रति कुछ भी आकर्षण नहीं था। परन्तु भट्ट जी प+ारसी अरबी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग अपनी रचना में स्वतंत्राता से करते थे। उक्त दोनों महाशय राजा लक्ष्मण सिंह की भाँति प+ारसी, अरबी शब्दों को अपनी रचना में स्थान नहीं देना चाहते थे। यह दूसरी बात है कि किसी अवसर पर वे उन भाषाओं के किसी प्रचलित शब्द को अपनी रचनाओं में स्थान दे देवें,ं परन्तु प्राय: वे उनसे बचते थे। भट्टजी पं. प्रताप नारायण की तरह इस बात की परवाह नहीं करते थे। यदि उनको उक्त भाषा का कोई प्रचलित शब्द भाषा प्रवाह के अनुकूल ज्ञात होता था, तो वे उसका प्रयोग निस्संकोच भाव से करते थे। वे पं. प्रताप नारायण की भाँति ग्रामीण शब्दों का प्रयोग भी कर जाते थे। भाषा शैली के विषय में भट्टजी का और पं. प्रताप नारायण का प्राय: एक मार्ग है और चौधारी जी का एवं मिश्र जी का एक। ये लोग बाबू हरिश्चन्द्र के ही सहयोगी हैं, और उन्हीं की शैली का प्राय: अनुसरण करते हैं। परन्तु स्वतंत्रा विचार होने के कारण सभी कुछ न कुछ स्वतंत्राता रखते हैं। माला सबों की एक प्रकार की है, किन्तु फूलों में और सजावट में अवश्य कुछ भिन्नता दृष्टिगत होती है। भट्ट जी के कुछ गद्य देखिए-

1. ''इस ऑंसू में भी भेद है। कितनों का पनीला कपार होता है, बात कहते रो देते हैं। अक्षर उनके मुँह से पीछे निकलेगा,ऑंसुओं की झड़ी पहले ही शुरू हो जायेगी। स्त्रिायों के जो बहुत ऑंसू निकलता है, मानो रोना उनके यहाँ गिरों रहता है,इसका कारण यही है कि वे नाम ही की अबला और अधाीर हैं। दुख के वेग में ऑंसू को रोकने वाला केवल धाीरज है। उसका टोटा यहाँ हरदम रहता है, तब इनके ऑंसू का क्या ठिकाना है। सत्तवशाली धाीरज वालों को ऑंसू कभी आता ही नहीं। कड़ी से कड़ी मुसीबत में दो-चार कतरे ऑंसू के मानो बड़ी बरकत हैं। बहुत मौकों पर ऑंसू ने ग़जब कर दिया है। सिकंदर का कौल था कि अपनी माँ की ऑंख के एक कतरा ऑंसू की कीमत मैं बादशाहत से भी बढ़ कर मानता हूँ। रेणुका के अश्रुपात ही ने परशुराम से इक्कीस बार क्षत्रिायों का संहार कराया। कितने ऐसे लोग भी हैं जिन्हें ऑंसू नहीं आता। इसलिए जहाँ पर बड़ी जरूरत ऑंसू गिराने की हो तो उनके लिए प्याज का गट्ठा पास रखना बड़ी सहज तरकीब निकाली गयी। प्याज जरा-सा ऑंख में छू जाने से ऑंसू गिरने लगता है।''

''किसी को बैंगन बावले किसी को बैंगन पत्थ'' बहुधाा ऑंसू का गिरना भलाई और तारीप+ में दाख़िल है। हमारे लिए ऑंसू बड़ी बला है। नजले का जोर है, दिन रात ऑंसू टपकता है, ज्यों ज्यों ऑंसू गिरता है त्यों त्यों बीमारी कम होती जाती है। सैकड़ों तदबीरें हम कर चुके ऑंसू का टपकना बंद न हुआ। क्या जाने बंगाल की खाड़ी वाला समुद्र हमारेकपार में आकर भर रहा है। ऑंख से तो ऑंसू चला ही करता है, आज हमने लेख में भी ऑंसू ही पर कलम चला दी, पढ़ने-वाले इसे निरी नहूसत की अलामत न मान हमें क्षमा करेंगे।

2. ''दर्शन (पि+लासप+ी) का अनुशीलन करते करते जिनका मस्तिष्क यहाँ तक परिष्कृत और बुध्दि इतनी पैनी हो जाती है कि उनकी बहस और तकदीर के मुकाबले कोई बात कभी उनके अविश्वासी चित्ता में स्थान पा नहीं सकती...।''

3. ''यद्यपि 'ब्रेनवर्क' मस्तिष्क का काम और शारीरिक कामों की अपेक्षा अधिाक योग्यता प्रकट करता है किन्तु कसौटी के समय परख केवल दिल की की जाती है।''

उक्त अवतरणों के रेखांकित शब्दों पर विचार कीजिए। वे सबके सब प+ारसी, अरबी के शब्द हैं। वे बोलचाल में गृहीत हो गये हैं। अतएव हिन्दी गद्य लिखने में उनका प्रयोग होना अनुचित नहीं। भट्टजी 'हिन्दी प्रदीप' नामक मासिक पत्रा के संचालक और सम्पादक भी थे। जहाँ इस पत्रा द्वारा वे यह उद्देश्य सिध्द करना चाहते थे कि शिक्षित लोगों का धयान हिन्दी साहित्य की ओर आकर्षित हो, वहाँ उन्हें इस बात का भी धयान बना रहता था कि 'हिन्दी-प्रदीप' में हीन श्रेणी की साहित्य-सामग्री न निकले। अतएव उन्होंने व्यंग्यात्मक रोचक निबंधा और शिक्षाप्रद उपन्यास आदि से ही उसका कलेवर भरा। पं. बालकृष्ण भट्ट के हृदय में देश की दुर्दशा के कारण बहुत अधिाक पीड़ा थी। इससे उनके व्यंग्यों में हृदय के मर्म-स्थल पर आघात करने की ऐसी शक्ति देखी जाती है, जिसका प्रभाव उनके समसामयिक समस्त लेखकों पर पाया जाता है। पं. प्रतापनारायण मिश्र जैसे कुछ उदात्ता विचार के लोगों की बात दूसरी है। अतएव भाषा के सम्बन्धा में उन्होंने जो नीति ग्रहण की, उससे उनकी व्यंग्यात्मक शैली के विकास में बहुत अधिाक सहायता मिली; क्योंकि तत्कालीन पठित समाज की बोलचाल पर उर्दू का गहरा रंग चढ़ा होने के कारण व्यंग्य को प्रभावशाली बनाने के लिए प+ारसी अरबी के प्रचलित शब्दों का अंगीकार अनिवार्यत: आवश्यक था। वे'कपार', 'धाीरज', 'निरी', 'पैनी' आदि शब्दों का प्रयोग भी करते हैं, मेहरिया, 'तिथ' आदि शब्दों का प्रयोग करते पं. प्रतापनारायण जी को भी देखा जाता है। पं. गोविन्द नारायण मिश्र की रचना का दूसरा अवतरण देखिए, उसमें जिन शब्दों को काला कर दिया गया है, वे सब ब्रजभाषा के शब्द हैं, और उनका प्रयोग भी ब्रजभाषा की भाँति किया गया है, वे लौं का व्यवहार भी करते थे। प्रेमघन जी के गद्य में भी भई] तरुगन, इत्यादि शब्दों का प्रयोग मिलता है। इससे पाया जाता है कि इन लोगों के समय में भी जैसा चाहिए वैसा भाषा का परिष्कार नहीं हुआ था। वाक्य भी उन लोगों के अशुध्द हैं, जिन पर मैंने लम्बी लकीरें खींच दी हैं, उनको देखिए। बाबू हरिश्चन्द्र की रचना में भी ये बातें पाई जाती हैं। पण्डित अम्बिकादत्ता व्यास और गोस्वामी राधााचरण की लेख माला में भी ये दोष देखे जाते हैं। इससे यह सिध्दान्त पर उपनीत होना पड़ता है, कि उस समय पूर्ण उन्नत होने पर भी जैसा चाहिए वैसा गद्य परिष्कृत नहीं हुआ।


 

 

 

 

× चम-प्रकरण

i

प्रचार-काल

यह प्रचार-काल बाबू हरिश्चन्द्र के समय से ही प्रारम्भ होता है, परन्तु वह विस्तृत एवं व्यापक उनके स्वर्गारोहण के बाद हुआ। किसी भाषा के प्रचार-कार्य के साथ समाचार-पत्राों एवं मासिक-पत्राों आदि का घना सम्बन्धा है। इसी प्रकार प्रचारकों और पुस्तक प्रणेताओं से भी उसका गहरा सम्पर्क है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आदि प्रतिभाशाली लेखकों ने हिन्दी भाषा की सर्वतोमुखी उन्नति के लिए उद्योगशील होकर, साहित्य की जो धाारा उन्नतिकाल में बहा दी थी, प्रचारकाल में द्विगुणित वेग से वह गतिवती हुई।

इस काल में यदि एक ओर स्वामी दयानन्द सरस्वती के कुछ अनुयायी हिन्दी गद्य को अपने धाार्मिक ग्रन्थों की रचनाओं द्वारा अग्रसर बनाने में तत्पर थे तो, दूसरी ओर बाबू हरिश्चन्द्र के अनेक सम सामयिक विविधा प्रकार के साहित्य पुस्तकों का प्रणयन कर उसकी सेवा के लिए कटिबध्द थे। कचहरियों में हिन्दी भाषा को स्थान दिलाने का उद्योग भी इसी समय में प्रारम्भ हुआ, अतएव इस सूत्रा से भी अनेक सभा सोसाइटियों का जन्म हुआ। इनका उद्देश्य भी हिन्दी का प्रचार और विस्तार था। सनातन-धार्मियों का एक विशाल दल भी इस समय इस कार्य में लग्न हुआ। आर्य-समाज की प्रतिद्वंद्विता के कारण उन पण्डितों ने भी हिन्दी भाषा में ग्रंथ-रचना के लिए लेखनी पकड़ी, जिन्होंने आजीवन संस्कृत देवी की आराधाना का ही व्रत ग्रहण कर लिया था। फिर क्या था अनेक पत्रा-पत्रिाकाएँ निकलीं, नाना प्रकार के ग्रन्थ बने और तरह-तरह के आन्दोलन उठ खड़े हुए। मैं क्रमश: सबका वर्णन करूँगा।

1. पं. भीमसेन शर्मा स्वामी दयानन्द सरस्वती के शिष्य थे। अपने जीवनकाल में वे स्वामी दयानन्द के आन्दोलन से बहुत दिनों तक सम्बध्द रहे, जिसका परिणाम यह हुआ कि संस्कृत के साथ हिन्दी भाषा का अनुराग भी उनके हृदय में उत्पन्न हो गया। पण्डित जी संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड पण्डित और अपने समय के अद्वितीय वेदवेत्ताा थे। वेद विद्या पारंगत सामाश्रमी के स्वर्णारोहण के उपरान्त कलकत्ताा के संस्कृत कॉलेज के वेदाचार्य का प्रधाान पद आपको ही प्राप्त था। आपमें सत्यप्रियता इतनी थी कि वेद मंत्राों के अर्थ में मत-भिन्नता उत्पन्न होने के कारण ही आपका सम्बन्धा स्वामी दयानन्द से छूटा। उन्होंने जैसे मार्मिक और विचारपूर्ण लेख वैदिक विषयों पर लिखे, शास्त्राीय सिध्दान्तों का विवेचन जिस विद्वता के साथ किया। वह प्रशंसनीय ही नहीं अभूतपूर्व है। ऐसे अपूर्व विद्वान् का हिन्दी क्षेत्रा में अवतीर्ण होना हिन्दी के लिए अत्यन्त गौरव की बात थी। उन्होंने जैसे गम्भीर धाार्मिक निबन्धा हिन्दी भाषा में लिखे हैं, जैसे शास्त्राीय ग्रंथ रचे हैं, ब्राह्मण सर्वस्व,निकाल कर हिन्दी भाषा को जो गौरव प्रदान किया है, उसके लिए हिन्दी संसार विशेषकर धाार्मिक जगत उनका सदैव कृतज्ञ रहेगा। वे वाग्मी भी बड़े थे, जिन्होंने उनके पांडित्यपूर्ण व्याख्यान सुने हैं, वे जानते हैं कि उनका भाषण कितना उपपत्तिामूलक और प्रौढ़ होता था। ऐसा ही उनका हिन्दी गद्य भी है। जहाँ तक पूर्ण और विवेचनात्मक शास्त्राीय विषय लिखा गया है, वहाँ उनकी भाषा गहन से गहन है। परन्तु साधाारण विषयों को उन्होंने बड़ी सुलझी और परिष्कृत भाषा में लिखा है। उनके गद्य में प्रवाह और प्रांजलता दोनों है, भाषा भी उनकी मँजी हुई है। देखिए-

''आत्म गौरव का संस्कार जागे बिना जातीय अभ्युत्थान का होना असम्भव है और जहाँ की भाषा अपने देश के उपकरणों से संगठित नहीं वहाँ आत्म-गौरव के संस्कार का आविर्भाव होना असम्भव है। क्योंकि ऐसी दशा में संसार यही कहेगा कि ''कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानमती ने कुनबा जोड़ा।'' जहाँ आत्मगौरव का अभाव है, उस देश या जाति का जातीय अभ्युत्थान होना भी असंभव ही जानो।

''जो मनुष्य ऐसे वंश में उत्पन्न हुआ है, जिसमें गौरव का चिद्द भी नहीं, न कोई वैसार् कत्ताव्य-पालन है, उसका उत्थान होना संभव नहीं है। क्योंकि जन्मान्तरीय संस्कार स्वच्छ होने पर भी उन संस्कारों के उद्बोधाक निमित्ता कारण उस जाति को प्राप्त नहीं हैं। इसी कारण ऐसे साधानहीन वंशों में उच्च कोटि के विचारवान मनुष्यों का सदा ही अभाव दिखता है। विचार का स्थान है कि मेवाड़ के महाराणा वीरों ने म्लेच्छों के समक्ष शिर नहीं झुकाया तथा अन्य सभी राजाओं ने शासक यवनों की अधाीनता स्वीकार की। इसका कारण वंश-परम्परागत आत्मगौरव ही था।''

इन दोनों अवतरणों को देखकर आपको पता चल गया होगा कि पण्डितजी की प्रवृत्तिा किस प्रकार की भाषा लिखने की ओर थी, उनकी भाषा परिष्कृत है, परन्तु है संस्कृतगर्भित। आजकल ऐसी ही भाषा का अधिाक प्रचार है, इसलिए हम यह कह सकते हैं कि इस शैली को प्रचलित और पुष्ट करने वाले पुरुषों में प्रथम स्थान पण्डितजी ही का है। उनमें इस प्रवृत्तिा का उदय होना स्वाभाविक था क्योंकि प्रथम तो वे संस्कृत के विद्वान् थे, दूसरे वे उन लोगों में थे जो विजातीय भाषा के शब्दों को ग्रहण करना युक्ति-संगत नहीं मानते थे। उनका विचार था, ऐसा करना रूपान्तर से अपनी भाषा की न्यूनता स्वीकार करना है। अन्यों से इस विषय में वे अधिाक कट्टर थे। वे विदेशी और विजातीय भाषा के शब्द न लेने की चर्चा करते हुए, एक स्थान पर यह लिखते हैं-

''शिकायत शब्द अन्य भाषा का है। परन्तु हिन्दी भाषा में विशेष रूप से प्रचलित हो गया है। यदि इस शब्द के स्थान में उपालम्भ का प्रयोग करने की रुचि नहीं है और यह इच्छा है कि इसी अर्थ का बोधाक इसी से मिलता हुआ संस्कृत शब्द हो तो वैसे शब्द भी संस्कृत भाषा की अद्भुत शक्ति होने से हमको प्राप्त हो सकते हैं, जिनका स्वरूप, और अर्थ दोनों मिल सकते हैं,जैसे 'शिक्षा यत्न' या शिक्षा यंत्रिा। जिस मनुष्य की शिकायत की जाती है उसको कुछ शिक्षा वा दण्ड देने वा दिलाने का अभिप्राय होता है। जिससे वह आगे वैसा न करे, इससे 'शिकायत' शब्द के स्थान में शिक्षायत्न शब्द का प्रयोग उचित है।''

इस अवतरण में यह शिक्षा है कि यदि आवश्यकता विदेशी विजातीय शब्दों को ग्रहण करना ही पड़े तो किस प्रकार उनको संस्कृत रूप दे दिया जावे। दूसरे स्थान पर वह यह कहते हैं, कि यदि विदेशी अथवा विजातीय शब्दों को मुख्य रूप में ही लिखना पसन्द हो तो, यह भी कर सकते हो, परन्तु उसको संस्कृत का शब्द ही मान लो, क्योंकि उसमें यह शक्ति है कि अन्य भाषा के शब्दों की व्युत्पत्तिा वह उसी अर्थ में कर लेती है। निम्नलिखित अवतरण्ा को पढ़िए और उसमें उनका पाण्डित्य देखिए-

''यदि हम आस्मान शब्द को अपने व्यवहार में लावें तो उसे असमान शब्द का अपभ्रंश मानें 'आसमन्तास्समानानमेव रूपं यदस्ति सर्वत्रा विद्यते नचघटादिषु विकृतं भवति तदा समानम्।' जो सब घटादि पदार्थों में एक ही रूप रहता, जिसमें किसी प्रकार का विकार नहीं होता, वह आसमान नामक आकाश है, उसी का अपभ्रंश आसमान हो गया। बन्धा धाातु से उर प्रत्यय करने पर बन्धाु शब्द बनेगा, जिस समुद्र तट पर जहाज बाँधो जावें, वह स्थान बन्धाुर हुआ, उसी का अपभ्रंश बन्दर शब्द को मान लेना चाहिए। अथवा स्तुति अर्थ वाले बदि धाातु से औणादिक अर प्रत्यय करने पर प्रशस्त कार्यसाधाक स्थान का नाम बन्दर हो सकता है।''

पंडित जी का विचार आत्मनिर्भरतामूलक है, उसका आधाार वह आर्य संस्कृति है, जिसको परावलम्बन प्रिय नहीं और जो सर्वथा शुध्दतावादी है। किन्तु परिस्थिति उनके विचारों के अनुकूल नहीं थी, और आवश्यकताओं की दृष्टि किसी अन्य लक्ष्य की ओर थी, इसलिए उनका कथन नहीं सुना गया, किन्तु हिन्दी भाषा विकास की चर्चा के समय उनका स्मरण सदा होता रहेगा। जनता की बोलचाल की भाषा बड़ी शक्तिशालिनी होती है, भाषा कितनी ही साहित्यिक बने परन्तु वह उसके प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकती। विदेशीय और विजातीय जो शब्द अधिाक प्रचलित हो जाने के कारण बोलचाल में गृहीत हो जाते हैं, उनका सर्वथा त्याग असम्भव है। प+ारसी अरबी, ऍंग्रेजी आदि भाषाओं के जो सहòों शब्द आज बोलचाल में प्रचलित हैं, उनके स्थान पर गढ़े शब्द रखने से भाषा की जटिलता बढ़ती है और वह बोधागम्य नहीं रह जाती। इसलिए ऐसे शब्दों का ग्रहण अनिवार्य हो जाता है। अनिच्छा अथवा संस्कृति उसके प्रसार में बाधाा नहीं पहुँचा सकती, क्योंकि संसार और समाज सुविधााप्रेमी है। फिर भी पण्डितजी की सम्मति उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखी जा सकती। इस प्रकार की सम्मतियाँ कार्य में परिणत न होकर भी भाषा को मर्यादित करने में बड़ी सहायक होती हैं। इनको पढ़कर वे लोग भी सावधाानीपूर्वक पाँव उठाने लगते हैं, जिनको ऑंख मूँदकर चलना ही पसंद आता है। पण्डितजी ने हिन्दी क्षेत्रा में साहित्य सम्बन्धाी जितने कार्य किये हैं, वे सब बहुमूल्य हैं,और उनके द्वारा हिन्दी संसार अधिाक उपकृत हुआ है।

2. पण्डित भीमसेन जी के उपरान्त हिन्दी के धाार्मिक क्षेत्रा में अपनी कृतियों द्वारा विशेष स्थान के अधिाकारी विद्यावारिधिा पं. ज्वाला प्रसाद हैं। आपने भी अनेक ग्रंथें की रचना की है और इस विषय में बड़ा नाम पाया है। आपका हिन्दी का यजुर्वेद भाष्य बड़ा ही परिश्रम साधय और महान् कार्य है। आपकी रामायण की टीका बहुत प्रसिध्द है, उसका प्रचार भी अधिाक हुआ है। आपका दयानन्द तिमिर भास्कर नामक ग्रंथ भी उपादेय है। आपने कई पुराण्ाों का अनुवाद भी हिन्दी भाषा में किया है। आपके समस्त ग्रंथ वेंकटेश्वर प्रेस में छपे हैं। आप बहुत बड़े वाग्मी थे। आप जैसा सभा पर अधिाकार करते मैंने अन्य को नहीं देखा। आपके रचे ग्रंथों की संख्या भी अधिाक है, परन्तु समस्त ग्रंथ धाार्मिक विषयों पर ही लिखे गये हैं। केवल बिहारी सतसई की टीका ही ऐसी है जिसे हम धाार्मिक ग्रंथ नहीं कह सकते। परन्तु यह टीका उनके पद-मर्यादा से बहुत नीचे है। आजीवन धाार्मिक क्षेत्रा ही उनका था और इसी में उनको अतुलनीय कीर्ति प्राप्त हुई। पण्डित बलदेव प्रसाद आपके लघु भ्राता थे। आपने भी अनेक हिन्दी ग्रंथों की रचना की है, आपके ग्रंथ भी उपयोगी और सुन्दर हैं। आप अपने ज्येष्ठ भ्राता की ही प्रतिमूर्ति थे।

मिश्रजी के गद्य का उदाहरण भी देखिए-

''श्री गोस्वामी जी का जीवन चरित्रा लिखने के लिए जिस-जिस सामग्री की आवश्यकता है, वह इस समय सर्वथा प्राप्त नहीं होती। इसलिए इनके चरित्रा लिखने के लिए दूसरे ग्रन्थों और कहावतों का संग्रह करना पड़ा है। सुनते हैं वेणीमाधाव दास कृत एक गोसाईं चरित्रा नामक ग्रन्थ है, जो गोस्वामी जी के समय में ही रचा गया है, परन्तु वह भी इस समय नहीं मिलता। इस कारण भक्तमाल तथा दूसरे ग्रन्थों के आधाार पर कुछ लिखते हैं।'' ''एक समय एक सन्त ने कहा राम का अवतार तो द्वादश कला का है, कृष्ण का सोलह कला है, सो तुम सोलह कलावतार को क्यों नहीं भजते। तुलसीदास जी यह सुनते ही दो घड़ी तक प्रेम में मग्न हो गये और फिर बोले हम तो आजतक रामचन्द्र को कौशल राजकुमार जानते थे, पर तुमने तो बारह कला का ईश्वर का अवतार बताकर हमारी भक्ति और भी दृढ़ कर दी, अब उनको कैसे त्याग दूँ। यह सुन अनन्य उपासी जान साधाु ने उनके चरण पकड़ लिये। यद्यपि गोस्वामी जी कह सकते थे कि सूर्य बारह कला और चन्द्र सोलह में पूर्ण होता है, यह उसी का उपलक्ष्य है, पर उन्होंने वही उत्तार देना उचित जाना।''

3. ''साहित्याचार्य पं. अम्बिकादत्ता व्यास का वर्णन मैं पहले कर आया हूँ। वे जैसे धार्माचार्य हैं, वैसे ही साहित्याचार्य। उनकी अनेक उपाधिायाँ हैं। वे भारतेन्दु जी के समकालीन थे। पं. प्रतापनारायण मिश्र, प्रेमघन, पं. गोविन्दनारायण मिश्र और पं. बालकृष्ण भट्ट के समान उनका स्थान भी उस समय के साहित्य-सेवियों में प्रधाान है, अतएव उन्हीं के साथ उनका वर्णन भी होना चाहिए था। परन्तु धार्म-क्षेत्रा के उनके कार्य साहित्य-क्षेत्रा से भी अधिाक हैं, बिहार प्रान्त में धार्म के साथ उन्होंने हिन्दी का प्रचार भी बड़ी तत्परता के साथ किया, इसलिए मुझको प्रचार कला में ही उन्हें लाना पड़ा। वे विचित्रा बुध्दि के मनुष्य थे। उन्होंने धाार्मिक-क्षेत्रा में रहकर उस समय अवतारकारिका, अवतार मीमांसा आदि जितने ग्रंथों की रचना संस्कृत में की, उनकी उस समय बड़ी प्रशंसा हुई थी। उनका मूर्ति-पूजा नामक हिन्दी ग्रन्थ भी इस विषय में अपूर्व है। बिहार प्रान्त में उन्होंने जिस प्रकार धार्म-दुन्दुभी का निनाद किया, वह बड़ा ही व्यापक और प्रभावशाली था। उन्होंने गद्य के कई बड़े-बड़े ग्रन्थ लिखे, वे पीयूष प्रवाह नामक अपने मासिक पत्रा को चिरकाल तक निकालते रहे। धार्म-क्षेत्रा में उनका कार्य जितना ठोस है,उतना ही साहित्य-क्षेत्रा में। उनका 'गद्य मीमांसा' नामक हिन्दी में लिखा गया ग्रन्थ भी अपूर्व है, उनके पहले किसी ने ग्रंथ लिखकर गद्य शैली-निधर्ाारण की चेष्टा नहीं की थी। उनका गद्य भी विलक्षण और कई प्रकार का होता था, कुछ उदाहरण लीजिए-

''सम्वत् 1934 में एंग्लो की उत्ताम वर्ग की पढ़ाई मैंने समाप्त की। इसी वर्ष अभिनव स्थापित काश्मीराधाीश के संस्कृत कॉलेज में मैंने नाम लिखाया। वहाँ परीक्षा दी। कॉलेज की प्रधाान अधयक्षता जगत्-प्रसिध्द स्वामी विशुध्दानन्द जी के हाथ में थी, उनने यावत् पंडितों के समक्ष मुझे व्यास पद दिया। यों तो पहले से ही व्यास जी कहा जाता था, परन्तु अब वह पद और पक्का हो गया।''

''थोड़े ही दिनों के ही अनन्तर पोरबन्दर के गोस्वामी बल्लभ कुलावतंस श्री जीवन लाल जी महाराज से मेरा परिचय हुआ। वे मुझसे कुछ पढ़ने लगे, उनके साथ कलकत्तो गया। वहाँ सनातन-धार्म के विभिन्न विषयों पर मेरी 28 वक्तृताएँ हुईं। कई सभाओं में बंगदेशीय पण्डितों से गहन शास्त्राार्थ हुए।''

''अब देखिए वहीं वेदान्तियों के सिध्दान्त मूर्ति पूजा द्वारा कैसे सुखपूर्वक सिध्द होते हैं। जगत का सम्पर्क छोड़ परमात्मा में एकदम लीन हो जाना, बात तो इतनी-सी है और इसी के साधाने में अहन्ता-ममतादि का त्याग है तो जगन्मिथ्या,जगन्मिथ्या कहते-कहते, तो आप लोगों को बतलाया ही जा चुका है ''पादांगुष्ठ शिरोषाग्नि: कदामौलिमवाप्स्यति'' और बाबा किसी अधिाकारी को उसी ढंग से शीघ्र जगत् से असम्पर्क हो, और आत्मानुभव हो तो हम उसके लिए कुछ मना भी नहीं करते, वह ब्रह्मानन्द में डूबे, पर देखिए तो भक्तों का एक कैसा अद्भुत रास्ता है।''

''आहा! इस समय भी स्मरण करने से ऐसा जान पड़ता है, कि मानो रात्रिा का अंधाकार क्रम से पीछे हट चला है, चिड़ियों ने धाीमे-धाीेमे कोमल सुर से कुछ चकचकाहट आरंभ की है और ठंडी-ठंडी हवा चल रही है। इसी समय नींद खुली और ऑंख खोलते ही चट नारायण का नाम ले, कुछ आवश्यक कृत्यों से निपट, जै जै करते मन्दिर की ओर दौड़ पड़े।''

4. फुल्लौर जिला जालंधार निवासी पं. श्रध्दाराम जी पंजाब प्रान्त के प्रसिध्द हिन्दू धार्म प्रचारक और हिन्दी भाषा के कई ग्रन्थों के रचयिता हैं, जिनमें 'सत्यामृत प्रवाह' अधिाक ख्याति प्राप्त है। मरने के समय उनके मुख से हठात् यह निकला था कि'हिन्दी भाषा के दो बड़े लेखक थे, एक पंजाब में और एक बनारस में; अब केवल एक ही रह जायेगा।' इससे स्पष्ट है कि उनका स्वर्गवास बाबू हरिश्चन्द्र के पहले ही हुआ, क्योंकि जिस शेष लेखक की ओर उनका संकेत है, वे उक्त बाबू साहब ही हैं। ऐसी अवस्था में प्रचार काल में उनकी चर्चा उचित नहीं। परन्तु मैं पहले ही लिख चुका हूँ कि यह प्रचार काल उनके जीवन से ही प्रारम्भ होता है, इसलिए और इस कारण कि पं. जी हिन्दी के प्रसिध्द प्रचारक थे, उनकी चर्चा प्रचारकाल में ही की गई। पण्डितजी ने जितने ग्रंथ लिखे हैं, वे बड़े उपादेय हैं। उनका 'आत्मचिकित्सा' नामक ग्रन्थ भी बड़ा उत्ताम है। वे अनीवश्वरवादी थे, परन्तु हिन्दू शास्त्राों पर उनकी बड़ी श्रध्दा थी और सामाजिक समस्त नियमों का पालन वे बड़ी तत्परता से करते थे। हिन्दू धार्म में उनकी बड़ी ममता थी, और उसकी रक्षा के लिए वे सदा कटिबध्द रहते थे। जिस समय काश्मीर के मुसलमानों को हिन्दू बनाने की इच्छा काश्मीर नरेश की हुई, उस समय पं. जी ने इस विषय में उन्हें बहुत उत्साहित किया। किन्तु दुख है कि हिन्दुओं के दुर्भाग्य और विशेष कारणों से मन की बात मन में ही रह गई। पण्डित जी ने भाग्यवती नामक एक उपन्यास भी लिखा है जो बड़ा ही सुन्दर है। उन्होंने अपना जीवनचरित स्वयं 1400 पृष्ठों में लिखा था, परन्तु अब वह प्राप्त नहीं होता। कहा जाता है, छपने के पहले ही गुम हो गया। उनके गद्य का कुछ अंश देखिए-

''वह भी ईश्वर कृत नहीं, किन्तु समुद्र और अन्य नदी नालों का जल सूर्य की किरण द्वारा उदान वायु के वेग से ऊपर खैंचा जाता है और सूर्य की ताप से पिघलता-पिघलता अति सूक्ष्म हो के आकाश में मेघाकार दिखाई देता है। जब उसको ऊपर शीतल वायु मिले तो घृत की नाईं जम के भारी हो जाता है और अपान वायु के वेग से नीचे गिरने लगता है। यदि ऊपर शीतल वायु बहुत लगे तो अत्यंत गरिष्ट हो के ओले बरसने लगते हैं।''

- सत्यामृत प्रवाह

5. श्रीमान् पं. मधाुसूदन गोस्वामी हिन्दू-शास्त्रा के पारंगत विद्वान् और हिन्दी भाषा के प्रौढ़ लेखक थे। उन्होंने ग्रंथ भी बनाये हैं, किन्तु अधिाकांश निबन्धा ही उनके लिखे हैं, जो प्राय: पत्रा और पत्रिाकाओं में मुद्रित होते रहते थे। वे प्रचार के लिए बाहर आते-जाते नहीं देखे गये, लेखों के द्वारा ही उन्होंने धार्म की अच्छी सेवा की है। जितने धार्म विषयक लेख उन्होंने लिखे हैं, वे पठनीय और आदरणीय हैं। आलाराम सागर संन्यासी भी उस काल के एक अच्छे प्रचारकों में थे। उन्होंने विशेषत: इस विषय पर लेख लिखे हैं कि सिक्खों के 10 गुरु हिन्दू धार्म के रक्षक थे और सदा उन्होंने हिन्दू धार्म भावों का ही प्रचार किया है। वे हिन्दू और सिक्खों में सद्भाव स्थापन के बड़े उद्योगी थे। इस विषय के टै्रक्ट और छोटे-छोटे ग्रंथ लिखकर उन्होंने उनका प्रचार अधिाकता से किया था। इस सब ग्रंथों और टै्रक्टों को उन्होंने अधिाकांश हिन्दी भाषा ही में लिखा था। हिन्दी भाषा प्रचार के लिए भी वे बहुत उत्सुक रहतेथे।

6. हिन्दी भाषा के प्रचार के लिए आर्य समाजियों ने भी इस समय बड़ा उद्योग किया था। पंजाब प्रांत में हिन्दी भाषा के प्रचार का श्रेय उन्हीं को प्राप्त है। इस समय आर्य समाज में भी संस्कृत के धाुरंधार विद्वान् थे जो धार्म के साथ-साथ हिन्दी-भाषा का प्रचार भी करते थे। इनमें से स्वामी दर्शनानन्द, स्वामी श्रध्दानंद, पं. तुलसीराम, पं. गणपति शास्त्राी, पं. राजाराम और श्रीयुत आर्य मुनि का नाम विशेष उल्लेखनीय है। स्वामी दर्शनानन्द ने पत्रा और पत्रिाकाएँ भी निकालीं और धाार्मिक विचारों पर उत्तामोत्ताम ग्रंथ भी लिखे। उनके ग्रंथ प्रौढ़ विचारों से पूर्ण हैं। उनमें दार्शनिकता भी पाई जाती है। ये समस्त ग्रंथ अधिाकांश हिंदी भाषा में लिखे गये हैं। स्वामी श्रध्दानंद ने चिरकाल तक 'सत्यधार्म प्रचारक' का सम्पादन किया था और कतिपय धाार्मिक पुस्तकें भी लिखी थीं। उनके ग्रंथ भी उपादेय हैं और सामयिकता की दृष्टि से उनमें ऐसी बातें लिखी गयी हैं कि जो हिन्दू जाति को जाग्रत करती हैं। आप लोग देश- विदेशों में जाते और वहाँ पर आर्य समाज के साथ हिन्दी भाषा का प्रचार भी करते थे। पं. तुलसीराम और पं. गणपति शास्त्राी का शास्त्रा ज्ञान और वैदिक विषयों की अभिज्ञता प्रशंसनीय थी। दोनों सज्जनों की विचार-शैली गहन और युक्तिमूलक होती थी। पं. तुलसीराम एक मासिक पत्रा भी निकालते थे, वे उसमें शास्त्राीय विषयों की मीमांसा करते रहते थे। उनके भी अधिाकांश ग्रंथ हिन्दी भाषा में ही लिखे गये हैं और इस कारण हिन्दी भाषा के प्रचार में उनका उद्योग भी प्रशंसनीय था। पं. गणपति शास्त्राी की भाषण शक्ति जैसी अपूर्व थी वैसी ही विषय-विवेचन की योग्यता भी उनमें थी। उनके लेख गंभीर होते थे, उनके ग्रंथ भी उनके पांडित्य के प्रमाण हैं। पं. राजाराम ने उपनिषदादि अनेक प्राचीन ग्रंथों की टीका हिन्दी भाषा में लिखी है, और कुछ स्वतंत्रा ग्रंथों की भी रचना की है। श्रीयुत आर्य मुनि की कृतियाँ भी मूल्यवान हैं जो अधिाकांश हिन्दी भाषा में हैं, उनसे हिन्दी प्रचार की तात्कालिक प्रवृत्तिा में अच्छी सहायता प्राप्त हुई है।

7. इस काल में अयोधयानिवासी कुछ महात्माओं और विद्वानों ने भी हिन्दू धार्म, हिन्दू जाति और हिन्दी भाषा की बहुत बड़ी सेवा की थी। इनमें से स्वामी युगलानन्द शरण का नाम विशेष उल्लेख योग्य है। स्वामी युगलानन्द शरण संस्कृत, अरबी एवं प+ारसी के बड़े विद्वान् थे, हिन्दी-भाषा के तो एक प्रकार से आचार्य ही थे। वे हिन्दी के सत्कवि थे। उन्होंने रामलीला सम्बन्धाी पद्य के सुन्दर ग्रन्थ बनाये हैं, उनमें धाार्मिक भाव भी पर्याप्त मात्राा में मौजूद है। उनकी जितनी रचनाएँ हैं, सब बड़ी सरस और मधाुर हैं, उनमें हृदयग्राहिता की मात्राा भी अधिाक है। उन्होंने कुछ ग्रन्थों की भी रचना की है और कतिपय ग्रन्थ की टीकाएँ भी लिखी हैं। उनकी शिष्य-परम्परा में भी उनके भाव गृहीत होते आये हैं, इसीलिए वे लोग भी हिन्दी सेवा में वैसे ही निरत देखे जाते हैं। बाबा रामचरणदास ने इसी काल में एक ऐसी विस्तृत रामायण की टीका लिखी है, जो अद्वितीय कही जा सकती है। इसमें उन्होंने वेद, शास्त्रा, उपनिषद, पुराण आदि के आधाार से गो. तुलसीदास की रामायण की चौपाइयों का ऐसा विशद अर्थ किया है, जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने पर भी तृप्ति नहीं होती। इस ग्रंथ से भी तात्कालिक हिन्दू धार्म को अच्छी उत्तोजना मिली है, हिन्दी भाषा के भण्डार को तो जगमगाता रत्न ही मिल गया है। बाबा रघुनाथ दास की रचनाएँ भी बहुमूल्य हैं, उनका अवधाी भाषा में लिखा गया 'विश्राम सागर' अधिाक प्रसिध्द है। इसी प्रकार के कुछ और हिन्दी-हितैषी महात्माओं और विद्वानों के नाम बताये जा सकते हैं, किन्तु व्यर्थ बाहुल्य होगा।

8. इसी काल में तुलसी साहब ने घटरामायण नामक एक विशाल ग्रन्थ की रचना पद्य में की, जो अपने ढंग का अनूठा है। राधाा स्वामी मत की स्थापना भी इसी काल में हुई। उस संप्रदाय वालों की भी कुछ ऐसी रचनाएँ इस काल की हैं, जिनसे हिन्दी भाषा के प्रचार में कुछ न कुछ सहायता अवश्य प्राप्त हुई। पं. ब्रह्मशंकर मिश्र का रचा हुआ ग्रन्थ प्रमाण में उपस्थित किया जा सकता है, यह ग्रन्थ अपने ढंग का उत्ताम है। उसमें जो बातें वर्णन की गयी हैं, वे कई एक सिध्दान्त की बातों पर अच्छा प्रकाश डालती हैं।

9. श्रीयुत राधााचरण गोस्वामी जी प्रसिध्द साहित्य-सेवियों में हैं, आप भी बाबू हरिश्चन्द्र के समकालीन सज्जनों में हैं। आपकी गणना भी उस समय के उन्हीं लोगों में है जो उनके सच्चे सहयोगियों के नाम से प्रसिध्द हैं। पण्डित बालकृष्ण भट्ट,पं. प्रतापनारायण, पं. अम्बिका दत्ता व्यास आदि के समान ही साहित्य-सेवियों में आपकी भी गणना है। आपने भारतेन्दु नामक एक मासिक पत्रिाका उनकी कीर्ति की स्मृति में निकली थी जो बहुत दिनों तक चलती रही। आप बड़े मार्मिक लेखक थे। आपकी लेख-मालाएँ बड़े आदर से पढ़ी जाती थीं। आप स्वतंत्रा विचार के पुरुष थे, इसलिए सामयिकता के विशेष अनुरागी थे। उन्होंने विदेश-यात्राा और विधावा-विवाह मण्डन पर भावमयी पुस्तकें लिखी हैं। आप जैसे गद्य-रचना में निपुण थे वैसे ही पद्य-रचना पटु भी। आपने 'उत्तारार्ध्द', 'भक्तमाल' नामक एक सुन्दर ग्रन्थ पद्य में बनाया है, उसमें नाभाजी के बाद के भक्तों की चर्चा की है। रचना वैसी ही सुन्दर सरस, और ललित है जैसी नाभाजी रचित भक्तमाल की। आपने ब्रजप्रान्त में और युक्तप्रान्त के पश्चिमी जिलों में हिन्दी भाषा के प्रचार का बड़ा उद्योग किया था। जिस समय कचहरियों में हिन्दी भाषा के ग्रहण किये जाने का आन्दोलन पूज्यपाद मालवीय जी के नेतृत्व में चल रहा था, उस समय आप भी उसके एक विशेष सहायक थे। आपने हिन्दी में कई ग्रन्थों की रचनाएँ की हैं जो मनोहर एवं मधाुर हैं। उनमें सामयिकता भी पाई जाती है। उनके गद्य और पद्य का एक उदाहरण देखिए-

''इसका नाम 'भारतेन्दु' रखने का कारण जानने के लिए शायद आप लोग उत्सुक होंगे, क्योंकि इस रूप तथा इस आकार के पत्रा के लिए तनिक यह नाम अयोग्य-सा मालूम होता है। परन्तु यह धाृष्टता केवल इसे पूज्यवाद भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र का स्मारक स्वरूप बनाने के लिए की गई है। यों तो उनकी अटल कीर्ति जब तक हिन्दी भाषा की एक भी पुस्तक रहेगी तब तक इस भूमण्डल में वर्तमान रहेगी, तथापि इसी बहाने उनके प्रात: स्मरणीय नाम के उच्चारण का सौभाग्य प्राप्त होगा।''

10. अलीगढ़ निवासी बाबू तोताराम बी.ए. बाबू हरिश्चन्द्र के समकालीन हिन्दी सेवकों में हैं। उन्होंने भी हिन्दी के प्रचार में बड़ा उद्योग किया था। 'भारत-बन्धाु' नामक एक साहित्यिक पत्रा उन्होंने निकाला था, कुछ ग्रन्थों की भी रचनाएँ की थीं। जिनमें 'केटो कृतान्त' नाटक और 'स्त्राी सुबोधिानी' प्रसिध्द हैं। इनकी गद्य-रचना साधाारण है, परन्तु उसमें नियमबध्दता पाई जाती है। इनकी गद्य-रचना का एक अंश देखिए-

''कौन नहीं जानता? परन्तु इस नीच संसार के आगे कीर्ति केतु विचारे की क्या चलती है। जो पराधाीन होने से ही प्रसन्न रहता है और सिसुमार की शरण जा गिरने का ही जिसे चाव है। हमारा पिता अत्रिापुर में बैठा हुआ वृथा रमावती नगरी की नाम-मात्रा प्रतिष्ठा बनाये है। नौपुर की निबल सेना और एक रीति संचारिणी सभा जो निष्फल युध्दों से शेष रह गई है, वह उसके संग है।''

11. पं. केसोराम भट्ट इस प्रचार-काल के ही एक प्रसिध्द हिन्दी-सेवक हैं। उन्होंने बिहार-बन्धाु नामक एक साप्ताहिक पत्रा बिहार से ही निकाला था, जो कुछ दिनों तक वहाँ सफलतापूर्वक चलता रहा। उन्होंने सज्जाद संबुल और शमशाद सौसन नामक दो नाटक भी बनाये थे और एक व्याकरण ग्रन्थ भी। यह व्याकरण ग्रन्थ उस समय हिन्दी संसार में आदर की दृष्टि से देखा गया था। उनके दोनों नाटक भी अच्छे हैं परन्तु उनकी भाषा खिचड़ी है। हिन्दी के साथ उसमें उर्दू का प्रयोग अधिाक है।

12. बाबू बालमुकुन्द गुप्त पहले उर्दू के प्रेमी थे। बाद को पं. प्रतापनारायण मिश्र के सहवास के कारण हिन्दी-प्रेमी बन गये। उन्होंने उन्हीं से हिन्दी लिखने की प्रणाली सीखी। अतएव उन्हीं की-सी फड़कती और चलती भाषा प्राय: लिखी है। उन्होंने बहुत दिनों तक भारतमित्रा पत्रा का सम्पादन किया था। दो-तीन छोटी-मोटी हिन्दी पुस्तकेंं भी लिखी हैं। उर्दू में पूरा अभ्यास होने के कारण उनकी भाषा मँजी हुई होती थी। वे सरस हृदय थे, इसलिए सुन्दर और सरस कविता भी कर लेते थे। उनकी हिन्दी भाषा की कविता थोड़ी है, पर अच्छी है। उनके कुछ गद्य-पद्य देखिए-

''तीसरे पहर का समय था, दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा था और सामने से संधया फुर्ती के साथ पाँव बढ़ाये चली आती थी। शर्मा महाराज बूटी की धाुन में लगे हुए थे। सिलबट्टा से भंग रगड़ी जा रही थी। मिर्च-मसाला साफ हो रहा था। बादाम इलायची के छिलके उतारे जाते थे। नागपुरी नारंगियाँ छील-छील कर रस निकाला जाता था। इतने में देखा कि बादल उमड़ रहे हैं, चीलें उतर रही हैं, तबीअत-मुरमुरा उठी। इधार भंग उधार घटा, बहार में बहार। इतने में वायु का वेग बढ़ा, चीलें अदृश्य हुईं,ऍंधोरा छाया, बूँदें गिरने लगीं, साथ ही तड़ तड़ धाड़ धाड़ होने लगी। देखो ओले गिर रहे हैं। ओले थमे, कुछ वर्षा हुई, बूटी तैयार हुई, बमभोला कहकर शर्मा जी ने एक लोटा भर चढ़ाई।'' उनके कुछ पद्य देखिए-

आ जा नवल वंसत सकल ऋतुओं में प्यारी।

तेरा शुभागमन सुन फूली केसर क्यारी।

सरसों तुझको देख रही है ऑंख उठाये।

गेंदे ले ले फूल खड़े हैं सजे सजाये।

आस कर रहे हैं टेसू तेरे दर्शन की।

फूल फूल दिखलाते हैं गति अपने मन की।

पेड़ बुलाते हैं तुझको टहनियाँ हिला के।

बड़े प्रेम से टेर रहे हैं हाथ उठा के।

13. लाला श्रीनिवासदास इस काल के अच्छे लेखकों में थे। उन्होंने परीक्षा गुरु नामक एक मौलिक उपन्यास लिखा था।'तप्ता संवरण', 'संयोगिता स्वयंवर' और 'रणधाीर प्रेम मोहिनी' नामक तीन नाटकों की भी रचना की थी। ये तीनों नाटक अच्छे हैं, परन्तु रणधाीर प्रेम मोहिनी सबसे सुन्दर है, इसका संस्कृत अनुवाद पं. विजयानन्द त्रिापाठी ने किया था। उन्होंने'सदादर्श' नामक मासिक पत्रा भी निकाला था। 'परीक्षा गुरु' की भाषा अच्छी है, उसमें चलतापन भी पाया जाता है, उसका एक अंश देखिए-

''जैसे अन्न प्राणाधाार है, परन्तु अति भोजन से रोग उत्पन्न होता है, लाला ब्रजकिशोर कहने लगे-देखिए, परोपकार की इच्छा अत्यन्त उपकारी है, परन्तु हद से आगे बढ़ाने पर वह भी प+जूलख़र्ची समझी जायेगी और अपने कुटुम्ब परिवारादि का सुख नष्ट हो जायेगा। जो आलसी अथवा अधार्मियों की सहायता की, तो उससे संसार में आलस्य और पाप की वृध्दि होगी।''

14. राजकुमार ठाकुर जगमोहन सिंह मधय प्रदेश विजय राघव गढ़ के रहने वाले थे, मधय प्रदेश में उन्होंने उस समय हिन्दी प्रचार का अच्छा उद्योग किया था। उन्होंने एक ही ग्रंथ लिखा है। 'श्यामा स्वप्न' परन्तु वह अपने ढंग का अनूठा है। उसमें प्राकृतिक दृश्यों का स्थान-स्थान पर सुन्दर चित्राण है। उन्होंने अपनी भाषा में पं. बदरी नारायण की साहित्यिक भाषा का अनुकरण किया है परन्तु उनके वाक्य अधिाक लम्बे हो गये हैं और वाक्य के भीतर वाक्यखंड आकर उसको जटिल बना देते हैं। फिर भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उन्होंने जिस प्रकार प्राकृत दृश्यों का वर्णन किया है, वह संस्कृत कवियों के गंभीर निरीक्षण का स्मरण दिलाता है-

उनके गद्य का एक अंश देखिए-

''मैं कहाँ तक इस सुन्दर देश का वर्णन करूँ? जहाँ की निर्झरिणी, जिनके तीर वानीर से भरे, मदकल कूजित विहंगमों से शोभित हैं, जिनके मूल से स्वच्छ और शीतल जलधाारा बहती है और जिनके किनारे के श्याम जम्बू के निकुंज फल भार से नमित जनाते हैं-शब्दायमान होकर झरती है। जहाँ के शल्लकी वृक्षों की छाल में हाथी अपना बदन रगड़-रगड़ खुजली मिटाते हैं और उनमें से निकला क्षीर बन के सीतल समीर को सुरभित करता है। मंजुबंजुल की लता और नील निचुल के निकुंज जिनके पत्तो ऐसे सघन, जो सूर्य की किरणों को भी नहीं निकलने देते-इस नदी के तट पर शोभित हैं।''

15. पंडित विनायकराव ने भी इस समय मधयप्रदेश में हिन्दी प्रचार का बहुत बड़ा कार्य किया, आप गद्य-पद्य दोनों सुन्दर लिखते थे और अपने विद्याबल से राजा और प्रजा दोनों से आदृत थे। आप की अधिाकांश पुस्तकों का प्रचार उस प्रदेश के हाई स्कूलों और पाठशालाओं में था, और इस सूत्रा से उनके सुलिखित ग्रन्थों ने आदर ही नहीं पाया, मधय प्रदेश में हिन्दी का धााक भी बिठला दी। आपकी लिखी रामायण की विनायकी टीका बहुत प्रसिध्द है, जो कई जिल्दों में है, इस ग्रंथ के देखने से उनके अगाधा ज्ञान का पता चलता है और यह प्रकट होता है कि आप हिन्दी भाषा पर कितना अधिाकार रखते थे। आपने पंद्रह-बीस ग्रंथ लिखे हैं। अपनी हिन्दी की बहुमूल्य सेवा के कारण आप सरकार और जनता दोनों से पुरस्कृत हुए हैं। सरकार ने एक बार आपको सहò रुपये पुरस्कार में दिये थे, 'कवि-नायक' एवं साहित्य भूषण की उपाधिा भी आपको मिली थी।

16. पंडित विजयानन्द त्रिापाठी हिन्दी भाषा के धाुरन्धार विद्वान् थे। जिस प्रकार संस्कृत के वे प्रकाण्ड थे, वैसे ही हिन्दी भाषा के भी। वाग्मी इतने बड़े थे कि जनता पर जादू करते थे। जब कभी उनका भाषण प्रारंभ होता, उस समय सब लोग आई खाँसी को भी मुँह के बाहर न निकलने देते। जनता उनके व्याख्यानों को सुनकर प्रस्तर की मूर्ति बन जाती थी। उपकार उनके रोम-रोम में भरा था, सर्वसाधाारण का काम निष्काम भाव से करते वे ही देखे गये। विद्यारत्न आपकी उपाधिा थी। बांकीपुर के बी. एन. कालेजियट स्कूल के हेड-पण्डित बहुत दिनों तक रहे। कविता में अपना नाम श्री कवि लिखते थे। उन्होंने बाबू हरिश्चन्द्र की रत्नावली नाटिका को, जो अधाूरी रह गई थी, पूरा किया। 'रणधाीर प्रेममोहिनी' नाटक का संस्कृत में अनुवाद किया, वह भी इस विशेषता के साथ, कि मुख्य ग्रंथ में जिस प्रकार शिष्ट और साधाारण जन की भाषा में अन्तर है वैसा ही उन्होंने अपने ग्रंथ में भी संस्कृत और प्राकृत भाषाओं के आधाार से किया। बाबू हरिश्चन्द्र के स्वर्गवास होने पर जो लम्बा लेख उन्होंने लिखा था, वह इतना अपूर्व है, और ऐसी प्रौढ़ भाषा में लिखा गया है कि जिसने उसको एक बार पढ़ा होगा, मेरा विश्वास है, वह उसको आजन्म न भूला होगा। भारत-जीवन पत्रा का जन्म ही उन्हीं के उद्योग का फल था। उनका लिखा हुआ महाअंधोर नगरी नाटक अपने ढंग का बड़ा विचित्रा ग्रंथ है। वास्तव बात यह है कि पं.जी साहित्य-कला के पारंगत थे और हिन्दी भाषा पर पूर्ण अधिाकार रखते थे। उनके रचे संस्कृत और हिन्दी भाषा के अनेक ग्रंथ हैं। उनकी एक गद्य-रचना देखिए-

ईमान बेचने वाला-(सभी जात) ईमान ले ईमान; टके सेर ईमान, टके पर हम ईमान बेचते हैं। ईमान ही क्या, जातपाँत कुलकानि धार्म्म कर्म्म वेद पुरान कुरान बाइबिल सत्य ऐकमत्य गुन गौरव इज्जत प्रतिष्ठा मान ज्ञान इत्यादि सर्वस टके सेर!! एक टका दो, हम तुमी को डिग्री देते हैं। टके पर हम अदालत में तुमारी ऐसी कहैं, टका खोलकर हमारी झोली में रक्खो, अभी तुम्हें के. सी. एस. आई. बल्कि ए. वी. सी. डी. इत्यादि छब्बीसों अक्षर और वर्णमाला भर का लम्बा पोंछ बढ़ा देवें।

- महाअंधोर नगरी।

17. इस प्रचार-काल में दो बड़े उत्साही युवक हिन्दी-संसार के सामने आते हैं, एक हैं बाबू राधााकृष्णदास जो स्वर्गीय भारतेन्दु जी के फुफेरे भाई थे और दूसरे हैं बाबू रामकृष्ण वर्मा। बाबू राधााकृष्णदास ने गद्य-पद्य दोनों लिखा है और उसमें अच्छी सफलता पाई है। उन्होंने भारतेन्दु जी के चरणों में बैठकर हिन्दी अनुराग की शिक्षा पाई थी, उनकी गद्य-पद्य शैली का अनुशीलन किया था, इसलिए उनकी रचनाओं एवं उनके हिन्दी प्रेम की झलक उनमें अधिाक मात्राा में पाई जाती है। उनमें देश-प्रेम भी था और मातृभूमि का प्यार भी, अतएव उनकी कृतियों में उनके इन भावों का रंग भी देखा जाता है। उन्होंने भारतेन्दु जी की एक छोटी-सी जीवनी लिखी है, जिसमें उनके जीवन से सम्बन्धा रखने वाली अनेक बातों पर प्रकाश डाला है। एक छोटी पुस्तिका में उन्होंने यह प्रमाणित करने की चेष्टा की है कि कविवर बिहारीलाल आचार्य केशवदास के पुत्रा थे, इस ग्रन्थ में उनकी विषय प्रतिपादन शैली देखने योग्य है। उनका लिखा हुआ प्रताप नाटक भी अच्छा है, उसकी रचना ओजस्विनी और भावमयी है। वे बनारस की नागरी प्रचारिणी सभा के संस्थापकों में अन्यतम हैं। उनका कुछ गद्यांश देखिए-

''परिहास-प्रियता भी इनकी अपूर्व थी। अंग्रेजी में पहली अप्रैल का दिन मानो होली का दिन है। उस दिन लोगों को धाोखा देकर मूर्ख बनाना बुध्दिमानी का काम समझा जाता है। इन्होंने भी कई बेर काशीवासियों को यों ही छकाया था। एक बार छाप दिया कि योरोपीय विद्वान् आये हैं, जो महाराज विजयानगरम् की कोठी में सूर्य चन्द्रमा आदि को प्रत्यक्ष पृथ्वी पर बुलाकर दिखलावेंगे। लोग धाोखे में गये और लज्जित होकर हँसते हुए लौट आये। एक बार प्रकाशित किया कि बड़े गवैये आये हैं, वह लोगों को हरिश्चन्द्र स्कूल में गाना सुनावेंगे।''

18. बाबू रामकृष्ण वर्मा भारत-जीवन प्रेस के संस्थापक और भारत-जीवन नामक साप्ताहिक पत्रा के सम्पादक थे। उन्होंने उस समय इन दोनों के द्वारा हिन्दी भाषा का बहुत अधिाक प्रचार किया। अपने प्रेम से बहुत अधिाक ग्रन्थ हिन्दी भाषा के उन्होंने निकाले जो अधिाकतर साहित्य से सम्बन्धा रखने वाले थे। श्रीयुत पंडित विजयानन्द के सहयोग से उनका भारत-जीवन भी खूब चमका, और उसने हिन्दी देवी की सेवा भी अच्छी की। बाबू साहब सुलेखक और कवि भी थे, साथ ही सरस हृदय और भावुक भी। उनके रचे हुए ग्रंथ अब भी हैं, परन्तु खेद है कि प्रेस की उपस्थिति में भी उनमें से कुछ ग्रंथों का भी द्वितीय संस्करण नहीं हुआ।

19. मैं पहले राजा शिवप्रसाद की हिन्दी शैली का ऊपर वर्णन कर आया हूँ। उनकी यह इच्छा थी, कि हिन्दी लिखने की शैली बिल्कुल बोलचाल की भाषा हो, इसलिए उन्होंने अपनी रचना में अरबी, प+ारसी के प्रचलित शब्दों का अधिाक प्रयोग किया। आवश्यकता होने पर वे अपनी रचना में प+ारसी-अरबी के अप्रचलित शब्दों का भी प्रयोग करते, और संस्कृत के तत्सम शब्दों का भी। कभी वे बड़ी सीधाी सरल हिन्दी लिखते, जिसमें संस्कृत के बोलचाल में गृहीत सुन्दर शब्द लाते। कभी ऐसी हिन्दी लिखने, लगते जिसमें प+ारसी अरबी के शब्दों की भरमार तो होती ही, संस्कृत के अप्रचलित तत्सम शब्द भी भर जाते। यही कारण है कि अपनी इच्छा के अनुकूल अपनी हिन्दी भाषा की शैली को वे बोलचाल के रंग में नहीं ढाल सके और न ही हिन्दी की कोई निश्चित शैली स्थापन कर सके। उनके रचे 'राजा भोज का सपना' की हिन्दी बड़ी सुन्दर है, उसमें हिन्दी के मुहावरे भी बड़ी उत्तामता से आये हैं, परन्तु इतिहास तिमिर नाशक इत्यादि की भाषा ऐसी नहीं है, उसको खिचड़ी भाषा कह सकते हैं। राजा लक्ष्मण सिंह अैर बाबू हरिश्चन्द्र आदि ने इसका प्रतिकार किया, उनको अपने कार्य में सफलता भी प्राप्त हुई। इस समय कचहरियों में हिन्दी के प्रवेश का आन्दोलन भी उठ खड़ा हुआ था, पूज्य मालवीय जी के नेतृत्व में युक्त प्रान्त के अनेक सम्भ्रान्त हिन्दू इस आन्दोलन के पृष्ठपोषक बनकर कार्य-क्षेत्रा में अवतीर्ण हुए थे। फल यह हुआ कि सरकार की दृष्टि भी इस ओर विशेष रूप से आकर्षित हुई और वह इस विचार में पड़ी कि इस द्वन्द्व की निष्पत्तिा क्या करें। अतएव भाषा के रूप की ओर उसका विशेष धयान गया, क्योंकि पाठशाला और स्कूल की पुस्तकों की भाषा का प्रश्न भी सामने था। इस समय पण्डित लक्ष्मीशंकर एम.ए. कुछ हिन्दू अधिाकारियों के साथ सम्मुख आये और एक नई भाषा गढ़ गई, जिसका नाम बाद को हिन्दुस्तानी पड़ा। पण्डित जी के स्कूलों का इन्सपेक्टर नियत हो जाने के कारण इस भाषा में बल आया और साधाारणतया इसी भाषा में स्कूलों के कोर्स की अधिाकतर पुस्तकों की रचना हुई। यह नई भाषा कोई दूसरी भाषा नहीं थी, राजा शिवप्रसाद की बोलचाल की भाषा ही थी, जिसका कुछ परिमार्जन हुआ था। पण्डित लक्ष्मीशंकर के दल के लोग इसको हिन्दी ही कहते। परन्तु कुछ लोग उसको मुसलमानों को संतुष्ट करने के लिए हिन्दुस्तानी बतलाते। जो अर्थ हिन्दुस्तानी का है वही अर्थ हिन्दी का है। केवल वाद निराकरण के लिए ही नवीन नाम की कल्पना हुई। पंडित लक्ष्मीशंकर की 'काशी पत्रिाका' इसी भाषा में निकलती थी और देवनागरी एवं प+ारसी दोनों अक्षरों में छपती थी। इस पत्रिाका का ग्रामीण पाठशालाओं तक में प्रवेश था। इसलिए इसके द्वारा हिन्दी के प्रचार में कुछ न कुछ सुविधाा अवश्य हुई। काशी पत्रिाका की भाषा बोलचाल की भाषा होती थी और उसमें प+ारसी अरबी के वही शब्द आते थे जिनको जनता प्राय: बोलती है, परंतु कसर यह थी कि संस्कृत के तत्सम शब्द उसमें नहीं आने पाते थे। जहाँ काम पड़ने पर प+ारसी अरबी के कठिन से कठिन शब्द ले लिये जाते थे, वहाँ संस्कृत शब्दों को ऐसे अवसर पर भी स्थान नहीं मिलता था, इसलिए अधिाकांश हिन्दू लेखकों की दृष्टि में यह भाषा नहीं जँची। परिणाम यह हुआ कि संस्कृत-गर्भित हिन्दी ही का अधिाक प्रचार हुआ और इस भाषा का क्षेत्रा संकुचित होकर रह गया। अन्त में पं. जी की दृष्टि भी इधार गई और उनके 'पदार्थ विज्ञान विटप' आदि ग्रन्थ ऐसी भाषा में लिखे गये, जिसमें प+ारसी-अरबी के स्थान पर संस्कृत तत्सम शब्दों का ही प्रयोग अधिाकतर हुआ था। उनके उन्नति प्राप्त प्रेस का नाम 'चन्द्रप्रभा' था, और उनकी पत्रिाका का नाम था 'काशी पत्रिाका'। ये दोनों नाम भी उनके मनोभाव के सूचक हैं। मैंने अपनी ऑंखों देखा है कि दौरे के दिनों में जब लड़के उनके पास हिन्दी कविताएँ लेकर पहुँचते, तो वे उनको प्रेम से सुनते, लड़कों को शाबाशी देते, कभी-कभी उनको पुरस्कृत भी करते। पहले-पहल पर्ािंवत का सुन्दर संस्करण उन्होंने ही हिन्दी में निकाला। उन्होंने 'त्रिाकोणमिति को उपक्रमणिका' नामक एक सुन्दर ग्रन्थ हिन्दी में बनाया था, जिसका उस समय बड़ा आदर हुआ था। पण्डित रमाशंकर मिश्र उनके छोटे भाई थे, वे आज़मगढ़ में ज्वाइण्ट मजिस्टे्रेट थे, बाद को कई जिलों में कलक्टर रहे। उनकी स्कूली पुस्तकें अधिाकतर हिन्दुस्तानी भाषा ही में लिखी गयी थीं, विभिन्न अक्षरों में छपकर वे हिन्दू-मुसलमान दोनों के लड़कों के काम आती थीं। परन्तु उनमें भी हिन्दी-प्रेम था। वे संस्कृत के विद्वान् थे, अतएव हिन्दी भाषा की रचनाओं को विशेष स्नेह दृष्टि से देखते थे। हिन्दी का लेखक होने के ही कारण मुझ पर भी उन्होंने कई विशेष अवसरों पर बड़ी कृपा की थी। मेरा विचार है कि प्रचार-काल में इन दोनों भ्राताओं से भी हिन्दी-भाषा की वृध्दि में सहायता पहुँची है और उन्होंने अपनी पत्रिाका और ग्रन्थों द्वारा हिन्दुओं के इस संस्कार को बहुत अधिाक दूर किया है कि अरबी प+ारसी के शब्द हिन्दी में आये नहीं कि वह उर्दू हुई नहीं। हिन्दी अक्षरों में छपे हुए हिन्दुस्तानी भाषा के ग्रन्थों को पढ़कर हिन्दू के लड़के उन्हें हिन्दी ही का ग्रन्थ समझते थे, उर्दू का नहीं। इससे भी बोलचाल की ओर प्रवृत्ता होने में, हिन्दी को बड़ा अवसर मिला, वह संकुचित होने के स्थान पर अधिाक विस्तृत हो गयी। बाबू देवकीनन्दन खत्राी के उपन्यास इसी परिणाम के फल हैं। आजकल के अनेक उपन्यास भी इसी मार्ग पर चल कर हिन्दी भाषा के विस्तार में सहायक हो रहे हैं। इसलिए मेरा विचार है कि उस समय के हिन्दी भाषा के प्रचार में पं. लक्ष्मीशंकर एम. ए. का भी विशेष हाथ है-उनके गद्य का एक नमूना देखिए-

''इस जमीन पर और इस जहान में जिसमें कि हम लोग रहते हैं, लाखों अजीब चीजें हमेशा दिखलायी देती हैं और हर रोज नई बातें हुआ करती हैं। जो कुछ कि इस जहान में होता है, उसे गौर से देखने और उसके सबब को सोचने से जरूर बड़ा फायदा होता है। बिजली के सब नियमों के जानने से कैसा फायदा हुआ है कि हजारों कोस की दूरी पर मुल्क-मुल्क में पलभर में तार के सबब से खबर पहुँचा सकते हैं। भाफष् के जशेर से कैसी अच्छी तरह से रेलगाड़ी और धुऑंकश चलते हैं।''

20. काशी-निवासी बाबू देवकीनन्दन खत्राी के 'चन्द्रकान्ता'और 'चन्द्रकान्ता सन्तति' नामक उपन्यासों से भी हिन्दी भाषा के प्रचार में कम सहायता नहीं मिली। इस समय इनके उपन्यासों ने इतना प्रचार पाया कि उससे उपन्यास-क्षेत्रा में युगान्तर उपस्थित हो गया। बहुत से लोगों ने उस समय हिन्दी इसलिए पढ़ी कि वे चन्द्रकान्ता को पढ़ सकें। इन उपन्यासों की भाषा हिन्दुस्तानी है, केवल विशेषता इतनी ही है कि उसमें यथावसर संस्कृत के तत्सम शब्द भी आते हैं। भाषा चलती और मुहावरेदार है, इसलिए भी उसकी अधिाक पूछ हुई। इन उपन्यासों में चमत्कृत घटनाओं का ही ऊहापोह और विस्तार है। उपदेश शिक्षा और धाार्मिक अथवा सामाजिक आघात-प्रतिघात से उनका कोई सम्बन्धा नहीं रहा, फिर भी उनमें इतना आकर्षण है,कि हाथ में लेकर उन्हें समाप्त किये बिना चैन नहीं आता। उनके गद्य का एक अंश देखिए-

''रोहतास गढ़ किले के अन्दर राजमहल की अटारियों पर चढ़ी हुई बहुत-सी औरतें उस तरफ देख रही हैं, जिधार वीरेन्द्र सिंह का लश्कर पड़ा हुआ है। कुँअर कल्यान सिंह के गिरफ्तार हो जाने से किशोरी को एक तरह की निश्चिन्ती हो गयी थी,क्योंकि ज्यादे डर उसे अपनी शादी उसके साथ हो जाने का था, अपने मरने की उसे जरा भी परवाह न थी। हाँ, कुँवर इन्द्रजीत सिंह की याद वह एक सायत के लिए भी नहीं भुला सकती थी, जिनकी तस्वीर उसके कलेजे में खिंची हुई थी। वीरेन्द्र सिंह की लड़ाई का हाल सुन उसे बड़ी खुशी हुई और वह भी अपनी अटारी पर चढ़कर हसरत-भरी निगाहों से उस तरफ देखने लगी जिधार वीरेन्द्र सिंह की फौज पड़ी हुई थी।''

21. अन्य भाषा से अपनी भाषा में ग्रन्थों का अनुवाद करना भी भाषा के विस्तार का हेतु होता है, इस प्रचार काल में यह कार्य भी अधिाकता से हुआ। बंगभाषा के अनेक उपन्यास अनुवादित होकर हिन्दी भाषा में गृहीत हुए। बाबू गदाधार सिंह ने'कादम्बरी', 'बंगविजेता' एवं 'दुर्गेश-नन्दिनी' का अनुवाद इसी समय किया। बाबू राधााकृष्णदास द्वारा 'स्वर्णलता' एवं 'मरता क्या न करता' आदि कई उपन्यास अनुवादित हुए। बाबू रामदीनसिंह की इच्छा से पं. प्रताप नारायण मिश्र ने 'राजसिंह' आदि आठ दस उपन्यासों का अनुवाद किया। पं. राधाचरण गोस्वामी द्वारा 'मृण्मयी', 'बिरजा' और 'जावित्राी' का अनुवाद हुआ। ये अनुवाद बाबू हरिश्चन्द्र की देखादेखी हुए थे। पहले-पहल आपने ही बंगभाषा के एक उपन्यास का अनुवाद करके मार्ग-प्रदर्शन किया था। इसके उपरान्त उससे अनेक उपन्यासों और ग्रन्थों का अनुवाद हुआ। अनुवाद-कत्तर्ााओं में बाबू रामकृष्ण वर्मा,बाबू कार्तिकप्रसाद, बाबू गोपालराम गहमरी, बाबू उदित नारायण लाल गाजीपुरी आदि का नाम विशेष उल्लेख योग्य है। बाद को इंडियन प्रेस ने तो अनुवाद का ताँता लगा दिया। उसने कवीन्द्र रवीन्द्र के उत्तामोत्ताम उपन्यासों के अनुवाद कराये और कुछ बँगला जीवन-चरित्राों के भी।

22. इस समय हिन्दी भाषा में अनेक पत्रा और पत्रिाकाएँ भी निकलीं, जिससे इसके प्रचार में अधिाकतर वृध्दि हुई। इस समय के पहले भी कुछ पत्रा-पत्रिाकाएँ निकली थीं, जिनमें बनारस अखाबर, कविवचन सुधाा, और हरिश्चन्द्र चन्द्रिका का नाम विशेष उल्लेख योग्य है। बाबू हरिश्चन्द्र के सहयोगियों में से लगभग सभी ने एक-एक पत्रा अथवा पत्रिाका अवश्य निकाली। इसकी चर्चा मैं कर चुका हूँ। इस समय इस कार्य की मात्राा बहुत बढ़ गई थी, सब प्रकार के पत्रा अधिाकता से इस समय ही निकले। कालाकाँकर का दैनिक 'हिन्दोस्तान', पं. गोपीनाथ संपादित लाहौर का 'मित्रा विलास', पं. सदानन्द मिश्र सम्पादित 'सार सुधाानिधिा, पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र सम्पादित 'उचित वक्ता', सम्पादकाचार्य पं. रुद्रदत्ता सम्पादित 'आर्यर्ावत्ता', उदयपुर का'सज्जन कीर्ति सुधााकर', पं. देवकी नंदन सम्पादित प्रयाग का 'प्रयाग समाचार' आदि उनमें विशेष उल्लेखनीय हैं। उस समय जो धाार्मिक पत्रा-पत्रिाकाएँ निकली थीं; उन्होंने भी हिन्दी प्रचार सम्बन्धा में विशेष कार्य किया था, क्योंकि जनता की रुचि इधार भी विशेष आकर्षित थी। इनमें कलकत्ताा से निकलने वाला 'धार्म दिवाकर' बड़ा सुन्दर पत्रा था, इसका सम्पादन पं. देवी सहाय करते थे। इसमें ऐसे सार गर्भ, संयत एवं मार्मिक लेख निकलते थे, जिनकी बहुत कुछ प्रशंसा की जा सकती है। इसी समय 'सरस्वती' भी निकली, जो पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के द्वारा सम्पादित होकर हिन्दी गद्य के विशेष संशोधान का कारण बनी। उस समय के निकले पत्रा-पत्रिाकाओं में अधिाकांश अब लुप्त हो चुके हैं, परन्तु उनका प्रचार कार्य और उनका सामयिक प्रभाव किसी प्रकार भुलाया नहीं जा सकता।

अब तक जो लिखा गया और जितने अवतरण दिये गये, उनके देखने से यह ज्ञात होता है कि उन्नतिकाल से प्रचार काल की भाषा अधिाक परिमार्जित है। स्थान के संकोच के कारण मैं प्रधाान पत्रा सम्पादकों की लेखमाला में से थोड़े अवतरण भी न उठा सका, विशेष कर पं. सदानन्द और पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र आदि के, यदि उठा पाता तो प्रस्तुत विषय और स्पष्ट हो जाता। उन्नति काल के प्रसिध्द हिन्दी लेखक 'आचार्य' हैं, उन्होंने ही आदर्श हिन्दी भाषा शैली उपस्थित की है। परन्तु वे लोग स्वच्छंदचारी और मनस्वी थे, जो लिखते थे, अपने विचारानुसार लिखते थे, वे परीक्षा की कसौटी पर कसे नहीं थे, इसलिए उनमें उतना परिमार्जन नहीं मिलता। कहीं-कहीं उनकी स्वतंत्रा गति भी देखी जाती है, उनके अवतरणों के वे अंश देखिए, जिन पर लम्बी-लम्बी लकीरें खिचीं हैं। उनमें ब्रजभाषा के शब्द ही नहीं, क्रियाएँ भी मिलती हैं, ग्रामीण शब्द भी पाये जाते हैं, और सदोष प्रयोग भी। परन्तु प्रचार-काल वाले विद्वज्जनों में वह बात नहीं पाई जाती या यह कहें कि यदि पाई जाती है तो नाम मात्रा को। इस समय यह बात स्पष्ट देखी जाती है, कि संस्कृत गर्भित भाषा ही अधिाकतर लिखी जाती है, यद्यपि सरलता की ओर भी दृष्टि पर्याप्त थी। चाहे पं. भीमसेन जी की भाषा को देखिए, चाहे पं. अम्बिकादत्ता व्यास की भाषा को, सबमें यह बात पाई जाती है। साहित्य लेखकों श्री निवासदास और बाबू राधााकृष्णदास इत्यादि में यह बात और अधिाक मिलती है। यद्यपि इस समय भी कुछ लोग अपनी भाषा में विदेशी शब्दों को नहीं ग्रहण करना चाहते थे। परन्तु साधाारणतया यह विचार ढीला पड़ गया था और लोग आवश्यक विदेशी शब्दों का प्रयोग करने में संकोच नहीं करते थे। इस समय में ऐसे लोग भी पाये जाते हैं, जो उपन्यासों के लिए बोलचाल की भाषा लिखना ही पसन्द करते हैं, और यथावसर मुहाविरे की रक्षा के लिए अथवा वाच्यार्थ को स्पष्ट करने एवं कथन को अधिाक भावमय बनाने के लिए निस्संकोच भाव से प+ारसी-अरबी अथवा अन्य विदेशी भाषा के शब्दों का व्यवहार करते हैं। बाबू बालमुकुन्द आदि ऐसे ही लेखक हैं। परिहासमय व्यंग्यपूर्ण लेखों में विदेशीय शब्दों की भरमार सभी करते हैं, कारण यह है कि बोलचाल में ही अधिाक व्यंग्यात्मक लेख लिखे जाते हैं और ऐसी अवस्था में उन प+ारसी-अरबी अथवा अन्य भाषा के शब्दों का त्याग नहीं हो सकता, जो उसके अंग बन गये हैं। वरन् उसके आने ही से बोलचाल की भाषा अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर अधिाक प्रभावशालिनी और चटपटी बन जाती है, अन्यथा वह कृत्रिाम और बनावटी ज्ञात होती है। यदि हम व्यंग्य करते हुए कहें कि इनकी हवा बिगड़ गई, फिर भी ये हवा बाँधा रहे हैं, तो हमको हवा शब्द को लेना ही पड़ेगा, चाहे वह प+ारसी शब्द भले ही हो। क्योंकि हवा के स्थान पर दूसरा शब्द वायु या पवन आदि ग्रहण करने से न तो भाव स्पष्ट होगा, न व्यंग्य सफल होगा और न मुहावरा मुहावरा रह जायेगा। इन बातों पर दृष्टि रखकर हिन्दी भाषा में स्वभावतया वही प्रणाली गृहीत हुई और चल पड़ी, जो उचित थी। आज दिन भी इसी प्रणाली का बोलबाला है। सब भाषाओं में गम्भीर विषयों की भाषा उच्च होती है और साधाारण विषयों की चलती। दार्शनिक, वैज्ञानिक और इसी प्रकार के अन्य विषय, गहन और विवेचनात्मक होते हैं, इसलिए उनके लिए प्रौढ़ भाषा ही वांछनीय होती है। जो विषय सहज हैं,जिनमें आपस के व्यवहारों, बर्तावों, अथवा घरेलू बातों की चर्चा होगी, उनको सरल और बोलचाल की भाषा में लिखना ही पड़ेगा,अन्यथा उनकी भाव व्यंजना यथार्थ रीति से न हो सकेगी। हिन्दी भाषा के उन्नति-काल के विद्वानों ने इन बातों पर दृष्टि रखकर ही उसकी शैलियों की स्थापना की, जिसका विशेष परिमार्जन इस काल में हुआ।

प्रान्तीय भाषाओं के शब्दों के क्रियाओं का त्याग जिनमें ब्रजभाषा भी सम्मिलित है, अधिाकतर संस्कृत तत्सम शब्दों के प्रयोगों द्वारा ही सम्भव था, इसलिए हिन्दी को वर्तमान शैली में संस्कृत तत्सम शब्दों का बाहुल्य है। यह प्रणाली ग्रहण करने से भी भाषा ग्रामीण शब्दों से सुरक्षित हुई। अरबी-प+ारसी शब्दों की भरमार भी इसी से दूर हुई। अतएव इस प्रणाली का ग्रहण युक्तिसंगत था। उसका हिन्दी भाषा और संस्कृत के प्रसिध्द हिन्दी लेखक विद्वानों द्वारा स्वीकृत हो जाना भी उसकी उपयोगिता का सूचक है। यह मैं अवश्य कहूँगा, कि न तो संस्कृत शब्दों की भरमार होना उचित है न प+ारसी और अरबी के प्रचलित शब्दों का आग्रहपूर्वक त्याग, क्योंकि ऐसा करने से भाषा दुर्बोधा हो जाती है, जो उसकी उन्नति के लिए वांछनीय नहीं। यह उद्योग सरकारी अधिाकारियों और जनता के कतिपय अग्रगन्ताओं द्वारा पहले से होता आया है, कि जहाँ तक सम्भव हो, हिन्दी भाषा की शैली ऐसी हो, जो बोलचाल के अधिाक निकटवर्ती हो और उसमें संस्कृत के शब्द यदि आवें भी तो थोड़े, परन्तु यह शैली चलाई जाने पर भी व्यापक न हो सकी। कारण हिन्दी का राष्ट्रीयता सम्बन्धाी विचार और वह निधर्ाारित सिध्दान्त था जिसका वर्णन मैं ऊपर कर चुका हूँ। संस्कृत के शब्द ही भारतवर्ष के सब प्रान्तों में अधिाकता से समझे जा सकते हैं। इसलिए उसका अभाव हिन्दी की राष्ट्रीयता का बाधाक होगा, यह समस्त हिन्दी संसार जानता है। निधर्ाारित शैली का त्याग युक्ति-संगत नहीं, क्योंकि इससे उसकी प्रगति में बाधाा पड़ेगी। इससे यह निश्चित है कि संस्कृत गर्भित शैली गृहीत रहेगी, वही इस समय व्यापक भी है। इसको विशेष परिमार्जित करने का श्रेय प्रचार काल को है।

इसी समय में स्वर्गीय बाबू रामदीन सिंह ने मुझको लिखा कि डॉ. जी. ए. ग्रियर्सन साहब की इच्छा है कि हिन्दी भाषा में एक ऐसा ग्रंथ लिखा जावे जो ठेठ हिन्दी का हो, जिसमें न तो संस्कृत के शब्द होें न किसी अन्य भाषा के। मेरा 'ठेठ हिन्दी का ठाट' नामक ग्रन्थ उन्हीं के अनुरोधा का परिणाम है, उसकी भाषा का कुछ अंश यह है-

''सूरज वैसा ही चमकता है, बयार वैसी ही चलती है। धाूप वैसी ही उजली है, रूख वैसे ही अपने ठौरों खड़े हैं, उनकी हरियाली भी वैसी ही है, बयार लगने पर उनके पत्तो वैसे ही धीरे-धीरे हिलते हैं, चिड़ियाँ वैसी ही बोल रही हैं। रात में चाँद वैसा ही निकला, धारती पर चाँदनी वैसी ही छिटकी, तारे वैसे ही निकले, सब कुछ वैसा ही है। जान पड़ता है देवबाला मरी नहीं। धारती सब वैसी ही है, पर देवबाला मर गई। धारती के लिए देवबाला का मरना-जीना दोनों एक-सा है। धारती क्या गाँव में चहल-पहल वैसी ही है। हँसना, बोलना, गाना, बजाना, उठना, बैठना, खाना, पीना, आना, जाना सब वैसा ही है।''

डॉक्टर साहब ने इस ग्रन्थ को बहुत पसंद किया, इसे सिविल सर्विस की परीक्षा का कोर्स बनाया और उक्त बाबू साहब को यह पत्रा लिखा-

प्रिय महाशय!

''ठेठ हिन्दी का ठाट'' के सफलता और उत्तामता से प्रकाश होने के लिए मैं आप को बधााई देता हूँ। यह एक प्रशंसनीय पुस्तक है।...मुझे आशा है कि इसकी बिक्री बहुत होगी, जिसके कि यह योग्य है। आप कृपा करके पं. अयोधया सिंह से कहिये कि मुझे इस बात का हर्ष है कि उन्होंने सफलता के साथ यह सिध्द कर दिया है कि बिना अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग किये ललित और ओजस्विनी हिन्दी लिखना सुगम है।''

आपका सच्चा

जार्ज ए. ग्रियर्सन

कुछ दिनों के बाद डॉक्टर साहब की यह इच्छा हुई कि इसी भाषा में एक ग्रन्थ और लिखा जावे, जो कुछ बड़ा हो और जिसमें हिन्दी भाषा के अधिाक शब्द आवें। यह ज्ञात होने पर मैंने 'अधाखिला फूल' की रचना की। उसकी भाषा का अंश देखिए-

''भोर के सूरज की सुनहली किरनें धीरे-धीरे आकाश में फैल रही हैं, पेड़ों की पत्तिायों को सुनहला बना रही हैं, और पास के पोखरे के जल में धीरे-धीरे आकर उतर रही हैं। चारों ओर किरनों का ही जमघटा है, छतों पर, मुड़ेरों पर किरन ही किरन हैं। कामिनी मोहन अपनी फुलवारी में टहल रहा है और छिटिकती हुई किरनों की यह लीला देख रहा है, पर अनमना है। चिड़ियाँ चहकती हैं, फूल महक रहे हैं, ठंडी-ठंडी पवन चल रही है, पर उसका मन इनमें नहीं है, कहीं गया हुआ है। घड़ी भर दिन आया, फुलवारी में बासमती ने पाँव रखा। धीरे-धीरे कामिनी मोहन के पास आकर खड़ी हुई।''

सुप्रसिध्द बाबू काशीप्रसाद जायसवाल को वे एक पत्रा में यह लिखते हैं-

रथफार्नहम-किंबरली-सरे

10-1-1904

''मेरी इच्छा है कि और लोग भी 'हरिऔधा' के बताये हुए 'ठेठ हिन्दी का ठाट' के स्टाइल में लिखने का उद्योग करें और लिखें। जब मैं देखूँगा कि पुस्तकें वैसी ही भाषा में लिखी जाती हैं, तो मुझको फिर यह आशा होगी कि आगामी समय उस भाषा का अच्छा होगा, जिसको कि मैं तीस वर्ष से आनन्द के साथ पढ़ रहाहूँ।''

आपका सच्चा

जार्ज ए. ग्रियर्सन

परन्तु हिन्दी संसार इन ग्रन्थों की ओर आकर्षित होकर भी उसकी भाषा की ओर प्रवृत्ता नहीं हुआ, और न किसी ने ऐसी भाषा लिखने की चेष्टा की। कारण इसका यही है, कि समय की आवश्यकताओं को देखकर संस्कृत गर्भित भाषा लिखने की ओर ही उसकी प्रवृत्तिा है, सफलता भी उसको इसी में मिल रही है। अतएव यही शैली अनुमोदनीय है। वर्तमान-काल कटिबध्द होकर उसका अनुमोदन भी कर रहा है।


 

 

 

 

 

षष्ठ प्रकरण

वर्तमान-काल

यह देखकर सन्तोष होता है कि वर्तमान-काल में हिन्दी गद्य ने प्रशंसनीय उन्नति की है। विद्या के उन समस्त विभागों से अब उसका सम्बन्धा हो गया है, जो राष्ट्रीय जीवन को विकास की ओर ले चलते हैं। देश के सार्वजनिक जीवन ने ज्यों-ज्यों उन्नत स्वरूप ग्रहण किया है, त्यों-त्यों हिन्दी गद्य को फलने-फूलने के लिए क्षेत्रा प्राप्त होता गया। सरकार और जनता के पारस्परिक सहयोग ने भी हिन्दी गद्य को सुगठित और पुष्ट होने का अवसर दिया। उत्तारी भारत तथा मधय प्रदेश के विश्वविद्यालयों में देशी भाषा की शिक्षा का प्रबन्धा हो जाने से हिन्दी काव्यों और अन्य ग्र्रन्थों के सुव्यवस्थित पठन-पाठन का श्रीगणेश अभी थोड़े ही दिनों से हुआ है, किन्तु उसने प्रचार-काल में जन्म अथवा पोषण प्राप्त पत्राों और पत्रिाकाओं का साहित्यिक पद अधिाक उन्नत करके गद्य-लेखन शैली के बहुत शीघ्र सबल और परिपक्व बनाने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर ली है। समालोचना की प्राचीन शैली के साथ पाश्चात्य शैली ने कन्धो-से-कन्धाा लगाकर हमें साहित्य के सबल और दुर्बल अंगों को परखने की कसौटियाँ बतलाई हैं, वे कसौटियाँ जिनकी अवहेलना नहीं की जा सकती। समालोचना का परिणाम भी देखने में आ रहा है,प्राय: लेखकगण अपनी रचनाओं के सम्बन्धा में अधिाक सावधाान हो गये हैं और बहुत परिश्रम तथा छानबीन के साथ ही ग्रन्थप्रणयन में प्रवृत्ता होते हैं। अब हम यह दिखलावेंगे कि इस वर्तमान-काल में हिन्दी भाषा के प्रत्येक विभागों में कितनी उन्नति हुई और उनमें किस प्रकार समयानुकूल परिवर्ध्दन एवं परिवर्तन हो रहा है। सुविधाा के लिए प्रत्येक विभागों का वर्णन अलग-अलग किया जावेगा, जिसमें प्रत्येक विषय का स्पष्टतया निरूपण किया जा सके। हिन्दी का कार्य-क्षेत्रा इस समय बहुत विस्तृत है और वह लगभग संपूर्ण भारतवर्ष में प्रसार पा रहा है। इसलिए हिन्दी उन्नायकों, सेवकों और ग्रन्थ-प्रणेताओं की संख्या भी बहुत अधिाक है। सबका वर्णन किया जाना एक प्रकार से असम्भव है। इसलिए उल्लेख-योग्य कृतियों की ही चर्चा की जायेगी, और उन्हीं हिन्दी-सेवा-निरत सज्जनों के विषय में कुछ लिखा जायेगा, जिनमें कोई विशेषता है या जिन्होंने उसको उन्नत करने में कोई अंगुलि-निर्देश योग्य कार्य किया है, अथवा जिनके द्वारा हिन्दी भाषा विकास-क्षेत्रा में अग्रसर हुई है। अब तक मैं कुछ अवतरण भी लेखकों अथवा ग्रन्थकारों की रचनाओं का देता आया हूँ, किन्तु इस प्रकरण में ऐसा करना ग्रन्थ के व्यर्थ विस्तार का कारण होगा, क्योंकि इस प्रकार के गण्यमान्य विवुधाों एवं प्रसिध्द पुरुषों की संख्या भी थोड़ी न होगी।

(1) साहित्य-विभाग (Literature)

आजकल हिन्दी साहित्य बहुत उन्नत दशा में है। दिन-दिन उसकी वृध्दि हो रही है। किन्तु यह कहा जा सकता है कि जिसमें सामयिकता अधिाक हो और जो देश और जाति के लिए अधिाक उपकारक हों, ऐसे ग्रंथ अभी थोड़े ही बने हैं। हाँ,भविष्य अवश्य आशापूर्ण है। विश्वास है कि न्यूनताओं की पूर्ति यथासम्भव शीघ्र होगी और उपादेय ग्रंथों की कमी न रह जायेगी। मैं यहाँ पर प्रस्तुत साहित्यिक ग्रंथों का थोड़े में दिग्दर्शन करूँगा, इसके द्वारा यह अनुमान हो सकेगा कि हिन्दी साहित्य के विकास की प्रगति क्या है। सम्भव है कि किसी उपयोगी ग्रन्थ की चर्चा छूट जाये, किन्तु ऐसा अनभिज्ञता के कारण ही होगा। कुछ सहृदयों का जीवन ही साहित्यिक होता है, वे साहित्य-सेवा करने में ही आनन्दानुभव करते हैं, उनकी प्रकृति के कारण आजकल हिन्दी साहित्य उत्तारोत्तार उत्तामोत्ताम ग्रन्थों से अलंकृत हो रहा है। प्रचारकाल से आज तक उन लोगों ने इस क्षेत्रा में जो कार्य किया है, वह बहुत उत्साहवर्ध्दक और बहुमूल्य है। अब से पचास वर्ष पहले साहित्य के दशांग पर लिखे गये गद्य ग्रन्थों का अभाव था, परन्तु इस समय उसकी बहुत कुछ पूर्ति हो गई है। ऐसे निबन्धा जो आत्मिक प्रेरणा से लिखे जाते हैं और जिनमें भावात्मकता होती है, पहले दुर्लभ थे, किन्तु इन दिनों उनका अभाव नहीं है। कवि और कविता सम्बन्धाी आलोचनात्मक निबंधा कुछ दिन पहले खोजने से भी नहीं मिलते थे, परन्तु आज उधार भी दृष्टि है। कुछ ग्रंथ लिखे गये हैं, और कुछ विद्वज्जनों की उधार दृष्टि है। जिन्होंने इस क्षेत्रा में कार्य किया है और जो आज भी स्र्वकत्ताव्य पालन में रत हैं-अब भी मैं उनकी चर्चा करूँगा। जिससे आप वर्तमानकालिक साहित्य भण्डार की वृध्दि के विषय में कुछ अनुमान कर सकें।

पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी ने अनेक साहित्यिक ग्रन्थों की रचना की है। वे जैसे बहुत बड़े लेखक हैं वैसे ही बहुत बड़े समालोचक भी। उन्होंने हिन्दी साहित्य भण्डार को बहुमूल्य ग्रन्थ रत्न दिये हैं और अपनी निर्भीक समालोचना से हिन्दी भाषा को परिष्कृत भी बनाया है। उनके रचे कई सुन्दर ग्रन्थ हैं। जिनमें 'वेकन विचार रत्नावली', 'स्वाधाीनता', 'साहित्य-सीकर', 'रसज्ञ-रंजन', 'हिन्दी भाषा की उत्पत्तिा', कालिदास की निरंकुशता आदि ग्रंथ उल्लेखनीय हैं।

बाबू श्यामसुन्दरदास बी. ए. नागरीप्रचारिणी सभा के जन्मदाताओं में अन्यतम हैं। हिन्दी गद्य के विकास में तथा उसका वर्तमानकालीन उन्नति में भी उनका हाथ है। हिन्दी के जितने ग्रंथ आपने सम्पादन किये और लिखे हैं उनकी बहुत बड़ी संख्या है। साहित्य के अनेक विषयों पर आपने लेखनी चलाई है। आपकी लिखी गद्य-शैली का चमत्कार यह है कि उसमें प्रौढ़ लेखनी की कला दृष्टिगत होती है। हाँ, उसमें मस्तिष्क मिलता है, हृदय नहीं। रुक्षता मिलती है, सरसता नहीं। हाल में आपका 'हिन्दी भाषा और साहित्य' नामक एक अच्छा ग्रन्थ निकला है।

बाबू जगन्नाथप्रसाद 'भानु' एक बहुत बड़े साहित्यसेवी हैं। 'काव्य प्रभाकर' और 'छन्द प्रभाकर' उनके प्रसिध्द ग्रन्थ हैं। आजन्म उन्होंने हिन्दी-देवी की सेवा की और इस वृध्दावस्था में भी उसके चरणों में पुष्पांजलि अर्पण कर रहे हैं।

बाबू कन्हैयालाल पोद्दार की साहित्यिक रचनाएँ प्रशंसनीय हैं। उनका 'काव्य-कल्पद्रुम' एक उल्लेख-योग्य साहित्य-ग्रन्थ है।'हिन्दी-मेघदूत विमर्श भी उनकी साहित्यज्ञता का प्रमाण है। वे भी हिन्दी-सेवा व्रत के व्रती हैं और उसको चुने ग्रन्थ अर्पण करते रहते हैं।'

पंडित रामचन्द्र शुक्ल बड़े गंभीर और मननशील गद्य लेखक हैं। कवीन्द्र रवीन्द्र की रचनाओं से जो गौरव बंग भाषा को प्राप्त है वही प्रतिष्ठा पंडितजी की लेखनी द्वारा हिन्दी भाषा को प्राप्त हुई है। हिन्दी-संसार में आप अद्वितीय समालोचक हैं। आपके गद्य में जो विवेचन गम्भीरता दार्शनिकता और विचार की गहनता मिलती है वह अन्यत्रा दुर्लभ है। इनके हाल के निकले हुए'काव्य में रहस्यवाद' और 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' नामक ग्रन्थ इनके पांडित्य के जाज्वल्यमान प्रमाण हैं।

मिश्र बन्धाुओं ने हिन्दी-भण्डार को एक ऐसा अमूल्य रत्न प्रदान किया है जिससे उनकी कीर्ति चिरकाल तक हिन्दी संसार में व्याप्त रहेगी। उनका मिश्रबन्धाु विनोद नामक ग्रन्थ ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्ण और अद्भुत गवेषणा और परिश्रम का परिणाम है। आजकल हिन्दी साहित्य के इतिहास लगातार लिखे जा रहे हैं। किन्तु इन सब तारकमण्डल को ज्योति प्रदान करने वाला सूर्य उनका ग्रन्थ ही है। मिश्र बन्धाुओं ने कुछ इतिहास ग्रंथ भी लिखे हैं। वे भी कम उपयोगी नहीं। पं. रमाशंकर शुक्ल एम. ए. 'रसाल' ने एक वर्ष के भीतर ही दो प्रशंसनीय ग्रन्थ प्रदान किये हैं। एक का नाम है 'अलंकार-पीयूष' और दूसरे का नाम है'हिन्दी-साहित्य का इतिहास।' ये दोनों ग्रन्थ अपने ढंग के अपूर्व हैं। 'अलंकार-पीयूष' में प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों की शास्त्राार्थ परम्परा का सुन्दर विवेचन उन्होंने जिस प्रकार किया है, वह हिन्दी-संसार के लिए एक दुर्लभ वस्तु है। उसमें उनकी प्रतिभा और विचारशैली दोनों का विकास है। उनका हिन्दी-साहित्य का इतिहास भी एक उल्लेखनीय और अभूतपूर्व ग्रन्थ है। पं. रमाकान्त त्रिापाठी एम. ए. का 'हिन्दी-गद्य-मीमांसा' नामक ग्रन्थ भी अपूर्व है। यह पहला ग्रन्थ है जिसमें हिन्दी भाषा पर पाश्चात्य प्रणाली से विवेचन किया गया है। थोड़े समय में इस ग्रन्थ का आदर भी अधिाक हुआ है, यह इसकी उपयोगिता और बहुमूल्यता का प्रमाण है। श्रीमान् सूर्यकान्त शास्त्राी एम. ए. का हिन्दी साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास भी गहन विवेचना के लिए अपना प्रमाण आप है। पंजाब जैसे सुदूरवर्ती प्रान्त में रहकर भी आपने हिन्दी के विषय में जिस मर्मज्ञता का परिचय दिया है, वह अभिनन्दनीय है। उनका यह ग्रन्थ हिन्दी भण्डार की आदरणीय सम्पत्तिा है। बाबू रमाशंकर श्रीवास्तव एम. ए.,एल-एल. बी. का हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास भी उपयोगी ग्रन्थ है और परिश्रम से लिखा गया है। अंग्रेजी स्कूलों में कोर्स में उसका गृहीत हो जाना इसका प्रमाण है। पं. जगन्नाथ मिश्र एम. ए. का 'हिन्दी गद्य-शैली का विकास' नामक ग्रन्थ भी सुन्दर है। लेखक का पहला ग्रन्थ होने पर भी प्रशंसा-योग्य है। 'हिन्दी काव्य में नवरस' नामक एक ग्रन्थ पं. बाबू रामबित्थरियाने और 'नवरस' नामक ग्रन्थ बाबू गुलाबराय एम. ए. ने लिखा है। पहला ग्रन्थ बहुत गवेषणा और विचारशीलता के साथ लिखा गया है। इसलिए वह बहुत उपयोगी बन गया है। दूसरा ग्रन्थ छोटा है परन्तु गुण में बड़ा है। बाबू साहब बड़े चिन्ताशील लेखक हैं, इसलिए उनकी लेखनी से जो निकला है, बहुमूल्य हैं। रायकृष्णदास की 'साधाना' उनकी किसी बड़ी साधाना का फल है। यह ग्रन्थ भावुकता की दृष्टि से आदरणीय है। उन्होंने कुछ कहानियाँ भी लिखी हैं, जो भावमयी और उपयोगिनी हैं। उनसे भी उनकी सहृदयता का परिचय मिलता है।

(2) नाटक

नाटक लिखने में सफलता उन लोगों को आजकल प्राप्त हो रही है जो नाटक कम्पनियों में रहकर कार्य कर रहे हैं। फिर भी हिन्दी साहित्य क्षेत्रा में ऐसे नाटक भी लिखे जा रहे हैं जो साहित्यिक-दृष्टि से अपना विशेष स्थान रखते हैं। ऐसे नाटककारों में अधिाक प्रसिध्द बाबू जयशंकर प्रसाद हैं। उनके नाटकों में सुरुचि है, और कवित्व भी। किन्तु उनका गद्य और पद्य दोनों इतना जटिल और दुरूह है कि वे अब तक नाटय मंच पर नहीं आ सके। हाँ, साहित्यिक दृष्टि से उनके नाटक अवश्य उत्ताम हैं। उन्होंने कई नाटकों की रचना की है। उनमें अजातशत्राु, स्कन्दगुप्त और चन्द्रगुप्त उल्लेख-योग्य हैं। पंडित बदरीनाथ भट्ट बी. ए. ने दो-तीन नाटक की रचना की है। वे सब सुन्दर हैं और उनमें ऐसा आकर्षण है कि वे रंगमंच पर खेले भी गये। उपयोगिता की दृष्टि से इनके नाटक प्रशंसनीय हैं। पं. बेचन शर्मा 'उग्र' का 'महात्मा ईसा' नाटक भी अच्छा है। पंडित लक्ष्मीनारायण मिश्र बी. ए. ने दो नाटक लिखे हैं, जो थोड़े दिन हुए प्रकाशित हुए हैं। एक का नाम है 'संन्यासी' और दूसरे का'राक्षस का मंदिर'। दोनों ही सामाजिक नाटक हैं और जिस उद्देश्य से लिखे गये हैं उसकी पूर्ति की ओर लेखक की दृष्टि पाई जाती है। परन्तु मैं इन दोनों नाटकों से अधिाक उत्ताम उनके अन्तर्जगत् नामक पद्य-ग्रन्थ को समझता हूँ। बाबू आनन्दी प्रसाद श्रीवास्तव ने 'अछूत' नामक एक नाटक लिखा है। यह नाटक अच्छा है और इसका लेखक इसलिए धान्यवाद का पात्रा है कि उसकी ममता अछूतों के प्रति देखी जाती है। ऐसे उपयोगी अनेक सामाजिक नाटकों की आवश्यकता हिन्दू समाज को है। इसके बाद वे नाटककार आते हैं, जिन्होंने नाटक कम्पनियों के आश्रय में रहकर नाटकों की रचना की है। वे हैं पंडित राधोश्याम, बाबू हरिकृष्ण जौहर और आगा हश्र आदि। इन लोगों ने भी अनेक नाटकों की रचना करके हिन्दी साहित्य की सेवा की है। इनमें से पंडित राधोश्याम और बाबू हरिकृष्ण जौहर के नाटक अधिाक प्रसिध्द हैं। इनमें भावुकता भी पाई जाती है और हिन्दू संस्कृति की मर्यादा भी। अन्य नाटकों में रूपान्तर से हिन्दू संस्कृति पर प्रहार किया गया है और स्थान-स्थान पर ऐसे अवांछनीय चरित्रा अंकित किये गये हैं जो प्रशंसनीय नहीं कहे जा सकते। रंगमंच पर कारण-विशेष से वे भले ही सफलता लाभ कर लें, पर उनमें सुरुचि पर छिपी छुरी चलती दृष्टिगत होती है। इस दोष से यदि कोई प्रसिध्द नाटककार मुक्त है तो वे हैं पंडित माधाव शुक्ल। उनको आर्य संस्कृति की ममता है। उनका 'महाभारत' नामक नाटक इसका प्रमाण है। इनके विचार में स्वातंत्रय होने का काण यह है कि वे किसी पारसी नाटक-मण्डली के अधाीन नहीं हैं। वे उत्ताम गायक और वाद्यकार ही नहीं हैं, नट कला में भी कुशल हैं और सरस कविता भी करते हैं। दुख है, कि हिन्दी संसार में अब तक बंगाली नाटककार द्विजेन्द्रलाल राय और गिरीश चन्द्र का समकक्ष कोई उत्पन्न नहीं हुआ। साहित्य के इस अंग की पूर्ति के लिए समय किसी ऐसे नाटककार ही की प्रतीक्षा कर रहा है। बाबू हरिश्चन्द्र के नाटक छोटे ही हों, पर उनमें जो देश-प्रेम, जाति-प्रेम तथा हिन्दू संस्कृति का अनुराग झलकता है,आजकल के नाटकों में वह विशेषता नहीं दृष्टिगत होती। श्री निवासदास के नाटकों में विशेष कर 'रणधाीर प्रेम मोहिनी' में जो स्वाभाविक आकर्षण है वैसा आकर्षण आजकल के नाटकों में कहाँ? ये बातेें उन्हीं नाटकों में पैदा हो सकती हैं जो चलती भाषा में लिखे गये हों और जिनके पद्यों में वह शक्ति हो कि उन्हें सुनते ही लोग मंत्रामुग्धा बन जावें। परमात्मा करे ऐसे नाटककार हिन्दी क्षेत्रा में आवें, जिससे देश जाति और समाज का यथोचित हित हो सके।

(3) उपन्यास

इस काल के प्रसिध्द उपन्यास-लेखक पं. किशोरीलाल गोस्वामी और श्रीयुत प्रेमचन्द हैं। पं. किशोरीलाल गोस्वामी ने 60 से अधिाक उपन्यास लिखे हैं। इसी सेवा और संस्कृत के विद्वान् तथा कवि-कर्म-निरत होने के कारण हिन्दी-साहित्य सम्मेलन के बाईसवें अधिावेशन के सभापतित्व पद पर वे आरूढ़ हो चुके हैं। बाबू देवकीनंदन खत्राी के बाद यदि किसी ने हिन्दी जनता को अपनी ओर अधिाक आकर्षित किया तो वे गोस्वामीजी के उपन्यास ही हैं। इनके बहुत पीछे बाबू धानपतराय बी. ए. (प्रेमचन्द) हिन्दी-क्षेत्रा में आये। परन्तु जो सफलता थोड़े दिनों में उन्होंने प्राप्त की, वह गोस्वामी जी को कभी प्राप्त नहीं हुई। कारण यह है कि प्रेमचंद जी के उपन्यासों में सामयिकता है और रुचिपरिमार्जन भी, गोस्वामी जी के उपन्यासों में यह बात नहीं पाई जाती। इसलिए उनकी उपस्थिति में ही उपन्यास-क्षेत्रा पर प्रेमचन्द जी का अधिाकार हो गया। उनकी भाषा भी चलती और फड़कती होती है। उनमें मानसिक भावों का प्रकाशन भी सुन्दरता से होता है। इसलिए आजकल हिन्दी साहित्य-क्षेत्रा में उन्हीं की धाूम है। सुदर्शन जी को छोटी कहानियाँ लिखने में यथेष्ट सफलता मिली है। आपकी भाषा सरस, सरल और मुहावरेदार होती है तथा कहानियों का चरित्रा-चित्राण विशेष उल्लेखनीय। कौशिक जी ने कहानियाँ और उपन्यास दोनों लिखने की ओर परिश्रम किया है। उनका पारिवारिक और सामाजिक भावों का चित्राण हृदय-ग्राही और मनोहर होता है। झाँसी के बाबू वृन्दावनलाल वर्मा बी. ए. ने'गढ़ कुण्डार' नामक सुन्दर उपन्यास लिख कर हिन्दी में वह काम किया है जो सर वाल्टर स्काट ने अंग्रेजी भाषा के लिए कियाहै।

पं. बेचन शर्मा उग्र ने कई उपन्यासों और बहुत-सी कहानियों की रचना की है। भाषा उनकी फड़कती हुई और मजेदार होती है, उसमें जोर भी होता है। यदि उसमें चरित्रा-चित्राण भी सुरुचिपूर्ण होता तो मणिकांचन योग हो जाता। पं. भगवती प्रसाद वाजपेयी, बाबू जगदम्बा प्रसाद वर्मा और बाबू शम्भूदयाल सक्सेना ने 'मीठी चुटकी' नामक एक उपन्यास संयुक्त उद्योग से लिखा है। हिन्दी में यह एक नया ढंग है, जिसे इन सहृदय लेखकों ने चलाया। पंडित भगवती प्रसाद वाजपेयी ने मुसकान, बाबू जगदम्बा प्रसाद वर्मा ने बड़े बाबू तथा बाबू शम्भूदयाल सक्सेना ने 'बहूरानी' नामक उपन्यास लिखा है। ये लोग कहानियाँ भी अच्छी लिखते हैं। पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा ने 'पतझड़', 'जेल की यात्राा', 'तलाक' आदि उपन्यास लिखे हैं, जो अच्छे हैं। श्रीमती तेजरानी दीक्षित प्रथम महिला हैं जो उपन्यास रचना की ओर प्रवृत्ता हुई हैं। आपका 'हृदय का काँटा' नामक उपन्यास हिन्दी-संसार में अच्छी प्रतिष्ठा लाभ कर चुका है। पंडित गिरिजादत्ता शुक्ल बी. ए. 'गिरीश' ने 'प्रेम की पीड़ा', 'पाप की पहेली', 'जगद्गुरु का विचित्रा चरित्रा', 'बाबू साहब', 'बहता पानी', 'चाणक्य', 'सन्देह', आदि उपन्यासों की रचना की है, जिनमें से 'बहता पानी'और 'चाणक्य' अभी अप्रकाशित हैं। बाबू साहब का दूसरा संस्करण हो रहा है। इनके उपन्यासों में चिन्ता-शीलता, भावुकता और सामयिकता पाई जाती है। उपन्यास का प्रधाान गुण रोचकता और रुचि-परिमार्जन है पर्याप्त मात्राा में ये बातें इनके उपन्यासों में हैं। भाषा भी इनकी चलती और ऐसी होती है जैसी उपन्यास के लिए होनी चाहिए। कहीं-कहीं उसमें गम्भीरता भी यथेष्ट मिलती है। ये सहृदय कवि भी हैं। इनका 'रसाल बन' नामक पद्य-ग्रन्थ कीर्ति पा चुका है और हाथों-हाथ बिक चुका है। कवि-हृदय होने के कारण इनके उपन्यासों में कवित्व भी देखा जाता है और उसमें सरसता भी यथेष्ट मिलती है। लहरी बुक डिपो बनारस से कुसुम माला नाम से जो उपन्यासों की मालिका निकल रही है, उसमें भी कुछ अच्छे उपन्यास निकले हैं, ये उपन्यास बाबू दुर्गाप्रसाद खत्राी के लिखे हुए हैं। इन उपन्यासों की भाषा बाबू देवकीनन्दन खत्राी की चन्द्रकान्ता की-सी है, जिनमें उर्दू के शब्दों का प्रयोग निस्संकोच भाव से किया जाता है। बाबू ब्रजनन्दनसहाय बी. ए. अच्छे उपन्यास लेखक हैं। इन्होंने कई उपन्यास लिखे हैं। सौन्दर्योपासक इनका सबसे अच्छा उपन्यास है और प्रशंसा भी पा चुका है। मैं समझता हूँ, बिहार प्रान्त में ये पहले ऐसे लेखक हैं जिन्होंने उपन्यास लिखने में सफलता लाभ की है। बाबू जैनेन्द्र कुमार भी एक अच्छे उपन्यास और कहानी लेखक हैं। इनकी भाषा ओजमयी और सुन्दर होती है, और शब्द-विन्यास प्रशंसनीय। इनकी भाव-चित्राण-क्षमता भी अच्छी है। हिन्दी संसार के ये गण्य लेखकों में हैं। थोडे दिनों से उपन्यास क्षेत्रा में पं. विनोदशंकर व्यास ने भी अपनी सहृदयता का परिचय देना प्रारम्भ किया है। उन्होंने कहानियाँ भी लिखी हैं और कुछ उपन्यास भी। उनमें भावुकता है और सूझ भी। इसलिए उनको उपन्यास लिखने में सफलता मिल रही है और वे अपने को इस कार्य के योग्य सिध्द कर रहे हैं। इनकी भाषा और भावों में एक प्रकार का आकर्षण पाया जाता है। बाबू गोपालराम गहमरी जासूसी उपन्यास लिखने के लिए प्रसिध्द हैं। इन्होंने भी बहुत अधिाक उपन्यास लिखे हैं और कीर्ति भी पाई है। जासूसी उपन्यास लिखने में हिन्दी संसार में इनका समकक्ष कोई नहीं पाया जाता। यह इनकी विशेषता है। इनकी भाषा चलती और सर्वसाधाारण के समझने के योग्य होती है। इनमें उपज और भावुकता भी है।

मैं समझता हूँ हिन्दी में जितने अधिाक उपन्यास आजकल निकल रहे हैं उतने अन्य विषयों के ग्रन्थ नहीं। आजकल उपन्यास का क्षेत्रा बड़ा विस्तृत है और उत्तारोत्तार बढ़ता जाता है। उपन्यासों ने हिन्दू संस्कृति को आजकल उलझनों में फँसा दिया है। आजकल की रुचि भिन्नता अविदित नहीं। कोई हिन्दू संस्कृति का आमूल परिवर्तन चाहता है, कोई उसको बिलकुल धवंस कर देना चाहता है, कोई उसका पृष्ठ पोषक है, कोई विरोधाी। किसी के विचार पर पाश्चात्य भावों का रंग गहरा चढ़ा है। कोई भारतीय भावों का भक्त है। किसी के सिर पर जातीय पक्षपात का भूत सवार है और कोई सुधाार के उन्माद से उन्मत्ता। निदान इस तरह के भिन्न-भिन्न भाव आज हिन्दू-समाज के क्षेत्रा में कार्य कर रहे हैं। अधिाकतर समाचार-पत्राों के लेख और उपन्यास ही अपने-अपने विचार प्रगट करने के प्रधाान साधान हैं। इसीलिए उपन्यासों का उत्तारदायितत्व कितना बढ़ गया है, यह कहने की आवश्यकता नहीं। परन्तु दुख है कि इस उत्तारदायित्व के समझने वाले इने-गिने सज्जन हैं। आजकल अपनी-अपनी डफली और अपना-अपना राग वाली कहावत ही चरितार्थ हो रही है। जो लोग शृंगार रस की कुत्सा करते तृप्त नहीं होते, उन्हीं लोगों को उपन्यासों में अश्लीलता का अभिनय करते अल्प संकोच भी नहीं होता। देश-प्रेम का सच्चा राग, जाति-हित की सच्ची प्रतिधवनि, आज भी बहुत थोड़े उपन्यासों में सुन पड़ती है। जिन दुर्बलताओं से हिन्दू समाज जर्जर हो रहा है, जिन कारणों से दिन-दिन उसका अधा:पतन हो रहा है, जो फूट उसको दिन-दिन धवंस कर रही है, जो अवांछनीय जाति-भेद की कट्टरता उसका गला घोंट रही है, जिन अन्धा-विश्वासों के कारण वह रसातल जा रहा है, जो रूढ़ियाँ मुँह फैलाकर उसको निगल रही हैं, क्या सच्चाई के साथ किसी उपन्यास लेखक की उस ओर दृष्टि है? क्या हिन्दुओं की नाड़ी टटोल कर किसी उपन्यासकार ने हिन्दुओं को वह संजीवन-रस पिलाने की चेष्टा की है, जिससे उनके रग-रग में बिजली दौड़ जाय? स्मरण रखना चाहिए कि हिन्दू जातीयता की रक्षा ही भारतीयता की रक्षा है क्योंकि हिन्दुओं में ही ऐसे धाार्मिक भाव हैं, जो विजातीयों और अन्य धार्मावलम्बियों से भी आत्मीयता का निर्वाह कर सकते हैं। सारांश यह कि आजकल के अधिाकांश उपन्यास मनोवृत्तिा-मूलक हैं। थोड़े ही उपन्यास ऐसे लिखे जाते हैं। जिनमें आत्माभावों को देश जाति अथवा धार्म की बलिदेवी पर उत्सर्ग करने की इच्छा देखी जाती है। इधार यथार्थ रीति से दृष्टि आकर्षित होना ही वांछनीयहै।

(4) जीवन-चरित

जीवन चरित्रा की रचना भी साहित्य का प्रधाान अंग है। जीवन-चरित्रा और उपन्यास में बड़ा अंतर होता है। उपन्यास काल्पनिक भी होता है। किन्तु जीवन-चरित किसी महापुरुष की वास्तविक जीवनचर्या के आधाार से लिखा जाता है। इसीलिए उसकी उपादेयता अधिाक होती है। हिन्दी में जीवन-चरित बहुत थोड़े लिखे गये और जो लिखे गये हैं वे भी कला की दृष्टि से उच्च कोटि के नहीं कहे जा सकते। फिर भी यह स्वीकार करना पडेग़ा कि इस विषय में आरा-निवासी बाबू शिव-नन्दन सहाय ने प्रशंसनीय कार्य किया है। उनका लिखा हुआ गोस्वामी तुलसीदास और बाबू हरिश्चन्द्र का जीवन चरित बहुत ही सुन्दर और अधिाकतर उपयोगी तथा गवेषणापूर्ण है। जीवन-चरित के लिए भाषा को भी ओजस्विनी और मधाुर होना चाहिए। उनकी रचना में यह बात भी पाई जाती है। उन्होंने चैतन्य देव एवं सिक्खों के दस गुरुओं की भी जीवनियाँ लिखी हैं। ये जीवनियाँ भी उत्तामता से लिखी गई हैं। इनमें भी उनकी सार ग्राहिणी प्रतिभा का विकास देखा जाता है। वे कवि भी हैं और सरस हृदय भी। इसलिए उनकी लिखी जीवनियों में उपन्यासों का-सा माधाुर्य आ गया है। पंडित माधाव प्रसाद मिश्र की लिखी हुई विशुध्द चरितावली भी आदर्श जीवनी है। पंडितजी की गणना हिन्दी भाषा के प्रौढ़ लेखकों में है। विशुध्द चरितावली की भाषा में वह प्रौढ़ता मौजूद है। उसमें उनकी लेखनी का विलक्षण चमत्कार दृष्टिगत होता है। पंडित रामनारायण मिश्र बी. ए. बनारस नागरी प्रचारिण्ाी सभा के स्थापकों में से अन्यतम हैं। आपका बनाया हुआ 'जस्टिस रानाडे का जीवन चरित' नामक ग्रन्थ भी अच्छा है। उसकी अनेक शिक्षाएँ उपदेशपूर्ण हैं। पंडित जी अच्छे गद्य लेखक हैं, और यथावकाश हिन्दी की सेवा करते रहते हैं। पंडित रामजी लाल शर्मा ने छोटी-बड़ी कई जीवनियाँ लिखी हैं। जिस जीवनी में उन्होंने भगवान रामचन्द्र का चरित्रा अंकित किया है, उसमें उनकी सहृदयता विकसित दृष्टिगत होती है और भी बहुत-सी छोटी-छोटी जीवनियाँ स्व-संस्थापित हिन्दी प्रेस से उन्होंने निकाली हैं, उनमें भी उनकी प्रतिभा की झलक मिलती है। पंडित ओंकारनाथ वाजपेयी ने अपने ओंकार प्रेस से छोटी-छोटी जीवनियाँ निकाली हैं। वे भी सुन्दर और उपयोगिनी हैं। राजस्थान निवासी स्व. मुंशी देवीप्रसाद ने कुछ मुसलमान बादशाहों, मीराबाई और राजा बीरबल की जीवन लिखी है और कुछ स्त्रिायों की भी परन्तु वे प्राचीन ढंग से लिखी गई हैं। फिर भी उनमें रोचकता और सरसता मिलती है और उनके पाठ से आनन्द आता है। पंडित ज्योतिप्रसाद मिश्र निर्मल ने 'स्त्राी कवि कौमुदी' नाम से हिन्दी स्त्राी कवयित्रिायों की एक जीवनी निकाली है। वह भी अच्छी है। पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी ने स्व. कविरत्न पंडित सत्यनाराण की अच्छी जीवनी लिखी है। उसमें उन्होंने जीवन-चरित लिखने की जिस शैली से काम लिया है वह प्रशंसनीय है। उनके सरल और भोले हृदय का विकास इस जीवनी में अच्छा देखा जाता है। वे एक उत्साही पुरुष हैं और उनके उत्साह का ही परिणाम यह जीवनी है, नहीं तो उसका लिखा जाना असम्भवथा।

(5) इतिहास

जीवन चरित और उपन्यास इन दोनों से भी इतिहास का स्थान बहुत ऊँचा है। जीवन-चरित का सम्बन्धा किसी एक महापुरुष अथवा उसके कुटुम्ब के कुछ प्राणियों या उससे सम्बन्धा रखने वाले कुछ विशेष मनुष्यों से होता है। उपन्यास की सीमा भी परिमित है। वह भी कतिपय व्यक्ति विशेषों पर अवलम्बित होता है, चाहे ये काल्पनिक हों अथवा ऐतिहासिक। परन्तु इतिहास का सम्बन्धा एकदेश, एक राज्य, किंबा एक समाज अथवा किसी जाति-विशेष से होता है। उसमें नाना सांसारिक घटनाओं के संघटन और मानव-समाज के पारस्परिक संघर्ष से उत्पन्न विभिन्न प्रकार के कार्य-कलाप सामने आते हैं, जो मानव-जीवन के अनेक ऐसे आदर्श उपस्थित करते हैं, जिनसे सांसारिकता के विभिन्न प्रत्यक्ष प्रमाण सम्मुख आ जाते हैं। इसलिए उसकी उपादेयता बहुत अधिाक बढ़ जाती है और यही कारण है कि इतिहास साहित्य का एक प्रधाान अंग है। हिन्दी संसार में इसके आचार्य राय बहादुर पं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा हैं। आप ऐसे उच्च कोटि के इतिहास लेखक हैं कि उनको समस्त हिन्दी संसार मुक्त कण्ठ होकर सर्वोत्ताम इतिहासकार मानता है। उन्होंने अपनी गवेषणाओं से बड़े-बड़े ऐतिहासिकों को चकित कर दिया है। शिलालेखों, मुद्राओं एवं अनेक प्राचीन पुस्तकों के आधाार से ऐसी-ऐसी ऐतिहासिक बातों को वे प्रकाश में लाये हैं जो बिलकुल अंधाकार में पड़ी थीं, उनको इन कार्यों के लिए बड़े-बड़े पुरस्कार मिले हैं। सरकार ने भी राय बहादुर की उपाधिा देकर उनकी प्रतिष्ठा की है। हिन्दी संसार ने भी साहित्य-सम्मेलन के द्वारा उनको 1200 रु. का मंगला प्रसाद पारितोषिक दिया है। इन सब बातों पर दृष्टि रखकर विचार करने से यह ज्ञात हो जाता है कि आपका इतिहासकारों में कितना उच्च स्थान है। आपने जितने ग्रन्थ बनाये हैं वे सब बहुमूल्य हैं और तरह-तरह की गवेषणाओं से पूर्ण हैं। आपके उपरान्त इतिहासकारों में पंडित विश्वेश्वरनाथ रेऊ का स्थान है। आप उनके शिष्य हैं और योग्य शिष्य हैं। आपका भी ऐतिहासिक ज्ञान बहुत बढ़ा हुआ है। श्रीयुत सत्यकेतु विद्यालंकार ने 'मौर्य साम्राज्य का इतिहास' नामक एक अच्छा इतिहास ग्रन्थ लिखा है, उसके लिए (1200रु.) पुरस्कार भी उन्होंने साहित्य सम्मेलन द्वारा पाया है। आपका यह इतिहास गवेषणापूर्ण, प्रशंसनीय और उल्लेख योग्य है। श्रीयुत जयचंद विद्यालंकार ने 'भारतवर्ष का इतिहास' नामक एक बड़ा ग्रंथ लिखा है। यह ग्रन्थ अभी प्रकाशित नहीं हुआ है,किन्तु मैं जानता हूँ कि यह उच्च कोटि का इतिहास है और इसमें ऐसी अनेक बातों पर प्रकाश डाला गया है, जो पाश्चात्य लेखकों की लेखनी द्वारा अन्धाकार में पड़ी थीं। अधयापक रामदेव का लिखा हुआ 'भारत का इतिहास' और गोपाल दामोदर तामसकर रचित 'मराठों का उत्कर्ष' नामक इतिहास भी प्रशंसनीय और उत्ताम हैं। ये दोनों ग्रन्थ परिश्रम से लिखे गये हैं और उनके द्वारा अनेक तथ्यों का उद्धाटन हुआ है। पं. सोमेश्वरदत्ता शुक्ल बी. ए. ने कुछ इतिहास ग्रंथ लिखे हैं और श्रीयुत रघुकुल तिलक एम. ए. ने 'इंग्लैण्ड का इतिहास' बनाया है। इन दोनों ग्रन्थों की भी प्रशंसा है। पंडित मन्नन द्विवेदी गजपुरी का बनाया हुआ मुसलमानी राज्य का 'इतिहास' नामक ग्रन्थ भी सुन्दर है और बड़ी योग्यता से लिखा गया है। भाषा इस ग्रन्थ की उर्दू मिश्रित है, परन्तु उसमें ओज और प्रवाह है लेखक की मनस्विता इस ग्रंथ में स्थल-स्थल पर झलकती दृष्टिगत होती है। आप सुकवि थे, परन्तु जीवन के दिन थोड़े पाये, बहुत जल्द संसार से चल बसे। भाई परमानन्द एम. ए. ने योरप का एक सुन्दर इतिहास लिखा है और प्रसिध्द वीरबन्दे गुरु का एक इतिवृत्ता भी रचा है। आप एक प्रसिध्द विद्वान् हैं और हिन्दू जाति पर उत्सर्गी कृत जीवन हैं। इसलिए आपके ये दोनों ग्रन्थ हिन्दू दृष्टिकोण से ही लिखे गये हैं, जो बड़े उपयोगी हैं।

(6) धार्म-ग्रन्थ

आर्य सभ्यता धार्म पर अवलम्बित है। धार्म ही उसका जीवन है और धार्म ही उसका चरम उद्देश्य। धार्म का अर्थ है धाारण करना। जो समाज को, देश को, जाति को उचित रीति से धाारण कर सके, उसका नाम धार्म है। व्यक्ति की सत्ताा धार्म पर अवलम्बित है। इसीलिए वैशेषिक दर्शनकार ने धार्म का लक्षण यह बतलाया है-

यतोऽभ्युदयनि:श्रेयस् सिध्दि: स धार्म:

जिससे अभ्युदय अर्थात् बढ़ती और नि:श्रेयस् अर्थात् लोक-परलोक दोनों का कल्याण हो उसी का नाम है धार्म। आर्य जाति और आर्य सभ्यता इसी मन्त्रा का उपासक, प्रचारक एवं प्रतिपालक है। किन्तु दुख है कि आजकल धार्म के नाम पर अनेक अत्याचार किये जा रहे हैं। अतएव कुछ लोग धार्म की जड़ खोदने के लिए भी कटिबध्द हैं। वे अधार्म को धार्म समझ रहे हैं,यह उनकी भ्रान्ति है सामयिक स्वार्थ परायणता, अन्धा-विश्वास और दानवी वृत्तिायों के कारण संसार में जो कुछ Religion और मजहब के नाम पर हो रहा है वह धार्म नहीं है, धार्माभास भी नहीं है। वह मानवीय स्वार्थ परायणता और अहम्मन्यता का एक निन्दनीयतम कार्य है जिस पर धार्म का आवरण चढ़ाया गया है। वैदिक धार्म अथवा आर्य सभ्यता न तो उसका पोषक है और न उसका पक्षपाती। जो कुछ आजकल हो रहा है, वह अज्ञान का अकाण्ड ताण्डव है। उसको कुछ भारतीय धार्मपरायण सज्जनों ने समझा है और वे उसके निराकरण के लिए यत्नवान् हैं। इस दिशा में बहुत बड़ा कार्य कवीन्द्र रवीन्द्र कर रहे हैं, वे संसार भर में भ्रमण कर यह बतला रहे हैं, धार्म क्या है। वे कह रहे हैं कि जब तक आर्य धार्म का अवलम्बन यथा रीति न किया जायगा, उस समय तक न तो संसार में शान्ति होगी और न उसकी दस्यु वृत्तिा का निवारण होगा। दस्युवृत्तिा का अर्थ परस्वापहरण है। भारतवर्ष में भी अनेक विद्वान धार्म रक्षा के लिए यत्नवान् हैं और सत्य का प्रचार कर रहे हैं। प्रचार का एक अंग ग्रंथ-रचना है, जिसका सम्बन्धा साहित्य से है। मेरा विषय यही है, इसलिए मैं यह बतलाऊँगा कि वर्तमानकाल में कितने सदाशय पुरुषों ने इस कार्य को अपने हाथ में लेकर उत्तामतापूर्वक किया है। मैं समझता हूँ, इस दिशा में कार्य करने वालों में भारतधार्म महामण्डल के स्वामी दयानन्द का नाम विशेष उल्लेख योग्य है। उनका सत्यार्थविवेक नामक ग्रंथ जो कई खंडों में लिखा गया है, वास्तव में आदर्श धार्म ग्रंथ है। आपने और भी धार्म-सम्बन्धाी ग्रंथ लिखे हैं और आजतक इस विषय में यत्नवान् हैं। आप जैसे संस्कृत के बहुत बड़े विद्वान् हैं वैसे ही अंग्रेजी के भी। आपके ग्रंथों की विशेषता यह है कि आप तात्तिवक विषय को लेकर उनकी मीमांसा पाश्चात्य प्रणाली और वैदिक सिध्दान्तों के आधाार से उपपत्तिापूर्वक करते हैं और फिर बतलाते हैं कि सत्य और धार्म क्या है। आपके ग्रंथ अवलोकनीय हैं और इस योग्य हैं कि उनका यथेष्ट प्रचार हो। स्वर्गीय पं. भीमसेन जी के पुत्रा पं. ब्रह्मदेव शर्मा भी इस विषय में बडे उद्योगशील हैं, उनका 'ब्राह्मण्ा सर्वस्व' नामक पत्रा इस दिशा में प्रशंसनीय कार्य कर रहा है। उन्होंने धार्म सम्बन्धाी कई उत्तामोत्ताम ग्रंथ भी निकाले हैं, जो पठनीय और मनन योग्य हैं। वास्तव में आप बड़े बाप के बेटे हैं। प्रसिध्द महोपदेशक कविरत्न पण्डित अखिलानन्द की अविश्राम शील महत्ताामयी लेखनी भी अपने कार्य में रत है, वह भी एक से एक अच्छे धाार्मिक ग्रंथ लिखते जा रहे हैं और आज भी धार्म रक्षा के लिए पूर्ववत् बध्द परिकर हैं। आपके जितने ग्रंथ हैं, सब बहुज्ञता और बहुदर्शिता से पूर्ण हैं, उनमें आपके पाण्डित्य का अद्भुत विकास देखा जाता है। लखनऊ के नारायण स्वामी द्वारा महर्षि कल्प स्वामी रामतीर्थ के सद्ग्रंथों का जो पुन: प्रकाशन और प्रचार हो रहा है वह भी महत्तवपूर्ण कार्य है। स्वामी जी के उपदेश और वचन भवभेषज और संसार तापतप्तों के लिए सुधाा सरोवर हैं, उनका जितना अधिाक प्रचार हो उतना ही अच्छा है। पं. कालूराम शास्त्राी का उद्योग भी इस विषय में प्रशंसनीय है। उन्होंने भी धार्म सम्बन्धाी कई उत्तामोत्ताम ग्रंथ लिखे हैं। पंडित चन्द्रशेख शास्त्राी का प्रयत्न भी उल्लेखनीय है। उन्होंने वाल्मीकि रामायण और महाभारत का सरल और सुन्दर अनुवाद करके उनका प्रचार प्रारम्भ किया है। उनमें धार्म-लिप्सा है, अतएव परमार्थ दृष्टि से उन्होंने अपने ग्रंथों का मूल्य भी कम रखा है। आजकल गोरखपुर के गीता प्रेस से जो धार्म-सम्बन्धाी पुस्तकें निकल रही हैं वे भी इस क्षेत्रा में उल्लेख योग्य कार्य कर रही हैं। बाबू हनुमान प्रसाद पोद्दार का उत्साह प्रशंसनीय ही नहीं, प्रशंसनीयतम है। वे स्वयं धाार्मिक ग्रंथ लिखते हैं और अन्य योग्य पुरुषों से धार्म्म ग्रंथ लिखाकर उनका प्रचार करने में दत्ता-चित्ता हैं। पंडित लक्ष्मीधार वाजपेयी का अनुराग भी इधार पाया जाता है। उन्होंने 'धार्म-शिक्षा' नामक एक पुस्तक और कुछ नीति-ग्रंथ भी लिखे हैं उनके ग्रंथ अच्छे हैं और सामयिक दृष्टि से उपयोगी हैं। उनका प्रचार भी हो रहा है। आर्य समाज द्वारा भी कतिपय धार्म सम्बन्धाी उत्तामोत्ताम ग्रंथ निकले हैं।

(7) विज्ञान

साहित्य का एक विशेष अंग विज्ञान भी है। बाह्य जगत् के तत्तव की अनेक बातों का सम्बन्धा विज्ञान से है। इस विषय के ग्रंथ अंग्रेजी भाषा में उत्ताम मौजूद हैं परन्तु हिन्दी भाषा में अब तक उनकी न्यूनता है। डॉक्टर त्रिालोकीनाथ वर्मा ने विज्ञान पर एक सुन्दर ग्रंथ दो भागों में लिखा है, उसका नाम, 'हमारे शरीर की रचना'। इस ग्रंथ पर उनको साहित्य-सम्मेलन से1200 का पुरस्कार भी मिला है। इससे इस ग्रंथ का महत्तव समझ में आता है। वास्तव में हिन्दी-संसार में विज्ञान का यह पहला ग्रंथ है, जो बड़ी योग्यता से लिखा गया है। प्रयाग में विज्ञान परिषत् नामक एक संस्था है। उसके उद्योग से भी विज्ञान के कुछ ग्रंथ निकले हैं। उस संस्था से 'विज्ञान' नामक एक मासिक पत्रा भी निकलता है। पहले इसका सम्पादन प्रसिध्द विद्वान् बाबू रामदास गौड़ एम.ए. करते थे, अब प्रोफेसर ब्रजराज एम. ए., बाबू सत्यप्रकाश एम‑ एस-सी‑ के सहयोग से कर रहे हैं। पत्रा का सम्पादन पहिले ही से अच्छा होता आया है, यही एक ऐसा पत्रा है, जिसके आधाार से हिन्दी-संसार में विज्ञान की चर्चा कुछ हो रही है। डॉक्टर मंगल देव शास्त्राी एम. ए. और नलिनी मोहन सान्याल एम. ए. ने भाषा विज्ञान पर जो ग्रंथ लिखे हैं,वे बडे सुन्दर हैं और ज्ञातव्य विषयों से पूर्ण हैं। उनके द्वारा हिन्दी भण्डार गौरवित हुआ है। हाल में एक ग्रंथ बाबू गोरखनाथ एम. ए. ने सौर परिवार नामक लिखा है, यह ग्रंथ बड़ा ही उत्ताम और उपयोगी है, उसको लिखकर ग्रंथकार ने एक बड़ी न्यूनता की पूर्ति की है।

(8) दर्शन

भारत का दर्शन शास्त्रा प्रसिध्द है। वैदिक धार्म के षड्दर्शन को कौन नहीं जानता? उसकी महत्ताा विश्व-विदित है। बौध्द दर्शन भी प्रशंसनीय है। स्वामी शंकराचार्य के दार्शनिक ग्रंथ इतने अपूर्व हैं, कि उन्हें विश्वविभूति कह सकते हैं, संसार में अब तक इतना बड़ा दार्शनिक उत्पन्न नहीं हुआ। श्री हर्ष का 'खंडन खंड खाद्य' भी संस्कृत भाषा का अलौकिक रत्न है। परन्तु हिन्दी भाषा में अब तक कोई ऐसा उत्ताम दर्शन ग्रंथ नहीं लिखा गया जो विशेष प्रशंसा प्राप्त हो। केवल एक ग्रंथ साहित्याचार्य पंडित रामावतार शर्मा ने दर्शन का लिखा है, जिसे नागरी प्रचारिणी सभा, बनारस ने छापा है। इस ग्रंथ का नाम 'योरोपीय दर्शन' है। पंडित जी बड़े प्रसिध्द विद्वान् थे। उन्होंने संस्कृत में भी कई महत्तवपूर्ण ग्रंथ लिखे हैं, परमार्थ दर्शन आदि। जैसे वे संस्कृत के उद्भट विद्वान् थे वैसा ही उनका अंग्रेजी का ज्ञान भी बड़ा विस्तृत था। वे एम. ए. थे, किन्तु उनकी योग्यता उससे कहीं अधिाक थी। इसलिए उनका बनाया हुआ 'योरोपीय दर्शन' नामक ग्रन्थ पांडित्यपूर्ण है। लाला कन्नोमल एम. ए. ने भी 'गीता दर्शन'नाम का एक अच्छा ग्रन्थ लिखा है। यह ग्रन्थ हिन्दी संसार में आदर की दृष्टि